ज्योतिष और संगीत का सम्बन्ध(ऐतिहासिक दर्शन)

 

ज्योतिष और संगीत का सम्बन्ध(ऐतिहासिक दर्शन)


संगीत ब्रह्म स्वरूप है, संगीत शिव स्वरूप है, संगीत अपार शक्तियों का श्रोत है, जो संगीत हम आज गाते हैं वह तो एक अंश मात्र है, और यदि अंश इतना विशाल है तो सम्पूर्ण संगीत कितना विशाल होगा, लय तथा नाद इन दोनों के अनुसंधान को संगीत कहते हैं। इसका सम्बन्ध विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, ज्योतिषशास्त्र, वास्तुशास्त्र तथा समाजशास्त्र से है कहना होगा कि ब्रह्माण्ड के आदि से अंत तक का रहस्य इस भारतीय संगीत में छिपा हुआ है।

 

प्राचीन भारत में तीन शास्त्रों को महत्वपूर्ण माना जाता था। वह तीन शास्त्र है भारतीय ज्योतिष अर्थात् (गणित), ऋग्वेद में हजारों वर्ष पूर्व के नक्षत्रों की दर्शनी का वर्णन मिलता है। भारतीय चिंतको ने गृह तारे व नक्षत्रो की स्थिति, उनके भ्रमण और उसके कारण सृष्टि पर होने वाले परिणाम परिवर्तन का सूक्ष्म अध्ययन किया तथा उनके पारस्चरिक सम्बन्ध को अत्यंत शास्त्र शुद्ध एवं सूत्रबद्ध करके अपने ग्रंथो में समाविष्ट किया। आकाश में भ्रमण करने वाले गृह अपनी गति का भ्रमण करते समय विशिष्ट प्रकार की ध्वनि का निर्माण करते है और उन ध्वनियों के मिश्रण से संगीत की निर्मिती होती है। ऐसा प्राचीन विचारकों का मत है। इसमें प्रमुखता से पायथागोरस का उल्लेख कर सकते है। उन्होंने भारत तथा अन्य देशों का भ्रमण करके निरुपित किया कि प्रत्येक गृह, उपग्रह, नक्षत्र और तारा भ्रमण करते समय ध्वनि उत्पन्न करता है तथा उन ध्वनियों के मिलने पर एक प्रकार का संगीत निर्मित होता है। यह नक्षत्र संगीत अथवा नक्षत्र नाद मनुष्य के जन्म के समय उसके मन या चित्त पर अंकित हो जाता है, वस्तुतः यह उसका जीवन संगीत ही होता है। यह सुसंवादी होने पर मनुष्य का जीवन सुखमय होता है तथा विसंवादी होने पर दुखी रहता है।

 

भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र(खगोलीय गणित) शास्त्र (आयुर्वेद) और भारतीय संगीत अर्थात् नाद योग। मानवीय काल के इतिहास को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि जबसे मनुष्य में जागृति आई तब से यह तीनों शास्त्र मनुष्य के विकास में अग्रेसर रहे है। वैदिक ज्ञान प्रणाली का आधार पंचतत्वों पर आधारित था, क्योंकि ऋक् तथा साम का आधार बताते हुए अनेक स्थानों पर पृथ्वी, आकाश, अग्नि, वायु तथा जल का उल्लेख किया गया है। इन पंच तत्वों का ज्ञान नादयोग के माध्यम से नाद योगीजन ही कर सकते थे और यह ज्ञान शिव स्वरोदय शास्त्र में इन तत्वों का सम्बन्ध ग्रहों से उसी प्रकार बताया जाता है जिस प्रकार प्राचीन संगीत साहित्य में सात स्वरों का सम्बन्ध पंचतत्वों से बताया गया है। नारदीय शिक्षा, संगीत-मकरन्द, संगीत-रत्नाकर तथा संगीत दर्पण ग्रन्थों में इस विषय में सम्बन्धित जहाँ अनेक विसंगतियाँ पाई जाती हैं वही सभी ग्रन्थकार ग्रहों से सम्बन्धित उल्लेख एक जैसा बताते हैं। । वास्तुशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र में ग्रह आधारित संगीत की उपयोगिता का मार्ग तर्कसंगत तरीके से प्रशस्त किया।

 

संगीत तथा ज्योतिष का इतिहास: प्रागैतिहासिक काल

वैदिक युग

इस युग से सम्बन्धित कोई लिखित सामग्री नही प्राप्त होती। वैदिक युग से पहले सिन्धु घाटी सभ्यता थी और इस सभ्यता के अवशेष खुदाई में भी प्राप्त हुए हैं। कुछ विद्वानों के मतानुसार यह सभ्यता वैदिक युग से पहले की है। कुछ विद्वान इसे वैदिकयुगीन सभ्यता मानते हैं। सिन्धु सभ्यता न तो आर्यों द्वारा निर्मित थी और न ही अनार्यों द्वारा। सम्भवता इस सभ्यता का निर्माण इन दोनों के द्वारा हुआ। इस सभ्यता का संबंध मैसोपोटामिया आदि सभ्यताओं से स्थापित कर इसे ईसा पूर्व अट्ठाईस सौ वर्ष पहले की मानते हैं। जो कि प्राप्त अवशेषों के आधार से ठीक प्रतीत होती है। लेकिन मेरा विनम्र निवेदन है कि वैदिक ज्ञान की प्रकाष्ठा से प्रतीत होता है कि सिन्धु तथा हड़प्पा सभ्यता कई हजार वर्ष पहले की है। कृष्ण संवत् के अनुसार यदि आज हम गणना करें तो कृष्ण संवत् चव्वन सा चल रहा है। इसका अर्थ यह है कि कृष्ण चौतीस सौ वर्ष ईसा पूर्व हुए। यदि श्री कृष्ण की कुण्डली बनाई जाए तो यह गणना ठीक निकलती है। यदि श्री रामजी की कुण्डली बनाई जाए तो वह ईसा से पूर्व पाँच हजार चौदह वर्ष की बनती है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सिन्धु अथवा हड़प्पा सभ्यता बहुत पुरातन थी। इसमें कोई सन्देह नही कि सिन्धु सभ्यता का दूसरी सभ्यताओं के साथ आदान-प्रदान ईसा पूर्व चार हजार वर्ष से हो रहा था।

 

यजुर्वेद का संबंध यज्ञ कार्यों के लिए हुआ है। शुक्ल यजु की वाजसपेयी संहिता तथा कृष्ण यजु की तैत्तिरीय संहिता अर्थात् दोनों में अग्निष्टोम, वाजसपेयी, राजसूय का अश्वमेघ आदि सोमयागों में विस्तृत वर्णन मिलता है। ज्योतिष के अनुसार यदि कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का विश्लेषण करें तो

पता चलता है कि ईडा, पिंगला, सुषुम्ना स्वर नाड़ियां शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष में भिन्न-भिन्न प्रकार से भिन्नता लिए हुए होती है। ज्योतिष शास्त्र में उनके फलाफल भी भिन्नता लिए होते हैं। शुक्ल यजु की वाजसपेयी तथा कृष्ण यजु की तैत्तिरीय संहिता दोनों में अग्निष्टोम, वाजसपेयी, राजसूय, अश्वमेघ आदि सोम महावेदि के चारों कोनों पर सत्रह दुन्दुभि स्थापित करने का प्रावधान था। इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में संगीत का संबंध वास्तु शास्त्र से था, और वास्तुशास्त्र का संबंध ज्योतिष शास्त्र से होता यह निर्विवाद है। यजमान की श्री तथा समृद्धि की द्योतक वीणा मानी जाती थी।

