सर्वकार्य सिद्धि हेतू मुहूर्त मार्तण्ड प्रकाश

 सर्वकार्य सिद्धि हेतू मुहूर्त मार्तण्ड प्रकाश :


*#होरा_मुहूर्त_शास्त्र*
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*भारत वर्ष में शुभ कार्य करने से पहले मुहूर्त साधने की परंपरा आदि काल से ही चली आ रही है आज भी उत्तर भारत में चौघड़िया, मिथिला एवं बंगाल में यामार्ध तथा दक्षिण भारत में राहुकाल को देखकर ही शुभ कार्य करने की प्रथा है।*

*भारतीय ज्योतिष में होरा चक्र का बहुत महत्व है।* *ज्योतिष ग्रंथों में वर्णन निम्न  श्लोक द्वारा लिखित भी है।*

*"अर्थार्जने सहाय:पुरुषाणामापदर्णवे पोत:,*
*यात्रा समये मन्त्री जातकमहापाय नास्त्यपर:" ॥*
                     *..................सारावली*

*अर्थात* 
*मनुष्यों को धन अर्जित करने मे यह (होरा शास्त्र) सहायता करता है, (शुभ दशा में लाभ,और अशुभ दशा मे हानि),विपत्ति रूपी समुद्र में नौका या जहाज का कार्य करता है,एवं यात्रा के समय में मंत्री अर्थात उत्तम सलाहकार होरा शास्त्र को छोड कर अन्य कोई नहीं हो सकता है.*

*"यस्य ग्रहस्य वारे यत्किंचित्कर्म प्रकीर्तित:।*
*तत्तस्य काल होरायां सर्वमेव विधीयते।।"*

*महर्षियों ने कहा है कि जो काम जिस वार में करना विहित है, उसे उसके काल होरा में करें।*
*कार्य जिस नक्षत्र में विहित है, वह उस नक्षत्र के स्वामी के मुहूर्त में करें।*

*अहोरात्र शब्द से ’अ’ और ’त्र’ हटाने के बाद होरा शब्द बनता है. सारावली*
*कर्मफललाभहेतुं चतुरा: संवर्णयन्त्यन्ये,*
*होरेति शास्त्रसंज्ञा लगनस्य तथार्धराशेश्च ॥*
*- सारावली*

*विद्वान लोग होरा शास्त्र को शुभ और अशुभ कर्म फल की प्राप्ति के लिये उपयोग करते हैं।* 
*लग्न और राशि के आधे भाग (15 अंश) की होरा संज्ञा होती है*

*सारांश*  
*सूर्य की होरा राजसेवा के लिये उत्तम है।* 
*चन्द्रमा की होरा सर्व कार्य सिद्ध करने के लिये शुभ है।* *मंगल की होरा युद्ध, कलह, विवाद, लडाई झगडे के लिये,*
*बुध की होरा ज्ञानार्जन के लिये शुभ है।*
*गुरु की होरा विवाह के लिये,* 
*शुक्र की होरा विदेशवास के लिये,*
*शनि की होरा धन और द्रव्य इकट्ठा करने के लिये शुभ है।*

*#होरा_मुहूर्त एवं राहुकाल विचार*
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*होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार होरा मुहूर्त अचूक माने गए हैं।* 
*इन मुहूर्तों में किया जाने वाला हर कार्य सिद्ध होता है।*

*सात ग्रहों के सात होरा- हैं, जो दिन रात के 24 घंटों में घूमकर मनुष्य को कार्य सिद्धि के लिए अशुभ समय में भी शुभ अवसर प्रदान करते हैं।*

*सात ग्रहों के*               *सात होरा*

*राज सेवा के लिए*       *सूर्य का होरा*
*यात्रा के लिए।*           *शुक्र का होरा*
*ज्ञानार्जन के लिए।*     *बुध का होरा*
*सभी कार्यों की* 
*सिद्धि के लिए।*          *चंद्र का होरा*
*द्रव्य संग्रह के लिए।*    *शनि का होरा*
*विवाह के लिए।*         *गुरु का होरा*
*युद्ध, कलह और* 
*विवाद में विजय* 
*के लिए।*                  *मंगल का होरा*

*प्रत्येक होरा एक घंटे का होता है। जिस दिन जो वार होता है, उस वार के सूर्योदय के समय 1 घंटे तक उसी वार का होरा रहता है।*

*उसके बाद एक घंटे का दूसरा होरा उस वार से छठे वार का होता है। इसी प्रकार दूसरे होरे के वार से छठे वार का होरा तीसरे घंटे तक रहता है। इस क्रम से 24 घंटे में 24 होरा बीतने पर अगले वार के सूर्योदय के समय उसी (अगले) वार का होरा आ जाता है।।*

*यहां चित्र प्रत्येक वार के 24 घंटों का होरा चक्र दिया गया है।*

*उदाहरण के लिए मान लें आज गुरुवार है और आज ही आपको कहीं जाना है। ऊपर बताया गया है कि शुक्र का होरा यात्रा के लिए श्रेष्ठ होता है। अतः मालूम करना है कि आज गुरुवार को शुक्र का होरा किस-किस समय रहेगा। चक्र में गुरुवार के सामने वाले खाने में देखें तो पाएंगे कि चैथे और ग्यारहवें घंटे में शुक्र का होरा है।*

#बिना_सारणी_के_होरा ज्ञात कैसे करे?
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*किसी भी वार का प्रथम होरा उसी वार से प्रारंभ होता है। उस वार से विपरीत क्रम से वारों को एक-एक के अंतर से गिनें। जैसे बुधवार को प्रथम होरा बुध का, तत्पश्चात विपरीत क्रम से मंगल को छोड़कर चंद्र का होरा एवं रवि को छोड़कर शनि का होरा होगा। इसी क्रम से आगे शेष 21 होरा उस दिन व्यतीत होंगे।*

*होरा शास्त्र कार्य सिद्धि का अचूक शास्त्रीय माध्यम है। किसी भी व्यक्ति को विशेष कार्य की शुरुआत करनी हो तो वो उसे विशेष मुहूर्त मे ही काम करना चाहता है.*
*ज्योतिष शास्त्र मे होरा चक्र का निर्माण किया गया है जिसे आप स्वयं देख कर किसी भी कार्य की शुरुआत कर सकते है जिससे आप का कार्य सफल हो जायेकभी कभी बहुत ज़रूरी होने पर हम पंडितजी के पास नही जा पाते या कोई अन्य काम पड़ जाता हैं जिससे हम समय पर काम करने का सही व उचित समय नही जान पाते, इन सभी परेशानियो को ध्यान में रखकर ज्योतिषशास्त्र में होरा चक्र का निर्माण किया गया,जिससे आप किसी भी दिन स्वयं होरा देखकर कोई भी काम कर सकते हैं।*

*ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक होरा (दिन-रात)में  24 होराएँ होती हैं जिन्हें हम 24 घंटो के रूप में जानते हैं जिसके आधार पर हर एक घंटे की एक होरा होती हैं जो किसी ना किसी ग्रह की मानी जाती हैं।*

*प्रत्येक वार की प्रथम होरा उस ग्रह की होती हैं जिसका वो वार होता हैं जैसे यदि रविवार हैं तो पहली होरा सूर्य की ही होगी।*

*होराओ का क्रम👉 प्रत्येक ग्रह की पृथ्वी से जो दुरी हैं उस हिसाब से ही होरा चक्र बनाया गया हैं आईये देखते हैं की होरा कैसे देखी जातीं हैं। मान लेते हैं की हमें रविवार के दिन किसी भी ग्रह की होरा देखनी हो तो हम उसे इस प्रकार से देखेंगे।*

*पहली होरा -सूर्य ग्रह की होगी*
*दूसरी होरा -शुक्र ग्रह की होगी*
*तीसरी होरा -बुध ग्रह की होगी*
*चौथी होरा-चंद्र ग्रह की होगी*
*पांचवी होरा -शनि ग्रह की होगी*
*छठी होरा -गुरु ग्रह की होगी*
*सातवी होरा -मंगल ग्रह की होगी*
*आठवी होरा फ़िर से सूर्य की ही होगी* 
*तथा*
*यह क्रमश: ऐसे ही चलता रहेगा.*
*इस प्रकार जो भी वार हो उसी वार की होरा से आगे की होरा निकाली जा सकती हैं तथा अपने महत्वपूर्ण कार्य किए जा सकते हैं.*
*विभिन्न ग्रहों की होरा में कुछ निश्चित कार्य किए जाए तो सफलता निश्चित ही प्राप्त होती हैं ।*

*सूर्य की होरा - 👉 सरकारी नौकरी ज्वाइन करना,चार्ज लेना और देना,अधिकारी से मिलना, टेंडर भरना व मानिक रत्न धारण करना।*

*चंद्र की होरा 👉  यह होरा सभी कार्यो हेतु शुभ मानी जाती हैं।*

*मंगल की होरा👉  पुलिस व न्यायालयों से सम्बंधित कार्य व नौकरी ज्वाइन करना, जुआ सट्टा लगाना,क़र्ज़ देना, सभा समितियो में भाग लेना,मूंगा एवं लहसुनिया रत्न धारण करना।*

*बुध की होरा👉  नया व्यापार शुरू करना,लेखन व प्रकाशन कार्य करना,प्रार्थना पत्र देना,विद्या शुरू करना,कोष संग्रह करना,पन्ना रत्न धारण करना।*

*गुरु की होरा👉  बड़े अधिकारियो से मिलना,शिक्षा विभाग में जाना व शिक्षक से मिलना,विवाह सम्बन्धी कार्य करना,पुखराज रत्न धारण करना।*

*शुक्र की होरा👉 नए वस्त्र पहनना,आभूषण खरीदना व धारण करना,फिल्मो से सम्बंधित कार्य करना ,मॉडलिंग करना,यात्रा करना,हीरा व ओपल रत्न पहनना।*

*शनि की होरा👉  मकान की नींव खोदना व खुदवाना, कारखाना शुरू करना,वाहन व भूमि खरीदना,नीलम व गोमेद रत्न धारण करना।*
*इस प्रकार ग्रह की होरा में कार्य सफलता हेतु किए जा सकते हैं  इस प्रकार विभिन्न ग्रह की होरा में विभिन्न कार्य सफलता हेतु किए जा सकते हैं।*

हिन्दू धर्म में शुभ मुहूर्त में कार्य करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल विवाह ही क्यों, यहां तो किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पहले एक मुहूर्त निकाला जाता है, ताकि वह कार्य सफल हो सके। बच्चों की शादी से लेकर बहू के गृह प्रवेश तक, घर में आए नन्हें मेहमान के गृह प्रवेश से लेकर उसके नामकरण पर शुभ मुहूर्त…. नामकरण, मुंडन तथा विद्यारंभ जैसे संस्कारों के लिए तथा दुकान खोलने, सामान खरीदने-बेचने और ऋण तथा भूमि के लेन-देन और नये-पुराने मकान में प्रवेश के साथ यात्रा विचार और अन्य अनेक शुभ कार्यों के लिए शुभ नक्षत्रों के साथ-साथ कुछ तिथियों तथा वारों का संयोग उनकी शुभता सुनिश्चित करता है। जब किसी समय विशेष में जन्म लेने के कारण उस व्यक्ति विशेष का प्रारब्ध निश्चित हो जाता है और उसकी स्वतन्त्रता के क्षेत्र प्रतिबन्धित होते हैं, तो मुहूर्त चयन की उपयोगिता के विषय में प्रश्न खड़ा होता है। किसी भी कार्य विशेष को प्रारम्भ करने के लिए सही समय का चुनाव किस सीमा तक किसी जातक के नियन्त्रण में है, यह विवाद का विषय है। मुहूर्त की उपयोगिता उस अर्थ में भी होती है, जिसके द्वारा जातक स्वयं को समष्टि के अनुकूल बनाता है। नैसर्गिक बल के विरूद्ध जाने की अपेक्षा यह अधिक अच्छा होता है कि तब किसी कार्य की शुरूआत की जाए जब आलौकिक शक्ति भी अनुकूल हो। मुहूर्त का अध्ययन इन अनुकूल क्षणों की जांच करने अथवा खोज करने में सहायता करता है। किस कार्य के लिए इस संयोग का स्वरूप क्या और कैसा हो? दिन, सप्ताह, पक्ष,मास, अयन, ऋतु, वर्ष एवं उत्सव तिथि का परिज्ञान के लिए ज्योतिष शास्त्र को केन्द्र में रखा गया है। मानव समाज को इसका ज्ञान आवश्यक है। धार्मिक उत्सव,सामाजिक त्योहार,महापुरुषों के जन्म दिन, अपनी प्राचीन गौरव गाथा का इतिहास, प्रभृति, किसी भी बात का ठीक-ठीक पता लगा लेने में समर्थ है यह शास्त्र। इसका ज्ञान हमारी परंपरा, हमारे जीवन व व्यवहार में समाहित है। शिक्षित और सभ्य समाज की तो बात ही क्या, अनपढ़ और भारतीय कृषक भी व्यवहारोपयोगी ज्योतिष ज्ञान से परिपूर्ण हैं। वह भलीभांति जानते हैं कि किस नक्षत्र में वर्षा अच्छी होती है, अत: बीज कब बोना चाहिए जिससे फसल अच्छी हो। यदि कृषक ज्योतिष शास्त्र के तत्वों को न जानता तो उसका अधिकांश फल निष्फल जाता। और आजकल तो कोई भी वस्तु खरीदने के लिए भी शुभ मुहूर्त निकाला जाता है।

इसके अलावा कुछ विशेष दिनों के आधार पर भी शुभ-अशुभ मुहूर्त बताए जाते हैं। जैसे कि शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णमासी के पूर्वार्द्ध और चतुर्थी एवं एकादशी के उत्तरार्द्ध में तथा कृष्ण पक्ष की तीज एवं दशमी के उत्तरार्द्ध और सप्तमी एवं चतुर्दशी के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है। तिथि के उत्तरार्द्ध में होने वाली भद्रा यदि दिन में हो तो शुभ होती है। इसी प्रकार पूर्वार्द्ध में होने वाली भद्रा रात्रि में हो तो शुभ होती है।

नक्षत्र ही भारतीय ज्योतिष का वह आधार है जो हमारे दैनिक जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को प्रभावित करता है। अतः हमें कोई भी कार्य करते हुए उससे संबंधित शुभ नक्षत्रों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए जिससे हम सभी कष्ट एवं विघ्न बाधाओं से दूर रहकर नयी ऊर्जा को सफल उद्देश्य के लिए लगा सकें। विभिन्न कार्यों के लिए शुभ नक्षत्रों को जानना आवश्यक है।हमारे जीवन में जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत मुहूर्तों का महत्व माना गया है। भारतीय संस्कृति में भी पंचांग, मुहूर्त, शुभ समय का बहुत महत्व है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन सभी कार्यों में मुहूर्त का संबंध निरंतर चलता ही रहता है।इन मुहूर्तों को देखकर किसी भी नए कार्य का शुभारंभ करना हमेशा ही शुभता लिए तथा सफलता प्रदान करने वाला होता है। इसीलिए हमें प्रतिदिन अशुभ काल में शुभ कार्य शुरू नहीं करना चाहिए, बल्कि शुभ काल में ही अपने कार्यों को करना चाहिए। जीवन में मुहूर्त के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता है. किसी व्यक्ति की सफलता, असफलता और जीवन स्तर में परिवर्तन के संदर्भ में मुहूर्त की महत्ता को अलग नहीं किया जा सकता है.

जैसे- राहु काल में कोई शुभ कार्य, यात्रा तथा कोई व्यापार संबंधी तथा धन का लेन-देन न करें।

भारतीय मुहूर्त विज्ञान व ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक कार्य के लिए शुभ मुहूर्तों का शोधन कर उसे करने की अनुमति देता है। कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। इस धर्म धुरी भारतीय भूमि में प्रत्येक कार्य को सुसंस्कृत समय में किया जाता है। अर्थात्‌ ऐसा समय जो उस कार्य की पूर्णता के लिए उपयुक्त हो।

इस प्रकार प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है। जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शान्ति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। इस प्रकार होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि एक होलाष्टक दोष माना जाता है। जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं।

विशेष रूप से इस समय विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरंभ नहीं करना चाहिए। ऐसा ज्योतिष शास्त्र का कथन है। अर्थात्‌ इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है तथा विवाह आदि संबंध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है।मुहूर्तों का महत्व और सफलता और असफलता वैज्ञानिकी के कुछ  कुछ तथ्य:

कौन-सा 'समय' सर्वश्रेष्ठ होता है

किसी भी कार्य का प्रारंभ करने के लिए शुभ लग्न और मुहूर्त को देखा जाता है। जानिए वह कौन-सा वार, तिथि, माह, वर्ष लग्न, मुहूर्त आदि शुभ है जिसमें मंगल कार्यों की शुरुआत की जाती है।

मुहूर्त संबंधित ग्रंथ : मुहूर्त संबंधित कई ग्रंथ हैं जो वेद, स्मृति आदि धर्मग्रंथों पर आधारित है। ये ग्रंथ है- मुहूर्त मार्तण्ड, मुहूर्त गणपति, मुहूर्त चिंतामणि, मुहूर्त पारिजात, धर्म सिंधु, निर्णय सिंधु, मुहूर्त प्रकरण आदि।

श्रेष्ठ दिन : दिन और रात में दिन श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ मुहूर्त : दिन-रात के 30 मुहूर्तों में ब्रह्म मुहूर्त ही श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ वार : सात वारों में रवि, मंगल और गुरु श्रेष्ठ है।

चौघड़िया : शुभ चौघड़िया श्रेष्ठ है जिसका स्वामी गुरु है। अमृत का चंद्रमा और लाभ का बुध है।

श्रेष्ठ पक्ष : कृष्ण और शुक्ल पक्षों के दो मास में शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ एकादशी : प्रत्येक वर्ष चौबीस और अधिकमास हो तो 26 एकादशियां होती हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में एकादशियों को श्रेष्ठ माना है। उनमें भी इसमें कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ माह : मासों में चैत्र, वैशाख, कार्तिक, ज्येष्ठ, श्रावण, अश्विनी, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन श्रेष्ठ माने गए हैं उनमें भी चैत्र और कार्तिक सर्वश्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ पंचमी : प्रत्येक माह में पंचमी आती है उसमें माघ माह के शुक्ल पक्ष की बसंत पंचमी श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ अयन : दक्षिणायन और उत्तरायण मिलाकर एक वर्ष माना गया है। इसमें उत्तरायण श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ संक्रांति : सूर्य की 12 संक्रांतियों में मकर संक्रांति ही श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ ऋ‍तु : छह ऋतुओं में वसंत और शरद ऋतु ही श्रेष्ठ है।

श्रेष्ठ नक्षत्र : नक्षत्र 27 होते हैं उनमें कार्तिक मास में पड़ने वाला पुष्य नक्षत्र श्रेष्ठ है। इसके अलावा अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रावण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, रेवती नक्षत्र शुभ माने गए हैं।

भारतीय संस्कृति में पंचांग, मुहूर्त का बहुत महत्व है। जो हमें किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले बहुत सारी सावधानियां बरतने की सलाह भी देता है।

मुहूर्त के अंतर्गत कुछ विशेष प्रकार की सावधानियों का जिक्र किया गया है। जो निम्नानुसार है।

- रिक्ता तिथियों यानी चतुर्थी, नवमी एवं चतुदर्शी के दिन रोजगार संबंधी कोई भी नया काम नहीं शुरू करना चाहिए।

- शुभ एवं मांगलिक कार्य अमावस्या तिथि में शुरू नहीं करना चाहिए।

- रविवार, मंगलवार एवं शनिवार के दिन समझौता एवं संधि नहीं करनी चाहिए। दिन, तिथि व नक्षत्र का योग जिस दिन 13 आए उस दिन उत्सव का आयोजन नहीं करना चाहिए।

- नन्दा तिथियों एवं प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी तिथि के दिन नवीन योजना पर कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।

- देवशयन काल में बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं दिलाना चाहिए।

- बुधवार के दिन उधार देना व मंगलवार को उधर लेना मुहूर्त की दृष्टि से शुभ नहीं माना गया है।

- नए वाहन खरीदते समय ध्यान रखना चाहिए कि आपकी राशि से चंद्रमा घात राशि पर मौजूद नहीं हो।

- कोई ग्रह जब उदय या अस्त हो तो उसके तीन दिन पहले और बाद में नया काम नहीं करना चाहिए।

- जन्म राशि और जन्म नक्षत्र का स्वामी जब अस्त, वक्री अथवा शत्रु ग्रहों के बीच हों तब आय एवं जीवन से जु़ड़े विषय को विस्तार नहीं देना चाहिए।

- मुहूर्त में क्षय तिथि का भी त्याग करना चाहिए।

- असफलता से बचने के लिए जन्म राशि से चौथी, आठवीं और बारहवीं राशि पर जब चंद्र हो उस समय नया काम शुरू नहीं करना चाहिए।

शुभ मुहूर्त में करें शुभ कार्य

ज्योतिषियों के अनुसार सुखी और खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है कि हर काम की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करें और अशुभ को त्यागें। सुखी और खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है कि हर काम की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करें और अशुभ को त्यागें।

* अभिजीत मुहूर्त- सभी कार्य अभिजीत में किए जा सकते हैं। लेकिन शुक्रवार को नहीं करें।

चौघड़िया  विचार:

नक्षत्र शुद्धि करने के उपरांत शुद्ध तिथियों के दिन चौघड़िया विचार किया जाता है। एक चौघड़िया  का समय चार घटी होता है अर्थात डेढ़ घंटे का समय होता है। इस शुभ चौघड़िया  के दौरान यात्रा करना शुभ फलदायक एवं यात्रा सुखद होती है। कुल आठ चौघड़िया में से चार चौघड़िया  शुभ होती हैं जिनके नाम हैं- शुभ , अमृत, चर, लाभ.

