तुला लग्न का सम्पूर्ण स्वभाव जीवन परिचय विवेचन विवरण विश्लेषण
तुला लग्न का सम्पूर्ण स्वभाव जीवन और व्यक्तित्व परिचय विवेचन विवरण विश्लेषण :
तुलालग्न की चारित्रिक विशेषताएं
तुलालग्न का स्वरूप
शीर्षोदयी युवीर्यादयरूतुलः कृष्णो रजोगुणी ।
पश्चिमो भूचरो घाती शूद्रो मध्यतनुद्विपात् ॥15॥
- बृहत्पाराशरहोराशास्त्र/अ. 4/श्लो. 15
तुला शीर्षोदय, दिगबली, कृष्णवर्ण, रजोगुणी, पश्चिमवासी, भूमिचारी, हिंसक,शूद्रजाति, मध्यदेह है, इसका स्वामी शुक्र है।।15।।
देवब्राह्मणसाधुपूजनरतः प्राज्ञः शुचिः स्त्रीजितः
प्रांशु सोनतनासिकः कृशचलद्गात्रोऽटनोऽर्थान्वितः ।
हीनांगः कय-विक्रयेषु कुशलो देवद्विनामा सरुग,
बन्धूनामुपकारकद् विरुषितस्त्यक्तश्च तैः सप्तमे॥17 |
बृहज्जातकम् अ. 16/श्लो. 7
तुला में चंद्रमा रहने पर देवता, ब्राह्मणों व साधु सज्जनों का सत्कार करनेवाला, बुद्धिमान, पवि आचरण करने वाला अर्थात् दूसरों की स्त्री व धनादि का ऊचीलोलुप, सत्याचारणशील, स्त्री द्वारा वश मे किया गया, ऊंचे कद वाला, नाम वाला, कमजोर एवं अस्वस्थप्राय शरीर वाला, यात्रा प्रेमी, धनी, अंगहीन, क्रय-विक्रय में कुशल, देवता वाचक किसी द्वितीय नाम वाला अर्थात् सामान्यत: दो
नामों वाला, रोगी, अपने बंधु-बान्धवों का उपकार करने वाला किन्तु अपने ही बन्धुओं से तिरस्कृत व त्यक्त होता है।
तुलाविलग्ने तु नरः प्रसूतः स्वकर्मणा जीवति बुद्धिमांश्च ।
विद्वप्रियः सर्वकलास्वभिज्ञश्चलस्वभावो वनिताजितश्च ॥
वृद्धयवन जातक अ. 24/श्लो. 7/पृ. 288
यदि जन्म समय में तुलालग्न विद्यमान हो तो मनुष्य बुद्धिमान, अपने कार्य मेंसंलग्न रहने वाला या पैतृक कार्य से जीविका कमाने वाला, विद्वानों का प्यारा, साभी कलाओं का जानकार, चंचल स्वभाव वाला, स्त्री से पराजित होने वाला होता है।
ललितवदनने राजपूज्यश्च विद्वान् मदनरतिविलोलः स्वीचनावशाली।
विरलदशनमुख्यः शान्तबुद्धिर्विषादी चलमतिरतिभी रुर्जायते तौलिलो।
जातक पारिजात श्लो. 7/पू. 678
सुन्दर चेहरा (मुखाकृति) और नेत्र, राजपूज्य (राजा से सम्मानित), विद्वान, स्त्रियों से रति के लिये जिसका चित्त चंचल रहे। स्त्री, धन और क्षेत्र (खेत, भूमि) से युक्त, विरल (परस्पर भिड़े हुए नहीं) दांत, मुख्य (प्रधान), शान्त बुद्धि, विषादी (किसी एक विचार पर दृढ़ न रहना अस्थिर मति का लक्षण है), अत्यन्त भीरु (डरपोक) हो।
कन्दर्परूपनिकपुणस्तुलादिभागेऽध्वसेवज्ञः।
श्यामकला पण्यरतो नियोगधीर: समेघावी ॥10॥
-सारावली पृ. 466/श्लो. 10
यदि जन्म लग्न में तुला राशि व तुला राशि का पहला द्रेष्काण हो तो जातक कामदेव के तुल्य स्वरूपवान, चतुर मार्ग सेवन की विधि का ज्ञाता, कृष्ण वर्ण, व्यापार में लीन, वियोग में धैर्यवान् और सुन्दर मेधावी होता है।
तुलालग्रोदये जातः सुधीः सत्कर्म जीविकः ।
विद्वान सर्वकलाभिज्ञो धनाढ्यो जनपूजितः ॥
-मानसागरी
तुलालग्न वाला जीव ज्ञानशील, विवेकी, सतकार्य युक्त, मान-सम्मान वाला, धनसम्पदाशील, अनेक कलाओं द्वारा जीवनयापन करने वाला, जनसमाज में पूज्य, वाणिज्य कार्य में कुशल रहे। तुला राशि का स्वामी शुक्र है। शुक्र ऐश्वर्यशाली व विलास पूर्ण ग्रह है। गौर वर्ण, मध्यम कद तथा सुन्दर, आकर्षक चेहरा इस राशि वाले जातक के प्रारम्भिक लक्षण हैं। यह राशि चर संज्ञक, वायु तत्त्व प्रधान व पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। इसका प्राकृतिक स्वभाव वृष-तुल्य होते हुए भी विशेषत: इस राशि वाले जातक विचारशील, ज्ञानप्रिय, कुशल कार्य सम्पादक व राजनीतिज्ञ होते हैं।
तुला लग्नोदये जातः सुधी: सत्कर्मजीविक:।
विद्वान सर्वकलाभिज्ञो धनाढ्यों जनपूजितः।।
गुणाधिकत्वाद द्रविणोप्लब्धि वाणिज्य कर्म व्याति नै पुणत्वम।
पदमालय तन्नीलये न लोला लग्न चेत्सकुलावतं स:।।
अर्थात तुला लग्न (राशि) में उत्पन्न जातक बुद्धिमान अच्छे कर्मों से आजीविका उपार्जन करने वाला विद्वान अनेक कलाओं में निपुण धनी व्यवहार कुशल तथा कुल में श्रेष्ठ होता है। राशि चक्र में तुला सातवी राशि है। भचक्र में इस राशि का विस्तार 180 डिग्री अंश से 210 डिग्री अंश तक है। इस राशि का अधिपति स्वामी ग्रह शुक्र है। जो सौर मंडल में सर्वाधिक चमकने वाला आकाशीय पिंड है। आकाश मंडल में तुला राशि कन्या राशि से दक्षिण पूर्वी भाग में है तथा राशि का निवास (संबंध) वस्ती / नाभि के नीचे आसपास गुर्दो एवं मूत्राशय है। इस राशि के अंतर्गत चित्रा नक्षत्र के अंतिम दो पाद, स्वाति के चारों पाद, तथा विशाखा के प्रथम तीन पाद आते हैं। चित्रा का स्वामी मंगल स्वाति का राहु तथा विशाखा का स्वामी गुरु माना जाता है।
आपके जन्म समय में तुला राशि उदित हो रही थी जिसका स्वामी शुक्र है।सामान्यतया तुला राशि में उत्पन्न जातक सुन्दर एवं दर्शनीय होते हैं तथा उनका व्यक्तित्व भी आकर्षक होता है जिससे अन्य लोग उनसे प्रभावित रहते हैं। उनकी प्रवृत्ति हास्यप्रिय होती है तथा बच्चों के प्रति इनके मन में प्रबल स्नेह का भाव विद्यमान रहता है। सुन्दर दृश्यों एवं वस्तुओं के प्रति भी इनमें आकर्षण रहता है। स्वाभाविक रूप से ये अन्य जनों को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं देते हैं तथा सबके साथ समानता का व्यवहार करते हैं जिससे समाज में ये सम्मानित, प्रतिष्ठित तथा
प्रसिद्ध रहते हैं। कला के प्रति इनका भावनात्मक लगाव रहता है तथा अच्छे कार्यों से ये अपनी आजीविका अर्जित करते हैं। नीति ज्ञान में ये चतुर होते हैं अतः राजनीति के क्षेत्र में इनको नेतृत्व प्राप्त हो जाता है परन्तु इनका कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं होता तथा समयानुसार ये परिवर्तन करते हैं। अतः इसके प्रभाव से आपका शारीरिक सौष्ठव व्यक्तित्व आकर्षक होगा तथा
अन्य जनों को प्रभावित करने में समर्थ होंगे। आपकी प्रवृत्ति हास्यप्रिय होगी तथा गम्भीरता आपको विशेष अच्छी नहीं लगेगी। बच्चों के प्रति आपके मन में स्नेह का भाव रहेगा तथा प्राकृतिक दृश्यों के प्रति आपके मन में आकर्षण रहेगा। साथ ही कला से आपका भावनात्मक संबंध रहेगा। आप सभी लोगों से समानता का व्यवहार करेंगे तथा आपके मन में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रहेगा। अपने कार्यक्षेत्र में आपका प्रभाव रहेगा तथा आपके अधिकारी एवं सहयोगी आपसे प्रसन्न तथा संतुष्ट रहेंगे। आप किसी नवीन सिद्धान्त या ग्रंथ की भी रचना कर सकते हैं जिससे आपको यश की प्राप्ति होगी।
इस नक्षत्र चरणों के नामाक्षर इस प्रकार हैं।रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते।
तुला राशि एवं लग्न सम्पूर्ण परिचय
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तुला लग्नोदये जातः सुधी: सत्कर्मजीविक:।
विद्वान सर्वकलाभिज्ञो धनाढ्यों जनपूजितः।।
गुणाधिकत्वाद द्रविणोप्लब्धि वाणिज्य कर्म व्याति नै पुणत्वम।
पदमालय तन्नीलये न लोला लग्न चेत्सकुलावतं स:।।
अर्थात तुला लग्न (राशि) में उत्पन्न जातक बुद्धिमान अच्छे कर्मों से आजीविका उपार्जन करने वाला विद्वान अनेक कलाओं में निपुण धनी व्यवहार कुशल तथा कुल में श्रेष्ठ होता है।
राशि चक्र में तुला सातवी राशि है। भचक्र में इस राशि का विस्तार 180 डिग्री अंश से 210 डिग्री अंश तक है। इस राशि का अधिपति स्वामी ग्रह शुक्र है। जो सौर मंडल में सर्वाधिक चमकने वाला आकाशीय पिंड है। आकाश मंडल में तुला राशि कन्या राशि से दक्षिण पूर्वी भाग में है तथा राशि का निवास (संबंध) वस्ती / नाभि के नीचे आसपास गुर्दो एवं मूत्राशय है। इस राशि के अंतर्गत चित्रा नक्षत्र के अंतिम दो पाद, स्वाति के चारों पाद, तथा विशाखा के प्रथम तीन पाद आते हैं। चित्रा का स्वामी मंगल स्वाति का राहु तथा विशाखा का स्वामी गुरु माना जाता है।
इस नक्षत्र चरणों के नामाक्षर इस प्रकार हैं।
रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते।
लग्न एवं लग्नेश के अतिरिक्त जन्म एवं नाम राशि व उसके नक्षत्र स्वामी का भी जातक के जीवन पर विशेष प्रभाव रहता है।
इसके अतिरिक्त किसी जातक के जन्म समय का लग्न स्पष्ट जिस नक्षत्र के अनुसार (पाद) चरण पर होता है। उस नक्षत्र भाग के स्वामी के अनुरूप भी जातक के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। यद्यपि राशि स्वामी या लग्नेश शुक्र का प्रभाव ग्रह स्थिति के अनुसार रहता ही है। इसके अतिरिक्त जातक के लग्न संबंधित होरा, द्रेष्काण, नवमांश, त्रिशांश, आदि षडवर्ग कुंडलियों का विश्लेषण कर लेने से जातक के व्यक्तित्व माता-पिता भाई-बहन स्त्री संतान आदि सुखों के संबंध में और अधिक क्षमता एवं स्पष्टता आ जाती है। उदाहरणत: यदि किसी जातक का जन्म तुला लग्न 3 अंश पर हो उसका प्रथम द्रेष्काण तुला का ही होगा तथा द्रे० कु० में यदि शुक्र चंद्र शनि आदि स्त्रीकारक ग्रहों में परस्पर संबंध हो तो जातक को प्रथम बहन का सुख अवश्य होगा। इसी भांति नवांश में भी प्रथम तुला का ही नवांश होने से नवांश लग्न वर्गोत्तम राशि का माना जाएगा जो कि विवाह के बाद सुंदर स्त्री धन लाभ व भाग्य उन्नतिनाड़ी सुखों में वृद्धिकारक होगा। अस्तु इसी भांति अन्य वर्ग कुंडलियों का विश्लेषण करना चाहिए।
तुला राशि के अन्य पर्यायवाची नाम👉
तौली, वणिक, तुलाधर, पण्याजीव, युक इत्यादि उर्दू में मेजान तथा अंग्रेजी में लिब्रा (libra) कहते हैं।
तुला राशि सौंदर्य एवं संतुलन की राशि है। आकाश मंडल में इसका स्वरूप श्वेत वस्त्र धारी पुरुष के हाथ में तराजू धारण किए हुए एक श्वेत वस्त्र धारी पुरुष की भांति है। इसकी स्थिति कन्या राशि के दक्षिण-पूर्वी भाग में है। तुला न्याय प्रिय राशि मानी जाती है। क्योंकि इसका चिन्ह निशान तराजू है। जो कि न्याय का प्रतीक है। यह बृहतकाय राशि, पुल्लिंग,( पुरुष जाति) चरसंज्ञक, वायु तत्व प्रधान, युवावस्था वाली, नीलवर्ण, क्रूर लेकिन विचारशील स्वभाव, दिन में बलि, रजोगुणी, त्रिधातु प्रकृति, विषम संख्या, शूद्र जाति (मतांतर में वैश्य जाति) अल्प सीमित संतान, शीर्षोदय एवं पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। शनि तुला राशि में 20 अंश पर परमोच्च तथा सूर्य इस राशि पर परम नीच अवस्था में माना जाता है। शुक्र इस राशि पर 1 से 10 अंश तक मूल त्रिकोण तथा 10 अंश से 30 अंश तक स्वराशिगत माना जाता है। निरयण सूर्य गोचर प्रतिवर्ष 17 अक्टूबर से 15 नवंबर के मध्य इस राशि में संचार करता है। फलित ज्योतिष अनुसार तुला राशि सूर्य की नीच राशि मानी जाती है अर्थात इस समय अवधि में तुला राशि पर शुभ विकर्णीय प्रभाव नहीं पड़ते।
तुला राशि के गुण एवं सामान्य विशेषताएं
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👉 तुला न्याय एवं अनुशासनप्रिय राशि है। क्योंकि इसका चिन्ह समभाग में रखा हुआ तराजू है। जो कि न्याय का प्रतीक है। यह सौंदर्य न्याय एवं संतुलन की राशि मानी जाती है। जातक सौम्य एवं हंसमुख मिलनसार, शांतिप्रिय, वैश्य जाति होने से व्यवहार कुशल, लेनदेन में स्पष्ट एवं इमानदार, सतर्क एवं मध्यस्थता के कार्य में निपुण होगा, चर एवं वायु तत्व राशि होने से संवेदनशील, भावुक परंतु दयालु परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला, स्त्री वर्ग, सिनेमा, संगीत, अभिनय आदि कलाओं में विशेष रुचि होगी। यह राशि न्याय नीति धर्म एवं स्मृति आदि शास्त्रों का भी प्रतिनिधित्व करती है।
तुला राशि-लग्न प्रमुख विशेषताएं
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शारीरिक संरचना एवं व्यक्तित्त्व👉
तुला लग्न में जन्म लेने वाला जातक सुंदर एवं श्वेतवर्ण, मध्यम या ऊंचा कद, शुक्र की स्थिति अनुसार कुछ लंबा एवं कुछ लंबाई लिए हुए सुंदर आयताकार चेहरा, संतुलित शरीर रचना, भूरि या नीली आंखें, तीखे नयन नक्श तथा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होगा अधिक आयु में भी युवा दिखाई देने वाला चेहरा होगा, बाल्यकाल में प्रायः दुबला किन्तु दृढ़ अस्थि एवं पुष्ट होगा तथा आयु वृद्धि के साथ-साथ संतुलित एवं स्वस्थ शरीर तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा। तुला जातक प्रायः हंसमुख तथा दूसरों के मनोभावों को समझने तथा अपने विचार भी समझाने में कुशल होते हैं।
स्वभावगत चारित्रिक विशेषताएं👉
तुला लग्न में उत्पन्न जातक सौंदर्य प्रिय, न्यायशील, शांतिप्रिय, ईमानदार, विचारशील, तीव्र बुद्धिमान, धर्म परायण, विनम्र, प्रियभाषी, स्पष्ट वादी एवं बातचीत करने में कुशल होगा। कुंडली में शुक्र के साथ चंद्र बुध एवं शनि ग्रह भी शुभस्थ हो तो जातक कल्पनाशील आदर्श एवं आशावादी दृष्टिकोण, उच्च अभिलाषी, अपने पहनावे एवं रहन सहन के प्रति विशेष सावधान, दयालु और उदार हृदय, परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला कुछ खर्चीले स्वभाव का भ्रमण प्रिय संगीत कलाकारों एवं साहित्यिक रुचियों के बावजूद क्रय विक्रय एवं तर्क वितर्क करने में कुशल होते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे मनुष्यों के मनोभावों को जान लेने में भी कुशल होते हैं। किसी अन्य व्यक्ति विशेष कर महिला वर्ग के साथ व्यवहार करते समय शिष्टता एवम् शालीनता को नहीं भूलते। नए नए संपर्क एवं मित्र बनाने में भी कुशल होते हैं। मानसिक एवं काल्पनिक शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य में लगा रहे पूरे मनोयोग के साथ लगा रहेगा। परंतु अपने विचार या कार्य योजना में परिवर्तन करने में भी शीघ्र तैयार हो जाता है। तुला प्रधान व्यक्ति किसी प्रकार के अनुचित दबाव को सहन नहीं कर सकता। स्वच्छंद प्रकृति होती है। कुछ विषयों में लापरवाह होने पर भी अपने उद्देश्य एवं स्वास्थ्य के प्रति सतर्क एवं सावधान रहेगा ।चंद्र गुरु व शुक्र यदि चर राशि में हो तो जातक को देश-विदेश अनेक स्थानों में भ्रमण करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
सामान्यतः तुला लग्न के जातक न्याय एवं मध्यस्ता के कार्य करने में निपुण, सच्चाई पसंद, लोकप्रिय, उदार हृदय, परोपकारी, दान देने की प्रवृत्ति, पराक्रमी, वाहन व अन्य सुख साधनों के शौकीन, देवी देवताओं और ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाले, स्त्रियों से संबंध बनाने में कुशल तथा निजी पराक्रम वह कुशल युक्तियों द्वारा धन संपदा का अर्जन करने वाले होते हैं।
इनमें भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों का विशेष संतुलन रहता है। चंद्र, बुध, शुक्र एवं गुरु के प्रभाव से जातक उच्च अभिलाषी, मिलनसार, भ्रमनप्रिय एवं नए-नए मैत्री संबंध बनाने में कुशल होता है। उसमें नेतृत्व करने की योग्यता तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ संबंध तथा प्रत्येक विषय व गुण दोष के आधार पर शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता, दूरदर्शी, विवेकशील, उच्चादर्श, दृढ़ संकल्प तथा प्रत्येक स्थिति का पूर्वानुमान लगाने में कुशल होते हैं।
स्वास्थ्य और रोग👉
