क्या करें, जब कुंडली उपलब्ध न हो?
क्या करें, जब कुंडली उपलब्ध न हो?
सम्पूर्ण जानकारी होने पर भी फलादेश का सटीक होना, मूलतः इस बात पर निर्भर करता है कि लग्नकुंडली शुद्ध व सटीक बनी हुई हो (क्योंकि फलादेश का आधार ही लग्नकुंडली है। अब यदि लग्नकुंडली ही ठीक नहीं होगी तो जाहिर है फलादेश भी सही नहीं होगा। कम से कम सटीक तो हरगिज नहीं होगा)। अतः कुण्डली का शुद्ध/निर्दोष एवं सटीक/एक्यूरेट बना होना सटीक फलादेश के लिए अनिवार्य है।
लग्नकुंडली का सही व सटीक होना बावजूद उसे बनाने की विधि की सही जानकारी के, मूलतः जन्म सम्बन्धी आंकड़ों के सटीक होने पर आधारित है (यानी जातक का जन्म स्थान, जन्म तिथि व जन्म समय-ये तीनों शुद्ध व सही होने चाहिए, तभी सटीक लग्नकुंडली बनाई जा सकती है)। प्रायः देखा गया है कि ज्ञान न होने के कारण लोग समय के मामले में सतर्कता नहीं रखते। समय उन्हें लगभग पता होता है, सटीक नहीं। बात पुरानी हो जाए तो तिथि भी उन्हें अन्दाजन याद रहती है, सटीक नहीं। और बहुत से लोगों को तो तिथि, समय आदि याद ही नहीं होते। यह एक विकट समस्या है।
अक्सर ऐसे भी लोग ज्योतिषज्ञों के पास आते हैं, जिन्हें अपनी जन्मतिथि व जन्म समय का पता ही नहीं होता। मात्र जन्म स्थान का ही पता होता है या उसका भी सिर्फ अंदाजा होता है। ऐसे मामलों में वे स्कूल में लिखी जन्मतिथि से ही प्रत्येक कार्य में काम चलाते हैं, किन्तु ज्योतिष में वह काम इसलिए नहीं चला पाती क्योंकि स्वयं जातक ही इस विषय में संदिग्ध होता है कि स्कूल में लिखाई तिथि सत्य है या कल्पित। इसके अलावा समय के मामले में वे सिर्फ इतना ही जानते हैं कि दिन का जन्म था या रात का। कुछ मामलों में जन्मतिथि में सम्बन्धित किसी विशेष घटना/त्यौहार आदि का उन्हें ज्ञान होता है। ऐसे में 100 वर्ष के पंचांग द्वारा उनकी तिथि तो ज्ञात कर ली जाती है। पर समय फिर भी मालूम नहीं हो पाता।
जन्मतिथि, जन्म समय व जन्म स्थान-ये तीनों कुंडली निर्माण के मूल घटक हैं। इन्हें जाने बिना कुंडली बनाई नहीं जा सकती। ये जितने सटीक होंगे, कुंडली भी उतनी ही सटीक बनेगी। अतः फलित भी उतना ही सटीक होगा। इन तीनों में से एक भी घटक डप्ैै या संदेहास्पद हो तो सही कुंडली का निर्माणमा सामान्य परिस्थितियों में सम्भव नहीं होता। यद्यपि ।क्ट।छब्म् ज्योतिष में अथवा विशेषज्ञों द्वारा ऐसे लुप्त या संदेहास्पद घटक को ढूंढा जा सकता है और वे ऐसा करते भी हैं। परन्तु उसके लिए जितनी कवायद करनी पड़ती है, तदनुसार पारिश्रमिक देने को जातक तैयार नहीं होता, अतः उसे असम्भव कहकर प्रायः ऐसे मामलों में मना ही कर दिया जाता है। (पुस्तक क्योंकि ज्योतिष की प्रारम्भ से लेकर उच्च स्तर में तक की जानकारी पर ही आधारित है। अतः उच्चतर या विशेषज्ञता के स्तर के सूत्र इसमें संकलित नहीं किए गए हैं। फिर भी इस मामले में रुचि रखने वाले जातकों के लिए (जन्म सम्बन्धी मूल घटकों में से खोए हुए को ढूंढ़ने सम्बन्धी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए) पुस्तक नष्ट जातकम् पढ़नी चाहिए।)
यद्यपि तीनों ही घटक लापता हों तब भी जातक की कुण्डली बनाना ज्म्ब्भ्छप्ब्।स्ल् सम्भव है और विशेषज्ञ ज्योतिषी ऐसा कर सकता है (यह बीज से फल का अनुमान लगाने की बजाय फल से बीज का अनुमान लगाने की भांति है)। पर कान को हाथ घुमाकर पकड़ने की तरह यह मार्ग न केवल लम्बा व उलझन वाला है, बल्कि च्त्।ब्ज्प्ब्।स्ल् सम्भव भी नहीं हो पाता। क्योंकि एक तो इसमें ज्योतिषी कोई महारथी होना चाहिए। दूसरे जातक को अपने जीवन की प्रमुख तथा महत्वपूर्ण घटनाओं का समय आदि क्रमबद्ध रूप से याद होना चाहिए। दोनों का मिलन (ऐसा योग्य जातक व ऐसा योग्य ज्योतिषी) अर्जुन- कृष्ण या जनक-अष्टावक्र के मिलन की भांति प्रायः दुष्कर व दुर्लभ होता है। अतः इसे असम्भव-सा ही मानते हैं।
फिर भी जिनकी कुंडली न हो अथवा विदेश गमन के समय/कार्य व्यवसाय में घर/देश से बाहर रहते समय जातक के पास अपनी कुंडली उस समय मौजूद न हो-जब वह किसी विशेष मामले में ज्योतिषी से परामर्श लेना चाहता हो-उन लोगों के लिए एक सरल विधि भी ज्योतिष शास्त्र में बनाई गई है। जिसके माध्यम से सम्पूर्ण जीवन का तो नहीं, किन्तु तात्कालिक समस्या या प्रश्न का उत्तर दिया जा सकता है। अथवा जब-जब जीवन में ऐसा अवसर उत्पन्न हो, तब-तब उस विधि से जातक की तात्कालिक समस्या का समाधान किया जा सकता है। यह विधि है-’प्रश्नकुंडली’ बनाकर फलित करना। पाठकों को इस विधि की जानकारी दिए बिना हम पुस्तक को बहु उपयोग तथा सम्पूर्ण नहीं बना सकते। तो आइए, जानें-प्रश्नकुंडली की प्रणाली को-
