संगीत तथा ग्रह आधारित रोगोपचार

 

संगीत तथा ग्रह आधारित रोगोपचार

1 संगीत द्वारा रोगोपचार

समस्त संसार की चेतन-सृष्टि पर संगीत का प्रभाव पड़ता है। वैसे तो जड़ और चेतन दोनों पर संगीत का प्रभाव पड़ता है। लेकिन विषय के अनुरूप हम चेतन संसार पर पड़ने वाले संगीत के प्रभाव की चर्चा करेगें और इसके अनेकों लाभों की चर्चा करेंगे।

 

संगीत द्वारा चेतन-सृष्टि पर प्रभाव डालने की कला मनुष्य ने प्राचीन काल से ही जान ली थी। संगीत के मूल नाद के विषय में तो भारतीय मनीषियों ने कहा है कि समस्त सृष्टि का सर्जन नाद द्वारा ही होता है और वह अन्तोतगत्वा उसी में विलीन हो जाती है। जब नाद का इतना महत्व है तो नाद आधारित संगीत अनेकों प्रकार के रोगों का निवारण क्यों नहीं कर सकता? आवश्यकता अनुसंधान की है। पाश्चात्य देशों में इसकी महत्ता को समझकर इस पर पच्चास के दशक में शोधकार्य करना प्रारम्भ किया था जिसके अनेक चमत्कारिक परिणाम निकले हैं।

 

समस्त संगीत, स्वर तथा लय पर आधारित है। स्वर को दो रूपों द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है - मानुषी वीणा तथा शरीरी वीणा। मानुषी अर्थात् विभिन्न वाद्यों द्वारा शरीरी अर्थात् मनुष्य में प्रकृति द्वारा प्राप्त गले द्वारा स्वर निष्पत्ति। इसमें सितार, बांसुरी, सरोद, तबला इत्यादि, वाद्यों के स्वर, पशु-पक्षियों के स्वर तथा आयु के अनुसार स्वरों के परिवर्तित रूप जैसे-बाल अवस्था के, युवा अवस्था के तथा वृद्धावस्था के रूप। इन सबके अलग-अलग प्रभाव पड़ते हैं क्योंकि इन सबके स्वरों की आन्दोलन संख्याएं अलग-अलग

 

होती है। स्वर के अधीन अनेकों प्रकार की शैलियों का निर्माण हुआ जो अपनी रचना के आधार पर भिन्नता लिए हुए हैं और अनेकों शैलियां लय की भिन्नता के आधार पर विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं। संगीत की विभिन्न शैलियों का प्रभाव अलग-अलग होता है। उसी प्रकार लय भेद से अनेकों प्रकार की लय बनती है और प्रत्येक लय का अपना ही एक प्रभाव होता है। जिस प्रकार कुछ गायन शैलियां व्यक्ति के चित्त को शान्त करती है उसी प्रकार व्यक्ति के दिल की धड़कन के समानान्तर कोई लय उसे शान्ति प्रदान करती है। समस्त सृष्टि लय पर आधारित है। यदि पृथ्वी लय विहीन हो जाए तो न तो पृथ्वी पर दिन रात बदलेंगे और न ही पृथ्वी पर ऋतुओं का परिवर्तन होगा। इसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड के अनेकों पिण्ड अपनी-अपनी धुरी पर घूमते हुए किसी अज्ञात शक्ति की परिक्रमा कर रहे हैं। भारतीय मनीषियों ने लय तथा स्वर की असीम शक्ति को हजारों वर्ष पहले जान लिया था और इसके प्रयोग से अनेकों चमत्कारिक परिणाम प्राप्त किए थे।

संगीत द्वारा रोगोपचार की पद्धति यद्यपि पाश्चात्य देशों के लिए नई चीज है।

लेकिन भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं। जिससे इस चिकित्सा पद्धति का प्रमाण मिलता है। भारतीय संगीत सहस्त्रों वर्ष पूर्व अपना विकसित रूप प्राप्त कर चुका था। "यहां की द्रविड़ जाति संगीत द्वारा अनेकों रागों का उपचार विधि जानती थी और यह काल वैदिक युग से पहले का है।"1 वेदों पुराणों में भी संगीत द्वारा रोगों के चिकित्सा सम्बन्धी विवरण मिलते हैं लेकिन ऐसा भी नही कि इस विषय पर भारतीयों का ही एकाधिकार था। समय-समय पर विभिन्न देशों की विभिन्न सभ्यताओं में इस विषय पर अनुसंधान तथा प्रयोग होते रहें हैं। पुरानी इजिल "ओल्ड टेस्टोमेन्ट" में कहागया है कि किंग डेविड ने 'सौल' की बीमारी को एक प्रकार की ज्या "harf" बजाकर दूर किया था। इसके अतिरिक्त "orfhic" विद्या पद्धति में संगीत की शक्ति द्वारा रोगों की चिकित्सा करना एक विज्ञान के रूप में पढ़ाया जाता है और साथ ही कहा जाता है कि युलेसिस का एक घाव संगीत की शक्ति से भर गया था। इसके अलावा अरबी लेखक इब्न सिना ने बीमारियों को दूर करने में संगीत की शक्ति पर लिखा है। "अकबर की रानियों में जब एक बीमार हुई तब तानसेन के गुरू हरिदास द्वारा वीणा पर एक राग विशेष बजाए जाने से उसकी बीमारी दूर हो गई।

 

प्राचीन संगीत मनीषियों ने रागों को गाने के समय आज के वैज्ञानिक युग से बहुत पूर्व ही निश्चित कर दिए थे। प्रत्येक राग ऋतु देश और काल के अनुसार प्रयोग किया जाता था ताकि उसका प्रभाव लोक के लिए सर्वथा मंगलकारी सिद्ध हो तथा सौन्दर्य और आनन्द की सृष्टि करें। संगीत के विविध राग, विविध रंगों और रूपों के प्रतीक है। यही कारण है कि रागों के द्वारा अनेकों रोगों की चिकित्सा की जा सकती है।

