भैरव अष्ट्मी भैरव उपासना दर्शन

भैरव अष्ट्मी भैरव उपासना दर्शन 

भैरवी अष्टमी का सनातन आगम तंत्र का में बहुत महत्व है. यह दिन भगवान काल भैरव की पूजा के लिए समर्पित है. लोग इस विशेष दिन पर उपवास रखते हैं और भगवान काल भैरव की पूजा करते हैं. इस दिन कालाष्टमी भी मनाई जाती है. मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि कालाष्टमी व्रत हर महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. यह सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी है जिसे कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है. यह माना जाता है कि भगवान शिव इसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे.





 कालभैरव जयंती को भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता हैशास्त्रों के अनुसार, भगवान काल भैरव भगवान शिव की भयावह अभिव्यक्ति हैं. इस दिन को भगवान काल भैरव की जयंती के रूप में मनाया जाता है इसलिए भगवान काल भैरव या भगवान शिव के भक्तों के लिए इस दिन का बहुत महत्व है.यह दिन अधिक शुभ माना जाता है जब इसे मंगलवार और रविवार के दिन मनाया जाता है क्योंकि ये दिन भगवान काल भैरव को समर्पित होते है. इसे महा काल भैरव अष्टमी या काल भैरव अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है.

भैरव तत्व विवेचन

तत्व सहाय्यक तत्व होता है .. जीवन मे भैरव तत्व बहुत उपयोगी होता है .. बिना भैरव के कोइ अकेला कुछ कार्य नही कर पाता है .. भैरव तत्व का मतलब है आपके जीवन मे कोइ मित्र , कोइ सहाय्यक , कोइ नौकर , कोइ शिष्य , कोइ follower , कोइ सिर्फ आपको मानने वाला , कोइ सिर्फ आप की सुननेवाला , कोइ सिर्फ आपका हितचिंतक .. उसे आपका भैरव कहते है .. जिस गुरु के उपर भैरव जी की कृपा होती है उन्हे समर्पित शिष्य मिलते है .. जिस सेनापती या राजा के उपर भैरव की कृपा हो उन्हे अपने प्राणो की आहुती देनेवाले सैनिक मिलते है . जिस नेता के उपर भैरव कृपा हो उन्हे समर्पित अनुयायी या कार्यकर्ता मिलते है .. जिस अधिकारी के उपर भैरव कृपा होती है उनके हाथ के नीचे काम करने वाले सदैव उनकी बात मानेंगे .. जिस व्यक्ती के उपर भैरव कृपा हो उसके मित्र उसके लिये कुछ भी करने के लिये तयार होते है .. भैरव तत्व से युक्त शिष्य अपने गुरु के लिये जान न्यौछावर करता है .. भैरव एक ऐसा तत्व जो सिर्फ आपके लिये कुछ भी करने को तयार हो .. जब सती ने दक्ष के याग मे अपने आपको भस्म किया तब शिव जी क्रोधित हुये और उनके क्रोध से वीरभद्र का आविर्भाव हुवा जो भैरव थे . वीरभद्र ने सिर्फ शिव जी के लिये विष्णु आदि देवताओ से युद्ध किया था .. कालभैरव ने शिव जी के लिये ही ब्रम्हा का पांचवा मुख काट लिया था .. भैरव तत्व सैनिको मे होता है इस लिये वे देश के लिये बिना सोचे बलिदान देते है .. भैरव तत्व के कारण ही क्रान्तिकारी अपने देश के लिये हसते हसते फांसी चढ सकते है .. क्योंकि भैरव तत्व स्वार्थी नही होता .. भैरव अपने स्वामी के लिये , अपने विचारो के लिये , अपने देश के लिये राज्य के लिये कुछ भी कर सकता है और भी किसी भी हद तक जा सकता है .. भैरव आपका संक्षरक है .. जब तक भैरव की आपके उपर कृपा है तब तक कोइ आपका बाल भी बांका नही कर सकता .. भैरव आपके शत्रू को ध्वंस कर देंगे .. सभी देवीयोंके पास शिवजी भैरव के रुप