दक्षिणामूर्ति शिव गुरु स्वरुप
भारतीय परंपरा गुरु या आध्यात्मिक शिक्षक को विशेष सम्मान देती है। दक्षिणामूर्ति को परम गुरु, ज्ञान का अवतार और अज्ञान का नाश करने वाला माना जाता है (जैसा कि देवता के पैरों के नीचे राक्षस को कुचले जाने से दर्शाया गया है)। ज्ञान मुद्रा की व्याख्या इस प्रकार की जाती है: - अंगूठा भगवान को दर्शाता है और तर्जनी मनुष्य को दर्शाती है। अन्य तीन उंगलियां मनुष्य की तीन जन्मजात अशुद्धियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अहंकार, माया और पिछले जन्म के बुरे कर्म। जब मनुष्य इन अशुद्धियों से स्वयं को अलग कर लेता है तो वह ईश्वर तक पहुंच जाता है। एक अन्य व्याख्या यह है कि अन्य तीन उंगलियां जीवन की तीन अवस्थाओं को दर्शाती हैं: जागृति (इंद्रियों और मन के माध्यम से पूरी तरह से जागृत),
स्वप्ना (नींद की अवस्था - जब मन जागृत होता है) और सुषुप्ति (सच्चा आत्म - जब इंद्रियां और मन अंदर चले जाते हैं) आत्मा -
आत्मा ). अभय मुद्रा, हथेली को बाहर की ओर रखते हुए, उंगलियों को इंगित करते हुए, हाथ को जांघ से ऊपर उठाकर एक मुद्रा, अपने छात्रों पर उनकी कृपा के रूप में व्याख्या की जाती है। माला या साँप
तांत्रिक ज्ञान का प्रतीक है। अग्नि अज्ञानता के अंधकार को दूर करके रोशनी का प्रतिनिधित्व करती है।
॥ अथ द्वाविंशत्यक्षर दक्षिणामूर्ति मन्त्र ॥ मन्त्रोयथा – “ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रयच्छ स्वाहा”। विनियोगः- ॐ अस्य दक्षिणामूर्तिमन्त्रस्य चतुर्मुख ऋषिः गायत्री छन्दः, वेदव्याख्यानतत्पर – दक्षिणामूर्ति देवता, सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः । ऋषिन्यासः – ॐ चतुर्मुखर्षये नमः शिरसि । गायत्री छन्दसे नमः मुखे । दक्षिणामूर्तये देवतायै नमः हृदि । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ कराङ्गन्यास – ॐ आं ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ईं ॐ तर्जनीभ्यां स्वाहा । ॐ ऊं ॐ मध्यमाभ्यां वषट् । ॐ ऐं ॐ अनामिकाभ्यां हुं । ॐ औं ॐ कनिष्ठाभ्यां वौषट् । ॐ अः ॐ करतल करपृष्ठाभ्यां फट् । इसी तरह हृदयादि न्यास करें । ॥ ध्यानम् ॥ वटवृक्षं महोच्छ्रायं पद्मरागफलोज्ज्वलम् गारुत्मतमयैः पत्रैर्विचित्रैरूप शोभितम् ॥ नवरत्न महाकल्पैर्लम्ब – मानैरलंकृतम् विचिन्त्य वटमूलस्थं चिन्तयेल्लोकनायकम् ॥ १ ॥ स्फटिकरजतवर्ण मौक्तिकी – मक्षमाला – ममृतकलश विद्याज्ञानमुद्रा कराब्जैः । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रम् विधृत विविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥ २ ॥ शङ्करं तु शरच्चन्द्र – निभम्भोजमध्यगं गङ्गाधरं शरच्चन्द्र करोल्लासित शेखरम् । प्रसन्नवदनाम्भोजं त्रिनेत्रं सुस्मिताननं दिव्याम्बरधरं देवं गंधमाल्यैरलंकृतम् ॥ ३ ॥ नानारत्नमयाकल्पमनुकल्प विभूषितं मुक्ताक्षमालां दक्षोर्ध्वे ज्ञानमुद्रामधः करे । वार्मोर्ध्वे च सुधाकुंभं पुस्तकं तदधः करे दधानं चिंतयेद् देवं मुनिवृन्दनिषेवितम् ॥ ४ ॥ ॥ अथ चतुर्विंशत्यक्षर दक्षिणामूर्ति मंत्र ॥ मन्त्रः- ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा । मेरुतन्त्र में इसके ऋषि ब्रह्मा, छन्दगायत्री, देवता दक्षिणामूर्ति, वीज मेधा, शक्ति स्वाहा एवं विनियोग मेधा समृद्धये कहा गया है । मेरुतन्त्र में मेधा का अर्थ वाक्शक्ति एवं प्रज्ञा का अर्थ स्मरण शक्ति बताया है । शारदातिलक में मेधा का पाठान्तर प्रज्ञा बताया है । (३२ अक्षर वाले मन्त्र में) ॥ ध्यानम् ॥ व्याख्यापीठेऽतिशुभ्रं च भस्मोद्धलितविग्रहम् । ज्ञानमुद्राक्षमालाढ्यं वीणा पुस्तक धारिणम् ॥
श्री स्वामी करपात्री जी महाराज ने श्री विद्या -रत्नाकर में दक्षिण आम्नाय में श्री दक्षिणामूर्ति देव के मंत्र लिख दिये हैं, जो साधकों के लिये परम उपयोगी हैं । एक मंत्र मैं नीचे दे रहा हूँ , जो कि अनुभूत है और यह मंत्र दैववश मुझे प्राप्त है । यह चौबीस अक्षर का मंत्र है ।इसकी साधना से मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ।
श्री मेधादक्षिणामूर्ति मंत्र के #ब्रह्मा ऋषि , गायत्री छन्द, और देवता दक्षिणा हैं ।
ध्यान:
स्फटिक रजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला ,
ममृतकलशविद्यां ज्ञानमुद्रां कराग्रे।
दधतमुरगकछ्यं चन्द्रचूडं त्रिणेत्रं,
विधृतविविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ।।
मूल मंत्र :
" ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा "
चौबीस अक्षर वाले इस मंत्र का जप करने से (यज्ञोपवीत संस्कार के बाद) पढ़ाई – लिखाई में विशेष लाभ होता है ।श्री शंकराचार्य महाराज द्वारा रचित एक स्तोत्र उपलब्ध है , जिसका नाम श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् हैं। इस पर श्री सुरेश्वराचार्य की टीका है जो श्रृंगेरी मठ से प्रकाशित है । प्रत्यभिज्ञा का स्वत: ज्ञान हो जाता है । यह छोटा सा स्तोत्र ज्ञान से पूर्ण है । लोग लाभान्वित हों , यही श्री दक्षिणामूर्ति देव से प्रार्थना है ।
"शिवो गुरु: शिवो वेद: शिवो देय: शिव: प्रभु:।
शिवो$स्म्यहं शिव: सर्वं शिवादन्यन्न किश्चन्" ।।
इति शिवम्
दक्षिणामूर्ति शिव भगवान शिव का सबसे तेजस्वी स्वरूप है । यह उनका आदि गुरु स्वरूप है । इस रूप की साधना सात्विक भाव वाले सात्विक मनोकामना वाले तथा ज्ञानाकांक्षी साधकों को करनी चाहिये ।
॥ऊं ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः ॥
दक्षिणामूर्ति उपनिषद
कृष्ण यजुर्वेदीय परम्परा से जुड़े इस उपनिषद में 'शिवतत्त्व' का विवेचन किया गया है। महर्षि शौनक आदि और मार्कण्डेय ऋषि के मध्य प्रश्नोत्तर के रूप में इसकी रचना की गयी है। मार्कण्डेय ऋषि इसमें 'शिवतत्व' का बोध कराते हैं, जिससे दीर्घ आयु प्राप्त होती है।
एक बार ब्रह्मावर्त देश में महाभाण्डीर नामक वटवृक्ष के नीचे शौनकादि महर्षियों ने दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञ का प्रारम्भ किया। उस समय शौनकादि ऋषियों ने 'तत्त्वज्ञान' प्राप्त करने के लिए चिरंजीवी मार्कण्डेय ऋषि से चिरंजीवी होने का कारण पूछा। तब उन्होंने बताया कि उनके दीर्घायु होने का कारण शिवतत्त्व का ज्ञान है।