आधुनिक काल पाश्चात्य देशों में संगीत चिकित्सा पर पचास के दशक

में काम करना शुरू किया था जबकि वर्तमान भारतीय संगीत चिंतकों ने इस

विषय पर कोई गम्भीर अनुसंधान नही किया है। इस विषय में पाश्चात्य देश

हमसे काफी आगे है। अमेरिकी हस्पताल में रोगियों का शल्य चिकित्सा करते

वक्त उपयुक्त संगीत बजाया जाता है और उस संगीत को सुनते-सुनते रोगी

अपना दर्द भूल जाते है।

 

हमारे देश में इस विषय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। यद्धपि

इसकी सम्भावनाऐं हमें पहले से ज्ञात है। "दक्षिण में तंजावुर में स्थित

सरस्वती महल-पुस्तकालय" में "राग चिकित्सा' नामक एक पांडुलिपि विद्यमान

थी किन्तु अब इसका कोई पता नही।

 

भारतीय वैशेषिक दर्शन में वर्ण को द्रव्य का गुण बताया है इसी प्रकार

के विचार अन्य आर्य विद्वानों ने भी प्रकट किए हैं। "पाश्चात्य तत्ववेत्ताओं ने

इस सम्बन्ध में अपने जो मत उपस्थित किए हैं उनसे अनेक वाद और

भ्रान्तियों का प्रादुर्भाव हुआ है। वायुमण्डल में विभिन्न गतियों से पृथक-पृथक

रंग उत्पन्न होते हैं इस बात को पूर्व और पश्चिम के सभी वैज्ञानिक समान

रूप से मानते हैं।

 

समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं के गठन विघटन से आयोजित है। पंचभूतों की सत्ता भी परमाणुओं पर आधारित है। प्रत्येक परमाणु का अपना स्वरूप है। गति के प्रभाव से यह स्वरूप परिवर्तित, परिवर्धित और प्रकाशित होता रहता है। "आकाशाच्छादित परमाणुओं पर भिन्न-भिन्न रूप और रंगों का निर्माण करती है और स्वर अपने स्वरूप को प्रकाशित कर देते हैं इसलिएहमारे शास्त्रकारों ने विभिन्न स्वरों के भिन्न-भिन्न रूप, रंग, देवता, गुण, जाति तथा स्वभाव आदि बताए हैं। जो इस प्रकार है:-

 

सकल ब्रह्माण्ड का उद्भव जिस त्रिगुणात्मक शक्ति द्वारा हुआ उन्ही सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों द्वारा ही समस्त स्वरों को श्रृंगार आदि रसों तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जाति तथा हरे, पीले, लाल आदि रंग प्राप्त हुए हैं।

प्राचीन महर्षियों ने स्वरों के गुण और धर्मों और प्रभावों का भली-भांति

देखकर ही इनका वर्ग अर्थात् जाति ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा रंग आदि का

विभाजन करके बताया है। -

इस बात का प्रमाण वेद ही माने जा सकते हैं जिसमें से "अग्निपोमाभ्यां

शरीरम् - अग्निपोमाभ्यां जगत्। ऐसे वाक्यों ने वेदों के वैज्ञानिक आधार पर ही

खोज निकाला है वह यही कि अग्नि "सूर्य" तत्व और भोम "चन्द्र" तत्व द्वारा

ही शरीरों की सृष्टि हुई है और इन्ही अग्निभोम (उष्ण-शीत) तत्वों द्वारा

जगत का निर्माण हुआ है।

यहां शोधार्थी एक तालिका प्रस्तुत कर रहें हैं :

स्वरों के देवता, वर्ण, रस, जाति आदि की तालिका इस प्रकार है।

1

स्वर

सा

रे

अंतर-ग

नि

काकली-नि

2

जाति

विप्र

क्षत्रिय

वैश्य

शूद्र

विप्र

विप्र

क्षत्रिय

वैश्य

शूद्र

3

कुल

देव

ऋषि

देव

शूद्र

देव 

पितृ

ऋषि

असुर

शूद्र

4

वर्ण

पद्मपत्र

पिंजर

स्वर्ण

 

कुंद

कृष्ण

पीत

सर्ववर्ण

 

5

देवता

ब्रह्

अग्नि

भारती

 

शिव

विष्णु

गणपती

सूर्य

 

6

ऋषि

अग्नि

ब्रम्ह

चंद्र

 

विष्णु

नारद

तुंबरू

तुंबुरु

 

7

रस

वीर,रौद्रो,

अध्भुद  

वीर,रौद्रो,

अध्भुद  

करूण

 

हास्य-शृंगार

हास्य-शृंगार

भयानक

वीभत्स

करूण

 

8

स्थान

कंठ

शिर

नासिक

 

उर

उर,शिर, कंठ

तालु

सर्वसंधि

 

9

छंद

अनूषठूप   

गायत्री

त्रिशटूप

 

बृहती

पंक्ति

ऊषणीक  

जगती

 

10

द्वीप

जंबू

शाक

कुश

 

क्रॉनच

शाल्मली

श्वेत

पूर्वाषाढ़ा

 

11

नक्षत्र

शतभीषक

चित्रा

धनिष्ठा

 

मधा

डतरा

पूर्वाषाढ़ा

 

 

12

राशि

कुम्भ

तुला

मीन

 

सिह

कन्या

धनु

वृश्चिक

 

 

यह तालिका मतंग मुनि कृत, बृहदेशी नारदमुनि कृत, संगीत मकरन्द तथा पण्डित शारंगदेव कृत, संगीत रत्नाकर पर आधारित है। शोध विषयक सामग्री के दृष्टिकोण से इन तीनों ग्रन्थों में से नारद मुनि कृत संगीत मकरन्द समृद्ध है। यद्यपि बृहदेशी और रत्नाकर में छन्दों,देवताओं और रसों का उल्लेख मिलता है। तथापि आधारित सप्तक का उल्लेख मकरन्द में ही मिलता है। आलोचना की दृष्टि से संगीत मकरन्द में पंचम की शुद्र बताई गई है।

