स्वर विज्ञानं और संगीत का संबंद

स्वर विज्ञान तथा संगीत का सम्बन्ध
शिव स्वरोदय अथवा स्वरोदय विज्ञान तथा संगीत अथवा गान्धर्व विद्या ये
दोनों विद्यायें स्वर आश्रित है। इन दोनों विद्याओं के ज्ञाता अपने-अपने ढंग
से स्वर की परिभाषा प्राचीन काल से कहते आए है। लेकिन इन दोनों
विद्याओं का कोई आपसी सम्बन्ध भी है ऐसा कोई उल्लेख किसी विद्वान ने
स्पष्ट रूप से नहीं किया। यद्यपि लेशमात्र उल्लेख दोनों विद्याओं के ज्ञाताओं
ने यत्र-तत्र किया है। संगीत रत्नाकर के लेखक पं० शारंगदेव ने अपने ग्रन्थ
में ईडा, पिंगला, सुषुम्ना का उल्लेख दिया है, और शिव स्वरोदय ग्रन्थ में
स्वरोदय विद्या का महत्व बताते हुए सभी विद्याओं की जननी स्वर विद्या को
बताया गया है। इन दोनों विद्याओं का मूल नाद है। अतः मेरा अपना विनम्र
मत है कि नाद के आहत तथा अनाहत दोनों रूपों का अनुसंधान करना
चाहिए। इस दृष्टि से नाद से सम्बन्धित प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेखित परिभाषाओं
का अध्ययन करना चाहिए।
गान्धर्व की परिभाषा
गन्धर्व शब्द की उत्पत्ति पर विचार करे बिना गान्धर्व विद्या का विचार अधूरा
रहेगा। इसलिए इसकी परिभाषा समझना जरूरी है।
"गान्धर्वस्य इदम् इति गांधर्वम' इस अर्थ में गन्धर्व से 'अण' प्रत्यय
लगाकर 'गान्धर्व' शब्द बनता है। 'गान्धर्व' शब्द की उत्पत्ति इस प्रकार की
जाती है "गंध अर्वति इति गंधर्वम" अर्थात् जो गन्ध को पहुंचे वह गन्धर्व!
गन्धर्व वेद के अर्न्तगत स्वर विद्या (ईडा, पिंगला) तथा संगीत विद्या इन
दोनों विद्याओं का समावेश रहा होगा। अतः गन्धर्व वेद के ज्ञाता इन दोनों विद्याओं के ज्ञाता रहे होंगे ऐसा मेरा विश्वास है क्योंकि गन्धर्व की परिभाषा का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि गन्धर्व कई प्रकार के थे। ऐसा उल्लेख किया गया है कि कुछ आकाश में विचरण करने वाले थे और जल निवासी थे, कुछ नगर से बाहर रहने वाले, कुछ पेड़ों पर रहने वाले थे।

अतः स्पष्ट है कि गन्धर्व अनेक प्रकार के थे पंच तत्वों का अनुसंधान शिव
स्वरोदय ज्ञान के अर्न्तगत बताया गया है। इस ज्ञान के ज्ञाता को स्वरोदय
ग्रन्थ तथा स्वरोदय ज्ञान में गन्धर्व कहा गया है और गन्धर्व विद्या को सभी
विद्याओं की जननी बताया गया है। गन्धर्व वेद नाद आश्रित है इसलिए नाद
का स्वरूप और उसके महत्व को जानना आवश्यक है।

 नाद का स्वरूप
नाद को ब्रह्म का रूप माना है। योगी और महाऋषियों ने इसे निर्गुण ब्रह्म का
सगुण रूप कहा है। परस्पर ब्रह्म की अनुभूति प्रणव की साधना से अथवा नाद की
उपासना से ही सिद्ध होती है। ब्रह्माण्ड में आकाश और नाद ये दो ही तत्व ऐसे
है जो सर्वव्यापी हैं। "शब्दगुणमाकांश' इस वचन से यह सिद्ध होता है। शब्द
या नाद आकाश का गुण होने से आकाश के सदृश्य सारे जगत् में व्याप्त है?

योगशिखे उपनिषद् में नाद के महत्व को इस प्रकार बताया गया है कि
"न नादेन बिना ज्ञानं न नादेन बिना शिव ।
नादरूपं परं ज्योतिनादं रूपी स्वयं हरि : ||"3
अर्थात् नाद के बिना कोई ज्ञान नही। नाद ही शिव अथवा मंगल रूप है।
नाद स्वयं ज्योति स्वरूप है, नाद और हरि अभिन्न हैं।
आद्यशंकराचार्य के मतानुसार-
"नादानुसंधान नमोस्तु तुभ्यं त्वां साधनं तत्वपदस्यं ज्ञाने
भवत्प्रसादात् पवनेन साकं, विलीयते विष्णुपदे मनो में।।
अर्थात् हे नादानुसंधान तुम्हें नमस्कार है क्योंकि तुम्हें मैं तत्वपद की
प्राप्ति के लिए एक उत्तम साधन जान गया हूँ। तुम्हारें प्रसाद से मेरा मन
पवन (प्राणों) सहित विष्णुपद (तत्वपद) में विलीन हो जाता है।
संगीत रत्नाकर में शारंगदेव जी ने कहा है कि

