अधिक मास व्याख्यायान
अधिकमास (मलमास) तथा क्षयमास का विवरण
१२ चंद्रमास के कारण ३५४ दिनों का अपना वर्ष होता हैं तथा सौर वर्ष ३६५ दिनों का होताहैं। इसका अर्थ यह हुआ की हर वर्ष सौर वर्ष से चांद्र वर्ष ११ दिन कम होता है। हर वर्ष ११ दिन बाकी रहने से जब ३० दिन होने को होते है, तब साधारण हर तीन वर्ष बाद एक अधिक मास आता है तथा सौर वर्ष से इसका मेल जुड़ जाता है। अतः ऋतुचक्र व कालचक्र का समायोजन हो जाता है।प्रत्येक चांद्रमास में अमावस्या के पूर्व सूर्य का संक्रमण होता है। परंतु सूर्य की धीमी गति के समय सामान्यतः २७ से ३५ महिनों की कालावधि में एकाध चांद्रमास की अमावस्या समाप्ति के पूर्व सूर्य का राशि संक्रमण नहीं होता है। अतः ऐसे मास को मलमास या अधिकमास से संबोधित किया जाता है। उसके पश्चात् आनेवाले मास को शुद्ध मास या निज मास कहा जाता है।
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक एवं फाल्गुन इन्हीं महिनों में से कोई एक महीना तीन वर्ष के बाद अधिक मास हो सकता है। (मार्गशीर्ष, पौष तथा माघ कभी अधिक मास नहीं होते हैं।) जिस चांद्रमास में सूर्य का राशि संक्रमण दो बार होता हैं उसे क्षयमास कहते है। यह क्षयमास सामान्यतः १४१ या कभी १९ वर्ष में आता हैं। इस मास को क्षयमास कहते हुए अगले मास का नाम भी दिया जाता है। जिस वर्ष क्षयमास आता हैं उस वर्ष क्षयमास के पूर्व एक अधिकमास तथा क्षयमास के पश्चात् एक अधिकमास आता है। पूर्व में आनेवाले अधिकमास को संसर्प तथा क्षयमास को अंहस्पति कहा जाता है। (कार्तिक, मार्गशीर्ष तथा पौष इनमें से कोई एक क्षयमास होता है, परंतु माघ मास क्षय मास या अधिक मास नहीं होता है।)शक १८८५ में कार्तिक मास क्षयमास था (क्षय मास के पूर्व कार्तिक ही अधिक मास था)उसके बाद शक १९०४ में पौष क्षय मास था (क्षय मास के बाद फाल्गुन मास अधिक मास था)इसके बाद शक २०४५ में मार्गशीर्ष यह क्षयमास होगा (क्षय मास के पूर्व आश्विन मास अधिकमास होगा) तथा शक २०६४ में पौष मास क्षय मास होगा (क्षय मास के पूर्व आश्विन अधिकमास होगा)।
100 ब्रह्मवर्ष - पथकाला। चन्द्र मास, सौर मास तथा अंग्रेजी मासों में तुलना हमारे त्योहार ऋतुओं के त्योहार हैं। (प्रमुख त्योहार वर्ण व्यवस्था के अनया चार ही हैं। क्योंकि 14 अप्रैल से भारतीय वर्षारम्भ होता है अत: सबसे पर त्योहार है रक्षाबंधन-ब्राह्मणों का। दूसरा दशहरा-क्षत्रियों का। तीसरा दीपावली वैश्यों का तथा वर्षांत में अंतिम त्योहार है होली-शूद्रों का।)
ऋतुओं एवं मासों की मेल बैठाने का कार्य पंचांगकारों का है। चंद्रवर्ष सौर वर्ष से छोटा होता है, अत. अधिक मास की योजना की गई है-यह पहले बता ही आएं हैं। __अब तक आप जान चुके हैं कि चन्द्रमा अपनी कक्षा में एक गति से नहीं। चलता, अतः तिथियों की लम्बाई घटती-बढ़ती रहती है। पृथ्वी की बात भी कुछ। चन्द्र जैसी ही है। वह भी सूर्य की परिक्रमा एक ही गति से नहीं करती। अतः। आकाश में सूर्य सदा एक-सी गति से चलता दिखाई नहीं देता।
