" बीज मंत्र रहस्य " सम्पूर्ण व्याख्या

" बीज मंत्र रहस्य " सम्पूर्ण व्याख्या 
आध्यात्म जगत अतिव्यापक गहन ओर स्वयं मे अनेकों रहस्य संजोये दैदीप्यमान चेतना सभर बना रहा है |
खास कर परब्रम्ह कों आराधित करने ओर उनकी कृपा प्राप्ति हेतु अनेकों मार्ग ओर ध्यान पुजन जप के अनेको निर्देश देखे जाते है | लगभग सभी देवी देवताओ की पुजा ओर आराधन मे मंत्रो कों अति विशेष महत्व दिया गया है | 
मंत्र क्या है ...? 
क्यो बिना किसी मंत्र के या मंत्र जप के दिव्य आराधन कों अधूरा समझा जाता है |
“ मनः मुक्तों त्रीतापेण इति मंत्र “सहजता से समझे तो हमे त्रिविध( आधि दैविक, आधि भौतिक, सांसार्गिक) तपो से जो बाहरी लौकिक जगत की समस्त आपदा विपदा भय से मुक्त बनाए रक्खे वही मंत्र कहा गया है| ‘मंत्र’ का अर्थ शास्त्रों में ‘मन: तारयति इति मंत्र:’ के रूप में बताया गया है, अर्थात मन को तारने वाली ध्वनि ही मंत्र है। वेदों में अक्षर ओर शब्दों के संयोजन से ऐसी ध्वनि उत्पन्न की गई है, जिससे मानव मात्र का मानसिक आध्यात्मिक कल्याण हो। ‘बीज मंत्र’ किसी भी मंत्र का वह लघु रूप है, जो मंत्र के साथ उपयोग करने पर उत्प्रेरक का कार्य करता है। यहां हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बीज मंत्र मंत्रों के प्राण हैं या उनकी कुंजी हैं|
जैसे एक मंत्र-‘श्रीं’ मंत्र की ओर ध्यान दें तो इस बीज मंत्र में ‘श’ लक्ष्मी का प्रतीक है, ‘र’ धन सम्पदा का, ‘ई’ प्रतीक शक्ति का और सभी मंत्रों में प्रयुक्त ‘बिन्दु’ दुख हरण का प्रतीक है। इस तरह से हम जान पाते हैं कि एक अक्षर में ही मंत्र छुपा होता है। इसी तरह ऐं, ह्रीं, क्लीं, रं, वं आदि सभी बीज मंत्र अत्यंत कल्याणकारी हैं। हम यह कह सकते हैं कि बीज मंत्र वे गूढ़ मंत्र हैं, जो किसी भी देवता को प्रसन्न करने में कुंजी का कार्य करते हैं
मंत्र शब्द मन +त्र के संयोग से बना है !मन का अर्थ है सोच ,विचार ,मनन ,या चिंतन करना ! और “त्र ” का अर्थ है बचाने वाला , सब प्रकार के अनर्थ, भय से !लिंग भेद से मंत्रो का विभाजन पुरुष ,स्त्री ,तथा नपुंसक के रूप में है !पुरुष मन्त्रों के अंत में “हूं फट ” स्त्री मंत्रो के अंत में “स्वाहा ” ,तथा नपुंसक मन्त्रों के अंत में “नमः ” लगता है ! मंत्र साधना का योग से घनिष्ठ सम्बन्ध है……

मंत्र ये कोई जादुई छड़ी या कोई चमत्कार नहीं ...!!
इसे देवी देवताओ का सूक्ष्म देह कहा गया है|  
आध्यात्म ओर भाव जगत मे शब्द कों ही ब्रम्ह माना जाता है |
हमारी सहज संवाद की शैली मे सभी भाषा ओर शब्द वाक्य ओर तथ्यो कों सटीक समझने ओर अक्षर या शब्दो से जुड़े उनके गर्भित सार आत्मसात करने हमे बचपन मे भाष का ज्ञान दिया जाता है |
बालक कों सर्व प्रथम क ख ग घ च छ ..... ये मुल अक्षरो का ज्ञान दिया जाता है |बाराक्षरी मे अक्षर का ऐक रूप ओर उसका सटीक उच्चारण हो इस पर भी खास ध्यान दिया जाता है ( जेसे ग ओर घ ) समान लगते अक्षर का उच्चारण भी अलग नाद संगत करने से उसके स्वरूप भेद कों स्पष्ट किया जाता है| यहा तक तो आसान लगता है पर जब अक्षरो के साथ बिंदु मात्र रकार उकार मकार आड़ि जोड़े जाते हे तो इंका व्याप हो कर गहन बनते जाते है | भाषा से मंत्र की शुद्धता स्पष्ट उचारण हेतु अक्षर ओर व्याकरण की शुद्धि अनिवार्य मानी गयी है | 
अनेको साधक उपासक की बोली या लिखावट मे व्याकरण के अनेको दोष देखे जाते है | समान्य बोलचाल मे तो ये क्षम्य हे किन्तु मंत्र उच्चारण मे इसकी शुद्धि होना खास अनिवार्य माना जाता है | तभी मंत्र गुरुमुख से दीक्षा लेकर ही दिया जाता रहा है | 
हमारे वेद कालीन अध्ययन कों देखे तो अनेको ग्रंथ कों श्रुतिग्रंथ कहा गया है जो शिष्य अपने समर्थ गुरुजी के सरी मुख से सुनते रहे ओर उनका मर्म आत्मसात करते रहे है |
मंत्र कों लिखने पढ़ने से ज्यादा शुद्धि सुन कर कानो से आवाज़ के माध्यम से शब्द नाद सी ली गयी मंत्र दीक्षा कों उत्तम माना गया है | गुरु मंत्र कों गुप्तता से लिया जाता है | शायद तभी सभी ब्राह्मणो के यज्ञोपवीत संस्कार के समय ब्रम्हदीक्षा के मंत्र गुप्तता से दिये जाने का प्रावधान देखा जाता है |
  इस ब्रह्माॅंड का प्रत्येक कंपन, रंग और ध्वनि का मिलित रूप होता है। प्रत्येक विचार भी मानसिक कंपन को उत्पन्न करता है अतः उसमें भी कंपन के रंग और ध्वनि होती है भले हम उसे न सुन पायें या न ही अनुभव कर पायें। इन्हें हम स्पंदनिक रंगों के यथार्थ क्षेत्र में मातिृकावर्ण कह सकते हैं और जिन विचारों से वे संबद्ध होते हैं उनके बीज मंत्र मान सकते हैं।
 "अ" ध्वनि स्रजन  का ध्वन्यात्मक मूल है। यही कारण है कि वह "भारतीय स्वर सप्तक" ( स, रे, ग, म, प, ध, नि ) का नियंत्रक है। भगवान सदाशिव  ने इस ध्वनि विज्ञान को आकार दिया और संगीत के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया। रंग, वर्ण या अक्षर और राग एक ही मूलक्रिया 'रंज' में घईं प्रत्यय लगाकर बनाये गये हैं जिसका अर्थ है किसी चीज को रंगना। क्रमचय और संचय विधियों से सदाशिव  ने इन ध्वनियों को अनेक रूपों में रंग
दिया जिन्हें छः राग और छत्तीस रागिनयाॅं कहते हैं। इस प्रकार संगीत के संसार को विस्त्रित करने के लिये उन्होंने महर्षि भरत को प्रशिक्षित  किया जिन्होंने इसे बौद्धिक स्तर पर उन्नत लोगों में प्रसिद्ध किया। अब तक नये अनुसंधान से अनेक राग और रागिनियाॅं भारतीय संगीत में जुड़ चुके हैं।
"आ" ध्वनि संगीत के ऋषभ अर्थात् दूसरे स्वर को प्रकट करता है जो ऋषभ को प्रत्यक्ष और गाॅंधार, मध्यम, पंचम, धैवत्य, और निषाद को अप्रयक्ष रूप से नियंत्रित करता है।
इन्डो आर्यन वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर 'अ' से 'क्ष' तक अपनी अपनी ध्वन्यात्मक मूल को निर्मित करता है। अतः सभी पचास वर्ण मनुष्य की पचास वृत्तियों को प्रकट करते हैं। तीसरा अक्षर 'इ' गाॅंधार का ध्वन्यात्मक मूल है और इसे प्रत्यक्षतः और अगले मध्यम, पंचम, धैवत्य, और निषाद को अप्रयक्ष रूप से नियंत्रित करता है।
सुर सप्तक के चैथे स्वर मध्यम 'म' का ध्वन्यात्मक मूल 'ई' है जो इसे प्रत्यक्षतः और पंचम, धैवत्य, और निषाद को अप्रयक्ष रूप से नियंत्रित करता है।
पंचम अर्थात् 'प' का ध्वन्यात्मक मूल छोटा 'उ' है जो पंचम को प्रत्यक्ष और  धैवत्य, और निषाद को अप्रयक्ष रूप से नियंत्रित करता है।
धैवत्य अर्थात् 'ध' का ध्वन्यात्मक मूल बड़ा 'ऊ' है जो धैवत्य को प्रत्यक्ष और निषाद को अप्रयक्ष रूप से नियंत्रित करता है।
यह निषाद 'नि' का ध्वन्यात्मक मूल है। यह सीधे ही सातवें स्वर को नियंत्रित करता है । चूंकि यह अर्धाक्षर है इसकी कोई स्वरात्मक ध्वनि नहीं है। यह किसी अन्य ध्वनि को नियंत्रित नहीं करता।
ऋृ
'ऋृ' ध्वनि, ओम का ध्वन्यात्मक मूल है। अब चूँकि ओम तो स्वयं स्रष्टि के स्रजन पालन और ध्वंस का अर्थात् सगुण और निर्गुण ध्वन्यात्मक का ध्वन्यात्मक मूल है फिर ऋृ , औंकार कर मूल कैसे हो सकता है यह प्रश्न  उठता है। ऊॅं में पाॅंच संकेत मिले हुए हैं, स्रजन का बीज(अ), संरक्षण का बीज(उ), संहार का बीज ,(म), निर्गुण का बीज (विंदु) और निर्गुण से सगुण में रूपान्तर का बीज(चंद्राकार) । अधिकाॅंश  ध्वन्यात्मक मूलों का श्रोत तंत्र है यद्यपि वेदों में भी कुछ पहले से ही मौजूद थे जो तंत्र में बाद में स्वीकार किये गये। ओम अन्य अक्षरों की तरह एक अक्षर है जो दक्षिणाचार तंत्र में ध्वंस को न स्वीकारे जाने के कारण 'उमा' उच्चारित किया जाता है
जो परमा प्रकृति का ही नाम है। ओंकार को प्रणव भी कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'जो परम स्तर को
प्राप्त कराने में अत्यधिक सहायता करता हो।' अब, जब कि ओंकार जो कि दस व्यक्त संसार के ध्वन्यात्मक
 मूल को प्रकट करता है और पाॅंच ध्वनियों को अपने में समाहित किये है अतः वह अपने आपका भी
ध्वन्यात्मक मूल चाहता है। अन्य मूल का ध्वन्यात्मक मूल ‘अतिबीज‘ या ‘महाबीज‘ कहलाता है। इसलिये ‘ऋृ‘ ओंकार का महाबीज हुआ। इसलिये ध्वनिविज्ञान और संधि विज्ञान के द्रष्टिकोंण से ऋृ आवश्यक  घ्वनि है।
लृ
लृ ध्वनि, हुंम ध्वनि का ध्वन्यात्मक मूल और उसका आन्तरिक प्रवाह है। हुंम ध्वनि स्वयं साधना के संघर्ष का ध्वन्यात्मक मूल है और तंत्र के अनुसार कुंडलनी का। जब साधना में आध्यात्मिक प्रगति होती है तब कभी कभी साधकों के गले से हुंम की ध्वनि निकलती है। तंत्र के अनुसार कुंडलनी प्रसुप्त देवत्व है अतः साधना के अभ्यास के समय मंत्राघात और मंत्रचैतन्य के प्रभाव से सभी बाधाओं को पार करते हुए कुंडलनी सहस्त्रार तक पहुंच जाती है। कुंडलनी को इस प्रकार जाग्रत करने का अभ्यास पुरश्चरण  कहलाता है। चूंकि यह मूलाधार में सोती रहती है अतः इसे जगाना बड़े ही संधर्ष से संभव हो पाता है अतः इसका बीज मंत्र हुंम कहलाता है। बुद्धतंत्र में मूलाधार को मणिपद्म या महामणिपद्म भी कहा गया है। वे धर्मचक्र को चलाते हुए ओम मणिपद्मे हुंम्म यह कहते हैं।
लृर्
यह ‘फट्‘ ध्वनि का ध्वन्यात्मक मूल है जो स्वयं ‘‘सिद्धान्त को व्यवहार में लाने‘‘ का ध्वन्यात्मक मूल है अतः लृर्, ‘फट्‘ का अतिबीज या महाबीज हुआ। वैसे ही जैसे बीज का अचानक प्रस्फुटित होना। जैसे सोते से अचानक वास्तविक जगत में आने पर किसी के द्वारा जो ध्वनि की जाती है उसे बोलचाल की भाषा में ‘फट्‘ इस प्रकार कहते है। प्रत्येक अक्षर मातृकावर्ण (causal matrix)कहलाता है क्योंकि प्रत्येक अक्षर किसी न किसी महत्वपूर्ण घटक जैसे ध्वनि, स्पंदन, दिव्य या राक्षसी प्रवृत्ति, मानव गुण या सूक्ष्म अभिव्यक्तिकरण हो सकता है। इसलिये किसी भी अक्षर को वर्णमाला से नहीं हटाना चाहिये भले उसका कम उपयोग होता हो।
साॅंसारिक ज्ञान का लयबद्ध अभिव्यक्तिकरण या उद्गम, साॅंसारिक भलाई, या इसके संबंध में सोचना आदि को ‘‘वोषट‘‘ से संवोधित किय जाता है। ध्वनि ‘इ‘ महाबीज या अतिबीज है ‘वोषट‘ के स्पंदनों का। पुराने जमाने में राजा लोग जो भूमि और अधिक क्षेत्र में राज्य फैलाने के भूखे होते थे वे राजसूय या अश्वमेध  यज्ञ करके ‘‘इम इन्द्राय वोषट‘‘ कहा करते थे ताकि उनका राज्य फैलता रहे।
सूक्ष्म क्षेत्र में भलाई करने का विचार और उसका क्रियान्वयन ‘‘वषट‘‘ से प्रकट किया जाता है। वे जो शिव से सार्वभौमिक भलाई के लिये प्रार्थना करते हैं वे कहते हैं  ‘एैम शिवाय वषट‘ , वे जो सूक्ष्म ज्ञान को प्राप्त करना
चाहते हैं  अपने गुरु से निवेदन करते हैं ‘‘ एैम गुरवे वषट‘‘ वे जो बाढ़ आदि से बचने के लिये प्रार्थना करते हैं वे कहते हैं‘‘ वरुणाय वोषट‘‘ ( यहाॅं भले की भावना केवल भौतिक क्षेत्र के लिये ही की गई है) परंतु वे जो दुष्टों से किये जा रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करते हैं वे कहते हैं ‘‘वरुणाय वषट‘‘। अतः वषट के ध्वन्यात्मक मूल में सूक्ष्म क्षेत्र में भलाई की भावना होती है, इसलिये वह सूक्ष्म क्षेत्र में आशीष देने के विचार से उस भावना का अति बीज या महाबीज है।

