ज्योतिष का पुरातन प्रादुर्भाव

 ज्योतिष का पुरातन प्रादुर्भाव



क्या है ज्योतिष ? 

क्यों है उपयोगी ?

सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार कहा जा सकता है कि ज्योतिष शास्त्र ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों आदि के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन शास्त्र है। जैसा कि कहा भी गया है ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहणां बोधक शास्त्रम्। दूसरे शब्दों में हम ज्योतिष को ’सामाजिक ब्रह्मांडीय शास्त्र’ भी कह सकते हैं। यह अनुमानतः 3000 वर्षों से अधिक पुराना विज्ञान है।

’ज्योतिष’ शब्द संस्कृत का एक मूल शब्द है। कुछ विद्वान इसे ’ज्योति़  ईश’ अर्थात् ’ईश्वर का प्रकाश’ ऐसा विश्लेषित करके समझाने का प्रयास भी करते हैं। परन्तु यह मात्र शब्द विलास ही जान पड़ता है। तार्किकता के आधार पर यह अर्थ सत्य प्रमाणित नहीं होता। क्योंकि ज्योतिष शब्द की संरचना ’ज्योतिस् $ अच्’ के अवयवों के अनुसार (ज्योतिस्-यानी प्रकाश तथा अच्-यानी प्रार्थना करना) ’ज्योतिष’ का अर्थ ’प्रकाश की प्रार्थना’ करना सिद्ध होता है। (इसी ’अच्’ से ’अर्चना’ का भी विन्यास होता है) यह व्याकरण की दृष्टि से भी अधिक उचित है और तर्कशास्त्र की दृष्टि से भी युक्तिसंगत है।

प्रायः ज्योतिष को भविष्य का ज्ञान करानेवाला शास्त्र ही माना जाता है। परन्तु यह अर्ध सत्य है। ज्योतिष समय और मानव के आर-पार देखने की कला है। इससे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जाना जा सकता है और मनुष्य के व्यक्तित्व, स्वभाव, प्रकृति, गुण-दोष, रोग-विकार आदि को भी ठीक-ठीक जाना जा सकता है।

ज्योतिष के सम्बन्ध में समाज अनेक भ्रान्तियों का शिकार है। ज्योतिष को ठीक-ठीक समझने के लिए मात्र परिभाषा या शब्दार्थ पर विचार करना पर्याप्त नहीं है। अपितु इस विषय में विस्तृत गहन चर्चा और इस संदर्भ में पनपी भ्रान्तियों का खण्डन भी आवश्यक है। 

क्या ज्योतिष अंधविश्वास है ?

विज्ञानवादियों एवं आधुनिक लोगों की यह आम धारणा है कि ज्योतिष अंधविश्वास और मात्र पंडितों की कमाई का धंधा है। लेकिन यह भी सत्य है कि ऐसी धारणा उन्हीं सज्जनों की है, जिन्होंने ज्योतिष को पढ़ा या जाना नहीं है, मात्र सुना ही है। किसी प्रणाली को जाने व समझे बिना ही उसका विरोध मात्र इसलिए करना कि वह प्राचीन है अथवा आध्यात्मिकता से सम्बन्धित है, बुद्धिमत्ता नहीं है। दो पदार्थो/सत्ताओं/विषयों को तत्त्वतः जानकर उनके सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही हम उनकी तुलना कर सकते हैं। तभी हम किसी को श्रेष्ठ और किसी को औसत या निम्न कहने के अधिकारी हैं। मात्र इसलिए नहीं कि वह हमें पसंद नहीं है या हमारी रुचि के अनुकूल नहीं है। सत्य हमेशा हमारी पसंद का ही हो, यह जरूरी नहीं है। 

ज्योतिष के सम्बन्ध में भ्रान्तियां और उनके कारण

किसी भी भ्रान्ति का एकमात्र कारण ’ज्ञेयता’ या ’समग्र दृष्टि’ का अभाव होता हैं। मजे की बात है कि ज्योतिष के विरोधी ही मात्र भ्रान्तियों के शिकार नहीं हैं। अपितु ज्योतिष के पक्षधर/समर्थक या इसे प्रयोग करने वाले बहुत से तथाकथित ज्योतिषी भी भ्रान्तियों के शिकार हैं (इनमें मेरे परिचित कुछ ऐसे विद्वान भी शामिल हैं जो 25-30 वर्षों से इसी विषय से गहनता से जुड़े होने का दम भरते हैं)। अतः आगे बढ़ने से पूर्व इन भ्रान्तियों का, इनके कारणों तथा निवारण का भी प्रयास करना युक्तिसंगत होगा। साथ ही जिज्ञासु पाठकों का ज्ञानवर्धन एवं संशय हरण होने के साथ-साथ इस विषय (ज्योतिष) को ठीक-ठीक समझ सकने के लिए सशक्त भूमिका एवं सुदृढ़ धरातल (च्संजम वितउ) भी प्राप्त हो सकेगा।

अतः यह विवेचन सम्पूर्ण पुस्तक से अधिक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी होगा। इसे नजरअंदाज करने की लापरवाही न करें।

विरोध में भ्रान्तियां-1. ज्योतिष अंधविश्वास/निराधार है।

2. ज्योतिष मात्र कर्मकाण्ड अथवा ’पंडों’ की आजीविका का साधन है। अन्यथा जीवन में उपयोगी नहीं।

3. ज्योतिष कपोल कल्पना है। अथवा ठगने की विद्या है। 

पक्ष में भ्रान्तियां-1. ज्योतिष मात्र ग्रहों की गतियों का गणित है। 

2. ज्योतिष ईश्वर का प्रकाश है अतः परिपूर्ण एवं दोषरहित है। 

3. ज्योतिष द्वारा पूर्व निश्चित भाग्य को बदला जा सकता है। 

4. ज्योतिष एक स्वतंत्र विज्ञान है और ज्योतिषी सर्वज्ञ होता है।

दोनों प्रकार की भ्रान्तियों के मूल कारण-1. ’समग्र दृष्टि’ का अभाव। किसी अंग विशेष को ही सम्पूर्ण मान लेने का भ्रम। दूसरे शब्दों में अज्ञान एवं अर्धज्ञान।

2. केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना। अतिसूक्ष्म, मापे तथा देखे न जा सकने वाले घटकों के अस्तित्व को न स्वीकारना। 

3. पुनर्जन्म की मान्यता के प्रति अविश्वास।

4. कालान्तर से होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान न देना तथा प्राचीन सिद्धांतों, उद्धरणों, संज्ञाओं को आज के परिप्रेक्ष्य में ज्यों का त्यों तोलने की कोशिश करना।

5. ज्योतिष को दर्शन शास्त्र, तर्क शास्त्र आदि से पृथक ईश्वर प्रदत्त, ऋषियों का पसाद मानकर सम्पूर्ण या असंशोधनीय समझना।

6. कर्मफल के बन्धन को तत्त्वतः न जानना अथवा कर्म के स्वरूप या कार्य और कारण के सम्बन्ध को न समझ पाना।

7. विषय को जाने और समझे बिना ही अपनी रुचि या अरुचि के आधार पर ’पूर्वाग्रह’ या ’हठधर्मिता’ से काम लेना। उसका निष्पक्षता के साथ विवेचन न करना।

8. शब्द के मात्र शब्दार्थ पर ही विचार करना। उसके भावार्थ, गूढार्थ, प्रचलित अर्थ एवं पर्याय अर्थों, संश्लिष्ट अर्थों पर विचार न करना।

9. यह मानना कि हर पुरानी चीज बदल दी जानी चाहिए।

यदि हम इन भ्रान्तियों के मूल कारणों पर ही थोड़ा विवेचन कर लें तो ये भ्रान्तियां स्वयं ही खण्डित हो जाएंगी। फिर भी हम बाद में इन भ्रान्तियों के औचित्य को भी संक्षेप में तोलेंगे। तभी ज्योतिष विषय की ओर आगे बढ़ेंगे। 

मूल कारणों के औचित्य एवं अनौचित्य का विवेचन

1. समग्र दृष्टि-किसी विषय/वस्तु/सत्ता/पदार्थ के विषय में हम ठीक-ठीक तभी जान सकते हैं, जब हम उसे समग्रता के साथ देखें और हमारी देखने की सामर्थ्य भी पूर्ण हो। जैसे-कमजोर आंखोंवाला तब तक देखी हुई वस्तु को वास्तविक रूप में सुविधापूर्वक नहीं पहचान सकता, जब तक उसके पास उचित नम्बर का चश्मा न हो। अतः दृष्टि सामर्थ्य का पूरा होना, पहले तो यही आवश्यक है।

यदि हम ’समग्रता’ से नहीं देखते और मात्र अंगविशेष या कोणविशेष को देखकर उसी के आधार पर समूचे का परिणाम/निष्कर्ष निकालने की चेष्टा करते हैं तो हम सत्य पर नहीं पहुंचते । या तो हम भ्रम में पड़ते हैं या फिर संशय में । अथवा मिथ्याभास (सांप को रस्सी समझना या रस्सी को सांप समझ लेना) या अपूर्ण सत्य को ही पूर्ण अथवा वास्तविक सत्य समझ लेते हैं। जैसे चार अंधों को किसी ने बताया कि उनके सामने एक हाथी खड़ा है और चारों ने उसे छूकर/टटोल कर जानने की कोशिश की। जिसने हाथी के पैर को टटोला उसका निष्कर्ष था कि हाथी खम्बे जैसा होता है। जिसने सूंड टटोली थी उसने बताया कि हाथी अजगर जैसा होता है। हाथी की पूंछ टटोलने वाले अंधे ने हाथी को मोटे रस्से जैसा बताया और हाथी के कान को पकड़ने वाले अंधे ने हाथी को सूपध्पंखे जैसा माना। (उदाहरण/कथा-पुरानी है। मैं अक्सर इसे दोहराता भी हूं। क्योंकि यह एकदम सटीक है और महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर आसानी से संकेत देती है।)

इस प्रकार हाथी के विषय में चारों अंधों के निष्कर्ष भिन्न थे। न केवल भिन्न थे, बल्कि सत्य भी नहीं थे। जबकि अंधों के प्रयासों, प्रयासों के प्रति ईमानदारी, अनुभवों तथा अनुभवों को अभिव्यक्त करने की ईमानदारी में कोई कमी नहीं थी। हरेक ने अपने-अपने हाथों में आने वाले अंग को तसल्ली से जांचा-परखा था और जिस नतीजे पर पहुंचे थे उसे ज्यों का त्यों बताया था, फिर भी वे सत्य नहीं जान सके थे, क्योंकि आंख न होने से उन्होंने सम्पूर्ण हाथी को नहीं देखा था बल्कि एक अंगविशेष को ही सम्पूर्ण समझ बैठे थे। ’समग्र दृष्टि’ के अभाव में ऐसा ही होता है। कहानी यहां खत्म हो जाती है। मूल संदेश भी यहां खत्म जाता है। लेकिन पूरा लाभ तब प्राप्त होगा, जब हम इस कहानी पर थोड़ा-सा और आगे विचार करेंगे।

क्या एक अंधा बाकी अंधों के निष्कर्षों को सही मानेगा ? -बिल्कुल नहीं। क्योंकि उसका अपना अनुभव औरों से सर्वथा भिन्न है। अतरू चारों अंधे एक-दूसरे को गलत/झूठा और स्वयं को सही/सच्चा बताएंगे। न केवल बताएंगे बल्कि वादविवाद के बाद शायद एक-दूसरे का सिर भी फोड़ें। बात यहीं खत्म हो जाती हो तो भी गनीमत थी। मगर ये अंधे अपने बच्चों और शिष्यों को भी यही सिखाएंगे कि हाथी ऐसा ही होता है। हमने स्वयं अनुभव करके जाना है। (बच्चे व शिष्य भी अंधे हुए या समग्र दृष्टि से हीन हुए तो पिता या गुरु की बात को सत्य मानेंगे और इस प्रकार विभिन्न मत या सम्प्रदाय चल निकलेंगे-जिनमें एक भी सही नहीं होगा।)

केवल आंख वाला/समग्रता से हाथी को देखने और पहचानने वाला ही यह जान सकता है कि चारों अंधे अपने-अपने स्थान पर सही हैं, परन्तु सत्य पर एक भी नहीं पहुंचा है। लेकिन वह जान तो सकता है-अंधों को जनवा या मनवा नहीं सकता। अंधे तो उसके निष्कर्ष को भी अपने अनुभवों के आधार पर चैलेंज और कण्डम करने का प्रयास करेंगे।

निष्कर्ष-अतः आंख वाला भी मात्र अंधों पर हंसने के या मौन रह जाने के और क्या कर सकता है? ज्ञान के क्षेत्र में भी अक्सर ऐसा ही होता है। जो स्वयं साक्षात्कार करके सत्य को जानता है, सत्य उसी का होता है। वह दूसरे को तब तो समझा सकता है, जब दूसरा सत्य को पाने के उद्देश्य से उसके प्रति श्रद्धा और विश्वास लेकर उसकी शरण मंब आए। अन्यथा हरगिज नहीं समझा सकता, क्योंकि सामने वाला निर्णय तो अपने सीमित अनुभव के आधार पर पहले ही ले चुका है। ऐसी ही स्थिति या असमर्थता को कवि ने गिरा अनैन नैन बिनु वाणी कहा है। सत्य पाना है तो समग्र दृष्टि उत्पन्न करें। अथवा किसी समग्र दृष्टि वाले की शरण में अपनी बुद्धि व अनुभव का समर्पण कर दें। उसी के वाक्य को ’ब्रह्मवाक्य’ माने। इसी को गुरु धारण करना कहते हैं। असमर्थ के कल्याण का यही उपाय है। 

प्रत्यक्ष प्रमाण-प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वोत्तम है। क्योंकि वह स्वयं अपने ही ज्ञान व अनुभव पर आधारित होने से तुरन्त सन्तुष्टि प्रदान करता है और व्यक्ति को लेशमात्र भी शंका नहीं रह जाती। परन्तु प्रत्यक्ष की सीमाएं हैं। जैसे ऊपर कथा में अंधे होने की मजबूरी से स्वयं प्रत्यक्ष या अनुभूत करने से सत्य की प्राप्ति नहीं हुई। इस संदर्भ में इसी स्थूल उदाहरण की और सम्भावनाएं तथा शर्तों को भी विचारिए और प्रत्यक्ष की सीमाएं देखिए -

सबसे पहले तो आपकी दृष्टि सही हो। दूसरी बात उसमें समग्रता से देखने की सामर्थ्य हो। तीसरी बात प्रकाश पर्याप्त मात्रा में हो। अंधेरे में रस्सी को सांप समझने या सांप को देख ही न पाने की सम्भावना होगी। चौथी बात जिसे देखा जा रहा है वह मलिन न हो, ढका हुआ न हो तथा स्थिर हो। अन्यथा उसके वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचाना जा सकेगा। पांचवीं बात आपकी दृष्टि व दृश्य के बीच में दीवार आदि अवरोध न हो। अन्यथा आप उस पार देख ही नहीं पाएंगे। छठी बात जिसे आप देख रहे हैं, वह आपकी दृष्टि सीमा में हो। अधिक दूर का भी ठीक दिखाई नहीं देता। उससे भी अधिक दूर का दृष्टि ठीक होने पर भी दिखाई नहीं देता। सातवीं बात आंख के बिल्कुल निकट की वस्तु अथवा बहुत तीव्र प्रकाश में रखी वस्तु भी दिखाई नहीं देती। सही देख पाने के लिए ये सभी शर्ते जरूरी हैं।

इसके बाद भी दृष्टि की एक सीमा है। आप अपनी आंख में पड़ा हुआ काजल नहीं देख सकते। दर्पण या पानी उपलब्ध नहीं हो तो स्वयं अपना चेहरा नहीं देख सकते। अपने शरीर का पिछला हिस्सा नहीं देख सकते। अपने शरीर के भीतर नहीं देख सकते। माइक्रोस्कोप से आप सूक्ष्म वस्तुओं को देख सकते हैं (माइक्रोस्कोप न हो अथवा उसे सेट करना न जानते हों तो वह भी नहीं देख सकते।) मगर दुनिया में और भी अतिसूक्ष्म वस्तुएं/प्राणी हैं-जो सूक्ष्मदर्शी से भी देखे नहीं जा सकते। आपके पास दूरबीन हो या खगोलबीन हो और आप उसका प्रयोग भी जानते हों तो औरों की अपेक्षा दूर तक देख लेंगे। पर दुनिया/सृष्टि खगोलबीन से भी आगे है।

इतने पर भी सृष्टि की आयु के सामने आपकी आयु क्या है ? अपने सारे जीवन में आप उस शहर का ही चप्पा-चप्पा नहीं देख पाते जहां रह रहे हैं ? पूरी दुनिया, पूरा ब्रह्मांड, सागर तल या पाताल की तो बात ही क्या है ? छोटी-सी आयु में आप सभी विषय, सभी पदार्थ, सभी सत्ताएं कैसे प्रत्यक्ष कर सकते हैं ? जबकि प्रत्यक्ष के साथ ऊपर बताई गई तमाम शर्ते भी जुड़ी हुई हैं। अतः निष्कर्ष यह है कि मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने से समूचे को जाना नहीं जा सकता, हमें और प्रमाणों का सहारा भी लेना ही होगा।

अन्य प्रमाण-भारतीय दर्शन इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण के बाद क्रमशः अनुमान प्रमाण शब्द प्रमाण और आप्त प्रमाण की व्यवस्था करता है। ये सभी प्रमाण ’प्रत्यक्ष’ पर आधारित हैं, परन्तु ये प्रमाण या तो आंशिक हैं अथवा अपने द्वारा प्रत्यक्ष या अनुभूत न होकर, औरों द्वारा प्रत्यक्ष/अनुभूत हैं। आधुनिक लोग तथा विज्ञानवादी व्यवहार में इन प्रमाणों का उपयोग भी करते हैं और कमोबेश मानते भी हैं, भले ही सम्पूर्णता से स्वीकार न करें।

अनुमान प्रमाण-हर सत्ता या पदार्थ का एक नाम, रूप या आकार तथा गुण या स्वभाव होता है। और इनमें एक निश्चित सम्बन्ध भी रहता है। अतः उस पदार्थ या सत्ता से निश्चित रूप से सम्बन्धित किसी लक्षण को प्रत्यक्ष करके, उसके माध्यम से उस सत्ता या पदार्थ के विषय में अनुमान लगा लेना-’अनुमान प्रमाण’ है।

जैसे कहीं धुआं उठता देखकर वहां आग लगी होने का अनुमान लगा लिया जाता है। आग को हमने प्रत्यक्ष नहीं देखा। परन्तु आग के एक निश्चित लक्षण या गुण-धुएं को प्रत्यक्ष देखा। आग और धुएं के सम्बन्ध की निश्चितता के कारण आग को प्रत्यक्ष न देखते हुए भी आग के विषय में जानकारी प्राप्त कर ली। यह अनुमान प्रमाण हुआ। यह प्रत्यक्ष पर पूर्णतः आधारित नहीं है, क्योंकि जिस सत्ता (आग) को हम जान रहे हैं, उसको हम प्रत्यक्ष नहीं देख रहे। यह आंशिक प्रत्यक्ष पर आधारित है। क्योंकि आग को भले ही हम प्रत्यक्ष नहीं कर रहे परन्तु उसके लक्षण धुएं को हम प्रत्यक्ष कर रहे हैं। फल द्वारा वृक्ष का या बीज द्वारा वृक्ष का अनुमान लगाना आदि ऐसे ही निश्चित सम्बन्धों के आधार पर अनुमान द्वारा ज्ञान प्राप्त करने या सत्ता के अस्तित्व को सिद्ध करने के सहज व सरल उदाहरण हैं। इसका प्रयोग भी काफी होता है।

शब्द प्रमाण-स्वयं प्रत्यक्ष या अनुभव न करते हुए भी जब कोई प्रत्यक्षदर्शी या विषय को अनुभूत करने वाला उस विषय के सम्बन्ध में कुछ कहता या लिखता है तब उसके शब्दों द्वारा हमें उस विषय के सम्बन्ध में सत्य का ज्ञान होता है। अतः इसे ’शब्द प्रमाण’ कहते हैं। पुस्तकें अथवा संस्मरण आदि इसी प्रमाण के अन्तर्गत आते हैं। यह प्रमाण दूसरे के प्रत्यक्ष या अनुभव पर आधारित है, परन्तु हमने उसे प्रत्यक्ष नहीं किया होता, न ही वह हमारे द्वारा अनुभूत होता है। फिर भी हम इसे सत्य मानते हैं और इसके माध्यम से हमारे ज्ञान का इतना अधिक विस्तार होता है, जितना हम मात्र ’प्रत्यक्ष प्रमाण’ के आधार पर एक जीवन में कभी नहीं कर सकते।

उदाहरण के तौर पर हम दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में कभी नहीं गए, मिस्र में कभी नहीं गए, चांद पर कभी नहीं गए। फिर भी हम क्रमशः नरभक्षी पेड़पौधों, पिरामिडों और चांद के गड्ढों या वहां के छरू गुने कम गुरुत्वाकर्षण बल के विषय में जानते हैं। स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हम नहीं हैं। परन्तु शब्द प्रमाण के उपयोग से, वहां जाने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरणों या उनके द्वारा लिखी पुस्तकों के आधार पर हम ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। रसायन, भूगोल, इतिहास, भौतिकी आदि समस्त विषयों का सभी ज्ञान या सिद्धांत अथवा आंकड़े हमारे द्वारा प्रत्यक्ष/अनुभूत नहीं होते। फिर भी हम अपनी सामर्थ्यानुसार अनेक विषयों में महारथ हासिल करने लायक ज्ञान इसी शब्द प्रमाण के आधार पर प्राप्त कर लेते हैं। ’शब्द प्रमाण’ इसलिए सर्वाधिक व्यापक प्रमाण है।

आप्त प्रमाण--’आप्त’ उस व्यक्ति को कहते हैं जो तृप्त या पूर्ण सन्तुष्ट है। यानी रागद्वेष और मोह-घृणा से मुक्त हो। ऐसा व्यक्ति यदि अपनी अनुभूति को बताता है तो उसे भी प्रमाण माना जाता है। यह ’आप्त प्रमाण’ है। यह प्रत्यक्ष पर नहीं अपितु अनुभूति पर आधारित होता है। यानी वह व्यक्ति एक ऐसा अनुभव बताता है जिसका वह भुक्त भोगी है। भले ही प्रत्यक्षदर्शी हो या न हो। (प्रत्यक्ष-दर्शी होना गौण और भुक्त भोगी होना यहां प्राथमिक है।) उसके भुक्त भोगी होने के कारण उसका अनुभव सच्चा होता है। और क्योंकि वह राग-द्वेष से परे है अतः वह उसकी अभिव्यक्ति भी ईमानदारी व सम्पूर्णतया करता है। कुछ बदलता अथवा छिपाता नहीं है। (क्योंकि झूठ आदमी अपने स्वार्थ के लिए बोलता है।) न तो उसका स्वभाव दुराव-छिपाव का होता है और न ही उसके पास दुराव-छिपाव का कोई कारण ही होता है। जैसे प्राचीन ऋषियों के वाक्य।

’आप्त प्रमाण’ का प्रयोग विशेषकर भावनात्मक, आध्यात्मिक, अतिसूक्ष्म तथा गहन विषयों के संदर्भ में होता है। जिन्हें भौतिक या स्थूल मापदण्डों पर कसा नहीं जा सकता। अतः भले ही इस प्रमाण का प्रयोग यदा-कदा या कम मात्रा में ही किया जाता है। परन्तु यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि इस प्रमाण का और कोई विकल्प नहीं है।

उदाहरण के तौर पर हम हमारे पिता के ही पुत्र हैं ? इस तथ्य को जानने का हमारे पास कोई तरीका नहीं है। न तो प्रत्यक्ष प्रमाण से, न अनुमान प्रमाण से और न शब्द प्रमाण से ही यह तथ्य सत्य सिद्ध हो सकता है। फिर भी हम ऐसा विश्वासपूर्वक या निश्चयपूर्वक मानते हैं कि हम अमुक व्यक्ति के ही पुत्र हैं। इस विश्वास या निश्चयपूर्वक मानने का हमारे पास क्या आधार है ? केवल एक कि हमारी मां ऐसा बताती है। हमारी मां हमें (और समाज को भी) बताती है कि अमुक व्यक्ति तुम्हारे (या मेरे बच्चे के) पिता हैं। और हम बिना तर्क-वितर्क के, बिना उनके कथन को सिद्ध किए ऐसा ही मान लेते हैं (समाज भी बिना विरोध के मान लेता है)! क्योंकि इसे सिद्ध करने या जानने का कोई और साधन ही नहीं है। केवल ’भुक्त भोगी’ ही यह बता सकता है। हमारी मां क्योंकि ’भुक्त भोगी’ है और उसके पास झूठ बोलने का कोई कारण नहीं है। अतः माता के कथन को ही हम सत्य मान लेते हैं। यह ’आप्त प्रमाण’ का एक लौकिक उदाहरण है। 

पुनश्च-आज क्ण्छण्।ण् परीक्षण द्वारा यदि यह जानना संभव भी हो (यद्यपि यह भी तर्क का ही विषय है, क्योंकि क्ण्छण्।ण् से ही ’क्लोन’ (अनुकृति) तैयार की जाती है। हमारे ग्रंथों में ’लव’ (राम के पुत्र) का ’क्लोन’ (कुश) वाल्मीकि ऋषि ने तैयार किया था। ’रक्तबीज’ राक्षस अपने रक्त की बूंदों से अपने अगणित ’क्लोन’ बनाने में सक्षम था। इस प्रकार के अनेक उद्धरण यह संकेत करते हैं कि क्ण्छण्।ण् के विषय में या उससे ’क्लोन’ बनाने के विषय में उस समय के ऋषियों को जानकारी थी। भले ही वे क्ण्छण्।ण् को किसी और नाम से पुकारते रहे हों अथवा उनकी प्रणाली भिन्न हो। लेकिन फिर भी क्ण्छण्।ण् द्वारा यह प्रमाणित हो सकने का कोई सांकेतिक उद्धरण हमारे शास्त्रों में नहीं मिलता कि किसी व्यक्ति के जनक को प्रमाणित कर पाता। यह सत्य तो मात्र माता के ही कथन से प्रमाणित होता था) तो भी पहले सम्भव नहीं था और आज भी सबके लिए सम्भव नहीं है। अतः ’आप्त प्रमाण’ की उपयोगिता व महत्त्व ज्यों का त्यों है।

दूसरी बात यह मात्र लौकिक उदाहरण है, जो पाठकों की सुविधा की दृष्टि से लिया गया है। परन्तु आत्मा, परमात्मा, देवता, शक्ति, काल, मन्त्र, तत्त्व, महाभूत, तन्मात्राओं, गुणों आदि पारलौकिक या अतिसूक्ष्म सत्ताओं को ऋषियों के ’आप्त प्रमाण’ द्वारा ही समाज जान पाया है। विज्ञान/प्रत्यक्षवादी वहां आज भी ’अपाहिज’ हैं, अन्य विधियों या प्रमाणों से इन सत्ताओं को जान सकने में आज भी असमर्थ हैं।

निष्कर्ष- अतः निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानकर समग्र को नहीं जाना जा सकता तथा सूक्ष्म और गहन विषयों या सत्ताओं को स्थूल (उपलब्ध) मापदण्डों पर कसकर सिद्ध नहीं किया जा सकता। यह सिद्ध न कर पाना हमारी अक्षमता है, न कि तथ्य का गलत होना या न होना। जैसे रात्रि में जलाए गए दीपक का प्रकाश जहां-जहां तक जाता है, वहां-वहां का ज्ञान हम प्राप्त कर लेते हैं। परन्तु दीपक के प्रकाश से आगे जहां अंधकार का साम्राज्य है-वहां का ज्ञान हमें नहीं हो पाता। तो इसका यह अर्थ नहीं है कि दीपक के प्रकाश से आगे/अंधकार में कोई वस्तु/सत्ता/पदार्थ/सृष्टि अथवा अस्तित्व है ही नहीं। लेकिन प्रत्यक्ष प्रमाण को ही सबकुछ मानने की मजबूरी हमें ऐसे ही निर्णय पर पहुंचा देती है।

जो अंधा ही पैदा होता है और अंधा ही मर जाता है। या रात को अंधेरे में पैदा होकर सुबह प्रकाश होने से पूर्व ही मर जाता है। वह अपने सीमित ज्ञान के आधार पर कह सकता है कि दुनिया में रंग, प्रकाश, दिन अथवा और लोग नहीं होते। परन्तु यह सत्य तो नहीं माना जा सकता न ?

पुनर्जन्म-कोई भी हिन्दू धर्म ऐसा नहीं है, जो पुनर्जन्म के सिद्धांत का अनुमोदन न करता हो । वेद, पुराण, उपनिषद्, शास्त्र सभी एक स्वर से पुनर्जन्म को स्वीकारते हैं। (सभी के उद्धरण यहां संग्रहित करना युक्तिसंगत नहीं है) और ऐसे विषयों में शास्त्र ही प्रमाण होते हैं। परन्तु मात्र इतना ही कह देने से उन सज्जनों को सन्तुष्टि नहीं होगी, जो पुनर्जन्म को नहीं मानते। अतरू कुछ सारगर्भित चर्चा करनी ही होगी।

इस तथ्य से सभी सहमत होंगे कि ’जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है।’ दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ’जो जन्म नहीं लेता, वह मरता भी नहीं है।’ गीता में इस तथ्य को सिद्धांत रूप से इस प्रकार व्यक्त किया है नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। अर्थात् असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। सरल शब्दों में कहा जाए तो जो नहीं है (सदा से नहीं है) वह तो अस्तित्व में नहीं आ सकता/उत्पन्न नहीं हो सकता और जो है (सदा से है) वह लोप/अनुपलब्ध/नष्ट नहीं हो सकता। जो नहीं है, वह सदैव नहीं है और जो है, वह सदैव है।’ यह सिद्धांत इससे स्पष्ट होता है।

इन दोनों तथ्यों को विज्ञान भी मानता है। फिर भी इन दोनों तथ्यों को तत्त्वतः समझ लेने की जरूरत है। इससे पुनर्जन्म का सिद्धांत सहज ही सिद्ध होता है। मोटे तौर पर यह दो विरोधी बातें मालूम पड़ती हैं (कि जन्म लेने वाला मरता अवश्य है। और जो है वह सदा है, कभी नष्ट नहीं होता।) पर वास्तव में ऐसा नहीं है। यह हमारी मोटी दृष्टि ही गलतफहमी उत्पन्न करती है। अतः इसे बारीकी से समझ लेना चाहिए।

’जन्म’ का अर्थ है-एक विशेष रूप/आकार/देह में आना और ’मृत्यु’ का अर्थ है-उस रूप/आकार/देह का विसर्जित/विघटित हो जाना। जैसा कि सूफी शायर कहता है

जिन्दगी क्या है अनासिर का ज़हूर-ए-तरतीब।

मौत क्या है इन्हीं जरों का परीशां होना।

अर्थात् जीवन तत्त्वों/महाभूतों (म्स्प्डम्छज्ै) का व्यवस्थित रूप से क्रमबद्ध होना है और मृत्यु इन्हीं कणों का अव्यवस्थित हो जाना/बिखर जाना है।

गीता में श्रीकृष्ण ने इसीलिए कहा है-

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। 

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानी संयाति नवानि देही।

अर्थात् जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुरानी देह को त्यागकर नई देह को धारण करता है।

यहां समझने की बात यह है कि मृत्यु केवल देह या आकार की हो रही है, उस स्वरूप की हो रही है, जिसके कारण जीव अभिव्यक्त हो रहा था। अतः मृत्यु का अर्थ यह नहीं कि देह के साथ जीव (आत्मा) भी नष्ट हो गया। वह तो अपना वर्तमान रूप छोड़ देने से अव्यक्त हुआ है, नष्ट नहीं। पुनः नए रूप में कालान्तर से अभिव्यक्त होगा।

मृत्यु, विघटन या नाश उस व्यवस्था या क्रमबद्धता का हुआ है जिसके कारण तत्त्व एक निश्चित आकार में अभिव्यक्त हो रहे थे। न कि तत्त्वों का नाश हुआ है। वे तो मात्र अव्यक्त हो गए हैं। पुनः अवसर पाकर नई व्यवस्था में व्यक्त होंगे, अतः जन्म और मृत्यु केवल देह/रूप/आकार या अभिव्यक्ति की हो रही है। आत्मा या तत्त्वों की नहीं। वे तो सदा से हैं, अतः कभी नष्ट नहीं हो सकते। देह, आकार या रूप सदा से नहीं था, अतरू वह जन्मता है और क्योंकि जन्मता है अतः मृत्यु को भी अवश्य ही प्राप्त होता है। (जैसा कि प्रारंभ में दोनों सिद्धांत बता दिए गए हैं कि जन्म लेने वाला मरता अवश्य है तथा सत् (जो सदा है) का कभी अभाव नहीं होता और असत् (जो सदा नहीं है) कभी सत्ता में नहीं आता।) भ्रम इसलिए होता है कि हम जन्म व मृत्यु को ही होना (सत्) या न होना (असत्) मान लेते हैं। इसे और सुगम करने के लिए एक स्थूल या लौकिक उदाहरण देते हैं -

जिस लकड़ी को आज हम वृक्ष के रूप में देख रहे हैं, क्या वह सदा से इसी रूप में थी ? (नहीं ! वह पहले बीजरूप में थी, फिर अंकुरित हुई, फिर पौधा बनी, फिर पुष्पित-पल्लवित हुई या वृक्ष बनी। उसका कोई भी रूप स्थायी नहीं था।) और क्या आगे भी लकड़ी इसी वृक्ष रूप में रहेगी, जिसमें हम उसे आज देख रहे हैं ? (नहीं ! वह कटकर फर्नीचर आदि के रूप में परिवर्तित होगी। टूट जाने पर उसका रूप कुछ और हो जाएगा। बाद में उसे ईंधन रूप से जला देंगे तो वह कोयले के रूप में परिवर्तित हो जाएगी। कोयला भी जलकर राख व धुएं के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। धुएं के कण आकाश में व्याप्त होंगे व वृष्टि के साथ पृथ्वी में जाएंगे। राख के कण मिट्टी या खाद में मिलकर पृथ्वी में जाएंगे और इस प्रकार नए पौधे की उत्पत्ति में सहयोगी बनेंगे)। यानी लकड़ी न तो सदा से इस रूप में थी और न रहेगी।

लकड़ी का वृक्ष, बीज, फर्नीचर, ईंधन, कोयला, राख आदि में परिवर्तित होते रहना मात्र उसके रूप, देह अथवा अभिव्यक्ति का परिवर्तन है। यही मृत्यु व जन्म की प्रक्रिया है। परन्तु लकड़ी का मूल तत्त्व नष्ट नहीं हो रहा। मात्र रूप परिवर्तित हो रहा है, यही इस सिद्धांत का अर्थ है कि ’जो है वह सदा रहता है, उसका अभाव नहीं होता।’ यही आत्मा का या आत्म तत्त्व का अजर-अमर होना है। इसीलिए कहा जाता है कि न आत्मा कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। वह शाश्वत है और सदा से है। अतः सदैव रहेगी भी।

इस विवेचन से एक तीसरा सिद्धांत निकलकर सामने आता है। वह यह कि ’जिस वस्तु, सत्ता, पदार्थ या प्राणी को हम आज जिस रूप में (व्यक्त) देख रहे हैं, वह न तो सदा उसी रूप में था और न ही सदा उसी रूप में रहेगा। वह रूपों का परिवर्तन करता रहेगा। क्योंकि वह ’है’ अतः कभी उसका नाश या अभाव (ना होना) तो नहीं होगा, मगर वह सदा एक विशेष या निश्चित रूप, आकार या देह में अभिव्यक्त भी नहीं रहेगा। बल्कि वह अनेक रूप बदलता हुआ-लकड़ी के बाद में धुएं में बदलकर वायुमंडल में व्याप्त हो जाने के समान या राख में बदलकर पृथ्वी में विलीन हो जाने के समान-कभी ’अव्यक्त’ भी हो जाएगा (परन्तु रहेगा तब भी, उसका अस्तित्व तब भी होगा) और कालान्तर में फिर ’अभिव्यक्त’ हो जाएगा। परन्तु नए रूप में इस सिद्धांत को छोटा कर एक पंक्ति में श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को इस प्रकार से समझाया है अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानी भारत। अर्थात् सम्पूर्ण प्राणी (या पदार्थ, सत्ता, वस्तु) जन्म से पूर्व (आरम्भ में) अव्यक्त (अप्रकट) थे और मृत्यु के उपरांत (अंत में) भी अव्यक्त (अप्रकट) हो जाने वाले हैं। मात्र मध्यावस्था (बीच में/वर्तमान में) में ही वे प्रकट (व्यक्त) हैं।

यह सिद्धांत लकड़ी के दृष्टांत से इसलिए समझ में आ जाता है कि उसके आदि से अन्त तक सभी रूप परिवर्तनों के (सभी जन्म-मरणों के) हम साक्षी या प्रत्यक्षदर्शी हैं। अथवा सभी के प्रत्यक्षदर्शी न भी हों तो कालावधि सीमित होने से अनुमान, शब्द आदि अनेक प्रमाणों से उन्हें जान पाते हैं। इसलिए सहज ही विश्वास हो जाता है। परन्तु प्राणी या मनुष्य के संदर्भ में जीवन-मृत्यु या एक रूप का तो आधा-अधूरा प्रत्यक्ष अनुभव हम कर पाते हैं। लेकिन कालान्तराल अत्यधिक होने से आदि से अन्त तक पूर्ण प्रक्रिया का हम अनुभव नहीं कर पाते। अतरू उस पर हमें सहज विश्वास नहीं होता।

उस पर भी दूसरे जन्म में हमें पूर्व जन्म की स्मृति बनी रहती है और न ही हम योगियों की भांति समय के आर-पार देखने या अपने पूर्व तथा आगामी जन्म का अनुमान लगाने के ही योग्य होते हैं। अतः हमें पूर्व जन्म पर सहज विश्वास नहीं होता। लौकिक उदाहरण के द्वारा समझें तो हम उस यात्री की भांति हैं जो यह नहीं जानता कि वह जिस ट्रेन में बैठा है, वह कहां तक जाएगी। उसे गाजियाबाद तक जाना है। वह दिल्ली से ट्रेन में बैठा है और बस इतना ही जानता है कि ट्रेन गाजियाबाद तक जरूर जाएगी। क्योंकि गाजियाबाद का उसके पास टिकट है और वह टी.टी. से पूछकर ट्रेन में बैठा है। अतरू वह दिल्ली से गाजियाबाद तक की यात्रा का तो प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है। पर बाद में वही ट्रेन आगे जिन-जिन स्टेशनों व मार्गों से होकर कन्याकुमारी या उड़ीसा पहुंचेगी, उन सबका अनुभव वह अपनी गाजियाबाद तक की यात्रा में कैसे कर सकता है ? वह तो यह मानने को भी तैयार नहीं होगा कि वही ट्रेन उड़ीसा भी जाती है।

दूसरे उदाहरण से समझें तो दुर्घटनाग्रस्त होकर अपनी यादाश्त खो देने वाला व्यक्ति अपने दुर्घटना से पहले के जीवन के अनुभव भूल जाता है और बाद में ठीक हो जाने पर दुर्घटना के बाद के जीवन के अनुभव भूल जाता है। जबकि दुर्घटना से पूर्व व दुर्घटना के बाद अपने जीवन को जी वही रहा होता है। फिर भी स्मृति लोप हो जाने से वह दोनों स्थितियों में तारतम्य नहीं बैठा पाता। फिर भी उसके परिवार वालों, मित्रों या सम्बन्धियों की स्मृतियां बनी होती हैं, अतरू वे उस व्यक्ति को अगला-पिछला याद दिलाने की कोशिश करते हैं या उसकी दोनों अवस्थाओं में सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं। लेकिन पुनर्जन्म वाले मामले में तो परिवार, मित्र व सम्बन्धी भी अगले जन्म में आने से पूर्व स्मृति खो चुके होते हैं, अतः वहां पर कौन सम्बन्ध स्थापित करे ?

फिर भी ’कपाल क्रिया’ आदि न होने या अन्य कारणों से बहुत से ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं, जहां नए जन्म में जाने वालों को पूर्व जन्म की बहुतसी स्मृतियां कुछ काल तक बनी रही हैं। इसके अलावा किसी स्थान या व्यक्ति से प्रथम दर्शन में ही आसक्ति या प्रियता का हमें कभी आभास होता है और कभी किसी से अकारण प्रथम मुलाकात में ही द्वेष-सा होता है। इनका कारण भी अस्पष्ट परन्तु गहन पूर्व जन्म के सम्बन्धों की स्मृति ही है।

निष्कर्ष-वैसे भी विचार कीजिए कि ऐसा क्यों होता है ? 

किसी का अपाहिज/अंगहीन/रोगग्रस्त, जन्म लेना। 

किसी का मन्दबुद्धि या पागल के रूप में जन्म लेना। 

किसी का तीव्र बुद्धि या प्रतिभाओं के साथ जन्म लेना। 

किसी का जन्म से ही दुष्ट या महात्मा स्वभाव होना। 

किसी का किसी राजा के घर तो किसी का रंक के घर जन्म लेना। 

किसी का पैदा होते ही या पैदा होने के बाद शीघ्र ही मर जाना। 

किसी के माता या पिता या दोनों का उसके जन्म के बाद मर जाना। 

किसी के जन्म से ही घर में खुशहाली या सौभाग्य बढ़ जाना। 

किसी के जन्म से ही घर में हानि, दुर्घटना या दुर्भाग्य बढ़ जाना।

किसी अजनबी को अचानक देखकर सुखद लगना, जबकि उसने हमारा कुछ भी प्रिय नहीं किया है। 

किसी अजनबी को अचानक देखकर द्वेष भाव का उत्पन्न होना, जबकि उसने हमारा कुछ भी बुरा नहीं किया है। 

किसी स्थान विशेष के प्रति पहली बार देखते ही आसक्ति या विरक्ति होना।

एक ही परिवार के चार बच्चों का एक ही माहौल, एक ही गुण, एक ही संस्कारों द्वारा परवरिश पाना। फिर भी उनकी प्रकृति, गुण, स्वभाव आदि में विपरीतता या भिन्नता होना। आदि अनेक (सबको यहां गिनाना पृष्ठ सामग्री का अपव्यय होगा) प्रश्नों का उत्तर मात्र ’संयोग’ नहीं हो सकता। इन प्रश्नों का एक ही सटीक उत्तर है पूर्वजन्म का प्रभाव।

क्योंकि ’संयोग’ (ठल् ब्भ्।छब्म्) जैसा कुछ भी इस सृष्टि में नहीं घटता। हर घटना या कार्य का एक निश्चित कारण अवश्य होता है। (इसे आगे ’कार्यकारण’ के प्रसंग में विस्तार से चर्चा में लेंगे।) यह बात और है कि बहुत से कारणों को हम जान या समझ पाते हैं। बहुत सों को नहीं। जिन कार्यों चा घटनाओं के कारण हमारी समझ से परे होते हैं उन्हें हम ’संयोग’ कहते हैं। (पाठकों की रुचि होगी तो पूर्वजन्म के सम्बन्ध में एक पृथक पुस्तक पेश करते का प्रयास करूंगा! यह विषय अत्यंत व्यापक और विशद् है । यहां मूल विषय यह नहीं होने से इस पर और विस्तृत चर्चा करना न युक्तियुक्त होगा, न न्यायसम्मत।)

कालान्तर के परिवर्तनों पर ध्यान न देना- समय सतत् प्रवाहमान है और प्रकृति सतत् परिवर्तनशील। हर युग में संस्कृतियों, सामाजिक नियमों, दृष्टिकोणों, शिक्षा, मापदण्डों एवं लोकाचार में अनेक परिवर्तन हो जाते हैं। जीवनशैली, भाषा, जीवन स्तर, जीवन मूल्य आदि में भी अनेक भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। कुछ पुरानी चीजें हट जाती हैं, कुछ नई चीजें जुड़ जाती हैं। भौगोलिक परिवर्तन भी इन्हीं सबके अन्तर्गत आते हैं। कई बार इतिहास स्वयं को दोहराता भी है तो कई बार नए कीर्तिमान भी जुड़ जाते हैं। ऐसे में किसी प्राचीन विषय या उसके सिद्धांतों को आज के परिवेश या समसामयिक परिस्थितियों के साथ तोलने या लागू करने के लिए अतिरिक्त जागरूकता आवश्यक होती है। कहीं संशोधन भी करने पड़ सकते हैं तो कहीं समायोजन भी। कुछ छोड़ना भी पड़ सकता है तो कुछ जोड़ना भी। और निस्संदेह कुछ बदलना भी।

इस बात को कुछ मोटे उदाहरणों द्वारा समझने में सुविधा होगी। यह व्यावहारिक उदाहरण है, अतः सहज व सुगम्य है।

जैसे पहले भोजन चूल्हे पर गाय या भैंस के गोबर से बने उपलों व लकड़ियों के माध्यम से पकाया जाता था। फिर चूल्हे का स्थान अंगीठी ने और उपलों का स्थान कोयलों ने ले लिया। फिर स्टोव आ गया, बत्तीवाला स्टोव आ गया, कोयलों का स्थान मिट्टी के तेल ने ले लिया। इसके बाद गैस आ गई, बिजली के हीटर आ गए। अब सोलर सिस्टम द्वारा खाना पकाने की बात भी सुनने में आ रही है। आने वाले 100-200 साल प्रगति इसी प्रकार परिवर्तन करती रहेगी। तब ’उपला’ नामक वस्तु को लोग भूल जाएंगे। अगर किसी समझदार आदमी ने उपले को संग्रहालय में न रख दिया तो ’उपला’ क्या था ? कैसा था ? कैसे बनता था ? किस काम आता था ? ये सब बातें तब के लोगों को पता नहीं होंगी। उस समय अपने पूर्वजों से ’उपले’ के विषय में परम्परागत रूप से जानने वाला कोई यदि औरों को बताएगा कि हमारे पूर्वज जानवरों के गोबर का ईंधन बनाकर खाना पकाते थे। जो उन्हें मुफ्त में उपलब्ध था और आज ईंधन को प्राप्त करने के लिए हम हजार रुपए प्रति मास खर्च करते हैं। तो तब के लोग उसे गप्पी या लम्बी-लम्बी छोड़ने वाला ही बताएंगे। तब यदि किसी को 200-300 या और अधिक वर्ष पुरानी पुस्तक उपलब्ध होगी और उसमें ’उपले’ के विषय में या उसके प्रयोग के विषय में वह पढ़ेगा तो पढ़कर भी वैसे ही यकीन नहीं करेगा, जैसे आज हम अपने पुराने ग्रन्थों का नहीं करते हैं। क्योंकि लम्बे कालान्तर के कारण तब कोई अन्य प्रमाण उसे सिद्ध करने को उपलब्ध नहीं होगा। यह भी सम्भव है कि तब किसी और वस्तु का नाम ’उपला’ हो जाए। अतः पढ़ने वाला और भी भ्रमित हो।

यह भी सम्भव है कि आने वाले 1000-500 साल बाद उस समय का कोई अन्वेषक ’उपले’ को पुनः आविष्कृत कर डाले और उसका कोई नया नामकरण करके सबको बताए कि जिस खाने को पकाने के लिए आप इतना खर्च ईंधन पर कर रहे हैं, वह मुफ्तप्रायः पशुओं के गोबर से भी पकाया जा सकता है।

अगर यह सम्भव है तो पुराणों में वर्णित ‘अग्नि बाण’ आज की बुलेट या पुष्पक विमान अथवा उड़न खटोला, आज का हवाई जहाज क्यों नहीं हो सकता ? फिर हम प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित जानकारी को कैसे अस्वीकार कर सकते हैं ? इसी उदाहरण को और परिप्रेक्ष्य में देखिए -

आज हम जिसे ’व्हेल’ के नाम से जानते हैं, उस दैत्याकार जल मत्स्य को क्या प्राचीनकाल में ’जलदैत्य’ अथवा ’समुद्री राक्षस’ के नाम से नहीं पुकारा जा सकता ? अन्तर मात्र नाम या सम्बोधन का है। रूप, गुण, लक्षण तो वही हैं। आज की ैम्। भ्व्त्ैम् मछली पहले समुद्री घोड़ा या पानी का घोड़ा नहीं कही जा सकती ? आज का परमाणु बम क्या प्राचीन काल में ’ब्रह्मास्त्र’ के नाम से पुकारा नहीं जा सकता ? आज की रिमोटकन्ट्रोल्ड सेल्फ एम्ड मिसाइल क्या पहले का ’सुदर्शन चक्र’ नहीं हो सकती ? आज यदि एक ही मशीनगन से दर्जनों गोलियां दागी जा सकती हैं तो क्या पहले एक ही धनुष से दर्जनों तीर एक बार में एकसाथ नहीं छोड़े जा सकते होंगे ? 

