कुंडली मिलान और भकूट दोष : कारण और परिहार

कुंडली मिलान और भकूट दोष : कारण और परिहार 
कुंडली के कुछ दोष जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं. इन्हीं में से एक भकूट दोष है. दरअसल कुंडली का भकूट दोष शादीशुदा जिंदगी में कई मुश्किलें पैदा करता है. दरअसल यह दोष शादी के बाद आर्थिक संकट पैदा करता है. साझेदारी वाले बिजनेस में भी धीरे-धीरे धन का संकट बढ़ने लगता है. साथ ही निवेश में कड़ी मेहनत करने के बाद भी आशाजनक लाभ नहीं मिलता है. परिणाम स्वरुप बिजनेस में नुकसान होने लगता है. इसके अलावा संतान से भी कष्ट मिलता है. इतना ही नहीं कई बार तो इस दोष के कारण शादीशुदा जिंदगी में तलाक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.  
भकूट दोष का प्रभाव शादी के बाद अधिक देखने में आता है. वर-वधु की कुंडली मिलान के दौरान भकूट दोष खास तौर पर देखा जाता है. यह दोष तब बनता है जब वर-वधु की कुंडली में चंद्रमा 6-8 भाव में स्थित रहे. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक यह दोष बहुत खतरनाक होता है. शादी के बाद यह दोष पति-पत्नी दोनों के लिए काष्ट का कारण बनता है. जानते हैं कि कुंडली में भकूट दोष के बारे में. 

भकूट दोष का नकारात्मक प्रभाव

  • भकूट दोष वैवाहिक जीवन में कई गंभीर मुद्दों को जन्म दे सकता है। ये समस्याएं स्पष्ट नहीं होंगी, लेकिन धीरे-धीरे वैवाहिक जीवन को नष्ट कर देता है। व्यक्ति निम्नलिखित प्रभावों को नोटिस करेगा:

  • वे अपनी शादी में वित्तीय समस्याओं का सामना करेंगे। यह समस्या कई मायनों में हो सकती है। उदाहरण के लिए, भागीदारों में से एक पूरी तरह से दूसरे पर निर्भर होने के कारण, भारी निवेश या कड़ी मेहनत के बाद व्यापार में विफल रहना।

  • संतान को लेकर परेशानी होगी। इससे विवाह में असंतुष्ट शारीरिक संबंध जैसे मुद्दे भी आ सकते हैं।

  • वे अपने संबंधों में निरंतर असहमति और झगड़े का सामना करेंगे जिससे कानूनी अलगाव हो सकता है।

  • अगर आपकी कुंडली में भकूट दोष एक और पुरुष दोष के साथ आता है तो यह एक साथी की मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

  जन्मकुंडली देखने का कार्य ज्योतिष के ज्ञाता का है  कम्पयूटर मानव कार्यों का एक सर्वोतम सहायक जरूर है, परंतु मानव नहीं इसलिए कम्पयूटर का उपयोग करें तो सिर्फ जन्मकुंडली निर्माण हेतु न कि कम्पयूटर द्वारा दर्शाई गई गुण मिलान संख्या को आधार मानकर कोई अंतिम निर्णय लिया जाए कुंडली मिलान और भकूट दोष : कारण और परिहार Kundali milan aur bhakut dosh parihar

कुंडली-मिलान में दोषों का परिहार (काट) कैसे होती है, 

मांगलिक दोष, गण दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष, मंगल दोष आदि ज्योतिष में महादोष कहे गए हैं, कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह पैमाना बिलकुल गलत है, कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ, सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढ़ना चाहिए |

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आजकल  आँख मूंदकर यही देखा है कि गुण कितने मिल रहे हैं और जातक मांगलिक है या नहीं बस इसके बाद सब कुछ तय हो जाता है 

यदि हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो अधिकतर कुंडलियों में गुण मिलान दोषों या मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है अर्थात अधिकतर दोष कैंसिल हो जाते हैं लेकिन इतना समय कौन बर्बाद करें, 

मैने अपनी ज्योतिष की प्रैक्टिस के दौरान कुंडली मिलान के ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही 25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले। अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक, मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम।

कुंडली  मिलान और भकूट दोष:

भकूट दोष दाम्पत्य जीवन की जीवनश्ौली, सामाजिकता, सुख-समृद्धि, प्रेम-व्यवहार, वंशवृद्धि आदि को प्रभावित करता है। परन्तु इसका शास्त्र सम्मत परिहार (काट) यदि वर वधू की कुंडली में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.
दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.
तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।

वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि
राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है |
अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है

भकूट दोष का प्रभाव

भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है।

द्विद्वार्दश भकूट में विवाह करने  सेे निर्धनता होता है।

नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के कारण कष्ट होता है।

षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ शारीरिक कष्ट की संभावना होती है।

भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है।
इन स्थितियों में भकूट दोष नहीं लगता है:—–
1. यदि वर-वधू दोनों के राशीश आपस में मित्र हों।
2. यदि दोनों के राशीश एक हों।
3. यदि दोनों के नवमांशेश आपस में मित्र हों।
4. यदि दोनों के नवमांशेश एक हो।
 परिहार (काट) यदि वर-वधू की कुंडली में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।

• मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।

• वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,

• जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है।

विवाह के वक्त यदि कुंडली में भकूट दोष हो तो भावी दम्पति का गुण मेलापक मान्य नहीं होता है, इसका मुख्य कारण यह है कि 36 गुणों में से भकूट के लिए 7 गुण निर्धारित हैं। 