  किसी जाप के उच्चारण करने में यह सामान्य प्रचलन है कि ध्वन्यात्मक मूल के अंत में ‘म‘ जोड़ दिया जावे। इसी लिये ई को एैम लिखा गया है। एैम , उच्चारण का ध्वन्यात्मक मूल है। वाचिक अभिव्यक्तिकरण छः प्रकार का होता है, परा, पश्यन्ति , मध्यमा, द्योतमाना, वैखरी और श्रुतिगोचरा। व्यक्ति जो कुछ कहता है या भविष्य में कहेेगा, यह भीतर ही सुप्तावस्था में रहता है जैसे छोटे से बीज के भीतर बृहदाकार वट बृक्ष छिपा रहता है। 
इसी प्रकार मनुष्य की कुंडलनी के भीतर अपार शक्तियाॅं पोटेशियल फार्म में होती हैं। पानी और अनुकूल वातावरण पाकर जैसे बीज से बृक्ष हो जाता है वैसे ही साधना के द्वारा मंत्राघात और मंत्रचैतन्य करने पर कुंडलनी से ये शक्तियाॅं जाग्रत हो जाती हैं और एक के बाद एक क्षमताओं के द्वार खुलते  जाते हैं। तंत्र में इसे पुरश्चरण  और योग में अमृतमुद्रा या आनन्दमुद्रा कहते हैं। ऐसे व्यक्ति की जीवन्तता और सुंदरता बढ़ने लगती है और अन्य लोग उसे महापुरुष कहते हैं और वह अंत में परमपुरुष के साथ एक हो जाता है। शास्त्रों में इस पद्धति को पराभ्युदय कहा गया है।
    भाषाओं के अभिव्यक्तिकरण का पहला स्तर मूलाधार में बीज के रूप में रहता है जो क्रमशः  अगले स्पष्ट स्तरों से होता हुआ पूर्ण भाषा में आ जाता हैं। भाषा के अभिव्यक्तिकरण की यह प्रारंभिक अवस्था पराशक्ति कहलाती है, यह परम क्रियात्मक सत्ता¼supreme operative principle½ से भिन्न होती है। यहाॅं ध्यान रखने की बात यह है कि इकाई सत्ता जिस शक्ति से अपने भौतिक- मनो- आत्मिक कार्य करता है उसे अपराशक्ति कहते हैं जो उसे उच्चतर स्तर तक ले जाने और अस्तित्व बनाये रखने के लिये कार्य करती है पर जिस शक्ति से वह अपने भौतिक मनोआत्मिक ऊर्जा को  सूक्ष्म उन्नति के स्तर ,दिव्य सत्ता की ओर ले जा पाता है वह पराशक्ति कहलाती है। यहाॅं भाषा के अभिव्यक्तिकरण से संबंधित बात हो रही है अतः मूलाधार में सोती हुई इस शक्ति को धीरे धीरे  ऊपर उठाते हुए भाषात्मक अभिव्यक्तिकरण की ओर लाया जाता है। दूसरे स्तर पर यह स्वाधिष्ठान चक्र पर पहुंचती है जहाॅं इसे ‘पश्यन्ति ‘ कहा जाता है।
 यह मूर्त और अमूर्त दोनों प्रकार की द्रश्यता की क्षमता रखती है पर इसकी मात्रा अधिक न होने से वह मानसिक आकार को देख नहीं पाती। विचारों को भाषा में बोलने के लिये उचित ऊर्जा को देने के लिये मणीपुर चक्र सहायता करता है जहाॅं आकर पश्यन्ति  का नाम मध्यमा हो जाता है, मणिपुर चक्र, शरीर को संतुलन में रखता है और ऊर्जा का केन्द्र होता है। मध्यमाशक्ति का वाच्य रूपान्तरण मनीपुर और विशुद्ध  चक्र के बीच के बिंदु पर होता है यहाॅं आकर उसका नाम द्योतमाना हो जाता है। द्योतमाना ग्रहीत विचार को भाषा में प्रकट करने के लिये बेचैन रहती है पर यदि इस प्रक्रिया के बीच मन को कोई डर लगे या कोई बृत्ति बाधक बने, या मनीपुर और विशुद्ध  चक्र के बीच में कोई दोष हो तो व्यक्त की जाने वाली भाषा शुद्ध  नहीं होगी, ऐंसा व्यक्ति कहेगा कि बात मन में है पर बोल नहीं पा रहा। 
वाच्य नाड़ी , विशुद्ध चक्र के क्षेत्र में होती है इसमें अमूर्त विचार को मूर्त विचार में बदलने की शक्ति होती है इस शक्ति को वैखरी कहते हैं। यह बोलने की प्रक्रिया का पाॅंचवाॅं स्तर होता है। जो लोग अधिक बातूनी होते हैं उनकी वैखरी शक्ति अनियंत्रित होती है। मानव कानों से बिलकुल स्वच्छ भाषा  का जब अनुभव होने लगता है तो इसे श्रुतिगोचरा कहते हैं यह भाषा के अभिव्यक्तिकरण की  छठवीं और अंतिम अवस्था कहा जाता है। इस प्रकार ‘एैम‘ ध्वनि उच्चारण के
सभी छः स्तरों की ध्वन्यात्मक मूल है। एैम को वाग्भव बीज भी कहते हैं और इसे गुरु का बीज भी कहते हैं, गुरु से ज्ञान मिलता है अतः ‘‘ एैम गुरवे नमः‘‘ से गुरु को जगाया जाता है। जो मूर्तिपूजा में विश्वाश  करते हैं वे भी
इस बीज को ज्ञान की देवी को जगाने में करते हैं ‘‘एैम सरस्वत्यै नमः‘‘ और इसे तंत्र के प्रवर्तक शिव को जगाने के लिये भी प्रयुक्त कियया जाता हे ‘‘ एैम शिवाय नमः‘‘ ।
क्रिया के पूर्ण होने का ध्वन्यामिक मूल है ‘स्वाहा‘ अर्थात् घी को आग में डालने पर स्वाहा नहीं कहा जा सकता जब तक कि वह पूरा जल नहीं जाता। जब कोई दिव्य कार्य करना होता है तभी स्वाहा बोला जाता है। पवित्र काम के लिये चाहे वह भौतिक मानसिक या आध्यामिक कोई भी हो उसका नियंत्रक ध्वन्यात्मिक मूल है स्वाहा। विशेषतः  स्वाहा को आहुति देते समय कहा जाता है अतः इस अर्थ में वह ध्वन्यात्मक  मूल स्वधा से संबंधित है। स्वधा का सामान्य अर्थ है ‘जो आत्म विश्वाशी  हो‘ इसलिये स्वधा का उपयोग पूर्वजों को आहुति देने में किया जाता है। प्राचीन काल में स्वाहा और स्वधा समानार्थी थे पर बाद में स्वाहा ‘‘ कल्याण हो‘‘ के अर्थ में और स्वधा ‘‘ भगवान आपको शांति दे‘‘ के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। 
इसी  लिये स्वाहा का उपयोग देवी देवताओं के लिये और स्वधा का उपयोग पूर्वजों की स्मृति के लिये किया जाने लगा।