 

भूमि दुन्दुभि पश्चिम की ओर बनाई जाती थी। यजमान की प्रशंसा करने वाले गायक दक्षिण की ओर बैठकर गान करते थे। जोकि वास्तु ज्योतिष के सिद्धान्त का परिचायक है। और यह गान उत्तर मंदरा स्वर में करना बताया गया है जो कि मुर्छना सिद्धान्त के अनुसार आज का बिलावल राग होता है।

ज्योतिष के अनुसार इस राग का संबंध शनि ग्रह से है। क्योंकि इस मुर्छना का आरम्भ नारदीय शिक्षा में निषाद से उल्लेखित है।

 

अथर्ववेद में संगीत तथा ज्योतिष

 

चारों वेदों में अथर्ववेद का विशेष स्थान है। इसके लिए अंगिरो वेद अथर्वागिरस वेद तथा बृहम वेद आदि ग्रन्थ पाए जाते हैं। अथर्व संज्ञा उन मंत्रों के लिए है जो सुख मूलम तथा मंगलमय होते हैं। अंगिरस मंत्रों का संबंध जारण, मारण आदि कार्यों के लिए किया जाता था। विष्णु पुराण के अनुसार शान्ति तथा पौष्टिक कार्यों के लिए अथर्व मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ऋग, यजु तथा सामवेद का निर्माण परमात्मा के प्रकाश से हुआ है। मुंडक उपनिषद में परा तथा अपरा विद्याओं से संबन्धित वर्गीकरण पाया जाता है। जिसमें परा विद्याओं का सम्बंध चारों वेदों से माना गया है। विराट के अंग अथर्व में एक स्थान पर बृहद रथन्तर में सात विषयों का उल्लेख पाया जाता है। दस शाक्वत सामों से अंतरिक्ष के देवताओं की स्तुति का प्रावधान है। बृहद तथा रथन्तर साम के दो पक्ष बताए जाते हैं। सविता उदित होने पर जिस द्विविध स्तवन को प्रेरित करता है वही बृहद था रथन्तर साम हैI

व्रत के वर्णन में साम का विशेष वर्णन पाया जाता है। व्रत्य का अनुसरण विभिन्न दशाओं में विभिन्न साम करते हैं। उर्ध्वतम दिशा में उसका अनुसरण ऋग, यजु तथा साम किया करते हैं। बृहद तथा रथन्तर पूर्व दिशा में साम करते हैं। दक्षिण दिशा में यज्य यज्ञीय वामदेवीय साम उसका अनुसरण करते हैI

 

पश्चिम दिशा में वैरूप तथा वैराज उसका अनुसरण करते हैं। विभिन्न दिशाओं के साथ विभिन्न सामों का संबंध बतलाता है कि वास्तु के अनुसार सामगान हुआ करता था तथा वास्तु शास्त्र का संबंध दिशाओं के साथ होता है और दिशाओं का संबंध ग्रहों के साथ होता है और ग्रह तत्वों से संबद्ध हैं,

और इसी प्रकार विभिन्न राग विभिन्न दिशाओं से सम्बन्धित हैं। इस प्रकार का वर्णन प्राचीन काल से मान्य है। इस तरह संगीत तथा ज्योतिष का संबंध बहुत गहरा है।

अथर्ववेदः अथर्ववेद में विभिन्न ऋतुओं से साम का संबंध पाया जाता है।अर्थर्ववेद में अनिष्ट के निवारणार्थ ताबीज तथा अभिमंत्रित मणियों का प्रयोग उस काल में बताया गया है: उस समय की यह परम्परा आज भी प्रचार में है।

सामवेदः सामवेद का संगीत की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। श्रीमद्भगवद्गीता में सामवेद को ईश्वर का अंश माना गया है। गीता के अनुसार महत्वपूर्ण स्थान है। छन्दों में गायत्री परमात्मा स्वरूप है। साम गान में गायत्री को सप्त प्रकृति में आदि माना गया है। साम साहित्य में उद्गीय का संबंध उच्च स्वर में गाए जाने वाले स्वर से है। इस स्वर का संबंध 'ऊँ' शब्द से है। जो मंत्र गाए जाते हैं वही साम है ऋग्वेद की ऋचाएँ ही साम का माध्य है। सामवेद कोई अलग ग्रन्थ नहीं है। इसकी ऋचाएं ऋग्वेद की ही है। ये ऋचाएं "गेय" होने के कारण सामवेद के अंतर्गत रखी गयी है।

सामवेद के ब्राह्मण ग्रन्थ आठ है। पौढ़ ब्राह्मण षड़विश, सामविधान, आर्षेय देवताध्याय, मंत्र व उपनिषद् संहितोपनिषद तथा वंश सामवेद का प्रथम मंत्र

इस तरह है। "ऊँ अग्न आयहि बीतये”