प्रश्नकुंडली: निर्माण एवं उपयोग
कुंडली बनी हुई न हो अथवा उपलब्ध न हो। इन मामलों में तो प्रश्नकुंडली उपयोगी है ही। किन्तु बहुत से ऐसे तात्कालिक प्रश्नों के उत्तर भी प्रश्नकुंडली के माध्यम से तुरंत व सरलता से जाने जा सकते हैं - जिनका लग्नकुंडली द्वारा उत्तर पाना काफी टेढ़ा या विलम्ब वाला होता है (जैसे मुकदमे में जीत किसकी होगी? अमुक व्यक्ति से मित्रता/साझेदारी करें या नहीं? मकान कब बनेगा? नया कार्य शुभ रहेगा या नहीं? रोगी कब तक ठीक होगा? खोई वस्तु या चोरी गई वस्तु मिलेगी या नहीं? मृत्यु का वास्तविक कारण क्या था? संतान कब होगी ? परीक्षा में सफलता मिलेगी या नहीं? काम बनेगा या नहीं? यात्रा कब होगी? तरक्की कब होगी? गया हुआ व्यक्ति लौटेगा/नहीं, अथवा कब लौटेगा? इत्यादि)।
अतः प्रश्नकुंडली बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। जन्मकुंडली के साथ अन्य षोडश वर्गों को (कम से कम षडवर्गों को), दशा/अंतर्दशा, अष्टक बल आदि को देखना पड़ता है। तब आप कुछ सटीक जान पाते हैं। परन्तु यहां मात्र एक प्रश्नकुंडली के द्वारा ही सम्बन्धित प्रश्न का हल जाना जा सकता है। अतः यह अधिक सरल, शीघ्र तथा उपयोगी रहती है। इसे बनाने में भी लग्नकुंडली बनाने की अपेक्षा बहुत कम परिश्रम करना पड़ता है। अतः जनसामान्य के लिए अधिक सुविधाजनक है।
प्रश्न उठ सकता है कि प्रश्नकुंडली की प्रणाली कितनी विश्वसनीय है? को इसके उत्तर में यह सीना ठोक कर कहा जा सकता है कि प्रश्नकुंडली पर पूर्ण विश्वास किया जा सकता है। जितनी ईमानदारी से प्रश्न किया जाएगा, उतना ही या सही परिणाम प्राप्त होगा (ईमानदार प्रश्न पर प्रश्नकुंडली प्रायः लग्नकुंडली की इसे तरह ही बनती है। अथवा उससे बहुत कुछ मेल खाती है)। दरअसल प्रश्नकुंडली की कार्य प्रणाली प्रश्न किए जाने के समय के लग्न तथा ग्रह दशा के अध्ययन पर नाय कार्य करती है। अतः उसी समय जन्म लेने वाले जातक की जन्मकुंडली की भांति दन उसका भविष्य बताती है। अन्तर मात्र यह होता है कि यहां जातक का स्थान प्रश्न लेता है। अतः प्रश्नकुंडली प्रश्न का भविष्य बताती है तथा प्रश्नकर्ता का भी, क्योंकि प्रश्न का प्रश्नकर्ता के साथ एक सुनिश्चित सम्बन्ध होता है। हां, लेकिन इसे विनोद के रूप में प्रयोग किया जाए या कुछ समय बाद पुनः वही प्रश्न दोहराकर कुंडली बनाई जाए तो परिणाम शुद्ध नहीं होते। अतः यह हंसी-मजाक या खेल के रूप में प्रयुक्त नहीं की जानी चाहिए। आवश्यक होने पर ही प्रयुक्त की जानी चाहिए।
प्रश्नकुंडली बनाने के लिए सर्वप्रथम वह समय नोट किया जाना चाहिए, जब कर्ता ने प्रश्न किया है (यदि आवश्यक हो तो स्थान भी नोट किया जाना चाहिए)। उस दिन, उस समय के लग्न को पंचांग से ज्ञात करना चाहिए तथा उस लग्न की कुंडली बनाकर जो ग्रह गोचर में जहां हो, उसे उसी राशि में प्रश्नकुंडली में बैठा देना चाहिए (यह समस्त जानकारी ब्न्त्त्म्छज् वार्षिक पंचांग में उपलब्ध
रहती है)। यह ध्यान रखना चाहिए कि पंचांग में-वार, तिथि, नक्षत्र आदि सब सूर्योदय से ही चलते हैं। अतः पंचांग में दैनिक ग्रह स्पष्ट-उस दिन के सूर्योदय के समय के होते हैं। इसलिए प्रश्न के समय उनकी स्थिति क्या होगी, इसे विचार लेना चाहिए। विशेषरूप से चन्द्रमा को, क्योंकि वह सवा दो दिन में राशि बदल लेता है। अतः दो घंटे के आसपास एक अंश चल चुकता है। अतरू यदि वह सूर्योदय के समय किसी राशि के प्रायः अंतिम अंशों में हो तो दोपहर, शाम या रात के समय के लग्न में अगली राशि में प्रविष्ट हो चुका हो सकता है। चन्द्रमा के बाद मंगल, बुध, शुक्र को भी तब जरूर विचार लें जब वे 29 के आसपास हों।
लग्न निकालने का एक सरल तरीका भी है जिससे पंचांग उपलब्ध न होने पर अथवा मार्ग पर चलते-चलते ही प्रश्न का लग्न मौखिक रूप से निकाला जा सकता है। और मजे की बात यह है कि प्रश्न का आधा उत्तर तो प्रश्नलग्न से ही मिल जाता है। शेष आधे के लिए ही पूरी कुंडली बनाने तथा ग्रहों पर विचार करने की आवश्यकता पड़ती है। मौखिक लग्न निकालने की यह सरल विधि मेरे सुयोग्य आचार्य श्री मदन मोहन कौशिक ने कृपा करके मुझे बताई थी और उन्हें उनके पूज्य गुरु श्री के. एन. राव से प्राप्त हुई थी। यह विधि स्थूल रूप से बिल्कुल सही उतरती है (स्थूल रूप इसलिए कहा क्योंकि इससे लग्न के अंश ज्ञात नहीं हो पाते, परन्तु लग्न अवश्य ही ज्ञात हो जाता है)। पाठकों की सुविधा तथा ज्ञानवर्धन के लिए यह विधि भी प्रस्तुत कर रहा हूं।