"चैतन्यं सर्वभुतानां विवृतं जगदात्मना।
नदब्रह्मं तदानन्दमद्वितीयमुपासमहे ।।||
अर्थात् सभी भूतों को चेतनता प्रदान करने वाला, सर्वव्यापक, ब्रहांस्वरूप,
स्वयं आनन्द स्वरूप, अद्वितीय, ऐसे नाद रूप की मैं उपासना करता हूँ।
"नाद" शब्द की "नद" धातु से व्युत्पत्ति की जाती है, जिसका अर्थ
व्यक्त रूप है वर्ण, पद, वाक्य, स्वर इत्यादि। इसकी उत्पत्ति प्राण तत्व एवं
अग्नि तत्व के संयोग से होती है। इस नाद के दो भेद माने गये हैं "आहत
तथा अनाहत"। अनाहत नाद बिना आघात के उत्पन्न होता है। इसे केवल
योगीजन ही सुनते हैं, समझते हैं, और उसके द्वारा मुक्ति पाते हैं। मन बुद्धि
की साम्य अवस्था में अर्थात् स्थितप्रज्ञ की स्थिति में ही वह सुना जाता है।
यौगिक क्रियाओं से मन बुद्धि एक विशेष अवस्था में पहुंचती है। तभी वह
अनाहत नाद ध्यानस्थों को श्रुतिगोचर होता है। उसी नाद में निमग्न होकर
योगीजन ब्रह्मनाद का अनुभव करते हैं।
अनाहत नाद की उपासना का मार्ग अत्यन्त कठिन है इसलिए भक्तों ने
भक्ति का मार्ग अपना कर नाद का ही सहारा लिया है। अपनी साधना पद्धति
में उन्होंने भले ही कुछ भिन्न रूप से उस नाद का उपयोग किया हो किन्तु
उसके सहारे ही उन्होंने मुक्ति को प्राप्त किया है। किन्तु आहत नाद का यानि
संगीत का अवलंबन करने से चित्तवृति का निरोध अपने आप सहज हो जाता
है। संगीत के द्वारा सम्प्राप्त यह सविकल्प समाधि निर्विकल्प समाधि में
परिणत हो जाती है। संगीत के इस आहत नाद की ऐसी अपार महिमा है।
यह इन्द्रियगोचर होते हुए भी इन्द्रियतीत है।
2.2 दर्शन शास्त्र के अनुसार नाद की परिभाषा
प्राचीन भारतीय दर्शन शास्त्र में अनाहत नाद के सम्बन्ध में जो उल्लेख मिलते
हैं वह इस प्रकार है
("वराह 2/73) "सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधानेन चेतसा ।
न्द एवानुसन्धेयो योगसाम्राजयमिच्छता"।"
अर्थात् योग सिद्धि अनुसंधान करना चाहिए।
(2 / 20) "नास्ति नादात्परो मन्त्रो न देवः स्वात्मनः परः ।
नानुसन्धेः परा पूजा न हि तृप्तेः परं सुखम् ।।
"योगउपनिषद के 2/20वें श्लोक से उद्वित" नाद से बड़ा कोई देव
नहीं है। नादानुसंधान से बड़ी कोई पूजा नहीं है और तृप्ति से बड़ा कोई
सुख नही है।तन्मयं यज्ञो नादानुसन्धानम्
""मानसो हंसः सोहं हंस
"पाशुपतउपनिषद पूर्वकाण्ड 12वें श्लोक से उद्धित" जो तु है सो ही मैं
हूँ, जो मैं हूँ सो ही तू है इस प्रकार की अभेद भावना ही नादानुसन्धान रूपी
यज्ञ है। योगीजन इस नाद की लौ लगाकर सिद्धि प्राप्त करते हैं। योग
साधना में नाद की इस परम महता को देखते हुए यह ज्ञान होता है कि योग
सिद्धान्त का संगीत शास्त्र के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध है। दोनों में एक स्थूल
अन्तर अवश्य है और वह यह कि योग में केवल अनाहत नाद उपास्य है और
संगीत में केवल आहत नाद का उपयोग होता है। योग साधना का मूल
उद्देश्य कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करना है तथा उसे उर्ध्वमुखी बनाना है।
जीव की वृद्धावस्था में यह कुण्डलिनी अधोमुखी रहती है। साधना द्वारा
उर्ध-बुर्ध? होकर जब यह उर्ध्वगामी बनती है तब सुषुम्ना का पथ खुल जाता
है। सुषुम्ना का द्वार खुलते ही योगी को अनाहत नाद की ध्वनि सुनाई देने
लगती है। बुधजन जानते हैं की सब जीवों का श्वास-प्रश्वास प्रायः ईडा,
पिंगला के मार्ग से ही चलता है। सुषुम्ना का पथ प्रायः बन्द रहता है। इस
पथ के उन्मुक्त होते ही प्राण स्थिर होकर निरन्तर उस अनाहत नाद को
सुनने लगता है। नाद से प्रकाश होता है और प्रकाश का ही व्यक्त रूप
महाबिन्दु है। यह बिन्दु तीन प्रकार के होते हैं-इच्छा, ज्ञान और क्रिया अखिल
ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में अभिव्यक्त होने वाला रूप ही
"ना या "बिन्दु" कहलाता है अर्थात् जो नाद अनाहत भाव
विश्व में व्याप्त है उसी की व्यष्टि रूप में, जब व्यक्ति को अनुभूति होती है तब उसे
नाद या बिन्दु कहते हैं।

 योग साधना में नाद के दो भेद
योग साधना में नाद के दो रूप माने गये हैं-एक "उपाएस्वरूप" और दूसरा
“उपेयस्वरूप”। उपायस्वरूप नाद की अनुभूति साधकवस्था में होती है और
उपेयस्वरूप नाद की अनुभूति सिद्धिलाभ के अवसर पर एवं तदंतर होती है।
साधकवस्था में जिस नाद की अनुभूति होती है वह मन को विषयों से विमुख
करा के परातत्व में लीन करने के लिए इस नाद में महान शक्ति निहित होती
है। अतः साधक को अभ्यास अपने भीतर से सुमुत्थित "नाद" को सुनने का
प्रयत्न करना चाहिए। साधना की प्रथमावस्था में स्थूल से सुक्ष्मांतर ना
श्रवणगोचर होता है। साधना की प्रथमावस्था में स्थूल नाद सुनाई देता है।
जिसका स्वरूप समुद्र–गर्जन, भेरी, निर्झर आदि की ध्वनि के सदृश नाद
सुनाई देता हुआ प्रतीत होता है। चरमावस्था में किन्कणी, वंशी, वीणा आदि
की ध्वनि के सदृश नाद श्रवणगोचर होता हुआ बताया गया है। इस प्रकार
"नाद" सूक्ष्म से "सूक्ष्मांतर" होता जाता है। साधना की परिपक्वता
जब तक
नही होती तब तक चित्त को स्थूल नाद में ही लगाने का प्रयत्न करना
चाहिए। "नाद" पर मन को स्थिर करने से ही वह मन स्थिर, लीन हो जाता
है। सम्पूर्ण ब्रहा जगत ही नहीं मानों इस प्रकार उसे भूलकर मन नाद में ऐसा
एकरूप हो जाएगा जैसे दूध में पानी और ऐसी एकरूपता के पश्चात् ही मन
चित्ताकाश में विलीन हो जाता है। जैसे भ्रमर को मकरंद या पराग का पान
करते समय गन्ध का ध्यान नहीं रहता है। उसी प्रकार नादासक्त चित्त विषय
की कामना नहीं करता। विषय रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मनरूपी
उन्मत गजेन्द्र को वश में करने के लिए वह नाद अंकुश की भांति पूर्ण समर्थ
है। यह नाद का उपायस्वरूप बताया गया है। नाद के उपेयस्वरूप के विषय
में नाद बिन्दु उपनिषद में इस प्रकार बताया गया है। प्रणवब्रह्म से संलग्न
नाद ज्योतिर्मय है। उसमें मन लय हो जा है। 'शब्द' से परे शब्दातीत
अर्थात् निःशब्द अवस्था में परब्रह्म परमात्मा की स्थिति है। जब तक "नाद"
है तब तक मन है। नाद के अन्त में मन की उन्मती अवस्था आती है।
निरन्तर नादानुसंधान से वासना क्षीण हो जाती है। और निरन्जन में मन और
प्राणवायु लीन हो जाती है। उपेयस्वरूप में कोटी सहस्र नाद और कोटी शत
बिन्दु लय प्राप्त हो जाते हैं। सब अवस्थाओं में मुक्त और सब चिन्ताओं से
रहित होकर वह सिद्धि प्राप्त योगी मृतवत् रहकर भी अमरत्व को पा जाता है।
फिर उसे शंख, दुन्दुभि आदि के नाद सुनने का प्रश्न ही शेष नही रह जाता
हैं मूलाधार चक में सुषुम्ना का उर्ध्वगामी स्वरूप कमल के तन्तु के सादृश है।
उस सुषुम्ना नाड़ी रूपी वीणाडण्ड में अमृत नाद कपाल कुहर में अनुभूति हो
जाती है, अथवा जो कि शंख की ध्वनि अथवा मयूर के रव के सदृश्य होता
है, उसे जो सुन लेता है उसके समक्ष आकाश के सदृश्य आत्मा का पूर्ण प्रकाश
प्रस्फुट हो जाता है। ईडा और पिंगला के मध्य पथ में एवं ब्रह्मन्थ में स्वात्म पुरूष
का दर्शन होता है। उस अवस्था में मन लय को प्राप्त हो जाता है। जो इस नाद,
बिन्दु और महेश्वर पद को जान लेता है। वही कैवल्य को प्राप्त करता है।
परा, पशयन्ती, मध्यमा और वैखरी-वाणी के ये चार भेद तन्त्रों में एवं
अन्य शास्त्रों में प्रसिद्ध है। इन भेदों का नाद की विविध अभिव्यक्ति के रूप
में योग शास्त्र में सुन्दर विवरण मिलता है। इन चार भेदों में नाद के
उपायस्वरूप और उपेयस्वरूप दोनों का समावेश हो जाता है। 
है और जो
योगशास्त्र में यह बताया गया है कि जिसका अनुभव पाकर योगी जिसे
चित्त कहकर वर्णन करते हैं, जो सर्व सिद्धियों का कारक है, जिसे जानने
मात्र से ही जन्म-बन्धन से मुक्ति मिल जाती है, व अक्षर या परम नाद
"शब्दब्रह" कहलाता है। मूलाधार में जो शक्ति स्थित है, जो अपने पर ही
आधारित बिन्दुरूपणी है, उस नाद की उसी प्रकार उत्पत्ति होती
है जैसे बीज में से अंकुर की, नाद की उस अभिव्यक्ति को पश्यन्ती कहते हैं।
जिसके द्वारा योगी आत्मदर्शन करते हैं। जब हृदय स्थान से मेघ गर्जन की
सादृश्य ध्वनि सुनाई देती है, तब वह "मध्यमा" वक्र कहलाती है। वैखरी की
अभिव्यक्ति स्वर नामक प्राण से होती है। तालव्यादि स्थानों में प्राण वायु का
संघटन होने से अकार से क्षकार तक के वर्ण उद्धभूत होते हैं। इन वर्णों या
अक्षरों से पद और पदों से वाक्य बनते हैं। हम यह जानते हैं कि मन्त्र, वेद,
शास्त्र, पुराण, काव्य इत्यादि सब कुछ वाक्यात्मक ही है। सप्तस्वर, गाथा
इत्यादि सभी नाद से ही संभ्रुत हैं। सब प्राणियों की गुहा में स्थित सरस्वती
देवी प्राणाग्नि से प्रेरित होकर वर्ण, पद और वाक्यों को प्रकट करते हैं। जो
योगी वैखरी को अपनी आत्मा में देख लेता है, वह सरस्वती के प्रसाद से
सिद्धि को पा लेता है।