लग्नेश शुक्र यदि बली होकर शुभस्थ हो तो तुला लग्न वाले जातकों का स्वास्थ्य प्राय अच्छा रहता है। जीवन में क्रियाशील चुस्त, व्यस्त, सक्रिय एवं युवा बने रहने की चेष्टा करते रहते हैं। तुला जातक संयमित भोजन एवं नियमित व्यायाम करते रहे तो बहुत कम रुग्ण होते हैं। तथा दीर्घायु होते हैं। परंतु यदि कुंडली में गुरु, शुक्र, शनि, मंगल ग्रह पापाक्रांत या अशुभ हो तो इनके शरीर में असंतुलन तथा स्वास्थ्य बिगड़ जाने की संभावना जल्दी होती है। इस स्थिति में तुला लग्न जातक को पेट विकार, स्नायु रोग, प्रमेह, अपेंडिक्स, मानसिक थकान, मधुमेह, गुर्दे के रोग, पथरी, पेट गैस, वीर्य विकार, गुप्त रोगों का भय रहता है। तुला लग्न में सूर्य एवं मंगल अशुभ हो तो सिरवेदना, मस्तिष्क एवं नेत्र रोग, नाक कान व गले के रोग या उच्च निम्न आदि अव्यवस्थित रक्तचाप संबंधित रोगों की आशंका होती है।
सावधानी👉
तुला लग्न के जातकों को अत्यधिक भोग और विलासिता से बचना चाहिए। इन्हें अत्यधिक कामुकता, शराब, मांस आदि तामसिक वस्तुओं के प्रयोग से भी परहेज करना चाहिए। सुखी जीवन जीने के लिए प्रत्येक क्षेत्र में संयम एवं संतुलन अत्यंत लाभदायक होंगे। ध्यान और ईश्वर भक्ति विशेष सहायक होगी।
तुला लग्न जातको की शिक्षा, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति
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तुला लग्न जातको की शिक्षा
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तुला लग्न के जातक की कुंडली में पंचम भाव बली हो तथा पंचमेश शनि भाग्येश बुध एवं लग्नेश शुक्र आदि ग्रहो का (स्थान दृष्टि आदि से) शुभ संबंध बना हो तो जातक उच्च व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाता है। पंचम भाव में शनि को छोड़कर कोई अन्य पाप ग्रह जैसे राहु-केतु मँगल आदी हो तो उच्च विद्या प्राप्ति में विघ्न बाधाएं होती हैं। परंतु यदि जातक को ग्रह दशा एवं अंतर्दशा किसी शुभ व योगकारक ग्रह की लगी हो तो अड़चनों के बावजूद जातक उच्च व्यावसायिक विद्या प्राप्त करने में सफल होता है।
व्यवसाय और आर्थिक स्थिति👉 तुला लग्न जातकों की स्वतंत्रता प्रिय सृजनात्मक एवं कलात्मक अभिरुचि होने के कारण यह चिरकाल तक किसी की अधीनता स्वीकार नहीं कर पाते। नौकरी की अपेक्षा अपने निजी व्यवसाय में अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। जन्म कुंडली में शुक्र शनि बुध एवं चंद्र आदि ग्रह शुभ भावस्थ अथवा शुभ या योग कारक ग्रहो द्वारा देखे जा रहे हो तो जातक निम्नलिखित व्यवसायों में विशेष कामयाब एवं लाभान्वित होते हैं👉 प्राध्यापक, वकील, न्यायाधीश, क्रय विक्रय व्यापार, कवि,संगीतकार, गायक, अभिनय, कलाकार, डॉक्टर, राजनीतिज्ञ, बैंकिंग, भवन निर्माण, लोह, कलपुर्जे, टेलीविजन, लेडीस गारमेंट, फैशन डिजाइनिंग, वस्त्र विक्रेता, बेकरी, मिठाई, होटल, फर्नीचर डीलर, आर्किटेक्ट (आंतरिक सज्जा) औषधि विक्रेता, नौसेना कर्मचारी, आइसक्रीम आदि फास्ट फूड, स्टेशनरी, मोटर आदि के स्पेयर पार्ट्स कंप्यूटर या कंप्यूटर से संबंधित काम, फोटोग्राफी, प्लास्टिक उद्योग खिलौने इत्यादि से संबंधित व्यवसाय में विशेष उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। किसी जातक की कुंडली में दशम या दशमेश ग्रह अथवा उनसे संबंधित जो ग्रह बैठे हो उसके अनुसार ही जातक को व्यवसाय में लाभ होता है। जैसे सूर्य बली हो तो जातक को सरकारी क्षेत्र में विशेष लाभ होगा।
आर्थिक स्थिति
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तुला लग्न के जातक की आर्थिक स्थिति मुख्यतः चंद्र, मंगल, शुक्र, शनि, रवि ल, बुध आदि ग्रहों की शुभ -अशुभ स्थिति पर निर्भर करती है. यदि तुला जातक की कुंडली में शनि, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध एवं शुक्र शुभ या योगकारक स्थिति में हो तो व्यवसाय द्वारा अच्छा धन अर्जन करते हैं। दो या अधिक ग्रहों में दृष्टि योग आदि का संबंध बना हो तो जातक निजी पुरुषार्थ के अतिरिक्त भाग्यवश एक से अधिक धन प्राप्ति के साधन प्राप्त करता है। विशेषकर सूर्य, मंगल एवं बुध ग्रह से संबंध हो तो धन आगमन में पारंपरिक पैतृक योगदान विशेषकर प्रमुख होता है।
शनि शुभस्थ (स्वक्षेत्रीय उच्चस्थ) हो तो जातक अपने बुद्धि कौशल एवं गुप्त युक्तियों से धनार्जन करने में कुशल होता है। भूमि, मकान, वाहन आदि के सुख भी प्राप्त होते हैं। तुला लग्न में मंगल भी स्वक्षेत्रीय उच्चस्थ हो तो विवाह के बाद धन एवं संपदा में विशेष लाभ व उन्नति होती है। सामान्यतः अनुभव में यही आया है कि तुला लग्न में जातक कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिश्रम निष्ठा एवं समायोजित योजना से निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त कर ही लेते हैं। तथा जल्द ही अपने परिवार के लिए सुंदर एवं अन्य वस्तुएं खरीदने के लिए उदारतापूर्वक खर्च भी कर देते हैं। तुला जातक सीमित साधनों में भी रहीसी ढंग से खर्च करने में नहीं हिचकिचाते हैं।
तुला लग्न जातको का पारिवारिक जीवन एवं प्रेम संबंध
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तुला लग्न के जातक के जीवन में प्रेम और सौंदर्य का विशेष महत्व होता है। अपने स्वच्छंद व्यवहार सहज मुस्कान एवं वाकपटुता के कारण पुरुष मित्रों के साथ साथ महिला मित्रों में भी आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। चाहे किसी आयु में हो अपने मित्रों से संबंध बनाए रखते हैं। यदि शुक्र मंगल की राशि में हो अथवा मंगल के साथ हो तो उस स्थिति में सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ कर भी अपनी इच्छा के अनुसार जीवन साथी का चयन करते हैं। कहीं अनैतिक संबंध भी हो सकते हैं। परंतु प्रेम संबंध चिरस्थाई नहीं रह पाते। अशुभ योगों के कारण कई बार तंबाकू शराब आदि व्यसनों के भी शिकार हो जाते हैं।
शुभ राशि जातक एवं उपयुक्त जीवन साथी👉
इसके लिए मैत्री चक्र के अतिरिक्त तत्व दृष्टि से भी विचार करना चाहिए। तुला राशि या लग्न को मेष, मिथुन, तुला एवं कुंभ राशि वालों के साथ वैवाहिक या व्यवसायिक संबंध शुभ एवं लाभदायक रहते हैं। वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि के साथ मिश्रित अर्थात मध्यम फली। जबकि सिंह व मीन राशि वालों के साथ षडाष्टक दोष होने से लाभदायक एवं शुभ नहीं होता। इसके अतिरिक्त मेलापक संबंधित गुण आदि अन्य नियमों पर भी विचार कर लेना चाहिए।
गृहस्थ जीवन👉 तुला जातक प्रेम संबंधों में प्रायः चंचल स्वच्छंद प्रकृति एवं उन्मुक्त व्यवहार में विश्वास करते हैं। परंतु विवाहोपरांत यदि (उपयुक्त जीवन साथी हो) उनके जीवन में विशेष परिवर्तन देखे गए हैं। विशेषकर बच्चों की पैदाइश के पश्चात उनकी प्रकृति में विशेष सुधारात्मक परिवर्तन होते हैं। अपने परिवार एवं गृहस्थ जीवन के प्रति पूरे इमानदार एवं समर्पित होते हैं। अपने परिवार को जीवन उपयोगी सभी प्रकार की सुख सुविधाएं देने के लिए जीवन koपर्यंत कठोर परिश्रम करते हैं। पंचमेश शनि के कारण संतान अल्प अथवा सीमित संख्या में होती है।
तुला लग्न की जातिकाये
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तुला लग्न राशि में उत्पन्न होने वाली लड़की का ऊंचा कद, सुंदर मुख और आयताकार आकृति कुछ लंबाई लिए हुए संतुलित खूबसूरत एवं आकर्षक शरीर रचना वाली होती है। नयन नक्श तीखे तथा अधिक आयु में भी प्रायः युवा दिखने वाली होती है। बाल्यकाल में कुछ दुबली किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य में सुधार होता है। राशि स्वामी शुक्र शुभस्थ हो तो तुला राशि जातिका विनम्र स्वभाव सहज मुस्कान लिए हुए हंसमुख मिलनसार, नए नए मित्र बनाने में कुशल, बुद्धिमान, न्याय प्रिय, व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, स्वाभिमानी एवं उत्साह शील प्रकृति की होगी। इसके अतिरिक्त सौंदर्य एवं कलात्मक अभिरुचिययो से युक्त अपने रहन-सहन के तरीके, उचित पहरावे एवं खानपान के प्रति विशेष सतर्क होगी। सौंदर्य एवं सजावट के प्रसाधनों श्रृंगार एवं कलात्मक वस्तुओं के संग्रह करने का शौक रखती है।
तुला जातिका स्वभावतः प्रिय भाषी, दयालु, उदार, परोपकारी, सामाजिक कार्य कलापों में सक्रिय होती है। किसी भी विषय पर गंभीर सोच विचार के उपरांत ही अंतिम निर्णय लेती है। कुंडली में यदि चंद्र शुक्र अथवा मंगल शुक्र का योग हो तथा उन पर गुरु की भी दृष्टि हो तो जातिका उच्च शिक्षित होती है। इन्हें साहित्य, लेखन, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि ललित कलाओं की ओर भी विशेष अभिरुचि होती है। व्यवसायिक तौर पर इनके द्वारा लाभ भी प्राप्त होता है।
शुक्र के कारण तुला जातिका की कल्पना शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य क्षेत्र में लगी रहे जब तक पूरे मनोयोग से और मजबूत दिल से करेगी। परंतु अपने विचार और योजना में भी परिस्थिति अनुसार परिवर्तन करने को तैयार हो जाती हैं। वैसे स्वभाव वश परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखती है। तुला जातिका सामान्यतः वर्तमान में जीने का विश्वास रखती है। बाधाओं के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाती है। मंगल यदि शुभस्थ हो अथवा चंद्र शुक्र का योग हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो उच्च शिक्षा के पश्चात प्राध्यापक या अर्धसरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त कर लेती है
गृहस्थ जीवन👉 तुला जाति का प्रेम संबंधों एवं विवाह आदि के संबंध में स्वतंत्र विचार रखती हैं। यद्यपि माता पिता की आशा के विरुद्ध आचरण भी कम ही करती देखी गई है। विवाह के पश्चात अपने पति को गृहस्थी एवं व्यवसाय में अच्छा सहयोग प्रदान करती हैं। ग्रह की सजावट, सुंदर वस्त्र, उच्च स्तरीय सवारी, बड़ा सुंदर मकान, आदि की विशेष अभिलाषी होती हैं। परंतु अपने पति के प्रति वफादार एवं निष्ठावान रहती हैं। तुला जातिका के बच्चे सीमित संख्या में होते हैं। सप्तम भाव में यदि राहु केतु शनि सूर्य आदि अशुभ ग्रह हो या उनकी अशुभ दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन के सुख में कमी रहती है।
उपयुक्त जीवन साथी👉 तुला जातिका (राशि या लग्न) को मेष, मिथुन, तुला व कुंभ राशि वालों के साथ वैवाहिक संबंध शुभ एवं उत्तम। वृश्चिक, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर राशि लग्न वालों के साथ मध्यम फली तथा सिंह व मीन राशि वालों के साथ शुभ फल ही नहीं होंगे। यद्यपि इस संबंध में कुंडली मिलान संबंधी नियमों का भी अनुसरण करना चाहिए।
उपयुक्त व्यवसाय👉 तुला लग्न जातिका अपनी रुचि के अनुसार ही व्यवसाय में भी कलात्मक परिवर्तन लाने के प्रयास करती रहती है। तुला जातिका को फैशन डिजाइनिंग, कंप्यूटर, ब्यूटी पार्लर, सिलाई कढ़ाई, शिल्पकारी, मॉडलिंग, गृह साज सज्जा, रेडीमेड वस्त्र विक्रेता, गायन, अभिनय, प्राध्यापक, वकालत, न्यायाधीश, बैंकिंग, सिनेमा, टेलीविजन, होटल, रेस्टोरेंट, फोटोग्राफी, खिलौनों आदि से संबंधित कार्यों में विशेष सफलता प्राप्ति के अवसर मिलते हैं।
तुला लग्न में दशान्तर्दशा का फल एवं अन्य शुभाशुभ ज्ञान
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तुला लग्न में उत्पन्न जातक-जातिका को शुक्र, शनि, चंद्र (यदि कुंडली में शुभ हो) तो अपनी दशा अंतर्दशा में शुभ फल प्रदान करेंगे। शनि अपनी दशा या भुक्ति में भूमि सवारी का सुख, विद्या या कंपटीशन में सफलता, संतान सुख, तकनीकी विद्या में कामयाबी दिलाएगा, चंद्रमा और शुक्र अपनी दशाओं में कार्य व्यवसाय या नौकरी में लाभ व उन्नति, माता एवं स्त्री का सुख, सौंदर्य प्रसाधन या सवारी आदि अन्य सुख साधनों की प्राप्ति के साथ उन पर खर्च भी कराएंगे। कुंडली में यदि शनि, चंद्र या शुक्र अशुभ हो तो उपरोक्त सुखों से विघ्न उत्पन्न होंगे।
मंगल की दशा में👉 कुछ परेशानियों एवं विघ्नों के पश्चात धन लाभ तथा पारिवारिक सुख प्राप्त होगा। तुला लग्न में मंगल धनेश एवं मारकेश भी होने से इस दशा में दुर्घटना से चोट अथवा रक्त विकार आदि से शरीर कष्ट का भय होता है। बुध की दशा में भाग्य में कुछ सुखद परिवर्तन होने की संभावना होती है। परंतु इस दशा में विभिन्न स्थानों पर यात्रा एवं फिजूलखर्ची भी अधिक होती है।
गुरु की दशा 👉 चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव में स्थित गुरु अशुभ फल तथा अन्य भावो में प्राय: शुभ फल प्रदान करता है।
राहु-केतु 👉 तुला लग्न में अपनी स्थिति एवं ग्रहयोग अनुसार फल प्रदान करते है।
तुला लग्न संबंधित अन्य शुभाशुभ ज्ञान एवं उपाय
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शुभ रंग👉 श्वेत हल्का नीला काला गुलाबी रंग अनुकूल रहेंगे हरे और पीले रंग के प्रयोग से बचें
शुभ नग (रत्न)👉 सवा रत्ती का हीरा प्लेटिनम या चांदी की अंगूठी में शुक्रवार को अथवा किसी शुभ योग में पंडित जी के परामर्श अनुसार शुभ मुहूर्त पर निम्नलिखित मंत्र का कम से कम 16 बार पाठ करके धारण करना लाभदायक रहता है।
मंत्र 👉 ॐ द्रां द्रीं दौं सः शुक्राय नमः।
इस दिन श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करके ब्राह्मण दंपत्ति का तथा पांच कन्याओं का पूजन करके उन्हें चांदी, श्वेत वस्त्र, फल, बर्फी, दूध, दही, चावल आदि का दान करना शुभ एवं कल्याणकारी होगा।
यदि तुला लग्न में किसी जातिका की जन्म राशि या नाम राशि धनु हो तो वैवाहिक सुख में वृद्धि के लिए श्वेत पुखराज भी धारण करवाया जा सकता है।
धन लाभ एवं वैवाहिक सुख के लिए मंगलवार का व्रत रखना तथा उस दिन गाय को मीठी रोटियां डालना शुभ होगा। कुंडली में सूर्य अशुभ हो तो रविवार का व्रत रखना तथा सूर्य भगवान को प्रतिदिन विशेष कर रविवार के दिन ॐ घृणि सूर्याय नमः मंत्र द्वारा तांबे के पात्र में जल लेकर तीन बार अर्घ देना शुभ रहता है।
शुभ दिन👉 रविवार, सोमवार, मंगलवार, शुक्रवार तथा शनिवार शुभ होंगे बुधवार मिश्रित प्रभाव देगा जबकि गुरुवार अशुभ फलप्रद रहेगा।
शुभ अंक👉 3,4,5,7 मध्यमफली 8 अशुभ अंक 2,6,9 ।
भाग्यशाली वर्ष👉 16, 27, 28, 32, 34, 35, 39, 40, 41 ,42 वे वर्ष।
सावधानी👉 तुला लग्न राशि के जातक जातकों को अत्यधिक भावुकता, भोग विलासिता, और उतावलेपन की प्रवृत्ति का यथासंभव त्याग करना चाहिए। बाह्यमुखी प्रवृतियों के कारण आप विशेष परेशान एवं अशांत रह सकते हैं। बनावट श्रृंगार कीमती वस्तु सवारी आदि सुख साधनों तथा मानक व्यसनों पर वृथा खर्चों से बचें। सात्विक एवं संतुलित भोजन करना आपके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा।
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"शतहस्त समाहर सहस्रहस्त से किर ।
कृतस्य कार्यस्य चेह स्फाति समावह ॥"
(अथर्ववेद ३ । २५ । ५)
सौ हाथों की सहायता से द्रव्य धान्यादि का संग्रह करो।
अर्थात् खूब परिश्रम करके धनार्जन करना चाहिये।
हजार हाथों वाला हो कर अर्जित द्रव्यादिकों को विखेरो ।
अर्थात् उदारता पूर्वक खुले हाथों खूब दान करना चाहिये।
स्वार्जित धन के दान का क्या फल होता है ?
इसे मंत्र की दूसरी पंक्ति में बताया गया है। इस शरीर से दान के कार्य का परिणाम है- द्रव्यस्फीति / धनवृद्धि की संप्राप्ति [ समावह] ।
इस मंत्र का आशय है, देने से वृद्धि ही वृद्धि होती है, क्षयन वा अभाव नहीं। श्री पं. जी इतना देते हैं, फिर भी उनकी थैली रिक्त नहीं होती है। वेद वचन सत्य है। इस सत्यता में जिसे संदेह हो वह सीधे सत्यसदनम् आ कर देखे।
यहाँ इस मंत्र की सत्यता साकार होकर विराजती है। अब मैं श्री पं. जी की सेवा में ज्योतिष जगत् की झलाकियों का पिटारा खोलता हूँ। राशि चक्र में सप्तम राशि तुला है। इसके विषय में यह श्लोक है...
