मिथुन लग्न व्यवहार स्वभाव सम्पूर्ण विवेचन

 

मिथुन लग्न (लग्नेश बुध)


     जब लग्नकुण्डली के प्रथम भाव में मिथुन राशि हो तो जातक का लग्न मिथुन होता है। मिथुन राशि का स्वामी बुध है। अतः मिथुन लग्न का स्वामी भी बुध ही होता है। बुध बुद्धि का कारक है। गणित, ज्योतिष, विद्या, व्यापार, मनोरंजन, क्रीड़ा, विनोद आदि का भी कारक है। परन्तु अति सौम्य व ठंडे स्वभाव का है (नपुंसक/बच्चा ग्रह है)। दूसरी ओर मिथुन का प्रतीक चिह्न दो बालकों का जोड़ा है। जो परस्पर खेल रहे हैं (कहीं इन्हें पुरुष व स्त्री के युगल के रूप में भी दर्शाया जाता है)। अतः मिथुन लग्न के जातकों का विवेचन करते हुए मिथुन के प्रतीक चिह्न तथा बुध की विशेषताओं को ध्यान में रखना जरूरी है। इस आधार पर सहज ही कहा जा सकता है कि मिथुन लग्न के जातक क्रीड़ा व मनोरंजन प्रेमी, हंसमुख एवं बातूनी, व्यापारी बुद्धि वाले (गणना में चतुर), शीतल स्वभाव के (बहुत कम क्रोध में आने वाले) किन्तु अतिकामुक प्रवृत्ति के होते हैं। यद्यपि इनकी कामशक्ति अपेक्षाकृत अल्प हो सकती है और बालकों की भांति ऐसे जातक चंचल/अस्थिर स्वभाव वाले होते हैं।

मिथुन राशि एवं लग्न सम्पूर्ण विवरण

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मिथुन विलगन जातः प्रियदारो भूषणप्रदान रतिः।

त्यागी भोगी धनी कामी दीर्घ सूत्रोंरिमर्दकः ।।

भोगी वदान्यो बहुमित्रपुत्रः सुगूढ़ मंत्रः सघनः सुशीलः।

तस्य स्थितिः स्यात नृप सन्निधाने लग्ने भवेत् मिथुनाभिधाने

राशि चक्र में तीसरे नंबर पर मिथुन राशि आती है। भचक्र में इसका विस्तार ६० अंश से ९० अंश के अंदर माना गया है। पृथ्वी पर विषुवत रेखा से २४ अंश तक उत्तर में इसकी स्थिति दृश्य होती है। इस राशि के अंतर्गत मृगशिरा के अंतिम २ चरण, आद्रा के चारो चरण एवं पुनर्वसु के प्रथम ३ चरण का समावेश होता है। मृगशिरा नक्षत्र का स्वामी मंगल, आद्रा का राहु तथा पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी गुरु माना जाता है। इस राशि का स्वामी बुध है

आकाश मंडल में मिथुन राशि से सम्बंधित नक्षत्रो का आकार स्त्री-पुरुष के युग्ल स्वरूप जैसा दिखाई देता है। संभवतः इसी कारण कुछ विद्वान् इसे मैथुन या राति सुख का प्रतीक मानते है। यह द्विस्वभाव एव विषम राशि स्त्री पुरुष के परस्पर आकर्षण का प्रतीक है। यह राशि शीर्षोदयी, वायु तत्त्व प्रधान, शुद्र वर्ण, सत्वगुणी एवं जीव संज्ञक, चंचल व् समशीतोष्ण स्वाभाव, क्रूर धर्मा, हरित वर्ण, रात्रि बलि एवं पश्चिम दिशा की स्वामिनी तथा बाल्य अवस्था वाली एवं पुरुष जाती कहलात है। थोड़े डेढ शाने होते है अपनी बुद्धि ज़रूरत से अधिक लगाते है सामने वाले को मुर्ख समझना स्त्रियों को मीठी मीठी बाते करके फ़साना कामुक भोगी हठी कुतर्की और ज़िद्दी होते है स्वयं को श्रेष्ठ ही मानते है l

मिथुन राशि के अन्य पर्यायवाची नाम

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युग्म, द्वन्द्व, यम, काम, विपंची, मन्मथ, वीणाधर आदि। काल पुरुष में इस राशि का सम्बन्ध हाथ, कंधे, स्वांस प्रक्रिया, फेफड़े, वक्षस्थल एवं स्तन आदि से है।

इस राशि पर कोई भी ग्रह उच्च,नीच या मूल त्रिकोण राशि का नहीं होता। निर्यण सूर्य इस राशि पर प्रायः १४ जून से १५ जुलाई के मध्य संचार करता है। जबकि सायन गणना अनुसार सूर्य लगभग २० मई से २० जून के मध्य संचरित होता है।

मिथुन लग्न में शुभ एवं योगकारक ग्रह

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मिथुन लग्न में बुध, सूर्य व शुक्र सामान्यतः शुभ एवं योगकारक ग्रह माने

जाते हैं।

राशि स्वामी बुध के सूर्य, शुक्र मित्र, चन्द्रमा शत्रु तथा मंगल, गुरु व शनि सम माने जाते हैं।

चन्द्र, गुरु, शनि व राहु शुभाशुभ अर्थात् मिश्रित फल प्रदान करते हैं। उपरोक्त मिथुन लग्न में ग्रहों का शुभाशुभ फल विशेषतया लग्न को ध्यान में रखकर किया गया है। परन्तु भावानुसार उनके फल में न्यूनाधिकता आ जाती है। इन ग्रहों का अन्य ग्रहों के साथ योग तथा शुभाशुभ ग्रहों की दृष्टि का भी विचार कर लेना चाहिए।

मिथुन लग्न में भावानुसार ग्रहों का फल

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सूर्य-लग्न, तृतीय, दशम एवं एकादश भावों में शुभ और ४, , , , व दशम भावों में मिश्रित प्रभाव तथा अन्य भावों, , , , ९ व १२वें में अशुभ फल करेगा।

चन्द्रमा द्वितीय, पंचम, सप्तम, दशम

छठे, अष्टम, नवम भावों में अशुभ फल करेगा। लाभ (११) में शुभ, और ३, ४ व १२वें भावों में मिश्रित तथा प्रथम,

मंगल तृतीय, पंचम, एकादश में मिश्रित तथा अन्य भावों में अशुभ फल करेगा।

बुध-लग्न, , , , ९ भावों में शुभ, अन्य भावों में अशुभ एवं मिश्रित प्रभाव करेगा।

गुरु-द्वितीय, तृतीय, पंचम, दशम एवं १२वें भावों में शुभ तथा अन्य भावों में अशुभ किंवा मिश्रित प्रभाव करेगा।

शुक्र-१, , , , १०, ११ एवं १२ भावों में शुभ तथा अन्य भावों में अशुभ किंवा मिश्रित फल करेगा।

शनि १, ३ एवं ५ (पंचम) भावों में शुभ तथा अन्य भावों में अशुभ किंवा मिश्रित फल करेगा।

राहु-१, , , ९ व ११ भावों में शुभ तथा अन्य भावों में अशुभ या मिश्रित फली माना जाता है।

केतु- ९, ११, ४ एवं ५ वें भावों में शुभ तथा अन्य भावों में अशुभ या मिश्रित प्रभाव करेगा।

मिथुन लग्न में शुभाशुभ ग्रह योग

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बुध-शुक्र-केन्द्रेश व त्रिकोणेश का सम्बन्ध होने से यह योग विशेष राजयोग बनता है। यह योग १, ,, , , ९ व ११ वें भावों (स्थानों) में शुभ फल देता है, जबकि अन्य स्थानों में अशुभ फल मिलते हैं। शुभ योग विद्या, स्त्री, सन्तनादि सुख एवं व्यापार में उन्नति एवं वाहन आदि सुखों को देता है। कम्प्यूटर व संगीत कला में कुशलता देता है।

बुध-गुरु योग-दोनों ग्रह केन्द्राधिपति होने से १, , , , ९ एवं दशम भावों में शुभ फली तथा अन्य स्थानों में अशुभ एवं मिश्रित फल प्रदान करते हैं। शुभ योग से जातक उच्चशिक्षित, वाहन, भूमि, स्त्री, संतान तथा व्यवसाय में उन्नति प्राप्त करता है।

गुरु-शुक्र- यह योग १,, , ७ व दशम भावों में शुभ, शेष अन्य स्थानों में अशुभ किंवा मिश्रित फल प्रदान करता है। शुक्र व्ययेश होने से प्रथमतः (आरंभ में) यह योग अशुभ फल प्रकट करता है, अन्तिम भाग में शुभ फली। शुभ योग धन, वाहन, स्त्री-संतान (विशेषतया) आदि सुख प्रदान करता है।

बुध-शनि-यह योग नवम भाव में शुभ फली होता है, जबकि अन्य स्थानों में अशुभ या मिश्रित फल प्रदायक होता है। यह योग व्यापार में विशेष उन्नति दिलवाता है।

गुरु-शनि-दोनों ग्रहों का योग महत्वपूर्ण है। कुमारादि अवस्था या बलाबल में जो ग्रह अधिक बली होगा, तदनुसार ही शुभाशुभ फल का निर्णय होगा। जातक की ४२ वर्ष की आयु के बाद शुभ योग का फल विशेष रूप से प्रकट होगा।

गुरु-मंगल गुरु दो केन्द्रों का स्वामी तथा मंगल षष्ठेश व लाभेश भी है। इस योग में जातक को अत्यन्त संघर्ष के साथ ३६वें वर्ष के बाद भाग्योन्नति होती है। मैडीकल क्षेत्र में भी उन्नति कारक योग होता है। सूर्य चन्द्र का योग जातक को लोहा, पत्थर, शिल्पकार, बिल्डिंग मैटीरीयल के क्षेत्र में सफल बनाता है।

परन्तु मिथुन लग्न में यदि बुध व शनि भी शुभ हों तो उपरोक्त योग प्रशस्त है। यह योग पैतृक सम्पदा एवं पारिवारिक सुख में भी वृद्धि करता है।

चन्द्र-बुध का योग जातक को (विशेषकर द्वितीय भाग में) पारिवारिक सुख, धन-सम्पदा, वाहनादि सुखों से युक्त विद्या एवं अध्यापनादि क्षेत्र में सफलता दिलवाता है। परन्तु अत्यन्त संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त होती है।

सूर्य-गुरु-चन्द्र-आदि शुभ योग हों, तो जातक धार्मिक वृत्तिवाला, परोपकारी, गुणवान, लेखन आदि कार्यों में रूचि एवं सफलता देता है।

इसके अतिरिक्त मिथुन लग्न में शनि मंगल, शनि-शुक्र, सूर्य-शनि, चन्द्र-शनि के योग प्रायः अत् संघर्षपूर्ण एवं अशुभ फल कारक होते हैं।

मिथुन लग्न की गुण एवं विशेषताएं

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मिथुन जातक प्रायः परिवर्तनशील, वायु तत्त्व होने से कल्पनाशील, अस्थिर प्रकृति, सतर्क, वाक्पटु एवं तर्क-वितर्क करने में कुशल, परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की क्षमता, तीव्र एवं चतुर बुद्धि, स्वाभिमानी, रचनात्मक व् बौद्धिक कार्यो में कुशल, अध्ययनशील, शिल्पकारी, तथा लेखन-पठन-पाठन करने वाला, मृदुभाषी, स्त्रियों का प्रिय, उच्चप्रतिष्ठित लोगो से संपर्क व् बहु मित्रो वाला होता है। संगीत, सिनेमा, टेलीविज़न आदि कलात्मक विषयो में भी विशेष रूचि होती है।

शारीरिक संरचना

〰〰〰〰〰मिथुन लग्न (राशि) में उत्पन्न जातक का ऊंचा कद, दुबला-पतला शरीर, एवं रंग गंदमी होगा। हाथ एवं भुजाएं अपेक्षाकृत लम्बी, लम्बा चेहरा व उठी हुई नाक, प्राय: तीखे नयन-नक्श सुन्दर नेत्र, तीव्र पैनी दृष्टि गहरे मुलायम बाल तथा आकर्षक व्यक्तित्व वाला होगा।

व्यक्तिगत विशेषताएं

〰〰〰〰〰〰इस लग्न / राशि का स्वामी बुध कुंडली में शुभ हो तो जातक परिवर्तनशील एवं अस्थिर स्वभाव होते हुए भी मौलिक विचारों से युक्त, तीक्ष्ण बुद्धि, परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला, परन्तु स्वाभिमानी, उच्च कल्पनाशक्ति के साथ-साथ तीव्र स्मरणशक्ति एवं रचनात्मक शक्ति भी अच्छी होगी। बौद्धिक काया व पढ़ने-लिखने के कामों में विशेष रुचि रखेगा। व्यवहार में तथा बातचीत करने में कुशल व हाजिर जवाब देने वाला होगा।