उपनिषद् तथा शिक्षा ग्रन्थों में संगीत तथा ज्योतिष

उपनिषद भारतीय चिन्तन धारा का प्रमुख स्त्रोत है। भारतीय तत्वज्ञान तथा धर्मों सिद्धान्त का सरित् इसी स्त्रोत से प्रवाहित हो उठा है। वैदिक काल में कर्मकाण्ड के साथ ही ज्ञानकाण्ड का उन्मेष हुआ जिसका प्रतिफल 'उपनिषद्' नाम रहस्य ग्रन्थों में लक्षित हुआ। मुण्डकोपनिषद् में दो तरह की विद्याएं बताई गई है। (1) परा (2) अपरा। परा विद्या वह है जिसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शिक्षा ग्रन्थों का समावेश है। शिक्षा के षटअंगों का दर्शन इनमें होता है। सबसे पहले तैतरीय उपनिषद में इस प्रकार का वर्णन पाया जाता है। छन्दोग्य के अनुसार अग्नि से ऋक्, वायु से यजु तथा आदित्य से साम का निर्माण हुआ है। परमात्मा के निःश्वास से साम की उत्पत्ति हुई है। परम पुरूष का सिर यजु तथा दक्षिण पक्ष ऋक् और वाम पक्ष साम से सम्बद्ध माना गया है। इस विचारधारा को यदि ज्योतिष के परिपेक्ष में देखा जाये तो दक्षिण दिशा अग्नि तत्व से संबन्धित है। और बाई दिशा जल तत्व से संबन्धित है। इन दोनों के मध्य स्थान को ब्रह्म स्थान कहा गया है। यदि स्वरोदय शास्त्र विद्या अर्थात् ईडा, पिंगला, सुषुम्ना के अनुसार देखा जाए तो दाहिनी नासिका (सूर्य) अर्थात् पिंगला स्वर की अग्नि तत्व के तथा ईडा, अर्थात् बाई नासिंका के स्वर को चन्द्र अर्थात् जल तत्व से सम्बद्ध माना जाता है और इन दोनों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी मानी गई है। वेदों की गान प्रणाली त्रेयी स्वर विद्या पर आधारित थी। इसमें कोई सन्देह नहीं। इसी गान प्रणाली को मार्गी संगीत कहते थे। इस विद्या के प्त होने के कारण यह था कि इस स्वर विद्या का शोधन अत्यंत कठिन था। बाद में इसी विद्या के आधार पर सूर्यांश, चन्द्रांश, मध्यांश राग वर्गीकरण सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ। छान्दोग्य के अनुसार साम का आधार स्वर है। और स्वर का आधार है प्राण, यह ध्यान देने योग्य बात है कि किस प्राण की ओर संकेत किया गया है। मेरी दृष्टि में स्वर की मधुरता, यदि प्राण है तो ईडा, पिंगला, सुषुम्ना जो प्राण विद्या से सम्बंध है। वह उसका आधार है। यज्ञ की सम्पन्नता के लिए स्वरवान होना आवश्यक है। इस कथन में दोनों बातें आ जाती है। अर्थात् स्वर का माधुर्य तथा स्वर शोधन विद्या सामवेद से सम्बद्ध छन्दोग्य से साम विशुद्धि का विवरण प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है। सामगान करते समय किन दोषों की सम्भावना हो सकती है। वो इस प्रकार है। एक उपाख्यायिका द्वारा समझा जा सकता है कि प्रजापति के पुत्रों में किसी समय कलह होने लगा, तब देवताओं ने असुरों को परास्त करने हेतु गान विद्या का सहारा लिया। देवताओं ने स्वर उच्चारण करके नासिका वाणी तथा मन का प्रयोग किया लेकिन स्वरगान करते समय आत्मसात न कर सके। और असुरों को हरा न सके। जब उन्होंने प्राण का प्रयोग किया तभी असुरों को हरा सके। अंगीरा, बृहस्पति आयास्या द्वारा इसी तरह स्वर-साधना बताई गई है। जो दीर्घ स्वांस पर आधारित है, स्वर सिद्धि और स्वर शोधन के लिए प्राणायाम आवश्यक है। हम जिस वायु को छोड़ते हैं वह प्राण वायु है। जिसे भीतर लेते हैं। वह अपान वायु है। जो इन दोनों के मध्य की स्थिति है। उसे व्यान वायु कहते हैं।

साम के निगूढ़ तत्वों को जो जानता है वह लोक तथा परलोक दोनों तत्वों को पा लेता है। छन्दोग के रचयिता ऋषि ने जगत के सभी व्यवहारों और व्यापारों से संगीत का सामंजस्य स्थापित किया। सामगान की विभिन्न भक्तियों की तुलना विभिन्न ऋतुओं से की गई है, जैसे हिंकार बसंत के समान है, प्रस्ताव ग्रीष्म के समान है, उद्गीत वर्षा ऋतु के समान है, प्रतिहार शरद ऋतु के समान है, तथा निधन हेमन्त ऋतु के समान है, साम पंच के अतिरिक्त इस छन्दोग्य में सप्त भक्ति का उल्लेख भी पाया जाता है, तथा उपद्रव में दो भक्तियाँ इसमें अतिरिक्त पाई जाती है। सामगान करते समय किस कंठ धर्म से किस देवता को रिझाया जा सकता है। इसका निर्देश भी प्राप्त होता है। जो कि इस प्रकार है। अग्नि देवता का सामगान विनत्रि गुण से करना चाहिए। प्रजापति के लिए साम गान अनिरूक्त अर्थात् अव्यक्त स्वर वाला होना चाहिए। सोम देवता का गान व्यक्त स्वर वाला वायव्य साम मृदु स्वर वाला, इन्द्र देवता का गान ओज तथा बलवाला होना चाहिए और बृहस्पति देवता का

क्रौंच अर्थात् सारस पक्षी के स्वर के समान तथा वरूण देवता के लिए अपथ्वान अर्थात् कौए के समान बतलाया गया है। इसलिए कागवाणी का प्रयोग सामगान में मान्य नहीं है। यह छन्दोग्य का आदेश है। सामगान की यह प्रणाली कंठ धर्मिता पर आधारित है। जो कि विभिन्न तत्वों से संबद्ध है। और विभिन्न देवताओं को प्रसन्न करने का प्रावधान है। विभिन्न ग्रहों का विभिन्न तत्वों से तथा देवताओं से गहरा संबंध है। इस नाते यह गान प्रक्रिया ज्योतिष से संबंन्धित जान पड़ती है और साथ ही ईडा,

पिंगला विद्या से सम्बन्धित भी है।

वराहोपनिषद

वराहोपनिषद के अनुसार योगी के लिए नादानुसंधान परमावश्यक है। नाद,

परबह्म में विलीन होने का परम साधन होने के कारण मंत्र तथा हठ योग में

श्रेष्ठ माना गया है।

 

 

 

शिक्षा ग्रन्थों में संगीत तथा ज्योतिष

शिक्षा ग्रन्थों में वेद के छः अंगों का समावेश किया गया है। वे निम्नानुसार है:- वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम तथा सन्तान। शिक्षा ग्रन्थों में मांडुका, पाणिनी तथा नारदीय शिक्षा ग्रन्थ प्रमुख है। पाणिनी का शिक्षा ग्रन्थ व्याकरण ग्रन्थ है। तथा नारदीय शिक्षा ग्रन्थ संगीत ग्रन्थ है। संगीत में व्याकरण तथा स्वर दोनों का बड़ा महत्व है। स्वर की सिद्धता तथा शब्द की शुद्धता दोनों परम आवश्यक है। नारदीय शिक्षा में तीन ग्राम बताए गए है। और इनमें से गन्धार ग्राम लुप्त बतलाया गया है। तीनों ग्रामों की इक्कीस मुर्छनाओं का सम्बंध इस तरह बताया गया है, सात मूर्छनाओं का सम्बन्ध देवताओं से और सात का पितरों से और शेष सात मुर्छनाओं का संबंध ऋषियों से बताया गया है। शिक्षाकार का कहना है कि मध्यम ग्राम की मुर्छनाओं का प्रयोग यक्षों के द्वारा होता है। षड्ज की मुर्छनाओं का प्रयोग ऋषियों तथा लौकिक गायकों द्वारा होता है और गन्धार ग्राम की मुर्छनाओं का प्रयोग गन्धर्वो द्वारा होता है। नारदीय शिक्षा की चौथी खंडिका में सप्त स्वरों के वरण जाति इत्यादि का वर्णन पाया जाता है। इस प्रकार विवरण संगीत के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। षड्ज स्वर का वर्ण पद्म पत्र के समान है और ऋषभ का शुक की भांति पिंजर वर्ण है, गन्धार का वर्ण कनक तथा मध्यम स्वर कुन्द के समान, पंचम का कृष्ण वर्ण है और धैवत का पीत तथा निषाद का सर्व वर्ण मिश्रित है। इसी क्रम में सात स्वरों की जातियों का उल्लेख इसी प्रकार है जैसे-षड्ज, मध्यम, पंचम की जाति ब्राह्मण है। ऋषभ तथा धैवत की क्षत्रिय तथा गन्धार, निषाद की जाति अर्ध वैश्य तथा अर्धशूद्र मानी गई है। ज्योतिष के अनुसार तुलनात्मक दृष्टि से यदि देखें तो हम पाते हैं कि इस प्रकार का वर्गीकरण ज्योतिष में ग्रहों तथा बारह राशियों का हुआ है। शिक्षाकार ने सात स्वरों का संबंध सात ग्रहों से भी बताया है। शिक्षा कीपरिभाषा देते हुए इस तरह कहा गया है। "शिक्षते उपदिश्यते यत्र साक्ष शिक्षा" अर्थात् जिस माध्यम से उपदेश दिया जाता है, वही शिक्षा है।

