ज्योतिष प्रश्नोत्तरी
2.
विवाह में माता का गोत्र एवं पिता के गोत्र का त्याग करनाचाहिए, परम्परा की रक्षा के लिए यह जरूरी है।
3.
जहाँ तक हो सके, अपने धर्म का निर्वाह करते हुयेस्वजाति में विवाह करें। ताकि आपकी सन्तानें वर्णसंकरन कहलावें। खून की शुद्धि एवं वंशपरम्परा की रक्षाहेतु स्वजाति विवाह पर ही ध्यान दें।
4.
सुत, शील और धर्म-ये तीनों विवाह के अधीन हैं अतजहां तक हो सके अशुभ की निवृति हेतु जन्मकुण्डलीमिलाकर विवाह करें।
प्रश्न 172- शुक्र प्रह का यात्रा से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर :
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सन्मुख शुक्र की स्थिति में यात्रनहीं करनी चाहिए। अतः जिस दिशा में शुक्र उदय होताहै, उस दिशा की अभिमुख यात्रा में ही सम्मुख शुक्र विशेषदोषप्रद होता है। वक्र या असंगत शुक्र की संस्थिति मेंराजा किंवा राजपुरुष की आज्ञा से राजा शत्रु के वश मेंचला जाता है।
उत्तर :
यात्रा के शुभ मुहूर्त में प्स्थान कर यात्रा करते हुयेमध्य मार्ग में यदि शुक्र अस्त हो जाये तो भी शुक्रास्तकाल तक राजपुरुष को मार्ग में रुककर पुनः शुक्रोदय केपश्चात् शुभ समय में शेष यात्रा करनी चाहिए।कुछ विद्वानों ने कहा कि चन्द्रमा जब रेवती नक्षत्र से कृत्तिकानक्षत्र के प्रथम चरण में रहता है तब शुक्र अन्धा रहतहै।शुकर की अ् सथिति में सममुख शुक्र या दकषि शका दोष नहीं रहता। यह शुक्र का अपवाद वाक्य है।प्रश्न 173- यदि मुहूर्त ठीक नहीं है तथा किसी कार्य के लिए बाहर यात्रपर जाना जरूरी है तो वारदोष की निवृत्ति कैसे होगी?वारदोष एवंअशुभ की निवृतहेतरविवार को तामबूल (पान)
सोमवार को कांच में मुख देखकर, मंगलवार को सूखेधाण खाकर, बुधवार को गुड़ एवं गुरुवार को दही खाकर,शुक्र को राई, एवं शनिवार को वायविडंग नामक औषधया कालीमिर्च घर से प्रस्थान करते समय मुंह में रखकरनिकलने से सभी प्रकार के कार्य में सर्वत्र सिद्धिमिलती है।
प्रश्न 174- यज्ञ-प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्यों में पृथ्वी जाग रही है यासो रही है? इसका पता कैसे चले?
मंदिर-प्रतिष्ठा, यज्ञ-हवन इत्यादि कायों में सबसे पहले यहपता लगाया जाता है कि भूमि जाग रही है या सो रहीहै।सोईहुअवसथामेंभूमपूजनकानयधएजगतअवस्था में भूमि-पूजन शीघ्र फलदायी कहा गया है।इसका पता हमें सूर्य संक्रांति से चलता है। जिस मासमें भूमि-पूजन करना अभीष्ट हो उस माह की सूर्य संक्रान्तिसे 5/7/9/15/21 तथा 24 वें दिनों में पृथ्वी सोयी रहतीहै। कुछ विद्वानों के मत से 5/7/9/11/15/20/22/23/28में पृथ्वी-शयनदोष माना है। इस काल में कूप, तड़ाग,बीजवपन, हल चलाना, खनन इत्यादि नेष्ट माना गया है।
प्रश्न 175- लग्न की शुद्धि नहीं हो, विवाह शुद्ध न निकलता होतो क्या करना चाहिए?
उत्तर :लग्न शुद्धिर्यदा नास्ति, कन्या यौवनशालिनी।तदा वै सर्ववर्णानां, लग्नं गोधूलिकं स्मृतम्।।लग्न की शुद्धि न बनती हो, विवाह का मुहूर्त भी ठीकन बैठता हो, और कन्या युवावस्था को प्राप्त हो गयी हो,तो ऐसी अवस्था में सभी वर्ण गोधूलि वेला में विवाह करेंतो कोई दोष नहीं क्योंकि लक्ष्मी और नारायण का विवाहगोधूलि में हुआ। तब से गोधूलि का लम्न समस्त लोकों
में कल्याणकारी व प्रशस्त हो गया।
प्रश्न 176- विवाह-नक्षत्र कौन-कौनं-से कहलाते हैं?
उत्तर :
रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मूल, स्वाति, मृगशिरा, मधाअनुराधा, हस्त, चित्रा, श्रवण, धनिष्ठा, अश्विनी, ये विवाहनक्षत्र कहलाते हैं। इनमें किया गया विवाह सर्वसम्मत औरशुभ माना गया है।
प्रश्न 177- विवाह हेतु कौन-कौन-से मास प्रशस्त कहे गये हैं?उत्तर:माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़़, मार्गशीर्ष मास में विवाहप्रशस्त माने गये है। कार्तिक मास की पूर्णिमा सेपाँच-पाँच दिन आगे-पीछे विवाह करने में तिथि, वार, नक्षत्र,यहाँ तक कि त्रिबल भी नहीं देखा जाता।उत्तर:
प्रश्न 178- पुष्य नक्षत्र विवाह में वर्जित क्यों है?
पुष्य सब नक्षत्रों का राजा है तथा इसमें किया गया प्रत्येककार्य पुष्टि एवं बढ़़ोत्तरी को प्राप्त होता है, पर यह विवाहमें वर्जित है क्योंकि पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिनप्रजापति ब्रह्माजी का विवाह हुआ था तथा वही ब्रह्माजीदेवाधिदेव महादेव के विवाह के अवसर पर पार्वती परमुध्ध हो गये। इसके पूर्व ब्रह्माजी सरस्वती पर भीमुख्ध हुये थे। अतः शिवजी ने पुष्य नक्षत्र को श्राप दिया,पुष्यनक्षत्र शापित होने से विवाह-सगाई में ग्राह्म नहीं है।
उत्तर :
प्रश्न 179- पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र विवाह में वर्जित क्यों है?
विवाह वृन्दावन नामक प्राचीन ग्रन्थ में यह प्रमाण मिलाहै कि सीता का विवाह पूर्वाफाल्लुनी नक्षत्र में हुआ। सीताजीविवाह के बाद समस्त जीवन, वनवास, अपहरण एवं पतिद्वारा अग्निपरीक्षा जैसे कष्टों को भोगती रहीं अतः विद्वानऋषियों ने एकमत होकर, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को विवाहयोग्य नहीं समझा।
प्शन 180- गोधूलि काल का सही मानक समय क्या है?उत्तर :सूर्य का आधा बिम्ब जब पश्चिम में अस्त हो गया हो तबसूर्यास्त काल से 12 मिनट पूर्व एवं 12 मिनट बाद कुल1 घड़़ी की गोधूलि होती है।
कुछ विद्वान् सूर्यास्त से 16 मिनट पहले एवं 24 मिनटबाद तक कुल 2 घड़ी अर्थात् 48 मिनट को गोधूलि कालमानते है। जिस दिन की गोधूलि अमीष्ट हो उस दिनके स्थानीय पंचागं में सूर्यारत काल को देखकर इसमें 24मिनट कम करके जो समय आये, वह गोधूलि प्रारम्भ कामुहूर्त तथा सूर्यास्त में 24 मिनट जोड़कर जो समय आवेवो गोधूलि काल के समाप्ति का समय होगा।उत्तर:जन्मलग्न, चन्द्रलग्न एवं सूर्यलग्न-इन तीन लग्नों को एकही परिपेक्ष्य में देखने की पद्धति को सुदशर्न चक्र कहतेहैं। यह पद्धति महर्षि पाराशर ने अपनायी तथा वृहत् पाराशरहोराशास्त्र में इसके ऊपर से फलादेश देखने की सम्पूर्णविधि दी गयी है।
प्रश्न 181- सुदर्शन चक्र क्या है? इससे फल कैसे देखा जाता है?
मध्य के चक्र में जन्मलग्न, उसके बाद चन्द्रकुण्डली एवंसबसे ऊपर बाहरी घेरे में सूर्य-कुण्डली बनायी जाती है।जो भाव अधिक पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों अथवाजिस भाव से केन्द्र व त्रिकोण में, अष्टम व द्वादश स्थानमें पापग्रह हों तो उस भाव की हानि होती है। कुछ विद्वानोंने प्रत्येक भाव को 10-10 वर्ष देकर विशेत्तरी आयु सेसुदर्शन चक्रायुर्दाय' का निर्माण करके, दशाफल निकालकरभी फलादेश देने की व्यवस्था की है।
प्रश्न 182- नक्षत्रों से वर्षा कैसे जानी जाती है?
उत्तर :आर्द्रा से दस नक्षत्र स्त्री संज्ञक है, विशाखादि तीन नपुसंक
नक्षत्र है। मूलादि 14 पुरुष संज्ञक नक्षत्र है। स्त्री-पुरुषनक्षत्र में सूर्य आवे तो महावृष्टि होवे। स्त्री नपसुक के योगसे थोड़ी वर्षा, स्त्री-स्त्री में मेघ छाया रहे तथा पुरुष नक्षत्रके संयोग से वर्षा नहीं होती।
प्रश्न 183- वार किसे कहते हैं वे कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
भारत में सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का समय "वार"कहलाता है। 'उदयादुदयं वारः" अर्थात् प्रत्येक वार कादिन होता है, रात भी उसी वार की मानी जाती है। परन्तुपश्चिमी देशों में वार रात्रि के 12 बजे ही बदल दियाजाता है। जबकि भारत में रात्रि को 12 बजे तारीख तोबदल दी जाती है परन्तु वार सूर्योदय के पश्चात्ही बदलता है।
वार सात हैं :-
1. रविवार (आदित्यवार)
2. सोमवार (चन्द्रवार)
3. मंगलवार (भौमवार)
4. बुधवार
5. बृहस्पतिवार (गुरुवार)
6. शुक्रवार (भृगुवार)
7. शनिवार (मन्दवार)
प्रश्न 184- दिनमान् व रात्रिमान् किसे कहते हैं?
उत्तर :किसी भी वार. के सूर्योदय काल से सूर्यास्त तक के समयको "दिनमान कहते हैं और सूर्यास्त के अगले वार केसूर्योदय काल को "रात्रिमान" कहते हैं।
प्रश्न 185- सौम्य एवं क्रूरवार किसे कहते हैं?
उत्तर:
बृहस्पति, चन्द्र, बुध और शुक्र-ये वार सौम्य संज्ञक एवंमंगल, रवि और शनि ये वार क्रूर संज्ञक माने जाते हैं।सौम्य संज्ञक वारों में शुभ कार्य करना अच्छा माना जाताहै।
प्रश्न 186- वारों का स्वभाव क्या है?उत्तर:
रविवार-स्थिर, सोमवार-चर, मंगलवार-उग्र, बुधवार-सम,गुरुवार-मृदु, शुक्र एंव शनिवार उत्तम माना जाता है विद्याप्रारम्भ के लिए गुरुवार और वाणिज्य प्रारम्भ के लिएबुधवार प्रशस्त माना जाता है।
प्रश्न 187- होरा किसे कहते हैं? इसका वार से क्या सम्बन्ध है?संस्कृत भाषा में दिन के लिए "अह" तथा रात के लिए"रात्रि" शब्द का प्रयोग किया जाता है, अर्थात् एक दिनको "अहोरात्र" कहते हैं। "अहोरात्र" शब्द के आदि-अन्तके अक्षरों को छोड़ देने से संक्षेप में "होरा" कहाजाता है। पूर्व क्षितिज पर इस समय यदि मेष राशि काउदय होगा अर्थात् एक दिन में बारह राशियों का एकचक्र पूरा होता है। पूर्वाद्ध तथा उतरारद्ध की दृष्टि से प्रत्येकराशि को भी अंश के दो भागों में विभाजित किया गयाहै। इन भागों को ही होरा कहते हैं। इस प्रकार एक अहोरात्रमें 12 राशियों के होरा नामक 25 विभाग माने गये हैं।जिस दिन की प्रथम होरा का जो ग्रह स्वामी होता है,उस दिन उसी ग्रह के नाम का वार रहता है। अभिप्राययह है कि ज्योतिषशास्त्र में शनि, बृहस्पति, मंगल, बुध, रवि,शुक्र और चन्द्रमा से यह ग्रह एक-दूसरे से नीचे माने गयेहैं अर्थात् सबसे ऊँचा (ऊपरी कक्षा में) शनि और उससेनीचे बृहस्पति, उससे नीचे मंगल, मंगल के नीचे रवि इत्यादिक्रम से ग्रहों की कक्षायें हैं।
उत्तर:
एक दिन में 24 होराएँ होती है। एक घण्टे की एक होराहोती है। प्रत्येक होरा का स्वामी ऊपर, उल्लिलिखत कक्षाक्रमसे एक-एक ग्रह होता है।
सृष्टि आरम्भ में सबसे पहले सूर्य दिखलाई पड़ता है इसलिए
पहली होरा का स्वामी सूर्य माना जाता है। अतः पहलेवार का नाम आदित्यवार या रविवार है। इसके अनन्तरउस दिन की दूसरी होरा का स्वामी उसके पास वालाशुक्र, तीसरी का बुध, ग्यारहवीं का चन्द्रमा, बारहवी काशनि, तेरहवीं का शुक्र, सत्रहवीं का बुध, अठारहवी का चन्द्रमा,उन्नीसवीं का शनि, बीसवीं का बृहस्पति, इक्कीसवी कामंगल, बाईसवीं का रवि, तेइसवीं का शुक्र और चौबीसवी
का बुध स्वामी होता है।
तत्पश्चात् दूसरे की पहली होरा का स्वामी चन्द्रमा पड़ताहै। अतः दूसरा वार सोमवार या चन्द्रवार माना जाता है।इसी प्रकार तीसरे दिंन पहली होरा का स्वामी मंगल, चौथेदिन पहली होरा का स्वामी बुध, पाँचवे दिन पहली होराका स्वामी बृहस्पति, छठे दिन पहली होरा का स्वामी शुक्रतथा सातवें दिन पहली होरा का स्वामी शनि होता है।इसलिए क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि- येवार माने जाते हैं।
प्रश्न 188- होराओं का क्रम क्या है?
उत्तर :
होराएं 24 होती हैं। जो इस प्रकार हैं।
प्रश्न 189- वारों के स्वामी देवता कौन-कौन-से हैं?
रविवार के स्वामी शिव, सोमवार की स्वामिनी दुर्गा, भौमके स्वामी कार्तिकेय, बुध के विष्णु, गुरु के बह्मा, शुक्र केइन्द्र तथा शनि के काल स्वामी हैं।प्रश्न 190- किन वारों से क्या विचार करना चाहिए?
उत्तर :
उत्तर :
विवाह के समय बृहस्पति का, यात्रा के समय शुक्र का,दीक्षा या विद्यारम्भ के समय बुध का, सब कार्यों में चन्द्रमाका, युद्ध में मंगल का, धन-संग्रह में शनि का, राजदर्शनमें सूर्य का विचार करना चाहिए। जिस वार को, जो कार्यकरने को कहा गया है, उस वार की होरा में वह काम
करना चाहिए। तब उस कर्म का तत्काल शुभाशुभ फलमिलता है।
प्रश्न 191- दिशाशूल किसे कहते हैं? और यह कैसे होता है?शनिवार, सोमवार को पूर्व दिशां, गुरुवार को दक्षिण दिशा,रविवार व शुक्रवार को परिश्चम दिशा, और भौमवारबुध को उत्तर दिशा में यात्रा करना निषेध है। यानी इनदिशाओं में इन वारों को दिशाशूल माना गया है। दिशाशूलमें यात्रा वर्जित है।
उत्तर :
प्रश्न 192- वार दोष का परिहार कैसे किया जाता है?
उत्तर :
ज्योतिष शास्रानुसार रात्रिकाल में वार का दोष नहीं मानाजाता है। यदि अनिवार्य हो तो रविवार को पान खाकर,सोमवार को काँच में मुँह देखकर, मंगलवार को धनियाखाकर, बुधवार को गुड़, गुरुवार को दही, शुक्रवार को राई,शनिवार को वायबिडंग औषधि या काली मिर्च को घर सेप्रस्थान करते समय लेने से वार जनित दोष का परिहार
होकर, व्यक्ति को कार्य, में सफलता मिलती है।
प्रश्न 193-वारवेला किसे कहते हैं?
उत्तर: दिन में चार प्रहर होते हैं, प्रायः 8 घड़ी का अर्थात् 3घण्टे का एक प्रहर होता है। एक प्रहर के आधे को यामार्द्धकहते हैं। यह प्रायः 4 घड़ी का होता है। दिनमान केघटने-बढ़ने से इनमें भी अन्तर पड़ता है। दिन के आटभाग करने से आठ यामार्द्ध होते हैं। रविवार का चतुर्थ,सोमवार का सप्तम, मंगल का दूसरा, बुध का पाँचवाँ, बृहस्पतिका आठवाँ, शुक्र का तीसरा, शनि का छठा यामार्द्ध "वारवेला"होती है। इसमें कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। प्रत्येकवार में पूर्वोक्त वेला राहु की होती है अतः वर्जित है।
प्रश्न 194- वार और चौघड़िया का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर : राजस्थान में खास तौर से और पूरे भारत में चौघड़ियेके मुहूर्त लोकप्रिय व प्रसिद्ध हैं। दिन में आठ चौघड़ियेहोते हैं एवं रात्रि में भी आठ चौंघड़िये। फलतः दिन-रातमें 16 चौघड़िये होते है। दिन में बारह घण्टे के हिसाबसे लगभग डेढ़ घण्टे का अर्थात् 3 घड़ी सात पल काएक चौघड़िया होता है। वैसे गणित की सही जानकारीहेतु दिनमान् में आठ का भाग देने से एक चौंघड़िये कास्पष्ट सूक्ष्म मान आ जायेगा। अन्यथा सूर्योदय या सूर्यास्तमें इनका मान जोड़ देने से भी, इनकी गणना का स्पष्टक्रमः प्राप्त हो जाता है। इन चौधड़ियों का नाम व क्रमफल
इस प्रकार है
1. उ. = उद्दग (उत्पात)
2. च = चल (चंचल)
3. ला = लाभ
4. अ = अमृत
5. का = काल
6. रो = रोग
7. शु = शुभ
प्रश्न 195- राशि किसे कहते हैं? राशि क्या होती है?
उत्तर :
जिस प्रकार भूमि को अनेक भागों में विभक्त कर भूगोल कीशिक्षा सुगमता से दी जाती है, उसी प्रकार खगोल को भी360 कल्पित अंशों में विभाजित किया गया है। "राशि"वास्तव में आकाशास्थ ग्रहां की नक्षत्रावली की एक विशेषआकृति व उपस्थिति का नाम है। आकाश में न तो कोईबिच्छू है और न कोई शेर; पहचानने की सुविधा के लिए तारासमूहों की आकृति की समता को ध्यान में रखकर महर्षियोंने परिचित वस्तुओं के आधार पर राशियों का नामाकरणकिया है। हमारे ऋषियों ने समग्र आकाश को मोटे तौर पर12 भागों में विभाजित किया। आकाश में स्थित भचक्र 360अंश अथवा 108 भाग का होता है। समस्त भचक्र 12 राशियोंमें विभक्त होने से 30 अंशों या 6 भाग की एक राशि होतीहै। इस राश्यावली को ठीक से पहचानने के लिए समस्तआकाश मण्डल की दूरी को 27 भागों में विभक्त कर प्रत्येकभाग का नाम एक-एक नक्षत्र रखा।
सूक्ष्मता से समझने के लिए प्रत्येक नक्षत्र के चार भागकिए जो "चरण कहलाते हैं। चन्द्रमा प्रत्येक राशि में सदादो दिन संचरण करता है। उसके बाद वह अगली राशिमें पहुँच जाता है। इस प्रकार लगभग 27 दिनों में चन्द्रमाद्वादश राशियों में अ्रमण का एक चक्र पूरा कर लेता है।सारांशतः भारतीय ज्योतिष के मतानुसार जातक के जन्मसमय चन्द्रमा जिस राशि में भ्रमण कर रहा हो, वही जातककी जन्मकालीन राशि अथवा "चन्द्रराशि" होती है। भारतीयमत से इसी राशि को प्रधानता दी जाती हैं।
चन्द्र राशियाँ
राशि शब्द का अर्थ हम जान चुके है। जिस राशि में चन्द्रमा रहता है उसे चन्द्र राशि कहते हैं। भारतीय ज्योतिष शास्त्रमें जहाँ भी राशि शब्द का फलादेश कहा जाता है उसकाअर्थ हमेशा "चन्द्र राशि" से ही होता है। जबकि पाशचात्यज्योतिषी "सूर्य राशि" को ज्यादा महत्त्व देते हैं। सूर्य राशिकी चर्चा हम आगे कर रहे हैं। अब तक हम यह समझचुके हैं कि सत्ताइस नक्षत्र की बारह राशियाँ होती हैं इसलियेसवा-दो नक्षत्रों की एक राशि मानी गयी है। प्रत्येक राशिमें 9 चरण होते हैं। तथा प्रत्येक चरण पर भारतीय भाषाका एक अक्षर होता है जिसके लिए भारत में जातक कानामकरण-संस्कार किया जाता है। इसलिए ज्योतिष सीखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को इन नामाक्षरों से युक्त ज्योतिष राशिक्रम को कण्ठस्थ कर लेना चाहिए। यदि इसे नक्षत्र सहितयाद कर लें तो आपको आगे चलकर बहुत सुविधा होगी।यह क्रम इस प्रकार से है :-
प्रश्न 196- सूर्य राशि किसे कहते हैं?
उत्तर :
वर्तमान समय में "राशिफल" से सम्बन्धित अधिकांश पुस्तकेंपाश्चात्य ज्योतिष के आधार पर सूर्य राशि को प्रधानतादेते हुए प्रकाशित की जाती हैं। जिस प्रकार भारतीय ज्योतिषीचन्द्र राशि को ही जातक की जन्म-राशि मानते हैं औरउसे प्रमुख महत्त्व देते हैं उसी प्रकार पाश्चात्य ज्योतिर्विदजातक की "सूर्यराशि" को अधिक महत्त्व देते हैं।
जातक के जन्म-समय में सूर्य जिस राशि पर संचरण कररहा होता है, वही जातक की "सूर्यराशि" होती है। भारतीयगणना के अनुसार "वैशाखे स्थाप्यतेमेषयावदभानुश्च गण्यते'-वैशाख महीने के लगते ही सूर्य अपनी उच्च राशि "मेषमें प्रवेश कर जाता है। तथा विशाखा नक्षत्र में सूर्य काप्रवेश होने के कारण उस माह का नाम भी "वैशाख" रखागया। भारतीय ज्योतिषियों ने प्रत्येक मास की समाप्ति पूर्णिमा
पर ही मानी है तथा पूर्णिमा राशि को प्राप्त नक्षत्र केआधार पर ही मास का नाम रखा गया, यथा-विशाखासे वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ, पूर्वाषाढ़ा से आषाढ़, श्रवण सेश्रावण, पू. भाद्रपद से भाद्रपद, अश्विनी से आश्विन, कृत्तिकासे कार्तिक, मृगशिरा से मार्गशीर्ष, पुष्य से पौष, मघा सेमाघ, पू. फाल्ुनी से फाल्गुन, चित्रा से चैत्र। भारतीय महीनोंके नाम एवं सूर्य का राशि विभाजन, सभी वैज्ञानिक है,परन्तु पाश्चात्य ज्योतिषियों की गणना के अनुसार सूर्य प्रतिवर्ष21 मार्च के लगभग मेष राशि में रहता है और 16 अप्रैलतक इसी राशि में आता है और वृष राशि में चला जाताहै। वह इस प्रकार प्रत्येक राशि में 30 दिन तक का संचरणकरता हुआ आगे बढ़ता है। पाश्चात्य मतानुसार सूर्य कीसंचरण राशि ही जातक की जन्म-राशि होती है जिसका
क्रम इस प्रकार हैः -
मेष
21 मार्च से 16 अप्रैल,
वृष-
20 अप्रैल से 20 मई,
मिथुन-
21 मई से 20 जून,
कर्क-
21 जून से 22 जुलाई
सिंह-
23 जुलाई से 22 अगस्त,
कन्या-
23 अगस्त से 22 सितम्बर,
तुला-
23 सितम्बर से 22 अक्टूबर,
वृश्चिक
धनु-
मकर-
23 अक्टूबर से 21 नवम्बर,22 नवम्बर से 21 दिसम्बर,22 दिसम्बर से. 16 जनवरी,
कुम्भ-
20 जनवरी से 18 फरवरी,
मीन-
19 फरवरी से 20 मार्च तक।
प्रश्न 197-सूर्य राशि देखें या चन्द्र राशि? कौन-सी राशि देखनीचाहिए?
उत्तर:
इसी राशि (सूर्य) के आधार पर पाश्चात्य, विद्वान् एक महीनेतक लंगातार जन्म लेने वाले दुनिया के सभी व्यक्तिरयका चरित्र, भविष्य एवं शुभाशुभ दिनों पर प्रकाश डालतेहैं। ज्योतिष प्रेमियों के साथ यह समस्या कई बार आतीहै कि वे चन्द्र राशि देखें या सूर्य राशि? इस बारे में केदलइतना ही कहना है कि भला एक महीने तक लगातारजन्म लेने वाली दुनिया के सभी प्राणियों का चर्त्र, व्यवहारएक. समान कैसे हो सकता है ? फलतः भविष्य की यहप्रणाली स्थूल व गलत सिद्ध होती है एवं इस प्रकार कीस्थूल गणना करने से ज्योतिष की साख भी गिरती है।जबकि दैनिक चन्द्रगति के माध्यम से भविष्य कथन, प्राचीनभारतीय परम्परा पर अवलम्बित होने के साथ-साथ अत्यधिकि वैज्ञानिक भी है। यह भी ध्यान में रखना चाहिए किजब-जब गोचर का चन्द्रमा जन्मकालीन चन्द्रमा से अंशात्मकयुक्ति करेगा तो वह समय-विशेष, त्सम्बन्धी घटना के लिएज्यादा प्रभावशाली माना जायेगा। इसलिए राशिफल हमेशाभारतीय पद्धति के प्रथम अक्षरानुसार ही देखना चाहिए।प्रश्न 198-जन्मराशि देखें या नाम राशि? कौन-सी राशि देखें?उत्तर :ज्योतिष प्रेमियों के साथ दूसरी बड़ी समस्या यह है किवे जन्म-राशि देखें या नाम-राशि ? वैसे व्यक्ति-विशेष केजीवन का पूरा विवरण एवं जानकारी तो उस "जन्मपत्रिकाके द्वारा ही सम्भव है। परन्तु मोटे तौर पर जन्मकालीनचन्द्रमा का पता लगाने पर भी अमुक व्यक्ति का चरित्र,गुण व गतिविधि के बारे में बहुत कुछ बताया जा सकताहै। कई व्यक्ति इस चक्कर में रहते है कि राशि कौन-
सी प्रधान माने "जन्मराशि" अथवा "चालू नाम" राशि। इसकेलिए ज्योतिष शास्त्र निर्देश देता है -
विधयारम्ये विवाहे च सर्वसंस्कार कर्मपु।
जन्म राशिः प्रधानत्व, नाम-राशि न चिन्त्येत्।।
अर्थात् विद्यारम्भ, विवाह यज्ञोपवीत इत्यादि मूल संस्कारितविवाह आदि संस्कार कारयों में जन्म-राशि की प्रधानता होतीहै। नाम राशि पर विचार न करें परन्तु-
गृहे गामे खले क्षेत्रे, यज्ञे व्यापार कर्मणि।नाम राशिः प्रधानत्वं, जन्म-राशि न चिन्तयेत्।।
घर को आने-जाने पर, गाँव-प्रस्थान व यात्रादि पर, खेत-फर्म,फैक्ट्री इत्यादि के उद्घाटन व समापन पर तथा यज्ञ, पार्टीव नित्य व्यापार कर्मों तथा दैनिक कार्यों में नाम राशिप्रधान है-जन्म राशि नहीं।
प्रश्न 199-आकाश में राशियों का स्वरूप व आकृति कैसी है?
