धनु लग्न के फलादेश

 धनु लग्न के फलादेश








धनुलग्न की चारित्रिक विशेषताएं धनुलग्न का स्वरूप

आकाश के 240 डिग्री से 270 डिग्री तक के भाग को धनु राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न धनु माना जाता है. धनु लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र अष्‍टम भाव का अधिपति होता है. यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

पृष्ठोदयी त्वथ धनुर्गुरुस्वामी च सात्विकः ॥17

पिंगलो निशिवीर्याढ्यः पावकः क्षत्रियो द्विपात्।

आदावन्ते चतुष्पादः समगात्रो धनुर्धरः ॥18

पूर्वस्थो वसुधाचारी तेजस्वी ब्रह्मणा कृतः ।

-बृहत्पाराशर होराशास्त्र अ. 4/श्लो. 18

धनु पृष्ठोदय, सत्वगुणी, पिंगलवर्ण, रात्रिबली, अग्नितत्त्व, क्षत्रिय, 25 अंश तक

द्विपद, उसके बाद चतुष्पद, समदेह, धनुषधारी, पूर्व दिशावासी, भूचारी, तेजस्वी है,

इसका स्वामी गुरु है।।17-18।।

व्यादीर्घास्य शिरोधरः पितृधनस्त्यागी कविवीर्यवान्,

वक्ता स्थूलरदश्रवोधरनसः कर्मोद्यतः शिल्पवित्।

कुब्जांसः कुनखी समांसलभुजः प्रागल्भ्यवान् धर्मवित्,

बन्धुद्विट् न बलात् समेति च वशं साम्नैकसाध्वोऽश्विजः ॥9

-बृहज्जातकम् अ. 16/श्लो. 9

धनु राशि में चंद्रमा रहने पर जातक बड़े मुख व लम्बी गर्दन वाला, पैतृक

सम्पत्ति प्राप्त करने वाला, त्यागी अर्थात् दानशील, काव्यादि को समझने वाला या

कवि, पराक्रमी या अधिक वीर्य वाला, अच्छा वक्तव्य देने वाला, दांत, कान, होंठ व

नाक पर मोटाई लिए हुए, सदैव कर्मशील, शिल्प कला जानने वाला, आगे को झुके

हुए कन्धों वाला तथा कन्धों के पीछे उठी हड्डी वाला, नाखूनों में विकार से युक्त,

मांसल भुजाओं वाला, प्रगल्भतायुक्त अर्थात् प्रतिभाशाली, धर्मवेता, अपने बन्धुओं से

द्वेष करने वाला, हठ व शक्ति से वश में न होने वाला अर्थात् बल प्रयोग से अधिक

असाध्य हो जाने वाला, प्रेम व कोमल व्यवहार मात्र से ही नियंत्रित होने वाला

होता है।

धनुर्विलग्ने भवति प्रसूतः कुलप्रधानः सुभगो मनुष्यः।

शूरोऽर्थवान् भीतिपरः कृतज्ञो बन्धूपभोग्यो द्रविणो वपुष्पान्॥१॥

-वृद्धयवन जातक अ. 24/श्लो.9/ पृ.289

यदि जन्म समय में धनुलग्न का उदय हो तो मनुष्य अपने कुल में प्रधानता पाने

सौभाग्य से युक्त, शूरवीर, धनवान, भययुक्त रहने वाला, लोकधर्म में भीरु,

कृतज्ञता से युक्त बन्धु-बान्धवों की सहायता करने वाला, अच्छे स्वस्थ शरीर वाला

वाला, एवं धनी होता है।धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक न्याय प्रिय, निःस्वार्थ भाव से सबके कार्य करने वाले, मेधावी, स्वाभिमानी, धनवान, उदार हृदय वाले, शान्ति प्रिय एवं अनेक भाषाओं को समझने वाले होते हैं | स्वदिष्ट भोजन पदार्थों से यथा संभव दूर ही रहने की चेष्टा करते हैं | ऐसे व्यक्ति सहज ही दूसरों पर विश्वास कर लेते हैं परंतु दूसरे लोग उनकी इस सादगी का अनुचित लाभ उठाते हैं | ऐसे व्यक्ति परिश्रमी भी होते हैं , अतः आर्थिक संतुलन बिगड़ने नहीं देते | समय के पाबंद होते हैं | समय पर कार्य करना इनका स्वभाव होता है | समय की कद्र करते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी समय का पूरा ध्यान रखें |

प्राज्ञश्चापविलग्नजः कुलवर: श्रीमान् यशोवितवा

-जातक पारिजात श्लो.. 9/ पृ. 678

धनु प्राज्ञ, कुल में श्रेष्ठ, धनी, यशस्वी, द्रव्यवान्। मूल में श्रीमान् और वित्तवान्

यह दो शब्द आये हैं। अभिप्राय दोनों का एक ही है।

परिमण्डलाक्षवक्त्रो गणेषु मुख्यो धनुर्दृगाणाद्ये

स्वोपचितस्वाचारस्तथा मृदुर्भवति संजातः ॥

-सारावली श्लो. 10/ पृ. 466

यदि जन्म लग्न में धनु राशि व धनु राशि का प्रथम द्रेष्काण हो तो जातक

गोल नेत्र व मुख वाला, समुदाय में प्रधान, स्वयं वृद्धि करने वाला, सुन्दर आचरण

कर्त्ता व कोमल हृदय वाला होता है।

धनुर्लग्नोदये जातौ नीतिमान् धर्मवान्, सुधीः ।

कुलमध्ये प्रधानश्च प्राज्ञः सर्वस्य पोषकः ॥ -मानसागरी अ. 1/ श्लो. 9

धनुलग्न वाला जीव धर्मिष्ठ, कुल वंश में प्रधान सभी का परिपालक, सुन्दर,

ज्ञानी, दृढ़ संकल्प वाला, राजसेवा कार्य तथा नीतिरीति निपुण होता है।

धनुलग्न का स्वामी गुरु है। गुरु देवगुरु माने गये हैं तथा धार्मिक प्रवृत्तियों के

परिसूचक भी हैं। यह कांचन वर्ण, द्विस्वभाव व अर्द्धजल राशि है। इसका प्राकृतिक

स्वभाव अधिकार प्रिय, करुणामय और मर्यादा इच्छुक है। इस राशि वाले व्यक्ति

विशेषत: पीले रंग, गेहुए शरीर व बड़ी-बड़ी आंखें, उन्नत ललाट, गाल फूले हुए

वाले तथा बुद्धिजीवी होते हैं। अध्ययन व अध्यापन कराते हुए पठन पाठन में रुचि

लेने वाले ये व्यक्ति धार्मिक स्वभाव के होते हैं।

धनु राशि एवं लग्न सम्पूर्ण परिचय

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धनुर्लग्न समुत्पन्नो नीतिमान धनवान सुधी:।

लोके मान्य:कुले श्रेष्ठ: पुत्र पौत्रादि संयुतः।।

बहुकलाकुशल:, सत्यप्रतिज्ञ: सुतरां मनोज्ञ:।

धनुविधिज्ञश्च धनुर्धरगे नरो धनकरो पि न करोति बहुव्यवयं।।


अर्थात धनु लग्न में उत्पन्न मनुष्य नीति कुशल, धनी, बुद्धिमान, लोगो मे सम्मानित, कुल में श्रेष्ठ, धन, वाहन, पुत्र-पौत्रादि सुखों से युक्त होता है। ऐसा जातक शिल्पादि अनेक कलाओं में कुशल, निर्मल बुद्धि, सत्यनिष्ठ, सुंदर स्वरूप, विद्वान, धनुर्विद्या (अर्थात शस्त्र संचालन में कुशल), धनवान होने पर भी कृपणता से धन का व्यय करता है।


राशि चक्र में धनु नौंवी राशि है।भचक्र में इस राशी का विस्तार 240° से 270° है। इस राशि का अधिपति स्वामी ग्रह गुरु है। जो कि सौरमंडल में सर्वाधिक बड़ा ग्रह भी है।गुरु की यह त्रिकोण राशि है। लग्न के रूप में यह प्रथम व चतुर्थ भाव का स्वामी हो जाता है। काल पुरुष में इस राशि का निवास (संबंध) जंघाओं, नसों तथा नितंबों में होता है। यह राशि मूल नक्षत्र के चार चरण (ये, यो, भ, भी) पूर्वाषाढ़ के चार चरण (भ, धा, फ़, ढ़) एवं उत्तराषाढ़ का एक चरण (भे) से मिलकर बनी है। मूल नक्षत्र का स्वामी केतु, पूर्वाषाढ़ का शुक्र तथा उत्तराषाढ़ का स्वामी सूर्य है। 


किसी जातक के जन्म समय का लग्न स्पष्ट जिस नक्षत्र के अंश या पाद चरण पर होता है, उस नक्षत्र भाग के स्वामी के अनुरूप भी जातक के व्यक्तित्त्व पर प्रभाव पड़ता है। धनु लग्न में नवम भाग (26°-40' से 30°-00' तक) का नवांश लग्न धनु ही होगा जो कि वर्गोत्तम होगा।


धनु राशि इंद्रधनुषीय कामनाओं और आशाओं की प्रतीक है। यह विषम राशि मध्यमआकार, पुरुष राशि, धनुष धारण किए कटी से ऊपर मनुष्य और नीचे अश्व घोड़े के समान आकार की, अल्प प्रसवी उग्र प्रकृति की सतोगुणी राशि है। यह अग्नि तत्व, दुःस्वभावा, बाल्यावस्था रात्रि बली, पित्र प्रकृति, क्षत्रिय जाति, पृष्ठोंदई, पूर्व दिशा की स्वामिनी है। इसका प्राकृतिक स्वभाव मर्यादा पालन करना आदर्श एवं अधिकार प्रियता है। वाहनों के प्रति विशेष लगाव रहता है। कोई भी ग्रह इस राशि में नीच या उच्च का नहीं होता परंतु कुछ विद्वान राहु को इस राशि में नीच एवं केतु को उच्च मानते हैं। गुरु इस राशि पर 5 से 10 अंश तक मूलत्रिकोणस्थ माना जाता है। निर्जन सूर्य गोचर वश प्रतिवर्ष प्रायः 15 दिसंबर से 13 जनवरी तक इस राशि पर संचार करता है।


धनु राशि के अन्य पर्याय नाम👉  

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अश्व, अस्त्री, चाप, धनुषक, धनुषमाण, अश्वकाय, शरासन आदि अंग्रेजी में इसे सैजिटेरियस (saggitarius) कहते हैं।


गुण एवं सामान्य विशेषताएं👉 

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धनु राशि का स्वामी गुरु है। धनु जातक का स्वभाव इस राशि के प्रतीक धनुर्धारी से अभिव्यक्त किया जा सकता है। जिस प्रकार धनुर्धारी सीधा लक्ष्यबेध करता है। उसी प्रकार धनु लग्न जातक का लक्ष्य की तरफ ध्यान केंद्रित रहता है। जातक सोच विचार कर कार्य करता है। यदि गुरु बुध की स्थिति शुभ हो तो जातक बुद्धिमान, सौम्य, सरल स्वभाव, धार्मिक प्रकृति, उदार हृदय, परोपकारी, संवेदनशील, करूंणा दया आदि भावनाओं से युक्त होगा। दूसरों के मनोभावों को जान लेने की विशेष क्षमता होगी इस राशि के व्यक्ति में बौद्धिक एवं मानसिक शक्ति प्रबल होती है।


धनु लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह

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सूर्य👉 सूर्य धनु लग्न में शुभ कारक होता है। भाग्येश एवं धर्मेश होने के कारण शुभ भाव में हो तो जातक धार्मिक, आस्थावान एवं भाग्यशाली होगा। सूर्य की दशा में शुभ फल घटित होंगे।


चंद्रमा👉  अष्टमेष होने से यद्यपि स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं किंतु कल्पना शक्ति एवं विद्वत्ता की दृष्टि से जातक विद्वान प्रतिष्ठित एवं अध्ययनशील होगा अड़चनों के बाद सफलता मिलेगी।


मंगल👉 पंचमेश होने से जातक को बौद्धिक क्षमत,  संतान सुख (पुत्र संतति) एवं शिक्षा के संबंध में शुभ फलदायक परंतु व्ययेश भी होने से आकस्मिक विघ्न बाधाएं, धन का अपव्यय तथा तनाव देता है। अपनी दशा में मिश्रित फल देता है।


बुध👉 सप्तमेश व कर्मेश होने से विवाह एवं व्यवसाय आदि की दृष्टि से प्रायः शुभ फल देता है। परंतु केंद्रश दोष होने से उसके शुभ कार्यकत्व गुणों एवं फल में कमी आ जाती है। अपनी दशा अंतर्दशा में शुभाशुभ फल बुध की स्थिति पर निर्भर करेगा।


गुरु👉 लग्न एवं चतुर्थ (सुख) भाव का स्वामी होने से शुभफली होता है। केंद्राधिपत्य दोष युक्त भी होता है। परंतु लग्नेश होने के कारण मारकत्व आदि दोष नहीं होंगे तथा अशुभ फल कम ही देगा। गुरु यदि कुंडली में अशुभस्त हो तो अपनी दशा में कष्टों के बाद सफलता देगा।


शुक्र👉 त्रिषडायपति अर्थात छठे भाव व 11 वे भाव का स्वामी होने से प्रायः इस लग्न में अशुभ फल देता है। किंतु 2, 3, 4, 7, 8, एवं 11 वे भाव में अपनी दशा में किंचित शुभफल प्रदान करेगा।