कुण्डली में चन्द्र शुक्र भी शुभ हों तो जातक स्वाभिमानी, विनोदी, तर्क-वितर्क करने में कुशल, स्पष्टवक्ता,

मित्रों तथा परिवार के लिए सब प्रकार से सहायक तथा नीति के अनुसार आचरण करने वाला व्यवहार कुशल होगा।

भूमि, वाहन, धन-सम्पदा आदि सुखों से सम्पन्न होगा। परंतु यदि चंद्र-बुध अशुभ हो तो यद्यपि जातक व्यवहार कुशल होगा, परन्तु अधिक तर्क-वितर्क करने वाला मानसिक अस्थिरता, अस्थिरता के कारण अधीर, व्यग्र एवं अशान्त भी हो जाएगा।

जातक गायन, संगीत, नृत्य, कला, साहित्य एवं सौन्दर्य सम्बन्धी कार्यों में व खेल-कूद (Sports) में रुचि रखने वाला, संवेदनशील होगा। उसमें बुद्धि एवं भाव तत्व-दोनों प्रबल होंगे। मिलनसार एवं वाक्पटु होने से ऐसे जातक अन्य लोगों से शीघ्र मित्रता कर लेते हैं, विशेषकर स्त्रियों के साथ सरलता से मेल जोल या सम्बन्ध बना लेते हैं।

कुण्डली में सूर्य बुध योग हो तो मिथुन जातक दृढ़ संकल्प एवं दृढ़ निश्चयी होते हैं, जिस काम को करने में तत्पर हो जाएं, उसे पूरी लगन एवं सच्चाई से करते हैं। चंद्र-शुक्र के कारण मिथुन जातक उच्वाकांक्षी, अन्वेषणशील, जिज्ञासु, दूसरों के मन की बात समझने में कुशल, नए-नए विषयों के रहस्य जानने को उत्सुक होते हैं। इसके लिए वह दूर-दूर तक के स्थानों की यात्राएं करने के अवसरों से भी नहीं चूकते। कामुक एवं विषय-वासनाओं में भी शीघ्र आकर्षित हो जाते हैं। द्विस्वभाव राशि होने के कारण इनमें एक समय में अधिक कार्य शुरु करने की प्रवृत्ति रहेगी। दुविधा के कारण अनेक कार्य अधूरे छोड़ देंगे। अनेकदा अत्यधिक तर्क-वितर्क करना मानसिक व्यग्रता एवं विवाद का कारण भी बन सकता है। अपने कार्य क्षेत्र में परिवर्तन एवं विविधता लाना पसन्द करते हैं। राजनीतिक क्षेत्र में मिथुन जातक विशेष कुशल रहते हैं। मिथुन जातक के स्वभाव

की भान्ति जीवन में भी अनेक उतार-चढ़ाव एवं कठिनाईयां आती हैं, परंतु ऐसा जातक अपनी बुद्धि चातुर्य द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने में सफल रहता है। जीवन को चुनौती मानकर कार्य क्षेत्र में उतरता है।

स्वास्थ्य एवं रोग

〰〰〰〰〰बुद्धिशील प्रकृति होने के कारण मिथुन जातक मानसिक तनाव, व्यग्रता एवं दुश्चिन्ताओं के कारण शीघ्र रुग्ण हो जाते हैं।

मिथुन लग्न (राशि) पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हों तो जातक को मानसिक रोगों के अतिरिक्त स्नायु, फेफड़ें, कन्धों, बाजुओं, गले में विकार, सर्दी, जुकाम, पेट विकृति, गुर्दे में पथरी, वायु विकार, मुख वाणी, श्वास, कुष्ठादि चर्म रोग, मन्दाग्नि, मधुमेह आदि रोगों की संभावनाएं अधिक रहती हैं। अपनी सामर्थ्य से अधिक मानसिक उद्वेग एवं शारीरिक क्षीणता से बचना चाहिए। उचित निद्रा संतुलित आहार, नियमित व्यायाम एवं उपयुक्त विश्राम लेते हुए अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। उत्तेजक व मादक तथा तामसिक भोजन के सेवन से परहेज करना चाहिए।

शिक्षा एवं कैरियर

〰〰〰〰〰〰 मिथुन लग्न कुण्डली में बुध, शुक्र लग्न में या पंचम भाव में उदित आदि शुभ अवस्था में हों तो जातक/जातिका कामर्स, एम.बी.ए., चार्टड एकांउटैण्ड (C.A.), इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस, संगीत, शिल्प, वकालत, अध्यापन आदि क्षेत्रों में अधिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं तथा इन्हीं विषयों से सम्बन्धित कैरियर को अपना सकते हैं।

यदि जातक की जन्म राशि एवं नाम राशि समान हो तो उपरोक्त गुणों की अधिकता होती है।

मिथुन राशि/लग्न की कन्या, सभी जातको का प्रेम एवं वैवाहिक सुख

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मिथुन राशि अथवा लग्न में जन्म लेने वाली कन्या सामान्य से लंबे कद वाली, पतले इकहरे शरीर की, सुंदर नेत्रो वाली, सुंदर गेंहुआ वर्ण, तीखे नयन नक्श, तीव्र पैनी दृष्टि एवं आकर्षक व्यक्तित्त्व की स्वामिनी होती है।

यदि इनकी जन्म कुंडली मे राशि स्वामी बुध हो तो ऐसी कन्या अत्यंत बुद्धिमान, वाक्पटु, तर्कशील, उद्यमी, अस्थिर किन्तु मौलिक विचारो से युक्त, परिवर्तनशील प्रकृति, अर्थात परिस्तितियो के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाली होती है। साथ ही दूसरों के मनोभाव को शीघ्र समझने वाली होती है।

कुंडली मे सूर्य,चंद एवं शुक्र भी शुभ हो तो जातिका तीव्र स्मरण शक्ति वाली, सतर्क चंचल आंखों वाली, हंसमुख, मिलनसार ओर व्यवहार कुशल भी होगी, साथ ही मधुर भाषी एवं हाजिर जवाब भी होगी, नए-नए मित्र बनाने में कुशल, इनकी मित्रता का क्षेत्र बहुत अधिक होने पर भी आत्मीयता बहुत कम के साथ रखती है। अपनी आलोचनात्मक एवं बौद्धिक कटु दृष्टिकोण के कारण ये अपने मैत्री संबंध को अधिक समय तक स्थाई नही रख पाती है।

ये जातिकाये द्विस्वाभव एवं पृथ्वी तत्त्व वाली राशि होने के कारण अधिकांश लोग इनकी भावनाओ को समझ नही पाते है। बाहरी तौर पर यद्यपि ये जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर विविधता एवं परिवर्तन पसंद करती है। परन्तु आंतरी रूप से ये अपने समान अथवा श्रेष्ठ मित्र एवं जीवन साथी की आकांक्षा रखती है।

सूर्य चंद्र के प्रभाव से ऐसी जातिका गुणी एवं परिश्रमी बनती है। अपने गुणों के द्वारा समाज एवं परिवार में विशेष भूमिका रखेंगी।  ये अपनी प्रतिष्ठा के प्रति विशेष संवेदनशील रहती है। यदि कुंडली मे बुध शुक्र दोनों शुभ हो तो उच्च व्यावसायिक शिक्षा में विशेष सफलता प्राप्त करती है। कम्प्यूटर, विज्ञान, संगीत, गायन, वाणिज्य, फैशन एवं परिधान डिजाइनिंग, वकालात, कंपनी-प्रबंधक आदि क्षेत्रों में विशेष सफलता पा सकती है।

वैवाहिक जीवन में सफलता (कुण्डली में) चन्द्र गुरु की स्थिति पर निर्भर करेगा। चन्द्र द्वितीय और गुरु १, ,, , १० या ११ वें भावों में शुभस्थ हो, तो मनोऽनुकूल जीवन साथी की प्राप्ति होगी। इस ग्रह में उच्च प्रतिष्ठित एवं बुद्धिमान साथी प्राप्त होगा। विवाह के उपरान्त पति-पत्नी दोनों के लिए विशेष भाग्योदय एवं उन्नति के योग होंगे। यदि गुरु अशुभ या पाप ग्रह से पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन में कटुता एवं वैमनस्य रहेगा। परन्तु उचित उपाय स्वरूप हालत में बेहतरी की सम्भावनाएं भी रहेंगी।

मिथुन राशि/लग्न जातको का प्रेम एवं वैवाहिक सुख

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मिथुन राशि/लग्न के जातक द्विस्वभाव प्रकृति के होने के कारण प्रेम संबंधों में भी विविधता एवं परिवर्तन की आकांक्षा रखते है। यद्यपि प्रेम में स्वयं तो स्थायी संबंधों की आशा तो करते है। परंतु जिसके साथ प्रेम करते है उसी (प्रेमी/प्रमिका) की त्रुटियां निकालते है। जिससे उनके प्रेम संबंधों में दरार पड़ जाती है। और अक्सर प्रेम संबंध टूट जाते है। प्रेम में अत्याधिक गणितीय आंकलन एवं मीन-मेख करने से मिथुन जातक को प्रायः मनोवांछित प्रेमी या प्रेमिका अथवा जीवन साथी नहीं मिल पाता।

मिथुन जातक की पत्नी जिसकी लग्न/राशि की अनुकूलता पति की लग्न/राशि से ठीक मिलान रखती है तथा जो पति की मनोवृत्ति को भली भांति समझने की क्षमता रखती हो ऐसी स्थिति में ही दोनों का दाम्पत्य जीवन सुखी रह सकता है।

मिथुन राशि/लग्न के जातकों के लिए दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभाशुभ विचार

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मिथुन लग्न में सूर्य, बुध, शुक्र, एवं शनि ग्रहो की दशा-अन्तर्दशाये शुभ एवं फलप्रदायक रहती है। शुभस्थ सूर्य एवं बुध की दशा-अंतर्दशाओं में पैतृक संपदा एवं भाई-बहनों के सुख में वृद्धि, आय के साधनों में विस्तार, भूमि, मकान, सवारी आधी सुखों में वृद्धि तथा भाग्योन्नति मिलती है। यदि गुरु-शुक्र भी शुभ हों तो उच्च शिक्षा प्राप्ति, वैवाहिक सुख तथा स्त्री-संतान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति, विदेश गमन की सम्भावनाये और कार्य व्यवसाय में भी लाभ एवं उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते है।

यदि बुध,गुरु,शुक्र आदि ग्रह अशुभ भावस्थ अथवा क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो उपरोक्त सुख साधनों एवं लाभ में कमी तथा विघ्न/बाधाओ के पश्चात सफलता मिलती है।

चंद्र, मंगल, राहु, केतु, एवं शनि ग्रहों की दशा-अंतर्दशाओं का शुभाशुभ फल ग्रहों की राशि व उनकी भावस्थिति पर निर्भर करेगा।

गोचर-विचार👉 दशान्तर्दशा के अतिरिक्त ग्रहों द्वारा फल कथन से पूर्व ग्रहों के गोचर संचार संबंधित शुभाशुभ फल कथन का भी ध्यान रखना चाहिए।

शुभाशुभ विचार

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शुभ रंग👉 हरा, हल्का नीला, सफेद, हल्का पीला, गुलाबी, काला, सतरंगीरंग अनुकूल एवं लाभदायक रहेंगे। गहरा लाल, गहरा नीला एवं पीला व भूरे रंग से परहेज करें।

शुभ रत्न👉 सोने की अंगूठी में पन्ना, सफेद मोती एवं हीरा में से अपने सामर्थ्य एवं आवश्यकता अनुसार धारण करें। स्त्रियों के लिए वैवाहिक सुख की दृष्टि से पुखराज धारण करना लाभप्रद रहेगा।

भाग्यशाली दिन👉 रविवार, शनिवार, बुधवार एवं शुक्रवार अधिक भाग्यशाली रहेंगे।

शुभांक👉 , , , एवं ७ भाग्यशाली रहेंगे।

भाग्योदय कारक वर्ष👉 २५, ३०, ३२, ३४, ३९ एवं ४३ वा वर्ष भाग्योन्नति कारक रहता है।

उपासना👉 श्री विष्णुसहस्त्रनाम तथा श्री दुर्गाशप्तशती का पाठ करना शुभ होगा। हर मंगलवार या शुक्रवार का व्रत एवं कन्यापूजन करके प्रसाद बांटना कल्याणकारी होगा। इसके अतिरिक्त मंगलवार व बुधवार को गौशाला में हरा चारा व गुड़ दान करना शुभ रहता है।

