भारतीय ज्योतिष का संक्षिप्त इतिहास
भारतीय ज्योतिष का संक्षिप्त इतिहास
भारत की सभ्यता विश्व की अन्य तीन प्राचीन सभ्यताओं क्रमशः प्राचीन मिस्र, प्राचीन मेसोपोटामिया तथा प्राचीन चीन के समान ही हजारों वर्ष पुरानी है, किन्तु भारतीय सभ्यता का मात्र वैदिक सभ्यता के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुतीकरण करने का प्रयास भारतीय इतिहास के साथ सरासर अन्याय है। आर्य संस्कृति अथवा वैदिक संस्कृति के
समानान्तर इस देश में अनार्य संस्कृति, असुर संस्कृति, अवैदिक संस्कृति, भौतिक संस्कृति, जैन संस्कृति, बौद्ध संस्कृति का भी बोलबाला रहा है। जहाँ तक ज्योतिष का प्रश्न है, शोध कार्य से पता चला है कि भारत में
असुर संस्कृति के अनुयायी लोगों में आर्यों की तुलना में अधिक विकसित ज्योतिष प्रणाली प्रचलित थी। अथर्ववेद के युग में तथा त्रेतायुग में भारत की विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं का सम्मिलन होने पर भारतीय ज्योतिष में और भी परिपक्वता आने लगी।
भारतीय ज्योतिष की सम्पन्नता का यह गूढ़ रहस्य नहीं समझ पाने के कारण पाश्चात्य विद्वान यह समझने की भूल कर बैठे कि भारतीय ज्योतिष यूनानी ज्योतिष का ही भारतीय संस्करण है। पाश्चात्य विद्वानों
ने यह देखने का प्रयास नहीं किया कि यूनानियों के आगमन के सैकड़ों वर्ष पूर्व से ही भारत में ज्योतिष की दो प्रमुख धाराएँ क्रमशः वैदिक धारा तथा जैन धारा प्रवाहित हो रही थीं। विश्व की अन्य किसी प्राचीन
सभ्यता में ज्योतिष के इतने परिष्कृत विकास का कोई प्रमाण नहीं
मिलता।
काल-विभाजन की दृष्टि से भारतीय ज्योतिष के विकास को हम
निम्न भागों में बाँट सकते हैं-
(क) अंधकार युग- (10,000 ई. पू. काल)
(ख) जागरण काल - (10,000 ई. पू. से 500 ई. पू. तक)
(ग) प्रारंभिक युग- (500 ई. पू. से 500 ई. तक)
(घ) मध्य युग प्रथम चरण- (501 ई. से 1000 ई. तक)
(ङ) मध्य युग द्वितीय चरण- (1001 ई. से 1800 ई. तक)
(च) आधुनिक युग- (1801 ई. से लेकर अधुना पर्यन्त ) ।
(क) अंधकार युग-दस हजार ई. पू. काल में ज्योतिष का कोई
प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु जागरण काल में प्रमाणों से पता चलता
है कि भारतवासियों को ज्योतिष के प्रारंभिक विषयों यथा काल, स्थान,
दिशा, नभ मंडल, दिवा-रात्रि, ऋतु, अयन, शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष आदि का
ज्ञान था। उन्हें सूर्य तथा चन्द्रमा की गति उसके महत्त्व का भी ज्ञान
था। कदाचित् नक्षत्रों का भी उन्हें ज्ञान था।
(ख) जागरण काल (10,000 ई. पू. से 500 ई. पू. तक) - प्राचीनकाल
में ज्योतिष शास्त्र धर्मशास्त्र का ही एक अंग था। इसे छः वेदांगों में से
एक माना गया है। वेदों, आरण्यकों, ब्राह्मण ग्रन्थों, रामायण, महाभारत,
पुराणों आदि में इसकी यत्र-तत्र चर्चा मिलती है। जैनों के द्वादशांगण तथा
प्रकीर्ण ग्रन्थों में हिन्दू ग्रन्थों के समान ही ज्योतिष की चर्चा मिलती है।
इन सभी ग्रन्थों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि भारत में दिन-रात्रि,
तिथि, माह, वर्ष, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, राहु-केतु
आदि के संचार तथा उनके प्रभावों के बारे में गहन अध्ययन
रहा था।
भारत के लोगों ने सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, लग्न, राशि चक्र, ग्रह-चक्र, ग्रहों
की विभिन्न प्रकार की गतियों का अध्ययन कर लिया था। हिन्दुओं के
छांदोग्य उपनिषद् तथा जैनों के समवायांग में राशियों तथा नक्षत्रों का
विवरण मिलता है। रामायण में तो श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की
जन्मकुंडली ही प्रस्तुत है। श्रीमद्भागवत पुराण में श्रीकृष्णादि की
जन्मकुंडली के संकेतादि हैं तो महाभारत में युधिष्ठिर आदि की जन्मकुंडली
के संकेत हैं। महाभारत में कुरुक्षेत्र युद्ध के पूर्व ग्रहों की गोचर स्थिति,
तिथि-क्षय, सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण आदि के विवरण उपलब्ध हैं।
इस युग के ज्योतिर्विदों में पितामह, वशिष्ठ, सूर्य, नारद, आत्रेय,
काश्यप, मनु, लोमश, भृगु, अंगिरा, शौनक, पुलस्त्य, च्यवन, मारीचि,
पराशर तथा व्यास का नाम उल्लेखनीय है। बाद में पोलिश तथा रोमक
आदि को भी शामिल किया गया है। नारद-संहिता, लोमश संहिता,
भृगु-संहिता, भृगु सूत्र, कश्यप संहिता, गर्ग संहिता, पराशर संहिता,
पराशरी होरा आदि इस काल के ही प्रमुख ग्रन्थ हैं। 3500 ई. पू. से 3000
ई. पू. के बीच पराशर तथा उनके पुत्र व्यास हुए। उसी युग में जैमिनी
हुए जिनका जैमिनी सूत्र आज भी प्रचलित है। यह दूसरी बात है कि भृगु,
पराशर तथा जैमिनी के मूल ग्रन्थों में बाद में काफी परिवर्तन भी किये गये
वैदिक ज्योतिष जो विभिन्न वैदिक ग्रन्थों में उपलब्ध था उसे ई. पू.
