संगीत तथा ज्योतिष में रंगों की विविधता का महत्व और क्षेत्र विस्तार
संगीत तथा ज्योतिष में रंगों की विविधता का महत्व और क्षेत्र विस्तार
ब्रह्माण्ड की सभी चराचर वस्तुएं किसी-न-किसी रंग की होती है। किसी भीवस्तु की पहचान अनेक प्रकार से होती है जिसमें उस वस्तु विशेष का रंग भी होता है। यदि किसी भी वस्तु का कोई रंग न हो तो उसकी विशेषताओं में एक प्रकार की कमी प्रतीत होती है।
ब्रम्हांड की अनन्त गहराईयों से लेकर पृथ्वी के छोटे से कण तक रंग का आधिपत्य है। मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी प्रकृति के विविध रंगों से प्रभावित होते हैं। किसी वस्तु विशेष का रंग उस वस्तु विशेष का गुण बताता है। रंगों के अनेकों रूप हो सकते है जिनमें सर्वप्रथम सर्वविदित दृष्टि से सम्बन्धित है और दूसरे नाद के कई रंग होते है। जिन्हें हम राग रूप में प्राप्त करते हैं और इन दोनों प्रकार के रंगों की विविधता के पीछे कुछ कारण होते हैं। जिनमें दृष्टि से सम्बन्धित रंगों की विविधता के पीछे रासायनिक प्रक्रिया होती है और श्रवणेन्द्रियों से सम्बन्धित रंगों की विविधता के पीछे आन्दोलनों की विविधता या स्वयंभू नाद की भूमिका होती है। इस दृष्टि से रंग की परिभाषा कुछ यूँ होनी चाहिए "कोई भी वस्तु जब अपनी रासायनिक तथा भौतिकीय गुणों से किसी प्राणी विशेष को प्रभावित करे तो उसे रंग कहेंगे।"
मूल रूप से रंग तीन होते हैं -लाल, हरितपीला, नीला और इन्ही के मिश्रण से अनेक रंग बन जाते हैं। इसी प्रकार नादात्मक रंगों की चर्चा करते समय प्राचीन ऋषियों ने उदात, अनुदात और स्वरित तीन स्वर बनाए थे और इन्ही की अलग-अलग मूर्छनाऐं रंग रूप में हमें सुनने को मिलती है। जिस प्रकार सूर्य की किरणों में सात रंग होते हैं उसी प्रकार एक सप्तक के सात स्वर होते है जहां सूर्य की किरणों का प्रथम दृष्टि में एक ही रंग नजर आता है वहीं किरण वर्षा ऋतु में इन्द्रधनुष में अलग-अलग सात रंगों में दृष्टिगोचर होती है।
हमारे सौरमण्डल में सात ग्रह हैं जो सूर्य से क्रमानुसार इस
प्रकार है-
बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि इन सात ग्रहों की
मान्यता प्राचीन काल में थी। इसके अतिरिक्त आधुनिक खोजों में और ग्रहों की भी खोज की है। इन सात ग्रहों का
सम्बन्ध सात रंगों से है। सूर्य सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह है। बल्कि सौर परिवार
के सभी ग्रह इसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। इन ग्रहों तथा स्वरों के रंग इस प्रकार है।
1. सूर्य का सम्बन्ध षड्ज से:
"ज्योतिष के अनुसार सूर्य सुदृढ़, गठीला तथा शक्तिशाली, वर्गाकार स्वरूप का है। इसका रंग
साधारणतः लाल किन्तु कहीं-कहीं इसका रंग श्याम काला भी माना गया है।"1 (क) किसी भी राग की परिकल्पना षड्ज रहित नहीं की जा सकती। प्रत्येक राग में षड़ज
का उतना ही महत्व है जितना कि सौर परिवार में सूर्य का। जिस प्रकार सौर परिवार में
सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर काटते हैं उसी प्रकार राग रूपी राज्य के षड्ज
विहीन राग की परिकल्पना नहीं की जा सकती। "ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा रचित
"प्रणव भारती' में सप्तक के
प्रथम स्वर षड्ज का
रंग पदमपत्र बताया गया है।" (ख) "संगीत
दर्पण" में दामोदर पंडित ने भी षड्ज स्वर का रंग लाल बताया है। (ग)
"संगीत" शास्त्र' में भातखण्डे
ने षड्ज का संस्कृत रंग काला बताया है। और (घ) "जार्ज फिल्ड ने अपनी पुस्तक
"Chromatics" में षड्ज का रंग नीला
बताया है।" (च)
2. चन्द्रमा का सम्बन्ध ऋषम के साथ:
"ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा का रंग सफेद दूधिया
बताया गया है। इसका रत्न मोती है।"2 (क) प्रणव भारती पुस्तक में ओंकारनाथ ठाकुर ने ऋषम का रंग पिंजर बताया
है।" (ख) "भातखण्डे" द्वारा रचित पुस्तक संगीत शास्त्र में ऋषभ का
संस्कृत रंग जामुनी बताया है (ग) "जार्ज फिल्ड ने अपनी पुस्तक "Chromatics"
में ऋषम का रंग जामुनी बताया है।" (घ) दामोदर पण्डित ने अपनी पुस्तक
संगीत दर्पण में ऋषभ का रंग पिंगल बताया है।" (च)
3. मंगल का सम्बन्ध गांधार के साथ:
ज्योतिष के अनुसार मंगल का रंग लाल व सिंदूरी बताया गया। है। इसका रत्न मूंगा है
"प्रणव भारती" पुस्तक में ऑकारनाथ ठाकुर ने गांधार का रंग स्वर्ण बताया
है। 3 (क) "भातखण्डे द्वारारचित पुस्तक 'संगीत शास्त्र' में गांधार का
संस्कृत रंग 'स्वर्ण'बताया है।" (ख) "जार्ज फिल्ड ने अपनी पुस्तक "Chromatics" में गांधार का रंग 'लाल' बताया है।" (ग) दामोदर पण्डित ने अपनी
पुस्तक "संगीत दर्पण" में गांधार का रंग लाल बताया। है। (घ)
4. बुध का सम्बन्ध मध्यम के साथ:
ज्योतिष के अनुसार बुध का रंग हरा बताया गया है। इसकारत्न
पन्ना है। "प्रणव भारती' नामक पुस्तक
में ओंकारनाथ ठाकुर ने मध्यम का रंग 'कुन्द' बताया है।"4 (क) "भातखण्डे ने अपनी पुस्तक 'संगीत शास्त्र' में मध्यम का
संस्कृत रंग सफेद बताया है।" (ख) "जार्ज फिल्ड ने अपनी पुस्तक "Chromatics" में मध्यम का रंग संतरी
बताया है।" (ग) "दामोदर जी ने अपनी पुस्तक "संगीत दर्पण" में
मध्यम का रंग श्वेत बताया है।” (घ) "रावण
संहिता में बुध का रंग दूध के समान बताया है।" (च)
5. बृहस्पति का सम्बन्ध पंचम के साथ:
ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति का रंग पीला होता है। इसका रत्न पुखराज है।"5 (क) "रावण संहिता में बृहस्पति का रंग पीला बताया है।" (ख) "प्रणव भारती पुस्तक में पंचम का रंग कृष्ण बताया है।" (ग) "संगीत शास्त्र में पंचम का संस्कृत रंग पीला तथा जार्ज फिल्ड ने अपनी पुस्तक "Chromatics" में पंचम का रंग पीला बताया है।" (घ) "संगीत दर्पण में पंचम स्वर का रंग काला बताया है।" (च)
6. शुक्र का सम्बन्ध धैवत के साथ:
ज्योतिष के अनुसार शुक्र का रंग सफेद बताया गया है। इसका रत्न हीरा है। "रावण
संहिता नामक पुस्तक में डॉ. वाई.डी. सरस्वती ने शुक्र का रंग काला बताया है। (क)
"प्रणव भारती पुस्तक में धैवत का रंग पीत बताया गया है।" (ख) “भातखण्डे जी
की पुस्तक 'संगीत शास्त्र' में धैवत का संस्कृत रंग सलेटी बताया गया है।" (ग) "जार्ज फिल्ड ने
अपनी पुस्तक में धैवत का रंग सलेटी बताया है। (घ) "संगीत दर्पण पुस्तक में
दामोदर पण्डित ने धैवत का रंग पीला बताया है।" (च)
7. शनि का निषाद के साथ सम्बन्धः
ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह का रंग काला स्याह बताया गया। है।
इसका रत्न नीलम है। "रावण संहिता पुस्तक में शनि का रंग काला बताया गया है।7 (क) प्रणव भारती पुस्तक में निषाद स्वर का रंग सर्पवर्ण बताया गया है।"
(ख) "संगीत शास्त्र पुस्तक में निषाद स्वर का संस्कृत रंग हरा बताया गया है।”
(ग) जार्ज फील्ड ने अपनी पुस्तक में निषाद स्वर का रंग हरा बताया है।" (घ)
"दामोदर जी की पुस्तक संगीत दर्पण में निषाद स्वर का चितकबरा बताया गया
है।" (च)
उपरोक्त सारे विवरण का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के रंग उनसे निकलने वाली रश्मियों से सम्बन्धित है। लेकिन स्वरों का ग्रहों के साथ सम्बन्ध यद्यपि एक जैसा है। फिर भी कहीं-कहीं भेद दृष्टिगोचर होता है। सम्भवतः अलग-अलग समय में किसी विशेष स्वर सप्तक का प्रचार-प्रसार अधिक रहा होगा या सिद्धान्त रूप में कई प्रकार के सप्तक विद्वान जानते होंगे लेकिन सामाजिक रूचि के अनुसार या किसी विशेष कार्य हेतु किसी एक विशेष स्वर सप्तक का प्रयोग करते होंगे। उदाहरणतः "जैन साहित्य में सातवें स्वर का अधिपति सूर्य को कहा गया है। ज्योतिष के अनुसार सूर्य गुण दृष्टि से शत्रुओं का दमन करता है। मेरे विचार में आज स्वर सप्तक बिलावल उस समय प्रचार में था। क्योंकि महर्षि भरत ने जो शुद्ध स्वर सप्तक बताया है, वह आज के काफी थाट के समान विद्वानों ने माना है। पण्डित ओंकार नाथ ठाकुर जी का कहना है कि महर्षि भरत के स्वर सप्तक की निषादी मूर्छना जो निषाद स्वर से प्रारम्भ होती है वह आज का शुद्ध सप्तक बिलावल है।" "जैन आगम, बृहदेशी तथा संगीत रत्नाकर में जो स्वर मण्डल बताया गया है उसमें निषाद स्वर देवता सूर्य बताया गया है। जबकि किसी भी ग्रन्थकार ने निषाद का देवता सूर्य नही बताया। अधिकांश ग्रन्थों में षड्ज स्वर का देवता सूर्य बताया गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यदि संगीत ग्रन्थों में उल्लेखित मत-मतान्त्रों पर दृष्टिपात करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि समय-समय पर अलग-अलग ग्रहके अनिष्ट निवारण हेतु अलग-अलग स्वर को आधार माना गया होगा जिससेअनेकों प्रकार के स्वर सप्तक मूर्छनाओं के रूप में अस्तित्व में आए।
ग्रहों की खगोलीय स्थिति को यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए और उसके अनुसार सप्तक की परिकल्पना करें तो कुछ इस प्रकार का सप्तक का रूप हमारे समक्ष आता है। सौरमण्डल में जो सूर्य की स्थिति है उस दृष्टि से यदि सप्तक में किसी स्वर के साथ सूर्य की तुलना करें तो निश्चय ही वह स्वर मध्यम प्राप्त होता है। सूर्य के सबसे समीप बुध ग्रह है। उसकी स्थिति पृथ्वी की ओर है। इसहिसाब में तो गान्धार स्वर का बुध ग्रह है। उसकी स्थिति पृथ्वी की ओर है। इस हिसाब में तो गान्धार स्वर का बुध ग्रह से सम्बन्ध होना चाहिए। सूर्य से बुध ग्रह की दूरी 3 करोड़ 60 लाख मील है। उसके बाद सूर्य से दूरी के हिसाब से शुक्र परिक्रमा कर रहा है। सप्तक में इसका सम्बन्ध ऋषभ से होना चाहिए। सूर्य से शुक्र की दूरी 6 करोड़ 72 लाख मील है। इसके उपरान्त पृथ्वी परिक्रमा कर रही है। पृथ्वी की दूरी सूर्य से 9 करोड़ 28 लाख 27 हजार मील है। पृथ्वी और सूर्य के बीच में बुध, शुक्र है। इसका सम्बन्ध सप्तक में षड्ज के साथ होना चाहिए। क्रम दृष्टि से बुध, शुक्र और पृथ्वी, सूर्य के एक ओर है। मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य के दूसरी ओर स्थित है।यदि सूर्य से बुध, शुक्र पृथ्वी को नीचे की ओर मान लिया जाए तो निःसंदेह स्वर क्रम इस प्रकार बनता है। मग,रे, सा अर्थात् म सूर्य, ग बुध, रे शुक्र और सा पृथ्वी सूर्य के ऊपर मंगल है जो सूर्य से 14 करोड़ 15 लाख 50 हजार मील पर है। सप्तक में मध्यम से ऊँचा पंचम स्वर विराज रहा है अर्थात् मंगल का सम्बन्ध पंचम के साथ होना चाहिए। दूरी क्रम में मंगल के बाद बृहस्पति भ्रमण कर रहे हैं जो सूर्य से 48 करोड़ 2 लाख 80 हजार मील पर है। इसका सम्बन्ध सप्तक में धैवत के साथ होना चाहिए। बृहस्पति से ऊपर सूर्यमें शनि ग्रह भ्रमण कर रहें है जो सूर्य से 88 करोड़ 60 लाख मील पर है और उनका सप्तक में निषाद स्वर के साथ सम्बन्ध होना चाहिए।
नाट्यशास्त्र के रचयिता महर्षि भरत ने मध्यम स्वर को
अविनाशी स्वर कहा है इसलिए इसका सम्बन्ध सूर्य के साथ मानकर सप्तक की परिकल्पना की गयी है।
सौरमण्डलीय आधार पर
स्वर इस प्रकार हुए
|
सा |
रे |
ग |
म |
प |
ध |
नी |
|
चन्द्रमा (पृथ्वी) |
शुक्र |
बुध |
सूर्य |
मंगल |
गुरु |
शनि |
संगीत मकरन्द
अनुसार
|
षड्ज |
ऋषभ |
गंधार |
मध्यम |
पंचम |
धैवत |
निषाद |