"वीथ्यां 'तुला पण्यधरो मनुष्यः स्थितः सनाभिकटिवस्ति देशे।
शुक्तार्थवी थ्यापणपट्टताध्व
साथ विधातोऽत्र न सस्य भूमिः ॥ "
[गली बाजार में तराजू से तौलता हुआ मनुष्य बैठा है। यही तुलाराशि का स्वरूप है। नाभि साहित कटि वस्ति स्थान की यह प्रतीक है। अर्थ के निमित्त बनियों की कतार (पंक्ति) में असस्य भूमि में इसका वास है। शुक्त =मदिरा, संयुक्त, एकाकी पता-रेशमी वस्त्र ।अध्व= मार्ग, सड़क।
वास्तव में दुलाराशि कालपुरुष का उपस्थ है। मूत्र उत्सर्जन, वीर्य उत्सर्जन, आर्तवस्थान, मैथुन स्थान ही मुख्य रूप से तुला राशि है। लिंग/योनि संबंधी समस्त बातों का विचार तुला राशि से किया जाता है। नाभि से चार अंगुल नीचे के स्थान के पश्चात् उपस्थ तथा गुदा के मध्य भाग पर्यन्त इस राशि का विस्तार है। इस भाग में बृहदान्त्र, मूत्राशय, जननेन्द्रिय, अण्डकोश की गणना होती है। स्पष्टता के लिये यह रेखाचित्र देखें(चित्र निचे संलग्न है)।
तुला के शीलगुण- यह चर राशि द्विपद है। इसका निवास स्थान बाजार है। दीर्घ आकार है। पुरुष, क्रूर, रुक्ष कान्ति तथा कृष्ण वर्ण है। वायु तत्व, शीर्षोदय तथा पाद जल है। यह लग्न स्थान बली, पश्चिम दिशा बली तथा दिवाबली है। धातु कारक, खनिज पदार्थ, सुदृढ़ पुष्टता तथा मध्यम सन्तान है। इसकी सकारात्मक सत्ता है। यह नि: शब्द, सम प्रकृति, रजोगुणी है। यह शूद्र वर्ण, विषम राशि है। दूत संबंध, पितामह उप संबंध का इससे विचार होता है। यह द्वार राशि है। इसका स्वामी शुक्र है। आग्न्येय ओर इसका प्लवत्व है। प्रश्न लग्न में इसके होने से धन चिन्ता का ज्ञान होता है।
यह राशि चक्र में १८१° से २१०° तक विस्तृत है।
उपस्थ इसका उदयमान २ घण्टा १६ मिनट है।
इसका मृत्युप्रद चन्द्रांश ४ है। अर्थात् तुला के ४° का चन्द्रमा मृत्युप्रद होता है।
इसका प्राकृतिक स्वभाव विचारशील, ज्ञानप्रिय ज्ञान सम्पादक तथा राजनीतिज्ञ है।
तुल धातु जिसका अर्थ बराबरी करना / समकक्ष रखना है, से तुला शब्द बना है।
तुल (तोलति, तोलयति-ते) + अड़् + टाप्= तुला।
इसका रुढ अर्थ तराजू है।
तुला कहते हैं, मूला प्रकृति को। तुला का पर्याय है तुलसी तुलसी एक पौधा विशेष है। विष्णुपत्नी का नाम तुलसी है। यद्यपि तुला राशि पुरुष संज्ञक है, किन्तु तुला शब्द स्त्री लिंग है। इस लिये तुला राशि को प्राकृतिक कुण्डली में जाया स्थान मिला है। वेद में जिसे ईशा कहा गया है सांख्य शास्त्र में जिसे मूला प्रकृति कहा गया है तथा पुराणों में जिसे देवी लक्ष्मी गौरी सरस्वती काली आदि कहा गया है, वही तुला (तुलसी) है।
तुल और तुला दोनों शब्द एक से हैं। तुल सदृश जो हो वह तुल-सी है। तुल-सी= तुलसी= तुला । इस प्रकार तुला राशि में स्त्री और पुरुष दोनों तत्व विद्यमान हैं। पुरुष की कुण्डली में तुलाराशि भार्या/जाया की प्रतीक है। स्त्री की कुण्डली में तुलाराशि भर्ता / पति की प्रतीक है। कुण्डली में तुला राशि तथा तुला का स्वामी शुक्र पाप प्रभाव में है तो विवाह से संबंधित सुख की हानि होगी। शुक्र वीर्य है। शुक्र स्त्री है। वीर्य निर्बल है तो वैवाहिक सुख नहीं। शुक्र निर्बल हो तो स्त्री सुखी नहीं। ७ की संख्या सप्तम भाव की भी प्रतीक है। अतः विवाह के लिये सप्तम स्थान की राशि तथा सप्तमेश का विचार किया जाता है। गुरु और शुक्र दोनों ग्रह एक ही जाति के हैं। इनमें से एक पुरुष है तो दूसरा स्त्री। अतः गुरु से पति का तथा शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है गुरु पति का कारक है तथा शुक्र पत्नी का कारक है। परन्तु सप्तम भाव काम सुख वा विवाह का कारक केवल शुक्र है। यह तथ्य ध्यातव्य है।
तुला तराजू है। तराजू से क्रय विक्रय किया जाता है। तुला राशि की स्थिति से जातक के वाणिज्य व्यवसाय का पता लगता है। सप्तम भाव भी साझा व्यापार से संबंध रखता है। विवाह भी साझा है, स्त्री पुरुष के सुखका। सप्तम भाव से यह जाना जाता है कि पुरुष-स्त्री परस्पर भोग सुख कितना लेते-देते हैं। तुला शुक्र की राशि है। शुक्र सांसारिक प्रपची यह है। यह भोग विलास काम वासना, सुख-सौन्दर्य प्रियता, तीक्ष्ण बुद्धि एवं सुकुमारता का प्रतिनिधि ग्रह है। इसलिये तुला राशि से इन सब बातों का पता लगाया जाता है।
सातवीं राशि तुला काल पुरुष का चिद् स्थान है। चेतना (कुण्डलिनी शक्ति) यहाँ सोई हुई रहती है। यह शक्ति उपस्थस्थानीय है। इसके जागने से उपस्थ उत्तेजित होता है, काम बीज अंकुरित होता है। यह आनन्ददा है।
योग शास्त्र वेत्ता कहते हैं। कि कुण्डलिनी शक्ति उस सर्पिणी के समान है जो अपने शरीर को साढ़े तीन (३.१/२) चक्कर करके पूँछ को मुंह में लिये शंखाकार हुई उपस्थ से दो अंगुल नीचे के स्थान में स्थित हो कर सुप्तावस्था में पड़ी रहती है। यह जब जागती है तो सीधी हो कर सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश करती है। इससे जातक (योगी) में अद्भुत सामर्थ्य का प्रकाश फैलता है। यह शक्ति मूलाधार चक्र से होती हुई शिरस्थ सहस्रार चक्र तक पहुँच कर योगी को अमित सामर्थ्य युक्त कर देती है। यह शक्ति स्त्री और पुरुष में समान रूप से रहती है।
३.१/२ चक्र पुरुष में +३.१/२ चक्र स्त्री में = ७ चक्र = तुलाराशि।
इस ७ चक्र के पूर्णत्व के लिये स्त्री और पुरुष परस्पर आकर्षित होते हैं संगम करते हैं/ युक्त होते हैं।
इसके लिये अग्नि के समक्ष उसके चारों ओर ७ परिक्रमा का प्राविधान है।
७ फेरे होने पर ही दोनों को विवाहित माना जाता है।
७ की संख्या कामानन्द की बोधक है। यह व्यापक है। इसलिये विष्णु है।
विष्णु को सप्तजिह्नः सप्तवाहनः तथा सप्तैधाः कहा गया है (विष्णु सहस्रनाम्नि)। अग्वेद में, सप्ताश्वः सप्तश्वसा सप्तहोता सप्तास्यः सप्तरश्मि सप्तसिन्धून सप्तशीर्षाण सप्तनामा सप्तचक्र सप्तर्षि के प्रयोग से ७ की संख्या का महत्व प्रतिपादित होता है।
तुलादान से सभी ग्रहों की शांति होती है। अश्वत्थ का, ज्योति का, देव प्रतिमा का तीर्थ स्थान का ७ चक्कर लगाने से अनिष्टों की शांति होती है। भगवान् सूर्य को सप्तसप्तिर्मरीचिमान् कहा गया है (आदित्य हृदय स्तोत्रम्) ।
तुला राशि के २० अंश तक शनि उच्च का होता है।
तुला राशि के १० अंश तक सूर्य नीच का होता है।
तुला राशि, शुक्र की मूल त्रिकोण राशि है। तुला के १५° अंश तक शुक्र मूलत्रिकोण है तथा इसके बाद १६° से ३०° तक स्वक्षेत्री है।
अब विभिन्न भावों में तुला राशि के होने से क्या फल होता है ? अब इसका विवेचन करता हूँ। तुला = ७|
१. लग्न में ७-कफ युक्त, सत्यवादी, स्त्रियों में सतत अनुसक्ति, राजमान, देवाराधन में तत्पर, न्याय प्रिय, भोग परायण, कोमल किन्तु स्थिर मति ।
२. धन में ७- सत्य में प्रतिष्ठित रहते हुए न्याय मार्ग से धन का संचयन, व्यापार बुद्धि एवं चातुर्य से धनार्जन, सौन्दर्य प्रसाधन एवं सजावट की वस्तुओं के क्रय विक्रय से धनागम।
३. सहज में ७- अनुजों की अभिवृद्धि, सौन्दर्य प्रधान लेखन-चित्रण, दीर्घ बाहु, कठोर शारीरिक श्रम से विरति स्वार्थी मित्रों का बाहुल्य, उत्साही अदीर्घ पर्यमाण, न्यायवादी लेने देने वाणिज्य व्यवसाय में सत्यनिष्ठा का अवलम्बन, विश्वसनीय।
४. सुख में ७- सौम्य सरल प्रकृति, शुभ कार्यों में दक्ष, विनीत, विद्यावान, सुख के साधनों की सरलता से प्राप्ति, सुखी, प्रसन्नचित्त, वाहन सेवक, भार्या की अनुकूलता।
५. सन्तान में ७- संसार में सफलतापूर्वक विचरण करने वाली बुद्धि, रूपवान् शीलवान् क्रियावान् सुन्दर नेत्रों वाले अनेकों पुत्रों की प्राप्ति, व्यापारिक, कार्यों में बुद्धि की विशेष गति मन्त्र कुशल।
६. शत्रु में धन के कारण भाई बन्धुओं से वैर, न्यायशीलता के कारण स्वजनों से शत्रुता, धन होते हुए भी धर्म संबंधी शुभ कार्यों में अचिन्त्य व्यवधान, वातकफ से बाहुशूल।
७. जाया में ७ गुणवती सुरूपवती चञ्चला अंगनाओं के संबंध की सुखानुभूति, भार्या सहित धर्म में प्रवृत्ति, अत्यन्त नम्रता पूर्ण व्यवहार, पुण्य कार्यों में लोगों से सहयोग, न्यायपूर्ण कार्यों से यश की प्राप्ति, क्षमाशील, उपेक्षा बुद्धि से निर्वैरता, इन्द्रिय तृप्तता तथा अनेक पुत्रों की प्राप्ति ।
८. आय में ७-किसी मनुष्य के प्रहार से वाणिज्य व्यवसाय में बड़ा घाटा होने से, दिवाला निकल जाने से, कफ के प्रकोप से, चलते फिरते घर से बाहर द्वार आदि स्थान पर मृत्यु ।
९. धर्म में ७- न्यायविद् न्यायमूर्ति धर्मशील धर्मात्मा धर्मध्वजी देवता ब्राह्मणों की प्रसन्नता के लिये शुभ कर्मों का अनुष्ठान आचारशील प्रतापी दानी यशस्वी तथा सबके द्वारा प्रशंस्य जीवनचर्या ।
१०. कर्म में ७- वाणिज्य के कार्य को बहुतायत से करने वाला, व्यवहार में, लेन-देन में न्याय बुद्धि से काम करने वाला, राज कार्य में रुचि, धर्म रूप मति से अपने कर्म में सफलता प्राप्त करने वाला तथा सज्जन प्रिय।
११. लाभ में ७- विभिन्न प्रकार के विचित्र उपायों से व्यापार में लाभ। स्त्रियों को व्यापार में प्रयुक्त करने से लाभ, साजसज्जा, प्रसाधन सामग्री, सुगंधित द्रव्यों, कोमल वस्तुओं के क्रय विक्रय से लाभ साधु सन्तों की सेवा करने से लाभ अभिनयादि कार्यों द्वारा लाभ।
१२. हानि में ७ देवता ब्राह्मण का सेवक, श्रुति स्मृति के अनुकूल धर्म के कार्यों के सम्पादन में व्यय करने वाला, धार्मिक संस्थाओं को दान देने वाला, मंदिर देवस्थानों के निर्माण एवं पुनरुद्धार पर व्यय करने वाला, दक्षिणादि से वित्रों को सन्तुष्ट करने वाला।
तुलाराशि में विभिन्न ग्रहों के चार से जो फल होता है, अब उसका वर्णन कर रहा हूँ।
१. ७ में सूर्य- तुला राशि में सूर्य नीच का होता है। इस लिये अच्छा फल नहीं देता। राज्य की ओर से लाभ नहीं मिलता। इसमें राजा वा पिता से प्रीति एवं भय, पाप कर्म में प्रवृत्ति, कलहकारी मन, अनुचित प्रयत्न, पर काम में रति, मद्य व्यवसाय, दुस्साहस, धनाभाव, हतकाम, पाखण्डी, यात्रा प्रिय ।
२. ७ में चन्द्रमा अनेक स्त्रियों में अनुरक्ति तथा यथावसर उनका उपभोग, पराक्रमी, दानशील, देवद्विज पूजक, सम्पन्न, प्रतिष्ठित, वाहनों के क्रयविक्रय में रुचि, सुन्दर सवारी का प्रयोग, स्त्री के वश में रहने वाला, यायावर, रुग्ण, क्षीण, किन्तु दीर्घ काया, कुटुम्बी, भोग सामग्री पर व्यय करने वाला, बन्धुओं से परित्यक्त, न्याय बुद्धि से काम करने वाला, प्रगतिशील।
३. ७ में मंगल- अधिक क्रियाशील, आवेशशील, आय से अधिक खर्च करने वाला, सदा भ्रूण में डूबा हुआ, स्त्री के वश में रहने वाला, स्त्री के निमित्त दुःख पाने वाला, स्त्री पर धन लुटाने वाला, परस्त्रीगामी, वेश्याओं के द्वारा धन कमाने वाला, वेश्यालय खोल कर उससे आजीविका चलाने वाला, परगृह वासी, अनीतिपूर्ण आचरण करने वाला, बुद्धि का दुरुपयोग करने वाला।
४. ७ में बुध-मिष्ट भाषी, व्ययशील, कलाविद्, शिल्पज्ञ, विनोदी, प्रहसनप्रिय, अभिनय प्रवीण, तुर्यत्रिक, गायन वादन नर्तन में प्रीति, बहुत बोलने वाला, अनेक व्यसनों में आसक्त, काम क्रीडा कुशल, येन केन प्रकारेण सुन्दरियों को अपने जाल में फैसा कर उनका उपयोग करने वाला, बैग, मिथ्या भाषण एवं मिथ्या चरण में सतत लीन, मेधावी, दानी, कार्य कुशल, चोर, कपटी, नास्तिक, ईर्ष्यालु, दरिद्री, जगह-जगह भटकने वाला ।
५. ७ में बृहस्पति-सद्गुणों का आगार, विप्र ब्राह्मण सेवी, ऐश्वर्यवान् गौरवशील, प्राचीन परम्पराओं के प्रति सजग, आर्षवाक्यों में निष्ठा, शास्त्रों का अध्येता एवं तदनुरूप आचरण करने वाला, काम शास्त्र में प्रवीण, धर्म युक्त काम का सेवन करने वाला जप होम एवं अनुष्ठानों में तत्पर रहने वाला, पौराणिक, वेद, दानी, चतुर, पुत्रवान्। प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्ग के बीच से हो कर चलने वाला पुष्ट काया, स्वस्थ मन, अपगामी, नेतृत्वशील, अपराजित।
६. ७ में शुक्र तुलाराशि शुक्र की स्वगृह एवं मूलत्रिकोण राशि है। इसलिये इसमें शुक्र उत्तम फल देता है। ऐसा जातक सुन्दर वस्त्रों का प्रेमी, सुन्दर वाहन से युक्त, श्रेष्ठ भवन में निवास करने वाला, सेवकों से युक्त, सुगंधित पुष्पों के उद्यान में भ्रमण करने वाला, सुन्दरियों के सुख का आस्वादन करने वाला, देश देशान्तरों में भ्रमण करने वाला, केलियात्री, कवि, काव्यप्रेमी, सौन्दर्य के चित्रण में पटु, लक्ष्मीवान् सुन्दर भाव से युक्त, अल्प शत्रुओं वाला, स्वीजित, सुन्दर सुगठित शरीर, सुन्दरायत नेत्र, मनोहर चाल, राजपूज्य, अपने बन्धुओं में गण्यमान्य समाज में प्रसिद्ध, निर्भय, अपनी इच्छाओं को नीतिमार्ग से पूर्ण करने में स्वयं समर्थ तथा धार्मिक मर्यादित ।
७. ७ में शनिश्चर- तुला, शनि की उच्च राशि है। इसलिये इसमें शनि शुभफल प्रदान करता है। तुला राशि शनि के मित्र शुक्र की राशि है। इसलिये शनि इसमें सब अच्छा फल करता है। ऐसा जातक अपने कुल में दीपक सदृश शोभित होता है। वह बलशाली होता है। यद्यपि जातक दुबला पतला होता है। किन्तु भीतर से बली होता है जातक अपने क्षेत्र में प्रख्यात, अपने ग्राम वा समूह में प्रभुत्व सम्पन्न, समाज में प्रतिष्ठित, जन सेवा के कार्यों में रुचि लेने वाला, धनवान् एवं अल्प कामी होता है।
८. ७ में राहु-विधर्मियों के सम्पर्क से वाणिज्य व्यवसाय में सफलतापूर्वक आगे बढ़ने वाला, न्याय अन्याय का बिना विचार किये वाणिज्य में उन्नति करने वाला, अपने काम को साधने में हर निन्द्य उपाय का अवलम्बन करने वाला, स्त्री सुख से वञ्चित, कुख्यात अख्यात जीवन यापन करने वाला।
९. ७ में केतु- दूषित काम वृत्ति, कुटिल व्यवहार, लोगों को अपने जाल में फँसा कर उनका शोषण करने वाला अभिनय में पटू वक्र बुद्धि कौशल से दूसरों को नीचा दिखाने वाला, उन्नतिशील महत्वाकांक्षी प्रपची कूटनीतिज्ञ ।
तुला राशि सुख देने वाली राशि है। काम सुख संसार का सबसे बड़ा सुख है। यह सुख तुला राशि तथा उसके स्वामी शुक्र के अधीन है। संसार की सबसे बड़ी शक्ति कुण्डलिनी शक्ति है। यह भी तुला राशि में सन्निहित है। काल पुरुष का यौन स्थान तुला राशि है। यौन जन्य समस्त अनुभूतियाँ तुला राशि देती है। तुला न्याय की प्रतीक है। तुलाराशि न्यायकारी है। तुलाराशि जिस भाव में होती है, उसभाव की अनुभूति न्यायपूर्ण ढंग से होती है।
तुलाराशि उपस्थेन्द्रिय है। इसके दूषित होने पर / पाप प्रभाव में होने पर यौन रोग होते हैं, यौन लोलुपता आती है, यौनांग निर्बल होता है। इस राशि के दूषित न होने पर वा शुभ प्रभाव में होने पर यौनांग पुष्ट और निरोग होते हैं, यौन संबंधों में मर्यादा रखी जाती है, यौनानन्द की प्रचुर अनुभूति होती है। तुला राशि से सुख तौला जाता है, जैसे तुला से बाँट रख कर धान्यादि पदार्थ तौले जाते हैं। सत्संग का सुख भी तुला सेवा तुलाराशि से तौला जाता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं...