 

संगीत मकरन्द में ऋषियों के कुछ नाम भी दिये गऐं हैं जैसे सा-दक्ष, रि-अत्रि, ग–कपित, म-वशिष्ठ, प-भार्गव, ध-नारद, नी- तुम्बरू। इसके साथ ही संगीत मकरन्द में स्वरों के रस के प्रकार दिए गए हैं। जैसे-सा अद्भवतवीर, रि-रौद्र, ग– शान्त, म-हास्य, प-श्रृंगार, ध-विभत्स, नी-करूण।

 

छन्द द्वीप नक्षत्र और राशि का विवरण बृहद्देशी ग्रन्थ में नहीं मिलता।

संगीत मकरन्द में ही दिए गए हैं। इस नक्षत्र का अन्य नाम शत्तारक है।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो घनिष्ठा जो कुम्भ राशि का

नक्षत्र है संगीत मकरन्द में मीन राशि का बताया गया है। यदि

पूर्वाभाद्रपद-उत्तराभाद्रपद या रेवती इन तीनों में से कोई नक्षत्र माना गया

होता तो मीन राशि ठीक थी।

 

प्राचीन भारतीय मनीषियों का यह ज्ञान ज्योतिष का योग आधारित था।

आज के युग में इनकी उपयोगिता कम आंकी जाती है। इस वैज्ञानिक युग में

शोधकर्ता कब, क्यों, कैसे के आधार पर सोचता है और भौतिक दृष्टिकोण से

विचार करता है।

 

हाल में एक रूसी युवक विज्ञानवेत्ता ल्योनतेव सांगीतिक ध्वनियों को विभिन्न रंगों में परिवर्तित करने में सफल हुए हैं। वह एक बार रेलगाड़ी में यात्रा कर रहा था तब मार्ग में चिंतन करने का स्वभाव होने के कारण उन्हें अनुभव हुआ कि गाड़ी के धूप तथा छांव में होकर जाने से पहियों की ध्वनि में अन्तर आ जाता है इस प्रकार उन्हें प्रकाश तथा ध्वनि में निकट सम्बन्ध प्रतीत हुआ। अतः इस विषय को लेकर परीक्षणों का सर्वप्रथम प्रदर्शन उन्होंने सन् 1952 में किया। संसार के प्रसिद्ध गायक पाल राबसन के एक गीत को ल्योनतेव ने अपने यन्त्र द्वारा रंगीन बल्बों के प्रकाश में साकार कर दिखाया था। दर्शकगण आश्चर्यचकित रह गऐ। किन्तु यह अनुसंधान का आरम्भ मात्र था। अपनी खोज में निरन्तर वृद्धि करते हुए उन्होंने अथक परिश्रम प्रारम्भ कर दिया।

 

ल्योनतेव का आधारभूत सिद्धान्त यह था कि शारीरिक संवेदन संस्थान "ज्ञानेन्द्रियां संचार की शाखाऐं हैं जिनके द्वारा मानव का सम्पर्क शेष संसार

से स्थापित हो सकता है। जो संवेदन संस्थान जितना अधिक शक्तिशाली होगा, उतनी ही जल्दी वस्तु के प्रति उसमें प्रतिक्रिया उत्पन्न होगी। सोवियत रूस और अमेरिका के मनोवैज्ञानिक वेत्ताओं का विचार है कि सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियों में आखें अधिक पूर्ण एवं शक्तिसम्पन्न हैं। अतः रंग संकेतों के रूप में कोई भी सूचनाएँ शक्ति को कम-से-कम क्षीण करती हुई निर्दिष्ट स्थान तक भेजी जा सकती है।

 

"बाद में ल्योनतेव ने मानवीय मस्तिष्क के दृश्य श्रवण सम्बन्धी भाग का विशेष अध्ययन किया और एक ऐसे यन्त्र के द्वारा सांगीतिक ध्वनि को विद्युत संकेतों के रूप में अनुभव करने के बाद प्रकाश में परिवर्तित कर दिया जाता है। यह यन्त्र स्वरों के गुण, परिणाम और समय के प्रभाव को भी बहुत सूक्ष्मता से ग्रहण कर सकता है। विशिष्ट समय पर एक ही स्वर का अन्य ही प्रभाव होगा, यह बात यन्त्र द्वारा अब सिद्ध हो चुकी है।"" किन्तु भारतीय संगीत में विशिष्ट रागों को गाने के समय आज के वैज्ञानिक युग से बहुत पूर्व ही उल्लेखित कर गए थे। प्रत्येक राग ऋतु, देश और काल के अनुसार प्रयोग किया जाता था ताकि उसका प्रभाव लोक के लिए सर्वथा मंगलकारी सिद्ध हो तथा सौन्दर्य और आनन्द की सृष्टि करें। संगीत के विविध राग विविध रंगों और रूपों के प्रतीक हैं।

 

भारत में भी अनेकों स्थानों पर ध्वनि के प्रभाव सम्बन्धी अनुसंधान किए जा रहें हैं। डॉ. टी.सी.एन. सिंह व डी.एस. ने "अन्नामलाई विश्वविद्यालय में पौधों पर प्रयोग कर यह सिद्ध किया कि यदि पौधों को कुछ समय के लिए। विशिष्ट राग सुनाए जाए तो उनकी पैदावार अधिक होती है। इसी परिपेक्ष में भारतीय रीति-रिवाजों का अनुसंधान करते हुए पाया गया कि धान रोपते समय जो गीत गाए जाते हैं वह भी नवजात पौधों के विकास के लिए सहायक होते हैं और साथ ही मनुष्य के अत्यधिक श्रम के उपरान्त जिस थकावट का एहसास उन्हें होता है संगीत उस थकान को भी दूर करने में सहायता प्रदान करता है।

