शीतलाष्ट्मी व्रत(बासोड़ा) कथा-स्तोत्र-कवच
शीतला अष्टमी(बसौड़ा) व्रत कथा
शीतलाष्टमी (स्कन्दपुराण)-इस देशमें शीतलाष्टमीका वरतकेवल चैत्र कृष्ण अष्टमीको होता है; किंतु स्कन्दपुराणमें चैत्रादि ४ महीनोंमेंइस व्रतके करनेका विधान है। इसमें पूर्वविद्धा अष्टमी ली जाती है।व्रतीको चाहिये कि अष्टमीको शीतल जलसे प्रातःस्रानादि करके ‘ममगेहेशीतलारोगजनिोपद्रवप्रशमनपूर्वकायरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमी व्रतं करिष्ये।' यह संकल्प करे। तदनन्तर सुगन्धयुक्त गन्ध-पुषादिसेशीतलाका पूजन करके प्रत्येक प्रकारके मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल-भात,लपसी और रोटी-तरकारी आदि कच्चे-पके, सभी शीतल पदार्थ (पहलेदिनके बनाये हुए) भोग लगाये और शीतलास्तोत्रका पाठ करके रात्रिमेंजागरण और दीपावली करे । नैवेद्यमें यह विशेषता* है कि चातुर्मासी वतहो तो-१ चैत्रमें शीतल पदार्थ, २ वैशाखमें घी और शर्करासे युक्त सतू,३ जेष्ठमें पूर्व दिनके बनाये हुए अपूप (पूए) और ४ आषाढ़में घी औरशाक्कर मिली हुई खीरका नैवेद्य अर्पण करे । इस प्रकार करनेसे व्रतीके कुलमेंदाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गञ्धयुक्त फोड़े, नेत्रोंके समस्त रोग,शीतलाकी फुंसियोंके चिह्न और शीतलाजनित सर्वदोष दूर होते हैं औरशीतला सदैव संतुष्ट रहती है। शीतलास्तोत्रमें शीतलाका जो स्वरूपबतलाया है, वह शीतलाके रोगीके लिये बहुत हितकारी है। उसमें बतलायाहै कि ‘शीतला दिगम्बरा है, गर्दभपर आरूढ़ रहती है, शूप, मार्जनी (झाडू)और नीमके पत्तोंसे अलङ्कत होती है और हाथमें शीतल जलका कलशरखती है।' वास्तवमें शीतलाके रोगीके सर्वाङगंमें दाहयुक्त फोड़े होनेसे वहबिलकुल नम्न हो जाता है। ‘गर्दभपिण्डी' (गधेकी लीद) की गन्धसेफोड़ोंकी पीड़ा कम होती है। शूपके काम (अत्नकी सफाई आदि) करने और झाड़ लगानेसे बीमारी बढ़ जाती है, अतः इन कामोंको सर्वथा बंदरखनेके लिये शूप और झाड़ बीमारके समीप रखते हैं। नीमके पत्तोंसेशीतलाके फोड़े सड़ नहीं सकते और शीतल जलके कलशका समीप रखनातो आवशयक है ही।
श्री गणेशाय नमः !
एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखूं कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आईं और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर नहीं है, और ना ही मेरी पूजा होती है।
माता शीतला गाँव की गलियों में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) नीचे फेंका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में फफोले/छाले पड गये। शीतला माता के पूरे शरीर में जलन होने लगी।
शीतला माता गाँव में इधर-उधर भाग-भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा है। कोई मेरी सहायता करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता की सहायता नही की। वहीं अपने घर के बाहर एक कुम्हारन महिला बैठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पूरे शरीर में तपन है। इसके पूरे शरीर में फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नहीं कर पा रही है।
तब उस कुम्हारन ने कहा हे माँ! तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खूब ठंडा पानी डाला और बोली हे माँ! मेरे घर में रात की बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी ज्वार के आटे की राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।
तब उस कुम्हारन ने कहा - आ माँ बैठजा तेरे सिर के बाल बहुत बिखरे हैं, ला मैं तेरी चोटी गूँथ देती हूँ।
और कुम्हारन माई की चोटी गूथने हेतु कंगी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन की नजर उस बूढ़ी माई के सिर के पीछे पड़ी, तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख बालों के अंदर छुपी है।
यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उस बूढ़ी माई ने कहा - रुकजा बेटी तू डर मत। मैं कोई भूत-प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पूजा करता है। इतना कहकर माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई।
माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब मैं गरीब इन माता को कहाँ बिठाऊ।
तब माता बोली - हे बेटी! तुम किस सोच मे पड गई।
तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आँसू बहते हुए कहा - हे माँ! मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता बिखरी हुई है। मैं आपको कहाँ बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन ही।
तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर की दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फैंक दिया।
और उस कुम्हारन से कहा - हे बेटी! मैं तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हूँ, अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग लो।
तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा - हे माता मेरी इच्छा है अब आप इसी डुंगरी गाँव मे स्थापित होकर यहीं निवास करें और जिस प्रकार आपने मेरे घर की दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ कर दिया। ऐसे ही आपको जो भी भक्त होली के बाद की सप्तमी को भक्ति-भाव से पूजा कर, अष्टमी के दिन आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर की दरिद्रता को दूर करना एवं आपकी पूजा करने वाली महिला का अखंड सुहाग रखना, उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला अष्टमी को नाई के यहाँ बाल ना कटवाये धोबी को कपड़े धुलने ना दें और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार मे कभी दरिद्रता ना आये।