|
सूर्य |
चंद्र |
मंगल |
बुध |
गुरु |
शुक्र |
शनि |
इस दृष्टि से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि प्राचीन
ऋषियों ने खगोलीय
आधार पर ग्रहों की स्थिति के अनुसार सप्तक के सात स्वरों का
क्रम नहीं माना
था। सम्भवतः पृथ्वी पर उन ग्रहों की रश्मियों का न्यूनाधिक
प्रभाव देखकर उन्होंने
सप्तक के सात स्वरों का सम्बन्ध ग्रहों के साथ स्थापित किया
था क्योंकि सप्ताह
के सात दिनों का सम्बन्ध संगीत के सात स्वरों के अनुसार है।
जो इस प्रकार है :
|
दिन |
रविवार |
सोमवार |
मंगलवार |
बुधवार |
गुरूवार |
शुक्रवार |
शनिवार |
|
स्वर |
षड्ज |
ऋषभ |
गांधार |
मध्यम |
पंचम |
धैवत |
निषाद |
|
ग्रह |
सूर्य |
चन्द्र |
मंगल |
बुध |
गुरू |
शुक्र |
शनि |
3.3 बारह राशियों के रंग, रोग निवारण हेतु रंगों का प्रयोग व संगीत का सहयोग
भारतीय ज्योतिष में 28 नक्षत्रों को बारह भागों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक भाग में जो नक्षत्र आकार जिस प्रकार
की आकृति बनाते हैं या हमें दृष्टिगोचर होते हैं। इस आकृति के आधार पर उस राशि का
नामकरण किया गया है।
“यह राशियां बारह रूपों में नाम अनुसार इस प्रकार
है :-
|
1. मेष |
2. वृष |
3. मिथुन |
|
4. कर्क |
5. सिंह |
6. कन्या |
|
7. तुला |
8. वृश्चिक |
9. धनु |
|
10. मकर |
11. कुम्भ |
12. मीन |
जिस प्रकार संगीत के सात स्वरों का सम्बन्ध सात ग्रहों से
है उसी प्रकार बारह राशियों का सम्बन्ध सप्तक के बारह स्वरों से है। सातों ग्रह
जिस प्रकार बारह राशियों में भ्रमण करते हुए अपनी परिक्रमा पूरी करते हैं। उसी प्रकार
संगीत के सात स्वर अपने सप्तक में भ्रमण करते हैं और इन बारह राशियों के अपने-अपने
अनुसार रंग भी होते है। जिनका समुचित प्रयोग किसी भी जातक का शुभत्व बढ़ा सकता है।
|
क्र.सं. |
राशि |
रंग |
ग्रह-तत्व दिशा |
स्वर |
|
1. |
मेष |
लाल, गाढ़ा गुलाबी और सिंदूरी |
मंगल-अग्नि-पूर्व |
सा |
|
2. |
वृष |
पैस्टल, हल्का गुलाबी, हल्का नीला, हरा |
शुक्र-पृथ्वी-दक्षिण |
रे कोमल |
|
3. |
मिथुन |
पीला, क्रीम, लैमन और
एम्बर |
बुध-वायु-पश्चिम |
रे |
|
4. |
कर्क |
सिल्वर, हल्का भूरा और कांसा |
मंगल-जल-उतर |
ग कोमल |
|
5. |
सिंह |
नारंगी, सुनहरा और बादामी |
चन्द्रमा जल-उतर |
ग |
|
6. |
कन्या |
गाढ़ा हरा, जई और गहरा नीला |
सूर्य-अग्नि-पूर्व |
म |
|
7. |
तुला |
नीला, आसमानी, हल्का
गुलाबी |
बुध-पृथ्वी-दक्षिण |
म तीव्र |
|
8. |
वृश्चिक |
मजेन्टा, गहरा लाल, चटकीला
गुलाबी |
शुक्र—वायु-पश्चिम |
प |
|
9. |
धनु |
नीला, बैगनी गहरा, गहरा जामुनी |
गुरू-अग्नि-पूर्व |
ध कोमल |
|
10.
|
मकर |
काला, भूरा |
शनि-पृथ्वी-दक्षिण |
ध |
|
11.
|
कुम्भ |
नीला, हरी आभा वाला नीला |
वरूण-वायु-पश्चिम |
नी कोमल |
|
12.
|
मीन |
समुद्री हरा, जामुनी |
गुरू-जल-उतर |
नी |
प्रकृति की सभी वस्तुएं और चराचर जगत के सभी प्राणी रंगों
से प्रभावित होते है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध हो चुका है। इन्फ्रारेड किरणों
व अल्टरावोयलेट किरणों का प्रभाव वैज्ञानिकों ने अनेकों प्रयोगों से सिद्ध किया है
और चिकित्सा जगत में इनका विभिन्न रूपों में प्रयोग हो रहा । जिस प्रकार विभिन्न
रंगों का चिकित्सा जगत में प्रयोग हो रहा है। उसी प्रकार चिकित्सा जगत में विभिन्न
प्रकार की ध्वनियों का प्रयोग हो रहा है।
ज्योतिषीय आधार पर रंगों का प्रयोग करते हुए संगीत की विभिन्न ध्वनियों का उनके साथ
सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास यहाँ पर किया है और यह प्रयास लग्न आधारित है।
ज्योतिष में सूर्य उदय से लग्न प्रारम्भ होता है। प्रत्येक 2 घण्टे का एक लग्न होता है इसी प्रकार 24 घण्टों को 12 भागों में अर्थात् लग्नों में विभाजित किया जाता
है। जिस राशि में सूर्य होता है। सूर्य उदय के समय उसी राशि का लग्न नाना जाता है।
इसी क्रम दृष्टि से 12 राशियों का
सम्बन्ध 12 स्वरों के साथ हम मानकर चल रहा है।
सा स्वर
मेष राशि, स्वर सा इस
राशि में सूर्य उच्च का होता है। इस राशि का रंग लाल, गाढ़ा गुलाबी, सिंदूरी होता
है। इसका ग्रह मंगल, तत्व अग्नि, पूर्व दिशा और समय सूर्य उदय है। संगीत की दृष्टि से प्रातःकाल का समय
अभ्यासार्थ अच्छा माना गया है, प्राचीन काल से
इस समय संगीत के अभ्यासार्थ षड्ज का या मन्द्र सप्तक के खरज का प्रयोग उचित बताया
गया है। मेष राशि वालों के लिए गाढ़ा लाल रंग इसलिए शुभ है क्योंकि इस राशि का
स्वामी मंगल है जो स्वयं लाल ग्रह के नाम से जाना जाता है। इसका स्वभाव भावुक, आत्मविश्वासी और संवेदनशील होता है। इस राशि में लाल रंग नकारात्मक विचारों को
हटाता है और उत्साहवर्धक ग्रन्थि एडिनल को उत्तेजित करने में मदद करता है जिससे आप
में उत्तेजना और उत्साह का संचार होता है। सबसे बढ़कर इसके प्रयोग से आप में
आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा होता है। इसका उपयोग तब करें जब आप कोई
काम शुरू कर रहे हों और आपको अधिक शक्ति की आवश्यकता हो तो कोई लाल चीज धारण करें
या किसी लाल चीज पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। इसका प्रयोग हमें नहीं करना चाहिए, जब किसी बात पर क्रोध आने से आपका खून खौल रहा हो तब आपको कोई लाल चीज कदापि नहीं देखनी चाहिए और न ही धारण करनी चाहिए वरना
आपसे कोई ऐसा काम हो जाऐगा जिसका
बाद में चलकर आपको पछतावा हो सकता है।
रे’-स्वर(कोमल)
"वृष राशि, स्वर रे कोमल, वाद्य