 नाद के स्वरूप की तन्त्रोक्त व्याख्या
स्वच्छन्द तन्त्र के अनुसार 'रोधिनी' या निदोधिका शक्ति के ऊपर 'नाद' की
स्थिति है। 'नाद' का धाम कोटि सूर्यों के परमतन्य में अभेद परामर्श होता है,
वहीं सदाशिव हैं, अथवा वही नाद का प्रारूप है। "नाद" नामक परम बीज
सब भूतों में अव्यक्त ध्वनि के रूप में उपस्थित है। वह अक्षर है और अविचल
स्वरूप है। शिव और शक्ति का उसमें अधिष्ठान है। शक्तयात्मक शिव के
स्पर्श द्वारा 'शून्य' में से नाद उत्पन्न होता है। शून्य शब्द में उस अवस्थ
सूचित किया है कि जहां वाच्य और वाचक एकाकाय हों, अभिन्न हों, उनका
पृथकीकरण न हुआ हो। वाच्य और वाचक का, शब्द और अर्थ का जो
अविभक्त समाष्टि रूप है उसी का नाम नाद है। वह नाद शब्द भेद से आठ
प्रकार के रूपों में अभिव्यक्त होता है। यदा-घोष, राव, स्वन, शब्द, स्फोट,
ध्वनि, झंकार और ध्वड़.कत नवम् महाशब्द इन सब में व्याप्त रहता है। 10
"इसी विषय को स्पष्ट करते हुए टीकाकार-क्षेमराज ने कुछ इस प्रकार
कहा है कि कान में अंगुली डालने से जो शब्द सुनाई देता है, जो जलती हुई
आग के शब्द के सदृश होता है वह 'घोष' कहलाता है। उस घोष के
में जो शब्द सुनाई देता है, जो फूटे कॉसे के सदृश रूखा होता है, उसे 'राव'
कहते हैं। बाँस की ध्वनि के सदृश जो नाद होता है उसे 'स्वन' कहते हैं।
चौथा प्रकार 'शब्द' है जो कि सब शब्दों का अरणिस्वरूप हैं पंचम नाद है
'स्फोट' जिसके द्वारा वाक्य, पद और वर्ण अपने भिन्न-भिन्न स्वरूप में
स्फुटत्या भासित होते हैं। नाद का छठा प्रकार जो कि कान के लिए सुखप्रद
होता है वह विपंची वीणा के पंचम तार को जोर से बजाने से जो नाद उत्पन्न
होता है। उसके सादृश्य होता है, उसी का नाम ध्वनि है। वीणा के सभी तारों
पर एक साथ आघात करने से जो नाद निकलता है, उसे झंकार कहते हैं।
आठवां प्रकार है ध्वड्.कृत, जो कभी घण्टें के निनाद के सदृश होता है,
अन्यथा सामान्य रूप से जिसकी ध्वनि प्रचण्ड घोष अथवा उंची आवाज के
सदृश्य होते हैं, उसे ध्व.कृत कहते हैं। शारदातिलक नामक ग्रन्थ में सृष्टि
तत्व को समझाते हुए नाद के महत्व को समझाया गया है।”
कबीर की वाणी में अनेक स्थानों पर अनाहत नाद का उल्लेख मिलता
है। अतः यह स्पष्ट है कि इस नाद के उपासक ही इसके दर्शन कर सकते
हैं और अपनी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यद्धपि आहत नाद के
माध्यम से ईश्वर उपासना की जा सकती है, लेकिन इस नाद की गहराई में
जब कोई भक्त उतरता है तो वह अनाहत नाद को पा लेता है, उसी श्रेणी
में कबीरदास, मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास इत्यादि इन भक्तों का नाम
लिया जा सकता है।