उस ज्ञान के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस साधना के द्वारा दक्षिणामुख शिव का प्रकटीकरण होता है, वही परम रहस्यमय शिवतत्त्व का ज्ञान है।
उन्होंने कहा-'सबसे पहले 'ॐ नम:' शब्द का उच्चारण करके 'भगवते' पद का उच्चारण करें। पुन: 'दक्षिणा' पद कहें, फिर 'मूर्तये' पद कहें, फिर 'अस्मद' शबद के चतुर्थी का एक वचन 'मह्यं' पद कहें तथा बाद में 'मेधां प्रज्ञां' पदों का उच्चारण करें। पुन: 'प्र' का उच्चारण करके वायु बीज 'य' का उच्चारण कर आगे 'च्छ' पद बोलें। सबसे अन्त में अग्नि का स्त्री पद 'स्वाहा' कहें। इस प्रकार चौबीस अक्षर का यह मनु मन्त्र है। यह पूरा इस प्रकार बनता है—
'ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।'
'इस प्रकार मन्त्र बोलकर ध्यान करें- मैं स्फटिक मणि एवं रजत सदृश शुभ्र वर्ण वाले दक्षिणमूर्ति भगवान शिव की स्तुति करता हूँ।'
ये शिव ज्ञानमुद्रा को धारण करने वाले हैं, अमृततत्त्व को देने वाले हैं, गले में अक्ष (रुद्राक्ष) माला धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र है, भाल पर चन्द्रमा का निवास है और कटि में सर्प लिपटे हुए हैं तथा जो विभिन्न वेष धारण करने में सिद्धहस्थ हैं।
मार्कण्डेय मुनि ने फिर कहा—'इसके उपरान्त नवाक्षरी मन्त्र का उच्चारण करें-
'ॐ दक्षिणामूर्तितरों।'
उसके बाद अट्ठारह अक्षर का मनु मन्त्र बोलें-
'ॐ ब्लूं नमो ह्रीं ऐं दक्षिणामूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा।'
'सभी मन्त्रों में यह अति गोपनीय मन्त्र है। इसमें शिव का ध्यान करते हुए देखें कि उनके समस्त शरीर पर भस्म का लेप है, मस्तक पर चन्द्रकला है, कर-कमलों में रुद्राक्ष की माला, वीणा, पुस्तक तथा ज्ञानमुद्रा है, सर्पों से सुशोभित काया है, व्याघ्रचर्मधारी भगवान शिव की यह दक्षिणामूर्ति है। वे सदैव हमारी रक्षा करें।'
मार्कण्डेय मुनि बोले-'शिव के सर्वरक्षक स्वरूप का ध्यान करते हुए इन मन्त्रों को बोलें—
ॐ ह्रीं श्रीं साम्बशिवाय तुभ्यं स्वाहा।
ॐ नमो भगवते तुभ्यं वटमूलवासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नम:।'
सभी मन्त्रों में श्रेष्ठ यह 'आनुष्टुभमन्त्रराज' है। भगवान शिव की मौन, शान्त मुद्रा मृत्युपर्यन्त बनी रहे, इसी की कामना करनी चाहिए।
मार्कण्डेय मुनि ने फिर कहा—'प्रभु दर्शन के लिए ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की आवश्यकता होती है। इसके द्वारा अज्ञान-रूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है और आत्मा-रूपी दीपक प्रज्वलित हो उठता है।'आत्मतत्व' का बोध होने से ही परमात्मा के परम आनन्द में प्रवेश हो जाता है। इसीलिए ब्रह्मज्ञानियों ने उसी 'दक्षिणामुखी शिव' की उपासना पर बल दिया है। इससे समस्त भव-बन्धन और पाप नष्ट हो जाते हैं। साधक 'मोक्ष' को प्राप्त कर लेता है।'
ब्रह्मचर्य का पालन करें.
ब्रह्ममुहूर्त यानि सुबह ४ से ६ के बीच जाप करें.