 

रामायण काल में संगीत तथा ज्योतिष

रामायण के रचयिता वाल्मीकि थे और इसकी रचना कब हुई, इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है। जो भी हो आदि कवि की यह रचना भारतीय सभ्यता का दर्पण है। मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर यह ग्रन्थ प्रकाश डालता है। बोध पूर्वकाल से लेकर ईसा पूर्व तक के समय का अध्ययन करने से ग्रन्थ की रचना का समय विद्वानों ने निर्धारित किया है। इस ग्रन्थ की रचना अनुष्टुक छन्द में की गई है। जो कि गेय है। इस काल में साम तथा गन्धर्व दोनों तरह की गान विद्याएं प्रचार में थी। राम स्वयं गन्धर्व विद्या के ज्ञाता थे। बालकांड में वाल्मीकि के गुरू के रूप में देवर्षि नारद का उल्लेख है। लेकिन उनके संगीतज्ञ होने का कोई संकेत नहीं मिलता। जबकि उन्ही के शिष्य वाल्मीकि

उच्च कोटि के संगीतज्ञ थे और उन्ही वाल्मीकि के शिष्य लव तथा कुश थे जो कि मार्गीय संगीत के विद्वान थे, तो यह मानना असम्भव है कि देवर्षि नारद संगीतज्ञ न थे। प्रमाणाभाव में हम कह सकते हैं कि रामायण में उनके संगीतज्ञ होने का कोई उल्लेख नहीं मिलता। रावण स्वयं सामगान के माध्यम से शिव की आराधना करता था। उस काल में संगीत के माध्यम से पशुओं को वश में किया जाता था, गन्धर्व विद्या के अन्तर्गत मार्गविधान उस समय पाया जाता था। बाल कांड में उल्लेख आया है कि लव तथा कुश ने श्री रामचन्द्र के कहे जाने पर मार्गशैली से गन्धर्व का गान किया था ।

इससे यह स्पष्ट होता है कि गान्धर्व विद्या दो प्रकार की थी, एक लौकिक तथा दूसरी अलौकिक। मेरे विचार में जो अलौकिक गान विद्या थी वह ईडा, पिंगला, सुषुम्ना विद्या पर आधारित थी। नाड़ी विद्या के अंतर्गत पंच तत्वों का शोधन कर जब नाद लक्षणों का ध्यान कर गाया जाता है तो इसे मार्ग संगीत कहना चाहिए। यदि आज भी इन सिद्धान्तों का शोधन कर गान किया जाए तो अनेक मानसिक समस्याएँ दूर की जा सकती है। रामायण में गन्धर्व का अर्थ दो प्रकार से पाया जाता है। एक गन्धर्व जाति के सम्मोहन अर्थ तथा दूसरा संगीत विद्या के अर्थ में। विद्या के अर्थ में निष्कर्ष यह है कि इस काल में मार्ग संगीत था लेकिन इसके जानने वालेmबहुत कम थे और लोक गान विद्या प्रचार में थी। मार्ग संगीत को ना जाननेmवालों ने इसे शास्त्रीय संगीत के अन्तर्गत रख दिया और वह अमूल्य विद्या लुप्त हो गई।

 

महाभारत में संगीत तथा ज्योतिष

 

एतिहासिक दृष्टि से यह काल बड़ा महत्वपूर्ण है। देशी संगीत का इसमहाकाव्य में वर्णन मिलता है। देशी संगीत की धारा वैदिक युग से निरन्तर बहती आई है। महाभारत काल में साम तथा गन्धर्व विद्या दोनों का बहुत प्रचार था। यह काल वैदिक परम्परा का उत्कर्षकाल था । वैदिक गान संबंधी शिक्षा ग्रन्थों का पालन किया जाता था। महाभारत काल में षड्ज आदि सप्त स्वर शब्दों का विस्तार पाया जाता है। जो कि स्वयं आकाश कागुण है। संगीत में स्वरों का आकाश तत्व से संबंध कहने से स्पष्ट है कि संगीत तथा तत्वों का आपसी संबंध उस काल में भी था। जैसा कि स्पष्ट है कि तत्वों का संबंध ग्रहों से होता है। इस तत्व ज्ञान को पहचानने का माध्यम ईडा, पिंगला, सुषुम्ना स्वर विद्या हो सकती है। इस प्रकार उस समय का संगीत ज्योतिष पर आधारित था यह स्पष्ट है। पाणिनी कालीन संगीत तथा ज्योतिष महर्षि पाणिनी का समय ईसा से सात शताब्दी पूर्व माना जाता है। उस समय का यह अमूल्य ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में न केवल व्याकरण बल्कि धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थिति का दर्शन होता है। इस अष्टाध्यायी में संगीत संबन्धित कुछ सामग्री मिलती है। इस ग्रन्थ में संगीत की प्रगति के दर्शन तो होते ही हैं लेकिन ज्योतिष आधारित संगीत के दर्शन नहीं होते। ज्योतिष से सम्बन्धित संगीत या तो ग्रह आधारित होता है या वास्तु आधारित और या ईडा, पिंगला, सुषुम्ना सुर विद्या पर आधारित होता है। इस दृष्टि से इस ग्रन्थ में कुछ भी सामग्री नही मिलती।

 

बुद्ध तथा जैन कालीन संगीत तथा ज्योतिष

 

बुद्ध काल में तक्षशिला विद्या का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ पर अनेक विशयों के अनेक विभाग थे। शब्द विद्या, अध्यात्म विद्या, चिकित्सा विद्या हेतु विद्या और शिल्प इत्यादि विद्याएँ पढ़ाई जाती थी। वाराणसी नालंदा जैसे स्थानों पर संगीत विभाग थे। संगीत के लिए गान्धर्व वेद संज्ञा थी। वैदिक गान प्रणाली का भी प्रचार-प्रसार था। लेकिन जिन वैदिक नियमों का निर्देश वैदिक युग में बताया गया था उन वैदिक नियमों का उल्लेख इस काल खण्ड में नही प्राप्त होता। निष्कर्ष यह है कि बौध काल में वैदिक तथा गान्धर्व विद्या प्रचार-प्रसार में थी लेकिन इस काल में भी ज्योतिष से संबन्धित संगीत विद्या का कोई संकेत नहीं मिलता। जैन ग्रन्थों में इस काल का निर्धारण ईसा पूर्व चार शताब्दी से लेकर ईसा तक का समय बताया जाता है। इस काल खंड में देशी संगीत का विकास भली-भांति होता रहा है और बुद्ध काल की भांति संगीत को राजाश्रय प्राप्त होता रहा। वैदिक गान वैदिक नियमों का निर्देश वैदिक युग में था जैसे वैदिक गान के समय दिशाओं का नियमन, शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष का नियम, तत्वों का ध्यान कर वैदिक गान करना इत्यादि । तथापि इस काल में रोग निवारण हेतु संगीत का प्रयोग किया जाता था। बृहत्कल्प भाष्य में कान्ह वासुदेव के चतुर्विद्य पहरी का उल्लेख है। एक कामुदिका का, दो संगानिया, तीन तुप्रिया इत्यादि इन भेरियों को आलौकिक गुणों से युक्त माना जाता था। असीवोक श्रेणी के बजाने से रोग निवारण होता था। इन भेरियों का निर्माण प्रायः चन्दन की लकड़ी से किया जाता था। सन्नाहिनी भेरी श्री कृष्ण की बताई जाती है इस भेरी का प्रयोग युद्ध के समय किया जाता था। शंख का उपयोग पर्यटक संत महात्माओं के द्वारा किया जाता था। ध्वनयात्मक दृष्टि से यदि हम विश्लेषण करे तो विविध ध्वनियों का प्रयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जाता था और प्रत्येक ध्वनि का एक अपना ही अर्थ था।