निष्कर्ष-लेकिन समय के लम्बे अन्तराल से न केवल वस्तुओं या सामग्रियों के रूप एवं प्रणाली परिवर्तित हुए हैं। बल्कि उनके सम्बोधन या नाम भी बदल चुके हैं। अतः बिना गहन विवेचन के, बिना उन परिवर्तनों को दृष्टि में रखे, बिना सभी सम्भावनाओं को खोजे मात्र इसलिए पुरानी बात को गलत नहीं कह सकते कि वह बहुत पुरानी है और आज के परिवेश या मान्यताओं से मेल नहीं खाती। यदि हम ऐसा करेंगे तो सत्य पर नहीं पहुंच सकेंगे और स्वयं ही अपनी मूर्खता को प्रमाणित करेंगे।

पानी से बिजली बनाना हमने आज से 150-200 साल पहले सीखा था। परन्तु इस तथ्य का ज्ञान ऋषियों को न रहा होता तो उन्होंने वेदों में जल को अग्निगर्भा (जिसके गर्भ में अग्नि या ऊर्जा छिपी हो) न कहा होता। ऐसे अनेक उद्धरण गिनाए जा सकते हैं। पर स्थानाभाव के कारण तथा ’समझदार को इशारा काफी है’ की उक्ति को ध्यान में रखते हुए इस चर्चा को यहीं समाप्त करते हैं। आवश्यकता तकरार की नहीं अपितु सम्पूर्णता से गहन विचार की है।

ज्योतिष को असंशोधनीय समझना- अब तक हमने जो चर्चा की वह ज्योतिष पर अविश्वास करनेवालों के सम्बन्ध में थी। मगर यह चर्चा ज्योतिष पर अंधविश्वास करनेवालों के लिए है। किसी तथ्य या विषय को भली प्रकार समझे बिना नकार देना अविश्वास है तो उसे भली प्रकार समझे बिना स्वीकार लेना अंधविश्वास है। दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं, क्योंकि ये वास्तविकता तक पहुंचने नहीं देतीं। अतः सत्य को समझने के लिए पूर्वाग्रह या हठधर्मिता को त्यागकर निष्पक्षता, सजगता एवं समग्रता से धैर्यपूर्वक विवेचन आवश्यक है।

ज्योतिष अपने आप में स्वतंत्र विधा नहीं है। इसमें खगोलशास्त्र, विज्ञान, गणित, पदार्थ विज्ञान, दर्शनशास्त्र, मंत्र विज्ञान, रत्न विज्ञान, शकुनशास्त्र, आयुर्वेद या रोग विज्ञान, शरीर लक्षण एवं मुखाकृति विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान, समाज शास्त्र, आचार संहिता, धर्म एवं अध्यात्म तथा मनोविज्ञान आदि सभी का कुछ न कुछ अंश (आंशिक या अधिक) शामिल है तथा ये विषय ज्योतिष के इतने समानान्तर हैं कि इनसे कटकर ज्योतिष को तत्त्वतः जाना ही नहीं जा सकता।

ज्योतिष किसी एक विशेष ऋषि द्वारा प्रदत्त अथवा अन्वेषित ज्ञान भी नहीं है। अपितु विभिन्न विशेषज्ञ ऋषियों द्वारा अपने-अपने समय व स्तर पर किए गए शोध तथा अध्ययनों का सम्मिलित परिणाम है। हर ऋषि या विद्वान का अपना दृष्टिकोण, अपना अनुभव तथा अपना मार्ग रहा है। अतः ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन प्रामाणिक ग्रन्थों के सिद्धांतों एवं निष्कर्षों व प्रणालियों में अनेक विरोधाभास है। इन ऋषियों या विद्वानों अथवा ज्योतिषशास्त्र के प्रणेताओं तथा प्रवर्तकों में मुख्य नाम पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। (अतः इसे ईश्वर प्रदत्त या ईश्वर का प्रकाश समझने की भूल न करें।)

नारद, व्यास, पराशर, गर्ग, गौतम, भृगु, भारद्वाज, जैमिनी, कश्यप, कात्यायन, बृहस्पति, श्रीसूर्य, वराहमिहिर आदि अतिप्राचीन एवं मंत्रेश्वर, गोपाल रत्नाकार, काशीनाथ, जयदेव, कल्याण वर्मा, श्रीमहेश, हरिवंश, मार्तण्ड, आचार्य वशिष्ठ, वैद्यनाथ, जोगेश्वर, नारायण भट्ट, नीलकंठ आदि मध्यकालीन व नवीन आचार्य प्रमुख हैं। भास्कर, कपिलेश्वर, नरपतिकवि, गणेश दैवज्ञ, नीलांबर आदि ज्योतिर्विदों के नाम भी गिनाए जा सकते हैं।

कोई भी विषय एक बार में शोधा नहीं जाता। अनेक पीढ़ियां क्रमशः उसे विकसित व संशोधित करती हैं। अतः हर विषय की अपनी सीमाएं होती हैं और परिपूर्ण समझे जाने पर भी उसमें संशोधनों व समायोजनों की गुंजाइश रहती है। उदाहरण के लिए भौतिकी के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को दुनिया के सामने अरस्तु (यूनानी दार्शनिक) ने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया (यद्यपि भारतीय प्राचीन ग्रन्थों में भी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का उल्लेख मिलता है, परन्तु उसकी प्रतिपादन या पारिभाषिक या सैद्धांतिक प्रस्तुति नहीं मिलती)। प्रायः 2300 वर्ष पूर्व तब से लगभग 2000 वर्षों तक अरस्तु का गुरुत्वाकर्षण सम्बन्धी नियम ही प्रचलित रहा। फिर गैलिलियो ने 17वीं शताब्दी में भिन्न सिद्धांत रखा और अरस्तु का सिद्धांत ध्वस्त हो गया।

बाद में सम्भवतः सन् 1687 में न्यूटन ने नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यह गैलिलियो के सिद्धांत से बेहतर सिद्ध हुआ। क्योंकि इसके सहयोग से भौतिक पिंडों, ग्रहों आदि का भार नापा जा सकना सम्भव हो सका जो गैलिलियो के सिद्धांत के प्रयोग से सम्भव नहीं था। सन् 1915 में वैज्ञानिक आइंस्टीन ने न्यूटन के सिद्धांत को फेल किया और वस्तुओं के आपसी आकर्षण की ओर अपने ’सापेक्षता सिद्धांत’ द्वारा लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

पाठकों की सूचनार्थ बता दें कि इस समय प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग आईंस्टीन के सिद्धांत में भी कुछ अपूर्णता का अनुभव कर शोध में जुटे हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि आनेवाले समय में वे कोई नया या संशोधित सिद्धांत दुनिया के सामने ले आएं और वह भी अंतिम होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। यह एक छोटा-सा उदाहरण है। सभी विषयों में इसी प्रकार अनेक शोध, संशोधन व परिवर्तन होते रहे हैं, होते रहेंगे। क्योंकि यही विकास की प्रक्रिया है।

ज्योतिष में भी सम्बन्धित सिद्धांतों में परिवर्तन, समायोजन या संशोधन की सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। (फिर भी यदि हम ऐसा करेंगे तो ज्योतिष विषय के और विकसित व सटीक होने की सम्भावनाओं को हम स्वयं ही बन्द करने के प्रयास करेंगे)। सन् 505 (वराह मिहिर) से पूर्व राहू-केतु ज्योतिषीय व्याख्या में शामिल नहीं थे। प्रधान सात ग्रहों की ही ज्योतिषीय व्याख्या की जाती थी। वराह मिहिर के बाद से राहू-केतु भी शामिल हुए। अभी पिछले सवा दो सौ सालों से यूरेनस, नेप्च्यून व प्लूटो को भी ज्योतिषीय व्याख्या में शामिल किया गया है। ये सब ज्योतिष के क्रमिक विकास के प्रमाण हैं। समयानुसार सृष्टि व समाज में अनेक परिवर्तन होते हैं। अनेक तारे ज्योतिष के प्रकाश में आने के बाद से अब तक ब्लैक होल्स में बदल चुके हैं (उनकी जीवन अवधि समाप्त हो चुकी है) और अनेक ’निहारिकाओं’ (तारों का त्।ॅ ड।ज्म्त्प्।स्) ने नए तारों के रूप में जन्म ले लिया है। बहुत से तारों का स्थान परिवर्तन हो चुका है। ग्रह गतियों या उनके भ्रमण मार्गों में कुछ मामूली-सा सही किन्तु परिवर्तन आया है। यह सब हमें ब्रह्मांड व तारों के निरंतर शोध में लगे रहनेवाले वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चलता है। पृथ्वी की जलवायु तथा वायुमंडल में भी अनेक बदलाव आ चुके हैं। मरुस्थलों की वृद्धि हुई है, वृक्ष कम हो गए हैं, ऋतुओं का स्वभाव असंतुलित हो चुका है, ओजोन परत में छेद हो चले हैं। हाल ही में (प्रायः दो वर्ष पूर्व बृहस्पति ग्रह से शूमेकरलेवी टकराया था, उससे बृहस्पति में क्या परिवर्तन हुए यह शोध के अन्तर्गत है। इन सब परिवर्तनों को ध्यान में रखना भी क्या हमारे लिए आवश्यक नहीं है ? ज्योतिष के सभी सिद्धांत ।ै प्ज् प्ै लागू करते रहने से पहले एक छोटे से उदाहरण के साथ इस प्रसंग को बन्द करेंगे। सामुद्रिक शास्त्र के एक सिद्धांत -

छिद्रदंता कुचित मूर्खा कुचित खल्वाट निर्धनः।

कुचित काणे भवे साधुः कुचित गानवती सति॥ 

(छीदे दांतों वाला कोई-कोई ही मूर्ख होता है। गंजा या उड़े हुए बालोंवाला कोई-कोई ही निर्धन होता। काना कोई-कोई ही साधु स्वभाव का होता है तथा गाने-नाचने वाली कोई-कोई ही सती, साध्वी, पतिव्रता होती है।)

-को आज के बदले परिवेश और परिवर्तित जीवन शैली में कैसे ।ै प्ज् प्ै लागू कर सकते हैं? आज का दृष्टिकोण तथा मान्यताएं व लोकाचार कुछ और हैं। जिस समय यह सूत्र बनाया गया, तब कुछ और थे। तब औरतों का नाचना-गाना, क्या शादी में जाना या घर से अकेले बाहर निकलना भी मान्य नहीं था। आज शादियों, पार्टियों में नाचना, गाना (औरतों का) एक आम बात है। अनेक गायिकाओं व नर्तकियों का यह पेशा ही है। अतरू आज इस सिद्धांत में संशोधन करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार ज्योतिष को भी समझें।

सनद के तौर पर दिल्ली का लांगीट्यूट 77ः13 ही अब परिवर्तित हो चुका है। फिर भी बहुत से पंचांग अभी 77ः13 के गणित से ही गणना कर रहे हैं। एक और उदाहरण में कुछ योग विवाह में विलम्ब (प्रायः 27-28 वर्ष) या अल्प सन्तान (1 या 2) का फल देते हैं। यह बात तब के लिए ठीक थी जब विवाह 16-18 वर्ष में हो जाते थे और 6-7 संतानें औसत मानी जाती थीं। आज 26-27 वर्ष से पूर्व कोई आत्मनिर्भर नहीं होता तो विवाह 27-28 वर्ष में होना सामान्य बात है। परिवार नियोजन की दृष्टि से जनमानस में आई क्रांति मात्र 1-2 संतानों तक ही सामान्यतः परिवार सीमित रखती है। आदि अनेक उदाहरण इस प्रकार के हैं।

निष्कर्ष-अतः ज्योतिष में भी अन्य विषयों की भांति आगे शोध एवं विकास की सम्भावनाएं हैं। और आज की परिस्थितियों में, आज के परिवेश में, आज की जीवन शैली तथा परिवर्तित समाज व परिवर्तित वायुमंडल में ज्योतिष के सभी सिद्धात अन्धे होकर ।ै प्ज् प्ै लागू नहीं किए जा सकते। अथवा उनको अन्तिम नहीं कहा जा सकता। हमें इस संदर्भ में अंधी रूढ़िवादिता का त्याग कर नए अध्ययनों, नए शोधों को औचित्य की कसौटी पर कसकर संशोधनों या समायोजनों का स्वागत करना चाहिए।

कर्मफल बन्धन व कार्य कारण सम्बन्ध-यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं आधारभूत तथ्य है। ज्योतिष के विरोधी हों या ज्योतिष के पक्षधर-दोनों को इन्हें तत्त्वतः समझना ही चाहिए तथा ज्योतिष से परे लौकिक या अलौकिक दृष्टि से जीवन को देखनेवालों (संसारवादी या अध्यात्मवादी) के लिए भी यह जानना परमावश्यक है। क्योंकि ज्योतिष के ही नहीं समूचे जीवन तथा पुनर्जन्म व मोक्ष आदि के सम्बन्ध में भी यह ज्ञान अनेक उलझनों व प्रश्नों का स्पष्ट व सटीक समाधान कर सकता है। अतः मेरा यह आग्रह है पाठकों से कि इस प्रसंग को विशेष ध्यान, धैर्य तथा तन्मयता व जागरूकता से पढ़ें।

इस अत्यंत गहन एवं विशद् तथ्य को संक्षेप में किन्तु सरलता व स्पष्टता से समझाने का प्रयास अपनी सीमित बुद्धि की सामर्थ्यानुसार करूंगा।

कर्मफल बन्धन-पहले तो यह जानिए कि कर्म क्या है ? और फल क्या है ? किसी लक्ष्य की प्राप्ति या कामना के उद्देश्य से किया जाने वाला कार्य ही श्कर्मश् है और कर्म का परिणाम ही ’फल’ है। इस दृष्टि से क्रिया और कर्म में अन्तर है। क्रिया वह है जो स्वाभाविक रूप से (बिना कामना या लक्ष्य की प्राप्ति की इच्छा) होती है। जैसे पाचन, श्वसन, दिल का धड़कना आदि क्रियाएं हैं, न कि कर्म हैं। (पहली गलतफहमी तो यहीं से शुरू होती है कि हम अज्ञानवश क्रिया और कर्म को एक मान लेते हैं।)

कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं-सुकर्म (अच्छे उद्देश्य के लिए), कुकर्म (बुरे उद्देश्य के लिए।) अथवा करने योग्य तथा न करने योग्य। और तीसरा है विकर्म यानी उद्देश्यरहित कर्म। (इस तीसरे को बाद में चर्चा में लेंगे क्योंकि यह सामान्यतः लोक व्यवहार में सम्भव नहीं होता।)

कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। हर कर्म का कोई न कोई फल या परिणाम अवश्य होता है। सुकर्म का अच्छा तो कुकर्म का बुरा। अथवा सुकर्म का सुख तो कुकर्म का दुख। या फिर सुकर्म का हितकारी और कुकर्म का अहितकारी। परन्तु जैसा भी हो-कर्म का फल अवश्य होता है। दूसरे शब्दों में कर्म सदा बन्धनकारी है। क्योंकि वह (भले या बुरे) परिणाम को भोगने के लिए कर्ता को प्रतिबन्धित कर देता है।

फल या परिणाम भी अच्छे या बुरे दो प्रकार के हैं। इसके अलावा कालावधि की दृष्टि से कुछ फल तुरंत प्राप्त होते हैं तो कुछ फल कालान्तर में अपने कर्मों का परिपाक काल आने पर। इस सिद्धांत पर कर्मों को तोलें तो कर्म में दो विभाग बनेंगे। पहले सद्यफलदायी (तुरंत फल देने वाले) और दूसरे कालान्तर में फलित होने वाले (परिपाक काल आने पर फल देने वाले)। जैसे हाथ में चाकू लगना और खून निकल आना या भोजन करना और पेट भर जाना तुरंत फल की प्राप्ति है। परन्तु बीज का बोना और बीज के अंकुरित होने, पौधा बनने, विकसित होने, पुष्पित, पल्लवित होने के बाद उस वृक्ष से फल का प्राप्त होना कालांतर या परिपाक काल आने पर फल मिलने का उदाहरण हुआ।

यह कालान्तर या परिपाक काल आने पर प्राप्त होने वाले फल ही ’सञ्चित कर्म’ अथवा ’भाग्य’ भी कहे जाते हैं। इस प्रकार कर्म बीज है और भाग्य या परिणाम फल है। कर्मों द्वारा ही भाग्य निर्मित होता है। यह कर्म और फल के निश्चित सम्बन्ध के कारण ही है। लेकिन कर्म बन्धनकारी है। क्योंकि निष्फल न होने से वह कर्ता को फल या भाग्य को भोगने के लिए प्रतिबन्धित कर देता है। उसे कर्ता को भोगना ही पड़ता है। यदि पूरे फल भोगे बिना (कर्मों का परिपाक काल आए बिना) ही कर्ता की आयु पूर्ण हो जाए और उसे शरीर छोड़ना पड़े तो उसका ’एकाउन्ट निल’ नहीं हो जाता, बल्कि ’ड्यू’ रहता है। परिणामतः कर्ता या जीव जब नया शरीर धारण करता है तब उसे उस जन्म में पूर्व कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इसी को जीव का दुर्भाग्य या सौभाग्य के साथ जन्म लेना कहते हैं।

यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख, जिससे कर्म का बीज होना और फल या भाग्य को उत्पन्न करने वाला होना सिद्ध होता है। (यहां दूसरी गलतफहमी पैदा होती है। क्योंकि हम केवल एक ही पहलू को पूरा मान लेते हैं, दूसरा पहलू देखने का प्रयास ही नहीं करते) तस्वीर का दूसरा रुख देखने के लिए इस कर्मफल बन्धन के सिलसिले को आगे बढ़ाना होगा। आगे बढ़ाने पर हम जान सकेंगे कि कर्म तो भाग्य या फल को उत्पन्न करता है, परन्तु भाग्य या फल आगे नवीन कर्म को भी उत्पन्न करता है। तभी श्रृंखला पूर्ण होती है। तभी कर्मफल बन्धन का चक्र जीव को आवागमन में उलझाए रखता है।

बीज (कर्म) से फल (भाग्य) उत्पन्न होता है। परन्तु यह बीज कहां से आता है ? यह आसमान से नहीं टपकता। यह फल (भाग्य) से ही उत्पन्न होता है। बीज से फल और फल से बीज अथवा कर्म से भाग्य और भाग्य से कर्म प्रेरित व उत्पन्न होते हैं। यह एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया या श्रृंखला है। मुर्गी से अंडा पैदा होगा तो अंडे से मुर्गी पैदा होगी। यह नहीं कहा जा सकता कि पहले मुर्गी आई या अंडा? यह नहीं कहा जा सकता कि पहले बीज आया या फल ? यह नहीं कहा जा सकता कि पहले बीज आया या फल ? यह नहीं कहा जा सकता कि पहले कर्म आया अथवा भाग्य। 

जैसे चक्र या वृत्त की परिधि पर ैज्।त्ज्प्छळ च्व्प्छज् या म्छक्प्छळ च्व्प्छज् का निर्णय नहीं लिया जा सकता, वैसे ही कर्मफल के इस चक्र में प्रारम्भ कहां से हुआ, यह निर्णय नहीं किया जा सकता। अस्तु, जहां से यात्रा आरम्भ कर दें वहीं से आरम्भ बिन्दु या ैज्।त्ज्प्छळ च्व्प्छज् बन जाता है और उससे ऐन पीछे समापन बिन्दु या म्छक्प्छळ च्व्प्छज् बन जाता है। ठीक वैसे ही जैसे-जन्म, मृत्यु, जन्म, मृत्यु, जन्म, मृत्यु के आवागमन चक्र में जहां से गणना आरम्भ करें वहीं से शुरूआत मानी जाएगी। ’राम-राम’ का पुनरावर्तन या ’मरा-मरा’ का पुनरावर्तन यदि एक पंक्ति में हो तो उसे ’राम’ या ’मरा’ ऐसा निश्चित जाना जा सकता है। लेकिन जब यह पंक्ति की बजाय एक चक्र या वृत्त में हो तो वह चक्र ’राम-राम’शब्दों का है अथवा ’मरा-मरा’ शब्दों का यह नहीं जाना जा सकता। अतः यह कहना कि जीवन कर्म प्रधान है या भाग्य प्रधान है। अथवा जीवन में कर्म का अधिक महत्त्व है या भाग्य का अधिक महत्त्व है, सम्भव ही नहीं है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे से लिपटकर चलते हैं, उन्हें काटा नहीं जा सकता।

गलतफहमी-फिर भी जो विद्वान कर्म को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं या जो भाग्य को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में समग्रदृष्टि वाले नहीं होते और तस्वीर का एक ही रुख देख रहे होते हैं। उस एक ही रुख को औरों के सामने रखकर वे पूरे समाज को दिशाभ्रमित करते हैं यह उनकी अल्पबुद्धि, अदूरदर्शिता व हठधर्मिता ही है। क्योंकि या तो वे दूसरा रुख देख नहीं पाते, या दूसरे रुख को नजरअंदाज करते हैं। क्योंकि वह उनकी रुचि के अनुकूल नहीं होता। आपकी रुचि या दृष्टिकोण के अनुसार ही सत्य भी हो ऐसा जरूरी नहीं है। आपकी पसंद-नापसंद, मत या दृष्टिकोण अलग बात है और सत्य या वास्तविकता अलग बात। ध्यान रखें कि सत्य को अधूरा कहना भी असत्य बोलने के समान ही घातक, भ्रामक व अन्याय होता है।

कर्मफल बन्धन के इस चक्र को ज्योतिष की दृष्टि से सरल व्यावहारिक उदाहरण द्वारा और स्पष्ट कर दें, ताकि किसी प्रकार के विभ्रम या संशय की सम्भावना न रहे।

जातक की जन्मपत्री में चन्द्रमा द्वितीय भाव में हो तथा राहू या शनि का दूसरे भाव से दृष्टि या युति द्वारा सम्बन्ध हो रहा हो तो जातक मदिरा का सेवन करने वाला एवं मांसाहारी होता है (यदि अन्य स्थितियां विपरीत प्रभाव डाल रही हों तो) ऐसा मेरे ज्योतिष के गुरु गुलाटीजी का कहना है। जो तार्किकता व ज्योतिष के सिद्धांतों के अनुसार सत्य है। 

जातक की जन्मपत्री में आठवें भाव में केतु विराजमान हो तथा गुरु आदि है। शुभ ग्रहों की दृष्टि या सुरक्षा का अन्य कोई कारण जन्मपत्री में उपस्थित न हो तो जातक को बवासीर का रोग होता है। ऐसा मेरे ज्योतिष के दूसरे गुरु कौशिकजी का कहना है। तार्किकता तथा ज्योतिष के सिद्धांतानुसार यह भी सत्य है।

अब विचारिए कि जिसकी जन्मपत्री में जातक को शराबी बनानेवाला पहला या बवासीर का रोगी बनाने वाला दूसरा योग प्रबल स्थिति में हो तो इसका अर्थ यह होगा कि पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार वे ऐसा निश्चित भाग्य लेकर आया यानी कर्मों से उसके भाग्य का निर्माण हुआ।

अब जब ऐसा भाग्य उसका निश्चित हो गया है तो वह शराब भी पीयेगा या ऐसे पदार्थ भी खाएगा और ऐसी दिनचर्या रखेगा कि उसे कब्ज आदि शिकायतें हों (तभी तो बवासीर का रोग उत्पन्न होगा)। इसका मतलब उसका निश्चित भाग्य उसे कुछ विशेष प्रकार के कर्मों (शराब पीना या गरिष्ठ भोजन करना अथवा अनुचित दिनचर्या से रहना आदि) के लिए प्रेरित व बाध्य करेगा। यानी उसके भाग्य से कुछ कर्म निर्मित होंगे।

अब जब निरंतर शराब पीएगा या निरंतर कब्ज रहेगी तो उसका लिवर या किडनी आदि डैमेज होंगे, दूसरी ओर बवासीर की तकलीफ होगी। यानी ये कर्म उसका नया भाग्य बनाएंगे या उसे नए फल भोगने को प्रतिबन्धित करेंगे।

तकलीफें व रोग होने से व्यक्ति उनके इलाज के लिए, औषधियों के सेवन, परहेज या ऑपरेशन कराने के लिए प्रेरित होगा। यानी ये नया भाग्य उसे नवीन कर्मों के लिए प्रेरित व बाध्य करेगा। यदि उसकी आयु शेष हुई तो इन इलाजों से उसे लाभ होगा या नया भाग्य प्राप्त होगा। यदि आयु नहीं शेष होगी तो इलाज के बाद भी बिना लाभ प्राप्त किए मर जाएगा। मर जाएगा तो इलाज के लिए किए गए ये कर्म उसे पुनर्जन्म में भाग्य रूप से प्राप्त हो जाएंगे।

निष्कर्ष-इस संक्षिप्त व्यावहारिक उदाहरण से यह सहज ही सिद्ध होता है कि व्यक्ति अपने कर्मों के लिए भी पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। उसका भाग्य उसे विशेष प्रकार के ही कर्म करने के लिए प्रेरित व बाध्य करता है और वे किए गए कर्म विशेष उसे नए फल भोगने के लिए बाध्य कर देते हैं। नए फल को भोगने के लिए व्यक्ति फिर कुछ विशेष प्रकार के कर्म करने को प्रतिबन्धित हो जाता है। इस प्रकार भाग्य से कर्म और कर्म से भाग्य का यह सिलसिला श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतर चलता है। मृत्यु के बाद भी यह सिलसिला थमता नहीं (क्योंकि मृत्यु देह की होती है, जीव की नहीं। और जीव को कुछ कर्मों के फल भोगने शेष रह जाते हैं। वे फल उसे भाग्य बनकर नए जन्म में प्राप्त होते हैं।) शेष फलों को भोगने के लिए ही उसे अगला जन्म लेना पड़ता है।

कर्मफल का यह बहीखाता जब तक छप्स्स् न हो जाए तब तक जीव आवागमन चक्र में फंसा रहता है। क्योंकि पुराने ’बैलेंस’ को भोगने के लिए उसे नया शरीर धारण करना पड़ता है। लेकिन उस बैलेंस को भोगने के लिए उसे जो कर्म करने पड़ते हैं, वे उसका आगे बैलेंस ’ड्यू’ कर देते हैं। खाता छप्स्स् नहीं हो पाता। मुक्ति या मोक्ष तभी सम्भव हो पाता है जब कर्मफल के बहीखाते में कुछ बैलेंस ’ड्यू’ न रहे। जब खाता छप्स्स् हो जाए। इसके लिए ही कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा हठयोग-ये चार उपाय हैं। दूसरे शब्दों में ’योग’ ही इसका मूल उपाय है। (प्रस्तुत पुस्तक का यह विषय नहीं है। अतः इन उपायों की चर्चा यहां विस्तारपूर्वक करना युक्तिसंगत नहीं है। फिर भी जो पाठक रुचि रखते हों वे मेरी पुस्तक ’कुण्डलिनी जागृत कैसे करें’ जो इसी प्रकाशन से प्रकाशित है को पढ़कर जिज्ञासा शांत कर सकते हैं। यहां भी प्रसंगवश ’कर्म योग’ की चर्चा आगे करेंगे, संक्षेप में। क्योंकि कर्मफल बन्धन में कर्मयोग की चर्चा अप्रासंगिक नहीं होगी।)

कर्मयोग-सुकर्म-कुकर्म/सत्कर्म/दुष्कर्म-सभी को तीसरे प्रकार के कर्म (विकर्म-जिसको प्रारम्भ में कहा था) बना देना ही ’कर्मयोग’ है। यह कर्मफल बन्धन से मुक्ति का एक उपाय है, जिसे गीता में श्रीकृष्ण ने विस्तार से समझाया है। दरअसल फल के प्रति आसक्ति या विरक्ति ही कर्ता को कर्म तथा फल से बांधती है। क्योंकि कर्म किसी कामना या इच्छा (अच्छी या बुरी) के कारण किया जाता है और साथ में कर्ता का ’अहं’ (मैं भाव) संयुक्त होता है। अतः फल की प्राप्ति पर सुख-दुख आदि बन्धन होते हैं। इसलिए निष्काम भाव से (बिना फल की इच्छा के) तथा समस्त कर्म ईश्वर को समर्पित करते हुए (’मैं’ भाव हटाकर) करना ही कर्मयोग है और यही मुक्ति का उपाय भी है।

पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, कर्म-अकर्म, इच्छा-अनिच्छा, राग-द्वेष, सुखदुख, अपना-पराया, रुचि-अरुचि, अनुकूल-प्रतिकूल, मोह-घृणा, आसक्ति-विरक्ति सब भेद बुद्धि को समाप्त करके, कर्ता भाव (अहं) का समर्पण करके कर्म करते चले जाना ही कर्मयोगी का एकमात्र उद्देश्य हो जाता है और वह साक्षी भाव से जीता है। अतरू नवीन कर्मों के फल से नहीं बंधता और पुराने फलों को भोगने में उसे हर्ष या पीड़ा नहीं होती।

जैसा कि श्रीमद्भगवद गीता में स्पष्ट कहा गया है-

बुद्धि युक्तो जहातीह उभे सुकृत दुष्कृते। 

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।

अर्थात् समबुद्धि युक्त (जब भेद भाव समाप्त होकर सुख-दुख, पाप-पुण्य आदि सब समान हो जाते हैं) पुरुष पुण्य व पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है (उनसे बंधता नहीं, मुक्त रहता है)। अतः तू समत्वरूप योग में लग। यह समत्वरूप योग (सभी को समान देखना) ही कर्मों में कुशलता है यानी कर्म फल बन्धन से छूटने का उपाय है। आगे समदर्शी होकर कर्मयोगी हुए पुरुष के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण और भी स्पष्ट रूप से कहते हैं-

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। 

चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।

अर्थात् उसे इस विश्व में न तो कर्म करने से ही कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही। तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी उसका किञ्चित मात्र भी स्वार्थ सम्बन्ध नहीं रहता है (उसके लिए न कुछ कर्म है, न अकर्म और न कोई अपना है, न ही पराया। वह समदृष्टा है)। 

तस्माद्सक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। 

असक्तो ह्याचरन्कर्म ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः।। 

अर्थात् इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भली-भांति करता रह । क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है (ब्रह्मलीन/मुक्त हो जाता है)।

आगे और भी स्पष्ट कहते हैं

यदृच्छालाभ सन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। 

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यत।।

अर्थात् जो बिना इच्छा के ही स्वतः प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है। जिसमें ईष्या का सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से सर्वथा अतीत हो गया है, ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बंधता।

पूरी गीता ही ऐसे उद्धरणों से भरी पड़ी है। सबको प्रस्तुत करना अनावश्यक होगा। अतः पूरी गीता के सारतत्त्व को जो महर्षि अष्टावक्र ने आधे श्लोक में कह दिया है। वही कहकर इस प्रसंग को समाप्त करेंगे -

यदा नाहं तदा मोक्षे, यदाहं बन्धनं तदा। (जहां अहं नहीं है वहीं मुक्ति है, जहां अहं है वहीं बन्धन है।)

पुनश्च-बहुत से विद्वानों का गीता पर आरोप है कि गीता कर्म को प्रधानता देती है। परन्तु यह गहन विचार के अभाव के कारण ही है। वास्तव में गीता कर्म तथा फल की एवं कर्मफल बन्धन की पूर्ण विवेचना करने के बाद कर्म को विकर्म बनाने की निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। इस विषय को विस्तार से किसी अन्य अवसर पर लगे, यहां संक्षेप में मात्र गीता के दो श्लोक ही कहेंगे -

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।। 

अर्थात् सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसी से अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं। अतः पाप-पुण्यादि कर्मों को महत्त्व देते हैं। इसलिए कर्म को नहीं योग को प्रधानता देते हुए घोषणा करते हैं - 

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुनः।। 

अर्थात् तपस्वियों से योगी श्रेष्ठ है। शास्त्रज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ माना गया है और कर्म करने वालों (कर्मकांडी व सकाम कर्मी) से भी योगी श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन ! तू योगी हो ! (क्योंकि योगी सर्वश्रेष्ठ है)।

कार्यकारण सम्बन्ध-कर्मफल बन्धन को समझ लेने के बाद कार्यकारण सम्बन्ध को समझ लेना भी आवश्यक है। क्योंकि इस सम्बन्ध में न जानकारी और भी बड़ी गलतफहमियां और संशय उत्पन्न कर देती है। यह इसलिए भी अनिवार्य है कि कार्यकारण सम्बन्ध और कर्मफल बन्धन को तत्त्वतरू जाने बिना ज्योतिष को ठीक-ठीक जानना असम्भव है। अतरू आपको ज्योतिष के प्रति अविश्वास हो या अंधविश्वास इस सम्बन्ध को जान लेने पर ही ज्योतिष को समझ पाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो पाएगी। अपने अविश्वास या अंधविश्वास को नष्ट करके ही ज्योतिष के प्रति आप विश्वास उत्पन्न कर पाएंगे।

जिस प्रकार कर्म व फल का एक निश्चित सम्बन्ध है। उसी प्रकार कार्य और कारण में भी एक निश्चित सम्बन्ध है। जिस प्रकार कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसी प्रकार कोई भी कार्य कभी अकारण नहीं होता। हर कार्य के पीछे कोई-नकोई कारण अवश्य ही विद्यमान होता है। (यह बात और है कि हम उस कारण को जान पाएं या नहीं।) जिन कार्यों के कारण हम जान नहीं पाते या हमारी सामर्थ्य/समझ से परे होते हैं, उन कार्यों या घटनाओं को हम ’संयोग’ कह देते हैं। परन्तु वास्तव में सृष्टि का कोई भी कार्य क्योंकि अकारण नहीं होता, अतः सृष्टि में ’संयोग’ नामक (ठल् ब्भ्।छब्म् जैसी) कोई स्थिति नहीं होती। ’इत्तफाक’ से कुछ नहीं होता।

दर्शनशास्त्र हर कार्य के मूल रूप से तीन कारण मानता है। पहला, मूल कारण, दूसरा निमित्त कारण तथा तीसरा समवाही कारण। सरल शब्दों में इन्हें हम-स्थूल कारण, सूक्ष्म कारण तथा सहयोगी कारण भी कह सकते हैं।

मूल कारण-’मूल’ इसलिए है कि उसके बिना कार्य होना सम्भव ही नहीं होता। क्योंकि वह कार्य से पूर्व भी विद्यमान रहता है, कार्य के दौरान भी और कार्य के बाद भी। दूसरे शब्दों में व्यक्त स्थिति में भी मूल कारण उपस्थित रहता है और व्यक्त से पूर्व व पश्चात अव्यक्त स्थितियों में भी वह उपस्थित रहता है। अतः यह मूल कारण कहलाता है। निमित्त कारण-वह कार्य का माध्यम होता है। वह कार्य से पूर्व या पश्चात में अव्यक्त होता है। केवल कार्य को व्यक्त करते समय कुछ समय के लिए ही कार्य के साथ संयुक्त होता है। इसके बाद अलग हो जाता है। अतः उसे बाद में जानना या पहचानना प्रायः असम्भव होता है। मात्र उसके विषय में अनुमान लगाया जा सकता है। फिर भी यह निमित्त कारण मूल कारण से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि कार्य का माध्यम वही होता है। उसके अभाव में कार्य नहीं हो सकता।

समवाही कारण- वह कार्य से पूर्व और पश्चात् में कार्य से संयुक्त नहीं रहता परन्तु कार्य के व्यक्त रूप में सूक्ष्म रूप से न केवल उपस्थित रहता है, बल्कि कार्य के साथ इस प्रकार संयुक्त रहता है कि उसके बिना कार्य अभिव्यक्त ही नहीं हो पाता। उसे हटाते ही कार्य का स्वरूप विकृत हो जाता है। यद्यपि वह मूल कारण व निमित्त कारण जैसा अनिवार्य नहीं होता (क्योंकि उसके विकल्प उपस्थित रहते हैं और वह कार्य की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, मात्र सहयोगी होता है) तथापि महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि उसके संयुक्त रहने से ही कार्य अभिव्यक्त होता है। उसके पृथक होते ही कार्य विघटित हो जाता है। कुछ समवाही कारण निमित्त कारण के साथ ही मूल कारण से जुड़ते हैं और कार्य हो जाने पर पृथक हो जाते हैं।

पाठकों की सुविधा के लिए इन तीनों कारणों को एक छोटे से लौकिक उदाहरण से समझाते हैं -

पलंग बनने के कार्य में ’पलंग’ कार्य की अभिव्यक्ति या व्यक्त रूप है। लकड़ी मूल कारण है। क्योंकि बिना लकड़ी के पलंग बन नहीं सकता और लकड़ी पलंग बनने से पूर्व भी (किसी और रूप में) थी, पलंग के वर्तमान अभिव्यक्त रूप में भी है और पलंग टूट जाने के बाद भी (किसी और रूप में)रहेगी।

बढ़ई यहां निमित्त कारण है। क्योंकि वही पलंग की अभिव्यक्ति का निमित्त/माध्यम बना। बढ़ई के बिना भी लकड़ी पलंग के रूप में अभिव्यक्त नहीं हो सकती थी। बढ़ई पलंग बनने से पूर्व, पलंग के साथ वर्तमान में या पलंग बनने अथवा टूटने के बाद भविष्य में पलंग के साथ संयुक्त नहीं है। वह केवल कुछ समय के लिए मूल कारण (लकड़ी) से संयुक्त हुआ था और उसे पलंग के रूप में अभिव्यक्त करके फिर अलग हो गया। पलंग देखकर उसके विषय में जाना नहीं जा सकता, मगर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लकड़ी को पलंग के रूप में परिवर्तित करने वाला कोई था जरूर । पलंग की कारीगरी या सौंदर्य बढ़ई की कुशलता की झलक तो दे सकते हैं, परन्तु बढ़ई का परिचय/बायोडॉटा नहीं बता सकते।

कीलें, फेवीकोल, आरी, हथौड़ा, वसूला, बरमा, रंदा आदि यहां समवाही कारण हैं। इनमें से कुछ (आरी से रंदे तक) निमित्त कारण के साथ कुछ समय को संयुक्त हुए थे, परन्तु वर्तमान स्थिति में या भविष्य में पलंग के साथ संयुक्त नहीं हैं। (लेकिन इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि उनके सहयोग के बिना पलंग की अभिव्यक्ति नहीं हो पाई होती।) और कुछ कीलें, फेवीकोल आदि ऐसे हैं जो वर्तमान स्थिति में भी पलंग के साथ संयुक्त हैं। जब वे भविष्य में पलंग से विलग होंगे तो पलंग अपना वर्तमान स्वरूप खो देगा (डिस्मेंटल हो जाएगा)। अतः महत्त्वपूर्ण हैं।

पलंग एक लौकिक व स्थूल उदाहरण है। अतः इस कार्य (पलंग बनना) में तीनों कारणों को सुविधापूर्वक जाना जा सका। परन्तु और सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म कार्यों या घटनाओं में इन तीनों कारणों को पहचान सकना इतना सुविधाजनक नहीं होता। अतः ऐसे मामलों में जहां कारण हमारी समझ से परे होते हैं, हम उस कार्य/घटना को ’संयोग’ ठल् ब्भ्।छब्म् कहकर काम चला लेते हैं। लेकिन ’संयोग’ हमारी असमर्थता के कारण प्रचलन में आया शब्द, यह प्रकृति के सिद्धांत पर आधारित नहीं है। क्योंकि सृष्टि/ प्रकृति में ’संयोग’ध् ठल् ब्भ्।छब्म् कभी नहीं होता, जैसा कि पहले भी कह आए हैं कि कारण अवश्य विद्यमान होता है।

मनुष्य के जन्म में भी आत्मा, तत्त्व, तन्मात्राएं आदि मूल कारण होते हैं। माता, पिता, कर्म आदि निमित्त कारण होते हैं तथा रक्त, अस्थि, मज्जा, त्वचा आदि समवाही कारण होते हैं। 

इसी प्रकार मनुष्य जो कुछ जीवन में करता या भोगता है। जो कुछ उसके साथ व उसके द्वारा घटित होता है, उन सबके पीछे भी ये कारण मौजूद रहते हैं। तब निमित्त कारण मनुष्य स्वयं होता है या परिस्थितियां अथवा अन्य लोग होते हैं। समवाही कारण मनुष्य के प्रयास/कर्म, उत्साह, ज्ञान/अनुभव तथा इच्छा आदि होते हैं। किन्तु मूल कारण ईश्वरीय विधान या उसके द्वारा पूर्व निर्धारित योजना (जिसे सुविधा के लिए हम भाग्य कह सकते हैं। अन्यथा उसे नियति या विधि का विधान कहना अधिक एक्यूरेट होगा) होती है।

किन्तु अपने अज्ञान व अहंकारवश मनुष्य स्वयं को अथवा परिस्थितियों को ही उन कार्यों या घटनाओं के प्रति जिम्मेदार मानता है और कर्त्ताभाव से ग्रस्त हो जाता है। यही ब्रह्म की माया की प्रबलता है। इसी को अविद्या भी कहा जाता है। अपने सम्पूर्ण समर्पण द्वारा अथवा आत्म साक्षात्कार द्वारा जब मनुष्य को ज्ञानालोक प्राप्त होता है तभी उसकी अविद्या दूर होती है। (इनमें कर्म योग व भक्ति योग सम्पूर्ण समर्पण पर आधारित हैं तथा सांख्य/ज्ञानयोग एवं हठयोग आत्मसाक्षात्कार पर आधारित हैं, यही ज्ञानोदय के मार्ग हैं।) इसीलिए श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। 

सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।

अर्थात् यदि तू अन्य सब पापियों से अधिक पाप करने वाला है (स्वयं को महापापी समझता है) तो भी तू ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भांति तर जाएगा। (क्योंकि)- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निरूसंदेह कुछ भी नहीं है।)

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। 

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।

अर्थात् क्योंकि हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है।

यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि ज्ञानाग्नि कर्मों को भस्म कैसे करेगा? ज्ञान में ऐसी क्या विशेषता है ? (यदि यह प्रश्न मस्तिष्क में न भी आए तो भी इस स्पष्टीकरण को पढ़िए ताकि ज्ञानाग्नि कर्मों को कैसे भस्म करेगा इस बात को और स्पष्टता से समझा जा सके)-ज्ञान हो जाने पर ही पता चल पाएगा कि कार्यों या घटनाओं के जिम्मेदार हम अथवा परिस्थितियां नहीं हैं। कर्मों के कर्ता भी हम नहीं हैं। हम तो मात्र निमित्त/माध्यम हैं। करवाने वाला तो कोई और है। उसकी नियति/विधान या च्त्व्ळत्।डडम् के अनुसार ही सब हो रहा है। यह ज्ञान होने पर ही ’अहं’/मैं भाव शनैः शनैः नष्ट हो जाएगा और जब कर्ता भाव ही न होगा तो कर्म या फल का बन्धन भी नहीं रहेगा। इस बात को पहले श्कर्मयोगश् के प्रसंग में कह आए हैं।

निष्कर्ष- कर्मफल बन्धन तथा कार्यकारण सम्बन्ध को समझ लेने से हमारी दृष्टि व्यापक होकर समग्रता की ओर बढ़ती है। हम ’कूपमण्डूक’ नहीं रहते हैं। अतरू ज्योतिष जैसे गूढ़, विराट और आध्यात्मिकता से जुड़े विषय को ही नहीं इसी प्रकार के अन्य गहन विषयों को समझ पाने की हमारी क्षमता बढ़ती है और ज्योतिष तो विशेषकर कार्य-कारण सम्बन्ध व कर्मफल चक्र पर आधारित है। अतः इन दोनों को जाने बिना ज्योतिष को तत्त्वतः जाना ही नहीं जा सकता। फिर भी स्वतः अनुभूत करके ज्ञान प्राप्त करना सभी को सम्भव नहीं है। अतः उधार के ज्ञान या मांगे हुए ज्ञान से भी लाभ प्राप्त किया जा सकता है। (वह 100ः नहीं होगा तो भी 30-40ः तो होगा) अतः श्रीकृष्ण ने गीता में इस ओर भी संकेत किया है -

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।

अर्थात् उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भली-भांति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से, कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से (मात्र कुतर्क/विवाद/परीक्षा/टाइम पास के लिए नहीं, बल्कि जिज्ञासापूर्वक, ईमानदारी से) वे परमात्म तत्त्व को भली-भांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्व का उपदेश करेंगे। यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। हे पांडव ! जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार के मोह को प्राप्त नहीं होगा। 

पूर्वाग्रह या हठधर्मिता-’पूर्वाग्रह’ का अर्थ है पहले से ही किसी विषय में अपना ’आग्रह’ या निर्णय रखना और हठधर्मिता का अर्थ है तर्कशास्त्र व न्यायशास्त्र की कसौटियों पर कसे जाने पर अपना निर्णय/ आग्रह/मत यदि अनुचित, गलत, निराधार या भ्रामक सिद्ध होता हो, तब भी उस पर अड़े रहना। हठधर्मी ’जाटबुद्धि’ या ’साकट’ (अड़ियल स्वभाव) होता है और पूर्वाग्रही पक्षपाती होता है। सत्य की प्राप्ति के लिए निष्पक्षता के साथ, सजगता के साथ सभी आग्रहों से मुक्त होकर विश्लेषण अनिवार्य है।

उचित को स्वीकारने के लिए (भले ही वह अपने मत से विपरीत हो) तथा अनुचित को त्यागने के लिए (भले ही वह अपने मत के अनुकूल हो) दोषों को सुधारने के लिए और सत्य/ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु को सभी संकोच, सभी आग्रह, सभी हठ तथा अहं त्यागकर प्रयासशील रहना ही चाहिए। तभी प्रगति सम्भव है। अन्यथा प्रगति के सभी विकल्प हम स्वयं बन्द कर लेते हैं।

जानना और मानना दो अलग-अलग बातें हैं। जानने के बाद मानना, या जाने बिना मानना (अथवा मानते हुए भी न जानना) भी दो अलग-अलग बातें हैं। पूर्वाग्रही मात्र मानता है, जानता नहीं है और हठधर्मी जो मानता है उसे जानना ही नहीं चाहता। इस प्रकार वह मिथ्याभास/गलतफहमी में जीता है। उसी में संतुष्ट भी रहता है और उससे बाहर निकलना भी नहीं चाहता। अतः ऐसे व्यक्ति के उद्धार, प्रगति या सत्य को साक्षात् कर पाने को कोई मार्ग नहीं होता। ऐसे ही ’जड़बुद्धि’ के लिए कहा गया है-मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिले विरंचि सम। (यदि ब्रह्मा के समान गुरु मिल भी जाएं तो भी मूर्ख हृदय में चेतना उत्पन्न नहीं होती। वह जागता नहीं।)

यहां एक विचारणीय प्रश्न है कि उचित/अनुचित का निर्णय कौन करेगा ? सत्य/असत्य का निर्णय कौन करेगा ? दो पक्ष यदि एक विषय पर विपरीत मत रखते हैं और एक-दूसरे के मत को स्वीकारने या अपने मत को त्यागने को तैयार नहीं होते तो दोनों पक्षों में सही कौन है और गलत कौन ? यह निर्णय कैसे होगा ? दोनों ही स्वयं को उचित मानेंगे, उचित सिद्ध करने का प्रयास करेंगे और दूसरे को अनुचित ठहराते हुए उस पर पूर्वाग्रही या हठधर्मी होने का आरोप लगाएंगे। ऐसे में सत्य का निर्णय कौन करेगा ? हर पक्ष स्वयं को ’ब्रह्मा’ और दूसरे को ’जड़बुद्धि’ मानेगा। स्वयं को सही और दूसरे को गलत ठहराएगा।

इस प्रश्न का बड़ा सीधा-सा उत्तर है और यही इस समस्या का एकमात्र व सर्वथा उचित समाधान भी है। स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में इस समाधान को उचित ठहराया है और इसकी स्पष्ट घोषणा की है -

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।

अर्थात् जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को। (यानी उसे सफलता, चरम लक्ष्य की प्राप्ति और आनन्द तीनों ही नहीं मिलते। सरल शब्दों में वह न इधर का रहता है, न ही उधर का बल्कि किधर का भी नहीं रहता।) 

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। 

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।

अर्थात् इसलिए तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में (क्या करें, क्या न करें ? या क्या उचित है, क्या अनुचित ?) शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।

अतः स्पष्ट है कि कौन सही है, कौन गलत ? या क्या उचित है, क्या अनुचित ? इस मामले में शास्त्र ही मात्र प्रमाण है। जिस पक्ष का मत शास्त्रसम्मत है, उसी को सही माना जाना चाहिए। विवाद करने वाले सभी पक्ष गलत तो हो सकते हैं। परन्तु सही यदि होगा तो एक ही होगा। वह एक वो होगा जो शास्त्रसम्मत होगा।

विशेष-फिर भी यहां एक ’घुण्डी’ है (पाठकों का ध्यान उस ओर न भी जाए तो भी ईमानदारी का तकाजा है कि उसे पाठकों की दृष्टि में लाया जाए) । वह यह कि ’शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर (जानकर, केवल मानकर नहीं) तू शास्त्र विधि से नियत कर्म कर।’ इस उपाय में भी ’जानकर’ (ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं...) शब्द का प्रयोग किया गया है। यानी जो शास्त्रोक्त है उसे भी दर्शनशास्त्र (विशेषकर मीमांसा दर्शन और न्याय दर्शन क्योंकि ’मीमांसा’ हमें विश्लेषण/एनालाइसिस बताता है और ’न्याय’ हमें औचित्य की कसौटी पर कसना/परखना बताता है) द्वारा विवेचित करके उसका औचित्य जान लेने पर उसको अमल में लाना है। यानी अंधता नहीं सजगता भी चाहिए। ऐसा न हो कि आदमी ’लकीर का फकीर’ हो जाए जैसा कि आमतौर पर बहुत से शास्त्रज्ञ हो जाते हैं।

इस ’जानने’ (ज्ञात्वा) पर इतना जोर क्यों है ? जाने बिना करने या जाने बिना मानने से क्या हानि है ? यह भी स्पष्ट कर दें। जाने बिना मानने से संशय/भ्रम/गलतफहमी होती है। पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है और जाने बिना करने से अहंकार, मोह और दम्भ उत्पन्न होता है, हठधर्मिता पैदा होती है। दोनों ही अविश्वास व अंधविश्वास को बढ़ाते हैं और मोह तथा अज्ञान में फंसाते हैं। मोह की दलदल से ज्ञान प्राप्त किए (जाने) बिना नहीं निकला जा सकता।

श्रीकृष्ण ने गीता में यह स्थिति भी स्पष्ट कर दी है -

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।

अर्थात् जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भली-भांति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों (झमेलों) से वैराग्य (मुक्त एवं ज्ञान) को प्राप्त हो जाएगा। (जब तक मोहग्रस्त है तब तक तत्त्वदर्शी यानी जो जैसा है उसे वैसा ही देखने/जानने वाला नहीं हो सकता।)

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। 

समाधावचला  बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।

अर्थात् (प्रतिपन्न का अर्थ ’एक्यूरेट’/सटीक होता है। ’विप्रतिपन्न’ का अर्थ ’अनएक्यूरेट’ या सटीक से उल्टा अर्थात् भ्रामक हुआ) भांति-भांति के विप्रतिपन्न वचनों (मतों) को सुनकर विचलित (भ्रमित/संशयग्रस्त) हुई तेरी बुद्धि जब एक मत (परमतत्त्व/शास्त्रोक्त सत्य) पर अचल/स्थिर हो जाएगी (ठहर जाएगी) तब तू योग (परमबुद्धि) को प्राप्त हो जाएगा। (यानी जब तेरी बुद्धि के संशय/भ्रम या असमंजसता समाप्त हो जाएगी तब तू एक निश्चित मत पर स्थिर हो जाएगा। इस प्रकार उस मत को स्थिर बुद्धि होने से जानकर तू प्रगति या योग को प्राप्त होगा। सरल शब्दों में जब तक डप्छक् में कॉन्सेप्ट क्लीयर नहीं होगा तब तक तू प्रगति नहीं कर सकता, दुविधाग्रस्त ही रहेगा।)

निष्कर्ष-अतः जाने बिना मानना (अंधविश्वास) तथा जाने बिना न मानना (अविश्वास) दोनों ही घातक हैं। किन्तु जानने के लिए सर्वप्रथम पूर्वाग्रह और हठधर्मिता को त्यागना होगा। तभी तो जिज्ञासा होगी और तभी ज्ञान प्राप्ति की सम्भावनाएं उत्पन्न होंगी।

ज्ञान प्राप्ति के तीन ही सुलभ मार्ग हैं-अपना अनुभव/प्रकृति (छ।ज्न्त्म्)/ऑब्जर्वेशन। उपदेश या पुस्तकें (गुरु या सीनियर/ज्ञानी की शरण में जाना) तथा आत्मसाक्षात्कार/योग। इन तीनों में भी जो अन्तिम है, वह अत्यंत कठिन है। पहला अपेक्षाकृत कम कठिन है परन्तु दूसरा (उपदेश पुस्तक/गुरु/ज्ञानी की शरण में जाना) अपेक्षाकृत आसान है। किन्तु इस आसान मार्ग पर भी तभी चला जा सकता है जब व्यक्ति पूर्वाग्रह तथा हठधर्मिता को छोड़कर ईमानदारी/निष्पक्षता, सरल हृदयता/निष्कपटता और जिज्ञासा पूर्ति (न कि तकरार करने या सामने वाले को एग्जामिन करने के उद्देश्य से जाए और समर्पण का भाव न रखे।)

समर्पण का भाव न रहने से भी गुरु कृपा प्राप्त नहीं होती। राम ने जब लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिए अंत समय में महाज्ञानी रावण के पास भेजा था तो लक्ष्मण रावण के सिरहाने खड़े हो गए थे। अविनय व असमर्पण के कारण लक्ष्मण को तब रावण से ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका था।

अर्थ को सम्पूर्णता से न विचारना- यह उन तथाकथित ज्ञानियों के सन्दर्भ में है जो ज्योतिष या अन्य किसी भी विषय या शास्त्र के ’पण्डित’ होने के भ्रम में जीते हैं और बस ’लकीर के फकीर’ बनकर रह जाते हैं। मसलन मेरे एक-दो परिचित हैं, जिन्हें गीता या अन्य शास्त्रों के बहुत से श्लोक कंठस्थ हैं । वे गाहे-बगाहे उनको सुनाकर अल्पज्ञों पर अपना पांडित्य झाड़कर गर्वित भी होते हैं, किन्तु तत्त्वदर्शी नहीं हैं। भावार्थ या गूढार्थ पर विचार न करके शब्दार्थ में ही अटक जाते हैं और फिर बाल की खाल निकालकर सत्य को झुठलाने का प्रयास करते हैं।

सूत्रों/श्लोकों का कंठस्थ होना अच्छी बात है। परन्तु तभी जब उसके तत्त्व को हम समझते भी हों और उन्हें जीवन में उतारने की चेष्टा भी करते हों। अन्यथा रटने के मामले में तोता और भी बेहतर है। मात्र आंकड़ों को स्मरण ही रखना हो तो कम्प्यूटर आदमी से कहीं श्रेष्ठ है। यदि उनका अर्थ और प्रयोग न आता हो तो मात्र रट लेने का कुछ लाभ नहीं। ज्ञान पुस्तकों में दबा हो या दिमाग में, पुस्तकें पड़ी हों तो वैसे ही हैं, जैसे लाइब्रेरी में पड़ी हों या गधे की पीठ पर लदी हों। तब तो मात्र व्यक्ति पुस्तकों का बोझ ही ढोता है। बोझ पुस्तक का हो या लकड़ियों का, कोई अन्तर नहीं है। अतः अधिकाधिक शास्त्र पढ़ना या उन्हें कंठस्थ कर लेना लाभप्रद नहीं, बल्कि पढ़े हुए को वास्तव में समझ लेना और उसे अमल में लाना लाभप्रद है। इसके लिए आवश्यक है कि हम लेखक के हृदय को समझें। हम शब्द के मर्म को समझें। हम पढ़े हुए को विचारें, मंथन करें। न समझ में आने वाले भाग को और भी जागरूकता से बार-बार पढ़ें, अपने से अधिक विद्वान की सहायता लें। प्राप्त निर्णय या तथ्यों को शास्त्रों की कसौटी पर कसें। इस प्रकार तत्त्व को जानें और फिर विश्वासपूर्वक उसे प्रयोग में लाएं।

शब्द एक ही होता है, परन्तु उसके अर्थ अनेक होते हैं। कहां और कौन-सा अर्थ युक्तिसंगत होगा, इसे तय करने के लिए अपनी सामान्य बुद्धि, सजगता व ज्ञान की ही नहीं, विषय/पुस्तक की आत्मा और लेखक के हृदय तथा दृष्टिकोण को भी दिमाग में रखना आवश्यक है। अन्यथा अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।

शब्द में शक्ति होती है। शक्ति के विस्फोट से अर्थ प्रस्फुटित होता है। लक्षणा शक्ति, अभिव्यंजना शक्ति आदि अनेक शक्तियां अर्थशक्ति के साथ छिपी रहती हैं। शब्द का शब्दार्थ, भावार्थ, गूढार्थ, प्रचलित अर्थ, पर्याय अर्थ, प्रासंगिक अर्थ आदि अनेक अर्थ शब्द में निहित रहते हैं। अतः शब्द को सरसरी तौर पर देखने या पढ़ने से बात नहीं बनती।

उदाहरण के रूप में ’मुर्गे ने बांग दे दी।’ का शब्दार्थ मात्र इतना है कि ’मुर्गे नामक एक पक्षी ने आवाज की।’ किन्तु लक्षणा शक्ति के चमत्कार से इस वाक्य का वास्तविक अर्थ निकलेगा-’सवेरा हो गया।’ जबकि पूरे वाक्य में सवेरा होने का कहीं जिक्र नहीं आया है। ऐसे में शब्दार्थ ढूंढ़ने वालों को वास्तविक अर्थ का भान नहीं होगा।

’सोना’ का अर्थ ळव्स्क् भी है और ’सोना’ का अर्थ ैस्म्म्च् भी है और ’खाना’ का अर्थ थ्व्व्क् भी है, ’खाना’ का अर्थ म्।ज्प्छळ भी है और खाना का अर्थ ैफन्।त्म् या चौखुंटा छोटा स्थान भी है। यही ’खाना’ जब किसी और शब्द के साथ जुड़ जाता है तो इसका मतलब ’आलय’ (रहने का स्थान) भी हो जाता है। जैसे-मुर्गीखाना, जुआखाना, दवाखाना आदि । उर्दू में खाना का अर्थ श्घरश् होता है। जैसे ’खानाखराब’ (बेघर), दौलतखाना (समृद्ध या सम्पन्न घर), गरीबखाना (झोंपड़ी) आदि। यही गलत पढ़ा जाए तो ’खाना’ के स्थान पर ’रवाना’ (कहीं प्रस्थान करना) हो जाता है। यदि इन अनेक अर्थों को नहीं विचारा जाएगा तो पता नहीं चलेगा कि कहां कौन-सा अर्थ ’एप्रोप्रिएट’ (माकूल) होगा और गलत अर्थ ले लेने पर अर्थ का अनर्थ हो जाएगा।

’गो’ खड़ी बोली का एक शब्द है। इसका प्रचलित अर्थ ’गाय’ है। किन्तु इसका एक अर्थ ’इन्द्री’ भी है। गो का अर्थ ग्रह भी है। तभी गोचर-दशा कहा जाता है। और गो जीभ को भी कहते हैं। यथा-गो गोचर जहिं लगि मन जाई, तहं लगि माया जानेहु भाई। (अर्थात् इन्द्रियां और इन्द्रियों के विषय तथा जहां तक भी मन की पहुंच है, वहां तक माया का ही राज्य है।) और ’इन्द्रियां’ भी ’गो’ कहलाती हैं। (जबकि अंग्रेजी में ’गो’ का अर्थ ’जाना’ है)। यहां प्रसंगवश एक वैदिक कथा को संक्षेप में देंगे।

वृत्रासुर नामक असुर ने गौओं को पकड़कर एक गुफा में बन्द कर दिया और इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा उस महा असुर का वध करके गौओं को छुड़ाया। ऐसी एक कथा वेदों में आती है। सभी अनुवादकों ने गो का अर्थ यहां गाय (ब्वू) से लिया है। परन्तु ’गो’ का दूसरा अर्थ ’इन्द्रियां’ यहां अधिक सारगर्भित है। क्योंकि मात्र गौओं की रक्षा के लिए इतना सब प्रपंच करना जरूरी नहीं था। अवश्य ही यहां ’गो’ का गूढार्थ ’इन्द्रियां’ होना चाहिए। इन्द्रियों से इन्द्र का सम्बन्ध दोनों नामों से समानताओं से ही सिद्ध होता है। यह एक छोटासा उदाहरण है जो गूढार्थ को विचारने के लिए प्रेरित करता है।

कथा को यहीं छोड़कर आगे बढ़ें तो किसी प्रसंग में ’गो’ का अर्थ अत्यंत सीधा, शरीफ व भोला व्यक्ति या स्त्री भी हो सकता है। जैसा कि कह दिया जाता है कि अमुक व्यक्ति/स्त्री तो निरा/निरी गो है। (यानी गाय की तरह सरल व सन्तोषी है।) यहां प्रासंगिक अर्थ होगा, जो शब्दकोश में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा। इसी तरह उल्लू, गधा, बकरी, लोमड़ी, भेडिया आदि जानवरों के नामों का प्रयोग प्रसंगवश किसी व्यक्ति के लिए हो जाता है।

मुहावरों या लोकोक्तियों के तौर पर प्रयुक्त होने वाले वाक्यों का अर्थ शब्दार्थ से भिन्न होता है। अतः वहां प्रचलित अर्थ को ग्रहण करके भावार्थ जाना जाता है। शब्दार्थ निकालने पर अर्थ पकड़ में नहीं आता। जैसे - ’कंगाली में आटा गीला’, ’अंगूर खट्टे होना’, आदि। ऐसे स्थानों पर वास्तविक अर्थ कभी मात्र शब्दार्थ को ही विचारने से नहीं पकड़ा जा सकता।

लिखने वाले का अपना अंदाज/शैली/स्टाइल भी कहीं पढ़ने वालों को विचारने को मजबूर कर सकता है। यथा-चौपड़ा साहब नहीं रहे, चौपड़ा साहब गुजर गए, चौपड़ा साहब मर गए, चौपड़ा साहब स्वर्ग सिधार गए, चौपड़ा साहब निकल लिए, चौपड़ा साहब अपने बच्चों को अनाथ कर गए, चौपड़ा साहब का टिकट कट गया, चौपड़ा साहब बैकंठवासी हो गए, चौपड़ा साहब का दुनिया से दाना-पानी उठ गया, चौपड़ा साहब सदा के लिए हमसे रूठ गए, चौपड़ा साहब चिरनिद्रा में लीन हो गए, चौपड़ा साहब का राम नाम सत् हो गया, चौपड़ा साहब इन्तकाल फरमा गए, चौपड़ा साहब का जै शिव हो गया, मिसेज चौपड़ा विधवा हो गईं, चौपड़ा साहब के बीवी-बच्चे बेसहारा हो गए, चौपड़ा साहब महायात्रा पर चले गए, चौपड़ा साहब खुदा को प्यारे हो गए, चौपड़ा साहब को भगवान ने अपने पास बुला लिया, अब चौपड़ा साहब कभी नहीं लौटेंगे, चौपड़ा साहब की सांसें उनसे रूठ गईं, जिन्दगी चौपड़ा साहब को दगा दे गई, चौपड़ा साहब को मौत ने गले लगा लिया, चौपड़ा साहब की आयु पूरी हो गई, चौपड़ा साहब काल कवलित हो गए, चौपड़ा साहब काल के गाल में समा गए, नियति के क्रूर हाथों ने चौपड़ा साहब को हमसे छीन लिया, चौपड़ा साहब ने दुनिया छोड़ दी, चौपड़ा साहब इतिहास बन गए, चौपड़ा साहब मिट्टी में मिल गए, चौपड़ा साहब पूरे हो गए आदि अनेक तरीकों से एक ही बात कही जा सकती है, जिन्हें ढंग से न समझा जाए तो कन्फ्यूजन हो सकता है ’कि चौपड़ा साहब कहां से गुजरे हैं ?’

