12 गृह के 12 भाव फल और उपाय
सूर्य द्वादश भाव फल उपाय
1) सूर्य लग्न में हो उच्च, स्वग्रही हो तो वह मनुष्य आशावादी,लोकप्रिय और देशाटन, करने वाला होता है। गेहुआ रंग, पित्त रोगी,कभी-कभी सिरदर्द रहता है। यदि सूर्य नीच हो शत्रु क्षेत्रीय हो तो नेत्रकष्ट होता है घर से दुःखी इसी के साथ यदि सूर्य, गुरू, चन्द्र, बुध सेदृषट हो तो अशुभ योग में कमी आती है।
उपाय- रविवार का व्रत रखना तथा सांड को गुड़़ देना।
2) सूर्य द्वितीय स्थान में हो तो वह कुछ विवाद करने वालाअपने पराक्रम से धन कमाने वाला इसी के साथ पाप ग्रह (मं.,शु.)साथ हो तो कुटुम्ब का विरोधी होता है। धन का नाश होता है।आन्तरिक ईष्या रखने वाला होता है। लेकिन इसके साथ कोई उच्चका, स्वग्रही, सोम्य ग्रह बैठा हो तो वह ईष्या नहीं रखता और भलाईकरने वाला होता है। उसके गले में टॉनसिल होते है और दूसरे घर में तीनपाप ग्रह बैठे हो तो स्त्री बीमार या सगाई टूटना अथवा पत्नी की मृत्युपति से पहले होती है।
उपाय - सूर्यास्त के समय जल का अर्ध देवे, एक माला गायत्रीकी सूर्य के सामने खड़े होकर फेरे।(रविवार के दिन)
3) तृतीय स्थान में सूर्य होने से जातक पराक्रमी, हठी (ज़िद्दी)राज्य कर्मचारी होता है। यदि पाप ग्रहों से दृष्ट हो मंगल साथ बैठे तोछोटे भाई से विचार नहीं मिलते या छोटे भाई की मृत्यु होती है या होताही नहीं है। स्वभाव झगड़ालु होता है। कंधे में चोट आती है या दर्द रहताहै।
उपाय -रविवार को सूर्य भगवान को अर्ध देवे तथा आदित्य हृदयस्त्रोत का पाठ करें।
4) जिसके सूर्य चतुर्थ स्थान में उच्च का हो तथा गुरु शुक्र सेदृष्ट हो तो वह प्रसिद्धी प्राप्त करता है। अकेला सूर्य हो तो माता के शरीरमें पीड़ा या पिता के स्थान को हानि तथा क्लेश करने वाला होता है।यदि नीच का हो तो सुख की कमी होती है और शनि से दृष्ट हो तोवाहन से पीड़ा (चोट) होती है। यदि शनि दशम् स्थान में हो तोमाता-पिता से विचारों में भिन्नता तथा माता-पिता को मानसिक सुखप्राप्त नहीं होता।
उपाय - सवेरे सूर्य भगवान को अर्घ देवें। रविवार को बड़े प्यालेमें जल भरकर उसमें सूर्यमुखी पुष्प पूर्व दिशा में रखें।
5) पंचम् स्थान में सूर्य हो तो कुछ क्रोधी, नीती तथा मंत्र शस्त्रका ज्ञाता होता है। परोपकारी तथा प्रथम पुत्र से कष्ट पाने वाला होताहै। यदि नीच का सूर्य हो और बुध, शुक्र साथ हो तो अध्यापक होता है,नीच का सूर्व यदि शनि से दृष्ट हो मंगल साथ हो (दृष्ट) तो संतानसुख में कमी आती है।
उपाय - सात रविवार सवा किलो गेहं, एक गुड़ की डली सफेदकपड़़े में बाँधकर दान करें।
6) षष्टम् स्थान में सूर्य हो तो शत्रु का नाश होता है। जातकनिर्भीक होता है। उच्च का हो स्वग्रही का हो, शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, योगसाधना तथा तंत्र मंत्र में प्रवीण हो सकता है। हर व्यक्ति उसकी बातमानते हैं तथा ननिहाल पक्ष को फायदा होता हैं।