मौखिक रूप से प्रश्न-लग्न निकालना
प्रश्न के समय (अथवा जिस समय का लग्न ज्ञात करना हो) को रेलवे स्टेशन की समय पद्धति में बदलें (जैसे दिन के 4ः00 बजे का अर्थ हुआ 12 $ 4 = 16ः00 बजे। उसमें से 6 घटाएं (यह 6 सूर्योदय के घटाए, क्योंकि प्रायः 6ः00 बजे के करीब सूर्योदय होता है, औसतन)। जो उत्तर आए उसका आधा करें, अथवा 2 से भाग दें (क्योंकि औसतन 2 घंटे का एक लग्न होता है)। फिर जो उत्तर आए उसमें सूर्य की वर्तमान राशि जोड़ दें तो वही लग्न आ जाएगा, जो उस समय चल रहा हो। (बिना अंश स्पष्ट के।)
सूत्र- प्रश्न समय 6»2 $ सूर्य की वर्तमान राशि = प्रश्न लग्न । उदाहरण के रूप में 20 सितंबर 2003 को दोपहर 4 बजे का लग्न ज्ञात करना है। यह प्रश्न का समय है। सुविधा के लिए हमने 4 को 12 $ 4 16ः00 माना (रेलवे स्टेशन पद्धति के अनुसार) और उसमें से 6 घटाए तो 10ः00 प्राप्त हुआ। (वैसे भी घटाएं तो 4 में से 4 कम करने पर 12ः00 बजे और उसमें से 2 कम करने पर 10ः00 का समय प्राप्त होगा। लेकिन यह थोड़ा असुविधाजनक है)। अब 10 का आधा किया (या 2 से भाग दिया) तो 5 प्राप्त हुआ। इसमें सूर्य की वर्तमान राशि को जोड़ दिया जैसाकि हम जानते हैं सूर्य 15 सित. से 15 अक्टूबर तक औसतन छठी राशि में होता है) अतः 5$6 = 11 प्राप्त हुआ। यानी कि 20 सित. 2003 को दोपहर 4 बजे 11 नम्बर की (कुम्भ) लग्न चल रही थी।
लग्न ज्ञात हो जाने के बाद (जो पंचांग में दैनिक लग्न सारिणी के कॉलम से भी ज्ञात किया जा सकता है) इस लग्न की कुण्डली बनाइए और पंचांग में दिए गए दैनिक ग्रह स्पष्ट के कॉलम से 20 सित. 2003 के ग्रह उन्हीं राशियों में बैठा दीजिए, जिन राशियों में वे दिए गए हैं। इस प्रकार हमारी 20 सित. 2003, शनिवार को दिन के 4ः00 बजे की प्रश्नकुंडली बन जाएगी। इस उदाहरण को सुस्पष्ट करने के लिए हमने पंचांग से ग्रह स्पष्ट नोट करके यह कुम्भ लग्न की कुंडली बना भी दी है।
20 सित. 2003 की लग्नकुंडली
प्रश्नकुंडली विचार एवं शकुन
अब पाठकों को प्रश्नकुंडली में प्रश्नों के विचार का तरीका संक्षेप में कहेंगे। तथा प्रश्न के सम्बन्ध में तात्कालिक शकुनों को भी मुख्य रूप से कहेंगे। क्योंकि प्रश्न के समय होने वाले शकुन भी उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं, जितना की प्रश्न लग्न।
प्रश्न सम्बन्धी प्रमुख अपशकुन-शकुन
ऽ यदि प्रश्नकर्ता हाथ में अग्नि लेकर (मोमबत्ती/दीपक, लालटेन, जलती हुई माचिस, जलती हुई सिगरेट/बीड़ी आदि) प्रश्न कर रहा हो तो उसका काम (विशेषकर रोग सम्बन्धी प्रश्न में) नहीं होगा। यह अच्छा शकुन नहीं है।
ऽ बीमारी या बीमार के विषय में प्रश्न करने वाला यदि गंजा हो तो यह भी एक अपशकुन माना गया है।
ऽ बीमार या रोग सम्बन्धी प्रश्नों में विशेषकर यदि प्रश्नकर्ता लाल वस्त्र पहने हुए हो तो यह भी अपशकुन है।
ऽ प्रश्न पूछते समय यदि ज्योतिषी के निकट उसका कोई प्रिय या आदरणीय व्यक्ति बैठा हो अथवा उसी समय आ जाए तो यह कार्य सिद्धि को दर्शाने वाला शुभ शकुन होता है।
ऽ प्रश्नकर्ता के प्रश्न पूछते ही यदि बत्ती/लाईट गुल हो जाए तो यह अवरोध सूचक होने से शुभ शकुन नहीं होता।
ऽ प्रश्नकर्ता का हाथ यदि प्रश्न करते समय सुगंधित फूल या फल पर अथवा वह उसके हाथ में हो/अकस्मात् उठा ले तो यह कार्य सिद्धिसूचक अन्य शकुन होता है।
ऽ देवमंदिर/नदी तट/गौशाला या पवित्र स्थान के सम्मुख/निकट प्रश्नकर्ता प्रश्न करें तो यह शकुन भी सिद्धिदायक होने से अति शुभ माना गया है। किन्तु सूने घर/वीराने में/श्मशान में/भस्म अथवा मिट्टी पर बैठकर प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो उसे कलेश प्राप्ति होती है। अतः यह अपशकुन माना गया है। शुष्क काष्ठ पर बैठकर प्रश्न करना भी अपशकुन है। किन्तु मद्यपान करते हुए प्रश्न करना शुभ कहा गया है
इनके अलावा प्रश्नकर्ता या ज्योतिषी-प्रश्न से ऐन पहले या ऐन कर अकस्मात् अपने शरीर के जिस अंग को स्पर्श करे-उसके अनुसार भी शकुनों के व्यवस्था की गई है। जैसे -
शिरोमुखं कर्णनेत्रं स्पर्श्या पृच्छित यो नरः ।
सुवर्षा धन-धान्यानां लाभस्तत्र न संशयः॥
अर्थात् जो मनुष्य, सिर, मुख, कान, नेत्र (चेहरे के अंगों) का स्पर्श करके प्रश्न करता है उसे सोना, धन, धान्य आदि का लाभ होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। यह कार्य सिद्धि सूचक है।
