नाड़ी दोष विवेचन तथा परिहार

नाड़ी दोष का परिहार 
Cancellation of Nadi Dosha
भारतीय सनातन परम्परा में धर्म अर्थ काम त्रिविध पुरूषार्थं सिद्धि के लिये तथा सर्वश्रेष्ठ गृहस्थ आश्रम के निर्वाह के लिये विवाह संस्कार कि नितान्त आवश्यकता होती है। विविध परीक्षणों से यह सिद्ध होता है कि वैदिक विधि से तथा ज्योतिष शास्त्रीय मेलापक द्वारा किये गये विवाह चिरकाल तक निर्बाध रूप से स्थायी होते हैं। विवाह पूर्व वर एवं बधू के जन्मनक्षत्रों का ज्योतिषीय विधि से विविध प्रकार का परीक्षण किया जाता है जिसे हम मेलापक, आनुकूल्य या प्रीति कहते हैं। विवाह मेलापक में विविध प्रकार के कूटों का अनुप्रयोग किया जाता है जिनकी संख्या 8, 10, 12, 18, 20, 23 अब तक के व्यक्तिगत शोध अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि विवाह में समवेत रूप से अधिकतम 23 प्रकार के मेलापक का विचार विवाह पूर्व वर एवं वधू में किया जाता है किन्तु इन सबका प्रयोग सम्बन्धित क्षेत्रों तक ही सीमित है तथा विशेष परिस्थितियों में इनका प्रयोग किया जाता है। जिसमे 4 मेलापक राशि से, 1 मेलापक ग्रह से, 16 मेलापक नक्षत्रों से, तथा आयु एवं शक्ति (प्रेम मेलापक से करते हैं। प्रश्नमार्ग में है -

चत्वारिभिर्भपेनैकं सक्त्या च वयसोडुभिः ।


शोडषेत्यनुकूलानां त्रयोविंशतिरीरिता ।।

इन विविध कूटों के होते हुये भी सम्पूर्ण ज्योतिष वाङ्मय में अष्ट कूटों की ही प्राधानता स्वीकार है। इन सभी कूटों में भी नाडी कूट का विशेष महत्व है क्योंकि ब्रह्मा ने इस स्त्रियों के मंगलसूत्र की तरह बनाया है जिस प्रकार स्त्रियों के कण्ठ में आजीवन पर्यन्त सर्वदा मंलगसूत्र विराजमान रहता है उसी प्रकार विविध कूटों में प्रधान रूप से नाडी कूट विराजमान रहता है -

नाडीकूटं तु संग्राह्यं कूटानां तु शिरोमणिः ।>

ब्रह्मणा कन्यकाकण्ठसूत्रत्वेन विनिर्मितम् ।।

अतः सभी कूटों में नाडी कूट का अवश्य ही विचार करना चाहिये। प्रायः सभी ग्रन्थों में अश्विन्यादि क्रम से आदि मध्य एवं अन्त्य नाडी का ही उल्लेख प्राप्त होता है 

पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही “कुण्‍डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्‍त सुखमय गृहस्‍थ जीवन व्‍यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इन में से एक ..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्‍से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनसे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।नाड़ी दोष का ज्ञान और कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है. आइए विस्तार से जानें :-

त्रिनाड़ी कूट -

त्रिनाडी कूट का ही सर्वत्र प्रचार एवं प्रसार दिखाई देता है। क्योंकि यह ज्ञान विधि में अत्यन्त सरल एवं सहज है समाज में यह देखा जाता है कि जो वस्तु सरल है उसी का प्रयोग प्रायः सभी लोग करते हैं जैसे विंशोत्तरी दशा। दशायें तो बहुविध है किन्तु सरल एवं सहज होने के कारण प्रायः सर्वत्र इसी का प्रयोग लोग करते हैं। वराहमिहिर ने भी विंशोत्तरी दशा का उल्लेख नहीं किया है। उन्होनें ग्रहानीत आयु को ही ग्रह दशा प्रमाण स्वीकार्य किया है। त्रिनाडी कूट का सम्बन्ध जीवन दायी श्वास एवं प्रश्वास से है । आयुर्वेद शास्त्र में प्रतिपादित इडा पिंगला सुषुम्ना नाडी का प्रयोग किया जाता है जिसके प्रतिकूल होने पर शरीर में विभिन्न प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होती है। अतः यदि वरवधू के जन्म नक्षत्र जन्य नाडीयों में भी प्रतिकूलता होती है तो विवाह अशुभ होता है। त्रिनाडी कूट में आदि मध्य एवं अन्त्य तीन प्रकार के नक्षत्रों का विभाजन क्रमशः अश्विन्यादि क्रम से सर्पाकार स्वरूप में किया जाता है। जैसा कि अधोलिखित चक्र से स्पष्ट है।

त्रिनाडी चक्र -

आदिअश्विनीआद्र्रापुनर्वसुउ0 फा0हस्तज्येष्ठामूलशतभिषापू0भा0
मध्यभरणीमृगशिरापुष्यपू0 फा0चित्राअनुराधापू0 षा0धनिष्ठाउ0 भा0
अन्त्यकृत्तिकारोहिणीआश्लेषामघास्वातीविशाखाउ0 षा0श्रवणरेवती