यदि सूर्य नीच का हो राहु केतु के साथ हो अथवा शनि दृष्ट हो तबजन्म से ननिहाल में हानि होती है। यात्रा में वस्तु गुम होती है।
उपाय -1. जातक घर से बाहर निकले तो 7 दाने गेहूं लेकर पूर्वदिशा में फेंककर आगे बढ़े। 2. रविवार के दिन नित्य 11 सूर्य के नामका उच्चारण करें, फिर कार्य आरम्भ करें।
7) सप्तम् स्थान में सूर्य हो तो स्त्री को रोग होता है।आन्तरिक डर वाला होता है। यदि मंगल राहु शामिल हो स्त्री से बेमनस्यता रखताहै। स्त्री की मृत्यु पहले होती है, विवाह में अड़चन रहती है। कभी-कभीदो विवाह भी होते है।
उपाय - श्वेत कपड़े में कपास (रुई) और 7 बादाम सूर्य मन्दिर मेंसूर्य भगवान को अर्पण करें। (सूर्य मंदिर में गेहूं दान करे )
8) सूर्य अष्टम में हो उच्च, स्वग्रही, हो मित्र क्षेत्रीय तब जातकपरदेश (विदेश) गमन करने वाला होता है। यदि नीच का हो तो वहजातक चालाक होता है उसे गुदा में तकलीफ होती है। उसके मित्र अच्छेविचारों वाले नहीं होते, घर पर मन कम लगता है, पचासवाँ वर्ष खराबजाता है, अन्य स्त्री के साथ सम्पर्क रहता है।
उपाय - रविवार के दिन खाने में चने की दाल का सेवन करें।रविवार के दिन नींबू सूर्य भगवान को अपर्ण कर सेवन करें। गेहूं कादान करें।
9) सूर्य नवम् स्थान उच्च का हो स्वग्रही हो या मित्र क्षेत्रीय होतो जातक कीर्तिमान, धार्मिक, निर्भीक होता है। कई संस्थानों द्वारासम्मानित किया जाता है, भाई-बहनों की चिन्ता करता है। विदेश जानेकी पूरी इच्छा रहती है।
यदि नीच का हो तो भाग्य में रुकावट पैदा करता है। पिता कोतकलीफ देता है। नास्तिक होता है। माता-पिता की आज्ञा का पालननहीं करता है।
उपाय - सूर्य भगवान की मूर्ति या सूर्य मन्दिर में रविवार कोसूर्वमुखी का पुष्य अर्पण करें। सूर्य मंदिर में चन्दन का दुकड़ा चढ़ावें।
10) सूर्य दशम् स्थान में उच्च का हो स्वग्रही हो गुरु से दृष्ट होऔर बुध साथ हो उसका कार्य राज्य में कभी भी रूकता नहीं है। बड़े आदमी से मुलाकात होती है, स्वयं बड़़ा अधिकारी भी हो सकता है,सुख होता है, लोग प्रशंसा करते है। यदि नीच का हो पाप ग्रह (शनि,राहु) के साथ हो तो माता-पिता से विचारों में अन्तर, मित्रता में भीधोखा देने वाला, सेना में नौकरी का इच्छुक रहता है। यदि मित्र क्षेत्रीयहो तो अच्छा प्रसिद्ध डॉक्टर भी होते है।
उपाय-रविवार को लाल कनेर पुष्य सूर्य भगवान को अपर्ण करें।11) सूर्य यदि एकादश स्थान में हो (उच्च, मित्र क्षेत्रीय, शुभग्रहों के साथ अथवा दृष्ट) जातक भाग्यवान, वाहनयुक्त, उच्चअधिकारी होता है, कभी-कभी राज्य सत्ता में पद एवं मजिस्ट्रेट भी होतेहै। शत्रु नाश होते है। सूर्य अशुभ हो तो संतान से दुःखी, बड़े भाई कष्टमें रहता है। परस्पर झगड़े भी रहते है। शूद्र जाति स्त्री से बदनामी होतीहै।