डमरू"। इस राशि में ग्रह शुक्र, उच्च का चन्द्रमा, तत्व पृथ्वी तथा दक्षिण
दिशा है। "इसका रंग पैस्टल, हल्का गुलाबी, हल्का नीला, हल्का हरा होता है। जिन रागों में रे कोमल की प्रधानता होती है उन रागों का
समय सूर्योदय के तुरन्त बाद माना गया है। इन रागों में रे कोमल की प्रधानता होती है। वृष राशि
का तत्व पृथ्वी है और इसका स्वामी शुक्र है। पर यह राशि पृथ्वी से संचालित न होकर
शुक्र से संचालित होती है और शुक्र को आनन्दायक,
सुन्दर और शान्तिदायक वस्तुएं अधिक पसन्द होती है। इसका
स्वभाव स्नेहल, शान्ति और संतुष्ट होता
है। इसकी विशेषता यह है कि हल्का गुलाबी रंग वृष राशि वालों के स्नेहल और सरल पक्ष का
प्रतिनिधित्व करता है। हल्का नीला रंग सन्तुष्टि का प्रतीक है, जबकि हरा रंग आपके भौतिक पक्ष को उजागर करता है। यह विकास का भी द्योतक है।
रंग का विशेष महत्व है, क्योंकि यह
सर्वाधिक पीड़ानाशक और संतुलन पैदा करने वाला माना जाता है। इसका प्रयोग घर के
अन्दर करना अधिक लाभदायक होता है, खासतौर से
बाथरूम और बेडरूम में। इन रंगों को देखने से तनाव और असुरक्षा की भावना कम होती है
और आप खुद को आरामदेह व सुरक्षित महसूस करते हैं।
वृष राशि वाले प्रायः आलसी होते है। अव्वल या तो वह काम
शुरू नही करते और
शुरू करते हैं तो धैर्यपूर्वक उस पर डटे रहना उनके लिए कठिन होता है। इसलिए अगर आप सचमुच कोई काम करना
चाहते हैं, तो अपने आस-पास से पेस्टल रंग हटा दे और ऐसा कोई
गाढ़ा रंग रखें जो आप में शक्ति और उत्साह का संचार करे।
रे-स्वर
मिथुन राशि, स्वर रे शुद्ध, वाद्य मंजीरा ।
इस राशि का स्वामी बुध, तत्व वायु
तथा पश्चिम दिशा होती है। इस राशि का रंग पीला, क्रीम, लैमन और ऐम्बर होता है। ज्योतिष के
अनुसार तीसरा लग्न जिसका औसत समय 9 से 11 बजे सुबह है। इस वर्ग में रे शुद्ध वाले रागों की प्रधानता होनी चाहिए। मिथुन राशि का तत्व वायु है।
उपरोक्त सभी रंग मिथुन राशि वालों की विशेषताओं को उभारने में मदद करते हैं। पीला रंग श्रेष्ठ
मानसिक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह बौद्धिक क्षमता और प्रसन्नता का
प्रतीक है। यह सकारात्मक विचारों को उत्प्रेरित करता है और अभिव्यक्ति को धारदार
बनाता है। इसका प्रयोग मन की दुविधा दूर करने के लिए सूर्य के चमकदार पीले प्रकाश
पर अपना ध्यान केन्द्रित करके करना चाहिए। सरसों के पीले फूलों से लहलहाते खेत की
कल्पना करें। इससे आपके मन में नई आशा का संचार होगा और उत्साह से काम करने की
प्रेरणा मिलेगी। अगर आप क्रोध में हैं तो पीले रंग का प्रयोग न करें क्योंकि यह आग
में घी का काम करेगा और इससे आपकी जुबान में कड़वाहट आएगी। ऐसी स्थिति में कोई चमकदार सफेद चीज धारण करें या कोई
सफेद चीज देखें, इससे आपका मन धीरे- धीरे शान्त हो जाएगा और
कुछ ही देर में आप अपने क्रोध पर काबू पा जाएगें।
ग’-स्वर(कोमल)
कर्क राशि, स्वर ग कोमल, वाद्य बांसुरी। इस राशि में बृहस्पति उच्च का होता
है। इसका ग्रह चन्द्रमा, तत्व जल तथा उत्तर दिशा होती है। इसका रंग सिल्वर, हल्का भूरा और कांसा जैसा होता है। ज्योतिषीय आधार में 11 से 1 चौथा लग्न होता है। इस वर्ग के रागों में कोमल ग की प्रधानता होती है। इन रंगों का सम्बन्ध
चन्द्रमा से होता है जो कर्क राशि का स्वामी है। यह एक ऐसा
रंग है जो प्रकाश के गुणों के साथ बदलता है। इसका स्वभाव निर्मल, शान्त और विचारशील होता है। इसकी धातु चाँदी है जो शांति और ध्यान का प्रतीक है इससे विचारों और भावों का
उतार-चढ़ाव सहज भाव से होता है। ग्रे रंग शक्ति का प्रतीक है जो कर्क और दूसरों के स्वभाव के साथ
उनकी क्रिया- प्रतिक्रियाओं में तालमेल बैठाने की उनकी क्षमता को प्रोत्साहित करता है। कर्क राशि वाले व्यक्ति
भावनाओं के दास होते हैं इसलिए उन्हें इसका प्रयोग सिल्वर रंग के रूप में करना चाहिए। भावनाओं में
बहकर वे अनिष्टकारक कार्य भी कर बैठते हैं। ऐसी स्थिति में सिल्वर रंग उनकी भावनाओं का शमन करता है। गहरा ग्रे आपके
स्वभाव पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे आप में चिड़चिड़ापन आनें के साथ विक्षिपत्ता सी आएगी। अतः
इसका प्रयोग न करें।
ग-स्वर
सिंह राशि स्वर ग शुद्ध वाद्य जलतरंग। इसका ग्रह सूर्य, तत्व अग्नि तथा पूर्व दिशा है। इस राशि का रंग नारंगी, सुनहरा, बादामी होता है। सिंह राशि वाले व्यक्ति अभिमानी होते
हैं। इस राशि का स्वामी सूर्य होने के कारण व्यक्ति के स्वभाव में सूर्य की प्रखरता का होना स्वाभाविक
है। इस प्रखरता का प्रभाव कम करने के लिए ग्रीष्म ऋतु में सुलभ सभी रंगों पर विचार करना चाहिए। इसका स्वभाव
अपव्ययी, वी, जीवंत और उदार होता है। इसकी विशेषता है कि नारंगी रंग विपत्ति में आपको शक्ति देता है
और आपके मार्ग को रोकने वाली मनोवैज्ञानिक बाधाओं को दूर करने में मदद करता है। सुनहरा रंग आपकी करूणा, स्वामी भक्ति और विश्वसनीयता का प्रतीक है। इसका प्रयोग नारंगी रंग की कोई भी चीज आपके
अन्दर घिर आए निराशा के बादलों को छांट कर आप में नए उत्साह का संचार करता है। इसका प्रयोग तब नहीं करना चाहिए
यदि परिस्थितियां आपको पीछे हटने के लिए बाध्य कर रही हों तो सुनहरी धूप जैसे रंगों से दूर रहें।
क्योंकि इससे आपके स्वभाव का अहंकारी और अहिष्णु पक्ष उजागर हो जाएगा। और आपको परिस्थितियों के साथ
सामंजस्य बैठाने में कठिनाई होगी। अतः इसके बजाय सिल्वर रंग पर विचार करें।
म-स्वर
कन्या राशि, स्वर म शुद्ध, वाद्य घुंघरू।
इस राशि का स्वामी बुध है और यही पर इसका उच्च स्थान है। इसका तत्व पृथ्वी तथा दिशा दक्षिण