उपर्युक्त चक्र के आधार पर किसी की भी नाडी सरलता से जानी जा सकती है यदि किसी का जन्म नक्षत्र आद्र्रा है तो उसकी नाडी आदि होगी। इसी प्रकार अन्य का भी जानना चाहिये। नाडी कूट मिलान में यदि वर एवं वधू की एक ही नाडी हो जाये तो अनिष्ट करने वाली होती है यदि दोनों का जन्मनक्षत्र आदि नाडी में पडे तो पति पत्नी का परस्पर वियोग होता है। यदि दोनों की मध्य नाडी हो तो वर एवं वधू दोनों को मृत्यु तुल्य कष्ट या मृत्यु होती है तथा यदि दोनों की अन्त्यैक नाडी हो जाये तो वैधव्य एवं दुःख करने वाली नाडी होती है। इसी प्रकार मेलापक में नाडी कूट का विचार किया जाता है। यदि दोनों की नाडी भिन्न हो जाये तो किसी प्रकार का दोष नही होता है और वैवाहिक जीवन सुखमय व्यतीत होता है। जैसे पुरूष की नाडी आदि तथा स्त्री की नाडी अन्त्य या मध्य या पुरूष की नाडी मध्य कन्या की अन्त्य या आदि हो । वराह वचन है -

आद्यैकनाडी कुरूते वियोगं मध्याख्यनाड्यमुभयोर्विनाशः ।
अन्त्या च वैधव्यमतीवदुःखं तस्माच्च तिस्रः परिवर्जनीयाः ।।

इसी प्रकार त्रिनाडी कूट का विचार विवाह में किया जाता है किन्तु सूक्ष्म अध्ययन से यह पता चलता है कि जिस पुरुष या स्त्री का जन्म नक्षत्र के चारों चरण एक ही राशि में हो केवल उसी के लिये त्रिनाडी चक्र का विचार करना चाहिये । जैसे अश्विनी एवं भरणी नक्षत्र का चारों चरण मेष राशि में होता है। इसी प्रकार रोहिणी, आद्र्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पू.फा. हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, श्रवण, शतभिषा, उ.भा., रेवती नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों का ही त्रिनाडी चक्र से विचार किया जाता है अन्य नक्षत्रोत्पन्न जातकों का नहीं क्योंकि इन नक्षत्रों के चारों चरण एक ही राशि में पडते हैं। प्रमाण है कि -

चतुस्त्रिद्वयङ्घ्रिभोत्थायाः कन्यायाः क्रमशोऽश्विभात् ।
वह्निभादिन्दुभान्नाडी त्रिचतुःपंचपर्वसु ।।

चतुर्नाडी कूट -

जिस प्रकार विवाह मेलापक में त्रिनाडी कूट का विचार किया जाता है उसी प्रकार भिन्न नक्षत्रों में उत्पन्न जातकों के लिये चतुर्नाडी का प्रयोग किया जाता है। जिस प्रकार त्रिनाडी कूट से तीन प्रकार के नक्षत्रों का विभाजन होता है ठीक उसी प्रकार चतुर्नाडी में 28 नक्षत्रों का विभाजन चार प्रकार से किया जाता है। उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि जिस जातक का जन्म तीन चरणों वाले नक्षत्रों में हो उसी के लिये चतुर्नाडी कूट का विचार करना चाहिये। चतुर्नाडी कूट का चक्र इस प्रकार बनता है। जैसे अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण मेष राशि में होने से त्रिनाडी कूट का प्रारम्भ अश्विनी से होता है ठीक उसी प्रकार नक्षत्रमाला में जिस प्रथम नक्षत्र का तीनों चरण एक ही राशि में पड़ता हो उससे ही चतुर्नाडी कूट का प्रारम्भ होता है। जैसे सर्वप्रथम कृत्तिका नक्षत्र का तीनों चरण वृष राशि में होने से चतुर्नाडी कूट का प्रारम्भ कृत्तिका से होता है। चक्र इस प्रकार है

-कृत्तिकामघापू. फा.ज्येष्ठामूलश्रवणधनिष्ठा
रोहिणीआश्लेषाउ.फा.अनुराधापूर्वाषाढाउ.भाद्रपदरेवती
मृगशिरापुष्यहस्तविशाखाउत्तराषाढापूर्वा भाद्रपदअश्विनी
आद्र्रापुनर्वसुचित्रास्वातीअभिजित्शतभिषाभरणी

जिस प्रकार त्रिनाडी चक्र में वर एवं वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक नाडी में पड़ने से अनिष्ट कारक होता है उसी प्रकार चतुर्नाडी कूट में भी वर एवं वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक नाडी में हो तो अनिष्ट कारक होता है। यह चतुर्नाडी विचार सूक्ष्म रूप से उन जातकों के लिये किया जाता है जिन जातकों का जन्म नक्षत्र तीन चरणों वाला हो अर्थात् जिन नक्षत्रों का तीनों चरण एक ही राशि में पड़ता हो। इस प्रकार कृत्तिका, पुनर्वसु, उ.फा., विशाखा, उत्तराषाढा, पूर्वा भाद्रपद नक्षत्रों में जन्मे जातकों के लिये ही चतुर्नाडी कूट का प्रयोग किया जाता है। पुनश्च देश भेद से अहल्या क्षेत्रों में (दिल्ली के आस पास स्थित कुरूदेश का समवर्ती प्रदेश उत्पन्न हुये वर एवं वधू के लिये विशेष रूप से चतुर्नाडी का प्रयोग करना चाहिये ऐसा शास्त्रवचन प्रमाण है क्योकि ज्योतिष शास्त्र को बिना शास्त्रप्रमाण से कहने वाले लोगों को ब्रह्म हत्या का दोष लगता है। अतः उपरोक्त दोनों विधि से जन्म लेने वाले पुरूष एवं स्त्री के लिये चतुर्नाडी का प्रयोग करना चाहिये। एक नाडी से भिन्न नाडी में विवाह शुभ होता है ।