राहुकाल का वास विचार:

दिशा शूल के समान राहु काल के वास का विचार किया जाता है। विशेष वार को विशेष दिशा में राहु काल का वास माना जाता है। यह निम्न प्रकार है: जिस दिशा में राहुकाल का वास होता है, उस दिशा में यात्रा करना अशुभ माना जाता है अर्थात यात्रा के समय राहुकाल सम्मुख नहीं होना चाहिए।

शुभ। होरा विचार:

शुभ चौघड़िया के उपरांत शुभ ग्रह की होरा का विचार भी किया जाता है। जैसा कि हम जानते हैं, शुभ ग्रह चार होते हैं- चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र। इन ग्रहों की होरा में यात्रा करना श्रेष्ठ माना जाता है।

योगिनी वास का विचार:

यात्रा करते समय योगिनी का वास किस दिशा में है, उसका ज्ञान होना भी आवश्यक है। यात्रा के समय योगिनी का सम्मुख या दाहिने होना अशुभ माना जाता है। योगिनीवास का विचार तिथि एवं दिशा के अनुसार निर्धारित किया जाता है।

अभिजीत मुहूर्त :

ज्योतिषशास्त्र के अंतर्गत आनेवाले मुहूर्तों में से एक मुहूर्त अभिजित मुहूर्त के नाम से जाना जाता है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिन का आठवां मुहूर्त अभिजित मुहूर्त कहलाता है. सामान्यतः इस मुहूर्त का मान मध्यममान से 48 मिनट होता है, लेकिन मुख्य रूप से यह उस दिन के दिनमान या सुर्योदयास्तकाल पर निर्भर करता है. इस मुहूर्त में सभी प्रकार के कार्य आरम्भ किए जा सकते हैं, क्योंकि मान्यतानुसार इस मुहूर्त में आरम्भ किए गए कार्यों में किसी भी प्रकार की विघ्न-बाधाएं नहीं आती है और वह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हो जाता है. ज्योतिषों के अनुसार यदि अभिजित मुहूर्त में पूजन कर कोई भी शुभ मनोकामना की जाए तो निश्चित रूप से पूरी होती है. शास्त्रकारों के मतानुसार अभिजित मुहूर्त बड़े से बड़े दोषों को नष्ट करने में सक्षम है, इसलिए जब किसी मंगल कार्य के लिए शुभ लग्न न मिले तो उस कार्य को इसी मुहूर्त में संपन्न कर लेना चाहिए. प्रत्येक दिन का मध्य-भाग (अनुमानत 12 बजे) अभिजित मुहूर्त कहलाता है जो मध्य से पहले और बाद में 2 घड़ी अर्थात्‌ 48 मिनट का होता है। दिनमान के आधे समय को स्थानीय सूर्योदय के समय में जोड़ दें तो मध्य काल स्पष्ट हो जाता है। जिसमें 24 मिनट घटाने और 24 मिनट जोड़ने पर अभिजित्‌ का प्रारंभ काल और समाप्ति काल निकट आता है। इस अभिजित्‌ काल में लगभग सभी दोषों के निवारण करने की अद्भुत शक्ति है। जब मुंडन आदि शुभ कार्यों के लिए शुभ लगन न मिल रहा हो तो अभिजित्‌ मुहूर्त काल में शुभ कार्य किए जा सकते हैं। बताते हैं कि वर्ष के 365 दिन में 11.45 से 12.45 तक का समय अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। इस मुहूर्त में अगर कोई भी कार्य किया जाए तो उसमें विजय प्राप्त होती है।कहते है इसमें आप कुछ भी करें तो वह सर्वफलदायी होता है, सर्वाथसिद्धिदायक होता है। इस मुहूर्त या फिर तिथि में किया गया काम शुभ फलों को देता है। अतिशुभ फलों के इन्हीं आगमन के लिए हिंदू कैलेंडर में कुछ तिथियां हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा काल गणना के आधार पर निर्धारित की गई है। अभिजीत मुहूर्त यानी एक ऐसा मुहूर्त जिसमें अगर काम शुरु किया गया तो विजय होनी तय है, सफलता की गारंटी पक्की होती है। वैशाख महीने की गणना सबसे सर्वोत्तम महीनों में की जाती है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें पड़ने वाली अक्षय तृतीय के कारण अमर हो जाती है। भारतीय काल गणना के मुताबिक चार स्वयंसिद्ध अभिजित मुहूर्त माने गए है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा), आखातीज यानी अक्षय तृतीया, दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।

शीघ्र फलदायी :

साधनाओं के लिए शास्त्रों में विशेष मुहूर्तों के उल्लेख हुए हैं। इन विशिष्ट मुहूर्तां को ध्यान में रख कर यदि साधना की जाती है, तो सफलता शीघ्र ही और अवश्य मिलती है। शुभ मुहूर्तों में सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है गुरु पुष्य। यदि गुरुवार को पुष्य नक्षत्र हो, तो इससे पूर्ण सिद्धिदायक योग बनता है। आचार्य वराह मिहिर ने साधना में सफलता प्राप्त करने के लिए 12 मासों में कुछ ऐसे दिनों और समय का उल्लेख किया है, जो अद्वितीय सफलता प्रदान करते हैं। इस मुहूर्त को विजय काल भी कहा जाता है। चैत्र, वैशाख, श्रावण, भाद्रपद.

शिवजी मुहूर्त के देवाधिदेव महादेव हैं :

१. यामल ग्रंथ और बृहददैवतरंजन आदि ग्रंथों के अनुसार: किसी विशिष्ट अत्यंत शुभ एवं सुप्रसिद्ध तीर्थोंमें यदि कोई परंपरा चली आ रही है, तो मुहूर्तों के कारण परंपरा को रोका नहीं जाता है उदाहरण के नाते: अक्षय्य तृतीया के दिन देशभरमें सामूहिक यज्ञोपवीत उपनयन संस्कार की परंपरा है. मुहूर्त के कारण यह परंपरा रूकती नहीं है!

२. कोई भी यात्रा को मुहूर्त का हवाला देकर रोकना यह धार्मिक परंपरा की अवहेलना है! मुहूर्त के कारण परंपरा को रोका नहीं जाता.

३. देवाधिदेव महादेव मुहूर्त के देवता है और उन की पूजा यात्रा के लिए सर्व मुहूर्त नतमस्तक होकर शुभ हो जाते हैं! फिर शिवजी की प्रिय पौर्णिमा अशुभ हो ही नहीं सकती, भद्रा भी अभद्र नहीं रहते तथा शिवजी के माथे पर विराजमान चन्द्र भी ग्रसित हो तो भी शिवभक्तों को यात्रा के शुभ फल ही देते हैं!

४. काशी में निर्जला एकादशी के दिन सभी नदियों से तीर्थ लाकर, माँ गंगा जी के तट पर उन की पूजा कर, तदनंतर उन कलशों की कलश यात्रा निकलती है और उन पवित्र जलोंसे काशी विश्वनाथ का अभिषेक किया जाता है. काशी खंड में दी गयी यह यात्रा निर्जला एकादशी को ही होती है और तब बाकी अन्य मुहूर्त निरर्थ हो जाते है!

सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि, गुरुपुष्यामृत और रविपुष्यामृत योग—-

सर्वार्थ सिद्धि योग नीचे दिए वारों को उनके आगे लिखे नक्षत्र होने पर सर्वार्थ सिद्धि योग बनता है। कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य करने के लिए यह योग शुभ रहता है। वार नक्षत्र रविवार | हस्त, मूल, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य, अश्विनी। सोमवार श्रवण, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा। मंगलवार अश्विनी, उत्तराभाद्रपद, कृतिका, आश्लेषा। बुधवार रोहिणी, अनुराधा, हस्त, कृतिका, मृगशिरा। बृहस्पतिवार | रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य। शुक्रवार | रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, श्रवण। शनिवार श्रवण, रोहिणी, स्वाति। शुभ मुहूर्तों में स्वर्ण आभूषण, कीमती वस्त्र आदि खरीदना, पहनना, वाहन खरीदना, यात्रा आरम्भ करना, मुकद्दमा दायर करना, ग्रह शान्त्यर्थ रत्न धारण करना, किसी परीक्षा प्रतियोगिता या नौकरी के लिए आवेदन-पत्र भरना आदि शुभ मुहूर्त जानने के किए अब आपको पूछने के लिए किसी ज्योतिषी के पास बार-बार जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।

सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि, गुरुपुष्यामृत और रविपुष्यामृत योग 

वारों का विषेश नक्षत्रों से सम्पर्क होने से ये योग बनते हैं । जैसे कि इन योगों के नामों से स्पष्‍ट है, इन योगों के समय में कोई भी शु्भ कार्य आरम्भ किया जाय तो वह निर्विघ्न रूप से पूर्ण होगा ऐसा हमारे पूर्वाचार्यों ने कहा है । यात्रा, गृह प्रवेश, नूतन कार्यारम्भ आदि सभी कार्यों के लिए या अन्य किसी अपरिहार्य कारणवश यदि व्यतिपात, वैधृति, गुरु-शुक्रास्त, अधिक मास एवं वेध आदि का विचार सम्भव न हो तो सर्वार्थसिद्धि आदि योगों का आश्रय लेना चाहिये ।

अमृतसिद्धि योग—-

अमृतसिद्धि योग रवि को हस्त, सोम को मृगशिर, मंगल को अश्‍विनी, बुध को अनुराधा, गुरु को पुष्य नक्षत्र का सम्बन्ध होने पर रविपुष्यामृत-गुरुपुष्यामृत नामक योग बन जाता है जो कि अत्यन्‍त शुभ माना गया है ।

रवियोग योग

रवियोग भी इन्हीं योगों की भाँति सभी कार्यों के लिए हैं . शास्त्रों में कथन है कि जिस तरह हिमालय का हिम सूर्य के उगले पर गल जाता है और सैकड़ों हाथियों के समूहों को अकेला सिंह भगा देता है उसी तरह से रवियोग भी सभी अशुभ योगों को भगा देता है, अर्थात्‌ इस योग में सभी कार्य निर्विघन रूप से पूर्ण होंगे ।

त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग

त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग विषेश बहुमूल्य वस्तुओं की खरीददारी करने के लिए हैं . इन योगों में खरीदी गई वस्तु नाम अनुसार भविष्य में दिगुनी व तिगुनी हो जाती है । अतः इन योगों में बहुमूल्य वस्तु खरीदनी चाहिये । इन योगों के रहते कोई वस्तु बेचनी नहीं चाहिये क्योंकि भविष्य में वस्तु दुगुनी या तिगुनी बेचनी पड़ सकती है । धन या अन्य सम्पत्ति के संचय के लिए ये योग अद्वितीय माने गए हैं । इन योगों के रहते कोई वस्तु गुम हो जाये तो भविष्य में दुगुना या तिगुना नुकसान हो सकता है, अतः इस दिन सावधान रहना चाहिए । इस दिन मुकद्दमा दायर नहीं करना चाहिए और दवा भी नहीं खरीदनी चाहिये


कन्या का सगाई (वाग्दान)

मुहूर्त उत्तराषाढ़, स्वाति, श्रवण, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ़, पूर्वाफाल्गुनी, अनुराधा, धनिष्ठा, कृतिका, रोहिणी, रेवती, मृगशिरा, मूल, हस्त, उत्तराफाल्गुनी एवं उत्तराभाद्रपद में से किसी भी नक्षत्र में सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी दिन को वाग्दान करना शुभ रहता है।

विवाह मुहूर्त

मूल, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, हस्त, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाद, उत्तराभाद्रपद, स्वाति, चित्रा, रोहिणी में से किसी भी नक्षत्र में, ज्येष्ठा, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष, आषाढ़ में से किसी भी महीने में विवाह करना शुभ होता है। विवाह मुहूर्त में कन्या के लिए बृहस्पति का, लड़के लिए सूर्य बल का एवं दोनों के लिए चंद्र बल का विचार अवश्य करना चाहिए। पंचागों में विवाह के शुभ मुहूर्त छापे जाते हैं। उनमें शुभसूचक खड़ी रेखाएं एवं अशुभ सूचक आड़ी रेखाएं होती हैं। सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त दस रेखाओं का, सात-आठ रेखाओं का मध्यम तथा पांच रेखाओं का जघन्य होता है। कम-से-कम रेखाओं के मुहूर्त को निंद्य मुहूर्त कहते हैं। विवाह के मुहूर्त में तुला, मिथुन, कन्या, वृषभ, धनु लग्न शुभ माने गए हैं। विवाह के लिए : रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती शुभ हैं।

    विवाह में सूर्यबल विचार-सूर्य वर की राशि से तृतीय, पष्ठ, दशम, एकादश राशिमें शुभः प्रथम, द्वितीय पंचम, सप्तम, नवम राशि में दान देने से शुभ और चतुर्थ अष्टम,द्वादश राशि में अशुभ होता है।

विवाह में चन्द्रबल विचार-चन्द्रमा वर और कन्या की राशि में तीसरा, छठा, सातयाँदसवाँ, ग्यारहवाँ शुभ; पहला, दूसरा, पाँचवाँ, नौवाँ दान देने से शुप और चीथा, आठवाँ,बारहयाँ अशुभ होता है।
    विवाह में अन्धादि लग्न व उनका फल-दिन में तुला और वृश्चिक; राशि में तुलाऔर मकर बधिर हैं तथा दिन में सिंह, मेष, वृष और रात्रि में कन्या, मियुन, कर्क अन्धसंज्ञक हैं। दिन में कुम्भ और रात्रि में मीन लग्न पंगु होते हैं। किसी-किसी आचार्य के मतसे धनु, तुला, वृश्चिक ये अपराह में बधिर हैं, मिधुन, कर्क, कन्या ये लग्न रात्रि में अन्धेहैं; सिंह, मेष, वृष ये लग्न दिन में अंधे हैं और मकर, कुम्भ, गीन ये लग्न प्रातःकाल तथासायंकाल में कुबड़े होते हैं। यदि विवाह बधिर लग्न में हो तो वर-कन्या दरिद्र; दिवान्धलग्न में हो तो कन्या विधवा; रात्रान्ध लग्न में हो तो सन्तति मरण; पंगु में हो तो धन-नाशहोता है।
    विवाह के शुभ लग्न-तुला, मिधुन, कन्या, वृष व धनु लग्न शुभ हैं, अन्य मध्यम हैं।लग्न शुद्धि-लग्न से बारहवें शनि, दसवें मंगल, तीसरे शुक्र, लग्न में चन्द्रमां औरक्रूर ग्रह अच्छे नहीं होते। लग्नेश, शुक्र, चन्द्रमा छठे और आठवें में शुभ नहीं होते। लग्नेशऔर सौम्य ग्रह आठवें में अच्छे नहीं होते हैं और सातवें में कोई भी ग्रह शुभ नहीं होताहै।
    ग्रहों का बल-प्रथम, चौथे, पाँचवें, नौवें और दसवें स्थान में स्थित बृहस्पति सबदोषों को नष्ट करता है। सूर्य ग्यारहवें स्थान में स्थित तथा चन्द्रमा वर्गोत्तम लग्न में स्थितनवांश दोषों को नष्ट करता.है। बुध लग्न, चौथे, पाँचवें, नौवें और दसवें स्थान में हो तोसौ दोषों को दूर करता है। यदि शुक्र इन्हीं स्थानों में हो तो दो सौ दोषों को दूर करताहै। यदि इन्हीं स्थानों में बृहस्पति स्थित हो तो एक लाख दोषों को दूर करता है। लग्नका स्वामी अथवा नवांश का 'स्वामी यदि लग्न, चौथे, दसवें, ग्यारहवें स्थान में स्थित हो तोअनेक दोषों को शीघ्र ही भस्म कर देता है।

नक्षत्र व सूर्य का गोचर(Transit of Sun and Nakshatra)

27  नक्षत्रों में से 10 नक्षत्रों को विवाह कार्य के लिये नहीं लिया जाता है . इसमें आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुणी, उतराफाल्गुणी, हस्त, चित्रा, स्वाती आदि नक्षत्र आते है. इन दस नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो व सूर्य़ सिंह राशि में गुरु के नवांश में गोचर कर तो विवाह करना सही नहीं रहता है.

वैवाहिक जीवन की शुभता को बनाये रखने के लिये यह कार्य शुभ समय में करना उतम रहता है. अन्यथा इस परिणय सूत्र की शुभता में कमी होने की संभावनाएं बनती है. कुछ समय काल विवाह के लिये विशेष रुप से शुभ समझे जाते है. इस कार्य के लिये अशुभ या वर्जित समझे जाने वाला भी समय होता है.

शुक्र व गुरु का बाल्यवृ्द्धत्व (Combustion of Jupiter and Venus)

शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिन तक बाल्यकाल में रहता है. इस अवधि में शुक्र अपने पूर्ण रुप से फल देने में असमर्थ नहीं होता है. इसी प्रकार जब वह पश्चिम दिशा में होता है. 10 दिन तक बाल्यकाल की अवस्था में होता है. शुक्र जब पूर्व दिशा में अस्त होता है. तो अस्त होने से पहले 15 दिन तक फल देने में असमर्थ होता है व पश्चिम में अस्त होने से 5 दिन पूर्व तक वृ्द्धावस्था में होता है.  इन सभी समयों में शुक्र की शुभता प्राप्त नहीं हो पाती है.

चन्द्र बल (Moon's strength)

चन्द्र का गोचर 4, 8 वें भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में होने पर चन्द्र को शुभ समझा जाता है. चन्द्र जब पक्षबली, स्वराशि, उच्चगत, मित्रक्षेत्री होने पर उसे शुभ समझा जाता है अर्थात इस स्थिति में चन्द्र बल का विचार नहीं किया जाता है.

चन्द्र का शुभ/ अशुभ होना (Benefic/Malefic influence of Moon)

चन्द्र को अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन दिन बाद तक बाल्य काल में होने के कारण इस समय को विवाह कार्य के लिये छोड दिया जाता है. ज्योतिष शास्त्र में यह मान्यता है की शुक्र, गुरु व चन्द्र इन में से कोई भी ग्रह बाल्यकाल में हो तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में न होने के कारण शुभ नहीं होता है. और इस अवधि में विवाह कार्य करने पर इस कार्य की शुभता में कमी होती है.

तीन ज्येष्ठा विचार (Consideration of three Jyeshtha)

विवाह कार्य के लिये वर्जित समझा जाने वाला एक अन्य योग है. जिसे त्रिज्येष्ठा  के नाम से जाना जाता है. इस योग के अनुसार सबसे बडी संतान का विवाह ज्येष्ठा मास में नहीं करना चाहिए.  इस मास में उत्पन्न वर या कन्या का विवाह भी ज्येष्ठा मास में करना सही नहीं रहता है . ये तीनों ज्येष्ठ मिले तो त्रिज्येष्ठा नामक योग बनता है.

इसके अतिरिक्त तीन ज्येष्ठ बडा लडका, बडी लडकी तथा ज्येष्ठा मास इन सभी का योग शुभ नहीं माना जाता है. एक ज्येष्ठा अर्थात केवल मास या केवल वर या कन्या हो तो यह अशुभ नहीं होता व इसे दोष नहीं समझा जाता है.