हैं इसका रंग गाढ़ा हरा, जेई, भूरा और गहरा नीला होता है। संगीत में अपराह्न 3 से 5 का समय वर्षा ऋतु से सम्बन्धित है एवं इस दृष्टिकोण से वर्षा ऋतु के रागो में शुद्ध म का प्राबल्य होना चाहिए। इस वर्ग में मल्हार और मल्हार के प्रकार आते हैं। कन्या राशि वाले
व्यक्ति अत्यन्त लचीले और समझदार होते हैं। इस राशि का स्वामी बुध है। जिसे विविधता पसन्द है, इसलिए कई प्रकार के रंग इस राशि के लिए शुभ हैं। इस राशि के तत्व को व्यवहारिकता
पसन्द है। इसलिए फैशन इसके लिए खास महत्व नहीं रखता है। इसका स्वभाव विवेकशील, सहयोगी, समझदार और चतुर होता है।
इसकी विशेषता यह होती है कि गहरा रंग इनकी थकान दूर करने में मदद करता है। भूरा रंग को इसकी शक्ति को नष्ट होने से बचाता है और गहरा
रंग इनको दूसरों के आकर्षण का केन्द्र बनाता है। इसका प्रयोग तब
करना चाहिए जब पूर्णता को प्राप्त करने के लिए स्वयं को बेरहमी से खपा
सकते हो। भूरा,
सफेद और बिस्किटी रंग आपको वास्तविकता के धरातल पर ला सकते हैं। जब आप सोचें
कि आप ऐसे छोटे बड़े काम नहीं कर पाएं है जिन्हें करना आपके लिए जरूरी था आप
घबराहट और गुस्से में हो तो जिन शुभ रंगों का ऊपर उल्लेख किया गया है उनके बारे
में सोचें भी नहीं। अर्थात् इन रंगों का प्रयोग न करें। इसके बजाए किसी नीली वस्तु
पर विचार करें।
म
(तीव्र) स्वर
तुला राशि, स्वर तीव्र म
और वाद्य करताल। उच्च का शनि, ग्रह शुक्र, तत्व वायु तथा पश्चिम दिशा होती है। इस राशि का रंग नीला, 'आसमानी' हल्का गुलाबी होता है। इस लग्न
का समय 5 से 7 होता है। इस समय रात्रि का आगमन तथा दिन की विदाई होती है अर्थात् सन्धिबेला का समय
होता है। सप्तक का सातवां स्वर म अर्थात् तीव्र मध्यम इससे सम्बन्धित है। जिन रागों में तीव्र मध्यम की
प्रधानता होती है वह इस वर्ग में आते हैं। इस वर्ग के रागों में पंचम दुर्बल होता है। ज्योतिषीय आधार से
तुला राशि का स्वामी शुक्र है, जो शान्तिप्रिय है। इसे आकर्षक तथा सौम्य रंग
प्रिय है। आसमानी रंग आपके लिए विशेष रूप से शुभ है। इसका स्वभाव मधुर, प्रेमालु, प्रसन्न, शांत और ईमानदार होता है। इसकी विशेषता यह है कि नीला रंग दिल और दिमाग में संतुलन पैदा
करता है। यह आपके व्यक्तित्व के सर्वोत्तम गुणों जैसे ईमानदारी, सच्चाई और निष्ठा का प्रतिनिधित्व करता है। नीले रंग का प्रयोग गले पर शासन करता है इसलिए
वह तुला राशि वालों की सबसे बड़ी कमजोरी "आवश्यक होने पर भी न बोल पाने की स्थिति"
में मदद करता है। नीला रंग नीले आकाश के नीचे शान्तिपूर्वक वार्तालाप करने की प्रेरणा देता है। तुला राशि वालों में
सबसे अवगुण जोड़-तोड़ करने का होता है। नीला रंग उनके इस अवगुण को और भी बढ़ा देता है। तब
इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसकी जगह मध्यम नीले रंग की चीज का प्रयोग करें और
पेचीदा स्थिति में बिचौलिए की भूमिका निभाए।
प स्वर
वृश्चिक राशि, स्वर प, वाद्य पूगी अर्थात् बीन।
इसका ग्रह मंगल, तत्व जल तथा उत्तर दिशा होती है।
इसका रंग मजेन्टा, गहरा चटकीला
गुलाबी, गहरा लाल होता है। इसका समय 7 से 9 होता है। इस वर्ग के रागों में जहां पंचम का महत्व अधिक होता है
वहीं तीव्र मध्यम और कोमल धैवत का प्रयोग भी होता है। पंचम का सम्बन्ध बृहस्पति के साथ होता
है। वृश्चिक राशि मंगल से सम्बन्धित है। इस राशि पर शासन करने वाले दो ग्रह हैं-मंगल और यम। इन दोनों के मेल से ही
इसका रंग निश्चित होता है। मंगल आपको लाल रंग देता है पर यम उसे गहरा या गाढ़ा बनाता है। इसका
स्वभाव तीव्र, दृढ़ रहस्यमय होता है। इसकी विशेषता यह है कि लाल रंग
उत्साह में वृद्धि करने वाला तथा आपके जीवन में प्रसन्नता लाने वाला होता है। यम का सम्बन्ध मृत्यु और पाताल से होने
के कारण लाल रंग उससे मिलकर वृश्चिक राशि वालों को आपदाओं से लड़ने का सामर्थ्य प्रदान करता है। अपने
जीवन में बदलाव लाना हो तो किसी गहरे लाल पारदर्शक पात्र से लाल पेय पदार्थ का प्रयोग करें। इससे आपका
रक्तचाप ठीक होगा और रक्त संचार में सुधार होगा। लाल रंग खतरे का भी प्रतीक है। वृश्चिक (बिच्छु) में
डंक होता है, यह तो सभी जानते हैं। यदि आप क्रोध में हैं तो लाल
रंग से बचें। गुस्से को शान्त करने के लिए हल्के भूरे या सफेद रंग का इस्तेमाल करें।
ध-स्वर(कोमल)
धनु राशि, स्वर कोमल ध, वाद्य एकतारा। धनु राशि का ग्रह गुरू, तत्व अग्नि तथा पूर्व दिशा होती है। इसका रंग नीला, गहरा बैगनी और गहरा जामुनी होता है। इसका समय रात्रि 9 से 11 होता है। इस वर्ग के रागों में कोमल धैवत की प्रधानता होती है।
विशेष बात यह है कि इसमें शुद्ध मध्यम लगता है। इस राशि का स्वामी गुरू है। नीला रंग गुरू का प्रतिनिधित्व
करता है। परन्तु क्योंकि आप मात्र मनुष्य है इसलिए उसमें थोड़ी सी लाल रंग की छटा जरूरी है। लाल रंग धनु
राशि के तत्व अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है। इसका स्वभाव प्रबुद्ध, उल्लासपूर्ण, आध्यात्मिक, बुद्धिमान और आशावादी होता है। इसकी विशेषता यह है कि नीला रंग जीवन का पुनः मूल्यांकन
करने की प्रेरणा देता है। इससे आपका झुकाव आध्यात्मिकता की खोज की ओर हो सकता है। रक्त चिकित्सा
में इस्तेमाल करने पर पीड़ा दूर करने में यह जादू सा असर करता है। बैंगनी रंग ज्ञान के प्रतीक
आपकी प्यास दर्शाता है और आप में आशा का संचार करता है। संसार की वास्तविकताओं के
कारण मन में घोर निराशा के बादल घिर आऐं हो तो नीले रंग के उपयोग से ये बादल आपको ढूढ़ते हुए दिखाई