1408 में किसी ने संकलित कर वेदांग ज्योतिष का नाम दिया। इसके
रचयिता संभवतः कोई लागध नामक ऋषि थे। दूसरी ओर जैनियों ने भी
वेदांग ज्योतिष के समकक्ष सूर्य-प्रज्ञप्ति तथा चन्द्र प्रज्ञप्ति नामक दो ग्रन्थों
की रचना की।
पितामह-सिद्धान्त तथा वशिष्ठ-सिद्धांत के बाद हिन्दुओं ने सूर्य-सिद्धांत
का विकास किया। ऐसा प्रतीत होता है कि बाद में दो विदेशी सिद्धांतों
क्रमशः पोलिश सिद्धांत तथा रोमक सिद्धांत को भी भारत में परखा गया,
किन्तु हिन्दुओं ने सूर्य-सिद्धांत को ही अपनाये रखा। सूर्य-सिद्धांत में
समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं। हिन्दुओं के पितामह-सिद्धांत,
वशिष्ठ-सिद्धांत तथा सूर्य-सिद्धांत एवं जैनियों के सूर्य-प्रज्ञप्ति तथा चन्द्र-प्रज्ञप्ति से पता चलता है कि भारतीय ज्योतिष का मूलाधार स्वदेशी तथा
सुदृढ़ है।
(ग) प्रारंभिक युग (500 ई. पू. से 500 ई. सन्)- इस युग में जैनियों
ने ज्योतिष करण्डक नामक ग्रंथ की रचना की। इसका प्रतिपादित विषय
वेदांग ज्योतिष से मिलता-जुलता है। यह 300-400 ई. पू. का ग्रंथ प्रतीत
होता है। इस युग के कल्प, सूत्र, निरुक्त और पाणिनी के व्याकरण में भी
ज्योतिष के विभिन्न प्रसंग आये हैं।
ई. पू. 300 के आसपास रचित कौटिल्य के अर्थशास्त्र से तो यह
स्पष्ट ही हो जाता है कि उस समय ज्योतिष शास्त्र लोक प्रशासन का
प्रमुख अंग था।
ईसा की प्रथम शताब्दी में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम
संवत् चलाया जो आज भी हिन्दुओं का प्रचलित कैलेन्डर है। इसी युग
में ऋषिपुत्र तथा सत्याचार्य नामक दो प्रमुख ज्योतिषी हुए जिनकी चर्चा
वराहमिहिर के ग्रन्थों में भी आज मिलती है। सत्याचार्य का एक ग्रन्थ
आज भी सत्यजातक के नाम से उपलब्ध है। ऋषिपुत्र का वर्तमान में
निमित्त शास्त्र उपलब्ध है जो संहिता विषयक है।
ईसा की प्रथम शताब्दी में वृद्धयवन जातक अथवा मीनराज जातक
नामक ग्रन्थ की रचना हुई। ईसा की द्वितीय शताब्दी में स्फुजिध्वज ने
बृहद् धवन जातक की रचना की। इन दो ग्रन्थों का भारतीय ज्योतिष पर
काफी प्रभाव पड़ा है। कल्याण वर्मा के सारावली, हरजी के मानसागरी,
ढुंढिराज के जातकाभरणकम तथा बलदेव मिश्र के होरारत्न पर तो इन दो
ग्रंथों के स्पष्ट प्रभाव दिखते हैं ।
ई. पू. प्रथम शताब्दी में जैन मुनि कालकाचार्य ने 'कालका-संहिता'
नामक ग्रंथ की रचना की जिसकी चर्चा वराहमिहिर के 'बृहत्संहिता' में भी
उपलब्ध है। ईसा की प्रथम शताब्दी में उमा-स्वाति ने 'तत्वार्थ सूत्र' नामक
ज्योतिष सिद्धांत ग्रन्थ की रचना की। ईसा की तृतीय शताब्दी में
‘अंग-विज्जा' नामक जैन ज्योतिष ग्रन्थ की रचना हुई। ईसा की पाँचवींशताब्दी में भद्रबाहु नामक जैन विद्वान ने 'अर्थचूड़ामणिस्सार' तथा
'लोकविजय यंत्र' नामक दो ग्रन्थों की रचना की। प्रथम ग्रन्थ वर्णमाला
पर आधारित प्रश्नज्योतिष है। द्वितीय रचना भारतीय मानसून तथा कृषि
के परिवेश में संहिता ग्रन्थ है।
ज्योतिष का क्रमबद्ध इतिहास आर्यभट्ट प्रथम के समय से मिलता
है। इनका जन्म ईस्वी सन् 476 में पाटलिपुत्र के पास जिस ग्राम में हुआ
था वह खगौल के नाम से प्रसिद्ध है। इन्होंने ज्योतिष का प्रसिद्ध ग्रन्थ
'आर्यभटीय' लिखा। इसमें सूर्य और तारों के स्थिर होने तथा पृथ्वी के
घूमने के कारण दिन और रात होने का वर्णन है। पृथ्वी की परिधि 4976
योजन बतायी गयी है। आर्यभट्ट ने सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के
वैज्ञानिक कारणों की व्याख्या की। शक संवत् 421 अर्थात् 499 ई. सन्