शनि👉 धनेश एवं तृतीय होने से अपनी दशा में मिश्रित प्रभाव करता है। 1, 3, 5, 7, 8, 9, 10, एवं 12 वे भावो में शुभ तथा शेष भागों में अशुभ फली होता है। फल दीपिका के अनुसार शनि पंचम भाव में नीच का होने पर भी लाभ स्थान व धन स्थान को उच्च एवं स्वराशि से देखने से अपनी दशा में शुभ फल प्रदान करता है।


राहु👉  2, 3, 5, 8, 9, 10, 11 एवं 12 वे भाव में शुभ शेष अन्य भाव में अशुभ फल करता है। दृष्टि योग आदि से फल में परिवर्तन भी संभव है।


केतु👉 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 11 एवं 12 वे भाव में शुभ तथा अन्य स्थानों में अशुभफल करता है।


विशेष👉 दो तीन या अधिक ग्रहों की स्थिति में अथवा ग्रहों की शुभाशुभ अवस्था एवं पारस्परिक दृष्टि यों के कारण उपरोक्त ग्रहों के शुभाशुभ फलों के संबंध में न्यूनाधिकता की संभावना भी होती है।


धनु लग्न-गुण स्वभाव, स्वास्थ्य-रोग, शिक्षा एवं कैरियर आदि 

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शारीरिक गठन एवं व्यक्तित्त्व👉 धनु लग्न कुंडली में गुरु एवं सूर्य शुभस्थ हो तो जातक का ऊंचा लंबा कद, संतुलित एवं सुगठित शरीर, सुंदर गेहूंआ रंग, किंचित चौड़ी एवं अंडाकार मुखाकृति, चौड़ा एवं ऊंचा माथा, प्राय लंबी नाक एवं लंबी पुष्ट गर्दन, बादाम जैसी आकृति की चमकदार आंखें, बड़े किंतु सुंदर मजबूत दांत, बौद्धिकता के प्रतिक बड़े कान, श्वेत पीत वर्ण (यदि लग्न में मंगल की दृष्टि आदि का योग हो तो श्वेत लालिमा मिश्रित वर्ण) तथा ऐसा जातक सौम्य, हंसमुख, आकर्षक, सुंदर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा।


चारित्रिक एवं स्वभावगत विशेषताएं

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धनु लग्न अग्नि तत्व राशि तथा लग्न स्वामी गुरु शुभ होने से जातक अत्यंत बुद्धिमान, परिश्रमी, स्वाभिमानी, पराक्रमी, साहसी, धर्म परायण, इनमें अच्छे बुरे एवं दूसरों के भावों को जान लेने की विशेष क्षमता होगी, जातक स्पष्ट वक्ता, इमानदार, न्यायप्रिय, व्यवहार कुशल, उदार हृदय, मिलनसार, नरम दिल, सिद्धांतवादी एवं अध्ययन शील प्रकृति का होता है। यदि सूर्य भी शुभस्थ हो तो जातक कुल में श्रेष्ठ, भाग्यशाली तथा इनकी बौद्धिक एवं मानसिक शक्ति प्रबल होगी। ये जिस कार्य को करने का संकल्प कर लेता है उसे पूरे किया बिना नहीं छोड़ता। ऐसा जातक धन - संपदा एवं वाहन आदि सुख साधनों से युक्त तथा निज पराक्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होगा। जातक धर्म परायण, परोपकारी स्वभाव तथा लोगों की भलाई का ख्याल बहुत रखेगा। जातक उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों से युक्त, शिक्षक तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ मेलजोल अधिक रखेगा। परंतु शनि यदि अशुभ हो तो जातक को भाई बंधुओं के सुख में कमी रहे तथा कार्य व्यवसाय के संबंध में अत्यधिक संघर्ष कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इनका 32 वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योदय होता है। 


धनु लग्न काल पुरुष के राशिचक्र में नवनी राशि होने से जातक को योगदर्शन, आध्यात्मिक, चिकित्सा आदि बौद्धिक विषयों में विशेष अभिरुचि होती है। ये अध्यात्म एवं जीवन संबंधी रहस्यों को जानने में प्रयत्नशील रहते हैं। मंगल गुरु के प्रभाव के जातक अध्ययनशील, आत्मविश्वास की भावना से युक्त, चुस्त, आशावादी दृष्टिकोण रखने वाला, दूसरों से सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाला, महत्वकांक्षी, कठिन से कठिन समस्याओं को अपने धैर्य और साहस से ठीक कर लेने वाला होता है। जातक की देश-विदेश की यात्राओं के भी अवसर प्राप्त होते हैं।


धनु राशि द्विस्वभाव की राशि है। इसलिए ऐसे जातक शीघ्र कोई निर्णय नहीं कर पाते हैं। परंतु जब खूब सोच समझ के बाद निर्णय लेते हैं तो अपने कार्य को पूरे उत्साह एवं जोश के साथ आरंभ कर देते हैं। वैसे तो धनु जातकों को जल्दी से क्रोध नहीं आता परंतु यदि किसी कारण विशेष से आ भी जाए तो देर तक क्रोध आवेश में रहते हैं। केवल प्रेम व शांति से वशीभूत होते हैं। इनकी सूक्ष्म में बुद्धि होने के कारण किसी भी विषय की गहराई तक जाने में कुशल होते हैं। कुंडली में मंगल शुक्र का योग हो तो विपरीत योनि के प्रति विशेष आकर्षण होता है। यदि लग्न में पाप ग्रह अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक ईर्ष्यालु, जिद्दी, शीघ्र क्रोधित होने वाला, कठोर स्वभाव, स्वार्थ परक, कामुक एवं स्वच्छाचारी स्वभाव का होता है। ऐसा जातक दूसरे लोगों की आलोचना एवं व्यंगात्मक वाणी का प्रयोग करने वाला भी होता है।


स्वास्थ्य एवं रोग👉 

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धनु लग्न जातक की कुंडली में गुरु, सूर्य, मंगल आदि ग्रह शुभस्थ हो तो जातक का स्वास्थ्य अच्छा एवं श्रेष्ठ होता है। परंतु यदि लग्न में लग्नेश (गुरु) अशुभ हो तथा शनि, मंगल, शुक्र एवं राहु आदि ग्रहों का लग्न या लग्नेश के साथ अशुभ संबंध हो तो जातक को कमर में या जोड़ों में दर्द, रक्त विकार, लीवर एवं उदर विकार, नेत्र स्नायु रोग, प्रमेह, उच्च रक्तचाप, जिगर, यौन रोग, गुप्त एवं पेचीदा रोगों की संभावना रहती है। स्वास्थ्य में सावधानीवश धनु जातक को बहुत अधिक उष्ण एवं गरिष्ठ एवं तला हुआ भोजन नहीं लेना चाहिए। मादक वस्तुओं एवं मांस मछली आदि तामसिक भोजन के सेवन से भी परहेज करना चाहिए। अत्यधिक क्रोध तथा उत्तेजना, आवेश पूर्ण व्यवहार भी आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। पौष्टिक एवं संतुलित भोजन एवं नियमित व्यायाम आपके स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए सुखद होंगे।


शिक्षा एवं कैरियर👉 

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धनु लग्न में गुरु पंचम भाव से एवं पंचमेश मंगल के साथ शुभ संबंध बनाता हो अथवा गुरु मंगल की दशा अंतर्दशा हो तो जातक उच्च शिक्षित विख्यात एवं उच्च पद पर प्रतिष्ठित होता है। धनु जातक गुरु और बुध के प्रभाव से प्राय: अध्ययनशील प्रकृति के होते हैं। जीवन में किसी भी व्यवसाय से संबंधित हो वह धर्म, ज्योतिष, गूढ़ विषयों के अध्ययन से जुड़े रहते हैं। मंगल, बुध, सूर्य आदि ग्रह स्वराशिस्थ या शुभस्थ हो तो जातक डॉ अथवा चिकित्सा के क्षेत्र में सफल होता है। यदि चंद्र-मंगल बुध आदि ग्रहों का योग केंद्र त्रिकोण में हो तो जातक इलेक्ट्रिक इंजीनियर होता है। पंचम में गुरु एवं केंद्र त्रिकोण में सूर्य बुध का योग होने से जातक वकालत के क्षेत्र में विशेष सफल रहता है। चंद्र, शुक्र एवं शनि ग्रहों के योग जातक या जातिका को अभिनय कला एवं फिल्म क्षेत्र में सफलता दिलाता है। सामान्यत: धनु जातक अपनी बौद्धिक योग्यता के बल पर उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। धनु जातक की कुंडली में सूर्य-बुध, सूर्य-मंगल, सूर्य-गुरु तथा गुरु-मंगल गुरु एवं बुध शुक्र के योग करियर की दृष्टि से विशेष प्रशस्त माने जाते हैं।


धनु लग्न-गुण आध्यात्मिक पक्ष-आर्थिक स्थिति, अनुकूल व्यवसाय, प्रेम और वैवाहिक सुख, मैत्री राशि आदि 

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धनु लग्न राशि से काल पुरुष की नवमी राशि उच्च लक्ष्य साधे धनुर्धारी पुरुष तथा कटी भाग से नीचे अर्ध अश्व की आकृति ग्रहण की हुई राशि मानी जाती है। इस प्रकार धनु जातक वाले यदि योग साधना के बल पर पाशविक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लें तो वह ध्यान और योग की उच्च स्थितियों को प्राप्त कर सकते हैं।


आर्थिक स्थिति👉 

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धनु लग्न के जातक उच्च अभिलाषी, परिश्रमी एवं बौद्धिक क्षेत्र में विशेष योग्यता होने से अपने कार्य व्यवसाय में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेते हैं। चाहे निजी व्यवसाय में हो अथवा सर्विस में हो दोनों स्थितियों में वह किफायत एवं समझ कर खर्च करने वाले होते हैं। धनु राशि की कुंडली में यदि सूर्य, गुरु, शनि एवं बुध ग्रह शुभ हो तथा ग्रह दशा भी इन्हीं ग्रहों में से किसी की हो तो जातक की आर्थिक स्थिति विशेषकर (40 वर्ष की आयु के बाद) अच्छी होती है। तथा अपने परिवार के लिए उदार पूर्वक व्यय करते हैं।


प्रारंभिक जीवन में अब जीविकोपार्जन के साधन चाहे अल्प रहे हो किंतु धनु जातक अपने पुरुषार्थ एवं शुभ ग्रहों के प्रभाव स्वरूप भूमि, जायदाद, मकान, वाहन आदि सुख के साधन बना लेता है। यदि कुंडली में केंद्र गत चंद्र-गुरु एवं बुध हो तो जातक को धन अर्जन करने में स्त्री का भी सहयोग विशेष रहता है। यदि शनि स्वक्षेत्री हो तो जातक धीरे-धीरे विपुल धन का स्वामी होता है। धनु कुंडली में केंद्र त्रिकोण में सूर्य-बुध का योग जातक को बौद्धिक कार्यों से विशेष धनलाभ करवाता है।


अनुकूल व्यवसाय👉 

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धनु जातक की कुंडली में यदि सूर्य, बुध एवं गुरु शुभस्थ हो तो जातक बौद्धिक कार्यों में विशेष सफल होता है। जैसे प्रोफेसर, अध्यापक, वकील, जज, ज्योतिषी, दार्शनिक, चिकित्सक, धर्मगुरु (उपदेशक), कर्मकांड पंडित, कलाकार, अभिनेता, अभिनेत्री, व्यापारी, खिलाड़ी, करियाना या जनरल स्टोर, समाज सेवक या राजनीतिज्ञ, बैंकिंग गुप्त चर, अकाउंटेंट, मैनेजर, संपादक, प्रकाशक होता है। यदि कुंडली में चंद्र-शुक्र आदि भी शुभस्थ हो तो जातक-जातिका अभिनय, नृत्य, गायन, फैशन डिजाइनिंग, सौंदर्य प्रसाधन, आदि के क्षेत्र में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त करते हैं। धनु जातक की कुंडली में शनि दूसरे भाव में स्वक्षेत्रीय हो तो जातक उच्च स्तरीय उद्योग अथवा उच्च स्तरीय व्यवसाय में सफल होता है। ऐसे जातक शिल्प, क्रय-विक्रय, कंप्यूटर विशेषज्ञ, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में भी विशेष उन्नत एवं लाभान्वित होते देखे गए हैं।


प्रेम और वैवाहिक सुख👉 

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प्रेम और विवाह के संबंध में धनु जातक अत्यंत संवेदनशील मैत्रीपूर्ण एवं उदाहरण होते हैं। अपने उत्साहशील, आशावादी एवं विवेकपूर्ण व खुले व्यवहार तथा सहज मधुर मुस्कान लिए धनु जातक विपरीत सेक्स के युवक-युवतियों के लिए शीघ्र आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। धनु जातक जीवन में आदर्श प्रेम और बलिदान को विशेष महत्व देते हैं। प्रेम के वशीभूत होकर वह निजी स्वार्थ का भी बलिदान कर देते हैं। परंतु धनु द्विस्वभाव राशि होने के कारण ऐसे जातक प्रेम के प्रसंगों में भी जल्दबाजी नहीं करते अपितु खूब सोच विचार एवं उहापोह के उपरांत किसी के प्रेम में समर्पित हो पाते हैं। परंतु जब किसी से करने लगते है तो प्रेम एवं मैत्री में वह पूरी ईमानदारी उत्साह एवं गहराई से स्वयं को न्योछावर कर देते हैं। विवाह संबंधों के बारे में भी धनु जातक शीघ्रता एवं अत्यंत भावुकता से काम नहीं लेते बल्कि गंभीर चिंतन एवं सोच-विचार के बाद ही जीवन साथी का चुनाव कर पाते हैं। इसी असमंजस पूर्ण प्रकृति के कारण कई बार जातक की विवाह की उपयुक्त आयु भी निकल जाती है। यदि जातक की कुंडली में गुरु, सूर्य, बुध एवं शुक्र शुभस्थ हो तो जातक का वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। पत्नी सुशील, बुद्धिमान तथा आर्थिक क्षेत्र में भी सहयोगिणी होती है। यदि कुंडली में सप्तम भाव में राहु ग्रह हो तथा बुध-शुक्र अशुभ हो तो दाम्पत्य जीवन असुखद तथा पत्नी रोगिणी एवं विरुद्ध स्वभाव की होगी।


