कन्या विवाह मांगलिक दोष बाधा हरण मंत्र पाठ
कन्या विवाह बाधा हरण मंत्र पाठ
मांगलिक दोष या विवाह विलम्ब का पाठ
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
ॐ गं गणपतये नमः ll
ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नमः
“ऊं सोमेश्वराय नमः”ll
ऊं लक्ष्मी नारायणाय नमःll
ॐ उमामहेश्वराभ्याम नमः ll
हे गौरी शंकर अर्धागिंनी यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मम कुरू कल्याणी कान्त कान्ता सुदुर्लभम् ।।
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोप सुतम् देवि पतिं मे कुरुते नमः॥
इस यंत्र को भोज पत्र पर या फिर में उपलब्ध होने पर या सादे कागज में केसर की स्याही और अनार की कलम से बना लें। यंत्र को पूजा स्थान पर रखें और ऊपर दिए गए मंत्र का जाप करें, इस यंत्र की 3 दिन तक पूजा करें और फिर इस यंत्र को ताबीज में रखकर धारण करें।
इससे आपको जीवन साथी खोजने में काफी मदद मिलेगी।
ॐ कुण्डली नमः || Om Kundli Namah
इस मंत्र का जाप शुरू करने की प्रक्रिया:
- इस मंत्र को शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी अमावस्या आठवें दिन से शुरू करें और सुबह और सोने से पहले ११ माला (लगभग ११०० मंत्र) का जाप करें।
- अपने विवाह में बाधाओं को दूर करने के लिए प्रार्थना करें अरु सकारात्मक सोचे ।
- कम से कम ४१ दिनों तक या विवाह होने तक मन्त्र जप करते रहें।
“ॐ श्रीदुर्गायै सर्व-विघ्न-विनाशिन्यै
नमः स्वाहा।सर्व-मङ्गल-मङ्गल्ये,
सर्व-काम-प्रदे देवि, देहि मे वाञ्छितं नित्यं, नमस्तेशंकर-प्रिये।।दुर्गे शिवेऽभये माये, नारायणि सनातनि, जपे मे मङ्गले देहि,नमस्ते सर्व-मङ्गले।।”
क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा”
केशवी केशवाराध्या किशोरी केशवस्तुता,
रूद्र रूपा रूद्र मूर्ति: रूद्राणी रूद्र देवता।
”ॐ नमो मोहिनी महा मोहिनी अमृत वासिनी स्वाहा”
“ॐ देवेंद्राणी विवाहं भाग्यमारोग्यं देहि में “ |
गौरी आवे ,शिव जो ब्यावे.अमुक का विवाह तुरंत सिद्ध करेँ,देर ना करेँ, जो देर होए , तो शिव को त्रिशूल पड़े, गुरु गोरखनाथ की दुहाई फिरै ।।
अमुक के स्थान पर जिस लड़की का विवाह न हो रहा हो उसका नाम लिख सकते है !
विवाह की इच्छुक कन्या को मानस की निम्न पंक्तियों का पाठ करना चाहिए।
॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥
तो भगवानु सकल उर बासी | करिहि मोही रघुबीर कै दासी
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गज बदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
दोहा –
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥ २३५ ॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
छंन्द –
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
सोरठा –
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥ २३६ ॥
॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥
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