में लल्लाचार्य का जन्म हुआ था। इनके गुरु का नाम प्रथम आर्यभट्ट
तथा पिता का नाम त्रिविक्रम भट्ट था । लल्ल भट्ट ने 'शिष्य-धीवृद्धि'
नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना आर्यभट्ट की परम्परा को लेकर की है।
इनका 'रत्नकोष' नामक संहिता ग्रन्थ भी मिलता है। आर्यभट्ट तथा
लल्लभट्ट दोनों ही विद्वान् ज्योतिषी बिहार राज्य के पटना शहर के पास
खगौल ग्राम के शाकद्वीपीय ब्राह्मण थे।
(घ) पूर्व मध्यकाल (501 ई. से 1000 ई. तक)
वराहमिहिर-इनका जन्म सन् 505 ई. में हुआ था। यह उज्जैन में
रहते थे। इनका सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ 'बृहत्संहिता' है जो मेदिनी ज्योतिष का
सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। इनकी 'पंचसिद्धांतिका' पूर्वप्रचलित सिद्धांतों का उत्तम
संकलन है। 'बृहत्जातक' तथा 'लघुजातक' जातक ज्योतिष के ग्रंथ हैं
जिनकी रचना इन्होंने की थी। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'विवाह-पटल',
'योगयात्रा' और 'समास-संहिता' नामक ग्रन्थों की भी रचना की।
वराहमिहिर की रचनाओं से स्पष्ट है कि कतिपय यवनाचार्यों तथा मयासुर
के विचारों का भी भारतीय ज्योतिष में समावेश हो चुका था। भारतीय
ऋषियों की परम्परा तथा वराहमिहिर के बीच जीव शर्मा, मणित्थ, विष्णु
गुप्त (चाणक्य), देव स्वामी, सिद्धसेन तथा सत्याचार्य हुए जिनके ज्योतिष संबंधी विचारों की चर्चा वराहमिहिर ने 'वृहज्जातक' में की है। इनका
'दैवज्ञ-वल्लभ' प्रश्न ज्योतिष का उत्तम ग्रन्थ है। वराहमिहिर के ग्रन्थों से
स्पष्ट है कि गुणाकर तथा कालकाचार्य उनके पूर्ववर्ती थे। जैन ग्रंथों के
अनुसार, 'होरा-मकरन्द' नामक जातक ग्रन्थ के रचयिता गुणाकर
कालकाचार्य के गुरु थे। कालकाचार्य ई. पू. प्रथम शताब्दी में हुए थे।
अतः उनके गुरु गुणाकर का काल ई. पू. प्रथम अथवा द्वितीय शताब्दी ही
हो सकता है। दोनों उज्जैन निवासी ही थे।
पृथुयशस-वराहमिहिर के पुत्र पृथुयशस ने 'होरा-सार' नामक जातक
ग्रन्थ तथा प्रश्न ज्योतिष पर 'षट्पंचाशिका' नामक ग्रन्थ लिखा।
कल्याण वर्मा-इन्होंने सन् 578 ई. में सारावली नामक जातक ग्रंथ
लिखा जो यवनजातक तथा वराहमिहिर के बृहज्जातक पर आधारित है।
कल्याण वर्मा केरलवासी थे।
ब्रह्मगुप्त - पंजाब में 598 ई. में यह उत्पन्न हुए। आर्यभट्ट के पश्चात्
भारत के यह द्वितीय महान् ज्योतिष गणितज्ञ हुए। आर्यभट्ट ने जहाँ सूर्य
तथा तारों को स्थिर और पृथ्वी को गतिशील मानकर गणना की वहां
ब्रह्मगुप्त ने पृथ्वी को स्थिर मानकर तथा सूर्य, तारों और ग्रहों को
गतिशील मानकर गणना की । ब्रह्म गुप्त ने दो ग्रन्थों की रचना की- 'ब्रह्म
स्फुट सिद्धांत' तथा 'खंड-खाट्य' । ब्रह्मगुप्त ही बीजगणित के जनक थे।
अरब वालों ने ब्रह्मगुप्त के ग्रंथ से बीजगणित सीखा तथा अरबों से
यूनानियों ने इसे सीखा।
मुंजल-इन्होंने सन् 662 ई. में 'लघुमानव' नामक एक करण ग्रंथ
लिखा। गणित जैसे नीरस विषय को भी इन्होंने रुचिकर बनाकर लिखा
है।
चन्द्रोन्मीलन-सातवीं से आठवीं शताब्दी के बीच केरल प्रश्न-ज्योतिष
के आधार पर किसी अज्ञात ज्योतिषी ने 'चन्द्रोन्मीलन' नामक प्रश्न
ज्योतिष की रचना की है।
कुवलयमाला - उदयोतन सूरि ने सन् 778 ई. में कुवलयमाला नामक एक जैन ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की। जातक तथा सामुद्रिक विद्या का
इसमें मिश्रण है।
महावीराचार्य-जैन ज्योतिष-गणितज्ञ महावीराचार्य ने सन् 850 ई. के
आसपास 'ज्योतिष-पटल' तथा 'गणितसार-संग्रह' नामक दो ग्रन्थ लिखे।