 व्याकरण और संगीत के स्वरों का आपसी सम्बन्ध
अ, इ और उ ये तीन भाषा के स्वर संगीत के सा, रे, ग के साथ एक रूप
है। भाषा का दूसरा स्वर है 'इ' वह तालु स्थान में स्थित है। प्राण वायु को
बाहर निकालने का वह 'इ' कारण है और साथ ही वह 'इ' कामबीज होकर
शक्ति का द्योतक है। 'अकार' केवल ज्ञान स्वरूप है और 'इकार' ज्ञान का
साधन चित्त है। शक्ति की महत्ता का तन्त्रों में बारम्बार उल्लेख किया गया है।
शक्ति रूप इकार के बिना 'शिव' 'शव' हो जाता है। 'शिव' शब्द में से
इकार निकाल दिए जाए तो वह शव ही तो होगा, इसी से कहा है कि इकार
अर्थात् शक्ति के संयोग से ही शिव सदा कर्म करता है अथवा सदाशिव कर्म
करता है। संगीत में ऋषभ शिव का वाहन है। इसी से जो वीर्य और पराक्रम
का द्योतक है, वह शक्ति स्वरूप ऋषभ और इकार दोनों एक रूप है। संगीत
के ग्रन्थों में इसी से ऋषभ को वीर रस का द्योतक माना है, वह ऋषभ बल
और वीर्य को जागृत करता है।
जब कंठ और जिव्हा आदि अवयव उकार का उच्चारण करने के लिए
उहित हो और क्रियदर्श को आकार के बदले इकार के उच्चारण का यन
उद्भव किया जाए तब उकार का सहज उद्भव होगा। उकार का अर्थ है
शुद्ध परिच्छिन्न ब्रहह्म यानि सगुण ब्रहा। संगीत में यही 'उकार' गांधार है, जो
श्रृंगार और करूण रस का निर्माता है। भगवान विष्णु के सौन्दर्य दर्शन का
अनुभव गांधार से अभिव्यक्त होता है। गांधार वाक् का वाहन है यानि वागेन्द्रिय
को जो धारण करता है उसे गांधार कहते है।

अ, इ, उ, ये तीन स्वर जिस प्रकार समस्त वाणी के आधार है, तद्वत्
षड्ज, ऋषभ, गांधार ये तीन स्वर समस्त संगीत के आधार है। निगुणता से
देखा जाए तो सा रे गा की सप्तक के पूर्वांग में जो अवस्था प, ध, नी की
उतरांग में है। 'म' स्वर क्योंकि पूर्वांग और उतरांग के बीच में स्थित है,
इसलिए शास्त्रकारों ने उसे 'मध्यमा' कहा है। इस दृष्टि से सा, रे, गा यही
तीन स्वर संगीत के आधार है। इतना ही नहीं संगीत में जो तीन ग्राम माने
गये हैं, उनके आधार भी यही तीन स्वर हैं।
ऋ, ऌ इन स्वरों को नपुंसक कहा गया है क्योंकि इनका स्थान गौण है।
संगीत में ऋ, लृ का स्थान अन्तर गांधार और काकली निषाद को दिया गया
है। ऋ मूर्धन्य स्वर है और उस ऋ का अर्थ परमेश्वर होता है। संगीत में ऋ
अन्तर गांधार है जो आज शुद्ध गांधार के नाम से परिचित है। लृ दन्त स्वर
है और परमात्मा की वृत्ति का कारण है। शास्त्रकारों ने सामान्यतः दाँतों को
सांकेतिक रूप माना है। ॠ, लृ की भाँति ये दोनों स्वर भी एक रूप के दो
पहलू है। सप्तक के अन्तरगांधार और काकली निषाद का अन्तर सम्बन्ध है।
इस प्रकार अन्तर काकली की एकरूपता है। अन्तर गांधार और काकली
निषाद वृद्धि और विकास के द्योतक है। अन्तर गांधार के बाद तत्काल मध्यम
की तरफ बढ़ने की प्रवृति होती है। तदत काकली निषाद के बाद सहज ही
षड्ज में मिलने की कामना होती है इसलिए ये दोनों स्वर पूर्वांग और उतरांग
में विकास के द्योतक है। अन्तर गांधार की श्रुति का नाम प्रसारणी है और
काकली की श्रुति का कमुद्धति है, ये दोनों श्रुति नाम विस्तार के सूचक है। 

 स्वरोदय विज्ञान तथा गान्धर्व विद्या का आपसी सम्बन्ध
शोधार्थी के विचार में स्वरोदय विज्ञान तथा गान्धर्व विद्या ये दोनों विद्यायें स्वर
अर्थात् श्वसन क्रिया पर आश्रित है। जिस प्रकार गान्धर्व विद्या में षड्ज,ऋषभ, गान्धार महत्वपूर्ण हैं उसी प्रकार स्वरोदय विज्ञान में ईडा, पिंगला,
सुषुम्ना का महत्व है। ईडा, पिंगला, सुषुम्ना जिस प्रकार सभी विद्याओं की
जननी बताई गई है तथा समस्त ब्रह्मण्ड का आधार बताई गई है, उसी प्रकार
सप्तक का पूर्वांग तथा उतरांग सा, रे, गा पर आधारित है। समस्त संगीत संसार
अर्थात् रचनाएं इन्हीं पर आधारित है। मूल स्वरों के अतिरिक्त स्वयंभु स्वरों को
जो जानता है उसे प्राचीन काल में गन्धर्व कहा गया है। स्वरोदय ज्ञान, विद्या
के ज्ञाता ईडा, पिंगला, सुषुम्ना के अतिरिक्त पाँचों तत्वों आकाश, अग्नि, जल,
वायु, पृथ्वी का ज्ञान रखते थे। इसलिए उन्हें गन्धर्व कहा जाता था। 13 इस
प्रकार इन दोनों विद्याओं के ज्ञाता एक ही संज्ञा के माने जाते थे। यद्यपि लेश
मात्र उल्लेख दोनों विद्याओं के ज्ञाताओं ने यत्र-तत्र किया है। इसलिए संगीत
तथा स्वर विद्या के गन्धर्वो का एक साथ अध्ययन करना आवश्यक है।