त्रिबल विचार (Consideration of Tribala)

इस विचार में गुरु कन्या की जन्म राशि से 1, 812 भावों में गोचर कर रहा हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है. गुरु कन्या की जन्म राशि से 3,6 वें राशियों में हों तो कन्या के लिये इसे हितकारी नहीं समझा जाता है. तथा 4, 10 राशियों में हों तो कन्या को विवाह के बाद दु:ख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती है.  गुरु के अतिरिक्त सूर्य व चन्द्र का भी गोचर अवश्य देखा जाता है . इन तीनों ग्रहों का गोचर में शुभ होना त्रिबल शुद्धि के नाम से जाना जाता है.

सगे भाई बहनों का विचार (Consideration of marriage of siblings)

एक लडके से दो सगी बहनों का विवाह नहीं किया जाता है. व दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त दो सगे भाईयों का विवाह या बहनों का विवाह एक ही मुहूर्त समय में नहीं करना चाहिए. जुडंवा भाईयों का विवाह जुडवा बहनों से नहीं करना चाहिए. परन्तु सौतेले भाईयों का विवाह एक ही लग्न समय पर किया जा सकता है. विवाह की शुभता में वृ्द्धि करने के लिये मुहूर्त की शुभता का ध्यान रखा जाता है.

पुत्री के बाद पुत्र का विवाह

पुत्री का विवाह करने के 6 सूर्य मासों की अवधि के अन्दर सगे भाई का विवाह किया जाता है. लेकिन पुत्र के बाद पुत्री का विवाह 6 मास की अवधि के मध्य नहीं किया जा सकता है. ऎसा करना अशुभ समझा जाता है. यही नियम उपनयन संस्कार पर भी लागू होता है. पुत्री या पुत्र के विवाह के बाद 6 मास तक उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है दो सगे भाईयों या बहनों का विवाह भी 6 मास से पहले नहीं किया जाता है.

वधू प्रवेश मुहूर्त

वधू प्रवेश मुहूर्त विवाह के दिन से 16 दिनों के भीतर पांचवें, सातवें एवं नौवें दिनों में वधू प्रवेश शुभ रहता है। किसी कारणवश 16 दिनों के भीतर वधू प्रवेश न हो सके तो विषम मास, विषम दिन और विषम वर्ष में वधू का प्रवेश करें। उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी एवं उत्तराषाढ़, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, रेवती, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा, मूल, मघा और स्वाति में से किसी भी नक्षत्र के दिन एवं 4,9,14 तिथियों छोड़ तथा रविवार, मंगलवार, बुधवार को छोड़कर शेष वारों में वधू प्रवेश करना शुभ होता है।तीनों उत्तरा रोहिणी हस्त अशिवनी पुष्य अभिजित मृगसिरा रेवती चित्रा अनुराधा श्रवण धनिष्ठा मूल मघा और स्वाति ये सभी नक्षत्र चतुर्थी नवमी और चतुर्दशी ये सभी तिथियां तथा मंगलवार रविवार और बुधवार इन वारों को छोड कर अन्य सभी नक्षत्र तिथि तथा वार में नववधू का घर मे प्रवेश शुभ होता है।

गौना (द्विरागमन) द्विरागमन मुहूर्त

(Dviragmn moment)

विवाह के दिन से सोलह दिन के भीतर नौवे सातवे पांचवे दिन मे वधू प्रवेश घर मे शुभ है,यदि किसी कारण से सोलह दिन के भीतर वधू का प्रवेश नही हो पाये तो विषम मास विषम दिन और विषम वर्ष में वधू प्रवेश घर मे करवाना चाहिये। तीनो उत्तरा रोहिणी अश्विनी पुष्य हस्त चित्रा अनुराधा रेवती मृगशिरा श्रवण मूल मघा और स्वाति नक्षत्र मे रिक्ता तिथि यानी चौथ नौवीं और चतुर्दशी को छोड कर तथा रविवार मंगलवार बुधवार को त्याग कर वधू को घर मे प्रवेश करवाना चाहिये. द्विरगमन का मुहूर्त भी कल्प ज्योतिष के अनुसार ही बनाया गया था,इसके द्वारा वर और वधू की सीमा परीक्षा यानी एक दूसरे के प्रति चाहत को जाग्रत करना,किसी भी प्रकार से चौथी की विदा करवाने (वधू के प्रथम गृह प्रवेश के चौथे दिन वापस विदा करना) के बाद पहली तीसरी पांचवी और सातवीं साल मे वर वधू को आपस मे नही मिलने देना तथा उनके प्रति आश्वस्त हो जाने की दशा मे ही द्विरागमन की विदा का रूप बताया जाता है। जब मेष वृश्चिक कुम्भ राशियों मे सूर्य हो,गुरुवार शुक्रवार सोमवार का दिन हो,मिथुन मीन कन्या तुला वृष यह लगने हों अश्विनी पुष्य हस्त उत्तराषाढा उत्तराफ़ाल्गुनी उत्तराभाद्रपद रोहिणी श्रवण धनिष्ठा शतभिषा पुनर्वसु स्वाति मूल मृगशिरा रेवती चित्रा अनुराधा यह नक्षत्र हो,चौथ नौवी और चतुर्दशी तिथि मे त्याज्य बाकी की तिथिया हो तभी विदा करना ठीक रहता है. मुहूर्त 1,3,5,7 वर्षों में कुभ, वृश्चिक या मेष राशि के सूर्य में, बृहस्पति, शुक्र, सोमवार में, मिथुन, मीन, कन्या, तुला, वृषभ, राशियों में और अश्विनी, पुष्य, हस्त, उत्तराषाढ़, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, स्वाति, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा आदि समूह नक्षत्रों में द्विरागमन शुभ माना जाता हैI

रजस्वला स्नान मुहुर्त

ज्येष्ठा अनुराधा हस्त रोहिणी स्वाति धनिष्ठा मृगसिरा और उत्तरा इन नक्षत्रों मे शुभ वार एवं शुभ तिथियों में रजस्वला स्त्री को स्नान करना शुभ है। वैसे तो यह नियम प्रतिमास के लिये शुभ तथापि प्रत्येक मास रजस्वला होने वाली स्त्री जातकों को प्रतिपालन संभव नही हो सकता है,अत: प्रथम बार रजस्वला होने वाली स्त्री को के लिये ही इस नियम का पालन करना उचित समझना चाहिये।

नवांगना भोग मुहूर्त

नववधू के साथ प्रथम सहसवास गर्भाधान के नक्षत्रों ( मृगशिरा अनुराधा श्रवण रोहिणी हस्त तीनों उत्तरा स्वाति धनिष्ठा और शतभिषा) में चन्द्र शुद्धि एवं रात्रि के समय करना चाहिये।

हनीमून के लिए शुभ मुहूर्त

आपको अपने जन्मांक, नामांक, वास्तु के अनुसार किन क्षेत्रों जैसे-पर्वतीय, समुद्र आदि की यात्रा करनी चाहिए। किस दिशा के कमरे में ठहरना चाहिए, सिराहना किस दिशा में करके सोना चाहिए आदि महत्वपूर्ण तथ्यों को जानना और शुभ मुहूर्त में यात्रा करना बहुत महत्वपूर्ण है।

गर्भाधान मुहूर्त

जिस स्त्री को जिस दिन मासिक धर्म हो,उससे चार रात्रि पश्चात सम रात्रि में जबकि शुभ ग्रह केन्द्र (१,,,१०) तथा त्रिकोण (१,,९) में हों,तथा पाप ग्रह (३,,११) में हों ऐसी लग्न में पुरुष को पुत्र प्राप्ति के लिये अपनी स्त्री के साथ संगम करना चाहिये। मृगशिरा अनुराधा श्रवण रोहिणी हस्त तीनों उत्तरा स्वाति धनिष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रों में षष्ठी को छोड कर अन्य तिथियों में तथा दिनों में गर्भाधान करना चाहिये,भूल कर भी शनिवार मंगलवार गुरुवार को पुत्र प्राप्ति के लिये संगम नही करना चाहिये।

पुंसवन तथा सीमांत मुहूर्त

आर्द्रा पुनर्वसु पुष्य पूर्वाभाद्रपदा उत्तराभाद्रपदा हस्त मृगशिरा श्रवण रेवती और मूल इन नक्षत्रों में रवि मंगल तथा गुरु इन वारों में रिक्त तिथि के अतिरिक्त अन्य तिथियों में कन्या मीन धनु तथा स्थिर लगनों में (२,,,११) एवं गर्भाधान से पहले दूसरे अथवा तीसरे मास में पुंसवन कर्म तथा आठवें मास में सीमान्त कर्म शुभ होता है। रवि गुरु तथा मंगलवार तथा हस्त मूल पुष्य श्रवण पुनर्वसु और मृगशिरा इन नक्षत्रों मेम पुंसवन संस्कार शुभ भी माना जाता है,षष्ठी द्वादसी अष्टमी तिथियां त्याज्य हैं। सीमान्त कर्म देश काल और परिस्थिति के अनुसार छठे अथवा आठवें महिने में करना भी शुभ रहता है। पुंसवन के लिये लिखे गये शुभ नक्षत्र ही सीमान्त के लिये शुभ माने जाते है।

गण्ड मूलोत्पन्न का विचार

मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या अपने ससुर के लिये कष्टकारी समझी जाती है. आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या को अपनी सास के लिये अशुभ माना जाता है. ज्येष्ठा मास की कन्या को जेठ के लिये अच्छा नहीं समझा जाता है. इसके अलावा विशाखा नक्षत्र में जन्म लेने पर कन्या को देवर के लिये अशुभ माना जाता है. इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाली कन्या का विवाह करने से पहले इन दोषों का निवारण किया जाता है.प्रसूता स्नान मुहूर्त

प्रसूति स्नान रविवार, मंगलवार, गुरुवार को करना हितकर है। अन्य वारों को यह काम नहीं करें। खासकर शतभिषा नक्षत्र और उपरोक्त वार हों। हस्त अश्विनी तीनों उत्तरा रोहिणी मृगशिरा अनुराधा स्वाति और रेवती ये सभी नक्षत्र तथा गुरु रवि और मंगल ये दिन प्रसूता स्नान के लिये शुभ माने जाते हैं। द्वादसी छठ और अष्टमी तिथियां त्याज्य हैं।

गंड मूल क जन्म:

ग्रह शांति अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल एवं रेवती, मूल संज्ञक नक्षत्र में यदि किसी बालक का जन्म हो, तो 27 दिन बाद जब वह नक्षत्र आए तो ग्रहशांति कराएँ। अन्य नक्षत्रों में पैदा होने पर ग्रहशांति की आवश्यकता नहीं होती है।

आठवाँ पूजन शुक्ल पक्ष में रविवार, मंगलवार एवं बृहस्पतिवार को पति का चन्द्रमा देखकर कर लें। पड़वा (एकम), छठ, नवमी तथा क्षय तिथि को आठवाँ पूजन नहीं करें।

सूतिका स्नान मुहूर्त शुभ:

रेवती, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाति, अश्विनी, अनुराधा ये दस नक्षत्र एवं रविवार, मंगलवार एवं बृहस्पतिवार ये तीन दिन सूतिका स्नान के लिए शुभ माने जाते हैं। अशुभः आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मघा, भरणी, विशाखा, कृतिका, मूल और चित्रा ये दस नक्षत्र एवं बुधवार, शनिवार—ये दो वार सूतिका स्नान के लिए अशुभ माने जाते हैं। षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी, नवमी, चतुर्थी तिथियां भी सूतिका स्नान के लिए त्याज्य हैं। व्यतिपात योग, वैधृति योग, भद्रा, क्षयतिथि, वृद्धि तिथि, क्षयमास, अधिक मास, कुलिक, अर्द्धयाम, महापातु, विष्कंभ, शूलयोग की पांच घटिकाएं अजु और अति अजु की छह घटियां एवं व्याघात योग की नौ घटियां सभी शुभ कार्यों के लिए त्याज्य हैं।

स्तनपान मुहूर्त

अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद, रेवती इन तेरह नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र के दिन सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी भी दिन शुभ लग्न में स्तनपान कराना शुभ है।


जातकर्म मुहूर्त


बालक का जात कर्म पूर्वोक्त पुंसवन के लिये वर्णित नक्षत्र और तिथियों के अनुसार ही माना जाता है। शुभ दिन जन्म से ग्यारहवां बारहवां ,मृदु संज्ञक नक्षत्र मृगशिरा रेवती चित्रा अनुराधा तथा ध्रुव संज्ञक नक्षत्र तीनो उत्तरा और रोहिणी क्षिप्र संज्ञक नक्षत्र हस्त अश्विनी पुष्य और अभिजित तथा चर संज्ञक नक्षत्र स्वाति पुनर्वसु श्रवण धनिष्ठा और शतभिषा शुभ होते हैं। जातक कर्म एवं नामकरण मुहूर्त जन्मकाल में या तदोपरांत चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य संक्राति को छोड़कर सोमवार, बुधवार, शुक्रवार, जन्मकाल से ग्यारहवें या बारहवें दिन मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा एवं शतभिषा नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र के दिन जातक कर्म एवं नामकरण करना शुभ है। जैनधर्मी जन्म से 45 दिनों तक उपरोक्त नक्षत्र, दिनों में जातकर्म एवं नामकरण करें।

डोलारोहण - झूले में शयन का मुहूर्त

रेवती,मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद एवं रोहिणी नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी भी शुभ दिन को बालक को झूले में शयन कराना श्रेयस्कर है।

भूम्युपवेशन

(शिशु को भूमि पर बैठाना) मुहूर्त रोहिणी, मृगशिरा, ज्येष्ठा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ एवं उत्तराभाद्रपद—इन दस नक्षत्रों में से चतुर्थी, नवमी एवं चतुर्दशी को छोड़कर शेष किसी भी तिथि में सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार या शुक्रवार के दिन शिशु को भूमि पर बैठाना शुभ होता है।

शिशु निष्क्रमण मुहूर्त

शिशु को प्रथम बार बाहर ले जाने का मुहूर्त अनुराधा ज्येष्ठा श्रवण धनिष्ठा रोहिणी मृगशिरा पुनर्वसु पुष्य हस्त उत्तराषाढा रेवती उत्तराफ़ाल्गुनी तथा अश्विनी ये नक्षत्र सिंह कन्या तुला तथा कुम्भ यह लगन जन्म से तीसरा या चौथा महिना यात्रा के लिये शुभ तिथियां तथा शनि और मंगल को छोडकर अन्य सभी दिन,यह सब शिशु को पहली बार घर से बाहर निकलने के लिये शुभ माने गये हैं। अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा एवं रेवती नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र को द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी में से किसी एक तिथि एवं सोमवार, बुधवार, शुक्रवार, रविवार इनमें से किसी दिन को शिशु को जन्म के बाद प्रथम बार घर से बाहर ले जाना श्रेयस्कर है।

अन्नप्राशन मुहूर्त

रोहिणी, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढ़, उत्तराफाल्गुनी, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, पुष्य, अश्विनी, अभिजित, पुनर्वसु, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं मृगशिरा नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र में सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी भी दिन को 2, 3, 5, 7, 10, 13, 15 तिथियों में से किसी भी तिथि को और वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, धनु, मकर, कुंभ में से किसी भी लग्न में बालक को अन्नप्राशन करवाना श्रेयस्कर है।

नामकरण मुहूर्त

नामकरण संस्कार रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरुवार को स्थिर लग्न एवं नक्षत्र चरण के आधार पर नामकरण कराएँ। सही अक्षर नहीं आने पर नक्षत्र राशि के अन्य अक्षरों पर यह काम किया जा सकता है। रिक्ता तिथि को कभी नहीं करें।नामकरण के लिए : संक्रांति के दिन तथा भद्रा को छोड़कर 1, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13 तिथियों में, जन्मकाल से ग्यारहवें या बारहवें दिन, सोमवार, बुधवार अथवा शुक्रवार को तथा जिस दिन अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, अभिजित, पुष्य, स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा इनमें से किसी नक्षत्र में चंद्रमा हो, बच्चे का नामकरण करना चाहिए। पुनर्वसु पुष्य हस्त चित्रा स्वाति अनुराधा ज्येष्ठा मृगशिरा मूल तीनो उत्तरा तथा धनिष्ठा इन नक्षत्रों में जन्म से ग्यारहवें बारहवें दिन शुभ योग बुध सोम रवि तथा गुरु को इन दिनों स्थिर लग्नों में बालक का नामकरण शुभ होता है।

कूप और जल पूजन मुहूर्त

कुआ पूजने का मुहूर्त  कुआ पूजन वर्ष के चैत्र, पौष, मास तथा पुरसोत्तम मास को छोड़कर सभी महीनों की २, , , , , , १०, ११, १२, १३, एवं पूर्णिमा तिथियों को तथा सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुभ वार रहते हैं | मूल, श्रवण, मृगशिरा, पुनर्वशु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, आदि नक्षत्र शुभ रहते हैं|तथा मेष, कर्क, सिंह,तुला, व् मकर, लग्न शुभ रहते हैं |जलवा (कुआँ पूजन) सोम, बुध, गुरुवार को जलवा पूजन करना हितकर है। चैत्र, पौष, अधिक मास, मलमास व तारा डूबने पर यह काम नहीं करें। मूल पुनर्वसु पुष्य श्रवण मृगशिरा और हस्त इन नक्षत्रों में तथा शुक्र शनि और मंगलवार इन दिनों के अतिरिक्त अन्य वारों में प्रसूता को कूप और जल पूजन करना चाहिये।

अन्न प्राशन मुहूर्त

तीनो पूर्वा आश्लेषा आर्द्रा शभिषा तथा भरणी इन नक्षत्रों को छोड कर अन्य नक्षत्र शनि तथा मंगल को छोडकर अन्य वार द्वादसी सप्तमी रिक्ता पर्व तथा नन्दा संज्ञक तिथियों को छोडकर अन्य तिथियां मीन वृष कन्या तथा मिथुन लग्न शुक्ल पक्ष शुभ योग तथा शुभ चन्द्रमा में जन्म मास से सम मास छठे अथवा आठवें महिने में बालक का तथा विषम मास में बालिका का प्रथम वार अन्न प्रासन (अन्न खिलाना) शुभ माना जाता है।

चूडाकर्म मुहूर्त-मुण्डन मुहूर्त

जडूला (मुंडन) शुक्ल पक्ष में तीसरे, पाँचवें व सातवें वर्ष में मुंडन करने का विधान है। चैत्र मास एवं ज्येष्ठ पुत्र का ज्येष्ठ माह में मुंडन नहीं कराएँ तथा दो मुंडन एक साथ नहीं किए जाते हैं। ध्यान रखें।हस्त चित्रा स्वाति श्रवण धनिष्ठा तीनों पूर्वा म्रुगशिरा अश्विनी पुनर्वसु पुष्य आश्लेषा मूल तथा रेवती ये सभी नक्षत्र तथा रविवार बुधवार और गुरुवार ये वार प्रथम वार मुण्डन के लिये शुभ माने गये हैं।चूडाकर्म (मुण्डन) मुहूर्त जन्म से तोसरे, पांचवें, सातवें एवं विषम वर्षों में अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, प्रतिपदा, षष्ठी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य संक्राति को छोड़कर अन्य तिथियों में से किसी भी तिथि को तथा सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार इन वारों में से एक दिन को, लग्न अथवा जन्म राशि से आठवीं राशि छोड़कर ज्येष्ठा, मृगशिरा, रेवतो, चित्रा, स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, हस्त, अश्विनी एवं पुष्य नक्षत्रों में मुंडन करवाना शुभ है। पुनर्वसु पुष्य ज्येष्ठा मृगशिरा श्रवण धनिष्ठा हस्त चित्रा स्वाति और रेवती इन नक्षत्रों में शुक्ल पक्ष उत्तरायण में सूर्य,वृष कन्या धनु कुम्भ मकर तथा मिथुन लगनों में शुभ ग्रह के दिन तथा शुभ योग में चूडाकर्म प्रशस्त माना गया है।

अक्षरारभ

जन्म से पांचवें वर्ष में, एकादशी, द्वादशी, दशमी, द्वितीया, षष्ठी, श्रवण, स्वाति, रेवती, पुनर्वसु, आर्द्रा, चित्रा एवं अनुराधा में से किसी भी नक्षत्र को सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी भी शुभ दिन को, मेष, मकर, तुला और कर्क लग्नों को छोड़कर अन्य लग्नों में शिशु जातक का अक्षरारंभ कराना शुभ माना जाता है।

