भुवन भास्कर - अध्याय 1 वास्तुपुरुषका प्रादुर्भाव

भुवन भास्कर अध्याय 1

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्राक्कथन
हिन्दू संस्कृति बहुत विलक्षण है। इसके सभी सिद्धान्त पूर्णत: वैज्ञानिक हैं और उनका एकमात्र उद्देश्य मनुष्यमात्रका कल्याण करना है। मनुष्यमात्रका सुगमतासे एवं शीघ्रतासे कल्याण
कैसे हो— इसका जितना गम्भीर विचार हिन्दू-संस्कृतिमें किया
गया है, उतना अन्यत्र नहीं मिलता। जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त मनुष्य जिन-जिन वस्तुओं एवं व्यक्तियोंके सम्पर्कमें आता है और जो-जो क्रियाएँ करता है, उन सबको हमारे क्रान्तदर्शी ऋषि- मुनियोंने बड़े वैज्ञानिक ढंगसे सुनियोजित, मर्यादित एवं सुसंस्कृत किया है और उन सबका पर्यवसान परम श्रेयकी प्राप्तिमें किया है। इतना ही नहीं, मनुष्य अपने निवासके लिये भवन-निर्माण करता है तो उसको भी वास्तुशास्त्रके द्वारा मर्यादित किया है! वास्तुशास्त्रका उद्देश्य भी मनुष्यको कल्याण-मार्गमें लगाना है-
'वास्तुशास्त्रं प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया' (विश्वकर्मप्रकाश) ।
शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार चलनेसे अन्तःकरण शुद्ध होता है और शुद्ध अन्तःकरणमें ही कल्याणकी इच्छा जाग्रत् होती है।