मिथुन राशि/लग्न जातको की आर्थिक स्थिति

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मिथुन राशि/लग्न के जातकों की आर्थिक स्थिति एवं आय का अनुमान कुंडली में चंद्र-बुध-गुरु एवं शनि की शुभाशुभ स्थिति से करना चाहिए। इन ग्रहो की दशा-अन्तर्दशा में जातक को अपने कार्य व्यवसाय में विशेष धन लाभ एवं उन्नति प्राप्त होती है। मिथुन जातक के जीवन में आर्थिक उन्नति अकस्मात ना होकर क्षण-क्षण क्रम बद्ध रूप से होती है। ऐसे जातक जीवन की मध्यमावस्था में मकान, सुशील स्त्री, उच्च शिक्षा एवं वाहन आदि सुखों को प्राप्त कर लेते है।

सावधानी:- द्विस्वभाव राशि होने के कारण मिथुन जातक एक ही कार्य-व्यवसाय में एकाग्रचित होकर परिश्रम नहीं कर पाते। एक ही समय में एक से अधिक कार्यो में रूचि रखने से एक ही व्यवसाय में पूर्णतः सफलता नहीं मिल पाती और न ही मनोवांछित लाभ प्राप्त हो पाता है। अपनी इस त्रुटि को ध्यान में रखते हुए अपने कार्य क्षेत्र में चित्त की एकाग्रता नितांत आवश्यक है।

जातकों का वैवाहिक जीवन एवँ अनुकूल साथी चुनाव

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मिथुन राशि/लग्न की जातिक/जातिकाओ के वैवाहिक जीवन की सफ़लता कुंडली मे चंद्र-गुरु की स्थिति पर अधिक निर्भर करता है। यदि चंद्र द्वितीय ओर गुरु १, , , , १० या ११ वे भाव मे शुभस्थ हो, तो मनोनुकूल जीवन साथी की प्राप्ति होती है। इस ग्रह में उच्च प्रतिष्ठित एवं बुद्धिमान साथी मिलता है। विवाह के बाद पति-पत्नी दोनों के लिए विशेष भाग्योदय एवं उन्नति के योग उपलब्ध होंगे, यदि गुरु अशुभ या पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन मे कटुता एवं वैमनस्य रहेगा। परन्तु उचित उपाय करने पर स्थिति बेहतर बनने की गुंजाइश भी रहेगी।

मिथुन राशि बौद्धिक एवं वायु तत्त्व प्रधान होने से इस लग्न के जातक जातिका को भी वायु तत्त्व एवं अग्नि तत्त्व प्रधान वाले जीवन साथी के साथ परस्पर वैवाहिक संबंध स्थापित करना अधिक अनुकूल एवं लाभप्रद रहता है। अतएव मिथुन जातक को मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, धनु, कुम्भ राशि वाले जातक/जातिका को जीवन साथी के रूप में चुनना शुभ एवं लाभदायक रहेगा। अन्य राशि वालो के साथ संबंध मध्यम फलदायी रहेंगे।

  आप मानवीय हृदय वाले, दूसरों के बारे में सोचने वाले, क्षमाशील तथा न्यायप्रिय होंगे | विनम्रता और भाषणकला में दक्षता भी आपके गुण होंगे | आपमें ज्ञान और सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा होगी और नये तकनीकी विकास में आपकी रूचि होगी | आप खोजी प्रवृति वाले होंगे और चीजों को उनकी गहराई में जाकर पता करेंगे | शिक्षा एवं बौद्धिक कार्यों में आपकी संलग्नता आपको प्रगति के मार्ग पर ले जायेगी | इन सभी गुणों के होने के बावजूद आप धैर्यवान नहीं हो सकते हैं और परिणाम की प्राप्ति में शीघ्रता कर सकते हैं | आपका दिमाग स्थिर नहीं होगा और समय-समय पर आपके इरादे बदलते रहेंगे

     मिथुन लग्न वाले जातक पढ़ने के शौकीन हो सकते हैं। ये सुविकसित शरीर वाले, प्रायः सीधे लम्बे कद वाले और पतले शरीर वाले होते हैं। ये अपने विचारों या योजनाओं को तुरन्त क्रियान्वित करने वाले (फुर्तीले व उत्साही किन्तु जल्दबाज), गणिज्ञ गणना में कुशल, बुद्धिमान, अच्छे वक्ता, प्रभावशाली वाणी वाले किन्तु संकोची व दूसरों का सहारा लेकर आगे बढ़ने वाले होते हैं (इनमें आत्मविश्वास सुदृढ़ स्थिति में नहीं होता)। प्रायः ये अच्छे पेशे से होते हैं (व्यापारी, बैंक की नौकरी, एकाउन्टेंट, गणक, सेल्स एजेन्ट/कमीशन एजेण्ट आदि)। मेकेनिकल साइंस में इनकी खासी रुचि रहती है। ये लोग चंचल प्रकृति के, अस्थिर मति वाले तथा विपरीत लिंगियों के प्रति अधिक आसक्ति रखने वाले होते हैं। इनको विपरीत लिंगियों से सावधान रहना चाहिए। अकेले रहना इनको पसंद नहीं होता। गोष्ठियों या स्त्रियों के साथ में/मित्रों के साथ में इन्हें विशेष सुख मिलता है (अपवाद रूप में कभी कुछ जातकों का कद छोटा भी मिलता है तथापि सक्रियता उनमें होती है अन्यथा प्रायः कद लम्बा ही होता है)। इनका रंग गेहुआं होता है। आंखें छोटी किन्तु दृष्टि तेज होती है। नाक प्रायः छोटी और पैनी व चेहरा गोलाईयुक्त होता है। कान भी अपेक्षाकृत छोटे पर आकर्षक होते हैं।

     सतत् विचारशील रहना, हर व्यक्ति या वस्तु पर शंका करना तथा जीवन/जीवन शैली में कुछ न कुछ परिवर्तन के विषय से चिंतित रहना इनका स्वभाव होता है। क्योंकि ये एकरसता पसंद नहीं करते, परिवर्तन चाहते हैं। यदि ये पुस्तक भी पढ़ेंगे तो मोटी पुस्तक नहीं पढ़ेंगे। यदि पढ़ेंगे तो कई किश्तों में पढ़ेंगे या बोर होकर छोड़ देंगे। आत्मविश्वास की सबलता न होते हुए भी ये लोग खरीदने, बेचने, प्रचारप्रसार, यात्रा सम्बन्धित कार्यों में रुचि लेते हैं। मिथुन लग्न के जातकों में बैठे-बैठे अपने शरीर का कोई अंग हिलाते रहने की आदत प्रायः होती है और ये लोग प्रायः तीव्र गति से चलने वाले होते हैं। ऐसा मेरा अनुभव है। यदि बुध की स्थिति सुदृढ़ हो तो प्रायः इन लोगों के गाल भी फूले हुए (फूलकर कुप्पा हो गए जैसे) मिलते हैं तथा बिना मतलब भी ये बातचीत करते समय हंसते रह सकते हैं।

इनमे एकाग्रता की बहुत कमी होती है, जो इनकी सफलता में बहुत बड़ी बाधा का काम करता है। स्वभाव से अत्यंत महत्वकांशी होते है।

इनकी कमज़ोरी ये होती है की इनमे सब्र या धैर्य की अत्यंत कमी होती है। इसी कारण इनके द्धारा किये  किसी भी प्रयास के परिणाम के लिए इंतज़ार करना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है। 

स्वभाव से थोड़े बहस करने वाले और एक समय में एक से अधिक कामों में खुद को व्यस्त रखते है, लेकिन एकाग्रता की कमी की वजह से दोनों को ही पूरा नहीं कर पाते। 

इनको मानसिक सुख की प्राप्ति की तलाश हमेशा बनी रहती है। जब इनको मानसिक सुख प्राप्त नहीं हो पाता तो ये कई बार अत्यंत बेचैन होकर अजीब व्यव्हार करने लगते है।

जिसकी वजह से कई बार इनका मानसिक संतुलन भी ख़राब हो सकता है। जीवन के हर एक पल में इनको प्यार, परिवर्तन और विविधता की तलाश रहती है।  

ये बहुत अच्छे सलाहकार होते है, और कोई भी अपनी परेशानी में निसंकोच इनसे सलाह ले सकता है। ये विश्वसनीय होते है। आप बेझिझक इनसे अपनी बात साझा कर सकते हो। 

ये लोग अत्यंत चतुर, प्रगतिशील, ऊर्जावान, आविष्कारक, यांत्रिकी ज्ञानी, सरल और प्रतिगामी शक्ति से भरे होते हैं। इनको किसी भी प्रकार के बंधन में जीना पसंद नहीं आता। ये बहुत अच्छे योजनाकार,पत्रकार,जासूस भी बन सकते है।  

इस व्यक्ति के जन्म समय के दौरान बुध ग्रह प्रतिगामी होता है, तो ये लोग सदैव सच का सच देना पसंद करते है। 

अच्छे और हलके फुल्के मज़ाक का आनंद उठाना इनका स्वभाव होता है। अपने पूरे जीवन काल में इनको बहुत सारे परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है।

जीवन का भरपूर आनंद लेना इन्हे बहुत अच्छे से आता है, परन्तु विपरीत लिंगी के साथ इनके मतभेद के कारण इनको लगातार दुर्भाग्य का सामना करना पड़ सकता है। 

पिता और परिवार के साथ भी इनके मतभेद हमेशा बने रहते है। दोस्ती करने में इनको महारथ हासिल होती है लेकिन हमेशा दूसरों में कमियां निकालने के इनके स्वाभाव की वजह से रिश्ते ज़्यादा लम्बे नहीं चल पाते। 

इनके जीवन में जितना अधिक रोमांस और रोमांच होगा उतना ही ये जीवन का आनंद लेंगे। 

मिथुन बुध की स्वराशी है तथा बुध वाणी एवं बुद्धि का कारक माना गया है अतः मिथुन लग्न में जन्मे जातकों का बुद्धिमान एवं वाक्पटु होना स्वाभाविक माना गया है. ऐसे जातक अधिक बात करने वाले एवं लच्छेदार भाषण देने में पटु होते हैं.

अपनी इन्ही विशेषताओं के कारण मिथुन लग्न के पुरुष  स्त्रियों के विशेष आकर्षण का केंद्र होते  हैं. सेक्स के प्रति विशेष रुझान के कारण आप स्त्रियों को संतुष्ट करने में सक्षम होते हैं . दुसरे के हाव भाव को ताड़ने में आपकी विशेष रूचि होती है. मिथुन लग्न के जातकों को अपनी इन्द्रियों पर वश करने की क्षमता होती है. अत्यधिक धन समपन्न मिथुन लग्न के जातक भोगी एवं अपने भाई बहनों से प्रेम करने वाले होते हैं. आप स्वभाव से दयालु तथा आत्मिक उन्नत्तिशील होते हैं.

मिथुन लग्न के जातकों का कद सामान्य से कुछ ऊँचा ही होता है. शारीर से भरी तो नहीं परन्तु दुबले भी नहीं कहे जा सकते हैं. चेहरे खिला एवं भरा हुआ होता है. केश काले परन्तु पतले होते हैं. मिथुन लग्न के जातक अक्सर आगे की ओर झुककर चलते हैं.

द्विस्वभाव होने के कारण मिथुन राशि के जातक किसी भी कार्य को जल्दबाजी में नहीं करते बल्कि बहुत ही सोच समझ कर कदम रखते हैं. जीवन में एकाएक किसी पर विशवास करना आपके लिए कठिन होता है परन्तु एक बार विश्वास बन जाने पर आप जीवन भर सम्बन्ध निभाने में विश्वास करते हैं. संगत का प्रभाव आप पर अधिक होता है तथा किसी से भी बहुत जल्दी आकर्षित एवं प्रभावित आप हो जाते हैं फिर भी मित्रों की संख्या कम ही रहती है. किसी के कार्यों में हसक्षेप करने की आदत आप में नहीं होती साथ ही दुसरो के सुख दुःख में भी आपकी उपस्तिथि कमतर ही रहती है.

ज्ञान एवं विद्या अर्जन करने में विशेष रूचि होने के कारण साहित्य के प्रति मिथुन लग्न के जातकों का विशेष झुकाव होता है. फलतः ये साहित्यकार एवं कवी भी होते हैं.  आप कभी भी किसी एक कार्य से संतुष्ट नहीं होते इसलिए एकसाथ कई कार्य प्रारंभ करने में सदैव रूचि बनी रहती है. अनेक प्रकार के कार्यों को  एक ही समय करने के कारण आपके सभी कार्यों में देरी हो जाती है तथा परिश्रम के अनुरूप फल भी प्राप्त नहीं होता है. इन्ही सब कारणों से मिथुन लग्न  के जातकों को कभी कभी हीन भावना से ग्रसित भी देखा गया है.

