अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया विशेष
हिंदू कलेंडर के अनुसार अक्षय तृतीया का त्योहार हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस साल यह तिथि 22 अप्रैल ,शनिवार को पड़ रही है। पंचांग के अनुसार अक्षय तृतीया 22 अप्रैल शनिवार की सुबह 8:04 से शुरू हो रहा है जो अगले दिन 23 अप्रैल रविवार की सुबह 8:08 बजे तक रहेगा. इस शुभ योग में दान पूर्ण करना तथा स्नान करने का काफी महत्व होता है. इससे पुण्य की प्राप्ति होती है और संकट कटते हैं. उन्होंने कहा कि लोगों को धार्मिक स्थलों पर जाकर स्नान कर गरीब, असहाय व जरूरतमंदों में दान कर पुण्य के भागी बनना चाहिए.
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया मनाने की परंपरा है. इसकी पौराणिक मान्यता भी है. इस साल पड़ने वाले अक्षय तृतीया को गुरु की राशि में परिवर्तन भी हो रहा है. अक्षय तृतीया के अवसर पर सोना, चांदी, आभूषण, वाहन, मकान, दुकान, फ्लैट, प्लॉट आदि की खरीदारी करना शुभ मामना जाता है. हालांकि इस दिन सोना खरीदना और धारण करना सबसे शुभ माना जाता है.
पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को ब्रह्म देव के पुत्र अक्षय कुमार की उत्पत्ति हुई थी. इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं. इस तिथि को आप जो भी शुभ कार्य करेंगे, उसका चार गुना फल अक्षय रहता है. उसमें कभी भी कोई कमी नहीं होती है. सोना व आभूषण को माता लक्ष्मी का भौतिक स्वरूप मानते हैं. जिस पर माता रानी की विशेष कृपा रहती है. शुभ योग होने की वजह से इस दिन सोना खरीदना काफी शुभ माना जाता है. साथ ही सोना खरीद कर धारण करने से अकाल मृत्यु नहीं होती है. पंचांग के अनुसार जो लोग अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना चाहते हैं, वे 22 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह 8:04 बजे से लेकर अगले दिन 23 अप्रैल रविवार के सुबह 8 बजे तक खरीदारी कर सकते हैं. इस दिन आभूषण खरीद कर धारण करने पर अकाल मृत्यु का खतरा क्षीण हो जाता है. यह 24 घंटे का समय त्रेता युग का योग बनाता है. इसमें भगवान परशुराम व राम का जन्म हुआ था. यह साल में मात्र एक बार ही होता है.
पंचांग के अनुसार जो लोग अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना चाहते हैं, वे 22 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह 8:04 बजे से लेकर अगले दिन 23 अप्रैल रविवार के सुबह 8 बजे तक खरीदारी कर सकते हैं.
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया मनाने की परंपरा है. इसकी पौराणिक मान्यता भी है. इस साल पड़ने वाले अक्षय तृतीया को गुरु की राशि में परिवर्तन भी हो रहा है. अक्षय तृतीया के अवसर पर सोना, चांदी, आभूषण, वाहन, मकान, दुकान, फ्लैट, प्लॉट आदि की खरीदारी करना शुभ मामना जाता है. हालांकि इस दिन सोना खरीदना और धारण करना सबसे शुभ माना जाता मासों में श्रेष्ठ वैशाख मास को पुराणों में जप, तप, दान का महीना कहा गया है इसलिए इस माह विशेष में विशेष तौर से वरुण देवता की पूजा का विशेष महत्त्व होता है। मान्यता है कि अक्षय तृतीया सभी पापों का नाश करने वाली एवं सभी सुखों को प्रदान करने वाली अक्षय तिथि है। इस दिन शास्त्रों में दान का विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं।
पंचांग के अनुसार जो लोग अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना चाहते हैं, वे 22 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह 8:04 बजे से लेकर अगले दिन 23 अप्रैल रविवार के सुबह 8 बजे तक खरीदारी कर सकते हैं. इस साल पड़ने वाले अक्षय तृतीया को गुरु की राशि में परिवर्तन भी हो रहा है. अक्षय तृतीया के अवसर पर सोना, चांदी, आभूषण, वाहन, मकान, दुकान, फ्लैट, प्लॉट आदि की खरीदारी करना शुभ मामना जाता है. हालांकि इस दिन सोना खरीदना और धारण करना सबसे शुभ माना जाता है.