सफेद वस्त्र , आसन , होगा.
दिशा इशान( उत्तर और पूर्व के बीच ) की तरफ देखकर करें.
भस्म से त्रिपुंड लगाए .
रुद्राक्ष की माला पहने .
रुद्राक्ष की माला से जाप करें.
Y मंत्र साधना के लिए गुरु धारण करना श्रेष्ट होता है.
Y साधना से उठने वाली उर्जा को गुरु नियंत्रित और संतुलित करता है, जिससे साधना में जल्दी सफलता मिल जाती है.
Y गुरु मंत्र का नित्य जाप करते रहना चाहिए. अगर बैठकर ना कर पायें तो चलते फिरते भी आप मन्त्र जाप कर सकते हैं.
Y रुद्राक्ष या रुद्राक्ष माला धारण करने से आध्यात्मिक अनुकूलता मिलती है .
Y रुद्राक्ष की माला आसानी से मिल जाती है आप उसी से जाप कर सकते हैं.
Y गुरु मन्त्र का जाप करने के बाद उस माला को सदैव धारण कर सकते हैं. इस प्रकार आप मंत्र जाप की उर्जा से जुड़े रहेंगे और यह रुद्राक्ष माला एक रक्षा कवच की तरह काम करेगा.
गुरु के बिना साधना
Y स्तोत्र तथा सहश्रनाम साधनाएँ बिना गुरु के भी की जा सकती हैं.
Y जिन मन्त्रों में 108 से ज्यादा अक्षर हों उनकी साधना बिना गुरु के भी की जा सकती हैं.
Y शाबर मन्त्र तथा स्वप्न में मिले मन्त्र बिना गुरु के जाप कर सकते हैं .
Y गुरु के आभाव में स्तोत्र तथा सहश्रनाम साधनाएँ करने से पहले अपने इष्ट या भगवान शिव के मंत्र का एक पुरश्चरण यानि १,२५,००० जाप कर लेना चाहिए.इसके अलावा हनुमान चालीसा का नित्य पाठ भी लाभदायक होता है.
Y
मंत्र साधना करते समय सावधानियां
Y मन्त्र तथा साधना को गुप्त रखें, ढिंढोरा ना पीटें, बेवजह अपनी साधना की चर्चा करते ना फिरें .
Y गुरु तथा इष्ट के प्रति अगाध श्रद्धा रखें .
Y आचार विचार व्यवहार शुद्ध रखें.
Y बकवास और प्रलाप न करें.
Y किसी पर गुस्सा न करें.
Y यथासंभव मौन रहें.अगर सम्भव न हो तो जितना जरुरी हो केवल उतनी बात करें.
Y ब्रह्मचर्य का पालन करें.विवाहित हों तो साधना काल में बहुत जरुरी होने पर अपनी पत्नी से सम्बन्ध रख सकते हैं.
Y किसी स्त्री का चाहे वह नौकरानी क्यों न हो, अपमान न करें.
Y जप और साधना का ढोल पीटते न रहें, इसे यथा संभव गोपनीय रखें.
Y बेवजह किसी को तकलीफ पहुँचाने के लिए और अनैतिक कार्यों के लिए मन्त्रों का प्रयोग न करें.
Y ऐसा करने पर परदैविक प्रकोप होता है जो सात पीढ़ियों तक अपना गलत प्रभाव दिखाता है.
Y इसमें मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों का जन्म , लगातार गर्भपात, सन्तान ना होना , अल्पायु में मृत्यु या घोर दरिद्रता जैसी जटिलताएं भावी पीढ़ियों को झेलनी पड सकती है |
Y भूत, प्रेत, जिन्न,पिशाच जैसी साधनाए भूलकर भी ना करें , इन साधनाओं से तात्कालिक आर्थिक लाभ जैसी प्राप्तियां तो हो सकती हैं लेकिन साधक की साधनाएं या शरीर कमजोर होते ही उसे असीमित शारीरिक मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है | ऐसी साधनाएं करने वाला साधक अंततः उसी योनी में चला जाता है |
गुरु और देवता का कभी अपमान न करें.
