गंगा दशमी- सेतुबंध रामेश्वरम स्थापना
आज ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष गंगा दशमी "गंगा दशहरा"...
गंगा सप्तमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को कहा जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास की इस तिथि को ही माँ गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में पहुँची थीं। इसलिए इस दिन को 'गंगा सप्तमी' के रूप में मनाया जाता है। कहीं-कहीं पर इस तिथि को 'गंगा जन्मोत्सव' के नाम से भी पुकारा जाता है। गंगा को हिन्दू मान्यताओं में बहुत ही सम्मानित स्थान दिया गया है।
पौराणिक उल्लेख ::---
पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार जब कपिल मुनि के श्राप से सूर्यवंशी राजा सगर के 60 हज़ार पुत्र जल कर भस्म हो गए, तब उनके उद्धार के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या की। वे अपनी कठिन तपस्त्या से माँ गंगा को प्रसन्न करने में सफल रहे और उन्हें धरती पर लेकर आए। गंगा के स्पर्श से ही सगर के 60 हज़ार पुत्रों का उद्धार हो सका। गंगा को 'मोक्षदायिनी' भी कहा जाता है। विभिन्न अवसरों पर गंगा नदी के तट पर मेले और गंगा स्नान आदि के आयोजन होते हैं। इनमें 'कुंभ पर्व', 'गंगा दशहरा', 'पूर्णिमा', 'व्यास पूर्णिमा', 'कार्तिक पूर्णिमा', 'माघी पूर्णिमा', 'मकर संक्रांति' व 'गंगा सप्तमी' आदि प्रमुख हैं।
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को माँ गंगा स्वर्ग लोक से शिवशंकर की जटाओं में पहुँची थी। इसलिए इस दिन को 'गंगा सप्तमी' के रूप में मनाया जाता है।
जिस दिन गंगा जी की उत्पत्ति हुई, वह दिन 'गंगा जयंती' (वैशाख शुक्ल सप्तमी) और जिस दिन गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित हुईं, वह दिन 'गंगा दशहरा' (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) के नाम से जाना जाता है। इस दिन माँ गंगा का पूजन किया जाता है।
गंगा सप्तमी के अवसर पर्व पर माँ गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वैसे तो गंगा में स्नान का अपना अलग ही महत्व है, लेकिन इस दिन स्नान करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्ति पा जाता है।
क्या आपको पता है आज ही के दिन सेतु बंध रामेश्वर शिव लिंग की स्थापना दशहरा में पूजनीय
नारायणं महेशं च ब्रह्माणं भास्करं
तथा । भागीरथं च नृपतिं हिमवन्तं नगेश्वरम् ॥
गन्धपुष्पादिभिः सम्यग्यथाशक्ति प्रपूजयेत् । दशप्रस्थांस्तिलान्दद्याद्दशविप्रेभ्य एव च।
दशप्रस्थान् यवान्दद्याद्दशसंख्यागवीस्तथा
।।
प्रस्थः = षोडश पलानि । पलं तु 'मुष्टिमात्रं पलं स्मृतम्' इति महार्णवे उक्तम् ।
नारायण, महेश, ब्रह्मा, सूर्य, भगीरथ, राजा और हिमवान्, नगेश्वर का यथाशक्ति गन्ध-पुष्प आदि से अच्छी प्रकार से
। दश ब्राह्मणों के लिये दशप्रस्थ (सोलह पल) यवों का और दश गो का दान करे। प्रस्थ- सोलह पल को
कहते हैं। पल तो मुष्टिमात्र को कहते हैं—यह महार्णव में कहा है।
पूजन करे
मत्स्य- कच्छप-मण्डूक- मकरादि-जलेचरान्। हंस-कारण्डव- बक-चक्र-ट्टिभि- सारसान्॥
कारयित्वा यथाशक्ति स्वर्णेन रजतेन तदलाभे पिष्टमयानभ्यर्च्य कुसुमादिभिः ॥
गङ्गायां प्रक्षिपेदाज्यदीपांश्चैव प्रवाहयेत्। पुष्पाद्यैः पूजयेद् गङ्गां मन्त्रेणानेन भक्तितः ॥
वा ।
ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै नमो नमः ॥
इति मन्त्रं तु यो मर्त्यो दिने तस्मिन्दिवानिशम् ।
जपेत्पञ्चसहस्त्राणि दशधर्मफलं लभेत् ॥
मछली, कछुआ, मेढक, मगर आदि जल में चलनेवाले जीवों को-हंस, कारण्ड-जलकुक्कुट, बगुला, चक्रवार,टिटहरी, सारस पक्षी–सोने या चाँदी का यथाशक्ति बनवा कर या उनके अभाव में पिष्टमय (आटा) का बनाकर कुसुम (पुष्प) आदि से पूजा कर गंगाजी में प्रक्षेप करे। घी के दीपकों को भी प्रवाहित करे। पुष्प आदि के द्वारा गंगाजी की भक्ति भाव से इस मन्त्र से पूजा करे।
'ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गङ्गायै नमो नमः।' इस मन्त्र को जो मनुष्य दिन या रात-दिन में पाँच हजार जपता है। उसको दश प्रकार के धर्मफल का लाभ होता है।
काशीखण्डे त्वन्यो मन्त्र उक्त:-
नमः शिवायै प्रथमं नारायण्यै पदं ततः । दशहरायै पदमिति गङ्गायै मन्त्र एष वै ।।
स्वाहान्तः प्रणवादिश्च भवेद्विंशाक्षरो
मनुः । पूजादानं जपो होमः तेनैव मनुना स्मृतम्। इति।
काशीखण्ड में तो अन्य मन्त्र कहा है कि- 'ॐ नमः शिवायै' – यह प्रथम पद है। तदनन्तर दूसरा पद 'नारायण्यै'
है। तीसरा पद 'दशहरायै' है। चतुर्थ पद— 'गङ्गायै' है। यही मन्त्र है। प्रणव को आदि में कहें और अन्त में स्वाहा शब्द कहें तो बीस अक्षर का मन्त्र होता है। मन्त्र का स्वरूप यह है— 'ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गङ्गायै स्वाहा।
इसी से पूजा, दान, जप तथा होम को कहा है।
अत्र 'गङ्गास्तोत्रपाठमपि दशवारं कुर्यात् । तदुक्तं भविष्ये-
तस्यां दशम्यामेतच्च स्तोत्रं गङ्गाजले स्थितः । यः पठेद् दशकृत्वस्तु दरिद्रो वाऽपि चाक्षमः ॥सोऽपि तत्फलमाप्नोति गङ्गां सम्पूज्य यत्नतः ।। इति ।
श्री गंगा जी की स्तुति
गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।