चतुर्नाडी त्वहल्यायां पांचाले पंचनाडीका ।
त्रिनाडी सर्वदेशेषु वर्जनीया प्रयत्नतः ।।

पंचनाडी कूट -

त्रिनाडी कूट एवं चतुर्नाडी कूट की तरह ही पंच नाडी कूट का प्रयोग किया जाता है। जिस प्रकार त्रिनाडी कूट में नक्षत्रों को तीन भागों मे बांटा गया था और चतुर्नाडी कूट में चार भागों में बाटा गया था ठीक उसी प्रकार पंचनाडी कूट में नक्षत्रों का पांच भागों में बांटकर वर्गीकरण किया गया है। पूर्वोक्त श्लोक से स्पष्ट है कि जिस नक्षत्र को दो चरण एक ही राशि में पडते हो उसी नक्षत्र से पंच नाड़ी की गणना प्रारम्भ की जाती है। जैसे नक्षत्रमाला में सर्वप्रथम मृगशिरा नक्षत्र का दो चरण एक ही राशि में पडता है अतः पंच नाडी कूट का गणना भी मृगशिरा से प्रारम्भ किया जाता है । पंचनाड़ी कूट का चक्र इस प्रकार है -

>> >>
मृगशिराहस्तचित्राश्रवणधनिष्ठारोहिणी
आद्र्राउ.फा.स्वातीउ. षा.शतभिषाकृत्तिका
पुनर्वसुपू.फा.विशाखापू. षाढापूर्वाभाद्रपदभरणी
पुष्यमघाअनुराधामूलउत्तराभाद्रपदअश्विनी
आश्लेषा>ज्येष्ठा>रेवती>

इस प्रकार से पंचनाड़ी कूट का विभाजन किया जाता है जिस प्रकार त्रिनाड़ी एवं चतुर्नाड़ी में एक ही नाड़ी में वर एवं वधू के जन्म नक्षत्र होने से अनिष्टकर होता है ठीक उसी प्रकार पंचनाड़ी में भी एक ही नाड़ी में दोनों के जन्म नक्षत्र होने से नाडी कूट अनिष्टकर होता है भिन्न नक्षत्र होने से विवाह शुभ होता है। जिस वर एवं वधू का जन्म दो चरणों वाले नक्षत्रों में हो केवल उन्हीं के लिये पंच नाडी कूट का प्रयोग करना चाहिये जैसे मृगशिरा, चित्रा, एवं धनिष्ठा में जन्म लेने वाले जातको के लिये पंच नाड़ी कूट का प्रयोग करना चाहिये तथा चश्देश भेद से भी पंच नाडी का प्रयोग क्षेत्र विशेष में करना चाहिये उपर्युक्त वचन से स्पष्ट है कि पंचनाडी का प्रयोग केवल पांचाल देश (आधुनिक रूहेलखण्ड में उत्पन्न वर एवं वधू के लिये करना चाहिये अन्य देशोत्पन्न जातकों के लिये नहीं करना चाहिये। केवल इन दोनों परिस्थितियों में ही पंच नाड़ी का प्रयोग करना चाहिये। इस प्रकार ज्योतिष शास्त्रीय शोध विश्लेषण के आधार पर विभिन्न परिस्थितियों विभिन्न नाडी कूट का प्रयोग करना चाहिये ऐसा ज्योतिष शास्त्र का निर्देश है ।

सर्वनाडी कूट परिहार -

विवाह मेलापक मे नाड़ी कूट की महत्ता को स्वीकार्य करते हुये अनुकूल मिलान होने पर इसे सर्वोत्तम अंक 8 प्रदान किया गया है तथा यदि वर एवं वधू दोनों का प्रतिकूल नाड़ी कूट मिलान होने पर 0 अंक प्रदान किया जाता है। ऐसी परिस्थिति में नाडी कूट के दोष से बचने के लिये हमें विविध प्रकार के परिहारों की आवश्यकता पड़ती है जिससे नाडी कूट के दोषों से तो नहीं बचा जा सकता किन्तु उसके गुण धर्म में विशेष प्रकार की अल्पता अनुभव प्रयोग में दिखाई पडती है। अतः नाडी कूट के कतिपय परिहार यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनके आधार पर नाड़ी कूट जन्य दोषों का निवारण शास्त्रीय आधार पर सुलभ हो जाता है। वर एवं वधू दोनों का एक ही नक्षत्र नाड़ी विभाग में जन्म नक्षत्र होने पर नाडी दोष होता है अतः उसका सर्वप्रथम परिहार नक्षत्र एवं राशि द्वारा ही किया जाता है।