 गन्धर्व तथा गान्धर्व की प्राचीनता तथा इनके प्रकार
गान्धर्व का सम्बन्ध गन्धर्व से है, जो वैदिक काल से लेकर गान कला में
विशारद रहे हैं। "गान्धर्वस्य इदम् इति गान्धर्वम्" इस अर्थ में "गंधर्व" से अण्
प्रत्यय लगाकर गान्धर्व शब्द बनता है। गान्धर्व शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार
की जाती है- "गन्ध आर्वति इति गान्धर्वम्" अर्थात् जो गन्ध को पहुँचे वह
गन्धर्व। गंध को पहुँचने का अर्थ है कि गंध से सब कुछ जान लेना 14
गन्धर्व की व्युत्पत्ति में गन्ध से जान लेने का अर्थ है कि जो स्वर की
गन्ध को भी पहचान ले। स्वर की गन्ध अर्थात् उपस्वर। गन्धर्वों की श्रवण
शक्ति इतनी तीक्ष्ण होती है कि वे मूल स्वरों के अतिरिक्त स्वयंभु स्वरों को
भी सुन लेती है अर्थात् उपस्वरों को भी सुन लेती है।
"स्वर विद्या के ग्रन्थ शिव स्वरोदय में ईडा, पिंगला, सुषुम्ना को सभी
विद्याओं की जननी बताते हुए लिखा है कि वेद और शास्त्र स्वर में ही हैं।
अथवा स्वर ही वेद शास्त्र है। गान विद्या भी स्वर में स्थित है। स्वर से विहीन
ज्योतिष भी ऐसा है जैसे स्वामी बिना घर, शास्त्रहीन वक्ता और सिर हीन
शरीर अतः इससे स्पष्ट है कि स्वरोदय ज्ञान का ज्ञाता संगीत तथा ज्योतिष
शास्त्र का भी ज्ञाता होता है।" प्राचीन काल में इन विद्याओं के ज्ञाताओं को
गन्धर्व कहा जाता था। अतः गन्धर्व अनेक प्रकार के थे और यह सभी गन्धर्व
सम्भवतः स्वर विद्या 'ईडा, पिंगला, सुषुम्ना' के साधक थे। इसलिए प्राचीन
इतिहास में गन्धर्वो से सम्बन्धित उल्लेखों पर विचार करना आवश्यक है।
"संगीत रत्नाकर में सात स्वरों के दृष्टा ऋषि बताए गए हैं। जिनमें से
पंचम स्वर नारद तथा चैवत व निषाद को तुम्बुरू बताया गया है। दृष्टा का
अर्थ है जिसने सबसे पहले स्वर के दर्शन किये हॉ। नारद तथा तुम्बुरू को
इसलिए गन्धर्व कहा गया है क्योंकि गन्धवों का अन्तरमाव दिव्य योनि जाति
पुराणकालीन वाङ्मय में गन्धवों का स्थान अर्थ-दैवत व्यक्तियों में है।
ऋग्वेद में तीन स्थलों को छोड़कर अन्यत्र गन्धर्व का उल्लेख बहुवचन में
समूह के अर्थ में हुआ है। गन्धर्व देव योनि के अन्तर्गत है और अन्तरिक्ष के
वासी बताए गए हैं।
ऋग्वेद 1,22,14 में गन्धर्व का पदध्रुव अर्थात् अविचल माना गया है।
ऋग्वेद 1,18,3,2 के अनुसार गन्धर्व इन्द्र रथ रश्मि पदों को धारण करने वाले
बताए गए हैं। सायण के अनुसार गन्धवाँ का अन्तरभाव पंचजनों का पदार्थ है
और इसमें गन्धवों का अन्तरभाव है। एतरेय ब्राह्मण के अनुसार विश्वेदेव
मनुष्य गन्धर्व अप्सरस का समावेश है। ऋग्वेद 8,77,5 में कहा गया है कि
इन्द्र ने ब्रह्म की रक्षा के लिए अन्तरिक्ष प्रदेश में गन्धर्व का हनन किया गया
था। उसी मण्डल के एक अन्य सूक्त में ऐतास मुनि को पराजित करने हेतु
गन्धर्व के साथ इन्द्र के युद्ध का उपाख्यान मिलता है। 19
स्वरोदय विज्ञान में गान्धर्व सम्बन्धी उल्लेख करते हुए लिखा है कि
संसार में उपलब्ध वेद स्वर हैं। आज तक जो भी शास्त्र उपलब्ध है वह भी
स्वर ही है। यह संसार और सम्पूर्ण त्रिलोक्य भी स्वर ही है। यह स्वर आत्मा
स्वरूप है कहने का तात्पर्य यही है कि स्वर अर्थात् सांस के बिना कुछ भी
नहीं। संसार में जो भी परोक्ष या अपरोक्ष है वह सब स्वर बिना मिथ्या है,
आधारहीन है, मृत है।
इस प्रकार गन्धव की प्राचीनता सम्बन्धी प्रश्न अपने आप में सिद्ध हो
जाता है। जब हम वैदिक कालीन साहित्य में यत्र-तत्र गन्धर्व तथा गान्धर्व
शब्द का उल्लेख देखते हैं, शोधार्थी का मानना है कि गान्धर्व विद्या के
अर्न्तर्गत अनेक विद्याओं का समावेश था क्योंकि ईडा, पिंगला, सुषुम्ना के
ज्ञाताओं को भी गन्धर्व कहते थे और गान विद्या के कलाकारों को भी गन्धर्व
कहते थे। अतः इन दोनों विद्याओं का अध्ययन एक साथ करना आवश्यक है।
और संगीत विद्या स्वरोदय विज्ञान से काफी हद तक सम्बन्धित है।
संगीत तथा स्वरोदय विज्ञान में स्वर की परिभाषा
संगीत तथा ज्योतिष में स्वर विद्या का बड़ा महत्व है। ये दोनों विद्यायें स्वर
पर आश्रित है, भेद केवल यह है कि संगीत स्वर के माध्यम से अभिव्यक्त
किया जाता है और ज्योतिष शास्त्र स्वर की अभिव्यक्त स्थिति पर आधारित
है। इसी कारण दोनों शास्त्र स्वर की अपनी-अपनी परिभाषा देते हैं। ज्योतिष
शास्त्र स्वर की परिभाषा कुछ इस प्रकार देते हैं।