सावधानी👉 गृहस्थ एवं सामाजिक जीवन में सफलता के लिए अधिक क्रोध, ज़िद एवं आलोचनात्मक (नुक्ता चीनी) के स्वभाव पर यथासंभव नियंत्रण रखने का प्रयास करें। धनु लग्न जातक की पत्नी को भी पति के क्षणिक क्रोध की उपेक्षा करके धैर्य एवं शांति का परिचय देना चाहिए।


अनुकूल राशि मैत्री👉 

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धनु राशि लग्न जातक को प्रायः मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ और मीन लग्न राशि के जातकों के साथ विवाह, व्यापार आदि संबंध लाभप्रद होंगे। कर्क, धनु और मकर राशि वालों के साथ सामान्य तथा वृषभ और वृश्चिक, मकर राशि वालों के साथ संबंध लाभप्रद नहीं होंगे। विवाह में तात्विक एवं राशि मैत्री के अतिरिक्त पारस्परिक कुंडली मिलान मांगलिक आदि विचार तथा गुण मिलान का भी विचार अवश्य कर लेना चाहिए।


धनु लग्न की कन्या (जातिकाये)

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धनु लग्न (राशि) की कन्या कुछ लंबे कद की सुंदर, सुगठित एवं संतुलित शरीर, अंडाकार चौड़ाई लिए लंबा चेहरा, कुछ गेहूंआ वर्ण, चमकदार बड़ी (बादामी) आंखें, गहन घनी भौहे, सुंदर मजबूत दांत, कुछ चौड़ा मस्तक, खूबसूरत सुंदर एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाली होती है।


स्वभावगत विशेषताये👉 

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चापोदये या वनिताभिजाता सा बुद्धिशूरा बहुकला कुशला।

पुण्यकर्मरता, धर्मशीला, धन, पुत्रवती जाता पति-सुखान्विता।।


अर्थात धनु लग्न में उत्पन्न जातिका अत्यंत बुद्धिमान, गायन, संगीत, साहित्य, नृत्य, अभिनय आदि कला में कुशल। परोपकारी, दया-दान आदि पुण्य कर्मों में रुचि रखने वाली। धनवान, श्रेष्ठ पति एवं संतान आदि सुखों से संपन्न होती है। इसके अतिरिक्त यदि गुरु, मंगल, सूर्य शुभ हो तो धनु जातिका अध्ययनशील प्रकृति, हंसमुख, नरम दिल, उदार हृदय, ईमानदार, सत्यप्रिया, धर्मपरायणा होते हुए भी दूसरों से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाली एवं स्वतंत्र चिंतन करने वाली, स्वाभिमानी, न्यायशील, साहसी, आत्मविश्वास की भावना से युक्त होती है। ये जिस काम को करने का निर्णय कर ले उसे हर स्थिति में पूरा करके ही छोड़ती है।


इन्हें अपने लक्ष्य के लिए निर्णय करने में विलंब हो सकता है परंतु जब किसी कार्य के लिए गंभीरता से निश्चय कर ले तो उसमें अवश्य सफलता प्राप्त कर लेती है। ऐसी जातिका प्राय: उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल होती है। धनु लग्न की जातिका की कुंडली में मंगल, बुध आदि ग्रह शुभस्थ हो तो जातिका उच्चाअभिलाषी, परिश्रमी एवं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्साहशील एवं सक्रिय रहती है। जातिका अभिनय, नृत्य, कास्मेटिक, ड्रेस डिजाइनिंग, कंप्यूटर डिजाइनिंग, ऑफिस क्लर्क, अध्यापक, शिक्षा, खेलकूद, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में विशेष सफल होती है।


इसके अतिरिक्त शिक्षा व्यवसाय एवं कैरियर के लिए गत पोस्ट में लिखे गए पुरुष धनु जातक के व्यवसाय संबंधी विवरण का भी अवलोकन कर सकते हैं।


मंगल, गुरु एवं बुध आदि ग्रहों के प्रभाव स्वरूप धनु जातिका गुणवती, चरित्रवान, उच्च-शिक्षा, पठन-पाठन लेखन-संपादन, आदि कार्य में विशेष रुचि रखने वाली, अपने गुणों द्वारा समाज एवं परिवार में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली, बौद्धिक, कलात्मक एवं रचनात्मक विषयों में विशेष रुचि रखने वाली होगी। कम पढ़ी लिखी होने पर भी धर्म एवं लोक व्यवहार के संबंध में अच्छा ज्ञान रखेगी।


स्वास्थ्य एवं रोग👉 

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धनु जातिका का स्वास्थ्य बाहरी तौर पर देखने से अच्छा लगता है। परंतु यदि जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र ग्रह अशुभ हो अथवा छठे, सातवें एवं आठवें भाव में शनि, मंगल, चंद्र, केतु, राहु आदि क्रूर ग्रह पड़े हो तो जातिका को उदर या रक्त विकार, अनियमित मासिकधर्म, रक्तस्त्राव आदि गुप्त रोग, पथरी, गला, नजला-जुकाम, शिर या नेत्र पीड़ा संबंधित रोगों का भय रहता है।


प्रेम और दाम्पत्य सुख👉 

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प्रेम के संबंध में धनु जातिका व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, सहृदया एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाली। मधुर मुस्कान, स्वच्छंद व्यवहार एवं आकर्षक व्यक्तित्व के कारण धनु जातिका अपना काम करवाने में कुशल होती है। प्रेम प्रसंगों में भी भावुकतावश बहुत जल्दबाजी नहीं करती बल्कि गहन सोच विचार के बाद ही विपरीत योनि के प्रति प्रेम भावना प्रकट करती है। परंतु अपने स्वाभिमान और आदर्शों के विरुद्ध समझौता नहीं करती। यदि कुंडली में गुरु, बुध शुभस्थ हो एवं सप्तम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो और दशा भी शुभ ग्रहों की हो तो जातिका का विवाह उच्च प्रतिष्ठित योग्य लड़के के साथ होता है। पति धन संपदा एवं सुख साधनों से संपन्न होगा तथा परस्पर दांपत्य जीवन सुखमय होगा। विवाह के बाद जातिका अपने पति के परिवार एवं आर्थिक क्षेत्र में भी विशेष सहयोगी होती है। यदि सप्तम भाव में मंगल, राहु, केतु, शनि आदि क्रूर ग्रह एवं अशुभ नवांश हो तो दांपत्य सुख में कमी होती है।


अनुकूल मैत्री राशियां👉 

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धनु लग्न राशि की जातिका बौद्धिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में अपने से श्रेष्ठतर जीवन साथी को अधिमान (प्राथमिकता) देती हैं। जातिका का मैत्री एवं विवाह संबंध प्राय मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ, मीन लग्न राशियों के साथ शुभ एवं लाभदायक होगा। कर्क, धनु और मकर लग्न वाली राशियों के साथ मध्यम फलदाई तथा वृष, वृश्चिक लग्न राशि वाले जातक के साथ अशुभ फलदायक रहने की संभावना होगी। फिर भी परस्पर जन्मपत्रिका मिलान करके विवाह संबंध करना शुभ एवं कल्याणकारी रहता है।


सावधानी👉 धनु लग्न राशि की जातिका को जीवनसाथी चुनाव करते समय बहुत अधिक तर्क-वितर्क, उहापोह एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए। कई बार वृथा हठधर्मी के कारण मांगलिक विवाह की उपयुक्त आयु निकल जाती है तथा स्वयं तथा माता पिता एवं साथी को अनेक प्रकार की दुश्वारियो का सामना करना पड़ता है।


धनु लग्न जातक/जातिकाओ की दशा-अंतर्दशा में ग्रहों के फल एवं अन्य शुभाशुभ ज्ञान

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किसी भाव संबंधी फलादेश ज्ञात करने के लिए ग्रहों की दशा, अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा तथा गोचर ग्रहों की शुभ अशुभ स्थिति को भी ध्यान में रखना होता है। सभी ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा आदि के काल में कुंडली में स्थिति अनुसार अपना शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं। ग्रहों की दशा अंतर्दशा के फलादेश का निर्णय करने से पूर्व ग्रहों के कारकत्त्व स्थान आदि बल वक्री-मार्गी, उच्च-नीच आदि अवस्थाओं को भी ध्यान में रखना उचित होगा। प्रत्येक लग्न में ग्रह दशा फल में भिन्नता आने की संभावना होती है। शुभ एवं उदित ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा में धन, वाहन, भूमि, विवाह, संतान, विद्या आदि सुखों की प्राप्ति तथा सोची हुई योजनाओं में सफलता प्राप्त करवाता है।


जबकि अशुभ भावस्थ एवं नीच शत्रु राशि गत, पापी ग्रह अपनी दशा में धन हानि, शत्रु एवं रोग पीड़ा, प्रिय जनों से अनबन, कलेश व बनते कार्यों में अड़चनें पैदा करता है। धनु लग्न जातक की कुंडली में सूर्य, बुध, गुरु, मंगल ग्रह का शुभ फल अन्य ग्रह चंद्र, शुक्र व शनि का शुभाशुभ अर्थात मिश्रित फल प्रदान करेंगे। राहु, केतु कुंडली में स्थिति के अनुसार फल करेंगे इस संबंध में हमारे द्वारा पूर्व में प्रेषित किये लेख "धनु लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह" शीर्षक के अंतर्गत लिखे विवरण का भी अध्ययन करना चाहिए।


धनु लग्न संबंधित कुछ उपयोगी उपाय👉 

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शुभ रंग👉 पीला, गुलाबी, हल्का हरा, सतरंगी, हल्का नीला।


अशुभ रंग👉 काला, लाल, गहरा हरा 


शुभ वार👉  रविवार, बुधवार, वीरवार, शुक्रवार तथा शनिवार।


भाग्यशाली नग👉 माणक तथा पुखराज दोनों में से कोई एक नग (ग्रह दशा एवं आवश्यकता अनुसार) सोने या ताम्र स्वर्ण मिश्रित अंगूठी में क्रमशः रविवार अथवा गुरुवार को विधिपूर्वक धारण करें। नग सहित अंगूठी पर तीन माला बीज मंत्र का पाठ करके शुद्ध करके शुभ मुहूर्त में धारण करें।


सूर्य बीज मंत्र ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नमः।


गुरु बीज मंत्र👉 ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स:गुरवे नमः।


वीरवार का व्रत विधि पूर्वक रखना तथा उस दिन एक बार मिष्ठान युक्त भोजन करना तथा गाय को हरा चारा एवं गुड सहित चपातीया डालना शुभ होगा।


शुभ अंक👉 1, 3, 5 व 9 के अंक क्रमानुसार शुभ एवं भाग्यकारक होते हैं।


भाग्योन्नति कारक वर्ष👉  32वां 36, 37 39, 41 एवं 45 वां 47 वां और 50 वां वर्ष शुभ एवं भाग्य उन्नति कारक होगा।


अगले लेख में हम मकर राशि एवं लग्न का अनुभव आधारित संबंधित विस्तृत लेख प्रेषित करेंगे।

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धनु लग्न की कन्या (जातिकाये)

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धनु लग्न (राशि) की कन्या कुछ लंबे कद की सुंदर, सुगठित एवं संतुलित शरीर, अंडाकार चौड़ाई लिए लंबा चेहरा, कुछ गेहूंआ वर्ण, चमकदार बड़ी (बादामी) आंखें, गहन घनी भौहे, सुंदर मजबूत दांत, कुछ चौड़ा मस्तक, खूबसूरत सुंदर एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाली होती है।


स्वभावगत विशेषताये👉 

चापोदये या वनिताभिजाता सा बुद्धिशूरा बहुकला कुशला।

पुण्यकर्मरता, धर्मशीला, धन, पुत्रवती जाता पति-सुखान्विता।।


अर्थात धनु लग्न में उत्पन्न जातिका अत्यंत बुद्धिमान, गायन, संगीत, साहित्य, नृत्य, अभिनय आदि कला में कुशल। परोपकारी, दया-दान आदि पुण्य कर्मों में रुचि रखने वाली। धनवान, श्रेष्ठ पति एवं संतान आदि सुखों से संपन्न होती है। इसके अतिरिक्त यदि गुरु, मंगल, सूर्य शुभ हो तो धनु जातिका अध्ययनशील प्रकृति, हंसमुख, नरम दिल, उदार हृदय, ईमानदार, सत्यप्रिया, धर्मपरायणा होते हुए भी दूसरों से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाली एवं स्वतंत्र चिंतन करने वाली, स्वाभिमानी, न्यायशील, साहसी, आत्मविश्वास की भावना से युक्त होती है। ये जिस काम को करने का निर्णय कर ले उसे हर स्थिति में पूरा करके ही छोड़ती है।