मे विद्यमान है .. यहाँ शिव तत्व शक्ती तत्व का सहाय्यक बन जाता है .. भैरव कृपा के कारण ही छत्रपती शिवाजी महाराज को, महाराणा प्रताप को उनके लिये जान देने वाले असंख्य वीर मिल जाते है ,भैरव कृपा के कारण ही लोकमान्य तिलक ,गांधी जी के एक हांक पे लोग देश के लिये जान लुटाने को तयार थे .. अगर आपके जीवन मे कोइ व्यक्ती ऐसा हो जो आपके लिये कुछ भी करने को तयार हो तो भी समझ लिजिये की आपके उपर भैरव जी की कृपा है .. कुत्ते के अंदर भैरव तत्व माना जाता है इसि लिये कुत्ते मालिक के प्रती वफादार होते है ..इसि लिये काले कुत्ते को अगर रोटी खिला दे बहुत सारी बाधाये टल जाती है .. कुत्ते मालिक के लिये अपनी जान भी देते है .. भैरव तत्व ऐसा ही होता है .. आपके प्रती वफादार .. आपके हर आदेश का पालन करने वाला .. आपके शत्रू और विरोधी के उपर टूट पडने वाला .. आपका संरक्षक ..आपका अत्यंत करीबी .. जो आपकी ही छाया हो .. जो आपके अपना सर कलम करने को हो तयार .. जान देने के लिये और आपके शत्रू की जान भी ले सके .. अगर आप ऐसे व्यक्ती किसी भी रुप मे आपके जीवन मे चाहते है , अगर आप शत्रू बाधा से मुक्त होना चाहते है , अगर आप किसी व्यक्ती के द्वारा सदैव पिडीत रहते है लेकिन उसके खिलाफ कुछ भी नही कर सकते , अगर आप ऐसी समस्या मे घिर गये है जहा आपको रास्ता नही दिखायी दे रहा है ,या आपको कोइ मदद करने किये तयार नही है ,अगर आप अपने आप को बहुत दुर्बल , असहाय समझते है , अगर आप चाहते है की कोइ अदृश्य शक्ती सदैव आपका संरक्षण करे तो फिर आप भैरव साधना करे और निश्चिंत हो जाये .. भैरव की कृपा से सारे बिगडे काम बनते जायेंगे .. कही से आपको मदद मिलेगी .. कोइ आपकी बात नही मान रहा है तो वो आपकी बात मानने लगेगा .. आपके शत्रू परास्त होंगे .. भैरव साधना से राहु और शनी की बाधा दूर होती है .. अगर कोइ तंत्र प्रयोग हुवा है तो भैरव साधना से उससे मुक्ती मिलेगी .. अगर कोइ आपका पैसा नही लौटा रहा है तो वह पैसा दे देगा .. कोइ आपको त्रस्त कर रहा है तो वो आपके सामने घुटने टेक देगा .. अगर किसी की शराब छुडानी हो तो भी आप यह भैरव साधना कर सकते है .. अगर आपके यहां नौकर टिकते नही है तो यह भैरव साधना कर सकते है .. अगर परिवार मे कोइ सदस्य आपको बिना वजह परेशान कर रहा है तो भी आप इस साधना से उससे छुटकारा पा सकते है .. अगर ऑफिस मे कोइ आपको तकलिफ दे रहा है तो यह भैरव साधना करके देखे .. अगर आप एक अच्छे शिष्य बनना चाहते तो आप को यह भैरव साधना जीवन मे करनी ही चाहिये .. बिना भैरव तत्व के शिष्य तत्व नही है .. राहु की महादशा चल रही है तो भैरव साधना करे .. जीवन कोइ भी बाधा हो तो इसे श्रद्धा से करे आप को फल जरुर मिलेगा .. भैरव साधना बहुत प्राचीन काल से प्रचलित है .. इसे तंत्र क्षेत्र मे बहुत मान्यता है .. इस साधना को सात्विक, राजसिक और तामसिक इन तिनो पद्धती से किया जा सकता है .. हम गृहस्थ है इसलिये हमे सात्विक पद्धती से करना चाहिये .. काल भैरव जयंती अष्टमी तिथी को होती है ..इसे रात्री काल मे संपन्न करे .. यह रात्री सिद्धि प्रद होती है .. इस लिये इसे अपनी क्षमता नुसार अवश्य करे .. आपको अगर आत्मविश्वास बढाना है , अपनी मानसिक क्षमता का विकास करना है ,अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण करना है तो यह साधना बहुत लाभदायी है