 

"सन् 1876-1880 ई. में भारत के वायसराय लार्डलिन्टन के एक विशाल सुसज्जित कक्ष में विज्ञान तथा उसके आविष्कारों से परिचित विद्वानों और विदुषियों का एक जमघट लगा हुआ था। एक तरफ एक दीवार पर एक सफेद परदा लटक रहा था। श्रीमती मारग्रेट हेन ने इस विज्ञ मण्डली के सामने अपने ओडियोफोन यन्त्र पर एक राग बजाना प्रारम्भ किया राग के आरम्भ होते ही सितारों के रूप की आकृतियां नाचती और उछलती हुई परदों पर दिखाई पड़ी। हेन महोदया ने बजाना बन्द कर दिया और आकृतियां भी धीरे-धीरे अदृश्य हो गयी। गायिका ने फिर दूसरा राग छेड़ा तत्काल ही अन्य प्रकार की आकृतियां परदे पर दिखाई पड़ी। जैसे-जैसे राग बदलते गऐ आकृतियां भी बदलती गयी। कभी सितारें सर्पाकार, कभी त्रिकोण कभी षटकोण और कभी सुविकसित फूलों की आकृतियां दिखाई पड़ी। कभी भीषणाकार समुद्री जन्तु प्रकट होते तो कभी फूलों और फलों से सुशोभित वृक्ष दिखलाई पड़ते। दर्शक मण्डली चकित, स्तम्भित चुपचाप देखती रही और आश्चर्य करती रही।

 

"फ्रांस और इटली में भी इस विषय को लेकर दो बार प्रदर्शन किए गए हैं एक बार मैडम लॉग ने जब एक राग छेड़ा तो कुमारी मैरी की आकर्षक आकृति शिशु जिज्स क्राईस्ट को गोद में लिए दिखाई पड़ी। एक बार एक भारतीय गायक ने भैरव राग गाया जिसके परिणाम स्वरूप भैरव-देव की भीषण आकृति प्रकट हुई उसी प्रकार एक ईटेलियन नवयुवती ने सामवेद की एक ऋचा को किसी भारतीय कलाविद से सितार पर बजाना सीखा। एक दिन वह नदी की रेत पर बैठकर उसी ऋचा का सितार पर अभ्यास करने लगी उसे यह देखकर महान आश्चर्य हुआ कि उस रेत पर एक चित्र सा बन गया है। उसने अपने कई विद्वान मित्रों को यह बात बताई उन लोगों ने उस स्वयं निर्मित चित्र का फोटो लिया। उसके आश्यर्च का तब तक ठिकाना न रहा जब तक वह चित्र जगत जननी "वीणा पुस्तकधारिणी सरस्वती का निकला जब-जब वह युवती तन्मय होकर उस राग को बजाती, तब-तब रेत पर वही चित्र बन जाता। इससे हम ये अनुमान करते हैं कि रागों और आकृतियों में कोई वैज्ञानिक व प्राकृतिक सम्बन्ध अवश्य है और यह सम्बन्ध हमारे सौरमण्डल में विचरण कर रहे ग्रहों के साथ विद्वजन मानते हैं। उनका कथन है कि सप्तक के सात स्वर अपनी नाद तरंगों से सप्त ग्रहों को प्रभावित करते हैं। जैसे षड्ज सूर्य को, ऋषी चन्द्रमा को, गान्धार मंगल को, मध्यम बुध को, पंचम गुरू को, धैवत शुक्र को और निषाद शनि को। इस प्रकार प्रत्येक राग जब नियमित एवं शुद्ध ढंग से गाया जाता है तो उसके वादी तथा संवादी स्वर अपनी तरंगों के माध्यम द्वारा ग्रहों-उपग्रहों से सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं जिससे राग अपना प्रभाव उत्पन्न करने में सफल होता है।" स्वरों के माध्यम से जिस चिकित्सा पद्धति का उल्लेख भारतीय संस्कृति में हजारों वर्ष पूर्व किया गया था उस चिकित्सा पद्धति को आज के वैज्ञानिक

 

"टयूनोपैथी" कहते है। आधुनिक विज्ञान मेघ कणों के निर्माण की विधि का जो सिद्धान्त बताता है वह हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पहले ही जान लिया था। उसी आधार पर वातावरण में पर्याप्त नमी के होते यदि वर्षा न हो रही हो तो मेघ राग की स्वरावलियों के माध्यम से वायुमण्डल में उपस्थित मेघ कणों के परस्पर जुड़ाव की प्रक्रिया को तेज कर वृष्टि करते हैं।

 

आधुनिक भारत के वैज्ञानिक वी. रमण का यहां तक कहना है कि प्रत्येक तरल पदार्थ कोई-न-कोई राग निरन्तर गा रहे हैं लेकिन उसकी तारता इतनी अधिक है कि जन साधारण की कणेन्द्रियां उसे ग्रहण नही कर सकती यदि ऐसा कोई यन्त्र बना लिया जाए जो इस तारता को ग्रहण कर सके और प्रकृति के इस रहस्य को विश्व कल्याण हेतु प्रयोग किया जा सके तो शोधार्थी का ऐसा मानना है कि मनुष्य की अनेक मानसिक शारीरिक समस्याऐं दूर हो जाऐंगी और समस्त विश्व उस निराकार शक्ति के दर्शन कर मुक्ति को प्राप्त हो जाएगा।

 

"महान दार्शनिक ए. केन्युल महोदय ने कहा है किः सर्वप्रथम हम लोगों को स्वप्न लेने चाहिए। तत्पश्चात् सम्भवतः हम सत्य को पा सकेंगे। इन्ही विचारों का समर्थन हमारे राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी किया है।

 