कथाओं के अनुसार वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को ब्रह्म देव के पुत्र अक्षय कुमार की उत्पत्ति हुई थी. इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं. इस तिथि को आप जो भी शुभ कार्य करेंगे, उसका चार गुना फल अक्षय रहता है. उसमें कभी भी कोई कमी नहीं होती है. सोना व आभूषण को माता लक्ष्मी का भौतिक स्वरूप मानते हैं. जिस पर माता रानी की विशेष कृपा रहती है. शुभ योग होने की वजह से इस दिन सोना खरीदना काफी शुभ माना जाता है. साथ ही सोना खरीद कर धारण करने से अकाल मृत्यु नहीं होती है.
सोना खरीदने का मुहूर्त
जो लोग अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना चाहते हैं, वे 22 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह 8:04 बजे से लेकर अगले दिन 23 अप्रैल रविवार के सुबह 8 बजे तक खरीदारी कर सकते हैं. इस दिन आभूषण खरीद कर धारण करने पर अकाल मृत्यु का खतरा क्षीण हो जाता है. यह 24 घंटे का समय त्रेता युग का योग बनाता है. इसमें भगवान परशुराम व राम का जन्म हुआ था. यह साल में मात्र एक बार ही होता है.
पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है।[1] इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।[2] वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किन्तु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्त्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखण्ड, वाहन आदि की खरीददारी से सम्बन्धित कार्य किए जा सकते हैं।[3] नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परम्परा भी है। हालांकि श्रीमद्भगवत गीता 16 के श्लोक 23-24 में गीता ज्ञान दाता स्पष्ट रूप से निर्देशित देते हुए कहता है कि जो साधक शास्त्रों में वर्णित भक्ति की क्रियाओं के अतिरिक्त कोई अन्य साधना व क्रियाएं करते हैं, उनको न सुख की प्राप्ति होती है, न उनको सिद्धि की प्राप्ति होती है, और नाही उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् यह व्यर्थ की पूजा है। साधक को वे सभी क्रियाओं का परित्याग कर देना चाहिए जो गीता तथा वेदों अर्थात् प्रभुदत्त शास्त्रों में वर्णित नहीं हैं।[4]
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र व गङ्गा स्नान करके और शान्त चित्त होकर, भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ व गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, पात्र, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है।[5] ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसन्त ऋतु के अन्त और ग्रीष्म ऋतु का प्रारम्भ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, शक्कर, साग, इमली, सत्तू आदि घर्मी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है।[2][6][3] इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग व अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा श्वेत कमल अथवा श्ववेत पाटल (गुलाब) व पीले पाटल से करनी चाहिये।
“ सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मन्त्र मेत मुदीरयेत्॥
अर्थात सभी महीनों की तृतीया में श्वेत पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।
ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।[7]
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है।[7] भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था।[6] ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था।[2] इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं।[6][3] जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया 41 घटी 21 पल होती है तथा धर्म सिन्धु एवं निर्णय सिन्धु ग्रन्थ के अनुसार अक्षय तृतीया 6 घटी से अधिक होना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए।[1] इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।[2] ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार:
“ अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥
अक्षय तृतीया के दिन सोने चांदी की चीजें खरीदी जाती हैं। इससे बरकत आती है। अगर आप भी बरकत चाहते हैं इस दिन सोने या चांदी के लक्ष्मी की चरण पादुका लाकर घर में रखें और इसकी नियमित पूजा करें। क्योंकि जहां लक्ष्मी के चरण पड़ते हैं वहां अभाव नहीं रहता है।
शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है। अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं। आइए जानें 25 बातों से अक्षय तृतीया का महत्व...
1 .नया वाहन लेना या गृह प्रवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं। मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है। इसलिए लोग जमीन जायदाद संबंधी कार्य, शेयर मार्केट में निवेश रीयल एस्टेट के सौदे या कोई नया बिजनेस शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं...