आपमें परिश्रम करने की क्षमता होती है परन्तु अस्थिर बुद्धि के कारण आप किसी एक कार्य में आपको विशेष दक्षता प्राप्त नहीं होती है. बौधिक स्तर ऊँचा होने के कारण आप को सफलता धीमी किन्तु अवश्य मिलती है.

 धार्मिक रूप से भी आप संतुलित ही रहते हैं. न तो बहुत अधित धार्मिक होते हैं और न ही अधार्मिक.

कमज़ोरियाँ

इन व्यक्ति में एकाग्रता की अत्यधिक कमी होती है, और ये जल्दबाज़ी में निर्णय लेते है जिसका नुकसान इनको हमेशा उठाना पड़ता है। 

एक छोटे से संघर्ष का सामना होने पर भी ये टूट जाते है। इनको अपने द्वारा किये गए प्रयासों का प्रतिफल जानने की हमेशा आतुरता रहती है। जिसकी वजह से इनका बनता हुआ काम अक्सर ख़राब हो जाता है।

इनको आसान तरीके से काम करना हमेशा पसंद आता है, जिसकी वजह से ये खुद अपना नुकसान कर बैठते है। इनका जीवन दूसरों के मुकाबले अधिक घटनापूर्ण होता है। 

किसी दुसरे की सलाह पर चलना इनको बिलकुल पसंद नहीं आता है। 

यह लोग अपना स्वास्थ्य खुद ख़राब करते है। अत्याधिक सोचने और चिंता करने की वजह से यदि ये बिना मतलब का मानसिक तनाव लेना छोड़ दे तो इनका स्वास्थ्य अच्छा हो सकता है। 

कई बार काम में विविधता लाने के चक्कर में ये अपने ऊपर काम का अत्यधिक भार ले लेते है, जिससे इनकी सेहत ख़राब हो जाती है। 

पूरी तरह आराम करने और भरपूर नींद लेने से इनका शरीर तरोताज़ा हो जाता है। इनके शरीर में इनको अपने फेफड़ों,कंधो और हाथों पर पूरा नियंत्रण होता है। 

इनमें अक्सर किसी भी व्यक्ति से बिना अर्थ की आसक्ति की भावना पैदा हो जाती है। जो इनकी चिंता और परवाह को बढ़ा कर इनका स्वास्थ ख़राब कर देती है।

इनको अक्सर ज़ुकाम, नाक बहना, इन्फ्लुएंजा, ब्रोंकाइटिस एवं अन्य श्वांस सम्बन्धी रोगों का सामना करते देखा जा सकता है। बवासीर, फिस्टुला, मूत्राशय और गुर्दे की बीमारियां होना भी इनमे बहुत आम बात होती है। 

जातक के जीवन में बहुत उठा पटक चलती रहती है। हर मोड़ पर इनको बदलावों का सामना करना पड़ता है।

वैसे तो साधारणत आर्थिक जीवन सहज ही रहता है, लेकिन कई बार खुद की गलतियों की वजह से इनको आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। 

इनको अपने जीवन में धन संपत्ति कमाने के बहुत सारे मौके मिलते है। लेकिन अपनी एकाग्रता की कमी के कारण और जल्दबाज़ी में लिए फैसलों की वजह से यह लोग उन मौकों का भरपूर लाभ नहीं उठा पाते। 

अक्सर इनको पत्रकारिता,जासूसी तथा आधिकारिक पदों पर काम करते देखा जाता है।  किसी कंपनी के सलाहकार के रूप में भी ये अपनी अच्छी पहचान बना कर धन कमा सकते है।

इसके अलावा ये बहुत अच्छे योजनाकार भी होते है, जिसकी वजह से इनको किसी भी व्यवसाय या नौकरी में बड़े पद का लाभ मिल सकता है। 

लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाने की कला में यह लोग माहिर होते है जिसकी वजह से इनके लिए जन संपर्क के पद पर काम करना भी अच्छा रहेगा।  

यह लोग अक्सर दोहरे चरित्र और मानसिकता में झूलते देखे जाते हैं। विविधता में ही इनको जीवन का असली सुख प्राप्त होता है।

इसी कारन से ये बहुत जल्दी किसी भी रिश्ते में पड़ जाते है और फिर अपने स्वभाव के कारण उसमें कमियां निकलना प्रारम्भ कर देते है।  इनकी यही आदत इनके किसी भी रिश्ते को ज़्यादा लम्बा नहीं चलने देती।  

इनको समझना इनके साथी के लिए लगभग असंभव ही होता है। इनके लिए रोमांस और रोमांच में ही जीवन का असली सुख छिपा होता है।

इनके दिल पर दिमाग हमेशा हावी रहता है, जिसकी वजह से इनके भावनात्मक संबंध कम ही बन पाते है। 

यह लोग प्रेम संबंधों में भी हमेशा फायदे और नुकसान को प्राथमिकता देते है। इनको अपने साथी से हमेशा ज़्यादा की उम्मीद होती है। इसी कारण इनको हमेशा ऐसा लगता है की इस रिश्ते में उनको पूरा नहीं मिला है।  

कई बार यह अपने स्वभाव के अनुसार ही दोहरा जीवन भी जीते है और इनके एक से अधिक प्रेम सम्बन्ध बन सकते है। किसी भी विपरीत लिंगी की ओर आसानी से आकर्षित हो जाते है। 

यदि इनका जीवन साथी भी इनकी तरह ही समझदार और जीवन का आनंद लेने वाला होता है।  तो इनका वैवाहिक जीवन अच्छा और आनंदमय रहता है। अन्यथा अलगाव और टूटन का सामना इनको करना पड़ता है।  

इनको केवल तुला, कुंभ, मेष और सिंह राशि में जन्म लेने वाले व्यक्ति के साथ विवाह करना चाहिए तभी इनके जीवन में विवाह संबंधों के सफल होने के अनुमान रहते है।  

आर्थिक क्षेत्र में इनके लिए  यही सलाह रहेगी की किसी भी काम में अपनी एकाग्रता और दृढ़ संकल्प को बनाये रखें तभी सफलता का स्वाद इनको चखने को मिलेगा।

पैसे को वैसे तो ये फालतू खर्च करने वाले नहीं होते। लेकिन अपनी हठधर्मिता की वजह से कई बार आर्थिक नुकसान उठाते है। 

इनके लिए यही सही होगा की बिना किसी बहस के अपने काम पर ध्यान लगाएं और अपने आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करें।

इनके अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, पार्टनर्स, ग्राहकों के साथ बहुत ही मधुर सम्बन्ध होते है। 

ये अपने खुशमिज़ाज़ व्यव्हार से अपने आसपास के माहौल को भी खुशनुमा बना सकते है। इनको अक्सर लोगों से बात करना और उनसे घिरा रहना पसंद होता है।  

अपने घर में भी ये अच्छा महसूस करते है जब कोई मेहमान आता है तो। लोगों से भरा पूरा घर इनको अच्छा लगता है।  घर में साफ़ सफाई और हर चीज़ करीने से जमी हुई रखना इनको बहुत आत्मसुख प्रदान करता है। 

लेकिन कई बार जातको को अकेले रहना भी बहुत अच्छा लगता है। चुपचाप अपने घर के अंदर सबसे दूर। ये कभी मानसिक और शारीरिक रूप से खाली बैठना पसंद नहीं करते। 

घर में बच्चे भी इनको बहुत पसंद होते है लेकिन तभी तक जब तक वो नियम कायदे में रहे। घर का सुख इनको अत्यंत प्रिय होता है। 

मिथुन लग्न में जन्मे जातक अधिक बातूनी तो होते ही हैं एवं भाषण शैली में भी ये निपुण होते हैं। विधा एवं ज्ञानार्जन की ओर इनमें विशेष अंदरुनी रूचि होती है, इसी कारण साहित्य से इनका विशेष जुड़ाव रहता है। ऐसे जातक जज, वकील, तार्किक, कलाकार, परामर्शदाता, नीतिज्ञ अथवा कारोबार में लाभ प्राप्त करने वाले होते हैं। ऐसे जातक कभी भी एक कार्य करने से संतुष्ट नहीं होते अतः एक साथ कई कई कार्य प्रारम्भ कर लेते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप इनके कार्यों को पूरा होने में प्रायः देरी हो जाया करती है। परिश्रम के अनुरूप धनार्जन का लाभ इन्हें प्राप्त नहीं होता, इस कारण ये हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। अस्थिर मति होने के कारण ऐसे जातक किसी कार्य विशेष में दक्ष नहीं हो पाते हैं, यदि ऐसा हो, तो अपवाद स्वरूप ही हो सकता है। इनका भाग्योदय 24, 25, 32, 33 और 35 वर्ष में होता है।

मिथुन लग्न में जन्मे जातक प्रबल बुद्धि से युक्त एवं वाचाल प्रवृत्ति वाले होते हैं। इनकी देह दुबली पतली तो नहीं होती है किन्तु ये लम्बे कद के होते हैं। इनका रंग खुला हुआ तथा चेहरा भरा हुआ होता है। इनके सिर के केश काले एवं पतले होते हैं, किन्तु दाढ़ी मूंछों के बाल प्रायः नुकीले होते हैं। ऐसे जातकों की नाक छोटी होती है एवं इनके नेत्र सुन्दर होते हैं। मिथुन लग्न वाले जातक कुछ आगे को झुक कर चलते हैं, जिस कारण इनकी कमर कुछ आगे को झुकी हुई सी प्रतीत होती है। इनको मूत्रस्थली, गुर्दा, गुप्त रोग एवं कमर सम्बन्धी रोगों एवं विकारों से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है।

स्वास्थ्य - मिथुन लग्न के प्रति

मिथुन राशि वाले लोग घबराहट, निराशावाद, दब्बूपन, और अधीरता से पीड़ित होते हैं। इस राशि वाले लोगों के लिए क्षय रोग, दमा, और एनीमिया आम समस्याएं होते हैं वे तंत्रिका तंत्रन और श्‍वांस से संबंधित, खासकर सुनने की समस्या से भी पीड़ित होते हैं। श्‍वांस संबंधी समस्या और कई तरह की घबराहट की समस्या आम होती है।

स्वभाव और व्यक्तित्व - मिथुन लग्न के प्रति

मिथुन राशि के लोग बहुत ही लुभावने, आकर्षक और मृदुभाषी होते हैं, वे शारिरिक और मानसिक तौर पर काफी मजबूत होते हैं। और इनका व्यक्तित्व ऐसा होता है कि वे अपनी उम्र से अधिक युवा प्रतीत होते हैं। इनमें कुछ नया करने की प्रवृति पाई जाती है। वे किसी एक चीज पर अस्थिर नहीं रहते और जल्द ही किसी काम से उब जाते है और लंबे समया तक किसी एक मसले पर ध्यान केंन्द्रित नहीं कर पाते। ऐसे लोगों में अपने फायदे के लिए दूसरों को इस्तेमाल करने की प्रवृति भी पाई जाती है। चूंकि उनका मन लगातार बदलता रहता है इसलिए उनपर भरोसा करना खतरनाक होता है। इस राशि के लोग बौद्धिक बातों को अधिक महत्व देते हैं, उनके लिए संचार का काफी महत्व होता है। इसलिए वे ज्ञान को जमा करने की पूंजी नहीं मानते। सूर्य राशि में जेमिनी का स्थान काफी अहम होता है। वे किसी एक मुद्दे पर निर्णय लेते है लेकिन अगले ही क्षण उसे बदल देते हैं। इस राशि के लोग खुले विचार और अधिक जिज्ञासु होते हैं।

शारीरिक रूप - मिथुन लग्न के प्रति

मिथुन लग्न के लोग चमकदार आँखें और अपनी बातों से लुभाने वाले होते हैं। ऐसे लोग दुबले कद काठी के, औसत से लंबी ऊचाई वाले होते हैं। वे कई बार माडल्‍स की तरह आकर्षक नजर आते हैं। इनके गोरे रंग, छोटे टोढी,सुन्दर चेहरे, और घुंघरीले बाल से इनका व्यक्तित्व काफी लुभावना लगता है। इनका ललाट चौड़ा होता है और आंखे भी सुंदर दिखाई देती है। लेकिन आकर्षक व्यक्तित्व होने का बावजूद वे रोग और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं।

इस लग्न में जन्मे जातक अस्थिर किन्तु मौलिक विचारों से युक्त होते हैं, इनकी बुद्धि बड़ी दूरदर्शी, तीक्ष्ण एवं तार्किक होती है, ये सदैव प्रसन्न चित्त रहने वाले एवं विनोदी स्वभाव के होते हैं, ये मधुर वाणी बोलने वाले किन्तु चपल एवं स्पष्ट वक्ता होते हैं, ये लज्जाशील प्रवृत्ति के होते हैं, ये खेलों में रूचि रखने वाले एवं बड़ी शीघ्रता से किसी को मित्र बनाने वाला होता है। मेष, मिथुन एवं कुम्भ लग्न वाले व्यक्तियों के साथ इनकी खूब जमती है।