'तात सर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिल, जो सुख लव सतसंग ॥"
(रा.च.मा.। )
क्षण भर के सतसंग सुख को तुला के एक पलड़े पर तथा भुर्भुवः आदि सात लोकों एवं मोक्ष के समस्त सुख को मिला कर दूसरे पलड़े पर रखा जाय तो भी वह पहले पलड़े के सुख की बराबरी नहीं कर सकता। यह है, सत्संग का माहात्म्य ।
लग्न एवं लग्नेश के अतिरिक्त जन्म एवं नाम राशि व उसके नक्षत्र स्वामी का भी जातक के जीवन पर विशेष प्रभाव रहता है।
इसके अतिरिक्त किसी जातक के जन्म समय का लग्न स्पष्ट जिस नक्षत्र के अनुसार (पाद) चरण पर होता है। उस नक्षत्र भाग के स्वामी के अनुरूप भी जातक के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। यद्यपि राशि स्वामी या लग्नेश शुक्र का प्रभाव ग्रह स्थिति के अनुसार रहता ही है। इसके अतिरिक्त जातक के लग्न संबंधित होरा, द्रेष्काण, नवमांश, त्रिशांश, आदि षडवर्ग कुंडलियों का विश्लेषण कर लेने से जातक के व्यक्तित्व माता-पिता भाई-बहन स्त्री संतान आदि सुखों के संबंध में और अधिक क्षमता एवं स्पष्टता आ जाती है। उदाहरणत: यदि किसी जातक का जन्म तुला लग्न 3 अंश पर हो उसका प्रथम द्रेष्काण तुला का ही होगा तथा द्रे० कु० में यदि शुक्र चंद्र शनि आदि स्त्रीकारक ग्रहों में परस्पर संबंध हो तो जातक को प्रथम बहन का सुख अवश्य होगा। इसी भांति नवांश में भी प्रथम तुला का ही नवांश होने से नवांश लग्न वर्गोत्तम राशि का माना जाएगा जो कि विवाह के बाद सुंदर स्त्री धन लाभ व भाग्य उन्नतिनाड़ी सुखों में वृद्धिकारक होगा। अस्तु इसी भांति अन्य वर्ग कुंडलियों का विश्लेषण करना चाहिए।
तुला राशि के अन्य पर्यायवाची नाम👉
तौली, वणिक, तुलाधर, पण्याजीव, युक इत्यादि उर्दू में मेजान तथा अंग्रेजी में लिब्रा (libra) कहते हैं।
तुला राशि सौंदर्य एवं संतुलन की राशि है। आकाश मंडल में इसका स्वरूप श्वेत वस्त्र धारी पुरुष के हाथ में तराजू धारण किए हुए एक श्वेत वस्त्र धारी पुरुष की भांति है। इसकी स्थिति कन्या राशि के दक्षिण-पूर्वी भाग में है। तुला न्याय प्रिय राशि मानी जाती है। क्योंकि इसका चिन्ह निशान तराजू है। जो कि न्याय का प्रतीक है। यह बृहतकाय राशि, पुल्लिंग,( पुरुष जाति) चरसंज्ञक, वायु तत्व प्रधान, युवावस्था वाली, नीलवर्ण, क्रूर लेकिन विचारशील स्वभाव, दिन में बलि, रजोगुणी, त्रिधातु प्रकृति, विषम संख्या, शूद्र जाति (मतांतर में वैश्य जाति) अल्प सीमित संतान, शीर्षोदय एवं पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। शनि तुला राशि में 20 अंश पर परमोच्च तथा सूर्य इस राशि पर परम नीच अवस्था में माना जाता है। शुक्र इस राशि पर 1 से 10 अंश तक मूल त्रिकोण तथा 10 अंश से 30 अंश तक स्वराशिगत माना जाता है। निरयण सूर्य गोचर प्रतिवर्ष 17 अक्टूबर से 15 नवंबर के मध्य इस राशि में संचार करता है। फलित ज्योतिष अनुसार तुला राशि सूर्य की नीच राशि मानी जाती है अर्थात इस समय अवधि में तुला राशि पर शुभ विकर्णीय प्रभाव नहीं पड़ते। तुला लग्न में जान लेने वाले जातकों की रूचि न्याय एवं अनुशासन के प्रति अधिक होता है। ऐसे जातक राजनीती में अधिक सफल होते हैं। ये परोपकार अपने हानि लाभ को पूरा ध्यान में रखकर ही करते हैं। गरीबों में भोजन बांटना, अतिथि सेवा सत्कार करना एवं पानी के पियाऊ व बाग बागीचे आदि लगवाना इनके चर्या में शामिल होता हैं। साधन विहीन होने पर भी, इनके लक्ष्य सदा ऊंचे ही रहते हैं। ऐसे जातकों की कल्पना शक्ति बहुत तीव्र होती है। इनका भाग्योदय 23, 32, 33 या 35 वें वर्ष में होता है।
तुला लग्न में जन्म लेने वाले जातकों का वर्ण गौर, कद मझोला एवं चेहरा सुन्दर होता है। इनका मुख चौड़ा होता है, नाक बड़ा आकार लिए हुए होती है एवं छाती उन्नत व चौड़ी होती है। ऐसे जातक सदैव प्रसन्नचित्त एवं मुस्कुराते रहते हैं। ये जिसको दिल से एक बार मित्र मान लेते हैं, उसके लिए सर्वस्व न्यौछावर तक कर देते हैं।
ऐसे जातक प्रायः धार्मिक विचारों से ओत प्रोत होते हैं। परिस्थितियों के अनुरूप स्वमं को ढालना इन्हे बखूबी आता है। दूसरे के मन की बात ये आसानी से जान लेते हैं किंतु अपने मन की बात किसी को नहीं देते। ये जातक उचित एवं शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता रखते है। छोटी छोटी बातें भी इनके मन मस्तिष्क में हलचल पैदा कर देती हैं।
इनका हृदय विशाल एवं शीघ्र ही द्रवित हो जाने वाला होता है। इनके सुविचारों एवं सुकर्मों को देखते हुए इन्हे सच्चे मायनों में पुण्यात्मा एवं सत्यवादी की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। शुक्र गृह के प्रभाव के कारण ये बड़ी आयु में भी युवा स्वरुप दिखते हैं।
स्वास्थ्य - तुला लग्न के प्रति
तुला राशि के अधिकांश लोगों में संवेदनशील त्वचा पाई जाती है जो अनिद्रा, अच्छे भोजन भोजन और शराब के अत्यधिक सेवन के कारण होती हैं। इस राशि वालो के लोगों में पीठ के निचले हिस्से और अंडाशय के निचले हिस्से में दर्द, और बहुत अधिक जैसी समस्याएं होती है जो अत्यधिक श्क्कर और भारी भोजन के कारण होता है।
स्वभाव और व्यक्तित्व - तुला लग्न के प्रति
तुला लग्न लोगों सहयोग और समझौता करने में रूचि रखते है और उन्हें जब लगता है कि यह सही है तो वे बिना बहस के उसे स्वीकार करना भी पसंद करते हैं। दूसरों से असहमति से उनमें असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। वे जिंदगी में सदभावना के लिए लालायित रहते है और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। इस राशि के लोग अविश्वासी, संकोची, दिनचर्या के प्रति असहज, रूढिवादी और शर्मीले स्वाभाव के होते हैं। उनमें जल्द क्रोध नहीं आता लेकिन वे जल्द उग्र होने की संभावना प्रबल होती है। वे यथार्थवाद के बजाय आदर्शवादी होते हैं और कभी- कभी ऐसी योजना बनाते हैं जो हवा में महल बनाने के समान होता है। क्या सही है और क्या गलत इसके बारे में ऐसे लोगों की राय बिल्कुल स्पष्ट होती है। तुला लग्न के लोग आम तौर पर शांतिप्रिय प्रकृति के; और किसी काम को आसान तरीके से करने वाले माना जाता है। वे देखने में आकर्षक होते हैं। वे बहुत सामाजिक प्रवति के होते हैं जिससे उन्हें काफी खुशी मिलती है।
शारीरिक रूप - तुला लग्न के प्रति
तुला लग्न लोग विविध और विशिष्ट होते हैं, उनकी शारीरिक बनावट खासकर होंठ और ललाट से आत्मविश्वास दिखता हैं। इनके बारे में आम धारणा होती है कि ये कम ऊचाई वाले होते हैं, और काफी चालाक प्रवृति के होते हैं। इस राशि की महिलाएं काफी आकर्षक होती हैं जबकि पुरूष भी काफी जोशीले होंते हैं। इस राशि के लोगों की ऊचाई औसत या इससे अधिक होती है।
तुला राशि के गुण एवं सामान्य विशेषताएं
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👉 तुला न्याय एवं अनुशासनप्रिय राशि है। क्योंकि इसका चिन्ह समभाग में रखा हुआ तराजू है। जो कि न्याय का प्रतीक है। यह सौंदर्य न्याय एवं संतुलन की राशि मानी जाती है। जातक सौम्य एवं हंसमुख मिलनसार, शांतिप्रिय, वैश्य जाति होने से व्यवहार कुशल, लेनदेन में स्पष्ट एवं इमानदार, सतर्क एवं मध्यस्थता के कार्य में निपुण होगा, चर एवं वायु तत्व राशि होने से संवेदनशील, भावुक परंतु दयालु परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला, स्त्री वर्ग, सिनेमा, संगीत, अभिनय आदि कलाओं में विशेष रुचि होगी। यह राशि न्याय नीति धर्म एवं स्मृति आदि शास्त्रों का भी प्रतिनिधित्व करती है।
तुला राशि-लग्न प्रमुख विशेषताएं
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शारीरिक संरचना एवं व्यक्तित्त्व👉
तुला लग्न में जन्म लेने वाला जातक सुंदर एवं श्वेतवर्ण, मध्यम या ऊंचा कद, शुक्र की स्थिति अनुसार कुछ लंबा एवं कुछ लंबाई लिए हुए सुंदर आयताकार चेहरा, संतुलित शरीर रचना, भूरि या नीली आंखें, तीखे नयन नक्श तथा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होगा अधिक आयु में भी युवा दिखाई देने वाला चेहरा होगा, बाल्यकाल में प्रायः दुबला किन्तु दृढ़ अस्थि एवं पुष्ट होगा तथा आयु वृद्धि के साथ-साथ संतुलित एवं स्वस्थ शरीर तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा। तुला जातक प्रायः हंसमुख तथा दूसरों के मनोभावों को समझने तथा अपने विचार भी समझाने में कुशल होते हैं।
स्वभावगत चारित्रिक विशेषताएं👉
तुला लग्न में उत्पन्न जातक सौंदर्य प्रिय, न्यायशील, शांतिप्रिय, ईमानदार, विचारशील, तीव्र बुद्धिमान, धर्म परायण, विनम्र, प्रियभाषी, स्पष्ट वादी एवं बातचीत करने में कुशल होगा। कुंडली में शुक्र के साथ चंद्र बुध एवं शनि ग्रह भी शुभस्थ हो तो जातक कल्पनाशील आदर्श एवं आशावादी दृष्टिकोण, उच्च अभिलाषी, अपने पहनावे एवं रहन सहन के प्रति विशेष सावधान, दयालु और उदार हृदय, परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला कुछ खर्चीले स्वभाव का भ्रमण प्रिय संगीत कलाकारों एवं साहित्यिक रुचियों के बावजूद क्रय विक्रय एवं तर्क वितर्क करने में कुशल होते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे मनुष्यों के मनोभावों को जान लेने में भी कुशल होते हैं। किसी अन्य व्यक्ति विशेष कर महिला वर्ग के साथ व्यवहार करते समय शिष्टता एवम् शालीनता को नहीं भूलते। नए नए संपर्क एवं मित्र बनाने में भी कुशल होते हैं। मानसिक एवं काल्पनिक शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य में लगा रहे पूरे मनोयोग के साथ लगा रहेगा। परंतु अपने विचार या कार्य योजना में परिवर्तन करने में भी शीघ्र तैयार हो जाता है। तुला प्रधान व्यक्ति किसी प्रकार के अनुचित दबाव को सहन नहीं कर सकता। स्वच्छंद प्रकृति होती है। कुछ विषयों में लापरवाह होने पर भी अपने उद्देश्य एवं स्वास्थ्य के प्रति सतर्क एवं सावधान रहेगा ।चंद्र गुरु व शुक्र यदि चर राशि में हो तो जातक को देश-विदेश अनेक स्थानों में भ्रमण करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
सामान्यतः तुला लग्न के जातक न्याय एवं मध्यस्ता के कार्य करने में निपुण, सच्चाई पसंद, लोकप्रिय, उदार हृदय, परोपकारी, दान देने की प्रवृत्ति, पराक्रमी, वाहन व अन्य सुख साधनों के शौकीन, देवी देवताओं और ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाले, स्त्रियों से संबंध बनाने में कुशल तथा निजी पराक्रम वह कुशल युक्तियों द्वारा धन संपदा का अर्जन करने वाले होते हैं।
इनमें भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों का विशेष संतुलन रहता है। चंद्र, बुध, शुक्र एवं गुरु के प्रभाव से जातक उच्च अभिलाषी, मिलनसार, भ्रमनप्रिय एवं नए-नए मैत्री संबंध बनाने में कुशल होता है। उसमें नेतृत्व करने की योग्यता तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ संबंध तथा प्रत्येक विषय व गुण दोष के आधार पर शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता, दूरदर्शी, विवेकशील, उच्चादर्श, दृढ़ संकल्प तथा प्रत्येक स्थिति का पूर्वानुमान लगाने में कुशल होते हैं।
स्वास्थ्य और रोग👉
लग्नेश शुक्र यदि बली होकर शुभस्थ हो तो तुला लग्न वाले जातकों का स्वास्थ्य प्राय अच्छा रहता है। जीवन में क्रियाशील चुस्त, व्यस्त, सक्रिय एवं युवा बने रहने की चेष्टा करते रहते हैं। तुला जातक संयमित भोजन एवं नियमित व्यायाम करते रहे तो बहुत कम रुग्ण होते हैं। तथा दीर्घायु होते हैं। परंतु यदि कुंडली में गुरु, शुक्र, शनि, मंगल ग्रह पापाक्रांत या अशुभ हो तो इनके शरीर में असंतुलन तथा स्वास्थ्य बिगड़ जाने की संभावना जल्दी होती है। इस स्थिति में तुला लग्न जातक को पेट विकार, स्नायु रोग, प्रमेह, अपेंडिक्स, मानसिक थकान, मधुमेह, गुर्दे के रोग, पथरी, पेट गैस, वीर्य विकार, गुप्त रोगों का भय रहता है। तुला लग्न में सूर्य एवं मंगल अशुभ हो तो सिरवेदना, मस्तिष्क एवं नेत्र रोग, नाक कान व गले के रोग या उच्च निम्न आदि अव्यवस्थित रक्तचाप संबंधित रोगों की आशंका होती है।
सावधानी👉
तुला लग्न के जातकों को अत्यधिक भोग और विलासिता से बचना चाहिए। इन्हें अत्यधिक कामुकता, शराब, मांस आदि तामसिक वस्तुओं के प्रयोग से भी परहेज करना चाहिए। सुखी जीवन जीने के लिए प्रत्येक क्षेत्र में संयम एवं संतुलन अत्यंत लाभदायक होंगे। ध्यान और ईश्वर भक्ति विशेष सहायक होगी।
तुला लग्न जातको की शिक्षा, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति
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तुला लग्न जातको की शिक्षा
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तुला लग्न के जातक की कुंडली में पंचम भाव बली हो तथा पंचमेश शनि भाग्येश बुध एवं लग्नेश शुक्र आदि ग्रहो का (स्थान दृष्टि आदि से) शुभ संबंध बना हो तो जातक उच्च व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाता है। पंचम भाव में शनि को छोड़कर कोई अन्य पाप ग्रह जैसे राहु-केतु मँगल आदी हो तो उच्च विद्या प्राप्ति में विघ्न बाधाएं होती हैं। परंतु यदि जातक को ग्रह दशा एवं अंतर्दशा किसी शुभ व योगकारक ग्रह की लगी हो तो अड़चनों के बावजूद जातक उच्च व्यावसायिक विद्या प्राप्त करने में सफल होता है।
व्यवसाय और आर्थिक स्थिति👉 तुला लग्न जातकों की स्वतंत्रता प्रिय सृजनात्मक एवं कलात्मक अभिरुचि होने के कारण यह चिरकाल तक किसी की अधीनता स्वीकार नहीं कर पाते। नौकरी की अपेक्षा अपने निजी व्यवसाय में अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। जन्म कुंडली में शुक्र शनि बुध एवं चंद्र आदि ग्रह शुभ भावस्थ अथवा शुभ या योग कारक ग्रहो द्वारा देखे जा रहे हो तो जातक निम्नलिखित व्यवसायों में विशेष कामयाब एवं लाभान्वित होते हैं👉 प्राध्यापक, वकील, न्यायाधीश, क्रय विक्रय व्यापार, कवि,संगीतकार, गायक, अभिनय, कलाकार, डॉक्टर, राजनीतिज्ञ, बैंकिंग, भवन निर्माण, लोह, कलपुर्जे, टेलीविजन, लेडीस गारमेंट, फैशन डिजाइनिंग, वस्त्र विक्रेता, बेकरी, मिठाई, होटल, फर्नीचर डीलर, आर्किटेक्ट (आंतरिक सज्जा) औषधि विक्रेता, नौसेना कर्मचारी, आइसक्रीम आदि फास्ट फूड, स्टेशनरी, मोटर आदि के स्पेयर पार्ट्स कंप्यूटर या कंप्यूटर से संबंधित काम, फोटोग्राफी, प्लास्टिक उद्योग खिलौने इत्यादि से संबंधित व्यवसाय में विशेष उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। किसी जातक की कुंडली में दशम या दशमेश ग्रह अथवा उनसे संबंधित जो ग्रह बैठे हो उसके अनुसार ही जातक को व्यवसाय में लाभ होता है। जैसे सूर्य बली हो तो जातक को सरकारी क्षेत्र में विशेष लाभ होगा।
आर्थिक स्थिति
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तुला लग्न के जातक की आर्थिक स्थिति मुख्यतः चंद्र, मंगल, शुक्र, शनि, रवि ल, बुध आदि ग्रहों की शुभ -अशुभ स्थिति पर निर्भर करती है. यदि तुला जातक की कुंडली में शनि, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध एवं शुक्र शुभ या योगकारक स्थिति में हो तो व्यवसाय द्वारा अच्छा धन अर्जन करते हैं। दो या अधिक ग्रहों में दृष्टि योग आदि का संबंध बना हो तो जातक निजी पुरुषार्थ के अतिरिक्त भाग्यवश एक से अधिक धन प्राप्ति के साधन प्राप्त करता है। विशेषकर सूर्य, मंगल एवं बुध ग्रह से संबंध हो तो धन आगमन में पारंपरिक पैतृक योगदान विशेषकर प्रमुख होता है।
शनि शुभस्थ (स्वक्षेत्रीय उच्चस्थ) हो तो जातक अपने बुद्धि कौशल एवं गुप्त युक्तियों से धनार्जन करने में कुशल होता है। भूमि, मकान, वाहन आदि के सुख भी प्राप्त होते हैं। तुला लग्न में मंगल भी स्वक्षेत्रीय उच्चस्थ हो तो विवाह के बाद धन एवं संपदा में विशेष लाभ व उन्नति होती है। सामान्यतः अनुभव में यही आया है कि तुला लग्न में जातक कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिश्रम निष्ठा एवं समायोजित योजना से निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त कर ही लेते हैं। तथा जल्द ही अपने परिवार के लिए सुंदर एवं अन्य वस्तुएं खरीदने के लिए उदारतापूर्वक खर्च भी कर देते हैं। तुला जातक सीमित साधनों में भी रहीसी ढंग से खर्च करने में नहीं हिचकिचाते हैं।
तुला लग्न जातको का पारिवारिक जीवन एवं प्रेम संबंध
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तुला लग्न के जातक के जीवन में प्रेम और सौंदर्य का विशेष महत्व होता है। अपने स्वच्छंद व्यवहार सहज मुस्कान एवं वाकपटुता के कारण पुरुष मित्रों के साथ साथ महिला मित्रों में भी आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। चाहे किसी आयु में हो अपने मित्रों से संबंध बनाए रखते हैं। यदि शुक्र मंगल की राशि में हो अथवा मंगल के साथ हो तो उस स्थिति में सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ कर भी अपनी इच्छा के अनुसार जीवन साथी का चयन करते हैं। कहीं अनैतिक संबंध भी हो सकते हैं। परंतु प्रेम संबंध चिरस्थाई नहीं रह पाते। अशुभ योगों के कारण कई बार तंबाकू शराब आदि व्यसनों के भी शिकार हो जाते हैं।
शुभ राशि जातक एवं उपयुक्त जीवन साथी👉
इसके लिए मैत्री चक्र के अतिरिक्त तत्व दृष्टि से भी विचार करना चाहिए। तुला राशि या लग्न को मेष, मिथुन, तुला एवं कुंभ राशि वालों के साथ वैवाहिक या व्यवसायिक संबंध शुभ एवं लाभदायक रहते हैं। वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि के साथ मिश्रित अर्थात मध्यम फली। जबकि सिंह व मीन राशि वालों के साथ षडाष्टक दोष होने से लाभदायक एवं शुभ नहीं होता। इसके अतिरिक्त मेलापक संबंधित गुण आदि अन्य नियमों पर भी विचार कर लेना चाहिए।
गृहस्थ जीवन👉 तुला जातक प्रेम संबंधों में प्रायः चंचल स्वच्छंद प्रकृति एवं उन्मुक्त व्यवहार में विश्वास करते हैं। परंतु विवाहोपरांत यदि (उपयुक्त जीवन साथी हो) उनके जीवन में विशेष परिवर्तन देखे गए हैं। विशेषकर बच्चों की पैदाइश के पश्चात उनकी प्रकृति में विशेष सुधारात्मक परिवर्तन होते हैं। अपने परिवार एवं गृहस्थ जीवन के प्रति पूरे इमानदार एवं समर्पित होते हैं। अपने परिवार को जीवन उपयोगी सभी प्रकार की सुख सुविधाएं देने के लिए जीवन koपर्यंत कठोर परिश्रम करते हैं। पंचमेश शनि के कारण संतान अल्प अथवा सीमित संख्या में होती है।
तुला लग्न की जातिकाये
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तुलालग्न स्त्री जातक