तब माता बोलीं तथास्तु! हे बेटी! जो तूने वरदान मांगे हैं मैं सब तुझे देती हूँ। हे बेटी! तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पूजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील की डुंगरी।
शील की डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी के दिन यहाँ बहुत विशाल मेला लगता है।
शीतला माता की जय!
शीतलाष्टक स्तोत्र
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
विनियोग:
ऊँ अस्य श्रीशीतला स्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, शीतली देवता, लक्ष्मी बीजम्, भवानी शक्तिः, सर्वविस्फोटक निवृत्तये जपे विनियोगः ॥
ऋष्यादि-न्यासः
श्रीमहादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीशीतला देवतायै नमः हृदि, लक्ष्मी (श्री) बीजाय नमः गुह्ये, भवानी शक्तये नमः पादयो, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ॥
ध्यानः
ध्यायामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ॥
मानस-पूजनः
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
मन्त्रः
ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः ॥ [११ बार]
॥ ईश्वर उवाच॥
वन्दे अहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी कलशोपेतां शूर्पालं कृत मस्तकाम् ॥1॥
वन्देअहं शीतलां देवीं सर्व रोग भयापहाम् ।
यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत् ॥2॥
शीतले शीतले चेति यो ब्रूयाद्दारपीड़ितः ।
विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥3॥
यस्त्वामुदक मध्ये तु धृत्वा पूजयते नरः ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥4॥
शीतले ज्वर दग्धस्य पूतिगन्धयुतस्य च ।
प्रनष्टचक्षुषः पुसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम् ॥5॥
शीतले तनुजां रोगानृणां हरसि दुस्त्यजान् ।
विस्फोटक विदीर्णानां त्वमेका अमृत वर्षिणी ॥6॥
गलगंडग्रहा रोगा ये चान्ये दारुणा नृणाम् ।
त्वदनु ध्यान मात्रेण शीतले यान्ति संक्षयम् ॥7॥
न मन्त्रा नौषधं तस्य पापरोगस्य विद्यते ।
त्वामेकां शीतले धात्रीं नान्यां पश्यामि देवताम् ॥8॥
॥ फल-श्रुति ॥
मृणालतन्तु सद्दशीं नाभिहृन्मध्य संस्थिताम् ।
यस्त्वां संचिन्तये द्देवि तस्य मृत्युर्न जायते ॥9॥
अष्टकं शीतला देव्या यो नरः प्रपठेत्सदा ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥10॥
श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धा भक्ति समन्वितैः ।
उपसर्ग विनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ॥11॥
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ॥12॥
रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाख नन्दनः ।
शीतला वाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ॥13॥
एतानि खर नामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् ।
तस्य गेहे शिशूनां च शीतला रूङ् न जायते ॥14॥
शीतला अष्टकमेवेदं न देयं यस्य कस्यचित् ।
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धा भक्ति युताय वै ॥15॥
॥ श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाअष्टक स्तोत्रं ॥
मूल-स्तोत्र
॥ ईश्वर उवाच ॥
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी-कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ॥1॥
वन्देऽहं शीतलां-देवीं, सर्व-रोग-भयापहाम् ।
यामासाद्य निवर्तन्ते, विस्फोटक-भयं महत् ॥2॥
शीतले शीतले चेति, यो ब्रूयाद् दाह-पीडितः ।
विस्फोटक-भयं घोरं, क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥3॥
यस्त्वामुदक-मध्ये तु, ध्यात्वा पूजयते नरः ।
विस्फोटक-भयं घोरं, गृहे तस्य न जायते ॥4॥
शीतले ! ज्वर-दग्धस्य पूति-गन्ध-युतस्य च ।