मिथुन लग्न में जन्मे जातकों के लिए शनि, बुध एवं शुक्र ग्रह शुभ फल प्रदाता एवं सूर्य, बृहस्पति ग्रह अशुभ फल प्रदाता सिद्ध होते हैं।

मिथुन लग्न वाले जातक स्वभाव से साहसी एवं पराक्रमी होते हैं। इस राशि पर बुध का प्रभाव होने से आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति होते हैं। इस लग्न में जन्म लेने के कारण आप दयालु, बुद्धिमान और वाक्पटु होंगे तथा कलात्मक कार्यों की तरफ आपका ध्यान होगा। आपकी प्रतिभा दिन-प्रतिदिन निखरती ही जाती है और सभी आपके काम से प्रभावित रहते हैं। इस राशि का वायु तत्व होने से आपका मस्तिष्क सदा चलायमान रहता है। आप नित नई योजनाओ को बनाने में व्यस्त रहते हैं एवं आप कल्पनाओ की दुनिया में भी खोये रह सकते हैं।

बुध को सभी ग्रहों में राजकुमार की उपाधि प्रदान की गई है। इसलिए बुध का प्रभाव होने से आप सदा स्वयं को जवाँ एवं ऊर्जावान मानेगें। आपको गीत, संगीत, नृत्य व कला में रुचि हो सकती है। आपको लेखन आदि कामों में भी दिलचस्पी हो सकती है। आप हास्यरस प्रेमी व मनोविनोद में रुचि रखने वाले व्यक्ति होते हैं। आप अधिक समय तक गंभीर बने नही रह सकते हैं। आपको हंसी मजाक करना अच्छा लगता है। आप खुले विचारों वाले और तार्किक होंगे तथा अपनी बुद्धिमानी एवं कूटनितियों से अपने विरोधियों को पराजित करेंगे।

आप मानवीय हृदय वाले, दूसरों के बारे में सोचने वाले, क्षमाशील तथा न्यायप्रिय होंगे। विनम्रता और भाषणकला में दक्षता भी आपके गुण होंगे। आपमें ज्ञान और सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा होगी और नये तकनीकी विकास में आपकी रूचि होगी। आप खोजी प्रवृति वाले होंगे और चीजों को उनकी गहराई में जाकर पता करेंगे। शिक्षा एवं बौद्धिक कार्यों में आपकी संलग्नता आपको प्रगति के मार्ग पर ले जायेगी। इन सभी गुणों के होने के बावजूद आप धैर्यवान नहीं हो सकते हैं और परिणाम की प्राप्ति में शीघ्रता कर सकते हैं। आपका दिमाग स्थिर नहीं होगा और समय-समय पर आपके इरादे बदलते रहेंगे।

तुला, धनु व कुम्भ लग्न के जातकों से मिथुन लग्न के जातकों की मित्रता शुभदायक होती है। यदि लग्न पर पाप प्रभाव हो तो जातक को त्वचा रोगों तथा फेफड़ों या स्नायुओं के रोग सम्भावित होते हैं।

     यदि मिथुन लग्न बलिष्ठ स्थिति में हो तथा बुध भी बली होकर लग्नस्थ हो तो ऐसे जातक शिल्पकार, गणितज्ञ, सांवले सलोने, बुद्धिमान तथा विद्वान होते हैं। शरीर हल्का किन्तु स्वभाव तमोगुण व सतोगुण के मिश्रित स्वभाव का एवं दयावान होता है। यदि बुध चैथे घर में हो तो ऐसे जातक माता को अधिक प्रिय होते हैं तथा भूमि एवं माता का गड़ा धन प्राप्त करने वाले होते हैं।

     मिथुन लग्न के जातक प्रायरू इतने बातूनी होते हैं कि धाराप्रवाह बोलते चले जाते हैं और बाद में समय का ध्यान आता है। इन जातकों में एक प्रकार का अन्तर्द्वन्द्व-सा रहता है जो इनको इनके शौक, विचारधारा आदि को अधिक समय स्थायी नहीं रहने देता। अक्सर मिथुन लग्न वाले जातक एक ही समय में कई काम करते हुए पाये जा सकते हैं। मसलन टी.वी. देखते हुए बात भी कर रहे होंगे और कोई और काम भी कर रहे होंगे। घोड़े की भांति स्थिर या शांत बैठना/खड़े रहना इनके वश में नहीं होता। ऐसे जातक नौकरी भी करेंगे तो ैप्क्म् में कुछ अलग काम भी कर रहे होंगे। यही इनकी सफलता का राज भी है।

     मेरा अपना मानना है कि बुध क्योंकि चन्द्रमा का बृहस्पति की पत्नी से उत्पन्न नाजायज पुत्र है। परन्तु इतना सुन्दर व चतुर है कि बृहस्पति व चन्द्रमा दोनों ही उसे पुत्र रूप में स्वीकार करते हैं। अतः मिथुन लग्न के जातकों में चतुराई (उनकी अपनी), ज्ञान, बुद्धि, विद्या (बृहस्पति की) तथा चंचलता एवं विपरीत लिंगी के प्रति प्रबल आकर्षण (चन्द्रमा का) सभी विद्यमान रहते हैं। मिथुन लग्न के जातक यदि एक बालक की भांति छोटी-छोटी बातों पर खुश हो सकते हैं और भावुक होते हैं तो एक प्रौढ़ की भांति समझदार व अक्लमंद भी होते है। बुध को म्छळस्प्ैभ् में मरकरी कहते हैं। मरकरी का अर्थ पारा है और पारा कभी स्थिर नहीं रहता। अतः चंचलता व परिवर्तनशीलता मिथुन लग्न वालों का स्वभाव है। वैसे भी मिथुन लग्न वायुतत्त्व प्रधान है, अतः चंचलता व अस्थिरता यहां प्रमुख रूप से रहेगी।

     रोग ज्योतिष के अनुसार लग्न व बुध यदि पाप प्रभाव में हों तो मिथुन लग्न के जातकों को त्वचा सम्बन्धी रोगों का विशेष भय रहता है। वाणी, फेफड़े, आंतों तथा नाडी तंत्र के रोगों की भी सम्भावना रहती है। गले के रोग या तुतलाहट आदि वाणीदोष बुध के निर्बल व पापाक्रांत होने से प्रत्येक लग्न में सम्भावित होते हैं, विशेषकर तब जब दूसरा भाव व द्वितीयेश भी पाप प्रभाव में हो। मूक बधिर होने की स्थिति में बुध की भूमिका अवश्य रहती है।

     विशेष (रोग)-मिथुन लग्न में षष्ठेश (मंगल) पापदृष्ट हो तो नेत्रों द्वारा जलस्राव के रोग से पीड़ित होकर जातक के अंधे हो जाने की सम्भावना होती है।

    मिथुन लग्न हो और वृश्चिक राशि में सूर्य दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक को तीव्र हार्ट अटैक होता है।

    मिथुन लग्न में यदि लग्नेश (बुध) निर्बल हो और चतुर्थ भाव में राहू अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो तो भी जातक को हार्ट अटैक की प्रबल सम्भावना होती है।

    मिथुन लग्न में चतुर्थ भाव में कन्या राशि का शनि हो और कुम्भ का सूर्य नवम भाव में हो तो जातक हृदय रोगी होता है।

    मिथुन लग्न में पांचवां और चैथा भाव पापग्रहों से युक्त हो तो हृदय रोग की प्रबल सम्भावना होती है। अथवा चतुर्थ भाव में शनि हो, षष्ठेश (मंगल) व सूर्य पापग्रहों के मध्य हों तो भी जातक हृदय रोगी होता है।

    मिथुन लग्न में चतुर्थेश व लग्नेश (बुध) यदि नीच का होकर अस्त हो तो जातक को हृदयाघात झेलना पड़ता है।

    मिथुन लग्न में बुध अष्टमस्थ हो तो जातक पर रोगों का आक्रमण सदैव होता ही रहता है। यदि दशमस्थ हो (नीच का) और दशम भाव पाप प्रभाव में हो तो घुटनों में दर्द देगा।

     अतिविशेष-मिथुन लग्न, लग्नेश बुध, तृतीय भाव, तृतीयेश (सूर्य) ये चारों पाप प्रभाव में हों तो कान, कंधे व श्वास नली के रोग अवश्य होते हैं। चन्द्रमा भी पीड़ित हो व राहू शनि का प्रभाव तृतीय भाव तृतीयेश, तृतीय राशि व राशीश पर हो तो दमा/अस्थमा होता है। बुध, मंगल व चन्द्र की प्छटव्स्टम्डम्छज् पाप प्रभाव में हो तो जातक को कुष्ठ, सफेद दाग, एलर्जी आदि चर्म रोग निश्चित रूप से होते हैं।

मिथुन लग्न में ग्रहों के प्रभाव :-

मिथुन लग्न में चंद्र ग्रह का प्रभाव

मिथुन लग्न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र द्वितीय यानि धन भाव का स्‍वामी होता है। द्वितियेश होकर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे संदर्भों का प्रतिनिधि होता है। मिथुन लग्न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सारे संदर्भ ही होते है, यदि जन्मकुंडली या दशाकाल में चंद्र बलवान और शुभ हो तो जातक को इन संदर्भों के द्वारा संपूर्ण संतुष्टि मिलती है। पाप प्रभाव गत या कमजोर चंद्र के होने से वर्णित विषयों में न्यूनता एवम असंतुष्टि प्राप्त होती है।

मिथुन लग्न में सूर्य ग्रह का प्रभाव

समस्‍त जगत में प्रकाश बिखेरने वाला सूर्य तृतीय भाव का अधिपति होता है नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है। अपनी यश पताका फ़हराने के लिये मिथुन लग्न के जातक उपरोक्त संदर्भों के प्रचार प्रसार एवम मजबूत बनाने में प्रयास रत रहते हैं। जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के बलवान और शुभ प्रभाव में रहने पर इन्हें इन विषयों का शुभ फ़ल प्राप्त होता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत सूर्य के कमजोर रहने पर उपरोक्त संदर्भों में इन्हें हानि उठानी पडती है।

मिथुन लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव

मंगल षष्‍ठ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है।

षष्ठेश होने के नाते यह रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी और एकादशेश होने के नाते यह लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे संदर्भों का स्वामी होता है। मंगल का बलवान और शुभ प्रभावगत होना उपरोक्त विषयों में मिथुन लग्न के जातकों को शुभ फ़लदायक होता है एवम निर्बल एवम पाप प्रभावगत मंगल अशुभ फ़लदायी होता है।

मिथुन लग्न में शुक्र ग्रह का प्रभाव

शुक्र पंचम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है।

पंचमेष होने के नाते बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार जैसे विषयों और द्वादशेश होने के कारण निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, और व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है। जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में अगर शुक्र बलवान और शुभ प्रभाव में हो तो अति शुभ फ़ल प्रदान करता है। अगर कमजोर और पाप प्रभावगत हो तो इन फ़लों में अशुभ फ़ल ही मिलते हैं।

मिथुन लग्न में बुध ग्रह का प्रभाव

मिथुन लग्न में बुध प्रथम भाव का स्वामी होकर लग्नेश होता है जो कि रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व जैसे अति महत्व पूर्ण विषयों का प्रतिनिधि होता है। बलवान बुध की स्थिति इन विषयों में अति शुभ फ़ल प्रदान करती है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत बुध होने से इन संदर्भों मे अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं।

मिथुन लग्न में बृहस्‍पति ग्रह का प्रभाव

मिथुन लग्न में बृहस्‍पति सप्‍तम भाव का स्‍वामी हो कर लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है। शुभ और बलवान वृहस्पति इन विषयों में अति शुभ फ़ल देता है जबकि कमजोर और पाप प्रभाव गत गुरू इन फ़लों में अशुभता देता है।

मिथुन लग्न में शनि ग्रह का प्रभाव

मिथुन लग्न में शनि अष्‍टम और नवम भाव का स्‍वामी होता है अष्टमेश होने से यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख एवम नवमेष होने से यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है। बलवान और शुभ प्रभाव वाला शनि बहुत शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर या पाप प्रभाव गत शनि उपरोक्त वर्णित विषयों में अशुभ फ़ल प्रदान करता है।

मिथुन लग्न में राहु ग्रह का प्रभाव

राहु इस लग्न में चतुर्थ भाव का स्वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है। शुभ प्रभाव गत और बलवान राहु इन विषयों में अति शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव वाला राहु अशुभ फ़लों का दाता होता है।