मुण्डन मुहूर्त

मुण्डन के लिए : जन्मकाल से अथवा गर्भाधान काल से तीसरे अथवा सातवें वर्ष में, चैत्र को छोड़कर उत्तरायण सूर्य में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार अथवा शुक्रवार को ज्येष्ठा, मृगशिरा, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, अश्विनी, अभिजित व पुष्य नक्षत्रों में, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तिथियों में बच्चे का मुंडन संस्कार करना चाहिए। ज्येष्ठ लड़के का मुंडन ज्येष्ठ मास में वर्जित है। लड़के की माता को पांच मास का गर्भ हो तो भी मुण्डन वर्जित है।हस्त चित्रा स्वाति श्रवण धनिष्ठा तीनों पूर्वा म्रुगशिरा अश्विनी पुनर्वसु पुष्य आश्लेषा मूल तथा रेवती ये सभी नक्षत्र तथा रविवार बुधवार और गुरुवार ये वार प्रथम वार मुण्डन के लिये शुभ माने गये हैं। (मुण्डन) मुहूर्त जन्म से तोसरे, पांचवें, सातवें एवं विषम वर्षों में अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, प्रतिपदा, षष्ठी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य संक्राति को छोड़कर अन्य तिथियों में से किसी भी तिथि को तथा सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार इन वारों में से एक दिन को, लग्न अथवा जन्म राशि से आठवीं राशि छोड़कर ज्येष्ठा, मृगशिरा, रेवतो, चित्रा, स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, हस्त, अश्विनी एवं पुष्य नक्षत्रों में मुंडन करवाना शुभ है। पुनर्वसु पुष्य ज्येष्ठा मृगशिरा श्रवण धनिष्ठा हस्त चित्रा स्वाति और रेवती इन नक्षत्रों में शुक्ल पक्ष उत्तरायण में सूर्य,वृष कन्या धनु कुम्भ मकर तथा मिथुन लगनों में शुभ ग्रह के दिन तथा शुभ योग में चूडाकर्म प्रशस्त माना गया है। जडूला (मुंडन) शुक्ल पक्ष में तीसरे, पाँचवें व सातवें वर्ष में मुंडन करने का विधान है। चैत्र मास एवं ज्येष्ठ पुत्र का ज्येष्ठ माह में मुंडन नहीं कराएँ तथा दो मुंडन एक साथ नहीं किए जाते हैं। ध्यान रखें।

कर्णवेध मुहूर्त

श्रवण धनिष्ठा शतभिषा पुनर्वसु पुष्य अनुराधा हस्त चित्रा स्वाति तीनों उत्तरा पूर्वाफ़ाल्गुनी रोहिणी मृगशिरा मूल रेवती और अश्विनी यह सभी नक्षत्र शुभ ग्रहों के दिन एवं मिथुन कन्या धनु मीन और कुम्भ यह लगन कर्णवेध के लिये उत्तम हैं,चैत्र तथा पौष के महिने एवं देव-शयन का समय त्याज्य है। कर्णछेदन मुहूर्त श्रवण धनिष्ठा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी भी शुभ दिन को 1,2,3,5,6,7, 10, 11, 12, 13, 14 तिथियों में से किसी भी तिथि को बालक का कर्णछेदन करना श्रेयस्कर रहता है। चैत्र, पौष, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक जन्म-मास, रिक्त तिथि, समवर्ष छोड़कर जन्म से छठे, सातवें, आठवें महीने में या बारहवें, सोलहवें दिन कर्णछेदन कराना शुभ माना जाता है।

उपनयन मुहूर्त

उपनयन संस्कार अर्थात यज्ञोपवीत उत्तरायण सूर्य में होता है. उस समय गुरु व शुक्र अस्त नहीं होने चाहिए. काल शुद्धि का विचार कर लें.

नक्षत्र :- अश्विनी, पुष्य, हस्त, अश्लेषा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, स्वाती, मूल, मृ्गशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा़, पूर्वाभाद्रपद, आर्द्रा नक्षत्रों में उपनयन संस्कार कर सकते हैं.

वार :- रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार आदि दिन उपनयन संस्कार के लिए शुभ दिन हैं.

तिथियाँ :- द्वित्तीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी तिथियों में तथा कृष्ण पक्ष में पंचमी तिथी तक, दोपहर से पहले यज्ञोपवीत संस्कार कर लेना चाहिए.

ज्येष्ठ मास में प्रथम बालक अर्थात ज्येष्ठ बालक का उपनयन संस्कार ना करें. उपनयन संस्कार में बृहस्पति की स्थिति अवश्य देख लें. धनु, कर्क तथा मीन राशि का बृह्स्पति अशुभ स्थानों में गोचर करने पर भी शुभ माना जाता है.पूर्वाषाढ अश्विनी हस्त चित्रा स्वाति श्रवण धनिष्ठा शतभिषा ज्येष्ठा पूर्वाफ़ाल्गुनी मृगशिरा पुष्य रेवती और तीनो उत्तरा नक्षत्र द्वितीया तृतीया पंचमी दसमी एकादसी तथा द्वादसी तिथियां,रवि शुक्र गुरु और सोमवार दिन शुक्ल पक्ष सिंह धनु वृष कन्या और मिथुन राशियां उत्तरायण में सूर्य के समय में उपनयन यानी यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार शुभ होता है। ब्राह्मण को गर्भ के पांचवें अथवा आठवें वर्ष में क्षत्रिय को छठे अथवा ग्यारहवें वर्ष में वैश्य को आठवें अथवा बारहवें वर्ष में यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये। किसी कारण से अगर समय चूक जाये तो ब्राह्मण को सोलहवें वर्ष में क्षत्रिय को बाइसवें वर्ष में वैश्य को चौबीसवें वर्ष में यज्ञोपवीत धारण कर लेना चाहिये। इन वर्षों के बीत जाने से गायत्री मंत्र को लेने के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। बिना यज्ञोपवीत धारण किये गायत्री उल्टा प्रभाव देने लगता है।

विद्यारंभ मुहूर्त

विद्या आरंभ के लिए : उत्तरायण में (कुंभ का सूर्य छोड़कर) बुध, बृहस्पतिवार, शुक्रवार या रविवार को, 2, 3, 5,6, 10, 11, 12 तिथियों में पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मूल, पूष्य, अनुराधा, आश्लेषा, रेवती, अश्विनी नक्षत्रों में विद्या प्रारंभ करना शुभ होता है।मृगशिरा, आद्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्विनी, मूल, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ़, पूर्वाफाल्गुनी, पुष्य, आश्लेषा नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र में रविवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार में से किसी दिन को, षष्ठी, पंचमी, तृतीया, एकादशी, द्वादशी, दशमी, द्वितीया में से किसी तिथि को एवं लग्न के नौवें, पांचवें, पहले, चौथे, सातवें एवं दसवें स्थान में शुभ ग्रहों के रहने पर विद्यारंभ कराना शुभ है। विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के समय शिशु बोलना भी शुरू नहीं कर पाता है और चूड़ाकर्म तक बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति जगने लगती है। इसलिये चूड़ाकर्म के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

यात्रा प्रवास मुहूर्त

मनुष्य विभिन्न उद्देश्यों और कार्यों से जीवन में समय समय पर यात्रा करते। जब हम किसी विशेष उद्देश्य या कार्य से यात्रा करते हैं तो हमारी अपेक्षा रहती है कि जिस प्रयोजन मे हम यात्रा कर रहे हें उसमें हमें सफलता प्राप्त हो। यात्रा कैसी होगी व यात्रा से अनुकूल परिणाम प्राप्त होगा या नहीं यह उस मुहुर्त पर निर्भर करता जिसमें हम यात्रा करते हैं।  ज्योतिषशास्त्री कहते हैं कि यात्रा के विषय में जब मुहुर्त का आंकलन किया जाता है तब देखा जाता है कि  यात्रा का उद्देश्य क्या है, कितनी दूरी तक यात्रा करनी है, यात्रा का मार्ग क्या है अर्थात जलमार्ग, वायु मार्ग, सड़क मार्ग या रेल मार्ग में से किस मार्ग से आप यात्रा कर रहे हैं।ध्यान देने वाली बात यह है कि दैनिक या रोजमर्रा की यात्रा के प्रसंग में मुहुर्त का विचार नहीं किया जाता है। यदि किन्हीं जरूरी कारणों से यात्रा शुभ मुहूर्त में न की जा सकें तो उसी मुहूर्त में ब्राह्मण जनेऊ-माला, क्षत्रिय शस्त्र, वैश्य शहद-घी, शूद्र फल को अपने वस्त्र में बांधकर किसी के घर में एवं नगर से बाहर जाने की दिशा में रखें।

ऊषाकाल में पूरब को, गोधू‍लि में पश्चिम को, अर्धरात्रि में उत्तर को और मध्याह्नकाल में दक्षिण को नहीं जाना चाहिए।

दक्षिण यात्रा का निषेध- कुम्भ और मीन के चन्द्रमा में अर्थात पंचक में दक्षिण कदापि न जाएं।

चन्द्रमा की दिशा और उसका शुभाशुभ फल- 'मेष सिंह धनु पूरब चन्दा। दक्षिण कन्या वृष मकरन्दा।। पश्चिम कुम्भ तुला अरु मिथुना। उत्तर कर्कट वृश्चिक मीना।।' अर्थात मेष, सिंह और धनु राशि का चंद्रमा पूर्व में, वृष, कन्या और मकर राशि का दक्षिण में, मिथुन, तुला और कुम्भ का पश्चिम में, कर्क, वृश्चिक, मीन का चन्द्रमा उत्तर में रहता है। यात्रा में चन्द्रमा सम्मुख या दाहिने शुभ होता है। पीछे होने से मरणतुल्य कष्टऔर बाईं ओर होने से धनहानि होती है

यात्रा मुहूर्त में दिशाशूल, योगिनी, राहुकाल, चंद्र-वास का विचार अवश्य करना चाहिए।

    चन्द्रवास विचार-मेष, सिंह और धनु राशि का चन्द्रमा पूर्व दिशा में, वृष, कन्याऔर मकर राशि का चन्द्रमा दक्षिण दिशा में; तुला, मिधुन व कुम्भ राशि का चन्द्रमा पश्चिमदिशा में; कर्क, वृश्चिक और मीन राशि का चन्द्रमा उत्तर दिशा में वास करता है।

    चन्द्रफल-सम्मुख चन्द्रमा धनलाभ करनेवाला, दक्षिण चन्द्रमा सुख-सम्पत्ति देनेवाला,

    पृष्ठ चन्द्रमा शोक-सन्ताप देनेवाला और वाम चन्द्रमा धननाश करनेवाला होता है।

समयशूल में पूर्व में प्रातः काल पश्चिम में सायकाल 

नक्षत्र आंकलन (Assessment of Nakshatra)

यात्रा विचार : अश्विनी, मृगशिरा, अनुराधा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती नक्षत्रों में यात्रा शुभ है। रोहिणी, ज्येष्ठा, उत्तरा-3, पूर्वा-3, मूल मध्यम हैं। भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, मघा, आश्लेषा, चित्रा, स्वाति, विशाखा निन्दित हैं। मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रिक्ता और दिक्शूल को छोड़कर सर्वदा सब दिशाओं में यात्रा शुभ है। जन्म लग्न तथा जन्म राशि से अष्टम लग्न होने पर यात्रा नहीं करनी चाहिए। यात्रा पर जाने से पहले नक्षत्रों की स्थिति का विचार करना चाहिए। अगर यात्रा के दिन हस्त, अश्विनी, पुष्य, मृगशिरा, रेवती, अनुराधा पुनर्वसु, श्रवण , घनिष्ठा  नक्षत्र हो तो यात्रा अनुकूल और शुभ रहता है आप इस नक्षत्र में यात्रा कर सकते है। इन नक्षत्रों के अलावा आप उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद  में भी यात्रा कर सकते हैं हलांकि ये नक्षत्र इस प्रसंग में मध्यम स्तर के माने जाते हैं। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं कि यात्रा के प्रसंग में मुहुर्त देखने के  निम्न सामान्य नियम है यात्रा या प्रवास सुखद हो इसलिए मुहूर्त देखना आवश्यक है:

उत्तमः अश्विनी, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, रेवती, हस्त, श्रवण, घनिष्ठा नक्षत्र यात्रा के लिए उत्तम हैं।

मध्यमः रोहिणी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा नक्षत्र यात्रा के लिए मध्यम हैं।

निंद्यः भरणी, कृतिका, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, चित्रा, स्वाति, विशाखा नक्षत्र यात्रा के लिए निंद्य हैं।

अधिकांश पंचांगों में गोरक्ष मत के अनुसार गमन मुहूर्त एवं उसका परिणाम, दिशा, प्रहर, आदि की जानकारी देनेवाली तालिका छापी जाती है। इस का उपयोग करने से नक्षत्रादि का विचार करना नहीं पड़ता। यह गोरक्ष-गमन मुहूर्त तालिका शत-प्रतिशत सही परिणाम दर्शाती है। अगले पृष्ठ पर वह तालिका संलग्न है। वारशूल और नक्षत्रशूल ज्येष्ठा नक्षत्र : सोमवार पूर्वाभाद्रपद : बृहस्पतिवार रोहिणी : मंगलवार उत्तराफाल्गुनी : बुधवार उपरोक्त नक्षत्र-वारों में प्रवास करना अहितकर रहता है।

यात्रा चर लग्न, द्विभाव लग्न में चन्द्रमा देखकर करें। चन्द्रमा सम्मुख या दाहिने रखें। स्थिर लग्न, दिशाशूल में यात्रा नहीं करें। शुभ समय न हो और यात्रा करना जरूरी हो तो वार के अनुसार परिहार कर लें।

तिथि विचार (Tithi Vichar)

जब आप यात्रा के लिए मुहुर्त का विचार करें तो ध्यान रखें कि तिथि कौन सी है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यात्रा के लिए द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, सप्तमी, एकादशी और त्रयोदशी तिथि बहुत ही शुभ मानी गयी है। कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि भी यात्रा के संदर्भ में उत्तम मानी जाती है । उपरोक्त तिथियों के अलावा जो भी तिथियां हैं वे यात्रा के लिए शुभ नहीं मानी जाती हैं।

करण (Karana)

विष्टि करण होने से भद्रा दोष लगता है, इस स्थिति में यात्रा नहीं करनी चाहिए.

वार विचार (Var Vichar)

यात्रा के लिए बृहस्पति और शुक्रवार को सबसे अच्छा माना जाता है। रविवार, सोमवार और बुधवार को यात्रा की दृष्टि से मध्यम माना जाता है। ज्योतिर्विदों के अनुसार मंगलवार और शनिवार यात्रा के लिए शुभ नहीं होते हैं अत: संभव हो तो इस तिथि में यात्रा नहीं करें.

वारशूल (Varshula)

ज्योतिषशास्त्रियों का मानना है कि यात्रा पर निकलने से पहले मुहुर्त का विचार करते हुए वार शूल का भी ध्यान रखना चाहिए। वारशूल से बचने के लिए सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा में नहीं जाना चाहिए। सोमवार और बृहस्पतिवार को आग्नेय दिशा में यात्रा नहीं करना चाहिए। दक्षिण दिशा में बृहस्पतिवार को यात्रा नहीं करनी चाहिए। रविवार और शुक्रवार को नैऋत्य एवं पश्चिम दिशा में यात्रा करने से बचना चाहिए। मंगलवार के दिन वायव्य दिशा में यात्रा करना वारशूल का कारण बनता है अत: इस दिशा में यात्रा से बचना चाहिए। मंगलवार और बुधवार को उत्तर दिशा में यात्रा करना अशुभ होता है क्योंकि इस दिन इस दिशा में वार शूल लगता है। बुधवार और शनिवार को इशान यानी उत्तर पूर्व दिशा में यह शूल लगता है अत: इस दिशा में यात्रा करने से बचना चाहिए।

योग (Yoga)

यात्रा के संदर्भ में योगों का आंकलन भी आवश्यक होता है। अगर यात्रा के दिन निम्न अशुभ योग हो तो यात्रा नहीं करनी चाहिए। जैसे व्यातिपात

    वैधृति

    मृत्यु

    दग्ध

    काक्रच

    सम्वर्तक

    हुताशन

    विष  और

    यमघण्ट

चन्द्रनिवास (Chandra Nivas)

चंद्रवासविकारः मेष, सिंह, धनु राशि का चंद्र-पूर्व दिशा, वृषभ, कन्या, मकर राशि का चंद्र-दक्षिण दिशा, तुला, मिथुन, कुंभ राशि का चंद्र पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, शनि का चंद्र-उत्तर दिशा। इस तरह चंद्र का वास दिशाओं में रहता है। चंद्रवास की दिशा में प्रवास लाभदायक रहता है।चन्द्रनिवास में देखा जाता है कि चन्द्रमा किस दिशा में हैं जिस दिशा में चन्द्रमा होता है उस दिशा में यानी सम्मुख दिशा में और दाहिने दिशा में यात्रा करना शुभ होता है एवं पीछे और बायीं ओर यात्रा करना ठीक नहीं माना जाता है। इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं माना कि आज चन्द्रमा पूर्व दिशा में है और आपको पूर्व में जाना है तो यात्रा के लिए यह शुभ स्थिति है, अगर आप दक्षिण में जाना चाहें तो इसके लिए भी चन्द्र शुभ है क्योकि पूर्व दिशा से दायीं ओर दक्षिण दिशा है।

सम्मुख शुक्र (Sammukh Shukra)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यात्रा के लिए सम्मुख शुक्र का त्याग किया जाना चाहिए  अर्थात जिस दिशा में आपको यात्रा करनी है उस दिशा में अगर शुक्र स्थित है तो सम्मुख शुक्र लगता है  । सम्मुख शुक्र यात्रा के लिए अशुभ होता है। सम्मुख शुक्र कैसे होता है अब इसे देखिए जब शुक्र गोचरवश कृतिका से आश्लेषा नक्षत्र में हो तो पूर्व दिशा में, मघा से विशाखा नक्षत्र तक दक्षिण में, अनुराधा से श्रवण तक पश्चिम में तथा घनिष्ठा से भरणी नक्षत्र में होने पर उत्तर दिशा में होता है। उपरोक्त बातों से निष्कर्ष निकलता है कि गोचरवश शुक्र जिस नक्षत्र में पहुंचता है उस नक्षत्र की दिशा में यात्रा करने से सम्मुख शुक्र लगता है।

परिघ दण्ड (Parigh Dand)

ज्योतिषशास्त्र कहता है कि यात्रा सफल और अनुकूल फलदायी हो इसके लिए मुहुर्त का विचार करते हुए परिघ दण्ड का भी आंकलन करना चाहिए। परिघ दण्ड का आंकलन किस प्रकार किया जाता है और यह किस प्रकार से यात्रा में शुभाशुभ प्रभाव डालता है आइये इसे समझें, गोचरवश चन्द्रमा घनिष्ठा से आश्लेषा नक्षत्र में भ्रमण करता है तो पूर्व और उत्तर दिशा में यात्रा करना शुभ होता है जबकि दक्षिण व पश्चिम दिशा में अशुभ फल देता है। जब चन्द्रमा मघा से श्रवण नक्षत्र तक गोचरवश जब भ्रमण करता है तब पश्चिम और दक्षिण दिशा में शुभ तथा पूर्व और उत्तर दिशा में अशुभ फल देता है, इसे परिघ दण्ड कहते हैं।

योगिनी निवास (Yogni Niwas)

ज्योतिषशास्त्र मे बताया गया है कि यात्रा में सम्मुख और बांयी तरफ की योगिनी से बचना चाहिए.  दाहिने और पीछे की योगिनी शुभ मानी जाती है.  योगिनी का निवास अलग अलग तिथियों मे अलग अलग दिशा में होता है, आइये देखें कि योगिनी किस तिथि को किस दिशा में रहती है।

    1.पूर्व दिशा में योगिनी का निवास प्रतिपदा और नवमी तिथि को रहता है।

    2. तृतीया और एकादशी तिथि को योगिनी आग्नेश दिशा में निवास करती है।

    3.पंचमी और त्रयोदशी तिथि को योगिनी दक्षिण दिशा में निवास करती है। 4.चतुर्थी और द्वादशी तिथि को योगिनी नैऋत्य दिशा में निवास करती है।

    5.षष्टी और चतुर्दशी तिथि को योगिनी पश्चिम में रहती है.