इस लग्न में जन्मी कन्या वैसे तो काफी सुंदर होती है होना स्वाभाविक है। वह चंचल स्वभाव की होगी, माता-पिता आदि गुरुजनों की भवत परन्तु गर्दन कुछ छोटी होगी। उपकार को मानने वाली धर्मशीला। वर्ष पर्यन्त तीर्थयात्रा करने वाली दर्शनीय स्थानों को देखने की इच्छुक और कुल के अनुसार अच्छे धन वाली होती है। बचपन से ही यह प्रिय वचन बोलने में कुशल होती है। उसके मस्तक पर प्रायः तिल होता है। शरीर में कभी-कभी दर्द बना रहता है। इसके लिए हर शनिवार शुभ होता है। साथी कम व शत्रु अधिक होते हैं। प्रकृति पित्त की होती है। संतान अधिक होती है। वर्ष 2 में अग्नि, 8वें जल भय रहता है। वर्ष 15, 18, 22 में कष्ट होते हैं। उम्र लम्बी होती है। 70 से ऊपर जा सकती है। जातक की मृत्यु किसी प्रियजन के वियोग का आघात लगने से या ज्यादा उपवास व्रतों से कफ द्वारा होती है।तुला लग्न राशि में उत्पन्न होने वाली लड़की का ऊंचा कद, सुंदर मुख और आयताकार आकृति कुछ लंबाई लिए हुए संतुलित खूबसूरत एवं आकर्षक शरीर रचना वाली होती है। नयन नक्श तीखे तथा अधिक आयु में भी प्रायः युवा दिखने वाली होती है। बाल्यकाल में कुछ दुबली किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य में सुधार होता है। राशि स्वामी शुक्र शुभस्थ हो तो तुला राशि जातिका विनम्र स्वभाव सहज मुस्कान लिए हुए हंसमुख मिलनसार, नए नए मित्र बनाने में कुशल, बुद्धिमान, न्याय प्रिय, व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, स्वाभिमानी एवं उत्साह शील प्रकृति की होगी। इसके अतिरिक्त सौंदर्य एवं कलात्मक अभिरुचिययो से युक्त अपने रहन-सहन के तरीके, उचित पहरावे एवं खानपान के प्रति विशेष सतर्क होगी। सौंदर्य एवं सजावट के प्रसाधनों श्रृंगार एवं कलात्मक वस्तुओं के संग्रह करने का शौक रखती है।
तुला जातिका स्वभावतः प्रिय भाषी, दयालु, उदार, परोपकारी, सामाजिक कार्य कलापों में सक्रिय होती है। किसी भी विषय पर गंभीर सोच विचार के उपरांत ही अंतिम निर्णय लेती है। कुंडली में यदि चंद्र शुक्र अथवा मंगल शुक्र का योग हो तथा उन पर गुरु की भी दृष्टि हो तो जातिका उच्च शिक्षित होती है। इन्हें साहित्य, लेखन, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि ललित कलाओं की ओर भी विशेष अभिरुचि होती है। व्यवसायिक तौर पर इनके द्वारा लाभ भी प्राप्त होता है।
शुक्र के कारण तुला जातिका की कल्पना शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य क्षेत्र में लगी रहे जब तक पूरे मनोयोग से और मजबूत दिल से करेगी। परंतु अपने विचार और योजना में भी परिस्थिति अनुसार परिवर्तन करने को तैयार हो जाती हैं। वैसे स्वभाव वश परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखती है। तुला जातिका सामान्यतः वर्तमान में जीने का विश्वास रखती है। बाधाओं के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाती है। मंगल यदि शुभस्थ हो अथवा चंद्र शुक्र का योग हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो उच्च शिक्षा के पश्चात प्राध्यापक या अर्धसरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त कर लेती है
तुला लग्न की जातिकाये
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तुला लग्न राशि में उत्पन्न होने वाली लड़की का ऊंचा कद, सुंदर मुख और आयताकार आकृति कुछ लंबाई लिए हुए संतुलित खूबसूरत एवं आकर्षक शरीर रचना वाली होती है। नयन नक्श तीखे तथा अधिक आयु में भी प्रायः युवा दिखने वाली होती है। बाल्यकाल में कुछ दुबली किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य में सुधार होता है। राशि स्वामी शुक्र शुभस्थ हो तो तुला राशि जातिका विनम्र स्वभाव सहज मुस्कान लिए हुए हंसमुख मिलनसार, नए नए मित्र बनाने में कुशल, बुद्धिमान, न्याय प्रिय, व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, स्वाभिमानी एवं उत्साह शील प्रकृति की होगी। इसके अतिरिक्त सौंदर्य एवं कलात्मक अभिरुचिययो से युक्त अपने रहन-सहन के तरीके, उचित पहरावे एवं खानपान के प्रति विशेष सतर्क होगी। सौंदर्य एवं सजावट के प्रसाधनों श्रृंगार एवं कलात्मक वस्तुओं के संग्रह करने का शौक रखती है।
तुला जातिका स्वभावतः प्रिय भाषी, दयालु, उदार, परोपकारी, सामाजिक कार्य कलापों में सक्रिय होती है। किसी भी विषय पर गंभीर सोच विचार के उपरांत ही अंतिम निर्णय लेती है। कुंडली में यदि चंद्र शुक्र अथवा मंगल शुक्र का योग हो तथा उन पर गुरु की भी दृष्टि हो तो जातिका उच्च शिक्षित होती है। इन्हें साहित्य, लेखन, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि ललित कलाओं की ओर भी विशेष अभिरुचि होती है। व्यवसायिक तौर पर इनके द्वारा लाभ भी प्राप्त होता है।
शुक्र के कारण तुला जातिका की कल्पना शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य क्षेत्र में लगी रहे जब तक पूरे मनोयोग से और मजबूत दिल से करेगी। परंतु अपने विचार और योजना में भी परिस्थिति अनुसार परिवर्तन करने को तैयार हो जाती हैं। वैसे स्वभाव वश परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखती है। तुला जातिका सामान्यतः वर्तमान में जीने का विश्वास रखती है। बाधाओं के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाती है। मंगल यदि शुभस्थ हो अथवा चंद्र शुक्र का योग हो
तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो उच्च शिक्षा के पश्चात प्राध्यापक या अर्धसरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त कर लेती है
गृहस्थ जीवन👉 तुला जाति का प्रेम संबंधों एवं विवाह आदि के संबंध में स्वतंत्र विचार रखती हैं। यद्यपि माता पिता की आशा के विरुद्ध आचरण भी कम ही करती देखी गई है। विवाह के पश्चात अपने पति को गृहस्थी एवं व्यवसाय में अच्छा सहयोग प्रदान करती हैं। ग्रह की सजावट, सुंदर वस्त्र, उच्च स्तरीय सवारी, बड़ा सुंदर मकान, आदि की विशेष अभिलाषी होती हैं। परंतु अपने पति के प्रति वफादार एवं निष्ठावान रहती हैं। तुला जातिका के बच्चे सीमित संख्या में होते हैं। सप्तम भाव में यदि राहु केतु शनि सूर्य आदि अशुभ ग्रह हो या उनकी अशुभ दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन के सुख में कमी रहती है।
उपयुक्त जीवन साथी👉 तुला जातिका (राशि या लग्न) को मेष, मिथुन, तुला व कुंभ राशि वालों के साथ वैवाहिक संबंध शुभ एवं उत्तम। वृश्चिक, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर राशि लग्न वालों के साथ मध्यम फली तथा सिंह व मीन राशि वालों के साथ शुभ फल ही नहीं होंगे। यद्यपि इस संबंध में कुंडली मिलान संबंधी नियमों का भी अनुसरण करना चाहिए।
उपयुक्त व्यवसाय👉 तुला लग्न जातिका अपनी रुचि के अनुसार ही व्यवसाय में भी कलात्मक परिवर्तन लाने के प्रयास करती रहती है। तुला जातिका को फैशन डिजाइनिंग, कंप्यूटर, ब्यूटी पार्लर, सिलाई कढ़ाई, शिल्पकारी, मॉडलिंग, गृह साज सज्जा, रेडीमेड वस्त्र विक्रेता, गायन, अभिनय, प्राध्यापक, वकालत, न्यायाधीश, बैंकिंग, सिनेमा, टेलीविजन, होटल, रेस्टोरेंट, फोटोग्राफी, खिलौनों आदि से संबंधित कार्यों में विशेष सफलता प्राप्ति के अवसर मिलते हैं
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गृहस्थ जीवन👉 तुला जाति का प्रेम संबंधों एवं विवाह आदि के संबंध में स्वतंत्र विचार रखती हैं। यद्यपि माता पिता की आशा के विरुद्ध आचरण भी कम ही करती देखी गई है। विवाह के पश्चात अपने पति को गृहस्थी एवं व्यवसाय में अच्छा सहयोग प्रदान करती हैं। ग्रह की सजावट, सुंदर वस्त्र, उच्च स्तरीय सवारी, बड़ा सुंदर मकान, आदि की विशेष अभिलाषी होती हैं। परंतु अपने पति के प्रति वफादार एवं निष्ठावान रहती हैं। तुला जातिका के बच्चे सीमित संख्या में होते हैं। सप्तम भाव में यदि राहु केतु शनि सूर्य आदि अशुभ ग्रह हो या उनकी अशुभ दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन के सुख में कमी रहती है।
उपयुक्त जीवन साथी👉 तुला जातिका (राशि या लग्न) को मेष, मिथुन, तुला व कुंभ राशि वालों के साथ वैवाहिक संबंध शुभ एवं उत्तम। वृश्चिक, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर राशि लग्न वालों के साथ मध्यम फली तथा सिंह व मीन राशि वालों के साथ शुभ फल ही नहीं होंगे। यद्यपि इस संबंध में कुंडली मिलान संबंधी नियमों का भी अनुसरण करना चाहिए।
उपयुक्त व्यवसाय👉 तुला लग्न जातिका अपनी रुचि के अनुसार ही व्यवसाय में भी कलात्मक परिवर्तन लाने के प्रयास करती रहती है। तुला जातिका को फैशन डिजाइनिंग, कंप्यूटर, ब्यूटी पार्लर, सिलाई कढ़ाई, शिल्पकारी, मॉडलिंग, गृह साज सज्जा, रेडीमेड वस्त्र विक्रेता, गायन, अभिनय, प्राध्यापक, वकालत, न्यायाधीश, बैंकिंग, सिनेमा, टेलीविजन, होटल, रेस्टोरेंट, फोटोग्राफी, खिलौनों आदि से संबंधित कार्यों में विशेष सफलता प्राप्ति के अवसर मिलते हैं।
तुला लग्न में दशान्तर्दशा का फल एवं अन्य शुभाशुभ ज्ञान
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तुला लग्न में उत्पन्न जातक-जातिका को शुक्र, शनि, चंद्र (यदि कुंडली में शुभ हो) तो अपनी दशा अंतर्दशा में शुभ फल प्रदान करेंगे। शनि अपनी दशा या भुक्ति में भूमि सवारी का सुख, विद्या या कंपटीशन में सफलता, संतान सुख, तकनीकी विद्या में कामयाबी दिलाएगा, चंद्रमा और शुक्र अपनी दशाओं में कार्य व्यवसाय या नौकरी में लाभ व उन्नति, माता एवं स्त्री का सुख, सौंदर्य प्रसाधन या सवारी आदि अन्य सुख साधनों की प्राप्ति के साथ उन पर खर्च भी कराएंगे। कुंडली में यदि शनि, चंद्र या शुक्र अशुभ हो तो उपरोक्त सुखों से विघ्न उत्पन्न होंगे।
मंगल की दशा में👉 कुछ परेशानियों एवं विघ्नों के पश्चात धन लाभ तथा पारिवारिक सुख प्राप्त होगा। तुला लग्न में मंगल धनेश एवं मारकेश भी होने से इस दशा में दुर्घटना से चोट अथवा रक्त विकार आदि से शरीर कष्ट का भय होता है। बुध की दशा में भाग्य में कुछ सुखद परिवर्तन होने की संभावना होती है। परंतु इस दशा में विभिन्न स्थानों पर यात्रा एवं फिजूलखर्ची भी अधिक होती है।
गुरु की दशा 👉 चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव में स्थित गुरु अशुभ फल तथा अन्य भावो में प्राय: शुभ फल प्रदान करता है।
राहु-केतु 👉 तुला लग्न में अपनी स्थिति एवं ग्रहयोग अनुसार फल प्रदान करते है।
तुला लग्न संबंधित अन्य शुभाशुभ ज्ञान एवं उपाय
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शुभ रंग👉 श्वेत हल्का नीला काला गुलाबी रंग अनुकूल रहेंगे हरे और पीले रंग के प्रयोग से बचें
शुभ नग (रत्न)👉 सवा रत्ती का हीरा प्लेटिनम या चांदी की अंगूठी में शुक्रवार को अथवा किसी शुभ योग में पंडित जी के परामर्श अनुसार शुभ मुहूर्त पर निम्नलिखित मंत्र का कम से कम 16 बार पाठ करके धारण करना लाभदायक रहता है।
मंत्र 👉 ॐ द्रां द्रीं दौं सः शुक्राय नमः।
इस दिन श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करके ब्राह्मण दंपत्ति का तथा पांच कन्याओं का पूजन करके उन्हें चांदी, श्वेत वस्त्र, फल, बर्फी, दूध, दही, चावल आदि का दान करना शुभ एवं कल्याणकारी होगा।
यदि तुला लग्न में किसी जातिका की जन्म राशि या नाम राशि धनु हो तो वैवाहिक सुख में वृद्धि के लिए श्वेत पुखराज भी धारण करवाया जा सकता है।
धन लाभ एवं वैवाहिक सुख के लिए मंगलवार का व्रत रखना तथा उस दिन गाय को मीठी रोटियां डालना शुभ होगा। कुंडली में सूर्य अशुभ हो तो रविवार का व्रत रखना तथा सूर्य भगवान को प्रतिदिन विशेष कर रविवार के दिन ॐ घृणि सूर्याय नमः मंत्र द्वारा तांबे के पात्र में जल लेकर तीन बार अर्घ देना शुभ रहता है।
शुभ दिन👉 रविवार, सोमवार, मंगलवार, शुक्रवार तथा शनिवार शुभ होंगे बुधवार मिश्रित प्रभाव देगा जबकि गुरुवार अशुभ फलप्रद रहेगा।
शुभ अंक👉 3,4,5,7 मध्यमफली 8 अशुभ अंक 2,6,9 ।
भाग्यशाली वर्ष👉 16, 27, 28, 32, 34, 35, 39, 40, 41 ,42 वे वर्ष।
सावधानी👉 तुला लग्न राशि के जातक जातकों को अत्यधिक भावुकता, भोग विलासिता, और उतावलेपन की प्रवृत्ति का यथासंभव त्याग करना चाहिए। बाह्यमुखी प्रवृतियों के कारण आप विशेष परेशान एवं अशांत रह सकते हैं। बनावट श्रृंगार कीमती वस्तु सवारी आदि सुख साधनों तथा मानक व्यसनों पर वृथा खर्चों से बचें। सात्विक एवं संतुलित भोजन करना आपके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा।
वैदिक ज्योतिष में व्यक्ति विशेष के लग्न पर काफी जोर दिया गया है. जन्म कुंडली में लग्न के आधार पर ही फलकथन किया जाता है. लग्न यदि बली है तब व्यक्ति बहुत सी परेशानियों को झेलने में कामयाब रहता है और यदि लग्न कमजोर है तब व्यक्ति में बहुत सी बातों की कमी दिखाई देती है. लग्न ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण करता है।लग्न यदि पाप प्रभाव मे है तो जीवन कष्टदायक और जातक खतरनाक और नकारात्मक व्यक्तित्व वाला हो जाता है।
तुला लग्न जब जन्मकुंडली के प्रथम भाव में तुला राशि हो तो जातक तुला लग्न का होता है। तुला राशि भचक्र की सातवें स्थान पर आने वाली राशि है. भचक्र में इस राशि का विस्तार 180 अंश से 210 अंश तक फैला हुआ है. इस राशि का तत्व वायु है इसलिए इस राशि के व्यक्तियों की विचारशक्ति अच्छी होती है समतोल स्वभाव के होते हैं। गजब की सहनशक्ति होती है। आशावादी, धैर्यवान होते हैं, आदर्शवादी, सत्यवान, परिवार प्रेमी, सहिष्णुता इनका प्रमुख गुण है। पढ़ने-लिखने के शौकीन होते हैं। उच्च अभिरुचि, कलात्मकता व सबको अपना बना लेने में ये निपुण होते हैं। निर्विकार स्वभाव भी होता है, मोह-माया में नहीं फँसते। तुला राशि का राशीश शुक्र है। अतः तुला लग्न का लग्नेश भी शुक्र होता है।
तुला लग्न के जातकों का विवेचन करते समय हमें तुला लग्न के लग्नेश शुक्र के गुण-स्वभाव तथा तुला राशि के प्रतीक चिह्न 'तुला' (तराजू) की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। इसके आधार पर सहज ही यह स्थूल निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं कि तुला लग्न के जातक चुप रहकर सुनते है, जैसे कोई न्यायाधीश सुन रहा हो और परत दर परत न्याय का अन्वेषन करते है ये भावुक नहीं होते या यू कहे के भावना पर इनका पूर्ण सयम होता है उसको सदिएव नियंत्रित रखते है, ये अधिकतर कानूनी पढ़ाई वाले या फिर चिकित्सक आए गए है जो अपने कार्य मे व्यस्त और मस्त रहते है और किसी को कोई तकलीफ नहीं देते, प्रेक्षण या observation इंका गुण होता है और उनका इवैल्यूएशन और कान के कसीदेकार यानि शब्दो को मापते है तोलते है और फिर अपना कम शब्दो वाला वक्तव्य देते है है चमड़ी साफसुतरती, पतली, कम बालो वाली होती है बालो की मात्र राहू शनि की स्थिति से निरहारित होती है अगर लग्न मे राहू या शनि है तो सावला काला रंग होगा और चेहरे के नैन नक्श थोड़े बड़े होंगे, किन्तु अगर चन्द्र या शुक्र हो तो वो अत्यंत सुंदर बड़ी आखो वाला और गोरी पतली स्त्रीयो जैसी मुखाकृतिवाला और प्रससिद्ध और अभिनेता या model हो या वाओसे सुंदर होगा। व्यवहारकुशल, चतुर, संतुलन बनाए रखने (अपने परिवार व समाज के साथ) में माहिर, व्यापारिक बुद्धि वाले, धन वृद्धि के इच्छुक, शॉपिंग के शौकीन, न्यायप्रिय किन्तु अस्थिर बुद्धि वाले तथा शौकीन मिजाज एवं कामुक होते हैं। स्त्रियों की सोहबत तथा बाजार में रहना इन्हें पसंद हो सकते हैं। प्रायः ये सभी कार्य तीव्रतापूर्वक करने वाले हो सकते हैं। निस्संदेह सुन्दर व आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। विपरीत लिंगी को ये अपनी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते हैं और नियम, कायदे, कानून, मर्यादा, सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करते। क्योंकि न्याय और निष्पक्षता के पक्षधर होते हैं। यदि शुक्र लग्न या द्वितीय भाव में हो तो इनके चेहरे का सौंदर्य तथा लावण्यता बुढापे में भी बनी रहती है। ऐसा भी देखा गया है। तुला लग्न के जातक सक्रिय होते हैं। अक्सर ये तेज चलने वाले होते हैं। परिष्कृत एवं उच्च विचारों वाले होते हैं। ये लोग आदर्शवादी, ऊर्जावान, सकारात्मक स्वभाव के, न्यायप्रिय व औसत कद-काठी के होते हैं। इनका रंग गोरा होता है। ये सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। पुरुष जातकों में स्त्रैण स्वभाव पाया जाता है। चेहरा चौड़ा हो सकता है (प्राय: लम्बोतरा देखने में लगता है)। आंखें सन्दर, छाती चौड़ी होती है। अपनी आयु से कम लगते हैं। दूरदर्शितापूर्ण तथा मानव स्वभाव के गहन अध्ययन में रुचि रखने वाले होते हैं। शान्ति व नियम मर्यादा से रहने वाले किन्तु प्रैक्टिकल व महत्वाकांक्षी होते हैं। संगीतप्रेमी, सत्यनिष्ठ व ईमानदार होते हैं। ईमानदारी इनके जीवन में विशेष महत्त्व रखती है। श्रृंगारप्रिय, मृदुभाषी, सुशील, विनयी किन्तु शौकीन व रसिक होते हैं। इनमें समूह को प्रभावित करने की तुला लग्न के जातकों का शरीर प्राय: नीचे से ऊपर तक एक समान होता है। इनकी आंखों व नाक तथा चेहरे पर विशेष आकर्षण होता है। शरीर संतुलित होता है। ये स्नेही तथा दयालु व उदर प्रवृत्ति के होते हैं। किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पूर्व ये भली प्रकार विचार करते हैं। दूसरों को अपनी समझ के अनुसार उचित सलाह देने की उत्सुकता इनमें सदैव रहती है। तुला लग्न के जातक परामर्शदाता (एडवाइजर), वकील, जज, साहित्य एवं नीति निर्धारण के कार्यों में विशेष सफल होते हैं। अन्य व्यवसाय में भी हों तो ये अपने अधिकारी की दृष्टि में कर्तव्यनिष्ठ, प्रशंसा के पात्र व सफल बनते हैं। यदि कुण्डली में अशुभ योग न हो तो ये जातक पूर्ण आस्तिक व धर्म के सम्बन्ध में विशेष रुचि रखने वाले एवं धर्मभीरू होते हैं। मेष, कुंभ व मिथुन लग्न के जातकों की मित्रता तुला लग्न वालों को शुभ व अनुकूल रहती है। यदि लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो इन्हें मूत्र, गुदा, कमर व गुप्तांगों के रोगों की सम्भावना रहती है (स्त्रियों में गर्भाशय की भी)।
तुला लग्न में शुक्र बलवान हो तो रंग विशेष गोरा, स्वभाव सौम्य, आकृति सुन्दर तथा स्वभाव सतोगुण एवं रजोगुण मिश्रित होता है। ऐसे जातक शृंगारप्रिय, साहित्य, संगीत कला में रुचि या दखल रखने वाले। फूल, मोती व सफेद पदार्थों (चावल, दही आदि) में रुचि रखने वाले, विद्वान, गुणी, मान्य व सौभाग्यशाली होते हैं। तुला लग्न का स्वामी शुक्र है अतः तुला लग्न में जन्मा जातक विलासी एवं ऐश्वर्यशाली जीवन का शौक़ीन होगा. मध्यम कद, गौर वर्ण तथा सुन्दर आकर्षक चेहरा इस लग्न में जन्मे जातक के लक्षण हैं. इस लग्न में जन्मे जातक विचारशील तथा ज्ञान प्रिय होते हैं। हर बात का लॉजिकल जवाब या कारण चाहते है, ये आध्यात्मिक विषयो मे भी क्रमबद, नितनेमवाले और फल के लिए पूजा करनेवाले या आराधन का भी टोल मोल करने वाले तार्किक और कभ कभी कुतरकीक भी हो जाते है। बिना शिकन सहन करना और चुपचाप रेहकर उचित समय का सदुपयोग करना और वापस मुहतोड़ जव्ब देकर सामनेवाले को निरुतर कर देना इंका गुण है। इस लग्न के जातकों में संतुलन की शक्ति असाधारण होती है. अच्छे बुरे की पहचान आपसे अधिक और कोई नहीं कर सकता. सामने वाले के बोलने से पहले ही उसकी मन की बात को समझ लेना आपका विशेष गुण है. तुरंत निर्णय लेने की क्षमता के कारण आप के प्रति सभी आकर्षित हो जाते है. तुला लग्न के जातक एक कुशल व्यापारी होते है.