देगें और आपके अन्दर आपत्तियों के थपेड़ों को सहने की आध्यात्मिक शक्ति आएगी। बैंगनी रंग में
लाल रंग की मात्रा अधिक होगी तो आपके स्वभाव में लापरवाही और उदंडता आएगी। तब
इसका प्रयोग न करें। ऐसी स्थिति में गहरे लाल रंग के बजाए
हल्के बैंगनी
रंग का इस्तेमाल करें।
ध-स्वर
मकर राशि स्वर धैवत, वाद्य वीणा और
उच्च का मंगल होता है। इस राशि का स्वामी शनि तत्व पृथ्वी तथा दिशा दक्षिण होती है। इसका रंग काला, भूरा होता है। इसका समय रात्रि के 11 से 1 का होता है। इसका सम्बन्ध सप्तक के धैवत
स्वर के साथ है। अतः इस वर्ग के रागों में शुद्ध धैवत का
महत्व अधिक होता है। मकर राशि का स्वामी शनि है और इसका तत्व पृथ्वी है। काला और भूरा रंग शनि की शक्ति को
नियन्त्रण में रखता है और आगे बढ़ने की आवश्यक शक्ति देता है। इसका स्वभाव नियन्त्रित, सशक्त, अनुशासित, सतर्क और नपा- तुला होता है। इसकी यह विशेषता होती है कि काला और भूरा रंग दोनों ही मकर राशि वाले
व्यक्ति के स्वभाव के रहस्यमय और सत्तावादी पक्ष को उजागर करते हैं। इसके उपयोग से आपकी बुद्धि
और महत्वाकांक्षाओं में वृद्धि होती है। काला रंग प्रबन्ध निर्देशकों का रंग होता है। यह आत्म संयम का प्रतीक है। किसी काम
में आप सफलता पाना चाहते हैं तो काले रंग के कपड़ों का प्रयोग करें। अधिक काले रंग का प्रयोग
न करें क्योंकि यह आपके भीतर नकारात्मक भावना और नकारात्मक विचार पैदा कर सकता है और आपकी प्रगति में बाधक बन
सकता है। इसलिए अलग-अलग स्वभाव के लिए अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल करें।
नी’-स्वर(कोमल)
कुम्भ राशि, स्वर कोमल नी, वाद्य तुम्बा।
इसका ग्रह वरूण, तत्व वायु और पश्चिम दिशा होती है। इसका
रंग नीला, हरी आभा वाला नीला होता है। इसका समय 1 से 3 रात्रि का होता है। इस वर्ग के रागों में कोमल
नी की प्रधानता विशेष
रूप से होनी चाहिए। कुम्भ राशि का स्वामी अरूण है और अरूण का सम्बन्ध नीले रंग से होता है। सूर्य से
दूरी के कारण वरूण को उससे ठण्डी ऊर्जा मिलती है। इससे आपके अन्दर की तर्कशक्ति बढ़ती हैं नीले रंग का सम्बन्ध वायु
तत्व से होता हैं इसका स्वभाव प्रखर, मैत्रीपूर्ण, स्वतन्त्र और बुद्धिमत्तापूर्ण होता है। इसकी
विशेषता यह है कि नीला रंग मौलिक और नये विचारों को जन्म देने वाला होता है। स्वयं को
बिजली के नीले प्रकाश में लिपटा हुआ महसूस करें। इससे आपको लगेगा कि आपके विचार सामान्य नहीं अपितु
विशिष्ट है। कुम्भ राशि वालों की विशेषता यह है कि ये आत्मीयता को मित्रता में बदल देते हैं
आपके विशिष्ठ रंगों का ठण्डापन इसमें कोई मदद नहीं करता। इसलिए लोगों को अपने निकट लाने के लिए और सम्बन्धों को
प्रगाढ़ करने के लिए नीले रंग में थोड़ा लाल रंग शामिल करें।
नी स्वर
मीन राशि, स्वर शुद्ध नी, वाद्य चिमटा मीन राशि का ग्रह गुरू, तत्व जल और उत्तर दिशा होती है। इसका रंग समुद्री हरा तथा जामुनी होता है। मीन राशि का शुक्र उच्च का
होता है। इसका समय 3 से 5 प्रातः काल होता है। इस वर्ग के रागों में नी शुद्ध की प्रधानता होती है।
समुद्री हरे रंग में आपके तत्व जल और आपकी राशि के स्वामी वरूण दोनों का समावेश होने
के कारण आपके
व्यक्तित्व में सागर के हमेशा बदलते रंगों की छटा है। आपको जामुनी रंग गुरू से मिला है।
19वीं शताब्दी में वरूण की खोज होने से पहले आपकी
राशि का गुरू ही था। इसका स्वभाव संवेदनशील, सहज ज्ञान युक्त और रसिक होता है। इसकी विशेषता है कि समुद्री तथा जामुनी रंग परिस्थिति
के साथ स्वयं को ढाल लेने की आपकी क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है। समुद्री तथा जामुनी दोनों ही रंग मीन
राशि "मछली" के रोग निवारक गुण रखते हैं। इन दोनों को सिर्फ देखने के बजाए उन्हें ग्रहण करना
अधिक लाभदायक होता है। मीन राशि वालों से इकरार करवाना मुश्किल होता है। अपने शुभ रंगों को अपनी अस्पष्टता का बहाना न
बनाऐं। अपने विचारों में स्पष्टता लाने के लिए पीले रंग का प्रयोग करना उचित रहेगा।
ज्योतिष
की कसौटी पर गृह-योग राग गान"संगीत"
भारतीय संस्कृति सबसे पुरातन है और इसकी पुरातनता ऐतिहासिक
तथ्यों से आज तक नापी नहीं जा सकती। इतिहास तथ्यों पर आधारित कहानी कहता है। उस दृष्टि से भारतीय
संस्कृति 7 से 10 हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। परन्तु इतने पुराने अवशेषों को देखने से यह पता चलता है कि
इस संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी अर्थात् अनेकों हजारों वर्ष पुरानी है। ज्ञान का अतुलनीय भण्डार
भारतीय संस्कृति में वेदों के रूप में प्राप्त होता है। प्राचीन काल से ही विश्व के सभी देश ज्ञान के
लिए भारत की ओर देखते रहे और भारत ने अपने गुरू होने की भूमिका भली-भांति निभाई। भारतीय संस्कृति
की अक्षुणता का कारण यह है कि इस संस्कृति का आधार वैज्ञानिक है।
1. बुद्धादित्य योग
"बुद्धादित्य योग" ज्योतिष के आधार पर सम्बन्ध बुध से है और सूर्य से है। संगीत के क्षेत्र में देखें तो यह बुद्धादित्य योग षड्ज मध्यम भाव द्वारा उत्पन्न होता है क्योंकि सा का अधिपति सूर्य और म का अधिपति बुध है। जिन रागों में सा, म का संवाद होता है वे अति मधुर, लोकप्रिय है। उदाहरणतः राग केदार में सा, म का संवाद होता है। राग भीमपलासी, राग मारू विहाग, बागेश्री, मालकोंस, बसन्त आदि रागों में भी सा म का संवाद होता है।
2. गज केसरी योग
संगीत में ऋषभ का सम्बन्ध चन्द्रमा से
तथा पंचम का सम्बन्ध बृहस्पति से है। जिन रागों में रेप या प, रे की संगति होती है वे राग लोगों द्वारा बहुत गाए बजाए जाते हैं। मधुरता की दृष्टि से इन