इन्हें अपने लक्ष्य के लिए निर्णय करने में विलंब हो सकता है परंतु जब किसी कार्य के लिए गंभीरता से निश्चय कर ले तो उसमें अवश्य सफलता प्राप्त कर लेती है। ऐसी जातिका प्राय: उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल होती है। धनु लग्न की जातिका की कुंडली में मंगल, बुध आदि ग्रह शुभस्थ हो तो जातिका उच्चाअभिलाषी, परिश्रमी एवं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्साहशील एवं सक्रिय रहती है। जातिका अभिनय, नृत्य, कास्मेटिक, ड्रेस डिजाइनिंग, कंप्यूटर डिजाइनिंग, ऑफिस क्लर्क, अध्यापक, शिक्षा, खेलकूद, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में विशेष सफल होती है।


इसके अतिरिक्त शिक्षा व्यवसाय एवं कैरियर के लिए गत पोस्ट में लिखे गए पुरुष धनु जातक के व्यवसाय संबंधी विवरण का भी अवलोकन कर सकते हैं।


मंगल, गुरु एवं बुध आदि ग्रहों के प्रभाव स्वरूप धनु जातिका गुणवती, चरित्रवान, उच्च-शिक्षा, पठन-पाठन लेखन-संपादन, आदि कार्य में विशेष रुचि रखने वाली, अपने गुणों द्वारा समाज एवं परिवार में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली, बौद्धिक, कलात्मक एवं रचनात्मक विषयों में विशेष रुचि रखने वाली होगी। कम पढ़ी लिखी होने पर भी धर्म एवं लोक व्यवहार के संबंध में अच्छा ज्ञान रखेगी।


स्वास्थ्य एवं रोग👉 धनु जातिका का स्वास्थ्य बाहरी तौर पर देखने से अच्छा लगता है। परंतु यदि जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र ग्रह अशुभ हो अथवा छठे, सातवें एवं आठवें भाव में शनि, मंगल, चंद्र, केतु, राहु आदि क्रूर ग्रह पड़े हो तो जातिका को उदर या रक्त विकार, अनियमित मासिकधर्म, रक्तस्त्राव आदि गुप्त रोग, पथरी, गला, नजला-जुकाम, शिर या नेत्र पीड़ा संबंधित रोगों का भय रहता है।


प्रेम और दाम्पत्य सुख👉 प्रेम के संबंध में धनु जातिका व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, सहृदया एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाली। मधुर मुस्कान, स्वच्छंद व्यवहार एवं आकर्षक व्यक्तित्व के कारण धनु जातिका अपना काम करवाने में कुशल होती है। प्रेम प्रसंगों में भी भावुकतावश बहुत जल्दबाजी नहीं करती बल्कि गहन सोच विचार के बाद ही विपरीत योनि के प्रति प्रेम भावना प्रकट करती है। परंतु अपने स्वाभिमान और आदर्शों के विरुद्ध समझौता नहीं करती। यदि कुंडली में गुरु, बुध शुभस्थ हो एवं सप्तम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो और दशा भी शुभ ग्रहों की हो तो जातिका का विवाह उच्च प्रतिष्ठित योग्य लड़के के साथ होता है। पति धन संपदा एवं सुख साधनों से संपन्न होगा तथा परस्पर दांपत्य जीवन सुखमय होगा। विवाह के बाद जातिका अपने पति के परिवार एवं आर्थिक क्षेत्र में भी विशेष सहयोगी होती है। यदि सप्तम भाव में मंगल, राहु, केतु, शनि आदि क्रूर ग्रह एवं अशुभ नवांश हो तो दांपत्य सुख में कमी होती है।


अनुकूल मैत्री राशियां👉 धनु लग्न राशि की जातिका बौद्धिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में अपने से श्रेष्ठतर जीवन साथी को अधिमान (प्राथमिकता) देती हैं। जातिका का मैत्री एवं विवाह संबंध प्राय मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ, मीन लग्न राशियों के साथ शुभ एवं लाभदायक होगा। कर्क, धनु और मकर लग्न वाली राशियों के साथ मध्यम फलदाई तथा वृष, वृश्चिक लग्न राशि वाले जातक के साथ अशुभ फलदायक रहने की संभावना होगी। फिर भी परस्पर जन्मपत्रिका मिलान करके विवाह संबंध करना शुभ एवं कल्याणकारी रहता है।


सावधानी👉 धनु लग्न राशि की जातिका को जीवनसाथी चुनाव करते समय बहुत अधिक तर्क-वितर्क, उहापोह एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए। कई बार वृथा हठधर्मी के कारण मांगलिक विवाह की उपयुक्त आयु निकल जाती है तथा स्वयं तथा माता पिता एवं साथी को अनेक प्रकार की दुश्वारियो का सामना करना पड़ता है।


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धनु लग्न के नक्षत्र

धनु राशि भचक्र की नवें स्थान पर आने वाली राशि है । राशि का विस्तार 240 अंश से 270 अंश तक फैला हुआ है । मूल नक्षत्र के चार चरण , पूर्वाषाढा नक्षत्र के चार चरण , व् उत्तराषाढा नक्षत्र के प्रथम चरण के संयोग से धनु लग्न बनता है ।

लग्न स्वामी : गुरु

लग्न चिन्ह : प्रतीक धर्नुधर हैं जिसका पीछे का शरीर घोड़े का होता है हाथ में धनुष जिस पर बाण चढ़ा हुआ होता है

तत्व: अग्नि

जाति: क्षत्रिय

स्वभाव : द्विस्भावी

लिंग : पुरुष संज्ञक

अराध्य/इष्ट : दुर्गा, दत्तत्रये, ह्ररिद्रा गणेश, नर्सिम्ह, बजरंग बलि

ध्यान देने योग्य है की यदि कुंडली के कारक गृह भी तीन, छह, आठ, बारहवे भाव या नीच राशि में स्थित हो जाएँ तो अशुभ हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में ये गृह अशुभ ग्रहों की तरह रिजल्ट देते हैं ।

किसी भी कारक या सम गृह के रत्न को भी धारण किया जा सकता है , लेकिन इसके लिए ये देखना अति आवश्यक है की गृह विशेष किस भाव में स्थित है । यदि वह गृह विशेष तीसरे , छठे , आठवें या बारहवें भाव में स्थित है या नीच

सामान्यतया: धनुलग्न में उत्पन्न जातक स्वस्थ्य एवं बलवान होते हैं। स्वभाव

में यद्यपि ये शान्त होते हैं परन्तु यदा-कदा अभिमान के भाव का भी प्रदर्शन करते

हैं। ये धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति होते हैं तथा अत्यन्त ही बुद्धिमत्ता से अपने सांसारिक

कार्यों को सम्पन्न करके उनमें सफलता अर्जित करते हैं फलत: जीवन में धनैश्चर्य

वैभव एवं सुख संसाधनों को अर्जित करने में समर्थ रहते हैं। ये आदर्शवाद एवं

आध्यात्मिकता के मध्य प्रवृत्त होकर भौतिक सुखों के प्रति आकृष्ट रहकर उनका

उपभोग करते हैं। ये अपने समस्त कार्यों को नियमानुसार सम्पन्न करते हैं। अन्य जनों के ये विश्वास पात्र होते हैं परन्तु स्वयं दूसरे पर कम ही विश्वास करते हैं।

दानशीलता का भाव भी इनमें विद्यमान रहता है तथा समाज में मान प्रतिष्ठा तथा यश अर्जित करने में समर्थ रहते हैं। राजनीति कानून गणित या ज्योतिष आदि विषयों में इनकी रुचि रहती है तथा परिश्रमपूर्वक इन क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं। इनको

प्रेम से ही वश में किया जा सकता है अन्य प्रलोभनों से नहीं।

राशि स्वामी वृहस्पति होने से धनु लग्न के जातक कुशाग्र बुद्धि के स्वामी होते हैं । अद्भुत ऊर्जा के स्वामी ऐसे जातक की नजर हमेशा अपने लक्ष्य पर टिकी रहती है जो लक्ष्य प्राप्त करने में सहायक होती है । जिस काम में लग जाए उसे पूरा करके ही दम लेते हैं । आधा घोडा ,अग्नि तत्व , व् क्षत्रिय वर्ण इनकी तीव्रता दर्शाते हैं । ज्ञान और गति इस राशि का जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण हैं । ये अपनी बात को अथॉरिटी के साथ सबके समक्ष रखते हैं । ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा इनकी तीव्र होती है । इनके स्वभाव में नैसर्गिक तीव्रता होने से कभी कभार इन्हे घमंडी भी समझ लिया जाता है । स्वभाव से काफी रोमेंटिक होते हैं ।

धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक प्रायः दार्शनिक एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं। ये पुरानी रूढि़यों एवं संस्कारों में अटूट विश्वास करते हैं एवं उन्ही का अनुसरण करते हैं। जिस प्रकार ये स्वमं स्वभाव एवं मन ने निश्छल एवं सरल होते हैं, ऐसे ही दूसरों को भी समझते हैं। जिस कारण से ये दूसरों पर शीघ्र विश्वास कर लेते हैं, परन्तु दूसरे लोग इनकी इस सादगी का अनुचित लाभ उठाते हैं। जिसके फलस्वरूप इन्हे प्रायः धोखा मिलता है। मेष, मिथुन एवं सिंह लग्न वाले जातकों से इनकी भली प्रकार से पटरी खाती है। धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातकों  को फेफड़े एवं वायु सम्बन्धी रोगों एवं विकारों से ग्रसित होने की सम्भावना रहती है। सूर्य, बुध एवं बृहस्पति ग्रह इनको शुभ फल प्रदान करते है एवं शनि व चन्द्रमा अशुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं।

धनुलग्न के प्रभाव से आप स्वस्थ्य एवं बलशाली होंगे तथा परिश्रम एवं

बुद्धिमत्तापूर्वक अपने कार्यों को सम्पन्न करके, उनमें सफलता प्राप्त करेंगे। आप एक

अध्ययनशील पुरुष को लेकर जीवन संघर्ष करेंगे तथा किसी के प्रति भी मन में

अनावश्यक द्वेष या ईर्ष्या का भाव नहीं रखेंगे, फलत: समाज में आप आदरणीय होंगे। शत्रु एवं विरोधी पक्ष से भी आप उदारता का व्यवहार करके उनको प्रभावित करेंगे। साथ ही अपनी व्यवहार कुशलता एवं धैर्ययुक्त प्रवृत्ति से कार्यक्षेत्र में उन्नति मार्ग पर प्रशस्त होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे।

आप एक बुद्धिमान पुरुष होंगे तथा बुद्धिमत्तापूर्वक सांसारिक कार्यों में

सफलता अर्जित करके धर्नश्वर्य एवं सुख संसाधनों को अर्जित करेंगे। आप में उदारता

का भाव भी विद्यमान होगा तथा अवसरानुकूल अन्य जनों की सेवा तथा सहायता

करने में तत्पर होंगे। आर्थिक रूप से आपकी स्थिति सुदृढ़ रहेगी तथा प्रचुर मात्रा

में धन एवं लाभ अर्जित करने में आपको सफलता मिलेगी।

आपमें तेजस्विता का भाव भी विद्यमान होगा तथा आप यदा-कदा उग्रता का

भी प्रदर्शन करेंगे। राजकार्य या सरकारी सेवा में आप तत्पर रहेंगे तथा राजनीति के

क्षेत्र में भी आपको सफलता की प्राप्ति हो सकती है। आपकी श्रेष्ठ कार्यों में रुचि

रहेगी तथा इन्हीं कार्यकलापों से आपकी प्रतिष्ठा बनेगी।

आप एक आस्तिक व्यक्ति होंगे तथा धर्म के प्रति आपके मन में पूर्ण श्रद्धा

रहेगी तथा निष्ठापूर्वक आप धार्मिक कार्य कलापों को सम्पन्न करेंगे साथ ही आप

समय-समय पर तीर्थयात्राएं भी करते रहेंगे। मित्र एवं बन्धुवर्ग के आप प्रिय एवं

आदरणीय होंगे तथा उनसे इच्छित लाभ एवं सहयोग प्राप्त होता रहेगा। इस प्रकार

आप उदार, दानशील तेजस्वी, महत्त्वाकांक्षी एवं व्यवहार कुशल व्यक्ति होंगे तथा

आनन्दपूर्वक सुखों का उपभोग करते हुए अपना समय व्यतीत करेंगे।

धनु राशि पुरुष जाति, अल्पसंतति व दिवाबली है। इस राशि का चिह्न प्रत्यंचा

चढ़ा हुआ धनुष है। ऐसे व्यक्ति लक्ष्य भेदन में पटु होते हैं। इनके जीवन का एक

निश्चित (टारगेट) लक्ष्य होता है तथा ये बड़े दत्तचित्त होकर एकाग्रता से अपने कार्य

को सफल बनाने में प्रयत्नशील रहते हैं। ऐसे व्यक्ति सभा सम्मेलनों व भाषण इत्यादि में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। मित्रों के हिसाब से ये श्रेष्ठतर मित्र साबित हो सकते हैं। यदि आपका जन्म 15 दिसम्बर से 23 जनवरी के बीच में हुआ तो आपका

भाग्योदय 32 वर्ष की आयु के पश्चात् सम्भव है। बचपन में आपकी आर्थिक स्थिति

अच्छी नहीं कही जा सकती है। ऐसे व्यक्ति यौवनकाल में ही विवाह करने के पक्ष

में रहते हैं। आपको व्यवसाय व प्रेम दोनों क्षेत्रों में शत्रुओं से संघर्ष करना पड़ेगा।

गुरु पीतवर्णित होने से पीले रंग की वस्तु आपके अनुकूल रहेगी। यदि आप

अनुसंधानात्मक कार्यों में रुचि लेंगे तो सफलता आपके कदम चूमेगी। आपका जीवन रत्न पुखराज है। 