उत्तर :
राशियों का स्वरूप :-
मेषमेष राशि की आकृति मेंढ़े के समान है।
वृषवृष राशि बैल की आकृति वाला है।
मिथुनमिथुन राशि स्त्री-पुरुष का जोड़ा है।
कर्ककर्क राशि केकड़े के समान है।
सिंहसिंह राशि मृगराज शेर के समान आकृति लियेहुए है।
कन्यानौका में बैठी हुई स्त्री हाथ में धान व अग्नि लियेहुए है।
तुला
तराजू हाथ में लिये हुए पुरुष के तुल्य है।
वृश्चिक वृश्चिक राशि आकाश में डंकदार बिच्छू की आकृति
बनाती है।
धनु
घनुष हाथ में लिये हुए, कमर ऊपर मनुष्य एवमकमर के नीचे जंघा घोड़े के समान है।
मकर
हरिण के सदृश मुंख वाले मगरमच्छ के समान है।कंधे पर कलश लिये हुए पुरुष के सदृश है।मीनदो मछलियों के एक मुख पर दूसरी पूँछ लगाकरगौल बनी हुई है।
कुम्भ
प्रश्न 200-काल पुरुष के अंग से राशियों का क्या सम्चन्ध है?उत्तर :काल-पुरुष के सिर पर मेष, मुख में वृष, दोनों भुजाओंऔर छाती में मिथुन, हृदय में कर्क, उदर में सिंह, कमरमें कन्या, तुला नाभि के नीचे अर्थात् नाभि और लिंग, गुदामें वृश्चिक, दोनों जांघों में धनु, घुटनों में मकर, दोनों पिंडलीमें कुम्भ, दोनों चरणों में मीन रखें। इस तरह सब अंगोंमें द्वादश राशियों को स्थापित करके उनको काल-पुरुषके अंग मानें।
काल-पुरूष के अंगों के अनुसार पुरुष के जन्म-काल मेंविचार करें। जन्मकाल में जो राशि या भाव शुभ ग्रह दृष्टव युक्त हो, वह काल-पुरुष के जिस अंग में हो, वह अंगपुष्ट कहना चाहिए और जो राशि या भाव पापग्रह से युक्तव दृष्ट हो, वह अंग चोट सहित निर्बल या व्रणा तिल,मशक, लहसन युक्त कहना चाहिए।उत्तर:
प्रश्न 201-भिन्न-भिन्न राशियों के रंग क्या हैं ?मेष राशि का लाल वर्ण है। वृष का श्वेत, मिथुन का हरा,कर्क का श्वेतरक्त (गुलाबी), सिंह का पाण्डु (अल्प श्वेत).कन्या का विचित्र (अनेक रंग), तुला का काला, वृश्चिकका पिंगल (स्वर्ण जैसा), धनु का पीला, मकर का कुर्बर
(थोड़ा श्वेतपीत), कुम्भ का ब्रम और मीन का ख्वेत, इसक्रम से मेषादि राशियों के रंग कहें गये हैं।प्रश्न 202-भिन्न-मिन्न राशियों का वर्ण क्या है?उत्तर
मीन, वृश्चिक और वृषराशि ब्राह्मण वर्ण की है। धनु, मेषऔर सिंह का क्षत्रिय वर्ण है। कुम्भ, मिथुन, तुला, वैश्यवर्ण हैं। कन्या, मकर और कर्क शूद्र वर्ण हैं।प्रश्न 203-सम व विषम राशियाँ किसे कहते हैं ?उत्तर :
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ विषम राशियाँ कहलातीहैं। उन्हें क्रूर राशियाँ भी कहते हैं। तथा वृष, कर्क, कन्यावृश्चिक, मकर और मीन सम राशियाँ कहलाती हैं। ये सौम्यराशियाँ मानी जाती हैं।
प्रश्न 204-कौन-से प्रह किस राशि के स्वामी हैं ?
उत्तर :मेष व वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल, वृष और तुला काशुक्र, मिथुन व कन्या का बुध, कर्क का चन्द्रमा, सिंह कासूर्य, धनु व मीन राशि का स्वामी बृहस्पति, मकर व कुष्भराशि का स्वामी शनि कहे गये हैं।
प्रश्न 205-अस्त राशियाँ क्रिसे कहते हैं ?
उत्तर :
ग्रहां के उच्छ या नीच राशिगत होने में एक सामान्य सिद्धान्तहै कि, जो ग्रह जिस राशि में उच्च का है, उससे सातवीराशि में नीच का माना जाता है, जैसे सूर्य मेष में उच्चका रहता है किन्तु तुला में नीच का माना जाता है। ऐसेही, जो ग्रह अपनी स्वराशि में रहता है उससे सातवी राशिमें अस्त का माना जाता है। उसे यह असंगतता राशिगतसम्बन्ध से ही है। जैसे- सिंह राशि सूर्य का स्वगृह है,तो सिंह से सातवी राशि कुम्भ उसकी अस्त राशि है।स्मरण रहे- अस्त राशि में गया ग्रह सदा निर्बल माना
जाता है। परिचय के लिए ग्रहां के अन्तर्गत राशियों काविवरण आगे दिया गया है।
कुम्भ, सूर्य, मकर, चन्द्रमा की, वृष और तुला मंगल कीधनु और मीन, बुध की, कन्या और मिथुन बृहस्पति कीमेष और वृश्चिक, शुक्र की तथा कर्क और सिंह, शनि कीअस्त राशियाँ हैं।
प्रश्न 206-कौन-सी राशि पुलिंग है? और कौन-सी स्त्रीलिंग?उत्तर :मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुम्म, ये सभी पुलिंगराशियाँ हैं। इन्हें पुरुष राशि भी कहते हैं। वृषम, कर्क, कन्या,वृश्चिक, मकर, मीन- ये सभी स्त्रीलिंग राशियाँ है- इन्ेंस्त्री राशि भी कहते हैं।
प्रश्न 207-राशियों के स्वभाव क्या है?
उत्तर :-मेष, कर्क, तुला, मकर- ये सभीचर राशियाँ कहलाती हैं।
चर राशियां
स्थिर राशियाँ - वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ- ये समीस्थिर राशियाँ कहलाती है।
द्विस्वभाव राशियाँ - मिथुन, कन्या, धनु, मीन ये सभीद्विस्वभाव राशियाँ कहलाती हैं।
प्रश्न 208-राशियों के तत्त्व क्या हैं ?
उत्तर:अग्नि तंत्त्व - मेष, सिंह, धनु-ये अग्नि तत्त्व राशियाँकहलाती हैं।
पृथ्वी तत्त्व -
वृषभ, कन्या, मकर- ये सभी पृथ्वीतत्त्व राशियाँ कहलाती हैं।
आकाश तत्त्व -
जल तत्त्व
मिथुन, तुला, कुम्भ- ये सभी आकाशतत्त्व वाली राशियाँ कहलाती हैं।कर्क, वृश्चिक, मीन-ये सभी जलतत्त्व वाली राशियाँ कहलाती हैं।
प्रश्न 209-राशियों के उदयकालीन भागों को स्पष्ट करें।उत्तर :
पृष्ठोदय- मेष, वृषभ, कर्क, धनु, मकर- ये सभी पिछले।भाग में उदय होने वाली पृष्ठोदय राशियाँ कहलाती है।शीर्षोदय-सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ-ये सभी सिरसे उदय होने वाले शीर्षोदय राशियाँ कहलाती है।
उभयोदय- मिथुन, मीन- ये दोनों राशियां सिंर से भीउदय होती हैं तथा कभी पिछले भाग से भी उदय होतीहैं अतः दोनों ओर से उदित होने के कारण उभयोदय राशियाँकहलाती हैं।
प्रश्न 210-राशियों के उदित होने की दिशाएं क्या है ?
उत्तर :
राशियाँ
दिशा
मेष, वृषभ
पूर्व
मिथुन
दक्षिण-पूर्व
कर्क, सिंह
दक्षिण
कन्या
दक्षिण-पश्चिम
तुला-वृश्चिक
पश्चिम
धनु
उत्तर-पश्चिम
मकर, कुम्भ
उत्तर
मीन
उत्तर-पूर्व
प्रश्न 211-राशियो का बल क्या है ?
उत्तर :सभी शीर्षोदय राशियाँ दिवाबली मानी जाती है। सब पृष्ठोदयराशियाँ रात्रि बली होती है। उभयोदय राशियाँ दिन औररात्रि- दोनों समय एक समान होती हैं।
प्रश्न 212-राशियों की प्रजनन शक्ति क्या है ?उत्तर :कुम्भ, मीन, वृश्चिक, कर्क और मकर- ये प्रजायुक्त राशियाँहैं। कन्या, धनु मिथुन और सिंह- ये बांझ राशियाँ हैं।
वृष, मेष, तुला- ये अल्प प्रजावली राशियाँ है। तुला कापरारद्ध और वृश्चिक का पूर्वाद्ध दग्ध अर्थात् निर्बीज है। इनकासन्तान-भाव के विचार में उपयोग किया जाता है।प्रश्न 213-राशियों की चतुष्पदादि संज्ञा क्या है ?उत्तर :धनु का परार्द्ध, सिंह, वृष तथा मकर का पूर्वाद्ध और मेषये चतुष्द राशियाँ हैं और दशमभाव में बली होती है। कन्यामिथुन, कुम्भ, तुला, धनु आदि ये भागपुरुष राशियाँ हैं औरये लग्न में बली होती हैं।
मकर का परार्द्ध, मीन और कर्क जलचर राशियाँ है। देचतुर्थ स्थान में बली होती है। वृश्चिक राशि जलाशय है।यह सप्तम भाव में बली होती है।
द्विपद, अर्थात् नर राशियाँ केन्द्रगत होकेर दिन में बलीहोती है। चतुष्पद केन्द्र में जाने पर रात्रि में बली होतीहैं। सभी कीट केन्द्र में प्राप्त होकर सन्ध्या अर्थात् प्रातःसांय बली होती हैं।
प्रंश्न 214-राशियों की धातु इत्यादि संज्ञा क्या है ?उत्तर :विद्वज्जन मेषादि राशियों को क्रम से धातु मूल, जीव संज्ञाकहते है। इसी प्रकार मेषादि राशियों की.विषम और समसंज्ञा जानना चाहिए। सुवर्ण से मृत्तिका पर्यन्त, वृक्ष से तृणतक मूल जीव कूट अर्थात् प्राणिमात्र जीव जानना चाहिए।
प्रश्न 215-ग्रह-नक्षत्र और तारे किसे कहते हैं ?उत्तर :जिन ज्योतिर्मय पिण्डों को हम आकाश में देखते हैं, उनमेंमुख्यतः तारे, आकाश-गंगा, नीहारिका, सूर्य, चन्द्रमा, प्रह,उपग्रह, उल्का, धूमकेतु, इन्द्रधनुष, परिवेष गर्धर्वनगर आदिहैं। इन सभी को सामूहिक रूप से ब्रह्माण्ड कहते हैं। यहाँपाठकों की जानकारी हेतु संक्षेप में वर्णन करते हैं।
इस अनन्त आकाश में असंख्य प्रकाश बिन्दु टिमटिमा रहेहैं। हम उन्हीं को तारे कहते हैं। उन अनगिनत तारों मेंसे पाँच हज़ार तारे ऐसे हैं, जो सुगमता से देखे जा सकतेहैं। परन्तु उन सभी तारों को हम एक साथ नहीं देखसकते हैं। आधे तो क्षितिज के ऊपर होते हैं औरआधे क्षितिज के नीचे होते हैं। फिर क्षितिज के साथ कुछदूर ऊपर तक ही बहुत से तारे दिखाई नहीं पड़ते । अतःएक समय में एक स्थान से हम 2000 तारों सेअधिक नहीं देख पाते। यद्यपि तारा-मण्डल स्थर है, परन्तुपृथ्वी अपने कल्पित अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमरही है। इसी कारण सूर्य, चन्द्रमा तथा सभी ग्रह-नक्षत्र आदिहमें पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं औरऐसा लगता है कि मानो पृथ्वी स्थिर है और आकाशीयज्योतिर्पिण्ड पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं।
आकाश में इन लुकछुप कर चमकने वाले तारों को नक्षत्रकहते हैं। ये नक्षत्र वास्तव में प्रचण्ड रूप से जलते हुएअग्नि के विशाल पिण्ड हैं जिनमें आग की भयकरआँधियाँ और ज्वालाओं के भीषण तूफान हर दम चला करतेहैं। जिस प्रकार भूमि को अनेक भागों में विभक्त कर भूगोलकी शिक्षा सुगमता से दी जाती है उसी प्रकार खगोलको भी 360 कल्पित अंशों में विभाजित किया गया है।उनमें से 30-30 अशों की एक राशि बनाकर सम्पूर्ण खगोलको बारह भागों में बाँटा गया है और दूसरे प्रकार से यदिएक भाग मानकर खगोल के 29 भाग किये गये हैं जो29 नक्षत्रों के नाम से जाने जाते हैं। कई नक्षत्र एक-एक तारे है और कोई दो-दो के तथा अनेक अधिक तारोंके भी समिष्ट रूप हैं। नक्षत्रों की पहचान के लिए उनको
अलग-अलग नाम दिये गये हैं। प्रत्येक नक्षत्र चन्द्रमा केएक दिन का भोग होता है। अतः चन्द्रमा के एक-एक भोगको ध्यान में रखते हुए आकाश को 29 भागों में विभक्तकिया गया है। इस प्रकार से सम्पूर्ण आकाश 12 राशिऔर 28 नक्षत्रों में विभक्त है।
पश्न 216-ग्रह किसे कहते है ?
उत्तर :
जिनकी चमक शान्त या स्थिर होती है तथा जिनकापरिक्रमा-पथ निश्चित होता है, उनको ग्रह कहते हैं। भारतीयज्योतिष में, सूर्य, चन्द्रमा मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, और शुक्लपक्ष की नवमी से लेकर कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक केचन्द्रमा को शुभग्रह तथा शनि, राहु, केतु को पापग्रह मानतेहैं। बुध भी जब पापग्रह के साथ रहता है तो पापी होजाता है।
नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों से अब यह अच्छी तरह सिद्धहो चुका है कि आकाश के कुछ पिण्ड ऐसे हैं, जो सूर्यके चारों ओर घूमा करते हैं। इन्हीं पिण्डों को आजकलप्लेनेट कहते हैं। बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु, शनि, वरुण,इन्द्र और यम- ये नवग्रह खगोलीय दृष्टि से प्रथम है।इनके सिवा अनेक ऐसे छोटे-छोटे पिण्ड हैं, जो दिखाईनहीं पड़ते, परन्तु मंगल और गुरु की कक्षाओं के बीचसूर्य की परिक्रमा किया करते है। इन्हें अवान्तर ग्रह कहतेहैं। कुछ पिण्ड ऐसे भी हैं, जो ग्रहां की परिक्रमा करतेहैं और ग्रहों के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा करते हैं।ऐसे पिण्डों को "उपग्रह" कहते हैं। जैसे- पृथ्वी का उपग्रहचन्द्रमा है। मंगल, गुरु और शनि के अनेक उपग्रह हैं जिनकापता दूरदर्शक यन्त्र की सहायता से लगा है। क्योंकि येइतनें छोटे हैं और दूर हैं. कि खुली आँखों से ये नहींदिखाई देते।
किसी भी पाप या शुभ ग्रह का मूल्याकन कर फलादेशकरते समय यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि पापग्रहपाप राशि में, अपने शत्रु के घर में तथा नीच राशि मेंस्थर रहने पर अनुक्रम से अधिक अशुभ फल देने वालाहो जाता है। शुभ ग्रह की राशि में, शुक्र ग्रह की दृष्टिमें, स्वस्थान में, उच्च राशि में रहने पर उसके पापत्व मेंक्रमिक रूप से कमी आ जाती है। ऐसे ही शुभ ग्रह उच्चका, मूल त्रिकोणी तथा स्वगृही, मित्रगृही और मित्र याशुभग्रह दृष्ट रहने पर प्रतिलोम विधि से अधिकाधिक शुभफल प्रदान करता है और शत्रुग्रही, शत्रुदृष्ट पाप राशिगतएवं नीच का रहने पर प्रभावहीन किंवा अशुभ फल प्रदानकरता है।
पापग्रहों के लिए माना जाता है कि ये जिस भी किसीभाव में रहते हैं उसी की हानि करते हैं किन्तु देखने मेंआया है कि स्वगृही या उच्च का रहने पर ये उस भावको हानि नहीं पहुँचाते । तीसरे, छढे, ग्याहरवें भावों में पापग्रहका रहना अच्छा माना गया है।उत्तर :
प्रश्न 217-सूर्य ग्रह की खगोलीय विशेषता क्या है ?वास्तव में सूर्य भी एक तारा ही है, जो अन्य करोड़ों तारोंके समान आकाशगंगा का एक नागरिक है। परन्तु पृथ्वीके निकट होने के कारण इसका प्रकाश प्रखर है और बड़ाभी दिखता है। सूर्य आकाश में अकेला नहीं है। उसकेसाथ कुछ पिण्डों का परिवार भी है। सूर्य सौरमण्डल कासम्राट है। हमारे सौरमण्डल का व्यास लगभग 20 अरबकि.मी. है। सभी ग्रह सूर्य को केन्द्र मानकर अण्डाकार कक्षामें उसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य भी अपनी कल्पितधूरी पर परिश्रमण करता है। इस प्रकार सूर्य लगभग सवा
पच्चीस दिन में एक बार आत्म-परिक्रमा कर लेता है। 24घण्टे के दिन में सूर्य की भचक्र में अमण गति एक अंशहोती है। सारे भचक्र की परिक्रमा वह 375 दिन और 6घण्टे में करता है। कालक्रम से ग्रहाँ की, प्रहाँ से उपग्रहाँकी उत्पति हुई, उन्हें भी चन्द्रमा कहते हैं।
जिस प्रकार पृथ्वी के चारों ओर एक चन्द्रमा घूमता है उसीप्रकार मंगल के चारों ओर चन्द्रमा घूमता है। बृहस्पति केतेरह, शनि के नौ, अरुण के पाँच तथा वरुण के दो चन्द्रमाघूमते हैं। बुध, शुक्र, यम, कुबेर तथा इन्द्र प्रह के कोई चन्द्रमानहीं है। ब्रह्माण्ड के सभी पदार्थ एक दूसरे को अपनी ओरआकर्षित करते हैं। ग्रह अपनी कक्षाओं में जिस समय सूर्यके निकटतम होते हैं, उस समय उनकी गति अधिक तीव्रहो जाती है। जब दूर होते हैं तो इनकी गति मन्द हो जातीहै। वस्तुतः सूर्य का गुरुत्वाकर्षण ही इन ग्रहों की अ्रमण कक्षाओंको बनाता है और उस पर नियन्त्रण भी करता है। सूर्य हमारीपृथ्वी से 15,70,00,000 कि.मी. की दूरी पर है। इसका व्यास13,52,800 कि.मी. है। सूर्य यदि भीतर से खोखला हो तोपृथ्वी जैसे 13 लाख पिण्ड़ उसमें समा सकते है। पृथ्वी परजो वस्तु एक किलो भार की है उसका भार सूर्य पर 29किलो होगा। सूर्य के रवि, विस्वान, भानु, भास्कर, सविता,दिवाकर, प्रभाकर अर्क, आदित्य, अनन्त, मार्तण्ड, महीधर आदिअनेक नाम है।
प्रश्न 218-सूर्य के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर :
यह सिंह राशि का स्वामी है एवं सिंह , मेष, वृश्चिक एवंधनु लग्न का योगाकार ग्रह है। सिंह राशि के 20 डिग्री अशतक स्वगृही रहता है। मेष राशि के 10 डिग्री अंशों तक यहनीच का कहलाता है। तुला में सूर्य नीच का तथा तुला के
दस अंशों तक सूर्य परम नीच का कहलाता है। शनि औरशुभ इसके नैसर्गिक शत्रु है, चन्द्र, मंगल व बृहस्पति इसकेमित्र ग्रह हैं एवं बुध के साथ इसका समभाव है। कर्क वकुम्भ लग्न के लिए यह मारक ग्रह है।
प्रश्न 219-सूर्य के कारकत्व पर प्रकाश डालें।उत्तर:
नवग्रहों में सूर्य ग्रहराज कहा जाता है। यह जगतचक्षु वनेत्रों का कारक ग्रह माना गया है तथा पारिवारिक दृष्टिसे यह पिता का कारक माना गया है। सूर्य अग्नितत्त्वप्रधान है अतः पित्त प्रकृति वाला ग्रह है। इससे नेत्र-ज्योति,सिरदर्द, पाचन संस्थान, पाचन में सम्बद्ध पेचिश, मन्दाग्नि,बुखार एवं तापप्रधान रोगों का विचार किया जाता है। वैसेयह आत्मा का कारक ग्रह है तथा शरीर में यह अस्थयोंकी कोमलता या दृढ़ता, स्वस्थता या क्षीणता का कारकहोता है। सूर्य पूर्व दिशा का स्वामी होकर क्रूर व पापग्रह के रूप में प्रतिष्ठित है। सुवर्ण इसकी प्रिय धातु एवं"माणिक्य" में इसका निवास माना गया है।
प्रश्न 220-सूर्य से प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसा होता है ?सूर्य बली जातक का व्यक्तित्व आकर्षक और प्रभावशालीहोता है। ऐसा व्यक्ति बहादुर होता है तथा इसकाआत्मविश्वास बढ़ा-चढ़ा होता है। किन्तु वह शीघ्र हीक्रोधित हो जाता है। सूर्य उच्च. का रखने पर जातकधनी-मानी और राज्य-कार्य में प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित रहताहै। मूल त्रिक्कोण में रहने पर व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठाऔर वैभव दिलवाता है। स्वगृही रहने पर जातक को आकर्षकव्यक्तित्व, उग्न प्रकृति, व्यभिचारी और स्वच्छन्दचारी बनाताहै। मित्रगृही हो तो व्यक्ति के मित्रों की संख्या अधिक रहतीहै, शत्नुग्रही रहने पर पिता के स्नेह से वंचित और नौकरी
उत्तर:
से जीवन-यापन करने की स्थिति उत्पन्न करता है। नीचराशि का रहने पर व्यक्ति को दुराचारी किन्तु बान्धवों कासेवक बनाता है।
प्रश्न 221-चन्द्र ग्रह की खगोलीय विशेषता क्या है ?उत्तर:
चन्द्रमा हमारी पृथ्वी का ही उपग्रह है। जिस प्रकार पृथ्वीसूर्य की परिक्रमा करती है उसी प्रकार चन्द्रमा भी पृथ्यीके चारों ओर घूमता है। वह हमारा सबसे निकट का पड़ोसीहै। यह सदैव अपना एक भाग पृथ्वी के सम्मुख रखकरउसकी अण्डाकार कक्ष में परिक्रमा करता है। जिस समयचन्द्रमा पृथ्वी से सर्वाधिक निकट होता है, उस समय वहपृथ्वी से 3,56,600 कि.मी. दूर ही रहता है। इस प्रकारइसकी मध्यमान दूरी लगभग 3,86,000 कि.मी. है जो पृथ्वीके व्यास का लगभग एक चौथाई है। इसकी गुरुत्वाकर्षणशक्ति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के 1/3 भाग के बराबरहै। ऐसी वस्तु जिसे पृथ्वी पर उठाना कठिन हो, चन्द्रमापर गेंद की भाँति उसे उछाला जा सकता है। चन्द्रमास्वयं प्रकाशित पिण्ड नहीं है, चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश कोपृथ्वी पर परिवर्तित करता है। यद्यपि पूर्णिमा को चन्द्रमाहमें बहुत तेजवान् दिखाई देता है। फिर भी चन्द्रमा कीचांदनी जितनी हमारी पृथ्यी पर पड़ती है, उससे कई गुनाअधिक पृथ्यी का प्रकाश चन्द्रमा पर पड़ता है। पृथ्वी पररहते हुए हम देखते हैं कि चन्द्रमा अपनी कलाएँ बदलतारहता है। चन्द्रमा पृथ्यी की परिक्रमा करता हुआ जब पृथ्यीऔर सूर्य के मध्य आ जाता है, उस समय हम चन्द्रमाका अ्धेरा भाग ही देख पाते है। चन्द्रमा की उस अवरथाको अमावस्या कहते है। अमावस्या को कुण्डली में सूर्यचन्द्रमा इकदटे हो जाते है। लगभग 15 दिनों के बाद
चन्द्रमा बढ़ता हुआ जब दूसरी ओर हो जाता है तो उसकापूर्ण प्रकाशित भाग दिखाई देता है। चन्द्रमा की उस स्थितिको "पूर्णिमा" कहते हैं। पूर्णिमा को चन्द्र सूर्य से 180°के अन्तर पर, अर्थात् सूर्य से सांतवें स्थान पर होता है।चन्द्रमा जब सूर्य तथा पृथ्वी से 60° के कोण पर होताहै, उस समय हम उसका आधा भाग ही देख पाते हैं,उसी को अर्द्धचन्द्र अर्थात् अष्टमी का चाँद कहते हैं।चन्द्रमा को पृथ्वी की एक परिक्रमा करने में 27.3 दिनलगते हैं। चन्द्र की औसत भ्रमण-गति एक मिनट में एकअंश है। प्रति दिन स्थान-विशेष के कारण चन्द्रमा की शुक्लताघटती-बढ़ती रहती है। चन्द्रमा प्रतिदिन पिछले दिन कीअपेक्षा 53 मिनट देरी से उदय होता है। अतः ज्वार-भाटाभी एक स्थान पर पिछले दिन की अपेक्षा 53 मिनट देरीसे आया करता है। जैसे- किसी समुद्र में आज दोपहर12 बजे ज्वार-भाटा आया है तो कल उसके आने का समय12 बजकर 53 मिनट होगा और उसके अगले दिन एकबज कर 46 मिनट होगा। इस प्रकार प्रति दिन 53-53मिनट आगे-ही-आगे बढ़ता चला जायेगा।उत्तर:
प्रश्न 222-चन्द्र के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।
चन्द्रमा कर्क राशि का स्वामी है, इसमें यह स्वगृही कहलाताहै। वृष राशि के तीन अंश तक यह परमोच्चय कहलाता है।इसी राशि के 4 से 30 डिग्री अंश तक यह मूल त्रिकोणीकहलाता है। वृश्चिक राशि में यह नीच का हो जाता है तथाइस राशि के 6 अंश तक यह परम नीच कहलाता है। बुध1, सूर्य, इसके मित्र ग्रह, बृहस्पति, शुक्र व शनि इसके समग्रह हैं। सम्पूर्ण ग्रहों में यही एक ग्रह, है, जो किसी भी अन्यग्रह के साथ शत्रु-भाव नहीं रखता परन्तु बुध इससे गुप्त शत्रुता
रखता है। फिर भी यह बुध को मित्र मानता है। राहु औरकेतु से ग्रसित होने पर यह "पाप ग्रस्त" कहलाता है। यरमिथुन लग्न के लिए मुख्य मारक, मकर लग्न में द्वितीय मारक,कर्क लग्न के लिए शुभ व तुला वृश्चिक लग्न के लिए योगकारक ग्रह है। यह द्विस्वभाव ग्रह है। यानि अकेला ही पापऔर शुभ फलदाई बन जाता है। शुक्ल पक्ष की नवमी सेकृष्ण पंक्ष की पंचमी तक यह "पूर्ण बली" कहलाता है। पूर्णबलीमें यह शुभ और क्षीण बली में यह अशुभ फल देता है। यहपश्चिमोत्तर दिशा का स्वामी है। शीघ्रगामी तथा पृथ्वी का सबसेनजदीक ग्रह होने से गोचर में मानव शरीर पर इसका प्रभावसर्वोपरि है। विशोत्तरी दशा के अनुसार दस वर्ष और अष्टोत्तरीमहादशा के अनुसार चन्द्रमा की दशा 15 वर्ष की होती है।उत्तर :
प्रश्न 223-चन्द्र के कारकत्व पर प्रकाश डालें।
चन्द्रमा स्त्रीकारक ग्रह माना गया है। यदि सूर्य ग्रहां काराजा है तो इसे "रानी कहना उपयुक्त होगा। चन्द्रमासुख-स्थान और माता का कारक है व समरत रसों कास्वामी है, अतः जगत् के समस्त स्त्री-पुरुषों का वात्सल्यभाव में सम्वर्द्धन करता है। स्त्रियों में स्थित कामभावनाएवं मासिक धर्म का सीधा सम्बन्ध चन्द्रमा से है। पवित्रवेदों के अनुसार समस्त औषधियां चन्द्र किरण से पुष्ट होतीहैं। फलतः यह "औषधीश" कहलाता है। ऋग्वेद की एकऋचा के अनुसार चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन कीकल्पना मनोविचारों पर चन्द्रमा का गहरा प्रभाव है। यहजलीय ग्रह है, फलतः समुद्र में स्थित ज्वारा-भाटा एवं मानवशरीर से प्राप्त 75 प्रतिशत नमकीन जल इसके घटनेबढ़ने से प्रभावित होता है। जल ग्रह होने के कारण न्यूमोनियाकफ जनित रोग, फेफड़े पर टी.बी, सर्दी, जुकाम व
साईटिका, कैन्सर रोग इससे प्रभावित होते हैं। यह भी देखनेमें आया है कि इसके निर्बल रहने पर प्रायः व्यक्ति शीतजनितरोगों से पीड़ित रहता है। रक्त-प्रवाह, हृदय, बायां नेत्र इसकेअधिकृत क्षेत्र हैं। श्वेत रंग का यह कारक ग्रह है। मोतीमें इसका निवास एवं चांदी इसकी प्रिय धातु है।प्रश्न 224-चन्द्र से प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसा होता है ?उत्तर :चन्दबली जातक और गौर वर्ण वाले, सुन्दर नेंत्रों वाले,मृदभाषी एवं कोमल स्वभाव के भावुक व्यक्ति होते हैं। चन्द्रमाका स्पष्ट प्रभाव नेत्र, दाँत, वाणी व रंग की स्निग्धता सेआंका जा सकता है। ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान्, प्लानिंग मास्टर,मिष्टभाषी, व राजनीति में दक्ष होते हैं।
चन्द्रमा उच्च राशि का होने पर व्यक्ति मिष्टान्नभोजी औरअलंकार प्रिय बनता है पर जातक धनी और सुखी रहताहै। कर्क राशि में चन्द्रमा मूल-त्रिकोणी रहने पर जातकधनी और सुखी तेजस्वी नेत्र वाला, मोहक व्यक्तित्व सम्पन्नतथा कलाकार होता है। मित्नग्रही होने पर उन्नतिशील, सुखीऔर सम्पन्न बनाता है।
चन्द्रमा नीच राशि का होने पर धर्म-बुद्धि का ह्रास करताहै। जातक को दुरात्मा और दुखी बनाता है। शत्रु-गृही होनेसे माता के स्नेह-सुख से वंचित और हृदय को कमजोरकरता है तथा वाहन व नौकर सुख में कमी देता है।प्रश्न 225-मंगल ग्रह की विशेषता क्या है ?उत्तर :
सौर-मण्डल में पृथ्वी के बाद मंगल ग्रह का चौथा स्थान है।मंगल सूर्य से 22,40,00,000 कि.मी. की दूरी पर है। इसकाव्यास 6860 कि.मी. है और अपने परिभ्रमण मार्ग पर 689दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। मंगल की अ्रमणगति 45 दिन में 20 अंश या डेढ़ दिन में एक अंश है। इसका
गुरुत्व हमारी पृथ्वी के गुरुत्व के दसवें भाग के बराबर है।जिस प्रकार हमारी पृथ्वी के इर्द-गिर्द चन्द्रमा घूमता है उसीप्रकार मंगल के चारों ओर दो चन्द्रमा घूमते हैं। मंगल जबपृथ्वी के निकटतम होता हैं तब पृथ्वी से उसकी दूरी 9.8करोड़ कि.मी. की होती है। उस समय यह लालमणि के समानचमकता हुआ दिखलाई देता है। तथा उसका अध्ययन भीसुगम रहता है।
मंगल ग्रह अस्त होने के 120 दिन बाद फिर उदय होताहै। उदय के 300 दिन बाद वक्री होता है। वक्री के 60दिन बाद मार्गी तथा मार्गी के 300 दिन बाद पुनः अस्तहोता है। मंगल को अंगारक रुधिर, आग्नेय, त्रिनेत्र, भौम,भूमिसुत, कुज आदि नाम दिये गये हैं।उत्तर :
प्रश्न 226-मंगल के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।
मंगल अग्नित्त्व प्रधान तेज्स ग्रह है। यह ग्रहों का सेनापतिहै। यह मेष व वृश्चिक राशि का स्वामी है। मकर राशिमें उच्च एवं कर्क राशि में मंगल नीच का कहलाता है।मकर राशि के 28 डिग्री अंश तक मंगल उच्च का तथाकर्क राशि के 28 अंश तक यह परम नीच राशि का तथामेष राशि के 28 डिग्री अंश तक यह मूल त्रिकोणी कहलाताहै। सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति इसके मित्र, बुध, शत्रु और शनिव शुक्र समभाव रखने वाले ग्रह हैं। कर्क, सिंह, धनु औरमीन राशियों में यह मित्र-गृही और मिथुन व कन्या में शत्रुगृहीकहलाता है। मंगल, वृष और तुला लग्न वालों के लिएमारक ग्रह है तथा कर्क व सिह लग्न वालों के लिए मंगलयोगकारक है। मीन लग्न मे मगल स्वय मारकेश का कार्यन करके, साहचर्य से फल देता है। यह दक्षिण दिशा कास्वामी है। विशेत्तरी दशा के अनुसार इसकी महादशा 6
वर्ष और अष्टोत्तरी आठ वर्ष रहती है। यह लाल रंग कास्वामी है। मूँगा में इसका निवास है एवं ताँबा इसकी प्रियधातु है।
प्रश्न 227-मंगल के कारकत्व पर प्रकाश डालें।उत्तर :
मंगल को पृथ्वी-पुत्र यानि भौम कहते है। इससे वीरता,भाइयों, रोग, शत्रु, जमीन-जायदाद कृषि व भूमि-सम्बन्धीक्रिया-कलापों पर विचार किया जाता है। मंगल तीसरे तथाछठें भाव का कारक ग्रह है। दसवें भाव में बैठने से यहदिक्बली माना जाता है। यह बलवान्, ठग, क्रूर ग्रह मानाजाता है। वक्री होने पर यह अत्यन्त बली हो जाता हैतथा प्रबल राजयोग देता है। गुरु के साथ होने से यहसात्विक बन जाता है एवं सूर्य के साथ राजभाव को बढ़ाताहैं। शनि के साथ होने से यह जातक को मुकदमेबाज़ीऔर बदमाशी में उलझाता है। मंगल पुरुष में शुक्राणुओंका कारक है जिसकी कृपा बिना पुत्र-सन्तान की उत्पत्ति,पैतृक सम्पत्ति व भूमि का लाभ सम्भव नहीं। लग्न से 3/4/7/10/11 में स्थानबली कहलाता है। जिस जातक कीकुण्डली में 1/4/7/12 भावों में मंगल चला जाता है, वहमांगलिक कहलाता है।
प्रश्न 228- मंगल से प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसा होताहै ?