अतः पढ़ने वाले को तथ्य समझने के लिए पूर्ण सजगता आवश्यक है। अन्यथा वह पढ़ेगा जरूर, पर समझेगा नहीं।

निष्कर्ष-कम से कम गूढ़ विषयों को तो विशेष सजगता और सावधानी से पढ़ना चाहिए। शब्द के एक-एक अर्थ को विचारकर पढ़ना चाहिए। विषय की आत्मा तथा लेखक के दृष्टिकोण को समझकर उनके साथ साहचर्य बनाकर पढ़ना चाहिए (इसके लिए पुस्तक की भूमिका/प्रस्तावना/आमुख को पहले जरूर पढ़ें ताकि विषय और लेखक के दृष्टिकोण व स्तर के साथ पुस्तक की विषयवस्तु या पठनीय सामग्री का भी पूर्ण अनुमान हो सके)। भले ही बार-बार पढ़ना पढ़े लेकिन पढे़ हुए को समझना चाहिए। औचित्य की कसौटियों पर कसना चाहिए और तब उसे अमल में लाना चाहिए। पढ़ते समय आपका दृष्टिकोण नकारात्मक या खण्डनात्मक न हो, बल्कि सकारात्मक तथा सीखने वाला हो, पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। तभी आप पुस्तक के प्रति और स्वयं अपने प्रति भी न्याय कर पाएंगे।

पुराना है इसलिए बेकार है, या सगना है इसीलिए काम का है ? - किसी विषय, वस्तु, ज्ञान अथवा सिद्धान्त को मात्र उसकी पुरातनता के आधार पर नहीं अपना लेना चाहिए और न ही मात्र उसके प्राचीन होने के कारण उसे त्याग देना चाहिए। यदि हम मात्र परम्परा या प्राचीनता के आधार पर ऐसा करेंगे तो यह हमारे ’पढ़े लिखे बेवकूफ’ होने का खुला सबूत होगा।

कहावत है कि व्स्क् प्ै ळव्स्क् लेकिन साथ में यह भी ध्यान रखिए - श्छव्ज् ।स्ॅ।ल्ैश् ( यानी जो पुराना है वह मूल्यावान है, परन्तु हमेशा नहीं)। क्योंकि ’हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती’ अतः यह भी मान होगा पूर्णता ही होगी कि हर नई वस्तु सोना ही होगी/मूल्यवान ही होगी। मूल्य या महत्त्व का आधार उसकी उपयोगिता और औचित्य है न कि उसका पुराना या नया होगा। अगर हमारे पूर्वज कुछ गलत करते रहे हैं तो इसी आधार पर हम भी गलत को नहीं अपना सकते कि हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते रहे हैं। इसी प्रकार यदि कोई नई प्रणाली या नया नियम निकक्मा साबित हो रहा है तो भी मात्र उसके आधुनिक या नवीन होने के कारण ही उसका स्वागत भी नहीं किया जा सकता। सतर्क एवं निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद जो उपयोगी व उचित सिद्ध हो वही अपनाए जाने योग्य है। भले ही वह परम्परागत/प्राचीन हो अथवा नूतन/आधुनिक जैसा पहले भी कहा है कि अन्धा विरोध या अन्धा समर्थन दोनों मूर्खता है। दोनों हठधर्मिता है। सजगता प्राथमिकता है।

यदि हम परम्परा की ही टांग पकड़कर लटकते तो बस लटके ही रहते। अरस्तु से गैलिलियो, गैलिलियो से न्यूटन और न्यूटन से आईस्टीन तक हमारे सिद्धांत व दृष्टिकोण विकसित न हुए होते अतः अन्धानुकरण से बचिए। भले ही वह परम्पराओं का ही, भले ही वह आधुनिकता का हो। यह बात कुछ छोटे व्यावहारिक उदाहरणों द्वारा और स्पष्ट की जा सकती है।

हमारे पूर्वज क्योंकि दीपक की रोशनी में रात को काम चलाते आए थे, इसलिए हमें भी ट्यूब लाइट या बल्ब की रोशनी में काम न करके दीपक की ही रोशनी में काम करना चाहिए ? अथवा आवागमन के साधन बेहतर न होने से हमारे पूर्वजों ने वर्षाकाल को यात्रा आदि बाहरी कार्यों के लिए निषिद्ध किया था तो आज सभी सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी हम इस ’निषेधाज्ञा’ का पालन मात्र इसलिए करें कि हमारे पूर्वजों ने भी ऐसा किया है ? यदि ऐसा करें तो हमारे पूर्वज तो आदिमयुग में असभ्य, असंस्कृत, जंगली और नंगे घूमने वाले थे। फिर आज हम शिक्षा, वस्त्रों, संस्कृति व सभ्यता को स्वीकार क्यों कर रहे हैं ? हमें वैसा ही बने रहना चाहिए।

मुस्लिम धर्म अरब (रेगिस्तानी क्षेत्र) से आरम्भ हुआ। पानी सुविधापूर्वक उपलब्ध न होने से टोंटी/नलकीदार लोटा तब प्रयोग में लाया गया (ताकि पानी का अपव्यय न हो) तथा वही लोटा नमाज, रसोई, स्नानागार व शौचालय में प्रयुक्त किया गया। ’वजु’ भी (उल्टे हाथ धोना) स्नान के स्थान पर, नमाज से पूर्व प्रयोग में लाया गया। गर्मी या सूर्य को सामने से न झेलना पड़े, अतःपश्चिम दिशा में मुख करके नमाज पढ़ने का प्रावधान किया गया। हफ्ते में एक बार वस्त्र धोने या गुसल की व्यवस्था बनाई गई। यह सब उस समय की मजबूरी थी। तब की परिस्थितियों के अनुसार उपयोगी था। परन्तु आज ऐसा नहीं है। फिर भी हम मात्र रूढ़िवादी होने की कट्टरता के कारण इन नियमों का अंधानुकरण करते हैं तो हमारे शिक्षित व विकसित होने का क्या लाभ ?

सायंकाल के बाद झाड़ लगाने से लक्ष्मी घर से चली जाती है। यह सिद्धांत जब बनाया गया तब रोशनी की उचित व्यवस्था नहीं थी। अंधेरे में या दीपक की कम रोशनी में झाड़ लगाने से कूड़े के साथ नीचे गिर गई कोई मूल्यवान चीज भी बाहर फेंकी जा सकती थी। तब के लिए यह सिद्धांत ठीक था। मगर आज रोशनी की समुचित व्यवस्था होने पर आवश्यकता पड़ने से शाम या रात को झाड़ क्यों नहीं लगाई जा सकती ? (इसका अर्थ यह नहीं कि रूढ़िवादिता को तोड़ने के लिए हम रात को ही झाडू लगाएं। क्योंकि प्रातःकाल ही घर तथा अपनी साफ-सफाई कर लेनी चाहिए। सारा दिन गंदगी में काटकर रात को सफाई करना तो निरी बेवकूफी है। मगर इसका अर्थ यह अवश्य है कि जरूरत पड़े तो रात में भी पुनः सफाई की जा सकती है। ऐसा नहीं कि सुबह यदि सफाई किसी कारण न हो सकी या पुनः गंदगी हो गई तो शाम ढल जाने के कारण गंदगी में ही पड़े रहें, सफाई न करें, क्योंकि हमारी रूढी इसका समर्थन नहीं करती।)

परम्परा का औचित्य-परम्परा को समझे बिना परम्परा का औचित्य जाना नहीं जा सकता और समय व बदली परिस्थितियों को तोले बिना परम्परा अब निभाने लायक रह गई है या नहीं-यह भी नहीं जाना जा सकता। एक छोटी-सी शिक्षाप्रद कहानी के बाद इस प्रसंग को समाप्त करेंगे और विषय की ओर बढ़ेंगे।

एक औरत ने घर में बिल्ली पाली हुई थी। करवा चौथ व अहोई अष्टमी पर वह घर में रंगोली वगैरह बनाती थी। बिल्ली पूजा के वक्त उसे खराब न कर दे इसलिए बिल्ली को उल्टे टोकरे के नीचे बन्द करके वह टोकरे के ऊपर बट्टा रख देती थी। औरत की बह भी यह सब देखती। जब औरत मर गई तब संयोग से दो सप्ताह बाद बिल्ली भी मर गई। बाद में जब करवा चौथ आई और बहू रंगोली बनाने बैठी तो उसने पति से कहा, ’’सुनो जी ! हमारी बिल्ली तो मर चुकी। कहीं से एक बिल्ली पकड़कर लाओ।’’ पति ने कारण पूछा तो पत्नी बोली, ’’अरे बिल्ली को टोकरे के नीचे बन्द करना होगा, तभी रंगोली बनाकर पूजा होगी। ऐसी ही परम्परा है। मैंने आपकी माताजी से सब रीति-रिवाज सीख लिए हैं।’’

अब यदि पति महोदय भी दिमागदार न हुए और बिल्ली पकड़ लाए तो यही रिवाज उनकी पुत्रवधू भी देखेगी और करेगी। इस प्रकार एक परम्परा की नींव पड़ जाएगी और पांच-छः पीढ़ियों बाद जब कोई समझदार व्यक्ति उस परिवार से कहेगा कि भाई बिल्ली बन्द करने की क्या तुक है ? तो यही जवाब मिलेगा- ’’हमारे खानदान की यही रीत है। हमारे पूर्वज कोई बेवकूफ तो थे नहीं, कुछ सोचकर ही उन्होंने यह रिवाज बनाया होगा।’’ इस प्रकार बिना कारण को जाने, बिना औचित्य को समझे एक परम्परा आरम्भ हो जाएगी। सच है ! हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे। उन्होंने तब की परिस्थितियों के अनुसार जो उचित और सुविधाजनक था वो किया। मगर हम अवश्य मूर्ख हैं जो आज की परिस्थितियों में तोले बिना किसी परम्परा को मात्र पूर्वजों के किए जाने के कारण अपनाते हैं।

निष्कर्ष-विकास या प्रगति एक यात्रा है, एक सिलसिला है। बहुत कुछ पुराना छूटता जाता है और नया जुड़ता जाता है। पुराने में जो आज भी उपयोगी और काम का है, मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण है उसे सहेज लिया जाता है, अनावश्यक कूड़े को छोड़ देते हैं। इसी प्रकार नए में भी उसे ही ग्रहण किया जाता है जो उपयोगी, मूल्यवान, महत्त्वपूर्ण और उचित है। बेकार या अनावश्यक को साथ में लादा नहीं जाता। यही समझदारी है।

भ्रान्तियों का संक्षिप्त विवेचन

   भ्रान्तियों के कारणों तथा कारणों को औक़ात जान लेने के बाद अब भ्रान्तियों खण्डन स्वतः ही हो जाता है। कारणों को दूर करना हो निवारण है। तथापि भ्रान्तियों के संदर्भ में जो पक्ष अनछुए रह गए हैं, उनको एक बार संक्षिप्त चर्चा में लेंगे ताकि भ्रान्तियों के संदर्भ में संदेह की कोई सम्भावना पाठकों के समक्ष न रहे।

ज्योतिष अंधविश्वासर ? -इस विषय पर प्रारम्भ में पर्याप्त चर्चा हो चुकी है। ज्योतिष अंधविश्वास नहीं है, मगर ज्योतिष पर कुछ लोगों को अंधविश्वास अवश्य है। ज्योतिष पर अविश्वास करने वाले ही ज्योतिष को अंधविश्वास कहते हैं, मगर अविश्वास का कोई ठोस आधार उनके पास नहीं है। जानना तो दूर उन्होंने ज्योतिष को पढ़ा तक नहीं है। अतः ज्योतिष निराधार नहीं है। बल्कि ज्योतिष को निराधार कहने वालों के पास अपने निर्णय/निष्कर्ष का कोई आधार नहीं है। मात्र विज्ञान को ही नहीं, ज्योतिष को भी जानिए। तभी निष्पक्ष तुलना करके निर्णय लीजिए। यही मेरा निवेदन है।

ज्योतिष मात्र कर्मकांड व पंडों की आजीविका ? -ज्योतिष मात्र कर्मकांड नहीं है। यह विज्ञान, कला, गणित, खगोल, समाजशास्त्र, आचार संहिता, दर्शन तथा अध्यात्म का अनूठा संगम है। यह ठीक है कि बहुत से विद्वानों को आजीविका का भी यह साधन है। पर इसमें आपत्तिजनक क्या है ? कानून का जानकर वकालत द्वारा आजीविका चलाता है। चिकित्सा विज्ञानी डॉक्टर बनकर आजीविका चलाता है। किसी भी विषय का जानकार उस विषय के उपयोग से दूसरों को लाभान्वित करके आजीविका चलाता है। वह एकाउंटेंट हो, वैज्ञानिक हो, संगीतज्ञ हो, कलाकार हो, गणितज्ञ हो, अध्यापक या भाषाविद हो, मैकेनिक हो, इंजीनियर हो, डॉक्टर हो, वकील हो, मनोवैज्ञानिक हो या खिलाड़ी आदि। (जो किसी भी विषय का विद्धान न हो और किसी भी प्रतिभा से सम्पन्न न हो, वह सेवा द्वारा ही आजीविका चलाता है।) फिर यदि कुछ ज्योतिर्विद ज्योतिष को आजीविका का साधन बनाते हैं तो इसमें आपत्ति कैसी ?

ज्योतिष कपोल कल्पना/ठगविद्या ? -कल्पना में मात्र विलास होता है। उसके निष्कर्ष कुछ नहीं निकलते। अतः कल्पना निराधार होती है, क्योंकि वास्तविकता से उसका सम्बन्ध नहीं होता। परन्तु ज्योतिषीय सूत्र सहज ही जातक के जन्म का समय, मास, पक्ष आदि बताते हैं। जातक का व्यक्तित्व, स्वभाव, गुण, दोष, रंग, आकार आदि बताते हैं, यहां तक कि वह किन रोगों से ग्रस्त/पीड़ित है ? उसका दाम्पत्य जीवन कैसा है ? बच्चे कितने हैं ? बच्चों का लिंग तथा गुण, स्वभाव क्या है ? जातक व उसके बच्चों की शिक्षा क्या है ? जातक के माता-पिता, भाई-बहनों आदि की स्थिति क्या है ? यह सब निष्कर्ष सत्यता के साथ उद्घाटित करते हैं। जातक के भूतकाल व भविष्यत् काल के संबंध में भी सटीक अनुमान ज्योतिषी लगा पाता है। फिर इसे कल्पना कैसे मान सकते हैं ?

हां, किन्तु यह दुख के साथ स्वीकारना होगा कि बहुत से हज़रत ज्योतिष की आड़ में मासूमों को गुमराह, भ्रमित, आतंकित या भयभीत करके, प्रलोभन या बरगला कर अपना स्वार्थ सीधा करके उन्हें ठगते भी हैं। इसी प्रकार के ’झोलाछाप’ ज्योतिषियों के कारण यह पेशा और विद्या बदनाम हो रही है। परन्तु इसमें विद्या का दोष नहीं, उसे प्रयोग करने वाले का दोष है। सही निशाना लगाना तो पुलिस/सेना का जवान भी जानता है और डाकू भी। किन्तु डाकू उस प्रतिभा का प्रयोग अपने हित में करता है और सेना का जवान जनहित में या राष्ट्रहित में। इसका अर्थ यह नहीं कि निशानेबाजी या बंदूक चलाने की कला दोषी है। दोषी तो उसको गलत प्रयोग में लाने वाले हैं। इसीलिए विद्या को, शक्ति को, ज्ञान को, धन को अथवा सत्ता व स्त्री को सौंपते समय व्यक्ति की पात्रता की परीक्षा आवश्यक है। बन्दर के हाथ में उस्तरा बन्दर के लिए ही नहीं, समाज के लिए भी घातक है।

प्रस्तुत पुस्तक में जन्मपत्री को पढ़ने की जो ज्योतिष की प्रारम्भिक व आधारभूत जानकारी दी जा रही है। उसका उद्देश्य ही यह है कि इस प्रकार की ’ठगी’ से पाठक सुरक्षित रह सकें और ज्योतिष के प्रति भ्रान्तियों से मुक्त हों। ठगे जान में ठगने वाला तो दोषी है ही, मगर ठगा जाने वाला भी दोषी है, क्योंकि वह अज्ञानी है और सजग नहीं है।

ज्योतिष मात्र ग्रहों का गणित है ? -ज्योतिष को मात्र गणित मानना भारी भूल है और यह भूल गलत परिणामों पर पहुंचा सकती है। गणित के नियम सीधे और निश्चित होते हैं। वे देश, काल, पात्र और परिस्थिति से कभी प्रभावित नहीं होते, जबकि ज्योतिष में ऐसा नहीं होता। उदाहरण के लिए- 2 $ 2 = 4 गणित का एक सामान्य नियम है। इस नियम को दूसरी कक्षा का छात्र प्रयोग में लाए अथवा डण्।ण्या च्ण्भ्ण्क्ण् करने वाला। दोनों का उत्तर समान होगा। दो और दो चार ही होंगे, तीन या पांच किसी भी सूरत में नहीं हो सकते। मगर ज्योतिष में प्रारम्भिक स्तर का छात्र ज्योतिषीय सूत्र के प्रयोग से जो परिणाम निकालता है, वह विशेषज्ञ के परिणाम से तो भिन्न होते ही हैं। अन्य ज्योतिषवेत्ताओं या अपने सहपाठियों के परिणामों से भी कई बार मेल नहीं खाते।

ज्योतिष में 2 $ 2  = 2 भी हो सकते हैं। 2 $ 2 = 0 और 2 $ 2 = 10 भी। निष्कर्षों की यह भिन्नता बताती है कि ज्योतिष मात्र गणित ही नहीं है। इसमें दर्शन, भूगोल, खगोल, विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, आचार संहिता, अध्यात्म, पदार्थ विज्ञान आदि बहुत से विषयों का कलात्मक ढंग से एक विशेष प्रकार का संयोजन है जो देश, काल, पात्र व परिस्थितियों के अनुसार फलित होता है। अतः ज्योतिषी का अपना अनुभव, विश्लेषण क्षमता, तर्कशक्ति, दूरदर्शिता तथा बुद्धि एवं दृष्टिकोण के साथ पारंगत होने का भी प्रभाव पड़ता है।

एक स्थूल उदाहरण के अनुसार हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु मिलकर गणितानुसार कुल तीन अणु होने चाहिए, जबकि वहां न हाइड्रोजन रूप में रहती है, न ही ऑक्सीजन, बल्कि एक नया रूप-’पानी’ परिणाम में उपलब्ध होता है। इसी प्रकार सोडियम क्लोराइड के दो टुकड़े और दो चम्मच पानी का संयोग न सोडियम क्लोराइड को सुरक्षित रखता है, न पानी को बल्कि वहां अग्नि प्रकट हो जाती है। कॉपर सल्फेट और पानी के घोल में डाला गया ब्लेड या कील कुछ घंटों बाद तांबे की कील/ब्लेड (तांबे की परत चढ़ जाती है) में परिवर्तित हो जाता है। जबकि केवल पानी में डाला गया ब्लेड/कील कुछ घंटों बाद बाहर निकालकर रखने पर ज्यों का त्यों रहता है अथवा जंग खा सकता है।

ज्योतिष में भी विभिन्न तत्त्वों तथा गुणों का भिन्न मात्राओं और भिन्न परिस्थितियों में संयोजन-देश, काल, पात्र व अवस्था के अनुसार विभिन्न परिणाम उत्पन्न करता है। एक जैसे नहीं। अतः ज्योतिष में ग्रहों की गति व काल गणना के प्रयोग तक ही गणित का महत्त्व है। इसे पूरा गणित पर ही आधारित नहीं माना जा सकता। या ज्योतिष को मात्र गणित नहीं कहा जा सकता। अन्यथा एक ही स्थान पर एक ही समय में उत्पन्न होने वाले अनेक जातकों का भविष्य तथा वर्तमान आदि सभी कुछ एक जैसा होना चाहिए, जो कभी नहीं होता।

ज्योतिष ईश्वरीय प्रकाश है अतः परिपूर्ण है ? -प्रकाश का अर्थ है ज्ञान, देखने की सुविधा व सामर्थ्य का प्राप्त होना। क्योंकि अंधकार में किसी भी वस्तु को जाना, पहचाना नहीं जा सकता। प्रकाश होता है, तभी जानकारी/ज्ञेयता होती है। ज्योतिष ईश्वर का प्रकाश नहीं, अपितु प्रकाश के लिए प्रार्थना या प्रकाश को सम्मान देना है। यह हम प्रारम्भ में परिभाषा व सन्धि विच्छेद/अवययों को विश्लेषित करके जान चुके हैं। अतः परिपूर्णता या अंतिम जैसा ज्योतिष में कुछ नहीं है। हर विषय को अपनी सीमाएं तथा एक निश्चित क्षेत्र होता है। ज्योतिष में भी यहीं नियम लागू होता है। हर विषय में आगे सतत् विकास व शोध की अनन्त सम्भावनाएं रहती हैं। ज्योतिष भी इन सम्भावनाओं से अछूता नहीं है। ऐसा नहीं कि प्रारम्भ में नारद बृहस्पति या भृगु ने जो सूत्र प्रतिपादित कर दिए वही अंतिम थे। आगे व्यास, पराशर, गर्ग, कश्यप आदि अनेक ऋषियों ने सूत्रों को विकसित, समाशोधित या संशोधित भी किया है और नए सूत्र भी बनाए हैं। यह सहज विकास का एक अंग भी है और सत्य तक पहुंचने के विभिन्न मार्ग या प्रणालियां भी। किन्तु हर प्रणाली में कुछ विशेषताएं भी होती हैं तो कुछ दोष भी। हर मार्ग में कुछ सुगम्यताएं होती हैं तो कुछ अवरोध भी। अतः यह नहीं माना जा सकता कि ज्योतिष परिपूर्ण या चरम है। सरल शब्दों में कहा जाए तो ज्योतिष अनेक उपलब्ध लक्षणों, अवस्थाओं, प्रभावों, कारणों व उनके संयोग से उत्पन्न होने वाले परिणामों का वैज्ञानिक व तार्किक (स्व्ळप्ब्।स्) अध्ययन के बाद अनुमान लगाने की कला या विद्या है और यह आवश्यक नहीं है कि अनुमान सदैव सत्य और सटीक ही हों। प्रणाली की सीमाएं और प्रयोगकर्ता की क्षमता (ज्ञान व अनुभव) दोनों ही इसके लिए उत्तरदायी होते हैं।

ज्योतिष द्वारा पूर्व निश्चित भाग्य बदला जा सकता है ? -यह बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है। प्रायः ज्योतिर्विद भी इस सम्बन्ध में गलतफहमी के शिकार हैं। क्योंकि यह बड़ा पेचीदा मामला है। यहां भाग्य और नियति (ईश्वरीय विधान या पूर्व योजना) का अन्तर समझ लेना अति आवश्यक है। भ्रान्तियों के कारणों पर चर्चा करते समय हमने कार्यकारण सम्बन्ध तथा कर्मफल बन्धन पर संक्षिप्त प्रकाश डाला था। उस आधार पर कहा जा सकता है कि संचित कर्म (जिनका परिपाक काल अभी नहीं आया है, परन्तु बीज डाल दिए जाने से जिनका फल निश्चित हो चुका है) ही भाग्य है और दुर्भाग्य हो या सौभाग्य वह फल हमको भोगने ही होंगे।

यानी स्पष्ट है कि हमारे नवीन कर्म/प्रयास नए फलों/भाग्य के लिए प्रतिबन्धित करेंगी न कि पूर्व कर्मों के फलों या भाग्य को परिवर्तित करेंगे। वह तो हमें भोगने ही होगा (मात्र योगाग्नि में ही उन्हें भस्म किया जा सकता है, मगर वह बहुत-बहुत ऊपर की बात है, ज्योतिष की सामर्थ्य से परे है।) यह तो अटल सत्य है। भली प्रकार समझ लेना चाहिए। इसका कोई विकल्प और नहीं है।

दूसरी बात हमारा भाग्य मात्र हमारे कर्मों का प्रतिफल है। (सभी का भाग्य उनके कर्मों का प्रतिफल है।) पर यह भाग्य या कर्म नियति को नहीं बनाते बल्कि नियति ही इन भाग्य व कर्मों को बनाती है। ईश्वर की योजनानुसार ही हमारे कर्म प्रभावित होते हैं और तदनुसार ही भाग्य निर्मित होता है। जहां कहीं तप आदि उपायों से मनुष्य अपनी सामर्थ्य को अत्यधिक बढ़ा लेता है वहां भी वह कर्म या प्रयास तो कर पाता है, परन्तु उसके फल को नियति के अनुसार ही पाता है न कि अपने प्रयासों के अनुसार।

जैसे कुम्भकरण ने तप किया यह वरदान पाने के लिए कि वह छः महीने जागे और एक दिन सोए। अपने आत्मबल तथा सामर्थ्य के कारण वह ऐसा प्रयास कर सका और ईश्वर को वर देने के लिए आना भी पड़ा। लेकिन ऐन मौके पर ईश्वर ने उसकी बुद्धि पलट दी और वह उलटा वर (छः महीने सोने व एक दिन जागने का) मांग बैठा-यह कुम्भकरण के प्रयास की सफलता तो नहीं कही जा सकती न ? उसका प्रयास व्यर्थ नहीं गया, पर उसे वो प्राप्त भी नहीं हुआ जिसकी कामना से उसने तप किया था। बल्कि उसे वो प्राप्त हुआ जो नियति के अनुसार निश्चित था। नियति कुम्भकरण के भाग्य/अधिकार में वो शक्ति नहीं देना चाहती थी। अतः कुम्भकरण प्रयास करने पर भी सफल नहीं हो पाया। यानी नियति के जो अनुकूल होता है वहीं प्रयास सिद्ध होता है, सभी प्रयास सिद्ध नहीं होते।

एक और उदाहरण देखिए - सतयुग में मनु और शतरूपा ने भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करने के उद्देश्य से तप किया। उनका प्रयास रंग लाया। भगवान न केवल प्रकट हुए वरन् उनको उनका इच्छित वर भी दिया। साथ ही यह भी कहा कि त्रेता युग में जब तुम दशरथ और कौशल्या के रूप में जन्म लोगे। तब मैं तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हें प्राप्त होऊंगा। यह प्रसंग दो तथ्यों को प्रकट करता है -

पहला यह कि मनु-शतरूपा को उनके प्रयास में सफलता इसलिए मिली और उनको इच्छित वर भी इसलिए मिला कि उनके प्रयास व इच्छा नियति के अनुकूल थी। (यदि ऐसा न होता तो उन्हें भी कुम्भकरण की भांति असफलता हाथ लगती।) लेकिन नियति (ईश्वरीय प्रोग्राम) में वह घटना त्रेतायुग में घटनी थी, सतयुग में नहीं। अतः तुरन्त या अगले ही जन्म में मनु-शतरूपा की इच्छा को भगवान ने पूर्ण नहीं किया। अपितु नियति के अनुसार किया।

दूसरा यह कि मनु और शतरूपा त्रेता युग में दशरथ व कौशल्या के रूप में जन्म लेंगे, यह नियति द्वारा पूर्व निश्चित था। अतः अगले जन्मों में उन्हें उसी हिसाब से कर्म करने थे। दुष्कर्म करते तो एक महान राजा-रानी के रूप में जन्म न ले पाते, योग करते तो त्रेता युग से पहले ही मोक्ष प्राप्त कर गए होते। यानी आदमी के भाग्य व भोग ही नहीं, उसके कर्म भी पूर्व निर्धारित हैं, नियति के अनुसार हैं। अतः दशरथ व कौशल्या के जन्म में पुत्रों का पिता बनना-यह भाग्य तो हजारों वर्ष पूर्व सतयुग में ही निश्चित हो चुका था। न कि दशरथ के पुत्रेयष्टि यज्ञ करने का बाद निश्चित हुआ। यज्ञ तो मात्र निमित्त था। यज्ञ के प्रयास से पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। पुत्र प्राप्त होना तो कई जन्म पहले ही निश्चित होकर दशरथ का भाग्य बन चुका था।

इस प्रकार के अनेकानेक प्रसंग सप्रमाण प्रस्तुत किए जा सकते हैं। परन्तु समझदार को इशारा ही पर्याप्त है और मूर्ख को स्वयं ब्रह्मा भी ज्ञान प्रदान नहीं कर सकते, ऐसा ज्ञानियों का कहना है। अतः हमारा भाग्य, हमारा कर्म, हमारे प्रयास और उनमें सफलता या असफलता हमारे अधिकार में नहीं, नियति के अधिकार में है। हम तो मात्र निमित्त हैं, परन्तु अज्ञानवशता और अहं के कारण ही स्वयं को कर्ता मान लेते हैं। जैसे बैलगाड़ी के नीचे-नीचे उसकी छाया में चलने वाला कुत्ता जिस दिशा में मुड़ जाए, उसी दिशा में बैलगाड़ी भी मुड़ जाए तो इस साम्यता से वह ऐसा समझने लगता है कि मेरे ही कारण यह बैलगाड़ी चल रही है। यदि मैं रुक जाऊंगा तो यह गाड़ी भी रुक जाएगी। गीता में भी स्पष्ट कहा है

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्मानि सर्वशः। 

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।। 

अर्थात् वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं। तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी ’मैं कर्त्त हूं’ -ऐसा मानता है।

विशेष - यह तो संक्षेप में हुई तत्त्वदर्शिता। अथवा नंगा सच। परन्तु व्यावहारिकता में इसके महत्व को जाने बिना यह अधूरा-सा रहेगा। क्योंकि प्रश्न उठता है कि यदि सभी कुछ पूर्व निश्चित है तो प्रयास/कर्म की आवश्यकता व उपयोग ही क्या है ? आवश्यकता भी है और उपयोग भी। कर्मफल, भाग्य, नियति के साथ एक पक्ष और भी तो है-कार्यकारण सम्बन्ध।

कोई भी कार्य या घटना तब तक घटित नहीं होते, जब तक कि उनका कारण न हो। यह तथ्य हम कार्यकारण सम्बन्ध में जान चुके हैं। अतरू कार्य के पीछे कारण का होना आवश्यक है। भले ही कारण आंतरिक हो या बाहरी, कारण स्थूल हो या सूक्ष्म, कारण स्वयं हम हों या परिस्थितियां, कारण हमारा भाग्य हो या नियति (जिसे अनजान होने से हम ’संयोग’ कहते हैं)। अतः कारण उत्पन्न करने के लिए प्रयासों की उपयोगिता या महत्व है। जब तक कारण उत्पन्न न हो, तब तक तो भगवान भी कोई कार्य (लीला) नहीं करते।

यदि रावण आदि के संहार के लिए उन्हें अवतार लेना था तो रावण आदि को ऐसे कर्म करने के लिए बाध्य किया कि उनके अवतार का कारण उत्पन्न हो। मनुशतरूपा को तप/प्रयास करने के लिए प्रेरित किया कि उनका रावण के काल में जन्म लेने का कारण उत्पन्न हो। दशरथ, वशिष्ठ आदि सभी जानकारों द्वारा शगुन, योग, मुहूर्त आदि के साथ कार्य की निर्विघ्न सम्पन्नता के उपाय कर लेने के बाद भी मंथरा को प्रेरित कर ऐसा कारण उत्पन्न किया कि उनका राजतिलक न होकर वनगमन हो। अस्तु, नियति के विधानानुसार ही कार्य होना है, परन्तु फिर भी उसका पहले कारण बनाना पड़ता है। मनु-शतरूपा अपने तप या प्रयास पर गर्व करें तो यह उनका अहं व अज्ञान होगा। कैकयी या मंथरा अपने कर्मों पर पछताएं तो यह उनका अहं या अभिमान होगा। हम कैकयी व मंथरा को गालियां दें तो ये हमारा अज्ञान व समग्रदृष्टि का अभाव होगा। उन्होंने जो किया, वे उसे करने को स्वतंत्र कहां थे ? बाध्य थे। स्वयं नियति के विधान द्वारा प्रेरित थे। उनको तो मात्र उन कार्यों का निमित्त बनना था जो ईश्वर द्वारा पूर्व निर्धारित थे। लेकिन मोह/माया/अविद्या/अहं के कारण हम इस तथ्य को समझते ही नहीं हैं। स्वयं कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है - 

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो 

लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। 

ऋतेऽपि त्वां भविष्यन्ति सर्वे

येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।। 

अर्थात् मैं तीनों लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। अतः प्रतिपक्षी सेना में जो योद्धा स्थित हैं, वे सब तेरे (मारे) बिना भी (जीवित) नहीं रहेंगे। अर्थात् तेरे न मारने पर भी इनका मरना निश्चित हो चुका है

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यथो लभस्व जित्वा शत्रून्भुड्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। 

मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।

अर्थात् अतः तू उठ! यश प्राप्त कर (यह अवसर तेरे कर्मों के कारण अधिकारी हो जाने से तुझे प्राप्त हो रहा है) और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग (यही तेरा भाग्य है)। ये सब शूरवीर तो मेरे द्वारा पहले ही से मारे हुए हैं (तू इस भ्रम में मत रहे कि तू ’कर्त्ता’ है)। हे सव्यसाचि (उल्टे हाथ से भी बाण चलाने में कुशल) ! तू तो मात्र (इनकी मृत्यु/वध का) निमित्त बन जा। (तू ’कर्ता’ नहीं है, तू तो मात्र माध्यम है। इस सत्य को जान ले)।

निष्कर्ष- अतः ज्योेतिष द्वारा मात्र कारण उत्पन्न करने के उपाय या प्रयास किए जा सकते हैं (इस विषय में आगे ’उपाय खण्ड’ में विस्तृत चर्चा करेंगे)। भाग्य को बदला नहीं जा सकता। क्योंकि उपाय यदि नियति के अनुसार हांेगे (ईश्वर ’परमिट’ करता होगा) तभी सफल हो पाएंगे वरना धूल में लट्ट पीटने के समान ही बेकार सिद्ध हो जाएंगे। इसलिए अगर हम ये समझते हैं कि चवन्नीक प्रसाद बॉटकर या दो-चार घंटे बजाकर हम अपने दुष्कर्मों के कारण निश्चित ही दुष्कर्मो के कारण निश्चित हो चुके दुर्भाग्य से बच जाएंगे, या भगवान हम पर कृपा कर देगा तो हमसे बड़ा बेवकूफ शायद ही कोई होगा और यदि भगवान ऐसा कर देता है तो उससे बड़ा उससे बेवकूफ शायद ही कोई होगा।

कारण दण्ड का उद्देश्य है सुधार। यदि अपराधी सच्चे मन से प्रायश्चित करके दण्ड स्वीकारता है और न्याय को सम्मान देता है, तभी (समय/अवधि से पूर्व सुधर जाने के कारण) उसका दण्ड क्षमा हो सकता है या दण्डावधि में छूट ही सकती है। तभी उसे कृपा प्राप्त हो सकती है। प्रसाद का लालच देकर या कर्मकांड का ढोंग करके नहीं। न्यायाधीश को तो धोखा दिया जा सकता है, ईश्वर को नहीं। दण्ड से बचने की चतुराई करने वाला या विभिन्न उपाय करने वाला तो षड़यन्त्रकारी, मक्कार और ईश्वरीय न्याय को न मानने वाला है। ऐसे व्यक्ति पर कृपा कैसे सम्भव हैं ? 

हमारा दुर्भाग्य हमारा दण्ड है (हमारे ही दुष्कर्मों के कारण हमें प्राप्त हुआ है)। हमारा सौभाग्य हमारा इमान है (हमारे ही सत्कर्मों के कारण हमें प्राप्त हुआ है) दण्ड हो या ईनाम- भोगना हमें ही है। खुश होकर भोगें या रोकर भोगें। दण्ड से बचाव के दो ही उपाय हैं-या तो हम स्वयं को सुधारें या दण्ड व इनाम की स्थिति से ऊपर उठा लें। स्वयं को सुधारना सत्कर्मों को करना व दुष्कर्मों का सच्चे मन मे प्रायश्चित करते हुए त्याग करना है और स्वयं को दण्ड या इनाम, पाप या पुण्या आदि से ऊपर उठा लेना यही ’योग’ है। इसके अलावा जो है वह हमारी चालाकी व छल है।

ज्योतिष स्वतंत्र विज्ञान व ज्योतिषी सर्वज्ञ है ?- ज्योतिष एक विद्या है, एक कला है, एक शास्त्र है, एक विज्ञान भी है। परन्तु इसे स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जैसा कि पहले भी चर्चा कर आए हैं, बहुत से समानान्तर विषयों का इसमें समायोजन है। बहुत से विषयों को साफ-साफ ज्योतिष से अलग नहीं किया जा सकता। जैसे हस्तरेखा विज्ञान, चरणरेखा विज्ञान, कपालसंहिता, मुखाकृति विज्ञान, अंकविज्ञान, शरीर लक्षण विज्ञान, चेष्टा विज्ञान, तिल-मस्सों आदि का प्रभाव, ग्रीवा संहिता, रावण संहिता, लाल किताब (अरुण संहिता), हस्तलिपि एवं हस्ताक्षर विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, रत्न ज्योतिष/रमल, खगोलशास्त्र, विज्ञान, समाजशास्त्र, आचार संहिता, मन्त्रविज्ञान, दर्शन शास्त्र, कर्मकांड, अध्यात्म, यन्त्र-तन्त्र एवं टोटके, शकुन शास्त्र, स्वप्न विज्ञान, मनोविज्ञान, गणित आदि बहुत से विषय ज्योतिष के साथ इस तरह गुंथे हुए हैं और आपस में इतने समानान्तर हैं कि उनको पृथक करके ज्योतिष को एक स्वतन्त्र विधा या विज्ञान कह सकना मेरे विचार में सम्भव ही नहीं है। अलबत्ता ज्योतिष एक स्वतंत्र विज्ञान भी है, यह सत्य है।

ज्योतिषी सर्वज्ञ नहीं हो सकता। क्योंकि ज्योतिषी भगवान नहीं है ! ज्योतिषी सिद्ध योगी भी नहीं है। ज्योतिषी को कोई वाक्सिद्धि का वरदान भी प्राप्त नहीं होता। ज्योतिष की सीमाएं हैं तो ज्योतिषी की और भी अधिक सीमाएं हैं। अतः ज्योतिषी को सर्वज्ञ मानना भारी भूल होगी। जैसा कि कहा है त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः (स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य देवता भी नहीं जानते तो मनुष्य कैसे जान सकता है ?)

ज्योतिष/ज्योतिषी, कार्यकारण सम्बन्ध, कर्मफल चक्र, पुनर्जन्म एवं ग्रहों की गति के गणित तथा तत्त्व एवं गुणों के समायोजन का अध्ययन कर काल द्वारा उनका सम्बन्ध स्थापित कर-भाग्य, कर्म, स्वभाव, भूत, वर्तमान, भविष्य आदि का अनुमान तो लगा सकता है, वह सटीक भी हो सकता है, परन्तु उन्हें बदल नहीं सकता और नियति को नहीं जान सकता। यह निश्चित है।




ज्योतिष की सार्थकता व लाभ

समस्त विवेचन के बाद, भ्रान्तियों से मुक्त होने के बाद, ज्योतिष की सीमाएं जान लेने के बाद, नियति की सुनिश्चितता को जान लेने के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि फिर जीवन में ज्योतिष की सार्थकता क्या है ? फिर हम ज्योतिष के ज्ञान से कैसे लाभान्वित हो सकते हैं ? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है और थोड़ा विवेचन मांगता है। सो हम यहीं से मूल विषय का आरम्भ कर रहे हैं।

सार्थकता व महत्त्व -ज्योतिष के माध्यम से हम अपनी या जातक की सीमाओं/दायरे को जान सकते हैं। वह/हम कहां स्थित हैं, यह जान सकते हैं। ज्योतिष बताता है कि कोई व्यक्ति कैसा है ? जैसा वह है, वैसा क्यों है ? वह पहले क्या कुछ कर चुका है ? अभी क्या कर रहा है ? आगे क्या करेगा ? और वैसा ही क्यों करेगा ? उसके साथ क्या कुछ घट चुका है ? और क्या कुछ आगे घटेगा ? और क्यों घटेगा ? उसकी आयु कितनी है ? उसका स्वास्थ्य कैसा होगा ? उसका सामाजिक व आर्थिक स्तर क्या होगा ? उसका स्वभाव, गुण-दोष, प्रकृति, शौक, रुचियां तथा मानसिकता कैसी होगी ? उसका परिवार, कुटुम्ब, पत्नी, संतान आदि, कार्यक्षेत्र, सम्बन्धी आदि कैसे होंगे ? उनसे उसकी कैसी निभेगी ? वह कितनी प्रगति या कितने पतन को प्राप्त होगा ? किसका भय रहेगा ? किसका सहयोग मिलेगा ? उसका व्यवसाय कैसा व कितने होंगे ? उसका रंग-रूप, आकार आदि कैसे होंगे ? आदि। संक्षेप में जीवन तथा काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) के सम्बन्ध में लगभग सभी क्या, क्यों, कैसे, कब और कितने की जानकारी हमें ज्योतिष देता है।

इसलिए नहीं कि ज्योतिष कोई जादू या दिव्य ज्ञान है, इसलिए भी नहीं कि ज्योतिषी अन्तर्यामी या सर्वज्ञ है। बल्कि इसलिए कि ज्योतिष समय व व्यक्ति के आर-पार झांक सकता है। सभी कुछ कार्यकारण सम्बन्ध व कर्मफल चक्र के अनुसार निश्चित है और ज्योतिष इस ’निश्चित/निर्धारित’ का अध्ययन न करके उसकी व्याख्या करने में समर्थ है। प्रकट लक्षणों के आधार पर भविष्य, भूत एवं वर्तमान का सटीक अनुमान लगाना ही ज्योतिष का विषय क्षेत्र है और यही इस शास्त्र की विशेषता भी है। इसीलिए तो इसे ’प्रकाश की प्रार्थना’ कहा गया है। क्योंकि यह अन्धकार को हटाकर ज्ञान की ओर जाता है। इसीलिए इसे दर्शनशास्त्र से काटा नहीं जा सकता। क्योंकि प्रकाश और दर्शन दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं। एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे के सहचारी हैं। यदि दर्शन सामर्थ्य न हो तो प्रकाश क्या करेगा ? जैसे अंधे के लिए प्रकाश का होना न होना बराबर है। यदि दर्शन सामर्थ्य हो और प्रकाश न हो, तब भी काम नहीं चलता, क्योंकि अंधकार में दर्शन सामर्थ्य का होना न होना बेकार है।

ज्योतिष अगर ज्ञान/प्रकाश है तो दर्शनशास्त्र उसको विश्लेषित करने, तोलने और निष्कर्ष पर पहुंचने का आधार है। क्या, क्यों, कैसे आदि प्रश्नों का उत्तर बिना मीमांसा (विश्लेषण) और न्याय (कसौटी) के नहीं दिया जा सकता। मात्र जानकारी/ज्ञान ही नहीं उसका सम्पूर्ण विश्लेषण/मंथन और औचित्य-परीक्षण/तोला जाना भी आवश्यक है, तभी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। (बहुत से ज्योतिषी जो दर्शन को ज्योतिष से पृथक मानकर छात्रों या जिज्ञासुओं की मीमांसा (विश्लेषण) या प्रश्नों पर आपत्ति करते हैं और उनके औचित्य (तार्किकता/स्व्ळप्ब्ै) पर एतराज करते हैं अथवा उनको अपने अधिकार का प्रयोग करके मौन हो जाने को बाध्य करते हैं-विशेषकर उन विद्वानों की जानकारी में मैं यह तथ्य लाना चाहता हूं।)

अतः ज्योतिष संक्षेप में पूर्व निर्धारित व पूर्व निश्चित को प्रकट लक्षणों के आधार पर जानने की कला है। ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों आदि के गुण स्वभाव गति आदि के समायोजन व गणित द्वारा जातक पर उनके द्वारा पड़ने वाले प्रभावों और उनसे उत्पन्न होने वाले परिणामों का अध्ययन कर सटीक अनुमान लगाना ज्योतिष की प्रणाली या कार्यशैली है। अतः ज्योतिष दिव्य भले ही न हो, चमत्कारिक या विशिष्ट अवश्य है।

अब प्रश्न उठता है कि सबकुछ पूर्व निर्धारित है और उसे बदला नहीं जा सकता तो ज्योतिष के माध्यम से यदि समय से पूर्व ही उसे जान भी लिया गया तो उससे हमें क्या लाभ प्राप्त हो सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर को भी विशेष ध्यान देकर समझने की आवश्यकता है, अन्यथा कोई ’कन्फ्यूजन’ पैदा हो सकता है या ब्स्म्।त्प्ज्ल् उत्पन्न नहीं होगी।

लाभ व उपयोग -पहला और सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि जो पूर्व निर्धारित व समय के गर्भ में छिपा है, वह हम समय से पूर्व ही जान सकते हैं। जो प्रकट है परन्तु आवरण के पीछे है उसे हम आवरण को पार करके वास्तविकता से जान लेते हैं तथा जो बीत चुका है और काल के गर्भ में समा चुका है, उसको भी हम जान लेते हैं। यानी वृक्ष के बीज, जड़, तना, शाखाओं, फूल-पत्तियों से लेकर फल तक सभी का सटीक अनुमान हम मात्र एक ही अंग से समस्त अंगों का विश्लेषण करके जान लेते हैं (क्योंकि शेष अंग उस एक अंग से निश्चित व स्थायी सम्बन्ध रखते हैं अतः ऐसा कर पाना सम्भव होता है)।

इस विधा के अन्य लाभों व उपयोगों की चर्चा से पूर्व उपरोक्त प्रश्न पर चर्चा आवश्यक है, अन्यथा प्रारम्भ में ही दिशा भ्रम हो जाना सम्भव है। ‘जो बदला नहीं जा सकता, उसे पहले से ही जान लेने का आखिर क्या लाभ होगा ?’

पहला लाभ है जिज्ञासा शांति। दूसरा लाभ है नियति के अनुरूप कर्मों निर्धारण। यदि अच्छा समय आने वाला है तो तदनुकूल प्रयास करना, यदि बुरा समय आने वाला है तो तदनुसार तैयारी कर लेना। तीसरा लाभ है अपनी सीमाओं को जान लेना। इससे आदमी अपनी आंखों से बड़े सपने नहीं देखता। चौथा लाभ अपने मित्रों, शत्रुओं, सहयोगियों तथा सम्पर्क में आने वाले लोगों की वास्तविकता को जान लेना। पांचवां लाभ है अपनी सन्तान/आश्रितों के कार्यक्षेत्र, रुचि, सम्भावित लाभदायक या अनुकूल व्यवसाय आदि को जानकर उन्हें तदनुसार शिक्षा-दीक्षा दिलाना तथा तैयार करना। संकटों/विपत्तियों का पूर्व ज्ञान और तदनुसार तैयारी आदि बहुत से सांसारिक लाभ हैं। अपने गुण, स्वभाव, संस्कार आदि का तथा भूत-भविष्य का ज्ञान कर सावधान/जागृत होकर तप या ज्ञान द्वारा अपने आगामी जन्म या परलोक को संवारने-सुधारने का प्रयास करना। यह एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक लाभ भी है।

बावजूद इसके कि हम पूर्व निश्चित को बदल नहीं सकते। हम उसके अनुसार मानसिक रूप से तैयार हो सकते हैं। पहले से सूचित व सनिद्ध हो जाने से अप्रत्याशित आघात नहीं लगता। अतः सुख-दुख के झमेले से परे होकर एक भाव में/समभाव में स्थित होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। क्योंकि जो दण्ड हम अपनी इच्छा (मन) के विपरीत भोगते हैं, वह सजा होता है, दुख देता है। पर जो दण्ड हम अपनी इच्छा से (मन से) भोगते हैं वह तप या प्रायश्चित हो जाता है और परिष्कृत करता है। अतः हम बदल पाए या नहीं, जानकर अपने मन को उसके अनुसार ढाल सकते हैं तथा अपनी सन्तुष्टि के लिए (यदि हम सांसारिक दृष्टि वाले हैं या प्रयासों को ही सबकुछ मानते हैं तो) प्रयास तो कर ही सकते हैं, फिर भले ही असफल हो जाएं।

कार्य क्योंकि बिना कारण के नहीं होता। अतः जो फल प्रबलता से निश्चित है, उसका कारण तो स्वयं नियति ही उत्पन्न कर देगी (भले ही परिस्थितियां बदलकर, भले ही हमें वैसा करने की प्रेरणा देकर) किन्तु जो फल प्रबल नहीं है, उसके कारण उत्पन्न करने के प्रयास तो हम अपने कर्मों से कर ही सकते हैं। परन्तु तभी, जब हम इस विषय में पहले जान चुके हों और यह जानना भी ज्योतिष द्वारा ही सम्भव है। अतः पूर्व निश्चित को न भी बदल सकें तो भी उसे जान लेने में ही हमारा लाभ है।

आदमी की बुद्धि, विचार और कर्म (प्रयास) वैसे ही हो जाते हैं जैसा कि नियति द्वारा पूर्व निर्धारित प्रबल फल को भोगने के लिए अनिवार्य होते हैं। इसीलिए कहा गया है विनाश काले विपरीत बुद्धि अथवा जाको प्रभु दारुण दुख देई, वाकी मति पहिले हर लेई। और इसीलिए श्री अरविंद ने भी कहा है.-भ्म् ॅभ्व् भ्।ै ब्भ्व्व्ैम्ै ज्भ्म् क्म्टप्छम् भ्।टम् ठम्म्छ ब्भ्व्व्ैम्छ ठल् ज्भ्म् क्म्टप्छम् ठम्थ्व्त्म् (वह जो परमात्मा को चुनता है, परमात्मा द्वारा पहले ही चुन लिया गया होता है)। जैसे-मनु शतरूपा ने ईश्वर को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप का मार्ग इसलिए चुना, क्योंकि उन्हें परमात्मा ने इस कार्य के लिए चुन लिया था। इसी प्रकार जब निश्चित (प्रबलता से) लाभ प्राप्त होना होता है अथवा निश्चित (प्रबलता से) हानि होनी होती है तो मनुष्य की बुद्धि को दैव वैसा ही कर देता है। उसी बुद्धिध्विचार/प्रेरणा/दृष्टिकोण से प्रेरित होकर वह वैसा कार्य/प्रयास करता है कि उसे लाभ/हानि हो। मनुष्य इस विषय में स्वतंत्र नहीं है।

जैसे शतरंज के मोहरों में यदि बुद्धि डाल दी जाए और उन्हें खेलने वाला खिलाड़ी अदृश्य हो तो हर मोहरा यही समझेगा कि अमुक चाल ’मैंने’ चली है। फलां मोहरे को ’मैं’ पीट रहा हूं। ’मेरे’ कारण जीत या हार हो रही है आदि। मनुष्य भी ऐसा ही बुद्धियुक्त मोहरा है और परमात्मा/नियति ऐसा ही अदृश्य खिलाड़ी है जो संसाररूपी ’बिसात’ पर अपना खेल (लीला) खेलता है। मनुष्य बुद्धि के कारण मायाग्रस्त होकर स्वयं को ही सबका कारण समझकर सुखी-दुखी होता है। मनुष्य एक बुद्धियुक्त रोबोट कहा जा सकता है जिसका ’रिमोट’ अदृश्य परमात्मा के हाथ में है। अतरू अपने मन, बुद्धि व अहं का समर्पण कर देना और स्वयं को ईश्वर/नियति के आसरे छोड़ देना ही एकमात्र उपाय है तत्त्वदृष्टाओं के लिए। लेकिन हर व्यक्ति ’तत्त्ववेत्ता’ नहीं होता, अतः ऐसे सांसारिकों के लिए यह ज्ञान और तत्त्व उसी प्रकार व्यर्थ है जैसे बंजर भूमि में डाले गए बीज। जैसा कि तुलसी कहते हैं -

शठ संग विनय कुटिल संग प्रीति। सहज कृपण संग सुंदर नीति।। 

ममता रत संग ज्ञान कहानी। अति लोभी संग बिरति बखानी।।

  क्रोधहि सम कामहिं हरिकथा। ऊसर बीज गए फल वृथा।।

(दुष्ट के साथ विनम्रता, क्रूर/कठोर के साथ स्नेह, मोह-ममता ग्रस्त से ज्ञान चर्चा, अत्यंत लालची के साथ वैराग्य/विरक्ति की बात, स्वाभाविक कंजूस व्यक्ति से दानपुण्य की बात, क्रोधित व्यक्ति से शांति की बात तथा कामुक (कामग्रस्त व कामनाग्रस्त) से भगवद्तत्त्व या परमात्मतत्त्व की बात करना उसी प्रकार व्यर्थ है जैसे बंजर भूमि में डाला गया बीज फलित नहीं होता (व्यर्थ हो जाता है).। स्वयं चाणक्य भी कहता है-’’सांसारिक व्यक्ति के साथ आध्यात्मिक चर्चा का कुछ लाभ नहीं होता। वह गर्म तवे पर पड़ी पानी की बूंदों की तरह व्यर्थ हो जाती है।’’ इसीलिए गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने तमाम तत्त्वज्ञान देने के बाद यह भी कह दिया है कि - 

प्रकृतेर्गुण सम्मूढाः सज्जनते गुण कर्मसु। 

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्न्नविन्न विचालयेत्।।

अर्थात् प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे (उन्हें वैसा ही करने दे, या उसी भ्रम में जीने दे)।

कारण कि सत्य जानने की लालसा तो प्रायः सभी में होती है, किन्तु सत्य को सहन करना व पचा सकना सबके वश की बात नहीं होती। इस सत्य को सुनकर (और जानकर) ’कर्मयोग’ की ओर प्रवृत्त होने (या मन को कछुए की भांति सब विषयों से सिकोड़कर एकाग्र करने तथा ’कर्म संन्यास’ लेने) की बजाय लोग सब कामनाओं को रखते हुए मात्र कर्म संन्यास का ढोंग करेंगे और निकम्मे आलसी होकर इस सत्य को अपनी अकर्मण्यता की ढाल बना लेंगे। यानी वे मान तो लेंगे मगर जानेंगे नहीं, अतः तत्त्वज्ञान भी उनके लिए घातक बन जाएगा। अतः उन्हें ’मंढे’ रहने दो। क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण के अनुसार -

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्मज्यायो ह्यकर्मणः।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।। 

अर्थात् तू शास्त्र विहित कर्तव्य कर्म कर। क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है (परन्तु कौन से कर्म, जो शास्त्र विहित हों।) तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकेगा। (किन्तु, सावधान!) -

यज्ञार्थत्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।। 

अर्थात् यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों में लगा हुआ मनुष्य समुदाय ही कर्मों से बन्धता है। अतः हे अर्जुन! तू आसक्तिरहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भली-भांति कर्म कर। (यद्यपि इस प्रकार के ’कर्मयोग’ के स्थान पर तू फल से न बन्धने के लिए ’कर्म संन्यास’ भी ले सकता है। परन्तु) -

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेय सकटावुभौ। 

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।। 

अर्थात् संन्यास (मन, वचन व कर्म से विरक्ति) और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारी (मुक्त करने वाले, बन्धन में न बंधने देने वाले) हैं। परन्तु इन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि कर्म न करने (अकर्मण्यता/निकक्मापन) से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म करने (सकाम) से निष्काम कर्म करना (कर्मयोग) अथवा कर्म संन्यास श्रेष्ठ है। सुगम होने से कर्मयोग अधिक श्रेष्ठ है। परन्तु जो कर्मयोग व कर्मसंन्यास दोनों के लिए सुपात्र नहीं हैं, उनको सकाम कर्म न करके शास्त्र विहीत (शास्त्रों में बताए गए) कर्म करना श्रेष्ठ है। क्योंकि सकाम कर्म अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी के हैं, यह भी श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है -

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धन´ंय।

बुद्धौ शरणमनिवच्छ कृपणाः फलेहेतवः।। 

अर्थात् इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी का है। अतः है धन´ंय ! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढंूढ़ अर्थात् समत्व बुद्धि योग (सफलता/असफलता, अच्छा/बुरा आदि सबको समान देखना) का ही आश्रय ले, क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यंत दीन हैं।

निष्कर्ष - सत्य अपने स्थान पर है और गुण, स्वभाव व संस्कार अपने स्थान पर। उन्हीं संस्कारों से युक्त बुद्धि मनुष्य अपना मार्ग चुनता या जीवन प्रणाली को निर्धारित करता है। अतः कोई संसारमार्गी हो या अध्यात्ममार्गी-कर्म दोनों को ही करने चाहिए, क्योंकि कर्म बीज है। संसारमार्गी सकाम भाव से कर्म करे और अध्यात्ममार्गी निष्काम भाव से। किन्तु फल के प्रति आसक्ति दोनों न रखें ताकि सुख-दुख आदि विकार व फल का बन्धन न हो। आसक्ति के त्याग में सक्षमता न हो तो शास्त्रसम्मत कर्म ही करे, ताकि शुभ फलों के लिए प्रतिबन्धित हो (यह निर्देश सकामकर्मी के लिए है) जो निष्कामकर्मी है या नियति के प्रति समर्पित है वह भी कर्म इसलिए करे ताकि कम प्रबल फलों की सिद्धि का कारण उत्पन्न हो सके। अधिक प्रबल फल को तो अन्य कारणों से भी फलित हो ही जाना है। तथापि कर्म इसलिए करे क्योंकि लोकदृष्टि से ऐसा ही करना चाहिए।

अतः ज्योतिष द्वारा नियति को जान लेने के बाद भी कर्म तो करने ही चाहिए, तब ज्ञान प्रकाश के द्वारा अपने कर्मों को दिशा देने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि योग व संन्यास जनसामान्य की सामर्थ्य से परे है। इसलिए भले ही आपकी सोच सांसारिक हो या तात्विक ज्योतिष का ज्ञान आपको दोनों ही प्रकार से उपयोगी सिद्ध होता है, बाधक नहीं। अब हम जन्मपत्री को पढ़ना व बनाना सीखेंगे।




क्या होती है जन्मपत्री ?