ऽ प्रश्नकर्ता यदि विशेषकर आर्थिक मामलों में अपने कन्धे, गले या हाथ का स्पर्श करके प्रश्न करे तो लाभ या सिद्धि अत्यंत कष्ट/संघर्ष के बाद ही मिलती है। किन्तु अपने केशों अथवा बगल का स्पर्श करे तो कार्य सिद्धि में अत्यंत व्यवधान आने से सिद्धि नहीं मिलती अथवा मृत्यु/मृत्युतुल्य कष्ट भी सम्भावित होता है। अतः यह अपशकुन है।
ऽ अपनी जांघ, लिंग, कमर का स्पर्श करके प्रश्न करे तो विवाह सम्बन्ध प्रश्न में अच्छा शकुन माना जाएगा। यह कन्या/स्त्री का लाभ दिलाने वाला होता है
ऽ यदि अपने घुटने, पैर अथवा टखने, तलवे या कोहनी को छूकर प्रश्न करता है तो यह अपशकुन है। प्रश्नकर्ता को किसी भारी संकट का सामना करन पड़ता हैं या दुखद परिस्थितियां झेलनी पड़ती हैं। किसी सम्बन्धी की मृत्यु सम्भावित होती है। अतः रोग विषयक प्रश्न के सम्बन्ध में यह अपशकुन विशेष महत्त्वपूर्ण है तथा झगड़े/विवाद के सम्बन्ध में भी।
ऽ भोजन सम्बन्धी प्रश्न हो तो कोख, पेट या नाभि का स्पर्श शुभ शकुन होता है। यह सुख सम्बन्धी मामलों में भी अच्छा शकुन है। स्वादु भोजन एवं सुर को प्राप्त करने वाला माना गया है।
विभिन्न प्रश्नों से सम्बन्धित सूत्र तथा प्रश्नकुंडली विचार
प्रश्नकुंडली पर विचार करते समय लग्न सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है। लग्न के बाद लग्नेश की स्थिति पर विचार करना चाहिए तथा इसके बाद प्रश्न से संबन्धित भात, प्रश्न के कारक तथा उस भाव के भावपति व कारक का विचार किया जाना चाहिए। सामान्यतः लग्न यदि चर राशि-1,4,7,10 का हो तो कार्य सिद्धि को प्रकट करता है। यदि स्थिर-2,5,8,11 का हो तो प्रश्न का उत्तर ’ना’ में ही आता है। यदि द्विस्वभाव राशि-3,6,9,12 का हो तो कार्य लटक जाता है। अथवा बिलम्ब से, विशेष प्रयासों के बाद ही सिद्ध हो पाता है। अतः लग्न बड़ा महत्त्वपूर्ण है।
विशेष स्थितियों में स्थिर लग्न भी शुभ माना जाता है। जैसे भवन विचार, गृह प्रवेश, लक्ष्मी पूजन आदि में।
नीचे संयुक्त रूप से कुछ प्रमुख सूत्र संक्षेप में दे रहे हैं
सूत्र -
ऽ झगड़े, विवाद, मुकदमे, प्रतिस्पर्धा अथवा पैसों के लेन-देन के मामलों में यदि लग्न में क्रूर ग्रह हो तो जातक/प्रश्नकर्ता की विजय होती है। यदि सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो तो प्रतिपक्षी की विजय होती है।
ऽ भाव का कारक व लग्नेश यदि सम्बन्धित भाव में हों अथवा दोनों लग्न में हों, अथवा दोनों का म्ग्ब्भ्।छळम् हो तो यह कार्यसिद्धि या समस्या का हल निकलने का सूचक है। यदि दोनों एक-दूसरे को देखें अथवा एक-दूसरे के भावों को देखें या अपने-अपने भावों को ही देखें तो भी कार्यसिद्धि की संभावनाएं बनती हैं (साथ में शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो और अच्छा है)। इससे विपरीत होने पर असफलता मिलती है।
ऽ रोग/रोगी से सम्बन्धित प्रश्न हो तो चर राशि रोगी की साध्यता, स्थिर राशि असाध्यता तथा द्विस्वभाव राशि दुःसाध्यता/कष्ट साध्यता को दर्शाती है। (द्विस्वभाव में अंश अवश्य देखने चाहिए)।
ऽ किसी के गुण स्वभाव के सम्बन्ध में चर राशि सात्विकता/सत् को, स्थिर राशि तामसिकता/तम को तथा द्विस्वभाव राशि राजसिकता/रजोगुण को दर्शाती है।
ऽ द्विस्वभाव राशि में अंश अवश्य देखें। यदि वह 15 से अधिक है, (जितनी अधिक है, उतना ही) तो वह चर राशि की ओर बढ़ी हुई होगी। यदि 15 से कम है (जितनी कम है, उतनी ही वह) तो स्थिर राशि की ओर होगी। इसको ध्यान में रखकर द्विस्वभाव राशि में सिद्धि की सम्भावना को विचारना चाहिए। ताकि फल सटीक आए।
ऽ रोग सम्बन्धी प्रश्न में यदि-2,7,8,12 भावों को शुभ ग्रहों की कृपा दृष्टि प्राप्त हो तो दुःसाध्य रोगों में भी साध्यता उत्पन्न हो जाती है। किन्तु रोगी के कारक ग्रह का बारहवें/आठवें स्थान में चले जाना अशुभ होता है।
ऽ विवाह सम्बन्धी प्रश्न में गुरू, शुक्र व शनि विशेष विचारणीय है। इनमें से कोई लग्न/लग्नेश या सप्तम भाव/सप्तमेश को देखे तथा चन्द्रमा लग्न या सातवें भाव को देखता हो तो विवाह होता है।
ऽ यात्रा, मुहूर्त, शुभ कार्यों आदि में चन्द्रमा की स्थिति विशेष विचारणीय होती है। चन्द्रमा लग्न/दशम भाव में हो तो यात्रा के लिए शुभ है। चतुर्थ/सप्तम में अशुभ।
ऽ सन्तान सम्बन्धी प्रश्न में लग्नेश व पंचमेश तथा पंचम भाव की स्थिति विचारें। लग्नेश व पंचमेश एक-दूसरे को देखें या म्ग्ब्भ्।छळम् हो तो सन्तान होती है। इसी योग में चन्द्र जब पंचम भाव में आएगा सन्तान तभी होगी। (चन्द्र सवा दो दिन एक राशि में रहता है। इस आधार पर या पंचांग देखकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि चन्द्र पंचम भाव में (प्रश्नकुंडली के) कब आएगा?)