प्राचीन काल में देवताओं और पूर्वजों को आहुति देने के पहले लोगों को बड़े संयम के काल से गुजरना पड़ता था अतः इस  प्रारंभिक तैयारी  के समय को अधिवास कहते थे।  जहाँ  तक ज्ञात है वैदिक युग में लोगों की सबसे कमजोरी थी सुरा या सोमरस या मद्य, को पीने की। अतः अधिवास के समय पुजारी लोग अपने कंधे पर मृगचर्म डाले रहते थे ताकि अधिवास के समयान्तर में कोई उन्हें सुरापान के लिये निमंत्रित न करे। जब उनका धार्मिक कार्य किया करते थे और स्वाहा उच्चारित कर लेते  थे तब वे मृगचर्म को वाॅंयें कंधे पर ले लेते थे और मृगचर्म को  यज्ञोपवीत कहा जाता पर यदि वे पूर्वजों के लिये धार्मिक कार्य करते थे तो स्वधा मंत्र का उच्चारण करते और मृगचर्म को दायें कंधे  पर डाल लेते थे इसे प्राचीणवीत कहा जाता था। जब वे इन में से कोई कर्म नहीं कर रहे होते तो वे मृगचर्म को गले में चारों ओर लपेट लेते थे जिसे निवीत कहा जाता था। देवताओं के कार्य के लिये स्वाहा मंत्र के साथ सम्प्रदान मुद्रा का, त्योहारों पर वोषट और वषट मंत्रों के साथ वरद मुद्रा का और स्वधा मंत्रों का उपयोग करते समय अंकुश  मुद्रा का उपयोग किया करते थे।

औ किसी की महानता को आदर देने के लिये जिस मुद्रा का उपयोग किया जाता है उसे नमः मुद्रा या नमोमुद्रा कहते हैं। वास्तव में किसी की महानता के कारण व्यक्ति का इस प्रकार का समर्पण करना उसके  मानसिक शरीर का परम सत्ता की महानता से स्पंदित होने के कारण होता है अतः नमोमुद्रा को करने वाला लाभान्वित होता है न कि जिसको नमोमुद्रा की जाती है। गुरु को नमो मुद्रा साष्टाॅंग प्रणाम कहलाती है जिसमें हाथों  की हथेलियां परस्पर समानान्तर जोड़कर उन के सामने सीधी लाठी की तरह लेट जाना होता है जिसका अर्थ है कि पूर्ण रूपसे केन्द्रित मन को परम लक्ष्य की ओर प्रेषित  करना। इसमें शरीर के आठ अंग प्रयुक्त होते हैं अतः इसे साष्टाॅंग प्रणाम कहते हैं। नृत्य विज्ञान में इस प्रकार की 850 मुद्राओं को मान्यता दी गई है।

ध्वनि ‘ह‘ सूर्य और आकाश  तत्व की ध्वन्यात्मक मूल है, ‘थ‘ चंद्रमा और अन्य उपग्रहों का ध्वन्यात्मक मूल
है। जब मन का प्रतिनिधि चंदमा और भौतिक ऊर्जा का प्रतिनिधि सूर्य मिलाकर एक किये जाते हैं तो इसे हठ योग कहते हैं। अर्थात् जब कोई क्रिया अचानक की जाती  है तो उससे जो ऊर्जा निकलती है उसे हठात् कहते हैं। शिव की महानता आकाश  की तरह विराट थी अतः लोग उन्हें नमः मुद्रा में आदर देते थे या फिर ‘औ‘ ध्वनि से। इसलिये शिवतत्व की ध्वन्यात्मक मूल ‘‘हौम‘‘ है, (हौम शिवाय नमः)। शिव के लिये अपनी साधुता, सरलता और निस्वार्थ सेवा भाव के कारण जो बहुत निकट और प्रिय थे वे भी उनकी पूजा ‘‘ह‘‘ ध्वनि से करते थे। इसलिये यह समझने में कोई कठिनाई नहीं है कि शिव का ध्वन्यात्मक मूल ‘होम‘ क्यों है।
अम्
‘‘अम् ‘‘ विचार का ध्वन्यात्मक मूल है। एक ही ध्वनि भिन्न भिन्न विचारों से उच्चारित करने पर भिन्न भिन्न अर्थ देती है और व्यक्ति व्यक्ति पर उसका अलग अलग प्रभाव भी पड़ता है।  जहरीली मानसिकता के शब्दों का ध्वन्यात्मक मूल है ‘अम्‘ और मधुरता भरने वाले शब्दों का ध्वन्यात्मक मूल है ‘‘अह‘‘। अतः जब कभी किसी से कुछ बोलना हो
 या कविता पढ़ना हो  या ड्रामा में भाग लेना हो तो यह ज्ञान होना चहिये कि क्या उच्चारित करना है और कैसे।
अहः
ऐंसे अनेक शब्द हैं जो न तो अच्छे हैं और न ही बुरे पर वे बोलने वाले की मानसिकता पर निर्भर करते हैं, जब किसी शब्द को मधुरता से बोला जाता है जो सबके कानों को अच्छा लगे तो इस भाव का ध्वन्यात्मक मूल है ‘अहः‘। इसलिये गायन में कवता पाठ में या नाटक में कार्य करते समय ध्यान रखना चाहिये ।अमृत और विष दोनों का नियंत्रक  विशुद्ध  चक्र है अतः वक्ता को इसके क्षेत्र में स्थित कूर्म नाड़ी पर नियंत्रण करना आना चाहिये।
क 
सभी मनुष्यों के सोचने का तरीका अलग अलग होता है। संसार के अधिकांश   लोग दो प्रकारों, अभीप्सात्मक आशा  वृत्ति  और विशुद्ध  संवेदनात्मक चिंता वृत्ति, इनमें सोचते हैं। अभीप्सात्मक आशा  वृत्ति का ध्वन्यात्तमक मूल ‘क‘ है और वह क्रिया ब्रह्म अर्थात् इस द्रश्य  जगत का भी बीज है। अतः ‘ क‘ सगुण ब्रह्म का नियंत्रक है
 (क धन ईश  बराबर केश  और नारायण दोनों होंगे) क अर्थात् सगुण ब्रह्म का ईश  जो है वह केश  अर्थात् नारायण और केश  अर्थात् बाल भी होगा। ‘‘कै‘‘ क्रियामूल से ड प्रत्यय जोड़कर निष्पन्न ‘क‘ का शाब्दिक अर्थ
है जो ध्वनि उत्पन्न करता है परंतु प्राचीन काल में लोग झरनों और नदियों से पानी एकत्रित करते थे जिनसे पानी के बहने की आवाज आती थी अतः बहते जल का ध्वन्यात्मक मूल ‘क‘ हो गया। वास्तव में पानी का ध्वन्यात्मक मूल ‘व‘ है।
यह चिंता वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल है। ख का अर्थ आकाश  भी है पर यह आकाश  का ध्वन्यात्मक मूल नहीं है आकाश  का ध्वन्यात्मक मूल है ‘ह‘। ख का अर्थ स्वर्ग भी है पर यह उसका ध्वन्यात्मक मूल नहीं है। स्वर्ग का स्थूल पक्ष ख से और सूक्ष्म पक्ष ‘क्ष‘ से प्रदर्शित  होता है।
यह चेष्टा वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल है जिसकी मानव जीवन के भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका है। आन्तरिक विशेषताओं को बाहर प्रकट करने का अभ्यास करना चेष्टा कहलाता है।
आसक्ति और ममता की वृत्ति मनुष्यों और अन्य प्राणियों में होती है जो समय, स्थान और व्यक्तिगत प्रभावों से संबंधित होती है। जैसे लोग अपने देश  की घटिया  वस्तुओं की तारीफ करेगा जबकि दूसरे देश  के अच्छे उत्पाद की नहीं क्योंकि यह किसी स्थान विशेष से मोह को प्रदर्शित  करता है। एक गाय नवजात बछडे  से जितना दुलार करती है कुछ बड़ा होने पर नहीं यह समय विशेष का प्रभाव प्रदर्शित  करता है। अतः ममता वृत्ति सापेक्षिक घटकों से सीमित रहती है पर मनुष्य अपने सतत और एकाग्र प्रयत्नों से उसकी सीमायें बढ़ा सकता है जो अन्य जीवों के लिये असंभव है। ‘घ‘ ममता का ध्वन्यात्मक मूल है।
यह दम्भ वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल है। विद्वान लोग यह मानते हैं कि महान संत वशिष्ठ,  तंत्र सीखने चीन
गये थे वहाॅं से इस ध्वनि का उपयोग उन्होने सीखा और लौटकर भारत में प्रारंभ किया। इन संत ने ही सबसे पहले चीन से बुद्धिष्ठ वामाचार तंत्र सीखा और तब से बौद्धिक तारा कल्ट तीन भागों में बट गया उग्रतारा या वज्र तारा भारत में ,नीलतारा या नीलतारा सरस्वती तिब्बत में और भ्रामरीतारा चीन  में पूजा जाता हैं। इन्हें ही बाद में वर्णाश्रम धर्म में वज्र तारा या उग्रतारा के नाम से स्वीकार किया गया। भारत में वज्र तारा और तिब्बत में नील तारा का ध्वन्यात्मक मूल एैम है।चीन का भ्रामरी तारा भारत में काली देवी के नाम से स्वीकार किया गया। इन दोनों का ध्वन्यात्मक मूल एक ही ‘‘क्रीम्‘‘ है। ‘क‘ सगुण ब्रहम और ‘र‘ ऊर्जा को प्रदर्षित करते हैं। यह ध्यान रखने योग्य है कि ये वशिष्ठ बुद्ध के बहुत बाद में हुए हैं।