किसी भी व्यक्ति की जन्मपत्री/जन्मकुण्डली वास्तव में उस समय के आकाश का नक्शा है, जिस समय उस व्यक्ति का जन्म हुआ था। ज्योतिषीय भाषा में इस नक्शे को जन्मकुण्डली या लग्नकुण्डली कहते हैं (जन्मपत्री-सभी कुण्डलियों तथा ग्रहस्पष्ट, नक्षत्रादि सम्बन्धित आंकड़ों का संकलन अथवा उस नक्शे से सम्बन्धित पूरी फाइल है)। जिस व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन या फलादेश किया जा रहा हो-वह स्त्री/पुरुष जो भी हो-ज्योतिषीय भाषा में जातक कहलाता है

अतः और स्पष्ट रूप में कहा जाए तो जन्मकुंडली जातक के जन्म के समय आकाश में कौन-सा ग्रह कहां और किस स्थिति में था-इस तथ्य को दर्शाने वाला नक्शा है। इस तथ्य से सम्बन्धित अन्य सहयोगी आंकड़े तथा विश्लेषण एवं व्याख्या जब इस नक्शे के साथ संकलित हो तो उसे जन्मकुंडली/टेवा न कहकर ’जन्मपत्री’ कहेंगे।

आकाश के नक्शे की क्या जरूरत है ? इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर यह है कि ज्योतिषशास्त्र क्योंकि ग्रह, नक्षत्र, राशियों आदि के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन शास्त्र है -ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहणां बोधक शास्त्रम् -अतः आकाश के तत्कालिन नक्शे व आंकड़ों के आधार पर ही अध्ययन किया जाएगा।

ग्रहों का ही अध्ययन क्यों ? -यूं तो जिन परिस्थितियों/परिवेश या स्थान पर मनुष्य रहता है वहां के भौगोलिक, सामाजिक, प्राकृतिक (वातावरण आदि), राजनैतिक, सांस्कृतिक आदि बहुत से प्रभाव व्यक्ति को प्रभावित करते हैं। उसके रूप-रंग, गुण, स्वभाव, आदतों एवं विचार आदि को बनाने-बिगाड़ने में पूरी भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि परिवार, परम्परा, संस्कार, शिक्षा, संगति आदि सभी छोटे-बड़े घटक इस सिलसिले में महत्त्वपूर्ण हैं, फिर ग्रहों के प्रभाव का अध्ययन ही क्यों इतना जरूरी है कि इसके लिए एक पृथक शास्त्र की आवश्यकता पड़ गई ? मनुष्य से लाखों-करोड़ों मील दूर के ग्रहों के प्रभाव में क्या इतनी तीव्रता और महत्व निहित है कि समीपस्थ अन्य घटकों की उपेक्षा कर ग्रहों के प्रभाव का ही अध्ययन आवश्यक व सम्पूर्ण प्रतीत हुआ ? और यदि हुआ तो क्यों ? तथा अन्य दारों आदि को इस अध्ययन में क्यों नहीं शामिल कर लिया गया ?

इन प्रश्नों का उत्तर स्पष्टतः जान लेने पर न केवल आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा और ज्योतिष-अध्ययन के सिद्धांतों को वस्तुतः समझ सकने योग्य आधारभूमि निर्मित हो सकेगी बल्कि ज्योतिष के महत्व, गहनता, प्रभाव क्षेत्र एवं प्रणाली को भी तत्त्वतः समझा जा सकेगा और इस शास्त्र के प्रति पाठकों की आस्था भी निर्मित हो सकेगी। अतः पहले इन्हीं प्रश्नों को लेते हैं।

वैज्ञानिक कारण -भौगोलिक, प्राकृतिक (पर्यावरण, जलवायु आदि), सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, संस्कारिक (पारिवारिक एवं पारम्परिक आदि) तथा परिस्थिति एवं संगतिजन्य बहुत से कारण मनुष्य एवं जीवन को निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं, यह सत्य है। परन्तु यह भी सत्य है कि ये सभी घटक स्थायी नहीं होते। वर्षों में, दशकों में, शताब्दियों में, सहस्राब्दियों में इन सभी घटकों में बहुत से क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाते हैं। प्रतिक्षण परिवर्तन होता है और शताब्दियों में वह बिल्कुल ही भिन्न प्रारूप सामने ले आता है। अतरू ये घटक इतने स्थायी नहीं होते कि इन पर ऐसे सिद्धांत खड़े किए जा सकें जो अन्त तक ज्यों के त्यों रह सकें। इनके आधार पर नियम तो बनाए जा सकते हैं, किन्तु सिद्धांत नहीं। क्योंकि सिद्धांत का अर्थ ही यह है कि अन्त सिद्ध हो जिसका या अन्त तक सिद्ध हो जो (सिद्ध़ $ अंत) अतः सिद्धांत अटल होता है।

नियम परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर हमें मौसम के प्रभाव से बचने के लिए गरम वस्त्र पहनने चाहिए। यह एक नियम है। क्योंकि ठंडे प्रदेशों या ठंडे मौसम पर ही यह निर्भर है। गरम प्रदेशों या गरम मौसम में इस नियम का पालन नहीं हो सकता। किन्तु सूर्य प्रकाश एवं ऊष्मा देता है-यह एक सिद्धांत है। क्योंकि यह परिस्थितियां बदल जाने पर भी ज्यों का त्यों रहता है। नियम और सिद्धांत का यह मूल अन्तर है। अतः परिवर्तनशील घटकों के प्रभावों के अध्ययन से सिद्धांत स्थापित नहीं किए जा सकते। क्योंकि जब तक शोध पूर्ण होकर सिद्धांत स्थापित होगा, तब तक या उसके कुछ समय पश्चात् ही वो घटक परिवर्तित हो चुका होगा या हो जाएगा, जिसके आधार पर निष्कर्ष निकाला गया। अतः ऐसे अध्ययनों के परिणाम कालजयी नहीं होंगे, निष्कर्ष अटल नहीं होंगे। उनके आधार पर एक सम्पूर्ण, सटीक तथा कालजयी शास्त्र के आधारभूत सिद्धांतों को नहीं बनाया जा सकता, अलबत्ता सहायक नियम बनाए जा सकते हैं। इसलिए ज्योतिष ने इन घटकों को अपने अध्ययन एवं विश्लेषण का आधार नहीं बनाया, बल्कि इनकी अपेक्षा अनंतकाल तक स्थिर रहने वाले ग्रहों को अपने अध्ययन का आधार बनाया।

’ग्रहों की स्थिरता’ को सुनकर पाठक किसी संशय में न पड़ें। हम सभी जानते हैं कि समस्त ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं और स्वयं अपनी धुरी पर भी (पृथ्वी के समान ही) घूमते हैं। (पौराणिक दृष्टि से तो सूर्य भी स्थिर नहीं है, क्योंकि वह ध्रुव तारे की परिक्रमा करता है। ’ध्रूव’ ही अटल है अन्य सभी तारे, ग्रह आदि घूमते ही रहते हैं)। परन्तु यहाँ स्थिरता से अभिप्राय है इनके रूटीन का यथावत रहना।

समस्त ग्रह अपनी एक निश्चित गति से अपनी- अपनी धुरी पर घूमते हैं। अतः उनके दिन-रात उसी अनुपात में निश्चित अवधि में निर्धारित रहते हैं। सभी अपने एक निश्चित पथ पर, निश्चित गति से सूर्य की परिक्रमा भी करते हैं। (इस परिक्रमा पथ में वे अपने निश्चित मार्ग से 9 इधर या 9 उधर हो जाते हैं। इससे अधिक नहीं।) अतः उनके वर्षों में दिन-रात की अवधि भी निश्चित रहती है। यह उनका यथावत रहने वाला रूटीन है। अतः उनके प्रभाव के अध्ययन को स्थिर माना जा सकता है। अरबों-खरबों वर्षों में किसी ग्रह या तारे की घूर्णन गतिध्परिक्रमा पथ में अन्तर आता है (वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार)। परन्तु वह अन्तर अनन्त एवं सुविस्तीर्ण ब्रह्मांड की तुलना में इतना नगण्य होता है कि उसे नजरअंदाज किया जा सकता है। अन्य तारों आदि को इसलिए इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया कि वे हमसे हजारों-लाखों प्रकाशवर्ष दूर हैं। अतरू उनका नगण्य-सा प्रभाव भी मानव पर नहीं पड़ता। सूर्य किरणों का ’प्लाज्मा क्षेत्र’ पृथ्वी पर ब्रह्मांड से होने वाली किरणों की वर्षा को वापस लौटा देता है।

जबकि भूगोल, मौसम, जलवायु, प्रकृति आदि जो अन्य घटकों में सर्वाधिक टिकाऊ कहे जा सकते हैं, शताब्दियों या सहस्राब्दियों में ही क्रांतिकारी रूप से परिवर्तित हो चुकते हैं। अतः ग्रहों के प्रभाव एवं स्वभाव के विश्लेषण तथा अध्ययन को स्थिर कहा जा सकता है। यह तो ज्योतिष में ग्रहों को अध्ययन का आधार बनाने का वैज्ञानिक अथवा स्थूल कारण हुआ। परन्तु इनसे कहीं शक्तिशाली आध्यात्मिक या सूक्ष्म कारण भी है। जो कर्मफल बन्धन (भाग्य) अथवा ईश्वरीय न्याय पर आधारित है और ज्योतिष का प्राण तत्त्व है।

आध्यात्मिक कारण -जैसा कि पहले स्पष्ट कर आए हैं कि कर्मफल का एक निश्चित सम्बन्ध/बन्धन है। कर्मों से फल और फलों से कर्म निश्चित रूप से जुड़े रहते हैं। इस ’खाते’ को भुगताने के लिए जीव का जन्म होता है। कर्मानुसार फल ही ईश्वर का निष्पक्ष न्याय है। इस न्याय का उत्तरदायित्व या कार्यभार ईश्वर ने ग्रहों को सौंपा हुआ है। यह आध्यात्मिक व धार्मिक मत है। जिस प्रकार मृत्युपरांत इस न्याय की व्यवस्था का कार्यभार सूर्यपुत्र यम (यमराज/धर्मराज) के सुपुर्द रहता है, उसी प्रकार जन्मोपरांत इस न्याय का कार्यभार सूर्यपुत्र शनि पर निर्भर रहता है (सूर्य साक्षी होते हैं)। अतः समस्त ग्रह (नवग्रह) इस संसार में मनुष्य को कर्मों के अनुसार फल प्रदान करने के मूल कारण होते हुए न्यायाधीशों की भूमिका निबाहते हैं। इनमें प्रधान न्यायाधीश के रूप में शनि की मान्यता है। यही कारण है कि इन नवग्रहों के नामों को भी ईश्वर के नामों का पर्यायवाची माना गया है।

जब जीवात्मा गर्भ में प्रविष्ट होता है, तभी से ये ग्रह उसके कर्मानुसार उसको फल प्रदान करने (न्याय करने) में प्रवृत हो जाते हैं। इसी से गर्भ तदनुरूप वृद्धि या विकृति को प्राप्त होता है। जन्म से ही अपाहिज, अंगहीन, विकृत होना, एक निश्चित रूप, रंग या आकारवाला होना एवं विशिष्ट तथा विभिन्न गुण स्वभाव वाला होना आदि सब फल इसी न्याय के आधार पर प्राप्त होते हैं। इस प्रकार जन्म से मृत्यु तक ये ग्रह जीव को उसके कर्मानुसार भोग/फल प्रदान करते हुए न्याय करते हैं।

जातक की जन्मकुंडली में उच्च के ग्रहों का अधिकांश होना तथा शुभ भावों में प्रतिष्ठित होना बताता है कि जातक के पूर्व कर्म शुभ थे और इस जन्म में वह अत्यंत सौभाग्यशाली व सुख वैभव को भोगने वाला होगा। इसके विपरीत अधिकांश ग्रहों का नीच होना या शत्रु क्षेत्रीय होकर अशुभ भावों में प्रतिष्ठित होना जातक के पूर्व कर्मों की अशुभता के कारण इस जन्म में कष्ट व दुष्फलों को भोगने की घोषणा करता है। जबकि स्वराशि एवं मित्रक्षेत्रीय ग्रह उसके कर्मों (पूर्व जन्म)तथा भाग्य (वर्तमान जन्म) का मध्यम स्तर पर होना (50-50) दर्शाते हैं। तदनुसार ही नक्षत्र व स्वामी ग्रह की दशा में जातक जन्म लेता है ताकि परिपाक काल के अवसर पर तत्सम्बन्धित ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतर दशा आदि जातक को वैसे ही फल प्रदान कर सकें, जैसे फलों का वह (अपने पूर्व कर्मों द्वारा) अधिकारी हो। जबकि अन्य तारों को विधाता ने यह अधिकार व शक्ति नहीं सौंपी है कि वे मानव के कर्मों व फलों के न्याय में कोई भूमिका निभा सकें या भागीदारी कर सकें। (सम्भवतः यही कारण है कि पुराणों व धर्मग्रन्थों में ग्रहों का वैयक्तिकरण किया गया है, अन्य सब तारों का नहीं।)

यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि जब सभी कुछ पूर्व निश्चित है और ग्रहों को अपनी-अपनी दशाओं में निष्पक्षता के साथ न्याय (फल प्रदान) करना ही है, तब फिर ज्योतिषीय/तांत्रिक उपायों का क्या औचित्य रह जाता है ? क्या उपायों द्वारा भाग्य को मोड़ा/बदला जा सकता है ? या निश्चित फल की प्राप्ति को रोका अथवा घटाया-बढ़ाया जा सकता है ? यदि नहीं, तो उपायों की क्या उपयोगिता व औचित्य है ? यदि हां, तो न्याय में निष्पक्षता कहां रही ? और तब नियति या ईश्वर परमशक्तिशाली कहां रह गया (क्योंकि ज्योतिषी अपनी इच्छानुसार ईश्वरीय न्याय में रद्दोबदल या हेर फेर उपायों द्वारा कर सकता है तो ये ईश्वर के लिए चुनौती हुई) ? यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। किन्तु इसे इसी पुस्तक के ’उपाय खण्ड’ में सविस्तार चर्चा में लेंगे। क्योंकि यह प्रश्न आगे का है और हमें विषय में सहज व सुगम्य बनाने के लिए ैज्म्च् ठल् ैज्म्च् चलना है। छलांगें नहीं लगानी हैं।

उपरोक्त वर्णित स्थूल एवं सूक्ष्म अथवा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारणों से ज्योतिष में ग्रहों के प्रभावों के अध्ययन को ही आधार बनाया गया है। अब हम पुस्तक के मूल विषय ’जन्मपत्री’ की ओर बढ़ते हैं। इसे समझने के लिए हमें ग्रह, राशि, नक्षत्रों आदि के परस्पर संबंध एवं स्वभावों को समझना होगा तथा कुण्डली के भावों को भी।

राशियां व नक्षत्र

ऐतिहासिक तथ्य -खगोलशास्त्र का प्रारंभ सर्वप्रथम किस काल में हुआ, कहना बहुत कठिन है। परन्तु इतना तय है कि यह शास्त्र कम से कम 5000 वर्ष पुराना तो अवश्य ही है। क्योंकि भारत में वैदिक काल से ही इस शास्त्र की जड़ें फैली हुई हैं। यजुर्वेद में नक्षत्र दर्शन का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सांकेतिक ढंग से खगोलविज्ञान के सूत्र मिलते हैं । छांदोग्य उपनिषद में नक्षत्र विद्या का वर्णन मिलता है। बाद के ग्रन्थों में तो खगोल, ज्योतिष एवं मौसम विज्ञान आदि का विस्तृत ज्ञान प्रचुरता से उपलब्ध होता है।

सूर्य और चन्द्र के कारण हमें काल मापन की दो स्वाभाविक इकाइयां प्राप्त होती हैं-दिन व महीना। (दिन के रात-दिन दो विभाग मिलते हैं तो मास के कृष्ण व शुक्लपक्ष दो विभाग मिलते हैं।) काल मापन की तीसरी महत्त्वपूर्ण इकाई सूर्य एवं पृथ्वी के कारण प्राप्त होती है-वर्ष। एक ऋतु के शुरू होकर पुनः उसी ऋतु में लौटने से वर्ष पूर्ण होता है।

बेबीलोनिया ने वारों को नाम दिए तो आर्यों ने रविमार्ग में विभाग कल्पित कर नक्षत्रों की व्यवस्था की। इतिहासकारों के अनुसार राशि विभाग बेबीलोन की खोज है और नक्षत्र विभाग भारत की। ज्योतिषीय गणना में सूर्य को आधार मानकर रविमार्ग को 12 भागों में विभक्त करने से राशिचक्र का निर्माण हुआ है और चन्द्र को आधार मानकर रविमार्ग को 27 भागों में विभक्त करने से नक्षत्रचक्र स्थापित हुआ। भारतीयों ने महीनों के नाम भी नक्षत्रों के आधार पर रखे। इससे सिद्ध होता है कि महीनों के नामकरण से पूर्व भारतीय विद्वान नक्षत्रों की ईजाद कर चुके थे।

भारतीय विद्वानों ने राशि व नक्षत्र दोनों को ज्योतिषीय गणना में महत्व दिया है। चंद्र को आधार मानकर वर्षगणना के लिए उन्होंने ऋतुवर्ष का आधार बनाया तो माससंक्रान्ति के लिए उन्होंने सूर्य का आधार भी लिया। संक्रान्तियों को विभक्त करने के लिए भारतीयों ने रविमार्ग को 12 भागों में बांटा, परन्तु उन भागों को राशियों का नाम देने की बात ई. स. 400 में हो पाई। तब भारतीयों ने राशिचक्र व नक्षत्रचक का आरम्भ रविमार्ग के एक ही स्थान से किया-जो उस समय का वसंतसंपात था। आज भी भारतीय पंचांग वसंतसंपात से ही आरम्भ होता है।

परन्तु आरम्भ में वसन्तसंपात का प्रारम्भ जिस स्थान से होता था, आज उस स्थान से नहीं होता। अतः भारतीय पंचांगों में मेष (राशि आरम्भ) तथा अश्विनी (नक्षत्र आरम्भ) से वर्तमान वसंतसंपात की दूरी अयनांश द्वारा दिखाते हैं।

वैदिक ऋचाओं में मार्गशीर्ष में वसंतसंपात होने के स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होते हैं। वैदिक काल में भी वर्षारंभ वसंत ऋतु से होता था। गीता में भी -मासानाम मार्गशीर्षोऽहम् (मासों में मैं माघ हूं) कहकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने माघ मास की महत्ता दर्शाकर इस ओर संकेत दिया है। अतः वसंत को ’वर्ष का मुख’ कहा गया है। भारतीयों को नक्षत्रों व मासों का ज्ञान ई. स. पू. 4000 वर्ष पहले हो चुका था। उस समय के मास चन्द्रमास थे। इसी कारण तब तक भारतीय अधिमास/अधिक मास/लौंध का महीना/पुरुषोत्तम मास से परिचित हो चुके थे। इसका एक प्रमाण यहां पाठकों के सम्मुख अवश्य रखेंगे -

यत् संवत्सरः तस्य त्रयोदशो मासो विष्टपम्। 

यथा वा ऋषभस्य विष्टपम् ।।

(ऋग्वेद) 

अर्थात् संवत्सर का 13वां मास अधिमास है। बैल के कूबड़ की तरह यह तेरहवां मास वर्ष का कूबड़ है।

वैदिक वाङ्मय में बृहस्पति व शुक्र का भी उल्लेख सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि आदि की भांति मिलता है। शुक्र को तब ’वेन’ कहा जाता था। (यूनान में सौंदर्य की देवी का नाम ’वीनस’ है जो शुक्र के लिए प्रयुक्त होता है। यूनान को पंचांग निर्माण का श्रेय भी जाता है।) वैसे भारतीय वैज्ञानिक खगोलशास्त्र का आरम्भ ’आर्यभट्ट’ (ई. स. की पांचवीं सदी) से माना जाता है। इससे पूर्व खगोल सम्बन्धी तथ्य या तो अपूर्ण प्राप्त होते हैं या बहुत प्रतीकात्मक। (आर्यभट्ट 23 वर्ष की आयु में ही खगोलविद् बन गया था।) आर्यभट्ट के अतिरिक्त भारत का दूसरा समर्थ खगोलविद् वराहमिहिर को माना गया है। खगोल के अलावा ज्योतिष में फलित सूत्रों के लिए भी वराह मिहिर का अत्यधिक महत्त्व है।

बाद में ब्रह्मगुप्त नामक प्रकांड खगोलविद् भारत में हुआ जिसने वर्षमान की शुद्धि की। ब्रह्मगुप्त को ’गणकचक्र चूड़ामणि’ कहा गया था। इसके बाद भारतीय सिद्धांतकारों में प्रमुख भास्कराचार्य (12वीं सदी), गणेश दैवज्ञ (16वीं सदी) तथा राजा जयसिंह (18वीं सदी) आदि हुए। उमर खैयाम जिसे लोग मात्र रूबाइयों के शायर रूप में जानते हैं, बहुत बड़ा गणित तथा समर्थ खगोल शास्त्री भी था।


बीजगणित की रचना उमर खैयाम ने ही की थी। राजा जयसिंह के बाद से भारतीय खगोलशास्त्रियों में कोई समर्थ विद्वान नहीं हो पाया और यूरोप आदि देश बाजी मार ले गए।

आकाशीय ज्योतियों से सम्बन्ध रखने वाला शास्त्र खगोल (।ैज्त्व्छव्डल्) शास्त्र है और उनके मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने वाला शास्त्र ज्योतिष (।ैज्त्व्स्व्ळल्) शास्त्र है। अतः दोनों एक-दूसरे से गहन रूप से जुड़े हैं। यदि हम ज्योतिष को तत्त्वतः जानना चाहते हैं तो थोड़ा-बहुत खगोल को भी जानना होगा।

समस्त आकाशीय ज्योतियां ब्रह्मांड गोलक के पूर्व में उगती व पश्चिम में अस्त होती हैं। या कह सकते हैं कि तारों भरा अंतरिक्ष पूर्व से पश्चिम में गतिशील होता है। इस विभ्रम का कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर चक्कर काटना है। पृथ्वी सहित समस्त ग्रह सूर्य की ।छज्प् ब्स्व्ब्ज्ञॅप्ैम् परिक्रमा करते हैं। सूर्य के चारों ओर घूमने से ये रविमार्ग के आसपास ही रहते हैं।

राशियां -किसी भी प्रकार के वृत्त का योग क्योंकि 360 से अधिक या कम नहीं होता। अतः रविमार्ग (भचक्रधर््व्क्प्।ब्) भी 360 का हुआ। ज्योतिषशास्त्र में इसे 12 समान भागों में बांटा गया है। अतः (360  12 = 30) 30 का एक भाग हुआ तथा कुल 12 भाग हुए (12  30 = 360)। इन 12 भागों को राशियों के नाम से पुकारा जाता है। सूर्य प्रत्येक मास एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। इस राशि प्रवेश (दूसरी राशि में संक्रमण) को संक्रान्ति कहते हैं। 14 जनवरी को आजकल सूर्य मकर संक्रान्ति (मकर राशि में प्रवेश) करता है तथा 14 अप्रैल को मेष संक्रांति (मेष राशि में प्रवेश) करता है। इन दोनों संक्रान्तियों का विशेष महत्त्व है। मेष संक्रांति ही वसन्तसम्पात का वर्तमान बिन्दु है। (सूर्य इस प्रकार 6 मास उत्तरायण तथा 6 मास दक्षिणायन रहता है। 22 दिसंबर से उत्तरायणा तथा 22 जून से दक्षिणायन का आरम्भ होता है।) इन 12 राशियों को हम क्रमशरू मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन के नाम से पुकारते हैं। इस प्रकार यह 12 राशियां राशिचक्र कहलाती हैं।

नक्षत्र -सूर्य को आधार मानकर रविमार्ग को 12 समान भागों में बांटकर जहां राशिचक्र की व्यवस्था की गई है, वहीं चन्द्र को आधार मानकर नक्षत्रचक्र की व्यवस्था भी की गई है। इसके लिए रविमार्ग को 27 समान भागों में बांटा गया है। हर भाग को एक नक्षत्र माना गया है। नक्षत्रों के नाम उस भाग में पड़ने वाले तारागुच्छों के आकार के हिसाब से रखे गए हैं।

रविमार्ग क्योंकि 360 का है। अतः उसके 27 बराबर भाग करने पर (360  27  13.20) 13.20 का एक भाग (नक्षत्र) प्राप्त होता है। हर नक्षत्र के चार भाग (चरण) होते हैं। अतः नक्षत्र का एक भाग (13.20  4 = 3.20) 3.20 का होता है तथा एक राशि में सवा दो नक्षत्र (13.20  13.20  3.20 = 29.60 अथवा 30) आते हैं। क्योंकि एक राशि 30 की होती है और एक नक्षत्र 13.20 का। (हर नक्षत्र चरण का एक वर्ण/अक्षर होता है। अतः एक नक्षत्र में 4 अक्षर/वर्ण होते हैं तथा एक राशि में सवा दो नक्षत्र होने से 9 अक्षर/वर्ण होते हैं।) इस प्रकार ये नक्षत्र न केवल जातक की जन्म राशि के आधार पर नामाक्षर निकालने में सहयोगी होते हैं। बल्कि चन्द्र के आधार पर रविमार्ग में राशि विभाग की पहचान भी मील के पत्थरों के रूप में करते हैं।

इन 27 नक्षत्रों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद तथा रेवती उत्तराषाढ़ा व श्रवण के बीच 28वें नक्षत्र अभिजित की कल्पना भी की गई है। पौराणिक मान्यता के अनुसार चन्द्रमा की 27 पत्नियां ही 27 नक्षत्र हैं। जिनमें रोहिणी चन्द्रमा को विशेष प्रिय थी।

सूर्य एक महीने एक राशि में (सवा दो नक्षत्र) रहता है और चन्द्रमा एक दिन एक नक्षत्र में रहता है। पाश्चात्य ज्योतिष की तुलना में भारतीय ज्योतिष फलादेश की दृष्टि से अधिक सटीक बैठता है। क्योंकि पाश्चात्य ज्योतिष सूर्य को आधार मानकर चलता है। अतः एक मास में उत्पन्न हुए सभी जातकों की राशि एक ही मानता है। जबकि भारतीय ज्योतिष चन्द्रमा को आधार मानकर चलता है। इसलिए हर सवा दो दिन में उत्पन्न जातकों की राशियां बदल जाती हैं । अतः स्थूल न होकर यहां गणना अधिक सूक्ष्म हो जाने से अधिक सटीक भी हो जाती है।

समस्या -फिर भी हमारी इस व्यवस्था में दो प्रमुख समस्याएं हैं। आप सभी जानते हैं कि वृत्त की परिधि पर यदि गणना आरम्भ करनी हो तो किसी भी बिन्दु को आरम्भ बिन्दु बनाया जा सकता। फिर भी आरम्भ बिन्दु पर कोई विशेषता रहे तो सुविधा होती है। हमारे प्राचीन खगोलविदों ने रविपथ पर ऐसी विशेषता वाले चार बिंदु खोजे-उत्तरायण, शरदसंपात, दक्षिणायन तथा वसंतसंपात। आखिर उन्होंने वसंतसंपात को विशेष महत्त्व देकर इसी बिन्दु को आरम्भ बिन्दु बना लिया। इस बिन्दु के निकटतम नक्षत्र को अश्विनी (प्रथम) तथा राशि को मेष (प्रथम) मानकर उन्होंने सम्पूर्ण गणित की व्यवस्था की। तब की इस व्यवस्था को आज ।ै प्ज् प्ै लागू करने में दो प्रमुख समस्याएं खड़ी होती हैं।

पहली समस्या यह है कि हमारे पूर्वजों का वसंतसंपात और वर्तमान वसंतसंपात एक नहीं है। पृथ्वी की विषुवायन गति के कारण यह संपात बिन्दु बदलता रहता है। इस समस्या का वैज्ञानिक कारण यह है कि पृथ्वी पूर्ण गोल न होकर नारंगी की भांति धुवों से चपटी है। दूसरे वह 23) पर झुकी हुई है (पृथ्वी की धुरी पृथ्वी कक्षा के साथ समकोण न बनाकर 66) का कोण बनाती है)। पृथ्वी के इस झुकाव का लाभ उठाकर सूर्य व चन्द्र के गुरुत्व एवं किरणीय दबाव पृथ्वी को और अधिक झुकाने का प्रयास करते हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर सतत् घूर्णन करती है अतः इन दबावों को काफी हद तक परावर्तित व निष्क्रिय कर देती है, तो भी इतना प्रभाव अवश्य पड़ जाता है कि पृथ्वी की घूर्णन गति कोल्हू के लाट की भांति हो जाती है। यह गति विज्ञान की भाषा में विषुवायन के नाम से जानी जाती है। विषुवायन गति का एक चक्र 26,000 वर्षों में पूर्ण होता है। इस गति के कारण पृथ्वी का विषुवत् स्थिर नहीं रह पाता, वह रविमार्ग पर सरकता रहता है, जिससे इन दोनों वृत्तों के छेदनबिन्दु (संपात) बदलते रहते हैं। परिणामतः आज का वसंतसंपात बिन्दु आरम्भिक वसंतसंपात बिन्दु से भिन्न हो चुका है। यह एक गम्भीर समस्या है।

दूसरी समस्या यह है कि हमारे पूर्वजों ने वसंतसंपात बिन्दु के सम्बन्ध में जो कहा वह स्पष्ट नहीं है, सांकेतिक है। अतरू जिस बिन्दु से गणना आरम्भ करनी है, उसके विषय में आज के विद्वान एक मत नहीं हैं। कुछ उसे वसंतसंपात बिन्दु से ही आरम्भ करने के पक्ष में हैं (जैसा कि पश्चिम के लोग करते हैं)। कुछ उसे अश्विनी नक्षत्र के आरम्भ बिन्दु से आरम्भ करने के पक्ष में हैं। उपाय के लिए आधुनिक वसंतसंपात तथा अश्विनी आरम्भ के बीच के अन्तर को अयनांश कहकर हम गणित कर रहे हैं। लेकिन यह अयनांश भी सर्वसम्मत नहीं होने से कठिनाइयां आती हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए 22 मार्च 1969 के अयनांश 23-25-27 को विद्वानों ने सर्वमान्य सम्मति प्रदान की है।


What is Astrology ? Part 1

Astrology is a great science that itself has contained a mysterious mystery in itself, from ancient times, through our Sage astrology method, we could easily tell about the future, the astrological methodology was completely based on the house constellations. The mathematical method that can be told about the future of the planetary movements and the events that occur in the future. Astrology is based on 9 planets. A mathematical method that 9 Home individual Effect and can be known about the events occurring in the future on the basis of this and promptly considerable influence of these planets on the person's life.

भारतीय ज्योतिषशास्त्र

भगवान गणेश की स्तुति करते हुए नारद मुनि ने कहा था विद्यार्थी लभते विद्याम धनार्थी लभते धनं पुत्रार्थी लभते पुत्रं मोक्षार्थी लभते गतिम् अर्थात ये वो हैं जो, विद्यार्थी की विद्या, धनार्थी को धन, पुत्रार्थी को पुत्र और मोक्षार्थी को मोक्ष देते हैं।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भगवान गणेश हिंदू मंदिरों के सबसे पूजनीय और संतुष्टि दायक देवता हैं। विघ्नहर्ता गणेशजी की पूजा और आशीर्वाद के किए बिना कोई भी नया काम जैसे नए घर का निर्माण, पुस्तक लेखन, यात्रा की शुरुआत या नया व्यापार शुरू नहीं किया जाता है।

बुद्धि और विवेक के भगवान के रूप में भी जाने जाते हैं जिसका उदहारण उनकी दो पत्नियां ऋद्धि और सिद्धि हैं। उनका शास्त्रों का ज्ञान प्रसिद्ध है। महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास जब महाभारत लिखने के लिए योग्य पुरुष ढूंढ़ रहे थे जो उनके विचारों को शुद्ध उच्चारण के साथ कलमबद्ध कर सके, तब उन्हें गणेशजी का ध्यान आया और इस तरह  दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य अस्तित्व में आया। गणेशजी की उत्पत्ति बहुत रोमांटिक है। कहानी यह है कि भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर बहुत सुखद जीवन का जीवन जी रहे थे। बस एक अड़चन यह थी कि शिवजी अक्सर पार्वतीजी को अकेले छोड़कर ध्यान लगाने के लिए गायब हो जाते थे। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि उन्हें वरदान दें, भगवान ने ख़ुशी से दे दिया। गणेशजी एक बहुत ही सुंदर बच्चे थे और सभी देवता उन्हें आशीर्वाद देने आए। लेकिन उनके मामा शनिदेव न आ सके क्योकि उन्हें श्राप था कि वो जिसे भी देखेंगे उसका सर कट जाएगा।

जब पार्वती जी ने बहुत जोर देकर कहा तो जैसे ही उन्होंने गणेशजी की ओर देखा वे भयभीत हो गए क्योंकि गणेशजी का सर, धड़ से अलग हो गया था। भगवान विष्णु ने स्थिति को संभालने का प्रयास किया और कैलाश पर्वत पर उन्हें एक हाथी दिख गया। उन्होंने तुरत उसका सर काटकर गणेशजी के सर पर लगा दिया। यह सब देखकर पार्वतीजी निराश हो गई। शिवजी ने उनक दुःख कम करने के लिए गणेशजी को वरदान दिया कि वे सभी देवों में प्रथम पूज्य होंगे। उसके बाद से गणेशजी विनायक (ज्ञानी) और विघ्नेश्वर (बाधा दूर करनेवाले) के रूप में पूजे जाते हैं। जो उनके आगे ध्यान लगाते हैं वे उन्हें आशीर्वाद देते हैं। ज्योतिष के द्वारा गणेशजी हमें यह जानने में मदद करते हैं कि हम क्या पा सकते हैं और क्या नहीं पा सकते।

ज्योतिष जीवन के लिए एक आईना है और गणेशजी स्वयं जीवन हैं। नश्वर प्राणियों को अज्ञात डर रहता है। गणेशजी ज्योतिष के माध्यम से, अंधेरे में एक प्रकाशपुंज के रूप में कार्य करते हैं और हमारा रास्ता प्रकाशित करते हैं। इसलिए गणेशजी सर्वोच्च हैं, जिनकी ग्रहों से निपटने की निपुणता अस्तित्व के रहस्यों को जानने के लिए ज्योतिषों द्वारा उपयोग में लाई जा रही है।

क्या ज्योतिष एक विज्ञान है ?

जिस ज्ञान से मुहूर्त, वास्तु ,वर्षा,बाढ़ ,सूखा, बीमारी, महामारी, आकाश, पाताल, आदि से सम्बंधित भूत, भविष्य एवं वर्त्तमान काल के विषयों की जानकारी मिलती हो वह शास्त्र विज्ञान ही हो सकता है। इसके अलावा भविष्य सम्बन्धी जानकारी देने वाला कोई दूसरा शास्त्र या आधुनिक विज्ञान में कुछ और हो भी नहीं सकता है और न है ही विज्ञान ने भविष्य जानने के लिए अभी तक किसी नई विधा का अन्वेषण ही किया है!ज्योतिष विषय वेदों जितना ही प्राचीन है। प्राचीन काल में ग्रह, नक्षत्र और अन्य खगोलीय पिण्डों का अध्ययन करने के विषय को ही ज्योतिष कहा गया था। इसके गणित भाग के बारे में तो बहुत स्पष्टता से कहा जा सकता है कि इसके बारे में वेदों में स्पष्ट गणनाएं दी हुई हैं। फलित भाग के बारे में बहुत बाद में जानकारी मिलती है।

भारतीय आचार्यों द्वारा रचित ज्योतिष की पाण्डुलिपियों की संख्या एक लाख से भी अधिक है। ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथों में फलित ज्योतिष की बातें हैं पर इन पर भी परिभाषित दोष है जिस ज्योतिष में फल कथन का किया जाता है और फल कथन का अर्थ जानना आवश्यक है।

इसके बिना इसे परिभाषा को समझना बहुत ही मुश्किल है इसी प्रकार का कथन ज्योतिषी के विद्वान भी किया करते हैं पर उनके इस कथन से नहीं ज्योतिष विद्या पर कोई प्रकाश पड़ता और ना ही कथा फल कथन के औचित्य पर जिस तरह अध्यात्म में शास्त्रीय कथनों से लोगों को कह कर हर धर्माचार्य स्वयं को स्थापित किए हुए है।

ज्योतिष का अर्थ है सूर्य को प्रकाशित करने वाली विद्या कुछ लोग इसे सूर्य की तरह प्रकाशित विद्या के अर्थ में भी लेते हैं पर विद्या सभी प्रकाशित होती है इसलिए अर्थ को ठीक से समझने की जरूरत है ज्योतिष का अर्थ है प्रकाशित विद्या या ज्योतिर्मय विद्या भी लिया जाता है।

प्राचीन शास्त्रों का गहन अध्ययन करने से इसके वास्तविक अर्थ जीवात्मा है ज्योति स्वरूप जीवात्मा पर समय काल के प्रभाव का अध्ययन करने वाली विद्या ही ज्योति विद्या है ज्योतिष का अर्थ सूर्य भी है इसलिए सूर्य आदि विद्याओ का विज्ञान भी कहा जाता है।

भारतीय प्राचीन विद्या में सूर्य का अर्थ जीवात्मा ही है इसे शासक राजा जी भोगता कर्ता के रूप में ज्योतिष में भी देखा गया है किसी संरचना के अपने क्षेत्र का शासक जीव आत्मा ही होता है इसी अर्थ में सौर्य मंडल रूपी इकाई के केंद्र में स्थित जीव आत्मा को भी सूर्य का नाम दिया गया है।

विज्ञान की भाषा में सूर्य नाभिक का पर्याय है यह हर संरचना में है और जहां भी है उस संरचना का स्वामी क्रिया कराने वाला उस संरचना के द्वारा भोग कराने वाला कर्ता यानी अपनी प्रवृत्तियों की इच्छा से कर्म कराने वाला तेजस अंधकार और ऐश्वर्य संयुक्त अतृप्त भोग में तत्पर इसी कारण अघोर पंथ में इसे काकणी कहा गया है अगर आप वेदों में व्यक्त सूर्य इंद्र की स्तुति पढ़ने से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि सूर्य को केवल सौरमंडल के सूर्य में के रूप में नहीं देखा गया है।

वहां इसे इंद्र के रूप में भी व्यक्त किया गया है और जीव आत्मा के रूप में भी ज्योतिष ने इसे जीव आत्मा ही माना है और इस विद्या में यह अर्थ अधिक स्पष्ट है फलित ज्योतिष का अर्थ है वह विद्या जी से जीव आत्मा के अनवरत जीवन पर कॉल प्रभाव की गणना की जा सके और उसके भूत भविष्य एवं वर्तमान को अव्यक्त दशक को ज्ञात किया जा सके इसी को फल गणना कहते हैं और यही फलित ज्योतिष है।

आधुनिक पढ़े-लिखे और विद्वान लोगों में यह भ्रम फैला हुआ है कि फलित ज्योतिष आधारहीन विद्या है और इसका कोई वैज्ञानिक स्वरूप नहीं है अपितु यह एक अंधी आस्था है जिसका सहारा लेकर कुछ चालाक लोग लोगों को बेवकूफ बनाते हैं।

परंतु यह सत्य नहीं है यह कथन कथन कर्ताओं के मानसिक दिवालियापन का प्रमाण बन जाता है इस बात का भी यह कि वह परले सिरे के जड़ बुद्धि हैं क्योंकि जो प्रतिक्रिया विश्वास करने के लिए अपनाई जाती है वही है विश्वास करने के लिए भी विश्वास या अविश्वास करने के लिए आपको संबंधित विषय में गहराई में डूब कर उसका अध्ययन करना होगा जब तक आप ऐसा नहीं करते आपको विश्वास क्या विश्वास करने का कोई अर्थ नहीं है पर दुर्भाग्य से इस विद्या के सारे आलोचकों ने इस विद्या को प्रारंभिक जानकारी भी प्राप्त नहीं होती है

माता पिता जब संभोग रत होते हैं आधुनिक विज्ञान के अनुसार शुक्राणु एवं डिंब का मेल होता है तब संतान उत्पन्न होती है पर ज्योतिष तंत्र एवं अध्यात्म का कथन है कीर्ति कॉल मी पिता और माता के उर्जा शरीर में भारी प्रतिक्रिया होती है इसमें जो आवेश उत्पन्न होता है और उस आवेश से शुक्राणु एवं डिंब की संरचना होती है और उनके सहयोग से जो संतान बीज उत्पन्न होता है उसकी ऊर्जात्मक व्यवस्था उसी समीकरण में विकसित होती है यही समीकरण शरीर में उत्पन्न होने वाले ऊर्जा बिंदुओं की शक्ति का समीकरण होता है।

इन्हीं उरजा बिंदुओं के सामांतर सौर मंडल के ग्रहों की ऊर्जा प्रकृति है यही कारण है नक्षत्रों में घूम रहे ग्रहों का प्रभाव इन बिंदुओं पर इनकी स्थिति के अनुसार पड़ता है प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य के उर्जा बिंदुओं में और सौर मंडल के ग्रहों में एक ही प्रकार की ऊर्जा समानता का वैज्ञानिक आधार क्या है ऐसा कैसे हो सकता है दूसरा प्रश्न यह है कि ग्रह तो साथ हैं और ऊर्जा बिंदु नो राहु और केतु नाम के कोई ग्रह है ही नहीं फिर यह माजरा क्या है तीसरा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि मान लिया जभी जाए की उपर्युक्त कथन सत्य है तो भी का क्या आधार है कि यह प्रभाव हमारे जीवन की घटनाओं को प्रभावित करता है।

पहले प्रश्न का उत्तर यह है की संरचना कोई भी हो उसमें मुख्य उर्जा बिंदु नौ ही होते हैं यह सभी एक ही प्रकार की ऊर्जा प्रवृत्ति के होते हैं स्वरूप और प्रकृति कांतर स्थान भेद समीकरण भेद उत्पत्ति स्थल की उर्जा धारा आधार स्थल आदि के कारण होता है हमारे शरीर और रूप आदि का कारण भी यही है और वनस्पतियों का भी पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी और सूर्य के नाभिक कणों का अंतर भिन्नता का कारण होता है।

हमारे समीकरण में नौवर्ग हैं तो वातावरण के नौ वर्गों का प्रभाव हम पर भिन्न-भिन्न ही पड़ेगा दूसरा प्रश्न ग्रहों की संख्या का है 7 ग्रह का नाम हम जानते हैं आठवां ग्रह पृथ्वी है जिसे हम स्थाई मान लेते हैं और इस के अंतर को आक्षांश से गणित करते हैं नवा ग्रह पृथ्वी का मूल है राहु और केतु धन एवं ऋण ध्रुव है।

चंद्रमा सौरमंडल का ग्रह नहीं है वह एक उपग्रह है इसे लोग ज्योतिष की अज्ञानता मानते हैं पर उनको ज्ञात नहीं है कि ज्योतिष का स्वरूप सौरमंडल का ज्ञान नहीं है वह आकाशीय पिंडों के पृथ्वी और उनकी संरचनाओं पर प्रभाव का विज्ञान है वास्तविक ग्रह एक ऊर्जा विज्ञान के ग्रह हैं।

उनकी समानता में जो जो आकाशीय पिंड आए हैं उनका नाम और गुण वही माना गया है प्राचीन ज्योतिष के कुछ लोगों में चंद्रमा की कक्षा सूर्य के ऊपर बताई गई है वास्तव में यही यहां कक्षा का निर्धारण इसी प्रकार प्राचीन ऊर्जा विज्ञान के अनुसार किया गया है यह चंद्रमा आपकी सिर की खोपड़ी के मध्य है यह शिव के शीर्ष पर है जबकि सूर्य का स्थान हृदय मूल केंद्र में है जो रीढ में होता है अब समझ जाइए कि चंद्रमा की कक्षा सूर्य के ऊपर है या नहीं है।

अगर आप इसे सौर गृह विज्ञान मानकर निष्कर्ष निकालेंगे तो क्या निकलेगा आलोचना करता हूं कभी यह नहीं सोचा कि शनि मंगल सूर्य बृहस्पति की संरचना का ज्ञान कीमा छल्ले हैं वहां गैस है वहां की मिट्टी लाल है यदि का ज्ञान अब हुआ है आधुनिक विज्ञान को यदि जब इस विज्ञान का जन्म हुआ तभी से इस ज्ञान का को हुआ मान ले तो इसकी की आयु ढाई सौ साल निकलती है।

ज्योतिष विद्या के जानकारों को कैसे मालूम था कि बृहस्पति का अर्थ गुरु है जो सबसे भारी है और यह हवा का देवता है कैसे पता था कि शनि ग्रह में छल्ले हैं उन्हें कैसे पता था कि मंगल शरीर के लाल रक्त कणों को प्रभावित करता है और शुक्र जो है स्थूल है उन्हें कैसे पता था कि सूर्य में हर बारहवे वर्ष विस्फोट होता है काले धब्बे बनते हैं तथा पृथ्वी पर भारी तबाही मचती है।

पूरी चांद की रात में सागर उछलने लगता है सारे मानसिक रोगी उन्मत्त हो जाते हैं चूहे की एक प्रजाति समुद्र में कूदने लगती है फिर किस सूत्र पर इस सूत्र को खंडित करते हैं कि ग्रहों के प्रभाव पृथ्वी के वातावरण पर नहीं पड़ते और इससे यहां का वातावरण प्रभावित नहीं होता है।

यह वेद सम्मत विज्ञान है। उन्होंने कहा कि ज्योतिष लोगों को अंधविश्वास ही ओर नहीं ले जाता, बल्कि लोगों को जागरूक करता है ।

ज्योतिष समय का विज्ञान है, इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी दी जाती है। यह किसी जाति या धर्म को नहीं मानता। वेद भगवान भी ज्योतिष के बिना नहीं चलते।

वेद के छः अंग हैं, जिसमें छठा अंग ज्योतिष है। उन्होंने बताया कि हमने पूर्व जन्म में क्या किया और वर्तमान में क्या कर रहे हैं, इसके आधार पर भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं, इसकी जानकारी दी जाती है।

उन्होंने कहा कि ग्रहों से ही सब कुछ संचालित होते हैं। इसी से ऋतुएं भी बनती हैं। सूर्य पृथ्वी से दूर गया तो ठंड का मौसम आ गया और पास आने पर गर्मी बढ़ गई।

* Key Concepts for the Planets :-

Principle :- 

SUN: Vitality; sense of individuality; creative energy, radiant inner self (attunement of soul); essential values

MOON: Reaction; subconscious predisposition; feeling about self (self-image); conditioned responses

MERCURY: Communication; conscious mind (i.e., logical or rational mind)

VENUS: Emotionally-colored tastes; values; exchange of energy with others through giving of self and receiving from others; sharing

MARS: Desire; will toward action; initiative; physical energy; drive

JUPITER: Expansion; grace

SATURN: Contraction; effort

URANUS: Individualistic freedom; freedom of ego-self

NEPTUNE: Transcendent freedom; unification; freedom from ego-self

PLUTO: Transformation; transmutation; elimination

Urges Represented :-

SUN: Urge to be and to create

MOON: Urge to feel inner support; domestic and emotional security urge

MERCURY: Urge to express one’s perceptions and intelligence through skill or speech

VENUS: Social and love urge; urge to express affections; urge for pleasure

MARS: Self-assertive and aggressive urge; sex urge; urge to act decisively

JUPITER: Urge toward a larger order or to connect self with something greater than self

SATURN: Urge to defend self"s structure and integrity; urge toward safety and security through tangible achievement

URANUS: Urge toward differentiation, originality, and independence from tradition

NEPTUNE: Urge to escape from the limitations of one’s self and of the material world

PLUTO: Urge toward total rebirth; urge to penetrate to the core of experience

Needs Symbolized :-

SUN: Need to be recognized and to express self

MOON: Need for emotional tranquility and sense of belonging; need to feel right about self

MERCURY: Need to establish connections with others; need to learn

VENUS: Need to feel close to another; need to feel comfort and harmony; need to give of self"s emotions

MARS: Need to achieve desires; need for physical and sexual excitement

JUPITER: Need for faith, trust, and confidence in life and self; need to improve self

SATURN: Need for social approval; need to rely on one's own resources and work

URANUS: Need for change, excitement and expression without restraint

NEPTUNE: Need to experience a oneness with life, a complete merger with the whole

PLUTO: Need to refine self; need to let go of the old through pain

* Positive-Negative Expression of Planetary Principles :-

Each planetary principle can be expressed positively and creatively or negatively and self-destructively. In other words, one’s attunement to each dimension of experience may be in harmony with higher law or in a state of disharmony and discord. This results in the creative use or in the misuse of these various energies, forces, and attunements. The aspects to each planet must be analyzed in order to understand the degree of harmony or discord present within the individual.

* Positive Expression :-   

SUN: Radiation of spirit; creative and loving pouring forth of self

MOON: Responsiveness; inner contentment; flowing, adaptable sense of self

MERCURY: Creative use of skill or intelligence; reason and power of discrimination used to serve higher ideals; ability to come to agreement through objective understanding and clear verbal expression

VENUS: Love; give and take with others; sharing; generosity of spirit

MARS: Courage; initiative; willpower consciously directed toward legitimate aim

JUPITER: Faith; reliance on higher power or greater plan; openness to grace; optimism; openness to self: need for improvement

SATURN: Disciplined effort; acceptance of duties and responsibilities; patience; organization; reliability

URANUS: Attunement to truth; originality; inventiveness; directed experimentation; respect for

freedom

NEPTUNE: Attunement with the whole; realization of spiritual dimension of experience; all-encompassing compassion; living an ideal

PLUTO: Acceptance of the need to focus one’a mind and will power on one'a own transformation; having the courage to face one’s deepest desires and compulsions and to transmute them through effort and intensity of experience

* Negative Expression :-

SUN: Pride; arrogance; excessive desire to be special

MOON: Over-sensitivity insecurity; insecurity inaccurate inhibiting sense of self

MERCURY: Misuse of skill or intelligence; amorality through rationalization of anything; opinionated and one-sided "communication"

VENUS: Self-indulgence; greed; emotional demands; inhibition of affections

MARS: Impatience; willfulness: violence; improper use of force or threats

JUPITER: Over-confidence; laziness; scattering energy; leaving the work to others; irresponsibility; over-extending self or promising too much

SATURN: Self restriction through too much reliance on self and lack of faith; rigidity: coldness; defensiveness crippling inhibition, fearfulness, and negativity

URANUS: Willfulness; restless impatience; constant need for excitement and purposeless change; rebellion; extremism

NEPTUNE: Self-destructive escapism; evasion of responsibilities and self's deepest needs; refusal to face one'a motives and to commit self to anything

PLUTO: Compulsive expression of subconscious cravings; willful manipulation of other. to serve one's own ends; ruthlessly using any mean. to avoid the pain facing one’s self; infatuation with power

* The Planets in the Elements The Sun :-

The Sun sign’s element is usually dominant in considering the overall psychology of a person. This is so because the Sun sign’s element reveals the attunement of one's basic vitality, identity, and power of self-projection, as well as the fundamental quality of his or her consciousness. It also shows what is ”meal” to the individual, for it is the unconscious assumption of what is particularly real and what isn't that determines how the person will focus his or her energy?

For example, the Air Signs (Gemini, Libra & Aquarius} live in the abstract realm of thought. and a thought for them is as real as any material object. The Water Signs (Cancer, Scorpio 8: Pisces) live in their feelings. and it is their emotional state that determines their behavior more than anything else. The Fire Signs (Aries, Leo & Sagittarius) live in a state of highly excited, inspired activity. and maintaining that state of being is crucial for the fire signs to stay healthy and happy. The Earth Signs (Taurus, Virgo, & Capricorn) are grounded in physical reality; the material world and considerations to security and achievement motivate their behavior more than anything else.

The element of one's Sun sign reveals the basic inner force motivating everything we do. The element of the Sun sign also gives insight into how any individual sees life itself and what expectations they have of life experience.

When approached on the level of energy attunement, the Sun sign element represents a type of energy charge that needs to be fed or refueled often so that one’s energy is not depleted. In other words, the element of your Sun sign is the fuel that you need to feel alive! It is the power which enables us to revitalize ourselves in order to cope with the stresses and demands of daily life.

SUN IN FIRE SIGNS :-

Basically motivated by inspirations and aspirations Recharges energy through vigorous. physically demanding activity and by pursuing new visions for the future

SUN IN EARTH SIGNS :-

Basically motivated by material needs and practicality Recharges energy through working with the physical world. being productive, feeding the senses

SUN IN AIR SIGNS :-

Basically motivated by intellectual concepts and social ideals Recharges energy through social involvement and intellectual stimulation

SUN IN WATER SIGNS :-

Basically motivated by deep emotional yearnings and desires Recharges energy through intense emotional experience and intimate involvement with people

* The Moon :-

The element of the Moon's sign represents an attunement from the past that manifests automatically. a mode of feeling and being that one needs to be aware of in order to feel inwardly secure and at home with oneself. This element and experiences related to it feed your need to feel right about yourself; by such modes of self-expression. you are satisfying a deep inner need that can give stability to your entire personality. The Moon's element also shows how you react instinctively to all experiences, with what energy you spontaneously adjust yourself to the flow of life.