    6.सप्तमी और पूर्णिमा को योगिनी वायव्य दिशा में वास करती है।

    7.द्वितीया और दशमी तिथि के दिन योगिनी उत्तर दिशा में विचरण करती है।

    8.अष्टमी और अमावस के दिन योगिनी का निवास ईशान यानी उत्तर पूर्व में रहता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यात्रा में सम्मुख और बॉयी तरफ की योगिनी से बचना चाहिए। दाहिने और पीछे की ओर योगिनी शुभ मान जाती है।

तारा शुद्धि (Tara Sudhhi)

आप यात्रा पर जा रहे हैं तो इस बात का ख्याल रखें कि जिस नक्षत्र में आपका जन्म हुआ है उससे पहला, तीसरा, पांचवां, सातवां, दशवां, बारहवां, चौदहवां, सोलवां, उन्नीसवां, इक्कीसवां, तेइसवां और पच्चीसवां नक्षत्र हो तो उस दिन यात्रा नहीं करें । ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इन नक्षत्रों में यात्रा करना नुकसानदेय हो सकता है। अगर आप इन नक्षत्रों का यात्रा में त्याग करें तो उत्तम रहता है इससे आपको तारा दोष से नहीं लगता है, इसे तारा शुद्धि के नाम से भी जाना जाता है

चन्द्र शुद्धि (Chandra Sudhhi)

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यात्रा पर निकलने से पहले चन्द्रमा की शुद्धि का भी विचार करना चाहिए  आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में था उस राशि से तीसरा, छठा, दसमा, ग्यारहवां, पहला और सातवें राशि में अगर चन्द्र है तो यह शुभ होता है। यात्रा के दिन अगर चन्द्रमा गोचरवश चतुर्थ, अष्टम अथवा द्वादश राशि में हो तो यात्रा स्थगित कर देना चाहिए, इससे चन्द्र दोष नहीं लगता है

घात (Ghat)

ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी राशि के अनुसार जो घात मास आता है उसका यात्रा के समय विशेष रूप से त्याग करना चाहिए मान लीजिए व्यक्ति की राशि सिंह है तो उसके लिए फाल्गुन मास, शनिवार मकर राशि का चन्द्रमा, मूल नक्षत्र तथा घनिष्ठा नक्षत्र का प्रथम चरण व तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथि यात्रा के लिए शुभ नहीं माना जाता। इस राशि के जातक को मकर लग्न में भी यात्रा से बचना चाहिए अन्यथा घात लगता है। इसी प्रकार से अन्य राशियों के जातक को भी घात का आंकलन करके यात्रा करना चाहिए।

लग्न (Lagna)

यात्रा के लिए आप जिस दिशा में जाना चाहते हैं, उस दिशा से सम्बन्धित लग्न या राशि के होने पर लाभदायक स्थिति रहती है इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं, यदि कोई व्यक्ति पूर्व दिशा की यात्रा करना चाहता है तो मेष, सिंह, धनु राशी का लग्न एवं राशि शुभफलदायक रहती है। इसी प्रकार दक्षिण दिशा में यात्रा करने के लिए वृष, कन्या व मकर एवं पश्चिम दिशा में यात्रा करने के लिए मिथुन, तुला एवं उत्तर दिशा में यात्रा करने के लिए कर्क, वृश्चिक एवं मीन लग्न व राशि उत्तम होता है। जिस व्यक्ति का जो लग्न एवं राशि होती है यदि यात्रा के लिए वही लग्न व राशि का प्रयोग किया जाए तो वह भी अनुकूल फल देता है in  यहां इस तथ्य को समझने के लिए हम एक उदाहरण देख सकते हैं, मान लीजिए किसी व्यक्ति का लग्न मेष एवं राशि धनु है, यदि वह व्यक्ति मेष लग्न और धनु राशि या धनु लग्न और धनु राशि या धनु लग्न और मेष राशि में यात्रा करता है तो यात्रा में सफलता मिलने की संभावना अधिक रहती है।यात्रा के संदर्भ में वर्गोत्तर लग्न और वर्गोत्तम चन्द्र अनुकूल रहता है  ऐसे में यदि केन्द्र (1,4,7,10 एवं त्रिकोण (5,9) में शुभ ग्रह तथा 3,6,11भाव में पाप ग्रह हों तो अत्यंत शुभ होता है।

यात्रा निषेध प्रथम (Travel ban first)

1.यात्रा के मुहुर्त के संदर्भ में बताया गया है कि कुम्भ लग्न और कुम्भ लग्न का नवमांश यात्रा के लिए त्याज्य है, अर्थात इस स्थिति यात्रा नहीं करनी चाहिए

2.जन्म लग्न से आठवां लग्न या जन्म राशि से आठवीं राशि का लग्न त्यागने योग्य होता है 

3.ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यात्रा के समय प्रथम, षष्टम, अष्टम और द्वादश भाव में चन्द्रमा हो तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिए।

4.लग्नेश अगर षष्टम, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में है तो यात्रा नहीं करनी चाहिए।

5.सप्तम भाव में शुक्र एवं दशम भाव में शनि हो तो यह स्थिति भी यात्रा के लिए शुभ नहीं मानी जाती है फलत: यात्रा से बचना चाहिए 

यात्रा के सम्बन्ध में अगर आप इन पांच निषेधों का पालन करें तो यात्रा में आने वाली समस्याओं से आप बच सकते हैं।

यात्रा निषेध द्वितीय (Travel ban II)

1.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यात्रा के मुहुर्त के संदर्भ में बताया गया है कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष में यात्रा नहीं करनी चाहिए

2.जिस महीने में एक भी संक्रान्ति नहीं हो उसे क्षय मास कहते हैं और जिसमें दो संक्रांति हो उसे अधिक मास कहते हैं। ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार यात्रा की दृष्टि से ये दोनों ही मास अशुभ होते हैं अत: इस मास में यात्रा नहीं करनी चाहिए।

3.आषाढ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक यात्रा स्थगित रखनी चाहिए 

4.यात्रा मुहुर्त के संदर्भ में आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद मासों का त्याग करना चाहिए यानी इन मासों मे यात्रा से बचना चाहिए।

5.सूर्य जब मिथुन,कन्या, धनु, मीन राशि में हो तब आपको लम्बी दूरी की यात्रा से यात्रा बचना चाहिए।

6.सूर्य जब वृष, सिंह या वृश्चिक राशि में हो तब आपको जलमार्ग से यात्रा नहीं करनी चाहिए।

यात्रा के संदर्भ में बताये गये निषेधों और पूर्व भागों में बताये गये नियमों का पालन करें तो संभव है कि आपकी यात्रा पूर्णत: सफल रहेगी और यात्रा से आपको अनुकल लाभ मिलेगा।

वस्तु या चीज खरीदने बेचने का मुहूर्त

वस्तु क्रय हेतु मुहूर्त चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा , रेवती, रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित नक्षत्रों में 4, 9, 14 तिथियों को मंगलवार एवं कुंभ लग्न को छोड़कर अन्य तिथि, दिन व लग्नों में चंद्रमा और शुक्र लग्न में हो एवं 8, 12 स्थानों से पापग्रह न हो एवं 2, 10, 11 स्थानों में शुभ ग्रह हो तो वस्तु बेचना या खरीदना दोनों शुभ है।वस्तु विक्रय हेतु मुहूर्त पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ़, विशाखा, कृतिका, आश्लेषा, भरणी, नक्षत्रों में कुंभ लग्न को छोड़कर किसी भी लग्न के 1, 4, 5, 7, 9, 10, के स्थान में शुभ ग्रह हो, 3, 6, 11 स्थान में अशुभ ग्रह हो, ऐसे लग्न में 1, 2, 5, 10, 11 एवं कृष्ण पक्ष की 1,2,5 तिथियों को वस्तु विक्रम करना श्रेयस्कर है।तीनों पूर्वा, विशाखा, भरनी, कृतिका, अश्लेषा, नक्षत्र तथा शुभ दिन शुक्र, गुरु, सोमवार, बुधवार, आदि इन वारों में वस्तु या चीज को बेचना चाहिये | तथा चित्रा, रेवती, स्वाति, शतभिषा, अश्विनी, धनिष्ठा, श्रवण नक्षत्रों में एवं और गुरूवार, शुकवार, सोमवार, बुधवार, इन वारों में वस्तु या चीज खरीदना चाहिये यह शुभ रहता है | सोम पुष्य नक्षत्र में खरीददारी विष्णुजी के प्रिय मास में लक्ष्मी की उपासना एवं कामना करने वालों के लिए इस मास में पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र का विशेष फल है।

शनि-पुष्य नक्षत्र का शुभ संयोग यह दिन खरीददारी और नए काम शुरू करने के लिए अतिशुभ माना गया है। गुरु, शुक्र और मंगल ग्रह के स्वग्रही होने से पुष्य नक्षत्र की महत्ता बढ़ गई है। ज्योतिषी के मुताबिक पुष्य नक्षत्र में गहने खरीदना सोने में सुहागा होगा।

शनिवार को पुष्य नक्षत्र का शुभ संयोग है, जो कि खरीददारी के लिए काफी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि शनि-पुष्य नक्षत्र में खरीदी हुई वस्तु का उपयोग काफी शुभ व फलदायी होता है, इसलिए बहुत से लोग शुभ कार्यों और खरीददारी के लिए इस शुभ नक्षत्र का इंतजार करते हैं।

पुष्य नक्षत्र : राशिनुसार खरीदें शुभ वस्तुएं

मेष : प्रापर्टी, औषधि, गृह उपयोगी सामग्री।

वृषभ : आभूषण, सुगंधित पदार्ध व वस्त्र।

मिथुन : वस्त्र, अन्ना, इलक्ट्रॉनिक, वस्तुएं।

कर्क : बहीखाते, भोज्य सामग्री, डायरी व पेन।

सिंह : सोना-चांदी, हीरा मोती सहित बहुमूल्य धातु, रत्न व इलेक्ट्रॉनिक उपकरण।

कन्या : रत्न, कम्प्यूटर, प्रिंटर स्टेशनरी।

तुला : रत्न, परफ्यूम और वाहन।

वृश्चिक : वाहन, खाद्य पदार्थ व वस्त्र।

धनु : स्टेशनरी, स्वर्ण, मोबाइल।

मकर : उपकरण, औषधि, मेवा।

कुंभ : मोबाइल, वाहन, सोना-चांदी और संचार के साधन।

मीन : जवाहरात, कम्प्यूटर, स्टेशनरी आदि।

कुछ मुहूर्त हमेशा शुभ होते हैं:

 1 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

2 ‑वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया)

3 ‑आश्विन शुक्ल दशमी (विजय दशमी)

4 ‑दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग।

भारत वर्ष में इनके अतिरिक्त लोकचार और देशाचार के अनुसार निम्नलिखित तिथियों को भी स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना जाता है-

1 ‑भड्डली नवमी (आषाढ़ शुक्ल नवमी)

2 ‑देवप्रबोधनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी)

3 ‑बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी)

4 ‑फुलेरा दूज (फाल्गुन शुक्ल द्वितीया)

इनमें किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है। परंतु विवाह इत्यादि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्तों को ही स्वीकार करना श्रेयस्कर रहता है।

नींव धरने का मुहूर्त (Lay the foundation of the moment)

नींव रखना : रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा एवं श्रवण नक्षत्र में मकान की नींव रखनी चाहिए।गृह आरम्भ करने या नींव धरने  के लिए शुभ तिथि , वार, नक्षत्र, लग्न आदि निम्न प्रकार से हैं :

शुभ महीने : श्रावण , वैशाख, कार्तिक, मार्गशीर्ष, फाल्गुन मास नींव धरने के लिए उत्तम रहते हैं

शुभ तिथियाँ : उपरोक्त सभी महीनों की शुभ तिथि , , , , , , १०, ११, १२, १२, एवं पूर्णिमा  तिथि नीवं धरने के लिए शुभ रहती हैं |

 शुभ वार : सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, व् शनिवार, आदि उत्तम रहते हैं |

शुभ नक्षत्र : मृगशिरा, रेवती, शतभिषा, चित्रा, पुष्य, अनुराधा, रोहिणी, तीनो उत्तरा, हस्त, स्वाति व् धनिष्ठा नक्षत्र उत्तम रहते हैं |

शुभ लग्न : वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ, आदि की स्थिर लग्न | उपरोक्त सभी घटकों में नींव धरना या गृह आरम्भ करना शुभ रहता है |

गृह प्रवेश उत्तरायण काल में शुभ रहता है | गृह प्रवेश वैशाख , ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष, माघ,एवं फाल्गुन मास , इन सभी महीनों की २, , , , , १०, ११, १३, एवं पूर्णिमा तिथि व् सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, व् शनिवार, शुभ रहते हैं | शुभ नक्षत्र : रोहिणी, मृगशिरा, तीनो, उत्तरा, चित्रा, अनुराधा, व् रेवती, तथा जन्म लग्न से ३, , १०, ११ वें पड़ने वाली स्थिर लग्न शुभ रहती हैं |

प्राचीनकाल से ही मानव जाति के मन में नियति के गूढ़ रहस्यों को भेदकर अपने भविष्य को जान लेने की लालसा रही है। इसी लालसा ने ज्योतिष विद्या को जन्म दिया। मानव ने ग्रहों की चालों का सूक्ष्म अध्ययन कर भौतिक और मानव जीवन में घटित होने वाली घटनाओं पर, उनके प्रभाव को जानने का यत्न किया।

 इसी क्रम में उसने अनुभव किया कि ग्रहों के साथ-साथ अंक भी जीवन जीवन की घटनाओं को प्रभावित करते हैं। अंकों के रहस्य और शक्ति को जानने का प्रयास हजारों वर्षों से होता रहा है।

    गृहारम्भ विचार-घर बनाने का आरम्भ करने के लिए सूर्य के' नक्षत्र से सात नक्षत्रअशुभ, आगे के ग्यारह तक्षत्र शुभ और इससे आगे के दस नक्षत्र अशुभ माने गये हैं। इसगणना में अभिजित् भी सम्मिलित है।

   

    घर के लिए दरवाजे का विचार-कुम्भ राशि के सूर्य के रहते फाल्गुन महीने में,कर्क और सिंह राशि के सूर्य के रहते श्रावण महीने तथा मकर राशि में सूर्य के रहते पौपमहीने में घर बनवायें तो उस घर का दरवाजा पूर्व या पश्चिम दिशा में शुभ होता है। मेकव वृष राशि में सूर्य के रहते वैशाख महीने में तथा तुला व वृश्चिक राशि में सूर्य रहते अगहनमहीने में घर बनवायें तो उसका दरवाजा उत्तर या दक्षिण दिशा में शुभ होता है।

    पूर्णमासी से लेकर कृष्णाष्टमी पर्यन्त पूर्व दिशा में, कृष्णपक्ष की नवमी से लेकरचतुर्दशी पर्यन्त उत्तर दिशा में, अमावस्या से लेकर शुक्लाष्टमी पर्यन्त पश्चिम दिशा में औरशुक्लपक्ष की नवमी से शुक्लपक्ष की चतुर्दशी पर्यन्त दक्षिण दिशा में बनाया हुआ घर काद्वार शुभ नहीं होता। द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी और द्वादशीमें बनाया हुआ द्वार शुभ होता है। दरवाजे का निर्माण शुक्लपक्ष में करने से शुभफल औरकृष्णपक्ष में करने से अनिष्टफल होता है। कृष्णपक्ष में द्वार का निर्माण करने से चोरी होनेकी आशंका सर्वदा बनी रहती है।

    जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उससे चार नक्षत्र सिर-उत्तमांग में स्थापित करे। इननक्षत्रों में घर का दरवाजा लगाया जाये तो लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसके पश्चात् आगे

    के आठ नक्षत्र चारों कोनों में स्थापित करना चाहिए। इन नक्षत्रों में दरवाजा लगाने से घर उजाड़ हो जाता है। इसके पश्चात आगे के आठ नक्षत्र शाखा-बाजुओं में स्थापित करनात चाहिए। इन नक्षत्रों में घर का दरबाजा लगाने से सुख, सम्पत्ति और वैभव की प्राप्ति होती है। इसके आगे के तीन नक्षत्र देहली में और उससे आगे के चार नक्षत्र मध्य में स्थापित करने चाहिए। देहली बाले नक्षत्रों में दरवाजा लगाने से स्वामी का मरण और मध्यवाले नक्षत्रोंत में दरवाजा लगाने से सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।
    