 

स्मृति ग्रन्थों में ज्योतिष तथा संगीत

वैदिक युग के पश्चात् रामायण तथा महाभारत काल आता है। तत्पश्चात् स्मृति ग्रन्थों का समय माना गया है। इन स्मृति ग्रन्थों का संगीत की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। इन ग्रन्थों का स्रोत वेद माने जाते है। इन ग्रन्थों में मनु स्मृति तथा याज्ञवल्कय स्मृति ग्रन्थ प्रमुख है। वेदाध्ययन करने वालों के लिए इन ग्रन्थों में संगीत का व्यावसायिक प्रयोग मना किया गया है। संगीत व्यावसायिक वर्ग को उस काल में हेय दृष्टि से देखा जाता था। याज्ञवल्कय स्मृति में नाद उपासना की विलक्षण बताई गई है। यह उपासना साम गीत तथा वीणा नाद के माध्यम से सम्भाव्य है। ऐसी मान्यता उस काल में थी। इसी को अंत्तोगत्वा शब्द ब्रह्म कहा गया है।" महर्षि याज्ञवल्कय के अनुसार सामगान के अतिरिक्त ऋक् गाथा आदि चार प्राचीन गीत तथा अपरान्तक उलोपय गीत नादानुसंधान के साधन हैं। गान्धर्व का अनुसंधान करने वाला व्यक्ति स्वतः ही परम पद को प्राप्त कर सकता है। ऐसी मान्यता उस काल में थी। तत्कालिक नाद उपासना का यह महत्व इस ओर संकेत करता है कि यह लौकिक संगीत से भिन्न नादानुसंधान प्रणाली थी, और वे ही अनाहद नाद की उपासना थी और यह उपासना शिव स्वरोदय शास्त्र के माध्यम से ही सम्भव है। जिसमें पंच तत्वों का अनुसंधान करके परम पद को पाया जा सकता है। ऐसा योगी भविष्य वक्ता तो होता ही है। अव्यक्त नाद की साधना हेतु यदि व्यक्त नाद का साधन बनाया जाए तो सफलता शीघ्र मिलती है ऐसी मेरी मान्यता है।

 

पौराण तथा तन्त्र ग्रन्थों में संगीत तथा ज्योतिष

 

पुराण शब्द पुरावृत का द्योतक है, तथा प्राचीन इतिहास का संकेत करता है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पौराण का विशेष महत्व है। मत्स्यपुराण, विष्णु पुराण, तथा ब्रह्मपुराण के अनुसार पौराण के पांच लक्षण होते हैं। सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मनवन्तर तथा वंशानुचरित हरिवंश पुराण, वायु पुराण तथा मार्कण्डेय पुराण में ये तीन पुराण ईस्वी एक से दस के बीच के हैं। हरिवंश पुराण में श्री कृष्ण को संगीतज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जबकि महाभारत में श्री कृष्ण को प्रकाण्ड पंडित तथा दार्शनिक दिखाया गया है यह ग्रन्थ कृष्ण परम्परा के अन्तर्गत लिखा गया है। तथा इसका संकलन ईस्वी 2 तक हो चुका था। कृष्ण संवत् के अनुसार देखा जाए तो उनका जन्म ईसा से 3400 वर्षपहले हुआ था। कृष्ण जहाँ दार्शनिक थे वही योगीराज भी थे वे शिव स्वर विद्या के ज्ञाता थे और जो ईडा, पिंगला स्वर विद्या को जानता है वही संगीतज्ञ तथा योगी पुरूष होगा। उसका व्यक्तित्व आकर्षक होगा और वह

भविष्य वक्ता भी होगा। स्वर विद्या की उपासना विधि का उल्लेख श्री ने गीता के पाँचवें अध्याय में बतलाया है। धैमतक्रिया देवगन्धार नामक छालक्य का गान श्रुति मनोहक रूप से कर रहे थे। गन्धार ग्राम पर गाया जाने वाला यह आसरित गीत गंगा अवतरण पर आधारित था। तथा इसका लय ताल युक्त गान असुरों के लिए सन्तोषजनक सिद्ध हुआ था। गन्धार ग्राम पर आधारित गान प्रणाली का उल्लेख कहीं और नहीं प्राप्त होता नारदीय शिक्षा में गन्धार ग्राम को लुप्त बताया गया है। तो फिर इस गन्धार ग्राम का क्या रहस्य था ? यह विचारणीय प्रश्न है। कहीं इस रहस्यमयी ग्राम का आधार ईडा, पिंगला स्वर विद्या तो नही थी? सम्भवतः लव और कुश का मार्ग। संगीत गन्धार ग्राम पर आधारित होते हुए शिव स्वर विद्या पर आधारित रहा हो, ऐसी सम्भावना प्रतीत होती है। शिव स्वयं संगीत तथा स्वर विद्या के प्रवर्तक थे और साथ ही तन्त्र विद्या के अधिष्ठाता भी शिव है।

 

वायु पुराण में संगीत तथा ज्योतिष

 

वायु पुराण प्राचीनतम है। जो संस्करण इसका उपलब्ध है वह अधिकाधिक ईस्वी पाँच तक का माना जा सकता है। इस पुराण में संगीत का विवरण पौराणिक प्रणाली से तो हुआ ही है साथ ही पंच तथ्यों पर भी आधारित है। संगीत संबंधी तथ्य पूर्व आचार्यों की तरह ही बताए गए हैं। इस पुराण के अनुसार प्रजापति आदिम सृष्टि में ऋक्, यजु, साम, सोम, यज्ञ तथा विविध छन्दों का निर्माण समाविष्ट है। इस सृष्टि की प्रक्रिया में देव, असुरों, सर्पों तथा गन्धर्वों का निर्माण बताया गया है। प्रजापति के प्रथम मुख से गायत्र, अग्निष्टोम, रथन्तर आदि साम छन्द तथा पंचदश का निर्माण हुआ है। दक्षिण मुख से बृहत्साम का सृजन हुआ है और अपने पश्चिममुख से छन्द अतिरात्र वैरूप्य आदि अन्य सामों की रचना है। दिशाओं से संबंधित साम गान सामग्री से प्रतीत होता है। कि उस समय सामगान का संबंध वास्तुशास्त्र से था। और वास्तुशास्त्र ज्योतिष आधारित होता है। इस तरह संगीत तथा ज्योतिष का आपसी संबंध उस काल में दिखाई पड़ता है। वायु पुराण के अनुसार गन्धर्व शब्द की उत्पत्ति "ध्यन्तो गाः” इस प्रकार है। धा धातु दानार्थक है और इसका गान करते समय गायन करने के कारण यह जाति गन्धर्व कहलाई। ऐसी इस पुराण की मान्यता है। इस पुराण के अनुसार गन्धर्व का स्थान आयुर्वेद तथा धनुर्वेद के समान है।