ऽ प्रश्नकुंडली में प्रश्न से सम्बन्धित भाव के स्वामी का अपने भाव से द्विद्वादश/षडाष्टक/समसप्तक/नवपंचम होना ठीक नहीं होता। यद्यपि लग्नकुंडली में समसप्तम व नवपंचम अच्छे होते हैं। प्रश्नकुंडली में ’चतुर्दशम्’ (4-10) या ’त्रिएकादश’ (3-11) अच्छा होता है।
ऽ व्यापार/वाहन खरीदना/व्यावसायिक स्थान पर लक्ष्मीपूजन आदि में चर। लग्न उत्तम है। जमीन-जायदाद, मकान, गृह प्रवेश, वर-वधू देखने में, विवाह आदि में स्थिर लग्न शुभ है (घर पर लक्ष्मीपूजन में भी)।
ऽ गर्भ में लड़का है या लड़की? यह जानने के लिए प्रश्नकुंडली में सूर्य, मंगल व गुरु की स्थिति देखें। यदि ये 3,7,9,5 भावों में हों तो लड़का होता है। इसके विपरीत इन स्थानों पर चंद्र, शुक्र, बुध, शनि हो तो लड़की होती है। अथवा लग्न में मंगल हो तो भी लड़का होता है (लग्न द्विस्वभाव का हो और बुध से दृष्ट हो तो प्रायः जुड़वां होता है)।
ऽ लग्न में पुरुष राशि हो व पुरुष ग्रह भी लग्न में हो। अथवा शनि (लग्न के अलावा) विषम भावों में हो अथवा गुरु व सूर्य विषम राशियों में हों तो भी लड़का होता है। इसके विपरीत लग्न में स्त्री राशि व स्त्री गृह हों, अथवा शनि (लग्न के अलावा) सम भावों में हों या चन्द्र, शुक्र, मंगल समराशियों में हों तो कन्या होती है।
ऽ प्रवासी के लौटकर आने के सम्बन्ध में प्रश्न हो तो देखें-दूसरे भाव में शुक्र व तीसरे में गुरु हो तो प्रवासी देर से वापस लौटता है। लग्न में शुक्र व चौथे भाव में गुरु हो तो लगभग पहुंचा ही हुआ होता है। लग्न में चर राशि हो तथा चन्द्रमा चर/द्विस्वभाव राशि में हो तो भी लौट आता है। पर लग्न स्थिर हो, चन्द्रमा स्थिर राशि में हो अथवा गुरु, शुक्र या चन्द्र में से कोई बारहवें घर में चला गया हो तो फिर प्रवासी वापस नहीं लौटता (अपितु उसके जीवित होने के सम्बन्ध में भी प्रश्न चिह्न लग जाता है)। यह ध्यान रखना चाहिए।
ऽ प्रश्न लग्न में पापग्रह हों लग्नेश निर्बल हो, या लग्न व लग्नेश पाप प्रभाव में हों तथा अष्टमेश बली हो या अष्टम भाव भी पापयुक्त हो और चन्द्रमा छठे या आठवें भाव में हो (कुछ लोग 12वां भी मानते हैं) तो रोगी वापस लौटकर नहीं (आता अर्थात् मर जाता है (बशर्ते किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी चन्द्रमा पर न हो)।
ऽ लग्न तथा अष्टम भाव पर शुभ ग्रहों की युति, दृष्टि या प्रभाव हो तो रोगी स्वस्थ होता है। सातवें भाव में शुभ ग्रह हों तो भी रोगी स्वस्थ्य होता है। अष्टम भाव बलग्न अष्टमेश व लग्नेश सहित सबल हो तथा छठे भाव में शुभ ग्रह/शुभ दृष्टि/चर राशि हो तो भी रोगी स्वस्थ होता है।
ऽ स्वाति, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी, आर्द्रा तथा अश्लेषा नक्षत्रों में यदि व्यक्ति रोग ग्रस्त हुआ हो तो मर जाता है। रेवती व अनुराधा नक्षत्र में रोग हुआ हो तो दीर्घकाल तक चलता है। मृगशिरा व उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में रोग हुआ हो तो एक मास तक चलता है। शेष नक्षत्रों में रोग हुआ हो तो 7 दिन से 15 देन में ठीक होता है।
ऽ रोगी को यदि स्थिर लग्न में हस्पताल ले जाया गया हो तो वह प्रायः वापस नहीं लौटता (भर जाता है)।
ऽ भरणी, अश्लेषा, मूल, कृतिका, विशाखा, आर्द्रा या मघा नक्षत्र में यदि सांप ने काट लिया हो तो दंशित व्यक्ति की प्रायः मृत्यु हो जाती है।
ऽ आर्द्रा, अश्लेषा, ज्येष्ठा, शतभिषा, भरणी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा, धनिष्ठा और कृतिका नक्षत्र तथा रवि, मंगल, शनि, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, एकादशी व षष्ठी-इन नक्षत्रों, दिनों व तिथियों के संयुक्त योग में जो रोगग्रस्त होता है उसकी अवश्य ही शीध्र मृत्यु होती है।
एक स्मरणीय उदाहरण
प्रश्नकुंडली का महत्व, उसे पढ़ने का तरीका और उसके सटीक निष्कर्ष को दर्शाने के लिए एक उदाहरण मैं अवश्य प्रस्तुत करूंगा। संयोगवश हमारी ज्योतिष की क्लास में ही एक महिला ने यह प्रश्न मेरे आचार्य श्री कौशिकजी से पूछा था और हमारे सामने ही इस प्रश्नकुंडली को बनाया तथा विचारा गयाा था, ताकि हम सब लाभान्वित हो सकें उसे मैं उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।
प्रश्नकर्ता/माता की कुंडली ( वास्तविक कुंडली)
परिवर्तित प्रश्नकुंडली
तीसरी मृतक संतान की कुंडली