उत्तर:मंगल प्रधान व्यक्तित्व अनुशासन को मानने वाला, वीर, पराक्रमी,साहसी, उद्दण्डी होता है। ताकत से ऐसे व्यक्ति को नहींदबाया जा सकता है। काम व क्रोध इसकी मुख्य कमजोरीहैं। प्रहारक और रक्षक, शंक्ति का ज्ञान मंगल से ही प्राप्तकिया जा सकता है। जिन लोगों की कुण्डली में यह ग्रहबलवान् होता है उनको शासन या सेना में उच्च पद प्राप्त
होता है। ऐसा जातक उदार ह्ृदय वाला, लाल नेत्र वाला,घुँघराले बालों वाला, शौकीन, अक्खड़ व अस्थर स्वभाव काहोता है। मंगल प्रधान व्यक्ति अपनी आलोचना या विरोध कोजरा भी सहन नहीं कर पासे तथा क्रोध आने पर ये समीमर्यादाएँ भूलकर हाथा-पाई पर उतर आते हैं। जहां नम्रताव सज्जनता विफल हो जाती है वहां पर मंगलबली लोगअपने व्यक्त्व रौब व धौस से अपना काम निकालने में सफलहो जाते हैं। उच्च राशि में स्थित मंगल व्यक्ति को साहसी,वीर और विजेता, मूल त्रिकोण में क्रूर व ह्ृदयहीन तथा उग्रप्रकृति, मित्र-गृही मित्र-मण्डली का प्रिय और सम्मान प्राप्तकरने वाला बनाता है।
मंगल नीच रशि में रहने से व्यक्ति स्वार्थी और नमकहरामतथा शत्रुगृही में रहने से गन्दा, दुखी, चिन्तित और निर्धनहोता है।
प्रश्न 229-बुध ग्रह की खगोलीय विशेषता क्या है ?
उत्तर :
बुध सूर्य के सबसे निकट का ग्रह है। इसी कारण इसपर भंयकर उष्णता है। बुध सूर्य से 5,80,00,000 कि.मी. की दूरी पर है और अपने परिश्रमण मार्ग पर 88 दिनमें सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। बुध सदैवअपना एक भाग सूर्य के सम्मुख रखकर सूर्य की परिक्रमाकरता है। यह हमारे सौर मण्डल का सबसे छोटा गहै। इसका ब्यास केवल 5160 कि.मी. है और इसका गुरुूतबभी हमारी पृथ्वी से एक चौथाई है। पृथ्वी पर छः फुट कूदनेवाला व्यक्ति बुध पर चौबीस फुट ऊँचा कूद सकेगा। सूर्यके निकटतम होने के कारण इसे देखा जाना भी कठिनहै। यह सूर्य की साहचर्य में न होने पर, सूर्योदय के कुछमिनट पहले पूर्वी क्षितिज पर अथवा सूर्यास्त के कुछ ही
मिनट बाद तक पश्चिमी क्षितिज पर, प्रथम कक्षा के तारेके समान चमकता हुआ दिखाई देता है। बुध पूर्व दिशामें अस्त होने के बत्तीस दिन बाद वक्री होता है। वक्रीके चार दिन बाद पश्चिम में अस्त होता है। अस्त होनेके सोलह दिन बाद पूर्व में उदय, उदय के चार दिनबाद मार्गी, मार्गी के बत्तीस दिन बाद पूर्व में पुनः अस्तहो जाता है।
बुध को क्षैतिज, सौम्य, बोधन, शन्त, कुमार हेम्न, उतारुदआदि नामों से सम्बोधित किया जाता है।
प्रश्न 230-बुध के स्वामित्व पर प्रकाश डालें ?
उत्तर :
ग्रहों के मन्त्री मण्डल में इसे युवराज की पदवी से विभूषितकिया गया है तथापि यह नपुंसक ग्रह है। जिसके साथबैठता है उसके समान हो जाता है। यह मिथुन व कन्याराशि का स्वामी है। कन्या में बुध उच्च का कहा गयाहै किन्तु कन्या राशि के 15 डिग्री अंश तक यह परमोच्चका होता है। इसी प्रकार मीन राशि के 15 डिग्री अंशतक यह परमनीच, बाकी अंशों में नीच का होता है। सूर्यऔर शुक्र उसके मित्र हैं, चन्द्रमा शत्रु और शेष य्रह समानभाव वाले माने जाते हैं। यह उत्तर दिशा का स्वामी है।सभी ग्रहों में यही एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के साथ रहकरभी मन्द नहीं होता अन्यथा दूसरे ग्रह आक्रान्त हो जातेहैं। विशोत्तरी व अष्टोत्तरी, दोनों में दशाकाल 17 वर्षों काहै। यह हरितवर्ण है, हरा रंग इसे प्रिय है "पन्ना इसकाअनुकूल रत्न है।
प्रश्न 231-बुध के कारकत्व पर प्रकाश डालें।उत्तर :बुध से बुद्धि, काब्य-शक्ति, ज्योतिष, वाणी, गुप्त रोग वगुप्तचरी का पता लगाया जा सकता है। यह सुख व राज्य
का नैसर्गिक कारक ग्रह है। चौथे स्थान में यह स्थानागतप्रभाव के कारण कोई फल नहीं देता पर इस स्थान मेंयदि चन्द्रमा के साथ रहे तो चन्द्रमा की बलवृद्धि करताहै। यह शुभ ग्रहाँ के साथ होने पर शुभ फल देने वालाऔर अशुभ ग्रहां के साथ अशुभ फल देने वाला बन जाताहै। मिथुन, कन्या व तुला लग्न के लिए योगकारक एवंधनु व मीन लग्न के लिए यह मारक ग्रह है। अपने स्थानमें सातदें भाव को यह पूर्ण दृष्टि से देखता है।उत्तर :
प्रश्न 232-बुध से प्रभावित जालक का व्यक्तित्व कैसा होता है ?बुधबली लोग मिष्ठभाषी एवं विनोदप्रिय होते हैं। बुधप्रभावीलोग बुद्धिमोन, कूटनीतिज्ञ व राजनीति में चतुर होते हैं।ऐसे लोगों के हाथ-पांव व चेहरे पर हरे रंग की नसें साफ-साफ दिखलाई पड़ती हैं। ऐसे लोग विद्वान् होते हैं।बुध-प्रधान लोग शिल्प, कला, हुनर व व्यापारप्रिय होते हैं।उच्च राशि का बुध सन्तति सुख देता है व सुखी रखताहै। राज्यपद प्रदान करता है। बुद्धिमान, चतुरवक्ता औरशत्रुजंयी बनाता है। मूल त्रिकोणी रहने पर ऐश्वर्ययुक्त तथास्वगृही होने पर कवि, विद्वान् व मित्रगृही होने पर उन्नतिशीलबनाता है। नीच राशिस्थ होने पर बन्धुओं से विरोध औरकलह कराता है। शत्रुगृही होने पर भारी व्यभिचारी औरदुखी बनाता है।
प्रश्न 233-बृहस्पति ग्रह की विशेषता क्या है ?
उत्तर :
बृहस्पति एक पीत वर्ण का ग्रह है। इसका सौर मण्डलमें पाँचवां स्थान है। यह सूर्य से लगभग 77,80,00000कि.मी. की दूरी पर है और लगभग 11 वर्षों में सूर्य कीएक परिक्रमा पूरी करता है। पृथ्वी से बहुत दूर होते हुएभी बृहस्पति अत्यधिक दैदीप्यमान् दिखाई देता है। यह सौर
भण्डल का सम्राट प्रह है। अतः शास्त्रों में इसके लिए"बृहस्पत" तथा "गुरु" नामों का प्रयोग किया गया है।इसका व्यास 1,43,640 कि.मी. है। बृहस्पति यदि भीतरसे खोखला हो तो पृथ्वी जैसे 1600 पिण्ड उसमें समासकते है। इसका गुरुत्व भो पृथ्वी से 317 गुणा है। यदिकोई व्यक्ति पृथ्वी पर 77 कि.प्रा. भार का है तो "गुरु"पर जाकर उसका भार 22 टन हो जायेगा। बृहस्पति केचन्द्रमाओं की संख्या तेरह है। बृहस्पति ग्रह अस्त होने के30 दिन बाद वक्री होता है। उदय के 129 दिन बादवक्री होता है। वक्री के 120 दिन बाद मार्गी होता है।तथा मार्गी के 129 दिन बाद पुनः अस्त होता है।बृहस्पति के अतिरिक्त गुरु, देवगुरु, वांगीश, अंगिरा, जीवआदि नाम भी इसके पर्याय माने गये हैं।उत्तर :
प्रश्न 234-गुरु के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।
बृहस्पति "देवगुरु" कहलाते हैं तथा ग्रह परिषद् में इन्हेंप्रधानमन्त्री का पद दिया गया है। ये धनु और मीन, दोराशि के स्वामी माने गये हैं परन्तु धनुराशि के 13 डिग्रीअंशों तक ये मूल "त्रिकोणी" कहलाते हैं। कर्क इनकी उच्चतथा मकर इनकी नीच राशि है। कर्क राशि में 5 डिग्रीअंश तक ये परम उच्च एवं मकर राशि के 5 अंश तकपरमनीच कहलाते हैं। सूर्य, चन्द्र, मंगल इनके मित्र हैं,बुध, शुक्र, शत्रु और, शनि इनसे समभाव रखते हैं। चन्द्रमाके संसर्ग में आफर ये विशेष बलवान् हो जाते हैं एवं सभीप्रकार के अरिष्टों का भोग करने में समर्थ हो जाते हैं।विशोत्तरी दशा के हिसाब से 16 व अष्टोत्तरी के हिसाबसे 19 वर्ष की इनकी महादशा जातक को लगली है। अपनेस्थान से सातवें भाव के अलावा 6 व 9 स्थानों पर भी
इनकी पूर्ण दृष्टि मानी गयी है। इनकी दृष्टि में अमृत है।फलतः इनकी दृष्टि 'जिस स्थान पर पड़ती है वहाँ केपापप्रभाव को नष्ट कर के शुभ फल की सृष्टि करती है।यह पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी व आकाशत्व प्रधान ग्रह है।इसका रंग पीला होता है तथा पीले रंग के "पुखराजमें इसका निवास है, स्वर्ण इनकी प्रिय धातु है।
प्रश्न 235-गुरु के कारकत्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर :
बृहस्पति सभी ग्रहों से सर्वाधिक शुभ ग्रह माना गया है। भाग्यव पुत्रकारक यह ग्रह धन-भाव, राज्य-भाव और आयु-भाव काकारक ग्रह है। यह विप्रवर्णी आध्यात्मिक, धार्मिक एवं राजनैतिकउन्नति का कारक ग्रह है। विद्या-व्यसन, सच्चर्त्रता वपरोपकारिता इनका नैसर्गिक स्वभाव है। यह स्त्रियों को सौभाग्य(पति का सुख) एवं पुरुषों को पतिव्रता स्त्री दिलवाने का कारकग्रह होने के साथ विवाह सुख व दाम्पत्य-प्रेम का भी कारकग्रह है। शरीर में यह मज्जा का अधिष्ठाता, गुल्म-स्वामी है।यह व्यक्ति को बुरे कार्यों के प्रति रोकता है। मेष, कर्क, सिंहधनु व मीन लग्न के लिए यह योगकारक ग्रह है। कन्या लग्नके लिए गुरु मारक है एवं मिथुन लग्न में इसे केन्द्राधिपत्यदोष" लगता है।
प्रश्न 236-बृहस्पति से प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसाहोता है ?
उत्तर :
इस ग्रह से प्रभावित व्यक्ति का रंग सुनहरा, आंखें व बालभूरे होते हैं। वह लम्बे व स्थूल शरीर का स्वामी होताहै। गुरुबली व्यक्ति बहुत बुद्धिमान्, गम्भीर व ओजसवी वक्ताहोता है। तेज व भारी आवाज के साथ ऐसे व्यक्ति राजनीतिमें दक्ष, विविध शास्त्रों के ज्ञाता एवं विद्या के भण्डार होतेहैं। गुरु उच्च कोटि में रहने पर सुख-सुविधा सम्पन्न, विख्यात
राज्य पक्ष में सम्मानित उच्च पदाधिकारी, मूल त्रिकोणी मेंयशसवपरककगप्रापतकरनेवाा,भकत-भावना प्रधान और वेदान्ती, स्वगृह में शास्त्र ममर्ज, काव्य,संगीत रसिक, चिकित्सा विज्ञानी, मित्रगृह में उन्नति करनेवाला तथा बुद्धिमान् बनाता है। नीच राशिस्थ बृहस्पति व्यर्थमें बदनाम, दुष्टकर्मी दुखी तथा शत्रुगृह में कार्यदक्ष,भाग्यशाली बनाता है।
प्रश्न 237-शुक्र ग्रह की खगोलीय विशेषता क्या है ?
उत्तर :
सौर मण्डल में बुध के बाद दूसरा स्थान शुक्र का है।शुक्र ग्रह सूर्य से 10,80,00,000 कि.मी. की दूरी पर है।और अपने परिभ्रमण मार्ग पर 225 दिन में सूर्य की एकपरिक्रमा पूरी करता है। इसका व्यास 12,600 कि.मी. है।तथा गुरुत्व लगभग पृथ्वी के समान है। सूर्य तथा चन्द्रमाके बाद शुक्र ही आकाश में सबसे अधिक तेजस्वी ग्रहहै। इसके सम्बन्ध में सबसे विचित्र बात यह है कि चन्द्रमाकी भाँति इसकी भी कलायें हैं, जो किसी भी दूरदर्शी यंत्रद्वारा सुगमता से देखी जा सकती हैं। शुक्र सूर्योदय केसमय पूर्व में अथवा सूर्यास्त के समय पश्चिम में देखाजाता है। इसे "संध्या" तथा "प्रभात का तारा" भी कहतेहैं। शुक्र ग्रह पूर्व में अस्त होने के 75 दिन बाद उदयहोता है। उदय के 240 दिन बाद वक्री होता है, वक्रीके 23 दिन बाद पश्चिम में अस्त होता है। पश्चिम मेंअस्त होने के 6 दिन बाद पूर्व में उदित होता है। पूर्वोदयमें 23 दिन बाद मार्गी तथा मार्गी के 240 दिन बाद पुनपूर्व में अस्त होता है। शुक्र ग्रह सूर्यास्त के एक-दो घण्टेबाद तक सूर्योदय से एक-दो घण्टे पूर्व ही दिखाई देनेलगता है। अर्थात् सूर्य को छोड़कर 45 अंश अधिक दूरकभी नहीं जाता।
शुक्र को भृगु, कवि, सीत, आच्छा, ऊशना, कारक, आस्फुजितदानवेज्य, दैत्यगुरु आदि विभिन्न नाम दिये गये है।
प्रश्न 238-शुक्र के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर :
शुक्र आकाश में दिखने वाला सबसे चमकीला ग्रह है। यहवृष और तुला, दो राशियों का स्वामी है। तुला राशि के10 डिग्री अंश तक वह "मूल त्रिकोणी" एवं 11 डिग्री से30 डिग्री अंश तक यह "स्वगृही कहलाता है। मीन राशिमें यह उच्च का होता है व 29 डिग्री अंश तक यह परमोच्चहोता है। कन्या राशि में यह नीच का परन्तु कन्या राशिके 29 डिग्री अंशों तक यह परम नीच कहलाता है। यहदक्षिण-पूर्व दिशा का स्वामी है तथा हीरे के समान ध्वलितक्रान्ति से युक्त है। "हींरा" इसका प्रधान रत्न है एवं चाँदीव श्वेत धातुओं का स्वामी है। विशेत्तरी दशा में 20 वर्षएवं अष्टोत्तरी दशा में 21 वर्ष का इसका दशाकाल है।अपने स्थान से सातवें भाव पर इसकी पूर्ण दृष्टि रहतीहै। शुक्र यदि सातवें स्थान पर हो तो इसे स्थानबली कहाजाता है। बुध और शनि के साथ इसका मित्र भाव, सूर्यचन्द्रमा के साथ शत्रुभाव और मंगल-बृहस्पति के साथ समभावरहता है।
-प्रश्न 239-शुक्र के कारकत्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर :
शुक्र से यौन शक्ति और कामवासना पर विचार किया जाताहै। यह असुर गुरु है तथा आकाश परिषद में इसको मन्नीका स्थान दिया गया है। गुरु आध्यात्मिक शक्ति का प्रेरकतो शुक्र सांसारिक शक्ति का प्रेरक ग्रह है। शुक्र का दूसराअर्थ "वीर्य" व "कवि" भी होता है। यह रजोगुणी व स्मगलिंगका ग्रह है। वीर्य-विकार, गुप्तांग रोग, स्त्री-सुख, कन्या-सन्तति का इससे विचार किया जाता है। यह सप्तम भाव
का कारक ग्रह है। दाम्पत्य जीवन, गुप्त सम्पर्क, रति-शक्त,आवेश सवारी, अलंकार एवं ऐश्वर्यशाली वस्तुओं, कवित्व-शक्ति संगीत व प्रेम सम्बन्धी मामलों का विचार इससेकिया जाता है। यह कामदेव का लघु सवरूप व नेत्रों काकारक ग्रह भी है। वृश्चिक लम्न वालों के लिए मुख्य मारक,मेष व वृष लग्न के लिए मारक तथा मिधुन, कन्या, मकरव कुम्भ लग्न के लिए यह योगकारक प्रह है।उत्तर :
प्रश्न 240-शुक्र से प्रभाव्त जातक का व्यक्तित्व कैसा होता है ?शुक्र-बली व्यक्ति मिलनसार एवंभावुक होता है। शुक्र लग्नमें रहने पर या अच्छी स्थिति में रहकर लग्न को देखनेपर व्यक्ति गोरे रंग का एवं अच्छे नाक-नक्श वाला होताहै। बलवान् सुन्दर देह, अच्छे तेज नेत्र, सघन श्याम केश,अत्यन्त आर्कषक व्यक्तित्व शुक्र की देन होती है। शुक्रदूसरे या बाहरवें स्थान में हो तो सुन्दर चमकीले नेत्र प्रदानकरता है। उच्च का शुक्र ऐयाश, वैभवसम्पन्न, नाच-गानका शौकीन, मूल त्रिकोणी सुन्दर व्यक्तित्व, मित्र-गृही, धनवान,स्त्री-पुत्र युक्त करता है। नीच का हो तो स्त्री से बंचित,कुटिल, दरिद्र, शत्रुक्षेत्री दूसरों की सेवा करके ही जीविकाकमाने वाला होता है।
यह भी अनुभव में आया है कि शुक्र अपनी उच्च राशिका मूल त्रिकोणी या स्वगृही होकर कहीं भी हो तो व्यक्तिअलंकार प्रिय, रतिप्रिय होता है। यदि इसी अवस्था में यह1/4/9/10 भावों में हो तो जातक की ऐयाशी कुछ इसतरह की होती है कि अनेक स्त्रियां उस व्यक्ति के पासअनायास जुड़ जाती है। ऐसा जातक किसी-न-किसी नशे
का आदी भी होता है।
प्रश्न 241-शनि ग्रह की खगोलीय ब्रिशेपता क्या है ?
उत्तर :
बृहस्पति के बाद बड़े ग्रहां में शनि का सथान है। नील वर्णका यह ग्रह सूर्य से 1,42,60,00,000 कि. मी. दूरी पर है।शर्नैः चर अर्थात् मन्द गति से चलने वाला यह ग्रह 29 वर्षामें सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। शनि आकार में केवलबृहस्पति से ही छोटा है। इसका व्यास 1,20, 500 कि. मी.है। इसका गुरुत्व पृथ्वी के गुरुत्व से 65 गुणा है। शनि प्रहकी नौ चन्द्रमा परिकमा करते हैं, उनमें से छठा चन्द्रमन्दीसबसे बड़ा होता है। शनि ग्रह अस्त होने के 3 दिन बादउदय होता है। उदय के 135 दिन बाद मार्गी होता है। मार्गीके 105 दिन बाद पश्चिम में पुनः अस्त हो जाता है। शनिको काण, अर्कपुत्र छायात्मज, असित, नील, मन्द, खंज आदिनाम दिये गये हैं।उत्तर :
प्रश्न 242-शनि ्रह के स्वामित्व के बारे में विशेष प्रकाश डालें।यद्यपि आकाश घरिषद में इस ग्रह को भृत्य, सेवक व नौकरका पद दिया गया है तथापि इसका प्रभाव सबसे ज्यादामहत्त्वपूर्ण विलक्षण व शीघ्र प्रभावी है। वक्री होने पर इसकीप्रभावोत्पादक शक्ति और बढ़ जाती है। वायुतत्त्व प्रधान शनि,मकर, कुम्भ का स्वामी होता है पर कुम्भ राशि में यह "मूलत्रिकोणी" बाकी में "स्वगृही" कहलाता है। मेष राशि में नीचका होता है परन्तु इसके 20 डिग्री अंशों तक यह परमनीचकहलाता है। इसी प्रकार तुला राशि में उच्च का परन्तु इसके20 डिग्री अंशों तक यह परम उच्च कहलाता है। शनि काविशोत्तरी दशा 16 वर्ष एवं अष्टोत्तरी दस वर्ष की होती है।यह सातवें स्थान के अतिरिक्त तीसरे व दसवें स्थान कोभी पूर्ण दृष्टि से देखता है। इसे काला व नीला रंग प्रियहै। "नीलम" इसका अनुकूल रत्न है तथा लोहे, धातु एवंकाले रंग में इसका निवास (वास) माना गया है। कालपुरुषके अंगों में यह घुटनों का स्वामी है।
पश्न 243-शनि के कारकत्व के बारे में प्रकाश डालें।
उत्तर :
शनैश्चर अपने नाम के अनुसार अपनी मन्दगति के लिएविख्यात् है, ज्योतिष में इसे छाया प्रह एवं सूर्य का पुत्रकहा गया है। इसे काला रंग, अन्धकार, गन्दगी, पाप काप्रतीक मानकर पापी ग्रह माना गया है। इसकी दृष्टि बड़ीअशुभ है। इसकी दृष्टि पड़ने से शुभ ग्रह भी अपनी शुभस्थिति का पूर्ण फल नहीं दे पाते। यह आम धारणा है।कि इसकी दशा व पनौती से मनुष्य को कई बार कईप्रकार के कष्ट, व्याधियों, हानि, बदनामी व संकटों के बीचमें से गुजरना होता है। पर ऐसा सदैव नहीं होता, अनुकूलस्थान में प्रबल होकर बैठने से ये सांसारिक सफलतायें,लॉटरी, सट्टा, जुआ, स्मगलिंग व अन्य हेय साधनों सेधन और यश भी दिलवाता है। यह दुस्साहसी, हठी वलँगड़ा ग्रह है। लँगड़ा होते हुए भी शनि कभी भी अचानकलात मार देता है। इसका पता नहीं चलता है क्योंकि यहरहस्यवादी ग्रह छढे, आठवें और बाहरवें स्थान का कारकग्रह है। इससे देह-रोगों, दैहिक कष्ट, एक्सीडेण्ट व मृत्युपर विचार किया जाता है। इसके निर्बल रहने पर आठवेंभाव से सम्बन्ध रखने वाली, असाध्य, बात व दीर्घकालिकव्याधियां जातक को हो जाती हैं। व्यक्ति की आयु, आत्मज्ञान,मोक्ष-कामना, ऐश्वर्य-जीविका, देह-कष्ट आदि का ज्ञान शनिकी स्थिति से किया जाता है। शनि जिसके साथ बैठताहै उस ग्रह को भी दूषित कर देता है। यह पृथकतावादीग्रह भी है। जिस स्थान पर इसकी दृष्टि पड़ती है उसस्थान के शुभफलों से जातक को वंचित (पृथक) कर देताहै। राहु इसके कार्य में भारी सहायक सिद्ध होता है। शनि,सिंह लग्न के लिए मुख्य मारक ग्रह है, कर्क व धनु लग्नके लिए भी मारक ग्रह है। मकर लग्न में यह मारकेश
होते हुए भी स्वयं नहीं मारता अपितु साहचर्य से फल देताहै, परन्तु वृष व तुला लग्न वालों के लिए शनि योगकारकग्रह है।
प्रश्न 244-शनि से प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसा होता है ?