विवेक का ध्वन्यात्मक मूल ‘च‘ है।
विकलता वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल ‘छ‘ है। इस वृत्ति में किसी का मन अच्छी तरह कार्य करते करते अचानक या तो कार्य करना बंद कर देता है या उल्टा पुल्टा कार्य करने लगता है। इसे ही nervous breakdown कहते हैं।

यह अहंकार वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल है। इस वृत्ति के लोग प्रायः यह कहते हैं कि मैं ने यह कार्य न किया होता तो होता ही नहीं आदि  आदि...।
यह लोलुपता और लोभ वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल है।
कपटता या पाखंड वृत्ति का यह ध्वन्यात्मक मूल है। इस वृत्ति के लोग दूसरों को ठग कर अपना काम निकालते हैं, या अपने को नैतिक बता कर दूसरों के पापों की आलोचना करते हैं और छिपकर वे पाप स्वयं करते हैं या दूसरे के अज्ञान या कमजोरी का फायदा उठा कर अपने आपको प्रभावी बनाते हैं।
यह वितर्क वृत्ति का ध्वन्यात्मक मूल है। यह वृत्त
" बीज मंत्र रहस्य " ( भाग -२ ) 
‘‘अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्तिमूलमनौषधम्’’ 
अर्थात कोई ऐसा अक्षर नहीं, जो मंत्र न हो और कोई ऐसी वनस्पति नहीं, जो औषधि न हो। केवल आवश्यकता है अक्षर में निहित अर्थ के मर्म को और वनस्पति में निहित औषधि के मर्म को जानने की। और जब मंत्र शास्त्र एवं सद्गुरु की कृपा से इसके अर्थ को हृदयंगम कर लिया जाता है, तब महर्षि पतंजलि के शब्दों में- 
‘‘एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुक् भवति’’ अर्थात यह एक ही शब्द भली भांति जानने पहचानने और मंत्र साधना में प्रयुक्त होने के बाद कामधेनु के समान साधक की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है। 
मंत्र कोई साधारण शब्द नहीं है। यह तो दिव्यशक्ति का वाचक एवं बोधक होता है। इसकी यह विशेषता है कि दिव्य होते हुए भी इसका एक वाच्यार्थ होता है और इसकी दूसरी विशेषता यह है कि यह देवता से अभिन्न होते हुए भी उसके स्वरूप का बोध कराता है। 
मंत्रार्थ ज्ञान की आवश्यकता मंत्र जिस शक्ति का, जिस रूप का और जिस तत्व का संकेत करता है और वह जिस लक्ष्य तक साधक को ले जा सकता है, यदि इन समस्त संकेतित अर्थों की जानकारी साधक को हो जाए, तो उसे अपनी मंत्र साधना में अधिक सुविधा हो जाती है। 
इसीलिए मंत्रशास्त्र ने मंत्र का जप करने से पूर्व उसके अर्थज्ञान को आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य बतलाया है। 
मंत्र योग संहिता के अनुसार, ‘‘मन्त्रार्थ भावनं जपः’’ अर्थात मंत्र के अर्थ की भावना को जप कहते हैं। और अर्थज्ञान के बिना लाखों बार मंत्र की आवृत्ति करने पर भी सिद्धि नहीं मिलती क्योंकि सिद्धि मंत्र की आवृत्ति मात्र से नहीं मिलती। वह तो जप से मिलती है और जप में अर्थज्ञान होना अनिवार्य होता है, 
मंत्रार्थ के भेद: मंत्र समस्त अर्थों का वाचक एवं बोधक होता है - ऐसा कोई अर्थ नहीं जो इसकी परिधि में न आता हो। मंत्राक्षरों के संकेतों की इसी विशेषता को ध्यान में रखकर महाभाष्यकार ने कहा है- ‘‘सर्वे सर्वार्थ वाचकाः’’ अर्थात मंत्र के सभी अक्षर समस्त अर्थों के वाचक होते हैं। 
किंतु जब एक समय में ये मंत्र किसी एक देवता से, उसके किसी संप्रदाय विशेष से और किसी अनुष्ठान/पुरश्चरण से जुड़ता है, तब वह कुछ निश्चित अर्थों का वाचक एवं बोधक बन जाता है। 
मंत्र शास्त्र के अनुसार इन अर्थों को छः वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। वस्तुतः ये वर्ग मंत्र के उन अर्थों को जानने की प्रक्रिया हैं। 
इस तरह मंत्रशास्त्र के मनीषियों ने मंत्र के छः प्रकार के अर्थ बतलाए हैं- 1. वाच्यार्थ, 2. भावार्थ, 3. लौकिकार्थ, 4. संप्रदायार्थ, 5. रहस्यार्थ एवं 6. तत्वार्थ। 
तंत्र आगम में इन अर्थों के भेदों, उपभेदों एवं अवांतर भेदों की संख्या अपरिमित है। 
इन छः भेदों में से वाच्यार्थ को छोड़कर अन्य पांच भेदों और उनके अवांतर भेदों का अर्थ गुरुकृपा एवं साधना से गम्य है। जैसे-जैसे साधक की साधना का स्तर उन्नत होता है और जैसे-जैसे उस पर इष्टदेव एवं गुरुदेव का वात्सल्य बढ़ता है, वैसे-वैसे साधक को मंत्र के अन्य अर्थों का बोध होने लगता है। मंत्रशास्त्र इसके वाच्यार्थ का प्रतिपादन करने में सक्षम है। किंतु इसके अन्यान्य अर्थों को गुरुकृपा और साधना द्वारा ही जाना जा सकता है। बीजमंत्रों के अर्थ: ‘मंत्र’ शब्द का धातुगत अर्थ है- गुप्त परिभाषण। जैसे बीजगणित में अ,ब,स,द आदि अक्षर विभिन्न संख्याओं के वाचक एवं बोधक होते हैं और उनका मान प्रक्रिया एवं प्रसंग के अनुसार गणित के द्वारा जाना जाता है, उसी प्रकार बीजमंत्रों के अक्षर भी गूढ़ संकेत होते हैं, जिनका अर्थ देवता, संप्रदाय एवं प्रयोग के आधार पर मंत्र शास्त्र से जाना जाता है। इस विषय में यह सदैव स्मरणीय है कि एक समय में बीजमंत्र का एक सुनिश्चित वाच्यार्थ होने पर भी वह मात्र उसी या उतने ही अर्थ का वाचक नहीं होता अपितु देवता, संप्रदाय एवं प्रयोग में परिवर्तन होते ही वह भिन्न अर्थ का वाचक बन जाता है। जैसे ‘योग’ शब्द योगशास्त्र में चित्तवृत्तियों के निरोध का, गीता में कर्मों में कुशलता का और गणित में दो राशियों को जोड़ने का वाचक बन जाता है, उसी प्रकार बीज (मंत्र) विभिन्न देवी-देवताओं के साथ विभिन्न संप्रदायों के अनुष्ठान एवं पुरश्चरण में प्रयुक्त होने पर विभिन्न अर्थों का वाचक या सूचक बन जाता है। फिर भी मंत्रों में प्रयुक्त सभी बीजों का एक वाच्यार्थ होता है। 
यह वह अर्थ है, जिसे बहुसम्मत अर्थ कहा जा सकता है। आगम ग्रंथों में मंत्रों में प्रयुक्त होने वाले बीजों के अर्थों का विस्तार से विचार किया गया है। 
यहां कुछ प्रसिद्ध बीजों के परंपरागत वाच्यार्थ हैं। 
1. ह्रीं (मायाबीज) इस मायाबीज में ह् = शिव, र् = प्रकृति, नाद = विश्वमाता एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस मायाबीज का अर्थ है ‘शिवयुक्त जननी आद्याशक्ति, मेरे दुखों को दूर करे।’
 2. श्रीं (श्रीबीज या लक्ष्मीबीज) इस लक्ष्मीबीज में श् = महालक्ष्मी, र् = धन संपत्ति, ई = महामाया, नाद = विश्वमाता एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस श्रीबीज का अर्थ है ‘धनसंपत्ति की अधिष्ठात्री जगज्जननी मां लक्ष्मी मेरे दुख दूर करें।’ 
3. ऐं (वागभवबीज या सारस्वत बीज) इस वाग्भवबीज में- ऐ = सरस्वती, नाद = जगन्माता और बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है- ‘जगन्माता सरस्वती मेरे दुख दूर करें।’ 
4. क्लीं (कामबीज या कृष्णबीज) इस कामबीज में क = योगस्त या श्रीकृष्ण, ल = दिव्यतेज, ई = योगीश्वरी या योगेश्वर एवं बिंदु = दुखहरण। इस प्रकार इस कामबीज का अर्थ है- ‘राजराजेश्वरी योगमाया मेरे दुख दूर करें।’ और इसी कृष्णबीज का अर्थ है योगेश्वर श्रीकृष्ण मेरे दुख दूर करें। 
5. क्रीं (कालीबीज या कर्पूरबीज) इस बीज में- क् = काली, र् = प्रकृति, ई = महामाया, नाद = विश्वमाता एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘जग. न्माता महाकाली मेरे दुख दूर करें।’ 
6. दूं (दुर्गाबीज) इस दुर्गाबीज में द् = दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, ¬ = सुरक्षा एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इसका अर्थ 1. है ‘दुर्गतिनाशिनी दुर्गा मेरी रक्षा करें और मेरे दुख दूर करें।’ 
7. स्त्रीं (वधूबीज या ताराबीज) इस वधूबीज में स् = दुर्गा, त् = तारा, र् = प्रकृति, ई = महामाया, नाद = विश्वमाता एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘जगन्माता महामाया तारा मेरे दुख दूर करें।’ 
8. हौं (प्रासादबीज या शिवबीज) इस प्रासादबीज में ह् = शिव, औ = सदाशिव एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘भगवान् शिव एवं सदाशिव मेरे दुखों को दूर करें।’ 
9. हूं (वर्मबीज या कूर्चबीज) इस बीज में ह् = शिव, ¬ = भ. ैरव, नाद = सर्वोत्कृष्ट एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘असुर भयंकर एवं सर्वश्रेष्ठ भगवान शिव मेरे दुख दूर करें।’ 
10. हं (हनुमद्बीज) इस बीज में ह् = अनुमान, अ् = संकटमोचन एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘संक. टमोचन हनुमान मेरे दुख दूर करें।’ 
11. गं (गणपति बीज) इस बीज में ग् = गणेश, अ् = विघ्ननाशक एवं बिंदु = दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘‘विघ्ननाशक श्रीगणेश मेरे दुख दूर करें।’’ 
12. क्ष्रौं (नृसिंहबीज) इस बीज में क्ष् = नृसिंह, र् = ब्रह्म, औ = दिव्यतेजस्वी, एवं बिंदु = दुखहरण है। 
इस प्रकार इस बीज का अर्थ है ‘दिव्यतेजस्वी ब्रह्मस्वरूप श्री नृसिंह मेरे दुख दूर करें।’ 
बीजार्थ मीमांसा: वस्तुतः बीजमंत्रों के अक्षर उनकी गूढ़ शक्तियों के संकेत होते हैं। इनमें से प्रत्येक की स्वतंत्र एवं दिव्य शक्ति होती है। और यह समग्र शक्ति मिलकर समवेत रूप में किसी एक देवता के स्वरूप का संकेत देती है। जैसे बरगद के बीज को बोने और सींचने के बाद वह वट वृक्ष के रूप में प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार बीजमंत्र भी जप एवं अनुष्ठान के बाद अपने देवता का साक्षात्कार करा देता है।
वेदमंत्र का संक्षिप्त रुप बीज मंत्र कहलाता है। वेद वृक्ष का सार संक्षेप में बीज है। मनुष्य का बीज वीर्य है। समूचा काम विस्तार बीज में सन्निहित रहता है। गायत्रीके तीन चरण हैं। इन तीनों का एक-एक बीज ‘भूः र्भुवः स्वः’ है। इस व्याहृति भाग का भी बीज है-ॐ। यह समग्र गायत्री मन्त्र की बात हुई। प्रत्येक अक्षर का भी एक-एक बीज है। उसमें उस अक्षर की सार-शक्ति विद्यमान है। तांत्रिक प्रयोजनों में बीज मंत्र का अत्यधिक महत्त्व है। इसलिए गायत्री-मृत्युञ्जय जैसे प्रख्यात मंत्रों की भी एक या कई बीजों समेत उपासना की जाती है। चौबीस अक्षरों के २४ बीज इस प्रकार हैं-
(१) ॐ (२) हीं (३) श्रीं (४) क्लीं (५) हों (६) जूं (७) यं (८) रं (९) लं (१०) वं (११) शं (१२) सं (१३) ऐं (१४) क्रो (१५) हुं (१६) हलीं (१७) पं (१८) फं (१९) टं (२०) ठं (२१) डं (२२) ड (२३) क्षं (२४) लूं।
यह बीज मन्त्र व्याह्यतियों के पश्चात् एवं मन्त्र-भाग से पूर्ण लगाये जाते हैं। ‘भूर्भुवः स्वः’ के पश्चात् ‘तत्सवितुः’ से पहले का स्थान ही बीज लगाने का स्थान है। ‘प्रचोदयात्’ के पश्चात् भी इन्हें लगाया जाता है। ऐसी दशा में उसे सम्पुट कहा जाता है। बीज या सम्पुट में से किसे कहाँ लगाना चाहिए इसका निर्णय किसी अनुभवी के परामर्श से करना चाहिए। बीज-विधान, तंत्र-विधान के अन्तर्गत आता है। इसलिए इनके प्रयोग में विशेष सतर्कता की आवश्यकता रहती है।
प्रत्येक बीज मन्त्र का एक यंत्र भी है। इसे अक्षर-यन्त्र या बीज यन्त्र कहते हैं। तांत्रिक उपासनाओं में पूजा प्रतीक में चित्र-प्रतीक की भाँति किसी धातु पर खोदे हुए यंत्र की भी प्रतिष्ठापना की जाती है और प्रतिमा-पूजन की तरह यंत्र का भी पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन किया जाता है। दक्षिण मार्गी साधनाओं में प्रतिमा-पूजन का जो स्थान है वही वाममार्गी उपासना उपचार में यंत्र-स्थापना का है, गायत्री यंत्र विख्यात है। बीजाक्षरों से युक्त २४ यंत्र उसके अतिरिक्त हैं। इन्हें २४ अक्षरों में सन्निहित २४ शक्तियों की प्रतीक-प्रतिमा कहा जा सकता है।