उपरोक्त विवरण के आधार पर निष्कर्ष रूप से हम यह कह सकते हैं कि एक ही ध्वनि का अलग-अलग प्रभाव होता है। समस्त ब्रह्माण्ड और उसके सभी पदार्थ निरन्तर कोई-न-कोई ध्वनि निकालते रहते हैं। वह ध्वनि लाभदायक भी हो सकती है व अनिष्टकारी भी हो सकती है उसको ध्यान के माध्यम से भी सुना जा सकता है। ध्वनि के विभिन्न प्रयोगों से वातावरण में अपेक्षित परिणाम प्राप्त किए जा सकते है और साथ ही अनेकों रोगजनित कष्टों से निवृति पाई जा सकती है। प्रत्येक स्वरावली कोई-न-कोई चित्र अश्व बनाती है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार रंगों के माध्यम से चित्रकार चित्र बनाता है और संगीत स्वरों के माध्यम से चित्र बनाता है। इससे सिद्ध होता है कि रागों के समयानुसार अपने अनेक रूप होते हैं।

 

प्रत्येक व्यक्ति को संगीत से आनन्द की अनुभूति होती है चाहे वह संगीत विद्या से अनभिज्ञ हो। एक साधारण श्रोता पर भी संगीत का प्रभाव अवश्य संगीत तथा पड़ता है तथा विभिन्न रागों से उसमें उत्साह का संचार सम्भव है। उसकी थकान दूर हो सकती है और इतना ही नही एक प्रफुल्लित मन को कुछ राग उदासी के कोहरे से ढक भी सकते हैं। यह तो हुई एक स्वस्थ मन की बात, अब हम अस्वस्थ हृदय को लेते हैं देखा गया है कि एक रोगी को एक रोग से अधिक उससे सम्बन्धित चिन्ता अधिक परेशान करती है और उसकी बढ़ती हुई मात्रा रोग को कठिन व असाध्य भी बना बैठती है।

 

रोगी के मन में विभिन्न शंकाओं का होना स्वाभाविक भी है। जिन्हें निराशा से भयावह रूप तक अगर न पहुंचने दिया जाए तो रोग का दूर होना सरल भी बन सकता है। इसके अतिरिक्त कुछ रोगों का तो सीधा सम्बन्ध भावनाओं से रहता है जैसे:-रक्तचाप, हृदय की धड़कन एवं विभिन्न प्रकार के मानसिक रोग आदि। अब हमें इस बात को देखना है कि संगीत के द्वारा रोगोपचार की विधि क्या होनी चाहिए। उसका प्रभाव क्यों कर पड़ता है।

 

मनुष्य जब आनन्दित होता है तो उसके मन में संशय का सारा द्वन्द्व मिट जाया करता है और तब सहज ही जो समाधान प्राप्त होता है उससे उसकेरोग का निदान हो जाता है। मानसिक सुख और संतोष बहुत प्रभावकारी होता है।

 

विभिन्न स्वर लहरियां तथा विभिन्न प्रकार की लय किसी भी श्रोता केन को एकाग्र करते हुए उसमें विशेष भावना का संचार करती है। "भिन्न-भिन्न स्वर और लय और उनका मिश्रण अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इस कारण रोगी के हृदय को उत्साह प्राप्त होता है। इस प्रयोग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि वायरोग, विषम ज्वर में संगीत के द्रुत लय व तीव्र स्वरों का प्रयोग उचित नहीं रहता। इन रोगियों के मन-मस्तिष्क में इसको सहन करने की क्षमता नही होती। इस बात का समर्थन आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ भी करते मनोविज्ञान की दृष्टि से आयु के विभिन्न चरणों पर दृष्टिपात करने से निष्कर्ष रूप से देखा गया है कि 8 से 18 आयु वर्ग में वीर रस सम्बन्धित प्रभाव प्रबलता रहती है और 18 से 40 वर्षों के बीच की अवस्था में सामान्यतः श्रृंगार रस से सम्बन्धित प्रभाव देखा गया है और 40 से अधिक आयु की वृत्ति अध्यात्म की ओर अधिक होने के कारण इसके स्वभाव में गम्भीरता रहती है इसलिए इस अवस्था के रोगियों को भूप, कल्याण, शंकरा एवं पट्टदीप राग अधिक लाभ पहुंचाते हैं। 18 से 40 आयु के रोगियों को बसंत, बहार, बिहाग, काफी, भैरवी इत्यादि श्रृंगार रस के रागों से अधिक लाभ होता है। 8 से 18 वर्ष तक की आयु वालों के लिए शंकरा, पट्टदीप अथवा हिंडोल आदि राग अधिक उपयोगी रहते हैं।

 

इस प्रकार के प्रयोग कर निष्कर्ष रूप में श्री मधुकर बा. आलेतकर जी ने किए हैं व इससे सम्बन्धित लेख संगीत पत्रिका अप्रैल 1968 में देखने को मिलता है। रोग चार प्रकार के होते हैं:-

 

1."स्वाभाविक" रोग जैसे-भूख, प्यास, बुढ़ापा, मृत्यु इत्यादि।

2. "आगन्तुक" रोग जैसे-जो रोग बाहरी कारणों से अकस्मात उत्पन्न हो जाते हैं जैसे-आघात, सांप आदि दुष्ट जीवों से प्राप्त रोग ।

3."कायिक" अर्थात् शरीर की धातुओं के दूषित होने वाले रोग जो की शरीर से ही पैदा होते हैं। जैसे-ज्वर, रक्तपित्त, प्रभृत्ति ।

4. "मानस" यानि मन से सम्बन्धित होने वाले रोग जैसे-पागलपन और मूर्छना आदि।

 