नरचन्द्र-सिंहसूरि के शिष्य नरचन्द्र ने जो राजा कुमारपाल के अधीन
शिक्षक थे, बिहार में भागलपुर के पास चम्पानगरी में सन् 867 ई. में
बेड़ा-जातक नामक ग्रन्थ की रचना की।
भट्टोत्पल-सन् 966 ई. के आसपास उत्पल भट्ट एक सुप्रसिद्ध
टीकाकार हुए। इन्होंने वराहमिहिर, पृथुयशस, कल्याण वर्मा तथा ब्रह्म
गुप्त के ग्रन्थों पर टीकाएँ लिखी हैं। इन्होंने 'प्रश्नज्ञान' नामक एक स्वतंत्र
ग्रन्थ लिखा ।
चन्द्र सेन - यह कन्नड़ प्रदेश के थे। इन्होंने 'केवल ज्ञान होरा' नामक
ग्रन्थ दसवीं शताब्दी में लिखा । वस्तुतः यह संहिता ग्रन्थ है न कि होरा
ग्रन्थ ।
श्रीपति- सन् 999 ई. में दक्षिण भारत में उत्पन्न इस ज्योतिषी ने
अनेकों ग्रंथ लिखे। ज्योतिषीय गणित में इन्होंने एक क्रांति ला दी जो
श्रीपति पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है। 'रत्नावली', 'रत्नसार' तथा
‘रत्नमाला' इनके तीन सुप्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ हैं।
श्रीधर-दसवीं सदी के अंतिम भाग में उत्पन्न श्रीधर ने 'गणितसार',
'ज्योतिर्ज्ञान विधि' तथा 'जातक तिलक' नामक तीन ग्रन्थ लिखे ।
भट्ट-वोसारी ने दसवीं सदी में 'आय-तिलक' नामक प्रश्न-ज्योतिष
ग्रन्थ की रचना की। इस सदी में भोजराज तथा ब्रह्मदेव नामक दो अन्य
सुप्रसिद्ध ज्योतिषी भी हुए थे।
(ङ) उत्तर मध्यकाल (1000 ई. से 1800 ई. तक)-
जयदेव-ई. सन् 1025 से ई. सन् 1050 के बीच बंगाल तथा मिथिला
के राजा लक्ष्मण सेन के दरबार में जयदेव राजज्योतिषी थे। इन्होंने मय
तथा अन्य यवनाचार्यों का अध्ययन किया था। इनका ग्रन्थ 'जातक
चन्द्रिका' परम्परागत हिन्दू जातक तथा यवन जातक का मिश्रण है।
कदाचित् जयदेव कश्मीरी पंडित थे।
दुर्गदेव-ई. सन् 1032 में उत्पन्न दिगम्बर जैन ज्योतिषी ने 'अर्धकांड'
तथा 'रिट्ठ समुच्चय' नामक दो ग्रन्थ लिखे जो प्रश्न ज्योतिष तथा
शकुन शास्त्र से संबद्ध हैं।
मल्लिसेन-ई. सन् 1043 में मल्लिसेन नामक एक अन्य जैन
ज्योतिषी ने 'आयसद्भाव' नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें आठ प्रकार से
भविष्यवाणी करने की विधि बतायी गई है।
भास्कराचार्य - बारहवीं शताब्दी में विजयवाड़ा में माहेश्वर नामक एक
सुप्रसिद्ध ज्योतिषी के यहाँ सन् 1114 में भास्कराचार्य उनके पुत्र रूप में
उत्पन्न हुए। वह ज्योतिषीय गणित तथा सिद्धांत ज्योतिष के प्रकाण्ड
विद्वान थे। उन्होंने सिद्धांत-शिरोमणि, लीलावती, करणकुतूहल, बीजगणित,
सर्वतोभावचन्द्रिका, भावदीपिका आदि प्रमुख ग्रंथ लिखे।
राजादित्य - श्रीपति के पुत्र राजादित्य ने ई. सन् 1120 में गणित ग्रंथ
(एक अन्य) लीलावती लिखा । वह राजा विष्णुवर्द्धन के दरबार में
राजज्योतिषी थे।
लक्ष्मणसेन-बारहवीं शताब्दी में मिथिला नरेश बल्लालसेन ने 'अद्भुत-
सागर' नामक संहिता ग्रंथ की रचना की।
नरपत कवि-ई. सन् 1170 से 1173 के बीच उज्जैन के निकट
धारापुर में नरपत कवि हुए। इन्होंने 'नरपतिजयाचार्यस्वरोदय' नामक
स्वर ज्योतिष पर एक अद्भुत ग्रंथ लिखा।
पद्यप्रभुसूरि-इन्होंने ई. सन् 1237 ई. में भुवन-दीपक नामक उत्कृष्ट
प्रश्नज्योतिष पर ग्रंथ लिखा।
नरचन्द्र द्वितीय-इन्होंने सन् 1267 ई. में बेड़ाजातकवृत्ति नामक ग्रन्थ
लिखा। इनका एक अन्य ग्रंथ 'ज्योतिष प्रकाश' मुहूर्त्त, मेदिनी तथा
जातक तीनों का मिश्रण है।
महेन्द्र सूरि ने सन् 1270 ई. में 'यंत्रराज' नामक ज्योतिषीय गणित
ग्रन्थ लिखा। कुछ विद्वानों के अनुसार ई. सन् 1300 में तेज सिंह नामक