मंत्र जाप में दिशा, आसन, वस्त्र का महत्व
Y साधना के लिए नदी तट, शिवमंदिर, देविमंदिर, एकांत कक्ष श्रेष्ट माना गया है .
Y आसन में काले/लाल कम्बल का आसन सभी साधनाओं के लिए श्रेष्ट माना गया है .
Y अलग अलग मन्त्र जाप करते समय दिशा, आसन और वस्त्र अलग अलग होते हैं .
Y इनका अनुपालन करना लाभप्रद होता है .
Y जाप के दौरान भाव सबसे प्रमुख होता है , जितनी भावना के साथ जाप करेंगे उतना लाभ ज्यादा होगा.
Y यदि वस्त्र आसन दिशा नियमानुसार ना हो तो भी केवल भावना सही होने पर साधनाएं फल प्रदान करती ही हैं .
Y नियमानुसार साधना न कर पायें तो जैसा आप कर सकते हैं वैसे ही मंत्र जाप करें , लेकिन साधनाएं करते रहें जो आपको साधनात्मक अनुकूलता के साथ साथ दैवीय कृपा प्रदान करेगा |
श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
दक्षिणामूर्ति हिंदू भगवान शिव का एक अंश है जो सभी प्रकार के ज्ञान के गुरु हैं। परमगुरु के प्रति समर्पित भगवान परमाशिव का यह अंश परम जागरूकता, समझ और ज्ञान के रूप में उनका व्यक्तित्व है। यह रूप शिव को योग, संगीत और ज्ञान के शिक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है, और शास्त्रों पर प्रतिपादक देता है। उनकी पूजा इस रूप में की जाती है। ज्ञान के देवता, पूर्ण और पुरस्कृत ध्यान। शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के पास परमगुरु नहीं है, तो वे भगवान धक्षिनमूर्ति को अपना गुरु मान सकते हैं और उनकी पूजा कर सकते हैं।
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आदि शंकराचार्य ने बहुत सारे महान स्तोत्र (प्रार्थना) लिखे हैं, लेकिन यहां एक अनोखी प्रार्थना है, जो न केवल एक प्रार्थना है, बल्कि उन सभी दर्शन का सारांश है जो उन्होंने सिखाया है। अपने समय के दौरान भी, इस स्तोत्र को समझना मुश्किल था और उनके एक शिष्य के लिए यह आवश्यक हो गया, सुरेश्वराचार्यो ने इस स्तोत्र को मानसोलासा नामक एक टीका लिखी। इस भाष्य पर बड़ी संख्या में पुस्तकें और टीकाएँ हैं।
ॐ मौनव्याख्या प्रकटितपरब्रह्मतत्वंयुवानं
वर्शिष्ठांतेवसद ऋषिगणै: आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः |
आचार्येंद्रं करकलित चिन्मुद्रमानंदमूर्तिं
स्वात्मरामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ||
मैं उस दक्षिणामूर्ति की स्तुति और प्रणाम करता हूं,कौन दक्षिण दिशा की ओर विराजमान है|जो उनकी मौन स्थिति से,परम ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप की व्याख्या करता है,जो दिखने में जवान है,जो पुराने साधुओं और शिष्यों से घिरा है,जिसका मन ब्राह्मण पर टिका हुआ है,शिक्षकों में सबसे बड़ा कौन है,जो अपने हाथ से चिन्मुद्र को दिखाता है,जो खुशी का व्यक्तिकरण करता है,जो अपने भीतर चरम आनंद की स्थिति में है,और जो मुस्कुराता हुआ चेहरा है।
विश्वंदर्पण दृश्यमान नगरी तुल्यं निजांतर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथानिद्रया |
यस्साक्षात्कुरुते प्रभोधसमये स्वात्मानमे वाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ||
ब्रह्मांड एक दर्पण जैसा शहर है जिसमें सब कुछ समाहित है। लेकिन भ्रम के कारण हम इसे जगह से बाहर होने के रूप में देखते हैं। लेकिन सब कुछ भ्रमपूर्ण है। हमारी सभी विचार प्रक्रियाएँ विवेकपूर्ण हैं यदि हमारे पास आत्मा है। जब हम गुरु से ज्ञान प्राप्त करते हैं, तब ही हम अज्ञानता और आत्मज्ञान के प्रकाश से पर्दा उठाते हैं।