तुला लग्न का स्वामी शुक्र होने के कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व में शुक्र का प्रभाव दिखाई देता हैं। इनका ब़डा चेहरा, सुन्दर और विशाल आँखें, घुंघराले बाल, मध्यम कद और सामान्य शरीर होता है। इनके चेहरे पर एक विशेष आकर्षण होता है, जिस कारण लोग इनकी ओर खींचे चले जाते हैं। इनका स्वभाव सौम्यता लिये होता है क्योंकि उनको स्वभाव में सब कुछ संतुलित करके चलने की आदत विद्यमान होती है। परन्तु कभी-कभी ये जितने सौम्य होते हैं, जरूरत प़डने पर उतने ही कठोर भी बन जाते हैं। ऎसे व्यक्ति व्यवहार पसंद होते हैं और सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति होने के कारण सबके साथ एक समान व्यवहार करते हैं। ऎसे व्यक्ति को भोग विलास की वस्तुओं का उपभोग करना और खरीदना ज्यादा पसंद होता है। नई टेक्नोलॉजी इन्हें पसंद होती है। ये व्यक्ति नये चिन्तन व परीक्षण करने वाले (क्रियटिव) होते हैं और संगीत, गायन, नृत्य, एक्टिंग आदि चीजें पसंद करते हैं और ये गुण भी इनमें विद्यमान रहते हैं। ऎसे व्यक्ति अपनी साज-सज्जा और कप़डों पर विशेष रूप से ध्यान रखते हैं। जिस प्रकार वायु होती है कि एहसास कराया और निकल गई उसी प्रकार ऎसे व्यक्ति अपना काम निकाल कर कब चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। ऎसे व्यक्ति अच्छा खाने और अच्छा पहनने के शौकीन होते हैं।
इन्हें वात संबंधी पेरशानी अधिक रहती है। तुला लग्न के साथ-साथ अगर शुक्र बलवान हो तो इनके काम संबंधी बातें बढ़ जाती हैं तो ऎसे व्यक्ति को अपनी कार्य प्रणाली में पेंटिग्स, संगीत, नृत्य आदि क्रेटिविटी को भी शामिल कर लेना चाहिए। ऎसे व्यक्तियों के ऑफिस में इंटीरियर बहुत अच्छा देखने को मिलता है।ऎसे व्यक्तियों की फ्रैण्डलिस्ट में महिला मित्रों की संख्या अधिक होती है। ऎसे व्यक्ति बहुत जल्दी ही हर माहौल में समझौता कर लेते हैं, चाहे वो थो़डा आधुनिक हो या पारम्परिक। हमेशा इनका अलग ही रूप देखने को मिलता है। ऎस व्यक्तियों मे हाजिर जवाब क्षमता अद्भूत होती है और पहनावा भी अच्छा होता है। इनके अन्दर राजाओं की तरह रहन-सहन, खान-पान वाले गुण पाये जाते हैं। ऎसे व्यक्ति अच्छे बिजनसमैन साबित होते हैं। ऎसे व्यक्ति एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकते। इन्हें हमेशा किसी ना किसी काम की आवश्यकता होती है, नहीं तो इनका समय अपने शौक को पूरा करने में व्यतीत हो जाता है। ऎसे व्यक्ति आदर्शवादी होते हैं और साहित्यप्रिय होने के कारण इनकी लेखन क्षमता भी अच्छी होती है। इनका वायु तत्त्व होने के कारण ये लोग अक्सर योजनाएं बनाते हुए मिल जाते हैं परन्तु उन पर क्रियान्वयन नहीं कर पाते।
तुला लग्न की जातिकाये
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तुला लग्न राशि में उत्पन्न होने वाली लड़की का ऊंचा कद, सुंदर मुख और आयताकार आकृति कुछ लंबाई लिए हुए संतुलित खूबसूरत एवं आकर्षक शरीर रचना वाली होती है। नयन नक्श तीखे तथा अधिक आयु में भी प्रायः युवा दिखने वाली होती है। बाल्यकाल में कुछ दुबली किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य में सुधार होता है। राशि स्वामी शुक्र शुभस्थ हो तो तुला राशि जातिका विनम्र स्वभाव सहज मुस्कान लिए हुए हंसमुख मिलनसार, नए नए मित्र बनाने में कुशल, बुद्धिमान, न्याय प्रिय, व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, स्वाभिमानी एवं उत्साह शील प्रकृति की होगी। इसके अतिरिक्त सौंदर्य एवं कलात्मक अभिरुचिययो से युक्त अपने रहन-सहन के तरीके, उचित पहरावे एवं खानपान के प्रति विशेष सतर्क होगी। सौंदर्य एवं सजावट के प्रसाधनों श्रृंगार एवं कलात्मक वस्तुओं के संग्रह करने का शौक रखती है।
तुला जातिका स्वभावतः प्रिय भाषी, दयालु, उदार, परोपकारी, सामाजिक कार्य कलापों में सक्रिय होती है। किसी भी विषय पर गंभीर सोच विचार के उपरांत ही अंतिम निर्णय लेती है। कुंडली में यदि चंद्र शुक्र अथवा मंगल शुक्र का योग हो तथा उन पर गुरु की भी दृष्टि हो तो जातिका उच्च शिक्षित होती है। इन्हें साहित्य, लेखन, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि ललित कलाओं की ओर भी विशेष अभिरुचि होती है। व्यवसायिक तौर पर इनके द्वारा लाभ भी प्राप्त होता है।
शुक्र के कारण तुला जातिका की कल्पना शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य क्षेत्र में लगी रहे जब तक पूरे मनोयोग से और मजबूत दिल से करेगी। परंतु अपने विचार और योजना में भी परिस्थिति अनुसार परिवर्तन करने को तैयार हो जाती हैं। वैसे स्वभाव वश परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखती है। तुला जातिका सामान्यतः वर्तमान में जीने का विश्वास रखती है। बाधाओं के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाती है। मंगल यदि शुभस्थ हो अथवा चंद्र शुक्र का योग हो
तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो उच्च शिक्षा के पश्चात प्राध्यापक या अर्धसरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त कर लेती है
गृहस्थ जीवन👉 तुला जाति का प्रेम संबंधों एवं विवाह आदि के संबंध में स्वतंत्र विचार रखती हैं। यद्यपि माता पिता की आशा के विरुद्ध आचरण भी कम ही करती देखी गई है। विवाह के पश्चात अपने पति को गृहस्थी एवं व्यवसाय में अच्छा सहयोग प्रदान करती हैं। ग्रह की सजावट, सुंदर वस्त्र, उच्च स्तरीय सवारी, बड़ा सुंदर मकान, आदि की विशेष अभिलाषी होती हैं। परंतु अपने पति के प्रति वफादार एवं निष्ठावान रहती हैं। तुला जातिका के बच्चे सीमित संख्या में होते हैं। सप्तम भाव में यदि राहु केतु शनि सूर्य आदि अशुभ ग्रह हो या उनकी अशुभ दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन के सुख में कमी रहती है।
उपयुक्त जीवन साथी👉 तुला जातिका (राशि या लग्न) को मेष, मिथुन, तुला व कुंभ राशि वालों के साथ वैवाहिक संबंध शुभ एवं उत्तम। वृश्चिक, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर राशि लग्न वालों के साथ मध्यम फली तथा सिंह व मीन राशि वालों के साथ शुभ फल ही नहीं होंगे। यद्यपि इस संबंध में कुंडली मिलान संबंधी नियमों का भी अनुसरण करना चाहिए।
उपयुक्त व्यवसाय👉 तुला लग्न जातिका अपनी रुचि के अनुसार ही व्यवसाय में भी कलात्मक परिवर्तन लाने के प्रयास करती रहती है। तुला जातिका को फैशन डिजाइनिंग, कंप्यूटर, ब्यूटी पार्लर, सिलाई कढ़ाई, शिल्पकारी, मॉडलिंग, गृह साज सज्जा, रेडीमेड वस्त्र विक्रेता, गायन, अभिनय, प्राध्यापक, वकालत, न्यायाधीश, बैंकिंग, सिनेमा, टेलीविजन, होटल, रेस्टोरेंट, फोटोग्राफी, खिलौनों आदि से संबंधित कार्यों में विशेष सफलता प्राप्ति के अवसर मिलते हैं
तुला लग्न में जन्मा जातक विलासी एवं ऐश्वर्यशाली जीवन का शौक़ीन होगा. मध्यम कद, गौर वर्ण तथा सुन्दर आकर्षक चेहरा इस लग्न में जन्मे जातक के लक्षण हैं. इस लग्न में जन्मे जातक विचारशील तथा ज्ञान प्रिय होते हैं. इस लग्न के जातकों में संतुलन की शक्ति असाधारण होती है. अच्छे बुरे की पहचान आपसे अधिक और कोई नहीं कर सकता. सामने वाले के बोलने से पहले ही उसकी मन की बात को समझ लेना आपका विशेष गुण है. तुरंत निर्णय लेने की क्षमता के कारण आप के प्रति सभी आकर्षित हो जाते है. तुला लग्न के जातक एक कुशल व्यापारी होते है.
तुला लग्न में जन्म लेने वालते जातकों का वर्ण गोरा, कद मध्यम एवं चेहरा सुन्दर होता है। चैड़ा मुख, बड़ी नाक, उन्नत एंव चैड़ी छाती वाले ऐसे जातकों को सदैव प्रसन्न चित्त एवं मुस्कुराते देखा जा सकता है। ये जिस किसी को मित्र मान लेते हैं, उसके लिए सर्वस्व देने में भी कभी नहीं चूकते। दूसरे के मन की बात यह बहुत अच्छे से जानते हैं, किन्तु अपने मन की थाह ये किसी को भी नहीं देते।
उचित एवं तुरंत निर्णय ले लेना इनकी प्रमुख विशेषता होती है। ऐसे जातक प्रायः धार्मिक विचारों के होते हैं तथा इन्हें आस्तिक और सात्विक भी कहा जा सकता है। कैसी भी परिस्थितियां हो ये अपने को उनके अनुरूप ढाल लेते हैं। छोसी-से छोटी बात भी इनके मस्तिक को बेचैन कर देती है। भले ही ये साधनविहीन हों, किन्तु इनके लक्ष्य सदा उंचे ही होंगे। इनमें कल्पनाशक्ति गजब की होती है।
ऐसे जातकों का रूझान न्याय एवं अनुशासन के प्रति अधिक होते हैं। राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे जातक अधिक सफल होते हैं। परोपकार की भावना भी इनमें अत्याधिक होती है किन्तु अपने हानि-लाभ को भी ये पूरा ध्यान में रखते है। गरीबों को भोजन देने वाले, अतिथिसेवी तथा कुआं व बाग आदि बनाने वाले होते हैं। इनका हृदय शीघ्र ही द्रवित हो जाता है तथा इन्हें सच्चे अर्थों में पुण्यात्मा और सत्यावादी कहा जा सकता है। शुक्र के कारण ये बड़ी आयु में भी जवान दिखते हैं।
बोल चाल में निपुण तथा चतुर व्यवहार के कारण किसी भी व्यापार में शीघ्र ही सफल हो जाते हैं. आपमें एक कुशल व्यापारी के समस्त गुण विद्यमान होते हैं तथा अपनी पारखी नज़रों से आप सच्चा परीक्षण करने की क्षमता रखते हैं. किसी के छलावे में तुला लग्न के जातक कभी नहीं आ सकते हैं. जन्म कुंडली में यदि शुक्र की स्तिथि अच्छी है तो आपमें अभिनेता बनने के सभी गुण होंगे.
तुला लग्न के जातक परामर्श देते समय सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं तथा सामान्य से अधिक विलम्ब लगाते हैं। परन्तु उनकी राय बहुत सटीक, सकारात्मक, उचित, कम किन्तु सारगर्भित और घेरे अर्थो वाले शब्दो मे व रचनात्मक होती है। बशर्ते कि आप धैर्यपूर्वक उनकी पूरी बात सुनें और फिर विचारें। सम्भवतः अन्य किसी भी लग्न के जातक की अपेक्षा तुला लग्न के जातक सर्वाधिक लाभदायक व सटीक परामर्श देने वाले होते हैं। शायद हर कार्य को करने में उस पर प्रारम्भ में गहनता व बारीकी से सर्वांगीण विचार करना ही तुला लग्न के जातकों को अधिकांशतः सफल बनाने विचार इतना लम्बा भी हो सकता है कि किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले ही अवसर निकल जाए। यद्यपि तुला का अर्थ व्यापार से भी है और प्राय: ज्योतिर्विद । व ज्योतिष ग्रन्थ तुला लग्न वालों को व्यावसायिक बुद्धि का चतुर भी बताते हैं। परन्तु मैं समझता हूं कि तुला का अर्थ न्याय व निष्पक्षता से लें तो तुला लग्न वालों के लिए अधिक उचित रहेगा। क्योंकि ये इतने ईमानदार होते हैं कि व्यापार वाली बेईमानी/फरेब कर ही नहीं सकते, अलबत्ता इनकी प्रैक्टिकल सोच, दूरदर्शिता तथा अत्यधिक विनयी होना इन्हें व्यापार या व्यवसाय में सफलतादायक होता है । तुला लग्न वाले जातकों को मैंने अत्यधिक धैर्यवान व सहिष्णु पाया है। ये जिस ध्येय पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं, प्राय: उसे प्राप्त कर ही लेते हैं। फिर भी इनका वैवाहिक जीवन प्रायः सुखमय नहीं होता। ऐसा मैंने दर्जनों तुला लग्न की कुंडलियों में देखा है। बावजूद तुला लग्न वालों की गहन विचार क्षमता, एडजस्टमेंट, दरदर्शिता तथा विनय और धैर्य के और बावजूद इसके कि वे सुन्दर व कामकला निपुण होते हैं-इनके वैवाहिक जीवन में प्रायः सुख के अभाव का कारण सम्भवतः । सातवें भाव में मंगल की राशि का होना होता है।
तुला लग्न के जातक अपने भाइयों के प्रति भी बहत समर्पित व निभाने वाले । देखे गए हैं। प्रायः ये अपनी पारिवारिक परम्पराओं में भी बहुत विश्वास रखते हैं। परन्त महफिलों, पार्टियों आदि में रहना या अपने आस-पास मित्रों आदि की भीड़ रखना इन्हें बहुत पसंद होता है। ये लोग अपने गहन मित्र को सफलता पर हदय से प्रसन्नता व्यक्त करने वाले होते हैं। किन्तु यदि ठान ही न लें तो प्रायः किसी कार्य या शौक को लम्बा नहीं चलाते। मानसिक अस्थिरता के कारण बहुत से जातक आध्यात्मिक प्रगति भी करते हैं। सस्त व लापरवाह भी होते हैं। शुक्र कुंडली में अच्छे स्थान पर बैठा हो तो तुला लग्न की स्त्रियां (वृष, कर्क, कन्या तथा मीन लग्न की भी) आमतौर पर सामान्य से अधिक सुंदर तथा कामकला में चतुर होती है। ऐसा अनुभव में भी देखने में आया है और शास्त्रोक्त दृष्टि से भी प्रमाणित होता है।
तुला में चंद्रमा रहने पर देवता, ब्राह्मणों व साधु सज्जनों का सत्कार करने वाला, बुद्धिमान, पवि आचरण करने वाला अर्थात दूसरों की स्त्री व धनादि का अलोलुप, सत्याचारणशील, स्त्री द्वारा वश में किया गया, ऊंचे कद वाला, ऊची नामक वाला, कमजोर एवं अस्वस्थप्राय शरीर वाला, यात्रा प्रेमी, धनी, अंगहीन, क्रय-विक्रय में कुशल, देवता वाचक किसी द्वितीय नाम वाला अर्थात् सामान्यतः दो नामों वाला, रोगी, अपने बंध-बान्धवों का उपकार करने वाला किन्तु अपने ही बन्धुओं से तिरस्कृत व त्यक्त होता है।
सुन्दर चेहरा (मुखाकृति) और नेत्र, राजपूज्य (राजा से सम्मानित) विना स्त्रियों से रति के लिये जिसका चित्त चंचल रहे। स्त्री, धन और क्षेत्र (खेत भीम से युक्त, विरल (परस्पर भिड़े हुए नहीं) दात, मुख्य (प्रधान), शान्त बुद्धि, विषादी (किसी एक विचार पर दृढ़ न रहना अस्थिर मति का लक्षण है), अत्यन्त भीरू (डरपोक) हो।
कन्दर्परूपनिकपुणस्तुलादिभागेऽध्वसेवज्ञः। -सारावली पृ. 466/श्लो. 10 कामदेव के तुल्य स्वरूपवान, चतुर मार्ग सेवन की विधि का ज्ञाता, कृष्ण वर्ण, व्यापार में लीन, वियोग में धैर्यवान् और सुन्दर मेधावी होता है। तुलालग्रोदये जातः सुधीः सत्कर्म जीविकः। विद्वान सर्वकलाभिज्ञो धनाढ्यो जनपूजितः॥ -मानसागरी
तुलालग्न वाला जीव ज्ञानशील, विवेकी, सतकार्य युक्त. मान-सम्मान वाला, धनसम्पदाशील, अनेक कलाओं द्वारा जीवनयापन करने वाला, जनसमाज में पूज्य वाणिज्य कार्य में कुशल रहे। तुला राशि का स्वामी शुक्र है। शुक्र ऐश्वर्यशाली व विलास पर्ण ग्रह है। गार। वर्ण, मध्यम कद तथा सुन्दर, आकर्षक चेहरा इस राशि वाले जातक के प्राराम्भक लक्षण हैं। यह राशि चर संज्ञक, वायु तत्त्व प्रधान व पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। इस ज्ञानप्रिय, कुशल कार्य सम्पादक व राजनीतिज्ञ होते हैं।
इस राशि का चिह्न तुला (तराजू) है। तराजू दो वस्तुओं के संतुलन का परीक्षण करते हुए हल्की व भारी वस्तु का बोध कराती है। अत: इस राशि वाले व्यक्ति की संतुलन शक्ति बड़ी गजब की होती है। यदि आपका जन्म चित्रा नक्षत्र में है तो आप किसी भी व्यक्ति के मन की थाह पा लेते हैं। कोई व्यक्ति क्या कहना चाहता है ये बोलने से पहले ही उसके हृदय की बात समझ लेते हैं। अपनी इसी फुर्तीली निर्णयात्मक शक्ति के कारण आप शीघ्र ही लोगों पर छा जाते हैं। "तराजू" जैसे व्यापार का परिचायक है इस राशि वाले बड़े कुशल व्यापारी होते हैं तथा लोक व्यवहार में चतुर होने के कारण इनको व्यापारिक सफलता शीघ्र मिल जाती है।
तुला राशि पुरुष जाति सूचक व क्रूर स्वभाव राशि मानी जाती है। यदि आपका जन्म स्वाति नक्षत्र में है तो आपमें एक जबरदस्त व्यापारी के समस्त गुण विद्यमान हैं। आप सच्चा व खरा परीक्षण करने की क्षमता रखते हैं। आप सहज में ही किसी व्यक्ति के छलावे में नहीं आ सकते। आप राजनीति के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। जन्मकुण्डली में यदि शुक्र की स्थिति अच्छी है तो कुशल सुंदर अभिनेता भी बन सकते हैं। तुला लग्न पर पाप प्रभाव हो तो जातक हठी और दुस्साहसी बन जाता है वो किसी की नहीं सुनता और निर्दयीता के साथ रूढ़िवादी और षड्यंत्रकारी बन जाता है इसको समझने के लिए गांधीजी और हिटलर की कुंडली को समझे दोनों ही तुला लग्नि किन्तु दोनों की सोच अति प्रभावशाली किन्तु कर्म मे फर्क ये जिस चीज़ का बेड़ा उठाते है उससे हमेशा से जुड़े रहते है किन्तु उसके निर्वहन मे ये कई प्रयोग करते है जो कभी कभी असफल भी हो जाते है
शारीरिक संरचना एवं व्यक्तित्त्व
तुला लग्न में जन्म लेने वाला जातक सुंदर एवं श्वेतवर्ण, मध्यम या ऊंचा कद, शुक्र की स्थिति अनुसार कुछ लंबा एवं कुछ लंबाई लिए हुए सुंदर आयताकार चेहरा, संतुलित शरीर रचना, भूरि या नीली आंखें, तीखे नयन नक्श तथा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होगा अधिक आयु में भी युवा दिखाई देने वाला चेहरा होगा, बाल्यकाल में प्रायः दुबला किन्तु दृढ़ अस्थि एवं पुष्ट होगा तथा आयु वृद्धि के साथ-साथ संतुलित एवं स्वस्थ शरीर तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा। तुला जातक प्रायः हंसमुख तथा दूसरों के मनोभावों को समझने तथा अपने विचार भी समझाने में कुशल होते हैं।
तुला लग्न में उत्पन्न जातक सौंदर्य प्रिय, न्यायशील, शांतिप्रिय, ईमानदार, विचारशील, तीव्र बुद्धिमान, धर्म परायण, विनम्र, प्रियभाषी, स्पष्ट वादी एवं बातचीत करने में कुशल होगा। कुंडली में शुक्र के साथ चंद्र बुध एवं शनि ग्रह भी शुभस्थ हो तो जातक कल्पनाशील आदर्श एवं आशावादी दृष्टिकोण, उच्च अभिलाषी, अपने पहनावे एवं रहन सहन के प्रति विशेष सावधान, दयालु और उदार हृदय, परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला कुछ खर्चीले स्वभाव का भ्रमण प्रिय संगीत कलाकारों एवं साहित्यिक रुचियों के बावजूद क्रय विक्रय एवं तर्क वितर्क करने में कुशल होते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे मनुष्यों के मनोभावों को जान लेने में भी कुशल होते हैं। किसी अन्य व्यक्ति विशेष कर महिला वर्ग के साथ व्यवहार करते समय शिष्टता एवम् शालीनता को नहीं भूलते। नए नए संपर्क एवं मित्र बनाने में भी कुशल होते हैं। मानसिक एवं काल्पनिक शक्ति प्रबल होती है। परंतु मन की केंद्रीय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य में लगा रहे पूरे मनोयोग के साथ लगा रहेगा। परंतु अपने विचार या कार्य योजना में परिवर्तन करने में भी शीघ्र तैयार हो जाता है। तुला प्रधान व्यक्ति किसी प्रकार के अनुचित दबाव को सहन नहीं कर सकता। स्वच्छंद प्रकृति होती है। कुछ विषयों में लापरवाह होने पर भी अपने उद्देश्य एवं स्वास्थ्य के प्रति सतर्क एवं सावधान रहेगा ।चंद्र गुरु व शुक्र यदि चर राशि में हो तो जातक को देश-विदेश अनेक स्थानों में भ्रमण करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
सामान्यतः तुला लग्न के जातक न्याय एवं मध्यस्ता के कार्य करने में निपुण, सच्चाई पसंद, लोकप्रिय, उदार हृदय, परोपकारी, दान देने की प्रवृत्ति, पराक्रमी, वाहन व अन्य सुख साधनों के शौकीन, देवी देवताओं और ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाले, स्त्रियों से संबंध बनाने में कुशल तथा निजी पराक्रम वह कुशल युक्तियों द्वारा धन संपदा का अर्जन करने वाले होते हैं।