एक प्रकांड ज्योतिषी हुए थे जिन्होंने वर्ष प्रवेशकालीन लग्न कुंडली के
द्वारा वार्षिक फलादेश करने की जो प्रणाली निकाली वह उन्हीं के नाम पर
'ताजिक' कहलाने लगी, किन्तु अधिकांश लोग 'ताजिक' को अरब की
ज्योतिष की देन मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि ग्यारहवीं सदी में
अलबरूनी के साथ जो भारत के ज्योतिषी गजनी गये थे उनमें से
वंशज जब तेरहवीं शताब्दी में भारत लौटे तो उन्होंने अरबी ज्योतिष के
आधार पर 'हिल्ला जातक' की रचना की जिसका भारत में खूब प्रचार
हुआ।
के
सन् 1300 ई. में अटूट्ट कवि ने 'अट्टमत' नामक जैन ज्योतिष ग्रंथ
लिखा ।
चौदहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के एक ज्योतिषी ने शंकराचार्य
के पदचिन्हों पर चलकर पूरे भारत का भ्रमण किया। इस ज्योतिषी का
नाम मंत्रेश्वर था। इन्होंने 'फलदीपिका' नामक फलित ज्योतिष ग्रन्थ की
रचना की जिसमें ज्योतिष के सिद्धांतों को उन्होंने एक राष्ट्रीय धारा में
मिलाने का सर्वोत्तम प्रयास किया। यही कारण है कि पराशरी होरा के
बाद 'फलदीपिका' को ही राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त है।
चौदहवीं शताब्दी में ही नारायण भट्ट ने 'चमत्कार चिन्तामणि'
नामक फलित ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की। चौदहवीं शताब्दी में ही
व्यंकटेश शर्मा ने 'सर्वार्थ चिन्तामणि' 'जातक-चन्द्रिका' (द्वितीय) तथा
'योगावली' नामक तीन ग्रन्थों की रचना की। नारायण भट्ट तथा
व्यंकटेश दोनों ही महाराष्ट्रीय थे। सन् 1350 ई. से 1450 ई. सन् के बीच
व्यंकटेश के पुत्र वैद्यनाथ का जन्म हुआ था । वैद्यनाथ ने फलित
ज्योतिष की सुप्रसिद्ध पुस्तक 'जातक पारिजात' की रचना की है।
सन् 1456 ई. में महाराष्ट्र के नान्दिग्राम में उत्पन्न केशव ने 'ग्रह
कौतुक', 'ताजिक पद्धति', 'जातक पद्धति', 'मुहूर्त-तत्त्व' आदि ग्रन्थ लिखे। केशव वैद्यनाथ के शिष्य थे। सन् 1478 ई. में काशी के मकरन्द
ने सूर्य सिद्धांत के आधार पर मकरन्द सारिणी तैयार की है। कतिपय
विद्वानों के अनुसार 15वीं शताब्दी के अंत में अथवा 16वीं शताब्दी के
पूर्वार्द्ध में महादेव पाठक के 'जातक तत्व' की रचना हुई। किन्तु अधिकांश
लोग यह मानते हैं कि महादेव पाठक ने 1842 ई. सन् से 1888 ई. सन्
के बीच 'जातक तत्व' की रचना की है।
'उत्तर कालामृत' ग्रन्थ की रचना दक्षिण भारत के किसी कालिदास
ने पन्द्रहवीं सदी के अन्त में अथवा सोलहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में की थी
तथा ई. पूर्व प्रथम शताब्दी के उज्जैन के कालिदास से इस ग्रन्थ को
जोड़ना उचित नहीं कहा जा सकता है।
15वीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ के
आसपास मंगलाद्रि के रामानुजाचार्य ने 'भावार्थ रत्नाकर', मालावार के
सोमयाजी ने 'जातकादेशमार्ग', गुजरात के हरजी ने 'मानसागरी', शिव
दैवज्ञ ने ‘शिव जातक', गोपाल दैवज्ञ ने 'गोपाल रत्नाकर' तथा पुंजराज ने
'शंभु होरा प्रकाश' की रचना की।
सन् 1517 ई. में उत्पन्न केशव के तेजस्वी पुत्र गणेश दैवज्ञ ने तेरह
वर्ष की आयु में 'ग्रह लाघवम्' नामक कठिन ग्रन्थ की रचना की। मकरन्द
की मकरन्दसारिणी तथा गणेश की ग्रह-लाघव सारिणी के आधार पर ही
हिन्दू पंचांगों का निर्माण किया जाता है। गणेश ने 'लघुतिथि चिन्तामणि',
'वृहद् तिथि चिन्तामणि', 'श्राद्धादि निर्णय', 'कृष्ण जन्माष्टमी निर्णय'
तथा 'होलिका निर्णय' आदि ग्रन्थ लिखे। गणेश ने 'सिद्धांत शिरोमणि',
'लीलावती', 'विवाह वृन्दावन' तथा 'मुहूर्त तत्त्व' आदि ग्रन्थों की टीका