  1. यदि दोनों का जन्म नक्षत्र एक पाश्र्व नाडी गत (भिन्न नक्षत्र हो तथा एक राशि हो तो नाडी दोष का परिहार हो जाता है जैसे कृत्तिका एवं रोहिणी की अन्त्य नाडी है किन्तु राशि मिथुन हो जाने से इसका परिहार हो जाता है ।
  2. यदि दोनों का नक्षत्र एक हो किन्तु राशि भिन्न हो तो नाडी दोष का परिहार हो जाता है जैस कृत्तिका नक्षत्र में दोनों का जन्म होने से अन्त्य नाडी है किन्तु राशि मिथुन एवं कर्क भिन्न हो जाने से परिहार हो जाता है। ये दोनों परिस्थिति केवल पास के नक्षत्रों मे ही संभव दूर के नक्षत्रों मे नही जैसे भरणी एव मृगशिरा नक्षत्र।
  3. यदि पूर्वोक्त प्रकार से दूर का नक्षत्र हो तो अर्थात् दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो (चारों चरण एक राशि में हो तो चरण भेद से नाडी कूट का परिहार हो जाता है। जैसे अश्विनी नक्षत्र मे जन्म होने पर दोनों की आदि नाड़ी होती है। पूर्वोक्त दोनों प्रकार से उसका परिहार नहीं हो पाता है अतः यदि दोनों का चरण भिन्न हो तो नाडी कूट का परिहार हो जाता है जैसा कि मुहूत्र्तचिन्तामणि में कहा है -
  4. राश्यैक्ये चेद् भिन्नमृक्षं द्वयोः नक्षत्रैक्ये राशीयुग्मं तथैव ।
    नाडी दोषो न गणानां च दोषः नक्षत्रैक्ये पादभेदे शुभं स्यात् ।।

    कुछ नक्षत्र ऐसे होते हैं जो पूर्णतः नाडी दोष से मुक्त होते हैं इन नक्षत्रों मे नाडी दोष प्रभावी नही होता है। जैसे रोहिणी आद्र्रा, मृगशिरा, कृत्तिका, पुष्य, ज्येष्ठा, श्रवण, उत्तरा भाद्रपद, रेवती, नक्षत्रों मे जन्मे पुरूष एवं स्त्री के लिये नाडी दोष प्रभावी नहीं होता है ।

    रोहिण्याद्र्रा मृगेन्द्राग्नी पुष्यश्रवणपौष्णभम् ।
    अहिर्बुध्न्यक्र्षमेतेषां नाडी दोषो न जायते ।।

    इस प्रकार शास्त्रीय वचनों को प्रमाण मान कर के यदि नाड़ी कूट का परिहार किया जाये तो नाड़ी दोष से पूर्णतः मुक्ति मिल सकती है। अतः हमें ज्योतिष शास्त्रीय प्रामाणिक ग्रन्थों का विशेष अध्ययन करने के पश्चात् ही किसी निष्कर्ष पर निर्णय देना चाहिये। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो न जाने कितने ही वैवाहिक दम्पती का जीवन अन्धेरे में डाल देते हैं नाड़ी दोष समाज में सभी जनमानस में समान रूप से विराजमान है किन्तु तथा कथित ज्योतिषीयों द्वारा गलत निर्णय देने से समाज में इस ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा धूमिल होती है। अतः यह हमारा परम दायित्व है कि हम शास्त्रीय ग्रन्थों का अध्ययन करें तथा उसका व्यवहारिक प्रयोग करके ही उसे लागु करें। क्योंकि ज्योतिष शास्त्र को भास्कराचार्य ने आदेश शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया है यदि आदेश गलत होगा तो ज्योतिष शास्त्र के वास्तविक स्वरूप में विकृति आयेगी ।

नाड़ी दोष : अपवाद /  निर्मूल

पंडितों के अधिकांश कुंडली मिलान मे नाड़ी को विशेष स्थान देते हैं ।उचित है ,परंतु किसी भी अधूरे ज्ञान या अपूर्ण ज्ञान के कारण कई विवाह ,अनावश्यक ही रुकवा देना पाप है ।

लगभग 13 नक्षत्र नाड़ी दोष मुक्त होते हैं| कन्या का जन्म नक्षत्र ब्राह्मण वर्ण का न हो तो नाड़ी दोष का प्रश्न हीनहीं | मानव जाति से नाड़ी नहीं देखि जाती |कन्या का जन्म नक्षत्र किस जाति का है यह ही नाड़ी का सिद्धान्त  है |

नाड़ी से अभिप्राय एवं प्रकार 

नाड़ी का पर्याय रज्जु अर्थात रस्सी । मानव शरीर मे व्याप्त रक्त प्रवाहिनी , रोग निदान के लिए भी आउर्वेद चिकित्सा पद्दती मे नाड़ीका प्रमुख स्थान है ।  .नारद पुराण मे 05 नाड़ियों के नाम .  .–शिरो,कंठ,कुक्षि,कटि एवं पाद ।

शिरो-सिर(प्रभाव-मृत्यु ), कंठ-गला,दोष होने वैधव्य , कुक्षि- नाभी, कुप्रभाव-संतान कष्ट,कटि-कमर,निर्धनता, रात पाद-पैर ,कुप्रभाव-यात्रा आधिक्य | उत्तर भारत मे तीन नाड़ी- आदि,मध्य,अंत्य का विवाह मिलान मे प्रयोग ।