धनुलग्न की महिला जातक

धनुलग्न में जन्मी कन्या स्थूल होंठ, स्थूल दांत और नाक वाली, कफ-वात

प्रकृति, पुष्ट बाहु और जांघ वाली, ज्ञानवती होती है। यह काम करने में अति चतुर

लेकिन पति की बातों का विरोध भी करती है। जातिका मनपसंद कार्य की तरफ

झुकाव ज्यादा रखती है। प्रायः पेट दर्द की शिकायत या गैस ट्रबल बनी रहती है। अन्य औरतों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार बहुत ही कम रखती है। बुधवार व्रत, चैत्र महीना

ये हमेशा हर नवीन कार्य के लिए शुभ रहता है। संतान नियोजित न कराने पर अधिक संतान दे सकती हैं। इसे गिरकर चोट लगना, आग का भय बार-बार बन सकता है। अंत में मुख रोग या कफ से आयु क्षीण होती है। जातिका की आयु 50-65 वर्ष तक होती है। आगे का फल विशेष योगायोगों पर निर्भर है।

इस लग्न वाली औरतों की संतान सुंदर होती है। परन्तु उनमें ज्यादातर झगड़े

की शौकीन होती है या फिर साहसी कर्म में लग जाती है। जातिका कठोर स्वभाव

की होती है। धनुलग्न वाली जातिका स्वयं भी प्रेम कर और दिखावा ज्यादा करती

है। अतः लोगों से प्रेम इसे कम मिलता है।

धनु लग्न तब होता है, जब जन्मकुण्डली के प्रथम भाव में धनु राशि हो ।क्योंकि धनु राशि का स्वामी गुरु बृहस्पति है। अतः धनु लग्न के जातकों का लग्नेश गुरु होता है। धनु लग्न के जातकों का विवेचन करने के लिए गुरु ग्रह की विशेषताओं तथा धनु राशि के प्रतीक चिह्न धनुष की विशेषताओं को ध्यान में

रखना आवश्यक है। जन्म कुण्डली के प्रथम भाव को लग्न भाव कहा जाता है | किसी जातक की जन्म कुण्डली का फलादेश बहुत कुछ उस जातक की कुण्डली के लग्न भाव की राशि, लग्नेश एवं उसकी स्थिति, लग्न भाव में स्थित ग्रह, लग्न भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रह, ग्रहों की युति आदि से प्रभावित होता हैं | आइए जानते हैं कि “धनु लग्न के फलादेश” क्या हैं | इस आधार पर सहज ही ये अनुमान लगाया जा सकता है कि धनु लग्न के जातक सुगठित व आकर्षक शरीर वाले, प्रायः सक्रिय (ACTIVE) तीव्रतापूर्वक कार्य करने वाले, अच्छी दृष्टि/दूरदृष्टि वाले, व्यग्र/बेचैन किन्तु लक्ष्य का बेधन करने वाले होते हैं। ये ऊंची महत्वाकांक्षा वाले तथा खाने-पीने व SEX के मामलों में अनुशासित, संयमी व नियंत्रित होते हैं। धर्मभीरू व ईमानदार भी होते हैं तथा प्रायः अपने वचनों को निभाने वाले होते हैं। धनु लग्न के जातकों के नेत्र बादाम जैसे, बाल भूरे, दांत सुषढ़ तथा चेहरा मुस्कराहट लिए होता है। ये व्यापार पसंद होते हैं किन्तु दर्शन और विज्ञान में भी रुचि रखने वाले होते हैं। विनम्र और सेवक स्वभाव के होते हैं। जीवन के उत्तरार्ध में इन्हें फेफड़ों का विकार सम्भव होता है। पीलिया रोग से ग्रस्त होने की सम्भावनाएं भी धनु लग्न वालों को रहती है।

धनु लग्न के जातक प्राय: मोठे, मासल वसायुक्त अच्छे लम्बे कद के होते हैं। इनका माथा उन्नत/चौड़ा, नाक, रंग व व्यक्तित्व आकर्षक होता है विशेष रूप से स्त्री जातक की जंघा बड़ी होती है । मध्यायु तक प्राय: इनका पेट कुछ बाहर निकल आता है। अथवा शरीर पर मेदवृद्धि हो जाती है। यदि लग्न अशुभ प्रभाव में न हो तो ये सुन्दर व रूपवान होते हैं। ऐसे जातकों के कान तथा गर्दन प्रायः लम्बे/बड़े होते हैं। ये सत्यवादी, उदार, नि:स्वार्थी एवं साधु स्वभाव के अथवा

सज्जन होते हैं। बुद्धि तीव्र व रचनात्मक होती है। सभी कार्य भली प्रकार सोच-

विचार कर करते हैं। लग्न व लग्नेश पर यदि अशुभ प्रभाव हो तो ऐसे जातक लैक्करर, घमंडी, कायर व कठोर हो सकते हैं। धनु लग्न के जातक बैंक, अध्यापक, प्रोफेसर, परामर्शदाता, वकील, धर्मोपदेशक या मठाधीश आदि के रूप में अधिक सफल रहते हैं। यदि ये व्यापार में भी हों तो पुस्तकों/ज्ञान/धर्म/उपदेश से किसी न

किसी रूप में जुड़े रहते हैं। लग्न की स्थिति सुदृढ़ हो या गुरु शुभ प्रभाव में हो तो

ऐसे जातक प्रसिद्ध धार्मिक संत या संन्यासी आदि या धर्मगुरु होते हैं।

धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक लम्बे कद के एवं गठीली देह युक्त होते हैं। इनका चेहरा, बड़ा की कलात्मक एवं सुंदल होता है, मानो किसी साँचे में तराशा गया हो। इनकी नासिका का अग्र भाग नुकीला एवं घुमावदार होता है। ऐसे जातकों की गर्दन प्रायः लम्बी होती है, व कान बड़ा आकार लिए होते हैं। ऐसे जातक न्याय प्रिय, साधु स्वभाव वाले, निःस्वार्थ भाव से सबके कार्य करने वाले, मेधावी, स्वाभिमानी, धनवान, उदार हृदय वाले, शान्ति प्रिय, अनेक भाषाओं को समझने वाले, दिखावट व आडम्बरों से दूर ही रहने वाले, सदाचारी एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाले, कवित्व एवं साहित्य में गहन रूचि रखने वाले, सृजनात्मक कार्यों के कर्ता, बुद्धिशाली एवं विवेकशील, दयालु एवं गंभीर प्रवृत्ति वाले, स्पष्ट एवं प्रभावशाली वक्ता एवं अवसरों का भरपूर लाभ उठाने वाले होते हैं। स्वदिष्ट भोजन पदार्थों से यथा संभव दूर ही रहने की चेष्टा करते हैं। धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातकों को प्रेम एवं शान्ति से ही काबू किया जा सकता है।

धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक प्रायः दार्शनिक एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं। ये पुरानी रूढि़यों एवं संस्कारों में अटूट विश्वास करते हैं एवं उन्ही का अनुसरण करते हैं। जिस प्रकार ये स्वमं स्वभाव एवं मन ने निश्छल एवं सरल होते हैं, ऐसे ही दूसरों को भी समझते हैं। जिस कारण से ये दूसरों पर शीघ्र विश्वास कर लेते हैं, परन्तु दूसरे लोग इनकी इस सादगी का अनुचित लाभ उठाते हैं। जिसके फलस्वरूप इन्हे प्रायः धोखा मिलता है। मेष, मिथुन एवं सिंह लग्न वाले जातकों से इनकी भली प्रकार से पटरी खाती है। धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातकों  को फेफड़े एवं वायु सम्बन्धी रोगों एवं विकारों से ग्रसित होने की सम्भावना रहती है। सूर्य, बुध एवं बृहस्पति ग्रह इनको शुभ फल प्रदान करते है एवं शनि व चन्द्रमा अशुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं।

धनु लग्न के जातकों की मित्रता मेष, मिथुन तथा सिंह लग्न के जातकों से शुभ रहती है। रोग ज्योतिष के अनुसार धनु लग्न के जातकों को मेदवृद्धि तथा यकृत सम्बन्धी रोगों की विशेष सम्भावना होती है। अशुभ प्रभाव में लग्न हो तो जातक को फेफड़े तथा वायु विकार से सम्बन्धित रोग भी हो सकते हैं।

धनु लग्न में गुरु लग्नस्थ और सबल स्थिति में हो तो जातक अन्य वर्ण में में जन्म लेकर भी ब्राह्मण के समान पूज्य होता है। ब्राह्मण वर्ण में जन्मा हो तो कहना ही क्या ? ऐसा जातक ज्ञान/अध्यात्म/धर्म/दर्शन आदि विषयों में धुरंधर होता है। यदि गुरु द्वितीयस्थ हो तो पैतृक सम्पत्ति मिलने नहीं देता। सातवें भाव का गुरु जातक विदुषी पत्नी दिलाता है। आठवें भाव में गुरु हो तो जातक की आयु तथा मृत्यु तीर्थस्थान पर होती है

धनु लग्न के जातक किसी असफलता या दुखद घटना के पश्चाताप में पड़े

नहीं रहते, उसे वे शीघ्र भुला देते हैं। परन्तु इस प्रवृत्ति के कारण प्राय: वे असफलताओं

से कुछ सीख भी नहीं पाते। एक शिकारी की भांति तलाश तथा लक्ष्य निर्धारण ही

उनके लिए महत्त्वपूर्ण होता है। सफलता या असफलता नहीं। वे अपने मित्रों तथा

परिवार के लोगों के परामर्शों पर भी विशेष ध्यान नहीं देते और बहुत अधिक

स्वतंत्रता प्रेमी होते हैं। समाज उनके विषय में क्या सोचता है, इसकी उन्हें परवाह

नहीं होती, वे मनमर्जी के मालिक होते हैं।

धनु लग्न के जातकों का मित्र वर्ग प्रायः काफी विस्तृत होता है। किन्तु उनमें

स्थायी मित्रों की संख्या कम तथा बाद में शत्रु बन जाने वाले मित्रों की संख्या

अधिक होती है-ऐसा भी देखने में आया है। धनु लग्न के जातक मन में आई बात

प्रायः बीच सभा में बिना इस बात का विचार करके कह डालते हैं कि दूसरों को

कैसा लगेगा ? इनके जीवन में औरों की अपेक्षा अधिक प्रेम सम्बन्धों की सम्भावना

होती है, किन्तु ये लम्बे चलने वाले/स्थायी नहीं होते। इनके वैवाहिक जीवन में भी

प्रेम/घनिष्ठता अधिक समय तक नहीं रहती। लग्न व गुरु की स्थिति शुभ हो तो

अपना नुकसान करके भी मित्रों की मदद करने वाले तथा उस अहसान की चर्चा

न करने वाले जातक बहुत उपकारी व आध्यात्मिक होते हैं।

धनु लग्न का प्रतीक आधा व्यक्ति धनुष खींचे हुए है और वही व्यक्ति कमर के नीचे हिस्से से घोड़ा हो गया है. यह  मानसिक और शारीरिक दोनों श्रम करने वाले टास्क कर लेते हैं. राजा के निकट होता है. धनु लग्न कालपुरुष की कुंडली में भाग्य भाव में पड़ता है. इसीलिए इस लग्न को भाग्यशाली लग्न कहा जाता है. यह राशि मूल के चार चरण, पूर्वाषाढ़ा के चार चरण और उत्तराषाढ़ा के एक चरण से मिलकर बनती है.

सज्जन होते हैं

धनु लग्न वाले भाग्यशाली होते हैं. इन्हें बस अपना लक्ष्य निर्धारित करना होता है. यदि धनु लग्न पंद्रह अंश से कम है तो इसमें पुरुषत्व के गुण अधिक और पंद्रह डिग्री से ज्यादा है तो पशुत्व के गुण अधिक होते हैं. इस लग्न का स्वामी बृहस्पति होता है. धनु पूर्व दिशा का स्वामी है तथा स्वभावत: क्रूर है और अग्नितत्व की पुरुष राशि है. यह पृष्ठोदय राशि है तथा अंगो में पैरो की संधि व जांघो का स्वामित्व इसे प्राप्त है. धनु लग्न के लोग भले और सज्जन होते हैं. ये दौड़ने में माहिर होते हैं.

धार्मिक विषयों में रुचि रखते हैं

इस लग्न में जन्म लेने वाला जातक दार्शनिक प्रकृति का होता है, मानवीय तथा धार्मिक विषयों में रुचि रखता है. अगर कुंडली में बृहस्पति तीसरे भाव में हो तो उदारता की  कोई सीमा ही नहीं होती . घर आए मेहमान की आवभगत में ये लोग तन-मन-धन से लग जाते हैं. इस लग्न वाले को अन्याय पसंद नहीं होता. अन्याय देखकर ये लड़ने पर उतारू हो जाते हैं. कभी कभी ये कटु बात भी बोल जाते हैं जिससे सामने वाले को कष्ट होता है.

बुद्धि से प्रखर और सात्विक विचारों वाले होते हैं

इस लग्न वाले अपने मित्रों को बहुत चाहते हैं तथा अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं. न्याय पाने या दिलाने के लिए यदि अथक परिश्रम भी करना पड़े, तो पीछे नहीं हटते हैं. इस लग्न के जातक बुद्धि में प्रखर और सात्विक विचारों वाले होते हैं. ये कोई भी बात बड़ी जल्दी समझ जाते हैं लेकिन किसी को समझाना हो, तो एक बार के बाद चिड़चिड़ा जाते हैं. इस लग्न में जन्म लेने वाले जातक की गर्दन लंबी होती है. इनकी हंसी और मुस्कान लुभावनी होती है. ये अन्य लोगों द्वारा घिरा रहना तथा अपनी प्रशंसा पसंद करते हैं.