भी लिखी। गणेश दैवज्ञ ने ही सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'जातकालंकार' की रचना
की है। सच पूछें तो गणेश दैवज्ञ जैसा बहुमुखी प्रतिभावान ज्योतिषी
वराहमिहिर और भास्काराचार्य को छोड़कर और कोई नहीं हुआ।
काशीनाथ ने सन् 1507 ई. में 'लग्न-चन्द्रिका' नामक ग्रन्थ लिखा।
उनकी दूसरी पुस्तक 'शीघ्र बोध' मुहूर्त के अलावा मेदिनी ज्योतिष पर भी
है। काशीनाथ बुन्देलखंड के राज-ज्योतिषी थे। नरसिंह दैवज्ञ के पुत्र
ढुंढिराज जिनका जन्म सन् 1547 ई. में हुआ, उन्होंने 'जातकाभरण' ग्रन्थ
लिखा। सन् 1556 ई. में उत्पन्न नीलकंठ ने 'ताजिक नीलकंठी' ग्रन्थ
लिखा जिसमें वर्ष कुंडली पद्धति तथा प्रश्न कुंडली पद्धति पर प्रकाश
डाला गया है।
e
नीलकंठ के अनुज राम दैवज्ञ जिनका जन्म सन् 1565 ई. में हुआ
था, सम्राट् अकबर के कृपापात्रों में एक थे। राम दैवज्ञ द्वारा रचित 'मुहूर्त'
चिन्तामणि' आज मुहूर्त ज्योतिष की सर्वमान्य पुस्तक है। राम ने अकबर
की फरमाइश पर ज्योतिषीय गणित का ग्रन्थ 'राम विनोद' लिखा। इसी
प्रकार टोडरमल को प्रसन्न करने के लिए 'टोडरानन्द' नामक ग्रन्थ लिखा ।
अकबर के सेनापति अब्दूर रहीम खानखाना ने 'खेट कौतुकम' नामक एक
ग्रन्थ लिखा जो भारतीय ज्योतिष तथा फारसी ज्योतिष के मेल का एक
नमूना है।
सोलहवीं शताब्दी में एक अन्य नारायण दैवज्ञ ने 'मुहूर्त मार्तण्ड'
नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा। सन् 1575 ई. में काशी में उत्पन्न रंगनाथ ने
'गूढार्थ प्रकाशिका' लिखी जो सूर्य-सिद्धांत की उत्तम टीका है।
सोलहवीं शताब्दी में शतानन्द, गंगाधर, भक्ति लाभ, हेमतिलक,
लक्ष्मीदास, ज्ञानराज, दुर्लभराज, हरिभद्रसूरि, विष्णु दैवज्ञ, सूर्य दैवज्ञ,
जगदेव, कृष्ण दैवज्ञ, रघुनाथ शर्मा, गोविन्द दैवज्ञ, विश्वनाथ, नृसिंह,
विट्ठल दीक्षित, सामन्त भद्र आदि ने ज्योतिष पर कोई-न-कोई ग्रन्थ
लिखा है।
नृसिंह दैवज्ञ के पुत्र दिवाकर ने सन् 1625 ई. में 'जातक-पद्धति'
नामक एक ग्रंथ लिखा। दिल्ली के ज्योतिषी नित्यानन्द ने 'सिद्धान्तराज'
नामक ज्योतिषीय गणित का ग्रंथ लिखा जो सायन पद्धति पर आधारित
है। यह ग्रंथ 1639 ई. सन् में लिखा गया। मुनीश्वर ने सन् 1646 ई. में
'सिद्धांत सार्वभौम' नामक ग्रन्थ की रचना की।
सन् 1649 ई. में केरल के किसी नम्बूदरीपाद ब्राह्मण ने 'प्रश्न-मार्ग' नामक एक बृहद् ग्रन्थ की रचना की। यह पुस्तक होराशास्त्र, मुहूर्त- ज्योतिष,
प्रश्न ज्योतिष, परिहार, निमित्त आदि का मिश्रित रूप है।
सन् 1653 ई. में कन्नौज के बलभद्र मिश्र ने जो शाहजहाँ के सबसे
बड़े शाहजादे दाराशिकोह के मित्र थे 'होरा रत्न' नामक ग्रन्थ लिखा
होराशास्त्र का इतना बृहद संकलन अन्यत्र कहीं नहीं है। रेफरेन्स
बुक के
रूप में इसकी बड़ी उपयोगिता है।
दिवाकर भट्ट के भ्राता कमलाकर भट्ट ने सन् 1658 ई. में
'सिद्धांत तत्त्व विवेक' नामक ग्रन्थ की रचना की। सन् 1665 ई. में
महिमोदय नामक एक जैन ज्योतिषी ने 'ज्योतिष रत्नाकर' नामक ग्रंथ की
रचना की। मेदिनी ज्योतिष, मुहूर्त्त ज्योतिष तथा होराशास्त्र का इस ग्रन्थ
में समन्वय है। सन् 1680 ई. में मेघ विजयगणि नामक एक जैन ज्योतिषी
ने 'वर्ष प्रबोध', 'उदयदीपिका', 'रमलशास्त्र', 'हस्त-संजीवनी' आदि ग्रंथों
की रचना की। सन् 1680 ई. के आसपास में उभयकौशल नामक एक
अन्य ज्योतिषी ने 'विवाह-पटल' तथा 'चमत्कार चिन्तामणि' (द्वितीय)
लिखा ।
सत्रहवीं शताब्दी में अच्युत ने केरल प्रदेश में 'देव केरलम्' नामक
एक नाड़ी ग्रंथ की रचना की।
