लेश्या (आत्मा के रंग)


लेश्या  (आत्मा-रंग) 
(1.काला, 2.नीला, 3.स्लेटी/धुमेला, 4.सुनहरा पीला, 5.कमल के रंग, 6. सफेद यानि कृष्ण, नील, कापोत, तेजस, पद्म  और शुक्ल)                                                                                                                  - समण सुत्तम् 531

1. जिसके द्वारा जीव पुण्य-पाप में अपने को लिप्त करता है, उनके अधीन करता है, उसको लेश्या कहते है।         2. जिस प्रकार आमपिष्टसे मिश्रित गेरु मिट्टी के लेप से दीवार लीपी या रंगी जाती है उसी प्रकार शुभ और  अशुभ भावरूप लेप के द्वारा जो आत्माका परिणाम लिप्त किया जाता है उसे लेश्या कहते है। 3. जो लिम्पन करती है अर्थात् जो आत्मा को कर्मों से लिप्त करती है उसको लेश्या कहते है। 4. जीव व कर्म का सम्बन्ध कराती है वह लेश्या है। अभिप्राय यह है कि मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योग ये लेश्या हैं।         - जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश 3.422 

कषायो से अनुरंजित (रंगी हुई) जीव की मन वचन काय की प्रवृत्ति को लेश्या कहते है। लेश्या के छह प्रकार है-कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म  और शुक्ल। इनमे आदि की तीन अप्रशस्त और शेष तीन प्रशस्त है।

छहों लेश्याओं के छह रंग है- काला, नीला, कापोती, लाल, पीला और सफेद। इन रंगो से प्रभावित भाव धारा शुभ और अशुभ रूप में परिणत होती है। भावधारा  शुभ और अशुभ दोनो प्रकार की होती है। इसके निर्माण मे रंगो का बहुत बडा हाथ होता  है। लाल, पीला, सफेद भाव विशुद्धि के उपाय है। विशुद्ध भाव धारा से शारीरिक और मानसिक बीमारी दूर होती है, एवम्  मूर्छा टूटती है।

शरीर के रंग को द्रव्य लेश्या और भाव धारा को भाव लेश्या कहते है। देव और नारकियों मे द्रव्य और भाव लेश्या समान होती है, पर अन्य जीवो मे इनकी समानता का कोई नियम नहीं है। द्रव्य लेश्या जीवन पर्यन्त एक ही रहती है, पर भाव लेश्या जीवों के भावधारा के अनुसार परिवर्तित होती रहती है।

छह ही द्रव्य लेश्याके जधन्य से उत्कृष्ट पर्यन्त शरीर के वर्ण की अपेक्षा संख्यात, असंख्यात व अनंत तक भेद हो जाते है। जबकि भाव लेश्याएं शुभ और अशुभ के भेद से दो प्रकार की है। वर्ण नामकर्म के उदय से उत्पन्न शरीर का जो वर्ण है उसी को द्रव्य लेश्या कहते है। भाव लेश्या कषायके उदयसे अनुरंजित योग की प्रवृत्ति रूप है, इसलिये वह औदयिकी कही जाती है। कषाय से अनुरंजित मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को लेश्या कहते है। मोहनीय कर्मके उदय, क्षयोपशम, उपशम अथवा क्षयसे उत्पन्न हुआ जीव का स्पन्द भावलेश्या है।   - जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश 3.422

रूपक 

जैन दर्शन मे लेश्या का बहुत सूक्ष्म विवेचन है। इसे स्थूल रूप से समझने के लिये एक रूपक प्रचलित है- छह व्यक्ति जो यात्री है वे जंगल के बीच मे अपना रास्ता भूल जाते हैं। वे फलो से लदे एक वृक्ष को देखते हैं और उन फलों को पाने के बारे मे सोचने लगते है; उनमें से एक पूरे पेड़ को उखाड़कर खाने का सुझाव देता है। दूसरा पेड़ के तने को काटने का सुझाव देता है; तीसरा शाखाओं को काटने का सुझाव देता है; चौथा टहनियों को काटने का सुझाव देता है; पांचवां केवल फल तोड़ने का सुझाव देता है; छठा वाला केवल गिरे हुए फलों को ही लेने का सुझाव देता है। इन छह यात्रियों मे से प्रत्येक के विचार, शब्द और शारीरिक गतिविधिया फल खाने के लिए परस्पर भिन्न हैं और क्रमशः छह लेश्याओें का उदाहरण है। इस दृष्टान्त से लेश्याओं  का स्वरूप स्पष्टता से समझ आ जाता है।                                                                                                                                            - समण सुत्तम् 537-538