2 .अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा।
3. धरती पर देवताओं ने 24 रूपों में अवतार लिया था। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों में उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था।
4. इस दिन भगवान विष्णु के चरणों से धरती पर गंगा अवतरित हुई। सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इस दिन से होती है।
5.शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है।
6.“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।
न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।।”
वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है।
7. वैशाख मास की विशिष्टता इसमें आने वाली अक्षय तृतीया के कारण अक्षुण्ण हो जाती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व का उल्लेख विष्णु धर्म सूत्र, मत्स्य पुराण, नारदीय पुराण तथा भविष्य पुराण आदि में मिलता है।
8.यह समय अपनी योग्यता को निखारने और अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए उत्तम है।
9. यह मुहूर्त अपने कर्मों को सही दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। शायद यही मुख्य कारण है कि इस काल को ‘दान’ इत्यादि के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
10. ‘वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आखातीज के रुप में मनाया जाता है भारतीय जनमानस में यह अक्षय तीज के नाम से प्रसिद्ध है।
11.पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान,दान,जप,स्वाध्याय आदि करना शुभ फलदायी माना जाता है इस तिथि में किए गए शुभ कर्म का फल क्षय नहीं होता है इसको सतयुग के आरंभ की तिथि भी माना जाता है इसलिए इसे’कृतयुगादि’ तिथि भी कहते हैं ।
12.यदि इसी दिन रविवार हो तो वह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली भी हो जाती है।
13. मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप आदि द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा संतान भी अक्षय बनी रहती है।
14.दीन दुखियों की सेवा करना, वस्त्रादि का दान करना ओर शुभ कर्म की ओर अग्रसर रहते हुए मन वचन व अपने कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है।
15. कलियुग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करके दान अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म में समृद्धि, ऐश्वर्य व सुख की प्राप्ति होती है।
16. भविष्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार शाकल नगर रहने वाले एक वणिक नामक धर्मात्मा अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव से स्नान ध्यान व दान कर्म किया करता था जबकि उसकी पत्नी उसको मना करती थी,मृत्यु बाद किए गए दान पुण्य के प्रभाव से वणिक द्वारकानगरी में सर्वसुख सम्पन्न राजा के रुप में अवतरित हुआ।
17. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर सामर्थ्य अनुसार जल,अनाज,गन्ना,दही,सत्तू,फल,सुराही,हाथ से बने पंखे वस्त्रादि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है।
18. दान को वैज्ञानिक तर्कों में ऊर्जा के रूपांतरण से जोड़ कर देखा जा सकता है। दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए यह दिवस सर्वश्रेष्ठ है।
19. यदि अक्षय तृतीया रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिवस की महत्ता हजारों गुणा बढ़ जाती है, ऐसी मान्यता है। किसानों में यह लोक विश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिए अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी।
20. इस दिन प्राप्त आशीर्वाद बेहद तीव्र फलदायक माने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। सतयुग, त्रेता और कलयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ और इसी तिथि को द्वापर युग समाप्त हुआ था।
21.रेणुका के पुत्र परशुराम और ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का प्राकट्य इसी दिन हुआ था। इस दिन श्वेत पुष्पों से पूजन कल्याणकारी माना जाता है।