सन् 1705 ई. में यशवन्तसागर ने 'यशोराज पद्धति' नामक एक होरा
ग्रन्थ लिखा। सन् 1718 ई. में जयपुर के महाराजा जयसिंह के दरबार के
राज ज्योतिषी जगन्नाथ सम्राट ने 'इजास्ति' नामक अरबी ज्योतिष ग्रन्थ
तथा अरबी रेखागणित का संस्कृत में अनुवाद किया। सन् 1726 ई. में
एक जैन ज्योतिषी बाघजी मुनि ने एक तिथि सारिणी तैयार की जो
मकरन्द सारिणी के समान ही पंचांग तैयार करने के काम में आ सकती
है।
महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् 1780 ई. में वाराणसी, जयपुर तथा
दिल्ली में वेधशालाओं का निर्माण कराया। उन्होंने पंचांग में भी आवश्यक
सुधार करवाया।
(च) आधुनिक युग (1801 ई. सन् से अद्यपर्यन्त)- बापू देवशास्त्री
(1821 ई. से 1890 ई.) जो पूना के महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे, ने भास्कराचार्य
के सिद्धांत शिरोमणि का आवश्यक संशोधन किया।
सन् 1828 ई. में उत्पन्न नीलाम्बर झा जो अरवल इस्टेट के राज
ज्योतिषी थे, ने 'गोल प्रकाश' नामक एक ज्योतिषीय गणित लिखा। इनके
ज्येष्ठ भ्राता जीवनाथ झा ने कई उपयोगी ज्योतिषी ग्रन्थ लिखे। जीवनाथ
झा ने पटना में 'भाव-प्रकाश', 'भाव कुतूहलम्', 'योगावली' तथा 'पराशरी
वासना' नामक चार होरा ग्रन्थ लिखे हैं। उनका अन्य ग्रंथ 'ताजिक दर्पण'
ताजिक ग्रंथ है। 'वास्तु रत्नावली' वास्तु शास्त्र तथा रत्न संबंधी ग्रन्थ हैं।
उनकी 'वनमाला' ज्योतिष मौसम विज्ञान पर पुस्तक है।
सन् 1885 ई. में उड़ीसा में उत्पन्न सामन्त चन्द्रशेखर ने 'सिद्धांत-दर्पण'
नामक एक सिद्धांत ग्रंथ लिखा। उन्होंने अपने राज्य में वेधशाला भी
बनवायी।
सन् 1816 ई. में रामदयालु ने अमृतसर में 'संकेत-निधि' ग्रंथ की
रचना की। काश्मीर राज्य के राज ज्योतिषी पंडित महेश ने ई. सन् 1874
में 'श्रीरणवीर ज्योतिष महानिबंध' की रचना की।
काशी के सुप्रसिद्ध विद्वान सुधाकर द्विवेदी ने सन् 1888 ई. में
वराहमिहिर के ग्रंथ पंचसिद्धान्तिका की प्रथम अंग्रेजी टीका प्रकाशित
की। उन्होंने बृहत्संहिता का भी सम्पादन किया। सूर्य-सिद्धांत, ग्रह-लाघव
तथा ब्राह्मण स्फुट सिद्धांत पर भी इन्होंने टीकाएँ लिखीं। भारतीय
ज्योतिष का पुनरुद्धार करने में सुधाकर द्विवेदी का सर्वाधिक हाथ रहा है।
जागेश्वर नामक ज्योतिषी ने सन् 1899 ई.-1900 ई. में बम्बई से
'कुंडली कल्पतरु' नामक ग्रन्थ का प्रकाशन कराया है।
उन्नीसवीं शताब्दी में ज्योतिष-जगत में नवजागरण लाने का श्रेय
तीन व्यक्तियों को दिया जा सकता है। पूना के बापूदेव शास्त्री, काशी के
सुधाकर द्विवेदी तथा दक्षिण भारत में बंगलोर के सूर्यनारायण राव।
शास्त्रीजी तथा द्विवेदीजी के बारे में बताया जा चुका है। बी. एस. राव
का जन्म 1856 ई. में हुआ था। भारतीय ज्योतिष पर अंग्रेजी भाषा में
सर्वप्रथम इनकी पुस्तक (COMPENDIUM OF ASTROLOGY) का
ही प्रकाशन हुआ है। यह पुस्तक जुलाई 1882 ई. में प्रकाशित हुई थी।
श्री राव ने वराहमिहिर तथा जैमिनी पर कई शोध कार्य किये तथा उनकी
कृतियों पर टीकाएँ लिखीं। सन् 1895 ई. में उन्होंने ही The Astrological
Magazine की स्थापना की जो ज्योतिष की सर्वाधिक पुरानी पत्रिका होने
का गौरव प्राप्त कर चुकी है। इस पत्रिका को आगे बढ़ाने में श्री राव के
पोते डॉक्टर बी. वी. रमण का प्रमुख हाथ रहा।
बीसवीं शताब्दी में ज्योतिष विद्या को प्रोत्साहित करने में पंडित
मदनमोहन मालवीय का बहुत बड़ा हाथ रहा है। बीसवीं शताब्दी के प्रमुख
ज्योतिषियों में डॉक्टर बी. वी. रमण, ए. आर. एस. आयंगर, टी. एस.