'वास्तु' शब्दका अर्थ है – निवास करना (वस निवासे) । जिस भूमिपर मनुष्य निवास करते हैं, उसे 'वास्तु' कहा जाता है। कुछ वर्षोंसे लोगोंका ध्यान वास्तुविद्याकी ओर गया है। प्राचीनकालमें विद्यार्थी गुरुकुलमें रहकर चौंसठ कलाओं (विद्याओं) की शिक्षा प्राप्त करते थे, जिनमें वास्तुविद्या भी सम्मिलित थी। हमारे प्राचीन
ग्रन्थोंमें ऐसी न जाने कितनी विद्याएँ छिपी पड़ी हैं, जिनकी तरफ अभी लोगोंका ध्यान नहीं गया है! सनत्कुमारजीके पूछनेपर नारदजीने कहा था-
[४]
ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेद सामवेदमाथर्वणं
चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य राशिं दैवं निधिं
वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां
नक्षत्रविद्या:सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि
(छान्दोग्योपनिषद् ७ । १ । २)
'भगवन्! मुझे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद
याद है। इनके सिवाय इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद (व्याकरण), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र,
नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या,
सर्पविद्या और देवजनविद्या- हे भगवन्! यह सब मैं जानता
भारतकी अनेक विलक्षण विद्याएँ आज लुप्त हो चुकी हैं और
उनको जाननेवालोंका भी अभाव हो गया है। किसी समय यह
देश भौतिक और आध्यात्मिक-दोनों दृष्टियोंसे बहुत उन्नत था, पर आज यह दयनीय स्थितिमें है!
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगाविप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥
(महा०, आश्व० ४४।१९; वाल्मीकि० २। १०५/१६)
'समस्त संग्रहोंका अन्त विनाश है, लौकिक उन्नतियोंका
अन्त पतन है, संयोगोंका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त
मरण है।' परन्तु लोगोंकी ऐसी धारणा है कि पहले कभी पाषाणयुग था, आदमी जंगलोंमें रहता था और धीरे-धीरे विकास होते-होते अब मनुष्य वैज्ञानिक उन्नतिके इस युगमें आ गया है।
वास्तवमें वैज्ञानिक उन्नति पहले कई बार अपने शिखरपर पहुँचकर नष्ट हो चुकी है! पाषाणयुग पहले कई बार आकर जा चुका है और आगे भी पुनः आयेगा! यह सृष्टिचक्र है। इसमें चक्रकी तरह सत्य, त्रेता, [५]
द्वापर और कलि- ये चारों युग दिनरात्रिवत् बार-बार आते हैं
और चले जाते हैं। समय पाकर विद्याएँ लुप्त और प्रकट होती
रहती हैं। गीतामें भी भगवान्ने कहा है-
परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो एवं
स कालेनेह महता योगो नष्टः
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
विदुः । परन्तप ॥
(४।२-३)
'हे परन्तप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोगको राजर्षियोंने जाना; परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा
है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है;
जण क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।' कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि वास्तुशास्त्रके अनुसार मकान बनानेमात्रसे हम सब दुःखोंसे, कष्टोंसे छूट जायँगे, हमें शान्ति मिल जायगी। वास्तवमें ऐसी बात है नहीं! जिनका मकान वास्तुशास्त्रके अनुसार बना हुआ है, वे भी कष्ट पाते देखे जाते हैं। शान्ति तो कामना-ममताके त्यागसे ही मिलेगी-
'स शान्तिमाप्नोति न कामकामी' (गीता २।७०)
'निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति' (गीता २ । ७१)
'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)
एक श्लोक आता है-
वैद्या वदन्ति कफपित्तमरुद्विकाराञ्ञ्ज्योतिर्विदो ग्रहगतिं परिवर्तयन्ति ।
भूताभिषङ्ग इति भूतविदो वदन्ति प्रारब्धकर्म बलवन्मुनयो वदन्ति ॥
‘रोगोंके उत्पन्न होनेमें वैद्यलोग कफ, पित्त और वातको
कारण मानते हैं, ज्योतिषीलोग ग्रहोंकी गतिको कारण मानते हैं,
[६]
प्रेतविद्यावाले भूत-प्रेतोंके प्रविष्ट होनेको कारण मानते हैं; परन्तु
बलवान् (कारण) मानते हैं।'
मुनिलोग प्रारब्धकर्मको ही
• तात्पर्य है कि अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितिके आने में
• मूल कारण प्रारब्ध है। प्रारब्ध अनुकूल हो तो कफ-पित्त-वात,
ग्रह आदि भी अनुकूल हो जाते हैं और प्रारब्ध प्रतिकूल हो तो
वे सब भी प्रतिकूल हो जाते हैं। यही बात वास्तुके विषयमें भी
समझनी चाहिये। देखनेमें भी ऐसा आता है कि जिसे वास्तुशास्त्रका ज्ञान ही नहीं है, उनका मकान भी स्वतः वास्तुशास्त्र के अनुसार
बन जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सब कुछ प्रारब्धपर
छोड़कर बैठ जायँ! हमारा कर्तव्य शास्त्रकी आज्ञाका पालन करना
है और प्रारब्धके अनुसार जो परिस्थिति मिले, उसमें सन्तुष्ट रहना है। प्रारब्धका उपयोग केवल अपनी चिन्ता मिटानेमें है। 'करने' का क्षेत्र अलग है और 'होने' का क्षेत्र अलग है। हम व्यापार आदि 'करते' हैं और उसमें लाभ या हानि 'होते' हैं। 'करना'हमारे हाथमें (वशमें) है, 'होना' हमारे हाथमें नहीं हैं। इसलिये हमें 'करने' में सावधान और 'होने' में प्रसन्न रहना है। गीतामें
भगवान्ने कहा है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
(२। ४७)
'कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी
नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी कर्म न
करनेमें भी आसक्ति न हो।'
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥
(गीता १६ । २४)
'अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही  प्रमाण है- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत
कर्तव्य-कर्म करनेयोग्य है, अर्थात् तुझे शास्त्रविधिके अनुसार कर्तव्य-कर्म करने चाहिये।' वास्तुविद्याके अनुसार मकान बनानेसे कुवास्तुजनित कष्ट तो दूर हो जाते हैं, पर प्रारब्धजनित कष्ट तो भोगने ही पड़ते हैं। जैसे— औषध लेनेसे कुपथ्यजन्य रोग तो मिट जाता है, पर प्रारब्धजन्य रोग नहीं मिटता। वह तो प्रारब्धका भोग पूरा होनेपर ही मिटता है। परन्तु इस बातका ज्ञान होना कठिन है कि कौन- सा रोग कुपथ्यजन्य है और कौन-सा प्रारब्धजन्य ? इसलिये हमारा कर्तव्य यही है कि रोग होनेपर हम उसकी चिकित्सा करें, उसको
मिटानेका उपाय करें। इसी तरह कुवास्तुजनित दोषको दूर करना
भी हमारा कर्तव्य है। वास्तुविद्या बहुत प्राचीन विद्या है। विश्वके प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' में भी इसका उल्लेख मिलता है। इस विद्याके अधिकांश ग्रन्थ लुप्त हो चुके हैं और जो मिलते हैं, उनमें भी परस्पर मतभेद है। वास्तुविद्याके गृह-वास्तु, प्रासाद-वास्तु, नगर-वास्तु, पुर-
वास्तु, दुर्ग-वास्तु आदि अनेक भेद हैं। प्रस्तुत 'भवनभास्कर'
पुस्तकमें पुराणादि विभिन्न प्राचीन ग्रन्थोंमें विकीर्ण गृह-वास्तुविद्याकी सार-सार बातोंसे पाठकोंको अवगत करानेकी चेष्टा की गयी है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
भवनभास्कर
पहला अध्याय
लम्बोदरं परमसुन्दरमेकदन्तं रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम् ।
उद्यदिवाकरनिभोज्ज्वलकान्तिकान्तं विघ्नेश्वरं सकलविघ्नहरं नमामि ॥
सामस्वरधीरनाद देवप्राग्वंशकायाखिलसत्रसन्थे।सनातनात्पन्भगवन्प्रसीद ॥