उपाय - रविवार के दिन 200 ग्राम गेहू 5 नीम्बू जमीन में गाड़ देवें यादान देवे।
12) यदि द्वादश में सूर्य हो तो वे सरकारी नौकरी करने वाला,यात्रा करने वाला होता है। आँखों में रोग होता है, हाथ से वस्तु गुमहोती है, व्यापार में हानि होती है, मेहनत का फल प्राप्त नहीं होता है,आन्तरिक ताकत होते हुये भी सफलता पाने में देरी होती है, नींद मेंकमी रहती है, धन खर्च ज्यादा होता है, घर से दूर रहना चाहता है।उपाय - रविवार को बिना नमक का व्रत करें। सूर्य भगवान पररक्त कमल चढ़ावे। रविवार के दिन ॐ घृणिः नमः की पाँच माला सूर्यदेव के सामने करें।
चन्द्रमा
1) चन्द्रमा लगन में हो उच्च का हो स्वग्रही हो, गुरू से दुष्ट होअथवा अकेला हो तो नाक नक्श अच्छा होता है, नेत्र सुन्दर होते है,शरीर में रक्त की प्रधानता होती है। जातक भ्रमणशील एवं कम भोजनकरने वाला होता है। यदि चन्द्र नीच का हो शनि या रहु के साथ हो तबजातक समय से पहले कम सुनना शुरु हो जाता है, कभी-कभी बोलनेमें हकलाता है, मानसिक अस्थिरता रहती है। यदि पूर्णिमा का जन्य हो।और उच्च का चन्द्र हो तो लक्ष्मीवान, चतुर, प्रतिष्ठावान होता है, यदिकृष्ण पक्ष जन्म हो (अमावस्या) तो लक्षण विपरित होते है,कभी-कभी अंगहीन या गूंगा भी पैदा होता है। ग्रहण दोष से भी ऐसा होसकता है।
उपाय-जातक के जन्म से ही 11 दिन तक ब्राह्मण द्वारा शिव परदही का अभिषेक करावें तथा महामृत्युंजय जप कराने से भी दोष दूरहोते है।
2) चन्द्र द्वितीय स्थान में उच्च का हो स्वग्रही हो जातक कागला बहुत सुन्दर होता है, गुरु से दूष्ट हो तो तीब्र बुद्धि वाला, लक्ष्मीप्राप्त करता है, शास्त्र प्रेमी होता है, परन्तु पैतृक सम्पत्ति में विवाद रहताहै।क्षीण चन्द्र क्रूर ग्रह दृष्टि (सूर्य, राहु, शनि) से दृष्ट हो वह साफ नहींबोलता, राहु से दुष्ट हो तो (दौरे पड़ना) अर्थात् बालक को गिरने सेबचाना चाहिये और स्त्री के चन्द्र कमजोर हो तो खून की कमी केकारणमासिकधर्ममेंतकलीफ रहतीहै
कभी-कभी चन्द्र प्रबल होने पर फौज में अफसर भी बनता है।
उपाय -250 ग्राम दही में 10 ग्राम शक्कर, 5 ईलायची, कुछकेसर की पत्ती, 10 रू. रोकड़ कुलड़ सहित 7 (सात) सोमवार शिव केबाण पर अर्पण करें।
3) तृत्तीय स्थान में चन्द्र उच्च का हो, स्वग्रही हो, मित्र क्षेत्रीयहो, जातक सफेद कपड़े पहनने वाला, परिश्रमी एवं नौकरी करने वालादेखा गया है। ज्यादा बोलने वाला, धन प्राप्त करने वाला एवं बहनेंअधिक होती है। यदि चन्द्र क्षीण हो तीसरे का पति दूसरे स्थान में, औरदूसरे का पति तीसरे स्थान पर हो अर्थात् तीसरे का पति चन्द्र हो तो 24(चौबीस) वर्ष तक राज्य दंड से धन की हानि होती है। नीच का होनेपर घमण्डी, जीव हिंसा करने वाला तथा उत्तम सुख नहीं मिलता है, घरमें कलह रहती है।
उपाय- शुक्ल पक्ष द्वितीया (बीज) का ब्रत कर दूध की खीर काउगते चाँद को भोग लगाकर उसका सेवन करें।
