धन्वन्तरि त्रयोदशी (धनतेरस) का शास्त्रीय आधार साधना

ऐसे करें धन्वंतरी स्तोत्र का जाप
धन्वन्तरि त्रयोदशी (धनतेरस) का शास्त्रीय आधार केवल धन-समृद्धि के लिए नहीं है, बल्कि यह आरोग्य, दीर्घायु और आयुर्वेद-जागरण का पर्व है।
आइए, व्रतराज, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण, पद्मपुराण आदि ग्रंथों के अनुसार इसका विधान क्रमशः देखें—

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🌿 १. पर्व का शास्त्रीय आधार

स्कन्दपुराण के वैशाखमाहात्म्य में कहा गया है—

> “धन्वन्तरिर्जगत्स्रष्टा रोगनाशोऽमृतालयः।
तस्य स्मरणमात्रेण रोगबन्धाद् विमुच्यते॥”

अर्थात् — धन्वन्तरि भगवान विश्व के स्रष्टा, रोगनाशक और अमृत के आश्रय हैं। उनके स्मरण मात्र से भी रोग-बंधन से मुक्ति मिलती है।

इसी कारण त्रयोदशी तिथि को जो धन्वन्तरि-जन्मदिन है, उसे धन्वन्तरि-जयन्ती भी कहा गया है।

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🔱 २. व्रतराज के अनुसार विधान

‘व्रतराज’ ग्रंथ में इस तिथि का विशेष विधान इस प्रकार बताया गया है—

> “आश्वयुजकृष्णत्रयोदश्यां धन्वन्तरिव्रतम्।
कर्त्तव्यं दीर्घजीव्यार्थं रोगनाशाय मानवैः॥”

👉 विधि-विधान (व्रतराज-विहित):

1. प्रातः स्नान कर विष्णु या धन्वन्तरि मंत्र से पूजन का संकल्प लें —

> ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः।

2. कलश-स्थापन करें — उसमें जल, सुवर्ण, चाँदी या ताम्र का धन्वन्तरि-प्रतिमा या चित्र रखें।

3. गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पण करें और यह मंत्र बोलें —

> “धन्वन्तरिं देवमनन्तवीर्यं सर्वामयानां पतिरेष वैद्यः।”

4. संध्याकाल में दीपदान करें — इसे यमदीपदान भी कहते हैं। यह यमराज के भय से रक्षा करता है।

> “त्रयोदश्यां दीपदानं यमदीपं विशेषतः।
अकालमृत्युनाशाय दीयते परमं शुभम्॥”  (व्रतराज)

5. रात्रि में धन्वन्तरि की कथा, विष्णु सहस्रनाम, अथवा आयुर्वेद से संबंधित ग्रंथों का पाठ करें।

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🍃 ३. उपवास या व्रत का स्वरूप

उपवास अथवा एकाहिक फलाहार का नियम है।

शाम को दीपदान के बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

ताम्र, सुवर्ण या चाँदी का धन्वन्तरि-प्रतिमा दान विशेष पुण्यप्रद है।

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💰 ४. धनतेरस का अर्थ — “धन” केवल अर्थ नहीं

शास्त्रों में ‘धन’ का अर्थ आयु, आरोग्य, औषधि और सद्बुद्धि से भी लिया गया है।

> “धनं आयुः बलं विद्यां धर्मं चैव चतुर्विधम्।”
इनमें आयु और बल का अधिष्ठान धन्वन्तरि हैं। अतः इस दिन आरोग्योपासना मुख्य है।

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🔔 ५. विशेष उपाय (शास्त्रानुसार)

1. धन्वन्तरि-मंत्र का 108 बार जप

“ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय नमः।”

2. गोघृत-दीपक जलाना — घर में रोगनिवारण का प्रभाव माना गया है।

3. आयुर्वेद-ग्रंथ, चिकित्सा उपकरण या औषधि का पूजन — इसे धन्वन्तरि की उपासना माना गया है।

4. अन्न, औषधि, दीपदान, जलदान — ये चार दान विशेष रूप से प्रशंसनीय बताए गए हैं।

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🌸 ६. फलश्रुति (व्रतराज, स्कन्दपुराण)

> “धन्वन्तरिप्रीतिहेतोः कृतेऽस्मिन् व्रते नरः।
रोगैः न बाध्यते कदाचिद् दीर्घायुर्लभते ध्रुवम्॥”

अर्थात् — जो मनुष्य यह व्रत धन्वन्तरि की प्रीति के लिए करता है, वह रोगरहित होकर दीर्घायु प्राप्त करता है।

ज्योतिषियों के अनुसार, धनतेरस पर शाम को उत्तर दिशा में पूजा के लिए चौकी तैयार करें. चौकी पर भगवान कुबेर, धन्वंतरी और मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें. भगवान कुबेर को सफेद मिठाई और धन्वंतरी भगवान को पीली वस्तु से बनी मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद गणेश जी व लक्ष्मी जी की पूजा कर आरती करें. फिर धन्वंतरी स्तोत्र का पाठ करना शुरू करें. अंत: सभी देवताओं का आशीर्वाद लेकर सुख-समृद्धि की कामना करें.धनतेरस पर धन्वंतरी स्तोत्र का खासा महत्व होता है. धन्वंतरी स्तोत्र के जाप से ना सिर्फ मां लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं, बल्कि उनकी कृपा से सालभर कभी भी धन की कमी नहीं होती. धनतेरस पर भगवान धन्वंतरी उत्पन्न हुए थे. मान्यता है कि धनतेरस की रात्रि जो भीधन्वंतरी भगवान की पूजा करता है, उसके घर धन का अभाव नहीं रहता. धनतेरस पर धन्वंतरी स्तोत्र का जाप करने से घर धन-धान्य से भर जाता है. इससे घर में सुख-समृद्धि का वास रहता है और घर की तिजोरी सदैव भरी रहती है.
ॐ धं धन्वंतराये नमः॥
ॐ रं रुद्र रोगनाशय धन्वन्तरयै हूं फट 
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये: अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
धन्वंतरी स्तोत्र 
ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।

सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।

वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:

अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप

श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

 धनतेरस पर शाम को उत्तर दिशा में पूजा के लिए चौकी तैयार करें. चौकी पर भगवान कुबेर, धन्वंतरी और मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें. भगवान कुबेर को सफेद मिठाई और धन्वंतरी भगवान को पीली वस्तु से बनी मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद गणेश जी व लक्ष्मी जी की पूजा कर आरती करें. फिर धन्वंतरी स्तोत्र का पाठ करना शुरू करें. अंत: सभी देवताओं का आशीर्वाद लेकर सुख-समृद्धि की कामना करें.

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