मकर संक्रांति का खगोलीय आधार
मकर संक्रांति का खगोलीय आधार
मकरादिरसराशिस्थेसूर्येकर्कादिषट्कगेस्यादुत्तरायणम् ।सूर्ये दक्षिणायनमुच्यते।l
सूर्य मकर से मिथुन तक छह राशियों में हो तो उत्तरायण और कर्क से धनु तक छह राशि में हो तो दक्षिणायन (याम्यायन) होता है।
शिशिरपूर्वमृतुत्रममुत्तरंह्ययनमाहुरहश्चतदामरम्।भवति दक्षिणमन्यदृतुत्रयं निगदिता रजनी मरुतां च सा ।।
शिशिर, बसन्त, ग्रीष्म इन तीन ऋतुओं को उत्तरायण (सौम्यायन) कहते हैं
उत्तरायण का फल
सौम्यायने नरो जातः सर्वशास्त्रविशारदः सदाऽनृतः ।
गुणवांश्च धर्मार्थकामशीलश्च
सुरूपवान् ।।
उत्तरायण में उत्पन्न मनुष्य (जातक) प्रत्येक शास्त्र का ज्ञाता, धर्म, अर्थ और
काम से युक्त, गुणी और रूपवान् होता है।
दक्षिणायन का फल
याम्यायने नरो जातः कूटसाक्षी सदाऽनृतः ।अधर्मी चाऽथ रोगी च बहुव्याधिः सदा भवेत् ।।
दक्षिणायन में उत्पन्न मनुष्य (जातक) छल करने वाला, झूठा, अधर्मी और
रोगी होता है।
भगवान सूर्य देव १४ जनवरी को रात्रि ०८:४४ मिनट
पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। अतःसंक्रांति से संबंधित
पुण्यकाल अगले दिन १५ जनवरी को सूर्योदय से
प्रारंभ...। इस संबंध में शास्त्रीय आधार निम्न है।
"यद्यस्तमयवेलायां मकरं याति भास्कर :।प्रदोषे वार्धरात्रे
वा स्नानं दानं परेहनि।।"
वृष,सिंह, वृश्चिक, कुम्भ इनकी संक्रांति को विष्णुपद।
मिथुन, कन्या, धनु,मीन इनकी संक्रांति को षडशीत्यानन।
मेष,तुला की संक्रांति को विषुव तथा कर्क व मकर को
अयन संक्रांति कहते है। इन सभी संक्रांतियों के पुण्यकाल
के नियम अलग-अलग है।
सूर्य की संक्रांति से ३३ घटी पहले व बाद में। चन्द्र संक्रांति
में २ घटी।मंगल संक्रांति में ९ घटी।बुध संक्रांति पर ६ घटी
गुरू में ८८ घटी | शुक्र की ९ घटी । तथा शनि की संक्रांति
पर १६० घटी पहले व बाद में पड़ने वाला समय शुभ
कार्यों के लिए पूर्णतः वर्जित है।
संक्रांति जब बहत् संज्ञक नक्षत्रों में हो तो वह ४५ मुहूर्ता
कहलाती है।तथा जघन्य नक्षत्रों में हो तो १५ मुहूर्ता तथा
सम नक्षत्रों में हो तो ३० मुहूर्ता कहलाती है।४५ मुहूर्ता से
धान्यादि सस्ते।१५ मुहूर्ता से तेजी तथा ३० मुहूर्ता से भाव
सम रहते है।इस बार की संक्रांति ३० मुहूर्ता है।
उत्तरायण अथवा उत्तरायन शब्द 'उत्तर' एवं 'अयण' (अयन) इन दो शब्दों से बना है। 'अयण' का अर्थ होता है चलना। सूर्य के उत्तर दिशा में अयण अर्थात् गमन को उत्तरायण कहा जाता है।
आधे वर्ष तक सूर्य, आकाश के उत्तर गोलार्ध में रहता है। उत्तरायण के छह महीनों में सूर्य, मकर से मिथुन तक भ्रमण करते हैं।
उत्तरायण काल को प्राचीन ऋषि मुनियों ने पराविद्याओं, जप, तप, सिद्धि प्राप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण माना है।
मकर संक्राति उत्तरायण काल का प्रारंभिक दिन है इसलिए इस दिन किया गया दान, पुण्य, अक्षय फलदायी होता है।
सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश के कारण इसे मकर संक्रांति कहते हैं।
इसे सौम्य आयण भी कहते हैं। जब सूर्य मकर राशि में अर्थात् 21-22 दिसम्बर से लेकर मिथुन के सूर्य तक रहता है।
छ: मास का समय उत्तरायण कहलाता है। भारतीय मास के अनुसार यह माघ मास से आषाढ़ मास तक माना जाता है।
उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है। इस समय में सूर्य देवताओं का अधिपति होता है।
शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतु उत्तरायण सूर्य का संगठन करती है।
इस अयण में नूतन गृह प्रवेश, दीक्षा ग्रहण, देवता, बाग़, कुआँ, बाबडी, तालाब आदि की प्रतिष्ठा, विवाह, चूडाकर्म और यज्ञोंपवीत आदि संस्कार करना अच्छा माना जाता है।
मकर संक्रांति कारणमकर संक्रांति प्रकृति का पर्व है। प्रकृति की उपस्थिति के बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते। मकर संक्रांति इस आशीर्वाद के लिए धन्यवाद देने का एक तरीका या पर्याय है। सूर्य जीवन, प्रकाश और वृद्धि का कारक है। यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। प्रात:काल सूर्य के आगमन से न केवल मनुष्य की बल्कि अन्य सभी जीवों की दिनचर्या प्रारंभ हो जाती है।