सूर्य का एक आकाशीय चक्र पूरे एक वर्ष का है। 30° के 12 भाग रविमार्ग के करने से 12 राशियां और 12 सौर मास बनते हैं। एक राशि में (30°) सूर्य एक मास रहता है। यानी प्रतिदिन 1° चलता है। सूर्य के मास संक्रांति मास या सौर मास कहे जाते हैं। परन्तु गति एक-सी न होने के कारण सौर मासों की लम्बाई भी एक-सी नहीं होती। सौर मासों की लम्बाई 29 दिन 10 घंटे 38.6 मिनट से 31 दिन 10 घंटे 54.6 मिनट तक होती है। कारण यह कि पृथ्वी का सूर्य की परिक्रमा का मार्ग दीर्घवृत्ताकार/अंडाकार है। अत: सूर्य के निकट होने पर उसकी गति तेज और दूर होने पर धीमी पड़ जाती है। अत: सामान्यतः अगहन, पौष तथा माघ छोटे व जेठ, आषाढ़ एवं श्रावण लम्बे महीने होते हैं। सौर मासों की लम्बाई 29/10/38.6 से 31/10/54.6 की है तो चन्द्र मासों की औसत लम्बाई 29.53049 दिवस है (सौर मासों की औसत लंबाई 30.43685 दिवस की हुई)।
चन्द्र मासों के लिए एक भारतीय नियम और भी है। जिस महीने में सूर्य संक्रान्ति हो उसे ही महीने का नाम दिया जाए। यदि किसी चन्द्रमास में सर्य संक्रान्ति न हुई तो वह मास बेनाम' (अधिक मास) हो जाता है। सौर मास चन्द्र मास से अधिक लम्बे हैं। अतः अमावस या उससे कुछ पूर्व सूर्य संक्रांति हो और दूसरी अगली अमावस के बाद हो तो बीच वाला चंद्र मास संक्रान्तिहीन होने से 'बेनाम' (अधिक मास) हो जाता है। परन्तु कभी इसका उल्टा भी हो सकता है।
यद्यपि चन्द्र मास सौर मासों से औसतन छोटे हैं। परन्त फिर भी सबसे छोटा सौर मास 29 दिन 10 घंटे 38.6 मिनट का होने से औसत चन्द्र मास से छोटा है। अतः ऐसे अवसर पर यदि शुक्लपक्ष में प्रारम्भ से सूर्य संक्रान्ति हो जाए तो कृष्ण पक्ष के अंतिम समय या अमावस तक दूसरी सर्य संक्रान्ति सम्भव हो जाती है। तब एक ही चंद्र मास को दो मासों का नाम देने की नौबत आ जाती है। अतः हमें एक मास का नाम छोड़ना पड़ता है। यह मास 'बेनाम' तो होता है, परन्तु अधिक नहीं। अत: इसको क्षय मास/लौंध का महीना कहते हैं।
यद्यपि मास का क्षय हो जाए ऐसी स्थिति औसतन 63 वर्षों में एक ही बार होती है। पर होती अवश्य है (कम से कम 19 वर्ष में तथा अधिकाधिक 141 वर्ष में एक क्षय मास आता है। औसतन 63 वर्ष में) । लेकिन यह भी मजे की बात है। कि क्षय मास से पहले और बाद का एक-एक महीना अधिक मास बनता है (यानी। कि क्षयमास अकेला नहीं आता, वह अपने साथ दो अधिक मास लेकर आता है- अपने आगे व पीछे एक-एक)। अधिकमास को मलमास भी कहते हैं। अगहन, पौष और माघ छोटे महीने होते हैं। जब क्षयमास बनता है, तब इन्हीं का क्षय होता है। बाकी महीनों में से कोई भी अधिक मास' बन सकता है। प्राय: जेठ, आषाढ तथा सावन (श्रावण) ही अधिक मास बनते हैं।'
अंग्रेजी महीनों में यह झंझट नहीं है। इस दृष्टि से उनकी व्यवस्था उत्तम है। । एक महीना 30 और एक 31 का करके तथा फरवरी 28 का करके उन्होंने 12 । महीनों की समुचित व्यवस्था की है। केवल 4 वर्ष बाद (LEAP YEAR) में उन्हें । फरवरी में एक दिन बढ़ाना पड़ता है (मुसलमानों में चन्द्रमासों का वर्ष होता है। अत: भले ही उनके रोजे ताजिए अलग-अलग ऋतुओं में सरक जाते हों मगर । क्षयमास या अधिकमास का झंझट वहां भी नहीं होता)।