    गृहारम्भ में निषिद्धकाल-गृहारम्भकाल में यदि सूर्य निर्वल, अस्त या नीच स्थानमें हो तो घर के स्वामी का मरण; यदि चन्द्रमा अस्त या नीच स्थान में हो अथवा निर्वलहो तो उसकी स्त्री का मरण होता है। यदि बृस्पति निर्वल, अस्त या नीच स्थान में होतो सुख का नाश; यदि शुक्र निर्वल, अस्त या नीच स्थान में हो तो धन का नाश होताहै। गृहारम्भकाल में चन्द्रमा का नक्षत्र या वास्तु का नक्षत्र घर के आगे पड़ता हो तो उसघर में स्वामी की स्थिति नहीं होती और पीछे पड़ता हो तो उस घर में चोरी होती है। जिसनक्षत्र में चन्द्रमा स्थित हो, वह चन्द्र नक्षत्र कहलाता है।गृह की आयु-जिस गृह के निर्माण के समय बृहस्पति लग्न में, सूर्य छठे स्थान में,बुध सातवें स्थान में, शुक्र चतुर्थ स्थान में और शनि तीसरे स्थान में स्थित हो उस घर कीआयु सौ वर्ष की होती है। जिस घर के आरम्भ में शुक्र लग्न में, सूर्य-तीसरे स्थान में, मंगलछठे स्थान में और बृहस्पति पाँचवें स्थान में स्थित हो. तो उसकी आयु दो सौ वर्ष होतीहै। जिसके आरम्भकाल में शुक्र लग्न में, बुध दशम में, सूर्य एकादश में और बृहस्पति केन्द्रमें हो उस घर की आयु एक सौ पच्चीस वर्ष होती है। उच्चराशि का गुरु केन्द्र में स्थितहो और अन्य ग्रह पूर्ववत् स्थित हों तो तीन सौ वर्ष की आयु होती है। गुरु, शुक्र, चन्द्रमाऔर बुध उच्चराशि के होकर चतुर्थभाव में शुभग्रहों से दृष्ट हों तो घर की आयु दो सौवर्ष से अधिक होती है। शुक्र मूलत्रिकोण या उच्चराशि का होकर चतुर्थ भाव में अवस्थितहो तो गृहस्वामी सुखी और सन्तुष्ट रहता है तथा घर सौ वर्षों से अधिक काल तकसुदृढ़ बना रहता है। जिस घर के आरम्भ में बृहस्पति चतुर्थ स्थान में, चन्द्रमा दसवें स्थानमें और मंगल-शनि एकादश स्थान में स्थित हों तो उस घर की आयु अस्सी वर्ष की होतीहै।
    जिस गृह के आरम्भ में कोई भी ग्रह शत्रु के नवांश में स्थित होकर लग्न, सप्तमया दशम में स्थित हो तो वह घर एक-दो वर्षों में ही दूसरे के हाथ में बेच दिया जाता है।पिण्डसांधन तथा आय-वार-आयु आदि विचार-गृहपति के हाथ प्रमाण घर की लम्बाई और चौड़ाई को गुणा कर गृहपिण्ड निकाल लेना चाहिए। इस पिण्ड को नौ स्थानों     में स्थापित कर क्रमशः १, २, ६, ८, ३, ८, ८, ४ और ८ से गुणा कर गुणनफल में ८,
    ७, १२, ८, २७, १५, २७ और १२० का भाग देने पर शेष क्रमशः आय, वार, अंश,
    द्रव्य, ऋण, नक्षत्र, तिथि, योग और आयु होते हैं। यदि वहुत ऋण और अल्प द्रव्य हो तो
    गृह अशुभ होता है। गृह की आयु भी उक्त क्रमानुसार जानी जा सकती है।
    जाता है।सुविधा के लिए 'देर्ष्य विस्तार आय आदि वोधक चक्र' पृष्ठ ४१७ के सामने दिया
    चक्र का विवरण-इस चक्र द्वारा आय, वार, अंश, धन (द्रव्य), ऋण, नक्षत्र, तिथि,योग और आयु निकालने का उद्देश्य यह है कि विषम आयवाला गृह शुम और समआयवाला दुख देनेवाला होता है। सूर्य और मंगल के वार, राशि अंशवाले घर में अग्न काभय रहता है। अतः ये त्याज्य और अन्य ग्रहों के वार, राशि और अंश ग्रहण करने योग्यहैं। इसी प्रकार अधिक धन और न्यून ऋणवाला घर शुभ तथा न्यून धन (द्रव्य) और अधिकऋणवाला घर अशुभ होता है। नक्षत्र जानने का प्रयोजन यह है कि मकान के नक्षत्र सेगृहारम्भ के दिन नक्षत्र तक तथा स्वामी के नक्षत्र तक जिनकी जितनी संख्या हो, उसमेंनौ का भाग देने से यदि १।३।५।७ शेष रहें तो मकान अशुभ और युदि २।४।६।८।० शेषरहे तो मकान शुभ होता है। तिथि का प्रयोजन शुभाशुभत्व की जानकारी प्राप्त करना है।यदि चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या इनमें से कोई तिथि आती हो तो गृह अशुभ-होता है। शेष तिथियों के आने पर घर को शुभ समझा जाता है। योग के सम्बन्ध में भीयह ध्यान रखना चाहिए कि अतिगण्ड, शूल, विष्कम्भ, गण्ड, व्याघात, वज्ञ, व्यतीपात औरवैधृति नितान्त अशुभ हैं। शेष योग प्रायः शुभ हैं। आयु का तात्पर्य स्पष्ट है कि अधिकदिन रहनेवाला मकान शुभ और कम दिन रहनेवाला अशुभ होता है।
    स्वामी के नक्षत्र से विचार करने का अभिप्राय यह है कि स्वामी तथा घर का यदिएक ही नक्षत्र हो तो मृत्यु होती है, परन्तु यदि राशि एक न हो तो यह दोष नहीं आताहै। यहाँ नाड़ी वेध को दोषकारक नहीं माना गया है।
    इस संदर्भ में राशि ज्ञात करने की विधि यह है कि अश्विनी, भरणी और कृत्तिकानक्षत्र.की मेष राशि; मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी की सिंह राशि तथा मूल, पूर्वाषाढ़ाऔर उत्तराषाढ़ा की धनु राशि होती है और शेष नक्षत्रों में उचित क्रम से नौ राशियों कीअवस्था अवगत कर लेनी चाहिए।
    आय, वार, नक्षत्र, तिथि और योग में क्रमशः ध्वज, धूम, सिंह, श्वान, गाय, गर्दभ,हस्ति और काक; रवि, सोम, भौम, बुध, गुरु, शुक्र और शनि; अश्विनी, भरणी, कृत्तिका,रोहिणी, मृगशिरा, आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफालुनी, हसत,चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा,शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती; प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी,षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और     पूर्णिमा-अमावस्या एवं विष्कम्भ, प्रीति, आयुष्मान्, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति,शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज, सिद्धि,व्यतीपात, वरीयान, परिध, शिव, सिद्धि,साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र और वैधृत्ति अवगत करना चाहिए। पिण्ड द्वारा घर काशुभाशुभत्व पूर्णतया जाना जा सकता है।
    गृह-निर्माण के लिए सप्तसकार योग-शनिवार, स्वाती नक्षत्र, सिंहलग्न, शुक्लपक्ष,सप्तमी तिथि, शुभयोग और श्रावण मास में गृहनिर्माण करने से हाथी, घोड़ा, धन-सम्पत्तिकी प्राप्त के साथ पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि होती है। उक्त योग सप्तसकार योग कहलाताहै। इसमें गृह-निर्माण करने का उत्तम फल बताया गया है। गृह-निर्माण प्रायः शुक्लपक्ष मेंश्रेष्ठ होता है, कृष्णपक्ष में गृह-निर्माण करने से चोरी का भय रहता है। श्रावण, वैशाख औरअगहन के महीने गृह-निर्माण के लिए उत्तम माने गये हैं।
    शल्य-शोधन-गृहनिर्माण की भूमि को शुद्ध कर लेना आवश्यक है। अतः सर्वप्रथमउस्स भूमि-गृहनिर्माणवाली भूमि, से शल्य-हड्डी को निकालकर बाहर कर देना चाहिए। शल्यअबगत करने की विधि ज्योतिष शास्त्र में कई प्रकार से बतलायी गयी है। गृहनिर्माणकरनेवाला व्यक्ति जब सामने आये और प्रश्न करे तो उसके प्रश्नाक्षरों की संख्या को दूनाकर लेना चाहिए। मात्राओं को चार से गुना कर पूर्वोक्त गुणनफल में जोड़ देना चाहिए।इस योगफल में नौ का भाग देने से विषम-१।३।५।७ शेष रहे तो शल्य-हड्डी भूमि में रहतीहै और सम-२।४।६।८ शेषं रहे तो भूमि निःशल्य-अस्थि-रहित होती है। प्रश्नाक्षरों के लिएपुष्प, देव, नदी एवं फल का नाम पूछना चाहिए।
    शल्य का अस्तित्य रहने पर यदि प्रश्नाक्षरों में पहला अक्षर व हो तो शल्य पूर्व भागमें होता है। पूर्व भाग में भी नौवाँ भाग समझना चाहिए। इस भूमि में डेढ़ हाथ खोदने सेमनुष्य की अस्थि प्राप्त होती है। कवर्ग के अन्तर रहने से अग्निकोण में दो हाथ नीचे गधेकी अस्थि निकलती है। चवर्ग के अक्षर रहने पर दक्षिण में कमर-भर भूमि खोदने पर मनुष्यका शल्य रहता है। तवर्ग के प्रश्नाक्षर होने से नै्ऋत्य कोण में कुत्ते का शल्य डेढ़ हाथ नीचेनिकतता है। स्वर वर्ण प्रश्नाक्षर होंने पर पश्चिम भाग में डेढ़ हाथ नीचे बच्चे की अस्थिनिकर ती है। ह प्रश्नाक्षर रहने पर वायव्य कोण में चार हाथ नीचे खोदने पर केश, कपाल,अस्थि, रोम आदि पदार्थ मिलते हैं। श प्रश्नाक्षर होने से उत्तर में एक हाथ नीचे खोदनेसे ब्राद्यण का शल्य उपलब्ध होता है। पदर्ग के प्रश्नाक्षर होने से ईशान कोण में डेढ़ हाथनीचे खोदने पर गाय की अस्थियाँ मिलती हैं। य प्रश्नाक्षर होने पर मध्य भाग में छाती-भरजमीन खोदने पर भस्म, लोहा, कपास. आदि.पदार्थ मिलते. हैं। मतान्तर से ह य प वर्णप्रश्नाक्षर होने से मध्य भाग में शल्य उपलब्ध होता है।
    शल्योद्धार के सम्बन्ध में विशेष जानकारी अहिबलचक्र के द्वारा प्राप्त करनी चाहिए।भूमि-की श्रेष्ठता अवगत करने के लिए सन्ध्या समय एक हाथ लम्बा, चौड़ा और गहरा गड्ढाखोदकर जल से भर देना चाहिए। प्रातःकाल उस गड्ढे में जल शेष रह जाय तो शुभ,निर्जल चौकोर भूमि, दिखाई पड़े तो मध्यम और निर्जल फटा हुआ गड्ढा मिले तो जमीनको अशभ समझना चाहिए। इस विधि को देश-काल के अनुसार ही प्रयोग में लाना श्रेयरकरहोता है।
    नूतन गृहप्रवेश मुहूर्त-उत्तराभाद्रपद,,उत्तराफालगुनी, उत्तराषाढा रोहिणी, मृगशिरा,चित्रा, अनुराधा, रेवती नक्षत्रों में,चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि वारों में और द्वितीया, वृतीया,पंचमी, षर्ष प्तमी शमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में गृहप्रवेश करना श्ुपहै।
    
    जीर्ण गृहप्रवेश मुहूर्त-शतभिषा, पुष्य, स्वाति, धनिष्ठा, चित्रा, अनुराधा, मृगशिर,रेवती, उत्तराफालगुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, नक्षत्रों में, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र,शनि वारों में और द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशीतिथियों में जीर्ण गृहप्रवेश करना शुभ है।
    
    शान्तिक और पौष्टिक कार्य का मुहूर्त-अश्विनी, पुष्य, हस्त, उत्तराफाल्युनी,उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, शतलिषा, पुनर्वसु, स्ववाति,अनुराधा, मधा नक्षत्रों में; रिक्ता (४1९1१४), अष्टमी, पूर्णमासी, अमावस्या तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में और रवि मंगल शनि वारो को छोड़ कर शेष वारो में शान्तिक पौस्टिक कार्य करना शुभ है 

छींक अशुभ नहीं शुभ भी होती है

 यात्रा के समय छींक भी शुभ एवं अशुभ शकुन का संकेत देती है।ज्योतिष शास्त्र के मतानुसार कुछ कार्य ऐसे भी हैं, जिनके करते समय छींक आती है तो अशुभ होते हुए भी शुभ मानी जाती है, जैसे आसन, शयन, शौच, दान, भोजन, औषध सेवन, विद्यारंभ, बीजारोपण, युद्ध या विवाह में जाते वक्त बाईं ओर या पृष्ठ भाग में हुई छींक शुभ होती है -

भोजने शयने दाने आसने वामे पृष्ठे युद्धे औषधसेवने अध्ययने बीजवापे एषु शुभा।

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पंचक

के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि ईंधन एकत्रित नहीं करना चाहिए, इससे अग्नि का भय रहता है।

पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है।

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नए कपड़े पहनें तीन वार कपड़ा पहिरै तीनि बार। बुध बृहस्पत सुक्रवार।

हारे अबरे इतवार। भड्डर का है यही बिचार।।

अर्थात नवीन वस्त्र धारण करने के लिए बुध, बृहस्पति और शुक्रवार का दिन विशेष शुभ होता है। अधिक आवश्यकता पड़ने पर रविवार को भी वस्‍त्र धारण किया जा सकता है, ऐसा भड्डरी का विचार है।

चलत समय नेउरा मिलि जाय। बाम भाग चारा चखु खाय।।

काग दाहिने खेत सुहाय। सफल मनोरथ समझहु भाय।।

अर्थात यदि कहीं जाते समय रास्ते में नेवला मिल जाए, नीलकंठ बाईं ओर चारा मुंह में लिए दिखाई दे और दाहिने ओर खेत में कौवा हो तो जिस कार्य से व्यक्ति निकला है, वह अवश्य सिद्ध होगा।

नारि सुहागिन जल घट लावै। दधि मछली जो सनमुख आवै।।

सनमुख धेनु पिआवै बाछा। यही सगुन हैं सबसे आछा।।

अर्थात यदि सौभाग्यवती स्त्री पानी से भरा घड़ा ला रही हो, कोई सामने से दही और मछली ला रहा हो या गाय बछड़े तो दूध पिला रही हो तो यह सबसे अच्छा शकुन होता है।

पुरुब गुधूली पश्चिम प्रात। उत्तर दुपहर दक्खिन रात।।

का करै भद्रा का दिगसूल। कहैं भड्डर सब चकनाचूर।।

अर्थात भड्डरी कहते हैं कि यदि पूर्व दिशा में यात्रा करनी हो तो गोधूलि (संध्या) के समय, यदि पश्चिम में यात्रा करनी हो तो प्रात:काल, यदि उत्तर दिशा में यात्रा करनी हो तो दोपहर में और यदि दक्षिण की ओर जाना है तो रात में निकलना चाहिए। यदि उस दिन भद्रा या दिशाशूल भी है तो ऐसा करने वाले व्यक्ति को कुछ भी नहीं होगा।

गवन समय जो स्वान। फरफराय दे कान।

एक सूद्र दो बैस असार। तीनि विप्र औ छत्री चार।।

सनमुख आवैं जो नौ नार। कहैं भड्डरी असुभ विचार।।

अर्थात भड्डरी कहते हैं कि यात्रा पर निकलते समय यदि घर के बाहर कुत्ता कान फटफटा रहा हो तो अशुभ होता है। यदि सामने से 1 शूद्र, 2 वैश्य, 3 ब्राह्मण, 4 क्षत्रिय और 9 स्त्रियां आ रही हों तो अशुभ होता है।

भ‍रणि बिसाखा कृत्तिका, आद्रा मघा मूल।

इनमें काटै कूकुरा, भड्डर है प्रतिकूल।।

अर्थात भड्डरी का कहना है कि यदि भरणी, विशाखा, कृत्तिका, आर्द्रा और मूल नक्षत्र में कुत्ता काट ले तो बहुत बुरा होता है।

लोमा फिरि फिरि दरस दिखावे। बायें ते दहिने मृग आवै।।

भड्डर जोसी सगुन बतावै। सगरे काज सिद्ध होइ जावै।।

अर्थात यात्रा पर जाते समय यदि लोमड़ी बार-बार दिखाई पड़े, हिरण बाएं से दाहिने ओर निकल जाए तो व्यक्ति जिन कार्यों के लिए जा रहा होगा, वे सभी सिद्ध हो जाएंगे, ऐसा ज्योतिषी भड्डरी कहते हैं।


सूके सोमे बुधे बाम। यहि स्वर लंका जीते राम।।

जो स्वर चले सोई पग दीजै। काहे क पण्डित पत्रा लीजै।।

अर्थात शुक्रवार, सोमवार और बुधवार को बाएं स्वर में कार्य प्रारंभ करने से सफलता मिलती है। राम ने इसी स्वर में लंका जीती थी। यदि बायां स्वर चले तो बायां पैर आगे निकालना चाहिए। दाहिना चले तो दाहिना पैर आगे निकालना चाहिए। इससे कार्य सिद्ध होता है। ऐसा करने वाले व्यक्ति को पंचांग में विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

सोम सनीचर पुरुब न चालू। मंगल बुद्ध उत्तर दिसि कालू।

बिहफै दक्खिन करै पयाना। नहि समुझें ताको घर आना।।

बूध कहै मैं बड़ा सयाना। मोरे दिन जिन किह्यौ पयाना।।

कौड़ी से नहिं भेट कराऊं। छेम कुसल से घर पहुंचाऊं।।

अर्थात यदि यात्रा पर जाना हो तो सोमवार और शनिवार को पूर्व, मंगल और बुध को उत्तर दिशा में नहीं जाना चाहिए। यदि व्यक्ति बृहस्पति को दक्षिण दिशा की यात्रा करेगा तो उसका घर लौटना संदिग्ध होगा। बुधवार कहता है कि मैं बहुत चतुर हूं, व्यक्ति को मेरे दिन कहीं भी यात्रा नहीं करनी चाहिए; क्योंकि मैं उसको एक कौड़ी से भी भेंट नहीं होने दूंगा। क्षेम-कुशल से उसको घर पहुंचा दूंगा।

त्यागज्य मुहूर्त

गुरू व शुक्र के अस्त, षिषुत्व व वृद्वत्व के दौरान तथा अधिक मास व क्षय मास में ये सारे कर्म न करें।

बावड़ी, तड़ाग, बाग, कुआ, आदि की षुरूआत व प्रतिश्ठा, लम्बे समय के लिए धारण किए जानेवाले व्रत का आरम्भ व उधापन, वधूप्रवेष, महादान-16 महादान, सोमयाग, अश्टका श्राद्व, गोदान, नए अन्न का प्रयोग (आग्रयण), प्याऊ बनवाना या लोकार्पण, पहले पहल का श्रावणी कर्म वेदव्रत अर्थात वैदिक महानाम्नीव्रत, उपनिशद्रवुत आदि। साड छोड़ना। यथोचित समय बीत जाने पर कालतिक्रम में किए जाने वाले जातक कर्म, नामकरण आदि संस्कार।

दीक्षाग्रहण, यज्ञोपवित, विवाह, मुण्डन, प्रथम बार किसी देवस्थान या तीर्थस्थान की यात्रा, संन्यास लेा, अगिनहोत्र का व्रत लेना, पहली बार राजा से मिलन, राज्यभिशेक, प्रथम बार यात्रा, चतुर्मास आरम्भ, समावर्तन, कर्णवेध, नया प्रयोग या परख (परीक्षा)।

मासिक, दैनिक नियम पहले से चला आ रहा हो, अन्यथा निर्दिश्ट समय पर होने वाले कार्य हों तो अस्तादि दोश नहीं लगता है।

सीमन्त, जातकर्म, अन्नप्राषनादि संस्कार निषिचत अवधि पर ही होते है। अत: इन्हे अस्त में भी किया जा सकता है। गया श्राद्व व गोदावरी तीर्थयात्रा इस दैरान भी की जा सकती है।

आभूशण बनवाने का मुहूर्त

त्रिपोश्कर योग में चर, क्षिप्र, धु्रवनक्षत्रों में गहने बनवाए या खरीदें। रत्नजडि़त गहने होे तो तीक्ष्ण व उग्र, नक्षत्रों को छोड़कर (मूल-ज्येश्ठा-आद्र्रा, ष्लेशा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, रहित) षेश 18 नक्षत्रों में रवि, मंगल, वार में 1.8.5 लग्न में बनवाए या खरीदें। यदि मोती का आभूशण लेना हो तो चर, क्षिप्र, धुव, नक्षत्रों में, षुभ राषि व षुभ ग्रह से युक्त लग्न में लें। षस्त्र-निर्माण या क्रय, तीक्ष्ण व उग्र संज्ञक नक्षत्रों में, अषिवनी, मृगषिरा, विषाखा, कृतिका नक्षत्रों में, मंगल, रवि, षनि वार में लें या धरण करें। प्रसंगवष सोने-चादी के बर्तन में प्रथम बार भोजनाराम्भ करने हेतु सोम, बुध, गुरू षुक्र वार में या अमृत योगों में, लघु, मैत्र, धु्रव, मृदु नक्षत्रों में ग्रहण करें।

शपथ लेने का मुहुरत

प्राचीन काल में राज हुआ करते थे। राजगद्दी पर बैठने से पहले राजाओं का राज्याभिषेक होता था, राजा इस अवसर पर जनता की देखभाल अपने पुत्र के समान करने की सौगंध लेते थे, व राष्ट्रहित में कोई भी निर्णय लेने का वादा करते थे।

आज राजतंत्र समाप्त हो चला है और प्रजातंत्र स्थापित हो गया है ऐसे में राजा भले ही न रहे परन्तु शपथ की प्रथा आज भी कायम है। आज चुनाव के पश्चात लोक सभा, विधान सभा, राज्य सभा के सदस्य शपथ ग्रहण करते हैं. इनकी तरह सम्पूर्ण शासनतंत्र में कई ऐसे पद होते हैं जिनके लिये पद और गोपनियता की शपथ लेनी होती है। पद की शपथ लेना बहुत ही शुभ कार्य है, इस शुभ कार्य को शुभ मुहुर्त में करें तो उत्तम रहता है यही ज्योतिषशास्त्रियों का मत है। आप चाहते है कि शुभ मुहुर्त में पद और गोपनियता की शपथ लें तो आपको मुहुर्त आंकलन से सम्बन्धित तथ्यों को समझना चाहिए। आइये जानें कि शपथ ग्रहण करने के लिए कौन सा मुहुर्त अच्छा है और यह मुहुर्त कैसे ज्ञात किया जा सकता है

नक्षत्र विचार (Nakshatra Vicharfor Muhurta for oath) मुहुर्त आंकलन में सबसे पहले नक्षत्रों की स्थिति को देखें, शपथ लेने वाले दिन अगर लघु नक्षत्र यानी अश्विनी, हस्त, पुष्य, अभिजीत हो अथवा मित्र नक्षत्र जैसे मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा या स्थिर नक्षत्र यानी उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा., उत्तराभाद्रपद., रोहिणी, ज्येष्ठा और श्रवण हो तो शुभ होता है.

तिथि विचार (Tithi Nakshatra Vicharfor Muhurta for oath)

मुहुर्त निकालते समय तिथि का भी आंकलन करना चाहिए। रिक्ता तिथि यानी चतुर्थ, नवम, चतुर्दशी शपथ ग्रहण करने के लिए शुभ नहीं माने गये हैं अत: इस तिथि में शपथ नहीं लेना चाहिए। रिक्ता तिथि को छोड़कर नक्षत्र, वार का आंकलन करते हुए किसी भी तिथि में आप शपथ ले सकते

वार विचार(Var Nakshatra Vicharfor Muhurta for oath)

नक्षत्र के साथ यह भी देखना चाहिए कि शपथ वाले दिन कौन सा वार है। अगर वार हो रविवार, बृहस्पतिवार अथवा शुक्रवार तो अच्छा रहता है। ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार उपरोक्त नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो और ये वार हों तो सुंदर स्थिति मानी जाती है.

तिथि विचार (Tithi Nakshatra Vicharfor Muhurta for oath)

मुहुर्त निकालते समय तिथि का भी आंकलन करना चाहिए। रिक्ता तिथि यानी चतुर्थ, नवम, चतुर्दशी शपथ ग्रहण करने के लिए शुभ नहीं माने गये हैं अत: इस तिथि में शपथ नहीं लेना चाहिए। रिक्ता तिथि को छोड़कर नक्षत्र, वार का आंकलन करते हुए किसी भी तिथि में आप शपथ ले सकते

लग्न विचार (Lagna Nakshatra Vicharfor Muhurta for oath)

किसी भी शुभ मुहुर्त का आंकलन करने के लिए नक्षत्र, वार एवं तिथि को देखने के बाद लग्न का विचार अवश्य करना चाहिए। ज्योतिषशास्त्री मानते हैं कि शपथ ग्रहण करने के लिए शीर्षोदय राशि यानी मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक एवं कुम्भ राशि के लग्न उत्तम होते हैं मुहुर्त लग्न में शुभ ग्रह प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम एवं दशम स्थान में हों तथा तृतीय, षष्टम एवं एकादश स्थान में पाप ग्रह हों तो शुभ होता है.