इनमें भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों का विशेष संतुलन रहता है। चंद्र, बुध, शुक्र एवं गुरु के प्रभाव से जातक उच्च अभिलाषी, मिलनसार, भ्रमनप्रिय एवं नए-नए मैत्री संबंध बनाने में कुशल होता है। उसमें नेतृत्व करने की योग्यता तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ संबंध तथा प्रत्येक विषय व गुण दोष के आधार पर शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता, दूरदर्शी, विवेकशील, उच्चादर्श, दृढ़ संकल्प तथा प्रत्येक स्थिति का पूर्वानुमान लगाने में कुशल होते हैं।
स्वास्थ्य और रोग लग्नेश शुक्र यदि बली होकर शुभस्थ हो तो तुला लग्न वाले जातकों का स्वास्थ्य प्राय अच्छा रहता है। जीवन में क्रियाशील चुस्त, व्यस्त, सक्रिय एवं युवा बने रहने की चेष्टा करते रहते हैं। तुला जातक संयमित भोजन एवं नियमित व्यायाम करते रहे तो बहुत कम रुग्ण होते हैं। तथा दीर्घायु होते हैं। परंतु यदि कुंडली में गुरु, शुक्र, शनि, मंगल ग्रह पापाक्रांत या अशुभ हो तो इनके शरीर में असंतुलन तथा स्वास्थ्य बिगड़ जाने की संभावना जल्दी होती है। इस स्थिति में तुला लग्न जातक को पेट विकार, स्नायु रोग, प्रमेह, अपेंडिक्स, मानसिक थकान, मधुमेह, गुर्दे के रोग, पथरी, पेट गैस, वीर्य विकार, गुप्त रोगों का भय रहता है। तुला लग्न में सूर्य एवं मंगल अशुभ हो तो सिरवेदना, मस्तिष्क एवं नेत्र रोग, नाक कान व गले के रोग या उच्च निम्न आदि अव्यवस्थित रक्तचाप संबंधित रोगों की आशंका होती है।
सावधानी तुला लग्न के जातकों को अत्यधिक भोग और विलासिता से बचना चाहिए। इन्हें अत्यधिक कामुकता, शराब, मांस आदि तामसिक वस्तुओं के प्रयोग से भी परहेज करना चाहिए। सुखी जीवन जीने के लिए प्रत्येक क्षेत्र में संयम एवं संतुलन अत्यंत लाभदायक होंगे। ध्यान और ईश्वर भक्ति विशेष सहायक होगी।
तुलालग्न के शुभाशुभ फल लग्नेश शुक्र फल शुक्र अष्टमेश है इसका दोष भी है। अत: कुछ पापी है अतः यह सम फल प्रदान करेगा। धनेश, सप्तमेश मंगल मारक भी है। साथ में गुरु योग हो तो ज्यादा मारक होगा। तृतीयेश षष्ठेश गुरु पाप फल करता है, मारक भी बन जाता ।
चतुर्थेश, पंचमेश शनि शभ फलकर्ता है। तलालग्न में शनि योगकारक होता के फल में द्धि करेगा। भाग्येश द्वादशेश बुध है, शुभ फल देता है।
दशमेश चंद्र पाप फलदाता है। यदि बलवान तिथि का हो तो मध्य का फल और चंद्र-बुध योग बना हो तो शुभ फल देगा। चंद्रमा को केन्द्राधिपति दोष है। एकादशेश सूर्य पापी है। चर लग्न होने से यह सूर्य बाधक भी है।
इस लग्न में चंद्र+बुध ही राजयोगकर्ता है। सफलयोग युति-1. शुक्र+शनि, शनि अकेला, 3. बुध+शनि, 4. शनि+चंद्र, 5. चंद्र+बुध, 6. बुध+शुक्र, मंगल+शनि।
रोग यह कालपुरुष का सातवां स्थान है। अतः गुप्तेन्द्रिय है। अतः तुला राशि शुक्र एवं सप्तम भाव या सप्तमेश पाप प्रभाव में हो तो गुप्तेन्द्रियों के रोग होंगे स्वरूप लम्बा कद या औसत लम्बा कद होगा। चेहरा थोड़ा-सा लम्बाई लिए, नाक-नक्श सुंदर। गौण वर्ण होगी। नजाकत वाली हो, चंद्र लग्न में सुंदर, शुक्र लग्न में या तो स्वयं गौर हो पति गेहआ हो या स्वयं गेहुए रंग वाली हो तो पति गौर वर्ण मिलेगा। मोटी नासिका, लम्बी आकृति, सुंदर नेत्र। चेहरे पर लावण्यतामय आकर्षकता रहेगी।
दांत सुंदर सफेद चमक वाले। - सीना चौड़ा होगा। रूप में यौवनमद रहेगा, स्तन कुछ कठोर पर अति सुंदर . कफ प्रधान प्रकृति होगी। चंचल हो, स्वभाव लचीला होगा। विशेषताएं विलासी शौकीन हो। व्यसनप्रिय हो। ऐश्वर्य पूर्ण हो। सेक्स के मामले में अत्यधिक रंगीली होगी। स्वयं को आकर्षक व दूसरों को भी आकर्षित करने का प्रयतन हो। घूमने के शौक़ीन अपना मतलब सिद्ध करने व दूसरों से धन ग्रहण की प्रवृत्ति होगी। अपना स्वार्थ साधते वक्त दूसरों के हितों की परवाह न करें। 10 रु. खर्च करें तो 100 रुपये वसूलने की प्रवृत्ति हो। 0 गप्प मारने व झूठ बोलने में रुचि ज्यादा होगी। मीठा बोलकर काम निकाले। देव, ब्राह्मण, गुरु भक्त हो व इंसाफ पसंद हो, धार्मिक होगी। मस्तिष्क क्रियाशील, बुद्धि संतुलित, ज्ञानप्रिय, कुशाग्र बुद्धि दक्ष राजनीतिज्ञ व सम्पादिका भी हो सकती है। खरीद फरोख्त में अति होशियार, कुशल व्यापारी व व्यवसायिक सफलता रा प्राप्त करेगी। O भाग्योदय देर से होगा। संतान भी सीमित होगी। कला कौशल, विज्ञान व मशीनरी के कामों में रुचि होगी। नौकरी करे तो सेक्रेटरी, न्यायाधीश, निर्देशक हो व पुस्तक लेखिका, कार साहित्य प्रेमी हो। स्मगलर, अभिनेत्री. पंच सरपंच प्रधानमंत्री आदि उतम पद पाती है। 0 शुक्र बलवान हो व बुध गुरु से प्रभावित हो तो सत्यप्रिय तथा था। दीर्घायु होवें। शुक्र ज्यादा पाप प्रभावी हो तो अल्पायु।
तुला लग्न (लग्नेश शुक्रजन्मकुंडली के प्रथम भाव में तुला राशि हो तो जातक तुला लग्न का होता है। तुला राशि का राशीश शुक्र है। अतः तुला लग्न का लग्नेश भी शुक्र होता है। तुला लग्न के जातकों का विवेचन करते समय हमें तुला लग्न के लग्नेश शुक्र के गुण-स्वभाव तथा तुला राशि के प्रतीक चिह्न ’तुला’ (तराजू) की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। इसके आधार पर सहज ही यह स्थूल निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं कि तुला लग्न के जातक व्यवहारकुशल, चतुर, संतुलन बनाए रखने (अपने परिवार व समाज के साथ) में माहिर, व्यापारिक बुद्धि वाले, धन वृद्धि के इच्छुक, शॉपिंग के शौकीन, न्यायप्रिय किन्तु अस्थिर बुद्धि वाले तथा शौकीन मिजाज एवं कामुक होते हैं। स्त्रियों की सोहबत तथा बाजार में रहना इन्हें पसंद हो सकते हैं। प्रायः ये सभी कार्य तीव्रतापूर्वक करने वाले हो सकते हैं। निस्संदेह सुन्दर व आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। विपरीत लिंगी को ये अपनी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते हैं और नियम, कायदे, कानून, मर्यादा, सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करते। क्योंकि न्याय और निष्पक्षता के पक्षधर होते हैं। यदि शुक्र लग्न या द्वितीय भाव में हो तो इनके चेहरे का सौंदर्य तथा लावण्यता बुढ़ापे में भी बनी रहती है। ऐसा भी देखा गया है।
तुला लग्न के जातक सक्रिय होते हैं। अक्सर ये तेज चलने वाले होते हैं। परिष्कृत एवं उच्च विचारों वाले होते हैं। ये लोग आदर्शवादी, ऊर्जावान, सकारात्मक स्वभाव के, न्यायप्रिय व औसत कद-काठी के होते हैं। इनका रंग गोरा होता है। ये सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। पुरुष जातकों में स्त्रैण स्वभाव पाया जाता है। चेहरा चौड़ा हो सकता है (प्रायः लम्बोत्तरा देखने में लगता है)। आंखें सुन्दर, छाती चौड़ी होती है। अपनी आयु से कम लगते हैं। दूरदर्शितापूर्ण तथा मानव स्वभाव के गहन अध्ययन में रुचि रखने वाले होते हैं। शान्ति व नियम मर्यादा से रहने वाले किन्तु प्रैक्टिकल व महत्वाकांक्षी होते हैं। संगीतप्रेमी, सत्यनिष्ठ व ईमानदार होते हैं। ईमानदारी इनके जीवन में विशेष महत्त्व रखती है। शृंगारप्रिय, मृदुभाषी, सुशील, विनयी किन्तु शौकीन व रसिक होते हैं। इनमें समूह को प्रभावित करने की क्षमता होती है। व्यवस्थाप्रिय होते हैं। स्त्रियों की संगति को पसंद करते हैं।
तुला लग्न के जातकों का शरीर प्रायः नीचे से ऊपर तक एक समान होता है। इनकी आंखों व नाक तथा चेहरे पर विशेष आकर्षण होता है। शरीर संतुलित होता है। ये स्नेही तथा दयालु व उदर प्रवृत्ति के होते हैं। किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पूर्व ये भली प्रकार विचार करते हैं। दूसरों को अपनी समझ के अनुसार उचित सलाह देने की उत्सुकता इनमें सदैव रहती है। तुला लग्न के जातक परामर्शदाता (एडवाइजर), वकील, जज, साहित्य एवं नीति निर्धारण के कार्यों में विशेष सफल होते हैं। अन्य व्यवसाय में भी हों तो ये अपने अधिकारी की दृष्टि में कर्तव्यनिष्ठ, प्रशंसा के पात्रं व सफल बनते हैं। यदि कुण्डली में अशुभ योग न हो तो ये जातक पूर्ण आस्तिक व धर्म के सम्बन्ध में विशेष रुचि रखने वाले एवं धर्मभीरू होते हैं। मेष, कुंभ व मिथुन लग्न के जातकों की मित्रता तुला लग्न वालों को शुभ व अनुकूल रहती है। यदि लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो इन्हें मूत्र, गुदा, कमर व गुप्तांगों के रोगों की सम्भावना रहती है (स्त्रियों में गर्भाशय की भी)।
तुला लग्न में शुक्र बलवान हो तो रंग विशेष गोरा, स्वभाव सौम्य, आकृति सुन्दर तथा स्वभाव सतोगुण एवं रजोगुण मिश्रित होता है। ऐसे जातक शृंगारप्रिय, साहित्य, संगीत कला में रुचि या दखल रखने वाले। फूल, मोती व सफेद पदार्थों (चावल, दही आदि) में रुचि रखने वाले, विद्वान, गुणी, मान्य व सौभाग्यशाली होते हैं।
तुला लग्न में पांचवें या ग्यारहवें घर में शुक्र हो तो पुत्रसुख, विद्या लाभ, ज्ञान लाभ एवं धन लाभ विशेष होता है तथा जातकों में काव्य प्रतिभा भी होती है। सप्तम भाव में शुक्र हो तो पत्नी रूपमती होती है। बारहवें भाव का शुक्र धर्म में अधिक खर्चा करवाता है। रोग-ज्योतिष के अनुसार यदि शुक्र व लग्न पाप प्रभाव में हों तो तुला लग्न के जातकों को मूत्र, वीर्य आदि के रोग तीव्रता से सम्भावित होते हैं। यदि शुक्र छठे भाव में हो अथवा लग्न के अलावा कहीं भी बुध के साथ हो (विशेषकर सातवें/बारहवें भाव में) तो जातक के पौरुष/कामशक्ति पर प्रश्नचिह्न भी लग सकता है। तुला लग्न की स्त्री जातक सामान्य से अधिक सुन्दर होती है। शुक्र लग्न में ही हो अथवा चन्द्रमा लग्न में हो तो अपने पति की विशेष प्यारी होती है तथा गुणवती होती है।
मैंने अपने अनुभव में पाया है कि तुला लग्न के जातक परामर्श देते समय सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं तथा सामान्य से अधिक विलम्ब लगाते हैं। परन्तु उनकी राय बहुत सटीक, सकारात्मक, उचित व रचनात्मक होती है। बशर्ते कि आप धैर्यपूर्वक उनकी पूरी बात सुनें और फिर विचारें। सम्भवतः अन्य किसी भी लग्न के जातक की अपेक्षा तुला लग्न के जातक सर्वाधिक लाभदायक व सटीक परामर्श देने वाले होते हैं। शायद हर कार्य को करने में उस पर प्रारम्भ में गहनता व बारीकी से सर्वांगीण विचार करना ही तुला लग्न के जातकों को अधिकांशतः सफल बनाने का आधार होता है। किन्तु लग्नेश सबल स्थिति में न हो तो इनका यह सोचविचार इतना लम्बा भी हो सकता है कि किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले ही अवसर निकल जाए। यद्यपि तुला का अर्थ व्यापार से भी है और प्रायः ज्योतिर्विद व ज्योतिष ग्रन्थ तुला लग्न वालों को व्यावसायिक बुद्धि का चतुर भी बताते हैं। परन्तु मैं समझता हूं कि तुला का अर्थ न्याय व निष्पक्षता से लें तो तुला लग्न वालों के लिए अधिक उचित रहेगा। क्योंकि ये इतने ईमानदार होते हैं कि व्यापार वाली बेईमानी/फरेब कर ही नहीं सकते, अलबत्ता इनकी प्रैक्टिकल सोच, दूरदर्शिता तथा अत्यधिक विनयी होना इन्हें व्यापार या व्यवसाय में सफलतादायक होता है। तुला लग्न वाले जातकों को मैंने अत्यधिक धैर्यवान व सहिष्णु पाया है। ये जिस ध्येय पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं, प्रायरू उसे प्राप्त कर ही लेते हैं। फिर भी इनका वैवाहिक जीवन प्रायः सुखमय नहीं होता। ऐसा मैंने दर्जनों तुला लग्न की कुंडलियों में देखा है। बावजूद तुला लग्न वालों की गहन विचार क्षमता, एडजस्टमेंट, दूरदर्शिता तथा विनय और धैर्य के और बावजूद इसके कि वे सुन्दर व कामकला निपुण होते हैं इनके वैवाहिक जीवन में प्रायः सुख के अभाव का कारण सम्भवतः सातवें भाव में मंगल की राशि का होना होता है।
तुला लग्न के जातक अपने भाइयों के प्रति भी बहुत समर्पित व निभाने वाले देखे गए हैं। प्रायः ये अपनी पारिवारिक परम्पराओं में भी बहुत विश्वास रखते हैं। परन्तु महफिलों, पार्टियों आदि में रहना या अपने आस-पास मित्रों आदि की भीड़ रखना इन्हें बहुत पसंद होता है। ये लोग अपने गहन मित्र की सफलता पर हृदय से प्रसन्नता व्यक्त करने वाले होते हैं। किन्तु यदि ठान ही न लें तो प्रायः किसी कार्य या शौक को लम्बा नहीं चलाते। मानसिक अस्थिरता के कारण बहुत से जातक सुस्त व लापरवाह भी होते हैं। शुक्र कुंडली में अच्छे स्थान पर बैठा हो तो आध्यात्मिक प्रगति भी करते हैं।
तुला लग्न की स्त्रियां (वृष, कर्क, कन्या तथा मीन लग्न की भी) आमतौर पर सामान्य से अधिक सुंदर तथा कामकला चतुर होती है। ऐसा अनुभव में भी देखने में आया है और शास्त्रोक्त दृष्टि से भी प्रमाणित होता है।
विशेष (रोग)-तुला लग्न हो, निर्बल चन्द्र आठवें भाव में शनि के साथ हो तो प्रेतबाधा या शत्रुकृत अभिचार के कारण जातक की मृत्यु होती है। अथवा लग्नेश (शुक्र) व लग्न दोनों पापग्रहों से युत हों तथा शनि सातवें भाव में हो तो भी शत्रु के अभिचार या देव शाप से जातक की मृत्यु होती है।
तुला लग्न हो तथा दूसरे भाव में शनि राहू या केतु के साथ हो तो जीवन बहुत कष्ट से गुजरता है।
तुला लग्न हो, शनि, गुरु व चन्द्र की युति छठे भाव में हो जाए तो जातक को कुष्ठ रोग सम्भव होता है।
तुला लग्न में अष्टमेश (शुक्र) लग्न में हो परन्तु आठवें भाव में कोई भी ग्रह न हो तो भी जीवन दुखी होता है।
तुला लग्न में पापग्रह लग्नस्थ हों, शुक्र (लग्नेश) निर्बल हो तो जातक सदैव रोगी रहता है। अथवा तुला लग्न में क्षीण चन्द्र हो और पापग्रहों से दृष्ट हो तो भी रोग जातक को घेरे रहते हैं। जातक पूर्ण स्वस्थ नहीं रह पाता।
तुला लग्न हो, गुरु, शुक्र तथा शनि दुःस्थानों में हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।
तुला लग्न में षष्ठेश (गुरु) लग्नस्थ हो तथा पापग्रहों से दृष्ट हो तो जातक नेत्रों से जलस्राव के कारण अंधा हो सकता है (निश्चितता के लिए सूर्य, द्वितीय व बारहवां भाव भी देखें तथा द्वितीयेश व द्वादशेश भी)।
तुला लग्न, वृश्चिक का सूर्य (दूसरे भाव में), दो पापग्रहों के बीच हो तो जातक का तीव्र हार्ट अटैक होता है। अथवा चौथे भाव में शनि तथा पांचवें में कुम्भ का सूर्य हो तो भी जातक हृदय रोगी होता है। अथवा चौथे में मकर व शनि तथा छठे भाव में मीन का सूर्य अन्य पापग्रहों के साथ हो तो भी जातक को हृदय रोग का शिकार होना पड़ता है।
तुला लग्न में शुक्र नीच का हो तो पांव में कष्ट देगा, जबकि वृष लग्न में नीच का शुक्र पेट का कष्ट देता है।
तुला लग्न विभूतिया : चैतन्य महाप्रभु, महर्षि रमण, आचार्य श्री राम शर्मा, लंका पति रावण, अटल बिहारी वाजपाइ, गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा गांधी, मारग्रेट ठेचर, माधवराव सिंधिया, गोपीनाथ मुंडे, हिटलर, स्टालिन, अकबर, औरंगजेब,जांघिर, रानीलक्ष्मी बाई, करिश्मा कपूर, शंकरदयाल शर्मा, चंद्रिका कुमार तुंग, लारा दत्ता, देवानन्द, चार्ली चैपलिन, कपिलदेव, अजित अगरकर, मीना कुमारी, तब्बू, रिंकि खन्ना, विंस्टन चर्चिल, हरिवंश राय बच्चन, माधुरी दीक्षित, सोनू निगम, ऐश्वर्या राय, अरविंद केजरीवाल, अरबाज़ खान, सानिया मिर्ज़ा
जन्म कुण्डली के प्रथम भाव को लग्न भाव कहा जाता है | किसी जातक की जन्म कुण्डली का फलादेश बहुत कुछ उस जातक की कुण्डली के लग्न भाव की राशि, लग्नेश एवं उसकी स्थिति, लग्न भाव में स्थित ग्रह, लग्न भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रह, ग्रहों की युति आदि से प्रभावित होता हैं | आइए जानते हैं कि “तुला लग्न के फलादेश” क्या हैं |
तुला लग्न वाले जातक के गुण :-
तुला लग्न का स्वामी शुक्र है अतः तुला लग्न में जन्मा जातक विलासी एवं ऐश्वर्यशाली जीवन जीने का शौक़ीन होगा | मध्यम कद, गौर वर्ण तथा सुन्दर आकर्षक चेहरा इस लग्न में जन्मे जातक के लक्षण हैं | इस लग्न के जातकों में संतुलन की शक्ति असाधारण होती है | सामने वाले के बोलने से पहले ही उसकी मन की बात को समझ लेना आपका विशेष गुण है | तुरंत निर्णय लेने की क्षमता के कारण आप के प्रति सभी आकर्षित हो जाते है | तुला लग्न के जातक एक कुशल व्यापारी होते है |
तुला लग्न में जन्मे जातक विचारशील तथा ज्ञान प्रिय होते हैं | ऐसे जातकों का रूझान न्याय एवं अनुशासन के प्रति अधिक होते हैं | राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे जातक अधिक सफल होते हैं | परोपकार की भावना भी इनमें अत्याधिक होती है किन्तु अपने हानि-लाभ को भी ये पूरा ध्यान में रखते है | गरीबों को भोजन देने वाले, अतिथिसेवी तथा कुआं व बाग आदि बनाने वाले होते हैं | इनका हृदय शीघ्र ही द्रवित हो जाता है तथा इन्हें सच्चे अर्थों में पुण्यात्मा और सत्यावादी कहा जा सकता है | शुक्र के कारण ये बड़ी आयु में भी जवान दिखते हैं |
तुला लग्न में जन्म लेने वाले जातक बोल चाल में निपुण तथा चतुर व्यवहार के कारण किसी भी व्यापार में शीघ्र ही सफल हो जाते हैं | उचित एवं तुरंत निर्णय ले लेना इनकी प्रमुख विशेषता होती है | ऐसे जातक प्रायः धार्मिक विचारों के होते हैं तथा इन्हें आस्तिक और सात्विक भी कहा जा सकता है | कैसी भी परिस्थितियां हो ये अपने को उनके अनुरूप ढाल लेते हैं | छोसी से छोटी बात भी इनके मस्तिक को बेचैन कर देती है | भले ही ये साधनविहीन हों, किन्तु इनके लक्ष्य सदा उंचे ही होंगे | इनमें कल्पनाशक्ति गजब की होती है |
तुला लग्न में ग्रहों के प्रभाव :-
1.शुक्र :- शुक्र देवता इस लग्न कुण्डली में पहले और आठवें भाव के स्वामी हैं | लग्नेश होने के कारण वह कुण्डली के अति योगकारक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में शुक्र देवता उदय अवस्था में अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | तीसरे, आठवें, छठे और बारहवें भाव में उदय अवस्था में शुक्र देवता अशुभ फल देते हैं | कुण्डली के किसी भी भाव में सूर्य देव के साथ अस्त पड़े शुक्र देवता का रत्न हीरा और ओपल पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है | शुक्र देवता की अशुभता उनका पाठ और दान कर के दूर की जाती है |