ये चार प्रकार के रोग कर्म और दोष से प्राप्त होते हैं अर्थात् कोई-कोई तो पूर्व जन्म के फलस्वरूप होते हैं तो कोई-कोई आहार, विहार के अनियोग, अतियोग तथा मिथ्या रोग दोषों के कुपित कारणों से होते हैं तो कोई-कोई दोनों कारणों से भी होते हैं। इन रोगों को दूर करने के लिए अच्छे-से-अच्छे कल्याणप्रद योगों का प्रयोग करें। "कल्याणप्रद" प्रयोग में संगीत कला भी प्रभावशाली सर्वोत्तम कला है इसलिए उचित संगीत द्वारा मानसिक विकार से उत्पन्न रोग आदि शान्त हो सकते हैं।

 

गायक के गुण-गायक सुन्दर, रूपवान, स्वस्थ, विद्वान, सदाचारी, प्रभावशाली और नौ रसों का ज्ञाता होता है। गायक का कण्ठ अति मधुर, चित को प्रसन्न और आकर्षित करने वाला हो। संगीत के महान तत्वों का ज्ञाता हो जिससे की संगीत के अलंकार रागालाप आदि का अनुवाद पद के रस की प्रधानता अनुसार करके संगीत को प्रभावशाली बना सकें। ऐसा न हो कि अनावश्यक एक ही अलंकार में बारम्बार लगा रहे इसलिए गायन के पद के भावानुसार राग-रागिनियों के अलंकारों का अनुपात करने का उचित ज्ञान होना गायक या गायिका में आवश्यक है। इसके अतिरिक्त राग-रागिनियों के अलंकारों का अनुपात करने का उचित ज्ञान होना गायक या गायिका में आवश्यक है। इसके अतिरिक्त राग-रागिनियों के शुभ-उच्चारण करने का सहज धर्म भी गायक के सुमधुर कण्ठ में होना चाहिए। इस प्रकार इन गुणों से सम्पन्न गायक श्रेष्ठ माने गए हैं। इसी प्रकार बायकार और नृत्यकार भी ताल, स्वर के ज्ञाता, सुन्दर, रूपवान, स्वस्थ, सदाचारी और संगीत के महान तत्वों के ज्ञाता तथा अभ्यासी होना चाहिए।

 

उपयुक्त विशेष लक्षणों को होना गायक, वादक और नृतक में प्राकृतिक ही होता है अर्थात् ऐसे विशेषज्ञों के शरीर आदि की रचना संगीत तत्वों से युक्त स्वभाविक ही रहती है। जिसको व्यावहारिक भाषा में ईश्वर की देन कहते हैं या अनेक जन्मों के अभ्यास का फल भी कहते हैं।

 

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में किसी-न-किसी रोग का सामना करना पड़ता है। अपने सार्मथ्य के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी औषधि का प्रयोग करता है जब वह किसी विशेषज्ञ के मार्ग दर्शन में इसका प्रयोग करता है तो अतिशीघ्र लाभ होता है। रोग निवारण हेतु अनेक पद्धतियां प्रचार में हैं जिनके दुष्परिणाम भी किसी-न-किसी रूप में व्यक्ति को भोगने पड़ते हैं।

 

प्राचीन भारतीय चिंतकों ने रोग निवृत्ति हेतु अनेक पद्धतियों के साथ-साथ एक और पद्धति का विकास किया था जिसे संगीत चिकित्सा पद्धति कहते हैं। आजकल ये ट्यूनोपैथी के नाम से जानी जाती है। आधुनिक काल में अनेक भारतीय संगीतज्ञों ने संगीत चिकित्सा पद्धति पर शोध कार्य किया है और अनेकों सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए हैं। राग नीलाम्बरी से अनिद्रा को दूर करने का प्रयास सफल रहा है। हिंसक प्राणियों को शान्त करने का प्रयास भी सफल रहा है। वनस्पतियों पर गुणात्मक प्रभाव देखा गया है. लेकिन संगीत चिकित्सा पद्धति का मूल सिद्धान्त क्या है ? इस पर किसी ने प्रकाश नही डाला है क्योंकि प्रत्येक राग का एक निश्चित समय होता है और औषधि के हिसाब से विचार किया जाए तो रोगी को हर समय औषधि उपलब्ध होनी चाहिए। जबकि आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं ने यह सिद्ध किया है कि ध्वनि का प्रभाव प्रकाश तथा छाया, दिन और रात में अलग-अलग होता है। सामान्यतः हम देखते हैं कि हमारे रेडियो और ट्राजिस्टर में दिन के समय दूर के स्टेशन नही लगते। जैसे-जैसे दिन ढलता है तो दूर के स्टेशन पकड़ संगीत तथा ज्योतिष का आपसी सम्बन्ध में आने शुरू हो जाते हैं और रात के समय बहुत दूर के स्टेशन भी सुनाई पड़ते हैं। इस तरह हमें ज्ञात होता है कि दिन के समय ध्वनि की तरंगों की लम्बाई कम होती है और प्रकाश से टकराने के कारण अधिक दूरी तय नही कर पाती। रात्रि के समय वही ध्वनि तरंगे निर्बाध रूप से अधिक लम्बी यात्रा तय कर लेती है और हमारे ट्रॉजिस्टर, रेडियो पर साफ सुनाई देती है।

 

चिकित्सा की दृष्टि से यदि विचार किया जाए तो हमें अनेक प्रकार की ध्वनि तरंगों की आवश्यकता होगी। इनका प्रभाव दिन और रात्रि में सुबह और शाम की संधि बेला में अलग-अलग पड़ेगा। ध्वनि तरंगों के अलग-अलग प्रभाव ही संगीत चिकित्सा का विचार करें तो भारतीय संगीत के अनेक राग उपयोगी सिद्ध होंगे क्योंकि उन रागों का दिन और रात, सुबह और शाम से सम्बन्ध होता है। यह सम्बन्ध उसी प्रकार होता है जिस प्रकार ग्रह इस पृथ्वी पर रहने वाले चराचर जगत को दिन और रात्रि में अलग-अलग योगों से प्रभावित कर रहें हैं और करते रहेंगे।

 