आदर्शवादिता में विशेष अभिरुचि होती है

ये लोग बृहस्पति के गुणों से ओत प्रोत रहते हैं. इनकी दृष्टि में संपत्ति और आर्थिक उन्नति अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहती. मंदिर बनवाने की इनकी प्रबल इच्छा होती है. इस लग्न के जातक की ज्ञान संबंधी विषयों, धार्मिक कार्यों, गहन मनन और चिंतन और जीवन की सात्विक आदर्शवादिता में विशेष अभिरुचि होती है. बिना किसी आडंबर के ये शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं. सेवा और किसी की सहायता करने में इन्हें बड़ा संतोष मिलता है. व्यंग्य और हास्य विनोद में ये माहिर होते हैं. इस लग्न वाले जातक ख्याति प्राप्त करते हैं तथा अपने कुल के श्रेष्ठ पुरुष बनते हैं. उनके कार्यों और व्यवहार की हर जगह चर्चा रहती है. उन्हें उच्चाधिकारियों का सानिध्य प्राप्त होता है.कभी-कभी ये गुण परिस्थितियों को भी जन्म देते हैं.

कफ प्रधान होते हैं

धनु लग्न का जातक कफ प्रधान प्रकृति का होता है. इन्हें स्नोफीलिया आदि बीमारियां होती हैं. साथ ही फेफड़े और छाती संबंधी बीमारियां होने की संभावनाएं भी अधिक रहती हैं. ये रूढ़िवादी विचारों के होते हैं. विवाद में ये आदर्श लोगों का ही साथ देते हैं. इस लग्न वाले व्यापार में भी रूचि लेते हैं। यदि इस लग्न वाले पुरुष की पत्नी व्यापार में हाथ बंटाए तो सफलता जल्द मिलती है. ये खाने के भी खूब शौकीन होते हैं.

शोध करने की क्षमता होती है

धनु का स्वामी बृहस्पति अष्टम में जाकर उच्च का होता है और द्वितीय भाव में जाकर नीच का हो जाता है. कर्क राशि अष्टम में पड़ने के कारण चंद्रमा अष्टमेश हो जाता है. यदि चंद्रमा कुंडली में ठीक न हुआ तो जातक का मन विचलित रहता है. लेकिन यह लोग शोधपरक कार्य करने में भी बहुत माहिर होते हैं. कुंडली में यदि चंद्रमा मजबूत हो तो यह लोग कुछ नया आविष्कार भी कर सकते हैं इसमें लक्ष्य भेदने की क्षमता तो होती है लेकिन खराब चंद्रमा होने के कारण लक्ष्य ही तय नहीं हो पाता. इस लग्न वालों को अपने गुरु का हमेशा सम्मान करना चाहिए. यदि आत्मबल में कमी हो तो पुखराज धारण करें. अपने भाग्य को बलवान बनाने के लिए प्रात: सूर्य को जल दें.

धनु लग्न के स्वामी बृहस्पति  हैं जो देवताओं के गुरु माने गये हैं. बृहस्पति के प्रभाव के कारण धनु लग्न में जन्मे जातक धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं.  अधिकारप्रिय, करुणामय और मर्यादापूर्वक व्यवहार इनका स्वभाव है. इस लग्न में जन्मे जातक गेहुएं रंग , विशाल नेत्र ओर उन्नत ललाट वाले बुद्धिजीवी होते हैं.

धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक पेशे से राजनीतिज्ञ, बैंकर, व्यवसायी, अच्छे सलाहकार, वकील, प्रोफेसर, अध्यापक, संन्यासी अथवा उच्चकोटि के उपदेशक होते हैं। अपने भाषण में ये अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा व क्षमता लगा देते हैं। यदि ऐसे जातक सैनिक बनें तो युद्ध में पीठ नहीं दिखाते। दीन दुखियों की सहायता के लिए ये सदैव तत्पर रहते हैं। दूसरों को व्यर्थ सताने वालो का ये खुलकर विरोध करते हैं, यहां तक की उसे दंडित करने से भी नहीं चूकते। आत्मविश्वासी होने के कारण ये सदैव सीधे तनकर चलते हैं। झूंठे आडम्बरों बनावट एवं दिखावट से ऐसे जातक कोसों दूर होते हैं। प्रायः लोग इन्हें समझने में भूल कर जाते हैं। धनु लग्न के जातकों का भाग्योदय 16, 22 एवं 32 वें वर्ष में होता है।

धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक लम्बे कद के एवं गठीली देह युक्त होते हैं। इनका चेहरा, बड़ा की कलात्मक एवं सुंदल होता है, मानो किसी साँचे में तराशा गया हो। इनकी नासिका का अग्र भाग नुकीला एवं घुमावदार होता है। ऐसे जातकों की गर्दन प्रायः लम्बी होती है, व कान बड़ा आकार लिए होते हैं। ऐसे जातक न्याय प्रिय, साधु स्वभाव वाले, निःस्वार्थ भाव से सबके कार्य करने वाले, मेधावी, स्वाभिमानी, धनवान, उदार हृदय वाले, शान्ति प्रिय, अनेक भाषाओं को समझने वाले, दिखावट व आडम्बरों से दूर ही रहने वाले, सदाचारी एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाले, कवित्व एवं साहित्य में गहन रूचि रखने वाले, सृजनात्मक कार्यों के कर्ता, बुद्धिशाली एवं विवेकशील, दयालु एवं गंभीर प्रवृत्ति वाले, स्पष्ट एवं प्रभावशाली वक्ता एवं अवसरों का भरपूर लाभ उठाने वाले होते हैं। स्वदिष्ट भोजन पदार्थों से यथा संभव दूर ही रहने की चेष्टा करते हैं। धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातकों को प्रेम एवं शान्ति से ही काबू किया जा सकता है।

आप अध्यन में विशेष रूचि रखते हैं. धनु लग्न में जन्मे जातक प्रायः स्वस्थ होते हैं . स्वभाव से शांत परन्तु अभिमानी और धार्मिक होते है. धनु लग्न के जातक अत्यंत बुद्धिमता का परिचय देते हुए अपने जीवन के कार्यों को पूरा करते हैं. आप अपने आदर्शों और सिद्धांतों  पर अडिग रह कर जीवन में सांसारिक सुखों का भोग करने में सफल होते है.

धनु लग्न के जातक अपने कार्यों को नियमों के अनुसार करना हे पसंद करते हैं , आप दूसरों के लिए आदर्श होते हैं परन्तु अपने किसी कार्य के लिए आप दूसरों पर विश्वास नहीं करते. स्वभाव से दानी ओर समाज में मान प्रतिष्ठा पाने में आप कामयाब होते हैं. गणित , राजनीति , क़ानून एवं ज्योतिष जैसे विषयों में आपकी रूचि रहती है तथा अपने परिश्रम से आप इन क्षेत्रों में सफलता भी अर्जित करते हैं.

ऐसे जातक प्रायः दार्शनिक विचार के हेाते हैं। आस्तिकता का पुट भी इनमें कुछ अधिक होता है, इसलिए पुरानी रूढ़ियों में जकड़े रहना इनकी नियति बन जाती है। ये सहज ही दूसरों पर विश्वास कर लेते हैं, पर दूसरे लोग इनकी इस सादगी का अनुचित लाभ उठाते हैं, फलतः इन्हें धोखा भी खाना पड़ता है। बनावट से ऐसे जातक कोसों दूर भागते हैं. प्रायः लोग इन्हें समझने मे भूल कर जाते है।

धनु लग्न में जन्मे जातक दूसरों के प्रति द्वेष या इर्ष्या की भावना नहीं रखते हैं . अपने अथक परिश्रम  तथा धैर्य के कारण आप जीवन में सफलता अर्जित करते हैं. आप विरोधी पक्ष से भी उदारता ओर सम्मान के भाव से मिलते हैं जिसके कारण समाज में आपका आदर होता है.

आर्थिक रूप से आपकी  स्तिथि समान्यतः सुदृढ़ हे रहती है तथा आप दूसरों की आर्थिक मदद से भी नहीं हिचकिचाते हैं. आपके स्वभाव में तेजस्विता स्वाभाविक रूप से दिखती है परन्तु यदा कदा उग्रता का भी आप प्रदर्शन करते हैं. राजनीती के क्षेत्र में आप सफलता अर्जित कर सकते हैं. राजकार्य या सरकारी सेवाएं भी आपके लिए अनुकूल हैं परन्तु श्रेष्ठ ओर अनुसंधान कार्यों में ही आपकी रूचि रहेगी और  इन्ही कार्यों के द्वारा आपकी प्रतिष्ठा भी बनेगी.

धनु लग्न के जातकों की धर्म के प्रति पूर्ण आस्था होती है. जीवन में कई बार आप तीर्थ यात्रा करेंगे. अपनी व्यवहार कुशलता के कारण आप अपने  मित्रों और  सहयोगियों के प्रिय तथा सम्मानीय होते हैं. जीवन में कई बार आपको अपने करीबियों से इच्छित सहयोग की प्राप्ति होती है. धनु लग्न के जातक अपने लक्ष्य के प्रति बहुत सचेत और चेष्टावान होते हैं. पूर्ण एकाग्रता के साथ लक्ष्य भेदन की कला में आप निपुण होते हैं.  धनु लग्न के पुरुष अल्प्संतती वाले होते है. बचपन में आर्थिक तंगी को झेलते हैं. व्यवसाय ओर प्रेम दोनों ही क्षेत्रों में शत्रुओं का सामना करना पड़ता है.

लग्न स्वामी गुरु, चिन्ह धर्नुधर हैं जिसका पीछे का शरीर घोड़े का होता है हाथ में धनुष जिस पर बाण चढ़ा हुआ होता है, तत्व अग्नि, जाति क्षत्रिय, स्वभाव द्विस्भावी, आराध्य बजरंग बलि होते हैं ।

मेरे अपने अनुभव के अनुसार धनु लग्न के जातक बहुत अधिक आशावादी

होते हैं तथा जीवन के कष्टों या संघर्षों को भी वे हल्के ढंग से लेते व ENJOY करते

हैं। अपने जीवन की हर ट्रेजेड़ी, हर दुर्घटना, हर असफलता को अतिशीघ्र एक

स्वप्न की भांति भूल जाते हैं। अपनी क्षमता से भी अधिक मदद करने का प्रयास

करने वाले होते हैं तथा अपने आर्थिक पक्ष और जीवन के अन्य सामाजिक पक्षों के

प्रति भी प्रायः लापरवाह होते हैं। ये लोग अपने मोहल्ले/दायरे में चर्चा का विषय

अवश्य बनते हैं। धनु लग्न के सम्बन्ध में मैं अपने गुरु पंडित सुरेश दत्त शर्मा के

इस कथन को अत्यंत उचित समझता हूं कि धनु लग्न में इस बात का महत्त्व बहुत

होता है कि लग्न में ग्रह कौन-सा बैठा हुआ है ? उस ग्रह का भी बहुत अधिक

प्रभाव धनु लग्न के जातकों पर रहता है। यदि लग्न में गुरु/सूर्य/मंगल/चंद्र हो तो

धनु लग्न के जातक बहुत अधिक सृजनात्मक हो जाते हैं। किन्तु बुध, शुक्र, शनि या राहू लग्न में हो तो स्थिति भिन्न हो जाती है। यदि गुरु स्थिति सुदृढ़ न हो तो यह

भिन्नता और भी निश्चित व गम्भीर हो जाती है।

विशेष (रोग) –धनु लग्न हो, सूर्य, मंगल तथा राहू व गुरु की युति यदि

दूसरे, तीसरे या बारहवें भाव में हो रही हो तो जातक के शरीर में कोई न कोई रोग

बना रहता है।

धनु लग्न हो, दूसरे भाव में शनि हो तथा चौथे व दसवें भाव में भी क्रूर

ग्रह हों तो भी जीवन कष्टमय रहता है। अथवा लग्न में पापग्रह हों तथा लग्नेश

निर्बल हो तो भी जातक सदैव रोगी होता है।

धनु लग्न हो, सप्तम भाव में चन्द्र, मंगल व राहू की युति हो तथा शुभ ग्रह

की दृष्टि सप्तम भाव पर न हो तो जातक की मृत्यु जन्म लेते ही हो जाती है।

धनु लग्न हो, गुरु वृश्चिक में तथा मंगल धनु में (EXCHANGE) हो तो

12 वर्ष में जातक की मृत्यु तीव्रता से सम्भव होती है (लाल किताब के अनुसार

गुरु का दोष निवारक सिद्ध यंत्र धारण करने से ऐसे जातक की आयु बढ़ जाती है)।

धनु लग्न हो, आठवें भाव का स्वामी चन्द्रमा लग्न में हो और लग्न का

स्वामी गुरु आठवें भाव में ही (EXCHANGE) तथा लग्न पर पापग्रहों की दृष्टि हो

तो जातक का स्वास्थ्य सदा खराब रहता है। किसी प्रकार की दवा-दारू का कोई

लाभ नहीं हाता। मंत्र/यंत्र के प्रयोग से ही लाभ की सम्भावना रहती है।

धनु लग्न में शुक्र हो तथा पापग्रह दृष्ट हो तो जातक की जलस्राव से दृष्टि

क्षीण/अंधे होने की सम्भावना रहती है।

धनु लग्न हो, बारहवें भाव में चन्द्र व शुक्र हो या अन्य दु:स्थानों में चन्द्र-

शुक्र की युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की अकाल मृत्यु होती है।