निषेध (Nishedha)

ज्योतिषशास्त्र कहता है, जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में था उस राशि से अगर चतुर्थ, अष्टम या द्वादश राशि में हो तो उस दिन शपथ ग्रहण नहीं करना चाहिए। तारा दोष या भद्रा सहित कोई भी अशुभ योग जिस दिन हो उस दिन शपथ नहीं लें। मुहुर्त लग्न के छठे, आठवें, बारहवें भाव में चन्द्रमा की स्थिति भी राजा की स्थिरता के लिए उत्तम नहीं होती है अत: इन स्थितियों के होने पर भी शपथ ग्रहण नहीं करना चाहिए

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर आप शपथ ग्रहण करें तो आपके लिए बहुत ही शुभ रहेगा।

संगीत हो नृत्य या अभिनय हो अगर आप इसमें सफलता की इच्छा रखते हैं तो इसकी उपासना करनी होती है। भारतीय दर्शन में इन कलाओं को ईश्वर का आशीर्वाद माना जाता है जो बहुत ही भाग्यशाली व्यक्तियों को प्राप्त होता है ।

नृत्य, संगीत एवं कला मुहुरत

ज्योतिषशास्त्री मानते हैं कि जैसे आप किसी भी शुभ कार्य के लिए मुहुर्त देखते हैं उसी प्रकार आपको कला संगीत एवं अभिनय के क्षेत्र में कदम बढ़ाने से पहले मुहुर्त का विचार जरूर करना चाहिए। जानें कि नृत्य, संगीत एवं कला के क्षेत्र में किस मुहुर्त में प्रयास करें ताकि आपको अपने प्रयास में सफलता प्राप्त हो।

नक्षत्र विचार (Consideration of Nakshatra)

जब आप संगीत, नृत्य या अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने जा रहे उस समय देख लें कि नक्षत्र मृगशिरा , रेवती  अनुराधा  हस्त , पुष्य  पूर्वाफाल्गुनी , ज्येष्ठा  और उत्तराषाढ़ा हो क्योंकि यह नक्षत्र संगीत, नृत्य व अभिनय सीखने के लिए अति उत्तम माने गये हैं। मुहुर्त चिन्तामणी  के अनुसार उत्तराफाल्गुनी उत्तराभाद्रपद  और रोहिणी नक्षत्रों को भी शुभ माना गया है।

संगीत/नृत्य एवं अभिनय की शिक्षा प्राप्त करने के लिए जब आप किसी संस्थान में दाखिला लेने जाएं तो पहले यह देख लें उस दिन द्वितीया/तृतीय/पंचमी/षष्टी/दशमी/एकादशी अथवा द्वादशी तिथि हो। इन तिथियों को इस विषय में शुभ माना गया है।

उपरोक्त नक्षत्र एवं तिथि के साथ वार को भी ध्यान में रखना चाहिए। सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार एवं शुक्रवार कला के इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए बहुत ही शुभ माने गये हैं।

जिस दिन गोचरवश चन्द्रमा जन्म के समय जिस राशि में था उस राशि से चतुर्थ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में उपस्थित हो तथा तृतीय भाव, पंचम भाव एवं सप्तम भाव में तारा हो एवं भद्रा या अन्य अशुभ योग नहीं हो तो आप बताएं गये नक्षत्र, तिथि, वार, लग्न का विचार कर शुभ मुहुर्त में संगीत, नृत्य एवं अभिनय प्रशिक्षण हेतु नामांकण करवा सकते हैं।

बट्वारे का मुहुरत

कहा जाता है कि दुनियां में संघर्ष का सबसे बड़ा कारण है सम्पत्ति। सभी व्यक्ति चाहते हैं कि उनके हिस्से में अधिक से अधिक सम्पत्ति आए इसके लिए जब भी सम्पत्ति विभाजन की बात आती है सभी हिस्सेदार अपने अपने स्वार्थ को साधने में जुट जाते हैं, इस परिस्थिति में कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि आपस में कलह, विवाद एवं संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाती है और बात अदालत तक पहु्च जाती है।

ज्योतिष के नज़रिये से देखें तो इस तरह की स्थिति तब पैदा होती है जबकि अशुभ मुहुर्त में बंटवारा किया जाए. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जब सम्पत्ति बंटवारा करना हो उससे पहले मुहुर्त का विचार अवश्य करलें। मुहुर्त का विचार करके बंटवारा करने से शांतिपूर्ण तरीके से विभाजन होता है और इसमें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं आती है। सम्पत्ति के बंटवारे के लिए आपको मुहुर्त का विचार किस प्रकार से करना चाहिए आइये दखें:

नक्षत्र विचार (Consideration of Nakshatra)

जिस दिन सम्पत्ति का बंटवारा करना हो उस दिन यह देखें कि नक्षत्र कौन है  अगर उस दिन हस्त ,अश्विनी पुष्य उत्तराफाल्गुनी  उत्तराषाढ़ा उत्तराभाद्रपद रोहिणी  स्वाती पुनर्वसु  श्रवण , घनिष्ठा , शतभिषा, मृगशिरा चित्रा  और रेवती नक्षत्र हो तो यह बहुत ही शुभ होता है। इन नक्षत्रों को सम्पत्ति विभाजन के लिए श्रेष्ठ कहा गया है।

तिथि विचार(Consideration of Tithi)

किसी भी कार्य में मुहुर्त का आंकलन करने के लिए तिथि की शुभता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। अगर तिथि शुभ नहीं हो तो परिणाम की अनुकूलता में आशंका रहती है, बात जब हो सम्पत्ति के बंटवारे की तो ध्यान रखना चाहिए कि जिस दिन बंटवारा करना हो उस दिन द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी एवं पूर्णिमा में से कोई तिथि विराजमान हो। उपरोक्त तिथियों को इस संदर्भ में उत्तम माना गया है।

वार विचार (Consideration of var)

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सम्पत्ति के बंटवारे के लिए वार का भी आंकलन जरूर कर लेना चाहिए । जिस दिन बताए गये नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो, उपरोक्त तिथियों में से कोई तिथि हो और रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार में से कोई वार हो उस दिन आपको सम्पत्ति का विभाजन करना चाहिए।

इस विषय में ध्यान रखे कि जिस दिन आप सम्पत्ति का बंटवारा कर रहे है उस दिन मुहुर्त में लग्न शुभ हो । अगर स्थिति इस प्रकार की नहीं हो तो बंटवारा करने की न सोचें।

भूमि के लेन-देन के लिए : आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, मूल, विशाखा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में, बृहस्पतिवार, शुक्रवार 1, 5, 6, 11, 15 तिथि को घर जमीन का सौदा करना शुभ है।

नूतन ग्रह प्रवेश : फाल्गुन, बैशाख, ज्येष्ठ मास में, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती नक्षत्रों में, रिक्ता तिथियों को छोड़कर सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार को नये घर में प्रवेश करना शुभ होता है। (सामान्यतया रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराषाढ़ा, चित्रा व उ. भाद्रपद में) करना चाहिए। नूतन गृह प्रवेश का मुहूर्त नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती। वारः सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार। तिथि: 2,3,5,6,7, 10, 11, 12, 13 लग्न: वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ लग्न उत्तम हैं जबकि मिथुन, कन्या, धनु, मीन लग्न मध्यम हैं।

गृहारंभ मुहूर्त नक्षत्रः मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढ़, धनिष्ठा, शतभिषा, चित्रा, हस्त, स्वाति, रोहिणी, रेवती। वारः सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार। मास: वैशाख, श्रावण, माघ, पौष, फाल्गुन। लग्नः वृषभ, मिथुन, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ, मीन। शुभग्रहः गृहारंभ के समय 8 एवं 12 स्थानों में कोई ग्रह नहीं होना चाहिए। लग्न से 1,4,5,7,9, 10, स्थानों में शुभ ग्रह एवं 3, 4, 11 स्थानों में पापग्रह शुभ होते हैं।

पुराने किराए के मकान में प्रवेश का मुहूर्त नक्षत्रः शतभिषा, पुष्य, स्वाति, धनिष्ठा, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढ़, उत्तराफाल्गुनी, रोहिणी। वारः सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार। तिथि: 2,3,5,6,7, 10, 11, 12, 13 मासः कार्तिक मार्गशीर्ष, श्रावण, फाल्गुन, वैशाख एवं ज्येष्ठ मास।

मुखय द्वार स्थापित करना : रोहिणी, मृगशिरा, उ.फाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती में स्थापित करना चाहिए।

मकान खरीदना : बना-बनाया मकान खरीदने के लिए मृगशिरा, आश्लेषा, मघा, विशाखा, मूल, पुनर्वसु एवं रेवती नक्षत्र उत्तम हैं।

कुआं खुदवाना या हैडपंप लगाने का मुहूर्त नक्षत्रः

हस्त, अनुराधा, रेवती, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, शतभिषा, मघा, रोहिणी, पुष्य, मृगशिरा, पूर्वाषाढ़ नक्षत्र कुआं खुदवाने या हैडपंप लगाने के लिए शुभ हैं। वार: बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथि: 2,3,5,7,10, 11, 12, 13, 15 धनिष्ठा, 9

सफलता के लिए उपयोगी शुभ मुहूर्त

जो भी व्यक्ति दुकान खोलते हैं उनकी आशा यही रहती है कि उनकी दुकान खूब चले। परंतु हर व्यक्ति की यह आश पूर्ण नहीं हो पाती है। दुकान खोलने वालों में कई ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें किन्ही कारणों से अपनी दुकान कुछ महीनों में बंद कर देनी पड़ती है ज्योतिषशास्त्री कहते हैं कि अगर आप दुकान खोलते समय मुहुर्त का विचार नहीं करें और अशुभ मुहुर्त में दुकान खोलें तो इस प्रकार की घटनाएं घटती हैं। जब आप दुकान खोलने का विचार मन में लाएं उस समय सबसे पहले मुहुर्त पर अच्छी तरह विचार करलें  । मुहुर्त जब शुभ हो तभी आप दुकान खोलने की सोचें अन्यथा शुभ मुहुर्त के आने की प्रतीक्षा करें। आइये अब देखें कि दुकान खोलने के लिए कौन सा मुहुर्त शुभ है और इस संदर्भ में मुहुर्त किस प्रकार देखना चाहिए।जब आप नया व्यापर/बिजनेस/ दुकान आरम्भ करने का या खोलने का विचार मन में लाएं उस समय सबसे पहले मुहुर्त पर अच्छी तरह विचार करलें । मुहुर्त जब शुभ हो तभी आप दुकान खोलने की सोचें अन्यथा शुभ मुहुर्त के आने की प्रतीक्षा करें। आइये अब देखें कि दुकान खोलने के लिए कौन सा मुहुर्त शुभ है और इस संदर्भ में मुहुर्त किस प्रकार देखना चाहिए। ज्योतिषियों के अनुसार सुखी और खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है कि हर काम की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करें और अशुभ को त्यागें। सुखी और खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है कि हर काम की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करें और अशुभ को त्यागें। सुखी और खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है कि हर काम की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करें और अशुभ को त्यागें।

दुकान खोलने के लिए : हस्त, चित्रा, रोहिणी, रेवती, तीनों उत्तरा, पुष्य, अश्विनी, अभिजित् इन नक्षत्रों में, 4, 9, 14, 30 इन तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में, मंगलवार को छोड़कर अन्य वारों में, कुंभ लग्न को छोड़कर अन्य लग्नों में दुकान खोलना शुभ है। ध्यान रहे कि दुकान खोलने वाले व्यक्ति की अपनी जन्मकुंडली के अनुसार ग्रह दशा अच्छी होनी चाहिए। व्यापार कब आरंभ करे इसके लिए गोस्वामी तुलसीदास अपने रचित ग्रंथ दोहावली मे लिखते हैं की श्रवण,धनिष्ठा,शतभीषा,हस्त,चित्रा,स्वाति,पुष्य,पुनर्वसु,मृगशिरा,अश्विनी,रेवती तथा अनुराधा नक्षत्रो मे आरंभ किया गया व्यापार व दिया गया धन हमेशा धनवर्धक होता हैं जो किसी भी अवस्था मे डूब नहीं सकता अर्थात इन नक्षत्रो मे आरंभ किया गया व्यापार कभी भी जातक को हानी नहीं दे सकता हैं

दुकान प्रारंभ करने का मुहुर्त नक्षत्रः रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाद, उत्तराभाद्रपद, हस्त, पुष्य, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, अश्विनी। वारः सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथिः 4,9,14 ये रिक्त तिथियां एवं अमावस्या छोड़कर बाकी सभी तिधियां।

प्रतिष्ठा मुहूर्त नक्षत्रः अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, रेवती। वारः सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथिः शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया, पंचमी, दशमी, त्रयोदशी और पूर्णिमा एवं कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया और पंचमी तिथियां।

थोक व्यापार हेतु मुहूर्त नक्षत्रः हस्त, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढ़, चित्रा। वारः बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथि: 2,3,5,7,11,13 नौकरी करने का मुहूर्त नक्षत्रः हस्त, चित्रा, अनुराधा, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य। वारः रविवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथि: 2,3,5,7, 11, 13

जब आप नया व्यापर/बिजनेस/ दुकान आरम्भ करने का या खोलने का विचार मन में लाएं उस समय सबसे पहले मुहुर्त पर अच्छी तरह विचार करलें । मुहुर्त जब शुभ हो तभी आप दुकान खोलने की सोचें अन्यथा शुभ मुहुर्त के आने की प्रतीक्षा करें। आइये अब देखें कि दुकान खोलने के लिए कौन सा मुहुर्त शुभ है और इस संदर्भ में मुहुर्त किस प्रकार देखना चाहिए।

1.नक्षत्र विचार —

नया व्यापर/बिजनेस/ दुकान आरम्भ करने का या खोलने के लिए जब मुहुर्त का आंकलन किया जाता है तब सबसे पहले नक्षत्र का विचार किया जाता है। अश्विनी, रोहिणी,मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, पुष्य, हस्त, चित्रा,अनुराधा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वा, भाद्रपदा, रेवती दुकान खोलने के लिए श्रेश्थ,  सभी स्थिर नक्षत्र (Stable Nakshatra) जैसे उत्तराफाल्गुनी (Uttrafalguni) , उत्तराषाढ़ा (Uttrashadha), उत्तराभाद्रपद(Uttra Bhadrapad), रोहिणी (Rohini) तथा सभी सौम्य नक्षत्र (Saumya Nakshatra) जैसे मृगशिरा(Mrigshira), रेवती(Raivti), चित्रा(Chitra), अनुराधा(Anuradha) व लघु नक्षत्र (Laghu Nakshatra) जैसे हस्त(Hast), अश्विनी (Ashwani), पुष्य (Pushya) और अभिजीत नक्षत्रों (Abhijeet Nakshatra ) को दुकान खोलने के लिए शुभ माना जाता है।

2.लग्न विचार—

नया व्यापर/बिजनेस/ दुकान आरम्भ करने का या खोलने के लिए नक्षत्र विचार करने के बाद आप लग्न से विचार करें। ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार जिस समय आप दुकान खोलने जा रहे हैं उस समय मुहुर्त का लग्न बलवान होना चाहिए। लग्न में चन्द्र-शुक्र हो तो यह सर्वोत्तम स्थिति मानी जाती है। लग्न की शुभता का विचार करने के लिए देखें कि लग्न से द्वितीय, दशम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह हो तथा अष्टम व द्वादश भाव में कोई अशुभ ग्रह ना हों। लग्न कुम्भ लग्न में वर्जित, आठवे एवं बाहरवें घर में पाप ग्रह त्याज्य वर्जित दिन महीने के अंतिम दिन, सूर्य संक्रांति के शुरू होने वाले दिन को न खोले

दिन, वर्ष का आखिरी दिन, अमावस्या

3. मास-पक्श-तिथि विचार—

दुकान खालने के लिए जब आप मुहुर्त निकालें उस समय उपरोक्त सभी विषयों पर विचार करने के मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास में वर्जित, पक्ष दोनों पक्ष, साथ ही तिथि द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, पूर्णिमा का भी विचार करना चाहिए। ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार दुकान खोलने के लिए सभी तिथि शुभ हैं परंतु रिक्ता तिथि यानी (चतुर्थ, नवम व चतुर्दशी) अपवाद स्वरूप हैं अत: इन तिथियो में दुकान नहीं खोलना चाहिए.

4.वार विचार—

नया व्यापर/बिजनेस/ दुकान आरम्भ करने का वार सोम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, रविवार का हो ध्यान रखें कि मंगलवार को दुकान नहीं खोलें। मंगल के अलावा आप किसी भी दिन दुकान खोल सकते हैं।

5.निषेध—

जिस दिन गोचरवश चन्द्रमा जन्म के समय जिस राशि में था उस राशि से चतुर्थ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में उपस्थित हो तथा तृतीय भाव, पंचम भाव एवं सप्तम भाव में तारा हो एवं भद्रा या अन्य अशुभ योग हो तो दुकान नहीं खोलना चाहिए

वस्त्र निर्माण हेतु शुभ महूर्त

नवीन वस्त्र परिधान हेतु मुहूर्त हस्त, चित्रा, विशाखा, अनुराधा, स्वाति, अश्विनी, उत्तराषाढ़, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती नक्षत्र एवं रिक्ता तिथि छोड़कर अन्य तिथियों तथा नक्षत्रों में सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार नए वस्त्र परिधान के लिए शुभ हैं। वार शनिवार को छोड़कर सभी दिन शुभ, मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास में वर्जित

पक्ष दोनों किन्तु शुक्ल पक्ष अधिक शुभ तिथियाँ द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, एकादशी द्वादशी, त्रयोदशी, पूर्णिमा, नक्षत्र मृगशिर, रोहिणी, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, चित्रा, अनुराधा, रेवतीलग्न शुभ लग्न

नये-वस्त्र धारण करना : अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, धनिष्ठा, रेवती शुभ हैं।

पशु क्रय विक्रय हेतु शुभ महूर्त

वार मंगलवार त्यागकर सभी वार शुभ

मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास में वर्जितपक्ष शुक्ल पक्ष

तिथियाँ द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्टी, सप्तमी,अष्टमी, एकादशी, त्रयोदशी

नक्षत्र अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, विशाखा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, रेवती

लग्न शुभ लग्न/ केंद्र में शुभ ग्रह / तीसरे, छठे एवं ग्यारहवे भाव में पाप ग्रह शुभ माना गया है

सिनेमा, फिल्म, टी.वी. सम्बंधित कार्य आरम्भ करने हेतु शुभ महूर्त

वार शुक्रवार अति शुभ, बुधवार और गुरूवार सामान्य

मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास त्यागकर

पक्ष कृष्ण पक्ष 1, शुक्ल पक्ष

तिथियाँ द्वितीया, तृतीया, पंचमी, अष्टमी,नवमी, द्वादशी

नक्षत्र भरणी, पुनर्वसु,पुष्य, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी,

पूर्वाषाढ़ा,

मिठाई की दूकान या होटल खोलने हेतु शुभ महूर्त

वार सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार

मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास त्यागकर

पक्षतिथि कृष्ण पक्ष (1, 3,5) शुक्ल पक्ष (2,3,5,7,9,10, 12,13,15)

नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, रेवती

लग्न शुभ लग्न/ गुरु, चन्द्र, शुक्र को प्रधानता / ग्रहण,

व्यातिपात, वैधृति अशुभ

सुगन्धित द्रव्य, फूल, अगरबत्ती, इत्र एवं दूकान खोलने हेतु

वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार

मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास त्यागकर

पक्षतिथि कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष 2,3,5,6, 7,10,11, 12,13,15

नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति,श्रवण,धनिष्ठा, रेवती

लग्न शुभ लग्न/शुक्र, चन्द्र और गुरु बल की श्रेष्ठता को देखना/ त्रिकोण में शुभ ग्रह/ तीसरे, छठे एवं

ग्याहरवें घर में पाप ग्रह

कोई वस्तु/सामान खरीदने के लिए : रेवती, शतभिषा, अश्विनी, स्वाति, श्रवण, चित्रा, नक्षत्रों में वस्तु/सामान खरीदना चाहिए।

कोई वस्तु बेचने के लिए : पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ़ा, कृत्तिका, आश्लेषा, विशाखा, मघा नक्षत्रों में कोई वस्तु बेचने से लाभ होता है। वारों में बृहस्पतिवार और सोमवार शुभ माने गये हैं।