 

शिव स्वयं संगीत प्रिय हैं तथा उनकी आराधना में वैदिक तथा लौकिक गतियों का प्रयोग किया जाता है। शिव का कहना है कि रथन्तर साम का गान उनकी प्रशंसा के लिए किया जाना चाहिए। उन्हीं को उद्देश्यकर सामगायक हो हो हा हा ही ही सूचक शब्दों से अलाप करते हुए गान करते हैं। एक शिव स्वयं स्वर विद्या के प्रर्वतक हैं और जो स्वर विद्या का पालन कर उन्हें संगीत की भेंट देता है वह व्यक्ति परम पद को पा लेता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। आगे चलकर इसी पुराण में संगीत के स्वरों का संबंध विभिन्न कल्पों के साथ बताया गया है। इस पुराण में तीनों ग्रामों में मूर्छनाओं के विवरण इस तरह पाये जाते हैं मध्यम ग्राम की प्रथम मूर्छना सोविरी देश से उत्पन्न बताई गई है और उसके  देवता ब्रह्म है हरिणास्या मूर्छना हरी देश से उत्पन्न बताई गई और उसके देवता इन्द्र है। ‘क्लोपनता' मूर्छना का उद्भव मरूत मंडल से है। उसके देवता मारूत हैं। शूद्ध मध्यमा' मूर्छना की उत्पत्ति मरूभूमि से है और इसके देवता गन्धर्व हैं।  मार्गी मूर्छना का संबंध मृगों से बताया है। और मृगेन्द्र इसके देवता है। षड्जग्राम के अंतर्गत रजनी मूर्छना का संबंध रजस देवता से है। उतरमंदरा मूर्छना' का संबंध पितृगण से है। शुद्ध षड्ज मूर्छना अग्नि की आराधना कामाध्यम है। मूर्छना का संबंध यक्ष देवता से है और अभिरूद्गता मूर्छना का संबंध नागदेवता से है। उतमा (उतरा) का संबंध पक्षीराज गरूड़ से है और अश्वकांता मूर्छना का संबंध अन्निदेव से है। विशुद्ध गांधारी मूर्छना का देवता गन्धर्व हैं। और उत्तरगांधारी मूर्छना का संबंध वसुगण से बताया गया है। वायु पुराण का यह संगीत विषयक विवरण यद्यपि सप्त ग्रहों पर आधारित नहीं है। तथापि ज्योतिष आधारित प्रणाली पर आश्रित दिखाई पड़ा है। सामगान का दिशाओं से संबंध वास्तु विषयक है जो कि पंच तत्वों पर आधारित है। तो मूर्छनाओं का अग्नि, वायु इत्यादि तत्वों से संबंध ज्योतिष  आधारित है। यहां तक की मूर्छनाओं के देवता आदि का वर्णन सप्तग्रहों के देवताओं की तरह माना गया है। इस प्रकार संगीत विषयक यह विवरण प्रत्यक्ष रूप से ज्योतिष आधारित ना होते हुए भी ज्योतिष आधारित है।

 

मार्कण्डेय पुराण में संगीत तथा ज्योतिष

 

मार्कण्डेय पुराण में संगीत विषयक सामग्री जो प्राप्त होती है। यह प्राचीन सामगान तथा गन्धर्व प्रणाली ही है।  मार्कण्डेय पुराण के अनुसार प्रजापति के प्रथम मुख से त्रिवत साम, रथन्तर, साम तथा अग्निष्टोम का सृजन हुआ है। उनके दक्षिण मुख से बृहत्साम तथा पंचदशी स्तोमों का निर्माण हुआ है। तथा पश्चिम मुख से बाकी बचे सामों का निर्माण हुआ। पुराण के अनुसार सृष्टि का संबंध त्रिगुणात्मक है। ऋग्वेद का संबंध रजोगुण से है। यजुर्वेद का संबंध सत्वगुण से तथा सामवेद का संबंध तमोगुण से है, और अथर्ववेद का संबंध सत्व तथा तमोगुण से बताया गया है। परमेष्ठी के पश्चिम मुख से साम तथा छंदों का तथा अभिचारमंत्रों से अथर्व वर्ण का आविर्भाव परमेष्ठी के उतर मुख से होने के संबंध में मान्यता इसमें पाई जाती है। परमेष्ठी के तेज स्वरूप त्रिविध है। शांतिक के लिए पौष्टिक तथा अभिचारिक के लिए इन्ही का विस्तार क्रमशः ऋक्, यजु तथा साम का संबंध प्रायः पूर्वाहन मध्यमान तथा अपराहं से है। लक्ष्मी की अष्ट निधियों में मुकन्द नाम निधि निर्दिष्ट है। जिसमें वीणा, वेणु, मृदंग आदिवाद्यों का संगीत सम्मलित है। इसी विधि के कारण गायक तथा नृतक को द्रव्य लाभ होता है। वीणा का अंतरभाव मंगलवाद्य में माना गया है जिस घर में वीणा वादन होता है। उस घर में यक्षादि क्षुद्र जातियों का प्रवेश नहीं होता। मार्कण्डेय पुराण में जो संगीत संबंधी सामग्री प्राप्त होती है। उसका आधार यदि देखा जाए जो निष्कर्ष रूप में ज्योतिष आधारित है। फिर चाहे व वास्तु आधारित ज्योतिष हो चाहे या पंच तत्व पर आधारित हो। यह ज्योतिष विद्या किसी-न-किसी ग्रह से संबन्धित है। जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे संगीत तथा ज्योतिषवेता संगीत से दूर होते गये। और ज्योतिष आचार्य संगीत से दूर होते चले गये। संगीत का केवल मनोरंजन पक्ष बढ़ता गया और उसका तत्व तथा ज्योतिष संबन्धित ज्ञान क्षीण होता चला गया क्योंकि यह ज्ञान कठिन था और इसमें द्रव्य लाभ भी न के समान था।

 

तंत्र तथा शिव के आगम साहित्य में संगीत धारा

 