भकूट दोष का प्रभाव

द्विर्द्वादश भकूट में विवाह करने का फल निर्धनता होता है।

 नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के कारण कष्ट होता है। 

षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ शारीरिक कष्ट की संभावना होती है। 

भकूट के आधार पर विवाह की शुभाशुभता शुद्ध भकूट और नाड़ी दोष रहित 18 से अधिक गुण हों तो विवाह शुभ मान्य होता है।

अशुद्ध भकूट (द्विर्द्वादश, नवपंचम, षड़ाष्टक) होने पर भी यदि मित्र भकूट की श्रेणी में हो तो 20 से अधिक गुण होने पर विवाह श्रेष्ठ होता है।

शत्रु षड़ाष्टक (6-8) भकूट दोष होने पर विवाह नहीं करें। दाम्पत्य जीवन में अनिष्ट की संभावना रहेगी।

मित्र षड़ाष्टक भकूट दोष में भी पति-पत्नी में कलह होती रहती है। अत: षड़ाष्टक भकूट दोष में विवाह करने से बचना चाहिए।

नाड़ी दोष के साथ यदि षड़ाष्टक भकूट दोष (चाहे मित्र षड़ाष्टक हो अथवा दोनो की राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो) भी हो तो, विवाह कदापि नहीं करें। शुद्ध भकूट से गण दोष का परिहार स्वत: हो जाता है।

भकूट दोष परिहार

वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही हों या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो गणदोष एवं दुष्ट भकूट दोष नगण्य हो जाता है।दोनों की राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो अथवा उनके राशि स्वामियों में मित्रता होने पर विवाह की अनुमति दी जा सकती है।  

वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही ग्रह हों, राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता हो, परस्पर तारा शुद्धि हो,
राशि सबलता हो, 
नवमांश पतियों में मित्रता हो तो 

यह पांच प्रकार के परिहार भी दुष्ट भकूट दोष निवारक हैं। परन्तु इनमें परस्पर नाड़ी शुद्धि होना चाहिए।

नवपंचम व द्विर्द्वादश दुष्ट भकूट होने पर वर की राशि से गणना करने पर कन्या की राशि 5वीं हो तो अशुभ किन्तु 9वीं शुभ तथा वर से कन्या की राशि गणना में 2 हो तो अशुभ परन्तु 12वीं शुभ होती है। ऎसे में भकूट दोष होने पर भी विवाह श्रेष्ठ होता है।

मेष राशि
इस राशि के जातकों को वृष, मीन राशि से द्विर्द्वादश भकूट, सिंह, धनु से नव-पंचम और कन्या, वृश्चिक राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
वृष राशि
इस राशि के जातकों को मिथुन, मेष राशि से द्विर्द्वादश, कन्या, मकर से नव-पंचम और तुला, धनु राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
मिथुन राशि
इस राशि को कर्क, वृष राशि से द्विर्द्वादश, तुला, कुंभ से नव-पंचम और वृश्चिक, मकर राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कर्क राशि
इस राशि के जातकों को सिंह, मिथुन राशि से द्विर्द्वादश, वृश्चिक, मीन से नव-पंचम और धनु, कुंभ राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
सिंह राशि
इस राशि को कन्या, कर्क राशि से द्विर्द्वादश, धनु, मेष से नव-पंचम और मकर, मीन राशि के जातकों के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कन्या राशि
इस राशि के जातकों को तुला, çंसंह राशि से द्विर्द्वादश, मकर, वृष से नव-पंचम और कुंभ, मेष राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
तुला राशि
इस राशि के जातकों को वृश्चिक, कन्या राशि से द्विर्द्वादश, कुंभ, मिथुन से नव-पंचम और मीन, वृष राशि वाले जातकों के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य होगा।
वृश्चिक राशि
इस राशि के जातकों को धनु, तुला राशि से द्विर्द्वादश, मीन, कर्क से नव-पंचम और मेष व मिथुन राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
धनु राशि
इस राशि के जातकों को मकर, वृश्चिक राशि से द्विर्द्वादश, मेष, सिंह से नव-पंचम और वृष व कर्क राशि वालों के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य रहेगा।
मकर राशि
इस राशि के जातकों को कुंभ, धनु राशि से द्विर्द्वादश, वृष, कन्या से नव-पंचम और मिथुन व सिंह राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कुम्भ राशि
ऎसे जातकों को मीन, मकर राशि से द्विर्द्वादश, मिथुन, तुला से नव-पंचम और कर्क व कन्या राशि के जातक के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य रहेगा।
मीन राशि
इन्हें मेष, कुंभ राशि से द्विर्द्वादश, कर्क, वृश्चिक से नव-पंचम और सिंह व तुला राशिं के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
उक्त वर्णित राशिगत भकूट दोष के परिहार स्वरूप यदि वर-कन्या दोनों का राशि स्वामी एक हो या दोनों के राशि स्वामियों में मैत्री भाव हो तो भकूट दोष समाप्त हो जाएगा और उनका मिलान शास्त्र सम्मत शुभ होता है।

कुंडली मिलान में एक से चार नंबर तक के दोषों का कुछ विशेष परिहार नहीं है, मुख्य रुप से गण मिलान से परिहार आरंभ होता है-
गण दोष का परिहार |

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