अतः भारतीय तिथियों के । पंचांग की तुलना में अंग्रेजी कैलेण्डर बहुत सरल है। यद्यपि सर्वांगता की दृष्टि से । वह भी अनुकूल नहीं पड़ता। (तिथियों, मुहूर्त, योगों आदि का सूक्ष्म गणित तो । - अंग्रेजी पंचांगों में है ही नहीं, इसके अलावा) उनके वर्षारम्भ अलग-अलग दिनों । में होते हैं तथा उनके वर्ष में सप्ताह पूरे नहीं बनते। (365-7-521/ सप्ताह होते हैं)। बहरहाल और अधिक विस्तार में न जाते हुए हम पाठकों को मासों के नाम बताते ।
हिन्दी (भारतीय)-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन,' कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन (ये नाम नक्षत्रों के आधार पर हैं। क्रमशः । चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, पू. आषाढ़, श्रवण, भाद्रपद, अश्विनी, कतिका, मृगशिरा, पुष्य, मघा, पू. फाल्गुनी)। इनको प्रचलित नामों से अपभ्रंश रूप से भी पुकारा जाता है-जैसे क्रमश: चैत, बैसाख, जेठ, आषाढ़, सावन, भादों, क्वार, कार्तिक, अगहन, पूस, माघ, फागुन।
ENGLISH नाम हम जानते ही हैं-APRIL, MAY, JUNE, JULY, AUGUST SEPTEMBER. OCTOBER. NOVEMBER, DECEMBER JANIYA FEBRUARY, MARCH. सुविधा के लिए ENGLISH नाम भी भारतीय मासों के क्रम में रख दिरा हैं, वरना ये JAN. से DEC. के क्रम में होते हैं। अब सौर मास व चन्द्र मासों के नाम जानें सौर मास चन्द्र मास (लगभग) ENGLISH MONTH मेष मास (1) (2) वैशाख लगभग 14 अप्रैल से 13 मई वृष मास (2) (3) ज्येष्ठ लगभग 14 मई से 13 जून मिथुन मास (3) (4) आषाढ़ लगभग 14 जून से 13 जुलाई कर्क मास (4) (5) श्रावण लगभग 14 जुलाई से 13 अगस्त सिंह मास (5) (6) भाद्रपद लगभग 14 अगस्त से 13 सितम्बर कन्या मास (6) (7) आश्विन लगभग | 14 सितम्बर से 13 अक्टूबर तुला मास (7) (8) कार्तिक लगभग 14 अक्टूबर से 13 नवम्बर वृश्चिक मास (8) (9) मार्गशीर्ष लगभग 14 नवम्बर से 13 दिसम्बर धनु मास (9) (10) पौष लगभग | 14 दिसम्बर से 13 जनवरी मकर मास (10)| (11) माघ लगभग 14 जनवरी से 11 फरवरी कुम्भ मास (11) (12) फाल्गुन लगभग | 12 फरवरी से 13 मार्च मीन मास (12) (1) चैत्र लगभग |14 मार्च से 13 अप्रैल
विशेष स्मरणीय तथ्य सौर मास-जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है। उस दिन को उस मास का प्रथम दिन मानकर उसी राशि के नाम द्वारा मास को पुकारा जाता है। (एक राशि 30° की है। सूर्य एक दिन में 1° चलता है। अत: एक राशि 30 दिन में पार करेगा। इसलिए सौर मास सदा 30 दिन का होता है।) मास का नाम सुनते ही पता चल जाता है कि सूर्य इस मास किस राशि में है।
चन्द्रमास-प्रत्येक मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, उसी नाम से उस मास को पुकारा जाता है। अत: मास का नाम सुनते ही पता चल जाता है कि चन्द्रमा इस मास की पूर्णिमा को किस नक्षत्र में होगा। चन्द्र मास 27 से 29 दिन का स्थूल रूप में होता है।