उपर्युक्त श्लोक हमें बताता है कि जो दुनिया हमारे बाहर है वह हमारी आत्मा के समान है लेकिन हम उन्हें अज्ञानता के घूंघट के कारण अलग-अलग संस्थाओं के रूप में देखते हैं। जैसे ही हम जागते हैं, हम महसूस करते हैं कि सपना झूठा है और यहां तक कि दर्पण में हमारी छवि को देखते हुए, हम जानते हैं कि हम हमें दर्पण में नहीं बल्कि हमारी छवि देख रहे हैं। जब हम गुरु से ज्ञान प्राप्त करते हैं तो हम अज्ञान के घूंघट के बिना जाग्रत अवस्था में होते हैं।
बीजस्यांतति वांकुरो जगदितं प्राङ्नर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पित देशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतं |
मायावीव विजृंभयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ||
जैसे बीज के भीतर छिपा वृक्ष, ब्रह्मांड उस ब्रह्मा के भीतर समाहित है। वह जो भ्रम बनाता है वह कई रूपों में प्रकट होता है। दक्षिण की और विराजमान सबसे बड़ा शिक्षक भगवानदक्षिणामूर्ति को मेरा आंतरिक प्रणाम, जो योगी की तरह एक पवित्र गुरु हैं
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् |
यस्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुरनावृत्तिर्भवांभोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ||
वह जो सत्य के वास्तविक प्रकाश के रूप में विद्यमान है,और दिखने की झूठी दुनिया में चमकता है,और वह जो शिष्यों को महान कहावत सिखाता है,”तू कला है कि” इसके आयात को साकार करने के बाद,जीवन और मृत्यु के इस चक्र से दूर हो जाता है| दक्षिण की और विराजमान ।
जो अपने बुद्धिमान प्रकाश से, इस भ्रमपूर्ण ब्रह्मांड को एक वास्तविकता बना देता है, उन लोगों को ब्रह्म सिखाता है जो ततमावसी के दर्शन के माध्यम से आत्मा को देखने की इच्छा रखते हैं, जो हमें जीवन और मृत्यु के इस चक्र से निकालता है, और दिव्य गुरु बन जाता है, मैं उससबसे बड़ा शिक्षक भगवान दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करता हूँ|
नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभासुरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण द्वारा बहिः स्पंदते |
जानामीति तमेव भांतमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ||
कई छेदों वाले बर्तन में रखादीपक से निकलने वाला प्रकाशजैसे सभी दिशाओं में जो चमकता हैं, जो हमें अपने ज्ञान से प्रबुद्ध करता है, और हमें अपने प्रकाश से प्रबुद्ध करता है और जो दक्षिण की और विराजमान है और जो सबसे बड़ा शिक्षक भगवान है मैं उस दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करता हूँ ।
देहं प्राणमपींद्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्री बालांध जडोपमास्त्वहमिति भ्रांताभृशं वादिनः |
मायाशक्ति विलासकल्पित महाव्यामोह संहारिणे
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 5 ||
उन महान दार्शनिकों, जो सोचते हैं कि,शरीर, आत्मा और चंचल बुद्धिशून्यता और अन्य सभी चीजों की अवधारणा,खुद के अलावा कुछ नहीं हैं,महिलाओं के बच्चों, अंधे और अज्ञानी के समान हैं।यह केवल वह है जो अज्ञानता के इस घूंघट को विनाश कर सकता है,और हमें छल से जगाता है | दक्षिण की और विराजमान सबसे बड़ा शिक्षक भगवान को प्रणाम।
राहुग्रस्त दिवाकरेंदु सदृशो माया समाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोप संहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् |
प्रागस्वाप्समिति प्रभोदसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 6 ||