मिथुन लग्न में केतु ग्रह का प्रभाव

केतु को मिथुन लग्न में दशम भाव का स्वामित्व मिलता है और दशमेश होने की वजह से यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है। अगर यह केतु बलवान हो कर शुभ प्रभाव गत हो तो इन विषयों के अति शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं।

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मिथुन लग्न में ग्रहों की स्तिथि

मिथुन लग्न में कारक ग्रह (शुभ-मित्र ग्रह)

शुक्र देव 5, 12, भाव का स्वामी

बुध देव 1, 4, भाव का स्वामी

शनि देव 8, 9, भाव का स्वामी

मिथुन लग्न में मारक ग्रह (शत्रु ग्रह)

चन्द्र देव 2, भाव का स्वामी

मंगल देव 6, 11, भाव का स्वामी

सूर्य देवता 3, भाव का स्वामी

मिथुन लग्न में सम ग्रह

बृहस्पति 7, 10, भाव का स्वामी

मिथुन लग्न लग्न में ग्रहों का फल

मिथुन लग्न में बुध ग्रह का फल

मिथुन लग्न में बुध देवता पहले और चौथे भावों के स्वामी होने के कारण योग कारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें और 11वें भावों में बुध देवता अपनी दशा -अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं।

तीसरे, छठें, आठवें, दसवें (नीच राशि) और 12वें भाव में यदि बुध देवता उदय अवस्था में पड़ें हो तो अशुभ फल देंगे। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

इस लग्न कुंडली में यदि बुध देवता किसी भी भाव में सूर्य के साथ बैठकर अस्त हो जाते हैं तो उनका रत्न पन्ना पहनकर बुध देवता के बल को बढ़ाया जाता है।

मिथुन लग्न में चंद्र ग्रह का फल

चंद्र देवता मिथुन लग्न में दूसरे भाव के स्वामी है और लग्नेष बुध का अति शत्रु है। अष्टम से अष्टम नियम के अनुसार चन्द्रमा इस कुंडली का अतिमारक ग्रह बन गए हैं।

इस लग्न कुंडली का मारक ग्रह होने के कारण कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र देवता बैठें हों तो वह अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार अशुभ फल देंगे।

चंद्र देवता का रत्न मोती इस लग्न कुंडली वाले जातक को कभी भी डालना नहीं चाहिए।

चंद्र देवता का दान और पाठ करके उनकी अशुभता कम की जाती है।

मिथुन लग्न में सूर्य ग्रह का फल

मिथुन लग्न में सूर्य देवता लग्नेश के मित्र हैं परन्तु तीसरे भाव के स्वामी होने के कारण वह इस कुंडली के मारक ग्रह बन जाते हैं।

इस कुंडली में सूर्य देवता मारक ग्रह होने के कारण कहीं भी स्थित हैं परन्तु वह अशुभ फल ही देंगे। अपनी क्षमता के अनुसार ही अशुभ फल देंगे।

सूर्य देवता की दशा अन्तरा में उनका दान और पाठ करके सूर्य देव की अशुभता कम की जाती है।

मिथुन लग्न में सूर्य देवता का रत्न माणिक कभी भी नहीं पहना जाता है।

सूर्य को जल देकर उनके मारकत्व को कम किया जाता है।

मिथुन लग्न में शुक्र ग्रह का फल

शुक्र देवता इस लग्न कुंडली में पांचवें और 12वें भाव के स्वामी हैं। तुला राशि जो शुक्र देव की मूल त्रिकोण राशि है वह कुंडली के मूल त्रिकोण भावों में आती है। लग्नेश बुध के शुक्र देवता के अति मित्र हैं। इस कारण शुक्रदेव इस लग्न कुंडली के अति योग कारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें, ग्यारहवें और बारहवें भाव में शुक्र देवता अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार अच्छा फल देंगे।

कुंडली के तीसरे, चौथे, छठे, आठवें, और 12वें भाव में शुक्र देवता यदि उदय अवस्था में स्थित हैं तो वें कुंडली के मारक ग्रह बन जाते हैं। उनका दान और पाठ करके उनके मारकेत्व को कम किया जाता है।

कुंडली के किसी भी भाव में शुक्र देवता यदि सूर्य के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न हीरा और ओपल पहनकर शुक्रदेव का बल बढ़ाया जाता है।

छठे, आठवें और 12वें भाव में शुक्र देवता विपरीत राजयोग में तब आते हैं जब लग्नेश बुध देवता बलवान होंगे। विपरीत राज़ योग में आने पर शुक्र देवता शुभ फल देंगे। उनके मारकेत्व में कमी आएगी।

मिथुन लग्न में मंगल ग्रह का फल

मंगल देव इस लग्न कुंडली में छठें और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। लग्नेश बुध के अति शत्रु होने के कारण मंगल देवता कुंडली के अति मारक ग्रह माने जाते हैं।

मंगल देवता इस लग्न कुंडली में सभी भावों में अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देंगे परन्तु छठें, आठवें और बारहवें भाव में यदि मंगल देव विराजमान हो और बुध देवता बलि हों तथा शुभ हो तो मंगल विपरीत राजयोग में आने पर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं।

मंगल देवता का रत्न मूंगा इस कुंडली में कभी भी नहीं पहना जाता है क्योँकि मंगल देव इस कुंडली के रोगेश हैं। मंगल देवता का दान और पाठ करके उनके मारकेत्व को कम किया जाता है।

मिथुन लग्न में बृहस्पति ग्रह का फल

बृहस्पति देवता इस लग्न कुंडली में सातवें और दसवें भाव के स्वामी हैं। अपनी स्थिति के अनुसार गुरुदेव अच्छा या बुरा फल देते हैं।

तीसरे, छठें, आठवें, और बारहवें भाव में बृहस्पति देवता को केन्द्राधिपति दोष लग जाता है और वह दूषित हो जातें है। अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं। बृहस्पति देव की अशुभता को बृहस्पति के दान और पाठ करके दूर किया जाता है।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में यदि बृहस्पति देवता विराजमान है तो वह अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देंगे।

कुंडली के किसी भी भाव में बृहस्पति देवता यदि सूर्य देव के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न पुखराज पहनकर बल बढ़ाया जाता है।

मिथुन लग्न में शनि ग्रह का फल

शनि देव इस कुंडली में आठवें और नौवें भाव के स्वामी हैं। कुम्भ जो शनि देव की मूल त्रिकोण राशि है वह इस कुंडली के मूल त्रिकोण भावों में आती है। शनि देव लग्नेश बुध के अति मित्र हैं। इन कारणों से शनि देव इस लग्न कुंडली में योग कारक हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें भाव में शनिदेव अपनी दशा अन्तरा में अपनी योग्यतानुसार शुभ फल देते हैं।

तीसरे, छठें, आठवें, 11वें (नीच राशि) और 12वें भाव में यदि शनि देव उदय अवस्था में हैं तो वह मारक बन जातें हैं।

छठें, आठवें, और बारहवें भावों में यदि शनि देव विपरीत राज़ योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता भी रखतें हैं परन्तु इसके लिए लग्नेश बुध का शुभ और बलवान होना अति अनिवार्य हैं।

कुंडली के किसी भी भाव में यदि शनि देव सूर्य देवता के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं उनका रत्न नीलम पहन कर बल बढ़ाया जाता है।

शनि देव का मारकेत्व उनका दान व पाठ करके दूर किया जाता है।

मिथुन लग्न में राहु ग्रह का फल

राहु देवता की अपनी कोई राशि नहीं होती है। वह अपनी मित्र राशि में शुभ भाव में बैठकर शुभ फलदायक होतें हैं।

इस कुंडली में पहले, चौथे, पांचवें, नौवें भावों में राहु देवता शुभ फल देंगे क्योँकि यह उनकी मित्र राशि है।

दूसरे, तीसरे, छठें (अशुभ भाव), सातवें, आठवें (अशुभ भाव), दसवें, 11वें और 12वें (अशुभ भाव) में राहु देवता मारक बन जाते हैं क्योँकि यह उनकी शत्रु राशि है।

राहु देवता का रत्न गोमेद किसी भी जातक को नहीं पहनना चाहिए।

राहु के मारकेत्व को उनका दान और पाठ करके दूर किया जाता है।

मिथुन लग्न में केतु ग्रह का फल

केतु देवता की भी अपनी कोई राशि नहीं होती। वह अपनी मित्र राशि और शुभ भाव में बैठकर शुभ फल देते हैं।

चौथे, पांचव, सातवें (उच्च राशि ), नौवें भाव में केतु देवता अपनी दशा-अन्तरा में शुभ फल देते हैं।

पहले (नीच राशि ), दूसरे, तीसरे, छठे, आठवें, दसवें, 11वें और 12वें भाव में केतु देवता मारक बन जाते हैं। उनका पाठ और दान करके केतु के मारकेत्व को कम किया जाता है।

केतु का रत्न लहसुनिया किसी भी जातक को नहीं पहनना चाहिए।

पहला भाव में केतु देवता नीच राशि में आकर मारक बन जातें हैं अपितु वह उनकी मित्र राशि है।

अपनी जन्म कुंडली से जाने 110 वर्ष की कुंडली, आपके 15 वर्ष का वर्षफल, ज्योतिष्य रत्न परामर्श, ग्रह दोष और उपाय, लग्न की संपूर्ण जानकारी, लाल किताब कुंडली के उपाय, और कई अन्य जानकारी, अपनी जन्म कुंडली बनाने के लिए यहां क्लिक करें। सैंपल कुंडली देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

मिथुन लग्न में धनयोग

मिथुन लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए धनप्रदाता ग्रह चंद्रमा है। धनेश चंद्र की शुभाशुभ स्थिति से, धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रहों की स्थिति से एवं धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों की दृष्टि संबंध से जातक की आर्थिक स्थिति आय के स्रोत तथा चल-अचल संपत्ति का पता चलता है। मिथुन लग्न में लग्नेश बुध, पंचमेश शुक्र एवं भाग्येश शनि की अनुकूल स्थितियां मिथुन लग्न वालों के लिए धन, ऐश्वर्य एवं वैभव को बढ़ाने में पूर्णरूप से सहायक सिद्ध होती हैं। वैसे मिथुन लग्न के लिए मंगल, गुरु, शनि और सूर्य अशुभ है। अकेला शुक्र शुभ है। चंद्रमा मारक होते हुए भी मारक का काम नहीं करेगा, रवि निष्फल होता है।

शुभ युति :- बुध + शुक्र

अशुभ युति :- मंगल + बुध

राजयोग कारक :- बुध, शुक्र, चन्द्र

मिथुन लग्न में चंद्रमा कर्क या वृष राशि का हो तो जातक बहुत धनवान होता है।

मिथुन लग्न में चंद्रमा शनि के घर कुंभ राशि में हो तथा शनि चंद्रमा के घर कर्क राशि में हो, तो जातक अपने भाग्य के बल पर खूब धन कमाता है एवं लक्ष्मीवान बनता है।

मिथुन लग्न में पंचम स्थान में शुक्र हो, लाभ स्थान में मंगल हो तो व्यक्ति बहुत सारी भू-संपत्ति का स्वामी होता हुआ प्रतिष्ठित एवं धनवान होता है।

मिथुन लग्न में लग्नागत बुध हो, बुध के साथ शनि या शुक्र हो तो व्यक्ति शहर का प्रतिष्ठित धनवान होता है।

मिथुन लग्न में शनि कुंभ या तुला राशि का हो तो जातक अल्प प्रयत्न से बहुत धन कमाता है। ऐसा व्यक्ति धन के मामले में भाग्यशाली कहलाता है।

मिथुन लग्न में चंद्रमा मेष राशि में तथा मंगल कर्क राशि में परस्पर राशि परिवर्तन करके बैठे हो तो जातक महाभाग्यशाली होता है, एवं जीवन में अत्यधिक धन-अर्जित करता है।

मिथुन लग्न में बृहस्पति यदि केंद्र त्रिकोण में हो तथा चंद्रमा स्वगृही होकर धन स्थान में मंगल के साथ या मंगल के सामने स्थित हो, तो जातक कीचड़ में कमल की तरह खिलता है एवं अपार धन कमाता है।

मिथुन लग्न में लग्नस्थ बुध, गुरु या शनि से युत या दृष्ट हो तो जातक महाधनी होता है।

मिथुन लग्न में स्वराशि का शुक्र पंचम भाव में हो, शनि लाभ स्थान में हो तो जातक बहुत लक्ष्मीवान होता है।

मिथुन लग्न में बुध मेष राशि में हो तथा मंगल लग्न में हो तो जातक शत्रुओं का नाश करते हुए स्वअर्जित धनलक्ष्मी को भोगता है।

मिथुन लग्न में लग्नेश बुध, धनेश चंद्र, भाग्येश शनि तथा लाभेश मंगल अपनी-अपनी उच्च राशि या स्वराशि में हो तो जातक करोड़पति होता है।