प्रत्येक प्राणी की देह में जो श्वास प्रक्रिया चल रही है उसे स्वर कहते
हैं और संगीत में स्वर की परिभाषा इस प्रकार की गयी है-"वह अनुरणात्मक
नाद जो किसी प्रकार के आघात स्वयमेव उद्धभूत होता है, जो अनुरंजक
हो, जो श्रोतृचित्त को सुखद हो, जो नियतश्रुति-स्थान पर स्थित होते हुए भी
अपने स्थान से अधो-उर्ध्व गति पाने से विकृत होता हो और आत्मा के
सुख-दुखादि सम्वेदनों को अभिव्यक्त करने में जो सहायक हो, ऐसे नाद को
स्वर कहते हैं"
 विभिन्न मतों की स्वर परिभाषाएँ
"श्वसन क्रिया को भक्तजन स्वर विद्या कहते हैं और भक्त इस विद्या को
सभी विद्याओं का मूल बताते हैं। भक्तजन इस श्वसन क्रिया को हंसाचार
कहते हैं और इसका निरन्तर ध्यान कर पार-ब्रह्म परमेश्वर के पंच तत्वों की
जानकारी प्राप्त कर संसार में व्याप्त सभी विद्याओं को जान जाते हैं और
अपनी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। 18
“शिव स्वरोदय ग्रन्थ के पृष्ठ तीन पर इसी स्वर विद्या के महत्व का पं.
जगन्नाथ जी ने उल्लेख किया है और इसी प्रकार का उल्लेख सी.एम.
श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक मूक प्रश्न एवं स्वर ज्योतिष के पृष्ठ संख्या-108
पर भी किया है।"
"संगीत का मूलभूत उपादान स्वर है। संगीत चाहे भारतीय हो या पाश्चात्य
स्वर पर आधारित होता है। इसको पाश्चात्य संगीत में 'नोट' कहते हैं। स्वरों
के विभिन्न समुदायों से संगीत का निर्माण होता है। स्वर वह नाद है जो
रंजक हो और जिसका अन्य नादों के बीच विशिष्ठ स्थान हो। केवल नाद के
रंजक होने से वह नाद स्वर नहीं बन सकता। स्वर कहलाने के लिए उसका
अन्य नादों या ध्वनियों से कोई सम्बन्ध होना आवश्यक है। स्वर की स्थिति
या सत्ता अन्य स्वरों से निरपेक्ष नहीं हो सकती। कोई ध्वनि ऋषभ या
गान्धार या मध्यम तब कहलायेगी जब षड्ज की सत्ता हमारे मन में स्थिर हो
जाए।"
'संगीत पारिजात' में अहोबल कहते हैं-
"श्रुतयः स्युः स्वराभिन्ना श्रावणत्वेन हेतुना।
आहिकुण्डल वृत्तत्र भेदोक्तिः शास्त्र सम्मतः ।।
स्वश्च श्रुतयस्तत्रद्रागेषु स्वरतांम गतः ।
रागः हेतुत्व ऐतासां श्रुतिसंज्ञैव सम्मतः ।।”
अर्थात् जो सुनी जा सके वह स्वर कहलाती है। श्रुति तथा स्वर में उतना
ही भेद है जितना सर्प तथा उसकी कुण्डली में होता है, यही भेद शास्त्र
सम्मत है। वे सब श्रुतियाँ ही रागों में स्वर का रूप धारण कर लेती है तथा
इन श्रुतियों का कारण रूप राग है। अतः 'श्रुति' यह संज्ञा ही सम्मत है।
‘संगीत दर्पण' में दामोदर पंडित ने श्रुति स्वर विवेचन करते समय स्वर
की व्याख्या इस प्रकार की है।
"श्रुत्यनंतरभावित्वं यस्यानुरणनात्मकः
स्निग्धश्च रंजकश्चासौ स्वर इत्यमिधीयते
स्वयं यो राजते नादः स स्वरः परिकीर्तितः।।”
अर्थात् श्रुति उत्पन्न होने के पश्चात् जो नाद तुरन्त उत्पन्न होता है
तथा जिसे प्रतिध्वनि के रूप में प्राप्त करते हैं और वह मधुर तथा रंजक हो,
उसे स्क कहते हैं तथा जो नाद स्वयं ही शोभित होता है तथा जिसे अन्य
किसा नाद की अपेक्षा नहीं होती, उसे स्वर समझना चाहिए। 19
“संगीत दर्पण” में ही दामोदर पं. श्रुति की व्याख्या इस प्रकार करते हैं:-
“स्वरूपमात्र श्रवणात्रदोडनुरणन बिना।
श्रुतिपिउच्यते भेदास्तस्या द्वाविशातिर्मता ।।"
अर्थात् प्रथमाघात से अनुरणन हुए बिना जो हृस्व नाद उत्पन्न होता है,
उसे श्रुति समझना चाहिए।
विश्वासु लिखते है:-
"कंणस्पर्शात्श्रुतिज्ञैया स्थित्यासैवस्वरोउच्यते ।"अर्थात् कण, स्पर्श, मींड, सूत से श्रुति तथा उस पर ठहरने से वही स्वर
हो जाता है। 21
महर्षि भरत नाट्यशास्त्र में लिखते हैं:-
"स्वराणां च श्रुतिकृतं तच्च में सन्निबोधन ।
व्यक्त मुक्ताड गुलिश्तत्र स्वरो ज्ञेयश्यतुः श्रुतिः ।।
कम्पमानाडू. गुलिश्चैव चिश्रुतिश्च स्वरो भवेत।
द्विकोडर्घाड. मुक्तस्तु एवं श्रुत्याश्रिताः स्वरः । 122
शारंगदेव संगीत रत्नाकर में लिखते हैं:-
"श्रुत्यन्तरभावि यः स्निग्धोडनुरणानात्मक: ।
स्वतः रजंयाति श्रीतृचित्रं स स्वर उच्यते ।।23
अर्थात् श्रुति के पश्चात् जो नाद स्निग्घता और अनुरणन युक्त होकर
कानों को अच्छा लगता हो और जो स्वतः श्रोताओं के चित्त का रंजन करता
हो अर्थात् जिसका स्वभाव ही चित्त को रंजक करना होता हो उसे स्वर कहते
हैं।
2.10 संगीत तथा ज्ञान स्वरोदय का आपसी सम्बन्ध
संगीत तथा ज्ञान स्वरोदय से सम्बन्धित स्वर की परिभाषाओं को देखने से ये
पता चलता है कि दोनों का आधार एक है-"श्वसन क्रिया"। यदि देह में
स्थित हंसाचार के नृत्य को जानने का प्रयास करें तो यह ज्ञान स्वरोदय के
अर्न्तर्गत आता हैं इस विद्या से ब्रह्मण्ड में व्याप्त अनाहत नाद की उपासना
होती है और पंच तत्वों का ज्ञान होता है। यह स्वर का अव्यक्त रूप है।
व्यक्त स्वर से पहले की अवस्था को जानते की प्रक्रिया को ज्योतिष में या
योगीजन, स्वरज्ञान विद्या कहते हैं और जब यह स्वर व्यक्त रूप से प्रकट
होता है तो यह संगीत विद्या या गान्धर्व विद्या कहलाता है। जिस प्रकार
संगीत में अनेक स्वर एक सप्तक के अर्न्तगत आते हैं उसी प्रकार ज्ञान
स्वरोदय विज्ञान में ईडा, पिंगला व सुषुम्ना के अर्न्तगत पाँच तत्व निरन्तर
बहते हुए अपने अनेक रुप प्रकट करते हैं। यह पाँचों तत्व दिन-रात
अलग-अलग समयों पर सक्रिय होते रहते हैं और यहां तक की मास के दोनों
पक्ष शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में इनकी सक्रियता अलग-अलग प्रभाव
दिखाती है और उसी प्रकार संगीत के राग भी 24 घन्टे में अलग-अलग
प्रभाव उत्पन्न करते हैं। क्योंकि हमारा संगीत मूलतः आध्यात्म से ही निकलता
है। इसलिए संगीत योगियों ने स्वर ज्ञान के तत्वों को समझकर संगीत के
स्वरों के ज्ञान के प्रभाव को ध्यान में रखकर ज्ञान स्वरोदय के तत्वों के साथ
संगीत के स्वरों के ज्ञान के प्रभाव को ध्यान में रखकर ज्ञान स्वरोदय के तत्वों
के साथ संगीत के स्वरों के तत्त्वों का मिलान करके रागों के रस, प्रभाव तथा
समय निश्चित किए हैं। यहां तक की तात्विक आधार पर रागों का ऋतुओं
के साथ सम्बन्ध स्थापित किया है।
जिन संगीतज्ञों ने स्वर की साधना करते हुए उनके तात्विक प्रभाव को
जाना तथा स्वर विद्या के अनुसार उसका प्रयोग किया वही संगीतज्ञ संगीतयोगी
कहलाए। शोधार्थी के विचार में स्वामी हरिदास, भक्त सूरदास, मीराबाई,
स्वामी चरणदास, तुलसीदास, कबीरदास, रामदास तथा बुल्लेशाह मध्ययुगीन
संगीत योगियों की श्रेणी के अर्न्तगत आते हैं। ऐसा भी नही है की प्राचीन
काल में संगीत योगी नहीं हुए, स्वयं भगवान श्री कृष्ण इस श्रेणी के योगीराज
हैं और तो और इस विद्या के प्रेणता स्वयं भगवान शिव हैं।
आधुनिक युग में संगीतकार आध्यात्मिक आध्यात्म की बातें तो करते हैं
परन्तु संगीत के आध्यात्म की साधना नहीं करते। स्वर विज्ञान की सिद्धि के
बिना संगीत की साधना चमत्कार तो पैदा कर सकती है परन्तु मुक्ति का मार्ग
प्रशस्त नहीं कर सकती। शोधार्थी का मानना है कि स्वर विज्ञान के साधकों
को संगीत का ज्ञान होना चाहिए तथा संगीत के कलाकारों को स्वर विज्ञान
शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि जहां "स्वरोदय विद्या आध्यात्म से
जुड़कर निर बार बेह में स्थित स्बर का अनुसंधान कर मुक्ति प्रदान करती है
वहीं ये विद्या ज्योतिष शास्त्र में प्रश्नकर्ता के उत्तर देने में सक्षम है और यही
स्वर जब व्यक्त रूप में हम सुनते हैं और इसका अनुसंधान करते हैं तो
संगीत कै अनेक रागों से लाभान्वित होते हैं तथा औरों को भी लाभान्वित
करते हैं। इस प्रकार ये दोनों विद्यायें आपस में प्राचीन काल से ही सम्बन्धित
थी। अब इस सम्बन्ध को जानने वालों की कमी हो गयी है।
 दोनों विद्याओं का महत्व बिना स्वर विद्या के संगीत
साधक एक संगीतकार तो हो सकता है लेकिन
संगीत के माध्यम से अपनी मुक्ति का मार्ग प्राप्त नहीं कर सकता और जो
ज्ञानी स्वरोदय विद्या को जानने वाला है वह अपनी मुक्ति का मार्ग तो प्राप्त
कर सकता है लेकिन संसार को मुक्ति के मार्ग पर नहीं चला सकता। जो
इन दोनों विद्याओं को जानने वाला है वह अपनी मुक्ति के साथ-साथ संगीत
के माध्यम से अनेकों को मुक्ति के मार्ग पर चला सकता है। उसके संगीत में
सम्मोहन होगा। जैसे स्वामी तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास, मीराबाई तथा
स्वामी हरिदास के संगीत में उच्च कोटि का सम्मोहन था। ऐसे भक्तजनों का
संगीत प्रत्येक देह में व्याप्त अनाहत नाद को झंकृत कर मुक्ति के लिए प्रेरित
करेगा। यदि आधुनिक संगीत शोधार्थी स्वर विद्या का अनुसंधान कर इस
विद्या में सिद्धस्थ हो जाए और फिर संगीत का प्रयोग करे तो जन-साधारण
के अनेकों कष्टों का निवारण हो सकता है।
यदि यहाँ मैं इस स्वर विद्या की साधना का उल्लेख न करूं तो यह सारी
चर्चा अधूरी रहेगी।
2.12 स्वरोदय शास्त्र की साधना विधि तथा पंचतत्वों का बोध
योग दर्शन के अनुसार पाँच तत्व इस प्रकार हैं: आकाश, अग्नि, वायु, जल
तथा पृथ्वी । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति इन्ही पाँच तत्वों से हुई है। शिव
स्वरोदय तथा स्वरोदय विज्ञान ग्रन्थों में शिव का आदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति
को प्रतिदिन गुरू के समक्ष पंचतत्वों की जानकारी करनी चाहिए।
पंचतत्वों की ज्ञान विधि
सर्वप्रथम अपनी हथेली के दोनों अगूठों से कानों को, दोनों तर्जनी से आंखों
को, दोनों मध्यमा से नाक के छिद्रों को तथा अनामिका व कनिष्ठिका से मुंह
को बंद करें। इसके बाद दोनों आंखों के मध्य में स्थित स्थान पर अपना
ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस प्रकार हमें पंचतत्वों के रंगों का दर्शन
सहजता से हो सकता है। इस क्रिया के करने से यदि पीला रंग दिखाई दे
तो पृथ्वी तत्व का उदय मानना चाहिए और सफेद रंग दिखने पर जल तत्व
का, लाल रंग दिखने पर अग्नि तत्व का, काला रंग दिखने पर वायु तत्व का
और चित्तकबरा रंग दिखने पर आकाश तत्व का उदय हुआ मानना चाहिए।
इसके अतिरिक्त हम अपने हाथ में एक दर्पण ले लें और उस पर नाक
से श्वास छोड़े, यदि दर्पण पर चौकोर आकृति बनें तो पृथ्वी तत्व का,
अर्द्ध-चन्द्राकार आकृति बने तो जल तत्व का तथा बिन्दु-बिन्दु आकृति बनें
तो आकाश तत्व का उदय हुआ मानना चाहिए। हमारे शरीर में किस समय
किस तत्व की प्रधानता है या किस तत्व का उदय हुआ है, इसका हमें
बोध हो जाएगा और उसी तत्व से सम्बन्धित राग का प्रयोग करना चाहिए।