" बीज मंत्र रहस्य " ( भाग -३ ) 
वेदमंत्र का संक्षिप्त रूप बीजमंत्र कहलाता है ।। वेद वृक्ष का सार संक्षेप बीज है ।। मनुष्य का बीज वीर्य है ।। समूचा काम विस्तार बीज में सन्निहित रहता है ।। गायत्री के तीन चरण हैं ।। इन तीनों का एक- एक बीज (भूः, भुवः, स्वः) है ।। इस व्याहृति भाग का भी बीज है- ॐ ।। यह समग्र गायत्री मंत्र की बात हुई ।। प्रत्येक अक्षर का भी एक- एक बीज है ।। उसमें उस अक्षर की सार शक्ति विद्यमान है ।। तांत्रिक प्रयोजनों में बीजमंत्र का अत्यधिक महत्त्व है ।। इसलिए गायत्री एवं महामृत्युञ्जय जैसे प्रख्यात मंत्रों की भी एक या कई बीजों समेत उपासना की जाती है ।। चौबीस अक्षरों के २४ बीज इस प्रकार हैं-

(१) ॐ (२) ह्रीं (३) श्रीं (४) क्लीं (५) हों (६) जूं (७) यं (८) रं (९) लं (१०) वं (११) शं (१२) सं (१३) ऐं (१४) क्रों (१५) हुं (१६) ह्लीं(१७) पं (१८) फं (१९) टं (२०) ठं (२१) डं (२२) ढं (२३) क्षं (२४) लृं ।।

यह बीज मंत्र व्याहृतियों के पश्चात् एवं मंत्र भाग से पूर्व लगाये जाते हैं ।। भूर्भुवः स्वः के पश्चात् 'तत्सवितुः' से पहले का स्थान ही बीज लगाने का स्थान है ।। प्रचोदयात् के पश्चात् भी इन्हें लगाया जाता है ।। ऐसी दशा में उसे सम्पुट कहा जाता है ।। बीज या सम्पुट में से किसे कहाँ लगाना चाहिए, इसका निर्णय किसी अनुभवी के परामर्श से करना चाहिए ।। बीज- विधान, तंत्र- विधान के अन्तर्गत आता है ।। इसलिए इनके प्रयोग में विशेष सतर्कता की आवश्यकता रहती है ।।