ज्योतिषी भी जब किसी जातक का भविष्य बताते हैं या अनिष्ट ग्रहों की निवृत्ति हेतु कुछ उपाय बताते है तो ग्रहों की गति और उनसे निकलने वाली न्यूनाधिक रश्मियों का विचार करते हैं जबकि ग्रहों के विभिन्न नाद भी होते हैं और यह सभी ग्रह बारह राशियों के स्वामी है। संगीत का सम्बन्ध नाद से है इसलिए इन बारह राशियों के अलग-अलग स्वरों का उल्लेख करना उचित नही होगा। यथा मेष राशि का स्वर उग्र, वृष राशि का स्वर महाशब्दकारी,मिथुन का स्वर महाशब्दकारी, कर्क राशि का शब्द शून्य, सिंह राशि का स्वर महाशब्दकारी, कन्या राशि का स्वर अखण्डशब्द, तुला राशि का स्वर शब्द रहित,वृश्चिक राशि का स्वर शब्द रहित, धनु राशि का स्वर अतिघोर शब्दकारी, मकर राशि का स्वर अर्ध शब्दकारी, कुम्भ राशि का स्वर अर्धस्वर, मीन राशि का स्वर शब्दरहित होता है।"2 यह 12 राशियां जिनके नाद शब्द का उल्लेख शोधार्थी ने किया है इनका सम्बन्ध सात ग्रहों से होता है और हमारे संगीत के सात स्वरों का सम्बन्ध भी सात ग्रहों से प्राचीनकाल से ही बताया गया है। अनिष्ट ग्रहों के उपचार हेतु विभिन्न प्रकार के उपायों का उल्लेख ज्योतिष शास्त्र में मिलता है तो संगीत के सात स्वरों के माध्यम से अनिष्ट निवृति क्यों नहीं की जा सकती ? इस विषय पर शोध की अपार सम्भावनाएं हैं।

 

संगीत के सप्त स्वरों का सम्बन्ध सप्त ग्रहों से है इन सात स्वरों का सात

ग्रहों से प्रचयात्मक सम्बन्ध इस प्रकार है:- सा रे ग म प धनी, सूर्य चन्द्र

मंगल बुध गुरु शुक्र शनि ।

1 सा-सूर्य- आधुनिक थाट काफी और उसका परिवार।

2  रे-चन्द्र- आधुनिक थाट भैरवी और उसका परिवार।

3 ग-मंगल आधुनिक कल्याण और उसके अर्न्तगत उसका परिवार।

4. म-बुध - आधुनिक थाट खमाज और उसके अर्न्तगत आने वाले सभी राग।

5. प-गुरू- आधुनिक थाट आसावरी (मेरे विचार में दरबारी कान्हड़ा) और उसके अर्न्तगत आने वाले सारे राग।

6. ध-शुक्र- आधुनिक थाट कोई नही। नया थाट शुक्र और उसके अर्न्तगत आने वाले द्वी-मध्यम वाले सभी राग ।

7. नी-शनि - आधुनिक थाट बिलावल और उसके अर्न्तगत आने वाले सभी राग।

इसके अतिरिक्त अर्न्तगान्धार और काकली निषाद का सम्बन्ध शोधार्थी के विचार में राहु और केतु से होना चाहिए।

 

विभिन्न रोगों में उपचार हेतु ग्रह आधारित रागों का प्रयोग

संगीत चिकित्सा पद्धति पर अनेक विद्वानों ने शोध करते हुए सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए हैं। ग्रह आधारित संगीत के प्रयोग के माध्यम से चिकित्सा पद्धति का वर्णन करने से पूर्व हमें अब तक किए गए संगीत चिकित्सा सम्बन्धी

उपलब्धियों का उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है। "संगीत चिकित्सकों का कहना है कि कफ के कुपित होने से सम्भावित रोगों के लिए राग भैरवी, मानसिक चंचलता, पक्षाघात एवं क्रोध की स्थिति में राग मल्हार व जयजयवन्ती, उच्च रक्तचाप की स्थिति में राग आसावरी, मन मारे बैठे रहने वालों की उदासी दक्षिण पद्धति का बिलहरी राग सुनने से दूर हो जाती है। श्री राग पाचन क्रिया ठीक रहती है और दक्षिण पद्धति का राग वर्द्धनी शारीरिक वेदना को दूर करता है। प्रभात से पूर्व दक्षिणात्य राग भूपालम् तथा मायामालवगोलम् के गाने से उत्साह के साथ उठने की प्रेरणा मिलती है। दक्षिणात्य राग नाथ नाम क्रिया द्वारा कठोर हृदय वालों को भी कोमल हृदय बना सकते हैं। श्वास सम्बन्धी रोग, तपेदिक, खांसी, दमा में राग भैरवी तथा उदर सम्बन्धी रोगों के लिए पंचम राग का प्रयोग बताया गया है। पागलपन की स्थिति में राग खमाज, अनिद्रा की स्थिति में राग नीलाम्बरी का प्रयोग लाभदायक होता है। शरीर के क्रिया कलाप सामान्य सहज ढंग से कार्य करें इसके लिए राग तोड़ी का प्रयोग किया जाता है।

"नाद तथा लय विहीन सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। समस्त ब्रह्माण्ड में नाद तथा लय की उपस्थिति सिद्ध करती है कि ब्रह्माण्ड की रचना इन दोनों पर आधारित है। सृष्टि नाद से ही उत्पन्न हुई है और नाद में विलीन हो जाएगी। यह दोनों क्रियाएं लय के अधीन हैं।

हमारे सौरमण्डल का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है और हमारे सौरमण्डल के समस्त ग्रह सूर्य के चारों ओर विभिन्न दूरीयों पर विभिन्न गतियों धारण कर परिक्रमा कर रहे हैं। और यह क्रिया उसी प्रकार की है जिस प्रकार किसी भी राग के स्वर उसके अंश स्वर के अधीन अलग-अलग स्वरूप बनाकर जड़ तथा चेतन को प्रभावित करते हैं। अलग-अलग स्वरावलियों के माध्यम से अलग-अलग रसों की उत्पत्ति होती है। इन रसों के प्रभावों को ध्यान में रखकर प्राचीन संगीत मनीषियों ने इनका सम्बन्ध ग्रहों से किया है।