सूर्य के समान ही जब सर्प राहु से पीडित होता है, जानता है कि ग्रहण समाप्त होने के बाद यहएक बार विद्यमान थावह मनुष्य नींद की अवस्था में था जिसकी इंद्रियाँ दबी हुई हों, जब वह सो रहा हो,भ्रम के घूंघट के कारणएहसास होता है कि वह,जब वह जागेगा।दक्षिण की और विराजमान सबसे बड़ा शिक्षक भगवान को प्रणाम।
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्ता स्वनु वर्तमान महमित्यंतः स्फुरंतं सदा |
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 7 ||
उसको सलाम
जो चमकता है और प्रदर्शन करता है,हाथ की चिनमुद्रा से खुद को,कि वह मनुष्य के भीतर स्वयं के रूप में विद्यमान है,हमेशा के लिए और गैर बदलते हुए,बचपन, युवा और वृद्धावस्था के बदलते राज्यों के दौरान भीऔर नींद, सपने और जागने की अवस्था के दौरान भी। दक्षिण की और विराजमान सबसे बड़ा शिक्षक भगवान को प्रणाम।
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबंधतः
शिष्यचार्यतया तथैव पितृ पुत्राद्यात्मना भेदतः |
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो माया परिभ्रामितः
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 8 ||
दुनिया कारण और प्रभाव को देखती है,हमारे और हमारे स्वामी के बीच मतभेद,शिक्षक और सिखाया के बीच का अंतर,पिता और पुत्र के बीच का अंतर,और इसलिए आदमी भ्रम में है,और इन अंतरों में विश्वास करता है,सपने और जागने के समय के दौरान। दक्षिण की और विराजमान सबसे बड़ा शिक्षक भगवान को प्रणाम।
भूरंभांस्यनलोऽनिलोऽंबर महर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् |
नान्यत्किंचन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभो
तस्मै गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये || 9 ||
किस सर्वोच्च ब्रह्म के लिए,ब्रह्मांड स्वयं के रूप में चमक रहा है,कौन सा चल और अचल है, इसके पहलुओं के साथ?जल, अग्नि, वायु, अंतरिक्ष,सूर्य, चंद्रमा और व्यक्तिगत आत्मा,और पीछे की सच्चाई की जांच करने वालों के लिए भी,इस ब्रह्मांड और खोजने का अर्थ,यह ईश्वर के अलावा कुछ भी नहीं है| दक्षिण की और विराजमान सबसे बड़ा शिक्षक भगवान को प्रणाम।
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्व श्रवणात्तदर्थ मननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात् |
सर्वात्मत्वमहाविभूति सहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्य मव्याहतम् ||
अथमा की अवधारणा,जो इस कविता में समझाया गया है,जिसे सुनकर समझ में आ गया,कौन सा और कौन सा गायन, ध्यानव्यक्ति को ईश्वर की स्थिति प्राप्त होगी,और आत्म बोध की महान स्थिति,और आपको भी बिना किसी समस्या मनोगत की आठ शक्तियाँ मिलेंगी,
निम्नलिखित तीन श्लोक और साथ ही प्रथम श्लोक का मुख्य स्तोत्र के बाद जप किया जाता है: –
चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा |
गुरोस्तु मौनव्याख्यानं शिष्यास्तुच्छिन्नसंशयाः
यह दृश्य देखना अजीब है कि,बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर एक युवा गुरु, वृद्ध शिष्यों को मौन के माध्यम से उनके सारी को समझाते हैं।
ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये |
निर्मलाय प्रशांताय दक्षिणामूर्तये नमः ||
उस दक्षिणामूर्ति को प्रणाम, जो “ओम”, प्रणव का अर्थ है,जो अलोकित ज्ञान का व्यक्तिकरण है, जो अपने विचार में स्पष्ट है,और जो शांति का प्रतीक है।
गुरवे सर्व लोकानां, जो प्राण
बिशजे भव रागिनाम्,
निधये सर्व विद्यामानम्,
श्री दक्षिणामूर्तिाय नमः।
उस दक्षिणामूर्ति को नमस्कार, जो ब्रह्मांड के गुरु और ज्ञान की देव हैं, जन्म और मृत्यु के समुद्र के ज्वार से प्रभावित लोगों के रक्षक हैं,और जो सभी ज्ञान का खजाना है।