उत्तर :
शनिप्रधान व्यक्ति काले रंग का, रुक्ष देह, लम्बे कद का,रुक्ष चमड़ी वाला, कटु भाषी एवं निन्दित कर्मा होता है।यह क्रोध युक्त व दिखने में भयानक, कुछ अप्रिय-सा होताहै। यह स्वभाव से निष्टुर व उदास है। इससे प्रभावितजातक एकांकी व स्वार्थी ज्यादा होता है। कभी-कभी यहग्रह व्यक्ति को नास्तिक बना डालता है। परन्तु उससेप्रभावित जातक क्षुद्र देवताओं का उपासक होता है। उच्चराशि का शनि क्षेत्र-पति, जमीन व कृषि का लाम लेने वाला,प्रतिष्ठित व राजतुल्य करता है। मूल त्रिकोण में सुदृढ़ शरीर,साहसी उच्च पदस्थ, स्वगृह में आवेश-ग्रस्त रहने वाला,सहनशील, प्रभावशील, मित्रगृही, में धनी, स्नेहशील, परोपकारी,उदार बनाता है।
नीच राशिस्थ शनि चन्तित रहने वाला, धनहीन, कष्टभोगी,और शत्रु राशिगत होने पर जातक को दुखी तथा जीविकाके लिए दर-दर भटकने वाला बनाता है।
प्रश्न 245-राहु ग्रह की विशेषता क्या है ?
र:
राहु एक छाया ग्रह है और आकाश में इसकी कोई स्थितिनहीं है। फिर भी यह चन्द्र और सूर्य को अ्रसित करता हैतथा सूर्य ग्रहण में राहु का प्रमुख हाथ माना जाता है। कुछविद्वान पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण- दो छोरों को राहु औरकेतु की संज्ञा देते हैं। विद्वानों के अनुसार पूर्णिमा के दिनचन्द्र और राहु का अन्तर सात अंश से कम हो तो ग्रहण'अवश्य होता है। दूसरे शब्दों में पृथ्वी की छाया में जब चन्द्रमा
पर आ जाता है तब पकाशहीन हो जाता है। इसी को"चन्द्रग्रहण" कहते है। यदि चन्द्रमा का पूर्ण पिण्ड पृथ्वी कीछाया में आये तब पूर्ण चन्द्र ग्रहण, अधूरा पिण्ड छाया में आयेतो खण्ड चन्द्र ग्रहण कहलाता है।
जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है तब सूर्यका कुछ भाग नहीं दिखता। यह "सूर्य ग्रहण" कहलाताहै। सूर्य ग्रहण में सूर्य, चन्द्र तथा राहु का विचार कियाजाता है। राहु दक्षिण दिशा का स्वामी है तथा अत्यन्तक्रूर माना जाता है।
प्रश्न 246-राहु के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर :
पाराशर ऋषि के मतानुसार राहु का स्वगृह "कन्या राशि"तथा उच्च राशि मिथुन है। अन्य आचार्यों के अनुसार दृषराशि में यह उच्च का और वृश्चिक में नीच का हो जाताहै। कुम्भ राशि में यह मूल त्रिकोणी रहता है। मेष राशिइसकी मित्र राशि है और राशिगत सम्बन्ध में यह मंगलऔर शनि के साथ मित्रभाव तथा चन्द्र, सूर्य, गुरु के साशशत्रु भाव रखता है।
इस ग्रह की गति दैनिक 3 कला 21 विकला है। इसेबारह राशियों के भ्रमण के लिए 3795 दिन, 20 घटी,25 पल, 7 विपल इतना समय लगता है। यह समय लगभग19 वर्ष, 7 मास और 2 दिन का होता है। अर्थात् राहुएक राशि पर लगभग 19 वर्ष की एवं अष्टोत्तरी दशाचक्रमें इसकी महादशा 12 वर्ष की होती है।
राहु की गति राशिचक्र में उल्टी अर्थात् मीन-कुम्भ-मकरआदि तथा कुण्डली में भी उल्टी अर्थात् लग्न-व्यय, लाभ दशमइस प्रकार से होती है। अन्य ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओरघूमते रहते हैं। राहु से ठीक सातवें स्थान में केतु होता है।
जोकि इसके साथ इसी भाँति घूमता है। राहु की दृष्टि 5/7/9/12 इन स्थानों पर पूर्ण होती है। 2-10 पर आधी होतीहै तथा 3-6 व चतुर्थ पाद दृष्टि होती है। कुछ आचायों केमत से राहु यदि कन्या राशि में हो तो अन्धा रहता है। अर्थात्उसकी दृष्टि अन्य स्थानों पर नहीं पड़ती।
प्रश्न 247-राहु के कारकत्व पर प्रकाश डालें।उत्तर:
राहु सिंहिका राक्षसी का पुत्र है। यह पैटीनस गोत्र वालाव बर्बर देश का, नैऋत्य दिशा में सूर्याकार मण्डल में रहताहै। इस राक्षस का धड़रूपी शरीर काजल के पहाड़ जैसा,अन्धकार रूप, भयकर, महाबलवान् है। धुएं की आकृति सेयुक्त कई बार मुकुट पहने हुए सर्प के समान दिखाई देताहै। राहु दशम स्थान में बलवान् माना गया है। यह चण्डालजाति का है। वन में रहता है। इसका धातु शीशा है।यह दक्षिण दिशा का स्वामी और धुएँ जैसा इसका रंगहै। यह पृथक्तावादी ग्रह है। जिस घर के भाव में यहस्थित रहता है उसी में बाधा पहुँचाने की इसकी प्रवृत्तिहै। यह जिस ग्रह के साथ बैठता है उसको भी दूषितकर देता है। यह अरम आभास, पिशाच, भूत, बाधा, जासूसी,निराधार बातें फैलाता है, अद्भुत और विलक्षण वस्तुओं काकारक ग्रह है। शरीर में यह अपस्मार, चेचक, नासूर, भूख,प्रेत-पिशाच बाधा, अरुचि, कीड़े और कोढ़, गुप्त रोग औरगुप्त शत्रुओं का कारक ग्रह है। इसका रत्न "गोमेद" है।प्रश्न 248-राहु से प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसा होता है ?उत्तर :राहु से प्रभावित व्यक्ति क्रूर, साहसी और प्रबल पराक्रमीहोता है। ऐसा व्यक्ति रहस्यवादी होता है तथा कभी कैसीभी विस्मयकारक घटना उत्पन्न करने में सक्षम एवंअविश्वसनीय व्यक्ति होता है। उच्च राशि का राहु ऐश्वर्य
सम्पन्न, कामी, राजा, मूल त्रिकोणी का धनवान, बातूनी,लोभी, क्रूर, स्वगृही या मित्रगृही होने पर विख्यात, सम्पन्न,सुन्दर करता है। नीच राशि का राहु वात-व्याधियों से पीड़ित,धनहीन, दुराचारी नीच और चोर बनाता है।प्रश्न 249-केतु प्रह की विशेषता क्या है?उत्तर:
राहु की तरह केतु का भी आकाश में कोई पिण्ड नहीं।है। राहु यदि सिंहिका राक्षसी के पुत्र का सिर है तो केतुउसी राक्षस का धड़ है। यह धूम्र वर्णीय है। कुण्डली मेंहमेशा केतु राहु से सातवें स्थान पर रहता है। इसलिएइसका ग्रह चाल राहु के समान ही चलता है अतः इसकाअलग से विश्लेषण प्राप्त नहीं होता।प्रश्न 250-केतु के स्वामित्व पर प्रकाश डालें।उत्तर :
वैसे तो राहु की उच्च राशि से सातवी राशि केतु की भीउच्च होनी चाहिए। पाराशर ऋषि ने "धनु" इसकी उच्चराशि मानी है। परन्तु कुछ विद्वानों ने केतु की उच्च राशिवृश्चिक, मूल त्रिकोणीय राशि कुम्भ, अनुकूल व प्रिय राशिकर्क मानी है। कुछ विद्वानों ने तो इनका फल राहु केअनुसार ही माना है। विशोत्तरी महादशा में केतु की दशा9 वर्ष की लगायी गयी जब कि अष्टोत्तरी दशा पद्धतिकेतु को अलग से ग्रह नहीं मानकर उसके दशा की व्यवस्थानहीं की गयी।
प्रश्न 251-केतु के कारकत्व पर प्रकाश डालें।उत्तर:केतु की प्रतीक ध्वजा है। यह ध्वजा विजय, यश, कीर्तिव प्रतिष्ठा की प्रतीक है। फलतः कई आचायों ने केतु काप्रभाव राहु से अलग जाना है। यह जैमिनी गोत्र का अवन्तिदेश का निवासी एवं ध्वजाकार मण्डल में रहने वाला है।राहु का रत्न "गोमेद" तो केतु का "वैदूर्य" (लसनिया) है। राहु नैऋत्य दिशा का स्वामी है तो केतु वायव्य दिशा कासवामी है। राहु का घर सूर्पाकार तथा केतु का स्थान कोना।रंग-बिरंगी गुदड़ी राहु का वस्त्र है तो केतु का वस्त्र कटाहुआ होता है। दोनों का धातु शीशा है। केत्तु यदि अशुमग्रहां के साथ हो तो अशुम फल अधिक तीव्रता से देताहै। कुण्डली में शुभ ग्रह यदि केन्द्र से हो, अन्य शुभ योगहो, केतु के साथ हो तो अशुम फल अधिक तीव्ता सेदेता है। कुण्डली में शुभ ग्रह के दोष दूर हो जाते हैं।केतु दाद, चर्मरोग, शूल, भूख, हृदय रोग, बुद्ध अ्रम,विद्या-बाधा, विष-बाधा, पैर के रोग, पिशाच-बाधा, पत्नी व पुत्रका दुख, ब्राह्मण और क्षेत्र में विरोध, शत्रु का भय, प्रेतबाधा तथा शरीर की मलीनता से उत्पन्न रोग, गूढ़ विद्या,ब्रह्म ज्ञान, शूद्र लोगों और नीच आत्माओं से कष्ट आदिवस्तुओं का कारक ग्रह है।
प्रश्न 252-केतु के प्रभावित जातक का व्यक्तित्व कैसा होगा?उत्तर :केतु से प्रभावित व्यक्ति ताँबे के जैसे रंग वाला, चंचलनेत्रों वाला व मजबूत दिखने वाला होता है। ऐसे व्यक्तिमें फुर्ती अधिक होती है। कटी-फटी वस्तुओं अथवा वेस्टमैटेरियल में इनकी ज्यादा रुचि होती है।
प्रश्न 253--अरुण (यूरेनस) गह की विशेषता क्या है?उत्तर :वेदों-पुराणों में इसे सूर्य का सारथी कहा गया है। तारके रूप में इसकी खोज सर विलियम हर्षल ने 1781 मेंकी। अतः कुछ विद्वान् इसे "हर्षल ने के नाम से भीपुकारते है। सौर मण्डल में अरूण ग्रह (यूरेनस) का सूर्यसे सातवाँ स्थान है। यह हरित वर्ण का ग्रह है। यह सूर्यसे लगभग 2,86,80,00,000 कि.मी. दूरी पर है। यदि प्रकाशगति से इस ग्रह को जानना चाहें तो तीन घण्टे का समय लगेगा। यह अपने परिश्रमण मार्ग पर वर्षों से सूर्य की एकपरिक्रमा करता है। तथा एक राशि में सात वर्ष तक रहताहै। इसका परिक्रमा पथ शनि व नेपच्यून क बीच में है।इसका व्यास 46,700 कि.मी. है। इस प्रकार यह पृथ्वीसे 15 गुना बड़ा है। इसमें हमारी 15 पृथ्वी समा सकतीहैं। दूसरे ग्रहां की अपेक्षा यह अद्भुत ग्रह है। इसकी भूमिपर सूर्य पश्चिम से उदित होकर पूर्व में अस्त होता है।अर्थात् इन सब की गतियाँ अन्य सभी ग्रहां से अलग है।यूरेनस के पांच उपग्रह हैं।उत्तर :
प्रश्न 254-वरुण (नेपच्यून) ग्रह की विशेषता क्या है ?वेदों में इसे "जल देवता" कहा गया है और इसकी उपस्थितिइस सृष्टि से पहले मानी गयी है। रोम में यह "समुद्रीदेवता' के रूप में प्रतिष्ठित है। तारे के रूप में इसकीखोज 1846 में हुई। अरुण के बाद वरुण ग्रह का स्थानसूर्य से आठवाँ आता है। यह हरित वर्ण का ग्रह सूर्य सेलगभग 4,49,40,00,000 कि.मी. दूरी पर है। अपनेपरिभ्रमण मार्ग पर 164.8 वर्षों में सूर्य की एक परिक्रमापूरी करता है। तथा एक राशि पर 13.7 वर्ष रहता है।इसका व्यास 49,600 कि.मी. है। यह हमारी पृथ्वी से 17गुना बड़ा है। इसके चारों ओर दो चन्द्रमा घूमते रहते हैं।उत्तर:
प्रश्न 255-यम (प्लूटो) ग्रह की विशेषता क्या है ?वेदों में "यम' का वर्णन पृथ्वी से स्वर्ग के पथ की रक्षाकरने वाले देवता के रूप में आया है। पौराणिक यम "मृत्युके देवता" एवं विवस्वान् के पुत्र हैं। मैंसा इनका वाहनहै। ग्रीक में इसे अन्धकार व पाताल का देवता माना गयाहै। पारसी लोग इसे "विवन्हवन्त" कहकर पूजते हैं। तारेके रूप में इसकी खोज 1360 में हुई। यह सौर मण्डल का नवां ग्रह है। यह सूर्य से लगभग 5,95,60,00,000कि.मी. दूरी पर है। प्रकाश की गति से इस पर पहुँचनेहेतु साढे पाँच घण्टे का समय लगेगा। यह अपने परिषथपर 248 वर्षों में सूर्य की एक परिक्रमा करता है तथा एकराशि पर 20.6 वर्ष रहता है। इसका व्यास लगभग 5,000कि.मी. है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि यह बहुत ठण्डग्रह है, यहाँ पर हवा नहीं है। इसका एक उपग्रह भी है।प्रश्न 256-कुबेर और इन्द्र गह की विशेषता क्या है ?उत्तर :
ऋग्वेद में "इन्द्र" और "कुबेर" आकाशीय देवताओं के रूपमें वर्णित हैं। इन्द्र सम्पूर्ण सौरमण्डल का स्वामी है जबकिकुबेर उत्तर दिशा का अधिष्ठाता है, जो कि अपने तीनचरणों व आठ दाँतों के साथ उत्पन्न हुआ। वैज्ञानिक अभीइस गुत्थी को नहीं सुलझा सके हैं किन्तु यह सत्य हैकि बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु, शनि, अरुण, वरुण तथायम-इन नौ ग्रहों के पश्चात् 10वाँ कुबेर तथा 11वाँ इन्द्र-ये दो ग्रह और हैं, परन्तु वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव केकारण पाश्चात्य विद्वान् इन पर अभी मौन हैं। दूरदर्शी यन्रद्वारा इनका देखा जाना सम्भव नहीं है, विद्युत यन्त्रों द्वाराही इनकी उपस्थिति प्रमाणित की जा सकती है।
प्रश्न 257-पंचांग किसे कहते है ?
उत्तर:
पंचांग साधन ज्योतिष शास्त्र का सबसे प्रमुख व अहम् विषयहै। मुहूर्त बताने में, जन्म-पत्री बनाने में पंचांग की आवश्यकतापड़ती है। अतः इसमें पूर्ण रूप से दक्ष होने पर ही व्यक्तिआगे चलकर कुशल व सफल ज्योतिषी हो सकता है। अतइसके प्रत्येक अंग को ध्यान से पढ़कर विधार्थी को कण्ठस्थकर लेना चाहिए। तिथि, वार, नक्षत्र, योग-करण और मुहूर्तइन पांच मुख्य विषयों का जिसमें विधिन-पूर्वक प्रतिपादन हो।
उसे पंचांग या तिथि-पत्र कहते है।
प्रश्न 258-अमावस्या व पूर्णिमा क्या है और कैसे बनती है ?प्रत्येक मास में तीस तिथिया होती है। चन्द्रमा व सूर्य जिसदिन एक राशि में युत्ति करते हैं उसे "अमावस्या कहतेहैं। चन्द्र व सूर्य एक साथ होकर फिर जितने समय मेंदूसरी बार एक साथ होते हैं, उसके मध्य में जितने दिनलगते हैं उसी को "चन्द्रमास" कहते हैं। चन्द्रगति केसम्बन्ध में मास की व्युत्पत्ति होने के कारण इसका नाम"चान्द्र" पड़ा। प्रत्येक चान्द्रमास में दो पक्ष पखवाड़े होतेहैं। जब चन्द्रमा सूर्य से 180 अंश की दूरी पर आ जाताहै। तब पन्द्रहवी तिथि "पूर्णिमा" कहलाती है, प्रत्येक पक्षकी 15 तिथि होती है। पूर्णिमा के बाद सोलहवी तिथिअर्थात् कृष्ण्पक्ष की प्रतिपदा लगती है। फिर जब अमावस्याहोती है तब 30 तिथियाँ बीत चुकती हैं। इसलिए अमावसकी जगह पंचांग में 30 लिखा जाता है। नये चाँद से"पूर्णिमा" तक को "शुक्ल पक्ष" और पूर्णिमा से अमावस्यातक के 15 दिनों को "कृष्ण पक्ष कहते हैं। इस प्रकारएक साल में 12x2=24 पक्ष होते हैं। हर तीसरे वर्ष 26पक्ष होते हैं। जिसे "अधिकमास" की संजा दी जाती है।प्रश्न 259-तिथि किसे कहते हैं ? एवम् यह कितनी होती हैं? विस्तारसे बतावे।
उत्तर :
उत्तर :
उपरोक्त विवरण से आप अच्छी तरह जान चुके होंगे किएक पक्ष में 15 तिथियाँ होती है। एक तिथि लगभग 60घड़ी अर्थात् 24 घण्टे की होती है। तिथि वास्तव में सूर्यव चन्द्रमा के मध्य की दूरी को स्पष्ट करती है। जब चन्द्रमासूर्य से 12 अंश आगे चला जाता है तब एक तिथि समाप्तहो जाती है। ज्योतिष शास्त्र में तिथियों के नाम क्रमशः
इस प्रकार सांकेतिक अंकों में रखे गये है :
1. प्रतिपदा (एकम) 2. द्वितीया (दूज) 3. तृत्तीया (तीज)4. बतुर्थी (चौथ) 5. पंचमी (पंचम) 6. षष्ठी (छठ) 7. सप्तमी(सातम) 8. अष्टमी (अष्ठम) 9. नवमी (नौम) 10. दशमी (दशम)11. एकादशी (इग्यारस) 12. द्वादशी (बारस) 13. त्रयोदशी(तेरस) 14. चतुर्दशी (चौदस) 15. पूर्णिमा (पूनम) शुक्ल पक्ष15वी तिथि को पूर्णिमा तथा कृष्ण पक्ष की 15वीं तिथि कोअमावस कहा गया है। अमावस को सम्पूर्ण अन्धेरा रहता है।तथा पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र की भरपूर चाँदनी रहती है। इसकेबाद एक तिथि क्रम से चन्द्रमा घटता रहता है। अमावस्यातक पहुँच कर पूर्ण रूप से क्षय हो जाता है।
प्रश्न 260-क्षय तिथि किसे कहते हैं ?
उत्तर :
सूर्य-चन्द्रमा की गतियाँ सदा समान नहीं रहतीं। कभी सूर्यकी गति 56 कला आसन्न होती है कभी 61 कला आसन्नहोती है। इसी प्रकार चन्द्रमा की गति मन्द हो-जाती है।या तीव्र हो जाती है अर्थात् चन्द्रमा कभी अधिक गति सेऔर कभी मन्द गति से चलता है। इसी कारण तिथियोंका मान भी सदा समान नहीं होता। तिथि का अधिक सेअधिक मान 65 घटी के लगभग तथा कम से कम मान54 घटी के लगभग होता है। जैसे संवत् 2042 के चैत्रशुक्ल-प्रतिपदा, शुक्रवार के तिथि। शुक्रवार के आगे 32/13 लिखा है इसका अर्थ है कि उस दिन प्रतिपदा तिथि32 घण्टों और 13 पल तक रहेगी। अर्थात् पूरे दिन भररहेगी उसके बाद दूज द्वितीया (तिथि आरम्भ होगी)। एकसूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक का समय सदैव कल्पित60 घटी का ही होता है। इसलिए दिन में किसी समयकोई तिथि पूरी हो सकती है। कभी-कभी दो तिथियाँ एक
ही वार में पूर्ण होती हैं और वार के पूर्ण होने के पहलेतीसरी तिथि लग जाती है। ऐसी दशा में उस वार कोसूर्योदय काल में जो तिथि विद्यमान् रहती है वही मानीजाती है और अगले वार (दूसरी तिथि) का मान पंचांगमें पहली तिथि की संज्ञा नहीं मानी जाती है। ऐसी तिथिको "क्षय तिथि" या तिथि हानि या तिथि टूटना भी कहतेहैं। निर्णयसागर पंचांग में 2042 में चैत्र शुक्ल एकादशीमें मंगलवार को एकादशी 0/23 होने से क्षय हो गयी तथाउस दिन द्वादशी 45/12 घटी पल है।
प्रश्न 261-तिथि-वृद्धि किसे कहते हैं ?
उत्तर :
प्रायः कभी-कभी एक ही तिथि दो सूर्योदय कालों में विद्यमान्रहती है। ऐसी दशा में वह तिथि दो बार मानी जातीहै। इसी को तिथि-वृद्धि कहते हैं, जैसे- संवत् 2042 कोचैत्र शुक्ल पक्ष में बुधवार को छठ तिथि का मान 60/10 लिखा है। इसके बाद दूसरे दिन (गुरुवार) को तिथिछठ 1/56 है। इन सब कारणों से ही कभी 13 कभी 15दिनों का पक्ष होता है। किसी वर्ष में कोई पक्ष 16 दिनका भी हो जाता है।
प्रश्न 262-तिथियों का फलादेश कैसे होता है ?उत्तर :तिथियों का भी फलाफल विचार को दृष्टि में रखते हुएतिथियों को पाँच भागों में विभाजित किया है :-1. नन्दा, 2. भद्रा, 3. जया, 4. रिक्ता, 5, पूर्णा1.पड़़वा छठ, एकादशी, नन्दा तिथि होती है।2.दूज, सप्तमी, द्वादशी-भद्रा तिथि होती है।तीज, अष्टमी, तेरस-जया तिथि होती है।चौथ, नवमी, चौदस-रिक्ता तिथि होती है।पंचमी, दशमी, पूर्णिमा-पूर्णा तिथि होती है।
3.
4.
5.
95
इन तिथियों का फल नाम के समान ही होता है अर्थातजिसका जैसा नाम है वैसा फल भी होता है। जैसे- नन्दातिथि उत्तम फलदायिनी होगी तथा रिक्ता (रिक्त याने खालीहोता है) तिथि प्रायः सभी कार्यों में त्याज्य होनी चाहिए।इसी प्रकार और तिथियों का महत्त्व समझना चाहिए।(12/30/4/6/14/6/9) ये तिथियाँ सामान्यतः अशुभ मानी गयीहैं और शेष (1/2/2/5/7/10/11/13/14) ये तिथियाँ सामान्यतःशुभ मानी गयी हैं।
प्रश्न 263-सिद्धियोग किसे कहते हैं ?
उत्तर :
शुक्रवार को नन्दा (1/6/11), बुधवार को भद्रा (2/7/12),मंगलवार को जया (3/9/13), शनि को रिक्ता (4/6/14),गुरुवार को पूर्णा (5/10/15), संयोग होने से सिद्ध योगहोता है- यह शास्त्रकारों ने कहा है। यह योग यात्रा केलिए शुभदायक कहा गया है।
प्रश्न 264-अमृत योग किसे कहते है ?उत्तर :रविवार को और सोमवार को पूर्णा (5/10/15), मंगलवारको भद्रा (2/5/12), गुरुवार को जया (3/7/13), शनि औरबुधवार को नन्दा (1/6/14) अमृतयोग कहा गया है। यहयोग भी यात्रा के लिए विशेष शुभ फलदायक होता है।प्रश्न 265-मृत्यु योग किसे कहते हैं ?उत्तर :रविवार और मंगलवार को नन्दा (1/6/11), शुक्र औरसोमवार को भद्रा (2/9/12), बुधवार को जया (37/13),गुरुवार को रिक्ता (4/8/15) और शनिवार को पूर्णा(5/10/15) संयोग होने से मृत्यु-योग होता है। इसमें यात्राकरने का निषेध है।
प्रश्न 266-तिथियों के स्वामी कौन-कौन है ?
उत्तर :प्रतिपदा का स्वामी अम्नि, द्वितीया का ब्रह्मा, तृतीया की पार्वती चतुर्थी का गणेश, पंचमी का सर्प, षष्ठी का कार्तिकेय, सप्तमीका सूर्य, अष्टमी का शंकर जी, नवमी को दुर्गा, दशमी कायमराज, एकादशी का विश्वदेव, द्वादशी का विष्णु, त्रयोदशीका विश्वकाम देव, चर्तुदशी का शिव, पूर्णिमा का चन्द्रमा औरअमावस्या का पित्तर, ये तिथियों के स्वामी कहे गये हैं। जिसतिथि का स्वामी जो है, उस तिथि में उसकी पूजाविशेष करकेविशिष्ट फल देने वाली होती है।
प्रशन 267-दग्ध, विष और हुताशन तिथियाँ किसे कहते हैं ?उत्तर :बुधवार को 3, मंगल को 5, गुरुवार को 6, मंगल व शनिको 7, बृहस्पति को 8 और शुक्र को 9 हो तो विष संज्ञकतिथि होती है। सोमवार को 6, मंगलवार को 7, बुधवारको 8, बृहस्पतिवार को 9, शुक्रवार को 10, शनिवार को11, रविवार को 12 हो तो हुताशन नाम की तिथि होतीहै। इनमें प्रयुक्त संख्यायें तिथियों की सूचक हैं। तिथियोंमें पक्ष की कोई शर्त नहीं है। इस योग में दोनों पक्षोंकी तिथियाँ समान मानी जाती हैं।उत्तर :
प्रश्न 268-मासशून्य तिथियाँ क्या होती हैं ?चैत्र शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की अष्टमी व नवमी, वैशाख शुक्लएवं कृष्ण पक्ष द्वादशी, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी एवं शुक्लपक्ष, षष्ठी, आषाढ़ कृष्ण पक्ष, 6 व शुक्ल पक्ष 7 श्रावणशुक्ल व कृष्ण पक्ष 1; 2, आश्विन कृष्ण व शुक्ल 10,11,कार्तिक कृष्ण पक्ष 5 व, शुक्ल 14, मार्ग शीर्ष शुक्ल वकृष्ण पौष कृष्ण व शुक्ल पक्ष, 5,4, माघ कृष्ण में पंचमीव शुक्ल पक्ष 6, फाल्गुन कृष्ण पक्ष 4 व शुक्ल पक्ष 3,मासशून्य कहलाती हैं। इन तिथियों में काम्य कर्म प्रारम्भनहीं किये जाते। मास शून्य तिथियों में मंगलकार्य करनेसे वंश तथा धन का नाश होता है।
प्रश्न 269-पंचांग में प्रयुक्त सांकेतिक शब्द बतावै।
उत्तर :
अब तक आप पंचांग साधन के लिए अध्ययन कर चुकेहै। फिर भी पंचांग को भली-भाँति समझने के लिए उसमप्रयुक्त सांकेतिक शब्दों के रहस्य को एवं विभिन्न मानीको जानना बहुत जरूरी है। ज्योतिष की रीढ़ की हदरपंचांग ही है। अतः इसमें प्रत्येक भाग का सूह्मता से आययन होना अपेक्षित है।
शब्द
सांकेतिक अक्षर
दिनमान्
दि.
तिथि
नक्षत्र
योग
ति.न.व.
यो.
वार
करणाप्रारम्भिक
दक्षिण गोलाई
सूर्योदय से तीन घटी
सूर्यास्त से तीन घटी तक
क.रवि गति प्रारद. गो.प्रातःसायं
35 अहोरात्र=
2 मास=
3 मास=
1 ऋतु1 ऋतु1 अयन
सूर्य अस्त
हिन्दी तारीखअंग्रेजी ता.