22.धन और भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति तथा भौतिक उन्नति के लिए इस दिन का विशेष महत्व है। धन प्राप्ति के मंत्र, अनुष्ठान व उपासना बेहद प्रभावी होते हैं। स्वर्ण, रजत, आभूषण, वस्त्र, वाहन और संपत्ति के क्रय के लिए मान्यताओं ने इस दिन को विशेष बताया और बनाया है। बिना पंचांग देखे इस दिन को श्रेष्ठ मुहुर्तों में शुमार किया जाता है।
23.दान करने से जाने-अनजाने हुए पापों का बोझ हल्का होता है और पुण्य की पूंजी बढ़ती है। अक्षय तृतीया के विषय में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान खर्च नहीं होता है, यानी आप जितना दान करते हैं उससे कई गुणा आपके अलौकिक कोष में जमा हो जाता है।
24. मृत्यु के बाद जब अन्य लोक में जाना पड़ता है तब उस धन से दिया गया दान विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। पुनर्जन्म लेकर जब धरती पर आते हैं तब भी उस कोष में जमा धन के कारण धरती पर भौतिक सुख एवं वैभव प्राप्त होता है। इस दिन स्वर्ण, भूमि, पंखा, जल, सत्तू, जौ, छाता, वस्त्र कुछ भी दान कर सकते हैं। जौ दान करने से स्वर्ण दान का फल प्राप्त होता है।
25. इस तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्रीबिहारीजी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते हैं।
26. दश महाविद्याओ में माँ मातंगी का भी प्राकट्य अक्षय तृतीया को होता है
उपाय टोटके
- अक्षय तृतीया के दिन 11 कौड़ियों को लाल कपडे में बांधकर पूजा स्थान में रखे इसमें देवी लक्ष्मी को आकर्षित करने की क्षमता होती है। इनका प्रयोग तंत्र मंत्र में भी होता है। देवी लक्ष्मी के समान ही कौड़ियां समुद्र से उत्पन्न हुई हैं।
- अक्षय तृतीया के दिन केसर और हल्दी से देवी लक्ष्मी की पूजा करने से आर्थिक परेशानियों में लाभ मिलता है।
- अक्षय तृतीया के दिन घर में पूजा स्थान में एकाक्षी नारियल स्थापित करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
- इस दिन स्वर्गीय आत्माओं की प्रसन्नता के लिए जल कलश, पंखा, खड़ाऊं, छाता, सत्तू, ककड़ी, खरबूजा आदि फल, शक्कर, घी आदि ब्राह्मण को दान करने चाहिए इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है।
- इस दिन गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, शहद और कन्या यह बारह दान का महत्व है। जो भी भूखा हो वह अन्न दान का पात्र है। जो जिस वस्तु की इच्छा रखता है यदि वह वस्तु उसे बिना मांगे दे दी जाए तो दाता को पूरा फल मिलता है। सेवक को दिया दान एक चौथाई फल देता है। कन्या दान इन सभी दानों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है इसीलिए इस दिन कन्या का विवाह किया जाता है।
अक्षय तृतीया पर दान देने वाला सूर्य लोक को प्राप्त होता है। इस तिथि को जो व्रत करता है वह ऋद्धि, वृद्धि एवं श्री से संपन्न होता है। इस दिन किए गए कर्म अक्षय हो जाते हैं। अत: इस दिन शुभ कर्म ही करने चाहिए।
अक्षय तृतीया का व्रत रखकर गर्मी की वस्तुओं जैसे- छाता, दही, जूता-चप्पल, जल का घड़ा, सत्तू, खरबूजा, तरबूज, बेल का शरबत, मीठा जल, हाथ वाले पंखे, टोपी, सुराही आदि वस्तुओं का दान करने से जीवन की समस्त समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
सनातन धर्म में अक्षय तृतीया के दिन धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। मां की पूजा करने से घर में सुख और समृद्धि आती है। अगर आप भी मां लक्ष्मी की कृपा पाना चाहते हैं, तो अक्षय तृतीया के दिन मां लक्ष्मी को सफेद कमल या लाल रंग का गुलाब अर्पित करें। इस उपाय को करने से घर में धन का आगमन होता है।
देवताओं को एक-एक करके जल, अक्षत, मौली अर्पित करें। कलश पर थोड़ा जल, हल्दी, कुमकुम और अक्षत छिड़कें और कलावा और फूल अर्पित करें। मां लक्ष्मी को सिंदूर चढ़ाएं। भगवान विष्णु को चंदन, फूल, अगरबत्ती और तुलसी चढ़ाएं और देवी लक्ष्मी को कमल का फूल चढ़ाएं।
अक्षय तृतीया पर वों घरो में आखा( बिना कटा पीसा ) यानि की गेहू का खीचड़ा बनाने की परंपरा आज भी कायम है। साथ में बाटा और आखि कचरा मिर्चा बडीया की सब्जी गांवों में आखातीज पर इस परंपरा का निर्वाह करते हुए कई घरों में बाजरे मोठ का खीचड़ा बनाया जाता है तथा लोग इसे बड़े चाव से खाते है। इसी प्रकार इस दिन को शुभ मानते हुए किसान भी सुबह जल्दी खेतों में पहुंचकर हळोतिया करते हुए जमीन की पूजा कर धन धान्य की कामना करते है। परिजन साथ में मिलकर खाना खाते है आखातीज के दिन सफेद छिपकली देखना भी लोग शुभ मानते है।