ENGLISH ENGLISH मासों की प्राय: 13-14-15 तारीखों में सूर्य संक्रांति करता है। फरवरी क्योंकि 28 दिन का है। अत: वहां 11-12 तारीख ऊपर लिखी गई है। सौर वर्ष सदैव मेष मास या सौर वैशाख से ही आरम्भ होता है। जबकि चन्द्र वर्ष चैत्र से आरम्भ होता है (अत: कोष्ठकों में मासों की संख्याओं में पाठक चन्द्र 1 मासों में 1 नम्बर को बाद में पाएंगे)। जबकि ENGLISH YEAR-JANUARY से प्रारम्भ होता है (वित्तीय या राष्ट्रीय वर्ष 1 अप्रैल से आरम्भ होता है)। अत: हिन्दी मासों में लगभग ENGLISH मासों का समय भी आगे लिख दिया गया है।
सौर मास, चन्द्र मास तथा अंग्रेजी मासों में एक ही समय का तालमेल दर्शाने के लिए क्रम संख्याओं में परिवर्तन कर दिए गए हैं। यहां हम पंचांग विभाग समाप्त करते हैं। परन्तु आगे बढ़ने से पूर्व यह और स्पष्ट करते चलें कि ज्योतिष में प्रमुख सात ग्रहों को 'काल स्वामित्व' भी दिया गया है। उसके अनुसार वर्ष का स्वामी 'शनि' होता है तथा मास का स्वामी 'गुरु' होता है। ऋतु का स्वामी बुध' है तो अयन का स्वामी 'सूर्य' है। दिवस (दिन-रात) का स्वामी 'मंगल' है तो पक्ष का स्वामी 'शुक्र' है। 'चन्द्रमा' मुहूर्त का स्वामी माना गया है। अत: मुहूर्त देखते समय चन्द्रमा की स्थिति को विचारना परमावश्यक है। कई बार तो मात्र चन्द्रमा का विचार ही पर्याप्त रहता है। (और तथ्यों पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती)। ग्रहों का काल स्वामित्व काल ग्रह स्वामित्व अयन (6 मास) चन्द्र मुहूर्त (48 मिनट) मंगल दिवस/दिन रात (24 घंटे) बुध ऋतु (2 मास) शुक्र पक्ष (15 दिन) मास (30 दिन) वर्ष (12 मास)
इसवी सन् 2001 से 2100 तक के अधिकमास (केस में दिया हुआ आंकड़ा शालिवाहन शक का है।).
मलमास कार्याकार्य विचार
अधिक मास में श्रीपुरुषोत्तम प्रीत्यर्थ संपूर्ण मास में उपवास, अयाचित, नक्तभोजन अथवा एक समय भोजन करना चाहिए। दुर्बल व्यक्ति इनमें से किसी एक प्रकार का व्रत ३ दिन तक कर सकता है अथवा यह भी संभव न हो तब कम से कम एक दिन व्रत करना चाहिए। संपूर्ण मास में तांबूलदान करनेपर सौभाग्यप्राप्ति, भगवान के पास अखंड ज्योत लगानेपर लक्ष्मी प्राप्ति, एक दिन गंगास्नान करनेपर सभी पापों से निवृत्ति हो जाती है। संपूर्ण मास में भोजन करते समय मौन रखने से भी पापों से निवृत्ति हो जाती है। संभव हो तो संपूर्ण मास में प्रतिदिन अपूपदान करना चाहिए। यह संभव न हो तब शुक्ल व कृष्ण द्वादशी, पूर्णिमा, कृष्ण अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा अमावस्या इन तिथियों के दिन तथा व्यतीपात एवं वैधृति हो उस दिन अपूपदान करना चाहिए। बहुत ही दुर्बल व्यक्ति हो तो उसे उपरोक्त किसी एक तिथि अथवा मन में जब श्रद्धाभाव जागे तब अपूपदान करना चाहिए। (अपूप अर्थात् अनरसा)
अपूपदान का संकल्पः 'मम त्रयस्त्रिंशद्देवतात्मक विष्णुरूपि सहस्रांशु श्रीपुरुषोत्तमप्रीतिद्वारानिखिलपापप्रशमपूर्वकं पुत्रपौत्रयुतधनधान्यक्षेमसमृद्धि लोकद्वय सुखहेतु पृथ्वीदान फल प्राप्त्याऽपूपच्छिद्र समसंख्य वर्ष सहस्रावधि स्वर्लोकनिवासादिकल्पोक्त फलसिद्ध्यर्थं