जोग्यार, टी. एस. चन्द्रशेखर, वी. एस. शास्त्री, एम. आर. के. भट्ट,
डॉक्टर कर्ण, सी. ऐय्यर, मुकुन्द दैवज्ञ, रामयन ओझा, गोपेश कुमार
ओझा, सीताराम झा, देव चन्द्र झा, मुरलीधर चतुर्वेदी, जगन्नाथ भसीन,
देवकीनन्दन प्रसाद सिंह, नेमिचन्द्र शास्त्री, एल. आर. चौधरी, आर.
संथानम, नारायण दत्त, श्रीमाली, के. ए. दूबे, पदमेश आदि के प्रमुख
योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
डॉक्टर जगन्नाथ राव ने मेडिकल ऐस्ट्रोलौजी के क्षेत्र में तथा एस.
केलकर ने भूकम्प के क्षेत्र में प्रशंसनीय शोधकार्य किये हैं। इस रचना के
लेखक के. के. पाठक ने सौ वर्षों के वर्षापात तथा भारत के पूर्व दुर्भिक्षों
पर शोधकार्य किया है जो The Times of Astrology के तीस अंकों में
प्रकाशित हो चुकी है तथा जो Mundane Astrology and Monsoon
नामक लेखक की पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुकी है। यह Astro-
Metreology पर गहन शोध है।
ज्योतिष की पत्रकारिता के क्षेत्र में The Astrological Magazine
की सफलता का श्रेय बी. एस. राव, बी. वी. रमण तथा गायत्री देवी
वासुदेव को जाता है। तत्पश्चात् The Times of Astrology की सफलता
का श्रेय आर. संथानम तथा राजेश्वरी शंकर ऐसोसियेट्स को जाता है।
श्री लक्ष्मण दास मदान के द्वारा अंग्रेजी तथा हिन्दी में प्रकाशित पत्रिका
'बाबाजी' भी गत दो दशाब्दियों से काफी लोकप्रिय हो रही है। चेन्नई से
प्रकाशित Express Star Teller भी इधर काफी लोकप्रिय हो रहा है।
बीसवीं शताब्दी में कृष्णमूर्ति ने एक नयी पद्धति को जन्म दिया है।
Ephemeris के क्षेत्र में निर्मल चन्द्र लाहिरी के योगदान को भी भुलाया
नहीं जा सकता।
बीसवीं शताब्दी की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ज्योतिष में महिलाओं
के योगदान की रही है। श्रीमती के. एन. सरस्वती, श्रीमती बी. पावनी
देवी, गोमती अन्नपूर्णा, गायत्री देवी वासुदेव आदि ने ज्योतिष के विकास
में काफी योगदान दिया है। उनकी पुस्तकें तथा रचनाएँ प्रशंसनीय हैं।
इधर सुनीता झा ने भी कुछ उत्तम ग्रन्थ लिखे हैं।
कम्प्यूटर के आविष्कार के बाद ज्योतिष जगत में इसका प्रवेश
स्वाभाविक था। कम्प्यूटर के प्रवेश होने से सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है
कि गणना का कार्य सरल हो गया है। गणना में भूल की भी कम गुंजाइश
रह गयी है। किन्तु कालान्तर में पुश्तैनी धंधे में लगे छोटे-मोटे ज्योतिषियों
को यह निश्चित रूप से बेरोजगार कर देगी। दूसरी ओर जहाँ छोटे-मोटे
पेशेवर ज्योतिषी सही कुंडली बनाने के लायक भी अब नहीं रह गये हैं
तथा अपने ग्राहकों के अज्ञान का लाभ उठाकर जो किसी प्रकार अपनी
रोटी सेक रहे हैं को यदि किनारे कर दिया जाये तो उनके लिए आँसू
बहाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इतना सब कुछ होने के बाद भी भारतीय ज्योतिष में सबसे बड़ी
खामी यह रही है कि यहाँ के पंचांगों में एकरूपता का अभाव है। इस
देश में करीब 30-32 प्रकार के अयनांश प्रयोग में हैं जिसके कारण ग्रहों
की स्थिति में कहीं-कहीं चार डिग्री का अंतर आ जाता है। यह घोर
अवैज्ञानिक है। इक्कीसवीं सदी में पंचांगों की एकरूपता पर ध्यान देना
आवश्यक होगा।
दूसरी बात यह है कि भारतीय ज्योतिष में दशा की गणना तीन सौसाठ दिन के सावन-वर्ष पर आधारित है; जबकि व्यवहार में लोग उसे तीन
सौ पैंसठ दिन के सौरवर्ष या रोमन कैलेन्डर के वर्ष के अनुसार प्रयोग कर
रहे हैं। फलतः शुभ अथवा अशुभ घटनाएँ अनुमानित समय से कुछ पूर्व
ही घट जाती हैं। अतः हिन्दू दशा-पद्धति के लिए सावन वर्ष का उपयोग
करना ही उचित होगा ।
आशा है, इक्कीसवीं शताब्दी भारतीय ज्योतिष के लिए नव विहान
तथा एक नयी आशा का अंकुर लेकर आयेगी।