प्रणष्ट-चक्षुषां पुंसां , त्वामाहुः जीवनौषधम् ॥5॥
शीतले ! तनुजान् रोगान्, नृणां हरसि दुस्त्यजान् ।
विस्फोटक-विदीर्णानां, त्वमेकाऽमृत-वर्षिणी ॥6॥
गल-गण्ड-ग्रहा-रोगा, ये चान्ये दारुणा नृणाम् ।
त्वदनुध्यान-मात्रेण, शीतले! यान्ति सङ्क्षयम् ॥7॥
न मन्त्रो नौषधं तस्य, पाप-रोगस्य विद्यते ।
त्वामेकां शीतले! धात्री, नान्यां पश्यामि देवताम् ॥8॥
॥ फल-श्रुति ॥
मृणाल-तन्तु-सदृशीं, नाभि-हृन्मध्य-संस्थिताम् ।
यस्त्वां चिन्तयते देवि ! तस्य मृत्युर्न जायते ॥9॥
अष्टकं शीतलादेव्या यो नरः प्रपठेत्सदा ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥10॥
श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः ।
उपसर्गविनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ॥11॥
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता ।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ॥12॥
रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाखनन्दनः ।
शीतलावाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ॥13॥
एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् ।
तस्य गेहे शिशूनां च शीतलारुङ् न जायते ॥14॥
शीतलाष्टकमेवेदं न देयं यस्यकस्यचित् ।
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धाभक्तियुताय वै ॥15॥
हिन्दी भावार्थ:
विनियोग:
इस श्रीशीतला स्तोत्र के ऋषि महादेव जी, छन्द अनुष्टुप, देवता शीतला माता, बीज लक्ष्मी जी तथा शक्ति भवानी देवी हैं. सभी प्रकार के विस्फोटक, चेचक आदि, के निवारण हेतु इस स्तोत्र का जप में विनियोग होता है।
ईश्वर बोले:
गर्दभ(गधा) पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में मार्जनी(झाड़ू) तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की मैं वन्दना करता हूँ॥1॥
मैं सभी प्रकार के भय तथा रोगों का नाश करने वाली उन भगवती शीतला की वन्दना करता हूँ, जिनकी शरण में जाने से विस्फोटक अर्थात चेचक का बड़े से बड़ा भय दूर हो जाता है॥2॥
चेचक की जलन से पीड़ित जो व्यक्ति “शीतले-शीतले” - ऎसा उच्चारण करता है, उसका भयंकर विस्फोटक रोग जनित भय शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥3॥
जो मनुष्य आपकी प्रतिमा को हाथ में लेकर जल के मध्य स्थित हो आपकी पूजा करता है, उसके घर में विस्फोटक, चेचक, रोग का भीषण भय नहीं उत्पन्न होता है॥4॥
हे शीतले! ज्वर से संतप्त, मवाद की दुर्गन्ध से युक्त तथा विनष्ट नेत्र ज्योति वाले मनुष्य के लिए आपको ही जीवनरूपी औषधि कहा गया है॥5॥
हे शीतले! मनुष्यों के शरीर में होने वाले तथा अत्यन्त कठिनाई से दूर किये जाने वाले रोगों को आप हर लेती हैं, एकमात्र आप ही विस्फोटक - रोग से विदीर्ण मनुष्यों के लिये अमृत की वर्षा करने वाली हैं॥6॥
हे शीतले! मनुष्यों के गलगण्ड ग्रह आदि तथा और भी अन्य प्रकार के जो भीषण रोग हैं, वे आपके ध्यान मात्र से नष्ट हो जाते हैं॥7॥
उस उपद्रवकारी पाप रोग की न कोई औषधि है और ना मन्त्र ही है. हे शीतले! एकमात्र आप जननी को छोड़कर (उस रोग से मुक्ति पाने के लिए) मुझे कोई दूसरा देवता नहीं दिखाई देता॥8॥
हे देवि! जो प्राणी मृणाल – तन्तु के समान कोमल स्वभाव वाली और नाभि तथा हृदय के मध्य विराजमान रहने वाली आप भगवती का ध्यान करता है, उसकी मृत्यु नहीं होती॥9॥
जो मनुष्य भगवती शीतला के इस अष्टक का नित्य पाठ करता है, उसके घर में विस्फोटक का घोर भय नहीं रहता॥10॥
मनुष्यों को विघ्न-बाधाओं के विनाश के लिये श्रद्धा तथा भक्ति से युक्त होकर इस परम कल्याणकारी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए अथवा श्रवण (सुनना) करना चाहिए॥11॥