बरेली की एक महिला, जिसका पुत्र दिल्ली में अपने मामा के यहां रहता था, मार गया था। एक महीने बाद ही (लगभग) लड़के का विवाह होने वाला था। पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर वह महिला दिल्ली आई थी। गुरुजी से परिचित होने के कारण वह उनके पास आई और अपने पुत्र की मृत्यु के सम्बन्ध में प्रश्न किया। आत्महत्या हुई? या हत्या हुई? तथा कैसे व क्यों हुई? उस समय की प्रश्नकुंडली बनाई गई, जो कुम्भ लग्न की कुंडली थी।
(पाठक कुण्डली का एक नम्बर देखें)
मरने वाला उस महिला का तीसरा पुत्र था, यह पूछ लिया गया था। कुण्डली प्रश्नकर्ता की थी (यानी लड़के की मां की) और जानना था प्रश्नकर्त्ता की संतान की मृत्यु के विषय में। वह भी तीसरी सन्तान के विषय में। जैसा कि पाठक जानते हैं कि सन्तान का भाव पांचवां होता है। किन्तु यह प्रथम सन्तान का होता है। दूसरी का सातवां और तीसरी का नौवां होता है। यानी प्रश्नकत्ता के तीसरी संतान के विषय में कुंडली के नौवें भाव से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में। नौवें भाव को लग्न मानकर विचारें तो वह तीसरी संतान की लग्न कुंडली होगी इस आधार पर प्रश्नकुंडली के नौवें भाव को लग्न बनाकर (सुविधा के लिए) एक और कुण्डली बनाई जो तुला लग्न की हुई। क्योंकि नौवें भाव में तुला राशि थी। अतः तुला लग्न की कुंडली बनाकर ग्रहों को उन्हीं राशियों में बैठा दिया, जहां के प्रश्नकुंडली में बैठे था। यह कुंडली नम्बर (2) हुई मृतक को कुण्डली। इस कुण्डली पर विचार किया गया।
(जैसा कि पाठक गुरु व शनि की राशियों से सहज अनुमान लगा सकते हैं कि यह ’केस’ उस वर्ष का है जब बुध प्रश्नकाल के दौरान श्वक्री था)।
विश्लेषण-हमने विचारना है जातक की मृत्यु का कारण तथा स्वरूप (क्योंकि यह दूसरी कुंडली मृतक की है, अतः सुविधा के लिए इसको जातक कह दिया)। अतः हमारे विचार का प्रमुख केन्द्र होगा मारक भाव-द्वितीय, सप्तम अष्टम व द्वादश। इनमें भी अष्टम भाव विशेष रूप से तथा जाहिर है, लग्न भी क्योंकि वह जातक/ैम्स्थ् की सूचक है। अब देखिए।
ऽ सातवें तथा दूसरे (मारक भाव) का स्वामी मंगल (मारकेश, ग्यारहवे भाव में (अंतिम यात्रा का सूचक) बैठा है। इस प्रकार वहां पड़ने वाली सिंह राशि के स्वामी सूर्य को भी मारकेश बना रहा है।
ऽ आठवें भाव (मृत्यु भाव) का स्वामी शुक्र लग्नेश होकर लान (ैम्स्थ्) में जा बैठा है और पाप मध्य में फंस गया है। क्योंकि दूसरे भाव में केतु व बारहवे में कूर ग्रह सूर्य बैठा है।
ऽ बारहवें भाव का स्वामी बुध वक्री है और नवमेश (भाग्य का स्वामी होकर) बारहवें भाव में ही शत्रु चन्द्र के साथ तथा सूर्य के साथ बैठा हुआ है। चन्द्रमा जातक के मन का कारक है, जो सूर्य के साथ होने से निर्वल है तथा बारहवें भाव में (अंतिम यात्रा) जाकर बैठ गया है।
ऽ दूसरे भाव में केतु सबल स्थिति में विद्यमान है और 8वें भाव में राह सबल स्थिति में है (दोनों ग्रह आकस्मिक घटनाओं के कारक हैं)। केतु मारकेश मंगल से दृष्ट है। पांचवां (शिक्षा) व छठा भाव (रोग/ऋण/शत्रु/झगड़ा) भी मंगल से दृष्ट है। स्वयं भंगल राहू केन्द्रीय प्रभाव में है और शनि से दृष्ट है। शनि से तीसरा भाव (जीवन) तथा छठा भाव भी दृष्ट है।
ऽ आठवें भाव का राहू सूर्य व चन्द्र दोनों को अपनी 5वीं दृष्टि से ग्रहण लगा रहा है। सातवीं दृष्टि से द्वितीय (मारक भाव) तथा नौवीं दृष्टि से चतुर्थ (सुख भाव) को (जहां शनि की राशि है) देखकर शनि का प्रभाव और खराब कर रहा है।
ऽ लग्नेश शुक्र स्वयं सातवें भाव को देख रहा है। जो कि मारक भाव भी है और प्रणय भाव भी।
ऽ दूसरे, चौथे तथा छठे भाव पर उच्च के गुरु की दृष्टि है।
ऽ मंगल अपने भाव से नवपंचम, शुक्र षडाष्टक तथा सूर्य द्विद्वादश है। गुरु भले ही उच्च का हो, जीवन भाव (तृतीय) जहां का वह स्वामी भी है, वहां से षडाष्टक है।
निष्कर्ष-इन आठों पॉइंट्स के विश्लेषण से ये निष्कर्ष निकलते हैं -
पहले च्वपदज का अर्थ है कुंडली के डबल मारकेश ’मंगल’ (क्योंकि 2,7 दोनों मारक भावों का स्वामी है) ने ग्यारहवें भाव में बैठकर जातक की अंतिम यात्रा की भूमिका बांध दी। मंगल के ग्यारहवें भाव में बैठने से मारकेश हुआ सूर्य स्वयं बारहवें स्थान (स्व्ैै व्थ् ैम्स्थ्) में चला गया। (सूर्य आत्मा का कारक भी है।) इस प्रकार ’महायात्रा’ निश्चित हो गई।