नाड़ी दोष , उत्तर भारत मे  03 नाड़ी, दक्षिण भारत मे 05 नाड़ी ,कही कहीं 04 नाड़ी

से विवाह मिलान ,प्रचलन मे है । उत्तर भारत विषेश रूप से उत्तरप्रदेश,बिहार या राजस्थान का  क्षेत्र है।

विडम्बना है कि ये क्षेत्र मुस्लिम आक्रांताओं ,शासन का रहा है। इसलिए वैदिक अनेकों परम्पराओं ने दम तोड़ दिया ओर नई वेद विरुद्ध परंपरा स्थापित हो गई जैसे पर्दा प्रथा, रात्रि मे विवाह  आदि ।

नाड़ी मूलतः 05 होती हैं। परंतु यहाँ 03 नाड़ी पर ही विचार करे ।

नाड़ी दोष नियम कैसे लागू होता है 

सामान्य नियम -वर,कन्या के जन्म नक्षत्र यदि एक ही नाड़ी समूह मे हो तो नाड़ी दोष होता है |

*किसी भी नियम के लागू होने की शर्ते (Conditionस) होती हैं ,उन विशिष्ट स्थितियोंमे ही कोई नियम लागू होता है ।

नाड़ी दोष देखने– कन्या के नक्षत्र से प्रारम्भ करना चाहिए ।

ज्योतिष मे व्यक्ति की जाति का कोई स्थान नहीं है ,जन्म नक्षत्र किस जाति,किस गोत्र,का है ?यह देखना महत्वपूर्ण है | कन्या का जन्म नक्षत्र यदि ब्राह्मण जाति का है तो नाड़ी दोष पर विचार करना चाहिए |

जाति दोष- नक्षत्र के स्थान पर ”व्यक्ति” प्रचलन –भ्रामक-

ब्राह्मण मनुष्यों को नाड़ी दोष ,क्षत्रियों को वर्ण दोष ,वैश्यों को गण दोष एवं शूद्रो को योनि दोष नहीं होना चाहिए।

प्रमाण- नाड़ी दोषस्तु विप्राणां वर्ण दोषस्तु क्षत्रिये ।

      गणदोषस्तु वैष्येषु शूद्राणां योनि दूषणम्।। -शीघ्रवोध

यह भ्रामक है कि,ये दोष ब्राह्मण ,ये दोष क्षत्रिय,ये दोष बनिए,ये दोष शूद्र पर लागू होगा । कुंडली मिलान मे यदि ब्राह्मण कि कुंडली है तो वे सभी दोष ,जो क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र,से संबंधित हैं ,उनको विचार क्षेत्र से निकाल देना चाहिए ।या अन्य जातियों कि कुंडली मिलान मे नाड़ी दोष पर विचार नहीं करना चाहिए ।परंतु एसा कोई पंडित या ज्योतिषी नहीं करता ।

यथार्थ मे जन्म नक्षत्र जिस गोत्र एवं जाति का है ,यह महत्वपूर्ण है |   मनुष्यकी जाति कदापि नहीं |

सर्पाकार नाड़ी चक्र के पास के नक्षत्र विशेष हानिप्रद-

जैसे  अश्वनी - आद्रा, पुनर्वसु-उफा, हस्त-ज्येष्ठा, मूल-शतभिषा, रोहिणी-अश्लेषा,  मघा-स्वाति, विशाखा-उषा, श्रवण-रेवती, भरणी-मृगशिरा, पुष्य -पूषा, चित्रा-अनुराधा, पूषा-धनिष्ठा,

-     

अनेक नक्षत्रों मे नाड़ी दोष नहीं । यह मेरा विचार नहीं वरन अनेक ग्रंथो मे उल्लेखित है -

1- विशाखा, आद्र्रा, श्रवण, रोहिणी, पुष्य, भरणी, पू.भा. मघा में से किसी एक ही नक्षत्र में दोनों का जन्म है तो नाड़ी दोष नहीं होगा। यदि स्त्री पुरूष की तारा भी एक हो तो श्रेष्ठ है। (कालनिर्णय)

विषाखिकाद्र्रा श्रवण प्रजेषतिष्यांततत्पूर्वमघा प्रषस्तो।

स्त्रीपुंसतारैक्य परिग्रहे तुशेषा विवत्र्या इति संगिरन्ते।।       (ज्योतिर्निबन्धोक्त)

2- पूर्वा भाद्रपद, अनुराधा, धनिष्ठा, विषाखा, भरणी, कृत्तिका, हस्त, श्लेषा, पुष्य श्रवण में भी किसी एक में वर व कन्या का जन्म हो तो भी नाड़ी दोष नहीं रहता है।

 ‘अजैकपान्मित्रवसुद्विदैवप्रभंजनाग्न्यर्कभुजंगमानि।

मुकुन्द जीवान्तक भानि नूनंशुभानि योषिन्नरजन्मभैक्ये।।

3-  (म) भरणी, (अ) कृत्तिका, (अ) रोहिणी, (म) मृगाषिरा, (आ) आद्र्रा, (मे) पुष्य, (अ) मघा, (अ) विषाखा, (म) अनुराधा, (अ) श्रवण, (अ) धनिष्ठा, (अ) पू. भाद्रपद, (म) उत्तरा भाद्रपद, (अ) रेवती।किसी  एक ही नक्षत्र में जन्म होने पर नाड़ी दोष नहीं होता ।