काल भैरव का दार्शनिक विवेचन

काल भैरव का मन्तव्य समझने हेतु पहले काल शब्द का अर्थ समझते हैं। काल शब्द के दो अर्थ हैं, पहला अर्थ है समय और दूसरा
अर्थ है अंधकार। समय अर्थात् वर्तमान चक्र। आणविक से लेकर ब्रह्माण्डीय, एक सूक्ष्म अणु से लेकर विशाल ब्रह्माण्ड तक सभी वस्तुयें चक्र में घूमती हैं। पृथ्वी एक चक्र पूरा करती है, तो एसे एक दिन कहते हैं। चन्द्रमा जब पृथ्वी के चारों ओर एक चक्र पूर्ण करता है तो उसे एक मास कहते हैं। पृथ्वी जब सूर्य के चारों ओर घूमकर एक चक्र पूर्ण करती
है, तो एक वर्ष कहते हैं। निद्रा और जागरण का चक्र, भोजन एवं क्षुधा का चक्र, इस प्रकार अनेक चक्र हैं। वस्तुओं की चक्रीय गति के कारण ही समय का आभास होता है। यदि यह चक्रीय गति की भौतिकता न हो,
तो मनुष्य को समय का अनुभव नहीं हो सकता। समय भौतिक अस्तित्व के माध्यम से व्यक्त होता है। यह भौतिक अस्तित्व एक विशाल अनस्तित्व के सान्निध्य में घटित हो रहा है। इसे विज्ञान की भाषा में अन्तरिक्ष कहते हैं, यही काल या अन्धकार है। के यहाँ अन्तरिक्ष को काल या अन्धकार कहने का कारण मात्र यही है कि यदि हम प्रकाश का अनुभव करना चाहते हैं, तो हमें प्रकाश
उद्गम स्रोत को देखना होगा अथवा ऐसी किसी वस्तु को, जो प्रकाश को अवरुद्ध करती हो। इसके अतिरिक्त प्रकाश को अनुभव करने का कोई विकल्प नहीं है। हम सूर्य का उदाहरण ले सकते हैं, सूर्य प्रकाश का स्रोत है, चन्द्रमा प्रकाश को परावर्तित करता है, किन्तु मध्य में अन्धकार ही है।
अस्तित्व का मूल आधार है काल अथवा समय। समय के कारण ही स्थान की सम्भावना है, अन्यथा स्थान की अवधारणा नहीं होती। इसी कारण अंतरिक्ष को काल या अन्धकार कहा जाता है। अन्तरिक्ष. अन्धकारमय है। यदि हम समय का अनुभव करते हैं तो भौतिकता की सीमाओं से परे ऐसे समय को महाकाल कहा जाता है। महाकाल में सृष्टि के छोटे-छोटे कृण अन्यत्र बिखरे पड़े हैं। शेष सब अवकाश (खालीपन) है, इस विस्तृत में ९९% अवकाश है। विशालकाय आकाश गंगाये चक्कर लगा
रही हैं, परन्तु उनका ९९% अंश खालीपन है। अतः महाकाल की गोद में हो सृष्टि घटित होती है। सृष्टि के सीमित कणों से ही जुड़े होने के कारण हमें समय का अनुभव चक्रीय गति के रूप में ही होता है। इसी आयाम
को जगत् कहा जाता है। इसके पार जाना ही वैराग्य है अर्थात् पारदर्शी होना। जब हम पारदर्शक स्वरूप में होते हैं तब हम प्रकाश को अवरुद्ध नहीं करते अपितु प्रकाश को स्वयं से होकर गुजरने देते हैं। ब्रह्माण्ड स्वयं द्वारा प्रकाश को न रोकने का अर्थ है कि हम जीवन की बाध्यकारक प्रकृति या चक्रीय गति से मुक्त हो गये हैं। जीवन की चक्रीय गति से मुक्त होने को मुक्ति या मोक्ष प्राप्ति कहते हैं। जो व्यक्ति मुक्ति या मोक्ष की अभिलाषा रखते हैं, उनके लिए अस्तित्व का यह आयाम जिसे महाकाल कहा गया है, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह मात्र सांस्कृतिक
न होकर एक ठोस विज्ञान है। इस विशेष कृपा क्षेत्र में स्थित होने पर उस महाकाल की उपस्थिति में जब हम यात्रा करते हैं, तब सब द्वन्द्व, भौतिकता, मन नष्ट हो जाता है। इसका अर्थ है हम भौतिकता से मुक्त होकर परम मुक्ति, मोक्ष की ओर अग्रसर हो जाते हैं।