हे शीतले! आप जगत की माता हैं, हे शीतले! आप जगत के पिता हैं, हे शीतले! आप जगत का पालन करने वाली हैं, आप शीतला को बार-बार नमस्कार हैं॥12॥
जो व्यक्ति रासभ, गर्दभ, खर, वैशाखनन्दन, शीतला वाहन, दूर्वाकन्द – निकृन्तन – भगवती शीतला के वाहन के इन नामों का उनके समक्ष पाठ करता है, उसके घर में शीतला रोग नहीं होता है॥13-14॥
इस शीतलाष्टक स्तोत्र को जिस किसी अनधिकारी को नहीं देना चाहिए अपितु भक्ति तथा श्रद्धा से सम्पन्न व्यक्ति को ही सदा यह स्तोत्र प्रदान करना चाहिए॥15॥
"श्रीशीतलाकवचम्
पार्वत्युवाच -
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
शीतलाकवचं ब्रूहि सर्वभूतोपकारकम् ॥ 1॥
वद शीघ्रं महादेव ! कृपां कुरु ममोपरि।
इति देव्याः वचो श्रुत्वा क्षणं ध्यात्वा महेश्वरः ॥ 2॥
उवाच वचनं प्रीत्या तत्श्रृणुष्व मम प्रिये ।
शीतलाकवचं दिव्यं श्रुणु मत्प्राणवल्लभे ॥ 3॥
ईश्वर उवाच -
शीतलासारसर्वस्वं कवचं मंत्रपल्लवितम् ।
कवचं विना जपेट यो वै नैव सिद्धयन्ति कलौ ॥ 4॥
धारणादस्य मन्त्रस्य जीवकरनृणाम् ।
विनियोगः -
कवचस्यस्य देवेशि ! ऋषिर्पोक्तो महेश्वरः ।
छन्दोऽनुष्टुप कथितं च देवता शीतला स्मृता ।
लक्ष्मीबीजं रमा शक्तिः तारं कीलकमीरितम् ॥ 5॥
लूताविस्फोटकादीनि शान्त्यर्थे परिकीर्तितः।
विनियोगः प्रकुर्वित पठेदेकाग्रमानसः ॥ 6॥
विनियोगः -
ॐ अस्य शीतलाकवचस्य श्रीमहेश्वर ऋषिः अनुष्टुपछन्दः,
श्रीशीतला भगवती देवता, श्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः,
ॐ कीलकं लूताविस्फोटकादिशान्त्यर्थे पाठे विनियोगः ॥
ऋष्यादिन्यासः -
श्रीमहेश्वरऋषये नमः शिरसि
अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे,
श्रीशीतला भगवती देवतायै नमः हृदि
श्री बीजाय नमः गुह्ये
ह्रीं शक्तिये नमः नाभौ,
ॐ कीलकाय नमः पादयो लूताविस्फोटकादिशान्त्यर्थे
पाठे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥
ध्यानं -
उद्यतसूर्यनिभां नवेन्दुमुकुटां सूर्याग्निनेत्रोज्ज्वलां
नानागन्धविलेपनां मृदुतं दिव्याम्बरालङ्कृताम् ।
दोर्भ्यां सन्दधतीं वरभययुगं वाहे स्थितां रासभे
भक्ताभीष्टफलप्रदां भगवतीं श्रीशीतलं त्वां भजे ॥
अथ कवचमूलपाठः -
ॐ शीतला पातु मे प्राणे रुणकी पातु चापाने ।
समाने झुनुकी पातु उदाने पातु मन्दला ॥ 1॥
व्याने च सेढला पातु मनुर्मे शङ्करी तथा ।
पातु मामिन्द्रियान् सर्वान् श्रीदुर्गा विन्ध्यवासिनी ॥ 2॥
ॐ मम पातु शिरो दुर्गा कमला पातु मस्तकम् ।
ह्रीं मे पातु भ्रुवोर् मध्ये भवानी भुवानी ॥
पातु मे मधुरमती देवी ॐकारं भृकुटीद्वयम् ॥ 3॥
नासिकां शारदा पातु तमसा वर्त्मसंयुतम् ।
आंखौ ज्वाला पातु भीषण पातु श्रुतिर्मे ॥ 4॥
कपोलौ कालिका पातु सुमुखी पातु चोष्ठयोः ।
सन्ध्ययोः त्रिपुरा पातु दन्ते च रक्तदन्तिका ॥ 5॥
जिह्वां सरस्वती पातु तालुके वग्वादिनी ।
कण्ठे पातु तु मातङ्गी ग्रीवायां भद्रकालिका ॥ 6॥
स्कन्धौ च पातु मे छिन्ना ककुमे स्कन्दमातरः ।
बाहुयुग्मौ च मे पातु श्रीदेवी बगलामुखी ॥ 7॥
करौ मे भैरवी पातु पृष्ठे पातु धनुर्धरी ।
वक्षःस्थले च मे पातु दुर्गा महिषमर्दिनी ॥ 8॥
हृदये ललिता पातु कुक्षौ पातु मघेश्वरी। (मघा ईश्वरी) (महेश्वरी)
पार्ष्वौ च गिरिजा पातु चन्नपूर्णा तु चोदरम् ॥ 9॥
नाभिं नारायणी पातु कटिं मे सर्वमङ्गला।
जंघयोर्मे सदा पातु देवी कात्यायनी पुरा ॥ 10॥ (दोनों पादों पर एक मात्रा शिफ्ट)
ब्रह्माणी शिश्नं पातु वृषणं पातु कपालिनी।
गुह्यं गुह्येश्वरी पातु जानुनोर्जगदीश्वरी ॥ 11॥
पातु गुल्फौ तु कौमारी पादपृष्ठं तु वैष्णवी ।