MOON IN FIRE SIGNS :-

Reacts to changing experiences with diet action and enthusiasm Feels comfortable when expressing confidence and strength

MOON IN EARTH SIGNS :-

Reacts to changing experiences with steadiness and stability Feels comfortable with self when being productive and working toward goals

MOON IN AIR SIGNS :-

Reacts to changing experiences with forethought and objective evaluation Feels comfortable with self when expressing ideas and interacting socially

MOON IN WATER SIGNS :-

Reacts to changing experiences with sensitivity and emotion Feels comfortable with self when feelings are deeply involved

* Mercury :-

The element of Mercury's sign indicates what specific energy and quality influences one’s thought processes, and how one expresses thoughts along that specific vibratory wavelength. Mercury symbolizes the urge to establish contact and true give-and-take communication with others, as well as all forms of coordination. including one's own nervous system coordination. Its element in a particular chart represents the inflow (through perception) and the outflow (through skill. speech. and manual dexterity) of intelligence. It shows the need to be understood by other people who are attuned to ideas in a similar way. as well as the need to learn by receiving ideas and information from the outer world.

MERCURY IN FIRE SIGNS :-

Thoughts are influenced by one's aspirations. beliefs, hopes. and future visions Skill and speech are expressed impulsively. demonstratively, and ethusiastically

MERCURY IN EARTH SIGNS :-

Thoughts are influenced by practical considerations and colored by traditional attitudes Skill and speech are expressed persistently. patiently. cautiously. and specifically

MERCURY IN WATER SIGNS :-

Thoughts are influenced by one's deep feelings and yearnings Skill and speech are expressed sensitively, emotionally, intuitively

MERCURY IN AIR SIGNS :-

Thoughts are real things in themselves and am influenced by abstract ideals and by social considerations Skill and speech are expressed objectively, articulately. and with understanding of the principles involved

* Venus :-

Like Mercury, Venus represents an inflow and outflow of energy, and its placement in the various elements is expressed as the give and take of love. affection, and sensual pleasure with others. The element of one's Venus represents how one expresses affection and caring and how one gives of one's own feelings. That is the out flowing phase of the Venus principle in action, but the in flowing phase is equally important. It represents the sorts of experiences and types of expression that feed one's need for closeness with others and help one to feel loved and appreciated.

Venus in women has to do with the female ego. A woman needs to experience the qualities of her Venus sign in order to feel feminine. It also shows how a woman receives and gives of herself in love and sex. Venus is usually more of a sexual indicator for women than it is for men. It indicates how a woman approaches any relationship that might eventually lead to sex, as well as less intimate social relationships.

For a man. Venus is associated with romance. beauty. and with images that are especially lovely and attractive to him. It describes the type of woman that erotically attracts a man, that looks good to him aesthetically and turns on his feelings! Venus is also related to a man's ideals about love. sex. and relationships. It is not usually specifically sexual. however; Mars is much more a symbol of sexual energy in men. In women. though, Venus and Mars energies are both important components of the sexual nature. and they combine and are usually more inseparable than is the case in most men.

VENUS IN FIRE SIGNS :-

Affection and appreciation are expressed energetically. directly, and grandly Feels love and closeness with another through sharing vigorous activities and mutual aspirations and enthusiasm

VENUS IN EAR’I’H SIGNS :-

Affection and appreciation are expressed tangibly. dependably. and physically Feels love and closeness with another through commitment and building a life together, as well as through sensual pleasure and sharing responsibilities

VENUS IN AIR SIGNS :-

Affection and appreciation are expressed through intense intellectual communication and a sense of companionship Feels love and closeness with another through verbal sharing, a meeting of minds. mutually pleasant socializing

VENUS IN WATER SIGNS :-

Affection and appreciation are expressed emotionally and sympathetically Feels love and closeness with another through interchange of sensitivity and feelings on a subtle level, leading to a feeling of deep merging

* Mars :-

The element of Mars shows what types of experiences and modes of activity stimulate one’s physical energy and with what energy one seeks to assert oneself. The element of one’s Mars is the energy that feeds your need for physical excitement and the mode through which you can express your aggressive powers to prove your strength. It describes the specific method you use to get what you want: Mars in air uses persuasion; Mars in fire uses power and initiative; Mars in earth uses patience and efficiency; and Mars in water uses intuition, slyness. and a rather unconquerable persistence.

For a man, Mars shows how he projects himself forcefully, assertively. and sexually. It indicates how he gives of his power in a sexual relationship, and how he expresses his masculinity in all areas of leadership and initiative. Thus, it is connected with a man’s “male ago.”

In a woman's chart. Mars is also a strong male image in her psyche; it is closely associated with a romantically exciting image that turns on her own energy and helps her to express herself. The Mars sign and aspects often are a key to what kind of man a woman finds physically attractive.

MARS IN FIRE SIGNS :-

Asserts self through direct physical action, initiative. and outgoing radiation of energy Physical energy stimulated by constant movement. confident enthusiasm, and dynamic action

MARS IN EARTH SIGNS :-

Asserts self through concrete achievement requiring patience and persistence Physical energy stimulated by hard work, self-discipline, challenge. and duty

MARS IN AIR SIGNS :-

Asserts self through expression of ideas. active communication. and energetic imagination Physical energy stimulated by mental challenges, social activism, relationships. and new ideas

MARS IN WATER SIGNS :-

Asserts self through emotional subtlety and persistence. and by appealing to the deeper feelings and needs of others Physical energy stimulated by deep yearnings. feeling needed by others. subtle intuitions. and intensity of emotional experience

* Jupiter :-

Jupiter’s element shows what sorts of experiences and modes of activity generate an inner faith and confidence in oneself. To state this another way. one is able to experience a protective feeling of unity with a greater power or plan and a sense of well-being when one operates on the level indicated by Jupiter's element. Opportunities come through expression of that element's energy. It indicates a reservoir of vitality that is abundant end naturally flowing. thus contributing to one's health.

JUPITER IN FIRE SIGNS :-

Inner faith comes when one is outgoing. enthusiastic. assertive. and physically active Opportunities are stimulated when one takes risks to express oneself and try new things

JUPITER IN EARTH SIGNS :-

Inner faith comes when one tunes into practicality. dependability, and the experiences of the senses Opportunities are stimulated when one works hard, assumes responsibilities. and tunes in to nature and its rhythm

JUPITER IN AIR SIGNS :-

Inner faith is stimulated through exploring new ideas. communicating with new people. and social improvement Opportunities come when one expresses ideas enthusiastically and interacts with others for a future goal

JUPITER IN WATER SIGNS :-

Inner faith is stimulated through depth of emotional experience and through positive expression of one’s compassion and imagination Opportunities come when one is sensitive and caring toward others. and when one intuitively follows one's inner yearnings

* Saturn :-

The element of Saturn in one’s chart generally indicates a challenge; one is working toward fully accepting. without fear. the level of experience represented by that particular element. This fear is often an outgrowth of an old pattern of life that has now become intolerably rigid and oppressive; the caution and discipline connected with this pattern may still be useful for one's growth, if it is accepted as a motivating force toward consistent. concrete expression in that area of life.

Saturn's element indicates at what level of expression one tends to be inhibited and where one's energy is blocked or restricted. This inner blockage arises because that level of experience is overly-important to the individual. He or she therefore tends to be tied up in knots in this area of life. By trying too hard to express the energy. or by avoiding or repressing it. one tends to restrict the natural flow of the energy.

SATURN IN FIRE SIGNS :-

Need to stabilize one’s identity and express creative energy with more regularity and objectivity Effort should be put into freer self-expression with both enthusiasm and responsibility

SATURN IN EARTH SIGNS :-

Need to stabilize one‘s efficiency and precision in work and in handling daily responsibilities Effort should be put into mastering the physical world and developing a systematic approach

SATURN IN AIR SIGNS :-

Need to stabilize one's thinking and discipline one’s mind without lapsing into negative thinking Effort should be put into communicating clearly and practically, as well as effectively handling social responsibilities with sincerity while still maintaining a detached perspective

SATURN IN WATER SIGNS :-

Need to stabilize one's emotions and sensitivities, expressing feelings while simultaneously developing more detachment from them Effort should be put into expressing feelings with self-acceptance while disciplining aver-sensitivity

* Uranus, Neptune & Pluto In the Elements :-

For understanding the birth chart of an individual. the element placements of these three outer planets are relatively unimportant. Each of these three planets remains in a certain element (and sign) for quite a few years. and thus little individualized meaning can be derived from such a widespread factor. The elemental emphasis revealed by the outer planets' placements over a period of some years is primarily of interest for illuminating generational differences and subtler changes in mass psychology worldwide.

 

सूर्य आत्मा के रूप में विराजमान हैं, परिवार में इसे पिता का स्थान प्राप्त है। इसी तरह चंद्रमा मन पर विराजमान रहता है, परिवार में इसे मां का दर्जा प्राप्त है। इसलिए जिस व्यक्ति ने मां-पिता का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया समझो वह सूर्य और चंद्रमा का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया।

मंगल शरीर की ऊर्जा है, शरीर में पर्याप्त ऊर्जा है तो आपकी सक्रियता दिखेगी, जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या नहीं है समझिए, उसका बुध मजबूत है, उसे बुध का आर्शीवाद प्राप्त है।

इसी तरह शुक्र परिवार में पत्नी की तरह और शरीर में शुक्राणु के रूप में मौजूद रहता है। जिस व्यक्ति का स्नायु तंत्र कमजोर है, नसें कमजोर हैं, स्पाईन का दर्द है समझो उसके ऊपर शनिदेव का प्रकोप है।

फलित ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शब्द का यौगिक अर्थ ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखनेवाली विद्या है। इस शब्द से यद्यपि गणित (सिद्धांत) ज्योतिष का भी बोध होता है, तथापि साधारण लोग ज्योतिष विद्या से फलित विद्या का अर्थ ही लेते हैं।

ग्रहों तथा तारों के रंग भिन्न-भिन्न प्रकार के दिखलाई पड़ते हैं, अतएव उनसे निकलनेवाली किरणों के भी भिन्न भिन्न प्रभाव हैं। इन्हीं किरणों के प्रभाव का भारत, बैबीलोनिया, खल्डिया, यूनान, मिस्र तथा चीन आदि देशों के विद्वानों ने प्राचीन काल से अध्ययन करके ग्रहों तथा तारों का स्वभाव ज्ञात किया। पृथ्वी सौर मंडल का एक ग्रह है। अतएव इसपर तथा इसके निवासियों पर मुख्यतया सूर्य तथा सौर मंडल के ग्रहों और चंद्रमा का ही विशेष प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी विशेष कक्षा में चलती है जिसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। पृथ्वी फलित ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शब्द का यौगिक अर्थ ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखनेवाली विद्या है। इस शब्द से यद्यपि गणित (सिद्धांत) ज्योतिष का निवासियों को सूर्य इसी में चलता दिखलाई पड़ता है। इस कक्षा के इर्द गिर्द कुछ तारामंडल हैं, जिन्हें राशियाँ कहते हैं। इनकी संख्या है। मेष राशि का प्रारंभ विषुवत् तथा क्रांतिवृत्त के संपातबिंदु से होता है। अयन की गति के कारण यह बिंदु स्थिर नहीं है। पाश्चात्य ज्योतिष में विषुवत् तथा क्रातिवृत्त के वर्तमान संपात को आरंभबिंदु मानकर, 30-30 अंश की 12 राशियों की कल्पना की जाती है। भारतीय ज्योतिष में सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु ही मेष आदि की गणना की जाती है। इस प्रकार पाश्चात्य गणनाप्रणाली तथा भारतीय गणनाप्रणाली में लगभग 23 अंशों का अंतर पड़ जाता है। भारतीय प्रणाली निरयण प्रणाली है। फलित के विद्वानों का मत है कि इससे फलित में अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि इस विद्या के लिये विभिन्न देशों के विद्वानों ने ग्रहों तथा तारों के प्रभावों का अध्ययन अपनी अपनी गणनाप्रणाली से किया है। भारत में 12 राशियों के 27 विभाग किए गए हैं, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। ये हैं अश्विनी, भरणी आदि। फल के विचार के लिये चंद्रमा के नक्षत्र का विशेष उपयोग किया जाता है।

ज्योतिष शब्द की उत्पति ज्योति से हुई। तारों के रूप में असंख्य ज्योतिष्क

आकाश में स्थित है। उनमें से ग्रहों की ज्योति पृथ्वी पर स्थित जीव, वनस्पति

आदि को प्रभावित करती रहती है। इस विषय की जानकारी जिस माध्यम से प्राप्त

होती है, उसे ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है या यह भी कहा जा सकता है कि जिस

शास्त्र में ज्योतिष्कों (ग्रह, तारा, नक्षादि) के विषय में विचार किया हो, उसे

ज्योतिष शास्त्र कहते हैं।

वेद संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। वेद में समस्त विद्याओं का समावेश है। वेद चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद । वेद के छह अंग माने गयेहैं। ज्योतिष उन्हीं अंगो में से एक है, इसे वेद के नेत्र की संज्ञा दी गई है। जिस प्रकार नेत्रों से हम विभिन्न वस्तुओं एवं उनकी गतिविधियों को देख सकते हैं,

उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र द्वारा भूत, वर्तमान एवं भविष्य काल में घटने वाली

घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

ज्योतिष शास्त्र की उत्पत्ति कब हुई, यह निश्चित नहीं किया जा सकता।

यह मानव सृष्टि की भांति अनादि है। ज्यों-ज्यों सृष्टि के कार्यो तथा विद्याओं की

उन्नति होती गई, वैसे-वैसे ज्योतिष शास्त्र का भी विकास हुआ।

ज्योतिष शास्त्र के 18 आदि प्रमुख प्रवर्तक हुए-1.ब्रह्मा, 2. सूर्य, 3.वशिष्ट,

4. अत्रि, 5. मनु, 6. पौलस्त्य, 7. रोमश, 8. मरीचि, 9.अङ्गिरा, 10. व्यास,

11.नारद, 12. शौनक, 13. भृगु, 14. च्यवन, 15. यवन, 16, गर्ग, 17. कश्यप,

18. पराशर। इसके बाद आर्यभट्ट, वराह मिहिर, कालकाचार्य, कल्याण वर्मा,

भास्कराचार्य, चन्द्रसेन, भोजराज, कमलाकर भट्ट आदि-आदि ज्योतिष शास्त्र के

मर्म को जानने वाले विद्वान हुए हैं।

पाश्चात्य विद्वान ज्योतिष शास्त्र का ज्ञाता यूनानियों को मानते हैं। परन्तु यह

कतई सत्य नहीं है। आज सम्पूर्ण विश्व यह मानने लगा है कि ज्योतिष विद्या का

उद्भव भारत में ही हुआ है।

आकाश में असंख्य तारों की तरह सूर्य भी एक तारा है। सभी तारे अपने

प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। सूर्य भी अपने ही प्रकाश से चमकता है। जो

ज्योतिष्क सूर्य के चारों और भ्रमण करते हैं, उन्हें ग्रह कहते हैं। पूर्व में चन्द्रमा को

उपग्रह कहा गया, लेकिन अब इसे सम्पूर्ण ग्रह के रूप में मान्यता दे दी गई है।

हमारे आदि ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि, साधना, अनुसंधान एवं कठिन

परिश्रम से सूर्य के अतिरिक्त अन्य छह ग्रहों-चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और

शनि की खोज की। इसके पश्चात उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्ध का पृथ्वी पर पड़ने

वाले प्रभाव को देखते हुए इन दोनों बिन्दुओं को ग्रह की संज्ञा दी। यहां यह भी

जान लें कि राहू-केतु कोई पिण्ड ग्रह नहीं होकर छाया ग्रह के रूप में विद्यमान हैं।

इस प्रकार हमारे आदि ऋषियों ने नौ ग्रह खोजे जबकि आधुनिक वैज्ञानिकों

ने पिछले दो सौ वर्षों में केवल तीन ग्रहों क्रमश: हर्सल, नेपच्यून, प्लूटो का पता

किया। अब ग्रहों की संख्या नौ से बढ़कर बारह हो गई है। आधुनिक वैज्ञानिकों

द्वारा जिन तीन ग्रहों की खोज की गई हैं वे पृथ्वी व सूर्य से अत्यधिक दूरी पर

स्थित हैं और इनसे पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्ण विश्लेषण नहीं हो पाया

है। फिर भी पाश्चात्य ज्योतिष इन्हें अपना रहे हैं। भारतीय ज्योतिष में इन्हें अभी

पूर्ण स्थान नहीं दिया गया है।

ज्योतिष शास्त्र के मुख्य दो विभाग गणित व फलित हैं। गणित द्वारा ग्रहों

की विभिन्न स्थतियों की जानकारी प्राप्त की जाती है, जिनके आधार पर जन्म

लग्न, चलित, दशाचक्र आदि का निर्माण होता है तथा फलित के आधार पर ग्रहों

के मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव का विचार किया जाता है। ज्योतिष विज्ञान के

विद्वान जैनाचार्यों ने इसमें प्रश्न व शकुन भी जोड़ दिये हैं।...

सनातन-ज्योतिषविद्या-विज्ञान-शक्ति-परिचय-विचार-परिदृश्य-महत्व-प्रस्तावना-विवेचन-विश्लेषण-तत्वबोध-अनुभव-संशोधन-दृष्टिकोण-भ्रांतिनीरकरण

सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार कहा जा सकता है कि ज्योतिष शास्त्र ग्रहों, । नक्षत्रों, राशियों आदि के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन शास्त्र है। जैसा कि कहा भी गया है । दूसरे शब्दों में हम ज्योतिष को 'सामाजिक ब्रह्मांडीय शास्त्र' भी कह सकते हैं। यह अनुमानतः 3000। वर्षों से अधिक पुराना विज्ञान है। "ज्योतिष' शब्द संस्कृत का एक मूल शब्द है।

v कुछ विद्वान इसे ज्योति+ईश अर्थात् 'ईश्वर का प्रकाश' ऐसा विश्लेषित करके समझाने का प्रयास भी करते हैं। परन्तु यह मात्र शब्द विलास ही जान पड़ता है। तार्किकता के आधार पर यह अर्थ । सत्य प्रमाणित नहीं होता। क्योंकि ज्योतिष शब्द की संरचना 'ज्योतिस्-अच्' के अवयवों के अनुसार (ज्योतिस्-यानी प्रकाश तथा अच-यानी प्रार्थना करना) 'ज्योतिष' का अर्थ 'प्रकाश की प्रार्थना' करना सिद्ध होता है। (इसी 'अच्' से 'अर्चना' का भी विन्यास होता है) यह व्याकरण की दृष्टि से भी अधिक उचित है। और तर्कशास्त्र की दृष्टि से भी युक्तिसंगत है।

v प्रायः ज्योतिष को भविष्य का ज्ञान करानेवाला शास्त्र ही माना जाता है। परन्तु यह अर्ध सत्य है। ज्योतिष समय और मानव के आर-पार देखने की कला है। इससे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जाना जा सकता है और मनुष्य के व्यक्तित्व, स्वभाव, प्रकृति, गुण-दोष, रोग-विकार आदि को भी ठीक-ठीक जाना जा सकता है।

v ज्योतिष के सम्बन्ध में समाज अनेक भ्रान्तियों का शिकार है। ज्योतिष को ठीक-ठीक समझने के लिए मात्र परिभाषा या शब्दार्थ पर विचार करना पर्याप्त नहीं है। अपित इस विषय में विस्तृत गहन चर्चा और इस संदर्भ में पनपी भ्रान्तियों का खण्डन भी आवश्यक है।

v क्या ज्योतिष अंधविश्वास है? विज्ञानवादियों एवं आधुनिक लोगों की यह आम धारणा है कि ज्योतिष अंधविश्वास और मात्र पंडितों की कमाई का धंधा है। लेकिन यह भी सत्य है कि ऐसी धारणा उन्हीं सज्जनों की है, जिन्होंने ज्योतिष को पढ़ा या जाना नहीं है, मात्र सुना ही है। किसी प्रणाली को जाने व समझे बिना ही उसका विरोध मात्र इसलिए करना कि वह प्राचीन है अथवा आध्यात्मिकता से सम्बन्धित है, बुद्धिमत्ता नहीं है। दो पदार्थों/सत्ताओं/विषयों को तत्त्वतः जानकर उनके सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही हम उनकी तुलना कर सकते हैं। तभी हम किसी को श्रेष्ठ और किसी को औसत या निम्न कहने के अधिकारी हैं। मात्र इसलिए नहीं कि वह हमें पसंद नहीं है या हमारी रुचि के अनुकूल नहीं है। सत्य हमेशा हमारी पसंद का ही हो, यह जरूरी नहीं है।

v ज्योतिष के सम्बन्ध में भ्रान्तियां और उनके कारण किसी भी भ्रान्ति का एकमात्र कारण 'ज्ञेयता' या 'समग्र दृष्टि' का अभाव होता है। मजे की बात है कि ज्योतिष के विरोधी ही मात्र भ्रान्तियों के शिकार नहीं हैं। अपितु ज्योतिष के पक्षधर/समर्थक या इसे प्रयोग करने वाले बहुत से तथाकथित ज्योतिषी भी भ्रान्तियों के शिकार हैं। अत: आगे बढ़ने से पूर्व इन भ्रान्तियों का, इनके कारणों तथा निवारण का भी प्रयास करना युक्तिसंगत होगा। साथ ही जिज्ञासु पाठकों का ज्ञानवर्धन एवं संशय हरण होने के साथ-साथ इस विषय (ज्योतिष) को ठीक-ठीक समझ सकने के लिए सशक्त भूमिका एवं सुदृढ़ धरातल (Plate form) भी प्राप्त हो सकेगा।

v अतः यह विवेचन अधिक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी होगा। इसे नजरअंदाज करने की लापरवाही न करें।

v विरोध में भ्रान्तियां-1. ज्योतिष अंधविश्वास/निराधार है। 2. ज्योतिष मात्र कर्मकाण्ड अथवा 'पंडों' की आजीविका का साधन है। अन्यथा जीवन में उपयोगी नहीं। 3. ज्योतिष कपोल कल्पना है। अथवा ठगने की विद्या है। पक्ष में भ्रान्तियां-1. ज्योतिष मात्र ग्रहों की गतियों का गणित है। 2. ज्योतिष ईश्वर का प्रकाश है अत: परिपूर्ण एवं दोषरहित है। 3. ज्योतिष द्वारा पूर्व निश्चित भाग्य को बदला जा सकता है। 4. ज्योतिष एक स्वतंत्र विज्ञान है और ज्योतिषी सर्वज्ञ होता है। दोनों प्रकार की भ्रान्तियों के मूल कारण-1. 'समग्र दृष्टि' का अभाव।। किसी अंग विशेष को ही सम्पूर्ण मान लेने का भ्रम। दूसरे शब्दों में अज्ञान एवं। अर्धज्ञान। 2. केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना। अतिसक्षम, मापे तथा देखे न जा सकने वाले घटकों के अस्तित्व को न स्वीकारना। 3. पुनर्जन्म की मान्यता के प्रति अविश्वास। 4. कालान्तर से होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान न देना तथा प्राचीन सिद्धांतों, दरणों, संज्ञाओं को आज के परिप्रेक्ष्य में ज्यों का त्यों तोलने की कोशिश करना। 5. ज्योतिष को दर्शन शास्त्र, तर्क शास्त्र आदि से पृथक ईश्वर प्रदत्त, ऋषियों का प्रसाद मानकर सम्पूर्ण या असंशोधनीय समझना। 6. कर्मफल के बन्धन को तत्त्वत: न जानना अथवा कर्म के स्वरूप या कार्य और कारण के सम्बन्ध को न समझ पाना। 7. विषय को जाने और समझे बिना ही अपनी रुचि या अरुचि के आधार पर 'पूर्वाग्रह' या 'हठधर्मिता' से काम लेना। उसका निष्पक्षता के साथ विवेचन न करना। 8. शब्द के मात्र शब्दार्थ पर ही विचार करना। उसके भावार्थ, गूढार्थ, प्रचलित अर्थ एवं पर्याय अर्थों, संश्लिष्ट अर्थों पर विचार न करना। 9. यह मानना कि हर पुरानी चीज बदल दी जानी चाहिए। यदि हम इन भ्रान्तियों के मूल कारणों पर ही थोड़ा विवेचन कर लें तो ये भ्रान्तियां स्वयं ही खण्डित हो जाएंगी। फिर भी हम बाद में इन भ्रान्तियों के औचित्य को भी संक्षेप में तोलेंगे। तभी ज्योतिष विषय की ओर आगे बढ़ेंगे।

v मूल कारणों के औचित्य एवं अनौचित्य का विवेचन

1. समग्र दृष्टिका अभाव-

किसी विषय/वस्तु/सत्ता/पदार्थ के विषय में हम ठीक- ठीक तभी जान सकते हैं, जब हम उसे समग्रता के साथ देखें और हमारी देखने की सामर्थ्य भी पूर्ण हो। जैसे-कमजोर आंखोंवाला तब तक देखी हुई वस्तु को वास्तविक रूप में सुविधापूर्वक नहीं पहचान सकता, जब तक उसके पास उचित नम्बर का चश्मा न हो। अत: दृष्टि सामर्थ्य का पूरा होना, पहले तो यही आवश्यक है। यदि हम 'समग्रता' से नहीं देखते और मात्र अंगविशेष या कोणविशेष को देखकर उसी के आधार पर समूचे का परिणाम/निष्कर्ष निकालने की चेष्टा करते हैं तो हम सत्य पर नहीं पहुंचते। या तो हम भ्रम में पड़ते हैं या फिर संशय में। अथवा मिथ्याभास (सांप को रस्सी समझना या रस्सी को सांप समझ लेना) या अपूर्ण सत्य को ही पूर्ण अथवा वास्तविक सत्य समझ लेते हैं। जैसे चार अंधों को किसी ने बताया कि उनके सामने एक हाथी खड़ा है और चारों ने उसे छूकर/टटोल कर जानने की कोशिश की। जिसने हाथी के पैर को टटोला उसका निष्कर्ष था कि हाथी खम्बे जैसा होता है। जिसने सुंड टटोली थी उसने बताया कि हाथी अजगर जैसा होता है। हाथी की पूंछ टटोलने वाले अंधे ने हाथी को मोटे रस्से जैसा बताया आर हाथी के कान को पकड़ने वाले अंधे ने हाथी को सूप/पंखे जैसा माना। उदाहरण/कथा-परानी है। मैं अक्सर इसे दोहराता भी हूं। क्योंकि यह एकदम सटीक है और महत्त्वपर्ण तथ्य की ओर आसानी से संकेत देती है।)इस प्रकार हाथी के विषय में चारों अंधों के निष्कर्ष भिन्न थे। न केवल भिन्न थे, बल्कि सत्य भी नहीं थे। जबकि अंधों के प्रयासों, प्रयासों के प्रति ईमानदारी. अनुभवों तथा अनुभवों को अभिव्यक्त करने की ईमानदारी में कोई कमी नहीं थी। हरेक ने अपने-अपने हाथों में आने वाले अंग को तसल्ली से जांचा-परखा था और जिस नतीजे पर पहुंचे थे उसे ज्यों का त्यों बताया था, फिर भी वे सत्य नहीं जान सके थे, क्योंकि आंख न होने से उन्होंने सम्पूर्ण हाथी को नहीं देखा था बल्कि एक अंगविशेष को ही सम्पूर्ण समझ बैठे थे। 'समग्र दृष्टि' के अभाव में ऐसा ही होता है। कहानी यहां खत्म हो जाती है। मूल संदेश भी यहां खत्म जाता है। लेकिन पूरा लाभ तब प्राप्त होगा, जब हम इस कहानी पर थोड़ा-सा और आगे विचार करेंगे। क्या एक अंधा बाकी अंधों के निष्कर्षों को सही मानेगा?-बिल्कुल नहीं। क्योंकि उसका अपना अनुभव औरों से सर्वथा भिन्न है। अत: चारों अंधे एक-दूसरे को गलत/झूठा और स्वयं को सही/सच्चा बताएंगे। न केवल बताएंगे बल्कि वाद- विवाद के बाद शायद एक-दूसरे का सिर भी फोड़ें। बात यहीं खत्म हो जाती हो। तो भी गनीमत थी। मगर ये अंधे अपने बच्चों और शिष्यों को भी यही सिखाएंगे कि हाथी ऐसा ही होता है। हमने स्वयं अनुभव करके जाना है। (बच्चे व शिष्य भी अंधे हुए या समग्र दृष्टि से हीन हुए तो पिता या गुरु की बात को सत्य मानेंगे और इस प्रकार विभिन्न मत या सम्प्रदाय चल निकलेंगे-जिनमें एक भी सही नहीं होगा।) केवल आंख वाला/समग्रता से हाथी को देखने और पहचानने वाला ही यह जान सकता है कि चारों अंधे अपने-अपने स्थान पर सही हैं, परन्तु सत्य पर एक भी नहीं पहुंचा है। लेकिन वह जान तो सकता है-अंधों को जनवा या मनवा नहीं सकता। अंधे तो उसके निष्कर्ष को भी अपने अनुभवों के आधार पर चैलेंज और condemn करने का प्रयास करेंगे। निष्कर्ष-अत: आंख वाला भी मात्र अंधों पर हंसने के या मौन रह जाने के और क्या कर सकता है?

v ज्ञान के क्षेत्र में भी अक्सर ऐसा ही होता है। जो स्वयं साक्षात्कार करके सत्य को जानता है, सत्य उसी का होता है। वह दूसरे को तब तो समझा सकता है, जब दूसरा सत्य को पाने के उद्देश्य से उसके प्रति श्रद्धा और विश्वास लेकर उसकी शरण में आए। अन्यथा हरगिज नहीं समझा सकता, क्योंकि सामने वाला निर्णय तो अपने सीमित अनुभव के आधार पर पहले ही ले चुका है। ऐसी ही स्थिति या असमर्थता को कवि ने गिरा अनैन नैन बिनु वाणी कहा है। सत्य पाना है तो समग्र दृष्टि उत्पन्न करें। अथवा किसी समग्र दृष्टि वाले की शरण में अपनी बुद्धि व अनुभव का समर्पण कर दें। उसी के वाक्य को 'ब्रह्मवाक्य' मानें ।

v इसी को गुरु धारण करना कहते हैं। असमर्थ के कल्याण का यही उपाय है। प्रत्यक्ष प्रमाण-प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वोत्तम है। क्योंकि वह स्वयं अपने ही ज्ञान व अनुभव पर आधारित होने से तुरन्त सन्तुष्टि प्रदान करता है और व्यक्ति को लेशमात्र भी शंका नहीं रह जाती। परन्तु प्रत्यक्ष की सीमाएं हैं। जैसे ऊपर कथा में अंधे होने की मजबूरी से स्वयं प्रत्यक्ष या अनुभूत करने से सत्य की प्राप्ति नहीं हई। इस संदर्भ में इसी स्थूल उदाहरण की और सम्भावनाएं तथा शर्तों को भी विचारिए और प्रत्यक्ष की सीमाएं देखिए- सबसे पहले तो आपकी दृष्टि सही हो। दूसरी बात उसमें समग्रता से देखने की सामर्थ्य हो। तीसरी बात प्रकाश पर्याप्त मात्रा में हो। अंधेरे में रस्सी को सांप समझने या सांप को देख ही न पाने की सम्भावना होगी। चौथी बात जिसे देखा जा रहा है वह मलिन न हो, ढका हुआ न हो तथा स्थिर हो। अन्यथा उसके वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचाना जा सकेगा। पांचवीं बात आपकी दृष्टि व दृश्य के बीच में दीवार आदि अवरोध न हो। अन्यथा आप उस पार देख ही नहीं पाएंगे। छठी बात जिसे आप देख रहे हैं, वह आपकी दृष्टि सीमा में हो। अधिक दूर का भी ठीक दिखाई नहीं देता। उससे भी अधिक दूर का दृष्टि ठीक होने पर भी दिखाई नहीं देता। सातवीं बात आंख के बिल्कुल निकट की वस्तु अथवा बहुत तीव्र प्रकाश में रखी वस्तु भी दिखाई नहीं देती। सही देख पाने के लिए ये सभी शर्ते जरूरी हैं। इसके बाद भी दृष्टि की एक सीमा है। आप अपनी आंख में पड़ा हुआ काजल नहीं देख सकते। दर्पण या पानी उपलब्ध नहीं हो तो स्वयं अपना चेहरा नहीं देख सकते। अपने शरीर का पिछला हिस्सा नहीं देख सकते। अपने शरीर के भीतर नहीं देख सकते। माइक्रोस्कोप से आप सूक्ष्म वस्तुओं को देख सकते हैं (माइक्रोस्कोप न हो अथवा उसे सेट करना न जानते हों तो वह भी नहीं देख सकते।) मगर दुनिया में और भी अतिसूक्ष्म वस्तुएं/प्राणी हैं-जो सूक्ष्मदर्शी से भी देखे नहीं जा सकते। आपके पास दूरबीन हो या खगोलबीन हो और आप उसका प्रयोग भी जानते हों तो औरों की अपेक्षा दूर तक देख लेंगे। पर दुनिया/सृष्टि खगोलबीन से भी आगे है। इतने पर भी सृष्टि की आयु के सामने आपकी आयु क्या है? अपने सारे जीवन में आप उस शहर का ही चप्पा-चप्पा नहीं देख पाते जहां रह रहे हैं ? पूरी दनिया. पुरा ब्रह्मांड, सागर तल या पाताल की तो बात ही क्या है ? छोटी-सी आयु में आप सभी विषय, सभी पदार्थ, सभी सत्ताएं कैसे प्रत्यक्ष कर सकते हैं? जबकि प्रत्यक्ष के साथ ऊपर बताई गई तमाम शर्ते भी जुड़ी हुई हैं। अतः निष्कर्ष यह है कि मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने से समूचे को जाना नहीं जा सकता, हमें और प्रमाणों का सहारा भी लेना ही होगा। अन्य प्रमाण-भारतीय दर्शन इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण के बाद क्रमश: अनुमान प्रमाण, शब्द प्रमाण और आप्त प्रमाण की व्यवस्था करता है। ये सभी 'प्रत्यक्ष' पर आधारित हैं, परन्तु ये प्रमाण या तो आंशिक हैं अथवा अपने द्वारा प्रत्यक्ष या अनुभूत न होकर, औरों द्वारा प्रत्यक्ष/अनुभूत हैं।

2।ज्योतिष को असंशोधनीय समझना-अब तक हमने जो चर्चा की वह ज्योतिष पर अविश्वास करनेवालों के सम्बन्ध में थी। मगर यह चर्चा ज्योतिष पर अंधविश्वास करनेवालों के लिए है। किसी तथ्य या विषय को भली प्रकार समझे बिना नकार देना अविश्वास है तो उसे भली प्रकार समझे बिना स्वीकार लेना अंधविश्वास है। दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं, क्योंकि ये वास्तविकता तक पहुंचने नहीं देतीं। अतः सत्य को समझने के लिए पूर्वाग्रह या हठधर्मिता को त्यागकर निष्पक्षता, सजगता एवं समग्रता से धैर्यपूर्वक विवेचन आवश्यक है। ज्योतिष अपने आप में स्वतंत्र विधा नहीं है। इसमें खगोलशास्त्र, विज्ञान, गणित, पदार्थ विज्ञान, दर्शनशास्त्र, मंत्र विज्ञान, रल विज्ञान, शकुनशास्त्र, आयुर्वेद या रोग विज्ञान, शरीर लक्षण एवं मुखाकृति विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान, समाज शास्त्र, आचार संहिता, धर्म एवं अध्यात्म तथा मनोविज्ञान आदि सभी का कछ न कुछ अंश (आंशिक या अधिक) शामिल है तथा ये विषय ज्योतिष के इतने समानान्तर हैं कि इनसे कटकर ज्योतिष को तत्त्वत: जाना ही नहीं जा सकता। ___ ज्योतिष किसी एक विशेष ऋषि द्वारा प्रदत्त अथवा अन्वेषित ज्ञान भी नहीं है। अपितु विभिन्न विशेषज्ञ ऋषियों द्वारा अपने-अपने समय व स्तर पर किए गए शोध तथा अध्ययनों का सम्मिलित परिणाम है। हर ऋषि या विद्वान का अपना दृष्टिकोण, अपना अनुभव तथा अपना मार्ग रहा है। अतः ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन प्रामाणिक ग्रन्थों के सिद्धांतों एवं निष्कर्षों व प्रणालियों में अनेक विरोधाभास है। इन ऋषियों या विद्वानों अथवा ज्योतिषशास्त्र के प्रणेताओं तथा प्रवर्तकों में मुख्य नास पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। (अतः इसे ईश्वर प्रदत्त या ईश्वर का प्रकाश समझने की भूल न करें।) । नारद, व्यास, पराशर, गर्ग, गौतम, भृगु, भारद्वाज, जैमिनी, कश्यप, कात्यायन, हस्पति श्रीसूर्य, वराहमिहिर आदि अतिप्राचीन एवं मंत्रेश्वर, गोपाल रलाकार, काशीनाथ, जयदेव, कल्याण वर्मा, श्रीमहेश, हरिवंश, मार्तण्ड, आचार्य वशिष्ठ, वैद्यनाथ, जोगेश्वर, नारायण भट्ट, नीलकंठ आदि मध्यकालीन व नवीन आचार्य पसख हैं। भास्कर, कपिलेश्वर, नरपतिकवि, गणेश दैवज्ञ, नीलांबर आदि ज्योतिर्विदों के नाम भी गिनाए जा सकते हैं। 29कोई भी विषय एक बार में शोधा नहीं जाता। अनेक पीढ़ियां क्रमश: उसे विकसित व संशोधित करती हैं। अतः हर विषय की अपनी सीमाएं होती हैं और परिपूर्ण समझे जाने पर भी उसमें संशोधनों व समायोजनों की गुंजाइश रहती है। सभी विषयों में इसी प्रकार अनेक शोध, संशोधन व परिवर्तन होते रहे हैं, होते रहेंगे। क्योंकि यही विकास की प्रक्रिया है। ज्योतिष में भी सम्बन्धित सिद्धांतों में परिवर्तन, समायोजन या संशोधन की सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। (फिर भी यदि हम ऐसा करेंगे तो ज्योतिष विषय के और विकसित व सटीक होने की सम्भावनाओं को हम स्वयं ही बन्द करने के प्रयास करेंगे)। सन् 505 (वराह मिहिर) से पूर्व राहू-केतु ज्योतिषीय व्याख्या में शामिल नहीं थे। प्रधान सात ग्रहों की ही ज्योतिषीय व्याख्या की जाती थी। वराह मिहिर के बाद से राहू-केतु भी शामिल हुए। अभी पिछले सवा दो सौ सालों से यूरेनस, नेप्च्यून व प्लूटो को भी ज्योतिषीय व्याख्या में शामिल किया गया है। ये सब ज्योतिष के क्रमिक विकास के प्रमाण हैं । समयानुसार सृष्टि व समाज में अनेक परिवर्तन होते हैं। अनेक तारे ज्योतिष के प्रकाश में आने के बाद से अब तक ब्लैक होल्स में बदल चुके हैं (उनकी जीवन अवधि समाप्त हो चुकी है) और अनेक 'निहारिकाओं' (तारों का RAW MATERIAL) ने नए तारों के रूप में जन्म ले लिया है। बहुत से तारों का स्थान परिवर्तन हो चुका है। ग्रह गतियों या उनके भ्रमण मागों में कुछ मामूली सा सही किन्तु परिवर्तन आया है। यह सब हमें ब्रह्मांड व तारों के निरंतर शोध में लगे रहनेवाले वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चलता है। पृथ्वी को जलवायु तथा वायुमंडल में भी अनेक बदलाव आ चुके हैं। मरुस्थलों की वृद्धि हुई है, वृक्ष कम हो गए हैं, ऋतुओं का स्वभाव असनतुलित हो चुका है, ओजोन परत में छेद हो चले हैं। हाल ही में (प्रायः दो वर्ष पूर्व बृहस्पति ग्रह से शूमेकरलेवी टकराया था, उससे बृहस्पति में क्या परिवर्तन हुए यह शोध के अन्तर्गत है। इन सब परिवर्तनों को ध्यान में रखना भी क्या हमारे लिए आवश्यक नहीं है? ज्योतिष के सभी सिद्धांत AS ITIS लागू करते रहन गलत है देश काल परिस्थिति पात्र परिवेश खगोल भूगोल सामाजिक आर्थिक न्यायिक ऐतिहासिक दृष्टि कोण की कसौटी पर जब सब आकलन करेनेगे तो परिशुद्ध निर्णय निकलेगा। अतः ज्योतिष में भी अन्य विषयों की भांति आगे शोध एवं विकास की सम्भावनाएं हैं। और आज की परिस्थितियों में, आज के परिवेश में, आज की जीवन शैली तथा परिवर्तित समाज व परिवर्तित परिवेश मे पुराने और लकीर के फकीर सिद्धांत अन्धे होकर AS IT IS लागू नहीं किए जा सकते। अंधी रूढ़िवादिता का त्याग कर नए अध्ययनों, नए शोधों को औचित्य की कसौटी पर कसकर संशोधनों या समायोजनों का स्वागत करना चाहिए।

3.कर्मफल बन्धन व कार्य कारण सम्बन्ध

यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं आधारभूत तथ्य है। ज्योतिष के विरोधी हों या ज्योतिष के पक्षधर-दोनों को इन्हें तत्त्वतः समझना ही चाहिए तथा ज्योतिष से परे लौकिक या अलौकिक दृष्टि से जावन को देखनेवालों (संसारवादी या अध्यात्मवादी) के लिए भी यह जानना परमावश्यक है। क्योंकि ज्योतिष के ही नहीं समूचे जीवन तथा पुनर्जन्म व मोक्ष आदि के सम्बन्ध में भी यह ज्ञान अनेक उलझनों व प्रश्नों का स्पष्ट व सटीक समाधान कर सकता है। कर्म क्या है? और फल क्या है? किसी लक्ष्य की प्राप्ति या कामना के उद्देश्य से किया जाने वाला कार्य ही 'कर्म' है और कर्म का परिणाम ही 'फल' है। इस दृष्टि से क्रिया और कर्म में अन्तर है। क्रिया वह है जो स्वाभाविक रूप से (बिना कामना या लक्ष्य की प्राप्ति की इच्छा) होती है। जैसे पाचन, श्वसन, दिल का धड़कना आदि क्रियाएं हैं, न कि कर्म हैं। (पहली गलतफहमी तो यहीं से शुरू होती है कि हम अज्ञानवश क्रिया और कर्म को एक मान लेते हैं।) कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं-सुकर्म (अच्छे उद्देश्य के लिए), कुकर्म (बुरे उद्देश्य के लिए।) अथवा करने योग्य तथा न करने योग्य। और तीसरा है। विकर्म यानी उद्देश्यरहित कर्म। कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। हर कर्म का कोई न कोई फल या परिणाम अवश्य होता है। सुकर्म का अच्छा तो कुकर्म का बुरा । अथवा सुकर्म का सुख तो कुकर्म का दुख। या फिर सुकर्म का हितकारी और कुकर्म का अहितकारी। परन्तु जैसा भी हो-कर्म का फल अवश्य होता है। दूसरे शब्दों में कर्म सदा बन्धनकारी है। क्योंकि वह (भले या बुरे) परिणाम को भोगने के लिए कर्ता को प्रतिबन्धित कर देता है। फल या परिणाम भी अच्छे या बुरे दो प्रकार के हैं। इसके अलावा कालावधि की दृष्टि से कुछ फल तुरंत प्राप्त होते हैं तो कुछ फल कालान्तर में अपने कर्मों का परिपाक काल आने पर प्राप्तहोते है। पहले सद्यफलदायो (तुरंत फल देने वाले) और दूसरे कालान्तर में फलित होने वाले (परिपाक काल आने पर फल देने वाले)। यह कालान्तर या परिपाक काल आने पर प्राप्त होने वाले फल ही 'सञ्चित कर्म' अथवा 'भाग्य' भी कहे जाते हैं। इस प्रकार कर्म बीज है और भाग्य या परिणाम फल है। कर्मो द्वारा ही भाग्य निर्मित होता है। यह कर्म और फल निष्फल न होने से वह कर्ता को फल या भाग्य को भोगने के लिए प्रतिबन्धित कर देता है। उसे कर्ता को भोगना ही पड़ता है। यदि पूरे फल भोगे बिना (कर्मों का परिपाक काल आए बिना) ही कर्ता की आयु पूर्ण हो जाए और उसे शरीर छोड़ना पड़े तो उसका 'एकाउन्ट निल' नहीं हो जाता, बल्कि 'ड्यू' रहता है। परिणामतः कर्ता या जीव जब नया शरीर धारण करता है तब उसे उस जन्म में पूर्व कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इसी को जीव का दुर्भाग्य या सौभाग्य के साथ जन्म लेना कहते हैं। यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख, जिससे कर्म का बीज होना और फल या भाग्य को उत्पन्न करने वाला होना सिद्ध होता है।

v तस्वीर का दूसरा रुख देखने के लिए इस कर्मफल बन्धन के सिलसिले को आगे बढ़ाना होगा। आगे बढ़ाने पर हम जान सकेंगे कि कर्म तो भाग्य या फल को उत्पन्न करता है, परन्तु भाग्य या फल आगे नवीन कर्म को भी। उत्पन्न करता है। तभी श्रृंखला पूर्ण होती है। तभी कर्मफल बन्धन का चक्र जीव को आवागमन में उलझाए रखता है। बीज (कर्म) से फल (भाग्य) उत्पन्न होता है। परन्तु यह बीज कहां से आता है? यह आसमान से नहीं टपकता। यह फल (भाग्य) से ही उत्पन्न होता है। फल और फल से बीज अथवा कर्म से भाग्य और भाग्य से कर्म प्रेरित व उत्पन्न होते हैं। यह एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया या श्रृंखला है। मुर्गी से अंडा पैदा होगा तो अंडे से मुर्गी पैदा होगी । यह नहीं कहा जा सकता कि पहले मर्गी आई अंडार यह नहीं कहा जा सकता कि पहले बीज आया या फल यह नहीं कहा सकता कि पहले बीज आया या फल? यह नहीं कहा जा सकता कि पहले कर्म आया अथवा भाग्य। जैसे चक्र या वृत की परिधि पर STARTING POINT या ENDING POINT का निर्णय नहीं लिया जा सकता, वैसे ही कर्मफल के इस चक्र में प्रारम्भ कहां से हुआ, यह निर्णय नहीं किया जा सकता। अस्तु, ठीक वैसे ही जैसे-जन्म, मृत्यु, जन्म, मृत्यु, जन्म, मृत्यु के आवागमन चक्र में जहां से गणना आरम्भ करें वहीं से शुरूआत मानी जाएगी।

v यह कहना कि जीवन कर्म प्रधान है या भाग्य प्रधान है। अथवा जीवन में कर्म का अधिक महत्त्व है या भाग्य का अधिक महत्त्व है, सम्भव ही नहीं है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे से लिपटकर चलते हैं, उन्हें काटा नहीं जा सकता। गलतफ़हमी-फिर भी जो विद्वान कर्म को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं या जो भाग्य को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में समग्रदृष्टि वाले नहीं होते और तस्वीर का एक ही रुख देख रहे होते हैं। उस एक ही रुख को औरों के सामने रखकर वे पूरे समाज को दिशाभ्रमित करते हैं यह उनकी अल्पबुद्धि, अदूरदर्शिता व हठधर्मिता ही है। क्योंकि या तो वे दूसरा रुख देख नहीं पाते, या दूसरे रुख को नजरअंदाज करते हैं।या माया वश उसको प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि वह उनकी रुचि के अनुकूल नहीं होता या ईश्वर की इछा का प्रतिबंध । आपकी रुचि या दृष्टिकोण के अनुसार ही सत्य भी हो ऐसा जरूरी नहीं है। आपकी पसंद-नापसंद, मत या दृष्टिकोण अलग बात है और सत्य या वास्तविकता अलग बात। ध्यान रखें कि सत्य को अधूरा कहना भी असत्य बोलने के समान ही घातक, भ्रामक व अन्याय होता है। व्यक्ति अपने कर्मों के लिए भी पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। उसका भाग्य उसे विशेष प्रकार के ही कर्म करने के लिए प्रेरित व बाध्य करता है और वे किए गए कर्म विशेष उसे नए फल भोगने के लिए बाध्य कर देते हैं। नए फल को भोगने के लिए व्यक्ति फिर कुछ विशेष प्रकार के कर्म करने को प्रतिबन्धित हो जाता है। इस प्रकार भाग्य से कर्म और कर्म से भाग्य का यह सिलसिला शृंखलाबद्ध रूप से निरंतर चलता है। मृत्यु के बाद भी यह सिलसिला थमता नहीं (क्योंकि मृत्यु देह की होती है, जीव का नहा। और जीव को कुछ कर्मा के फल भोगने शेष रह जाते। फल उसे भाग्य बनकर नए जन्म में प्राप्त होते हैं। शेष फलों को भोगने के लिए ही उसे अगला जन्म लेना पड़ता है। यह बहीखाता जब तक NILL न हो जाए तब तक जीवआवागमन चक्र में फंसा रहता है। क्योंकि पुराने 'बैलेंस' को भोगने के लिए उसे नया शरीर धारण करना पड़ता है। लेकिन उस बैलेंस को भोगने के लिए उसे जो कर्म करने पड़ते हैं, वे उसका आगे बैलेंस 'ड्यू' कर देते हैं। खाता NILL नहीं हो पाता। मुक्ति या मोक्ष तभी सम्भव हो पाता है जब कर्मफल के बहीखाते में कुछ बैलेंस ड्यू' न रहे। जब खाता NILL हो जाए। इसके लिए ही कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा हठयोग-ये चार उपाय हैं। दूसरे शब्दों में 'योग' ही इसका मूल उपाय है। कर्मयोग-सुकर्म-कुकर्म/सत्कर्म/दुष्कर्म-सभी को तीसरे प्रकार के कर्म (विकर्म-जिसको प्रारम्भ में कहा था) बना देना ही 'कर्मयोग' है। यह कर्मफल बन्धन से मुक्ति का एक उपाय है, जिसे गीता में श्रीकृष्ण ने विस्तार से समझाया है। दरअसल फल के प्रति आसक्ति या विरक्ति ही कर्ता को कर्म तथा फल से बांधती है। क्योंकि कर्म किसी कामना या इच्छा (अच्छी या बुरी) के कारण किया जाता है और साथ में कर्त्ता का 'अहं' (मैं भाव) संयुक्त हो है। अतः फल की प्राप्ति पर सुख-दुख आदि बन्धन होते हैं। इसलिए निष्काम भाव से (बिना फल की इच्छा के) तथा समस्त कर्म ईश्वर को समर्पित करते हुए ('मैं' भाव हटाकर) करना ही कर्मयोग है और यही मुक्ति का उपाय भी है। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, कर्म-अकर्म, इच्छा-अनिच्छा, राग-द्वेष, सख- दुख, अपना-पराया, रुचि-अरुचि, अनुकूल-प्रतिकूल, मोह-घृणा, आसक्ति-विरक्ति सब भेद बुद्धि को समाप्त करके, कर्त्ता भाव (अहं) का समर्पण करके कर्म करते चले जाना ही कर्मयोगी का एकमात्र उद्देश्य हो जाता है और वह साक्षी भाव से जीता है। अत: नवीन कर्मों के फल से नहीं बंधता और पुराने फलों को भोगने में उसे हर्ष या पीड़ा नहीं होती।

v आपको ज्योतिष के प्रति अविश्वास हो या अंधविश्वास इस सम्बन्ध को जान लेने पर ही ज्योतिष को समझ पाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो पाएगी। अपने अविश्वास या अंधविश्वास को नष्ट करके ही ज्योतिष के प्रति आप विश्वास उत्पन्न कर पाएंगे। जिस प्रकार कर्म व फल का एक निश्चित सम्बन्ध है। उसी प्रकार कार्य और कारण में भी एक निश्चित सम्बन्ध है। जिस प्रकार कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसी प्रकार कोई भी कार्य कभी अकारण नहीं होता। हर कार्य के पीछे कोई-न- कोई कारण अवश्य ही विद्यमान होता है। (यह बात और है कि हम उस कारण को जान पाएं या नहीं।) जिन कार्यों के कारण हम जान नहीं पाते या हमारी सामर्थ्य/समझ से परे होते हैं, उन कार्यों या घटनाओं को हम 'संयोग' कह देते हैं। परन्तु वास्तव में सृष्टि का कोई भी कार्य क्योंकि अकारण नहीं होता, अतः सृष्टि में 'संयोग' नामक (BY CHANCE जैसी) कोई स्थिति नहीं होती। 'इत्तफ़ाक' से कुछ नहीं होता।। यही ब्रह्म की माया की प्रबलता है। इसी को अविद्या भी कहा जाता है। अपने सम्पूर्ण समर्पण द्वारा अथवा आत्म साक्षात्कार द्वारा जब मनुष्य को ज्ञान योग प्राप्त होता है तभी उसकी अविद्या दूर होती है। (इनमें कर्म योग व भक्ति योग अपर्ण समर्पण पर आधारित है तथा सांख्य/ज्ञानयोग एवं हठयोग आत्मसाक्षात्कार । पर आधारित हैं, यही ज्ञानोदय के मार्ग हैं। ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भांति तर जाएगा, क्योंकि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला नि:संदेह कोई और वस्तु ही नहीं है।) जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है।

v यहा एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि जानाग्नि कर्मों को भस्म कैसे करेगा? ज्ञान में ऐसी क्या विशेषता है ? ज्ञान हो जाने पर ही पता चल पाएगा कि कार्यों या घटनाओं के जिम्मेदार हम अथवा परिस्थितियां नहीं हैं। कर्मों के कर्ता भी हम नहीं हैं। हम तो मात्र निमित्त/माध्यम हैं। करवाने वाला तो कोई और है। उसकी नियति/विधान या PROGRAMME के अनुसार ही सब हो रहा है। यह ज्ञान होने पर ही 'अहं'/मैं भाव शनैः शनैः नष्ट हो जाएगा और जब को भाव ही न होगा तो कर्म या फल का बन्धन भी नहीं रहेगा। निष्कर्ष- कर्मफल बन्धन तथा कार्यकारण सम्बन्ध को समझ लेने से हमारी दृष्टि व्यापक होकर समग्रता की ओर बढ़ती है। हम 'कूपमण्डूक' नहीं रहते हैं। अत: ज्योतिष जैसे गूढ़, विराट और आध्यात्मिकता से जुड़े विषय को ही नहीं इसी प्रकार के अन्य गहन विषयों को समझ पाने की हमारी क्षमता बढ़ती है और ज्योतिष तो विशेषकर कार्य-कारण सम्बन्ध व कर्मफल चक्र पर आधारित है। अत: इन दोनों को जाने बिना ज्योतिष को तत्त्वत: जाना ही नहीं जा सकता। फिर भी स्वत: अनुभूत करके ज्ञान प्राप्त करना सभी को सम्भव नहीं है।

v . पूर्वाग्रह या हठधर्मिता-'पूर्वाग्रह' का अर्थ है पहले से ही किसी विषय अपना आग्रह' या निर्णय रखना और हठधर्मिता का अर्थ है तकशास्त्रवन्याय की कसौटियों पर कसे जाने पर अपना निर्णय आग्रह/मत यदि अनुचित, गलत निराधार या भ्रामक सिद्ध होता हो, तब भी उस पर अड़े रहना। हठधर्मा और पूर्वाग्रही पक्षपाती होता है। सत्य की प्राप्ति के लिए निष्पक्षता के साथ, सजगत के साथ सभी आग्रहों से मुक्त होकर विश्लेषण अनिवार्य है। उचित को स्वीकारने के लिए (भले ही वह अपने मत से विपरीत हो) तथा अनुचित को त्यागने के लिए (भले ही वह अपने मत के अनुकूल हो) दोषों को सुधारने के लिए और सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु को सभी संकोच, सभी आग्रह, सभी हठ तथा अहं त्यागकर प्रयासशील रहना ही चाहिए। तभी प्रगति सम्भव है। अन्यथा प्रगति के सभी विकल्प हम स्वयं बन्द कर लेते हैं।

v जानना और मानना दो अलग-अलग बातें हैं। जानने के बाद मानना, या जाने बिना मानना (अथवा मानते हुए भी न जानना) भी दो अलग-अलग बातें हैं। पूर्वाग्रही मात्र मानता है, जानता नहीं है और हठधर्मी जो मानता है उसे जानना ही नहीं चाहता। इस प्रकार वह मिथ्याभास/गलतफहमी में जीता है। उसी में संतुष्ट भी रहता है और उससे बाहर निकलना भी नहीं चाहता। अतः ऐसे व्यक्ति के उद्धार, प्रगति या सत्य को साक्षात् कर पाने को कोई मार्ग नहीं होता। ऐसे ही 'जडबुद्धि' । के लिए कहा गया है--मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिले विरंचि सम। (यदि ब्रह्मा के समान गुरु मिल भी जाएं तो भी मूर्ख हृदय में चेतना उत्पन्न नहीं होती। वह जागता नहीं।)