सूर्य का अपने उत्तरी संक्रांति (उत्तरायण) में प्रवेश
सूर्य भगवान छह महीने की यात्रा को छोड़कर उत्तरी संक्रांति (कर्क रेखा) में प्रवेश करते हैं। जैसे ही सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है, इसे देवता के दिन की शुरुआत माना जाता है। मकर संक्रांति से ही भगवान की कृपा बरसनी शुरू हो जाती है। इन छह महीनों के दौरान, भगवान विश्राम की स्थिति में रहते हैं। खगोल विज्ञान के जानकार लोगों के अनुसार यह तय हुआ कि हर साल 14/15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाएगी।
मकर संक्रांति एवं अंग्रेजी दिनांक -
मकर संक्रांति सूर्य के निरयन मकर राशि में प्रवेशकरनेपर निर्भर है, वह १४ जनवरी के दिन आती है, ऐसा बिलकुल नहीं है। सूर्य एकबार मकरराशि में प्रवेश करने के पश्चात् पुनः मकर राशि में प्रवेश के लिए ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट १०सेकंड इतना समय लगता है। इसका अर्थ यह हुआ कि हर वर्ष मकर राशि में प्रवेश करने कासमय ६ घंटे से बढ़ जाता है। ४ वर्ष में एक दिन (२४ घंटे) की बढ़ोत्तरी हो जानी चाहिए परंतुअंग्रेजी कॅलेंडर के अनुसार जिस इसवी सन् को ४ से भाग देनेपर शेष शून्य आता है, उस वर्षको लीप (प्लुत) वर्ष कहते है। लीप वर्ष में फरवरी माह में २९ दिन होते है तथा उस वर्ष केकुल ३६६ दिन होते हैं। इस २९ फरवरी के कारण संक्रांति अनेक वर्षों तक एक ही दिनांक कोआती है। जो शतक वर्ष चार से पूर्ण भाज्य है परंतु चार सौ से भाज्य नहीं है, उस वर्ष फरवरीमें २८ दिन ही होते है। इस कारण शतक वर्ष से संक्रांति एक दिन से बढ़ जाती है। परंतु ६ घंटे ९ मिनट १० सेकंड से संक्रमण समय अधिक होने के कारण यह बढ़ती हुई कालावधि इकठ्ठाहोकर एकत्रित १५७ वर्ष उपरांत संक्रांति एक दिन से आगे बढ़ जाती है। यह परिवर्तन अचानकनहीं होता है, वह क्रमशः होता है। (पहले ४ वर्ष में एक दिन, दूसरे कालांश में ३ वर्ष के उपरांतएक दिन, तीसरे कालांश में २ वर्ष के उपरांत एक दिन तथा चौथे कालांश में एक ही दिनांकवर्षों तक रहता है।)
इसवी सन् २०० में निरयन मकर संक्रांति २२ दिसंबर को होती थी। सन् १८९९ में निरयनमकर संक्रांति १३ जनवरी को होती थी। सन् १९७२ तक मकर संक्रांति १४ जनवरी को होतीथी। १९७२ से २०८५ तक निरयन मकर संक्रांति कभी १४ जनवरी, तो कभी १५ जनवरी कोहोगी। इसवी सन् २०८५ के उपरांत प्रति वर्ष संक्रांति १५ जनवरी को होगी। परंतु सन् २१०० को४०० से भाग न जाने के कारण सन् २१०० से निरयन मकर संक्रांति १६ जनवरी को होगी इसतरह से दिनों में बढ़ोत्तरी होने के कारण सन् ३२४६ में मकर संक्रांति १ फरवरी को आनेवाली है।
यदि हम भौगोलिक विज्ञान में देखें तो हम पाते हैं कि भूमध्य रेखा पृथ्वी को दक्षिणी और उत्तरी गोलार्ध में विभाजित करती है। मकर संक्रान्ति से पूर्व सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध अर्थात मकर रेखा में होता है। लेकिन, इसके बाद सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ने लगता है। जहां सूर्य का उत्तरायण में प्रवेश करना जाना जाता है।
वैदिक ज्योतिष में मकर संक्रांति का महत्व
मकर संक्रांति को तिल संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिषीय कथनों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब सूर्य शत्रु के घर अर्थात शनि की राशि में प्रवेश करता है तो सूर्य के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए शनि से संबंधित वस्तुओं का दान किया जाता है। इनमें से तिल शनि का प्रमुख कारक है।
सूर्य से शुभता प्राप्त करने के लिए आज के दिन तिल का दान किया जाता है। मकर संक्रांति पर सूर्य का राशि परिवर्तन अंधकार के प्रकाश में परिवर्तन का प्रतीक है। यही वजह है कि हर राज्य में अलग-अलग तरीके से सूर्य देव की पूजा और अर्चना की जाती है।