रागों का कोई जवाब नहीं उदाहरणतः राग जयजयवन्ती का प, रे का संवाद, राग शुद्ध कल्याण का प, रे का संवाद और राग कामोद का प, रे का संवाद, राग छायानट आदि अनेक राग है।
3. केसरी योग
ज्योतिष में सूर्य, गुरू की युति बहुत शुभ मानी गई है। इसे केसरी योग कहते हैं। संगीत में
षड्ज, पंचम संवाद होता है। जिन रागों में सा-प का संवाद होता है वे राग भी सदा ही लोकप्रिय रहें
हैं। इस श्रेणी में राग तिलक, राग कामोद, राग देसी आदि राग आते हैं।
4. कपि योग
संगीत की दृष्टि से नी, प की संगति
इसके अर्न्तगत आएगी क्योंकि निषाद स्वर शनि से और पंचम गुरू से सम्बन्धित हैं जिन रागों में नी, प की संगति होती है वे राग
इस योग से सम्बन्धित जातकों द्वारा अधिक पसन्द किए जाते हैं। इन रागों में राग मल्हार और उसके
प्रकार, राग सारंग के प्रकार, राग तिलक कामोद, राग देश
इत्यादि राग प्रमुख हैं। इस योग के निःसन्देह ऐसे जातक अर्न्तर्गत राग कान्हड़ा भी आता है।
5. सूर्य-शुक्र योग
संगीत में जहां सा, सूर्य का स्वर है। वहीं ध शुक्र का
स्वर हैं। अर्थात् सा-ध का संवाद जिन रागों में होता है वे इसी श्रेणी के अर्न्तगत
आते हैं जैसे राग भूपाली, राग देशकार, राग
पहाड़ी, राग दुर्गा, राग भटियार आदि
आते
6. बुध-शुक्र योग
संगीत क्षेत्र में इस योग से सम्बन्ध रखने वाले
स्वर म, ध बुध-शुक्र हैं। जिन-जिन रागों में यह योग होता है।
यह राग लोक रूचि से जुड़े हुए होते हैं। इस वर्ग के अर्न्तगत राग बागेश्री,
राग रागेश्वरी, राग मालकौंस इत्यादि आते हैं।
7. बुध-शनि योग
संगीत क्षेत्र में यह योग म, नी का संवाद कहलाता है
क्योंकि मध्यम बुध का तथा निषाद शनि का स्वर है। जिन रागों में म नी प, पनी म प, नी पम प स्वर
संगतियां आती है। अधिकांशतः वह राग वर्षा से सम्बन्धित होते हैं। यह दोनों ग्रह
वायु तत्व वाले हैं। अतः वायु के समान चंचलता इन जातकों तथा रागों में बनी रहती
हैं इसमें मल्हार अंग के राग प्रचार व प्रसार में आते हैI
सप्तक के स्वर, ग्रह, मूर्छना
तथा आधुनिक थाट
संगीत के प्राचीन ग्रन्थों में ज्योतिष आधारित जिस स्वर
सप्तक की कल्पना की गयी है। वह काफी थाट के सदस्य हैं। सप्तक के सात स्वरों का सात
ग्रहों के साथ सम्बन्ध भी ग्रन्थकारों ने अलग-अलग ढंग से बताया है। हम यहां नारद
के बताए पथ पर चलेंगे क्योंकि सप्तवार, सप्तग्रहों से सम्बन्धित है
ओर इन सात वारों का सम्बन्ध सप्त स्वरों से है। प्राचीन रागों का स्वरूप आज हमारे
समक्ष नहीं है इसलिए आधुनिक प्रचलित रागों का हम प्रयोग करेंगे। सिद्धान्त मूलतः
पुराने ही होगें और वे सिद्धान्त जिनके अवशेष आज हम देखते हैं उन्ही का आज हम
प्रयोग करेंगे। जिस प्रकार भूगर्भ शास्त्री विभिन्न स्थानों की खुदाई कर पुराने
अवशेषों को ढूंढ़ते हैं और निष्कर्ष रूप में उस सभ्यता का दिगदर्शन करते और करातें
है। उसी प्रकार प्रचलित संगीत प्रणालियों में तथा रीति-रिवाजों में हमें अपने
संगीत के पुरातात्विक अवशेष ढूढ़ने चाहिए और इसी आधार पर सप्ताह के सात दिनों का, संगीत के सात
स्वरों के साथ सम्बन्ध जान पड़ता है। प्राचीन काल में विद्वानों ने मूर्छना का
वर्णन करते हुए अलग-अलग मूर्छनाओं अवरोही क्रम होना चाहिए क्योंकि षड्ज सूर्य से
सम्बन्धित है और सूर्य की किरणों में अनेकों रंगों की उपस्थिति होती है और नाम के
अनुरूप 6 स्वरों का उत्पादक षड्ज होता है। सूर्य के बाद सबसे अधिक रश्मियाँ जिस
ग्रह पर पड़ती है। वह चन्द्रमा है। इसलिए ऋषम स्वर की मूर्छना का उल्लेख होना
चाहिए। इसी क्रम में बाकि मूर्छनाओं का ग्रहों के साथ क्रम बनता है
1. षड्ज
"मध्यम स्थान के षड्ज स्वर से षड्ज ग्राम की पहली
मूर्छना का
आरम्भ होता है जिसका नाम उतरमन्द्रा है।" षड्ज स्वर का
स्वामी सूर्य है। इस मूर्छना का रूप आधुनिक काफी थाट के
समान है। षड्ज स्वर का दिन रविवार है।
2. ऋषभ
इसका सम्बन्ध चन्द्रमा से है तथा इसका दिन सोमवार है। ऋषभ
से आरम्भ होने वाली मूर्छना का नाम "अभिरूदंगता"
है। यह
आधुनिक थाट भैरवी के समान है।
3. गान्धार
गान्धार से आरम्भ होने वाली मूर्छना
"अश्वक्रान्ता" नाम से जानी
जाती है। व गान्धार स्वर का सम्बन्ध मंगल ग्रह से है। यह
मूर्छना आधुनिक कल्याण थाट के समान है। इसका दिन मंगलवार
4. मध्यम
"मध्यम से आरम्भ होने वाली मूर्छना मत्सरीकृता कहलाती
है।” व
इसका सम्बन्ध बुध ग्रह से माना गया है। इसका दिन बुधवार है।
यह मूर्छना आधुनिक खमाज थाट के सादृश्य है।
5. पंचम
पंचम से आरम्भ होने वाली मूर्छना "शुद्ध षड़जा' के नाम से
जानी जाती है व पंचम का सम्बन्ध बृहस्पति के साथ माना गया
है। यह मूर्छना आधुनिक आसावरी थाट के समान है। इसका
दिन गुरूवार है।
6. धैवत
इस मूर्छना का आरम्भ धैवत स्वर से होता है। तथा यह
"उतरायता
नाम से जानी जाती है। इसका सम्बन्ध शुक्र ग्रह से है। यह
आधुनिक किसी भी थाट या राग के समान नही है। शुक्र लेकिन
दोनों मध्यम का इस मूर्छना में होना इस बात का प्रतीक है कि
यह दिन और रात की सन्धिबेला से सम्बन्ध रखता है। अगरशुद्ध म
की प्रबलता होगी तो म की सन्धिबेला का सम्बन्ध मानना
उचित होगा और तीव्र मध्यम की प्रबलता हो तो सायं सन्धि बेला
का सम्बन्ध मानना उचित होगा। इसका दिन शुक्रवार होता है।
7. निषाद
सप्तक के निषाद स्वर से आरम्भ होने वाली मूर्छना "रजनी"
नाम
से जानी जाती है। इसका सम्बन्ध शनि ग्रह से माना जाता है।
इसका दिन शनि माना गया है। यह मूर्छना आधुनिक बिलावल