4-  शुक्रे जीवे तथा सौम्ये एकराषीष्वरो यदि ।

    नाडीदोषो न वक्तव्यः सर्वथा यत्नतो बुधैः।।      (विवाह कुतूहल)

     मिथुन, कन्या, धनु, मीन, वृष, तुला इन राशियों में से कोई एक राशि वर व कन्या की एक साथ हो तो नाड़ी दोष नहीं लगेगा।

5- विवाह निसर्ग पुस्तक-शुभ ग्रह, बुध, गुरू, शुक्र यदि दोनां की राशियों के स्वामी हों .नाड़ी दोष नही बनता है।

6- गोदावरी के दक्षिण की ओर स्थित शहरों, महाराष्ट्र, मैसूर, मद्रास, आन्ध्र प्रदेष आदि प्रान्तों में नाड़ी दोष का विचार आवष्यक नहीं है।

प्रमाण- गोदावरी दक्षिणतो भावच्च मलयानिलः।

      त्यजन्ति तेषु देषेषु नाड़यैक्यं न करग्रहै।। (मुहूर्त दीपिका)

7 -यदि वर वधु की राशि एक ही हो किन्तु नक्षत्र चरण भिन्न् हो तो नाड़ी दोष नहीं होता।

8- आ*परंतु 1-4 या 2-3 अर्थात प्रथम एवं चतुर्थ चरण दोनों का हो या 2रा एवं 3रा चरण हो तो नाड़ी दोष मान्य ।

9- दोनां की राशि एक हो किन्तु नक्षत्र अलग-अलग हो तो भी नाड़ी दोष नहीं होता

10 नाड़ी दोष मुक्त नक्षत्र:- 

कृतिका, रोहिणी, मृगषिरा, आद्र्रा, पुष्य, ज्येष्ठा, श्रावण, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती इन नक्षत्रों में यदि वर-कन्या का जन्म हो तो भी नाड़ी दोष नहीं लगता ।

प्रमाण- रोहिण्याद्र्रामृगेन्द्राग्निपुष्य श्रवण पौष्णम्।

     अहिर्बुध्न्यक्र्षमेतेषां नाड़ीदोषो न विद्यते ।। -ज्यौतिष चिन्मामणि

11- नाड़ी दोष मुक्त राशि:-  यदि वर एवं वधु के राशि स्वामी बुध गुरू अथवा शुक्र हो तो भी नाड़ी दोष नहीं लगता। (3.6.9.12.2.7 राशि )

प्रमाण- शुकः सौम्यो तथा जीव एक राशिष्वरो यदि।

       नाड़ी दोषो न वक्तव्यः सर्वथा यत्नतो बुधैः।।

(कन्या तथा वर - मिथुन.कन्या/धनु. मीन/वृष. तुला राशि के है।)

r     यदि आवश्यक हो तो  महामृत्युंजय जप, गौदान ,स्वर्ण दान करिए तो भी नाड़ी दोष का परिहार होता है।

12-  राहिण्याद्र्रा मृगेन्द्राग्नी पुष्य श्रवण पौष्णभम्।

     उत्तराप्रौष्ठपाच्चैव नक्षत्रैक्येऽपि शोभनम् ।।

अर्थात् राहिणी, आद्र्रा, मृगाशिरा, पुष्य, विशाखा, श्रवण, उ.भा. रेवती इन आठ नक्षत्रों मे से किसी एक नक्षत्र में चरण भेद न होते हुए भी वर-कन्या दोनों का जन्म हो तो नाड़ी दोष नहीं है।

श्रेष्ठ-नियम -नाड़ी पश्येच्च ताराणां शुद्धमुद्वाहनं शुभम्।

वर कन्या के नवांश स्वामियों में मित्रता तथा राशिनाथा में शत्रुता रहने पर भी नाड़ी एवं तारा शुद्धि हो तो विवाह शुभ होता है

नाड़ी दोष का कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है. आइए विस्तार से जानें :-

वर तथा वधु की एक ही राशि हो लेकिन नक्षत्र भिन्न तब इस दोष का परिहार होता है.

दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चंद्र राशि भिन्न हो तब परिहार होता है.

दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चरण भिन्न हों तब परिहार होता है.

शास्त्रानुसार नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गणा दोष वैश्यों के लिए और योनि दोष शूद्र जाति के लिए देखा जाता है.

ज्योतिष चिन्तामणि के अनुसार 
रोहिणी, मृ्गशिरा, आर्द्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण, रेवती तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र होने पर नाड़ी दोष नहीं माना जाता है.