दूसरे च्वपदज का अर्थ है कि जातक की मृत्यु का कारण जातक स्वयं है (आत्महत्या)। क्योंकि आठवें भाव (मृत्यु का कारण बताने वाला भाव) का स्वामी लग्न (ैम्स्थ्) में बैठकर आठवें भाव (मृत्यु के कारण) से ैम्स्थ् का सम्बन्ध जोड़ता है। यह और भी निश्चित हो जाता है, इसलिए क्योंकि लग्न व आठवें भाव का स्वामी एक ही (शुक्र) है। उस पर लग्न पाप मध्य में होने के अशुभ हो गई है। (हालांकि लग्न पर उच्च के गुरु का केंद्रीय प्रभाव है। किन्तु लग्न की राशि तथा राशीश दोनों ही गुरु के शत्रु हैं। अतः शत्रु की दृष्टि लाभकारी नहीं कही जा सकती। फिर भी गुरु एक सौम्य ग्रह है और स्वयं शुक्र भी सौम्य ग्रह है। अतः जातक ने मरने के लिए शांतिपूर्ण तरीका अपनाया। यद्यपि गुरु व शुक्र की आधी सौम्यता इसलिए नष्ट हो चुकी है। क्योंकि गुरु मारकेश व षष्ठेश होने (रोग, ऋण, शत्रु, शोक, झगड़ा) तथा शुक्र अष्टमेश (मारकेश) होने से अनुप प्रभाव भी रख रहे हैं।)
तीसरे च्वपदज का अर्थ है कि बारहवें भाव (स्व्ैै) का स्वामी बुध जो जातक का भाग्येश भी है। स्वयं स्व्ैै व्थ् ैम्स्थ् में बैठ गया है। वो भी शत्रु चंद्रमा के साथ। वक्री होने से ग्यारहवें घर (अंतिम यात्रा की तैयारी) का प्रभाव भी लेता है और वहां बैठे डबल मारकेश मंगल का भी। दूसरे चन्द्रमा जो दशमेश (कर्म भाव का स्वामी) है तथा जातक के मन का कारक है। वह स्वयं बारहवें घर में बैठकर कर्म व उत्साहहीनता/मनोबल होनता को दर्शाता है। उस पर भी सूर्य के साथ (अमावस्या) होने से अस्त हुआ है। यानी जातक मन से टूटा हुआ, निराश हुआ था। ऊपर से आठवें भाव में बैठे राहू की पांचवीं दृष्टि चन्द्र व सूर्य दोनों को ग्रहण भी लगा रही थी। सो मनोबल व आत्मबल से बिल्कुल हीन हो चुके जातक द्वारा आत्महत्या कर लेना कोई बड़ी बात नहीं थी।
चौथे व पांचवें च्वपदज का अर्थ है कि चौथा तथा पांच च्वपदज मिलकर इस आकस्मिक दुर्घटना के योग को और प्रबल कर रहे हैं तथा जातक के आत्मघात के लिए उत्साहित कर रहे हैं। इसके अलावा आठवें भाव में बैठा कहू तथा दूसरे भाव में बैठा केतु कुछ और महत्त्वपूर्ण तथ्यों को बताते हैं। राहू विष, विश्वासघात तथा मामा का कारक है और अष्टम भाव में बैठा हुआ है। अर्थात् मृत्यु का कारण इन तीनों में से एक/दो/तीनों हैं। दूसरे भाव से क्योंकि मुख को भी देखा हैं और केतु वहां विद्यमान हैं। शनिवत् राहु, कुजवत् केतु सूत्रानुसार केतु भी मंगल जैसा स्वभाव रखता है। उस पर मंगल की राशि में बैठा हुआ है तथा मंगल से दृष्ट भी है। अतः पूर्ण तथा मंगल के समान (डबल मारकेश) हो चुका है। मारकेश केतु का द्वितीय भाव में बैठने का अर्थ इसलिए यह हुआ कि जातक ने विष मुख के माध्यम से पिया/खाया तथा बाद में जातक के मुख से खून भी आया हो सकता है। (क्योंकि मंगल रक्त का कारक भी है)। इसके अलावा दृष्टियों में छठे भाव की प्दअवसअमउमदज भी ’मामा’ की ओर इशारा करती है।
विशेष- मंगल क्योंकि शनि से दृष्ट है और मंगल केतु को भी देखता है। तथा केतु राहू से दृष्ट हैं। अतः विष (राहू), शराब (शनि), खून/मृत्यु (मंगल खून लाल होने से तथा मृत्यु मारकेश होने से) तथा मुख (दूसरे भाव का केतु) ये आपस में सम्बद्ध होते हैं। इसकी रोशनी में कहा जा सकता है कि विष शराब के माध्यम से (शराब में मिलाकर) मृतक के मुख में गया और फिर सुख से खून आने पर जातक मरा। (राहू मामा तथा विश्वासघात का कारक भी है। अतः निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मामा ने शराब में विष मिलाकर जातक को धोखे से मारा होगा। परन्तु यह निष्कर्ष तब ठीक होता जब चन्द्रमा सबल स्थिति में होता। हम जान चुके हैं कि जातक का मनोबल बिल्कुल टूटा हुआ था और यह भी जानते हैं कि जातक अपनी मृत्यु का कारण स्वयं है। अतः यह निष्कर्ष गलत है।)
छठे च्वपदज का अर्थ है कि जातक के दिमाग में (लग्न क्योंकि मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है) किसी लड़की (प्रेम/ैम्ग्) से सम्बन्धित कोई समस्या थो (क्योंकि शुक्र प्रेम/ैम्ग् का कारक है तथा सातवें पत्नी/प्रणय के भाव को देखता भी है।) और उससे विवाह को लेकर उसे पत्नी बनाने के सम्बन्ध में कोई कश्मकश चल रही थी। इसके अलावा मारकेश मंगल से न केवल दूसरा (मुख) तथा छठा (मामा/शत्रु) भाव दृष्ट है, बल्कि पांचवां (शिक्षा/संतान का) भाव भी दृष्ट है। इस विवेचन तथा देश काल, पात्र, परिस्थिति के अनुसार हम पांचवें भाव से यहां संतान आदि का अर्थ नहीं लेंगे। अपितु प्रेमिका का लेंगे, क्योंकि पांचवां भाव प्रेमिका का प्रतिनिधित्व भी करता है (पाठक पहले भाव परिचय के अध्याय में पढ़ चुके हैं)। इस जमा-जोड़ का नतीजा निकलता है कि आत्महत्या करने का कारण प्रेमिका से विवाह/प्रणय की समस्या होनी चाहिए।
इसके अलावा आठवां भाव जो इस पूरे मामले में बुरी तरह प्दअवसअम है तथा राहू के प्रभाव में है। वह न केवल मृत्यु के कारण, मामा, रहस्य का ही भाव है अपितु वसीयत का भाव भी है। अतः जातक की मृत्यु में वसीयत की प्दअवसअमउमदज भी सम्भावित है। ऐसा नतीजा निकाला जा सकता है। क्योंकि दूसरा भाव (मुख को ही नहीं अपितु) बैंक बैलेंस/भूमि या संचित धन को भी प्रकट करता है तथा ग्यारहवां भाव अंतिम यात्रा की भूमिका ही नहीं बल्कि लाभ/आय का भाव भी है। और इस पूरे ब्ंेम में दूसरा तथा ग्यारहवां भाव भी पूरी तरह प्दअवसअम है।