मुसलमानी
ग्रह रष्ट
र.अ.हि.अथवा भा.अ.अथवा इ.मु.ग्र.स्प.
पंचक उदय
उत्तर गोलार्द्ध
पं.उ.
उ.गो.
98
प्रारम्भ
प्रा.
सूर्यास्त से छ: घटी तक
प्रदोष
अर्धरात्रि के मध्य का दो घटी
निशीथ
सूर्योदय से पूर्व पाँच घटी
उषाकाल
2 पक्ष =
1 मास
3 ऋतु =
1 वर्ष
व्यावहारिक पंचाग मान :-
3 लव =
1 निमेष
3 निमेष =
4 क्षण =
2 क्षण1 काष्टा
15 लघु =
1 घड़ी (घटी)
1 घड़ी =
24 मिनट
30 घड़ी =
1 दिन
प्रशन 270-नक्षत्र किसे कहते हैं ?
उत्तर :नक्षत्र "न" क्षरति इति नक्षत्रम अर्थात् जो चलता-फिरता
नहीं उसको नक्षत्र कहते हैं।
सड़क की दूरी मापने के लिए किलोमीटर, मील अथवाकोस का उपयोग करते हैं। वैसे ही आकाश-मण्डल कीदूरी नक्षत्रों से मापी जाती है। उदाहरण के तौर पर सड़कपर जब कोई घटना घटित होती है, तब किसी अन्य व्यक्तिके पूछने पर कि घटना कहाँ घटी ? उत्तर दिया जाताहै कि उस स्थान विशेष से इतने किलोमीटर बाद घटी।इसी प्रकार आकाश-मण्डल में अमुक ग्रह कहाँ है ? इसकाउत्तर भी वैसे ही दिया जायेगा कि अमुक नक्षत्र से इतनाकिलोमीटर दूर अमुक ग्रह है। नक्षत्र आकाश-मण्डल कीदूरी मापने का साधन है। चन्द्रमा जिस नक्षत्र में जितनेसमय तक रहता है, उतने काल तक उस नक्षत्र की गणना होती है। जैसे-यदि अश्विनी नक्षत्र है- 6 बजे प्रातःकालसे 4 बजे रात्रि काल तक रहे तो कहते हैं कि 6 बजेसे 4 बजे तक अश्विनी नक्षत्र है। चन्द्रमा की स्पष्ट गतिसदा समान नहीं रहती। इसलिये नक्षत्र का मान भी सदासमान नहीं रहता। नक्षत्र का आदि और अन्त दिन में किसीसमय भी हो सकता है। सामान्यतः एक नक्षत्र का विस्तार13 अंश 20 मिनट होता है। राशियों व नक्षत्र दोनों काप्रारम्भ 9० अंश मेष से होता है।
प्रश्न 271-नक्षत्र कितने होते हैं ? उनके नाम बतावे।
उत्तर :ऋषियों ने समस्त आकाश-मण्डल को 27 भागों में विभक्तकिया है। हर एक नक्षत्र को अलग-अलग नाम दिया है।
नक्षत्रों के नाम इस प्रकार हैं :
1. अश्विनी 2. भरणी 3. कृत्तिका 4. रोहिणी 5. मृगशिरा6. आर्द्रा 7. पुनर्वसु 8. पुष्य 9. आश्लेषा 10. मघा11. पूर्वाफालगुनी 12. उत्तराफालगुनी 13. हस्त 14. चित्रा15. स्वाति 16. विशाखा 17. अनुराधा 18. ज्येष्ठा 19.मूल 20. पूर्वाषाढ़ा 21. उत्तराषाढा 22. श्रावण 23. धनिष्ठा24. शतभिष 25. पूर्वाभाद्रपद 26. उत्तराभाद्रपद 27. रेवती।इन 27 नक्षत्रों के अतिरिक्त "अभिजित" नामक नक्षत्र को 28वाँनक्षत्र भी माना गया है। 21वें नक्षत्र उत्तराषाढ़ा का चतुर्थाश व22वें श्रावण नक्षत्र के प्रारम्भ की 4 घटी अभिजित नक्षत्रकहलाता है। यह समस्त कायों में शुभ माना जाता है।उत्तर :
प्रश्न 272-नक्षत्रों के स्वामी कौन-कौन-से हैं ?
राशियों के समान नक्षत्रों के स्वामी भी विभिन्न ग्रह होतेहैं। राहु और केतु को भी कुछ नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्तहै। नीचे की तालिका में 27 नक्षत्रों के नाम और उनकेस्वामी ग्रह दिये गये हैं :-
नक्षत्र
1. अश्विनी
2. भरणी
3. कृत्तिका4. रोहिणी
5. मृगशिरा
6. आर्द्रा
7. पुनर्वसु
8. पुष्य
9. आश्लेषा
10. मघा
11. पूफा.
12. उ.फा.
13. हस्त
14. चित्रा
15. स्वाति
16. विशाखा
17.
अनुराधा
18.
ज्येष्ठा
19. मूल
20. पूर्वाषाढा
21.उत्तराषाढ़ा
22. श्रावण
23.धनिष्ठा
24. शतभिषा
25. पूर्वाभाद्र पद
बृहस्पति
26. उत्तर भद्र पद
27. रेवती
बुध
प्रश्न 273- नक्षत्रों के स्वरूप कया है ?
उत्तर:
प्रत्येक नक्षत्र की पहचान उसके पास के तारे या समूहसे होती है। और नक्षत्र के पास वाले तारा समूह के नामसे पुकारते हैं यहां नीचे अश्विनी आदि नक्षत्रों का स्वरूपचित्रांकित किया जाता है।
1. अश्विनी-घोड़े के मुख के समान
2. भरणी-भग के समान
3. कृत्तिका-धार (क्षुर) के समान
4. रोहिणी-गाड़ी के समान
5. मृगशिरा-मृग के समान
6. आद्रो-मणि के समान
7. पुनर्वसु-घर के समान
8. पुष्य-बाण के समान
9. आश्लेषा-चक्र सद्टश
10. मघा-चक्र सृदश
11. पुर्वाफालुनी-मंच के समान
12. उत्तराफालुनी-खाट सदृश्य
13. हस्त-हाथ सद्ृश्य
14. चित्रा-मोती सदृश्य
15.
स्वाति-मूँगा सदृश्य
16. विशाखा-तोरण सदृश्य
17. अनुराधा-भात की राशि सदृश्य
18. ज्येष्ठा-कुण्डल सदृश्य
19. मूल-सिंह के पुच्छ सद्ृश्य
20. पूर्वाषाढ़ा-हस्ती के दाँत के समान
21. उत्तराषाढा-मंच सदृश्य
22. अभिजित-त्रिकोण समान
23. श्रवण-तीन चरणी के सदृश्य
24. धनिष्ठा-मृदंग बाजा के सदृश्य
25. शतभिषा-गोलाकार
26. पूर्वाभाद्रपद-मंच के समान
27. उत्तराभाद्रपद-जोड के समान
28. रेवती-मृदंग बाजा के सदृश्य
ऐसे सभी नक्षत्रों के आकार कहे गये है जिन्हें आकाश मेंदृष्टिगत किया जा सकता है।
प्रश्न 274-नक्षत्रों के देवता कौन-कौन है ?
उत्तर :
1. अश्विनी के अश्विनी कुमार 2. भरणी के यम 3. कृत्तिकाका स्वामी अग्नि 4. रोहिणी का ब्रह्मा 5. मृगशिरा का चन्द्रमा6. आ्दा का शिव 7. पुनर्वसु का अदिति 8. पुष्य कागुरु 9. आश्लेषा का सर्प 10. मघा के पित्तर11. पूर्वाफाल्गुनी का भृग (सूर्य विशेष) 12. उत्तरा फाल्गुनीके अर्यम 13. हस्त का सूर्य 14. चित्रा का त्वष्टा15. स्वाति का वासु 16. विशाखा का इन्द्र और अम्नि17. अनुराधा का मित्र (सूर्य) 18. ज्येष्ठा का इन्द्र19. मूल का राक्षस 20. पूर्वाषाढ़ा का जल 21. उत्तराषाढ़ाका विश्वेदेव 22. श्रवण का विष्णु 23. धनिष्ठा का वसुदेव24. शतभिषा का वसुदेव 25.पूर्वाभाद्रपद का अजपात (बरह्मा)26. उत्तराभाद्र का अहिबुध्य (सूर्य) 27. रेवती का पूषा (सूयी)।
प्रश्न 275-नक्षत्रों के कितने विभाग हैं ?
उत्तर:फलादेश की दृष्टि से व्यवहार को ध्यान में रखते हुए नक्षत्रों
को 7 भागों में विभाजित किया गया है-
1. ध्रुव या स्थर 2. चल या चर 3. उग या क्रूर
4. क्षिप्र या लघु 5. मिश्र व साधारण 6. मृदु व मैत्र
7. दारुण व तीक्ष्ण।
प्रश्न 276- ध्रुव एवं स्थर नक्षत्र किसे कहते हैं, इनका फल क्या है?
उत्तर :
घुव व स्थिर नक्षत्र तीनों उत्तरा (उत्तरा फालगुनी, उत्तराषादा,उत्तरा आद्रपद) और रोहिणी तथा रविवार के दिन ये नक्षत्रघरुव एवं स्थर संज्ञक होते हैं। इनमें स्थर कार्य, बीज बोना,गृह बनाना, वास्तु शान्ति करना, बाग लगाना इत्यादि शुलहोता है।
प्रश्न 277-चल एवं चर संज्ञक नक्षत्र किसे कहते है? इनका फलक्या है ?
उत्तर:स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा- ये नक्षत्र औरसोमवार के दिन इनकी चर और चल संज्ञा है। इनमें हाथीइत्यादि की सवारी तथा फुलवारी लगाना यात्रादि कर्म करनाचाहिए।
प्रश्न 278-मिश्र व साधारण संज्ञक नक्षत्र किसे कहते है ? इनकाफल क्या है ?
उत्तर:विशाखा, कृत्तिका नक्षत्र और बुधवार इनकी मिश्र औरसाघारण संज्ञा है। इनमें अग्नि कार्य व मिले हुए कार्य औरवृषोत्सर्गादि सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 279-उग्र व चर संज्ञक नक्षत्र किसे कहते है ? इनका फलक्या है ?
उत्तर:तीनों पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, भरणी, मघा तथामंगलवार उग्र और क्रूर संज्ञक है। इनमें घात करना, आगलगाना, क्रूर कर्म तथा विष-शस्त्रादि कर्म शुभ हैं।
प्रश्न 280-क्षिप्र व लघु संज्ञक नक्षत्र किसे कहते है ? इनका फलक्या है ?
उत्तर :हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित तथा गुरुवार की क्षिप्र एवंलघु संज्ञा होती है। इनमें बाजार लगाना, क्रीड़ा करना,ज्ञान प्राप्त करना, भूषण पहनाना, शिल्प कलादि कार्य करनाशुभ है।
प्रश्न 281-मृदु तथा मैत्र संज्ञक नक्षत्र किसे कहते हैं ? इनका फलक्या है ?
उत्तर:मृगशीर्ष, रेवती, चित्रा, अनुराधा तथा शुक्रवार- ये मृदु तथामैत्र संज्ञक हैं। इनमें गाना-बजाना, नवीन वस्त्र धारण करनाशुभ है।
प्रशन 282-दारुण तथा तीक्ष्ण संज्ञक नक्षत्र किसे कहते हैं, इनकाफल क्या है ?
उत्तर :मूल, ज्येष्ठा, आर्द्ा, आश्लेषा तथा शनिवार- ये दारुण तथातीक्ष्ण संज्ञक हैं। इनमें अभिचार कर्म, घातादि कार्य, उग्रकर्म, भेद कर्म, (किसी की मैत्री को तोड़ना) पशु का दमनआदि कार्य सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 283- मूल संज्ञक नक्षत्र किसे कहते हैं ? इनका फल क्या है ?उत्तर :मूल, ज्येष्ठा, रेवती, मघा और अश्विनी- ये मूल संज्ञकनक्षत्र हैं। इन नक्षत्रों में बालक का जन्म हो तो नक्षत्रशान्ति कराने का विधान एवं हवन कराने का विधान शास्त्रोंमें दिया गया है।
प्रशन 284- पंचक संज्ञक नक्षत्र किसे कहते हैं ? इनका फल क्या है ?उत्तर :धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती- इननक्षत्रों में पंचक दोष माना जाता है। अन्य मतानुसार अन्तिमचारों नक्षत्र व धनिष्ठा का अन्तिम अर्द्ध भाग पंचक दोषयुक्त माना जाता है। पंचक में सभी शुभ कार्य वर्जित हैं।क्योंकि अशुभ घटना की पांच बार पुनरावृत्ति होती है।
प्रश्न 285-यमघण्ट योग किसे कहते हैं ?
उत्तर :रविवार में मधा, सोमवार में विशाखा, मंगलवार में आर्द्रा,बुधवार में मूल, बृहस्पतिवार में कृत्तिका, शुक्रवार में रोहिणीतथा शनिवार में हस्त नक्षत्र रहने से यमघण्ट योग बनताहै। इस योग में शुभ कर्म वर्जित रहते हैं।
प्श्न 286-यमदृष्टा योग किसे कहते हैं ?
रविवार में मधा और धनिष्ठा, सोमवार में विशाखा और मूल,मंगलवार में कृत्तिका और भरणी, बुधवार को पूर्वाषाढ़ा औरपुनर्वसु, बृहर्पतिवार में उत्तराषाढ़ा और अश्विनी, शुक्रवार मेंरोहिणी और अनुराधा, शनिवार में श्रवण और शतभिषा नक्षत्ररहने पर यमदृष्टा योग बनता है- जैसा कि इसके नाम सेज्ञात है। शुभ कारयों में इस योग को वर्जित करना चाहिए।प्रश्न 287-सर्वार्थ सिद्धि योग किसे कहते है ?उत्तर :
उत्तर :
रविवार को अश्विनी, मृगशिरा, हस्त, पुष्य, उत्तराफाल्ाुनी,उत्तराभाद्रपद व उत्तराषाढ़ा, सोमवार में श्रवण, रोहिणी, मृगशिरा,अनुराधा व पुष्य, मंगलवार में अश्विनी, उत्तराभाद्रप्रद कृत्तिकाव आश्लेषा, बुधवार में अनुराधा, रोहिणी, हस्त, कृत्तिका वमृगशिरा, बृहस्पतिवार में अश्विनी, अनुराधा, पुनर्वसु श्रावणव रेवती, शनिवार में श्रावण स्वाति व रोहिणी नक्षत्र रहने परसर्वार्थ सिद्धि योग बनता है। स्वाभाविक है, इस योग में प्रारम्भकिये गये कामों में पूर्ण सफलता मिलती है।उत्तर :
प्रश्न 288-अधोमुखी नक्षत्र किसे कहते हैं ?मूल, आश्लेषा, मिश्न संज्ञक और उग्र संज्ञक- ये नक्षत्रअधोमुख संज्ञक हैं। आर्दरा, पुष्य, श्रावण, धनिष्ठा, शतभिषाऔर ध्रुव संज्ञक- ये नक्षत्र ऊर्ध्वमुख संज्ञक है। मैत्र संज्ञकमृगशिरा, रेवती, मूल, चित्रा, (अनुराधा) हस्त, स्वाति, पुनर्वसुज्येष्ठा और अश्विनी- ये नक्षत्र तिर्यड्मुख संज्ञक है। इननक्षत्रों में इसी तरह कार्य करना शुभप्रद होता है। अधोमुखसंज्ञक नक्षत्र में कूप, तड़ाग, बावली आदि बनवाना। ऊरर्वमुख संज्ञक में मकान बनवाना, वृक्ष लगवाना आदि। तिर्यड़मुख संज्ञक नक्षत्र में पशु-पालन, पशु क्रय-विक्रय आदिकार्य शुभ कहे गये हैं।
प्रश्न 289-वैवाहिक नक्षत्र कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मूल, स्वाति, मृगशिरा, मघा,अनुराधा और हस्त- ये नक्षत्र विवाह में मंगलदायक हैं।इन, नक्षत्रों मं ही विवाह होता है।
प्रश्न 290-यात्रा में प्रशस्त नक्षत्र कौन-कौन-से हैं ?उत्तर :शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, पष्ठी, द्वादशी, अष्टमी तथा रिक्ता,पूर्णिमा, अमावस्या तिथियों में यात्रा निषेध है। अश्विनी, पुनर्वसुअनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, रेवती, हस्त, श्रवण और धनिष्ठानक्षत्रों की यात्रा शुभफल देने वाली होती है।
प्रश्न 291-"योग" किसे कहते है ?
उत्तर :
योग शब्द की निष्पति "मुज् धातु से हुई है जिसका अर्थहोता है- जोड़ना, मिलाना, सम्मिश्रित करना। पंचांग में तिथि,ग्रह, नक्षत्र के मिलने को "योग कहते हैं। प्रस्तुत (पंचांग)प्रकरण में सूर्य व चन्द्रमा की जोड़ को योग कहते हैं। सूर्यव चन्द्रमा की आकाशीय दूरी से जिस प्रकार तिथि का निर्माणहोता है, ठीक उसी प्रकार सूर्य एवं चन्द्रस्पष्ट के जोड़ सेयोग का निर्माण होता है। योग गणितागत स्पष्टीकरण इसप्रकार से समझा जा सकता है। गणना- नक्षत्र से सूर्य एवंचन्द्रस्पष्ट के जोड़ से योग का निर्माण होता है। 900 कलाएँआगे निकल जाते हैं, तब तक एक योग व्यतीत होता है।1600 कलाएँ आगे बढ़ने पर दो योग व्यतीत होंगे। इसीप्रकार 900 x 26 = 21600 कलाएँ आगे बढ़ जाने पर 28योग व्यतीत हो जाते हैं। कुल सत्ताईस योग होते हैं। जिसकेनाम अगले प्रश्न के उत्तर में हैं।
प्रश्न 292-तिथ्यात्मक सत्ताईस योगों के नाम एवं उनका मान बतावें।उत्तर :1. विष्कुम्भ 2. प्रीति 3. आयुष्मान् 4. सौभाग्य 5. शोभनी6. अतिगण्ड 7. सुकर्मा 8. धृति 9. शूल 10. गण्ड
11. वृद्धि 12. ध्रुव 13. व्याघात 14. हर्षण 15. वज 16.सिद्धि 17. व्यतिपात 18. वरीयान 19. परिषि 20. शिव21. सिद्धि 22. साध्य 23. शुम 24. शुक्ल 25 ब्रह्मा 26
ऐन्द्र 27. वैधृति।
इन योगों के मान भी समान नहीं होते। तिथि और नक्षत्रोंकी तरह इनमें भी क्षय-वृद्धि होती है। सूर्योदय से जितनीघटी और पल तक कोई योग रहता है, वही योग उसकेसामने लिखा रहता है। कुछ अन्य प्रकार के भी योग होतेहैं जिनकी चर्चा अन्यत्र की जायेगी।
प्रश्न 293-योग जानने की विधि क्या है ?
सूर्योदय से जितनी घटी पल तक नक्षत्र योग रहते हैं,उनके घट्यादि मान के आगे समय का मान सभी पंचागोंमें लिखा रहता है। जब चन्द्रमा और सूर्य का योग 13अंश 20 कला होता है तब एक योग पूर्ण होता है।उत्तर :
श्रवण नक्षत्र से सूर्य नक्षत्र तक गि्नें और दोनों संख्याओंका योग कर योगफल में 27 को भाग दें, जो शेष बचेविषकुम्भ से उतनी संख्या पर जो योग आएगा, वही उसदिन का योग होगा।
प्रश्न 294-योग के स्वामी और सांकेतिक अक्षर बतावें।
उत्तर :
इन 27 योगों का ज्योतिष-शास्त्र में काफी महत्त्व है। नीचेयोगों के स्वामी व संकेताक्षर स्पष्ट किये जा रहे हैं :-
क्रम संख्या
योग
स्वामी
संकेताक्षर
1.
विषकुम्भ
यम
वि.
2.3.
प्रीति
विष्णु
प्री.
आयुष्मान
चन्द्रमा
आयु.
4.
सौभाग्य
5.
शोभन
ब्रह्माबृहस्पति
सौ.
शो.
6.
अतिगण्ड
चन्द्रमा
7.8.9.10.
सुकर्मा
धृति
शूल
गण्ड
11.
वृद्धि
12.
ध्रुव
13.14.
व्याघात
हर्षण
15.16.
वज्ञ
सिद्धि
गणेश
17.
व्यतिपात
18.
वरीयान
19.20.
परिधि
विश्वकर्मा
शिव
21.22.
सिद्धिसाध्य
कार्तिकेयसावित्री
23.
शुभ
लक्ष्मी
24.
शुक्ल
पार्वती
स
F
ਕ
哈
लल
唧
雨
अति.
no
शु.
25.26.
ब्रह्मा
अश्विनीकुमार
ऐन्द्र
पितर
ब्र.ऐ
27.
वैषृति
दिति
वै.
प्रशन 295-शुभ कार्य में कौन-सा योग कितने घटी त्याज्य है ?परिधि का आधा पहले का विषकुम्भ की प्रथम पांच घटिकाएँशूल की प्रथम सात घटिकाएँ, गण्ड की प्रथम छः घटिकाएँव्याघात की प्रथम छः घटिकाएँ, हर्षण की प्रथम नौ घटिकाएँ,वज की प्रथम नौं घटिकाएँ, वैधति पूरा व्यतिपात पूरासाध्य योग की एक घटी अतिगण्ड योग की नौ घटिकाएँ
उत्तर :
त्याज्य कहीं गयी हैं।
प्रश्न 296--आनन्दादि अट्ठाईस योग क्या है ?
उत्तर :
अनेक पंचांगों में आनन्दादि क्रम से वर्द्धमान तक 23 योगोंकी चर्चा भी रहती है। रविवार को अश्विनी से, बुधवारको हस्त से, गुरुवार को अनुराधा से, शुक्रवार को उत्तरावाढासे, शनिवार को शतभिषा से आनन्दादिक योग बनते है।इन आनन्दादि योगों की अपेक्षा विषकुम्भादि योग प्रधान हैं।क्योंकि इन्हीं योगों को मूहर्तों में त्याज्य कहते हैं। इन योगोंके प्रभाव को विज्ञ ज्योतिषी के नाम के अनुसार जाननाचाहिए। इन 28 योगों के नाम इस प्रकार हैं-
1. आनन्द
2. श्रीवत्स
3. लुम्बक
4. प्रजापति
5. कालदण्ड
6. मूसल
7. धूम्रा
8. वज
सौम्य
10. मुदगर
11. छत्र
13. मानस
16. उत्पात
14. पद्म17. मृत्यु
19. सिद्धि
9.12. मित्र15. ध्वांक्ष18. काण21. अमृत
22. ध्वग25. राक्षस
20. शुभ23. गरद्
24. मातंग
26. चर
27. स्थिर
28. प्रवर्द्धमान्
इस तरह आनन्दादिक 28 योग होते हैं। अपने-अपने नाम
के अनुसार उनका फल समझना चाहिए।
प्रश्न 297-करण किसे कहते हैं, इनका क्या उपयोग है?तिथि के आधे भाग को करण कहते है। इस प्रकार यहस्पष्ट है कि एक तिथि में दो करण होते हैं। कुल करणग्यारह हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं -
उत्तर :
1. बव
2. बालव
11. किस्तुछ
वायु
प्रश्न 299- भद्रा किसे कहते हैं ?
उत्तर :
सातवाँ चल करण ही विष्टि है, उसी को भद्रा भी कहते हैं।यह भद्रा प्रायः पक्ष में चार बार अर्थात् एक मास में आठ बारआती है। जिन तिथियों में भद्रा होती है उनका विवेचन नीचेदिया जा रहा है।
शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णमासी को पूर्वाद्ध में ही अर्थाततिथि के आरम्भ होते ही भद्रा भी प्रारम्भ हो जाती है औरआधी तिथि तक रहती है। इसी प्रकार शुक्ल पक्ष की एकादशीऔर चतुर्थी के परारद्ध में आधी तिथि से लेकर तिथि के अन्ततक भद्रा रहती है और सप्तमी व चतुर्दशी को पूर्वाद्ध तिथिके प्रारम्भ से ही मध्य तिथि तक भद्रा रहती है।
प्रश्न 300- भद्रावास का निवास कब-कहाँ रहता है, उससे क्या लामहैं?
उत्तर :
कुम्भ, मीन, कर्क और सिंह- इन राशियों में चन्द्रमा हो तोभद्रा का वास मृत्यु लोक में होता है। मेष, वृष, मिथुन औरवृश्चिक इन राशियों के चन्द्रमा में अदा का वास स्वर्गलोकमें होता है। कन्या, तुला, धनु व मकर राशियों में चन्द्रमा होतो भद्रा का वास पाताल लोक में जानना चाहिए। जिस लोकमें भद्रा होती है उसी लोक में फल देती है, पाताल में भद्रारहने से धन लाभ और मृत्यु लोक में भद्रा रहने से सभी कारयोंका विनाश होता है।
प्रश्न 301- भद्रा के मुख पुच्छ का ज्ञान कैसे होता है?
उत्तर :
शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के पाँचवें प्रहर की आदि 5 घड़ी, अष्टमीके दूसरे पहर की आदि 5 घड़ी, एकादशी के सातवें प्हरकी आदि 5 घड़ी, पूर्णिमा के चौथे प्रहर की आदि से 5 घड़ीतथा कृष्ण पक्ष में तृतीया के आठवें प्रहर की 5 घड़ी, सप्तमी
के तीसरे प्रहर की 5 घड़ी, दशमी के छठे प्रहर की आदिकी 5 घड़ी, और चतुर्दशी के पहले प्रहर के आदि की पाँचघड़ी, भद्रा का मुख होता है। इनमें शुभ कार्य सर्वथा वर्जितहैं।
प्रन 302- मुहूर्त किसे कहते हैं?
उत्तर:
"मुहूर्त" का व्यावहारिक अर्थ होता है-क्षणविशेष या समयविशेषका अल्यांश काल। मुहूर्त शब्द भारतीय ज्योतिष में काफी प्रचलितहै। तथा शुभ कार्यों के प्रारम्भ हेतु मुहूर्त का अध्ययन कियाजाता है। महर्षियों ने काल के मुख्यतः पाँच अंग माने हैं-1. वर्ष 2. मास, 3. दिन, 4. लग्न 5. मुहूर्त। ये परस्परउत्तम बली हैं अर्थात् दोषयुक्त वर्ष को श्रेष्ठ मास ठीक करदेता है। यदि मासदोष युक्त हो पर दिन बलवान् हो तोमास का दोष नहीं लगता। इसी प्रकार शुद्ध मुहूर्त होने परवर्ष मास या दिन या अशुभ लग्न का दोष नहीं लगता। इसलिएमहर्षियों ने समस्त कायों में मुहूर्त शुद्ध देखने की आज्ञा दीहै।
प्रशन 303- मुहूर्त कितने होते हैं, एवं मुहूर्त का काल-मापन क्या है?
उत्तर :
ज्योतिष-सिद्धन्त के अनुसार 15 मुहूर्त दिन मे होते हैं तथा15 मुहूर्त रात्रि में, दिन-रात में कुल 30 मुहूर्त होते हैं। फलतःलगभग 45 मिनट का एक मुहूर्त होता है। अथवा दिनमान्में 15 का भाग देने से एक मुहूर्त का गणितागणित काल स्पष्टहो जाता है। उदाहरणस्वरूप किसी तारीख का दिनमान31 घटी 12 पल है। तो सही मुहूर्त काल जानने के लिए15 सेभाग दिया।
15) 31.12 (2 घटी
30/1
0
मुहूर्त समस्त दोषों का नाश करता है तथा इस काल में कियेगये कार्य हमेशा शीघ्र सफल होते हैं।
प्रश्न 305- वर्ग किसे कहते हैं ? ज्योतिष में इनकी क्या उपयोगिता है?उत्तर:भारतीय ज्योतिषयों में हिन्दी वर्णमाला के अक्षरों को 8 व्गोंमें विभाजित किया है। बारहखड़ी की 8 वर्णमाला ही भारतीयज्योतिष के 8 वर्ग हैं। ये आठ वर्ग भारत में प्रमुखता से पायेजाने वाले आठ प्रधान पशु-पक्षी हैं। जिनके वर्ण वर्णमाला के
क्रम से इस प्रकार से स्थापित किये गये हैं :-
1. अ इ उ ए
= गरुड़ = गरुङ-सर्प वैर
2. क ख ग घ ङ
= बिलाव
= बिलाव-मूषक वैर
3. च छ ज झ ञ
= सिंह
= सिंह-मृग वैर
4. ट ठ ड ढण
= श्वान
= श्वान-मेष वैर
5. त थ दध न
= सर्प
= सर्प-गरुड़ वैर
6. प फ बभम
= मूषक
= मूषक-बिलाव वैर
7. य र ल व
= मृग
= मृग-सिंह वैर
8. शष स ह
= मेष
= मेष-श्वान वैर
प्रश्न 306- गुण किसे कहते हैं? विवाह मेलापक में इनकी क्या उपयोगिताहै ?