भारतीय इतिहास में धर्म की विविध धाराएं समय-समय पर प्रवाहित होती रही है। और इन सब धाराओं का संगीत पर प्रभाव भी पड़ा है। इसी क्रम में तंत्र तथा आगम साहित्य का प्रभाव भी संगीत पर पड़े बिना न रह सका संगीत की वैदिक धारा के लिए निगम संज्ञा थी तथा दूसरी धारा के लिए आगमसंज्ञा थी। प्रथम का आधार महार्षियों के चिंतन पर आधारित वेद, उपनिषद, ग्रंथ माने जाते हैं और दूसरे की आधारशिला लौकिक मान्यता पर आधारित शिव सूत्र, शक्ति सूत्र तथा तांत्रिक पुराण आदि ग्रंथ थे। सिन्धु सभ्यता में भी इसके स्पष्ट प्रमाण प्राप्त होते हैं। यह परम्परा न्यूनाधिक रूप से प्राचीनकाल से अब तक चली आ रही है। तान्त्रिक सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि का निर्माण शिव तथा शक्ति का परिणाम है। इन दोनों का संयोग ही नाद का कारण बताया गया है। शंकराचार्य के शब्दों में

“सदाशिवोत्तकानी सपादलज्ञलयावधानानि वसन्त लोके नादानुसन्धान

समाधिमेक  मन्यामहे मान्यतम लयानाम्। योगतारावली 7 (पेज-231)

 

योग तथा आगम ग्रन्थों में नाद तथा लय दोनों का महत्व हैं योगशास्त्र में लय का वही स्थान है। जो हठ योग, मंत्र योग तथा राजयोग का है। शैवमत के अनुसार नाद की तीन अवस्थाएँ होती है।  

1. नाद 2. अनाहत नाद तथा 3. आहत नाद-नद तथा महानाद की उत्पत्ति शक्ति से बताई गई है।

इस नाद से बिन्दुनाद का आर्विभाव होता है। जो अनाहत नाद के रूप में सारे गगनमंडल में व्याप्त हैं इस आहत रूप को गद्य, पदय तथा समस्त वांगमय में देखा जा सकता है। नादानुसंधान लय सिद्धि के लिए उपयुक्त माना गया है। वीणा तथा वंशी लय नाद के परम उत्पादक माने जाते है। लय का अर्थ है। धेय वस्तु से सम्पूर्ण एकाग्रता जो नाद के माध्यम से सहजसाध्य मानी जाती है। पाणिनी के शास्त्र में शम्भु मत का उल्लेख हुआ है। जो शैव मत का सूचक है। नाट्यशास्त्र में भी शिवमत का उल्लेख पाया जाता है। मलंग की कृति बृहदेशी जो सातवीं शताब्दी में लिखी गई, उसमें भी शिवमत का प्रभाव पाया जाता है। मतंग के अनुसार गन्धर्व विद्या की उत्पत्ति स्वयं महादेव से हुई है। पदम पुराण, शिवपुराण तथा स्कन्दपुराण में शिव आगम का प्रमाण प्राप्त होता है शिव आराधना भारतीय सभ्यता में प्राचीन काल से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि सभी विद्याओं के प्रवर्तक शिव है। स्वर आराधना से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। और लौकिक संगीत के माध्यम से जनमनोरंजन किया जा सकता है और द्रव्य लाभ भी होता है। मार्गी संगीत का रहस्य शिव स्वरोदय ज्ञान में छिपा है। इस विद्या के माध्यम से योगीजन अपने मूलाधार इत्यादि चक्रों को जागृत कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसी को मार्गी संगीत समझना चाहिए। पुराणकाल में गन्धर्वो को देवयोनि के अंतर्गत माना गया है। यही गन्धर्व जब संगीत के माध्यम से ईश्वर उपासना करते थे तो ही वे देवत्व प्राप्त करते थे। ऐसी मान्यता उस काल में थी।

 

संगीत बोधः

 

भारतीय संगीत का महत्वपूर्ण ग्रन्थ नाट्यशास्त्र हैं इस ग्रन्थ को नाट्य तथा संगीत का कोष कहना उचित होगा। तत्कालीन गायन विधि, वादन तथा नाट्य सम्बन्धित विवरण इस ग्रन्थ में पाया जाता है। सबसे पहले श्रुति दर्शन इसी ग्रन्थ में मिलता है। भरत के मत के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में अन्य विद्वानों के मतों का भी उल्लेख मिलता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार भरत से पूर्व सदाशिव तथा ब्रह्ममत प्रचार में थे। और इन सभी मतों का संग्रह इस नाट्यशास्त्र में हुआ। इस ग्रन्थ का रचनाकाल ईसवी 2, 3 से लेकर ईसवी 519 तक का माना गया है। महत्व की दृष्टि से इसे पाचवाँ वेद तक कहा गया है। ज्योतिष की दृष्टि से यदि इस ग्रन्थ की सामग्री का विश्लेषण करें तो इस ग्रन्थ में ज्योतिष संबंधी सामग्री कुछ भी प्राप्त नही होती। जो कुछ उपलब्ध हैं वह देसी संगीत के प्रमाण है। इस ग्रन्थ की यह कृति खंडित कृति है। संम्भवतः जो अध्याय उपलब्ध नही है। उनमें ज्योतिष से सम्बन्धित सामग्री रही हो। क्योंकि शिव तथा ब्रह्म मत क्रमशः तंत्र मत तथा मुक्ति मार्ग से सम्बन्धित थे। नारदीय शिक्षा के वैदिक स्वरों का जो तुलनात्मक विवरण पाया जाता है। वह नाट्यशास्त्र में प्राप्त नही होता जबकि नाट्यशास्त्र के बाद के ग्रन्थों में ज्योतिष से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त होती है। मतंग का बृहदेशी तथा नारद का संगीत मकरंद दो ऐसे ग्रन्थ है। जिनकी रचना सातवीं तथा नौवी शताब्दी के बीच में हुई है। संगीत की ज्योतिष विषयक सामग्री ईसवी 7 से पुनः प्राप्त होती है। इस अवधि के प्रमुख ग्रन्थ है। बृहदेशी, संगीत मकरंद, संगीत रत्नाकर, संगीत पारिजात इत्यादि । राग रागिनी पद्धति का आधार वैदिक गान प्रणाली ही है। रागों का दिशाओं के साथ संबंध तथा ऋतुओं के साथ संबंध इसी बात का द्योतक है। यह प्रणाली प्रकृति पर आधारित है।

 

बृहदेशीः

 

बृहदेशी ग्रन्थ प्राचीन है। यह संगीत ग्रन्थ ई. सन् 825 और ई. 87520 ई. के मध्य लिखा गया। यह ग्रन्थ नाट्य से पृथक है। यह तत्कालीन देसी संगीत पर आधारित है। उपलब्ध ग्रन्थ के अध्यायों की संख्या नही दी गई है। केवल अंतिम अध्याय में लिखा है कि यह छठा अध्याय है। लेकिन प्रकरणों के अनुसार इसे 10 भागों में विभाजित कर सकते हैं। विद्वानों का मत है कि इस ग्रन्थ में वाद्य अध्याय भी था। क्योंकि मतंग स्वयं एक अच्छे वीणावादक थे। और इन्होंने सर्वप्रथम वीणा पर सारिकाएं स्थापित की। स्वरों में वर्ण, कुल और देवता इस ग्रन्थ में बताए गए हैं।

 

संगीत रत्नाकर:

 