• मलमासप्रयुक्त अपूपदानं करिष्ये।' इस तरह संकल्प कर दानवस्तु का पूजन करना चाहिए। 'इदं सोपस्करं त्रयस्त्रिंशदपूपदानं सदक्षिणाकं सतांबूलं पुरुषोत्तमप्रीतिकामस्तुभ्यमहं संप्रददे।।'
ऐसा उच्चारणकर दान देना चाहिए। दान प्राप्त करनेवाले को निम्न श्लोक का उच्चारण करते हुए दान ग्रहण करना चाहिए - ‘त्वयादत्तमिदं पात्रं परमान्नेनपूरितं। सघृतं प्रतिगृह्णामि प्रीयतां
ते दिवाकरः ।।'
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इस प्रकार से जो ३३ अपूपदान देगा उसे पुत्रपौत्र तथा सम्पत्ती प्राप्त होगी। वर्तमान समय में लोग पुरुषोत्तम मास में विविध वस्तुओं का भी दान देते हैं।
पुरुषोत्तम मास का कार्याकार्य विचार
नित्य नैमित्तिक कार्य करने चाहिए। काम्यकर्मों का आरंभ तथा समाप्ति नहीं करनी चाहिए। जो काम करना अपरिहार्य हैं वह करना चाहिए। ज्वरशांति, पर्जन्येष्टि आदि काम्यकर्म कर सकते हैं। देवताओं की पुनःप्रतिष्ठा कर सकते हैं। ग्रहणश्राद्ध, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन आदि संस्कार कर सकते हैं। मन्वादि तथा युगादि संबंध के श्राद्धादि कर्म कर सकते हैं। तीर्थश्राद्ध, दर्शश्राद्ध, नित्यश्राद्ध कर सकते हैं, महालयश्राद्ध ना करें। महादान, गृहारंभ, वास्तुशांति, संन्यास ग्रहण, नूतन व्रतग्रहण दीक्षा, विवाह, उपनयन, चौल, नूतन देवता प्रतिष्ठा, काम्ययाग नहीं कर सकते, लेकिन विश्वकल्याण हेतु काम्ययाग कर सकते हैं। मंगलकार्य के पूर्व (ग्रहमख) गणपति पूजन आदि कर सकते हैं। ६० एवं ७५ वर्षपूर्ति जैसे शांति कर्म नहीं करने चाहिए। विवाहनिश्चय (ऍंगेजमेण्ट), गोदभराई (Baby Shower), वास्तुशांति किए बगैर लौकिक गृहप्रवेश, जगह या फ्लेट का क्रय-विक्रय आदि कर सकते है। नारायण नागबली, त्रिपिंडी जैसे कर्म गंगा, गोदावरी, गया आदि तीर्थक्षेत्र में कर सकते हैं। तात्पर्य यह है, अगतिक कर्म कर सकते है परंतु सगतिक कर्म मलमास के पश्चात् ही करने चाहिए।
पुरुषोत्तम (अधिक) मास में श्राद्ध कब करना चाहिए?
जिस मास में निधन हुआ हो वही मास अधिक मास हो तो, प्रथम वर्षश्राद्ध अधिक मास में कर सकते है। उदाहरण - ज्येष्ठ मास में किसी व्यक्ति का निधन हो गया हो तथा अगले वर्ष में अधिक मास ज्येष्ठ हो तब प्रथम वर्ष श्राद्ध अधिक ज्येष्ठ मास में ही करना चाहिए। हर वर्ष का प्रति सांवत्सरिक श्राद्ध निज मास में ही करना चाहिए, परंतु कुछ वर्ष पूर्व किसी व्यक्ति का निधन अधिक मास में हुआ हो तथा कालांतर से वही महीना अधिक मास हो तब उसका प्रति सांवत्सरिक श्राद्ध अधिक मास में करना चाहिए। अधिकमास के पूर्व के वर्ष अन्य मास में यदि किसी व्यक्ति का निधन हो जाता है, तब प्रथम वर्षश्राद्ध उसी महीने में करना चाहिए। १३ मास होते हैं इसलिए एक महीना पूर्व नहीं करना चाहिए। वर्तमान अधिक मास में किसी व्यक्ति का निधन हो गया हो तो, उस व्यक्तिका प्रथम वर्ष श्राद्ध आगामी वर्ष के उसी मास में करना चाहिए।