उत्तर :भारतीय ज्योतिष शास्त्र में सम्भावित वर-वधू का मिलान नक्षत्रएवं उसके चरण को आधार मानकर किया जाता है। यह मानदण्डजिसे "गुण" कहते हैं, कुल 36 नम्बर का होता है जो किआठ विभिन्न मानदण्डों में विभाजित होता है। इनके क्रम इस
प्रकार है :-
1. वर्ण 2. वश्य 3. तारा 4. योनि 5. प्रहमैत्री 6. गणमैत्री
7. भकूट 8. नाडी
प्रश्न 307- वर्ण किसे कहते हैं ? इसकी उपयोगिता क्या है ?
उत्तर :
वर्ण का सीधा अर्थ होता है जाति। समसत मानव जाति को1. ब्राह्मण, 2, क्षत्रिय, 3. वैश्य, एवम् 4. शूद्र- इन चार वरणोमें विाजित किया गया हैं। ये चार वर्ण सत, रजस, राजस-तामस एवं तामस है। द्वादश राशियों के क्रम में 1. मीन, वृश्चिकऔर कंक-ब्राह्मण राशि, (जल तत्त्व), 2. मेष, सिंह औरधनु-क्षत्रिय राशि (अग्नि तत्त्व) 3. वृष, कन्या और मकर-वैश्यराशि (भूमि त्व) 4. मिथुन, तुला और कुम्भ-शूद्र राशि (वायुतत्त्व) वाली राशियाँ कही गयी हैं।
पन 308- वश्य किसे कहते हैं ? इसकी कया उपयोगिता है ?उत्तर :समस्त संसार के चराचर जीवों को पाँच वश्य में विभाजितकिया गया है। मेष राशि पूरी, धन राशि का उतरारबद्ध, मकरका पूर्वद्ध, वृष और सिंह राशि पूरी इन्हें एक "चतुष्पद" (चौपायोँ)की संज्ञा कही गयी हैं।
वृश्चिक राशि की सर्प व (वनचर) संज्ञा है, कर्क राशि कीकीट संज्ञा है, धन का पूर्वाद्ध मिथुन संज्ञा और तुला ये द्विपदसंज्ञक हैं।
इसी प्रकार कुम्भ, मीन और मकर राशि का उतर्रारद्ध- ये सभीजलचर संज्ञक हैं- ऐसा समझना चाहिए।पान 309- ज्योतिष शास्त्र में प्रह मैत्री का विचार कैसे किया जाता है?उत्तर :विवाह मैलापक, भागीदार, या सेवक रखते समय ग्रह मैत्री परविचार अवश्य ही करना चाहिए, इससे ग्रहों की नैसर्गिक शत्रुताएवं मित्रता का पता चलता है। फलित ज्योतिष में किसी भीप्रकार का फलादेश करते समय ग्रहों के इन स्वाभाविक गुणकत्ता
को ध्यान में रखना चाहिए। यथा
1. सूर्य - के शुक्र, चन्द्र, मंगल मित्र हैं। बुध से समभावपरन्तु शुक्र, शनि से शत्रुता रहती है।
2. चन्द्रमा - के सूर्य, बुध-मित्न। मंगल, गुरुू, शुक्र, शनिसे समभाव है परन्तु शत्रुता किसी से नहींहै।
3. मंगल - की सूर्य, चन्द्र, शुक्र से मित्रता है। शुक्र, शनिसे समभाव परन्तु बुध से शत्रुता रहती है।
4. बुध- सूर्य, शुक्र का मित्र है। मंगल, शुक्र, शनिसे समभाव रखता है परन्तु चन्द्रमा से उसकीशन्रुता रहती है।
5. गुरू- सूर्य, चन्द्र, मंगल का मित्र है। शनि से समभावरखता है परन्तु चन्द्रमा से उसकी शत्रुताहै।
6. शुक्र- बुध, शनि का मित्र है। मंगल, बृहस्पति सेसमभाव परन्तु सूर्य चन्द्र से शत्रुता है।
7. शनि- बुध, शुक्र का मित्र, गुरु से समभाव है परन्तुसूर्य मंगल, चन्द्र से शत्रुता रखता है।
वरकन्या दोनों. के स्वामी एक हों तो मैत्री गुण 5, सम याशत्रु का गुण० या आधा जानना चाहिए, शत्रु-मित्र का गुण1; सम मित्रता 4, सम समत्व 3, शत्रुशत्रुता का गुण0 समझनाचाहिए।
प्रश्न 310- गण किसे कहते हैं ? इनका मिलान कैसे किया जाता है?उत्तर :दुनिया के मुनष्यों को ज्योतिष शास्त्र में देव, मनुष्य एवं, राक्षसतीन गणों में बाँटा गया है।
1. अश्विनी, मृगशीर्ष, रेवती, हस्त, पुष्य,पुनर्वसु अनुराध, श्रवणऔर स्वाति-ये नौं नक्षत्र 'देवगण कहलाते हैं।
2. पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराफालगुनी,उल्लाषाढाऔर उत्तराभाद्रपद, आर्द्रा, रोहिणी और भरणी में नौ नक्षत्र
मनुष्यगण कहलाते हैं।
गणफलम्- स्वगणे च उत्तम प्रीतिः मध्यमा अमरमृत्ययोः।मृत्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देवराक्षसोः।।राक्षसो यदि वा नारी, नरो भवति मानुषः।मृत्युस्तत्र न सन्देहो, विपरीतः शुमावहः।।यदि स्त्री पुरुष का गुण एक हो तो परस्पर अत्यन्त प्रीति रहेगी,देव और मनुष्य गण में मध्यम प्रीति, मनुष्य और राक्षस गणहो तो मृत्यु, देव और राक्षसगण हो तो परस्पर कलह सदैवबना रहता है। यदि कन्या का राक्षस गण और वर का मनुष्यगण हो तो निःसन्देह वर की मृत्यु हो जाती है। यदि वर काराक्षस गण हो और कन्या का मनुष्य गण हो तो फल शुभरहता है।
स्त्री-पुरुष का एक गण हो तो गुण 6, पुरुष का देवगण औरकन्या का मनुष्यगण हो तो 6, दोनों का मनुष्य-राक्षसगण होतो 0, दोनों का राक्षस गण हो तो 1, दोनों देव मन्ुष्य होतो गुण 6, इसके विपरीत गण हो तो 1 तथा शुत्रता से 0,समझना चाहिए।उत्तर :
फन311- तारा किसे कहते है ? इसका क्या उपयोग है ?तारा का सीधा सम्बन्ध वर-कन्या के जन्मकालीन नक्षत्रों सेहै। कन्या के जन्म-नक्षत्र तक से वर के नक्षत्र तक गणनाकरें, उसी प्रकार वर के जन्म नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तकगणना करें, जो संख्या आवे, उसको नौ से अलग-अलग भागदैं। जो शेष रहे- उसे तारा जानना चाहिए। जो 3=7 अंकशेष रहें तो तारा अशुभ जानना चाहिए। बाकी शुभ जाननाचाहिए। शेष स्त्री-पुरुष- दोनों की तारा शुभ अशुभ हो तोउसका गुण ढेड़, दोनों की तारा शुभ हो तो उसके 3 गुण,एक की अच्छी और दूसरे की नेष्ट होने पर ढेढ़ गुण मिलता
है। दोनों की तारा अशुभ हो तो गुण ० समझना चाहिए।
इसमें अभिजित नक्षत्र भी लिया गया है।
प्रश्न 312- ज्योतिष में योनि किसे कहते है? इसकी क्या उपयोगिताहै ?
उत्तर :
वैसे तो मानव जाति में नर, नारी और नपुसक- तीन योनियाँही मानी गयी है। ये योनियाँ प्रकट हैं। भारतीय मनीषियों नेसमग्न मानव जाति को 14 योनियों में विभाजित किया है।ये योनियाँ गुप्त (प्रछन्न) हैं। ये योनियाँ 28 नक्षत्रों केआधार पर स्थापित हैं।
1. अश्विनी, शतभिषा
2. रेवती, भरणी
अश्व योनि
3. पुष्य, कृत्तिका
4. रोहिणी, मृगशिरा
5. आर्द्रा, मूल
6. पूर्वाफालगुनी, मघा
7. पुनर्वसु आशलेषा
8. उत्तराफालुनी, उत्तराभाद्रपद्
बिलाव योनि
9. स्वाति, हस्त
महिष (ैस) योनि
10. ज्येष्ठा, अनुराधा
11. चित्रा, विशाखा
12. श्रवण, पूर्वाषाढा वानर योनि
13. उत्तराषाढ़ा, अभिजित
नकुल योनि
14. धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद्
सिंह योनि
लोक व्यवहार में गौ और ब्याघ्र का वैर, गज और सिंह का
वैर, अश्व और महिष का वैर, श्वान और मृग का वैर सर्प
और नकुल का वैर, वानर और मेष का वैर, बिलाव और मूषक
का वैर जग प्रसिद्ध है। दम्पति एवं स्वामी-सेवक के बारे मेंयोनि का विचार अवश्य करना चाहिए और वैर योनि का त्यागकरना चाहिए। दो योनियों में परस्पर महावैर, विवाह में सर्वथात्याज्य है। स्त्री-पुरुष या भागीदारों की योनियों में महावैर होतो गुण 0, भिन्न योनि हो, पर शत्रु न हो तो गुण 1, सामान्ययोनि हो तो गुण 2, कुछ समान व्यवहार वाली योनि हो तोगुण 3, दोनों में परस्पर भिन्न भाव होकर मैत्री हो तो 4 गुणमिलते हैं।
प्रन313- भकूट क्या होता है? इसका प्रयोग कैसे किया जाता है?
उत्तर :भकूट को "राशिकूट" कहते हैं। दो राशियों की परस्पर मित्रताके आधार पर इसका मिलान किया जाता है। इसमें सीधे सातगुण होते हैं या (शून्य)।
शास्त्रवचनानुसार कन्या तथा वर की राशि आपस में चौथीऔर दसवी हो, तीसरी या ग्यारहवी हो तो शुभ, दोनों की सातवींराशि हो तो सम जानना चाहिए और एक नक्षत्र हो तो भीशुभ (कल्याणकारी) समझना चाहिए। राजस्थानी भाषा में इसे"लेणियाँ-देणियाँ का मिलान भी कहते हैं।
भारतीय ज्योतिषयों ने राशिकूट को और भी सूक्ष्मता सेअध्ययन किया और कहा कि परस्पर छटी और आठवीं राशि(षडाष्टक क्षेत्र) हो तो मृत्यु होती है। नवमी और पाँचवी राशि(नवपंचम दोष) हो तो निर्धनता रहती है। विद्वानों ने इसमें भीपरिहार वचन दिये हैं। षडाष्टक दो प्रकार के होते हैं-मृत्युषडाष्टक एवं प्रीतिषडाष्टक-मृत्यु पडाष्टक :-
1. मेष + कन्या,
2. तुला + मीन,
3. मिथुन+ वृश्चिक,
4. मकर + सिंह,
5. कर्क + कुम्भ,
6. वृष + धनु
ये मृत्युषडाष्टक है। इन लोगों को परस्पर विवाह या भागीदारीनहीं करनी चाहिए।
प्रीति पडाष्टक :
1. सिंह + मीन,
2. वृष + तुला,
3. कर्क + धनु,
4. कन्या + कुम्भ,
5. मिथुन + मकर,
6. मेष + वृश्चिक
जिन राशियों के प्रीति षडाष्टक होता है, तो इनकी परस्परभागीदारी या विवाह शुभ होता है।
नव पंचम विचार-मीन+कर्क, मीन+कुम्म, मिथुन, तथा मकर+कन्याका नव पंचम हो तो विवाह नहीं करना चाहिए। परन्तु परिहारवचनों के अनुसार वर की राशि से पाँचरवी राशि कन्या कीहो और कन्या की राशि से नवमी राशि वर की हो, वह नवपंचम (त्रिकोण) शुभ समझना चाहिए क्योंकि वह पुत्र-पौत्र कीवृद्धि करता है।
प्रश्न 314- ज्योतिष शास्त्र में नाड़ी किसे कहते हैं? इस पर विचार कैसेकिया जाता है?
उत्तर :1.अश्विनो, आर्द्र, शतभिषा, ज्येष्ठा, हस्त, पुर्वस, पूर्वाभाद्रपदमूल उत्तराफालगुनी- ये नौ नक्षत्र "आद्य नाड़ी" संज्ञकहैं।
2.पूर्वाफालुनी, चित्रा, धनिष्ठा, भरणी, मृगशीर्ष, पूर्वाषाढ़ा
अनुराधा, उत्तराभाद्रपद और पुष्य ये नौ नक्षत्र "मध्य नाड़ी"के हैं।
3.
कृत्तिका, रोहिणी, स्वाति, मधा, आश्लेषा, रेवती, श्रवण,उत्तराषाढ़ा, और विशाखा ये- नौ नक्षत्र "अन्त्य नाड़ी"के हैं।
यदि कन्या और वर दोनों की आद्य नाड़ी हो तो पति कानाश होता है। यदि दोनों की मध्य नाड़ी है तो दोनों का नाशहोता है और यदि दोनों की अन्त्य नाड़ी हो तो कन्या कीमृत्यु होती है।
क्रमानुसार ब्राह्मणों को नाड़ी-दोष, क्षत्रियों को वर्ण दोष, वैश्योंको गुण दोष, और शूद्रों को योनि दोष प्रधान रूप से त्याज्यहै। अतः इन दोषों से बचना चाहिए। गुरु-शिष्य की परस्परएक नाड़ी में द्वेष, मन्त्र और साधक की परस्पर एक नाड़ीमें रोग, देवता और पूजक की परस्पर एक नाड़ी होने से पूजककी मृत्यु होती है। नाड़ी चक्र अगले प्रश्न के उत्तर में दियागया है।
पन 315- नामाक्षरों से जन्मदशा की गणना कैसे होती है ?वैसे तो भारतीय ज्योतिष में कुल 27 नक्षत्र माने गये हैं। पर28वाँ एक "अभिजित्" नक्षत्र भी है। जन्म-नक्षत्र के भुक्त भोग्यके आधार पर जातक के जन्म दशाओं की गणना होती है।इस गणना में "अभिजित्" नक्षत्र को काम में नहीं लिया गयाहै। जन्म-नक्षत्र के आधार पर ही ब्यक्ति का नाम रखा जाताहै। प्रत्येक नक्षत्र को चार नामाक्षर प्रदान किये गये हैं। येचार नामाक्षर ही नक्षत्र के चार चरण या पाद कहलाते हैं।इस श्रृंखला में अभिजित नक्षत्र को भी चार नामाक्षर दिये गयेहैं। 60 घड़ी का एक नक्षत्र होता है और 15 घड़ी का एकचरण होता है। दूसरे शब्दों में नक्षत्र के एक चरण का मान
उत्तर :
लगभग 6 घण्टे होता है।
भारतीय ज्योतिषियों ने व्यक्ति की आयु का निर्धारण 120 वर्षकिया और इस शृंखला में 'विशेत्तरी दशा' की रचना की।120 वर्षों को नौ ग्रहां के प्रभावित कालांश में बाँटा गया औरएक सूत्र का निर्माण हुआ "आचमौराजीशबुकेशु" अर्थात् व्यक्तिको सबसे पहले आदित्य की दशा लगेगी फिर चन्द्रमा, भौम,राहु, जीव, शनि, बुध, केतु, और शुक्र की दशा लगेगी। सूर्यकी दशा को 6 वर्ष चन्द्र 10 वर्ष, भौम अर्थात् मंगल 7 वर्ष,राहु 18 वर्ष, जीव अर्थात् बृहस्पति 16 वर्ष, शनि 19 वर्ष,बुध 17 वर्ष, केतु 7 वर्ष एवं शुक्र को 20 वर्ष का कालांशप्रदान किया गया। इन ग्रहां के कालांश को नक्षत्रों में बाँटागया। प्रत्येक नक्षत्र को चार अक्षर प्रदान किये। अट्ठाईस नक्षत्रऔर उनके आधार पर नामाक्षर तथा नामाक्षर केआधार पर जन्मदशा की गणना इस प्रकार से बनती है।
नामाक्षर
नक्षत्र जन्मदशा जन्मदशा काल
1. चू चे, चो, ला
अश्विनी
केतु
7 वर्ष
2. ली, लू ले, लो
भरणी
शुक्र
3. अ, ई, उ, ए
कृत्तिका
सूर्य
20 वर्ष6 वर्ष
4. ओ, वो, वी, चू
रोहिणी
चन्द्र
5. वे, वा, का, की
मृगशिरा
मंगल
6. कु घ, ड, छ
आर्द्रा
राहु
7. के, को, ह, ही
पुनर्वसु
गुरु
8. हू है, हो, हा
पुष्य
शनि
9. डी, डू डे, डो
आश्लेषा
बुध
17 वर्ष
10. मा, मी, मू में
मघा
केतु
07
9
7 वर्ष
11. मो, टा, टी, टू पूर्वाफालुनी
शुक्र
20 वर्ष
12. हे हो, पा, पी
उत्तरा फालुनी सूर्य
6 वर्ष
13. पष ण व
हरत
चन्द्र
14. पे, पो रा, री
चित्रा
मगल
10 वर्ष7 वर्ष
15. र, र, शो, ता
स्वाति
राहु
16. ती चू ते, तो
विशाखा
बृहर्पति
17. ना नी पू मे
अनुराधा
शनि
18. नो या, थी, यू
ज्येष्ठा
बुध
19. ये, यो, भ, भी
मूल
केतु
20. भू धा, फा, ढा पूर्वाषादा
शुक्र
18 वर्ष16 वर्ष19 वर्ष17 वर्ष7 वर्ष20 वर्ष
21. भे, भो, जा, जी उत्तराषाढा
सूर्य
6 वर्ष
22. जू जे, जो, खा अभिजित23. खी, खू खे खो श्रवण
चन्द्र
24. गा गी, गू गे धनिष्ठा
मंगल
25, गो, सा, सी, सू शतभिषा
राहु
26. से, सो, द, दी पूर्वाभाद्रपद बृहस्पति
27. दू थ, झ
उत्तराभाद्रपद शनि
28. दे, दो, चा, ची रेवती
बुध
10 वर्ष7 वर्ष18 वर्ष16 वर्ष19 वर्ष17 वर्ष
इन जन्म-दशाओं का सही फलादेश तो जन्मकुण्डली के
आधार पर ही दिया जा सकता है, क्योंकि उसी से कारकेश,मारकेश, भावेश व योगकारक ग्रहों का पता चलता है। सामान्यतः
सूर्य, मंगल, राहु शनि और केतु पाप ग्रह हैं। बृहस्पति, शुक्रतथा चन्द्रमा शुभ गहे है। सूर्य, मंगल का समावेश क्रूर ग्रहों
में है। ये तेजस्वी है। शनि, राहु और केतु दैत्य जाति के हैं।
ये स्वभाव से ही मनुष्यों को दुख देने वाले अरह हैंबुध, वृहस्पति, चन्द्रमा और शुक्र सदा सुख देने वालें ग्रह हैं।
इसमें कुध साहचर्य से शुभ-अशुभ फल देता है। इन अक्षरों के
अतिरिक्त तत्सम अक्षरों की भी वही राशि होती है, इसकाध्यान रखना चाहिए।
उदाहरण : श्री लीलाराम थानवी का जन्म भरणी नक्षत्रके प्रथम चरण में माना जायेगा "ली इनमें नाम का प्रथमअक्षर होने के कारण इनका जन्म शुक्र की महादशा में हुआ,जो जन्म से 20 वर्ष तक प्रभावी रहेगी। फलतः इनके20 वर्ष की आयु पूर्ण सुख व ऐश्वर्य के साथ बीतेगी-ऐसाकहा जा सकता है। यदि किसी का नाम "ले से शुरूहोता है तो भरणी नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म होना सिद्धहोता है। फलतः शुक्र की महादशा 10 वर्ष की लगेगी।कौन-सी दशा किस तारीख को लगेगी एवं कब समाप्त होगी,इसका सही पता तो जन्म-पत्रिका की सूक्ष्म गणित से हीचलता है।
प्रश्न 316- हंस किसे कहते हैं? इसका प्रभाव कैसे देखा जाता है?
उत्तर :जन्माक्षर में जातक की कुण्डली में हंस लिखने की परिपाटीहै। राशि के तत्त्व को ज्योतिष की भाषा में हंस कहते हैं।समस्त राशियाँ चार तत्त्वों में विभाजित हैं।
हंस विचार
मेष, सिंह, धनु
अग्नि (हंस)
वृष, कन्या, मकर
भूमि (हंस)
मिथुन, तुला, कुम्म
वायु (हंस)
कर्क, वृश्चिक, मीन-जल
- जल (हंस)
फल- अग्नि तथा वायु राशियों की आपस में मित्रता होती है।क्योंकि वायु अग्नि को प्रज्वलित करने में सहायक की भूमिका निभातीहै। इसी प्रकार भूमि एवं जल संज्ञक राशियाँ परस्पर मित्र होती हैंपरन्तु अग्नि व जल राशि में शत्रुता है तथा वायु संजञक एवंभूमि
सज्ञक राशियों में परस्पर शत्रु भाव रहता है।
उदाहरण-मेष राशि में जन्मे ललित कुमार, मिथुन राशि मेंजन्मे कोमल कोठारी से नैसर्गिक मित्रता रहेगी जबकि ललितकुमार का वृश्चिक राशि में जन्सें नरेन्द्र कुमार के प्रति नैसर्गिकशत्रुता का भाव बना रहेगा।
प्रश्न 317- युज्जा किसे कहते हैं?
उत्तर :
युज्जा विचार इस प्रकार किया गया है -रेवती से मृगशिरा तक छः नक्षत्र "पूर्व युज्जा' कहलाती है।आर्द्र से अनुराधा नक्षत्र तक "मध्य युज्जा" कहलाती है।ज्येष्ठा से उत्तराभाद्रपद नौ नक्षत्र तक "अन्त्य युज्जा" कहलाती
है। यथा -
1 पूर्व युज्जा - रेवती, अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी,मृगशिरा।
2 मध्य युज्जा - आर्द्रा, पुनर्वसु पुष्य, आश्लेषा, मधा,पुर्वाफाल्गुनी, उत्तराफालगुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा,अनुराधा।
3 अन्त्य युज्जा - ज्येष्डा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण,धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद।
प्रश्न 318- घात किसे कहते हैं? घातचक्र क्या होता है? यह कैसे देखाजाता है?
उत्तर :
बच्चा जब जन्म लेता है, उसी दिन तय हो जाता है कि एकदिन इसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। मनुष्य जैसे-जैसे बड़ा होताहै, ज्यों-ज्यों अपनी वर्षगाँठ मनाता है, वह मृत्यु के औरअधिक निकट होता चला जाता है। विधाता ने जन्म के साथजातक की मृत्यु के दिन भी निश्चित कर रखे हैं। कई बारऐसा भी होता है कि मनुष्य मृत्यु के मुख में जाकर भी बच.
जाता है। मृत्युतुल्य दुर्घटना व कष्ट का हादसा गुजर जाताहै तथा जातक कुछ और समय तक जी लेता है। इस प्रकारकी घटना को "घात कहते हैं। प्रत्येक जातक के जीवन मेंदो-तीन घात जरूर आते हैं। इस घात से जातक कई बारबच भी जाता है और कई बार यह घात मृत्यु की नियतिमें परिणित हो जाता है। भारतीय ज्योतिषियों ने जातक केजन्म के साथ-साथ उसके मृत्यु की तिथि पर भी गम्भीरतासे विचार किया। दूसरे शब्दों में आपके नामाक्षर में मृत्यु कीसम्भावित तारीखें छिपी हुई हैं, जिसे इस घात चक्र केमाध्यम से आप समझ पाएँगे।
मान लीजिए- श्रीकान्त नामक व्यक्ति का घात चक्र देखनाहै। श्रीकान्त की कुम्भ राशि हुई। कुम्भ राशि के प्रकोष्ट मेंनिम्न जानकारियाँ प्राप्त होंगी : घातमास-चैत्र, घाततिथि- 3,8, 13, घात-नक्षत्र-आर्द्र, घातयोग--गण्ड, घातकरण-किरस्तुहघातचन्द्रमा-धनु।
न. धातलग्न- मेष. घातप्रहर- तीसरा,
कुछ विद्वानों के मत से यात्रा में, युद्ध में, खेती में, वाणिज्यमें, घर बनाने में घात चन्द्रमा वर्जित है।अब श्रीकान्त नामक व्यक्ति को चाहिए कि इने तिथि व समयमें बाहरी यात्रा न करे दुस्साहसपूर्ण कार्य न करे। न्यायालय-विवादवाहन-गाड़ी के प्रयोग में, रोग आपरेशन वगैरा में घात चन्द्रको अवश्य देखे और अपना बचाव करे। कुछ विद्वानों के मतसे विवाह, उपनयन आदि मांगलिक कार्य एवं तीर्थ यात्राओं
में घातचन्द्रमा पर विचार नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 319- काल (मृत्यु) का यात्रा में विचार कैसे किया जाता है?उत्तर :रविवार को उत्तर दिशा में सोमवार को वायव्य कोण में, मंगलको पश्चिम दिशा में, बुध को नैऋत्य कोणं में, गुरु को दक्षिण
दिशा में, शुक् को अग्निकोण में और शनिवार को पूर्व दिशामें काल का निवास कहा गया है। अतः जिस दिशा में कालहो उस दिशा में उस दिन यात्रा नहीं करनी चाहिए।
इस "काल" को कुछ लोग मृत्यु कहते हैं तो कुछ विद्वान इसेकाल रुद्ध भी कहते हैं। यात्रा करते समय काल को पीठपीछे रखना तथा बाये रखना शुभ माना गया है।
रचिवार और गुरुवार को पूर्व दिशा में, सोम और शुक्र को दक्षिणदिशा में, मंगल को पश्चिम दिशा में, शनि को उत्तर दिशा में गमनकरें तो काल बाएँ तथा पिछले भाग(पीठ) में रहता है। इस प्रकारयान्ना करें तो सब कायों की सिद्धि मिलती है।
प्रशन 320- मृत्युयोग किसे कहते हैं? यह कैसे बनता है?
उत्तर :मृत्युयोग दो प्रकार के होते हैं। एक तो नक्षत्र एवं वार के संयोगसे बनता है- उसे "नक्षत्र वारादि मृत्युयोग" कहते हैं।
रविवार के दिन अनुराधा, सोमवार के दिन शतभिषा, बुधवार के दिनअश्विनी, गुरुवार के दिन मृगशीर्ष, शुक्रवार के दिन आश्लेषा, शनिवारके दिन हस्त नक्षत्र हो तो "मृत्युयोग" कहलाता है।
रवौ भौमे भवेन्नन्दा, भद्रा भार्गवचन्द्रयोः ।।बुध जया गुरौ रिक्ता, शनौ पूर्णा च मृत्युदाः।।रविवार को और मंगलवार को नन्दा तिथि, शुक्रवार और सोमवार को भद्रा तिथि, बुधवार को जया तिथि गुरुवार को रिक्तातिथि, शनिवार को पूर्ण तिथि हो तो मृत्यु योग जानना चाहिए।मृत्युयोग में कोई कार्य प्रारम्भ हो तो सफल नहीं होता। कार्यप्रारम्भ के साथ ही कार्य नष्ट हो जाता है। इन योगों में यात्राएवं शुभकार्य मृत्यु तुल्य कष्ट देते हैं।
प्रश्न 321- यात्रा काल में दिशाओं के अनुसार चन्द्र कैसे देखा जाताहै? उसका असर क्या होता है?
उत्तर:
चन्द्रमा
दिशा
मेष, सिंह, धनु
पूर्व दिशा
वृष, कन्या, मकर
दक्षिण दिशा
मिथुन, तुला, कुम्भ
पश्चिम दिशा
कर्क, वृश्चिक, मीन
उत्तर दिशा
यात्रा काल में चन्द्रबल प्रमुख माना जाता है। ज्योतिष शास्त्रके अनुसार मेष, सिंह व धनु राशि के चन्द्रमा का निवास पूर्वदिशा में माना गया है। इस प्रकार वृष, कन्या व मकर दक्षिण,मिथुन, तुला व कुम्भ पश्चिम और कर्क, वृश्चिक व मीन केचन्द्रे का निवास उत्तर दिशा में माना गया है। यदि चन्द्रमासन्मुख (यात्रा करते समय सामने) हो तो यात्रा में विपुल ६।नि की प्राप्ति होती है। यात्रा-काल में चन्द्रमा की स्थिति दक्षिणमें हो तो सुख-सम्पत्ति व प्रसन्नता मिलती है। यदि चन्द्र वामभाग में हो तो धन का नाश, चोरी या कुछ अप्रिय घटनाकरवा देता है एवं यात्राकाल में पीठ का चन्द्रमा मृत्यु या मृत्युतुल्यकष्ट को देने वाला कहा गया है।
प्रश्न 322- योगिनी किसे कहते हैं ? इसके निवास का पता कैसे चलताहै ? यात्रा में इसका महत्त्व क्या है ?