v यहां एक विचारणीय प्रश्न है कि उचित/अनुचित का निर्णय कौन करेगा? सत्य असत्य का निर्णय कौन करेगा? दो पक्ष यदि एक विषय पर विपरीत मत रखते हैं और एक-दूसरे के मत को स्वीकारने या अपने मत को त्यागने को तैयार नहीं होते तो दोनों पक्षों में सही कौन है और गलत कौन? यह निर्णय कैसे होगा? दोनों ही स्वयं को उचित मानेंगे, उचित सिद्ध करने का प्रयास करेंगे और दसरे को अनुचित ठहराते हुए उस पर पूर्वाग्रही या हठधर्मी होने का आरोप लगाएंगे। ऐसे में सत्य का निर्णय कौन करेगा? हर पक्ष स्वयं को 'ब्रह्मा' और दूसरे को जड़बुद्धि' मानेगा। स्वयं को सही और दूसरे को गलत ठहराएगा।

v इस प्रश्न का बड़ा सीधा-सा उत्तर है और यही इस समस्या का एकमात्र व सर्वथा उचित समाधान भी है। जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को। (यानी उसे सफलता, चरम लक्ष्य की प्राति और आनन्द तीनों ही नहीं मिलते। सरल शब्दों में वह न इधर का रहता है, न ही उधर का बल्कि किधर का भी नहीं रहता।) तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ अर्थात् इसलिए तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में (क्या करें, क्या न करें? या क्या उचित है, क्या अनुचित?) शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।

v अतः स्पष्ट है कि कौन सही है, कौन गलत? या क्या उचित है, क्या अनुचित? इस मामले में शास्त्र ही मात्र प्रमाण है। जिस पक्ष का मत शास्त्रसम्मत है, उसी को सही माना जाना चाहिए। विवाद करने वाले सभी पक्ष गलत तो हो सकते हैं। परन्तु सही यदि होगा तो एक ही होगा। वह एक वो होगा जो शास्त्र- सम्मत होगा।

v विशेष-फिर भी यहा अंधता नहीं सजगता भी चाहिए। ऐसा न हो कि आदमी 'लकीर का फकीर' हो जाए जैसा कि आमतौर पर बहुत से शास्त्रज्ञ हो जाते हैं। जब तक मोहग्रस्त है तब तक तत्त्वदर्शी ज्ञान योगी, यानी जो जैसा है उसे वैसा ही देखने/जानने वाला नहीं हो सकता। बुद्धि जब एक मत (परमतत्त्वाशास्त्रोक्त सत्य) पर अचल/स्थिर हो जाएगी (ठहर जाएगी) तब तू योग (परमबुद्धि) को प्राप्त हो जाएगा। (यानी जब तेरी बुद्धि के संशय/भ्रम या असमंजसता समाप्त हो जाएगी तब एक निश्चित मत पर स्थिर हो जाएगा। जब तक MIND में कॉन्सेप्ट क्लीयर नहीं होगा तब तक तू प्रगति । नहीं कर सकता, दुविधाग्रस्त ही रहेगा।)

v निष्कर्ष-अतः जाने बिना मानना (अंधविश्वास) तथा जाने बिना न मानना (अविश्वास) दोनों ही घातक है। किन्तु जानने के लिए सर्वप्रथम पूर्वाग्रह और हठधर्मिता को त्यागना होगा। तभी तो जिज्ञासा होगी और तभी ज्ञान प्राप्ति की। सम्भावनाएं उत्पन्न होंगी। ज्ञान प्राप्ति के तीन ही सुलभ मार्ग हैं-अपना अनुभव/प्रकृति (NATURE)/ ऑब्जर्वेशन । उपदेश या पुस्तकें (गुरु या सीनियर/ज्ञानी की शरण में जाना) तथा आत्मसाक्षात्कार/योग । इन तीनों में भी जो अन्तिम है, वह अत्यंत कठिन है।

v पहला अपेक्षाकृत कम कठिन है परन्तु दूसरा (उपदेश/पुस्तक/गुरु/ज्ञानी की शरण में जाना) अपेक्षाकृत आसान ह। किन्तु इस आसान मार्ग पर भी तभी चला जा सकता। है जब व्यक्ति पूर्वाग्रह तथा हठधर्मिता को छोड़कर ईमानदारी/निष्पक्षता, सरल । हृदयता/निष्कपटता और जिज्ञासा पूर्ति (न कि तकरार करने या सामने वाले को। एग्जामिन करने के उद्देश्य से जाए और समर्पण का भाव न रखे। समर्पण का भाव न रहन से भी गुरु कृपा प्राप्त नहीं होती।

v जो ज्योतिष या अन्य किसी भी विषय या शास्त्र के 'पण्डित' होने के भ्रम में जीते हैं और बस 'लकीर के फकीर' वनकर रह जाते हैं।, जिन्हें गीता या अन्य शास्त्रों के बहुत से श्लोक कंठस्थ हैं। वे गाहे-ब- गाहे उनको सुनाकर अल्पज्ञों पर अपना पांडित्य झाड़कर गर्वित भी होते हैं, किन्तु तत्त्वदर्शी नहीं हैं। भावार्थ या गूढार्थ पर विचार न करके शब्दार्थ में ही अटक जाते हैं और फिर बाल की खाल निकालकर सत्य को झुठलाने का प्रयास करते हैं। सूत्रों/श्लोकों का कंठस्थ होना अच्छी बात है। परन्तु तभी जब उसके तत्त्व को हम समझते भी हों और उन्हें जीवन में उतारने की चेष्टा भी करते हों। अन्यथा । रटने के मामले में तोता और भी बेहतर है। मात्र आंकड़ों को स्मरण ही रखना हो। तो कम्प्यूटर आदमी से कहीं श्रेष्ठ है। यदि उनका अर्थ और प्रयोग न आता हो तो मात्र रट लेने का कुछ लाभ नहीं।

v ज्ञान पुस्तकों में दबा हो या दिमाग में, पुस्तकें पड़ी हों तो वैसे ही हैं, जैसे लाइब्रेरी में पड़ी हों या गधे की पीठ पर लदी हों। तब तो मात्र व्यक्ति पुस्तकों का बोझ ही ढोता है। बोझ पुस्तक का हो या लकड़ियों का, कोई अन्तर नहीं है। अतः अधिकाधिक शास्त्र पढ़ना या उन्हें कंठस्थ कर लेना लाभप्रद नहीं, बल्कि पढ़े हुए को वास्तव में समझ लेना और उसे अमल में लाना लाभप्रद है। हमारे गुरु आश्रम मे एक प्रश्न लिखा था की – “कितने किलो पढ़ाई कीपुस्तक मे शब्दो को न पढ़ कर लेखक के द्र्स्तिकोण को अनुभूत करे यही पुस्तक की आत्मा को समझना कहा गया है न की केवल पुस्तक को चाट कर रखने से

v इसके लिए आवश्यक है कि हम लेखक के हृदय को समझें। हम शब्द के मर्म को समझें। हम पढ़े हुए को विचारें, मंथन करें। न समझ में आने वाले भाग। को और भी जागरूकता से बार-बार पढ़ें, अपने से अधिक विद्वान की सहायता लें। प्राप्त निर्णय या तथ्यों को शास्त्रों की कसौटी पर कसें । इस प्रकार तत्त्व को जानें और। फिर विश्वासपूर्वक उसे प्रयोग में लाएं।

v शब्द एक ही होता है, परन्तु उसके अर्थ अनेक होते हैं। कहां और कौन-सा। अर्थ युक्तिसंगत होगा, इसे तय करने के लिए अपनी सामान्य बुद्धि, सजगता व ज्ञान की ही नहीं, विषय/पुस्तक की आत्मा और लेखक के हृदय तथा दृष्टिकोण को भी दिमाग में रखना आवश्यक है। अन्यथा अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है। शब्द में शक्ति होती है। शक्ति के विस्फोट से अर्थ प्रस्फुटित होता है। लक्षणा शक्ति, अभिव्यंजना शक्ति आदि अनेक शक्तियां अर्थशक्ति के साथ छिपी रहती हैं। शब्द का शब्दार्थ, भावार्थ, गूढार्थ, प्रचलित अर्थ, पर्याय अर्थ, प्रासंगिक अर्थ आदि अनेक अर्थ शब्द में निहित रहते हैं। अतः शब्द को सरसरी तौर पर देखने या पढ़ने से बात नहीं बनती।

v अतः पढ़ने वाले को तथ्य समझने के लिए पूर्ण सजगता आवश्यक है। अन्यथा वह पढ़ेगा ज़रूर, पर समझेगा नहीं। निष्कर्ष-कम से कम गूढ विषयों को तो विशेष सजगता और सावधानी से। पढ़ना चाहिए। शब्द के एक-एक अर्थ को विचारकर पढ़ना चाहिए। विषय की आत्मा तथा लेखक के दृष्टिकोण को समझकर उनके साथ साहचर्य बनाकर पढ़ना चाहिए (इसके लिए पुस्तक की भूमिका/प्रस्तावना/आमुख को पहले ज़रूर पढ़ें ताकि विषय और लेखक के दृष्टिकोण व स्तर के साथ पुस्तक की विषयवस्तु या पठनीय सामग्री का भी पूर्ण अनुमान हो सके)। भले ही बार-बार पढ़ना पढ़े लेकिन पढ़े हुए को समझना चाहिए। अर्थ का मंथन करना चाहिए। औचित्य की कसौटियों पर कसना चाहिए और तब उसे अमल में लाना चाहिए। पढ़ते समय आपका दृष्टिकोण नकारात्मक या खण्डनात्मक न हो, बल्कि सकारात्मक तथा सीखने वाला हो, पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। तभी आप पुस्तक के प्रति और स्वयं अपने प्रति भी न्याय कर पाएंगे। पुराना है इसलिए बेकार है, या पुराना है इसलिए काम का है?-किसी विषय, वस्तु, ज्ञान अथवा सिद्धांत को मात्र उसकी पुरातनता के आधार पर नहीं अपना लेना चाहिए और न ही मात्र उसके प्राचीन होने के कारण उसे त्याग देना चाहिए। यदि हम मात्र परम्परा या प्राचीनता के आधार पर ऐसा करेंगे तो यह हमारे 'पढ़े-लिखे बेवकूफ़' होने का खुला सबूत होगा। कहावत है कि OLD IS GOLD लेकिन साथ में यह भी ध्यान रखिए- 'NOT ALWAYS' (यानी जो पुराना है वह मूल्यवान है, परन्तु हमेशा नहीं) या ALL THAT GLITTERS IS NOT GOLD । हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती' अत: यह भी मान लेना मूर्खता ही होगी कि हर नई वस्तु सोना ही होगी/मूल्यवान ही होगी। मूल्य या महत्त्व का आधार उसकी उपयोगिता और औचित्य है न कि उसका पुराना या नया होना।

v अगर हमारे पूर्वज कुछ गलत करते रहे हैं तो इसी आधार पर हम भी गलत को नहीं अपना सकते कि हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते रहे हैं। इसी प्रकार यदि कोई नई प्रणाली या नया नियम निकम्मा साबित हो रहा है तो भी मात्र उसके आधुनिक या नवीन होने के कारण ही उसका स्वागत भी नहीं किया जा सकता। सतर्क एवं निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद जो उपयोगी व उचित सिद्ध हो वही अपनाए जाने योग्य है। भले ही वह परम्परागत/प्राचीन हो अथवा नूतन/आधुनिक जैसा पहले भी कहा है कि अन्धा विरोध या अन्धा समर्थन दोनों मूर्खता है। दोनों हठधर्मिता है। सजगता प्राथमिकता है। यदि हम परम्परा की ही टांग पकड़कर लटकते तो बस लटके ही रहते। अरस्तु से गैलिलियो, गैलिलियो से न्यूटन और न्यूटन से आईस्टीन तक हमारे सिद्धांत व दृष्टिकोण विकसित न हुए होते अतः अन्धानुकरण से बचिए। भले ही वह परम्पराओं का हो, भले ही वह आधुनिकता का हो। इस प्रकार बिना कारण को जाने, बिना औचित्य को समझे एक परम्परा आरम्भ हो जाएगी। सच है ! हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे। उन्होंने तब की परिस्थितियों के अनुसार जो उचित और सुविधाजनक था वो किया। मगर हम अवश्य मूर्ख हैं जो आज की परिस्थितियों में तोले बिना किसी परम्परा को मात्र पूर्वजों के किए जाने के कारण अपनाते हैं।

v निष्कर्ष-विकास या प्रगति एक यात्रा है, एक सिलसिला है। बहुत कुछ पुराना छूटता जाता है और नया जुड़ता जाता है। पुराने में जो आज भी उपयोगी और काम का है, मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण है उसे सहेज लिया जाता है, अनावश्यक कडे को छोड़ देते हैं। इसी प्रकार नए में भी उसे ही ग्रहण किया जाता है जो उपयोगी, मूल्यवान, महत्त्वपूर्ण और उचित है। बेकार या अनावश्यक को साथ में लादा नहीं जाता। यही समझदारी है।

वैदिक ज्योतिष विद्याओं की जानकारी

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है किंतु वास्तविकता  परखने  पर ही प्रकट  होती है ।

ज्योतिषमान जागृत जगत की एक ज्योति का नाम ही जीवन है। ज्योति का पर्याय ज्योतिष है अथवा ज्योतिस्वरूप ब्रह्म की व्याख्या का नाम ज्योतिष है। वेदरूप ज्योतिष ब्रह्मरूप ज्योति का ज्योतिष है जिसका द्वितीय नाम संवत्कर ब्रह्म या महाकाल है।

ब्रह्म सृष्टि के मूल बीजाक्षरों या मूल अनन्त कलाओं को एक-एक कर जानना वैदिक दार्शनिक ज्योतिष कहा जाता है। इसका दूसरा स्वरूप लौकिक ज्योतिष है जिसे खगोलीय या ब्रह्माण्डीय़ ज्योतिष कहा जाता है। व्यक्त या अव्यक्त इन दोनों के आकार, दोनों की कलायें एक समान हैं। वैदिक दर्शन के लिए यह वेदांगी ज्योतिष दर्शन सूर्य के समान प्रकाश देने का काम करता है इसी कारण इसे ब्रह्मपुरुष का चक्षु कहा गया है।

ज्योतिषशास्त्र की व्युत्पत्ति ‘‘ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम’’ की गई है। अर्थात् सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिषशास्त्र कहा जाता है । भारतीय ज्योतिषशास्त्र की परिभाषा के स्कन्ध-त्रय-होरा, सिद्धान्त और संहिता अथवा स्कन्ध पंच होरा, सिद्धान्त, संहिता, प्रश्न और शकुन ये अंग माने गये हैं।

यदि विराट पंचस्कन्धात्मक परिभाषा का विश्लेषण किया जाये तो आज का मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, पदार्थ विज्ञान, रसायन विज्ञान एवं चिकित्साशास्त्र इत्यादि इसी के अन्तर्भूत हो जाते हैं। बिना आँख के जैसे दृश्य जगत का दर्शन असम्भव है वैसे ही ज्योतिष के बिना ज्ञान के विश्वकोश वेद भगवान् का दर्शन भी असम्भव है।

सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा।का उद्घोष करने वाले वेद ने भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वप्रथम संस्कृति माना है। यदि हम इस प्राचीनतम श्रेष्ठ संस्कृति से पुनः जुड़ना चाहते हैं तो हमें ज्योतिष का ज्ञान अनिवार्य रूप से प्राप्त करना होगा। हमें हमारी संस्कृति से जोड़ने का सेतु ज्योतिष ही है। यदि हमारे सभी देशवासी अपनी संस्कृति से जुड़ गये तो धरती पर देवत्व का अवतरण करके रहेंगे।

ज्योतिष ज्ञान सबका मंगल करे। विकृत मान्यताओं से उबारे।

॥तमसो मां जोतिर गमय॥

ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों का प्रभाव

फलित ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शब्द का यौगिक अर्थ ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखनेवाली विद्या है। इस शब्द से यद्यपि गणित (सिद्धांत) ज्योतिष का भी बोध होता है, तथापि साधारण लोग ज्योतिष विद्या से फलित विद्या का अर्थ ही लेते हैं।

ग्रहों तथा तारों के रंग भिन्न-भिन्न प्रकार के दिखलाई पड़ते हैं, अतएव उनसे निकलनेवाली किरणों के भी भिन्न भिन्न प्रभाव हैं। इन्हीं किरणों के प्रभाव का भारत, बैबीलोनिया, खल्डिया, यूनान, मिस्र तथा चीन आदि देशों के विद्वानों ने प्राचीन काल से अध्ययन करके ग्रहों तथा तारों का स्वभाव ज्ञात किया। पृथ्वी सौर मंडल का एक ग्रह है। अतएव इसपर तथा इसके निवासियों पर मुख्यतया सूर्य तथा सौर मंडल के ग्रहों और चंद्रमा का ही विशेष प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी विशेष कक्षा में चलती है जिसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। पृथ्वी के निवासियों को सूर्य इसी में चलता दिखलाई पड़ता है। इस कक्षा के इर्द गिर्द कुछ तारामंडल हैं, जिन्हें राशियाँ कहते हैं। इनकी संख्या 12 है। इन्हें, मेष, वृष आदि कहते हैं। प्राचीन काल में इनके नाम इनकी विशेष प्रकार की किरणें निकलती हैं, अत: इनका भी पृथ्वी तथा इसके निवासियों पर प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक र

ाशि 30 की होती है। मेष राशि का प्रारंभ विषुवत् तथा क्रांतिवृत्त के संपातबिंदु से होता है। अयन की गति के कारण यह बिंदु स्थिर नहीं है। पाश्चात्य ज्योतिष में विषुवत् तथा क्रातिवृत्त के वर्तमान संपात को आरंभबिंदु मानकर, 30-30 अंश की 12 राशियों की कल्पना की जाती है। भारतीय ज्योतिष में सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु ही मेष आदि की गणना की जाती है। इस प्रकार पाश्चात्य गणनाप्रणाली तथा भारतीय गणनाप्रणाली में लगभग 23 अंशों का अंतर पड़ जाता है। भारतीय प्रणाली निरयण प्रणाली है। फलित के विद्वानों का मत है कि इससे फलित में अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि इस विद्या के लिये विभिन्न देशों के विद्वानों ने ग्रहों तथा तारों के प्रभावों का अध्ययन अपनी अपनी गणनाप्रणाली से किया है। भारत में 12 राशियों के 27 विभाग किए गए हैं, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। ये हैं अश्विनी, भरणी आदि। फल के विचार के लिये चंद्रमा के नक्षत्र का विशेष उपयोग किया जाता है।क्या ग्रह निश्चित करते हैं हमारा भविष्य ?

आकाश मण्डल में बहुत से ग्रह हैं मगर ज्योतिष शास्त्र में सात ग्रह व दो छाया ग्रहों का ही उल्लेख मिलता है और यही ग्रह हमारे जीवन को जन्म लग्न की स्थितिनुसार फल देते हैं। मान्यता है कि किसी भी जातक का जीवन नव ग्रहों के शुभ और अशुभ फलों के प्रभाव पर ही निर्भर करता है। कुंडली में नव ग्रहों की  स्थिति के अनुरूप ही मानव जीवन में आने वाले सुख-दुख, खुशी-गम, सफलता-असफलता देते हैं। क्या वास्तव में सभी ग्रह हमारी राशि के अनुसार फल प्रदान करते हैं?

इस संसार में हरेक वस्तु चाहे वह ग्रह हो, पेड़-पौधे हो, मानव हो, खनिज तत्व हो। सब अपनी-अपनी तरंगों से एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। हम निश्चय रूप से केवल नवग्रहों से ही नहीं संपूर्ण तारामंडल से प्रभावित होते हैं नवग्रह तो ब्रह्मांड का कुछ प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है। तो क्या ये सब हमारे भविष्य को प्रभावित करते हैं, र्निमित करते हैं ?

अगर आपकी शारीरिक-मानसिक क्षमताएं अपनी गलत धारणाओं और आहार-विहार से कमजोर हो गई है तो आप निश्चय ही इससे प्रभावित होते हैं। क्या ग्रहों के प्रभाव से बच सकते हैं ?

हम सभी जानते हैं कि जब हम कमजोर होते हैं तो गर्मी, सर्दी, बरसात, कोलाहल हल्की आवाजें भी हमसे सहन नहीं होती। जब हम मजबूत होते हैं तो इन सब को लंबे समय तक झेल सकते हैं। अगर आप प्राकृतिक आहार-विहार, योग-ध्यान, रेकी, तनाव रहित जीवन से या सकारात्मक धारणाओं से अपने आपको सशक्त रखते हैं तो ग्रहों के कोई भी प्रभाव आपको विचलित नहीं करते आपको पता भी नहीं चलता कि कौन-सा ग्रह कब आया और कब गया, कौन सा मौसम कब आया कब गया, क्योंकि आपके अपने शरीर मन में कोई परिवर्तन नहीं आता।

ज्योतिषशास्त्र का इतिहास

दिए हुए दिन, समय और स्थान के अनुसार ग्रहों की स्थिति की जानकारी और आकाशीय तथा पृथ्वी की घटनाओं के बीच संबंध स्थापित करना ज्योतिष विज्ञान है। ये विन्यास फिर उस परिप्रेक्ष्य में देखे जाते हैं। एक विषय के रूप में ज्योतिष की जड़ें ब्रह्मा जी (भारतीय धर्म के रचयिता) से जुड़ी हुई हैं। गर्ग ऋषि के अनुसार ब्रह्माजी ने उन्हें आम लोगों तक इसे प्रचारित करने को कहा था। वर्तमान में यह ज्योतिषी, ज्योतिष, खगोल विज्ञान और खगोल वैज्ञानिक सबको एक ही माना जाता है।

प्राचीन काल में विज्ञान और ज्योतिष के अध्ययन पर पुजारियों का एकाधिकार था। ज्योतिष को दैनिक आवश्यकताओं और लाभ के लिए योजनाबद्ध किया गया था और उनका एक सफल साम्राज्य चल रहा था। ज्योतिषों को खगोल वैज्ञानिक माना जाता था और सितारों की गणना में कुशल होने के कारण उनका परामर्श लिया जाता था। बाद में वे आधिकारिक पुजारी बन गए और किसी विशेष देवता की पूजा, नौवहन और कृषि की गतिविधियों से जुड़ गए। कुछ हद तक यह बताता है कि ज्योतिष क्यों देवतुल्य विज्ञान माना जाने लगा और आम लोगों की पहुंच से दूर हो गया। वर्तमान में सितारों के लिए घटनाओं की पूर्व सूचना देना अभी भी समय के गर्भ में है।

ज्योतिष अब लोगों के लिए अधिक सुलभ बन गया है और इसके रहस्य अब गूढ़ नहीं रह गए। ज्योतिष को अपनी मातृभाषा में पढ़ना सरल होता है। शास्त्रीय भाषाओं में अपेक्षित प्रवीणता नहीं रह गई है। सही समय और कैलेंडर आम आदमी के दायरे में आ गया है।

ज्योतिष और तंत्र मंत्र विज्ञान (दोनों अक्सर एक साथ समान गलती) अपने चारों ओर रहस्य का एक निश्चित दायरे से घिरा हुआ है और यह व्यक्ति को रहस्य की गहराई की ओर आकर्षित करता है। आदमी अपने सवालों के जवाब के लिए आकाश की ओर देखता है, जैसे-पूजा का शुद्ध रूप क्या है, बीज बोने का सही समय, समुद्र में कब जाने पर जोखिम कम है आदि। धीरे धीरे, इन सवालों के जवाब देनेवाले व्यक्ति को समाज में बहुत महत्व दिया जाने लग और इसके फलस्वरूप वे समाज के नीति निर्माता बन बैठे।

यूनानी, रोमन, पारसी, मिस्र निवासी, सुमेरी, अरब के लोग और भारतीय आदि के विरासत में छोड़े हुए पौराणिक किस्से, कहावतें और पुरातात्विक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन काल के लोग ज्योतिष के प्रति बहुत अधिक आकर्षित थे। उस समय कई बार जब लोग प्रकृति के रहस्यों की थाह लगाने में असमर्थ होते थे तब उसे भाग्यवादी रंग दे देते थे। अतीत में महामारी का कारण बननेवाले कीटाणु, विषाणु रोधक टीकाकरण के इस आधुनिक चिकत्सीय युग तक लोगों के पास कोई संसाधन नहीं था और राहत के लिए वे ज्योतिष पर निर्भर थे। किसी भी अवर्णनीय घटना को दैविक रंग में रंग दिया जाता था और इसे दैविक इच्छा मान लिया जाता था। उदहारण के तौर पर चेचक एक बहुत ही सामान्य बीमारी है जिसे शीतला माता का प्रकोप माना जाता था। अब यह एक टीका रोधी बीमारी है। लेकिन अगर कोई इस बीमारी से ग्रस्त होता है तो वह डॉक्टर से परामर्श करने के साथ ही सभी आवश्यक पारंपरिक रिवाज पूरे करता है।

हालांकि सभी ने कहा और किया कि ज्योतिष ज्ञान की एक शाखा है और रहेगी, जो हमेशा मनुष्य को और अधिक जानने के लिए लुभाती रहेगी। जो इसकी गहराई में जितना ज्यादा उतरेगा, इसके प्रति उसकी भूख उतनी ही बढ़ती जाएगी। अगस्त और वशिष्ठ जैसे मुनियों द्वारा संकलित किए गए ग्रन्थ जैसे पञ्च सिद्धांत कोष, सूर्य सिद्धांत, नित्यानन्द, बृहत् जातक, आर्यभट्ट, भृगु संहिता, मानसागरी, रणवीर और लघु पराशर की वैज्ञानिक और प्रमाणिक बातें आज भी लोगों को पढ़ने के लिए आकर्षित करती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि निनेवेह और बेबीलोन के प्रारंभिक ज्योतिषों की ५०० साल पुरानी मिट्टी की गोलियां आज भी ब्रिटेन के संग्रहालय में देखी जा सकती हैं।

ग्रीक में का जन्म के समय पर आधारित कुंडली है जो वित्त, परिवार, भाग्य और भविष्य की जानकारी देती है। इस तरह की भोजपत्र पर लिखी २००० साल पुरानी एक यूनानी कुंडली ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित है।

प्राचीन मिस्र में उच्च श्रेणी के ज्योतिष हुआ करते थे. प्राचीन मिस्र के फ़राओ ज्योतिषों से सिंहासन के दावेदारों के बारे में सलाह करते थे जिसे बाद में मरवा डालते थे।

चीन में शासक का दावा करनेवाले को ज्योतिष का ज्ञान होना आवश्यक था। 2513 ईसा पूर्व में चिउनी इसी तरह राजा बना था।

यहां तक कि सिकंदर महान अपने सभी अभियान पर ज्योतिष भी साथ लेकर चलता था। वह जिस देश में हमला करता था वहां की ज्योतिष परम्पराओं को अपना लेता था।

इस तरह सभी देशों को ज्योतिष का श्रेय दिया जाता है। हालांकि इसके प्राचीन गौरव और सफलता के बावजूद वैज्ञानिकों की निरंतर चल रही खोज ने ज्योतिषों को भविष्यवेत्ता में बदल दिया। ज्योतिष के किसी भी विद्यालय को अंतिम शब्द का अधिकार नहीं है और किसी भी दो ज्योतिष के विचार एक नहीं हो सकते। यह संभावना के सिद्धांत पर अधिक निर्भर करता है। इसके अलावा शायद ही कोई संचालक निकाय होगी जो बाल की खाल निकालेगी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि झूठे लोग लोगों को ठगते हैं।

सभी ने कहा और किया, ज्योतिष अनिश्चित जीवन के तीर से घिर लोगों को आश्वासन की एक निश्चित राशि प्रदान करता है। यह उन्हें उनकी समस्याएं समाप्त हो जाने की आशा देता है और उन्हें जीवन की कठिनाइयों के साथ जीने का आत्मविश्वास प्रदान करता है।

PLANETS AS MENTIONED IN SCRIPTURES...

Planets were being worshipped by the Hindus since vedic culture. Purusha sukta, Navagraha sukta and Nakshatra sukta stand as examples to this.

भूरिति वा अयं लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः। मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लॊका महीयन्ते। भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चंद्रमाः। चंद्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतिषि महीयन्ते। अनुवाक ५, शिक्षावल्लि, तैत्तरीयॊपनिषत् "Bhu is this world; Bhuva is the sky, Suva, the other world and Maha the sun, because by the sun all the worlds ae nourished. Bhu is fire, Bhuva the air, Suva the sun and Maha the moon. Verily by the moon are all the luminaries maintained." - Anuvaka 5, Shikshavalli, Taittariyopanishad

Bhagawadgeeta, cream of all vedas and upanishads makes reference to the planets several times. यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेखिलम्। यच्चंद्रमसि यच्चाग्नौतत्तेजो विद्धि मामकम्॥ ---श्लोक १२, पुरुषोत्तम योग, श्रीमद्भगवद्गीत "I am the light in sun, moon and fire." -sloka 12, Purushottamaprapti yoga.

In Islam planets are regarded as the objects that glorify the Creator. See ye not How God has created The seven heavens one above another And made the moon A light in their midst And made the sun As a (glorious) lamp. -Ayat 15,16-sura 71.(Holy Qur'an). Sura 91 Shams (sun) begins with description of sun and moon.

Though there are no mention of planets either as Gods or the objects that glorify the Creator in old and new testaments, the Book of Solomon contains reference to planets but this Book is not recognized as a part of official Bible.

ज्‍योतिष के मुख्‍य दो विभाग हैं - गणित और फलित। गणित के अन्दर मुख्‍य रूप से जन्‍म कुण्‍डली बनाना आता है। इसमें समय और स्‍थान के हिसाब से ग्रहों की स्थिति की गणना की जाती है। दूसरी ओर, फलित विभाग में उन गणनाओं के आधार पर भविष्‍यफल बताया जाता है। इस शृंखला में हम ज्‍यो‍तिष के गणित वाले हिस्से की चर्चा बाद में करेंगे और पहले फलित ज्‍योतिष पर ध्यान लगाएंगे। किसी बच्चे के जन्म के समय अन्तरिक्ष में ग्रहों की स्थिति का एक नक्शा बनाकर रख लिया जाता है इस नक्शे केा जन्म कुण्डली कहते हैं। आजकल बाज़ार में बहुत-से कम्‍प्‍यूटर सॉफ़्टवेयर उपलब्‍ध हैं और उन्‍हे जन्‍म कुण्‍डली निर्माण और अन्‍य गणनाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

पूरी ज्‍योतिष नौ ग्रहों, बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह भावों पर टिकी हुई है। सारे भविष्‍यफल का मूल आधार इनका आपस में संयोग है। नौ ग्रह इस प्रकार हैं -

ग्रह अन्‍य नाम अंग्रेजी नाम

सूर्य रवि सन

चंद्र सोम मून

मंगल कुज मार्स

बुध मरकरी

गुरू बृहस्‍पति ज्‍यूपिटर

शुक्र भार्गव वीनस

शनि मंद सैटर्न

राहु नॉर्थ नोड

केतु साउथ नोड

आधुनिक खगोल विज्ञान (एस्‍ट्रोनॉमी) के हिसाब से सूर्य तारा और चन्‍द्रमा उपग्रह है, लेकिन भारतीय ज्‍योतिष में इन्‍हें ग्रहों में शामिल किया गया है। राहु और केतु गणितीय बिन्‍दु मात्र हैं और इन्‍हें भी भारतीय ज्‍योतिष में ग्रह का दर्जा हासिल है।

भारतीय ज्‍योतिष पृथ्‍वी को केन्द्र में मानकर चलती है। राशिचक्र वह वृत्त है जिसपर नौ ग्रह घूमते हुए मालूम होते हैं। इस राशिचक्र को अगर बारह भागों में बांटा जाये, तो हर एक भाग को एक राशि कहते हैं। इन बारह राशियों के नाम हैं- मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्‍या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन। इसी तरह जब राशिचक्र को सत्‍ताईस भागों में बांटा जाता है, तब हर एक भाग को नक्षत्र कहते हैं। हम नक्षत्रों की चर्चा आने वाले समय में करेंगे।

एक वृत्त को गणित में 360 कलाओं (डिग्री) में बाँटा जाता है। इसलिए एक राशि, जो राशिचक्र का बारहवाँ भाग है, 30 कलाओं की हुई। फ़िलहाल ज़्यादा गणित में जाने की बजाय बस इतना जानना काफी होगा कि हर राशि 30 कलाओं की होती है।

हर राशि का मालिक एक ग्रह होता है जो इस प्रकार हैं -

राशि अंग्रेजी नाम मालिक ग्रह

मेष एरीज़ मंगल

वृषभ टॉरस शुक्र

मिथुन जैमिनी बुध

कर्क कैंसर चन्द्र

सिंह लियो सूर्य

कन्या वरगो बुध

तुला लिबरा शुक्र

वृश्चिक स्कॉर्पियो मंगल

धनु सैजीटेरियस गुरू

मकर कैप्रीकॉर्न शनि

कुम्भ एक्वेरियस शनि

मीन पाइसेज़ गुरू

इस अध्याय में बस यहीं तक। लेख के अगले क्रम में जानेंगे कि राशि व ग्रहों के क्‍या स्‍वाभाव हैं और उन्हें भविष्‍यकथन के लिए कैसे उपयोग किया जा सकता

पिछले अध्याय में हमनें राशि, ग्रह एवं राशि स्‍वामियों के बारे में जाना। वह अत्‍यन्‍त ही महत्‍वपूर्ण सूचना थी और उसे कण्‍ठस्‍थ करने की कोशिश करें। इस बार हम ग्रह एवं राशियों के कुछ वर्गीकरण को जानेंगे जो कि फलित ज्‍योतिष के लिए अत्‍यन्‍त ही महत्‍वपूर्ण हैं।

पहला वर्गीकरण शुभ ग्रह और पाप ग्रह का इस प्रकार है:-

शुभ ग्रह: चन्द्रमा, बुध, शुक्र, गुरू हैं पापी ग्रह: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु हैं

साधारणत: चन्‍द्र एवं बुध को सदैव ही शुभ नहीं गिना जाता। पूर्ण चन्‍द्र अर्थात पूर्णिमा के पास का चन्‍द्र शुभ एवं अमावस्‍या के पास का चन्‍द्र शुभ नहीं गिना जाता। इसी प्रकार बुध अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ होता है और यदि पापी ग्रह के साथ हो तो पापी हो जाता है।

यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि सभी पापी ग्रह सदैव ही बुरा फल नहीं देते। न ही सभी शुभ ग्रह सदैव ही शुभ फल देते हैं। अच्‍छा या बुरा फल कई अन्‍य बातों जैसे ग्रह का स्‍वामित्‍व, ग्रह की राशि स्थिति, दृष्टियों इत्‍यादि पर भी निर्भर करता है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

जैसा कि उपर कहा गया एक ग्रह का अच्‍छा या बुरा फल कई अन्‍य बातों पर निर्भर करता है और उनमें से एक है ग्रह की राशि में स्थिति। कोई भी ग्रह सामान्‍यत अपनी उच्‍च राशि, मित्र राशि, एवं खुद की राशि में अच्‍छा फल देते हैं। इसके विपरीत ग्रह अपनी नीच राशि और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं।

ग्रहों की उच्‍चादि राशि स्थिति इस प्रकार है -

ग्रह उच्च राशि नीच राशि स्‍वग्रह राशि

सूर्य मेष तुला सिंह

चन्द्रमा वृषभ वृश्चिक कर्क

मंगल मकर कर्क मेष, वृश्चिक

बुध कन्या मीन मिथुन,कन्या

गुरू कर्क मकर धनु, मीन

शुक्र मीन कन्या वृषभ, तुला

शनि तुला मेष मकर, कुम्भ

राहु वृषभ, मिथुन वृश्चिक, धनु कन्या

केतु वृश्चिक, धनु वृषभ, मिथुन मीन

ऊपर की तालिका में कुछ ध्‍यान देने वाले बिन्‍दु इस प्रकार हैं - 1. ग्रह की उच्‍च राशि और नीच राशि एक दूसरे से सप्‍तम होती हैं। उदाहरणार्थ सूर्य मेष में उच्‍च का होता है जो कि राशि चक्र की पहली राशि है और तुला में नीच होता है जो कि राशि चक्र की सातवीं राशि है।

2. सूर्य और चन्‍द्र सिर्फ एक राशि के स्‍वामी हैं। राहु एवं केतु किसी भी राशि के स्‍वामी नहीं हैं। अन्‍य ग्रह दो-दो राशियों के स्‍वामी हैं।

शेष अगले अध्याय में .......

पिछली बार हमने प्रत्येक ग्रह की उच्च नीच और स्वग्रह राशि के बारे में जाना था। हमनें पढ़ा था कि राहु और केतु की कोई राशि नहीं होती और राहु-केतु की उच्च एवं नीच राशियां भी सभी ज्योतिषी प्रयोग नहीं करते। लेकिन, फलित ज्योतिष में ग्रहों के मित्र, शत्रु ग्रह के बारे में जानना भी अति आवश्यक है। इसलिए इस बार इनकी जानकारी।

सूर्य के मित्र वृ. मं चन्द्र

चंद्रमा के मित्र सूर्य बुध

मंगल के मित्र सू. च. वृ.

बुध के मित्र सूर्य, शुक्र, राहु,

बृहस्पति के मित्र सू. च. मं

शुक्र के मित्र श. बु. के.

शनि के मित्र बुध-शुक्र-राहु

राहु के मित्र बु. श. के.

केतु के मित्र शु. राहु

शत्रु

सूर्य शुक्र, शनि, राहु

चन्द्र केतु, राहु

मंगल बुध, केतु

बुध चंद्रमा

बृहस्पति शुक्र, बुध

शुक्र सूर्य , चन्द्र, राहु

शनि सूर्य , चन्द्र , मंगल

राहु सूर्य , शुक्र, मंगल

केतु चन्द्र , मंगल

सामान्य

सूर्य- बुध

चन्द्र शुक्र, शनि , मंगल , बृहस्पति

मंगल शुक्र, शनि

बुध शनि , मंगल, बृहस्पति, केतु

बृहस्पति रा. के. शनि

शुक्र मं, बृहस्पति

शनि- केतु ,बृहस्पति

राहु बृहस्पति , चंद्रमा ,

केतु वृ. श, बु. सू

तात्कालिक मित्रता- शत्रुता

मित्रता कुंडली में 2, 3, 4, 5, 10, 11, 12, में बैठे ग्रह तात्कालिक मित्र होते है।

शत्रु – 1, 5,6,7, 8 एवं भावों में बैठे ग्रह आपस में शत्रु होते है।

नोट किसी भी खाने को खाना – 1 मान कर मित्रता शत्रुता के लिए यही सूत्र प्रयुक्त होता है।

यह अति महत्वपूर्ण सूत्र है और इसे भी कण्ठस्थ् करने की कोशिश करनी चाहिए। यदि यह तालिका बहुत बड़ी लगे तो डरने की कोई जरुरत नहीं। तालिका समय एवं अभ्याकस के साथ खुद व खुद याद हो जाती है।

मोटे तौर पर वैसे हम ग्रहों को दो भागों में विभाजित कर सकते हैं, जो कि एक दूसरे के शत्रु हैं -

भाग 1 - सूर्य, चंद्र, मंगल और गुरु

भाग 2 - बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतु

यह याद रखने का आसान तरीका है परन्तु हर बार सही नहीं है। उपर वाली तालिका कण्ठस्थ हो तो ज्यादा बेहतर है।

मित्र-शत्रु का तात्पर्य यह है कि जो ग्रह अपनी मित्र ग्रहों की राशि में हो एवं मित्र ग्रहों के साथ हो, वह ग्रह अपना शुभ फल देगा। इसके विपरीत कोई ग्रह अपने शत्रु ग्रह की राशि में हो या शत्रु ग्रह के साथ हो तो उसके शुभ फल में कमी आ जाएगी।

चलिए एक उदाहर लेते हैं। उपर की तालिका से यह देखा जा सकता है कि सूर्य और शनि एक दूसरे के शत्रु ग्रह हैं। अगर सूर्य शनि की राशि मकर या कुंभ में स्थित है या सूर्य शनि के साथ स्थित हो तो सूर्य अपना शुभ फल नहीं दे पाएगा। इसके विपरीत यदि सूर्य अपने मित्र ग्रहों च्ंद्र, मंगल, गुरु की राशि में या उनके सा‍थ स्थित हो तो सामान्‍यत वह अपना शुभ फल देगा

इस अध्याय में बस इतना ही। आगे जानेंगे कुण्डली का स्वरुप, ग्रह-भाव-राशि का कारकत्वक एवं ज्योतिष में उनका प्रयोग आदि।

इस अध्याय में हम जानेंगे की कुण्‍डली में ग्रह एवं राशि इत्‍यादि को कैसे दर्शाया जाता है। साथ ही लग्‍न एवं अन्‍य भावों के बारे में भी जानेंगे।

कुण्‍डली को जन्‍म समय के ग्रहों की स्थिति की तस्‍वीर कहा जा सकता है। कुण्‍डली को देखकर यह पता लगाया जा सकता है कि जन्‍म समय में विभिन्‍न ग्रह आकाश में कहां स्थित थे। भारत में विभिन्‍न प्रान्‍तों में कुण्‍डली को चित्रित करने का अलग अलग तरीका है। मुख्‍यत: कुण्‍डली को उत्‍तर भारत, दक्षिण भारत या बंगाल में अलग अलग तरीके से दिखाया जाता है। हम सिर्फ उत्‍तर भारतीय तरीके की चर्चा करेंगे।

कुण्‍डली से ग्रहों की राशि में स्थिति एवं ग्रहों की भावों में स्थिति पता चलती है। ग्रह एवं राशि की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं और भाव की चर्चा हम आगे करेंगे। उत्तर भारत की कुण्डली में लग्न राशि पहले स्थान में लिखी जाती है तथा फिर दाएं से बाएं राशियों की संख्या को स्थापित कर लेते हैं। अर्थात राशि स्थापना (anti-clock wise) होती हैं तथा राशि का सूचक अंक ही अनिवार्य रूप से स्थानों में भरा जाता है। एक उदाहरण कुण्‍डली से इसे समझते हैं।

भाव थोडी देर के लिए सारे अंको और ग्रहों के नाम भूल जाते हैं। हमें कुण्‍डली में बारह खाने दिखेंगे, जिसमें से आठ त्रिकोणाकार एवं चार आयताकार हैं। चार आयतों में से सबसे ऊपर वाला आयत लग्‍न या प्रथम भाव कहलाता है। उदाहरण कुण्‍डली में इसमें रंग भरा गया है। लग्‍न की स्थिति कुण्‍डली में सदैव निश्चित है। लग्‍न से एन्‍टी क्‍लॉक वाइज जब गिनना शुरू करें जो अगला खाना द्वितीय भाव कहलाजा है। उससे अगला खाना तृतीय भाव कहलाता है और इसी तरह आगे की गिनती करते हैं। साधारण बोलचाल में भाव को घर या खाना भी कह देते हैं। अ्ंग्रेजी में भाव को हाउस (house) एवं लग्‍न को असेन्‍डेन्‍ट (ascendant) कहते हैं। भावेश कुण्‍डली में जो अंक लिखे हैं वो राशि बताते हैं। उदाहरण कुण्‍डली में लग्‍न के अन्‍दर 11 नम्‍बर लिखा है अत: कहा जा सकता है की लग्‍न या प्रथम भाव में ग्‍यारह अर्थात कुम्‍भ राशि पड़ी है। इसी तरह द्वितीय भाव में बारहवीं अर्थात मीन राशि पड़ी है। हम पहले से ही जानते हैं कि कुम्‍भ का स्‍वामी ग्रह शनि एवं मीन का स्‍वामी ग्रह गुरु है। अत: ज्‍योतिषीय भाषा में हम कहेंगे कि प्रभम भाव का स्‍वामी शनि है (क्‍योंकि पहले घर में 11 लिखा हुआ है)। भाव के स्‍वामी को भावेश भी कहते हैं। प्रथम भाव के स्‍वामी को प्रथमेश या लग्‍नेश भी कहते हैं। इसी प्रकार द्वितीय भाव के स्‍वामी को द्वितीयेश, तृतीय भाव के स्‍वामी को तृतीयेश इत्‍यादि कहते हैं।

ग्रहों की भावगत स्थिति उदाहरण कुण्‍डली में उपर वाले आयत से एन्‍टी क्‍लॉक वाइज गिने तो शुक्र एवं राहु वाले खाने तक पहुंचने तक हम पांच गिन लेंगे। अत: हम कहेंगे की राहु एवं शुक्र पांचवे भाव में स्थित हैं। इसी प्रकार चंद्र एवं मंगल छठे, शनि - सूर्य-बुध सातवें, और गुरु-केतु ग्‍यारवें भाव में स्थित हैं। यही ग्रहो की भाव स्थिति है।

ग्रहों की राशिगत स्थिति ग्रहों की राशिगत स्थिति जानना आसान है। जिस ग्रह के खाने में जो अंक लिखा होता है, वही उसकी राशिगत स्थिति होती है। उदाहरण कुण्‍डली में शुक्र एवं राहु के आगे 3 लिखा है अत: शुक्र एवं राहु 3 अर्थात मिथुन राशि में स्थित हैं। इसी प्रकार च्रद्र एवं मंगल के आगे चार लिखा है अत: वे कर्क राशि में स्थित हैं जो कि राशिचक्र की चौथी राशि है।

याद रखें कि ग्रह की भावगत स्थिति एवं राशिगत स्थिति दो अलग अलग चीजें हैं। इन्हें लेकर कोई कन्फ्यूजन नहीं होना चाहिए।

 

सहविचारका ह।

ज्योतिष को असंशोधनीय समझना-अब तक हमने जो चर्चा की वह

ज्योतिष पर अविश्वास करनेवालों के सम्बन्ध में थी। मगर यह चर्चा ज्योतिष पर

अंधविश्वास करनेवालों के लिए है। किसी तथ्य या विषय को भली प्रकार समझे

विना नकार देना अविश्वास है तो उसे भली प्रकार समझे बिना स्वीकार लेना

अंधविश्वास है। दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं, क्योंकि ये वास्तविकता तक

पहंचने नहीं देती। अत: सत्य को समझने के लिए पूर्वाग्रह या हठधर्मिता को

त्यागकर निष्पक्षता, सजगता एवं समग्रता से धैर्यपूर्वक विवेचन आवश्यक है। ।

ज्योतिष अपने आप में स्वतंत्र विधा नहीं है। इसमें खगोलशास्त्र, विज्ञान,

गणित, पदार्थ विज्ञान, दर्शनशास्त्र, मंत्र विज्ञान, रत्न विज्ञान, शकुनशास्त्र, आयुर्वेद

या रोग विज्ञान, शरीर लक्षण एवं मुखाकृति विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान, समाज

शास्त्र, आचार संहिता, धर्म एवं अध्यात्म तथा मनोविज्ञान आदि सभी का कुछ न ।

कुछ अंश (आंशिक या अधिक) शामिल है तथा ये विषय ज्योतिष के इतने

समानान्तर हैं कि इनसे कटकर ज्योतिष को तत्त्वत: जाना ही नहीं जा सकता।

___ज्योतिष किसी एक विशेष ऋषि द्वारा प्रदत्त अथवा अन्वेषित ज्ञान भी नहीं

है। अपितु विभिन्न विशेषज्ञ ऋषियों द्वारा अपने-अपने समय व स्तर पर किए गए

शोध तथा अध्ययनों का सम्मिलित परिणाम है। हर ऋषि या विद्वान का अपना

दृष्टिकोण, अपना अनुभव तथा अपना मार्ग रहा है। अतः ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन

प्रामाणिक ग्रन्थों के सिद्धांतों एवं निष्कर्षों व प्रणालियों में अनेक विरोधाभास है।

इन ऋषियों या विद्वानों अथवा ज्योतिषशास्त्र के प्रणेताओं तथा प्रवर्तकों में मुख्य

नाम पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। (अत: इसे ईश्वर प्रदत्त या

ईश्वर का प्रकाश समझने की भूल न करें।)