विवाह में वर-वधू के गुण मिलान में नाड़ी का सर्वाधिक महत्त्व को दिया गया है। 36 गुणों में से नाड़ी के लिए सर्वाधिक 8 गुण निर्धारित हैं। ज्योतिष की दृष्टि में तीन नाडियां होती हैं – आदि, मध्य और अन्त्य। *इन नाडियों का संबंध मानव की शारीरिक धातुओं से है।* वर-वधू की समान नाड़ी होने पर दोषपूर्ण माना जाता है तथा संतान पक्ष के लिए यह दोष हानिकारक हो सकता है।

शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि: “नाड़ी दोष केवल ब्रह्मण वर्ग में ही मान्य है।”
“समान नाड़ी होने पर पारस्परिक विकर्षण तथा असमान नाड़ी होने पर आकर्षण पैदा होता है।” आयुर्वेद के सिद्धांतों में भी तीन नाड़ियाँ – वात (आदि ), पित्त (मध्य) तथा कफ (अन्त्य) होती हैं। शरीर में इन तीनों नाडियों के समन्वय के बिगड़ने से व्यक्ति रूग्ण हो सकता है।

भारतीय ज्योतिष में नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं।

9-नौ नक्षत्रों की एक नाड़ी होती है।
जो इस प्रकार है।
आदि नाड़ी अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद ।.

मध्य नाड़ी👉 भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद

अन्त्य नाड़ी कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती ।

नाड़ी के तीनों स्वरूपों आदि, मध्य और अन्त्य ..
आदि नाड़ी ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। यही नाड़ी मानव शरीर की संचरना की जीवन गति को आगे बढ़ाने का भी आधार है।

सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी और ब्रह्म नाड़ी” जिसे इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा के नाम से भी जानते हैं। कालपुरुष की कुंडली की संरचना बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों तथा योगो करणों आदि के द्वारा निर्मित इस “शरीर में नाड़ी का स्थान सहस्रार चक्र के मार्ग पर होता है।” यह विज्ञान के लिए अब भी “पहेली”-बना हुआ है कि नाड़ी दोष वालों का ब्लड  प्राय: ग्रुप एक ही होता है । और “ब्लड ग्रुप” एक होने से रोगों के “निदान, चिकित्सा,  उपचार” आदि में समस्या आती हैं।

इड़ा, पिंगला, और सुसुम्णा*

 हमारे मन मस्तिष्क और सोच का प्रतिनिधित्व करती है ।यही सोच और वंशवृद्धि का द्योतक “नाड़ी” हमारे दांपत्य जीवन का आधार स्तंभ है। अत: नाड़ी दोष को आप गंभीरता से देखें। यदि एक नक्षत्र के एक ही चरण में वर कन्या का जन्म हुआ हो तो नाड़ी दोष का परिहार संभव नहीं है। 

और यदि परिहार है भी तो जन मानस के लिए असंभव है। ऐसा देवर्षि नारदने भी कहा है।
एक नाड़ी विवाहश्च गुणे:
                  सर्वें: समन्वित: l
वर्जनीभ: प्रयत्नेन
                  दंपत्योर्निधनं ll

अर्थात वर -कन्या की नाड़ी एक ही हो तो उस विवाह वर्जनीय है। भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

ऐसी लोक चर्चा है कि वर कन्या की नाड़ी एक हो तो पारि‍वारिक जीवन में अनेक बाधाएं आती हैं और संबंधों के टूटने की आशंका या भय मन में व्‍याप्‍त रहता है.

 कहते हैं कि यह दोष हो तो संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है, पति-पत्नी में परस्‍पर ईर्ष्या रहती है और दोनों में परस्‍पर वैचारिक मतभेद रहता है.*

नब्‍बे प्रतिशत लोगों का एकनाड़ी होने पर ब्लड ग्रुप समान और आर एच फैक्‍टर अलग होता है यानि एक का पॉजिटिव तो दूसरे का नेगटिव होता है.  हो सकता है इसलिए भी संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है।
चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक शोधों में भी समान ब्लड ग्रुप वाले युवक युवतियों के संबंध को स्वास्थ्य की दृष्टि से अनपयुक्त पाया गया है। 

चिकित्सकों का मानना है कि यदि लड़के का आरएच फैक्टर RH+ पॉजिटिव हो व लड़की का RH- आरएच फैक्टर निगेटिव हो तो विवाह उपरांत पैदा होने वाले बच्चों में अनेक विकृतियाँ सामने आती हैं, जिसके चलते वे मंदबुद्धि व अपंग तक पैदा हो सकते हैं। वहीं रिवर्स केस में इस प्रकार की समस्याएँ नहीं आतीं, 