उत्तर:
योगिनी का विचार यात्रा में प्रस्थान करते समय किया जाताहै। योगिनी का सम्बन्ध तिथि एवं दिशाओं से होता है। प्रतिपदाऔर नवमी के दिन पूर्व दिशा में -द्वितीया और दशमी केदिन उत्तर में- तृतीया और एकादशी के दिन अग्निकोण में-चतुर्थी और द्वादशी के दिन नैऋत्यकोण में- पंचमी और त्रयोदशीके दिन दक्षिण में- षष्ठी और चतुर्दशी के दिन पश्चिम में-सप्तमी और पूर्णिमा के दिन वायव्य कोण में- अमावस्या औरअष्टमी के दिन ईशान कोण में योगिनी का वास होता है।
योगिनी बाई तरफ हो तो सुख देती है। पृष्ठ भाग मेहो तो इचिक्त फल देती है। दाहिनी तरफ हो तो धन कानाश करती है। सन्मुख में हो तो मरणप्रद जानना चाहिए।मन 323 पाया किसे कहते हैं? मह कैसे देखा जाता है?उत्तरआर्ा दस रूपाणा, विशाखा नब ताम्रका।रेव्तीषट्ट हेमश्च, शेषा लोहा प्रकीर्तिता।।
आदा से दस नक्षत्रं में जन्म हो तो चांदी का पाया, विशाखासे नौ तक तांबे का पाया, रेवती से छ तक सोने का औरबाकी के नक्षत्रं में लोहे का पाया जानना चाहिए। सोने कापाया अशुभ होता है। कुछ विद्धान् चन्द्रमा से भी पाया काविचार करते है वो सथूल हैं।
प्रशन 324- पंचक किसे कहते हैं? इसमें कौन-से कर्म करने कानिषेध है?
उत्तर :
धनिष्ठा नक्षत्न के उत्तरार्द्ध से रेवती तक पांच नक्षत्र पंचककहलाते हैं। 1. धनिष्ठा 2. शतभिशा 3. पूर्वाभाद्रपद4. उत्तराभाद्रपद 5. रेवती-ये पाँच नक्षत्र ही पंचक कहलातेहैं। जनभ्रुतियों और मान्यताओं के अनुसार इन पाँच नक्षत्रों मेंकिये गये अशुभ कार्यों की पाँच बार पुनरावृत्ति होती है।अतः पंचक में दक्षिण दिशा में गमन, घर का ढहना, प्रेत-दाहघास तथा लकड़ी का संग्रह और घाट भरना- ये काम नहींकरना चाहिए। इसके अतिरिक्त शुभ मांगलिक कार्यों में भीपंचक आ्राह्म नहीं है।प्रश्न (अ) पंचक-दोष की निवृति कैसे होती है?
उत्तर :
प्रश्न (ब)
पंचक में यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो ऐसी मान्यताहै कि उस परिवार में पाँच और लोगों की मृत्यु होगी, अतःइस अनिष्ट से बचने के लिए शव के साथ पाँच आटे केपुतले जलाये जाते हैं। ग्रामीण भाषा में इस विधि को 'टोटकाकहते हैं।
पंचक लक्षण के पांचों अंग समझाये ?
उत्तर :
धनिष्ठा पंचक आ्रमे, शतभिषाकुल पंचकम्।पूर्वाभादपदारथ्याः चोत्तरा गृह पंचकम्।रेवती ग्रामबाह्य ब एतत् पंचक लक्षणम्।पंचक का व्यापक प्रभाव कुछ इस प्रकार से जाना जाता है-धनिष्ठा नक्षत्र को "ग्रामपंचक" जानना। उसमें जन्ममरण होतो गाँव में पाँच बालक जन्म लें अथवा पाँच मनुष्यों की मृत्युहो। शतभिषा नक्षत्र "कुलपंचक" है, उसमें किसी का जन्महो या किसी की मृत्यु हो तो कुल में पाँच बालक जन्म लेंअथवा पाँच मनुष्यों की मृत्यु हो। पूर्वाभाद्रपद "मौहल्ला पंचक"है। उसमें किसी का जन्म या मरण हो तो मौहल्ला-गली मेंपाँच बालक जन्में या पाँच मनुष्य मरें।
प्रश्न 325
उत्तराभाद्रपद "गृहपंचक" है। उसमें किसी का जन्म हो याकिसी की मृत्यु हो तो घर में पाँच बच्चे जन्में या पाँच व्यक्तियोंकी मृत्यु हो। रेवती नक्षत्र में "ग्रामबाह्यपंचक" है। उसमें किसीका जन्म. या किसी की मृत्यु हो तो गाँव के बाहर पाँच बच्चेजन्में या पाँच व्यक्ति मरें। इस प्रकार से भिन्न-भिन्न पंचकोंका फल जानना शास्त्र सम्मत है।त्रिपुष्कर योग किसे कहते हैं?
उत्तर :जिस प्रकार से पंचक होते हैं उसी प्रकार से त्रिपुष्कर योग होताहै जिसमें अशुभ कारयों की तीन बार पुनरावृत्ति होने का भय रहताहै। यह योग तिथि, वार, नक्षत्रों के संयोग से बनता है।
द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी-- इन तिथियों में शनि, मंगलऔर रविवार पड़ता हो तथा उस दिन विशाखा, उत्तराफालुनी,पूर्वाफालुनी, पूरनर्वसु, कृत्तिका और उत्तराषाढ़ा- इन नक्षत्रों मेंसे कोई नक्षत्र हो तो त्रिपुष्कर योग बनता है। त्रिपुष्कर योगके दिन यदि मरण, किसी वस्तु का नाश हो या कोई वस्तुकी प्राप्ति हो तो उसका फल तिगुना होता है।
प्रश्न (अ) त्रिपुष्कर दोष की निवृत्ति कैसे होती है?
गायों के मूल्य की राशि दान करनी चाहिए।त्रिपुष्कर योग कैसे बनता है ?उत्तर:त्रिपुष्कर दोष की निवृति हेतु तीन गायों का, अथवा क्रम अनुसार
प्रश्न 326-
द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी को शनि, मंगल एवं रविवार होतथा इनमें धनिष्ठा, चित्रा और मृगशीर्ष- ये नक्षत्र पड़ते होंतो त्रिपुष्कर योग बनता है। इसका प्रभाव त्रिपुष्कर योग कीभाँति ही है तथा निवृत्ति भी उसी प्रकार से मानी गयी है।उत्तर :
उत्तर :
प्रश्न 327- रवियोग किसे कहते है ?
सूर्य के महानक्षत्र से चन्द्रमा के नक्षत्र तक गिनकर जो चार,नौ, छः दस, तेरह, बीस संख्या आवे तो उस दिन को "रवि-योग" जानें। रवि-योग बीस प्रकार के दोष समूहों का नाशकरने वाला, सब प्रकार के कार्यों में सफलता देने वाला, श्रेष्ठयोग होता है।
प्रश्न 328- गोधूलि किसे कहते हैं? गोधूलि कब त्याज्य है?उत्तर :जब सूर्य अस्त न हो और गौ-खुरों की धूल आकाश में छा रही हो.ऐसी गोधूलि बेला सब शुभ कायों में प्रशंसनीय है व आ्राह्म है।गोधूलि की प्रशंसा "मुहूर्त चिन्तामणि" में यूं लिखी है।
नास्यामृंक्ष न तिथिकरण नैव लग्नस्य चिन्ता,नो वा वारो न च लवविधिनों मुहुर्तस्य चर्चा।
नो वा योगो न मृतिमवने नैय जामित्र दोषो,गोधूलिः सा मुनिमिरूदिता सर्वकार्यषु शस्ता।अर्थात् ऋषि मुनियों ने सब कारयों में गोधूलि अति शुभ मानीहै। इसमें न तो अशुभ नक्षत्र, तिथि, करण और लग्न की चिन्ताहै, न निषिद वार, नवमांश तथा मुहूर्त की चर्चा है, न कुयोग,अष्टम घर तथा मंगल-दोष पर विचार है। अन्य विद्वानों कामत है कि "घटी लग्न यदा नास्ति तदा गोधूलिक शुमम्अर्थात् घटी-लग्न न बनती हो समय का सही परिज्ञान हेतुकोई यन्त्र न हो तो ऐसी अवस्था में गोधूलि शुभ है अन्यथानक्षत्र, मुहूर्त व लग्न बल पर विचार करना चाहिए।
लग्न शुद्धिर्यदा नास्ति कन्या यौवनशालिनी,तदा वे सर्ववर्णानां लग्न गोधूलिक स्मृतम्।।
प्रश्न (अ)
कई बार सिंहस्थ बृहस्पति, तारों के उदय-अस्त के कारण विवाहमुहूर्त न निकलता हो, लग्न की शुद्धि न बनती हो और कन्यायुवा हो, तो ऐसी अवस्था में सभी वर्ण गोधूलि बेला में विवाहकरें, तो किसी प्रकार का कोई दोष नहीं रहता। परन्तु गुरुवारका सूर्य अस्त होने के पीछे और शनि को सूर्य अस्त के पहलेकुलिक दोष के कारण गोधूलि त्याज्य समझना चाहिए।गोधूलिनिर्णय ऋतुओं के अनुसार कैसे किया जाता है?
उत्तर :गोधूलि निर्णय हेमन्त काल के चार महीने में, जब सूर्य गोलाकारअस्त. समय हो तो गोधूलि लग्न होंता है और ग्रीष्म ऋतु मेंचार मास अर्धास्त सूर्य समय गोधूलि जानो। जलचर ऋतु मेंचार मास में सम्पूर्ण सूर्य के अस्त समय को गोधूलि जानीजाती है।
प्रश्न 329- पुष्य नक्षत्र क्या है ? इसकी क्या महिमा है ?
उत्तर:पुष्य नक्षत्र 27 नक्षत्रों के क्रम में आठवाँ नक्षत्र है जिसका
स्वामी बृहर्पति कहा गया है। यह कर्क राशि का नक्षत्र है।इसमें चन्द्रमा स्वगृही होकर हर्षित रहता है तथा गुरु उच्चका होकर अत्यधिक बल को प्राप्त करता है। पुष्य नक्षत्र मेंकी गयी पूजा मूर्तिप्रतिष्ठा, यन्त्रों की प्राणप्रतिष्ठा एवं वस्तु कीप्रतिष्ठा अमोघ फलदायी होती है।
ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र की महिमा कुछ इस प्रकार बतायीगयी है-
सिंहों यथा सर्वत्र चतुष्पदानांतथैव पुष्यो बलवानुडूनाम्।
चन्द्रे विरुद्धे व्यृथ गोचरेपि,
सिद्धयन्ति कार्याणि कृतानि पुष्ये।।
अर्थात् जैसे सिंह चौपायों में बलवान् होता है ऐसे ही नक्षत्रोंमें कार्य नहीं बिगड़ता। पुष्य नक्षत्र में किया गया काम हमेशासिद्ध होता है। पर ध्यान रहे, पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिप्रदाता होनेपर भी (ब्रह्मशाप के कारण) विवाह कार्य में वर्जित है। अन्यसारे मुहूतों में पुष्यनक्षत्र श्रेष्ठ है। उससे भी रविपुष्य एवं गुरुपुष्य का कोई मुकाबला नहीं।
प्रश्न 330- राहुकाल किसे कहते हैं ? यह किस वार को कितने बजेआता है ?
उत्तर :दक्षिण भारत में केरल, कनार्टक, मद्रास, गोवा में राहुकाल काप्रचलन सर्वाधिक है। राहुकाल में कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ नहींकिया जाता। जनश्रुतियों के अनुसार राहुकाल में किया गया कामपूरा नहीं होता है। राहुकाल में प्रारम्भ किये कार्य का फल हमेशाअशुभ ही होता है। यह डेढ़ घण्टे का होता है। इस कालांशमें शुभ मांगलिक कार्य निवेध है। परत्येक वार को राहुकाल अपनेनिश्चित समय में इस प्रकार से आता है :-
1.
सोमवार
प्रातः
7:30 से 9:00
2.
मंगलवार
दोपहर
15:00 से 16:30
3.
बुधवार
दोपहर
12:00 से 13:30
4.
गुरुवार
दोपहर
13:30 से 15:00
5.
शुक्रवार
प्रातः
10:30 से 12:00
6.
शनिवार
प्रातः
9:00 से 10:30
7.
रविवार
सायं
16:30 से 18:00
प्रस्न 331- दिशाशूल किसे कहते हैं? यह कैसे देखा जाता है?उत्तर:यात्रा में प्रस्थान करते समय "दिशाशूल' देखा जाता है। दिशाशूल
का सम्बन्ध वार से है।
शनि और सोमवार को पूर्व दिशा में दिशाशूल रहता है। गुरुवारको दक्षिण दिशा में, रविवार और शुक्रवार को पश्चिम दिशामें, बुध और मंगलवार को उत्तर दिशा में दिशाशूल रहता है।अतः इन-इन वारों में इन-इन दिशाओं में यात्रा वर्जित है।कहा है-
दिशाशूल ले जाओ वामे,राहु योगिनी पूठ।सन्मुख राखो चन्द्रमा,तो ल्यावे लक्ष्मी लूट।।
प्रश्न 332- मांगलिक कुण्डली किसे कहते हैं?
उत्तर :
ज्योतिष शास्त्र में एक प्रमाण सर्वत्र मिलता है।
लग्ने व्यये व पाताले, जामित्रे चाष्टमें कुजे।कन्या भृतुं विनाशाय, भृतु कन्या विनश्यति।।अर्थात् किसी भी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में 1/4/7/8/12वेंस्थान में मंगल हो तो कुण्डली मंगलीक कहलाती है।प्रशन 333- चुनरी मंगलीक एवं मौलिया मंगल किसे कहते हैं?
उत्तर :उपरोक्त स्थिति के अनुसार यदि किसी पुरुष की कुण्डली में 1।4/7/8/12वें स्थानों में मंगल हो तो उस मंगल को "मौलिया मंगलकहते हैं। यदि यही मंगल 1/47/8/12वें स्थान में किसी स्त्री जातककी कुण्डली में हो तो उसे "चुनरी मंगल' कहते हैं।
प्रश्न334- क्या मंगलीक होना कोई दोष है?
यदि किसी कन्या की कुण्डली "चुनरी मंगल' वाली हो तो उसे"मौलिये मंगल" वाली पुरुष कुण्डली के साथ विवाह कराया जाताहै। अन्यथा जनमान्यताओं के अनुसार उन दोनों में से एक की मृत्युहोती है जिससे वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता है।उत्तर :
कुण्डली का मांगलीक होना कोई दोष नहीं है। यह जातक कीकुण्डली की एक विशेष प्रकार की गुणवत्ता है जो जातक के जीवनपर मंगल का विशेष प्रभाव बताती है। इससे अधिक घबराने कीआवश्यकता भी नहीं क्योंकि अनेक प्रकार से इस मंगलीक स्थितिके काट, परिहार वचन-शास्त्रों में मिलते हैं।
केवल विवाह समय में मंगल मिलान को लेकर कुछ कठिनाइयाँजीवन में किसी-किसी व्यक्ति को आती हैं। मेरे विचारों में जहाँतक हो सके मंगल का सही मिलान जरूर कराना चाहिए।शास्त्र वचन एवं जनआंन्तियाँ एकदम झूठे नहीं होते।प्रश्न 335- यदि वस-कन्या में से एक की कुण्डली मंगलीक हो और दूसरीकुण्डली मंगलीक न हो तो क्या उपाय है?
उत्तर :ऐसी स्थिति में शांस्त्रकारों ने "घट विवाह" की व्यवस्था कीहै। दक्षिण भारत में "कदली विवाह" केले के तने के साथपहले विवाह कराया जाता है बाद में कन्या का वर के साथविवाह कराया जाता है। जिससे "द्विभार्योयोग" स्वतः ही नष्टहो जाता है। अनिष्ट की निवृत्ति हेतु इस प्रकार के उपायकरना ही बुद्धिम्ता है। इस विषय में विशेष जानकारी हेतुमेरे द्वारा लिखित 'कालसर्पयोग शान्ति एवं घटविवाह पर
शोधकार्य नामक पुस्तक अवश्य पढे।
प्रशन 326- छायादान किसे कहते हैं? यह क्यों किया जाता है?
उत्तर :
छायादान काँसे या स्टील की कटोरी में तेल भरकर अन्दरसोने का छोटा-सा तुष डालकर उसमें जातक व उसकेमाता-पिता की छाया देखी जाती है। इसके पश्चात् कटोरीदान में दे दी जाती है। इसे "छायादान" कहते हैं। जो स्वर्णपाद में जन्मे जातक के लिए अशुभ निवारण हेतु किया जाताहै।
भारतीय मनीषियों ने स्वर्ण को सबसे नीच व म्लेच्छ धातु मानाहै क्योंकि इसमें कलियुग का वास है तथा इसको धारण करनेसे मनुष्य गर्वी व अहंकारी हो जाता है अतः सोने के पायेमें जन्मा बालक माता-पिता के लिए अशुभ होता है तथा प्रसवहोने के डेढ़ माह तक माता-पिता को कष्ट देता है। इसकष्ट की निवृति हेतु शास्त्रों में "छायादान" (छायापात्र) कीव्यवस्था है।
प्रश्न 327- शनि की पनौति किसे कहते हैं? यह कैसे लगती है? इसकाप्रभाव क्या होता है?
उत्तर :
जिस मनुष्य की जन्म राशि में 1,2, 12वें स्थान पर गोचरका शनि आवे तो उसे साढ़े साती जाने और 4, 8वें शनिहो तो शनि की ढैया लगती है। इसे ही शनि की पनौतिकहते हैं। आम ज्योतिषी लोग केवल शनि की पनौति बतलादेते हैं। मेरी दृष्टि में यह ठीक नहीं, जन्म से चन्द्र के अंशोंसे शनि का पनौति देखना शास्त्रसम्मत है। जैसे- किसी काचन्द्र मकर राशि के 20 अंश पर है तो शनि जब 20 अंशमकर पर आवेगा तब मकर राशि वाले उस जातक के शनिकी साढ़े साती लगेगी। साढ़े साती का प्रभाव उस समय जातकपर पड़ेगा जिस दिन पनौति बैठे उस दिन जन्म-राशि के 1, 6, 11वाँ चन्द्र हो तो शनि का प्रवेश सोने के पाये में,2, 5, 9वाँ चन्द्र हो तो चांदी, 3, 7, 10वाँ चन्द्र हो तो ताँबेका पाया और 4, 8, 12वाँ चन्द्र हो तो शनि का प्रवेश लोहेके पाये में होता है। सोना का पाया चिन्ताकारक, चाँदी कापाया लक्ष्मीदायक, ताम्बा का पाया सुख-सम्पति एवं लोहे कापाया कष्टदायक माना गया है।
प्रश्न 338- साढे साती-ढैया किसे कहते हैं? यह कैसे लगती है?
उत्तर :
प्रत्येक राशि में शनि ढाई वर्ष रहता है। इसलिए तीन राशियोंमें साढ़े सात वर्ष रहेगा। शनि यदि बारहवें स्थान में हो तोढाई वर्ष तक उसकी दृष्टि कहलाती है जो दुःखदाई होतीहै। प्रत्येक कार्य में रुकावट, दिक्कतें उत्पन्न करती है। जन्मराशिपर शनि आवे तो ढाई वर्ष तक का समय भोग कहलाता है।उदर पर शनि, शरीर पर कष्ट देता है आवक की चिन्ता रहतीहै। जन्म राशि से द्वितीय स्थान पर शनि हो तो यह "लात"कहलाती है। यह शनि पावों को तकलीफ देता है। बहुत यात्राएँकराता है, भटकाता है।
प्रश्न 339- रौद्रकाल किसे कहते हैं ? और यह क्या होता है ?
उत्तर :
सूर्यास्त समायात्यज्य कलापुंजो हि रौद्रकः।
वर्जितः शुभकार्येषु शस्तः चन्द्रो बली यदा।।
सूर्योदय से 6 घटी (2 घण्टे 28 मिनट) पहले तक कासमय प्रभात काल और सूर्यास्त के पश्चात् 3 घटी (1 घण्टा12 मिनट) तक का समय प्रदोष काल कहलाता है। सूर्यास्तसे 4 घटी बाद तक का समय रौद्रकाल (भगवान शिव केविचरण का समय) कहलाता है, जिसमें कोई भी शुभ कार्यनहीं करना चाहिए। पुराणों में आता है कि महर्षि कश्यप कीपत्नी दिति ने इसी रौद्रबेला में गर्भाधान कर दैत्यों को उत्पन्नकिया था। आजकल लोग गोधूलि बेला को विवाहादि के लिए
अत्यन्त शुभ मानते हैं, वह इसी काल में पड़ती है। अतःगोधूलि में विवाह करने वालों को चन्द्रबल विचार करके हीकरना चाहिए अन्यथा विपरीत फल भी भोगना पड़ता है। रौद्रकाल चन्द्र बल (मुहूर्त, लग्न एवं कर्ता की जन्म राशि) के प्राप्तहोने पर ही शुभ है।
प्रान 340- य्रह एक दूसरे के कुप्रभाव को कैसे काटते हैं?
उत्तर :
वैध्यनाथ ने अपने ग्रन्थ में बताया है कि राहु के कारण यदिकोई बुरा फल मिल रहा है, लेकिन बुध का राहु सेसम्बन्ध हो, अर्थात् राहु पर बुध का प्रभाव हो अथवा कुण्डलीमें बुध बलवान् होकर शुभ स्थानों में हो तो राहु का कुफलसभाप्त हो जायेगा। इसी तरह राहु व बुध के दोष को अकेलाशनि शान्त कर देता है। इन तीनों (रा.बु. श.) के दोष कोमंगल समाप्त करता है। चारों (रा. बु. श. मं) के दोष कोअकेला शुक्र धो देता है। पाँचों के दोष को (रा. बु. श. मं.शु) गुरु नष्ट करता है। छहों (रा. बु. श. मं. शु. गु) के दोषका नाश करने में अकेला चन्द्रमा सक्षम है। सूर्य (उत्तरायणमें विशेष) सातों ग्रहों के कुप्रभाव को शान्त करने की अकेलासामर्थ्य रखता है।
तात्पर्य यह हुआ कि अकेला बृहस्पति, चन्द्रमा या सूर्य जन्म-कुण्डली में बलवान् होकर बैठा हो तो समझ लीजिए कि काफीअशुभ का अंश समाप्त हो गया। ध्यान रखिए, एक-दो शक्तिशालीग्रह होने पर भी मुनुष्य सफल, सुखी व शान्तिपूर्ण जीवन बिता
सकता है।
पन 341-- ग्रहों के बलाबल का कैसे ज्ञान हो?
उत्तर :ग्रहों के बलाबल के लिए ग्रहों के 6 प्रकार के बल बताये गएहैं। सामान्यतः स्वराशि, उच्चराशि, मित्रराशि, मां्गी, ग्रहों से दुष्टव शुभ स्वामित्व में बलवान् होता है तथा विपरीत स्थिति में
निर्बल होता है। तथापि 6 प्रकार के बल से ग्रह के सही-सही बल का पता लगना है। ये छ: प्रकार के हैं जिनसे ग्रहका बल बढ़ता है-
1.
स्थान बल - ग्रह यदि उच्च, मित्र, स्वराशि में, मूल त्रिकोणराशि में, नवांश में, इसी तरह मित्रोच्चादि राशियों में होतो स्थान बल को प्राप्त करता है, अर्थात् ग्रह बली होताहै। केन्द्र में स्थित ग्रहाँ को पूरा स्थान बल मिलता है।सप्तवरगों में यदि स्व, उच्च या मित्र की राशि में ग्रह होतो स्थान बली होते हैं।
2.
दिगबल - बुध व बृहस्पति लग्न में, सूर्य व मगल दशमस्थान में, शनि को सप्तम स्थान में और शुक्र, चन्द्र कोचतुर्थ स्थान में दिग्बल मिलता है।
3.चेष्टा बल - सूर्य और चन्द्रमा मकर से मिथुन राशि तकबली होते हैं। मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र व शनि वक्री होनेपर या चन्द्रमा से 12 अंशों के भीतर होने पर चेष्टा बलीहोते हैं।
4.
5.
काल बल - सूर्य, बृहस्पति व शुक्र दिन में बली होते हैं।चन्द्र, मंगल और शनि रात्रि में बली हैं। बुध सदा बलीहोता है। इसी तरह शुभ प्रह शुक्ल पक्ष में तथा अशुभग्रह कृष्ण पक्ष में कालबली होते हैं। बुध प्रातःकाल, सूर्यदोपहर में, शनि सांयकाल, मंगल रात के पहले पहर मेंचन्द्रमा आधी रात में व शुक्र रात के अन्तिम पहर में बलीहोता है। बृहस्पति सदा कालबली होता है।
6.
दृष्टि बल- शुभ ग्रह यदि देखते हो तो दृष्टि बल मिलताहै। अशुभ ग्रहों की दृष्टि से दृष्टि बल घट जाता है।
नैसर्गिक बल - सूर्य चन्द्रमा, शुक्र, बृहस्पति, बुध, मंगल,शनि इस क्रम से सारे ग्रह कम बल वाले होते जाते हैं।
अर्थात् सूर्य सर्वाधिक बली है, उससे कम चन्द्रमा, उससेकम शुक्र तथा क्रमशः शनि सबसे कम निसर्ग बल वालाहोता है।
यहां हमने ग्रहाँं के बलों का सामन्य परिचय मात्र दिया है।अन्यथा, सभी ग्रहां का सही-सही बल गणित से निकाला जाताहै, लेकिन प्रारम्भिक स्तर पर उसकी मात्रा निकालने का विशेषव्यावहारिक उपयोग नहीं है।
प्रश्न 342- अ्रहं की अवस्थायें कैसे बनती हैं ?
उत्तर:ग्रहों के बल के अतिरिक्त ग्रहों की अवस्थाओं का भी कुण्डलीदेखते समय ध्यान रखना चाहिए। आकाश चक्र में अ्रमण करतेहुए ग्रहों का विशिष्ट स्थिति में पहुँचना ही अवस्थाएँ है। अवस्थाओंका वर्गीकरण कई ढँग से किया जाता है।
प्रश्न 343- गरहों की दीप्तादि दस अवस्थायें क्या है ?
उत्तर :
अपनी उच्च राशि में ग्रह 'दीप्त' होता है। अपनी राशि में 'स्वस्थहोता है। अपने नैसर्गिक मित्र ग्रह की राशि में मुदित अर्थात्प्रसन्न होता है। शुभ ग्रहां के नवांश, ट्रेष्काण, द्वादशांश आदिमें हो तो 'शान्त' अवस्था होती है। उच्च रश्मि व चेष्टा रश्मियोंसे शुद्ध ग्रह 'शक्त' अवस्था वाला होता है। मतान्तर से वक्रीहोने, पर ग्रह ‘शक्त’ अवस्था में होता है। उपर्युक्त अवस्थायेंशुम फल देने वाली होती हैं। शक्तावस्था में थोड़ा मतभेदहै। शुभ ग्रह भी वक्री होने पर बहुत ताकतवर हो जाते हैं,अतः शक्त अवस्था को शुभता या अशुभता का निर्णय करतेसमय यह देखना आवश्यक होगा कि ग्रह कहाँ स्थित है, किनस्थानों का स्वामी है तथा कहाँ पर दृष्टि सम्बन्ध रखे हुए है।अशुभ स्थानों में बली ग्रह हानिकारक भी होता है।इनके अतिरिक्त पाँच अन्य अवस्थाएँ हैं जिनमें ग्रह अपनास्वाभाविक बल व फल देने की सामर्थ्य खोता जाता है। वे
अशुभ अवस्थाएँ इस प्रकार हैं-
शत्रुराशि या शत्रु नकांश में प्रह 'दीन' अवस्था वाला होता है।अस्त होने पर 'विकलावस्था', नीच राशि में होने पर 'भीतावस्था',पाप ग्रहां के वर्ग में होने पर 'खल' अवस्था, राशि के अन्त मेंहोने पर तथा ग्रहां द्वारा पराजित होने पर 'पीड़ित' अवस्था होतीहै। ये अवस्थाएँ सदा अशुभ फल देने वाली होती हैं।
प्रश्न 344- अ्रहाँ की बाल-युवा-वृद्ध आदि अवस्थाएँ क्या है ?उत्तर:ये अवस्थाएँ पाँच होती हैं। 6 अंशों की एक अवस्था होती है,अतः 30 अंशों की एक राशि में रहते हुए ग्रह की पाँचों अवस्थाएँपूर्ण हो जाती है। विषम राशियों व सम राशियों में इनका क्रमअलग--अलग होता है-
विषम राशि अवस्था समराशि
1-6 अंश. बाल अवस्था 25-30 अंश
7-12 अंश
कुमार अवस्था
19-24 अंश
13-18 अंश
युवा अवस्था
13-18 अंश
19-24 अंश
वृद्ध अवस्था
7-12 अंश
25-30 अंश
मृत अवस्था
1-6 अंश
11 अंशों से 18 अंशों तक ‘युवावस्था में ग्रह पूरा फल देताहै लेकिन सामान्यतः 6 से अधिक 24 से कम होने पर भीग्रह तारतम्य से फल देता है। बाल्यावस्था में तथा मृतावस्थामें शुभ फल का नाश करता है।
प्रश्न 345- ग्रहां की जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाएँ क्या हैं ?उत्तर:राशि में 10-10 अंशों की ये अवस्थाएँ होती हैं। जागृत (जगताहुआ), स्वान (सपने की अवस्था) तथा सुषुप्ति (सोता हुआ)अतः सुबुप्ति अवस्था में ग्रह फल देने में असमर्थ होता है।येअवसथाएँ भी विषम व समराशियों में अंश भेदसे अलग
अलग होती हैं।
विषम राशि
अवस्था
1-10 अंश
11-20 अंश
जागृत अवस्था
समराशि
स्वपन अवस्था
21-30 अंश तक
21-30 अंश
सुषुप्ति अवस्था
11-20 अंश तक
1-10 अंश तक
इन अवस्थाओं व बल से ग्रह की वास्तविक सामर्थ्य का अनुमानलगाकर आनुपातिक ढंग से तथा व्यक्ति की परिस्थितियों कोदेखकर बताये गये तथा आगे कहे जाने वाले सभी योगों कावास्तविक फलानुपात समझ कर ही बुद्धिमानी से किसी निष्कर्षपर पहुँचना चाहिए।
प्रशन 346- उपग्रह कितने हैं ? उनके नाम क्या है ?