मिथुन लग्न में चतुर्थ भाव में राहु, शुक्र, मंगल और शनि की युति हो तो जातक अरबपति होता है।

मिथुन लग्न में चंद्रमा स्वगृही हो तो व्यक्ति को पैतृक धन प्राप्त होता है।

मिथुन लग्न में बुध सप्तम भाव में हो तथा द्वादश भाव का स्वामी शुक्र चतुर्थ भाव में हो तो जातक को ससुराल से धन प्राप्त होता है।

मिथुन लग्न में गुरु, शनि व मंगल लग्न में स्थित हो तो जमीदारी योग होता है।

दिन का जन्म हो मिथुन लग्न में चंद्रमा मित्र के नवांश में हो तो ऐसे जातक का जीवन धनसुख से युक्त व्यतीत होता है।

मिथुन लग्न में गुरु चंद्र की युति कर्क राशि में हो तो गजकेसरी योग होता है। इससे जातक विवेकी, सद्गुणी, नम्र तथा धनी होता है।

मिथुन लग्न में सुखेश बुध, लाभेश मंगल नवम भाव में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो व्यक्ति को अनायास धन की प्राप्ति होती है।

1.बुध :- मिथुन लग्न में बुध ग्रह पहले और चौथे भावों के स्वामी होने के कारण योग कारक ग्रह माने जाते हैं | दो केन्द्रों का स्वामी होने के कारण बुध को केन्द्राधिपत्य दोष भी लगता है, जो बुध की शुभता में कमी लाता है | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भावों में बुध देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं | तीसरे, छठें, आठवें, दसवें (नीच राशि) और बारहवें भाव में यदि बुध देवता उदय अवस्था में पड़ें हो तो अशुभ फल देंगे | उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता दूर की जाती है | इस लग्न कुण्डली में यदि बुध देवता का रत्न पन्ना पहनकर बुध देवता के बल को बढ़ाया जाता है |

2.चंद्र :- चंद्र देवता मिथुन लग्न में दूसरे भाव के स्वामी है और लग्नेष बुध के शत्रु है | अष्टम से अष्टम नियम के अनुसार चन्द्रमा इस कुण्डली का अतिमारक ग्रह बन गए हैं | इस लग्न कुण्डली का मारक ग्रह होने के कारण कुण्डली के किसी भी भाव में चंद्र देवता बैठें हों तो वह अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार अशुभ फल देंगे | चंद्र देवता का रत्न मोती इस लग्न कुण्डली वाले जातक को कभी भी धारण करना नहीं चाहिए | चंद्र देवता का दान और पाठ करके उनकी अशुभता कम की जाती है |

3.सूर्य :- मिथुन लग्न में सूर्य देवता लग्नेश के मित्र हैं परन्तु तीसरे भाव के स्वामी होने के कारण वह इस कुण्डली के मारक ग्रह बन जाते हैं | इस कुण्डली में सूर्य देवता मारक ग्रह होने के कारण कहीं भी स्थित हों वह अपनी क्षमता के अनुसार अशुभ फल ही देंगे | सूर्य देवता की दशा-अन्तर्दशा में उनका दान और पाठ करके सूर्य देव की अशुभता कम की जाती है | मिथुन लग्न में सूर्य देवता का रत्न माणिक कभी भी नहीं पहना जाता है | सूर्य को जल देकर उनके मारकत्व को कम किया जाता है |

4.शुक्र :- शुक्र देवता इस लग्न कुण्डली में पांचवें और बारहवें भाव के स्वामी हैं | तुला राशि जो शुक्र देव की मूल त्रिकोण राशि है वह कुण्डली के त्रिकोण भाव में आती है | लग्नेश बुध के शुक्र देवता के अतिमित्र हैं | इस कारण शुक्रदेव इस लग्न कुण्डली के लिए अति योग कारक ग्रह होते हैं | पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें, ग्यारहवें और बारहवें भाव में शुक्र देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार अच्छा फल देंगे | कुण्डली के तीसरे, चौथे, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में शुक्र देवता यदि उदय अवस्था में स्थित हैं तो वें कुण्डली के मारक ग्रह बन जाते हैं | उनका दान और पाठ करके उनके मारकेत्व को कम किया जाता है | कुण्डली के किसी भी भाव में शुक्र देवता यदि सूर्य  के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न हीरा पहनकर शुक्रदेव का बल बढ़ाया जाता है |

5.मंगल :- मंगल देव इस लग्न कुण्डली में छठें और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं | लग्नेश बुध के अतिशत्रु होने के कारण मंगल देवता कुण्डली के अतिमारक ग्रह माने जाते हैं | मंगल देवता इस लग्न कुण्डली में सभी भावों में अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देंगे परन्तु छठें, आठवें और बारहवें भाव में यदि मंगल देव विराजमान हो और बुध देवता बलि  हों तथा शुभ हो तो मंगल विपरीत राजयोग में आने पर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं | मंगल देवता का रत्न मूंगा इस कुण्डली में कभी भी नहीं पहना जाता है क्योँकि मंगल देव इस कुण्डली के रोगेश हैं मंगल देवता का दान और पाठ करके उनके मारकेत्व को कम किया जाता है |

6.बृहस्पति :- बृहस्पति देवता इस लग्न कुण्डली में सातवें और दसवें भाव के स्वामी हैं | अपनी स्थिति के अनुसार गुरुदेव अच्छा या बुरा फल देते हैं | दो केन्द्रों का स्वामी होने के कारण बृहस्पति को केन्द्राधिपत्य दोष भी लगता है, जो बृहस्पति की शुभता में कमी लाता है | अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं | बृहस्पति देव की अशुभता को बृहस्पति के दान और पाठ करके दूर किया जाता है | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में यदि बृहस्पति देवता विराजमान है तो वह अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देंगे | कुण्डली के किसी भी भाव में बृहस्पति देवता यदि सूर्य देव के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न पुखराज पहनकर बल बढ़ाया जाता है |

7.शनि :- शनि देव इस कुण्डली में आठवें और नौवें भाव के स्वामी हैं | कुम्भ जो शनि देव की मूल त्रिकोण  राशि है वह इस कुण्डली के त्रिकोण भाव में आती है | शनि देव लग्नेश बुध के अतिमित्र हैं | इन कारणों से शनि देव इस लग्न कुण्डली में योग कारक हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें भाव में शनिदेव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी योग्यतानुसार शुभ फल देते हैं | तीसरे, छठें, आठवें, ग्यारहवें (नीच राशि) और बारहवें भाव में यदि शनि देव उदय अवस्था में हैं तो वह मारक बन जातें हैं | छठें, आठवें, और बारहवें भावों में यदि शनि देव विपरीत राज़ योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता  भी रखतें हैं परन्तु इसके लिए लग्नेश बुध का शुभ और बलवान होना अति अनिवार्य हैं | कुण्डली के किसी भी भाव में यदि शनि देव सूर्य देवता के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं, उनका रत्न नीलम पहन कर बल बढ़ाया  जाता है |

8. केतु :- केतु को मिथुन लग्न में दशम भाव का स्वामित्व मिलता है और दशमेश होने की वजह से यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. अगर यह केतु बलवान हो कर शुभ प्रभाव गत हो तो इन विषयों के अति शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं

9. राहु:- राहु इस लग्न में चतुर्थ भाव का स्वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है. शुभ प्रभाव गत और बलवान राहु इन विषयों में अति शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव वाला राहु अशुभ फ़लों का दाता होता है.

 किसी भी प्रकार की नौकरी या व्यवसाय में फिट बैठते है। अपने दोहरे चारित्रिक गुण की वजह से यह एक समय में एक से ज़्यादा नौकरी या व्यवसाय का हिस्सा भी हो सकते है।

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सीधे-सीधे लोगों से संवाद वाले काम भी यह अपनी व्यव्हार कुशलता के दम पर बहुत आसानी से कर पाते है। 

उनके लिए सबसे अच्छा पेशा दलाल, बुद्धिमान एजेंट, सफल व्यवसायी, सचिव और कुशल वकील हैं। अपनी अच्छी आश्वस्त शक्ति के सहारे ये अपना हाथ पत्रकारिता में भी आज़मा सकते है।

अपनी आय के स्रोतों में परिवर्तन करते रहना इनके लिए आम बात होती है। एक जगह न टिक पाने के स्वभाव की वजह से ऐसा होता है।

Mithun Lagna Lucky Number and Color | मिथुन लग्न स्वास्थ्य भाग्यशाली संख्या तारीख और रंग

लग्न का स्वामी बुध ग्रह एवं अन्य ग्रहो के प्रभाव के बारे में विस्तृत जानकारी के लिये नवग्रह प्रभाव (Navagraha ) पर जाये। अपितु मंगल ही नहीं अन्य ग्रहो के प्रभाव और सम्बंधित रत्न के बारे में जाने।

सोमवार, गुरुवार, बुधवार और शुक्रवार के दिन लाभदायक होते है। मंगलवार और शनिवार के दिन इनके लिए चिंता और नुकसान के विषय लाते  है।

रविवार का दिवस छोटी यात्राओं और दैनिक कामों से आराम के दिन के रूप में इनको सुख प्रदान करता है। पूर्णिमा के दिन उपवास रखना इनके लिए अच्छा होता है।

इनके लिए शुभ संख्या 7, 3, 5, 6 और 1, 2 होती है। 4 8 संख्या वालों से इनकी बिलकुल नहीं बनती वह है ।

आकाश के 60 डिग्री से 90 डिग्री तक के भाग को मिथुन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय पर यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मिथुन माना जाता है. मिथुन लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र द्वितीय यानि धन भाव का स्‍वामी होता है. द्वितियेश होकर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे संदर्भों का प्रतिनिधि होता है. मिथुन लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सारे संदर्भ ही होते है, यदि जन्मकुंडली या दशाकाल में चंद्र बलवान और शुभ हो तो जातक को इन संदर्भों के द्वारा संपूर्ण संतुष्टि मिलती है. पाप प्रभाव गत या कमजोर चंद्र के होने से वर्णित विषयों में न्यूनता एवम असंतुष्टि प्राप्त होती है.

समस्‍त जगत में प्रकाश बिखेरने वाला सूर्य तृतीय भाव का अधिपति होता है नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है. अपनी यश पताका फ़हराने के लिये मिथुन लग्‍न के जातक उपरोक्त संदर्भों के प्रचार प्रसार एवम मजबूत बनाने में प्रयास रत रहते हैं. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के बलवान और शुभ प्रभाव में रहने पर इन्हें इन विषयों का शुभ फ़ल प्राप्त होता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत सूर्य के कमजोर रहने पर उपरोक्त संदर्भों में इन्हें हानि उठानी पडती है.

मंगल षष्‍ठ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. षष्ठेश होने के नाते यह रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी और एकादशेश होने के नाते यह लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे संदर्भों का स्वामी होता है. मंगल का बलवान और शुभ प्रभावगत होना उपरोक्त विषयों में मिथुन लग्न के जातकों को शुभ फ़लदायक होता है एवम निर्बल एवम पाप प्रभावगत मंगल अशुभ फ़लदायी होता है.

शुक्र पंचम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है पंचमेष होने के नाते बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार जैसे विषयों और द्वादशेश होने के कारण निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, और व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है. जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में अगर शुक्र बलवान और शुभ प्रभाव में हो तो अति शुभ फ़ल प्रदान करता है. अगर कमजोर और पाप प्रभावगत हो तो इन फ़लों में अशुभ फ़ल ही मिलते हैं.

मिथुन लग्‍न में बुध प्रथम भाव का स्वामी होकर लग्नेश होता है जो कि रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व जैसे अति महत्व पूर्ण विषयों का प्रतिनिधि होता है. बलवान बुध की स्थिति इन विषयों में अति शुभ फ़ल प्रदान करती है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत बुध होने से इन संदर्भों मे अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मिथुन लग्‍न में बृहस्‍पति सप्‍तम भाव का स्‍वामी हो कर लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. शुभ और बलवान वृहस्पति इन विषयों में अति शुभ फ़ल देता है जबकि कमजोर और पाप प्रभाव गत गुरू इन फ़लों में अशुभता देता है.