काल भैरव शिव का एक भयंकर रूप है। भैरव का स्वरूप भय के परे ले जाता है और काल भैरव का स्वरूप काल अर्थात् समय के भय से भी परे है। काल भैरव मात्र मृत्यु के भय से पार जाना न होकर समय के
भय से भी बाहर होना है। वास्तव में समय ही भय का आधार है, यदिअनन्त समय हो या समय के पार होने की क्षमता हो, तो भय का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा। प्रत्येक घटना समय के भीतर ही घटती है। यदि मनुष्य समय के भय से मुक्त होगा, तो वह पूर्णतया स्वाधीन होगा। काल भैरव शिव की प्राणघातक अथवा भयंकर अवस्था है। काल भैरव का यह भयंकर, काला स्वरूप उनका एक अद्भुत आयाम है। जब भगवान शिव रौद्र रूप में सृष्टि के विनाश फैलाने लगे तब काल भैरव स्वरूप प्रकट हुआ। यह विनाश किसी वस्तु का नहीं अपितु समय का विनाश था। 


प्रत्येक सांसारिक या भौतिक पदार्थ की समय सीमा निश्चित है। यदि समय को ही नष्ट कर दिया जाये, तो सब कुछ ध्वस्त हो जायेगा। काल भैरव समय के नष्ट होने से उपस्थित विध्वंस से पार जाने की अवस्था का स्वरूप हैं। सम्पूर्ण जीवन की पीड़ा, आनन्द, हर्ष आदि का मात्र एक क्षण
में अनुभव काल भैरव की साधना से सम्भव है। समय की सीमा से परे होने के कारण समस्त सिद्धि एवं आनन्द का अनुभव एक क्षण की प्रबलता में ही इनकी कृपा से सम्भव है। अनन्त जन्मों में प्राप्त होने वाले
अनुभवों की प्रगाढ़ता मात्र एक क्षण में ही करा देने में काल भैरव समर्थ
हैं।

श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप 'काल भैरव' के नाम से विख्यात हैं। दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें 'आमर्दक' कहा गया है। शिव जी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।

जिन व्यक्तियों की जन्मकुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से परेशान हों, तो वे व्यक्ति भैरव अष्टमी अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से प्रारंभ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (108 बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से 40 दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।भ्रं यह भैरव भगवान का बीज मंत्र है और इससे शत्रु, भूत-प्रेत का नाश और कोर्ट कचेरी के मामलों में सफलता मिलती है.