2.मंगल :- मंगल देवता इस लग्न कुण्डली में दूसरे और सातवें भाव के स्वामी हैं | दोनों मारक स्थान के स्वामी होने के कारण मंगल देव इस कुण्डली के अतिमारक ग्रह माने जाते हैं | कुण्डली के किसी भी भाव में मंगल देव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देंगे | कुण्डली के किसी भी भाव में पड़े मंगल की अशुभता उनका दान या पाठ करके दूर की जाती जाती है | मंगल का रत्न मूंगा इस लग्न कुण्डली में कभी भी नहीं पहना जाता | मंगल देवता कहीं से अगर अपने घर को देख रहे हैं तो वह अपने घर को बचाएंगे |
3.बृहस्पति :- बृहस्पति देवता इस लग्न कुण्डली में तीसरे और छठे भाव के स्वामी हैं | दो अशुभ स्थनों के स्वामी होने के कारण बृहस्पति कुण्डली के मारक ग्रह माने जातें है l कुण्डली के सभी भावों में बृहस्पति देवता यदि उदय अवस्था में पड़ें हैं तो अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देंगे | छठे, आठवें और बारहवें भाव में स्थित बृहस्पति देवता विपरीत राज़ योग में शुभ फल देने की क्षमता भी रखतें है | विपरीत राज़ योग में आने के लिए शुक्र देवता का बलि और शुभ होना अति अनिवार्य है | बृहस्पति देव का रत्न पुखराज इस लग्न कुण्डली में नहीं पहना जाता बल्कि दान व पाठ करके उनकी अशुभता दूर की जाती है |
4.शनि :- शनि देवता इस लग्न कुण्डली में चौथे और पांचवे भाव के स्वामी हैं | एक केंद्र एवं एक त्रिकोण भाव स्वामी होने के कारण शनिदेव इस कुण्डली के सबसे योगकारक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, नवम, दशम और एकादश भाव में पड़े शनिदेव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | तीसरे, छठें, सातवें (नीच-राशि), आठवें और द्वादश भाव में स्थित शनि देव यदि उदय अवस्था में हैं तो वह अपनी योगकारकता खो देते हैं और अशुभ फल देते है | कुण्डली के किसी भी भाव में यदि शनिदेव अस्त अवस्था में पड़े हैं तो उनका रत्न नीलम पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है l शनि देव की अशुभता उनका पाठ और दान करके दूर की जाती है |
5.चंद्र :- चंद्र देवता इस कुण्डली के दशमेश हैं l अच्छे भाव के मालिक होने के कारण वह कुण्डली के शुभ फलदाता ग्रह माने जाते हैं | अपनी स्थिति के अनुसार वह कुण्डली में अच्छा फल देंगे | पहले, चौथे, पांचवे, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में स्थित चंद्र देव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी स्थिति अनुसार शुभ फल देंगे | दूसरे (नीच राशि), तीसरे, छठे, आठवे और बारहवे भाव में चंद्रदेव अशुभ माने जातें है | चंद्र देव की अशुभता उसके पाठ और दान करके दूर किया जाता है | चंद्र देव की दशा-अन्तर्दशा में कामकाज की वृद्धि के लिए उनका रत्न मोती पहना जाता है |
6.बुध :- बुध देवता इस लग्न कुण्डली में नवम और द्वादस भाव के स्वामी हैं | बुध देवता की साधारण राशि मिथुन कुण्डली के त्रिकोण भाव में आती है | बुध लग्नेश शुक्र देवता के अति मित्र भी है | इसलिए भाग्येश बुध इस कुण्डली के अति योगकारक माने जातें हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवे, सातवे, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में पड़े बुध देवता की जब दशा-अन्तर्दशा चलती है तो वह अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें हैं | तीसरे, छठे, आठवे और द्वादश भाव में यदि बुध देव उदय अवस्था में स्थित हैं तो अपनी योगकारकता खोकर अशुभ फल देतें है | किसी भी भाव में बुध देवता यदि अस्त अवस्था में पड़े हैं तो उनका रत्न पन्ना पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है |
7.सूर्य :- सूर्य देव इस कुण्डली में ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं जो की लाभेश होते हुए भी कुण्डली के मारक ग्रह हैं | सूर्य देव इस कुण्डली में अपनी दशा-अन्तर्दशा में सदैव कष्ट ही देते मिलेंगे | इस ग्रह का रत्न माणिक कभी भी धारण नहीं किया जाता | यह ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में अगर अच्छी जगह पड़ा हो तो लाभ के साथ -साथ समस्या तथा शारीरिक कष्ट भी लेकर आता है | इस लग्न कुण्डली में सूर्य देव मारक हैं तो इसका दान- पाठ करके इसके मारकेत्व को कम किया जा सकता है |
तुला लग्न ( Tula Lagna ) के लोग अपनी लग्न राशि के अर्थ ( तराज़ू ) के अनुसार ही सामंजस्य और बराबरी बना कर चलने वाले होते है। इस लग्न का तत्व वायु होता है, जो कभी-कभी अपना रौद्र रूप भी दिखाता है।
इस लग्न का स्वामी शुक्र ग्रह होता है, जो इनके जीवन के निजी क्षेत्र, सामाजिक, प्रेम संबंधो, आकर्षण के भाव को नियंत्रित करता है।
ये इनकी कुंडली के 8 वें घर का स्वामी होता है। जिसकी वजह से इनके जीवन में परिवर्तन होना निश्चित होता है।
बृहस्पति इनकी कुंडली में थोड़ा परेशानी लिए होता है। इसलिए उससे सम्बंधित रत्न धारण करने में विशेष सावधानी बरतना ज़रूरी हो जाता है।
शनि इनके जीवन और कुंडली में एक योगकारक के रूप में विराजित होता है, और इसके फलस्वरूप इनको बढ़ोतरी प्रदान करता है।
बुध इनके भाग्य को निर्देशित करता है। वहीँ मंगल एक मारक ग्रह के रूप में काम करता है।
व्यक्ति के शरीर में अच्छा रंग, सुगठित शरीर, लम्बा कद, चिकनी त्वचा, भूरे और काले बाल, नीली या भूरी आँखे, तोते जैसी तीखी नाक, गोल चेहरा, सुंदर नैन-नक्श के स्वामी होते है।
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तराशा हुआ शरीर, जवानी में पतले लेकिन बढ़ती आयु के साथ थुलथुल शरीर होता है। अपनी युवावस्था में इनकी मीठी मुस्कान,आकर्षक शरीर सबको आकर्षित करने और मोहने वाला होता है।
काफी लम्बे समय तक ये अपनी आयु से ज़्यादा जवान और सुन्दर दीखते हैं। इनकी आँखों में हमेशा एक शैतानी तैरती रहती है।
Tula Lagna Nature | तुला लग्न मानसिक प्रवृत्ति या स्वभाव
हमेशा सुन्दर दिखने के लिए आकर्षक वस्त्र,खुशबूदार इत्र का प्रयोग करते हैं। इनको कला और संगीत का बहुत शौक होता है।
tula-lagna-nature
इनका स्वभाव कल्पनाशील और सही अंतर्ज्ञान, शानदार बुद्धि, पूर्वविवेक, सराहनीय शोधन, सर्वोच्च क्षतिपूर्ति और सुखद प्रकृति से भरपूर होता है ।
इनकी सोच बहुत कल्पनाशील होती है। जिसके आधार पर ये सही अंदाज़ा लगाने में माहिर होते हैं।
शानदार बुद्धि, पूर्वविवेक, सराहनीय शोधन, सर्वोच्च क्षतिपूर्ति के गुणों से परिपूर्ण व्यक्तित्व इनका सबसे बड़ा गहना होता है।
साधारणतः इनके स्वभाव में कल्पनाशील कलाकार, आशावान, हंसमुख, मानवीय, न्यायसंगत, सहानुभूतिपूर्ण, प्यार करने वाला।
लेकिन परिवर्तनशील, समाज और शौकीनों का शौकीन और आमतौर पर कामुक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति छिपा होता है।
इस लग्न का व्यक्ति यदि चाहे तो आध्यात्मिक जीवन के उच्च स्तर पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, और ध्यान को जीवन का लक्ष्य बना सकता है।
इनका का मुख्य कारक ग्रह शुक्र होता है, जिसकी वजह से ये लोग बहुत विनम्र और मेहमाननवाज होते हैं।
वे सभी रूपों में सुंदरता के शौकीन होते हैं, आसानी से खुश हो जाते हैं, हमेशा समाज और दुनिया के कल्याण में सुख का आनंद लेते हैं। तुला लग्न वाले अक्सर राष्ट्रवाद को समर्थन करते हैं।
वैसे इनका व्यव्हार और स्वभाव दयालु,उदार ,आदर्शवादी, कलात्मक, अपनाने योग्य, रचनात्मक, सहज, प्रभावशाली, प्रेरणादायक, सेक्सी, भावुक और समझौता करने वाली प्रकृति की का होता है। जिसकी वजह से इनको सभी पसंद करते हैं।
इनके पास इतना अथाह स्नेह भाव होता है, कि वे आनंद के अलावा जीवन में और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं।
अपने विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षित होने और स्पष्टता और दूरदर्शिता के साथ बहस करने के स्वभाव से युक्त होते हैं।
जातकों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखा चाहिए और चीज़ों को अपने हाथ से निकलने से पहले ही सँभालने की सलाह दी जाती है।
क्योंकि ये लोग थोड़े खर्चीले स्वभाव के होते है। इसलिए इनको अपने खर्चों पर नज़र रखना चाहिए। अन्यथा भविष्य में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
Tula Lagna Health | तुला लग्न स्वास्थ्य
वैसे तो जातकों को अच्छा सुगठित शरीर प्राप्त होता है। लेकिन फिर भी इनको संक्रामक रोगों का खतरा बना रहता है।
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इनको अक्सर गुर्दे ,फेफड़ों, रीढ़, गर्भाशय, पुरुष गुप्तांग, पीनियल ग्लैंड्स आदि से जुडी बिमारियों से जूझते देखा जाता है।
इन बीमारियों से बचने और वृद्धावस्था में सेहतमंद रहने के लिए इनको हमेशा युवावस्था में व्यवस्थित जीवन जीने की सलाह दी जाती है।
Tula Lagna Money | तुला लग्न धन, संपत्ति
चूंकि यह लग्न वाले अन्य लोगों को तर्क, दूरदर्शिता और निर्णय के मामलों में उत्कृष्टता से परिपूर्ण दीखते हैं, इसलिए उनके साथी मार्गदर्शन और सही निर्णय के लिए उनकी ओर देखते हैं।
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इन सभी क्षेत्रों से जुड़े कामों में ये अपने भविष्य के रोज़गार की तलाश कर सकते है।
इसके आलावा ये अच्छे आलोचक,वकाळात, वित्तीय मामलो में हाथ आज़मा कर आने लिए धन कमा सकते हैं।
यदि वे अपने खर्चों को थोड़ा नियंत्रण में रखें तो इनको अपने जीवन में धन संपत्ति की कमी का सामना नहीं करना पड़ता।
Tula Lagna Prem, Vivah | तुला लग्न विवाह और प्रेम सम्बन्ध
यह जातक प्रेम सम्बन्ध बनाने में उस्ताद होते हैं, इसलिए इनका यौन जीवन बहुत अच्छा गुज़रता है।
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प्रेम में ईमानदार और स्नेही होते है, इनका पहनावा, शिष्टाचार विपरीत लिंग को बहुत जल्दी अपने आकर्षण में बांध लेता है।
परन्तु दुसरे के प्रति यह जितनी जल्दी आकर्षित होते है, उतनी ही जल्दी उनसे ऊब भी जाते हैं। इनको अपने विपरीत लिंग के सनिध्य में अत्यंत सुख की अनुभूति प्राप्त होती है।
ये जल्दी ही विवाह संबंध में बंध जाते हैं। विवाह उपरांत इनको मनोरंजन, सामाजिक समारोहों में शामिल होना,जीवन के हर पल को जीना, घर सजाना आदि में अत्यंत सुख की अनुभूति होती है।
विवाह उपरांत उन्हें उच्च जीवन स्तर पसंद होता है, लेकिन कभी-कभी उनके पास ऐसा साथी नहीं हो सकता जो उन्हें संतुष्ट कर सके। तब वो उस सम्बन्ध को एक अनचाहे बंधन के रूप में लेना शुरू कर उदासी में घिर जाते हैं।
इनके लिए सही जोडे के रूप में मिथुन और कुंभ राशि के लोग सबसे उपयुक्त हैं। वे मीन, मकर और कर्क राशि के लोगों को छोड़कर दूसरों के साथ सामंजस्य नहीं बना सकते।
Tula Lagna Family | तुला लग्न घरेलू वातावरण
खुशहाल और सामंजस्यपूर्ण घरेलू जीवन तुला लग्न वालों के जीवन का सार है। वे घर को सजाकर रखते हैं, अच्छी तरह से सुसज्जित और काफी आकर्षक।
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महंगे आभूषण उनके पास हमेशा होते हैं, जिसके वो बहुत शौक़ीन होते हैं।
उन्हें अपने बच्चों और परिवार से बहुत लगाव होता है। वे हमेशा एक अच्छे दोस्त होते हैं, ईमानदार राजा के समान उदार और घर पर पार्टियों के शौकीन और दोस्तों के साथ जिनके बिना वे नहीं रह सकते।
Tula Lagna Job, Business | तुला लग्न व्यवसाय या रोज़गार
इनके पास सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के रूप में काम करने के लिए बहुत कुछ होता है। वे वित्तीय और सामाजिक सफलता दोनों के साथ ज्यादातर अपना जीवन जीएंगे।
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वे अपने कामों से दूसरों को चोट नहीं पहुंचाते हैं, इसलिए वे लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय होते हैं।
कानून से जुड़े कामों के लिए सबसे उपयुक्त और खुद को तरल वस्तुओं, रसायनज्ञों, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों, परिवहन, नौसेना और चित्रकारों आदि में संलग्न कर सकते हैं।
इसके अलावा तुला लग्न वाले लेखक, संगीतकार, बैक सिंगर, आर्किटेक्ट, शिक्षक और अच्छे सेल्समैन हो सकते हैं।
Tula Lagna Lucky Number and Color | तुला लग्न स्वास्थ्य भाग्यशाली संख्या तारीख और रंग
इनके जीवन के भाग्यशाली दिन रविवार, सोमवार, शनिवार, मंगलवार और बुधवार हैं। जबकि गुरुवार इनके लिए हानिकारक है, और शुक्रवार मिश्रित परिणाम प्रदान करता है।
इनका शासक ग्रह शुक्र एवं अन्य ग्रहो के प्रभाव के बारे में विस्तृत जानकारी के लिये नवग्रह प्रभाव (Navagraha) पर जाये। अपितु मंगल ही नहीं अन्य ग्रहो के प्रभाव और सम्बंधित रत्न के बारे में जाने।
शुभ संख्या के रूप में 1, 2, 4 और 7 हैं। जबकि 5, 6, 3 और 9 संख्याओं के साथ इनका तालमेल ठीक नहीं बैठता है। इनकी कुंडली में संख्या 8 निवेश और लाभ के क्षेत्र को इंगित करती है ।
तुला लग्न
सम्पूर्ण उपासना मन्त्र
ॐगंरंह्रींक्लींश्रींदंखंभ्रंहंफ्रौं नमः
सूर्य : अंक 1 पाप ग्रह जब केंद्रों के स्वामी हों,ल देते हैं। सूर्य वृष लग्न में चतुर्थेश होकर योग कारक बन गया है। इसकी दशा में भूमि और भवन से लाभ, सुख की प्राप्ति, रोगों और ऋणों से मुक्ति मिलती है।
माणक, गोल मूंगा, 1 मुखी रुद्राक्ष सांड को आटा लाया खिलावे शिव मंदिर में चाँदी का नंदी भेट करे l बेल की जड़ी पहने ॐ घृणिः सूर्याय नमः
रविवार सूर्य सप्तमी व्रत रखे
चंद्रमा : अंक 2 दशमेश चंद्रमा यदि पक्षबल से हीन हो, तो शुभ फल देगा, सदैव शुभ कर्म पिता और अर्थ व्यवस्था का कारक मोती, मूनस्टोन धारणकरे, 2 मुखी रुद्राक्ष पहने, खिरनी की जड़ी पहने, पूर्णिमा व्रत, चतुर्थी व्रत,
मंगल : अंक 9 द्वितीयेश और सप्तमेश होकर मंगल प्रबल मारक होते हुवे भी व्यापार, पत्नी करियर, धन वाणी धन द्वितीय संतान कुटुंब का करक । मंगल की महादशा में धन व्यापर प्राप्त हो । राउंड लाल मूंगा धारण करे, अनंत मूल की जड़ी, 3 मुखी रुद्राक्ष पहने, ताम्बे का कड़ा ताम्बे में जल पिए, हनुमानजी को पूजे, रक्तांग भैरव पूजे,
बृहस्पति : अंक 3 तुला लग्न में बृहस्पति तृतीयेश और षष्ठेश होकर अपकारक होता है। इसकी दशा बाधाकारक होगी। इसकी दशा में व्यक्ति अपना बहुत-सा समय आमोद-प्रमोद और अपने नित नए शौकों को पूरा करने में खर्च करेगा। सर्वदा अशुभ और हानि करक दान करे
शनि : अंक 8 केंद्र (चतुर्थ) और त्रिकोण (पंचम) का स्वामी होकर शनि तुला लग्न के लिए बेहद समृद्धि और सफलता का पर्याय होता है। विशेषकर शनि में शनि और शनि में शुक्र का अंतर मनोकामना पूर्ण करने वाला होना चाहिए।सर्वदा शुभ करक
अंक 8 वृष लग्न के लिए यह श्रेष्ठ दशा है, क्योंकि शनि नवमेश और दशमेश होकर केंद्र त्रिकोण का स्वामी हो गया है। सर्वदा शुभ नीलम धारण करे काल भैरव शिव कृष्ण काली जी को पूजे बिच्छू की जड़ पहने 7 मुखी रुद्राक्ष पहने
बुध : अंक 5 नवमेश होने से बुध हालांकि भाग्यवृद्धि करता है, लेकिन द्वादशेश होकर व्याधिक्य देता है। बुध की दशा में यद्यपि आय के कई-कई स्रोतों का सृजन संभव है, लेकिन व्ययों की तुलना में स्थिति को सकारात्मक नहीं कहना चाहिए। अच्छी दशा के लिए बुध का उदय रहना आवश्यक है।भाव का स्वामी होने से प्रायः शुभ फल ही देता है। हालांकि इसकी स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बुध द्वितीयेश होने से साधारण मारकेश बन जाता है। सर्वदा शुभ धन सिद्धि कारी
पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने
शुक्र : अंक 6 लग्नेश शुक्र की दशा बल-वीर्य में वृद्धि करती है। अष्टमेश होने के कारण सामान्य बाधाएं आनी भी संभावित हैं, लेकिन यदि चंद्रमा मकर या कुंभ में हो, तो शुक्र की महादशा में विचारे गए कार्यों का क्रियान्वयन हो जाता है।अंक 6 लग्नेश होने से शुक्र की शुभता में कोई संशय नहीं है, लेकिन अकसर देखा जाता है कि यदि शुक्र की महादशा जीवन की प्रौढ़ावस्था के बाद आती है, तो शुभ फल न्यूनतम मिलते हैं। वैसे भी वृष लग्न में शुक्र षष्ठेश भी है, जो कि रोग, शत्रु और ऋणों में वृद्धि का संकेत देता है।सर्वदा शुभ लाभ कारी सफ़ेद स्फटिक पुखराज पहने हीरा पहने, सर्पोखे की जड़ी पहने, 6 मुखी रुद्राक्ष पहने
7. तुला लग्न के इष्ट - मंत्र-
तुला राशि : इन्हें श्वेत हरे गणेश और विष्णु देव और दुर्गा भैरव श्री विद्या में माता षोडशी या माता ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए।
ॐ गौरीपुत्राय नम:।
ॐ नमो भगवते गजाननाय
ॐ दं यं वैष्णवे नम
ॐ ह्रींश्रींक्लींदुं दुर्गाय नमः
ॐ अर्धनारीश्वराय नमः ऊँ रुद्राय नम:
तुला राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।
ॐगंह्रींग्रींह्रींश्रींदंलंवंयंभ्रंह्रींक्लींश्रींऎंसौःनमः ॐ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:
इसके अलावा ये गृह आपके अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे इनकी दशा में जप करावे
शुक्र मंत्र- 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:'।
शुक्र का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शुं शुक्राय नम:'।
शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'।
शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'
बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।
बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'।
सूर्य तांत्रिक मंत्र- 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: सूर्याय नमः
चन्द्रमसे नम:'।चंद्र एकाक्षरी मंत्र- ॐ सों सोमाय नम:।
तुला लग्न के लिए शुक्र, शनि, बुध, मंगल चंद्र, योग कारक हैं इसलिए हीरा, नीलम,पन्ना, मूंगा, मोती धारण करें।
1,2,3,4,6,7,मुखी रुद्राक्ष भी धारण
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गुरु के दान की सामग्री अंक 3
3gm सोने की गिन्नी, पित्तल के,5 मुखी रुद्राक्ष, भारंगी की जड़, 11 बर्तन 3अलग ,8अलग धार्मिक, पुखराज, पुस्तकें, केसर, हल्दी, पीताम्बर, चने की दाल, पीले मूंग, पीले पुष्प, पीला वस्त्र, शक्कर, घोड़ा (लकड़ी या खिलौना घोड़ा), चने की दाल, हल्दी, ताजे फल, पके केले नमक, स्वर्णपत्र, कांस्य, पीतल, कपास, पीला गुड़, पीली गेंद, बेसन की सेवे, बेसन के नमकीन, बेसन के बने व्यंजन, मक्की, अध्यन सामग्री, अध्यन के लिए स्टेशनरी का सामान, किताब, कॉपी कलम, कागज़, ग्रन्थ, भगवा वस्त्र,
राहु+केतु+गुरु+
जौ+बाजरी+चनादाल+मक्का
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गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को दान करे
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