उत्तर :हमारे सौरमण्डल परिवार के कुल नौ उपग्रह हैं। जिनके नाम
1. काल, 2. परिवेष, 3. धूम, 4. अर्धयाम, 5. यमकण्टक,
6. इन्द्र धनु, 7. गुलिक, 8. व्यतिपात, 9. उपकेतु इत्यादि हैं।फलित ज्योतिष में विशेषतया मृत्यु, आयु व दुःख विचार मेंइन उपग्रहों की विशेष सहायता ली जाती है।
प्रश्न 347- प्रहों का उच्च-नीच बल स्पष्ट करें।
उत्तर :‘सारावली के अनुसार उच्चराशि में ग्रह अपना पूर्ण शुभफल,मूल त्रिकोण में तीन चौथाई (75 प्रतिशत) स्वगृही में 50%,मित्र की रशि में 25 प्रतिशत एवं शत्रु की राशि में मामूलीशुभफल देता है।
इसी तरह नीच राशि में ० शून्य फल होता है. ऐसा स्वयंसिद्धहै। य्रहां की मूल त्रिकोणादि राशियों का सर्वसम्मत प्रकार यहाँइस टेबल में बताया जा रहा है।
प्रश्न 348
सभी ग्र अपनी उच्च राशियों से सातवी राशि में नीच होतेहैं। जो अंश परमोच्च के बताये गये हैं, उन्हीं अंशों पर अपनीनीच राशि में ग्रह परम नीच का होता है।वक्री-ग्रह किसे कहते हैं?
उत्तर :
संस्कृत में वक्री का अर्थ होता है कुटिल। घुमावदार रास्तेसे चलने वाला या छलकपट करने वाले व्यक्ति को वक्री कहाजाता है। अंग्रेजी में ‘रिट्रोग्रड शब्द वक्री ग्रह के लिए प्रयोगहुआ है। प्रायः ऐसी धारणा होती है कि जब ग्रह अपनी राशिसे उल्टा विपरीत दिशा में जाने लगता है तो हम कहते हैं।कि अमुक ग्रह वक्री हो गया।
वस्तुतः ग्रह कभी भी उल्टे नहीं चलते। वास्तव में हम जबकिसी ग्रह के चक्री होने की बात करते हैं, तो यह उस ग्रहविशेष की तुलनात्मक स्थिति का विवेचन होता है। पृथ्वी कीगति उस ग्रह से तेज हो जाती है तब हमें गृह उल्टा चलताहुआ प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ जिस ट्रेन में हम बैटे हैं,उसके समानान्तर पटरी पर कोई ट्रेन, हमारे ट्रेन की गति सेकम स्पीड में हो, तो ऐसा लगता है कि सामने वाली ट्रेनपीछे जा रही है। जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं।ज्योतिष की भाषा में जब हम किसी ग्रह को वक्री कहतेहैं तो वास्तव में ऐसी स्थिति उस ग्रह की पृथ्वी की तुलनामें मन्द गति होने की सूचना देती है और ऐसी स्थिति में उसग्रहविशेष का प्रभाव विशेष बलशाली हो जाता है। इसकी विस्तृतसमझ के लिए हमारी पुस्तक वक्री ग्रह पढ़े।
प्रश्न 349- अतिचारी किसे कहते हैं?
जब कोई ग्रह अपनी तेज गति के कारण राशिमण्डल के अन्यग्रह को पीछे छोड़ दे अथवा व्यावहारिक भाषा में उसे ओवरटेककर दे तो ऐसी स्थति में उस ग्रह को अतिचारी कहते हैं।फलित ज्योतिष में ऐसे ग्रह का प्रभाव अति तीव्र होगा।प्रशन 350- मार्गी होना किसे कहते हैं?
उत्तर :
उत्तर :
जब ग्रह वक्री हो जाता है और वापस सही स्थिति मेंआ जाता है तथा अपनी राशि के अंशों में आगे कीओर बढ़ता हुआ प्रतीत होने लगता है, अपने वक्रत्व कोछोड़ देता है तो उसे उस समय मार्गी कहते हैं।इसका प्रभाव पूर्ववत् हो जाता है।
प्रशन 351- अधिक मास एवं क्षय मास किसे कहते हैं?
उत्तर:अधिक मास और क्षय मास की गणना 'सावन मासों में होतीहै। लौकिक व्यवहार में 24 घण्टे का एक दिन तथा तीस
दिन का एक सावन मास होता है। इसी क्रम में प्त्येक तीनवर्ष बाद एक अधिक मास आता है। इस कारण भारतीय महीनोंमें ऋतुओं का सन्तुलन बराबर बना रहता है। इसे मलमासएवं पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। जिसमें विवाह इत्यादि शुभकार्य नहीं होते।
अधिक मास की तरह गणितागणित स्पष्टीकरण से क्षय मासभी भारतीय ज्योतिष की पंचांग गणना में आते हैं। जिस चन्द्रमासमें दो संक्रान्तियों का प्रवेश हो जाता है तो एक मास क्षयहो जाता है। इसके विपरीत जिस मास में सूर्य की संक्रान्तिन हो वह असंक्रान्ति मास- अधि या मलमास कहलाता है।सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के अनुसार क्षय मास कार्तिक आदितीन मासों में पड़ता है तथा अधिक मास प्रायः फाल्गुनादिआठ मास अर्थात् आश्विन तक होते हैं। कार्तिक मास क्षयव अधिक दोनों हो सकता है। पर माघ मास क्षयाधिक नहींहोता। जिस वर्ष क्षय मास होता है उसी वर्ष दो अधिक मासहोते हैं।
प्रश्न 352- दिन-रात में कितने लग्न होते हैं?
उत्तर :दिन-रात में कुल 12 लग्न होते हैं। छः लग्न दिन के एवंछः लग्न रात के होते हैं। मेष, वृष आदि क्रम से लग्नों के
नाम वही हैं, जो राशियों के नाम होते हैं।
प्रश्न 353- लग्न-काल कितने प्रमाण का होता है?
उत्तर :औसत एक लग्न दो घंटे का होता है परन्तु ज्योतिष कीगणितागणित स्पष्टीकरण से इनका सही कालमापन इंस प्रकारहै। मेष लग्न- 3 घटी 38 पल, वृष- 4 घटी 51 पल,मिथुन- 5 घटी 3 पल, कर्कलग्न- 5 घटी 43 पल, सिंहलग्न-5 घटी 37 पल, कन्या- 5 घटी 38 पल, तुला-5 घटी 43 पल, वृश्चिक 5 घटी 40 पल, धनु-5 घटी
40 पल, मकर-5 घटी 3 पल, कुम्भ- 4 घटी 14 पल,मीन- 3 घटी 44 पल का होता है। अपने-अपने देशों कीपलभा के अनुसार लग्न काल भिन्न-मिन्न होते हैं।
प्रश्न 354- उदित एवं अस्त लग्न किसे कहते है?
उत्तर :सूर्य जिस राशि (लग्न) में उदित होता है वह उदयलग्न, उससेचतुर्थ मध्य लग्न एवं उससे सातवाँ जिसमें सूर्य अस्त होताहै, अस्लग्न कहलाता है।
प्रश्न 355- क्या सभी लग्नों में ग्रहां का फल एक समान होता है?
उत्तर :अलग-अलग लग्नों में ग्रहों का स्वामित्व बदलने से उनका फलअलग-अलग प्रकार का होगा। इसलिए प्रबुद्ध पाठंक को चाहिएकि प्रत्येक लग्न के कारक एवं मारक ग्रहों को भलीमाँति अययन कर उन्हें कण्ठस्थ कर लेना चाहिए।
प्रश्न 356- मेष लग्न में ग्रहों की क्या भूमिका है?
उत्तर :जिसका मेष लग्न में जन्म होता है उसको बुध, शनि औरशुक्र अरिष्टदायक है। गुरु और रवि शुभफलकारक है। गुरुऔर शनि का समयोग शुभदायक नहीं है और शुक्र मारकेशहोकर भी मेषलग्न वाले को मारेगा नहीं, परन्तु शनि वगैरहपापग्रह जातक को मारेंगे।
प्रश्न 357- वृष लग्न में अहों की क्या भूमिका है?
उत्तर :वृष लग्न वाले को गुरु, शुक्र, चन्द्र अशुभ ग्रह है। शनि, रवि,शुभग्रह हैं। शनि अकेला राजयोगकारक है। गुरु वगैरह अशुभग्रह इस लग्न के लिए मारक का काम करेंगे।
प्रश्न 358
मिथुन लग्न में ग्रहां की क्या भूमिका है?
उत्तर :जिसका मिथुन लग्न हो, उसको मंगल, गुरु अशुभ एवं शुक्रशुभ फल देंगे। शनि और गुरु का समायोग अशुभफलदायकहै। रवि और चन्द्रमा भी अशुभ है। शुक्र और शुभग्रह युक्त
बुध दोनों ही राजयोगकारक हैं। मारकेश होकर भी शनि मारेगानहीं। मंगल मारकेश का काम करेगा।
प्रश्न 359- कर्क लग्न में प्रहां की क्या भूमिका है?
उत्तर :
कर्क लग्न में जन्मे जातकों के लिए शुक्र, शनि और बुध अशुभहै। मंगल राजयोगकारक है। गुरु मंगल का समायोग अत्यन्तराजयोगकारक है। सूर्य मारकेश होकर भी कर्क लग्न वाले कोनहीं मारेगा। शुक्र वगैरह पापग्रह मारकेश का काम करेंगे।
प्रश्न 360- सिंह लग्न में ग्रहां की क्या भूमिका है?
उत्तर :
सिंह लग्न वालों को शनि, शुक्र, बुध अशुभ है, मंगल शुभ है।शुक्र, गुरु का समायोग फलदायक नहीं है परन्तु मंगल औरगुरु का समायोग-फलदायक है। बुध प्रधान मारकेश है। शनिमारकेश होकर भी मारेगा नहीं।
प्रश्न 361- कन्या लग्न में ग्रहों की क्या भूमिका है?
उत्तर :
कन्या लग्न वालों के लिए शुक्र, चन्द्र, गुरु मंगल अशुभ हैं।बुध और शुक्र का समायोग राजयोगकारक है। सूर्य अकेलामारेगा नहीं। मंगल वगैरा उक्त पापग्रह मारक का काम करेंगे।
प्रश्न 362- तुला लग्न में य्रहों की क्या भूमिका है?
उत्तर :तुला लग्न वालों को गुरु, रवि, मंगल अशुभ है तथा बुध, शनिशुभ है। शनि अकेला राजयोगकारक है। चन्द्र, बुध संयुक्तराजयोगकारक हैं। मंगल प्रधान मारकेश होकर भी तुला लग्नवालों को मारेगा नहीं।
प्रश्न 363- वृश्चिक लग्न में अहों की क्या भूमिका है?
उत्तर :
वृश्चिक लग्न वाले को बुध, शुक्र, शनि अशुभ है। गुरु शुमहै। रवि और चन्द्र राजयोगकारक है। गुरु मारकेश होकर भीमारेगा नहीं। बुध मारकेश का काम करेगा।
प्रश्न 364- घनु लग्न में ग्रहां की क्या भूमिका है?
धनु लग्न वालों को शुक्र अशुभ है। रवि, मंगल शुभ है।बुध और रवि का समायोग राजयोगकारक है। शनि मारकेशहोकर भी मारेगा नहीं। शुक्र ग्रह मारक का काम करेगा।उत्तर:मकर लग्न वालों को मगल, गुरु और चन्द्रमा अशुम है। शुक्र,बुध शुभ है। शुक्र अकेला राजयोगकारक है। शुक्र यदिबुध के साथ हो तो ज्यादा उत्तम है। शनि मारकेश होकरभी मारेगा नहीं। मंगल वगैरह अन्य ग्रह मारक का कार्य करेंगे।प्रश्न 366- कुम्भ लग्न में प्रहाों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
प्रश्न 365- मकर लग्न में ग्रहाँ की क्या यूमिका है?
उत्तर :कुम्भ लग्न वालों को मंगल, गुरु, चन्द्र अशुभ है तथा शुक्रशुभ है। शुक्र और मंगल का समायोग राजयोगकारक है। गुरुमारकेश होकर भी नहीं मारेगा, मंगल वगैरह अन्य ग्रह मारकका कार्य करेंगे।
प्रश्न 367- मीन लग्न में ग्रहों की क्या भूमिका है?
उत्तर :मीन लग्न वालों को शनि, शुक्र, रवि और बुध अशुभ है। मंगलऔर चन्द्र शुभ है। गुरु और मंगल का समायोग भी राजयोगकारकहै। मंगल मारकेश होकर भी मारेगा नहीं। शनि वगैरह अन्यग्रह मारकेश का कार्य करेंगे।
प्रश्न 368- अमुक कुण्डली पुरुष,की है या स्त्री की? इसका बिना बताये,पता कैसे चले?
उत्तर :जन्म-कुण्डली में सूर्य जिस राशि पर है, वह अंक, राहु का अंकतथा लग्न का अंक तीनों जोड़ें। इस योग में 4 का भाग दें।एक या तीन बचे तो पुरुष की कुण्डली है। शून्य या २ बचेतो स्त्री की जन्म-कुण्डली है। कई विद्वान् इसमें गुरु की राशिका अंक जोड़ते हैं तो परिणाम ज्यादा सही निकलता है।
प्रश्न 369- प्रश्न ज्योतिष किसे कहते हैं?
उत्तर :
आजकल घड़ी के समय को देखकर प्रश्न कुण्डली निकालकरउस पर फलादेश करने का प्रचलन बहुत बढ़ गया है। इसेही प्रश्न ज्योतिष (टाइम क्चश्चन) कहते हैं। प्रश्न ज्योतिष केकुछ नियम हैं जो इस प्रकार हैं :-
1. प्रश्नकर्ता जिज्ञासु एवं विनम्र भाव से ज्योतिषी के पास
फल-पुष्प लेकर आदर भाव से ज्योतिषी के स्थान परजाकर प्रश्चन करे तभी उसके प्रति कहे गये वचन सत्यहोते है अन्यथा नहीं।
2. सभा में प्रश्न नहीं करना चाहिए। कपटी, हँसी, मजाकमें प्श्न करने वाले, श्रद्धाहीन खोटे मनुष्य के प्रति, रात्रिमें सोये या लेटे हुए, लापरवाही या बेरुखी से या परीक्षाभावसे प्रश्न पूछने वाले के प्रश्नों का उत्तर देवज्ञ को नहींदेना चाहिए।
3. एक समय में एक प्रश्न का उत्तर देना चाहिए। शास्त्र
के अनुसार शुद्ध लग्न बनाकर एक काल में एक ही प्रश्नबताने पर ज्योतिष द्वारा बतलायी गयी बात मिथ्या नहींहोती।
4. प्रश्न का उत्तर देने. के पूर्व या प्रश्नकुण्डली बनाने के
पूर्व दैवज्ञ को अपने इष्टदेव का स्मरण करना चाहिए।
5. ध्यान करें, भक्त, पीड़ित, दीनमुख एवं जिज्ञासु के प्रति
देवज्ञ प्रश्न न कहें, तो उसका ज्ञान निष्फल होजाता है।
6. प्रबुद्ध ज्योतिषी को प्रश्नकर्ता के देश-काल, आयु व परिस्थिति
आदि का विचार करके उत्तर देना चाहिए।
7. ज्योतिषी को प्रश्नकर्ता के हाव-भाव, अंग-प्रत्यंग की हरकतों का सुक्ष्मता से निरीक्षण करना चाहिए।
8. प्रश्नकाल में होने वाली ध्वनि एवं घटनाओं व शकुन का
भी ज्योतिषी को ध्यान रखना चाहिए।
प्रश्न 370- मूक प्रश्न किसे कहते हैं?
उत्तर :
बिना पूछे ही किसी के मन के प्रश्न को बता देना "मूक प्रश्न विचार"है। सही प्रश्न बताने से ज्योतिषी की मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है तथापृष्टा के हृदय में भी ज्योतिषशास्त्र के प्रति विश्वास व श्रद्धा बढतीहै। मूक प्रश्न बताने में ज्योतिष शास्त्र के अतिरिक्त ज्योतिषी कीकुशाग्रता एवं अनुभवजन्य विशेषता का पता चलता है।
प्रश्न 371- मूक प्रश्न से भविष्य कैसे जाना जाता है?
उत्तर :सबसे पहले ज्योतिषी तात्कालिक समय के अनुसार शुद्ध लग्न
कुण्डली बनावे तथा यह देखे कि सूर्य कहाँ बैठा है। मूक प्रश्नसमय में सूर्य लग्न में हों तो पाखण्ड क्रूर और झूठ के प्रतिचिन्ता हो। दूसरे सूर्य हो तो कार्यबल की चिन्ता हो, तीसरेसूर्य हो तो विवाद के प्रति किसी झगड़े के प्रति चिन्ता हो।चौथे सूर्य हो तो भी विवाद की चिन्ता हो। पाँचवें सूर्य होतो मनुष्य को पुत्रों (सन्तान) की चिन्ता होती है। छठे सूर्यहो तो कार्य की और मार्ग की चिन्ता, सातवें सूर्य स्री केप्रति चिन्ता, आठवें सूर्य हो तो बीमारी मृत्यु के प्रति चिन्ताहोती है। नवें सूर्य हो तो अन्य देश में स्थित मनुष्य की चिन्ता,दशम सूर्य हो तो राजकार्य की चिन्ता होती है। ग्यारहवें सूर्यहो तो राजा से धन प्राप्त होने की चिन्ता होती है। बाहरवेंसूर्य हो तो मार्ग और शत्रु की चिन्ता हो अथवा खर्च की चिन्ताहोती है। इस प्रकार से अन्य ग्रहों की भाव-स्थिति में भी मूकप्रश्न का पता चलता है। मूक प्रश्न किस प्रकार का है यहजानने के लिए एक विद्वान् के अनुसार लग्नेश और लामेशइन दोनों में से जो ग्रह बली हो, उस बली ग्रह से और चन्द्रमासे विचारणीय वस्तु की चिन्ता है, यह कहना चाहिए।
प्रश्न 372- प्रश्नकुण्डली से भूत व भविष्य की घटना कैसे जानी जातीहै?
उत्तर :
प्रश्न कुण्डली से पृष्टा जिस भाव (धन, भाई, पुत्र आदि केलिए) प्रश्न करता है, उस भाव को लग्न मानकर, उससे जोद्वितीय स्थान हो, उससे भाव के भविष्यफल का, और उससेजो द्वादश स्थान हो, उससे उस भाव के भूतकाल का विचारकरे।
प्रश्न-काल में शंख-वीणा-और मृदंग शब्द एवं गाय, घोड़ा, हंस,हाथी का शब्द सुनाई दे तो पृष्टा का कार्य जल्दी सिद्ध होगा।यदि कौआ, कुत्ता, एवं गधे का अप्रिय शब्द सुनाई दे तो प्रश्नके लिए अनिष्ट असिद्धि सूचक हैं।ज्योतिष (प्रश्न-विद्या) के सभी कार्यों में चन्द्रमा बीज तुल्य,लग्न पुष्पतुल्य, नवमांश फल तुल्य और भाव से स्वाद-तुल्यपरिणाम जानने चाहिए।
प्रश्न 373- वार से तेजी मन्दी का विचार कैसे किया जाता है?उत्तर :भय व्याप्त हो। वर्षा की कमी से कषटृक् वर्ग चिन्तितरहे। अन्न, सुवर्ण अलसी में तेजी हो।
1. जिस मास में पांच रविवार पड़े, तो प्रजा में रोग, अशान्ति,
2. जिस मास में पाँच सोमवार पड़े तो वर्षा समयानुकूलउत्तम हो। अन्नादि के सब ब्यापार में मन्दी का वातावरणरहे।
3. जिस मास में पाँच मंगलवार पडें तो प्रजा में परस्पर द्वेष,
कलह, अशान्ति रक्त-विकार हों तथा लाल वस्तु अन्नादितेज हों।
4. जिस मास में बुधवार पाँच पड़ें तो धान्य-भाव सम, वर्षा कहीं कम, कहीं अधिक हो। चाँदी, रूई में घटा-बढ़ी होकरबाद में तेजी रहे।
5. जिस मास में पाँच गुरुवार पड़ें तो व्यापारिक वस्तुओं
में घटा-बढ़़ी के साथ रुख गिरावट की ओर होता है।
घृत, गुड़, रसादि पदार्थ तेज हां।
6. जिस मास में पाँच शुक्रवार पड़े तो अन्न मन्दा, प्रजामें सुख-शान्ति, व्यापार में घटाबढ़ी से प्रायः बाद में मंदीहोती है।
7. जिस मास में पाँच शनिवार पड़ें तो प्रजा में अशान्ति,
रोग, शोक आदि का भय व्याप्त हो। व्यापारिक वस्तुओं
के भाव तेज रहें। कृषक चिन्तित हां।
?प्रश्न 374- पंचक नक्षत्रों से तेजीमन्दी का विचार कैसे किया जाता है।
उत्तर :धनिष्ठा नक्षत्र के आधा भाग से पीछे अर्थात् उत्तर्द्ध से लेकरशतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती नक्षत्र तक कासमय पंचक कहलाता है।
1. पंचक के पहले अढ़ाई दिन में यदि कोई रूई आदि वस्तु
मंदी हो तो पिछले अढ़ाई दिन में तेजी आती है। औरपहले अढ़ाई दिन में तेजी हो तो पिछले अढ़ाई दिन में
मन्दी आती है।
2. पंचक का प्रारम्भ सोमवार, बुधवार या शुक्रवार को होतो रूई आदि में मंदी आती है।
3. पंचक का आरम्भ रवि, मंगल, या शनिवार को हो तोसभी व्यापारिक वस्तुओं में तेजी आती है।
4. पंचक के आरम्भ से पंचक की समाप्तिपर्यन्त यदि किसीवस्तु में तेजी रही हो तो वह तेजी एक मास पर्यन्तरहती है।
5 किसी दिन पंचक 50 घड़ी पीछे प्रारम्भ हो। (अर्थात् कुम्भका चन्द्रमा सूर्योदय से 50 घड़ी पीछे आवे) और ऐसे
ही मेष चन्द्रमा भी रात्रि में आवे तो एक मास शेयरभाव तेज रहे।
6. यदि पंचक सूर्योदय से 45 घड़़ी पीछे प्रारम्भ हो औरउसी तरह पंचक की समाप्ति भी हो तो एक मास रुईशेयर्स में तेजी रहे। उपरोक्त समय के अतिरिक्त समयमें पंचक प्रारम्भ व समाप्त हो तो रूई शेयर्स में मन्दीहो। यदि उस दिन शुक्रवार हो तो पाँच दिन रूई शेयर्समें तेजी होकर फिर मंदी होती है।
7. पंचक के दिनों में जिस दिन ऐन्द्र, वैधृत्ति या व्यतिपातयोग पड़़ जाय तो उस दिन शेयर्स में तेजी होती है।8. पंचक के दिनों में रविवार के दिन धृतियोग पड़े तो रूईमें मन्दी आती है।
9. पंचक के बाद दूसरे मास के पंचक के अन्तर्गत जिसशुक्रवार को गत पंचक में आई हुई तेजी या मन्दी केअनुसार तेजी या मन्दी आवे तो वह बुधवार तक रहेगी।
10. पंचक आरम्भ के दिन यदि मृत्यु योग हो तो रूई में 5या 7 टका की मन्दी होती है।
11. पंचक में मंगलवार को किसी वस्तु की तेजी हो तो आगेशनिवार को भी तेजी आती है। ऐसे ही पंचक में यदिशनिवार को तेजी आवे तो आगे मंगलवार को भी तेजीआती है।
प्रश्न 375- वर्ष के राजा से तेजी मन्दी का विचार कैसे किया जाताहै ?
उत्तर :चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में उदयात् जो वार हो, वही उस
वर्ष का राजा माना जाता है।
1. जिस वर्ष में वर्ष का राजा सूर्य हो तो-धान्य व फलोंकी उत्पति कम हो। वर्ष के अन्त में अकाल जैसी स्थिति
बने। अन्य ग्रहों का कुयोग भी हो तो अकाल अवश्य पड़े।हर प्रकार का अनाज तेज रहे, उस वर्ष में विज्ञ व्यापारियोंको चाहिए कि गल्ला, गेहूँ चावल, जौ, वैशाख व ज्येष्ठमास में संग्रह करें और आषाढ़ से भाद्रपद तक बेचकरलाभ उठा लेवें। उस वर्ष धी, गुड़, तेल भी आषाढ़ शुक्लसे एक मास में तेज होते हैं।
2. वर्ष का राजा चन्द्र हो तो अनाज का भाव पहले मन्दारहे। चावल की पैदावार अच्छी हो। इस वर्ष मन्दी मेंअन्न रहे। चावल की पैदावार का संग्रह करने से भाद्रपदसे एक मास में लाभ होता है। यदि इस वर्ष लाल मिर्च,तेल, घी, मजीठ, चैत्र, वैशाख में मन्दे स्तर पर दीखेंतो अवश्य खरीदें। क्योंकि आगे भावों तथा आश्विन मेंदुगना तक लाभ होता है।
3. वर्ष का राजा मंगल हो तो- वर्षा में कमी रहे। कहींओले पड़ने से फसल को हानि पहुँचे। अन्नादि का भावतेज हो। व्यापारियों को चाहिए कि चैत्र वैशाख में गेहूँगुड़, मजीठ, लाल मिर्च, लाल रंग, छुहारे, बिनौले कीखरीद करें। आगे भाद्रपद या आश्विन में बेचकर ड्योढ़ादुगुना तक लाभ उठावें। खरीदते समय ध्यान रखें किउपरोक्त कौंन-सी चीज खास मन्दी बिक रही है।
4. वर्ष का राजा बुध हो तो -धान्य की उत्पत्ति अच्छी हो।गौ, बैल आदि पशु मन्दे रहें। वर्ष के आरम्भ में गुड़, एरण्ड,मिर्च, शक्कर, घृत, तेल, बिनौला, नमक खरीद करें। पीछेश्रावण या भाद्रपद की तेजी में बेचकर अच्छा नफा उठालेना चाहिए।
5. वर्ष का राजा गुरु हो तो वर्ष के प्रारम्भ में गल्ला आदिसर्व वस्तुओं में मन्दी रहकर वर्ष के अन्त में कभी भाद्रपद
में ही तेजी आती है। पर गुड़, तेल, बिनौला, खाण्ड,हल्दी में तथा पशुओं के भाव में मन्दी ही रहती है। यदिइस वर्ष आश्विन में वर्षा हो जावे तो धी, मजीठ, हल्दी,तिल, राई, जौ, अरहर और मेहदी में आगे तेजी आतीहै।
6. वर्ष का राजा शुक्र हो तो अन्न तथा घास-चारे की उत्पत्तिअच्छी होती है। वर्षारम्भ में गल्ला मन्दा रहता है। अन्तमें तेजी रहती है। फूलों के भाव मन्दे रहें। ध्यान रहेकि चावल का भाव खास तेज रहता है। अतः फसलपर चावल संग्रह करके लाभ उठावें।7. वर्ष का राजा शनि हो तो धान्योत्पत्ति कम हो। वर्षा समयपर न हो। कहीं वर्षा की भारी कमी तथा कहीं ओलेआदि के कारण फसल को हानि होकर अकाल पड़े।उड़द, लोहा, कोयला आदि काले रंग के पदार्थ तथाउनमें तेजी रहती है। श्रावण तथा मार्ग शीर्ष में अन्नकी तेजी से लाभ उठा लेना चाहिए।
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समाप्त