वास्तुपुरुषका प्रादुर्भाव और वास्तुशास्त्रके उपदेष्टा भगवान् शङ्करने जिस समय अन्धकासुरका वध किया, उस
समय उनके ललाटसे पृथ्वीपर पसीनेकी बूँदें गिरीं। उनसे एक,विकराल मुखवाला प्राणी उत्पन्न हुआ। उस प्राणीने पृथ्वीपर गिरेहुए अन्धकोंके रक्तका पान कर लिया। फिर भी जब वह तृप्त नहीं हुआ, तब वह भगवान् शङ्करके सम्मुख घोर तपस्या करने लगा।

उसकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् शङ्करने उससे कहा कि तुम्हारी जो कामना हो, वह वर माँग लो। उसने वर माँगा कि मैं तीनों लोकोंको ग्रसनेमें समर्थ होना चाहता हूँ। वर प्राप्त करनेके बाद वह अपने विशाल शरीरसे तीनों लोकोंको अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वीपर आ गिरा। तब भयभीत देवताओंने उसको अधोमुख करके वहीं स्तम्भित कर दिया। जिस देवताने उसको जहाँ दबा रखा था, वह देवता उसके उसी अंगपर निवास करने लगा। सभी देवताओंके निवास करनेके कारण वह 'वास्तु' नामसे प्रसिद्ध हुआ। 
विश्वकर्मा स्रुकतुण्ड पूर्तेष्टधर्म श्रवणोऽसि मयस्तथा ।पुरन्दरः ॥भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः
ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च । वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः ।
(मत्स्यपुराण २५२ २-४)

'भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित्,भगवान् शङ्कर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, भगवान्
वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति- ये अठारह वास्तुशास्त्र के उपदेष्टा माने गये हैं।'

जब मनुष्य अपने निवासके लिये ईंट, पत्थर आदिसे गृहका
निर्माण करता है, तब उस गृहमें वास्तुशास्त्रके नियम लागू हो जाते हैं। वास्तुशास्त्रके नियम ईंट, पत्थर आदिकी दीवारके भीतर ही लागू होते हैं। तारबंदी आदिके भीतर, जिसमेंसे वायु आर-पार होती हो, वास्तुशास्त्रके नियम लागू नहीं होते।
वास्तुशास्त्रमें दिशाओंका बहुत महत्त्व है। सूर्यके उत्तरायण
या दक्षिणायनमें जानेपर उत्तर और दक्षिण तो वही रहते हैं, पर
पूर्व और पश्चिममें अन्तर पड़ जाता है। इसलिये ठीक दिशाका
ज्ञान करनेके लिये दिग्दर्शकयन्त्र (कम्पास)-की सहायता लेनी
चाहिये। इस यन्त्रमें तीन सौ साठ डिग्री रहती है, जिसमें (आठों
दिशाओंमें) प्रत्येक दिशाकी पैंतालीस डिग्री रहती है। अतः
दिशाका ठीक ज्ञान करनेके लिये डिग्रीको देखना बहुत आवश्यक
है। दिशाओंकी स्थिति इस प्रकार है-

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