२४ बीज मंत्रों से सम्बन्धित २४ यंत्र
प्रत्येक बीज मंत्र का एक यंत्र भी है ।। इन्हें अक्षर यंत्र या बीज यंत्र कहते हैं ।। तांत्रिक उपासनाओं में पूजा प्रतीक में चित्र- प्रतीक की भाँति किसी धातु पर खोदे हुए यंत्र की भी प्रतिष्ठापना की जाती है और प्रतिमा पूजन की तरह यंत्र का भी पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन किया जाता है ।। दक्षिणमार्गी साधनों में प्रतिमा पूजन का जो स्थान है, वही वाममार्गी उपासना उपचार में यंत्र- स्थापना का है ।। गायत्री यंत्र विख्यात है ।। बीजाक्षरों से युक्त २४ यंत्र उसके अतिरिक्त हैं ।। इन्हें २४ अक्षरों में सन्निहित २४ शक्तियों की प्रतीक- प्रतिमा कहा जा सकता है ।।
ॐ कार मंत्र जैसे दूसरे २० मंत्र और हैं | उनको बोलते हैं बीज मंत्र | उसका अर्थ खोजो तो समझ में नही आएगा लेकिन अंदर की शक्तियों को विकसित कर देते हैं | सब बिज मंत्रो का अपना-अपना प्रभाव होता है | जैसे ॐ कार बीज मंत्र है ऐसे २० दूसरे भी हैं | 
ॐ बं ये शिवजी की पूजा में बीज मंत्र लगता है | ये बं बं.... अर्थ को जो तुम बं बं.....जो शिवजी की पूजा में करते हैं | लेकिन बं.... उच्चारण करने से वायु प्रकोप दूर हो जाता है | गठिया ठीक हो जाता है | शिव रात्रि के दिन सवा लाख जप करो बं..... शब्द, गैस ट्रबल कैसी भी हो भाग जाती है | बीज मंत्र है |
ऐसे ही साधको को  एक बिज मंत्र देते हैं| 
खं.... हार्ट-टैक कभी नही होता है | हाई बी.पी., लो बी.पी. कभी नही होता | ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है | १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है | खं शब्द |
ऐसे ही ब्रह्म परमात्मा का कं शब्द है | ब्रह्म वाचक | तो ब्रह्म परमात्मा के ३ विशेष मंत्र हैं | ॐ, खं और कं |
ऐसे ही रामजी के आगे भी एक बीज मंत्र लग जाता है | रीं रामाय नम: || 
कृष्ण जी के मंत्र के आगे बीज मंत्र लग जाता है | क्लीं कृष्णाय नम: ||
तो जैसे एक-एक के आगे, एक-एक के साथ मिंडी लगा दो तो १० गुना हो गया | ऐसे ही आरोग्य में भी ॐ  हुं विष्णवे नम: | तो हुं बिज मंत्र है | ॐ बिज मंत्र है | विष्णवे..., तो विष्णु भगवान का सुमिरन | ये आरोग्य के मंत्र हैं | तो बिज मंत्र जिसमें जितने |
एक मैं मंत्र देता हूँ, जो एकदम सीरियस है, केस ठीक नही है, डॉक्टरों को समझ में नही आ रहा, तबियत ठीक नही है, फलाना है, धिन्गना है, एकदम विशेष जो रोगग्रस्त अथवा समस्या से, तकलीफ से ग्रस्त है | उनको मैं मंत्र देता हूँ | उसको मैंने ऐसे ही विनोद में नाम रख दिया यमराज का मोबाईल नम्बर है, तो उसमें ४ बिज मंत्र हैं | 
तो बीज मंत्रो की साधना अथवा बीज मंत्रो का प्रभाव उसी सच्चिदानंद परमात्मा से आता है | 
ये जो देवता लोग आशीर्वाद देते हैं अथवा जिनका आशीर्वाद पड़ता है, उनके जीवन में बीज मंत्रो का भी प्रभाव पड़ता है |
क्रीं, श्रीं, ह्रौं, दूँ, ह्रीं, ऐं, गं, हूँ,ग्लौं, स्त्रीं, क्षौं, वं, –इसी प्रकार कई “बीज” हैं, जो कि अपने-आप में ही मन्त्र स्वरुप हैं! 
शं, फ्रौं, क्रौं, दं, हं, वं, रं, लं, ज्ञं, भ्रं!
क्रीं —इसके चार-स्वर-व्यंजन हैं—
क=काली
र=ब्रह्म
ईकार=महामाया
अनुस्ववार=दुखहरण !
इस प्रकार “क्रीं ” बीज का अर्थ हुआ—ब्रह्न-शक्ति संपन्न महामाया काली मेरे दुखों का हरण करे!
श्रीं—
श=महालक्ष्मी
र= धन-ऐश्वर्य
ई=तुष्टि
अनुस्वार=दुखहरण!
नाद का तात्पर्य विश्वमाता है! इस प्रकार “श्रीं” बीज का अर्थ हुआ! धन-ऐश्वर्य संपत्ति, तुष्टि-पुष्टि की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी मेरे दुखों का हरण करे!
ह्रौं—–
यह प्रसाद बीज है—
ह्र=शिव
औ=सदाशिव
अनुस्वार=दुःख हरण
ह्रौं बीज का अर्थ—शिव तथा सदाशिव कृपा कर मेरे दुखों का हरण करें!
दूँ——
डी=दुर्गा
ऊ= रखा
अनुस्वार=करना
मां दुएगे! मेरी रक्षा करो! यह दुर्गा बीज है!
ह्रीं– ह=शिव
र=प्रकृति
ई=महामाया
नाद= विश्वमाता, बिंदु= दुःख हर्ता! शिव युक्त विश्वमाता मेरे दुखों का हरण करे!
ऐं——
ऐ=सरस्वती
अनुस्वार=दुःख हरण
हे माँ सरस्वती ! मेरे दुखों का, अविद्या का नाश कर! सरस्वती जी का बीज मन्त्र है!
क्लीं —
क=कृष्ण
ल=इंद्र
ई=तुष्टिभाव
अनुस्वार=सुखदाता
कामदेव रूप श्रीकृष्ण मुझे सुख-सौभाग्य दें!
गं—–
गणपति बीज—
ग=गणेश
अनुस्वार= दुःख हर्ता
श्री गणेश मेरे विध्नों को, दुखों को दूर करें!
हूँ—-
ह=शिव
ऊ=भैरव
अनुस्वार=दुःख हर्ता
यह कूर्च बीज है!
इसका तात्पर्य यह है असुर-संहारक शिव मेरे दुखों का नाश करें!
ग्लौं—–
ग=गणेश
ल=व्यापक
औ =तेज
बिंदु=दुःख हरण
व्यापक रूप विध्नहर्ता अपने तेज से मेरे दुखों का नाश करें!
स्त्रीं—
स=दुर्गा
टी=तारण
र=मुक्ति
ई=महामाया
बिंदु=दुःख हर्ता
हे दुर्गा मुख्तिदाता, दुःख हर्ता, भवसागर-तारिणी महामाया मेरे दुखों का नाश करे!
क्षौं —
क्ष= नृसिंह
र=ब्रह्म
औ=ऊर्ध्वकेशी
बिंदु=दुःख हरण
नृसिंह बीज है! ऊर्ध्व केशी ब्रह्म स्वरुप नृसिंह भगवान मेरे दुखों को दूर करे!
वं—-
व्=अमृत
बिंदु=दुःख हरता
हे अमृत स्वरुप मेरे दुखों को दूर कर!
शं—शंकर बीज
फ्रौं –हनुमान बीज
क्रौं –काली बीज
दं–विष्णु बीज
हं–आकाश बीज
यं –अग्नि बीज
रं–जल बीज
लं–पृथ्वी बीज
ज्ञं –ज्ञान बीज और
भ्रं—भैरव बीज है!
" बीज मंत्र रहस्य " ( भाग -४ )
ऊर्जा अविनाशिता के नियमानुसार ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन्‌ एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। अतः जब हम मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उससे उत्पन्न ध्वनि एक ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रेषित होकर जब उसी प्रकार की ऊर्जा से संयोग करती है तब हमें उस ऊर्जा में छुपी शक्ति का आभास होने लगता है। ज्योतिषीय संदर्भ में यह निर्विवाद सत्य है कि इस धरा पर रहने वाले सभी प्राणियों पर ग्रहों का अवश्य प्रभाव पड़ता है..चंद्रमा मन का कारक ग्रह है, और यह पृथ्वी के सबसे नजदीक होने के कारण खगोल में अपनी स्थिति के अनुसार मानव मन को अत्यधिक प्रभावित करता है। अतः इसके अनुसार जो मन का त्राण (दुःख) हरे उसे मंत्र कहते हैं.. मंत्रों में प्रयुक्त स्वर, व्यंजन, नाद व बिंदु देवताओं या शक्ति के विभिन्न रूप एवं गुणों को प्रदर्शित करते हैं.. मंत्राक्षरों, नाद, बिंदुओं में दैवीय शक्ति छुपी रहती है..
मंत्र उच्चारण से ध्वनि उत्पन्न होती है, उत्पन्न ध्वनि का मंत्र के साथ विशेष प्रभाव होता है.. जिस प्रकार किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु के ज्ञानर्थ कुछ संकेत प्रयुक्त किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार मंत्रों से संबंधित देवी-देवताओं को संकेत द्वारा संबंधित किया जाता है, इसे बीज कहते हैं.. 

विभिन्न बीज मंत्र इस प्रकार हैं :
ॐ- परमपिता परमेश्वर की शक्ति का प्रतीक है.
ह्रीं- माया बीज,
श्रीं- लक्ष्मी बीज,
क्रीं- काली बीज,
ऐं- सरस्वती बीज,
क्लीं- कृष्ण बीज...

बीजमंत्र लाभ
कं- मृत्यु के भय का नाश, त्वचारोग व रक्त- विकृति में..
ह्रीं- मधुमेह हृदय की धड़कन में....
घं- स्वप्नदोष व प्रदररोग में ....
भं- बुखार दूर करने के लिए...
क्लीं - पागलपन में ...
सं- बवासीर मिटाने के लिए.....
वं- भूख प्यास रोकने के लिए...
लं- थकान दूर करने के लिए ...
बं - वायु रोग और जोदो के दर्द के लिये ....

बीज मंत्रों के अक्षर गूढ़ संकेत होते हैं.. इनका व्यापक अर्थ होता है... बीज मंत्रों के उच्चारण से मंत्रों की शक्ति बढ़ती है.. क्योंकि, यह विभिन्न देवी-देवताओं के सूचक है....
ह्रीं इस मायाबीज में ह्= शिव, र= प्रकृति, नाद= विश्वमाता एवं बिंदु= 
दुखहरण है... इस प्रकार मायाबीज का अर्थ है- "शिवयुक्त जननी आद्य शक्ति मेरे दुखों को दूर करें..श्री [श्री बीज या लक्ष्मी बीज]: इस लक्ष्मी बीज में श्= महालक्ष्मी, र= धन संपत्ति, ई= महामाया, नाद= विश्वमाता एवं बिन्दु= दुखहरण है.. इस प्रकार इस का अर्थ है धन संपत्ति की अधिष्ठात्री जगजननी मां लक्ष्मी मेरे दुख दूर करें।....ऎं [वाग्भव बीज या सारस्वत बीज]: इस वाग्भव बीज में ऎ= सरस्वती, नाद= जगन्माता और बिंदु= दुखहरण है... इस प्रकार इस बीज का अर्थ है- जगन्माता सरस्वती मेरे ऊपर कृपा करें....
क्लीं [कामबीज या कृष्णबीज]: इस कामबीज में क= योगस्त या 
श्रीकृष्ण, ल= दिव्यतेज, ई= योगीश्वरी या योगेश्वर एवं बिंदु= दुखहरण... इस प्रकार इस कामबीज का अर्थ है- राजराजेश्वरी योगमाया मेरे दुख दूर करें... कृष्णबीज का अर्थ है योगेश्वर श्रीकृष्ण मेरे दुख दूर करें...
क्रीं [कालीबीज या कर्पूरबीज]: इस बीज मंत्र में क= काली, र= प्रकृति, 
ई= महामाया, नाद= विश्वमाता, बिंदु= दुखहरण है.. इस प्रकार इस बीजमंत्र का अर्थ है, जगन्माता महाकाली मेरे दुख दूर करें...
गं [गणपति बीज]: इस बीज में ग्= गणेश, अ= विƒननाशक एवं बिंदु= दुखहरण है। इस प्रकार इस बीज का अर्थ विƒननाशक श्रीगणेश मेरे दुख दूर करें। दूं [दुर्गाबीज]: इस दुर्गाबीज में द्= दुर्गतिनाशनी दुर्गा, = सुरक्षा एवं बिंदु= दुखहरण है... इस प्रकार इसका अर्थ है दुर्गतिनाशनी दुर्गा मेरी रक्षा करे और मेरे दुख दूर करे...
हौं [प्रसादबीज या शिवबीज]: इस प्रसाद बीज में ह्= शिव, औ= सदाशिव एवं बिंदु= दुखहरण है... इस प्रकार इस बीज का अर्थ है, 
भगवान शिव एवं सदाशिव मेरे दुखों को दूर करें..
इस प्रकार बीज मंत्रों की शक्ति इतनी असीम होती है, कि देवताओं को भी अपने वशीभूत कर लेती है, तथा जप अनुष्ठान द्वारा देवता का साक्षात्कार करा देती है...बीज मंत्रों के अक्षर उनकी गूढ़ शक्तियों के संकेत होते हैं... इनमें से प्रत्येक की स्वतंत्र एवं दिव्य शक्ति मिलकर देवता के विराट् स्वरूप का संकेत देती है...
मंत्रों का प्रयोग मानव ने अपने कल्याण के साथ-साथ दैनिक जीवन की संपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु यथासमय किया है, और उसमें सफलता भी पाई है, परंतु आज के भौतिकवादी युग में यह विधा मात्र कुछ ही व्यक्तियों के प्रयोग की वस्तु बनकर रह गई है...मंत्रों में छुपी अलौकिक शक्ति का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है.... सबसे पहले प्रश्न यह उठता है, कि 'मंत्र' क्या है, इसे कैसे परिभाषित किया जा सकता है.. इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि मंत्र का वास्तविक अर्थ असीमित है... किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रयुक्त शब्द समूह मंत्र कहलाता है... जो शब्द जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है, उसे उस देवता या शक्ति का मंत्र कहते हैं... मंत्र एक ऐसी गुप्त ऊर्जा है, जिसे हम जागृत कर इस अखिल ब्रह्मांड में पहले से ही उपस्थित इसी प्रकार की ऊर्जा से एकात्म कर उस ऊर्जा के लिए देवता (शक्ति) से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं...
मंत्रों में देवी-देवताओं के नाम भी संकेत मात्र से दर्शाए जाते हैं, जैसे राम के लिए 'रां', हनुमानजी के लिए 'हं', गणेशजी के लिए 'गं', दुर्गाजी के लिए 'दुं' का प्रयोग किया जाता है... इन बीजाक्षरों में जो अनुस्वार या अनुनासिक (जं) संकेत लगाए जाते हैं, उन्हें 'नाद' कहते हैं.. नाद द्वारा देवी-देवताओं की अप्रकट शक्ति को प्रकट किया जाता है...