नारद, व्यास, पराशर, गर्ग, गौतम, भृगु, भारद्वाज, जैमिनी, कश्यप, कात्यायन,

वृहस्पति, श्रीसूर्य, वराहमिहिर आदि अतिप्राचीन एवं मंत्रेश्वर, गोपाल रत्नाकार,

काशीनाथ, जयदेव, कल्याण वर्मा, श्रीमहेश, हरिवंश, मार्तण्ड, आचार्य वशिष्ठ,

वैद्यनाथ, जोगेश्वर, नारायण भट्ट, नीलकंठ आदि मध्यकालीन व नवीन आचार्य

प्रमुख हैं। भास्कर, कपिलेश्वर, नरपतिकवि, गणेश दैवज्ञ, नीलांबर आदि ज्योतिर्विदों

के नाम भी गिनाए जा सकते हैं।

सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार कहा जा सकता है कि ज्योतिष शास्त्र ग्रहों, । नक्षत्रों, राशियों आदि के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन शास्त्र है। जैसा कि कहा भी गया है ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहणां बोधक शास्त्रम्। दूसरे शब्दों में हम ज्योतिष को 'सामाजिक ब्रह्मांडीय शास्त्र' भी कह सकते हैं। यह अनुमानतः 3000। वर्षों से अधिक पुराना विज्ञान है। "ज्योतिष' शब्द संस्कृत का एकमल शब्द है। कुछ विद्वान इसे ज्योति ईश अर्थात् 'ईश्वर का प्रकाश' ऐसा विश्लेषित करके समझाने का प्रयास भी करते हैं। परन्तु यह मात्र शब्द विलास ही जान पड़ता है। तार्किकता के आधार पर यह अर्थ । सत्य प्रमाणित नहीं होता। क्योंकि ज्योतिष शब्द की संरचना 'ज्योतिस्-अच्' के अवयवों के अनुसार (ज्योतिस्-यानी प्रकाश तथा अच-यानी प्रार्थना करना) 'ज्योतिष' का अर्थ 'प्रकाश की प्रार्थना' करना सिद्ध होता है। (इसी 'अच्' से 'अर्चना' का भी विन्यास होता है) यह व्याकरण की दृष्टि से भी अधिक उचित है। और तर्कशास्त्र की दृष्टि से भी युक्तिसंगत है। प्रायः ज्योतिष को भविष्य का ज्ञान करानेवाला शास्त्र ही माना जाता है। परन्तु यह अर्ध सत्य है। ज्योतिष समय और मानव के आर-पार देखने की कला है। इससे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जाना जा सकता है और मनुष्य के व्यक्तित्व, स्वभाव, प्रकृति, गुण-दोष, रोग-विकार आदि को भी ठीक-ठीक जाना जा सकता है। ज्योतिष के सम्बन्ध में समाज अनेक भ्रान्तियों का शिकार है। ज्योतिष को ठीक-ठीक समझने के लिए मात्र परिभाषा या शब्दार्थ पर विचार करना पर्याप्त नहीं है। अपित इस विषय में विस्तृत गहन चर्चा और इस संदर्भ में पनपी भ्रान्तियों का खण्डन भी आवश्यक है। क्या ज्योतिष अंधविश्वास है? विज्ञानवादियों एवं आधुनिक लोगों की यह आम धारणा है कि ज्योतिष अंधविश्वास और मात्र पंडितों की कमाई का धंधा है। लेकिन यह भी सत्य है किऐसी धारणा उन्हीं सज्जनों की है, जिन्होंने ज्योतिष को पढ़ा या जाना नहीं है, मात्र सुना ही है। किसी प्रणाली को जाने व समझे बिना ही उसका विरोध मात्र इसलिए करना कि वह प्राचीन है अथवा आध्यात्मिकता से सम्बन्धित है, बुद्धिमत्ता नहीं है। दो पदार्थों/सत्ताओं/विषयों को तत्त्वतः जानकर उनके सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही हम उनकी तुलना कर सकते हैं। तभी हम किसी को श्रेष्ठ और किसी को औसत या निम्न कहने के अधिकारी हैं। मात्र इसलिए नहीं कि वह हमें पसंद नहीं है या हमारी रुचि के अनुकूल नहीं है। सत्य हमेशा हमारी पसंद का ही हो, यह जरूरी नहीं है। ज्योतिष के सम्बन्ध में भ्रान्तियां और उनके कारण किसी भी भ्रान्ति का एकमात्र कारण 'ज्ञेयता' या 'समग्र दृष्टि' का अभाव होता है। मजे की बात है कि ज्योतिष के विरोधी ही मात्र भ्रान्तियों के शिकार नहीं हैं। अपितु ज्योतिष के पक्षधर/समर्थक या इसे प्रयोग करने वाले बहुत से तथाकथित ज्योतिषी भी प्रान्तियों के शिकार हैं (इनमें मेरे परिचित कुछ ऐसे विद्वान भी शामिल हैं जो 25-30 वर्षों से इसी विषय से गहनता से जुड़े होने का दम भरते हैं)। अत: आगे बढ़ने से पूर्व इन भ्रान्तियों का, इनके कारणों तथा निवारण का भी प्रयास करना युक्तिसंगत होगा। साथ ही जिज्ञासु पाठकों का ज्ञानवर्धन एवं संशय हरण होने के साथ-साथ इस विषय (ज्योतिष) को ठीक-ठीक समझ सकने के लिए सशक्त भूमिका एवं सुदृढ़ धरातल (Plate form) भी प्राप्त हो सकेगा। अतः यह विवेचन सम्पूर्ण पुस्तक से अधिक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी होगा। इसे नजरअंदाज करने की लापरवाही न करें। विरोध में भ्रान्तियां-1. ज्योतिष अंधविश्वास/निराधार है। 2. ज्योतिष मात्र कर्मकाण्ड अथवा 'पंडों' की आजीविका का साधन है। अन्यथा जीवन में उपयोगी नहीं। 3. ज्योतिष कपोल कल्पना है। अथवा ठगने की विद्या है। पक्ष में भ्रान्तियां-1. ज्योतिष मात्र ग्रहों की गतियों का गणित है। 2. ज्योतिष ईश्वर का प्रकाश है अत: परिपूर्ण एवं दोषरहित है। 3. ज्योतिष द्वारा पूर्व निश्चित भाग्य को बदला जा सकता है। 4. ज्योतिष एक स्वतंत्र विज्ञान है और ज्योतिषी सर्वज्ञ होता है। दोनों प्रकार की भ्रान्तियों के मूल कारण-1. 'समग्र दृष्टि' का अभाव।। किसी अंग विशेष को ही सम्पूर्ण मान लेने का भ्रम। दूसरे शब्दों में अज्ञान एवं। अर्धज्ञान। 2. केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना। अतिसक्षम, मापे तथा देखे न जा सकने वाले घटकों के अस्तित्व को न स्वीकारना। 3. पुनर्जन्म की मान्यता के प्रति अविश्वास।4. कालान्तर से होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान न देना तथा प्राचीन सिद्धांतों, दरणों, संज्ञाओं को आज के परिप्रेक्ष्य में ज्यों का त्यों तोलने की कोशिश करना। 5. ज्योतिष को दर्शन शास्त्र, तर्क शास्त्र आदि से पृथक ईश्वर प्रदत्त, ऋषियों का प्रसाद मानकर सम्पूर्ण या असंशोधनीय समझना। 6. कर्मफल के बन्धन को तत्त्वत: न जानना अथवा कर्म के स्वरूप या कार्य और कारण के सम्बन्ध को न समझ पाना। ___7. विषय को जाने और समझे बिना ही अपनी रुचि या अरुचि के आधार पर 'पूर्वाग्रह' या 'हठधर्मिता' से काम लेना। उसका निष्पक्षता के साथ विवेचन न करना। 8. शब्द के मात्र शब्दार्थ पर ही विचार करना। उसके भावार्थ, गूढार्थ, प्रचलित अर्थ एवं पर्याय अर्थों, संश्लिष्ट अर्थों पर विचार न करना। 9. यह मानना कि हर पुरानी चीज बदल दी जानी चाहिए। यदि हम इन भ्रान्तियों के मूल कारणों पर ही थोड़ा विवेचन कर लें तो ये भ्रान्तियां स्वयं ही खण्डित हो जाएंगी। फिर भी हम बाद में इन भ्रान्तियों के औचित्य को भी संक्षेप में तोलेंगे। तभी ज्योतिष विषय की ओर आगे बढ़ेंगे। मूल कारणों के औचित्य एवं अनौचित्य का विवेचन 1. समग्र दृष्टि-किसी विषय/वस्तु/सत्ता/पदार्थ के विषय में हम ठीक- ठीक तभी जान सकते हैं, जब हम उसे समग्रता के साथ देखें और हमारी देखने की सामर्थ्य भी पूर्ण हो। जैसे-कमजोर आंखोंवाला तब तक देखी हुई वस्तु को वास्तविक रूप में सुविधापूर्वक नहीं पहचान सकता, जब तक उसके पास उचित नम्बर का चश्मा न हो। अत: दृष्टि सामर्थ्य का पूरा होना, पहले तो यही आवश्यक है। ___यदि हम 'समग्रता' से नहीं देखते और मात्र अंगविशेष या कोणविशेष को देखकर उसी के आधार पर समूचे का परिणाम/निष्कर्ष निकालने की चेष्टा करते हैं तो हम सत्य पर नहीं पहुंचते। या तो हम भ्रम में पड़ते हैं या फिर संशय में। अथवा मिथ्याभास (सांप को रस्सी समझना या रस्सी को सांप समझ लेना) या अपूर्ण सत्य को ही पूर्ण अथवा वास्तविक सत्य समझ लेते हैं। जैसे चार अंधों को किसी ने बताया कि उनके सामने एक हाथी खड़ा है और चारों ने उसे छूकर/टटोल कर जानने की कोशिश की। जिसने हाथी के पैर को टटोला उसका निष्कर्ष था कि हाथी खम्बे जैसा होता है। जिसने सुंड टटोली थी उसने बताया कि हाथी अजगर जैसा होता है। हाथी की पूंछ टटोलने वाले अंधे ने हाथी को मोटे रस्से जैसा बताया आर हाथी के कान को पकड़ने वाले अंधे ने हाथी को सूप/पंखे जैसा माना। उदाहरण/कथा-परानी है। मैं अक्सर इसे दोहराता भी हूं। क्योंकि यह एकदम सटीक है और महत्त्वपर्ण तथ्य की ओर आसानी से संकेत देती है।) इस प्रकार हाथी के विषय में चारों अंधों के निष्कर्ष भिन्न थे। न केवल भिन्न थे, बल्कि सत्य भी नहीं थे। जबकि अंधों के प्रयासों, प्रयासों के प्रति ईमानदारी. अनुभवों तथा अनुभवों को अभिव्यक्त करने की ईमानदारी में कोई कमी नहीं थी। हरेक ने अपने-अपने हाथों में आने वाले अंग को तसल्ली से जांचा-परखा था और जिस नतीजे पर पहुंचे थे उसे ज्यों का त्यों बताया था, फिर भी वे सत्य नहीं जान सके थे, क्योंकि आंख न होने से उन्होंने सम्पूर्ण हाथी को नहीं देखा था बल्कि एक अंगविशेष को ही सम्पूर्ण समझ बैठे थे। 'समग्र दृष्टि' के अभाव में ऐसा ही होता है। कहानी यहां खत्म हो जाती है। मूल संदेश भी यहां खत्म जाता है। लेकिन पूरा लाभ तब प्राप्त होगा, जब हम इस कहानी पर थोड़ा-सा और आगे विचार करेंगे। क्या एक अंधा बाकी अंधों के निष्कर्षों को सही मानेगा?-बिल्कुल नहीं। क्योंकि उसका अपना अनुभव औरों से सर्वथा भिन्न है। अत: चारों अंधे एक-दूसरे को गलत/झूठा और स्वयं को सही/सच्चा बताएंगे। न केवल बताएंगे बल्कि वाद- विवाद के बाद शायद एक-दूसरे का सिर भी फोड़ें। बात यहीं खत्म हो जाती हो। तो भी गनीमत थी। मगर ये अंधे अपने बच्चों और शिष्यों को भी यही सिखाएंगे कि हाथी ऐसा ही होता है। हमने स्वयं अनुभव करके जाना है। (बच्चे व शिष्य भी अंधे हुए या समग्र दृष्टि से हीन हुए तो पिता या गुरु की बात को सत्य मानेंगे और इस प्रकार विभिन्न मत या सम्प्रदाय चल निकलेंगे-जिनमें एक भी सही नहीं होगा।) केवल आंख वाला/समग्रता से हाथी को देखने और पहचानने वाला ही यह जान सकता है कि चारों अंधे अपने-अपने स्थान पर सही हैं, परन्तु सत्य पर एक भी नहीं पहुंचा है। लेकिन वह जान तो सकता है-अंधों को जनवा या मनवा नहीं सकता। अंधे तो उसके निष्कर्ष को भी अपने अनुभवों के आधार पर चैलेंज और कण्डम करने का प्रयास करेंगे। निष्कर्ष-अत: आंख वाला भी मात्र अंधों पर हंसने के या मौन रह जाने के और क्या कर सकता है? ज्ञान के क्षेत्र में भी अक्सर ऐसा ही होता है। जो स्वयं साक्षात्कार करके सत्य को जानता है, सत्य उसी का होता है। वह दूसरे को तब तो समझा सकता है, जब दूसरा सत्य को पाने के उद्देश्य से उसके प्रति श्रद्धा और विश्वास लेकर उसकी शरण में आए। अन्यथा हरगिज नहीं समझा सकता, क्योंकि सामने वाला निर्णय तो अपने सीमित अनुभव के आधार पर पहले ही ले चुका है। ऐसी ही स्थिति या असमर्थता को कवि ने गिरा अनैन नैन बिनु वाणी कहा है। सत्य पाना है तो समग्र दृष्टि उत्पन्न करें। अथवा किसी समग्र दृष्टि वाले की शरण में अपनी बुद्धि व अनुभव का समर्पण कर दें। उसी के वाक्य को 'ब्रह्मवाक्य' मानें । इसी को गुरु धारण करना कहते हैं। असमर्थ के कल्याण का यही उपाय है। प्रत्यक्ष प्रमाण-प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वोत्तम है। क्योंकि वह स्वयं अपने ही 18 जान व अनुभव पर आधारित होने से तुरन्त सन्तुष्टि प्रदान करता है और व्यक्ति को लेशमात्र भी शंका नहीं रह जाती। परन्तु प्रत्यक्ष की सीमाएं हैं। जैसे ऊपर कथा में अंधे होने की मजबूरी से स्वयं प्रत्यक्ष या अनुभूत करने से सत्य की प्राप्ति नहीं हई। इस संदर्भ में इसी स्थूल उदाहरण की और सम्भावनाएं तथा शर्तों को भी विचारिए और प्रत्यक्ष की सीमाएं देखिए- सबसे पहले तो आपकी दृष्टि सही हो। दूसरी बात उसमें समग्रता से देखने की सामर्थ्य हो। तीसरी बात प्रकाश पर्याप्त मात्रा में हो। अंधेरे में रस्सी को सांप समझने या सांप को देख ही न पाने की सम्भावना होगी। चौथी बात जिसे देखा जा रहा है वह मलिन न हो, ढका हुआ न हो तथा स्थिर हो। अन्यथा उसके वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचाना जा सकेगा। पांचवीं बात आपकी दृष्टि व दृश्य के बीच में दीवार आदि अवरोध न हो। अन्यथा आप उस पार देख ही नहीं पाएंगे। छठी बात जिसे आप देख रहे हैं, वह आपकी दृष्टि सीमा में हो। अधिक दूर का भी ठीक दिखाई नहीं देता। उससे भी अधिक दूर का दृष्टि ठीक होने पर भी दिखाई नहीं देता। सातवीं बात आंख के बिल्कुल निकट की वस्तु अथवा बहुत तीव्र प्रकाश में रखी वस्तु भी दिखाई नहीं देती। सही देख पाने के लिए ये सभी शर्ते जरूरी हैं। इसके बाद भी दृष्टि की एक सीमा है। आप अपनी आंख में पड़ा हुआ काजल नहीं देख सकते। दर्पण या पानी उपलब्ध नहीं हो तो स्वयं अपना चेहरा नहीं देख सकते। अपने शरीर का पिछला हिस्सा नहीं देख सकते। अपने शरीर के भीतर नहीं देख सकते। माइक्रोस्कोप से आप सूक्ष्म वस्तुओं को देख सकते हैं (माइक्रोस्कोप न हो अथवा उसे सेट करना न जानते हों तो वह भी नहीं देख सकते।) मगर दुनिया में और भी अतिसूक्ष्म वस्तुएं/प्राणी हैं-जो सूक्ष्मदर्शी से भी देखे नहीं जा सकते। आपके पास दूरबीन हो या खगोलबीन हो और आप उसका प्रयोग भी जानते हों तो औरों की अपेक्षा दूर तक देख लेंगे। पर दुनिया/सृष्टि खगोलबीन से भी आगे है। इतने पर भी सृष्टि की आयु के सामने आपकी आयु क्या है? अपने सारे जीवन में आप उस शहर का ही चप्पा-चप्पा नहीं देख पाते जहां रह रहे हैं ? पूरी दनिया. पुरा ब्रह्मांड, सागर तल या पाताल की तो बात ही क्या है ? छोटी-सी आयु में आप सभी विषय, सभी पदार्थ, सभी सत्ताएं कैसे प्रत्यक्ष कर सकते हैं? जबकि प्रत्यक्ष के साथ ऊपर बताई गई तमाम शर्ते भी जुड़ी हुई हैं। अतः निष्कर्ष यह है कि मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने से समूचे को जाना नहीं जा सकता, हमें और प्रमाणों का सहारा भी लेना ही होगा। अन्य प्रमाण-भारतीय दर्शन इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण के बाद क्रमश: अनुमान प्रमाण, शब्द प्रमाण और आप्त प्रमाण की व्यवस्था करता है। ये सभी'प्रत्यक्ष' पर आधारित हैं, परन्तु ये प्रमाण या तो आंशिक हैं अथवा अपने द्वारा प्रत्यक्ष या अनुभूत न होकर, औरों द्वारा प्रत्यक्ष/अनुभूत हैं। आधुनिक लोग तथा विज्ञानवादी व्यवहार में इन प्रमाणों का उपयोग भी करते हैं और कमोबेश मानते भी हैं, भले ही सम्पूर्णता से स्वीकार न करें। अनुमान प्रमाण-हर सत्ता या पदार्थ का एक नाम, रूप या आकार तथा गुण या स्वभाव होता है। और इनमें एक निश्चित सम्बन्ध भी रहता है। अत: उस पदार्थ या सत्ता से निश्चित रूप से सम्बन्धित किसी लक्षण को प्रत्यक्ष करके, उसके माध्यम से उस सत्ता या पदार्थ के विषय में अनुमान लगा लेना-'अनुमान प्रमाण' है। जैसे दूर कहीं धुआं उठता देखकर वहां आग लगी होने का अनुमान लगा लिया जाता है। आग को हमने प्रत्यक्ष नहीं देखा। परन्तु आग के एक निश्चित लक्षण या गुण-धुएं को प्रत्यक्ष देखा। आग और धुएं के सम्बन्ध की निश्चितता के कारण आग को प्रत्यक्ष न देखते हुए भी आग के विषय में जानकारी प्राप्त कर ली। यह अनुमान प्रमाण हुआ। यह प्रत्यक्ष पर पूर्णतः आधारित नहीं है, क्योंकि जिस सत्ता (आग) को हम जान रहे हैं, उसको हम प्रत्यक्ष नहीं देख रहे। यह आंशिक प्रत्यक्ष पर आधारित है। क्योंकि आग को भले ही हम प्रत्यक्ष नहीं कर रहे परन्तु उसके लक्षण धुएं को हम प्रत्यक्ष कर रहे हैं। फल द्वारा वृक्ष का या बीज द्वारा वृक्ष का अनुमान लगाना आदि ऐसे ही निश्चित सम्बन्धों के आधार पर अनुमान द्वारा ज्ञान प्राप्त करने या सत्ता के अस्तित्व को सिद्ध करने के सहज व सरल उदाहरण हैं। इसका प्रयोग भी काफी होता है। शब्द प्रमाण-स्वयं प्रत्यक्ष या अनुभव न करते हुए भी जब कोई प्रत्यक्षदर्शी या विषय को अनुभूत करने वाला उस विषय के सम्बन्ध में कुछ कहता या लिखता है तब उसके शब्दों द्वारा हमें उस विषय के सम्बन्ध में सत्य का ज्ञान होता है। अत: इसे 'शब्द प्रमाण' कहते हैं। पुस्तकें अथवा संस्मरण आदि इसी प्रमाण के अन्तर्गत आते हैं। यह प्रमाण दूसरे के प्रत्यक्ष या अनुभव पर आधारित है, परन्तु हमने उसे प्रत्यक्ष नहीं किया होता, न ही वह हमारे द्वारा अनुभूत होता है। फिर भी हम इसे सत्य मानते हैं और इसके माध्यम से हमारे ज्ञान का इतना अधिक विस्तार होता है, जितना हम मात्र 'प्रत्यक्ष प्रमाण' के आधार पर एक जीवन में कभी नहीं कर सकते। उदाहरण के तौर पर हम दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में कभी नहीं गए, मिस्र में कभी नहीं गए, चांद पर कभी नहीं गए। फिर भी हम क्रमश: नरभक्षी पेड़- पौधों, पिरामिडों और चांद के गड्ढों या वहां के छ: गुने कम गुरुत्वाकर्षण बल के विषय में जानते हैं। स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हम नहीं हैं। परन्तु शब्द प्रमाण के उपयोग स, वहां जाने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरणों या उनके द्वारा लिखी पुस्तकों के आधार पर हम ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। रसायन, भूगोल, इतिहास, भौतिकी आदि समस्त नयों का सभी ज्ञान या सिद्धांत अथवा आंकड़े हमारे द्वारा प्रत्यक्षा जनभूत नहीं फिर भी हम अपनी सामर्थ्यानुसार अनेक विषयों में महारथ हामिरत करने गक जान इसी शब्द प्रमाण के आधार पर प्राम कर लेते हैं। 'शब्द प्रमाण' इसलिए सर्वाधिक व्यापक प्रमाण है। आम प्रमाण-'आस' उस व्यक्ति को कहते हैं जो तृस या पूर्ण सन्तुष्ट है। यानी रागद्वेष और मोह-घृणा से मुक्त हो। ऐसा व्यक्ति यदि अपनी अनुभूति को अताता है तो उसे भी प्रमाण माना जाता है। यह 'आत प्रमाण है। यह प्रत्यक्ष पर नहीं अपितु अनुभूति पर आधारित होता है। यानी वह व्यक्ति एक ऐसा अनुभव बताता है जिसका वह भुक्त भोगी है। भले ही प्रत्यक्षदर्शी हो या न हो। (प्रत्यक्ष- दर्शी होना गौण और भुक्त भोगी होना यहां प्राथमिक है।) उसके भुक्त भोगी होने के कारण उसका अनुभव सच्चा होता है। और क्योंकि वह राग-द्वेष से परे है अत: वह उसकी अभिव्यक्ति भी ईमानदारी व सम्पूर्णतया करता है। कुछ बदलता अथवा छिपाता नहीं है। (क्योंकि झूठ आदमी अपने स्वार्थ के लिए बोलता है।) न तो उसका स्वभाव दुराव-छिपाव का होता है और न ही उसके पास दुराव-छिपाव का कोई कारण ही होता है। जैसे प्राचीन ऋषियों के वाक्य। ___'आप्त प्रमाण' का प्रयोग विशेषकर भावनात्मक, आध्यात्मिक, अतिसूक्ष्म तथा गहन विषयों के संदर्भ में होता है। जिन्हें भौतिक या स्थूल मापदण्डों पर कसा नहीं जा सकता। अत: भले ही इस प्रमाण का प्रयोग यदा-कदा या कम मात्रा में ही किया जाता है। परन्तु यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि इस प्रमाण का और कोई विकल्प नहीं है। उदाहरण के तौर पर हम हमारे पिता के ही पुत्र हैं ? इस तथ्य को जानने का हमारे पास कोई तरीका नहीं है। न तो प्रत्यक्ष प्रमाण से, न अनुमान प्रमाण से और न शब्द प्रमाण से ही यह तथ्य सत्य सिद्ध हो सकता है। फिर भी हम ऐसा विश्वासपूर्वक या निश्चयपूर्वक मानते हैं कि हम अमुक व्यक्ति के ही पुत्र हैं। इस विश्वास या निश्चयपूर्वक मानने का हमारे पास क्या आधार है ? केवल एक कि हमारी मां ऐसा बताती है। हमारी मां हमें (और समाज को भी) बताती है कि अमक व्यक्ति तम्हारे (या मेरे बच्चे के) पिता हैं। और हम बिना तर्क-वितर्क के. बिना उनके कथन को सिद्ध किए ऐसा ही मान लेते हैं (समाज भी बिना विरोध के मान लेता है। क्योंकि इसे सिद्ध करने या जानने का कोई और साधन ही नहीं है। केवल भक्त भोगी' ही यह बता सकता है। हमारी मां क्योंकि 'भूक्त भोगी' है और बोलने का कोई कारण नहीं है। अतः माता के कथन को ही हम है। यह 'आप्त प्रमाण' का एक लौकिक उदाहरण है। पाच-आज D.N.A. पराक्षणद्वारा याद यह जानना संभव भी हो (यद्यपि पुनश्च-आज 21यह भी तर्क का ही विषय है, क्योंकि DN.A. से ही 'क्लोन' (अनुकृति) तैयार की जाती है। हमारे ग्रंथों में 'लव' (राम के पुत्र) का ' क्लोन' (कुश) वाल्मीकि ऋषि ने तैयार किया था। 'रक्तबीज' राक्षस अपने रक्त की बूंदों से अपने अगणित 'क्लोन' बनाने में सक्षम था। इस प्रकार के अनेक उद्धरण यह संकेत करते हैं कि D.N.A. के विषय में या उससे क्लोन' बनाने के विषय में उस समय के ऋषियों को जानकारी थी। भले ही वे DN.A. को किसी और नाम से पुकारते रहे हों अथवा उनकी प्रणाली भिन्न हो। लेकिन फिर भी DN.A. द्वारा यह प्रमाणित हो सकने का कोई सांकेतिक उद्धरण हमारे शास्त्रों में नहीं मिलता कि किसी व्यक्ति के जनक को प्रमाणित कर पाता। यह सत्य तो मात्र माता के ही कथन से प्रमाणित होता था) तो भी पहले सम्भव नहीं था और आज भी सबके लिए सम्भव नहीं है। अत: 'आप्त प्रमाण' की उपयोगिता व महत्त्व ज्यों का त्यों है। दूसरी बात यह मात्र लौकिक उदाहरण है, जो पाठकों की सुविधा की दृष्टि से लिया गया है। परन्तु आत्मा, परमात्मा, देवता, शक्ति, काल, मन्त्र, तत्त्व, महाभूत. तन्मात्राओं, गुणों आदि पारलौकिक या अतिसूक्ष्म सत्ताओं को ऋषियों के 'आप्त प्रमाण' द्वारा ही समाज जान पाया है। विज्ञान/प्रत्यक्षवादी वहां आज भी अपाहिज' है, अन्य विधियों या प्रमाणों से इन सत्ताओं को जान सकने में आज भी असमर्थ हैं। ___ निष्कर्ष-अतः निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानकर समग्र को नहीं जाना जा सकता तथा सूक्ष्म और गहन विषयों या सत्ताओं को स्थूल (उपलब्ध) मापदण्डों पर कसकर सिद्ध नहीं किया जा सकता। यह सिद्ध न कर पाना हमारी अक्षमता है, न कि तथ्य का गलत होना या न होना। जैसे रात्रि में जलाए गए दीपक का प्रकाश जहां-जहां तक जाता है, वहां-वहां का ज्ञान हम प्राप्त कर लेते हैं। परन्तु दीपक के प्रकाश से आगे जहां अंधकार का। साम्राज्य है-वहां का ज्ञान हमें नहीं हो पाता। तो इसका यह अर्थ नहीं है कि दीपक के प्रकाश से आगे/अंधकार में कोई वस्तु/सत्ता/पदार्थ/सृष्टि अथवा अस्तित्व है ही नहीं। लेकिन प्रत्यक्ष प्रमाण को ही सबकुछ मानने की मजबूरी हमें ऐसे हो। निर्णय पर पहुंचा देती है। जो अंधा ही पैदा होता है और अंधा ही मर जाता है। या रात को अधर में पदा होकर सुबह प्रकाश होने से पूर्व ही मर जाता है। वह अपने सीमित ज्ञान के आधार पर कह सकता है कि दुनिया में रंग, प्रकाश, दिन अथवा और लोग नहीं हात' परन्तु यह सत्य तो नहीं माना जा सकता न? पुनर्जन्म-कोई भी हिन्दू धर्म ऐसा नहीं है, जो पुनर्जन्म के स अनुमादन न करता हो। वेद, पुराण, उपनिषद्, शास्त्र सभी एक स्वर सपुर स्वीकारते हैं। (सभी के उद्धरण यहां संग्रहित करना युक्तिसंगत नहा । मा एक स्वर से पुनर्जन्म को युक्तिसंगत नहीं है) और ऐसे विषयों में शास्त्र ही प्रमाण होते हैं। परन्तु मात्र इतना ही कह देने से उन सज्जनों को सन्तुष्टि नहीं होगी, जो पुनर्जन्म को नहीं मानते। अत: कुछ सारगर्भित चर्चा करनी ही होगी। इस तथ्य से सभी सहमत होंगे कि 'जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो 'जो जन्म नहीं लेता, वह मरता भी नहीं है।' गीता में इस तथ्य को सिद्धांत रूप से इस प्रकार व्यक्त किया है नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। अर्थात् असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। सरल शब्दों में कहा जाए तो जो नहीं है (सदा से नहीं है) वह तो अस्तित्व में नहीं आ सकता/उत्पन्न नहीं हो सकता और जो है (सदा से है) वह लोप/अनुपलब्ध/नष्ट नहीं हो सकता। जो नहीं है, वह सदैव नहीं है और जो है, वह सदैव है।' यह सिद्धांत इससे स्पष्ट होता है। इन दोनों तथ्यों को विज्ञान भी मानता है। फिर भी इन दोनों तथ्यों को तत्त्वत: समझ लेने की जरूरत है। इससे पुनर्जन्म का सिद्धांत सहज ही सिद्ध होता है। मोटे तौर पर यह दो विरोधी बातें मालूम पड़ती हैं (कि जन्म लेने वाला मरता अवश्य है। और जो है वह सदा है, कभी नष्ट नहीं होता।) पर वास्तव में ऐसा नहीं है। यह हमारी मोटी दृष्टि ही गलतफहमी उत्पन्न करती है। अतः इसे बारीकी से समझ लेना चाहिए। __'जन्म' का अर्थ है-एक विशेष रूप/आकार/देह में आना और मृत्यु' का अर्थ है-उस रूप/आकार/देह का विसर्जित/विघटित हो जाना। जैसा कि सूफ़ी शायर कहता है- ज़िन्दगी क्या है अनासिर का ज़हूर-ए-तरतीब। मौत क्या है इन्हीं ज़रों का परीशां होना। अर्थात् जीवन तत्त्वों/महाभूतों (ELIMENTS) का व्यवस्थित रूप से क्रमबद्ध होना है और मृत्यु इन्हीं कणों का अव्यवस्थित हो जाना/बिखर जाना है। गीता में श्रीकृष्ण ने इसीलिए कहा है- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानी संयाति नवानि देही॥ अर्थात जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुरानी देह को त्यागकर नई देह को धारण करता है। यहां समझने की बात यह है कि मृत्यु केवल देह या आकार की हो रही है, हो रही है. जिसके कारण जीव अभिव्यक्त हो रहा था। अत: मृत्यु का अर्थ यह नहीं कि देह के साथ जीव (आत्मा) भी नष्ट हो गया। वह तो अपनावर्तमान रूप छोड़ देने से अव्यक्त हुआ है, नष्ट नहीं। पुनः नए रूप में कालान्तर से अभिव्यक्त होगा। मृत्यु, विघटन या नाश उस व्यवस्था या क्रमबद्धता का हुआ है जिसके कारण तत्त्व एक निश्चित आकार में अभिव्यक्त हो रहे थे। न कि तत्त्वों का नाश हुआ है। वे तो मात्र अव्यक्त हो गए हैं। पुनः अवसर पाकर नई व्यवस्था में व्यक्त होंगे, अत: जन्म और मृत्यु केवल देह/रूप/आकार या अभिव्यक्ति की हो रही है। आत्मा या तत्त्वों की नहीं। वे तो सदा से हैं, अत: कभी नष्ट नहीं हो सकते। देह, आकार या रूप सदा से नहीं था, अत: वह जन्मता है और क्योंकि जन्मता है अत: मृत्यु को भी अवश्य ही प्राप्त होता है। (जैसा कि प्रारंभ में दोनों सिद्धांत बता दिए गए हैं कि जन्म लेने वाला मरता अवश्य है तथा सत् (जो सदा है) का कभी अभाव नहीं होता और असत् (जो सदा नहीं है) कभी सत्ता में नहीं आता।) भ्रम इसलिए होता है कि हम जन्म व मृत्यु को ही होना (सत्) या न होना (असत्) मान लेते हैं। इसे और सुगम करने के लिए एक स्थूल या लौकिक उदाहरण देते हैं- जिस लकड़ी को आज हम वृक्ष के रूप में देख रहे हैं, क्या वह सदा से इसी रूप में थी? (नहीं! वह पहले बीजरूप में थी, फिर अंकुरित हुई, फिर पौधा बनी, फिर पुष्पित-पल्लवित हुई या वृक्ष बनी। उसका कोई भी रूप स्थायी नहीं था।) और क्या आगे भी लकड़ी इसी वृक्ष रूप में रहेगी, जिसमें हम उसे आज देख रहे हैं? (नहीं! वह कटकर फर्नीचर आदि के रूप में परिवर्तित होगी। टूट जाने पर उसका रूप कुछ और हो जाएगा। बाद में उसे ईंधन रूप से जला देंगे तो वह कोयले के रूप में परिवर्तित हो जाएगी। कोयला भी जलकर राख व धुएं के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। धुएं के कण आकाश में व्याप्त होंगे व वृष्टि के साथ पृथ्वी में जाएंगे। राख के कण मिट्टी या खाद में मिलकर पृथ्वी में जाएंगे और इस प्रकार नए पौधे की उत्पत्ति में सहयोगी बनेंगे)। यानी लकड़ी न तो सदा से इस रूप में थी और न रहेगी। लकड़ी का वृक्ष, बीज, फर्नीचर, ईंधन, कोयला, राख आदि में परिवर्तित होते रहना मात्र उसके रूप, देह अथवा अभिव्यक्ति का परिवर्तन है। यही मृत्यु व जन्म की प्रक्रिया है। परन्तु लकड़ी का मूल तत्त्व नष्ट नहीं हो रहा। मात्र रूप परिवर्तित हो रहा है, यही इस सिद्धांत का अर्थ है कि 'जो है वह सदा रहता है, उसका अभाव नहीं होता।' यही आत्मा का या आत्म तत्त्व का अजर-अमर होना है। इसीलिए कहा जाता है कि न आत्मा कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। वह शाश्वत है और सदा से है। अत: सदैव रहेगी भी। इस विवेचन से एक तीसरा सिद्धांत निकलकर सामने आता है। वह यह कि 'जिस वस्तु, सत्ता, पदार्थ या प्राणी को हम आज जिस रूप में (व्यक्त) देख रहे हैंवह न तो सदा उसी रूप में था और न ही सदा उसी रूप में रहेगा। वह रूपों का परिवर्तन करता रहेगा। क्योंकि वह 'है' अत: कभी उसका नाश या अभाव (ना होना) तो नहीं होगा, मगर वह सदा एक विशेष या निश्चित रूप, आकार या देह में अभिव्यक्त भी नहीं रहेगा। बल्कि वह अनेक रूप बदलता हुआ-लकड़ी के बाद में धुएं में बदलकर वायुमंडल में व्याप्त हो जाने के समान या राख में बदलकर पृथ्वी में विलीन हो जाने के समान-कभी 'अव्यक्त' भी हो जाएगा (परन्तु रहेगा तब भी, उसका अस्तित्व तब भी होगा) और कालान्तर में फिर 'अभिव्यक्त' हो जाएगा। परन्तु नए रूप में इस सिद्धांत को छोटा कर एक पंक्ति में श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को इस प्रकार से समझाया है अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानी भारत। अर्थात् सम्पूर्ण प्राणी (या पदार्थ, सत्ता, वस्तु) जन्म से पूर्व (आरम्भ में) अव्यक्त (अप्रकट) थे और मृत्यु के उपरांत (अंत में) भी अव्यक्त (अप्रकट) हो जाने वाले हैं। मात्र मध्यावस्था (बीच में/वर्तमान में) में ही वे प्रकट (व्यक्त) हैं। यह सिद्धांत लकड़ी के दृष्टांत से इसलिए समझ में आ जाता है कि उसके आदि से अन्त तक सभी रूप परिवर्तनों के (सभी जन्म-मरणों के) हम साक्षी या प्रत्यक्षदर्शी हैं। अथवा सभी के प्रत्यक्षदर्शी न भी हों तो कालावधि सीमित होने से अनुमान, शब्द आदि अनेक प्रमाणों से उन्हें जान पाते हैं। इसलिए सहज ही विश्वास हो जाता है। परन्तु प्राणी या मनुष्य के संदर्भ में जीवन-मृत्यु या एक रूप का तो आधा-अधूरा प्रत्यक्ष अनुभव हम कर पाते हैं। लेकिन कालान्तराल अत्यधिक होने से आदि से अन्त तक पूर्ण प्रक्रिया का हम अनुभव नहीं कर पाते। अत: उस पर हमें सहज विश्वास नहीं होता। उस पर भी दूसरे जन्म में हमें पूर्व जन्म की स्मृति बनी रहती है और न ही हम योगियों की भांति समय के आर-पार देखने या अपने पूर्व तथा आगामी जन्म का अनमान लगाने के ही योग्य होते हैं। अत: हमें पूर्व जन्म पर सहज विश्वास नहीं होता। लौकिक उदाहरण के द्वारा समझें तो हम उस यात्री की भांति हैं जो यह नहीं जानता कि वह जिस ट्रेन में बैठा है, वह कहां तक जाएगी। उसे गाजियाबाद तक जाना है। वह दिल्ली से ट्रेन में बैठा है और बस इतना ही जानता है कि टेन गाजियाबाद तक जरूर जाएगी। क्योंकि गाजियाबाद का उसके पास टिकट है और वह टी.टी. से पूछकर ट्रेन में बैठा है। अत: वह दिल्ली से गाजियाबाद तक की यात्रा का तो प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है। पर बाद में वही ट्रेन आगे जिन-जिन स्टेशनों व मार्गों से होकर कन्याकुमारी या उड़ासा पहुचेगी, उन सबका अनुभव वह अपनी गाजियाबाद तक की यात्रा में कस कर सकता है? वह तो यह मानने हो भी तैयार नहीं होगा कि वही ट्रेन उड़ीसा भी जाती है। दसरे उदाहरण से समझें तो दुर्घटनाग्रस्त होकर अपनी यादाश्त खो देने वालाव्यक्ति अपने दुर्घटना से पहले के जीवन के अनुभव भूल जाता है और बाद में ठीक हो जाने पर दुर्घटना के बाद के जीवन के अनुभव भूल जाता है। जबकि दुर्घटना से पूर्व व दुर्घटना के बाद अपने जीवन को जी वही रहा होता है। फिर भी स्मृति लोप हो जाने से वह दोनों स्थितियों में तारतम्य नहीं बैठा पाता। फिर भी उसके परिवार वालों, मित्रों या सम्बन्धियों की स्मृतियां बनी होती है, अतः वे उस व्यक्ति को अगला-पिछला याद दिलाने की कोशिश करते हैं या उसकी दोनों अवस्थाओं में सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं। लेकिन पुनर्जन्म वाले मामले में तो परिवार, मित्र व सम्बन्धी भी अगले जन्म में आने से पूर्व स्मृति खो चुके होते हैं, अत: वहां पर कौन सम्बन्ध स्थापित करे? फिर भी 'कपाल क्रिया' आदि न होने या अन्य कारणों से बहुत से ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं, जहां नए जन्म में जाने वालों को पूर्व जन्म की बहुत- सी स्मृतियां कुछ काल तक बनी रही हैं। इसके अलावा किसी स्थान या व्यक्ति से प्रथम दर्शन में ही आसक्ति या प्रियता का हमें कभी आभास होता है और कभी किसी से अकारण प्रथम मुलाकात में ही द्वेष-सा होता है। इनका कारण भी अस्पष्ट परन्तु गहन पूर्व जन्म के सम्बन्धों की स्मृति ही है। निष्कर्ष--वैसे भी विचार कीजिए कि ऐसा क्यों होता है? किसी का अपाहिज/अंगहीन/रोगग्रस्त, जन्म लेना। किसी का मन्दबद्धि या पागल के रूप में जन्म लेना। किसी का तीव्र बुद्धि या प्रतिभाओं के साथ जन्म लेना। किसी का जन्म से ही दुष्ट या महात्मा स्वभाव होना। किसी का किसी राजा के घर तो किसी का रंक के घर जन्म लेना। किसी का पैदा होते ही या पैदा होने के बाद शीघ्र ही मर जाना। किसी के माता या पिता या दोनों का उसके जन्म के बाद मर जाना।। किसी के जन्म से ही घर में खुशहाली या सौभाग्य बढ़ जाना। किसी के जन्म से ही घर में हानि, दुर्घटना या दुर्भाग्य बढ़ जाना। किसी अजनबी को अचानक देखकर सुखद लगना, जबकि उसने हमारा कुछ भी प्रिय नहीं किया है। किसी अजनबी को अचानक देखकर द्वेष भाव का उत्पन्न होना, जबकि उसने हमारा कुछ भी बुरा नहीं किया है। किसी स्थान विशेष के प्रति पहली बार देखते ही आसक्ति या विरक्ति होना।। एक ही परिवार के चार बच्चों का एक ही माहौल, एक ही गुण, एक हा। संस्कारों द्वारा परवरिश पाना। फिर भी उनकी प्रकृति, गुण, स्वभाव आदि। विपरीतता या भिन्नता होना। आदि अनेक (सबको यहां गिनाना पृष्ठ सामग्राअपव्यय होगा) प्रश्नों का उत्तर मात्र 'संयोग' नहीं हो सकता। इन प्रश्नों का एक ही सटीक उत्तर है पूर्वजन्म का प्रभाव। क्योकि 'संयोग' (BY CHANCE) जैसा कुछ भी इस सृष्टि में नहीं घटता। हर घटना या कार्य का एक निश्चित कारण अवश्य होता है। (इसे आगे 'कार्य- कारण' के पसंग में विस्तार से चर्चा में लेंगे।) यह बात और है कि बहुत से कारणों को हम जान या समझ पाते हैं। बहुत सों को नहीं। जिन कार्यों या घटनाओं के कारण हमारी समझ से परे होते हैं उन्हें हम 'संयोग' कहते हैं। (पाठकों की रुचि होगी तो पूर्वजन्म के सम्बन्ध में एक पृथक पुस्तक पेश करते का प्रयास करूंगा। यह विषय अत्यंत व्यापक और विशद् है। यहां मूल विषय यह नहीं होने से इस पर और विस्तृत चर्चा करना न युक्तियुक्त होगा, न न्यायसम्मत।) कालान्तर के परिवर्तनों पर ध्यान न देना-समय सतत् प्रवाहमान है और प्रकृति सतत् परिवर्तनशील। हर युग में संस्कृतियों, सामाजिक नियमों, दृष्टिकोणों, शिक्षा, मापदण्डों एवं लोकाचार में अनेक परिवर्तन हो जाते हैं। जीवनशैली, भाषा, जीवन स्तर, जीवन मूल्य आदि में भी अनेक भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। कुछ पुरानी चीजें हट जाती हैं, कुछ नई चीजें जुड़ जाती हैं। भौगोलिक परिवर्तन भी इन्हीं सबके अन्तर्गत आते हैं। कई बार इतिहास स्वयं को दोहराता भी है तो कई बार नए कीर्तिमान भी जुड़ जाते हैं। ऐसे में किसी प्राचीन विषय या उसके सिद्धांतों को आज के परिवेश या समसामयिक परिस्थितियों के साथ तोलने या लागू करने के लिए अतिरिक्त जागरूकता आवश्यक होती है। कहीं संशोधन भी करने पड़ सकते हैं तो कहीं समायोजन भी। कुछ छोड़ना भी पड़ सकता है तो कुछ जोड़ना भी। और निस्संदेह कुछ बदलना भी।। इस बात को कुछ मोटे उदाहरणों द्वारा सम्झने में सुविधा होगी। यह व्यावहारिक उदाहरण है, अत: सहज व सुगम्य है। जैसे पहले भोजन चूल्हे पर गाय या भैंस के गोबर से बने उपलों व लकड़ियों के माध्यम से पकाया जाता था। फिर चूल्हे का स्थान अंगीठी ने और उपलों का स्थान कोयलों ने ले लिया। फिर स्टोव आ गया, बत्तीवाला स्टोव आ गया, कोयलों का स्थान मिट्टी के तेल ने ले लिया। इसके बाद गैस आ गई, बिजली के हीटर आ गए। अब सोलर सिस्टम द्वारा खाना पकाने की बात भी सुनने में आ रही है। आने वाले 100-200 साल प्रगति इसी प्रकार परिवर्तन करती रहेगी। तब 'उपला' नामक वस्तु को लोग भूल जाएंगे। अगर किसी समझदार आदमी ने उपले को संगहालय में न रख दिया तो 'उपला क्या था? कैसा था? कैसे बनता था? किस काम आता था? ये सब बातें तब के लोगों को पता नहीं होंगी। उस समय अपने पूर्वजों से 'उपले' के विषय में परम्परागत रूप से जानने BANIM वाला कोई यदि औरों को बताएगा कि हमारे पूर्वज जानवरों के गोबर का बनाकर खाना पकाते थे। जो उन्हें मुफ्त में उपलब्ध था और आज ईंधन को पार करने के लिए हम हजार रुपए प्रति मास खर्च करते हैं। तो तब के लोग उसे गयी या लम्बी-लम्बी छोड़ने वाला ही बताएंगे। तब यदि किसी को 200-300 या और अधिक वर्ष पुरानी पुस्तक उपलब्ध होगी और उसमें उपले' के विषय में या उसके प्रयोग के विषय में वह पढ़ेगा तो पढ़कर भी वैसे ही यकीन नहीं करेगा, जैसे आज हम अपने पराने ग्रन्थों का नहीं करते हैं। क्योकि लम्बे कालान्तर के कारण तव कोई अन्य प्रमाण उसे सिद्ध करने को उपलब्ध नहीं होगा। यह भी सम्भव है कि तब किसी और वस्तु का नाम 'उपला' हो जाए। अत: पढ़ने वाला और भी भ्रमित हो। यह भी सम्भव है कि आने वाले 1000-500 साल बाद उस समय का कोई अन्वेषक 'उपले' को पुनः आविष्कृत कर डाले और उसका कोई नया नामकरण करके सबको बताए कि जिस खाने को पकाने के लिए आप इतना खर्च ईंधन पर कर रहे हैं, वह मुफ्तप्रायः पशुओं के गोबर से भी पकाया जा सकता है। अगर यह सम्भव है तो पुराणों में वर्णित ‘अग्नि बाण' आज की बुलेट या पुष्पक विमान अथवा उड़न खटोला, आज का हवाई जहाज क्यों नहीं हो सकता? फिर हम प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित जानकारी को कैसे अस्वीकार कर सकते हैं? इसी उदाहरण को और परिप्रेक्ष्य में देखिए- ___ आज हम जिसे 'ह्वेल' के नाम से जानते हैं, उस दैत्याकार जल मत्स्य को क्या प्राचीनकाल में 'जलदैत्य' अथवा 'समुद्री राक्षस' के नाम से नहीं पुकारा जा सकता? अन्तर मात्र नाम या सम्बोधन का है। रूप, गुण, लक्षण तो वही हैं। आज की SEA HORSE मछली पहले समुद्री घोड़ा या पानी का घोड़ा नहीं कही जा सकती? आज का परमाणु बम क्या प्राचीन काल में 'ब्रह्मास्त्र' के नाम से पुकारा नहीं जा सकता? आज की रिमोटकन्ट्रोल्ड सेल्फ एम्ड मिसाइल क्या पहले का 'सुदर्शन चक्र' नहीं हो सकती? आज यदि एक ही मशीनगन से दर्जनों गोलियां दागी जा सकती हैं तो क्या पहले एक ही धनुष से दर्जनों तीर एक बार में एकसाथ नहीं छोड़े जा सकते होंगे? निष्कर्ष-लेकिन समय के लम्बे अन्तराल से न केवल वस्तुओं या सामग्रियों के रूप एवं प्रणाली परिवर्तित हुए हैं। बल्कि उनके सम्बोधन या नाम भी बदल चुके हैं। अत: बिना गहन विवेचन के, बिना उन परिवर्तनों को दृष्टि में रखे, बिना सभी सम्भावनाओं को खोजे मात्र इसलिए पुरानी बात को गलत नहीं कह सकते कि वह बहुत पुरानी है और आज के परिवेश या मान्यताओं से मेल नहीं खाती। यदि हम ऐसा करेंगे तो सत्य पर नहीं पहुंच सकेंगे और स्वयं ही अपनी मूर्खता को प्रमाणित करेंगे। पानी से बिजली बनाना हमने आज से 150-200 साल पहले सीखा था। परन्तु इस तथ्य का ज्ञान ऋषियों को न रहा होता तो उन्होंने वेदों में जल को अग्निगर्भा (जिसके गर्भ में अग्नि या ऊर्जा छिपी हो) न कहा होता। ऐसे अनेक उद्धरण गिनाए जा सकते हैं। पर स्थानाभाव के कारण तथा 'समझदार को इशारा काफी है' की उक्ति को ध्यान में रखते हुए इस चर्चा को यहीं समाप्त करते हैं। आवश्यकता तकरार की नहीं अपितु सम्पूर्णता से गहन विचार की है। ज्योतिष को असंशोधनीय समझना-अब तक हमने जो चर्चा की वह ज्योतिष पर अविश्वास करनेवालों के सम्बन्ध में थी। मगर यह चर्चा ज्योतिष पर अंधविश्वास करनेवालों के लिए है। किसी तथ्य या विषय को भली प्रकार समझे बिना नकार देना अविश्वास है तो उसे भली प्रकार समझे बिना स्वीकार लेना अंधविश्वास है। दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं, क्योंकि ये वास्तविकता तक पहुंचने नहीं देतीं। अतः सत्य को समझने के लिए पूर्वाग्रह या हठधर्मिता को त्यागकर निष्पक्षता, सजगता एवं समग्रता से धैर्यपूर्वक विवेचन आवश्यक है। ज्योतिष अपने आप में स्वतंत्र विधा नहीं है। इसमें खगोलशास्त्र, विज्ञान, गणित, पदार्थ विज्ञान, दर्शनशास्त्र, मंत्र विज्ञान, रल विज्ञान, शकुनशास्त्र, आयुर्वेद या रोग विज्ञान, शरीर लक्षण एवं मुखाकृति विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान, समाज शास्त्र, आचार संहिता, धर्म एवं अध्यात्म तथा मनोविज्ञान आदि सभी का कछ न कुछ अंश (आंशिक या अधिक) शामिल है तथा ये विषय ज्योतिष के इतने समानान्तर हैं कि इनसे कटकर ज्योतिष को तत्त्वत: जाना ही नहीं जा सकता। ___ ज्योतिष किसी एक विशेष ऋषि द्वारा प्रदत्त अथवा अन्वेषित ज्ञान भी नहीं है। अपितु विभिन्न विशेषज्ञ ऋषियों द्वारा अपने-अपने समय व स्तर पर किए गए शोध तथा अध्ययनों का सम्मिलित परिणाम है। हर ऋषि या विद्वान का अपना दृष्टिकोण, अपना अनुभव तथा अपना मार्ग रहा है। अतः ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन प्रामाणिक ग्रन्थों के सिद्धांतों एवं निष्कर्षों व प्रणालियों में अनेक विरोधाभास है। इन ऋषियों या विद्वानों अथवा ज्योतिषशास्त्र के प्रणेताओं तथा प्रवर्तकों में मुख्य नास पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। (अतः इसे ईश्वर प्रदत्त या ईश्वर का प्रकाश समझने की भूल न करें।) । नारद, व्यास, पराशर, गर्ग, गौतम, भृगु, भारद्वाज, जैमिनी, कश्यप, कात्यायन, हस्पति श्रीसूर्य, वराहमिहिर आदि अतिप्राचीन एवं मंत्रेश्वर, गोपाल रलाकार, काशीनाथ, जयदेव, कल्याण वर्मा, श्रीमहेश, हरिवंश, मार्तण्ड, आचार्य वशिष्ठ, वैद्यनाथ, जोगेश्वर, नारायण भट्ट, नीलकंठ आदि मध्यकालीन व नवीन आचार्य पसख हैं। भास्कर, कपिलेश्वर, नरपतिकवि, गणेश दैवज्ञ, नीलांबर आदि ज्योतिर्विदों के नाम भी गिनाए जा सकते हैं। कोई भी विषय एक बार में शोधा नहीं जाता। अनेक पीढ़ियां क्रमश: उसे विकसित व संशोधित करती हैं। अतः हर विषय की अपनी सीमाएं होती हैं और परिपूर्ण समझे जाने पर भी उसमें संशोधनों व समायोजनों की गुंजाइश रहती है। उदाहरण के लिए भौतिकी के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को दुनिया के सामने अरस्तु (यूनानी दार्शनिक) ने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया (यद्यपि भारतीय प्राचीन ग्रन्थों में भी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का उल्लेख मिलता है, परन्तु उसकी प्रतिपादन या पारिभाषिक या सैद्धांतिक प्रस्तुति नहीं मिलती)। प्राय: 2300 वर्ष पूर्व तब से लगभग 2000 वर्षों तक अरस्तु का गुरुत्वाकर्षण सम्बन्धी नियम ही प्रचलित रहा। फिर गैलिलियो ने 17वीं शताब्दी में भिन्न सिद्धांत रखा और अरस्तु का सिद्धांत ध्वस्त हो गया। बाद में सम्भवतः सन् 1687 में न्यूटन ने नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यह गैलिलियो के सिद्धांत से बेहतर सिद्ध हुआ। क्योंकि इसके सहयोग से भौतिक पिंडों, ग्रहों आदि का भार नापा जा सकना सम्भव हो सका जो गैलिलियो के सिद्धांत के प्रयोग से सम्भव नहीं था। सन् 1915 में वैज्ञानिक आइंस्टीन ने न्यूटन के सिद्धांत को फेल किया और वस्तुओं के आपसी आकर्षण की ओर अपने 'सापेक्षता सिद्धांत' द्वारा लोगों का ध्यान आकर्षित किया। पाठकों की सूचनार्थ बता दें कि इस समय प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग आईंस्टीन के सिद्धांत में भी कुछ अपूर्णता का अनुभव कर शोध में जुटे हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि आनेवाले समय में वे कोई नया या संशोधित सिद्धांत दुनिया के सामने ले आएं और वह भी अंतिम होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। यह एक छोटा-सा उदाहरण है। सभी विषयों में इसी प्रकार अनेक शोध, संशोधन व परिवर्तन होते रहे हैं, होते रहेंगे। क्योंकि यही विकास की प्रक्रिया है। ज्योतिष में भी सम्बन्धित सिद्धांतों में परिवर्तन, समायोजन या संशोधन की सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। (फिर भी यदि हम ऐसा करेंगे तो ज्योतिष विषय के और विकसित व सटीक होने की सम्भावनाओं को हम स्वयं ही बन्द करने के प्रयास करेंगे)। सन् 505 (वराह मिहिर) से पूर्व राहू-केतु ज्योतिषीय व्याख्या में शामिल नहीं थे। प्रधान सात ग्रहों की ही ज्योतिषीय व्याख्या की जाती थी। वराह मिहिर के बाद से राहू-केतु भी शामिल हुए। अभी पिछले सवा दो सौ सालों से यूरेनस, नेप्च्यून व प्लूटो को भी ज्योतिषीय व्याख्या में शामिल किया गया है। ये सब ज्योतिष के क्रमिक विकास के प्रमाण हैं । समयानुसार सृष्टि व समाज में अनेक परिवर्तन होते हैं। अनेक तारे ज्योतिष के प्रकाश में आने के बाद से अब तक ब्लैक होल्स में बदल चुके हैं (उनकी जीवन अवधि समाप्त हो चुकी है) और अनेक 'निहारिकाओं' (तारों का RAW MATERIAL) ने नए तारों के रूप में जन्म ले लिया है। बहुत से तारों का स्थान परिवर्तन हो चुका है। ग्रह गतियों या उनके भ्रमण मागों में कुछ मामूली सा सही किन्तु परिवर्तन आया है। यह सब हमें ब्रह्मांड व तारों के निरंतर शोध में लगे रहनेवाले वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चलता है। पृथ्वी को जलवायु तथा वायुमंडल में भी अनेक बदलाव आ चुके हैं। मरुस्थलों की वृद्धि हुई है, वृक्ष कम हो गए हैं, चातुओं का स्वभाव असेतुलित हो चुका है, ओजोन परत में छेद हो चले हैं। हाल ही में (प्रायः दो वर्ष पूर्व बृहस्पति ग्रह से शूमेकरलेवी टकराया था, उससे बृहस्पति में क्या परिवर्तन हुए यह शोध के अन्तर्गत है। इन सब परिवर्तनों को ध्यान में रखना भी क्या हमारे लिए आवश्यक नहीं है? ज्योतिष के सभी सिद्धांत AS ITIS लागू करते रहने से पहले एक छोटे से उदाहरण के साथ इस प्रसंग को बन्द करेंगे। सामुद्रिक शास्त्र के एक सिद्धांत- छिद्रदता कुचित मूर्खा कुचित खल्वाट निर्धनः।। कुचित काणे भवे साधुः कुचित गानवती सति॥ (छोदे दांतों वाला कोई-कोई ही मूर्ख होता है। गंजा या उड़े हुए बालोंवाला कोई-कोई ही निर्धन होता। काना कोई-कोई ही साधु स्वभाव का होता है तथा गाने-नाचने वाली कोई-कोई ही सती, साध्वी, पतिव्रता होती है।) -को आज के बदले परिवेश और परिवर्तित जीवन शैली में कैसे AS IT IS लागू कर सकते हैं? आज का दृष्टिकोण तथा मान्यताएं व लोकाचार कुछ और हैं। जिस समय यह सूत्र बनाया गया, तब कुछ और थे। तब औरतों का नाचना-गाना, क्या शादी में जाना या घर से अकेले बाहर निकलना भी मान्य नहीं था। आज शादियों, पार्टियों में नाचना, गाना (औरतों का) एक आम बात है। अनेक गायिकाओं व नर्तकियों का यह पेशा ही है। अतः आज इस सिद्धांत में संशोधन करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार ज्योतिष को भी समझें। सनद के तौर पर दिल्ली का लांगीट्यूट 77° : 13 ही अब परिवर्तित हो चुका है। फिर भी बहुत से पंचांग अभी 77° : 13 के गणित से ही गणना कर रहे हैं। एक और उदाहरण के रूप में कुछ योग विवाह में विलम्ब (प्राय: 27-28 वर्ष) या अल्प सन्तान (1 या 2) का फल देते हैं। यह बात तब के लिए ठीक थी जब विवाह 16-18 वर्ष में हो जाते थे और 6-7 संतानें औसत मानी जाती थीं। आज 26-27 वर्ष से पूर्व कोई आत्मनिर्भर नहीं होता तो विवाह 27-28 वर्ष में होना सामान्य बात है। परिवार नियोजन की दृष्टि से जनमानस में आई क्रांति मात्र 1-21 संतानों तक ही सामान्यत: परिवार सीमित रखती है। आदि अनेक उदाहरण इस प्रकार के हैं। निष्कर्ष-अतः ज्योतिष में भी अन्य विषयों की भांति आगे शोध एवं विकास की सम्भावनाएं हैं। और आज की परिस्थितियों में, आज के परिवेश में, आज की जीवन शैली तथा परिवर्तित समाज व परिवर्तित वायुमंडल में ज्योतिष के