मकर संक्रांति का औषधीय महत्व
आज के दिन तिल और गुड़ से बनी चीजें खाई और दान की जाती हैं। आयुर्वेद के अनुसार मकर संक्रांति पर तिल खाने से गठिया रोग से बचाव होता है। यदि आज के दिन तिल और गुड़ का सेवन नहीं किया जाए तो वसंत ऋतु में खांसी हो सकती है और वर्षा ऋतु में गठिया रोग जल्दी हो सकता है। एक विशेष वर्ग जो इन वस्तुओं को वहन नहीं कर सकता, उन्हें दान के रूप में प्राप्त करें। इससे वे इन्हें खा भी पाते हैं।
मकर संक्रांति के दिन मन को ईश्वर में एकाग्र करना ही इस पर्व को आध्यात्मिक आधार प्रदान करता है। इस संकल्प से व्यक्ति ईश्वर का चिन्तन कर ईश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर जीवन में आगे बढ़ता है। परम शांति और सुख की तलाश में व्यक्ति को कई जन्मों में आश्चर्य करना पड़ता है। ऐसा संकल्प लेने के लिए मकर संक्रांति सबसे शुभ दिन है।
इस पर्व को कैराल में मकर संक्रांति, असम में माघ बिहू, हिमाचल प्रदेश में माघी साजी, जम्मू में माघी संगरंद या उत्तरायण (उत्तरायण), हरियाणा में सकरत, राजस्थान में सकरत, मध्य भारत में सुकरत, पोंगल तमिलनाडु में, गुजरात में उत्तरायण, और उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में घुघुती, बिहार में दही चुनी, ओडिशा में मकर संक्रांति, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, पश्चिम बंगाल (जिसे पौष संक्रांति या मोकोर सोनक्रांति भी कहा जाता है), उत्तर प्रदेश (जिसे खिचड़ी भी कहा जाता है) संक्रांति ), उत्तराखंड (जिसे उत्तरायणी भी कहा जाता है) या क्षेत्रों को चिह्नित करता है और संक्रांति और शिशु संक्रथ (कश्मीर) कहा जाता है।
तिल का दान मकर संक्रांति को तिल संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन तिल का दान करने से विशेष लाभ मिलता है. इससे शनि दोष दूर होता है. इसके अलावा इस दिन भगवान विष्णु, सूर्य और शनि देव की पूजा भी करनी चाहिए. मान्यता है कि जितने तिलों का दान होता है उतने ही जन्मों तक पुण्य फल प्राप्त होते हैं.
इस दिन कंबल का दान भी विशेष होता है यह समय अतंत ही सर्द समय होता है इसलिए मकर संक्रांति के दिन किसी गरीब को कंबल दान करना उत्तम होता है. इससे राहु दोष दूर होता है. गरीब, असहाय, जरूरतमंद लोगों को काले रंग का कंबल दान करना चाहिए.
गुड़ का दान गुड़ का संबंध बृहस्पति ग्रह से है. मकर संक्रांति गुरुवार के दिन पड़ रही है इसलिए इस दिन गुड़ का दान करने से कुंडली में बृहस्पति ग्रह मजबूत होगा और जीवन में सौभाग्य, सुख और समृद्धि आएगी.
खिचड़ी का दान मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने का बहुत महत्व होता है. इसलिए इसे खिचड़ी पर्व भी कहते हैं. मकर संक्रांति की खिचड़ी में चावल, उड़द की दाल और हरी सब्जियों का प्रयोग किया जाता है, इन चीजों का संबंध शनि, बुध, सूर्य और चंद्र से होता है. इस दिन खिचड़ी खाने और दान करने से इन सभी ग्रहों की कृपा प्राप्त होती है
जेठ,ससुर जी,काका ससुर वगेरह रह ससुराल के बड़ो को सीढ़ीयां चढ़वाते और उतरवाते है.,बहू द्वारा.जिसमे हर सीढ़ी पर मिठाई और नेग रखते है..।
घर की सवासणी को बारह महीने का भोजन शुरू करवाना.. राम रोटी।
बारह महीनों मे सवासणी को कपड़े और मिठाई, सूखे मेवे वगैरह देते है..जिसे खूंजो झिलाई कहते है.
सौ सैरी मे जीवनोपयोगी खाद्य सामग्री प्रति एक किलो के हिसाब से देते है..गुर..बेटियो ,बहनो..और जरूरतमंद को..सौ किलो..
तेरूंडे मे चौदह साता..मतलब चौदह गूंद गिरी के लड्डू या चौदह पाव मेवे देते है स्वेटर या शॉल के साथ बुजुर्गों, सगे संबंधियों को...
बाकी टीप लंबी हो जाएगी...टीकी,मेहंदी वगैरह मे साडी के साथ ये सामान देते है..
बारह मासिए मे हर महीने के हिसाब से..
चैत मे चूंदड़ी से लेकर माघ तक की अलग अलग वस्तुएं देते है।