चाँदी के बर्तन में भोजन करें।
4) जिस मनुष्य के जन्म लग्न से चतुर्थ स्थान में चन्द्र स्वग्रही होउच्च का हो उसे माता का पूर्ण सुख मिलता है, कफ प्रकृति तथा बचपनमें शारीरिक सुख में कमी रहती है। चौदह वर्ष छः मास के बाद सुखप्राप्त करता है, वह जातक स्त्रियों के पास ज्यादा बैठता है। यदि चन्द्रक्षीण हो नीच अथवा राहु व केतु के साथ हो पाप ग्रहों की दृष्टि हो तोउसकी माता बीमार रहती है। माता से विचारों में अन्तर रहता है। माताके सुख में कमी रहती है, वह व्यक्ति चुगलखोर होता है तथा वाहनसुख कम रहता है। यदि उच्च का हो तो माता से भाग्य उदय होता है।चौपाया जानवर से तथा खेती में लाभ होता है।
उपाय - मोती सहित चाँदी का चन्द्रमा गले में पहने। चौदह वर्षबाद सम चौरस चाँदी की अंगूठी पर चाँदी का चन्द्रमा तथा मोतीअनामिका अंगुली में धारण करें।
अ) जिस जातक के पंचम् स्थान में चन्द्र उच्च, स्वग्रही हो गुरु सेदृष्ट हो अथवा गुरु साथ हो तब जातक को संतान सुख रहता है, विद्या तथा उच्च ज्ञानी होता है, उसका व्यवहार बहुत उत्तम रहता है, बातचीतमें होशियार होता है, कभी-कभी ऐसे जातक ब्याज बट्टे का कार्य भीकरता है। तंत्र-मंत्र का शौकीन होता है, पंचम् स्थान मनुष्य के ईष्ट देवका होता है, चन्द्र के कारण स्त्री जातक दुर्गा का भक्त होता है। वह दसमाह विद्या का जानकार होता है, पंचम् स्थान में द्विस्वभाव राशि हो तोकभी-कभी जुड़़वा बच्चे भी होते है।
यदि चन्द्र दूषित (नीच) हो तो उसके मन में निराशा रहती है।विद्या में असफलता रहती है, बोलने में चतुर होता है, मगर झूठ बोलकरलोगों को ठगता है, नीच होने से पेट में पीड़ा रहती है।
उपाय -सोमवार का व्रत रखें। चन्द्र ग्रहण के दिन शंख ले उसकोपंचामृत से स्नान करा कर स्वास्तिक बनावें तथा उसमें चावल भरकरकृष्ण मन्दिर में चढ़ावें।
6) चन्द्रमा षष्टम् स्थान में उच्च या स्वग्रही हो तो जातक शत्रुपर विजय पाने वाला, कम भोजन करने वाला परन्तु अस्थिरता रहतीहै। यदि चन्द्र क्षीण हो या पाप ग्रह से युक्त हो तब ननिहाल में मामा कोपीड़़ा और मौसी को संतान से चिन्ता रहती है, जातक के पैरों में पीड़़ारहती है और बार-बार क्रोध आता है, कई देवज्ञों ने लिखा है कि मूत्रसम्बन्धी बीमारी और पाचन क्रिया बहुत कमजोर होती है। चन्द्र शनिया राहु युक्त हो तो रात में ऐसा महसूस होता है कि सांस रुक रही है(घबराहट) और यदि चन्द्रमा की दशा आ जाये तो मृत्यु तुल्य कष्टहोता है।
उपाय -जातक स्फटिक की माला पहने। श्रावण मास में शिवमन्दिर में अखण्ड ज्योत के लिए घी का दान करना चाहिये।
7) सप्तम् स्थान में चन्द्र उच्च या स्वग्रही तो स्त्री सुन्दर होती है,