वाहन (गाड़ी) मोटर साइकिल, स्कूटर चलाने का मुहूर्त : अश्विनी, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्रों में सोमवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार व शुभ तिथियों में गाड़ी, मोटर साइकिल, स्कूटर चलाना शुभ है।

कृषि (हल-चलाने तथा बीजारोपण) के लिए : अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा तीनों, अभिजित, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, मूल, धनिष्ठा, रेवती, इन नक्षत्रों में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार को, 1, 5, 7, 10, 11, 13, 15 तिथियों में हल चलाना व बीजारोपण करना चाहिए।

फसल काटने के लिए : भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, मृगशिरा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, हस्त, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठा, मूल, पू.फाल्गुनी, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा तीनों, नक्षत्रों में, 4, 9, 14 तिथियों को छोड़कर अन्य शुभ तिथियों में फसल काटनी चाहिए।

कुआँ खुदवाना व नलकूप लगवाना : रेवती, हस्त, उत्तरा भाद्रपद, अनुराधा, मघा, श्रवण, रोहिणी एवं पुष्य नक्षत्र में नलकूप लगवाना चाहिए।

Bank में धन के लेन-देन, जमा संग्रह आदि के लिए शुभाशुभ

बैंक के फिक्स डिपाजिट करने के लिए तथा बैंक में खाता खोलने के लिए नीचे दिए गए मुहूर्तों को उत्तम माना जाता है। जीवन बीमा तथा वस्तुओं के बीमा के लिए भी इन्हीं मुहूर्तों में ही आवेदन पत्र पर हस्ताक्षर करना अच्छा होता है। कृष्णपक्ष की द्वितीया, तृतीया, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी तथा एकादशी, द्वादशी तिथियों तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया, तृतीया, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी तथा त्रयोदशी तिथि हो तथा इन तिथियों में सोमवार, वीरवार या शनिवार हो साथ ही अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य हस्त, चित्रा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा तथा रेवती आदि में से कोई भी एक नक्षत्र हो तो ऐसे मुहूर्त में जोड़ा गया धन शुभ परिणाम देता है।

ब्याज कमाने के उद्देश्य से जब कोई व्यक्ति, संस्था या साहूकार रुपया उधार देता है तब उसे भी कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, उभयपक्षों की द्वितीया, तृतीया, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की त्रयोदशी एव पूर्णिमा तिथि का ही उपयोग करना चाहिए। उपरोक्त तिथियों में अश्विनी, पुनर्वसु, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा तथा रेवती आदि में से कोई एक नक्षत्र हो तो बहुत ही अच्छा माना जाता है। शनिवार, वीरवार, शुक्रवार तथा सोमवार का दिन उधार या ऋण देने के लिए अच्छा माना जाता है।

ब्याज लेन देन का शुभ महूर्त य धन-आदान प्रदान का मुहूर्त

ऋण लेने-देने के लिए : मंगलवार, संक्रांति दिन, हस्त वाले दिन रविवार को ऋण लेने पर ऋण से कभी मुक्ति नहीं मिलती। मंगलवार को ऋण वापस करना अच्छा है। बुधवार को धन नहीं देना चाहिए। कृत्तिका, रोहिणी, आर्द्रा, आश्लेषा, उत्तरा तीनों, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल नक्षत्रों में, भद्रा, अमावस में गया धन, फिर वापस नहीं मिलता बल्कि झगड़ा बढ़ जाता है। इसी प्रकार शेष अन्य नक्षत्रो मे दिया गया,चोरी गया,छीना हुआ अथवा उधार दिया धन कभी भी वापस नहीं आता हैं अर्थात जातक को हानी ही प्रदान करता हैं | एक अन्य श्लोक् मे कहा गया हैं की यदि रविवार को द्वादशी,सोमवार को एकादशी,मंगलवार को दशमी,बुधवार को तृतीया,गुरुवार को षष्ठी,शुक्रवार को द्वितीया तथा शनिवार को सप्तमी तिथि पड़े तो यह तिथिया सर्व सामान्य हेतु हानिकारक बनती हैं अर्थात आमजन को इन तिथियो मे नुकसान ही होता हैं | अत: इन तिथियो मे कोई बड़ा सौदा अथवा लेन-देन नहीं करना चाहिए |

जातक की अपनी राशि से जब चन्द्र का गोचर 3,6,12 भावो से होता हैं तब जातक को अवस्य ही दुख तकलीफ,धनहानी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं इसी प्रकार जब मेष राशि के प्रथम,वृष के पंचम,मिथुन के नवे,कर्क के दूसरे,सिंह के छठे,कन्या के दसवे,तुला के तीसरे,वृश्चिक के सातवे,धनु के चौथे,मकर के आठवे,कुम्भ के ग्यारहवे,तथा मीन के बारहवे चन्द्र होतो जातक हेतु घातक प्रभाव होता हैं जिससे जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होते हैं अत: इन इन दिनो जातक को विशेष सावधान रहना चाहिए |

स्वाती, पुनर्वसु, चित्रा, अनुराधा, मृगषिरा, रेवती, विषाखा, पृश्य, श्रवण, धनिश्ठा, षतभिशा, अषिवनी इन 11 नक्षत्रों में चर, लग्नों में, 5.9.8 भावों में षुभ ग्रह हों, पापी न हों तो धन देना, ऋण देना,कर्ज चुकाना, निवेष करना षुभ है। मनगलवार, संक्रानित दिन, वृद्वि योग, हस्त नक्षत्र व रविवार हस्तार्कयोग में कभी ऋण न लें। ऐसा ऋण पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है, चुकता नही होता। अपि च बुधवार को पैसा उधार या निवेष के मद में भी नही देना चाहिए। लेकिन मंगलवार, संक्रानित आदि में कर्ज चुकाना उत्तम होता है।वार मंगलवार को छोड़कर सभी दिन शुभ मासपक्ष दोनों पक्ष, नक्षत्र भरणी, कृतिका, अश्लेशा, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, विशाखा, लग्न विशेष मंगलवार को ऋण चुकाना शुभ माना जाता है. बुधवारको ऋण देना ठीक नहीं मन जाता.धन के लेन-देन, जमा संग्रह आदि के लिए

बुधवार के दिन  ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक दिन का संबंधित ग्रहों की सत्ता और उनकी सौरमण्डल में उपस्थिति पर आधारित है। बुधवार का दिन बुध देव को समर्पित है। बुध देव बुद्धि और चतुराई के दाता हैं। जीवन में सफलता पाने के लिए बुद्धि और चतुराई का समावेश होना अत्यंत आवश्यक है। कारोबार एवं अच्छा पद ही जीवन में सफलता की राह बनाता है। इसलिए बुधवार के दिन कौनसे कार्य करने से लाभ होगा इसके बारे में पता होना आवश्यक है। मंगलवार, संक्रांति का दिन, संक्रांति युक्त रविवार का दिन, मूल, आद्र्रा, ज्येष्ठा, विशाखा, कृत्तिका, धु्रवसंज्ञक नक्षत्र अर्थात उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा तथा उत्तराभाद्रपद एवं रोहिणी आदि नक्षत्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

प्लाट क्रय विक्रय मुहूर्त

 भूमि एवं प्लाट खरीदने या बेचने हेतु वैशाख , ज्येष्ठ, अषाढ़ , मार्गशीर्ष, माघ, व् फाल्गुन मास की द्वितीय, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी  व् पूर्णिमा तिथि में बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार, सोमवार, अदि वारों में मृगशिरा, अश्लेशा, मघा, विशाखा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, मूल,  रेवती, उत्तराषाढ़,  उत्तराभाद्रपद, हस्त, चित्रा, स्वाति, शतभिषा, नक्षत्र उत्तम रहते हैं |जमीन खरीदने एवं बेचने हेतु शुभ महूर्तवार गुरु, शुक्र, मास क्षय मास, मल मास, अधिक मास में वर्जित पक्ष दोनों किन्तु शुक्ल पक्ष अधिक शुभ तिथियाँ द्वितीया, पंचमी, षष्टी, दशमी, एकादशी, पूर्णिमा नक्षत्र मृगशिर, पुनर्वसु, अश्लेशा, मघा , विशाखा, अनुराधा, मूल, रेवती लग्न वृषभ, कर्क, वृश्चिक/ केंद्र में शुभ लग्न/ त्रिकोण में शुभ ग्रह/तीसरे, छठे, या ग्याहरवें भाव में पाप ग्रह शुभ फलदायी

मुकदमा दायर करने हेतु मुहूर्त नक्षत्र: ज्येष्ठा, आर्द्रा, भरणी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी, मूल, आश्लेषा, मधा। वार:रविवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथिः 1,5,8,10,13,15

औषधि बनाने हेतु मुहूर्त नक्षत्र: हस्त, अश्विनी, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, पुनर्वसु, स्वाति, मृगशिरा, चित्रा, रेवती, अनुराधा। वारः रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार।

 

मंदिर निर्माण मुहूर्त मासः 

माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष। नक्षत्र: पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, मृगशिरा, श्रवण, अश्विनी, चित्रा, पुनर्वसु, विशाखा, आर्द्रा, हस्त, धनिष्ठा, रोहिणी। वारः रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथि: 2,3,5,7,11,13

प्रतिमा निर्माण मुहूर्त नक्षत्र: 

पुष्य, रोहिणी, श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा, आर्द्रा, अश्विनी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, हस्त, मृगशिरा, रेवती, अनुराधा। वारः सोमवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार। तिथि: 2,3,5,7,11 एवं

मंत्र सिद्धि हेतु मुहूर्त नक्षत्रः 

उत्तराफाल्गुनी, हस्त, अश्विनी, श्रवण, विशाखा, मृगशिरा। वारः रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार। तिथि: 2,3,5,7, 10, 11, 13 सरिंभ मुहूर्त सभी कार्यों का आरंभ करने के लिए जन्मकुंडली के लग्न से बारहवां और आठवां स्थान शुद्ध होना चाहिए। इन दो स्थानों में कोई ग्रह नहीं होना चाहिए। जन्मराशि से तीसरा, छठा, दसवां, ग्यारहवां लग्न हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तथा शुभ ग्रह युक्त हो, चंद्रमा जन्मलग्न या जन्मराशि से तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें स्थान में होने पर कोई भी कार्य प्रारंभ किया जाना शुभ रहता है।

कालसर्प शांति हेतु मुहूर्त

अश्विनी, रोहिणी, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती नक्षत्रों में से किसी भी दिन कालसर्प योग शांतिविधि के लिए शुभ मुहूर्त है।

नारायण नागबलि हेतु मुहूर्त धनिष्ठा पंचमः

धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती मिलकर 'धनिष्ठा पंचक' बनता है। कृतिका, पुनर्वसु, उत्तरा, विशाखा, उत्तराषाढ़ एवं पूर्वाभाद्रपद त्रिपाद नक्षत्र कहलाते हैं।

नारायण नागबलि विधि के लिए धनिष्ठा पंचक एवं त्रिपाद नक्षत्र छोड़कर हस्त, पुष्य, आश्लेषा, मृग, आर्द्रा, स्वाति, मूल में से किसी नक्षत्र पर नारायण नागबली विधि करवाना प्रशस्त रहता है। संतान प्राप्ति के लिए दोनों पक्षों की पंचमी एवं एकादशी तिथियां एवं श्रवण नक्षत्र श्रेयस्कर हैं। रविवार, सोमवार, बृहस्पतिवार इस विधि के लिए शुभ हैं। केवल नागबली विधि करनी हो तो आश्लेषा नक्षत्र एवं पंचमी, नवमी, पूर्णिमा श्रेयस्कर है।

उपचार शुरु करना :

किसी भी क्रोनिक रोग के उपचार हेतु अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, हस्त, उत्तराभाद्रपद, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं रेवती शुभ हैं।

औषधि या इलाज कराने या दवाई शुरू करने का मुहूर्तरेवती, अश्विनी, पुनर्वशु, पुष्य, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अनुराधा, मूल, मृगशिरा, इन नक्षत्रों में दवाई या इलाज शुरू करने से जल्दी रोग दूर हो जाता है एवं शुभ रहता है रवि सोम बुद्ध गुरु शुक्र

शल्य क्रिया (ऑपरेशन) के लिए : आर्द्रा, ज्येष्ठा, आश्लेषा एवं मूल नक्षत्र ठीक है। हेतु मुहूर्त मेष, कर्क, तुला, मकर, वृषभ, सिंह, कुंभ लग्न शल्य क्रिया के लिए शुभ हैं। शल्य क्रिया के समय सूर्य, मंगल एवं बृहस्पति केंद्र स्थान में हो, चंद्र बलवान एवं शुभ स्थान में हो। इष्टकालीन लग्नेश शुभ स्थान में होकर उसकी दृष्टि लग्न पर हो। चंद्र-मंगल में शुभ योग हो। सूर्य एवं चंद्र, सूर्य एवं लग्नेश का भी शुभ योग हो। अष्टम एवं षष्ठ स्थान में लग्नेश, सूर्य एवं चंद्र न हो। जिसका ऑपरेशन करना हो उस लग्न से ऑपरेशन का लग्न अष्टम न हो। शरीर के जिस अंग का ऑपरेशन करवाना हो उस हिस्से को जन्मकुंडली में दर्शाया जाना हो, उस हिस्से में चंद्र या पापग्रह नहीं हो। ऑपरेशन दिन में ही करवाना चाहिए।

    कुओँ खुदवाने का मुहूर्त-हस्त, अनुराधा, रेवती, उत्तराफालगुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद,धनिष्ठा, शतभिषा, मघा, रोहिणी, पुष्य, मृगशिर, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों में, बुध, गुरु, शुक्र, वारोंमें और रिक्ता (४1९1१४) छोड़ सभी तिथियों में शुभ होता है।

    दुकान करने का मुहूर्त -रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, हस्त,पुष्य, चित्रा, रेवती, अनुराधा, मृगशिर, अश्विनी, नक्षत्रों में तथा शुक्र, बुध, गुरु, सोम वारोंमें व रिक्ता (४।९।१४), अमावस्या को छोड़ शेष तिथियों में दुकान करना शुभ है।

    बड़े-बड़े व्यापार करने का मुहुूर्त-हस्त, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद,उत्तराषाढ़ा, चित्रा नक्षत्रों में, शुक्र, बुध, गुरु वारों में और द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी,एकादशी, त्रयोदशी तिथियों में बड़े-बड़े व्यापार-सम्बन्धी कारोबार करना शुभ है।

    
    राजा से मिलने का मुहूर्त-
श्रवण, घनिष्टा, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफालुनी,मृगशिर, पुण्य, अनुराधा, रोहिणी, रेवती, अश्विनी, चित्रा, स्वाति नक्षत्रों में और रवि, सोम,बुध, गुरु, शुक्र वारों में राजा से मिलना शुभ है।

    बगीचा लगाने का मुहूर्त-
शतभिषा, विशाखा, मूल, रेवती, चित्रा, अनुराधा, मृगशिर,उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुषय नक्षत्रों में तथा शुकर,सोम, बुध, गुरु वारों में बगीचा लगाना शुभ है।

    रोगमुक्त होने पर स्नान करने का मुहुर्त-
उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद,ऐोहिणी, आश्लेषा, पुनवंसु, स्वाति, मघा, रेवती नक्षत्रों को छोड़ शेष नक्षत्रों में, रि, मंगल,गुरु वारों में और रिक्तादि तिथियों में रोगी को स्नान कराना शुभ है।

    नौकरी करने का मुहूर्त-
हस्त, चित्रा, अनुराधा, रेवती, अश्विनी, मृगशिर, पुष्य नक्षत्रोंमें, बुध, गुरु, शुक्र, रवि वारों में और शुभ तिथियों में नौकरी शुभ है।

    मुकदमा दायर करने का मुहुर्त-
ज्येष्ठा, आर्रा, भरणी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभद्पद,पूर्वाफाल्गुनी, मूल, आश्लेषा, मघा नक्षत्रों में, तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी, पंचमी, दशमी,पूर्णमासी तिथियों में और रवि, बुध, गुरु, शुक्र वारों में मुकदमा दायर करना शुभ है।
    
    आँषध बनाने का मुहूत-हस्त, अश्विनी, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिया, मूल,पुनर्वसु, स्वाति, मृगशिरा, चित्रा, रेवती, अनुराधा-इन नक्षत्रों में और रवि, सोम, बुध, गुरु,शुक्र-इन वारों में औषध निर्माण करना शुभ है।
    मन्दिर-निर्माण का मुहूर्त-पुष्य, उत्तराफालगुनी, उत्तरामाद्रपद, उत्तराषाढा, मृगशिर,श्रवण, अश्विनी, चित्रा, पुनर्वसु, विशाखा, आ्दा, हस्त, धनिष्ठा और रोहिणी नक्षत्रों में, सोम,बुध, गुरु, शुक और रवि वारों में एवं द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी, द्वादशीऔर त्रयोदशी तिथियों में मन्दिर-निर्माण करना शुप है।
    
    प्रतिमा-निर्माण का मुहूर्त-पुष्य, रोहिणी, श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा, आ्दा, अरिवनी,उत्तराफालगुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, हस्त, मृगशिर, रेवती और अनुराधा-इन नक्षत्रों में;सोम, गुरु और शुक्र-इन वारों में एवं द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी औरत्रयोदशी-इन तिथियों में प्रतिमा-निर्माण करना शुभ है।

    प्रतिष्ठा मुहुर्त-अश्विनी, रोहिणी, मृगशिर, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा,उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद और रेवती-इन नक्षत्रों में, सोम, बुध, गुरु औरशुक्र-इन वारों में एवं शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया, पंचमी, दशमी, त्रयोदशी और पूर्णिमातथा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया और पंचमी इन तिथियों में प्रतिष्ठा करना शुभ है।प्रतिष्ठा के लिए स्थिर संजञक राशियाँ लग्न के लिए शुभ बतायी गयी हैं।
    मन्त्र सिद्ध करने का मुूर्त-उत्तरफा्गुनी, हस्त, अश्विनी, श्रवण, विशाखा, मृकरभक्षत्रों में, रवि, सोम, बुध, गुरु, शुक वारों में दितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दमी,एकादशी, त्रयोदशी, पूर्णिमा तिथियों में यन्त्र-मन्त्र सिद्ध करना शुम होता है।
    सर्वारम्भ मुहूर्त-लग्न से बारहवोँ और आटवाँ स्थान शुद्ध हो और कोई प्रह नशहो तथा जन्मलगन व जन्मराशि से तीसरा, छठा, दसवाँ, गयारहवोँ लगन ही और शुमम्रही कीदृष्टि हो तथा शुभग्रह युक्त हौ। चन्द्रमा जन्मला्न व जन्मराशि से तीसर, छठे, दसवै, गयारस्थान में हो तो सभी कार्य प्रारम्भ करना शुभ होता है,।
    मण्डप बनाने का मुहूर्त-सोम, बुध, गुरू और शुक्र बारीं में २५७।१११२।१३तिथियों में एवं मृगशिर, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा, श्रवण, उत्तराफाल्गुनी उत्तराषाढा औरउत्तराभाद्रपद नक्षत्रों में मण्डप बनाना शुभ. है।
    होमाहुति,का मुहूर्त-सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उसमें तीन-तीन नक्षत्रों काएक-एक त्रिक होता है, ऐसे सत्ताईस नक्षत्रों के नो त्रिक होते हैं। इनमें पहला सूर्य का,दूसरा बुध का, तीसरा शुक्र का, चौथा शनश्चर का, पाँचवाँ चन्द्रमा का, छठा मंगल का,सातवौँ बृहस्पति का, आठवाँ राहु का और नौवाँ केतु का त्रिक होता है। होम के दिन कानक्षत्र जिसके त्रिक में पड़े उसी ग्रह के अनुसार फल समझना चाहिए। रवि, मंगल, शनि,राहु और केतु ग्रहों के त्रिक में हवन करना वर्जित है।
    अग्निवास और उसका फल-शुक्लपक्ष की प्रतिषदा से लेकर अभीष्ट तिथि तकगिनने से जितनी संख्या हो उसमें एक और जोड़े; फिर रविवार से लेकर इष्टवार तक गिननेसे जितनी संख्या हो, उसको भी उंसी में जोड़े। जोड़ने से जो राशि आए उसमें ४ का भागदे। य्दि तीन अथवा शून्य शेष रहे तो अग्नि का वास पृथ्वी में होता है, यह होम करनेके लिए उत्तम होता है। एक शेष में अग्नि का वास आकाश में होता है, इसका फल प्राणोंको नाश करनेवाला बताया गया है। और दो शेष में अग्निं का वास पाताल में होता है,इसका फल अर्थनाशक कहा गया है।

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