लिंगों के अनुसार मंत्रों के तीन भेद होते हैं-
पुर्लिंग : जिन मंत्रों के अंत में हूं या फट लगा होता है..
स्त्रीलिंग : जिन मंत्रों के अंत में 'स्वाहा' का प्रयोग होता है...
नपुंसक लिंग : जिन मंत्रों के अंत में 'नमः' प्रयुक्त होता है..

अतः आवश्यकतानुसार मंत्रों को चुनकर उनमें स्थित अक्षुण्ण ऊर्जा की तीव्र विस्फोटक एवं प्रभावकारी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है... 
मंत्र, साधक व ईश्वर को मिलाने में मध्यस्थ का कार्य करता है... मंत्र की 
साधना करने से पूर्व मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा, भाव, विश्वास होना आवश्यक है, 
तथा मंत्र का सही उच्चारण अति आवश्यक है... मंत्र लय, नादयोग के 
अंतर्गत आता है... मंत्रों के प्रयोग से आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैनिक, 
भौतिक तापों से उत्पन्न व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है.. रोग 
निवारण में मंत्र का प्रयोग रामबाण औषधि का कार्य करता है.. मानव 
शरीर में 108 जैविकीय केंद्र (साइकिक सेंटर) होते हैं जिसके कारण 
मस्तिष्क से 108 तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) उत्सर्जित करता है...
शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने मंत्रों की साधना के लिए 108 मनकों की माला तथा मंत्रों के जाप की आकृति निश्चित की है.. मंत्रों के बीज मंत्र उच्चारण की 125 विधियाँ हैं.. मंत्रोच्चारण से या जाप करने से शरीर के 6 प्रमुख जैविकीय ऊर्जा केंद्रों से 6250 की संख्या में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जो इस प्रकार हैं :

मूलाधार 4x125=500

स्वधिष्ठान 6x125=750

मनिपुरं 10x125=1250

हृदयचक्र 13x125=1500

विध्रहिचक्र 16x125=2000

आज्ञाचक्र 2x125=250

कुल योग 6250 (विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों की संख्या)...

भारतीय कुंडलिनी विज्ञान के अनुसार मानव के स्थूल शरीर के साथ-साथ 6 अन्य सूक्ष्म शरीर भी होते हैं... विशेष पद्धति से सूक्ष्म शरीर के फोटोग्राफ लेने से वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली बीमारियों या रोग के बारे में पता लगाया जा सकता है.. सूक्ष्म शरीर के ज्ञान के बारे में जानकारी न होने पर मंत्र शास्त्र को जानना अत्यंत कठिन होगा...मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियों पर प्रयोगों द्वारा ध्वनि परिवर्तन (मंत्रों) से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के उत्पन्न होने को प्रमाणित कर लिया गया है.. मानव शरीर से 64 तरह की सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जिन्हें 'धी' ऊर्जा कहते हैं.. जब धी का क्षरण होता है तो शरीर में व्याधि एकत्र हो जाती है..मंत्रों का प्रभाव वनस्पतियों पर भी पड़ता है... जैसा कि बताया गया है कि चारों वेदों में कुल मिलाकर 20 हजार 389 मंत्र हैं, प्रत्येक वेद का अधिष्ठाता देवता है.. ऋग्वेद का अधिष्ठाता ग्रह गुरु है। यजुर्वेद का देवता ग्रह शुक्र, सामवेद का मंगल तथा अथर्ववेद का अधिपति ग्रह बुध है... मंत्रों का प्रयोग ज्योतिषीय संदर्भ में अशुभ ग्रहों द्वारा उत्पन्न अशुभ फलों के निवारणार्थ किया जाता है...ज्योतिष वेदों का अंग माना गया है। इसे वेदों का नेत्र कहा गया है.. भूत ग्रहों से उत्पन्न अशुभ फलों के शमनार्थ वेदमंत्रों, स्तोत्रों का प्रयोग अत्यन्त प्रभावशाली माना गया है..उदाहरणार्थ आदित्य हृदयस्तोत्र सूर्य के लिए, दुर्गास्तोत्र चंद्रमा के लिए, रामायण पाठ गुरु के लिए, ग्राम देवता स्तोत्र राहु के लिए, विष्णु सहस्रनाम, गायत्री मंत्रजाप, महामृत्युंजय जाप, क्रमशः बुध, शनि एवं केतु के लिए, लक्ष्मीस्तोत्र शुक्र के लिए और मंगलस्रोत मंगल के लिए... मंत्रों का चयन प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से किया गया है.. वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है, कि ध्वनि उत्पन्न करने में नाड़ी संस्थान की 72 नसें आवश्यक रूप से क्रियाशील रहती हैं... अतः मंत्रों के उच्चारण से सभी नाड़ी संस्थान क्रियाशील रहते हैं...मंत्र विज्ञान मंत्र एक गूढ़ ज्ञान है.. सद्गुरु की कृपा एवं मन को एकाग्र कर जब इसको जान लिया जाता है, तब यह साधक की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है.. मंत्रागम के अनुसार दैवी शक्तियों का गूढ़ रहस्य मंत्र में अंतर्निहित है... व्यक्ति की प्रसुप्त या विलुप्त शक्ति को जगाकर उसका दैवीशक्ति से सामंजस्य कराने वाला गूढ़ ज्ञान मंत्र कहलाता है... यह ऐसी गूढ़ विद्या है, जो साधकों को दु:खों से मुक्त कर न केवल उनकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है, बल्कि उनको परम आनंद तक ले जाती है.. मंत्र विद्या विश्व के सभी देशों, मानवजाति, धर्मों एवं संप्रदायों में हजारों-लाखों वर्षो से आस्था एवं विश्वास के साथ प्रचलित है..

मंत्रों के प्रकार-
मंत्र दो प्रकार के होते हैं- वैदिक मंत्र एवं तांत्रिक मंत्र.... वैदिक संहिताओं की समस्त ऋचाएं वैदिक मंत्र कहलाती हैं, और तंत्रागमों में प्रतिपादित मंत्र तांत्रिक मंत्र कहलाते हैं.. तांत्रिक मंत्र तीन प्रकार के होते हैं— बीज मंत्र, नाम मंत्र एवं माला मंत्र.. बीज मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं — मौलिक बीज, यौगिक बीज तथा कूट बीज.. इसी तरह माला मंत्र दो प्रकार के होते हैं— लघु माला मंत्र एवं बृहद माला मंत्र..बीज मंत्र दैवी या आध्यात्मिक शक्ति को अभिव्यक्ति देने वाला संकेताक्षर बीज कहलाता है.. इसकी शक्ति एवं रूप अनंत हैं.. बीज मंत्र विभिन्न देवताओं, धर्मो एवं उनके संप्रदायों की साधनाओं के माध्यम से साधक को भिन्न-भिन्न प्रकार के रहस्यों से परिचित करवाता है। शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, जैन एवं बौद्ध धर्मो के सभी संप्रदायों में ‘ह्रीं’, ‘कलीं’ एवं ‘श्रीं’ आदि बीजों का मंत्रसाधना में समान रूप से प्रयुक्त होना इसका साक्ष्य है। बीज मंत्र समस्त अर्थो का वाचक एवं बोधक होने के बावजूद अपने आपमें गूढ़ है। 
अपने आराध्य देव का समस्त स्वरूप इसके बीज मंत्र में निहित होता है। 
ये बीज मंत्र तीन प्रकार के होते हैं— मौलिक, यौगिक व कूट। इनको कुछ आचार्य एकाक्षर, बीजाक्षर एवं घनाक्षर भी कहते हैं.. जब बीज अपने मूल रूप में रहता है, तब मौलिक बीज कहलाता है, जैसे- ऐं, यं, रं, लं, वं, क्षं आदि.. जब यह बीज दो वर्षो के योग से बनता है, तब यौगिक कहलाता है, 
जैसे- ह्रीं, क्लीं, श्रीं, स्त्रीं, क्ष्रौं आदि...इसी तरह जब बीज तीन या उससे अधिक वर्षो से बनता है, 
तब यह कूट बीज कहलाता है... बीज मंत्रों में समग्र शक्ति विद्यमान होते हुए भी गुप्त रहती है..नाम मंत्र -बीज रहित मंत्रों को नाम मंत्र कहते हैं, जैसे- 
‘ॐ नम: शिवाय’, ‘ॐ नमो नारायणाय’ एवं ‘..ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ आदि.. इन मंत्रों के शब्द उनके देवता, उनके रूप एवं उनकी शक्ति को अभिव्यक्ति देने में समर्थ होते हैं... इसलिए इन मंत्रों को भक्तिभाव से कभी भी सुमिरन किया जा सकता है..माला मंत्र कुछ आचार्यो के अनुसार 20 अक्षरों से अधिक और अन्य आचार्यो के अनुसार 32 अक्षरों से अधिक अक्षर वाला मंत्र माला मंत्र कहलाता है, जैसे- ‘ऊँ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते, देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:..