वायु-पित की प्रकृति होती है, शुक्र-पक्ष में काम वासना अत्यधिक होती है। जातक स्त्री हो या पुरुष, चन्द्र के कारण विदेश में व्यापारकरने वाला भी होता है। चन्द्र यदि क्षीण या पाप ग्रह से ग्रस्त हो तोपत्नी के सुख में कमी आती है, घमण्डी होता है, छोटी-छोटी बात परपत्नी से झगड़ा करता है, स्त्री बीमार रहती है, 24 से 28 वर्ष के बीचविधवा स्त्री से सम्पर्क होता है और विवाह भी 24 से 26 के बीच होताहै, जातक के नौकरी, व्यवसाय में कई परिवर्तन होते हैं।
उपाय -तीन मुठी चावल सोते समय कपड़े में बांधकर सिरहानेरखें। अगले दिन उसे उबाल एवं घी, शक्कर डालकर गाय को खिलायेया केवल उबाल कर मछलियों को देवें।
8) अष्टम् स्थान में चन्द्र होने पर घर से दूर रहने वाला, रोग उसेघेरे रहते है, प्रमेय रोगी होता है। यदि शनि युक्त हो चोरी में फसता है।राजदण्ड भी मिलने का योग होता है। जन्म से आठ मास कमजोर वआठवां वर्ष भी नेष्ट जाता है। चन्द्र राहु साथ हो शनि से दृष्ट हो अथवाकोई सौम्य ग्रह न देखता हो तब आठवां मास तक मृत्यु भी हो सकतीहै। बालक को आठ वर्ष या पन्द्रह वर्ष तक तैरने न जावे, तब तक पानीके पास न भेजे। उम्र 44 व 45 वर्ष में धन हानि होती है।
उपाय-जन्म के बाद शिव पर तेल का अभिषेक करावें (सरसोंया तिल्ली) आठवें वर्ष में शक्कर व घी का दान करावें।
9) नवम् स्थान में चन्द्र उच्च का, मित्र क्षेत्रीय, स्वग्रही हो तोवह जातक धार्मिक होता है, भाग्य उदय 24 से 26 वर्ष के बीच होता है।तीर्थ यात्रा करता है, पितरों को मानने वाला तथा पूर्वजों का श्राद्धश्रद्धा से करता है। चन्द्र क्षीण हो तो संतान बहुत देरी से होती है, हरकार्य में अड़चन आती है, माता को बीमारी व माता की मृत्यु समय सेपहले होती है।
उपाय - वह मनुष्य श्वेत चंदन का टीका लगाकर घर से निकले, पूर्णिमा के दिन रात्रि को घी के अन्दर कड़कड़ शक्कर (देसी, पीली)
डालकर छत पर रखें फिर उसको सप्ताह भर सेवन करें या सोमवार कोदही का सेवन करें।
10) दशम् भाव चन्द्र उच्च का, स्वग्रही या गुरु के साथ हो तो वहराज्य में यश प्राप्ति होती है, प्रथम पुत्र से चिन्ता या मृत्यु को भी प्राप्त होजाता है। यदि मृत्यु न हो तो पिता पुत्र में वैमनस्य रहता है। जातक काससुर से धन प्राप्ति का योग बनता है। यदि चन्द्र नीच का हो हर कार्य मेंरूकावटें होती है। 28वां वर्ष खराब जाता है।
उपाय -शिव भगवान पर चाँदी का छत्र चढ़ावें। यज्ञ के अन्दरचावल का दान करें।
11) एकादश स्थान में चन्द्र होने पर सरकारी नौकरी करने वालाया व्यापार से धन कमाने वाला, यशस्वी होता है। चाँदी का व्यापारकरने वाले को लाभ होता है, यदि जौहरी हो तो उसे भूमिगत निकलनेवाले नगीनों में अवश्य लाभ होता है। कई संस्थानों से जुड़ा होता है।ऐसा व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पितरों को पानी पीलाता है। तो वह पितृऋण(श्राद्ध पक्ष) से मुक्त हो जाता है। नीच या क्षीण चन्द्र हो उसकी संगतअच्छी नहीं होती, प्रतिष्ठा में कमी आती है। अपयश प्राप्त होता है। रोगघेरे रहते है। बड़े भाई को तकलीफ होती है। यदि एकादश भाव में चन्द्रक्षीण हो तो निम्न उपाय करें।