धनु लग्न हो, चौथे भाव में पापग्रह, चतुर्थेश (गुरु) पापग्रहों के बीच हो

तो जातक को हृदय रोग होता है।

धनु लग्न हो, गुरु मकर राशि में हो तथा अस्त/निर्बल हो तो हार्ट अटैक

से मृत्यु होती है। अथवा वृश्चिक राशि में सूर्य दो पापग्रहों के मध्य हो तो भी हार्ट

अटैक से जातक की मृत्यु होती है।

लम्बे कद के एवं गठीली देह युक्त होते हैं | शारीरिक गठन सुंदर और सजीला होता है | गोल और आकर्षक चेहरा, श्याम-पीत केश, पैनी और खिलती हुई आंखें तथा सम्मोहक मुस्कुराहट इनकी विशेषता होती है | धनु लग्न में जन्म लेने वाले व्यक्ति अधिकांशतः दार्शनिक विचार के होते हैं | ईश्वर में उनकी दृढ़ आस्था रहती है | आत्मा, परमात्मा, जीव, हंस, ब्रह्म, माया आदि विषयों पर यह सहजता से ही चिंतन करते हैं या आस्था रखते हैं | ऐसे व्यक्ति मित्रों के काम आने वाले, राजा के समीप रहने वाले, ज्ञानवान, अनेक कलाओं के ज्ञाता, सत्य का पालन करने वाले, बुद्धिमान एवं श्रेष्ठ स्वभाव वाले होते हैं |

धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक पेशे से गुरु उपदेशक, ज्ञानी, धर्मनेता, राजनीतिज्ञ, बैंकर, व्यवसायी, अच्छे सलाहकार, वकील, प्रोफेसर, अध्यापक, संन्यासी अथवा उच्चकोटि के उपदेशक होते हैं | अपने भाषण में ये अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा व क्षमता लगा देते हैं | यदि ऐसे जातक सैनिक बनें तो युद्ध में पीठ नहीं दिखाते | दीन दुखियों की सहायता के लिए ये सदैव तत्पर रहते हैं | दूसरों को व्यर्थ सताने वालो का ये खुलकर विरोध करते हैं, यहां तक की उसे दंडित करने से भी नहीं चूकते | आत्मविश्वासी होने के कारण ये सदैव सीधे तनकर चलते हैं | झूंठे आडम्बरों बनावट एवं दिखावट से ऐसे जातक कोसों दूर होते हैं | प्रायः लोग इन्हें समझने में भूल कर जाते हैं |     

       धनु लग्न में जन्म लेने वाले जातक न्याय प्रिय, निःस्वार्थ भाव से सबके कार्य करने वाले, मेधावी, स्वाभिमानी, धनवान, उदार हृदय वाले, शान्ति प्रिय एवं अनेक भाषाओं को समझने वाले होते हैं | स्वदिष्ट भोजन पदार्थों से यथा संभव दूर ही रहने की चेष्टा करते हैं | ऐसे व्यक्ति सहज ही दूसरों पर विश्वास कर लेते हैं परंतु दूसरे लोग उनकी इस सादगी का अनुचित लाभ उठाते हैं | ऐसे व्यक्ति परिश्रमी भी होते हैं , अतः आर्थिक संतुलन बिगड़ने नहीं देते | समय के पाबंद होते हैं | समय पर कार्य करना इनका स्वभाव होता है | समय की कद्र करते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी समय का पूरा ध्यान रखें |

धनु लग्न में ग्रहों के प्रभाव :-

1.बृहस्पति :- लग्नेश गुरु , पंचमेश मंगल व् नवमेश सूर्य कुंडली के कारक गृह हैं । अतः इनसे सम्बंधित रत्न पुखराज , मूंगा व् माणिक धारण किया जा सकता है । इस लग्न कुंडली में बुद्ध सप्तमेश व् दशमेश होकर एक सम गृह बनता है । सौम्य गृह होने से धारण किया जा सकता है । किसी भी कारक या सम गृह के रत्न को धारण किया जा सकता है , लेकिन इसके लिए ये देखना अति आवश्यक है की गृह विशेष किस भाव में स्थित है । यदि वह गृह विशेष तीसरे , छठे , आठवें या बारहवें भाव में स्थित है या नीच राशि में पड़ा हो तो ऐसे गृह सम्बन्धी रत्न कदापि धारण नहीं किया जा सकता है । कुछ लग्नो में सम गृह का रत्न कुछ समय विशेष के लिए धारण किया जाता है , फिर कार्य सिद्ध हो जाने पर निकल दिया जाता है । इसके लिए कुंडली का उचित निरिक्षण किया जाता है । उचित निरिक्षण या जानकारी के आभाव में पहने या पहनाये गए रत्न जातक के शरीर में ऐसे विकार पैदा कर सकते हैं जिनका पता लगाना डॉक्टर्स के लिए भी मुश्किल हो जाता है |

ध्यान देने योग्य है की मारक गृह का रत्न किसी भी सूरत में रेकमेंड नहीं किया जाता है , चाहे वो विपरीत राजयोग की स्थिति में ही क्यों न हो ।

कोई भी निर्णय लेने से पूर्व कुंडली का उचित विवेचन अवश्य करवाएं । आपका दिन शुभ व् मंगलमय हो । बृहस्‍पति प्रथम भाव का स्‍वामी होकर लग्नेश होता है. यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. धनु लग्न में बृहस्पति देवता पहले और चौथे भाव के स्वामी हैं | लग्नेश एवं चतुर्थेश होने के कारण बृहस्पति कुण्डली के सबसे योगकारक ग्रह माने जाते हैं | पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में विराजमान बृहस्पति देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | दूसरे (नीच राशि), तीसरे, छठें, आठवें और बारहवें भाव में स्थित बृहस्पति देव यदि उदय अवस्था में है तो वह अशुभ फल देंगे क्योँकि इन भावों में वह अपनी योग्यकारकता खो देंगे | कुण्डली के किसी भी भाव में अस्त पड़ें बृहस्पति देवता का रत्न पुखराज पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है | 5 मुखी रुद्राक्ष या गुरु यंत्र भारंगी की जड़ी  धारण करे लग्नेश और चतुर्थेश गुरु शुभ ग्रह है। फिर भी इसको केन्द्राधिपति दोष होने के कारण इसका फल मध्यम प्राप्त होता है। यदि गुरु स्वगृही होगा तो 'हंस योग' करेगा और उत्तम फल देगा।

2.शनि :- शनि देवता इस लग्न कुण्डली में दूसरे और तीसरे भावों के स्वामी हैं | लग्नेश बृहस्पति के विरोधी दल के होने का कारण उन्हे कुण्डली का मारक ग्रह माना जाता है | इस लग्न कुण्डली के किसी भी भाव में पड़ें शनि देव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार जातक को कष्ट ही देते हैं | उनका रत्न नीलम धनु लग्न वाले जातक को कभी भी नहीं पहनना चाहिए | शनि का पाठ और दान करके उनके मारकेत्व को कम किया जाता है | धनेश और तृतीयेश शनि मारक भी है और अशुभ फल प्रदान करता है। शनि द्वितीय और तृतीय भाव का स्‍वामी होता है. द्वितीयेश होने के कारण यह जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब विषयक मामलों का प्रतिनिधि होता है वहीं तॄतीयेश होने के कारण यह नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों को प्रतिनिधित्व देता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

3.मंगल :- मंगल देवता इस लग्न कुण्डली में पांचवें और बारहवें भाव के स्वामी हैं | पंचमेश होने के कारण मंगल कुण्डली के अति योगकारक ग्रह माने जाते हैं | कुण्डली के पहले, दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में पड़ें मंगल देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी बलाबल अनुसार शुभ फल देते हैं | तीसरे, छठें, आठवे और बारहवें भाव में यदि मंगल देव अपनी उदय अवस्था में हैं तो अपनी योग कारकता खोकर वह अशुभ फल देतें हैं | किसी भी भाव में अस्त पड़ें मंगल देव का रत्न मूंगा पहन कर उनके बल को बढ़ाया जाता है | पंचमेश और द्वादशेश मंगल त्रिकोणेश होने से शुभ फल प्रदान करता है। मंगल पंचम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने कारण यह बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है एवम द्वादशेश होने के नाते निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

4.शुक्र :- शुक्र षष्‍ठ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. षष्ठेश होने के नाते यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. एवम द्वादशेश होने के कारण लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैंधनु लग्न कुण्डली में शुक्र देवता छठे और एकादश भाव के मालिक हैं | वह लग्नेश बृहस्पति देवता के विरोधी दल के भी हैं | इसलिए शुक्र देव कुण्डली के मारक ग्रह माने जाते हैं | किसी भी भाव में स्थित शुक्र देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार जातक को अशुभ फल ही देते हैं | परन्तु छठें, आठवें और बारहवें में शुक्र देवता विपरीत राजयोग में हैं तो वह शुभ फलदायक भी बन जाते हैं इसके लिए बृहस्पति देवता का शुभ और बलि होना अनिवार्य है | षष्ठेश और लाभेश शुक्र पाप ग्रह है तथा अशुभ फल करने वाला है।

5.बुध :- बुध देवता इस लग्न कुण्डली में सातवें और दसवें भाव के मालिक हैं |बुध सप्‍तम भाव का स्वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं लग्नेश बृहस्पति से उनका सम का रिश्ता है | कुण्डली में बुध देवता अपनी स्थिति के अनुसार अच्छा या बुरा दोनों ही फल देते हैं | पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में पड़ें बुध देवता की जब दशा-अन्तर्दशा चलती है तो वह अपनी क्षमता अनुसार जातक को शुभ फल देतें हैं | तीसरे, चौथे (नीच राशि), छठें, आठवें और बारहवें भाव में पड़ें  बुध देवता अपनी कारकता खोकर अशुभ फल देतें हैं | किसी भी भाव में अस्त बुध देवता का रत्न पन्ना पहनकर उसका बल बढ़ाया जाता है | सप्तमेश और दशमेश बुध मारक ग्रह है और केन्द्राधिपति दोषी है। यह अशुभ

फल प्रदान करता है। बुध स्वगृही होने पर 'भद्र योग' करेगा। अच्छा फल देगा

इसलिए मध्यम है।

6.चंद्र :- धनु लग्न कुण्डली में चंद्र देवता आठवें भाव के मालिक हैं | अशुभ भावों के मालिक होने के कारण चंद्र देवता को कुण्डली का अतिमारक ग्रह माना जाता है | कुण्डली के किसी भी भाव में पड़े चंद्र देवता की जब दशा-अन्तर्दशा चलती है तो वह जातक के लिए कष्टकारी होती है | छठे और आठवें में स्थित चंद्र देवता  विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देते हैं परन्तु इसके लिए लग्नेश बृहस्पति का शुभ और बलि होना अनिवार्य है | इस लग्न कुण्डली में चन्द्रमा का रत्न मोती किसी भी जातक को नहीं पहनना चाहिए  |अष्टमेश चंद्रमा पापी है यहां पर 'गजकेसरी योग' आदि बनते हों तो वे शुभ फल प्रदान नहीं करते है। यह चंद्रमा सम है फिर भी जिस भाव में बैठेगा उसका फल कमजोर करेगा।

7.सूर्य :- सूर्य देवता इस लग्न कुण्डली में नौवें भाव के स्वामी हैं | सूर्य नवम् भाव का स्‍वामी होकर धनु लग्न के जातक के भाग्‍य और धर्म का प्रतिनिधित्‍व करता है. यह जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.  भाग्येश होने के कारण वह कुण्डली के अति योगकरक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें व दसवें भाव में स्थित सूर्य देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | तीसरे, छठें, आठवें, और बारहवें भाव में पड़ें सूर्य देवता अपनी योगकारकता खो देते हैं और अपनी दशा-अन्तर्दशा में अशुभ फल देते हैं | इस लग्न में सूर्य देवता का रत्न माणिक पहनकर उसकी शुभता को बढ़ाया जाता है |

नवमेश सूर्य उत्तम फल प्रदान करेगा और शुभ है।

8.राहु :-  दशम भाव का स्वामी होकर धनु लग्न में जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयक प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

9. केतु :- चतुर्थ भाव का स्वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.  