थाट के सादृश्य है।
तालों के रंग, रस, स्वभाव
एवं प्रभाव
जिस प्रकार संगीत सप्तक के सात स्वरों के बिना अपूर्ण
प्रतीत होता है। उसी प्रकार संगीत तालों के बिना नीरस प्रतीत होता है। संगीत कला
में स्वर और लय का अति महत्वपूर्ण स्थान है। स्वरों की उत्पत्ति नाद से होती है और
लय उन्हें गति प्रदान करती है। लय द्वारा ही तालों की उत्पत्ति हुई है। काल को मापने
का कार्य ताल का है। संगीत में यह माप मात्राओं के माध्यम से किया जाता है। जब
मात्राओं को एक समान दूरी व गति प्रदान की जाए तो वह ताल का रूप धारण कर लेती है।
जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में स्थित नक्षत्र सूर्य की परिक्रमा लय में करते हैं उसी
प्रकार संगीत भी लय के माध्यम से ताल के रूप में संगीत की परिक्रमा उक्त नक्षत्रों
की एक आवृत्ति है। उक्त आर्वतन को बराबर-बराबर कला अनुसार विभाजित कर दिया जाए तो
कोई-न-कोई प्रकृति की ताल बन जाएगी। इसी रूप के अनुरूप संगीत में तालों की रचना की
गयी है। इन तालों में 4,6,7,8,10,12,14 और 16 मात्राओं के ताल छन्द काम में लिए
जाते हैं जिन्हें ठेका कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला के 'क' 'ट' और 'त' वर्गों को ताल
रचना में महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें त-वर्ग के वर्णों का सर्वाधिक महत्व है
तथा क-वर्ग का द्वितीय और ट-वर्ग का तृतीय स्थान है।
1. त-वर्ग
पंखावज एवं तबले पर बजाए जाने वाले बोलों में त वर्ग के
पाँचों अक्षर अर्थात् त, थ, द, ध, न तालोंपयोगी
हैं। तालों के गठन में ता, धा, ना, ति और धि ये
पाँच वर्ग आधुनिक दृष्टि से उपयोगी माने गये हैं। हिन्दी वर्ण माला में त अक्षर
16वें स्थान पर आता है। थ अक्षर 17वें स्थान के ध अक्षर के पूर्व में 16 अक्षर हैं
और बाद में भी ह अक्षर तक 16 है। इनका योग भी 7 आता है जो सात तालों की पुष्टि
करता हैं आगे तालों के महत्वपूर्ण अक्षरों के देवता, रंग, तत्व आदि की जानकारी तालिका के रूप में दी जा रही है।
|
वर्ण |
ता |
धा |
ना |
ति |
धि |
|
देवता |
गणेश |
महेश |
विष्णु |
ब्रह्मा |
भगवती |
|
रंग |
श्वेत |
लाल |
पीला |
हरा |
काला |
|
तत्व |
आकाश |
अग्नि |
जल |
वायु |
पृथ्वी |
'त-वर्ग' का गुण-सत, स्वभाव-उत्तम, रस शान्त व प्रवृत्ति-पित्त है।
2. क-वर्ग
तालों में 'क-वर्ग'
का स्थान द्वितीय माना गया है। यह वर्ग प्रथम वर्ग का सहायक होता
है। इसके 'ख' अक्षर को छोड़कर शेष
चारों अक्षरों को ताल की बंदिशों एवं सम्बन्धित तोड़ों, परनों
आदि में प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग का गुण-रजस, स्वभाव
चंचल, रस-श्रृंगार तथा प्रवृति कफ प्रधान है।
3. ट-वर्ग
तालों एवं उनके कायदे, परनों आदि
को बनाने वाला इस वर्ग का एकमात्र 'ट' अक्षर
है। इस वर्ग के अन्य अक्षरों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस अक्षर का गुण तम,
स्वभाव उग्र, रस वीर, प्रवृत्ति
बात प्रधान है। भारत में प्रमुख रूप से सात तालें अत्यधिक प्रचलन में है। जिनके
नाम है-कहरवा, दादरा, रूपक, झपताल, चौताल, दीपचन्दी और
त्रिताल। चौताल अतिरिक्त उपयुक्त छहों तालों के बोल त वर्ग हैं। चौताल में त,
क और ट इन तीनों वर्गों के बोल प्रयुक्त किए जाते हैं। यह ठेका पखावज
का है, जो ध्रुपद गायन शैली के साथ बजाया जाता है। संगीत में
गायन, वादन एवं नृत्य को प्रभावशाली बनाने में तालों की सर्वाधिक
भूमिका है। ताल का सीधा प्रभाव प्राणीमात्र पर होता है। ताल वाद्यों द्वारा शान्त,
श्रृंगार, वीर आदि रसों को प्रकट किया जा सकता
है। नीचे मुख्य सात तालों की प्रवृत्ति, रंग, रस, स्वभाव आदि की जानकारी के लिए तालिका दी जा रही
है।
|
क्रम सं. |
ताल |
प्रवृत्ति |
रंग |
रस |
स्वभाव |
वार |
|
1 |
कहरवा |
पित्त |
लाल |
श्रृंगार |
चंचल |
रवि |
|
2 |
दादरा |
वात |
हरा |
श्रृंगार |
चंचल |
सोम |
|
3 |
रूपक |
वात-पित्त |
स्वर्ण |
करूण |
उच्छृंखल |
मंगल |
|
4 |
झपताल |
कफ |
श्वेत |
हास्य |
आलस्य |
बुध |
|
5 |
चौताल |
कफ |
श्याम |
वीर |
गम्भीर |
गुरु |
|
6 |
दीपचन्दी |
पित्त |
पीला |
हास्य |
उत्साह |
शुक्र |
|
7 |
त्रिताल |
वात |
कबूतरी |
श्रृंगार |
मधूर |
शनि |
संगीत में तालों का प्रयोग गायन तथा स्वर वाद्यों के साथ
तबले पर किया जाता है। तालों के अलग-अलग बोल और लय की गति विभिन्न प्रकार की
बीमारियों को भी दूर कर सकती हैं कहरवा ताल से मानसिक रोग दूर किया जा सकता है।
दादरा ताल से हृदय को बल मिलता है। रूपक ताल गर्भवती स्त्री की पीड़ा को शान्त
करता है। झपताल मानव की पाचन शक्ति को लाभ पहुँचाता हैं चौताल त्रिदोश नाशक है।
दीपचन्दी ताल कामाग्नि को शान्त करता है। तथा त्रिताल से मिर्गी की बीमारी दूर की
जा सकती है। इस प्रकार तबला तथा पखावज पर बजाए जाने वाले अन्य तालों में विभिन्न प्रकार
की बीमारियों को दूर करने की क्षमता हैं ताल संगीत के प्राण है। मनुष्य को स्वस्थ
रखने के लिए तालों का प्रयोग संगीत में अति आवश्यक व लाभदायक है।
सार-संक्षेप
हम के विचार में
हमारा स्वर सप्तक ग्रह सम्बद्ध है। रंगों पर आधारित है और अनेक प्रकार की
मूर्छनाओं का केन्द्र है। प्रत्येक मूर्छना अलग–अलग रस का निर्माण करती है। और इन
मूर्छनाओं का सप्ताह के सात दिनों के साथ सम्बन्ध सिद्ध होता है उसी प्रकार
सप्तवारों का क्रम भी सप्त स्वरों के साथ ठीक बैठता है। इससे यह बात सिद्ध होती है
कि हमारा संगीत यह आधारित है। अर्थात् संगीत तथा ज्योतिष का सम्बन्ध प्राचीन ही
नहीं प्राचीनतम है।