इसलिए युवा अपना रक्तपरीक्षण अवश्य कराएँ, ताकि पता लग सके कि वर-कन्या का रक्त समूह क्या है।* चिकित्सा विज्ञान अपनी तरहसे इस दोष का परिहार करता है, लेकिन “ज्योतिष” ने इस समस्या से बचने और उत्पन्न होने पर नाड़ी दोष के उपाय निश्चित किए हैं । इन उपायों में जप-तप, दान पुण्य, व्रत, अनुष्ठान आदि साधनात्मक उपचारों को अपनाने पर जोर दिया गया है ।
शास्त्र वचन यह है कि-
*एक ही नाड़ी होने पर
“गुरु और शिष्य”*
“मंत्र और साधक”
“देवता और पूजक” में भी क्रमश: †ईर्ष्या, †अरिष्ट और †मृत्यु” जैसे कष्टों का भय रहता है l*
 देवर्षि नारद ने भी कहा है :-
वर-कन्या की नाड़ी एक ही हो तो वह विवाह वर्जनीय है. भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से तो पति-पत्नी के स्वास्थ्य और जीवनके लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है ।
ll वेदोक्त श्लोक ll
〰〰〰〰〰
अश्विनी रौद्र आदित्यो,
            अयर्मे हस्त ज्येष्ठयो l
निरिति वारूणी पूर्वा
              आदि  नाड़ी स्मृताः ll
भरणी सौम्य तिख्येभ्यो,
              भग चित्रा अनुराधयो l
आपो च वासवो धान्य
              मध्य नाड़ी स्मृताः ll
कृतिका रोहणी अश्लेषा,
              मघा स्वाती विशाखयो।
विश्वे श्रवण रेवत्यो,
             *अंत्य नाड़ी* स्मृताः॥
आदि  नाड़ी* के  अंतर्गत नक्षत्र
क्रम: 01, 06, 07, 12, 13, 18, 19, 24, 25 वें नक्षत्र आते हैं।
—+—+—+—
मध्य नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम : 02, 05, 08, 11, 14, 17, 20, 23, 26 नक्षत्र आते हैं।
—+—+—+—
अन्त्य नाड़ी* के अंतर्गत क्रम : 03, 04, 09, 10, 15, 16, 21, 22, 27 वें नक्षत्र आते हैंl
—+—+—+—
 
 वहीं ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष के अनुरूप यदि एक ही रक्त समूह वाले वर-कन्या का विवाह करा दिया जाता है तो उनकी होने वाली संतान विकलांग पैदा हो सकती है।*
अत: नाड़ी दोष का विचार ही आवश्यक है.*

एक नक्षत्र में जन्मे वर कन्या के मध्य नाड़ी दोष समाप्त हो जाता है लेकिन नक्षत्रों में चरण भेद आवश्यक है.

जैसे दोनों की राशि एक हो लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों.
वर-कन्या का नक्षत्र एक हो और चरण अलग-अलग हों.
उदाहरण:-
वर-ईश्वर (कृतिका द्वितीय),
वधू-उमा (कृतिका तृतीया)
दोनों की अंत्य नाड़ी है। परंतु कृतिका नक्षत्र के चरण भिन्नता के कारण शुभ है।
एक ही नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों:– 
यह निम्न नक्षत्रों में होगा l*
आदि  नाड़ी
*वर*- आर्द्रा, (मिथुन),
*वधू*- पुनर्वसु, प्रथम, तृतीय चरण (मिथुन),
*वर* उत्तरा फाल्गुनी (कन्या)- *वधू*- हस्त (कन्या राशि).
*मध्य नाड़ी *वर*- शतभिषा (कुंभ)- *वधू*- पूर्वाभाद्रपद प्रथम, द्वितीय, तृतीय (कुंभ)
*अन्त्य नाड़ी: *वर*- कृतिका- प्रथम, तृतीय, चतुर्थ (वृष)-
*वधू*- रोहिणी (वृष)
*वर*- स्वाति (तुला)- *वधू*-विशाखा- प्रथम, द्वितीय, तृतीय (तुला)
*वर*- उत्तराषाढ़ा- द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ (मकर)- *वधू*- श्रवण (मकर) —-
*एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो*
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जैसे *वर अनिल*- कृतिका- प्रथम (मेष) तथा *वधू इमरती*-
कृतिका- द्वितीय (वृष राशि)। दोनों की अन्त्य नाड़ी है परंतु राशि भिन्नता के कारण शुभ पाद-वेध नहीं होना चाहिए.
वर-कन्‍या के नक्षत्र चरण “प्रथम और चतुर्थ” या
“द्वितीय और तृतीय” नहीं होने चाहिएं.
*उक्त परिहारों में यह ध्यान रखें कि वधू की जन्म राशि, नक्षत्र तथा नक्षत्र चरण, वर की राशि, नक्षत्र व चरण से पहले नहीं होने चाहिए।* “अन्यथा नाड़ी दोष परिहार होते हुए भी शुभ नहीं होगा ।”

*उदाहरण देखें :-*
1.वर- कृतिका- प्रथम (मेष), वधू- कृतिका द्वितीय (वृष राशि)-

2.शुभ वर- कृतिका- द्वितीय (वृष),
वधू-कृतिका- प्रथम (मेष राशि)- *अशुभ*
*वैसे तो वर कन्या के राशियों के* *स्वामी आपस में मित्र हो तो वर्ण दोष, वर्ग दोष, तारा दोष, योनि दोष, गण दोष भी  …नष्ट हो जाता है.

*वर और कन्या की कुंडली में राशियों के स्वामी एक ही हो या मित्र हो* अथवा D-9 नवांश के स्वामी परस्पर मित्र हो या एक ही हो तो सभी “कूट-दोष” समाप्त हो जाते हैं.*
*नाड़ी दोष हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए. इससे दांपत्य जीवन में आ रहे सारे दोष समाप्त हो जाते हैं.*
नाड़ी दोष का उपचार:-
पीयूष धारा के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।
नाड़ी दोष का प्रभाव कम करने के लिए किसी ब्राह्मण को गोदान या स्वर्णदान करना चाहिए। इसके अलावा सालगिराह पर अपने वजन के बराबर अन्न दान करना चाहिए। साथ ही ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्र दान करना चाहिए।

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