रुद्रयामलतंत्र में दिये गये भैरव के ६४ नाम | 64 

असितांग, विशालाक्ष, मार्तण्ड, मोदकप्रिय, स्वछन्द, विघ्नसंतुष्ट, खेचर, सचराचर, 
रुद्र, कोडदंष्ट्र, जटाधर, बिश्वरूप, विरुपाक्ष, नानरूपधर, पर, वज्रहस्त,
महाकाय, चण्ड, प्रलयान्तक, भूमिकम्प, नीलकण्ठ, विष्णु, कुलपालक, मुण्डपाल,
कामपाल, क्रोध, पिंगलेक्षण, अभ्ररूप, धरापाल, कुटिल, मंत्रनायक, रूद्र,
पितामह, उन्मत्त, बटुनायक, शंकर, भूतवेताल, त्रिनेत्र, त्रिपुरान्तक, वरद,
पर्वतावास, कपाल, शशिभूषण, हस्तिचर्माम्बरधर, योगीश, ब्रह्मराक्षस, सर्वज्ञ, सर्वदेवेश, सर्वभूतहृदिस्थिता, भीषण, भयहर, सर्वज्ञ, कालाग्नि, महारौद्र, दक्षिण, मुखर, अस्थिर,  संहार, अतिरिक्तांग, कालाग्नि, प्रियंकर, घोरनाद, विशालाक्ष, दक्ष, संस्थित योगीश।  

अष्टभैरव 

तंत्रभैरवों के सुप्रसिद्ध अष्टभैरव | 

१. असितांग भैरव

२. चंड भैरव

३. रूरू भैरव

४. क्रोध भैरव

५. उन्मत्त भैरव

६. कपाल भैरव

७. भीषण भैरव

८. संहार भैरव

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अष्टभैरव | 

१ महाभैरव २ संहार भैरव ३ असितांग भैरव ४ रुद्र भैरव ५ कालभैरव ६ क्रोध भैरव ७ ताम्रचूड़ भैरव ८ चंद्रचूड़ भैरव

शंकराचार्यजी द्वारा प्रपंचसारतंत्र में किये गये अष्टभैरव का उल्लेख | 

१.भूतनाथ भैरव २. चण्डकपाल भैरव ३. रूरू भैरव ४. क्रोध भैरव ५. उन्मत्त भैरव ६. कालराज भैरव ७. भीषण भैरव ८. संहार भैरव

सप्तविशंति रहस्यम में किये गये भैरव का उल्लेख | 

१.श्रीमन्थान भैरव २. फटकार भैरव ३. षट्चक्र भैरव ४. एकात्म भैरव ५. हविर्भक्ष्य भैरव ६. चण्ड भैरव ७. भ्रमर भास्कर भैरव


१० वीर भैरव के नाम | 

१ सृष्टिवीर भैरव २ स्थितिवीर भैरव ३ संहारवीर भैरव ४ रक़्तवीर भैरव ५ यमवीर भैरव ६ मृत्युविर भैरव ७ भद्रवीर भैरव ८ परमार्कवीर भैरव ९ मार्तण्डवीर भैरव १० कालाग्निरुद्रवीर भैरव

३ बटुक भैरवो के नाम | 

१ स्कन्द-बटुक 
२ चित्र-बटुक 
३ विरंचि-बटुक 


मंत्र :
1.'ॐ ह्रीं भ्रं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।'
2. ॐ भ्रं कालभैरवाय हूं फट्

3. ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:’ 

4.ॐ भ्रं काल भैरवाय नमः

5.ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्

6.ॐ क्रीं क्रीं कालभैरवाय फट

7.ॐ श्री भैरवाय नमः

8.ॐ हं शं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:

9.ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुधारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं

10.ॐ भयहरणं च भैरव:

11.ओम ब्रह्म काल भैरवय फट

12.ॐ कर कलित कपाल कुण्डली दण्ड पाणी तरुण तिमिरव्याल यज्ञोपवीती कर्त्तु समया सपर्या विघ्नविच्छेद हेतवे जयती बटुक नाथ सिद्धि साधकनाम ॐ श्री बम बटुक भैरवाय नमः

काल भैरव कवच पाठ

ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः।

पातु मां बहुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु।।

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा।

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः।।

नैऋत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे।

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेशवरः।।

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा।

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः।।

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः।

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः।।

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु।

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च।।

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः।

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः।।

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरव।

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा।।

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा।

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा।।

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