सभी सिद्धांत अन्धे होकर AS IT IS लाग नहीं किए जा सकते। अथवा उनको आन्तम नहीं कहा जा सकता। हमें इस संदर्भ में अंधी रूढ़िवादिता का त्याग कर नए अध्ययनों, नए शोधों को औचित्य की कसौटी पर कसकर संशोधनों या समायोजनों का स्वागत करना चाहिए। कमफल बन्धन व कार्य कारण सम्बन्ध–यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं आधारभूत तथ्य है। ज्योतिष के विरोधी हों या ज्योतिष के पक्षधर-दोनों को इन्हें तत्त्वतः समझना ही चाहिए तथा ज्योतिष से परे लौकिक या अलौकिक दृष्टि से जावन को देखनेवालों (संसारवादी या अध्यात्मवादी) के लिए भी यह जानना परमावश्यक है। क्योंकि ज्योतिष के ही नहीं समूचे जीवन तथा पुनर्जन्म व मोक्ष आदि के सम्बन्ध में भी यह ज्ञान अनेक उलझनों व प्रश्नों का स्पष्ट व सटीक समाधान कर सकता है। अत: मेरा यह आग्रह है पाठकों से कि इस प्रसंग को विशेष ध्यान, धैर्य तथा तन्मयता व जागरूकता से पढ़ें। इस अत्यंत गहन एवं विशद् तथ्य को संक्षेप में किन्तु सरलता व स्पष्टता से समझाने का प्रयास अपनी सीमित बुद्धि की सामर्थ्यानुसार करूंगा। कर्मफल बन्धन-पहले तो यह जानिए कि कर्म क्या है? और फल क्या है? किसी लक्ष्य की प्राप्ति या कामना के उद्देश्य से किया जाने वाला कार्य ही 'कर्म' है और कर्म का परिणाम ही 'फल' है। इस दृष्टि से क्रिया और कर्म में अन्तर है। क्रिया वह है जो स्वाभाविक रूप से (बिना कामना या लक्ष्य की प्राप्ति की इच्छा) होती है। जैसे पाचन, श्वसन, दिल का धड़कना आदि क्रियाएं हैं, न कि कर्म हैं। (पहली गलतफहमी तो यहीं से शुरू होती है कि हम अज्ञानवश क्रिया और कर्म को एक मान लेते हैं।) कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं-सुकर्म (अच्छे उद्देश्य के लिए), कुकर्म (बुरे उद्देश्य के लिए।) अथवा करने योग्य तथा न करने योग्य। और तीसरा है। विकर्म यानी उद्देश्यरहित कर्म। (इस तीसरे को बाद में चर्चा में लेंगे क्योंकि यह सामान्यतः लोक व्यवहार में सम्भव नहीं होता।) कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। हर कर्म का कोई न कोई फल या परिणाम अवश्य होता है। सुकर्म का अच्छा तो कुकर्म का बुरा । अथवा सुकर्म का सुख तो कुकर्म का दुख। या फिर सुकर्म का हितकारी और कुकर्म का अहितकारी। परन्तु जैसा भी हो-कर्म का फल अवश्य होता है। दूसरे शब्दों में कर्म सदा बन्धनकारी है। क्योंकि वह (भले या बुरे) परिणाम को भोगने के लिए कर्ता को प्रतिबन्धित कर देता है। फल या परिणाम भी अच्छे या बुरे दो प्रकार के हैं। इसके अलावा कालावधि की दृष्टि से कुछ फल तुरंत प्राप्त होते हैं तो कुछ फल कालान्तर में अपने कर्मों का परिपाक काल आने पर। इस सिद्धांत पर कर्मों को तोलें तो कर्म में दो विभाग जनेंगे। पहले सद्यफलदायो (तुरंत फल देने वाले) और दूसरे कालान्तर में फलित होने वाले (परिपाक काल आने पर फल देने वाले)। जैसे हाथ में चाकू लगना और बन निकल आना या भोजन करना और पेट भर जाना तुरंत फल की प्राप्ति है। परन्त बोज का बोना और बीज के अंकुरित होने, पौधा बनने, विकसित होने, पुष्पित, पल्लवित होने के बाद उस वृक्ष से फल का पास होना कालांतर या परिपाक काल आने पर फल मिलने का उदाहरण हुआ। यह कालान्तर या परिपाक काल आने पर प्राप्त होने वाले फल ही 'सञ्चित कर्म' अथवा 'भाग्य' भी कहे जाते हैं। इस प्रकार कर्म बीज है और भाग्य या परिणाम फल है। कों द्वारा ही भाग्य निर्मित होता है। यह कर्म और फल के निश्चित सम्बन्ध के कारण ही है। लेकिन कर्म बन्धनकारी है। क्योंकि निष्फल न होने से वह कर्ता को फल या भाग्य को भोगने के लिए प्रतिबन्धित कर देता है। उसे कर्ता को भोगना ही पड़ता है। यदि पूरे फल भोगे बिना (कर्मों का परिपाक काल आए बिना) ही कर्ता की आयु पूर्ण हो जाए और उसे शरीर छोड़ना पड़े तो उसका 'एकाउन्ट निल' नहीं हो जाता, बल्कि 'ड्यू' रहता है। परिणामतः कर्ता या जीव जब नया शरीर धारण करता है तब उसे उस जन्म में पूर्व कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इसी को जीव का दुर्भाग्य या सौभाग्य के साथ जन्म लेना कहते हैं। यह तो हुआ तस्वीर का एक रुख, जिससे कर्म का बीज होना और फल या भाग्य को उत्पन्न करने वाला होना सिद्ध होता है। (यहां दूसरी गलतफ़हमी पैदा होती है। क्योंकि हम केवल एक ही पहलू को पूरा मान लेते हैं, दूसरा पहलू देखने का प्रयास ही नहीं करते) तस्वीर का दूसरा रुख देखने के लिए इस कर्मफल बन्धन के सिलसिले को आगे बढ़ाना होगा। आगे बढ़ाने पर हम जान सकेंगे कि कर्म तो भाग्य या फल को उत्पन्न करता है, परन्तु भाग्य या फल आगे नवीन कर्म को भी। उत्पन्न करता है। तभी श्रृंखला पूर्ण होती है। तभी कर्मफल बन्धन का चक्र जीव को आवागमन में उलझाए रखता है। बीज (कर्म) से फल (भाग्य) उत्पन्न होता है। परन्तु यह बीज कहां से आता है? यह आसमान से नहीं टपकता। यह फल (भाग्य) से ही उत्पन्न होता है। फल और फल से बीज अथवा कर्म से भाग्य और भाग्य से कर्म प्रेरित व उत्पन्न होते हैं। यह एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया या श्रृंखला है। मर्गी से अंडा पैदा होगा तो अंडे से मुगी पदा हागा। यह नहीं कहा जा सकता कि पहले मर्गी आई अंडार यह नहीं कहा जा सकता कि पहले बीज आया या फल यह नहीं कहा सकता कि पहले बीज आया या फल? यह नहीं कहा जा सकता कि पहले कर्म आया अथवा भाग्य। जैसे चक्र या वत्त की परिधि पर STARTING POINT या ENDING POINT का निर्णय नहीं लिया जा सकता, वैसे ही कर्मफल के इस चक्र में प्रारम्भ कहां से हुआ, यह निर्णय नहीं किया जा सकता। अस्तु, जहाँ से यात्रा आरम्भ कर दें वहीं से आरम्भ बिन्द या STARTING POINT बन जाता है और उससे ऐन पीछे समापन बिन्दु या ENDING POINT बन जाता है। ठीक वैसे ही जैसे-जन्म, मृत्यु, जन्म, मृत्यु, जन्म, मृत्यु के आवागमन चक्र में जहां से गणना आरम्भ करें वहीं से शुरूआत मानी जाएगी। 'राम-राम' का पुनरावर्तन या 'मरा-मरा' का पुनरावर्तन यदि एक पंक्ति में हो तो उसे 'राम' या 'मरा' ऐसा निश्चित जाना जा सकता है। लेकिन जब यह पंक्ति की बजाय एक चक्र या वृत्त में हो तो वह चक्र 'राम-राम' शब्दों का है अथवा 'मरा-मरा' शब्दों का यह नहीं जाना जा सकता। अतः यह कहना कि जीवन कर्म प्रधान है या भाग्य प्रधान है। अथवा जीवन में कर्म का अधिक महत्त्व है या भाग्य का अधिक महत्त्व है, सम्भव ही नहीं है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे से लिपटकर चलते हैं, उन्हें काटा नहीं जा सकता। ___ गलतफ़हमी-फिर भी जो विद्वान कर्म को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं या जो भाग्य को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में समग्रदृष्टि वाले नहीं होते और तस्वीर का एक ही रुख देख रहे होते हैं। उस एक ही रुख को औरों के सामने रखकर वे पूरे समाज को दिशाभ्रमित करते हैं यह उनकी अल्पबुद्धि, अदूरदर्शिता व हठधर्मिता ही है। क्योंकि या तो वे दूसरा रुख देख नहीं पाते, या दूसरे रुख को नजरअंदाज करते हैं। क्योंकि वह उनकी रुचि के अनुकूल नहीं होता। आपकी रुचि या दृष्टिकोण के अनुसार ही सत्य भी हो ऐसा जरूरी नहीं है। आपकी पसंद-नापसंद, मत या दृष्टिकोण अलग बात है और सत्य या वास्तविकता अलग बात। ध्यान रखें कि सत्य को अधूरा कहना भी असत्य बोलने के समान ही घातक, भ्रामक व अन्याय होता है। कर्मफल बन्धन के इस चक्र को ज्योतिष की दृष्टि से सरल व्यावहारिक उदाहरण द्वारा और स्पष्ट कर दें, ताकि किसी प्रकार के विभ्रम या संशय की सम्भावना न रहे। जातक की जन्मपत्री में चन्द्रमा द्वितीय भाव में हो तथा राह या शनि का दूसर। भाव से दृष्टि या युति द्वारा सम्बन्ध हो रहा हो तो जातक मदिरा का सेवन करना वाला एवं मांसाहारी होता है (यदि अन्य स्थितियां विपरीत प्रभाव डाल रही हाता ऐसा मेरे ज्योतिष के गुरु गुलाटीजी का कहना है। जो तार्किकता व ज्योतिष सिद्धांतों के अनुसार सत्य है। जातक की जन्मपत्री में आठवें भाव में केत विराजमान हो तथा गुरु आ शुभ ग्रहों की दृष्टि या सुरक्षा का अन्य कोई कारण जमपत्री में उपस्थित नही ती जातक को बवासीर का रोग होता है। ऐसा मा ज्योतिष के दूमो गुरु सौशिकली का कहना है । तार्किकता तथा ज्योतिष के सिद्धांतानुसार यह भी सत्य है। अब विचारिए कि जिसकी जन्मपत्री में जातक को शराबी बनानेवाला पहला या बवासीर का रोगी बनाने वाला दूसरा योग प्रबल स्थिति में हो तो इसका अर्थ यह होगा कि पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ये ऐसा निश्चित भाग्य लेकर आया है। यानी कर्मों से उसके भाग्य का निर्माण हुआ। अब जब ऐसा भाग्य उसका निश्चित हो गया है तो वह शराब भी पीयेगा या ऐसे पदार्थ भी खाएगा और ऐसी दिनचर्या रखेगा कि उसे कब्ज आदि शिकायते ही (तभी तो बवासीर का रोग उत्पन्न होगा)। इसका मतलब उसका निश्चित भाग्य उसे कुछ विशेष प्रकार के कर्मों (शराब पीना या गरिष्ठ भोजन करना अथवा अनुचित दिनचर्या से रहना आदि) के लिए प्रेरित व बाध्य करेगा। यानी उसके । भाग्य से कुछ कर्म निर्मित होंगे। अब जब निरंतर शराब पीएगा या निरंतर कब्ज रहेगी तो उसका लिवर या किडनी आदि डेमेज होंगे, दूसरी ओर बवासीर की तकलीफ होगी। यानी ये कर्म उसका नया भाग्य बनाएंगे या उसे नए फल भोगने को प्रतिबन्धित करेंगे। तकलीफें व रोग होने से व्यक्ति उनके इलाज के लिए, औषधियों के सेवन, परहेज या ऑपरेशन कराने के लिए प्रेरित होगा। यानी ये नया भाग्य उसे नवीन कर्मों के लिए प्रेरित व बाध्य करेगा। यदि उसकी आय शेष हई तो इन इलाजों से उसे लाभ होगा या नया भाग्य प्राप्त होगा। यदि आय नहीं शेष होगी तो इलाज के बाद भी बिना लाभ प्राप्त किए मर जाएगा। मर जाएगा तो इलाज के लिए किए गए ये कर्म उसे पुनर्जन्म में भाग्य रूप से प्राप्त हो जाएंगे। । निष्कर्ष-इस संक्षिप्त व्यावहारिक उदाहरण से यह सहज ही सिद्ध होता है। कि व्यक्ति अपने कर्मों के लिए भी पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। उसका भाग्य उसे विशेष प्रकार के ही कर्म करने के लिए प्रेरित व बाध्य करता है और वे किए गए कर्म विशेष उसे नए फल भोगने के लिए बाध्य कर देते हैं। नए फल को भोगने के लिए व्यक्ति फिर कुछ विशेष प्रकार के कर्म करने को प्रतिबन्धित हो जाता है। इस प्रकार भाग्य से कर्म और कर्म से भाग्य का यह सिलसिला शृंखलाबद्ध रूप से निरंतर चलता है। मृत्यु के बाद भी यह सिलसिला थमता नहीं (क्योंकि मृत्यु देह की होती है, जीव का नहा। और जीव को कुछ कर्मा के फल भोगने शेष रह जाते। फल उसे भाग्य बनकर नए जन्म में प्राप्त होते हैं। शेष फलों को भोगने के लिए ही उसे अगला जन्म लेना पड़ता है। ल का यह बहीखाता जब तक NILL न हो जाए तब तक जीव आवागमन चक्र में फंसा रहता है। क्योंकि पुराने 'बैलेंस' को भोगने के लिए उसे नया शरीर धारण करना पड़ता है। लेकिन उस बैलेंस को भोगने के लिए उसे जो कर्म करने पड़ते हैं, वे उसका आगे बैलेंस 'ड्यू' कर देते हैं। खाता NILL नहीं हो पाता। मुक्ति या मोक्ष तभी सम्भव हो पाता है जब कर्मफल के बहीखाते में कुछ बैलेंस ड्यू' न रहे। जब खाता NILL हो जाए। इसके लिए ही कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा हठयोग-ये चार उपाय हैं। दूसरे शब्दों में 'योग' ही इसका मूल उपाय है। (प्रस्तुत पुस्तक का यह विषय नहीं है। अत: इन उपायों की चर्चा यहां विस्तारपूर्वक करना युक्तिसंगत नहीं है। फिर भी जो पाठक रुचि रखते हों वे मेरी पुस्तक 'कुण्डलिनी जागृत कैसे करें' जो इसी प्रकाशन से प्रकाशित है को पढ़कर जिज्ञासा शांत कर सकते हैं। यहां भी प्रसंगवश 'कर्म योग' की चर्चा आगे करेंगे, संक्षेप में। क्योंकि कर्मफल बन्धन में कर्मयोग की चर्चा अप्रासंगिक नहीं होगी।) कर्मयोग-सुकर्म-कुकर्म/सत्कर्म/दुष्कर्म-सभी को तीसरे प्रकार के कर्म (विकर्म-जिसको प्रारम्भ में कहा था) बना देना ही 'कर्मयोग' है। यह कर्मफल बन्धन से मुक्ति का एक उपाय है, जिसे गीता में श्रीकृष्ण ने विस्तार से समझाया है। दरअसल फल के प्रति आसक्ति या विरक्ति ही कर्ता को कर्म तथा फल से बांधती है। क्योंकि कर्म किसी कामना या इच्छा (अच्छी या बुरी) के कारण किया जाता है और साथ में कर्त्ता का 'अहं' (मैं भाव) संयुक्त होता है। अतः फल की प्राप्ति पर सुख-दुख आदि बन्धन होते हैं। इसलिए निष्काम भाव से (बिना फल की इच्छा के) तथा समस्त कर्म ईश्वर को समर्पित करते हुए ('मैं' भाव हटाकर) करना ही कर्मयोग है और यही मुक्ति का उपाय भी है। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, कर्म-अकर्म, इच्छा-अनिच्छा, राग-द्वेष, सख- दुख, अपना-पराया, रुचि-अरुचि, अनुकूल-प्रतिकूल, मोह-घृणा, आसक्ति-विरक्ति सब भेद बुद्धि को समाप्त करके, कर्त्ता भाव (अहं) का समर्पण करके कर्म करते चले जाना ही कर्मयोगी का एकमात्र उद्देश्य हो जाता है और वह साक्षी भाव से जीता है। अत: नवीन कर्मों के फल से नहीं बंधता और पुराने फलों को भोगने में उसे हर्ष या पीड़ा नहीं होती। जैसा कि श्रीमद्भगवद गीता में स्पष्ट कहा गया है- बुद्धि युक्तो जहातीह उभे सुकृत दुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ अर्थात् समबुद्धि युक्त (जब भेद भाव समाप्त होकर सुख-दुख, पाप-पुण्य आदि सब समान हो जाते हैं) पुरुष पुण्य व पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है (उनसे बंधता नहीं, मुक्त रहता है)। अत: तू समत्वरूप योग में लग। यह समत्वरूप योग (सभी को समान देखना) ही कर्मों में कुशलता है यानी कर्म फल बन्धन से छूटने का उपाय है। आगे समदर्शी होकर कर्मयोगी हुए पुरुष के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण और भी स्पष्ट रूप से कहते हैं- नैव तस्य कृतेनाओं नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।। अर्थात् उसे इस विश्व में न तो कर्म करने से ही कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही। तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी उसका किञ्चित मात्र भी स्वार्थ सम्बन्ध नहीं रहता है (उसके लिए न कुछ कर्म है, न अकर्म और न कोई अपना है, न ही पराया। वह समदृष्टा है)। तस्माद्सक्तः सततं कार्य कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ।। अर्थात् इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भली-भांति करता रह। क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है (ब्रह्मलीन/मुक्त हो जाता है)। आगे और भी स्पष्ट कहते हैं- यदृच्छालाभ सन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कत्वापि न निबध्यते॥ अर्थात् जो बिना इच्छा के ही स्वतः प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है। जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से सर्वथा । अतीत हो गया है, ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बंधता। पूरी गीता ही ऐसे उद्धरणों से भरी पड़ी है। सबको प्रस्तुत करना अनावश्यक होगा। अतः पूरी गीता के सारतत्त्व को जो महर्षि अष्टावक्र ने आधे श्लोक में कह दिया है। वही कहकर इस प्रसंग को समाप्त करेंगे- यदा नाहं तदा मोक्षे, यदाह बन्धनं तदा। (जहां अहं नहीं है वहीं मुक्ति है, जहां अहं है वहीं बन्धन है।) पुनश्च बहुत से विद्वानों का गीता पर आरोप है कि गीता कर्म को प्रधानता देती है। परन्तु यह गहन विचार के अभाव के कारण ही है। वास्तव में गीता कर्म तथा फल की एवं कर्मफल बन्धन की पूर्ण विवेचना करने के बाद कर्म को विकर्म बनाने की या निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। इस विषय को विस्तार से किसी अन्य अवसर पर लेंगे, यहां संक्षेप में मात्र गीता के दो श्लोक ही कहेंगे- नादत्ते कस्यचित्यापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥ अर्थात् सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसी से अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं। अत: पाप-पुण्यादि कर्मों को महत्त्व देते हैं। इसलिए कर्म को नहीं योग को प्रधानता देते हुए घोषणा करते हैं- तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुनः ।। अर्थात् तपस्वियों से योगी श्रेष्ठ है। शास्त्रज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ माना गया है और कर्म करने वालों (कर्मकांडी व सकाम कर्मी) से भी योगी श्रेष्ठ है। अत: हे अर्जुन ! तू योगी हो! (क्योंकि योगी सर्वश्रेष्ठ है)। कार्यकारण सम्बन्ध-कर्मफल बन्धन को समझ लेने के बाद कार्य- कारण सम्बन्ध को समझ लेना भी आवश्यक है। क्योंकि इस सम्बन्ध में न जानकारी और भी बड़ी गलतफहमियां और संशय उत्पन्न कर देती है। यह इसलिए भी अनिवार्य है कि कार्यकारण सम्बन्ध और कर्मफल बन्धन को तत्त्वत: जाने बिना ज्योतिष को ठीक-ठीक जानना असम्भव है। अत: आपको ज्योतिष के प्रति अविश्वास हो या अंधविश्वास इस सम्बन्ध को जान लेने पर ही ज्योतिष को समझ पाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो पाएगी। अपने अविश्वास या अंधविश्वास को नष्ट करके ही ज्योतिष के प्रति आप विश्वास उत्पन्न कर पाएंगे। जिस प्रकार कर्म व फल का एक निश्चित सम्बन्ध है। उसी प्रकार कार्य और कारण में भी एक निश्चित सम्बन्ध है। जिस प्रकार कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसी प्रकार कोई भी कार्य कभी अकारण नहीं होता। हर कार्य के पीछे कोई-न- कोई कारण अवश्य ही विद्यमान होता है। (यह बात और है कि हम उस कारण को जान पाएं या नहीं।) जिन कार्यों के कारण हम जान नहीं पाते या हमारी सामर्थ्य/समझ से परे होते हैं, उन कार्यों या घटनाओं को हम 'संयोग' कह देते हैं। परन्तु वास्तव में सष्टि का कोई भी कार्य क्योंकि अकारण नहीं होता, अतः सृष्टि में 'संयोग' नामक (BY CHANCE जैसी) कोई स्थिति नहीं होती। 'इत्तफ़ाक' से कुछ नहीं होता।। दर्शनशास्त्र हर कार्य के मूल रूप से तीन कारण मानता है। पहला, मूल कारण, दूसरा निमित्त कारण तथा तीसरा समवाही कारण। सरल शब्दों में इन्हें हम-स्थूल कारण, सूक्ष्म कारण तथा सहयोगी कारण भी कह सकते हैं। मूल कारण-'मूल' इसलिए है कि उसके बिना कार्य होना सम्भव ही नहीं होता। क्योंकि वह कार्य से पूर्व भी विद्यमान रहता है, कार्य के दौरान भी और कार्य के बाद भी। दूसरे शब्दों में व्यक्त स्थिति में भी मूल कारण उपस्थित रहता है और व्यक्त से पूर्व व पश्चात अव्यक्त स्थितियों में भी वह उपस्थित रहता है। अत: यह मूल कारण कहलाता है। निमित्त कारण-वह कार्य का माध्यम होता है। वह कार्य से पूर्व या पश्चात में अव्यक्त होता है। केवल कार्य को व्यक्त करते समय कुछ समय के लिए ही कार्य के साथ संयुक्त होता है। इसके बाद अलग हो जाता है। अत: उसे बाद में जानना या पहचानना प्राय: असम्भव होता है। मात्र उसके विषय में अनुमान लगाया जा सकता है। फिर भी यह निमित्त कारण मूल कारण से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि कार्य का माध्यम वही होता है। उसके अभाव में कार्य नहीं हो सकता। समवाही कारण-वह कार्य से पूर्व और पश्चात् में कार्य से संयुक्त नहीं रहता परन्तु कार्य के व्यक्त रूप में सूक्ष्म रूप से न केवल उपस्थित रहता है, बल्कि कार्य के साथ इस प्रकार संयुक्त रहता है कि उसके बिना कार्य अभिव्यक्त ही नहीं हो पाता। उसे हटाते ही कार्य का स्वरूप विकृत हो जाता है। यद्यपि वह मूल कारण व निमित्त कारण जैसा अनिवार्य नहीं होता (क्योंकि उसके विकल्प उपस्थित रहते हैं और वह कार्य की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, मात्र सहयोगी होता है) तथापि महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि उसके संयुक्त रहने से ही कार्य अभिव्यक्त होता है। उसके पृथक होते ही कार्य विघटित हो जाता है। कुछ समवाही कारण निमित्त कारण के साथ ही मूल कारण से जुड़ते हैं और कार्य हो जाने पर पृथक हो जाते हैं। ____ पाठकों की सुविधा के लिए इन तीनों कारणों को एक छोटे से लौकिक उदाहरण से समझाते हैं- पलंग बनने के कार्य में 'पलंग' कार्य की अभिव्यक्ति या व्यक्त रूप है। लकड़ी मूल कारण है। क्योंकि बिना लकड़ी के पलंग बन नहीं सकता और लकड़ी पलंग बनने से पूर्व भी (किसी और रूप में) थी, पलंग के वर्तमान अभिव्यक्त रूप में भी है और पलंग टूट जाने के बाद भी (किसी और रूप में)रहेगी। बढ़ई यहां निमित्त कारण है। क्योंकि वही पलंग की अभिव्यक्ति का निमित्त/माध्यम बना। बढ़ई के बिना भी लकड़ी पलंग के रूप में अभिव्यक्त नहीं हो सकती थी। बढ़ई पलंग बनने से पूर्व, पलंग के साथ वर्तमान में या पलंग बनने अथवा टूटने के बाद भविष्य में पलंग के साथ संयुक्त नहीं है। वह केवल कुछ समय के लिए मूल कारण (लकड़ी) से संयुक्त हुआ था और उसे पलंग के रूप में अभिव्यक्त करके फिर अलग हो गया। पलंग देखकर उसके विषय में जाना नहीं जा सकता, मगर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लकड़ी को पलंग के रूप में परिवर्तित करने वाला कोई था ज़रूर। पलंग की कारीगरी या सौंदर्य बढ़ई की कुशलता की झलक तो दे सकते हैं, परन्तु बढ़ई का परिचय/बायोडॉटा नहीं बता सकते। - कीलें, फेवीकोल, आरी, हथौड़ा, वसूला, बरमा, रंदा आदि यहां समवाही कारण हैं। इनमें से कुछ (आरी से रंदे तक) निमित्त कारण के साथ कुछ समय को संयुक्त हुए थे, परन्तु वर्तमान स्थिति में या भविष्य में पलंग के साथ संयुक्त नहीं हैं। (लेकिन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उनके सहयोग के बिना पलंग की अभिव्यक्ति। A S D F नहीं हो पाई होती।) और कुछ कोलें, फेवीकोल आदि ऐसे हैं जो वर्तमान स्थिति में भी पलंग के साथ संयुक्त हैं। जब वे भविष्य में पलंग से विलग होंगे तो पलंग अपना वर्तमान स्वरूप खो देगा (डिस्मेंटल हो जाएगा)। अत: महत्त्वपूर्ण हैं। पलंग एक लौकिक व स्थूल उदाहरण है। अत: इस कार्य (पलंग बनना) में तोनों कारणों को सविधापूर्वक जाना जा सका। परन्तु और सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म कार्यों या घटनाओं में इन तीनों कारणों को पहचान सकना इतना सुविधाजनक नहीं होता। अतः ऐसे मामलों में जहां कारण हमारी समझ से परे होते हैं, हम उस कार्य/घटना को 'संयोग' BY CHANCE कहकर काम चला लेते हैं। लेकिन 'संयोग' हमारी असमर्थता के कारण प्रचलन में आया शब्द, यह प्रकृति के सिद्धांत पर आधारित नहीं है। क्योंकि सष्टि प्रकति में संयोग'/ BY CHANCE कभी नहीं होता, जैसा कि पहले भी कह आए हैं कि कारण अवश्य विद्यमान होता है। मनुष्य के जन्म में भी आत्मा, तत्त्व, तन्मात्राएं आदि मूल कारण होते हैं। माता, पिता, कर्म आदि निमित्त कारण होते हैं तथा रक्त, अस्थि, मज्जा, त्वचा आदि। समवाही कारण होते हैं। इसी प्रकार मनुष्य जो कुछ जीवन में करता या भोगता है। जो कछ उसके। साथ व उसके द्वारा घटित होता है, उन सबके पीछे भी ये कारण मौजद रहते हैं। तब निमित्त कारण मनुष्य स्वयं होता है या परिस्थितियां अथवा अन्य लोग होते हैं। समवाही कारण मनुष्य के प्रयास/कर्म, उत्साह, ज्ञान/अनुभव तथा इच्छा आदि होते. हैं। किन्तु मूल कारण ईश्वरीय विधान या उसके द्वारा पूर्व निर्धारित योजना (जिसे सुविधा के लिए हम भाग्य कह सकते हैं। अन्यथा उसे नियति या विधि का विधान कहना अधिक एक्यूरेट होगा) होती है। किन्तु अपने अज्ञान व अहंकारवश मनुष्य स्वयं को अथवा परिस्थितियों को ही उन कार्यों या घटनाओं के प्रति जिम्मेदार मानता है और कर्त्ताभाव से ग्रस्त हो जाता है। यही ब्रह्म की माया की प्रबलता है। इसी को अविद्या भी कहा जाता है। अपने सम्पूर्ण समर्पण द्वारा अथवा आत्म साक्षात्कार द्वारा जब मनुष्य को जानालोक प्राप्त होता है तभी उसकी अविद्या दूर होती है। (इनमें कर्म योग व भक्ति योग अपर्ण समर्पण पर आधारित है तथा सांख्य/ज्ञानयोग एवं हठयोग आत्मसाक्षात्कार । पर आधारित हैं, यही ज्ञानोदय के मार्ग हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि- अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि। अर्थात् यदि तू अन्य सब पापियों से अधिक पाप करने वाला है (स्वयं को महापापी समझता है) तो भी तू ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप समुद्र से Enter भली भांति तर जाएगा। (क्योंकि)-न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला नि:संदेह कुछ भी नहीं है।) यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥ ___ अर्थात् क्योंकि हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है। यहा एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि जानाग्नि कर्मों को भस्म कैसे करेगा? ज्ञान में ऐसी क्या विशेषता है ? (यदि यह प्रश्न मस्तिष्क में न भी। आए तो भी इस स्पष्टीकरण को पढ़िए ताकि ज्ञानाग्नि कर्मों को कैसे भस्म करेगा। इस बात को और स्पष्टता से समझा जा सके)-ज्ञान हो जाने पर ही पता चल पाएगा कि कार्यों या घटनाओं के जिम्मेदार हम अथवा परिस्थितियां नहीं हैं। कर्मों के कर्ता भी हम नहीं हैं। हम तो मात्र निमित्त/माध्यम हैं। करवाने वाला तो कोई और है। उसकी नियति/विधान या PROGRAMME के अनुसार ही सब हो रहा है। यह ज्ञान होने पर ही 'अहं'/मैं भाव शनैः शनैः नष्ट हो जाएगा और जब को भाव ही न होगा तो कर्म या फल का बन्धन भी नहीं रहेगा। इस बात को पहले 'कर्मयोग' के प्रसंग में कह आए हैं। निष्कर्ष-कर्मफल बन्धन तथा कार्यकारण सम्बन्ध को समझ लेने से हमारी दृष्टि व्यापक होकर समग्रता की ओर बढ़ती है। हम 'कूपमण्डूक' नहीं रहते हैं। अत: ज्योतिष जैसे गूढ़, विराट और आध्यात्मिकता से जुड़े विषय को ही नहीं इसी प्रकार के अन्य गहन विषयों को समझ पाने की हमारी क्षमता बढ़ती है और ज्योतिष तो विशेषकर कार्य-कारण सम्बन्ध व कर्मफल चक्र पर आधारित है। अत: इन दोनों को जाने बिना ज्योतिष को तत्त्वत: जाना ही नहीं जा सकता। फिर भी स्वत: अनुभूत करके ज्ञान प्राप्त करना सभी को सम्भव नहीं है। अत: उधार के ज्ञान या मांगे हुए ज्ञान से भी लाभ प्राप्त किया जा सकता है। (वह 100% नहीं होगा तो भी 30-40% तो होगा) अतः श्रीकृष्ण ने गीता में इस ओर भी संकेत किया है- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। अर्थात् उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भली-भांति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से, कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से (मात्र कुतर्क/विवाद/परीक्षा/टाइम पास के लिए नहीं, बल्कि जिज्ञासापूर्वक, ईमानदारी से) वे परमात्म तत्त्व को भली-भांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्व का उपदेश करेंगे। यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। हे पांडव! जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार के मोह को प्राप्त नहीं होगा।  s D . पूर्वाग्रह या हठधर्मिता-'पूर्वाग्रह' का अर्थ है पहले से ही किसी विषय अपना आग्रह' या निर्णय रखना और हठधर्मिता का अर्थ है तकशास्त्रवन्याय की कसौटियों पर कसे जाने पर अपना निर्णय आग्रह/मत यदि अनुचित, गलत निराधार या भ्रामक सिद्ध होता हो, तब भी उस पर अड़े रहना। हठधर्मा 'जाटवटि या 'साकट' (अडियल स्वभाव) होता है और पूर्वाग्रही पक्षपाती होता है। सत्य की प्राप्ति के लिए निष्पक्षता के साथ, सजगत के साथ सभी आग्रहों से मुक्त होकर विश्लेषण अनिवार्य है। उचित को स्वीकारने के लिए (भले ही वह अपने मत से विपरीत हो) तथा अनुचित को त्यागने के लिए (भले ही वह अपने मत के अनुकूल हो) दोषों को सुधारने के लिए और सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु को सभी संकोच, सभी आग्रह, सभी हठ तथा अहं त्यागकर प्रयासशील रहना ही चाहिए। तभी प्रगति सम्भव है। अन्यथा प्रगति के सभी विकल्प हम स्वयं बन्द कर लेते हैं। जानना और मानना दो अलग-अलग बातें हैं। जानने के बाद मानना, या जाने बिना मानना (अथवा मानते हुए भी न जानना) भी दो अलग-अलग बातें हैं। पूर्वाग्रही मात्र मानता है, जानता नहीं है और हठधर्मी जो मानता है उसे जानना ही नहीं चाहता। इस प्रकार वह मिथ्याभास/गलतफहमी में जीता है। उसी में संतुष्ट भी रहता है और उससे बाहर निकलना भी नहीं चाहता। अतः ऐसे व्यक्ति के उद्धार, प्रगति या सत्य को साक्षात् कर पाने को कोई मार्ग नहीं होता। ऐसे ही 'जडबुद्धि' । के लिए कहा गया है--मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिले विरंचि सम। (यदि ब्रह्मा के समान गुरु मिल भी जाएं तो भी मूर्ख हृदय में चेतना उत्पन्न नहीं होती। वह जागता नहीं।) यहां एक विचारणीय प्रश्न है कि उचित/अनुचित का निर्णय कौन करेगा? सत्य असत्य का निर्णय कौन करेगा? दो पक्ष यदि एक विषय पर विपरीत मत रखते हैं और एक-दूसरे के मत को स्वीकारने या अपने मत को त्यागने को तैयार नहीं होते तो दोनों पक्षों में सही कौन है और गलत कौन? यह निर्णय कैसे होगा? दोनों ही स्वयं को उचित मानेंगे, उचित सिद्ध करने का प्रयास करेंगे और दसरे को अनुचित ठहराते हुए उस पर पूर्वाग्रही या हठधर्मी होने का आरोप लगाएंगे। ऐसे में सत्य का निर्णय कौन करेगा? हर पक्ष स्वयं को 'ब्रह्मा' और दूसरे को जड़बुद्धि' मानेगा। स्वयं को सही और दूसरे को गलत ठहराएगा। इस प्रश्न का बड़ा सीधा-सा उत्तर है और यही इस समस्या का एकमात्र व सर्वथा उचित समाधान भी है। स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में इस समाधान को उचित । ठहराया है और इसको स्पष्ट घोषणा की है- शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते यः न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ कामकारतः । अर्थात् जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को। (यानी उसे सफलता, चरम लक्ष्य की प्राति और आनन्द तीनों ही नहीं मिलते। सरल शब्दों में वह न इधर का रहता है, न ही उधर का बल्कि किधर का भी नहीं रहता।) तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ अर्थात् इसलिए तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में (क्या करें, क्या न करें? या क्या उचित है, क्या अनुचित?) शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है। अतः स्पष्ट है कि कौन सही है, कौन गलत? या क्या उचित है, क्या अनुचित? इस मामले में शास्त्र ही मात्र प्रमाण है। जिस पक्ष का मत शास्त्रसम्मत है, उसी को सही माना जाना चाहिए। विवाद करने वाले सभी पक्ष गलत तो हो सकते हैं। परन्तु सही यदि होगा तो एक ही होगा। वह एक वो होगा जो शास्त्र- सम्मत होगा। _ विशेष-फिर भी यहां एक 'घुण्डी' है (पाठकों का ध्यान उस ओर न भी जाए तो भी ईमानदारी का तकाजा है कि उसे पाठकों की दृष्टि में लाया जाए)। वह यह कि 'शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर (जानकर, केवल मानकर नहीं) तू शास्त्र विधि से नियत कर्म कर।' इस उपाय में भी 'जानकर' (ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं...) शब्द का प्रयोग किया गया है। यानी जो शास्त्रोक्त है उसे भी दर्शनशास्त्र (विशेषकर मीमांसा दर्शन और न्याय दर्शन क्योंकि 'मीमांसा' हमें विश्लेषण/एनालाइसिस बताता है और 'न्याय' हमें औचित्य की कसौटी पर कसना/परखना बताता है) द्वारा विवेचित करके उसका औचित्य जान लेने पर उसको अमल में लाना है। यानी अंधता नहीं सजगता भी चाहिए। ऐसा न हो कि आदमी 'लकीर का फकीर' हो जाए जैसा कि आमतौर पर बहुत से शास्त्रज्ञ हो जाते हैं। इस 'जानने' (ज्ञात्वा) पर इतना जोर क्यों है ? जाने बिना करने या जाने बिना मानने से क्या हानि है? यह भी स्पष्ट कर दें। जाने बिना मानने से संशय/भ्रम/ गलतफ़हमी होती है। पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है और जाने बिना करने से अहंकार, मोह और दम्भ उत्पन्न होता है, हठधर्मिता पैदा होती है। दोनों ही अविश्वास व अंधविश्वास को बढ़ाते हैं और मोह तथा अज्ञान में फंसाते हैं। मोह की दलदल से ज्ञान प्राप्त किए (जाने) बिना नहीं निकला जा सकता। श्रीकृष्ण ने गीता में यह स्थिति भी स्पष्ट कर दी है- यदा ते मोहकलिल बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ अर्थात् जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भली-भांति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों (झमेलों) से वैराग्य (मुक्त एवं ज्ञान) को प्राप्त हो जाएगा। (जब तक मोहग्रस्त है तब तक तत्त्वदर्शी यानी जो जैसा है उसे वैसा ही देखने/जानने वाला नहीं हो सकता।) श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।। अर्थात् (प्रतिपन्न का अर्थ 'एक्यूरेट'/सटीक होता है। 'विप्रतिपन्न' का अर्थ 'अनएक्यूरेट' या सटीक से उल्टा अर्थात् भ्रामक हुआ) भांति-भांति के विप्रतिपन्न वचनों (मतों) को सुनकर विचलित (भ्रमित/संशयग्रस्त) हुई तेरी बुद्धि जब एक मत (परमतत्त्वाशास्त्रोक्त सत्य) पर अचल/स्थिर हो जाएगी (ठहर जाएगी) तब तू योग (परमबुद्धि) को प्राप्त हो जाएगा। (यानी जब तेरी बुद्धि के संशय/भ्रम या असमंजसता समाप्त हो जाएगी तब तू एक निश्चित मत पर स्थिर हो जाएगा। इस प्रकार उस मत को स्थिर बुद्धि होने से जानकर तू प्रगति या योग को प्राप्त होगा। सरल शब्दों में जब तक MIND में कॉन्सेप्ट क्लीयर नहीं होगा तब तक तू प्रगति । नहीं कर सकता, दुविधाग्रस्त ही रहेगा।) ___ निष्कर्ष-अतः जाने बिना मानना (अंधविश्वास) तथा जाने बिना न मानना (अविश्वास) दोनों ही घातक है। किन्तु जानने के लिए सर्वप्रथम पूर्वाग्रह और हठधर्मिता को त्यागना होगा। तभी तो जिज्ञासा होगी और तभी ज्ञान प्राप्ति की। सम्भावनाएं उत्पन्न होंगी। ज्ञान प्राप्ति के तीन ही सुलभ मार्ग हैं-अपना अनुभव/प्रकृति (NATURE)/ ऑब्जर्वेशन । उपदेश या पुस्तकें (गुरु या सीनियर/ज्ञानी की शरण में जाना) तथा आत्मसाक्षात्कार/योग । इन तीनों में भी जो अन्तिम है, वह अत्यंत कठिन है। पहला अपेक्षाकृत कम कठिन है परन्तु दूसरा (उपदेश/पुस्तक/गुरु/ज्ञानी की शरण में जाना) अपेक्षाकृत आसान ह। किन्तु इस आसान मार्ग पर भी तभी चला जा सकता। है जब व्यक्ति पूर्वाग्रह तथा हठधर्मिता को छोड़कर ईमानदारी/निष्पक्षता, सरल । हृदयता/निष्कपटता और जिज्ञासा पूर्ति (न कि तकरार करने या सामने वाले को। एग्जामिन करने के उद्देश्य से जाए और समर्पण का भाव न रखे। समर्पण का भाव न रहन से भी गुरु कृपा प्राप्त नहीं होती। राम ने जब लक्ष्मण । को ज्ञान प्राप्ति के लिए अंत समय में महाज्ञानी रावण के पास भेजा था तो लक्ष्मण । रावण के सिरहाने खड़े हो गए थे। अविनय व असमर्पण के कारण लक्ष्मण को तब रावण से ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका था। अर्थ को सम्पूर्णता से न विचारना-यह उन तथाकथित ज्ञानियों के सन्दर्भ में है जो ज्योतिष या अन्य किसी भी विषय या शास्त्र के 'पण्डित' होने के भ्रम में जीते हैं और बस 'लकीर के फकीर' वनकर रह जाते हैं। मसलन मेरे एक दो परिचित हैं, जिन्हें गीता या अन्य शास्त्रों के बहुत से श्लोक कंठस्थ हैं। वे गाहे-ब- गाहे उनको सुनाकर अल्पज्ञों पर अपना पांडित्य झाड़कर गर्वित भी होते हैं, किन्तु तत्त्वदर्शी नहीं हैं। भावार्थ या गूढार्थ पर विचार न करके शब्दार्थ में ही अटक जाते हैं और फिर बाल की खाल निकालकर सत्य को झुठलाने का प्रयास करते हैं। सूत्रों/श्लोकों का कंठस्थ होना अच्छी बात है। परन्तु तभी जब उसके तत्त्व को हम समझते भी हों और उन्हें जीवन में उतारने की चेष्टा भी करते हों। अन्यथा । रटने के मामले में तोता और भी बेहतर है। मात्र आंकड़ों को स्मरण ही रखना हो। तो कम्प्यूटर आदमी से कहीं श्रेष्ठ है। यदि उनका अर्थ और प्रयोग न आता हो तो मात्र रट लेने का कुछ लाभ नहीं। ज्ञान पुस्तकों में दबा हो या दिमाग में, पुस्तकें पड़ी हों तो वैसे ही हैं, जैसे लाइब्रेरी में पड़ी हों या गधे की पीठ पर लदी हों। तब तो मात्र व्यक्ति पुस्तकों का बोझ ही ढोता है। बोझ पुस्तक का हो या लकड़ियों का, कोई अन्तर नहीं है। अतः अधिकाधिक शास्त्र पढ़ना या उन्हें कंठस्थ कर लेना लाभप्रद नहीं, बल्कि पढ़े हुए को वास्तव में समझ लेना और उसे अमल में लाना लाभप्रद है। इसके लिए आवश्यक है कि हम लेखक के हृदय को समझें। हम शब्द के मर्म को समझें। हम पढ़े हुए को विचारें, मंथन करें। न समझ में आने वाले भाग। को और भी जागरूकता से बार-बार पढ़ें, अपने से अधिक विद्वान की सहायता लें। प्राप्त निर्णय या तथ्यों को शास्त्रों की कसौटी पर कसें । इस प्रकार तत्त्व को जानें और। फिर विश्वासपूर्वक उसे प्रयोग में लाएं। ___ शब्द एक ही होता है, परन्तु उसके अर्थ अनेक होते हैं। कहां और कौन-सा। अर्थ युक्तिसंगत होगा, इसे तय करने के लिए अपनी सामान्य बुद्धि, सजगता व ज्ञान की ही नहीं, विषय/पुस्तक की आत्मा और लेखक के हृदय तथा दृष्टिकोण को भी दिमाग में रखना आवश्यक है। अन्यथा अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है। शब्द में शक्ति होती है। शक्ति के विस्फोट से अर्थ प्रस्फुटित होता है। लक्षणा शक्ति, अभिव्यंजना शक्ति आदि अनेक शक्तियां अर्थशक्ति के साथ छिपी रहती हैं। शब्द का शब्दार्थ, भावार्थ, गूढार्थ, प्रचलित अर्थ, पर्याय अर्थ, प्रासंगिक अर्थ आदि अनेक अर्थ शब्द में निहित रहते हैं। अतः शब्द को सरसरी तौर पर देखने या पढ़ने से बात नहीं बनती। उदाहरण के रूप में 'मुर्गे ने बांग दे दी।' का शब्दार्थ मात्र इतना है कि 'मुगे नामक एक पक्षी ने आवाज की।' किन्तु लक्षणा शक्ति के चमत्कार से इस वाक्य का वास्तविक अर्थ निकलेगा-'सवेरा हो गया। जबकि पूरे वाक्य में सवेरा होने का कहीं ज़िक्र नहीं आया है। ऐसे में शब्दार्थ ढूंढ़ने वालों को वास्तविक अर्थ का भान नहीं होगा। ___ 'सोना' का अर्थ GOLD भी है और 'सोना' का अर्थ SLEEP भी है और 'खाना' का अर्थ FOOD भी है, 'खाना' का अर्थ EATING भी है और खाना का अर्थ SQUARE या चौखंटा छोटा स्थान भी है। यही 'खाना' जब किसी और शब्द के साथ जुड़ जाता है तो इसका मतलब 'आलय' (रहने का स्थान) भी हो जाता है। जैसे-मुर्गीखाना, जुआखाना, दवाखाना आदि। उर्दू में खाना का अर्थ 'घर' होता है। जैसे 'खानाखराब' (बेघर), दौलतखाना (समृद्ध या सम्पन्न घर), गरीबखाना (झोंपड़ी) आदि। यही गलत पढ़ा जाए तो 'खाना' के स्थान पर रवाना' (कहीं प्रस्थान करना) हो जाता है। यदि इन अनेक अर्थों को नहीं विचारा जाएगा तो पता नहीं चलेगा कि कहां कौन-सा अर्थ 'एप्रोप्रिएट' (माकूल) होगा और गलत अर्थ ले लेने पर अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। _ 'गो' खड़ी बोली का एक शब्द है। इसका प्रचलित अर्थ 'गाय' है। किन्तु इसका एक अर्थ 'इन्द्री' भी है। गो का अर्थ ग्रह भी है। तभी गोचर-दशा कहा जाता है। और गो जीभ को भी कहते हैं। यथा-गो गोचर जहिं लगि मन जाई, तहं लगि माया जानेहु भाई। (अर्थात् इन्द्रियां और इन्द्रियों के विषय तथा जहां तक भी मन की पहुंच है, वहां तक माया का ही राज्य है।) और 'इन्द्रियां' भी 'गो' कहलाती हैं। (जबकि अंग्रेजी में 'गो' का अर्थ 'जाना' है)। यहां प्रसंगवश एक वैदिक कथा को संक्षेप में देंगे। वृत्रासुर नामक असुर ने गौओं को पकड़कर एक गुफा में बन्द कर दिया और इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा उस महा असुर का वध करके गौओं को छुड़ाया। ऐसी एक कथा वेदों में आती है। सभी अनुवादकों ने गो का अर्थ यहां गाय (cow) से लिया है। परन्तु 'गो' का दूसरा अर्थ 'इन्द्रियां' यहां अधिक सारगर्भित है। क्योंकि मात्र गौओं की रक्षा के लिए इतना सब प्रपंच करना ज़रूरी नहीं था। अवश्य ही यहां 'गो' का गूढार्थ 'इन्द्रियां' होना चाहिए। इन्द्रियों से इन्द्र का सम्बन्ध दोनों नामों से समानताओं से ही सिद्ध होता है। यह एक छोटा- सा उदाहरण है जो गूढार्थ को विचारने के लिए प्रेरित करता है। कथा को यहीं छोड़कर आगे बढ़ें तो किसी प्रसंग में 'गो' का अर्थ अत्यंत । सीधा, शरीफ व भोला व्यक्ति या स्त्री भी हो सकता है। जैसा कि कह दिया जाता है कि अमुक व्यक्ति/स्त्री तो निरा/निरी गो है। (यानी गाय की तरह सरल व सन्तोषी है।) यहां प्रासंगिक अर्थ होगा, जो शब्दकोश में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा।तरह उल्लू, गधा, बकरी, लोमड़ी, भेड़िया आदि जानवरों के नामों का प्रयोग प्रसंगवश किसी व्यक्ति के लिए हो जाता है। मुहावरों या लोकोक्तियों के तौर पर प्रयुक्त होने वाले वाक्यों का अर्थ शब्दार्थ से भिन्न होता हा अत: वहा प्रचलित अर्थ को ग्रहण करके भावार्थ जाना जाता है। शब्दार्थ निकालने पर अर्थ पकड़ में नहीं आता। जैसे–'कंगाली में आटा गीला', अंगर खट्टे होना', आदि। ऐसे स्थानों पर वास्तविक अर्थ कभी मात्र शब्दार्थ को ही विचारने से नहीं पकड़ा जा सकता। लिखने वाले का अपना अंदाज/शैली/स्टाइल भी कहीं पढ़ने वालों को विचारने को मजबूर कर सकता है। यथा-चौपड़ा साहब नहीं रहे, चौपड़ा साहब गुज़र गए, चौपड़ा साहब मर गए, चौपड़ा साहब स्वर्ग सिधार गए, चौपड़ा साहब. निकल लिए, चौपड़ा साहब अपने बच्चों को अनाथ कर गए, चौपड़ा साहब का टिकट कट गया, चौपड़ा साहब बैकुंठवासी हो गए, चौपड़ा साहब का दुनिया से दाना-पानी उठ गया, चौपड़ा साहब सदा के लिए हमसे रूठ गए, चौपड़ा साहब चिरनिद्रा में लीन हो गए, चौपड़ा साहब का राम नाम सत् हो गया, चौपड़ा साहब इन्तकाल फरमा गए, चौपड़ा साहब का जै शिव हो गया, मिसेज़ चौपड़ा विधवा हो गईं, चौपड़ा साहब के बीवी-बच्चे बेसहारा हो गए, चौपड़ा साहब महायात्रा पर चले गए, चौपड़ा साहब ख़ुदा को प्यारे हो गए, चौपड़ा साहब को भगवान ने अपने पास बुला लिया, अब चौपड़ा साहब कभी नहीं लौटेंगे, चौपड़ा साहब की सांसें उनसे रूठ गईं, जिन्दगी चौपड़ा साहब को दगा दे गई, चौपड़ा साहब को मौत ने गले लगा लिया, चौपड़ा साहब की आयु पूरी हो गई, चौपड़ा साहब काल कवलित हो गए, चौपड़ा साहब काल के गाल में समा गए, नियति के क्रूर हाथों ने चौपड़ा साहब को हमसे छीन लिया, चौपड़ा साहब ने दुनिया छोड़ दी, चौपड़ा साहब इतिहास बन गए, चौपड़ा साहब मिट्टी में मिल गए, चौपड़ा साहब पूरे हो गए आदि अनेक तरीकों से एक ही बात कही जा सकती है, जिन्हें ढंग से न समझा जाए तो कन्फ्यूजन हो सकता है कि चौपड़ा साहब कहां से गुज़रे हैं?' ___अतः पढ़ने वाले को तथ्य समझने के लिए पूर्ण सजगता आवश्यक है। अन्यथा वह पढ़ेगा ज़रूर, पर समझेगा नहीं। निष्कर्ष-कम से कम गूढ विषयों को तो विशेष सजगता और सावधानी से। पढ़ना चाहिए। शब्द के एक-एक अर्थ को विचारकर पढ़ना चाहिए। विषय की आत्मा तथा लेखक के दृष्टिकोण को समझकर उनके साथ साहचर्य बनाकर पढ़ना चाहिए (इसके लिए पुस्तक की भूमिका/प्रस्तावना/आमुख को पहले ज़रूर पढ़ें ताकि विषय और लेखक के दृष्टिकोण व स्तर के साथ पुस्तक की विषयवस्तु या पठनीय सामग्री का भी पूर्ण अनुमान हो सके)। भले ही बार-बार पढ़ना पढ़े लेकिन पढ़े हुए को समझना चाहिए। अर्थ का मंथन करना चाहिए। औचित्य की कसौटियों पर कसना चाहिए और तब उसे अमल में लाना चाहिए। पढ़ते समय आपका दृष्टिकोण नकारात्मक या खण्डनात्मक न हो, बल्कि सकारात्मक तथा सीखने वाला हो, पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। तभी आप पुस्तक के प्रति और स्वयं अपने प्रति भी न्याय कर पाएंगे। पुराना है इसलिए बेकार है, या पुराना है इसलिए काम का है?-किसी विषय, वस्तु, ज्ञान अथवा सिद्धांत को मात्र उसकी पुरातनता के आधार पर नहीं अपना लेना चाहिए और न ही मात्र उसके प्राचीन होने के कारण उसे त्याग देना चाहिए। यदि हम मात्र परम्परा या प्राचीनता के आधार पर ऐसा करेंगे तो यह हमारे 'पढ़े-लिखे बेवकूफ़' होने का खुला सबूत होगा। कहावत है कि OLD IS GOLD लेकिन साथ में यह भी ध्यान रखिए- 'NOT ALWAYS' (यानी जो पुराना है वह मूल्यवान है, परन्तु हमेशा नहीं)। क्योंकि हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती' अत: यह भी मान लेना मूर्खता ही होगी कि हर नई वस्तु सोना ही होगी/मूल्यवान ही होगी। मूल्य या महत्त्व का आधार उसकी उपयोगिता और औचित्य है न कि उसका पुराना या नया होना। अगर हमारे पूर्वज कुछ गलत करते रहे हैं तो इसी आधार पर हम भी गलत को नहीं अपना सकते कि हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते रहे हैं। इसी प्रकार यदि कोई नई प्रणाली या नया नियम निकम्मा साबित हो रहा है तो भी मात्र उसके आधुनिक या नवीन होने के कारण ही उसका स्वागत भी नहीं किया जा सकता। सतर्क एवं निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद जो उपयोगी व उचित सिद्ध हो वही अपनाए जाने योग्य है। भले ही वह परम्परागत/प्राचीन हो अथवा नूतन/आधुनिक जैसा पहले भी कहा है कि अन्धा विरोध या अन्धा समर्थन दोनों मूर्खता है। दोनों हठधर्मिता है। सजगता प्राथमिकता है। यदि हम परम्परा की ही टांग पकड़कर लटकते तो बस लटके ही रहते। अरस्तु से गैलिलियो, गैलिलियो से न्यूटन और न्यूटन से आईस्टीन तक हमारे सिद्धांत व दृष्टिकोण विकसित न हुए होते अतः अन्धानुकरण से बचिए। भले ही वह परम्पराओं का हो, भले ही वह आधुनिकता का हो। यह बात कुछ छोटे व्यावहारिक उदाहरणा द्वारा और स्पष्ट की जा सकती है।। हमारे पूर्वज क्योंकि दीपक की रोशनी में रात को काम चलाते आए थे, इसलिए हमें भी ट्यूब लाइट या बल्ब की रोशनी में काम न करके दीपक की ही रोशनी में काम करना चाहिए? अथवा आवागमन के साधन बेहतर न होने से हमारे पूर्वजों ने वर्षाकाल को यात्रा आदि बाहरी कार्यों के लिए निषिद्ध किया था तो आज सभी सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी हम इस 'निषेधाज्ञा' का पालन मात्र इसलिए करें कि हमारे पूर्वजों ने भी ऐसा किया है ? यदि ऐसा करें तो हमारे पूर्वज तो आदिमयुग में असभ्य, असंस्कृत, जंगली और नंगे घूमने वाले थे। फिर आज हम शिक्षा, वस्त्रों, संस्कृति व सभ्यता को स्वीकार क्यों कर रहे हैं? हमें वैसा ही बने रहना चाहिए। ___ मुस्लिम धर्म अरब (रेगिस्तानी क्षेत्र) से आरम्भ हुआ। पानी सुविधापूर्वक उपलब्ध न होने से टोंटी/नलकीदार लोटा तब प्रयोग में लाया गया (ताकि पानी का अपव्यय न हो) तथा वही लोटा नमाज, रसोई, स्नानागार व शौचालय में प्रयुक्त किया गया। वजु' भी (उल्टे हाथ धोना) स्नान के स्थान पर, नमाज़ से पूर्व प्रयोग में लाया गया। गर्मी या सूर्य को सामने से न झेलना पड़े, अत: पश्चिम दिशा में मुख करके नमाज़ पढ़ने का प्रावधान किया गया। हफ्ते में एक बार वस्त्र धोने या गुसल की व्यवस्था बनाई गई। यह सब उस समय की मजबूरी थी। तब की परिस्थितियों के अनुसार उपयोगी था। परन्तु आज ऐसा नहीं है। फिर भी हम मात्र रूढ़िवादी होने की कट्टरता के कारण इन नियमों का अंधानुकरण करते हैं तो हमारे शिक्षित व विकसित होने का क्या लाभ? सायंकाल के बाद झाड़ लगाने से लक्ष्मी घर से चली जाती है। यह सिद्धांत जब बनाया गया तब रोशनी की उचित व्यवस्था नहीं थी। अंधेरे में या दीपक की कम रोशनी में झाड़ लगाने से कूड़े के साथ नीचे गिर गई कोई मूल्यवान चीज भी बाहर फेंकी जा सकती थी। तब के लिए यह सिद्धांत ठीक था। मगर आज रोशनी की समुचित व्यवस्था होने पर आवश्यकता पड़ने से शाम या रात को झाड़ क्यों नहीं लगाई जा सकती? (इसका अर्थ यह नहीं कि रूढ़िवादिता को तोड़ने के लिए हम रात को ही झाड़ लगाएं। क्योंकि प्रात:काल ही घर तथा अपनी साफ-सफाई कर लेनी चाहिए। सारा दिन गंदगी में काटकर रात को सफाई करना तो निरी बेवकूफी है। मगर इसका अर्थ यह अवश्य है कि जरूरत पड़े तो रात में भी पुनः सफाई की जा सकती है। ऐसा नहीं कि सुबह यदि सफाई किसी कारण न हो सकी। या पुनः गंदगी हो गई तो शाम ढल जाने के कारण गंदगी में ही पड़े रहें, सफाई न । करें, क्योंकि हमारी रूढ़ी इसका समर्थन नहीं करती।) परम्परा का औचित्य-परम्परा को समझे बिना परम्परा का औचित्य जाना नहीं जा सकता और समय व बदली परिस्थितियों को तोले बिना परम्परा अब निभाने लायक रह गई है या नहीं-यह भी नहीं जाना जा सकता। एक छोटी-सी शिक्षाप्रद कहानी के बाद इस प्रसंग को समाप्त करेंगे और विषय की ओर बढ़ेंगे। एक औरत ने घर में बिल्ली पाली हुई थी। करवा चौथ व अहोई अष्टमी पर वह घर में रंगोली वगैरह बनाती थी। बिल्ली पूजा के वक्त उसे खराब न कर दे इसलिए बिल्ली को उल्टे टोकरे के नीचे बन्द करके वह टोकरे के ऊपर बट्टा रख 

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