इस ग्रन्थ की रचना  दसवीं अथवा ग्यारहवीं शताब्दी होने के प्रमाण मिलते है। इस ग्रन्थ के रचयिता पंडित शारंगदेव हैं। उत्तर तथा दक्षिण पद्धतियों के विद्वान इस ग्रन्थ को संगीत का आधार ग्रन्थ मानते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि जिस ग्रन्थ के पिण्डोत्पत्ति अध्याय को अनुपयोगी मानकर छोड़ दिया गया। मेरे विचार से यह पंडित शारंगदेव के साथ सरासर अन्याय है। यदि कोई विषय किसी की समझ से बाहर है तो उसे अनुपयोगी कहना ठीक नहीं। यदि पिण्डोत्पत्ति प्रकरण को समझ लिया जाए तो संगीत चिकित्सा के रहस्य को समझा जा सकता है। शरीर के साथ श्वसन क्रिया का संबंध है। और श्वसन क्रिया के विज्ञान को समझने के लिए स्वरविद्या अर्थात् स्वरोदय विद्या का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। यह विद्या ईडा, पिंगला, सुषुम्ना पर आधारित है और इसी आधार पर सूर्याश, चन्द्रांश, मध्यांश राग वर्गीकरण सिद्धान्त बना ऐसी मेरी मान्यता है। स्वरोदय शास्त्र में सूर्य स्वर पिंगला अर्थात् दाहिनी नासिका वाला सांस का प्रवाह और चन्द्रस्वर अर्थात् बाँई नासिका वाला सांस का प्रवाह तथा नासिका के दोनों छिद्रों से बराबर सांस का प्रवाह सुषुम्ना के नाम से जाना जाता है।यथापिंडे तथा ब्रह्माण्डे के अनुसार यदि हम विचार करें तो इस शरीर रूपी पिंड के माध्यम से हम ब्राह्मण्ड को जान सकते हैं। और यह जानकारी स्वरोदय शास्त्र से प्राप्त हो सकती है। इसी स्वरोदय शास्त्र के माध्यम से वात्, पित्, कफ जनित अनेक बीमारियों की चिकित्सा संगीत के माध्यम से की जा सकती है। इस दृष्टि से पंडित शारंगदेव का यह अध्याय अनुपयोगी न होकर अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा प्राचीन काल में इसी प्रकार के अज्ञानवश संगीत चिकित्सा विधि का हास होता रहा है।

 

राग रागिनी पद्धति तथा ज्योतिष

 

राग रागिनी पद्धति मध्य युग में पुष्पित और प्रफुल्लित हुई इस पद्धति के चार मत प्रचार में थे। 1. शिवमत 2. हनुमान मत 3. कल्लीनाथ मत तथा 4. भरतमत इन चारों मत के राग रागनियों में न्यूनाधिक अंतर होते हुए भी सिद्धान्त दृष्टि से ये एक थी। मुख्य राग तथा उसकी रागनियाँ और पुत्र तथा पुत्रवधुएँ इस तरह का वर्गीकरण सभी मतों में मान्य था। इन चारों मतों के मुख्य रागों का संबंध ऋतुओं के साथ होता है और यह ऋतुगान प्रणाली वैदिक युग से चली आ रही है। इस भांति सामवेद की विभिन्न ऋतुओं के अनुसार गायी जाती थी। जैसे रथन्तर साम का वर्षा ऋतु से शाक्वत और वैरूप्य साम का संबंध हेमन्त ऋतु से इत्यादि । इस प्रकार राग रागिनी पद्धति की जड़ें वैदिक युग से जुड़ी हुई है। जिस तरह हम ऋतु विशेष में हम विशेष भोजन करते हैं। इसी तरह हमारी गान प्रणाली भी थी। अर्थात् ऋतु विशेष के अनुसार खाना, गाना तथा वस्त्र पहनना था। राग रागिनी पद्धति मध्य युग की उपज है। यद्यपि इसका आधार वैदिक परम्परा से लिया गया है। तथापि मध्ययुगीन श्रृंगार परम्परा का प्रभाव इस पर पड़े बिना न रह सका स्त्री तथा पुरुष राग की परिकल्पना कोई बात न थी फिर भी उस प्राचीन परम्परा को अलंकारिक ढ़ंग से सजाया गया और राग रागिनी पद्धति का जन्म हुआ इस पद्धति का आधार ऋतुओं के माध्यम से पंचतत्वों से संबंन्धित था। इस पद्धति का आधार रागों की वंशावली न था। यह तो उस युग का प्रभाव था क्योंकि वह युग रीतिकाल के नाम से जाना जाता है। इसी मध्ययुग में पंडित अहोबल ने संगीत पारिजात नामक ग्रंथ लिखा। इस पारिजात ग्रन्थ में 22 श्रुतियों का संबंध ईडा, पिंगला, सुषुम्ना से बताया जो कि इसी युग की देन है। इसके अतिरिक्त इसी युग में सूर्याश, चन्द्रांश तथा मध्यांश राग वर्गीकरण का उल्लेख पाया जाता है। जो कि इसी बात का द्योतक है, कि उस काल में पंचतत्वों का शोधन किया जाता था। इस सिद्धान्त के अनुसार रागों को गाया जाता था। इस तरह स्पष्ट है कि ऋतुओं का संबंध तत्वों से होता है, और तत्वों का विभिन्न दिशाओं से और विभिन्न दिशाओं का संबंध विभिन्न ग्रहों से होता है। निष्कर्ष यह है कि राग रागिनी पद्धति वैदिक परम्परा पर आधारित थी, ऋतु विज्ञान पर आधारित थी, वास्तुशास्त्र पर आधारित थी तथा स्वरोदय विज्ञान अर्थात् ईडा, पिंगला, सुषुम्ना पर आधारित थी। इस प्रणाली को अवैज्ञानिक, इसके वंश परम्परा के आधार से किया गया जबकि वंश परम्परा राग रागिनी प्रणाली का आधार था ही नहीं। यह तो केवल उस युग का प्रभाव था जिसके कारण राग रागिनी पद्धति का परिवार बनाया गया और परिवार के माध्यम से इस

पद्धति की रोचकता बनाई गई।

 

आधुनिक काल में संगीत तथा ज्योतिष

 

आधुनिक काल का आरम्भ यदि 300 वर्ष पूर्व से माना जाए तो इस युग का आरम्भ सन् 170021 ई. से मानना उचित होगा। राजनीतिक दृष्टि से यह युग उथल पुथल वाला था। हम अंग्रेजों के गुलाम होते जा रहे थे और अंग्रेज हमारी सभ्यता को हेय दृष्टि से देखते थे और उसका प्रभाव हमारे संगीत पर भी पड़ा हमारा संगीत, हमारी संस्कृति का विकास अवरूद्ध हो गया। अवरूद्ध ही नही बल्कि पतन होने लगा। संगीत को जिससे आश्रय मिलता था। वे सब उपभोगतावादी संस्कृति के शिकार हो गए। ज्योतिष की दृष्टि से यदि इस युग में संगीत का कोई विकास देखें तो यह नगन्य था। आजादी के बाद जो अब संगीत पर शोध कार्य किए जा रहे हैं। वह ज्योतिष से संबन्धित नही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ध्वनि चिकित्सा पर शोध अवश्य हो रहा है। ध्वनित चिकित्सा के शोध कार्य के साथ यदि भारतीय दर्शन का भी समावेश कर लिया जाए तो परिणाम अच्छे होंगे और सफलताएँ भी अधिक होगी।

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