इस कुंडली में मंगल और सूर्य की युति या कोई संबंध हो तो शुभ योग होगा। इस कुंडली का प्रधान ग्रह सूर्य है। उसका गुरु से योग व संबंध भी शुभ होगा, सफल योग देगा। धनु राशि कालपुरुष का नवां अंग नितंब है। यानि हीपस है। इसलिए धनु राशि

में गुरु नवम भाव और नवमेश सूर्य अगर पाप प्रभावी हो तो नितंबों में

रोग होंगे। इस कुंडली में मंगल और बुध की युति केन्द्र और त्रिकोण का संबंध होने

पर भी ‘निष्फल योग' होगा, फलदायी नहीं होगा। इस कुंडली में मंगल और गुरु के योग या बुध व सूर्य के योग लक्ष्मीदायक होंगे।

9 धनु लग्न के इष्ट- मंत्र-

धनु राशि : इन्हें रक्त हरिद्रा गणेश देवी दुर्गा नारायण हनुमान माता कमला या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।

धनु लग्न

सूर्य : नवमेश सूर्य भाग्यवर्धक है। सूर्य की दशा के वर्ष यद्यपि कम हैं, लेकिन इन वर्षों में योजनाओं का क्रियान्वयन होता है। भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है।सूर्य भगवान् को अर्ग देवे, माणक 1 मुखी रुद्राक्ष, सांड को आटा खिलाये या खिलावेमंदिर में चाँदी का नंदी भेट करे l बेल की जड़ी पहने आदित्य ऋदय स्तोत्र, सूर्य कवच का पाठ करे सप्तमी, रविवार का व्रत रखे  ॐ घृणिः सूर्याय नमः बेल का वृक्ष लगावे बेल का फल शिव पर चढ़ावे l

चंद्रमा : अष्टमेश चंद्रमा यदि पक्षबल से हीन हो, तो शुभ है अन्यथा रोग और परेशानियों को बढ़ाता है।चंद्र अशुभ रहेगा तो दान करे, मोती न पहने चावल दान करे शिवलिंग पर दूध का अभिषेक कर कुत्तो को पिलावे, पत्नी को चाँदी का टूथपिक 
देवे पत्नी को चाँदी की गिलास में पानी पिलावे, पत्नी को मोती भेट करे lससुराल से चाँदी का सिक्का लेवे

मंगल : धनु लग्न मकी दोहरी भूमिका है। पंचमेश होने से पर्याप्त कारक भी है, तो द्वादशेश होकर अनिष्टकारी भी है। मंगल का पूर्वार्ध बेहतर हो सकता है, जिसमें किसी नवीन कार्य की योजना बन सकती है।लाल मूंगा धारण करे, अनंत मूल की जड़ी, 3 मुखी रुद्राक्ष पहने, ताम्बे का कड़ा ताम्बे में जल पिए, हनुमानजी को पूजे, हनुमानजी, नरसिंह जी, रक्तांग भैरवजी पूजे, नीम का पेड़ लगावे, ताम्बे में मंगल यन्त्र धारण करे

बृहस्पति : सर्वदा शुभ लाभ समृद्धि फल वृध्दि सुख, शुभ अमृत कारक आयुष्य के लिए सर्वश्रेस्ठ बृहस्पति लग्नेश होने से सबसे श्रेष्ठ, पुखराज , सुनहला, सिट्रीन रत्न धारण करे 5 मुखी रुद्राक्ष और भारंगी की जड़ी पहने, पीतल में खाना खावे, पीपल का पेड़ लगाए सीचे और शनिवार को  के तेल का दिया करे, बृहस्पति यंत्र इंडेक्स फिंगर में सोने में पहने, पुष्करतीर्थ में स्नान और पूजन करावे,  दक्षिणमुखीशिव, दत्तात्रेय भन् की पूजा करे उनको गुरु  बनावे

शनि : द्वितीयेश और पराक्रमेश शनि किसी भी दृष्टि से मंगलकारी नहीं है। मारक प्रभाव से युक्त शनि, जीवन में विपदा और रोगों में वृद्धि करता है। शनि की महादशा में लोहे का दान देना शुभ होता है। 7 मुखी रुद्राक्ष, बिच्छू की जड़ धारण करे, लाजवर्त,  फ़िरोज़ा धारण करे, लोहे का छल्ला दाए हाथ की मधयमा अंगुली में में पहने, नाव की कील को पास रखे, तेल उड़द दान करे l इडली डोसा 8 इमरती गरीबो में बांटे

बुध : सप्तमेश और दशमेश बुध की दशा प्रतिकूल ही होगी। दो केंद्रों का स्वामी होने से बुध केंद्राधिपति दोष से दूषित है। यदि बुध दुःस्थानों (षष्ठ, अष्टम और द्वादश) में कहीं हो, तो शुभ हो सकता है।सर्वदा शुभ धन सिद्धि कारी पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने किन्नरों की सेवा करे साडी और हरे मुंग की दाल खावे फिटकरी से नहाये दुर्गा उपासना करे

शुक्र : षष्ठेश और एकादशेश शुक्र की महादशा में विपरीत फलों की प्राप्ति होती है। व्यक्ति ऋणों से ग्रस्त रहता है। शुक्र अशुभ फल देगा उसके दान ही करे l कोई रत्न मंत्र जड़ी रुद्राक्ष न पहने 

राहु-केतु सर्वदा अशुभ इनके दान करे जूता छाता चप्पल कम्बल मोज़े टोपी, 8स्टील और 8लोहे के बर्तन, जौ बाजरी प्याज लहसुन सफ़ेद काले तिल, कोयला सिगड़ी, मोप्पर, वाइपर, पोछा, साबुन लिक्विड वाशिंग  पाउडर केमिकल, मेडिसिन  या इंडक्शन
शनि :  काली उडद
शुक्र :  ज्वार
चंद्र: चावल
केतु :  बाजरा/चवला
राहू: जौ/मोठ
मिक्सचर donate करे गौशाला में
@  9,18,27,54,81,108,kg
गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को करें
OR
50gm डिब्बी में रात को सिरहाने रखकर या सुबह 27 बार एंटीक्लॉक वाइज उवार कर पक्षियों में डाले

9 धनु लग्न के इष्ट- मंत्र-

धनु राशि : इन्हें रक्त हरिद्रा गणेश देवी दुर्गा नारायण हनुमान माता कमला या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।
ॐ लं लम्बोदराय नमः
ॐघृणि सूर्य आदित्य श्रीं
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ॐऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै
ॐ हौं जूं सः 
धनु लग्नराशि के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।
ॐग्लौंबृंरंदंखंहौंदूंभ्रंहंफ़्रौं
ऎंह्रींश्रींक्लीं हंसौः जगत्प्रसूत्यै नमः"
ॐ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:
इसके अलावा ये गृह आपके अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे इनकी दशा में जप करावे
गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'।
गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।
सूर्य तांत्रिक मंत्र- ॐ ह्रां ह्रीं हौं स: सूर्याय नम:।
एकाक्षरी बीज मंत्र- ॐ घृणि: सूर्याय नम:
भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।
बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।
बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'।
प्रजापति शनि
शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'।
शनि का एी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'
धनु लग्न के लिए गुरु, सूर्य, मंगल, बुध, वरुण, योग कारक हैं। अतः पुखराज, माणिक्य, मूंगा, पन्ना, फ़िरोज़ा, टाइगर धारण करें। 1,3,4,5,7 मुखी रुद्राक्ष पहनना भी आवश्यक है।
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दान: चंद्र, शुक्र, शनि, राहु, केतु

चंद्र:  सफ़ेद रंग की वस्तुवे, सफ़ेद फूल, कैल्शियम, नदी स्नान, केवड़ा  सफ़ेदवस्त्र,दूध,पानी मोती, मूंस्टोंन, चाँदी के आइटम , चाँदी का सिक्का,चाँदीपायल ,  चाँदीकमरबंध,चाँदीबिछिया,चाँदी पेन,चाँदी गायी, चावल, लौकी जल पेठा, खीर, मावा, खील, बताशे,खरबूजा,ककड़ी, अनानास, रसीलेफल, अंगूर, भांग, शलजम, सिंघाड़े, खस, केवड़ा, ठंडाई, बर्फ,गोला, सीताफल,  नारियलपानी,पोदीना, शरबत, ओला,शकरगोला, मिश्री, मक्खन,
मैदा, छाछ, नारियल तेल

शुक्र ग्रह अंक 6, 6 मुखी रुद्राक्ष, सरपौंखा की जड़, हीरा प्लैटिनम चांदी  स्टील वाइट metal,का 6ग्राम सिक्का, श्रीयंत्र, छोला,सफ़ेद काबुली चने, मैदा,  कमलगट्टा , सफ़ेदक्रीम, पनीर , मक्खन, दही,  चावल, ज्वार, सफ़ेद उड़द दाल, मिश्री, दूध, दही लस्सी, श्रीखंड, इत्र, सफेद चंदन, चांदी, प्लैटिनम, हीरा, अमेरिकन डायमंड, सफ़ेद पुखराज, ओपल, मोज़ोनैट, बंगाली छैने की सफ़ेद मिठाई, मलाई, कपूर, इत्र, कमल ककड़ी, धूपबत्ती, खुशबु की वस्तुवे,टेलकम पाउडर, श्रृंगार सामग्री, मोगरा चमेली सफ़ेद खुशबूदार पुष्प, इत्र परफ्यूम डीओ, फ्रग्रेंस, कद्दू,आलू,शक्करकंद, आगरे का पेठा, मखाने, सफ़ेद क्रिस्टल, led लाइट, गन्ना, सफ़ेद मावा मिश्री, काजू कतली, दूधबर्फी, बताशा, आभूषण, सिल्क रेशम, मखमल, सफ़ेद मूंगा, sunscreen लोशन, क्रीम, टूथपेस्ट, स्त्री सौंदर्य सामग्री, सैनेटरीपेड, स्त्री प्रसाधन, ब्रा-पेंटी,   मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, आराम की सामग्री, मनोरंजन सामग्री, सिंघाड़ा, साबूदाना , आलू के बने व्यंजन, निरोध, वियाग्रा,

शनि के दान

अंक 8, लोहा, 8 लोहे के बर्तन, 8 के काले नीले वस्त्र  अंक में काजल, सुरमा, कालीउड़द, लोहे के औज़ार, हथियार गाडी, धातु से बने पात्र, अस्त्र शास्त्र, मशीन, 7 धान, जूते, काले फल, काले अंगूर, काले नीले फूल, कला दन्त मंजन, काला नमक, राई,  काले मोज़े, काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, अलसी, तेल, काला पुष्प, कस्तूरी, काले तिल, चमड़ा, काले कंबल का दान किया जाता है
नील, चारकोलसोप, आवला, पीपल, कला कुत्ता, उड़द से बने इमरती, डोसा, इडली, सांभर वादा, काली दाल, चाय की पत्ती, काली पैंट, कला रुमाल, गोल बगीचे के आठ चक्कर, टायर, पायल, धातु, बांसुरी, लौंग, काली हल्दी, काले चने

राहु-केतु के दान अंक 4-7

नीलेफूल, मैग्गी, चौमीन, सोया सॉस ,फ़ास्ट फ़ूड, अंडा नॉनवेज, चाय, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, ईरफ़ोन, mic, स्पीकर, मुखौटा,  नशे, डबल रोटी ब्रेड, बासी भोजन, स्टील, अस्ट धातु या पांच धातु या मिश्रण धातु के आइटम, लेड शीशा, पीतल, कांसा, स्टील के बर्तन  जौ-बाजरा,प्याज-लहसुन,काले-सफ़ेद तिल, मशरूम, ऊनि- टोपी, जूता, छाता, चप्पल कम्बल, एलोपैथिक होम्योपैथिक दवाइयाँ, चाकू छुरी, तलवार कटार, ढाल, कपडे, शराब, मादक पदार्थ, खट्टे आइटम, डेटोल, स्पिरिट, पोछा, वाशिंग मशीन, साबुन डिटर्जेंट, केमिकल, तेज़ाब, एसिड, पोइसन, केमिकल स्प्रे, radio, मोबाइल, ट्रांजिस्टर, इंडक्शन चूल्हा, शमशान की लकड़ी, पलंग, पूरानी लकड़ी के आइटम हेंडीक्राफ्ट   काले-दुरंगे कुत्ते, राहु के लिए काला-नीला कपड़ा, कंबल, सरसों का दाना, राई, ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का ‍दान किया जाता है।
केतु के लिए सात अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान किया जाता है।

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गणेश मंदिर :  बुद्धवार
लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की दोनों  चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE
में लगावे

देवी दुर्गा मंदिर
/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच
सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री  यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे  

सूर्य मंदिर : रविवार, सप्तमी का व्रत
रोली चावल जल से नित्य अर्घ दे
आस्तोत्र, अष्टक, कवच का पाठ सूर्य यन्त्र स्थापित करे पूर्व दिशा में 
गायत्रीमन्त्र स्तोत्र कवच का पाठ
राम उपासना रामायण का पाठ

काली मंदिर : शनिवार  चढ़ावे : माँ काली को प्रथम भेट में पांव की पायल भेट करे और सरसो के तेल का दिया मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे  108 बार मंत्र बोले ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए  

भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ  इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड,  उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः, भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे

हनुमान मंदिर : मंगल शनि
गदा की भेट, चमेली आवला का दिया 5 इमरती 5 गुलाब पुष्प,सिन्दूर चमेली तेल गुड़ चना पान चढ़ावे
llॐ हं फ़्रौं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट ll दक्षिण में मंगल यन्त्र पांच मुखी हनुमान यन्त्र स्थापित करे
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शिव मंदिर : कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र,  व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार),  पान, गन्ने का रास दीप, पान
मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च
ह्रौं नमः शिवाय 
पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में
बारह ज्योतिर्लिंग और उनका राशियों से संबंध
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कमला लक्ष्मी मंदिर
मिश्री दही दूध बताशा गन्ना श्रीफल केला पान सुपारी मखाना साबूदाना चावल की खीर मोगरे का इत्र माला धुप ,मिश्री मावा अनार सेब
श्रीयंत्र स्थापित करे कनकधारायंत्र कुबेर यंत्र स्थापित करे श्रीसूक्त, कनकधारा, लक्ष्मीसूक्त, पद्मावती, श्रीविद्या,लक्ष्मीअष्टक,त्रयोदशी,  अमावस्या पूर्णिमा, अष्टमी तृतीया त्रयोदशी लक्ष्मी कमला त्रिपुर सुंदरी कवच मन्त्र पत्नी से करावे
षोडशी श्री विद्या मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'
या
ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:
ॐ ह्रींश्रींक्लीं महालक्ष्म्यै नमः
ॐश्रीं श्रियै नमः
ॐकमलवासिन्यै स्वाहा
ॐ कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगतप्रसूत्यै नमः

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पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे
अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे
रामायण, भागवत का पाठ करावे
गौशाला ब्राह्मण को दान करे
पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे  में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00  से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके  हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे 
llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3
    2. त्रिपिंडी
    3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच
ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः
पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे


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