सारांश
गंधर्व विद्या नाद के व्यक्त रूप पर आधारित है। नाद की परिभाषा अलग-अलग
ढंग से की गई है। योगीजनों की नाद की परिभाषा संगीतजनों के नाद की परिभाषा से अलग है। इसी तरह तांत्रिक तथा व्याकरणाचार्यों की नाद
परिभाषाऐं अलग है। इस प्रकार नाद से सम्बन्धित अनेक प्रकार की परिभाषा
दृष्टिगोचर होती है। जिससे नाद का विराट रूप प्रकट होता है नाद से स्वर
की उत्पत्ति होती है। स्वर की परिभाषा योगीजन श्वसन क्रिया के आधार पर
करते हैं और संगीतज्ञ स्वर के व्यक्त रूप के आधार पर करते हैं। योगियों
ने समस्त विद्याओं की जननी स्वर विद्या को माना है और स्वर के
अनुसंधानकर्ता इहलोक-परलोक दोनों में अपना स्थान बनाते हैं और जगत
कल्याण करते हैं।
स्वर विद्या के अनुसंधानकर्ताओं को गन्धर्व की संज्ञा से पुकारा जाता है
ये गन्धर्व पाँच प्रकार के थे। सम्भवतः पंचतत्वों के ज्ञाता थे। इसलिए उनकी
अलग-अलग श्रेणियां बताई गई। क्योंकि पंचतत्वों का सम्बन्ध विभिन्न ग्रहों
से हैं और इन पाँच तत्वों का सम्बन्ध प्राचीन महर्षियों ने स्वरों से भी बताया
है। इस आधार पर शोधार्थी का मानना है कि संगीत तथा ज्योतिष का
आपसी सम्बन्ध स्थापति होता है और सर्वप्रथम स्वर विज्ञान की महिमा बताते
हुए मैंने स्वर के अव्यक्त रूप की चर्चा की है।
:-
शिव का सबसे गहन और रोचक तंत्र है स्वरोदय शास्त्र  जिसमे मूल नाद और लय की साधना होती है