हीवारा पातु पादाग्रे ऐन्द्राणी सर्वमर्मसु ॥ 12॥
मार्गे रक्षतु चामुण्डा वने तु वनवासिनी।
जले च विजया रक्षेत् वह्नौ मे चापराजिता ॥ 13॥
रणे क्षेमकारी रक्षेत् सर्वत्र सर्वमङ्गला।
भवानी पातु बन्धून मे भार्या रक्षतु चम्बिका ॥ 14॥
पुत्रान् रक्षतु महेंद्री कन्याकां पातु शांभवी ।
गृहेषु सर्वकल्याणी पातु नित्यं महेश्वरी ॥ पंद्रह॥
पूर्व कादम्बरी पातु वह्नौ शुक्लेश्वरी तथा ।
दक्षिणे कालालिनी पातु प्रेतारुढा तु नैरते ॥ 16॥
पाशहस्ता पश्चिमे पातु वायव्ये मृगवाहिनी ।
पातु मे चोत्तरे देवी यक्षिणी सिंहवाहिनी ।
ईशाने शूलिनी पातु ऊर्ध्वे च खगगामिनी ॥ 17॥
अधस्तात्वैष्णवी पातु सर्वत्र नारसिंहिका ।
प्रभाते सुन्दरी पातु मध्याह्ने जगदम्बिका ॥ 18॥
सायाह्ने चण्डिका पातु निशीथेऽत्र निशाचारी ।
निशान्ते खेचरी पातु सर्वदा दिव्ययोगिनी ॥ वक्॥
वायौ मां पातु वेताली वाहने वज्रधारिणी ।
सिंहा सिंहासने पातु शय्यां च भगमालिनी ॥ 20॥
सर्वरोगेषु मां पातु कालरात्रिस्वरुपिणी ।
यक्षेभ्यो यक्षिणी पातु राक्षसे डाकिनी तथा ॥ 21॥
भूतप्रेतपिशाचेभ्यो हाकिनी पातु मां सदा।।
मन्त्रं मन्त्राभिचारेषु शाकिनी पातु मां सदा ॥ 22॥
सर्वत्र सर्वदा पातु श्रीदेवी गिरिजात्मजा।
इत्येतत्कथितं गुह्यं शीतलाकवचमुत्तमम् ॥ 23॥
फलश्रुतिः -
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा दानवादयः ।
विस्फोटभयं नास्ति पठनाध्यनाद् घटना ॥ 1॥
अष्टसिद्धिप्रदं नित्यं धारणात्कवचस्य तु ।
सहस्त्रपठनात्सिद्धिः सर्वकार्यार्थसिद्धिदम् ॥ 2॥
तदर्धं वा तद्र्धं वा पठेदेकाग्रमानसः ।
अश्वमेधसहस्रस्य फलमाप्नोति मानवः ॥ 3॥
शीतलाग्रे पठेद्यो वै देवीभक्तैकमानसः ।
शीतला रक्षयेन्नित्यं भयं क्वापि न जायते ॥ 4॥
घटे वा स्थापयेद्देवी दीपं प्रज्वल्य यत्नतः ।
पूजयेत्जगतां धात्री नाना गन्धोपहारकैः ॥ 5॥
अदीक्षिताय नो दद्यत कुचलाय दुरात्मने ।
अन्यशिष्याय दुष्टाय निन्दकाय दुरार्थिने ॥ 6॥
न दद्यादिदं वर्म तु प्रमत्तालापशालिने ।
दीक्षिताय कुलीनाय गुरुभक्तिरताय च ॥ 7॥
शान्ताय कुलशक्ताय शान्ताय कुलकौलिने ।
दातव्यं तस्य देवेशि ! कुलवागीश्वरो भवेत् ॥ 8॥
इदं रहस्यं परमं शीतलाकवचमुत्तमम् ।
गोप्यं गुह्यतमं दिव्यं प्रमाणं स्वयोनिवत् ॥ 9॥
मूलमन्त्रः - ॐ श्रीं ह्रीं ॐ ।
॥ श्रीईश्वरपार्वतीसम्वादे शक्तियामले शीतलाकवचं संपूर्णम् ॥"
शीतलाअष्टमी पर्व पर विशेष :--
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बरराम्,
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्।
सद्बुद्धि, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रतीक शीतला अष्टमी के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
मां भगवती शीतला आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि एवं खुशहाली प्रदान करें ऐसी मां से मेरी प्रार्थना हैं।
# शीतलाष्टमी ( बसौड़ा ) :--
होली के एक सप्ताह बाद अष्टमी तिथि को आने वाला शीतला अष्टमी का पर्व पूरे उतरी भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता की पूजा करने एवं व्रत रखने से चिकन पॉक्स यानी माता, खसरा, फोड़े, नेत्र रोग नहीं होते हैं। माता इन रोगों से रक्षा करती है। माता शीतला को माँ भगवती का ही रूप माना जाता है। अष्टमी के दिन महिलाएं सुबह ठण्डे जल से स्नान करके शीतला माता की पूजा करती हैं और पूर्व रात्रि को बनाया गया बासी भोजन ( दही, राबड़ी, चावल, हलवा, पूरी, गुलगुले ) का भोग माता को लगाया जाता है।