त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥माँ गंगा स्तोत्रम्॥
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे
त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमले
मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥
भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव
जलमहिमा निगमे ख्यातः ।
नाहं जाने तव महिमानं
पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥
हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे
हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं
कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३॥
तव जलममलं येन निपीतं,
परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।
मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः
किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४॥
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे
खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये,
पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५॥
कल्पलतामिव फलदां लोके,
प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।
पारावारविहारिणि गङ्गे
विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६॥
तव चेन्मातः स्रोतःस्नातः
पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे
कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७॥
पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे
जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।
इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे
सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥
रोगं शोकं तापं पापं
हर मे भगवति कुमतिकलापम्।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे
त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९॥
अलकानन्दे परमानन्दे
कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवासः
खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १०॥
वरमिह नीरे कमठो मीनः
किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव
न हि दूरे नृपतिकुलीनः॥ ११॥
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये
देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं
पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२॥
येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां
भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकान्तापज्झटिकाभिः
परमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३॥
गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं
वाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।
शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति
सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ १४॥
देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे
त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमले
मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥
- श्री शङ्कराचार्य कृतं
यहाँ पर गङ्गास्तोत्र का पाठ भी दश बार करे। इस बात को भविष्यपुराण में कहा है कि उस दशमी तिथि में इस
श्लोक को गंगाजल में स्थित होकर जो दरिद्री या अक्षम (धनी) दश वार पड़ता है। वह भी गंगाजी के जल से पूजन का
फल प्राप्त करता है।
स्तोत्रं च प्रतिपदादिदशमीपर्यन्तं दिनवृद्धिसंख्यया पठनीयमिति शिष्टाः । अत्र सर्वोऽपि विस्तरः
स्तोत्रादि च भट्टकृतत्रिस्थलीसेतोरवधेयः। विस्तरभीतेस्तु न लिख्यते।
स्तोत्र को प्रतिपदा तिथि से दशमी तिथिपर्यन्त दिन वृद्धि की संख्या से पढ़ना चाहिये—यह शिष्ट मत है। यहाँ पर
सम्पूर्ण विस्तार तथा स्तोत्रादि को भट्टकृत त्रिस्थलीसेतु—से जानना चाहिये। विस्तार के भय से नहीं लिखते हैं।
एवं कुर्वतः फलमुक्तं काशीखण्डे-
एवं कृत्वा विधानेन वित्तशाठ्यविवर्जितः। उपवासी वक्ष्यमाणैर्दशपापैः प्रमुच्यते॥
सर्वान्कामानवाप्नोति प्रेत्य ब्रह्मणि लीयते।। इति ।
इस तरह करते हुए काशीखण्ड में फल कहा है कि इस प्रकार उपवासी (उपवास करने वाला) मनुष्य वित्त की
शठता को छोड़कर विधान द्वारा कहे हुए दश पापों से छूट जाता है। और संपूर्ण इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है एवं मरने
पर ब्रह्म में लय हो जाता है।
सेतुबन्धरामेश्वर-प्रतिष्ठादिन पर विशेष पूजन-कथन
अस्यां सेतुबन्धरामेश्वरस्य प्रतिष्ठादिनत्वाद्विशेषेण पूजा कार्या। तदुक्तं स्कान्दे सेतुमाहात्म्ये—
ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः । गरानन्दे व्यतीपाते कन्याचन्द्रे वृषे रवौ।
दश योगे सेतुमध्ये लिङ्गरूपधरं हरम्। रामो वै स्थापयामास शिवलिङ्गमनुत्तमम्।। इति दशहरा।
इस तिथि में सेतुबन्ध रामेश्वर का प्रतिष्ठादिन होने से विशेष पूजा करे। इस बात को स्कन्दपुराण के सेतुमाहात्म्य में
लिखा है कि—ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर, आनन्द, व्यतीपात, कन्या का चन्द्रमा और वृष राशि का सूर्य—इन दशयोग में सेतु के मध्य में लिङ्गरूपधारी हर (शङ्कर) को श्री (भगवान्) राम ने स्थापन किया। जो शिवलिङ्ग सर्वोत्तम है।