सातवें च्वपदज का अर्थ है कि कुंडली के 2,4 या 6 भाव उच्च के गुरु से पूर्णतः दृष्ट हैं (लेकिन गुरु स्वयं केतु की नौवीं दृष्टि से पूर्णतः दृष्ट है और केतु न केवल दूसरे भाव तथा डबल मारकेश मंगल की राशि में है, बल्कि मंगल की चौथी दृष्टि में भी है अतः स्वयं डबल मारकेश बना हुआ है)। अतः गुरु भी जातक के लिए मारकेश हो गया है तथा उच्च का होने से और शक्तिशाली हो गया है, अतः जिन भावों को देख रहा है वह दूषित और विकृत हो रहे हैं। स्वयं गुरु षष्ठेश तो है ही (शत्रु/मामा) साथ ही तृतीयेश भी है। तृतीय भाव जीवन, साहस, संघर्षक्षमता आदि का है। जब यहीं का स्वामी मारकेश हो गया हो तो जीवन में संघर्ष क्षमता का अन्त होना ही था। साहस टूटना ही था। फिर भी आत्महत्या करने वाले को स्ंेज डवअमउमदज पर अतिरिक्त साहस/जुनून की जरूरत पड़ती है। ऐसा न हो तो उसके मन में भले ही आत्महत्या का विचार आता रहे वह उसे क्रियान्वित कर पाने की हिम्मत/हौसला नहीं जुटा पाता। किन्तु तृतीयेश गुरु उच्च का होकर जातक को यह हिम्मत प्रदान कर रहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जातक ने आत्महत्या की परन्तु मामा इस ब्ंेम में कहीं न कहीं प्दअवसअम जरूर है। गुरु की चौथे घर पर दृष्टि जातक की माता को भी प्दअवसअम करती है। परन्तु यह प्दअवसअमउमदज और च्वपदजे से कन्फर्म नहीं होता। अतः उसे मामूली प्दअवसअमउमदज कहेंगे। (इसका फल निष्कर्ष में पढ़िए)।
आठवें च्वपदज का अर्थ है कि ’षडाष्टक’ या ’द्विद्वादश’ किसी भी कुंडली में अच्छे नहीं होते। यह पाठक जानते भी हैं तथा विवाह एवं प्रश्नकुंडली में ’सभसप्तक’ तथा ’नवपंचम’ होना भी अच्छा नहीं होता, यह पाठकों को याद ही होगा। अतः मंगल, शुक्र व गुरु इन तीनों की ही अशुभता और बढ़ गई है। ये तीनों ही जातक के मारकेश हैं (सूर्य व केतु तो हैं ही)। शुक्र अष्टमेश और गुरु षष्ठेश भी है। अतः करेला और नीम चढ़ा वाली बात हो गई है तथा मंगल तो डबल मारकेश (दो मारक भावों का स्वामी) होने से वैसे ही अत्यंत अशुभ व खतरनाक हो गया है। अतः यह विवेचन भी जातक की मृत्यु के सम्बन्ध में निकाले गए परिणामों की पुष्टि में मददगार सिद्ध होता है।
अब इन आठों च्वपदजे के अर्थों को मिलाकर जो निष्कर्ष सामने आता है, वह पाठक देखें -
निष्कर्ष-जातक किसी लड़की से प्रेम करता था, उससे विवाह करना चाहता था। लड़के की माता बरेली में रहती थी, लड़का दिल्ली में रह रहा था। लडके का विवाह घरवालों द्वारा कहीं और तय कर दिया गया और एक डेढ़ महीने बाद उसकी शादी होने वाली थी। अतः लड़का बड़ी असमंजस में था। (लड़का अपने मामा के साथ दिल्ली में रहता था। अथवा मामा के घर रहता था, यह जातक की माता से हमने कन्फर्म किया था।)
प्रश्न किए जाने से एक दिन पूर्व जातक की अपने मामा के साथ कहा-सुनी हो गई (शायद वे दोनों इकट्ठे शराब पी लेते हों। तो शराब पीते वक्त बात हुई हो। या जातक ने बाद में अकेले शराब पी हो)। यह कहा-सुनी वसीयत के सम्बन्ध में अथवा उस लड़की के सम्बन्ध में हुई होगी (या दोनों ही बातें शामिल रही हों)। कहा सुनी इतनी बढ़ गई कि जातक का मन विक्षिप्त/विक्षुब्ध सा हो गया। ज्मदजपवद में तो वह पहले ही था। इस ’कहासुनी’ ने आग में घी का कार्य किया। जातक ने कहासुनी के बाद शराब पी और उत्तेजित अवस्था में आत्मघात का निर्णय ले लिया। शराब में जहर मिलाकर या शराब पीने के बाद उसने जहर पी लिया। इस प्रकार विष व शराब के नशे में बेसुध होकर वह सो गया। रात को किसी समय उसके मुख से खून आया और उसका बेहोशी की स्थिति में ही प्राणांत हो गया। (क्योंकि मामा को रात में कुछ पता नहीं चला। सुबह पता चला। दूसरे कुंडली में भी बुद्धि व होश का कारक बुध बारहवें स्थान (शयन सुख तथा स्वेे व् िैमस िएवं अंतिम यात्रा) में बैठकर यही कहता है।
जातक के मुख से खून निकला मिला था। जातक अपने दूसरे नम्बर के मामा छोटे मामा) के साथ दिल्ली में रहता था। यह जातक की माता से कन्फर्म किया था। इस प्रकार मामा ने जातक को मारा तो नहीं था किन्तु उसे आत्महत्या के निर्णय पर पहुंचने के लिए मजबूर कर देने में एक सशक्त भूमिका अवश्य निभाई थी। माता की मामूली प्दअवसअमउमदज यह थी कि जातक की शादी उसकी मर्जी के (खिलाफ तय की गई थी।
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