माला मंत्रों के वर्णो की पूर्व मर्यादा 20 या 32 अक्षर हैं, लेकिन इनकी उत्तर मर्यादा का मंत्रशास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता.. इसलिए माला मंत्र कभी-कभी छोटे और कभी-कभी अपेक्षाकृत अधिक लंबे होते हैं......आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने चाहे जितनी प्रगति कर ली हो,........ पर बीमारियों पर नियंत्रण का उसका सपना आज तक अधूरा है.. आंकड़े तो यहां तक बयान करते हैं, कि दवाओं के अनुपात में -रोगों की वृद्धि अधिक तेजी से हो रही है......... किन्तु ऐसी विकट स्थिति में भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है.. प्राचीन समय में भारत में यंत्र-तंत्र और मंत्र के रूप में एक ऐसे विज्ञान का प्रचलन रहा है, जो बहुत ही शक्तिशाली और चमत्कारी है.. आज जिन बीमारियों को लाइलाज माना जा रहा है, उनका मंत्रों के द्वारा स्थाई निवारण संभव है |
कहा जाता है कि यह मंत्र भगवान शिव को प्रसन्न कर उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का माध्यम है… इस मंत्र का सवा लाख बार निरंतर जप करने से आने वाली अथवा मौजूदा बीमारियां तथा अनिष्टकारी ग्रहों का दुष्प्रभाव तो समाप्त होता ही है, इस मंत्र के माध्यम से अटल मृत्यु तक को टाला जा सकता है…
हमारे चार वेदों में से एक ऋग्वेद में महामृत्युंजय मंत्र इस प्रकार दिया गया है…
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।
इस मंत्र को संपुटयुक बनाने के लिए के लिए इसका उच्चारण इस प्रकार किया जाता है…
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
इस मंत्र का अर्थ है : हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं… उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए… जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं…
यही नियम ओर तथ्य ग्रह आराधन me भी लागू होती है मंत्र से बीज जोड़ा जाने पर इसका प्रभाव अनेकों गुना बढ़ जाता है |

नवग्रहों के मूल मंत्र -
सूर्य : ॐ सूर्याय नम:
चन्द्र : ॐ चन्द्राय नम:
गुरू : ॐ गुरवे नम:
शुक्र : ॐ शुक्राय नम:
मंगल : ॐ भौमाय नम:
बुध : ॐ बुधाय नम:
शनि : ॐ शनये नम: अथवा ॐ शनिचराय नम:
राहु : ॐ राहवे नम:
केतु : ॐ केतवे नम:

नवग्रहों के बीज मंत्र -
सूर्य : ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
चन्द्र : ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्राय नम:
गुरू : ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:
शुक्र : ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:
मंगल : ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
बुध : ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:
शनि : ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:
राहु : ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:
केतु : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:
साथ ही समझे तो सर्व प्रचलित शिव का पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमःशिवाय अथवा दुर्गा का नवारण मंत्र अपने मे अनेकों अद्भुत रहस्य समाये हुये हे |
बीज मन्त्रों के रहस्य
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शास्त्रों में अनेकों बीज मन्त्र कहे हैं, आइये बीज मन्त्रों का रहस्य जाने

१👉 "क्रीं" इसमें चार वर्ण हैं! [क,र,ई,अनुसार] क--काली, र--ब्रह्मा, ईकार--दुःखहरण।
अर्थ👉 ब्रह्म-शक्ति-संपन्न महामाया काली मेरे दुखों का हरण करे।

२👉 "श्रीं" चार स्वर व्यंजन [श, र, ई, अनुसार]=श-महालक्ष्मी, र-धन-ऐश्वर्य, ई तुष्टि, अनुस्वार-- दुःखहरण।
अर्थ👉 धन- ऐश्वर्य सम्पति, तुष्टि-पुष्टि की अधिष्ठात्री देवी लाष्मी  मेरे दुखों का नाश कर।

३👉 "ह्रौं" [ह्र, औ, अनुसार]  ह्र-शिव, औ-सदाशिव, अनुस्वार--दुःख हरण।
अर्थ👉 शिव तथा सदाशिव कृपा कर मेरे दुखों का हरण करें।

४👉 "दूँ" [ द, ऊ, अनुस्वार]-द दुर्गा, ऊ--रक्षा, अनुस्वार करना।
अर्थ👉 माँ दुर्गे मेरी रक्षा करो, यह दुर्गा बीज है।

५👉 "ह्रीं" यह शक्ति बीज अथवा माया बीज है।
[ह,र,ई,नाद, बिंदु,] ह-शिव, र-प्रकृति,ई-महामाया, नाद-विश्वमाता, बिंदु-दुःख हर्ता।
अर्थ👉 शिवयुक्त विश्वमाता मेरे दुखों का हरण करे।

६👉 "ऐं" [ऐ, अनुस्वार]-- ऐ- सरस्वती, अनुस्वार-दुःखहरण।
अर्थ👉 हे सरस्वती मेरे दुखों का अर्थात अविद्या का नाश कर।

७👉 "क्लीं" इसे काम बीज कहते हैं![क, ल,ई अनुस्वार]-क-कृष्ण अथवा काम,ल-इंद्र,ई-तुष्टि भाव, अनुस्वार-सुख दाता।

अर्थ👉 कामदेव रूप श्री कृष्ण मुझे सुख-सौभाग्य दें।

८👉 "गं" यह गणपति बीज है। [ग, अनुस्वार
.. शिवषडक्षर स्तोत्रम् ..
ॐकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः |
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः || १||

नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणाः |
नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नमः || २||

महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणम् |
महापापहरं देवं मकाराय नमो नमः || ३||

शिवं शांतं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् |
शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नमः || ४||

वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कंठभूषणम् |
वामे शक्तिधरं वेदं वकाराय नमो नमः || ५||

यत्र तत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः |
यो गुरुः सर्वदेवानां यकाराय नमो नमः || ६||

षडक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसंनिधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते || ७||
|| इति श्री रुद्रयामले उमामहेश्वरसंवादे  षडक्षरस्तोत्रं संपूर्णम् ||
 स्तोत्र के प्रत्येक पद का प्रथम अक्षर देखे तो ये उनही बीज का व्याप किया गया है | ये अनुपम चेतना सभर है |
यहा दुर्गा का प्रसिद्ध नवाक्षरी नवारण मंत्र समझे तो .... 
.. नवाक्षरीस्तोत्रम् ..
श्रीगुरुचरणसरोजं श्रीकरभवतरणसुकरदृढनावम् .
मच्चितमधुपझंकृतमानन्दं नौमि शांकरं शरण्यम् .. १..
ऐन्द्रधनुर्मरतकमामैरावतनाथगीर्भिरभ्यर्च्याम् .
ऐंकारार्थस्वरूपामैशानीनाथसेवितां वन्दे .. २..
ह्रीनतदैत्यसमूहां हृद्यां सुरलोकसेविताङ्घ्रियुगाम् .
ह्रींकारान्त्यसरूपां हृदयविलासप्रचोदितां वन्दे .. ३..
क्लींकारकामजननीं क्लीमितिशब्दप्रपूरितदिगन्ताम् .
क्लीबस्त्रीपुंशब्दक्रीडारूपां नमामि विश्वमयीम् .. ४..
चामरबिभ्रद्वाणीचन्द्रसजातासुसेव्यपार्श्वयुगाम् .
चरणतलमहिषमुण्डां चापादिकरां नमामि चामुण्डाम् .. ५..
मुण्डमणिहारकण्ठीं मुकुरकपोलप्रभासुशोभमुखीम् .
मुहुरास्फालितधनुषं मुरहरभागिनीं नमामि मुग्धतनुम् .. ६..
डाकिन्याद्यभितुष्टां डमरुकनादेन पूरितदिगन्ताम् .
डम्भाभिमानहन्त्रीं डामरतन्त्रप्रकाशितां वन्दे .. ७..
यैवर्णसत्यमायायस्यै दत्तान्यायुधानि शक्राद्यैः .
यौवनमदसाम्राज्यायै तस्यै नमोऽस्तु विद्यायै .. ८..
विश्वोत्तीर्णां विद्यां विविधजगच्चित्रकल्पनारूपाम् .
वियदादिसृष्टिहेतुं विश्वासैकप्रकाशितां नौमि .. ९..
चेतसि नितरां वासितचेतोमयि चैत्यचेतने चतुरे .
चम्पककलिकानासे चामीकरभासुराङ्गि नौमि त्वाम् .. १०..
अक्षरनवाक्षरीयं निक्षेपमयी सुवाक्सुधारूपा .
एतत् स्तोत्रम् पठतां यच्छति सौभाग्यकीर्तिपुष्टिधृतीः .. ११..

|| इत्यानन्दनाथपादपद्मोपजीविना काश्यपगोत्रोत्पन्नेनान्ध्रेण
त्यागराजनाम्ना विरचितं नवाक्षरीस्तोत्रं संपूर्णम् ||

प्रत्येक पद का प्रथम अक्षर ही उस बीज का व्याप कर पूरे पद मे सामझाने का प्रयास किया गया है |

यहा आलेख का व्याप हो रहा है .... 
आराधको के लिए इतनी जानकारी पर्याप्त होगी |
बिन किसी बीज के मंत्र प्राणवान ओर प्रभावी नहीं बनता बस गुरु मुख से उचित कामना संगत योग्य बीज मंत्र का आरधान करना ही कल्याण का प्रसार माना गया है |
सादर .... ॐ नमो नारायण .... हर हर महादेव

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