रोग निवृति हेतु ग्रह आधारित मूर्छनाओं का प्रयोग करते समय अलग-अलग तालों का प्रयोग करना चाहिए और साथ ही ग्रह प्राचीन शास्त्र में बताए गए हैं। उसी तरह आधुनिक विचारकों ने बारह राशियों के वाद्य बताए हैं। इन बारह प्रकार के वाद्यों की ध्वनि प्रत्येक राशि के जातक को अनिष्ट से बचाने की क्षमता रखती है ऐसा उनका विचार है। सन्तोष नारायण व्यास ने संगीत पत्रिका के माध्यम से जिन बारह राशि वाले वाद्यों का उल्लेख किया है वह इस प्रकार है:-

मेष राशि का वाद्य: इसराज अथवा सारंगी

वृष राशि का वाद्य: डमरू

मिथुन राशि का वाद्य  मंजीरा

कर्क राशि का वाद्य :  बांसुरी

सिंह राशि का वाद्य : जलतरंग

कन्या राशि का वाद्य: घुँघरू

तुला राशि का वाद्य: करताल

वृश्चिक राशि का वाद्य :पुंगी अथवा सपेरा बीन

धनु राशि का वाद्य: एकतारा

मकर राशि का वाद्य: वीणा

कुम्भ राशि का वाद्य: तुम्बा

मीन राशि का वाद्य: चिमटा

रोग निवृति हेतु किन स्वरावलियों का किन तालों के अधीन प्रयोग होगा।

इस विधि का उल्लेख शोधार्थी तालिका के माध्यम से करेगा।

1 सा

सन्तुलित आत्मविश्वास के लिए सा रे सम्बन्धित मूर्छना जो राग काफी के समान है प्रयोग करना चाहिए। यह प्रयोग ताल कहरवा के अधीन होना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य आत्मा का कारक बताया गया है। इसलिए आत्म-विश्वास के संतुलन हेतु राग काफी तथा उसका परिवार और ताल कहरवा तथा उसके प्रकारों का प्रयोग किया जा सकता है।

2 रे

चन्द्रमा मन का कारक है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा का सम्बन्ध मन से बताया गया है। मन अर्थात् भावना। जिस प्रकार प्रत्येक मनुष्य की भावनाऐं घटती बढ़ती रहती है उसी प्रकार चन्द्रमा की कलाएं घटती बढ़ती रहती है। भावनाओं की नकारात्मक स्थिति से बचने के लिए रे से प्रारम्भ होने वाली मूर्छना जो राग भैरवी के सदृश्य है। उसे ताल दादरा के अधीन प्रयोग करना चाहिए। प्राचीन मनीषियों ने ऋषभ का सम्बन्ध चन्द्रमा से बताया है।

3

सप्तक का तीसरा स्वर ग है जब कोई जातक साहस विहीन जाए तो ऐसी स्थिति में ग से प्रारम्भ होने वाली मूर्छना का प्रयोग ताल रूपक के अधीन करना चाहिए। ग का सम्बन्ध मंगल ग्रह से होता है और इससे उत्पन्न मूर्छना कल्याण के सदृश्य होती है।

4

बौद्धिक सन्तुलन के लिए ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह से सम्बन्धित उपचार विधि है। स्वर सप्तक का मध्यम स्वर बुध ग्रह से सम्बन्धित है। इससे उत्पन्न मूछना खमाज के समान है अतः खमाज राग को प्रयोग करते समय झपताल का प्रयोग करना चाहिए। जिससे जातक का बौद्धिक विकास सन्तुलित हो जाए।

5

संगीत शास्त्र में प का सम्बन्ध बृहस्पति से बताया गया है। बृहस्पति व्यक्ति विशेष में गुण पैदा करता है। अतः किसी जातक के गुणात्मक विकास हेतु राग दरबारी का प्रयोग चार ताल के अधीन करना चाहिए क्योंकि पंचम स्वर से आरम्भ होने वाली मूर्छना राग दरबारी अथवा आसावरी के समान होती है। ऐसा व्यक्ति विवेकशील हो जाएगा।

6

धैवत का स्वर शुक्र से सम्बन्धित बताया गया है। ध से उत्पन्न मूर्छना पंचम विहिन द्विमध्यमा वाली भैरवी के सदृश्य है। पंचम स्वर बृहस्पति से सम्बन्धित

है और बृहस्पति गुण तथा विवेक का स्वामी होता है। पंचम विहिन राग का प्रयोग करने से व्यक्ति विशेष पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है इसलिए धैवत से सम्बन्धित मूर्छना को महत्व नहीं दिया गया। क्योंकि शुक्र ग्रह विलासिता का स्वामी है अत्यधिक विलासिता किसी भी जातक को पतन के पथ पर ले जा सकती है। इस मूर्छना का प्रयोग या तो पंचम युक्त करना चाहिए। अथवा तीव्र मध्यम के प्रधान्य से करना चाहिए। शुक्र ग्रह से सम्बन्धित ताल दीपचन्दी है। जो 14 मात्राओं का ताल है।

7 नी

निषाद स्वर का सम्बन्ध शनि ग्रह से होता है। इससे उत्पन्न मूर्छना राग  बिलावल के सदृश्य होती है। इसका प्रयोग विलम्बित तीन ताल के अधीन करना चाहिए। यदि किसी जातक को वायु विकार सम्बन्धी रोग हो तो इसका प्रयोग लाभदायक रहेगा। यदि जातक में न्यायप्रियता की कमी हो तो भी यह राग उसके न्यायप्रियता के गुण को सन्तुलित करेगा।

 

 

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