जिसके मुख्य दो आयाम है एक है नाद जिसे ध्वनि कहते है एक आहत और दूसरी अनाहत 
जिसमे साधक को अपनी गति को अपनी प्रकृति एवं अपने कुंडलिनी के संचित कर्मो का विनाश कर एक एक कर अपनी आत्मा के मूल केंद्र पर जाना होता है

स्वरोदय वो विज्ञानं है जिससे ब्रह्मा वेद पठन करते है सरस्वती ब्रह्मांड को ज्ञान देती है कृष्ण आनंद देते है शिव नया आरम्भ हेतु विसर्जन करते है

नाद और लय का ताल मेल संगीत है

शब्द बिना है सुरत आंधरी

बिना नाद साधक को पता ही नहीं चलता की वो अपने पिंड के कौसे द्वार से अपनी आत्मा को वैश्विक चेतना में व्याप्त कर सकते है
या ध्वनि नौ प्रकार की होती है.
नहीं वो मोक्ष को पा सकता है

क्यूंकि उपरी अवस्था का ज्ञान नहीं होता तब तक जिव मृत्यु लोक अंतर्गत ही भटकता है

जब नाद और लय से श्रुति को सुनता है तब वो अभेद रहस्य को समजने लगता है यह बिना गुरु सम्भव नहीं है साधक कितने भी प्रयत्न करले चाहे अपने योग बल से शिवत्व को प्राप्त करले किन्तु बिना 
गुरु कृपा सही नाद और लय प्राप्त नहीं कर सकते

नाद ध्वनी
इसको
सुनने का अभ्यास करना शब्द-ब्रह्म का
ध्यान करना है. इससे
संध्या के बाद खाया हुआ अन्न क्षण भर में
ही पाच
जाता है और संपूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि
बहुत से उपद्रवों का
शीघ्र ही नाश करता है. यह शब्द
ब्रह्म न ॐकार है, न मंत्र है, न बीज
है, न अक्षर है. यह अनाहत नाद है
(अनाहत अर्थात बिना
आघात के या बिना बजाये उत्पन्न होने
वाला शब्द). इसका उच्चारण
किये बिना ही चिंतन होता है. यह नौ
प्रकार का होता
है :-
१. घोष नाद :- यह आत्मशुद्धि करता है,
सब रोगों का नाश करता
है व मन को वशीभूत करके अपनी और
खींचता है.
२. कांस्य नाद :- यह प्राणियों की गति
को स्तंभित कर
देता है. यह विष, भूत, ग्रह आदि सबको
बांधता है.
३. श्रृंग नाद :- यह अभिचार से सम्बन्ध
रखने वाला है.
४. घंट नाद :- इसका उच्चारण साक्षात्
शिव करते हैं. यह संपूर्ण
देवताओं को आकर्षित कर लेता है,
महासिद्धियाँ देता है और
कामनाएं पूर्ण करता है.
५. वीणा नाद :- इससे दूर दर्शन की
शक्ति प्राप्त होती है.
६. वंशी नाद :- इसके ध्यान से सम्पूर्ण
तत्त्व प्राप्त
हो जाते हैं.
७. दुन्दुभी नाद :- इसके ध्यान से साधक
जरा व मृत्यु
के कष्ट से छूट जाता है.
८. शंख नाद :- इसके ध्यान व अभ्यास से
इच्छानुसार रूप धारण
करने की शक्ति प्राप्त होती है.
९. मेघनाद :- इसके चिंतन से कभी
विपत्तियों का सामना
नहीं करना पड़ता.
इन सबको छोड़कर जो अन्य शब्द सुनाई
देता है वह तुंकार
कहलाता है. तुंकार का ध्यान करने से
साक्षात् शिवत्व
की प्राप्ति होती है.

शब्द ब्रह्म के 1000 प्रकार है हर सहस्त्र दल में सहस्त्र सिद्धिया है जो यह सहस्त्र भिन्न भिन्न नाद से खोला जाता है

यह एक अलौकिक घटना है

जब गुरु शिष्य से अत्यंत प्रसन्न हो जाते है
तब यह पूर्ण अभिषेक से सब नादो को अपनी कला ओ से खिला देते है
जो सारे ब्रह्मांड का ज्ञान वो शिष्य को स्वत: सिद्ध हो जाता है

यह क्रिया सब एक शब्द भेदी गुरु ही कर सकते है

बाकि के सारे नाद वो सिद्धिया या देव मंडल को प्राप्त करवाते है जब की
निनाद और सार शब्द वो मुक्ति देते है

जिसके बाद शिष्य परब्रह्म अवस्था को प्राप्त कर लेता है और अपने योग बल से अपना विराट स्वरुप भी प्रकट कर लेता है
वो अकरम और अकर्ता हो जाता है

नाद और लय दोनों ही एक सिक्के की दो बाजु है
बिना लय नाद एक ध्वनि है 
लय के साथ नाद संगीत है
जिसे हम ritham केहते है
लय का काम प्रथम पद पर सांसो से होती है
नाद पर ध्यान लगाते ही साँस अपने आप लय को प्राप्त करती है
बिना लय के साँस जब चलती है तो वो ब्रह्मांडीय और पंचतत्वो में असमानता पैदा करती है
जैसे कोई भी संगीत सुर में या ताल बद्ध नहीं होता वो कर्ण प्रिय नहीं होता

दूसरा चरण आता है ह्रदय की स्पंदन उर्जा को लय में आना जिससे 
हमारा शरीर निरोगी रेहता है
बेशक की नाद की उर्जा से खाना जल्दी पच जाता है
एवम आपकी शरीर एक कोस्मिक शरीर हो जाती है
शरीर हल्का रेहता है भूख और नींद कम हो जाती है 
बस एक तन्द्रा और उसमे पूर्ण सजगता की अनुभूति होती है
जिससे लय मिलता है
यह साधक के बाहरी और आंतरिक उर्जा एवम उसके आचार विचार और व्यवहार पर काम करता है

लय बद्धता आने पर ब्रह्मांड में चल रही महा आरती स्त्रोत्र श्रुति गान
परावानी  आने वाले भविष्य में ब्रह्मांड की स्थिति सब लय पर रहता है

जब साधक को सभी नाद की ध्वनि संगीत और लय बद्धता से सुनाई देती है तब वो आत्मा के महारास तक पोहच जाता है
जहा
 हजारो गीता जैसे ग्रन्थ प्रकाशित होती रहते

मूल बात यही आती है की सिद्ध विद्या होते हुई भी इन्सान अपने आप को लालच लोभ और मोह से ग्रस्त कर लेता है वहा से वो सिद्धि चली जाती है

यह एक ऐसा विज्ञानं है जो जिससे श्री कृष्ण ने अपने योगेश्वर रूप को भिन्न भिन्न कला और रूपों में प्रकट किया था

पूजा पाठ कर्मकांड अनुष्ठान सब इसके सामने तुच्छ है

पर यह सहज योग सिर्फ और सिर्फ इश्वर के प्रेम को पाने से ही संभव है

इस पर नरसिह मेहता ने खूब कहा था
अखिल ब्रह्मांड माँ एक तू श्री हरी
जुजवे रुपे अनंत बाजे

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