ठण्डा भोजन खाने के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता भी है कि माता शीतला को शीतल, ठण्डा व्यंजन और जल पसन्द है। इसलिए माता को ठण्डा ( बासी ) व्यंजन का ही भोग लगाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य भी ठण्डे पानी से स्नान करते हैं और रात में बनाया हुआ बासी भोजन ही करते हैं। इससे माता शीतला प्रसन्न होती है।
यह ऋतु का अंतिम दिन होता है। ऋतु परिवर्तन से मानव शरीर में विभिन्न प्रकार के विकार और रोग होने स्वभाविक हैं। इन विकारों को दूर करने एवं इनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला का व्रत और पूजन किया जाता है। माता शीतला इन विकारों से रक्षा करती है।
वहीं वैज्ञानिक तथ्य ये भी है कि इस दिन के बाद से सर्दी की विदाई मानी जाती है। अतः इस दिन अंतिम बार ठण्डा भोजन ग्रहण करने के बाद आगे ठण्डा बासी भोजन खाना गर्मी में हानिकारक होता है। क्योंकि गर्मी में वो भोजन खराब हो जाता है। इस तरह धार्मिक और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच इस पारम्परिक त्यौहार ने देश में एक विशिष्ट स्थान बनाया हुआ है जो हमारी समृद्ध संस्कृति की महानता को और समृद्ध कर रहा है।
# शीतला माता की पौराणिक कथा :--
एक कथा के अनुसार एक दिन माता ने सोचा कि धरती पर चल कर देखें की उसकी पूजा कौन-कौन करता है। माता एक बुढ़िया का रूप धारण कर एक गांव में गई। माता जब गांव में जा रही थी तभी ऊपर से किसी ने चावल का उबला हुआ पानी डाल दिया। माता के पूरे शरीर पर छाले हो गए, और पूरे शरीर में जलन होने लगी।
माता दर्द में कराहते हुए गांव में सभी से सहायता माँगी। लेकिन किसी ने भी उनकी नहीं सुनी। गांव में कुम्हार परिवार की एक महिला ने जब देखा कि एक बुढ़िया दर्द से कराह रही है, तो उसने माता को बुलाकर घर पर बैठाया और बहुत सारा ठण्डा जल माता के ऊपर डाला। ठण्डे जल से माता को उन छालों की पीड़ा में काफी राहत महसूस हुई।
फिर कुम्हारिन महिला ने माता से कहा माता, मेरे पास रात के दही और राबड़ी है, आप इनको खायें। रात के रखे दही और ज्वार की राबड़ी खा कर माता को शरीर में काफी ठंडक मिली।
कुम्हारिन ने माता को कहा, माता आपके बाल बिखरे हैं इनको गूथ देती हूँ।
वो जब बाल बनाने लगी तो बालों के नीचे छुपी तीसरी आँख देख कर डर कर भागने लगी। तभी माता ने कहा बेटी डरो मत मैं शीतला माता हूँ और मैं धरती पर ये देखने आई थी कि मेरी पूजा कौन करता है।
फिर माता असली रूप में आ गई। कुम्हारिन महिला शीतला माता को देख कर भाव विभोर हो गई। उसने माता से कहा माता मैं तो बहुत गरीब हूँ। आपको कहा बैठाऊँ। मेरे पास तो आसन भी नहीं है। माता ने मुस्कुरा कर कुम्हारिन के गधे पर जाकर बैठ गई। और झाडू से कुम्हारिन के घर से सफाई कर डलिया में डाल कर उसकी गरीबी को बाहर फेंक दिया।
माता ने कुम्हारिन की श्रद्धा भाव से खुश हो कर वर माँगने को कहा। कुम्हारिन ने हाथ जोड़कर कहा माता, आप वर देना चाहती हैं तो आप हमारे गांव में ही निवास करें और जो भी इंसान आपकी श्रद्धा भाव से सप्तमी और अष्टमी को पूजा करे, और व्रत रखे, तथा आपको ठण्डा व्यंजन का भोग लगाए, उसकी गरीबी भी ऐसे ही दूर करें। पूजा करने वाली महिला को अखंड शौभाग्य का आशीर्वाद दें। माता शीतला ने कहा बेटी ऐसा ही होगा और कहा कि मेरी पूजा का मुख्य अधिकार कुम्हार को ही होगा। तभी से ये परंपरा चल रही है।
जोधपुर का यह गांव का नाम अब "शील की डूंगरी" नाम से प्रचलित है। जहाँ माता शीतला का भव्य मंदिर बना हुआ है और सप्तमी पर मंदिर पर विशाल मेला लगता है। काफी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन कर मनौती माँगते है, पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाते है।
जय शीतला माता। 🙏