मिथुन लग्‍न में शनि अष्‍टम और नवम भाव का स्‍वामी होता है अष्टमेश होने से यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख एवम नवमेष होने से यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. बलवान और शुभ प्रभाव वाला शनि बहुत शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर या पाप प्रभाव गत शनि उपरोक्त वर्णित विषयों में अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

मिथुन लग्न

बीज मन्त्र 

ॐ गं ह्रीं क्लीं श्रीं दं द्रां खं भ्रं नमः

सूर्य : अंक 1 पराक्रमेश सूर्य की महादशा तभी लाभदायक सिद्ध होती है, जबकि सूर्य वर्गोत्तमी, उच्चस्थ या स्वग्रही हो। सूर्य अशुभ फल ही देगा अतः गेहू आटा दान करे दान सामग्री नीचे बतादि गयी है 


चंद्रमा : अंक 2 शुभ करक है  धन वाणी का स्वामी भी होने से सर्वदा शुभकारक है। धन कुटुंब और वैभव वाणी शुभ मोती धारण करे, चावल खावे दूध पिए मोती मूनस्टोन पहने चाँदी की स में पानी पिए, रोहिणी,चतुर्थी, पूर्णिमा का व्रत रखे खिकी जड़, और 2 मुखीरुद्राक्ष पहने दूज के चाँद देखे शिवाभिषेक करे l चतुर्थी का व्रत रखे गणेश उपासना करे l शमशान से कांच की बोतले में  जल लाकर रखे 


मंगल : अंक 9 षष्ट और एकाका स्मी है। मंगल की अंतरदशाएं हमेशा संकटकारी होती हैं। मारक है बचे 

दान करे मसूर दाल त्रिकोण वस्तु 

समोसा दान सामग्री नीचे बतादि गयी है रक्त का दान मंगल को शांत करता है।सर्वदा अरिस्ट अशुभ कारक इसका दान करे मंगल के दान करे त्रिकोण खाद्य पदार्थ ∆ का दान करे मूंगा न पहने मंगल का दान करे


बृहस्पति : अंक 3 सप्तम और दशम का स्वामी होकर बृहस्पति केंद्राधिपति होने का दोषीहै। मिथुन लग्न में बृहस्पति की दशा जीवन में स्थान परिवर्तित करवाती है। प्रायः अशुभ फल देती है।केला खावे चनादाल बेसन खावे पुखराज पहने पुखराज , सुनहला, सिट्रीन रत्न धारण करे 5 मुखी रुद्राक्ष और भारंगी की जड़ी पहने, पीतल में खाना खावे, पीपल का पेड़ लगाए सीचे और शनिवार को  के तेल का दिया करे, बृहस्पति यंत्र इंडेक्स फिंगर में सोने में पहने, पुष्करतीर्थ में स्नान और पूजन करावे,  दक्षिणमुखीशिव, दत्तात्रेय भन् की पूजा करे उनको गुरु  बनावे

हल्दी के गणेश की पूजा करे l चने की दाल बेसन पीले लड्डू का भोजन करे बृहस्पति वॉर को l केसर हल्दी दाल कर दूध पिए 


शनि : अंक 8 शनि अष्टम और दशम का स्वामी होकर अत्यंत विषम परिस्थितियों का निर्माण करता है। महर्षि पराशर ने लिखा है कि जब कोई ग्रह अष्टमेश और नवमेश संयुक्त रूप से हो, तो राजयोग को नष्ट करता है। किन्तु लग्नेश का मित्र होने से सर्वदा शुभ भाग्यकारक होगाशनि, की दशा का निर्णय इसकी स्थिति के अनुसार करना चाहिए। शुभ करक शनि का नीलम फ़िरोज़ा पहने सर्वशुभ लाभ कारी सर्वदा शुभ नीलम धारण करे काल भैरव शिव कृष्ण काली जी को पूजे बिच्छू की जड़ पहने 7 मुखी रुद्राक्ष पहने 


बुध : अंक 5 मिथुन लग्न में बुध लग्नेश और चतुर्थेश होकर कारक बन गया है। बुध की महादशा में शारीरिक सुख, संपदा और वैभव की प्राप्ति होती है।सदैव शुभ साम्भरवड़ा पालक खावे खड्डे वाला सिक्का पास रखे पन्ना पहने हरी बनियान पहने हरी मूंगदाल सब्ज़िया खूब खावे सर्वदा शुभ करक सर्वदा दुर्गा षोडशी भुवनेश्वरी पूजे आरोग्य शुभ धन सिद्धि कारी पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने 


शुक्र : अंक 6 मिथुन लग्न में शुक्र की दशा सर्वश्रेष्ठ और सही अर्थों में जीवन का स्वर्णकाल होता है। यद्यपि शुक्र पंचमेश के साथ द्वादशेश जैसे अशुभ भाव का भी स्वामी है, लेकिन शास्त्रों में लिखा है कि शुक्र द्वादशेश होने के दोष से मुक्त है। हीरा पहने दही बड़े खावे आलू छोला कमला लक्ष्मी की उपासना करे ओपल हीरा पहने आलू छोला दही लस्सी खुशबू वाली वस्तुवे खावे सर्वदा शुभ लाभ कारी सफ़ेद स्फटिक  पुखराज पहने हीरा पहने, सर्पोखे की जड़ी पहने, 6 मुखी रुद्राक्ष पहने


राहु:अंक 4,   

भाव 3-6-10-11  में अति शुभ  राहु की स्थिति देख गोमेद  पहना चाहिए भैरव जी की उपासना करे शनिवार को करे सुलेमानी हकीक धारण करे 


केतु:  अंक 7 

शुभ फल देगा इसलिए कुत्ते की सेवा करे दूध ब्रेड खिलावे और कान बिन्धावे, गणेश उपासना जीवन को अमृत बनादेगी गणेश चतुर्थी व्रत 

टाइगर ऑय स्टोन धारण करना शुभ  है 


अधिकतर राहु-केतु सर्वदा अशुभ इनके दान करे जूता छाता चप्पल कम्बल मोज़े टोपी, 8स्टील और 8लोहे के बर्तन, जौ बाजरी प्याज लहसुन सफ़ेद काले तिल, कोयला सिगड़ी, मोप्पर, वाइपर, पोछा, साबुन लिक्विड वाशिंग  पाउडर केमिकल, मेडिसिन  या इंडक्शन 

मंगल  :  मसूर दाल /रागी  

शनि :  काली उडद/काले चने 

शुक्र : सफ़ेद ज्वार 

सुर्य : गेहू गुड़ 

केतु :  बाजरा/चौला

राहू: जौ/मोठ

मिक्सचर donate करे गौशाला में 

@  9,18,27,54,81,108,kg

गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को करें

OR

50gm डिब्बी में रात को सिरहाने रखकर या सुबह 27 बार एंटीक्लॉक वाइज उवार कर पक्षियों में डाले

3. मिथुन लग्न की इष्ट - मंत्र-


मिथुन राशि : इन्हें हरे श्वेत हरिद्रा गणेश विष्णु लक्ष्मी दुर्गा  भैरव कृष्ण श्रीनाथ जी माता भुवनेश्वरी की या माता चन्द्रघंटा की उपासना करनी चाहिए।ॐ गौरीपुत्राय नम:।ॐ नमो भगवते गजाननाय

ॐ श्रीं दं यं वैष्णवे नम

ॐ ह्रींश्रींक्लींदुं दुर्गाय नमः

ॐ अर्धनारीश्वराय नमः 

मिथुन राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।

ॐ गंदंश्रींक्लींऎंसौः खंभ्रंक्लीं कृष्णायै नम:

इसके साथ आपके शुभ ग्रहो ले मन्त्र 

बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।

बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'

गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'। 

गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।

शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'। 

शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'

शुक्र मंत्र- 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:'।

शुक्र का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शुं शुक्राय नम:'।

भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।

भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।

मिथुन लग्न के लिए बुध, शुक्र, शनि, गुरु,चंद्र , अरुण योग कारक हैं इसलिए आप पन्ना, हीरा, नीलम, फ़िरोज़ा, पुखराज, सफ़ेद मूंगा, मोती  धारण कर सकते हैं l 2,3,4,5,6,7,15,17मुखी रुद्राक्ष भी साथ में धारण करेंगे तो पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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गणेश मंदिर :  बुद्धवार तो मंदिर जाकर , और घर में रोज़ 

लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की दोनों  चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE

में लगावे 


देवी दुर्गा मंदिर 

/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच 

सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री  यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे   

काली मंदिर : शनिवार  चढ़ावे :

मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे  108 बार मंत्र बोले 

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए   


भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ  इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड,  उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है 

ॐ भ्रं भैरवाय नमः

भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे 


विष्णु लक्ष्मी मंदिर:

मंदिर में जावे बेसन चक्की और दूध की बर्फी केले भोग नैवेद्य ॐ श्रीं दं नमः पूर्णिमा, एकादशी, द्वादशी का व्रत रखे सूर्य यन्त्र विष्णु यन्त्र बुद्ध यन्त्र उत्तर में


पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे 

अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे 

रामायण, भागवत का पाठ करावे 

गौशाला ब्राह्मण को दान करे 

पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे  में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00  से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके  हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे  

llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3

    2. त्रिपिंडी 

    3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच 

ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः

पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे 

प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे 

दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे


दान मंगल के 9 का अंक 

ताम्बा, गुलाब जामुन, सिकी हुई, माटी, ईट, चूल्हा, अगरबत्ती,लाल शरबत जूस, लाइटर, गैस लैंप, स्टोव, गुलाब शरबत, सेब, मिठाई, गुलाल,लाल रंग के पुष्प, टमाटर, सिन्दूर, मूंगा, त्रिकोण वस्तुवे, आतिश बाज़ी , अग्नि की वस्तुवे, क़ुमकुम, शहद , मसूर दाल , खजूर , मिठाई सिका हुवा मावा रबड़ी बेसन के लड्डू पकोड़े ,समोसे, तिकोण पुरिया बिंगो, पेटीज़, सैंडविच, मालपुवे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए। इसके अलावा योग्य ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को गेहूं, गुड़, माचिस,लाइटर, गैस, चूल्हा, ताम्बा, स्वर्ण, दुधारू गौ, मसूर की दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्ठान्न एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है। 


सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में 1 अंक सांड,रोटी,अनार, कमल, गुलाबी रंग, चौरस आकर के आसान  सोने की 1ग्राम  गिंनी, कमल का फूल, आम, चुकुंदर, गाजर, रानी रंग के वस्त्र, अनार, आम, नारंगी, बन्दर के खिलोने, कुमकुम, बिस्कुट, गुलाल, आटा, तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है। पीला बल्ब  रौशनी की वस्तुवे टोर्च, टेबल लैंप  यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रांति के दिन किया जा सकता है। सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है।


राहु-केतु के दान अंक 4-7


नीलेफूल, मैग्गी, चौमीन, सोया सॉस ,फ़ास्ट फ़ूड, अंडा नॉनवेज, चाय, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, ईरफ़ोन, mic, स्पीकर, मुखौटा,  नशे, डबल रोटी ब्रेड, बासी भोजन, स्टील, अस्ट धातु या पांच धातु या मिश्रण धातु के आइटम, लेड शीशा, पीतल, कांसा, स्टील के बर्तन  जौ-बाजरा,प्याज-लहसुन,काले-सफ़ेद तिल, मशरूम, ऊनि- टोपी, जूता, छाता, चप्पल कम्बल, एलोपैथिक होम्योपैथिक दवाइयाँ, चाकू छुरी, तलवार कटार, ढाल, कपडे, शराब, मादक पदार्थ, खट्टे आइटम, डेटोल, स्पिरिट, पोछा, वाशिंग मशीन, साबुन डिटर्जेंट, केमिकल, तेज़ाब, एसिड, पोइसन, केमिकल स्प्रे, radio, मोबाइल, ट्रांजिस्टर, इंडक्शन चूल्हा, शमशान की लकड़ी, पलंग, पूरानी लकड़ी के आइटम हेंडीक्राफ्ट   काले-दुरंगे कुत्ते, राहु के लिए काला-नीला कपड़ा, कंबल, सरसों का दाना, राई, ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का ‍दान किया जाता है।

केतु के लिए सात अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान किया जाता है।


शनि के दान अंक 8


अंक 8, लोहा, 8 लोहे के बर्तन, 8 के काले नीले वस्त्र  अंक में काजल, सुरमा, कालीउड़द, लोहे के औज़ार, हथियार गाडी, धातु से बने पात्र, अस्त्र शास्त्र, मशीन, 7 धान, जूते, काले फल, काले अंगूर, काले नीले फूल, कला दन्त मंजन, काला नमक, राई,  काले मोज़े, काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, अलसी, तेल, काला पुष्प, कस्तूरी, काले तिल, चमड़ा, काले कंबल का दान किया जाता है, नील, चारकोलसोप, आवला, पीपल, कला कुत्ता, उड़द से बने इमरती, डोसा, इडली, सांभर वादा, काली दाल, चाय की पत्ती, काली पैंट, कला रुमाल, गोल बगीचे के आठ चक्कर, टायर, पायल, धातु, बांसुरी, लौंग, काली हल्दी, दान करे ल


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