 गुण स्थान और लेश्या

उक्त छाहों लेश्याओं मे  चौथे गुण स्थान तक छहों लेश्याएं होती है। पांचवे से सातवे गुण स्थान तक तीन शुभ लेश्याएं होती है तथा आठवें से तेरहवें गुण स्थान तक एक मात्र शुक्ल लेश्या होती है। कषाय व योग का अभाव हो जाने से अयोग केवली और मुक्त जीवों मे लेश्या नहीं होती।

गतियों की अपेक्षा लेश्या

गतियो की अपेक्षा नरक गति में कृष्ण, नील, कापोत ये तीन अशुभ लेश्या होती है। उसमें  भी पहले से तीसरे नरक तक कापोत लेश्या और तीसरे नरक के अन्तिम पटलों से पांचवें नरक तक नील लेश्या तथा पांचवें नरक के नीचे पटलों से सातवें नरक तक कृष्ण लेश्या ही होती है।

देवगति मे पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या होती है। उनमें भी भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिष्क देवों में एक मात्र पीत लेश्या होती है, किन्तु जब वे अपर्याप्त होते है, उस समय नियमित तीन अशुभ लेश्याएं होती है, क्योंकि भवत्रिक में उत्पन्न होनेवाले जीवों के नियमित तीन अशुभ परिणाम होते ही है। सौधर्म और ईशान स्वर्ग के देवों में पीत लेश्या, सनत कुमार महेन्द्र स्वर्ग मे पीत और पद्म लेश्या, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ठ स्वर्ग मे पद्म लेश्या, शुक्र-महाशुक्र, शतार और सहस्त्रार कल्प में पद्म और शुक्ल लेश्याएं होती है  आनत कल्प से लेकर नवमे ग्रैवेयक तक एक मात्र शुक्ल लेश्या तथा उससे ऊपर नौ अनुदिशों एवम् पंच अनुत्तर विमानों  मे परम शुक्ल लेश्या होती है।

मनुष्य गति मे छहों लेश्याएं पायी जाती है।

तिर्यन्चों में एक इन्द्रिय से असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक के सभी जीवों के नियमित तीन अशुभ लेश्याएं होती है। संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यन्चों में छहों लेश्याएं सम्भव है।

देवों और नारकियों की लेश्या आयु पर्यन्त एक ही रहती है, जबकि मनुष्यों और तिर्यन्चों की भाव लेश्या अन्तर्मुहूर्त में बदलती रहती है।

लेश्या लक्षण

कृष्ण लेश्या के व्यक्ति की मानसिक विशेषताएं है; वह हिंसक है; वह शत्रुता नहीं छोड़ता; वह झगड़ालू है, वह भलाई और करुणा से रहित है; वह दुष्ट है और प्रभावित नहीं हो सकता।                                  - समन सुत्तम् 539  

नील लेश्या वाले व्यक्ति की मानसिक विशेषताएं है; वह सुस्त है; वह बुद्धि से रहित है; वह कोई भेदभाव नहीं करता है; और वह कामुक आनंद के लिए दिया जाता है।                                                                  - समण सुत्तम् 540

कापोत लेश्या वाले व्यक्ति की मानसिक विशेषताएं है; वह अक्सर क्रोधित हो जाता है, दूसरों की निंदा करता है, दूसरों को दोष देता है, दुःख और भय के प्रति संवेदनशील होता है और क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिये इसमें भेद नहीं करता है।                                                                                            - समण सुत्तम 541

पीत लेश्या वाले व्यक्ति की मानसिक विशेषता है; वह जानता है कि क्या करना चाहिए, क्या करना है, क्या नहीं करना है; वह जानता है कि किन कार्यों से कल्याण होता है और किन कार्यों से नहीं; वह हमेशा निष्पक्ष भाव रखता है, वह हमेेशा करुण और दान के कार्यों में लगा रहता है, और वह नरम होता है।                       - समण सुत्तम 542

पद्म लेश्या वाला व्यक्ति की मानसिक विशेषताएं है; वह उदार, ईमानदार, अपनें व्यवहार में सीधा है, वह महान सहनशीलता के साथ भिक्षुओं और उपदेशकों की पूजा मे लगा हुआ है।                                    - समण सुत्तम् 543

शुक्ल लेश्या वाले व्यक्ति की मानसिक विशेषताएं है; वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता है; भविष्य के कामुक सुखों की कोई इच्छा नहीं है, सभी के साथ समान व्यवहार करता है; और वह स्नेह, धृणा और लगाव से रहित है।                                                                                                                                    - समण सुत्तम् 544   अलेश्या के लक्षण

पंच परिवर्तन रूप संसार से विनिर्गत है, अनन्त सुखी है, और आत्मोपलब्धि रूप सिद्धिपुरी को सम्प्रापत है, ऐसे अयोगिकेवली और सिद्ध जीवों को अलेश्य जानना चाहिये।                                      - जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश 3.423

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