उपाय-श्रावण मास में गन्ने के रस से शिवजी का अभिषेक करें।
दिपावली के दिन लक्ष्मी सूक्त का 21 बार पाठ करें एवं आहुति देवें।
12) द्वादश भाव में चन्द्र हो तो खाना खाने में विशेष रूचि होतीहै।नैत्र रोग से पीड़ित रहता है, यदि शुक्र साथ हो तो निश्चय ही एक नेत्रमें अतिविशेष कमजोरी या देखना भी बन्द होता है। 45 वर्ष तीन माहमें पानी के करीब न जावें, नींद में कमी आती है। यदि शनि साथ हो तोप्रेम सम्बन्ध में काटे पड़ जाते है।
उपाय - चन्द्र ग्रहण के दिन नाभि प्रयन्त जल में खाड़े रहकर चन्द्रमंत्र का जप करें।
मंत्र - ॐश्राँ श्रीँ सः चन्द्रमसे नमः।
अथवा - ॐसों सोमाय नमः
हर सोमवार को शिवलिंग पर जल चढ़ावें।
या सोमवार को श्वेत पुष्प की माला चढ़ावें।
मंगल
1) मंगल लग्न में उच्च स्वग्रही या मित्र क्षेत्रीय हो तो मुँह अथवा
शरीर में वृण होता है। स्वभाव में क्रोध होता है, जातक तेजस्वी होता है,एक ही स्थान पर मन नहीं लगता। जब मंगल की दशा आती है तब चोटलगती है। शनि साथ हो तो रक्त विकार (B.P.) होता है। यदि मंगलनीच का हो तो परिश्रम से धन कमाने वाला, मगर उसकी संगत अच्छेआदमी से नहीं होती है। मगर उनसे पूर्ण लाभ होता है। उसके मन मेंकभी-कभी चोरी का भाव आता है। (जरूरी नहीं)
उपाय-नित्य हनुमान चालीसा का पाठ करें। मंगलवार के दिनहनुमानजी के लाल कनेर के पुष्य चढ़ावें।
2) द्वितीय भाव में मंगल उच्च, स्वग्रही अथवा मित्र क्षेत्रीय होतो जातक घर पर खर्च करने वाला, हरेक की मदद करता है, अपनीयुक्तियों से धन कमाने वाला होता है। यदि शनि साथ हो कुटुम्ब सेझगड़ा करने वाला, गले में पीड़ा होती है। यदि मंगल नीच का हो तो घरखर्च करने पर भी यश प्राप्त नहीं होता। कुट वचन बोलने वाला, सरपर फोड़े होते है, द्वितीय स्थान में मंगल, सूर्य और शनि हो अथवा शनि से दृष्ट हो तब द्विभार्या (स्त्री) योग भी बनता है, स्त्री की मृत्यु पहलेहोती है, कुटुम्ब वाले साथ नहीं देते, गर्दन में पीड़़ा होती है, घर के बाहरप्रतिष्ठा अच्छी रहती है।
उपाय -सफेद मूँगा धारण करें। मंगलवार के दिन हनुमानजी केबाएं पैर पर गुलाब का पुष्प चढ़ावें एवं मंगलवार का व्रत करें।
3) मंगल तृत्तीय स्थान में उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तोपरिश्रम करने वाला, ननिहाल से लाभ प्राप्त करने वाला छोटा भाईनहीं होता। यदि हो तो मृत्यु हो जाती है अथवा विचार नहीं मिलते।मंगल नीच का हो शत्रु क्षेत्रीय हो तो भाई-बहनों से अनबन रहती है।लापरवाही से कभी-कभी कार्य नहीं होता। शनि साथ हो अथवाचन्द्रमा साथ हो तो जातक आत्महत्या का विचार मन में आता है। कन्धेमें तकलीफ होती है।
उपाय -मंगलवार के दिन गुड़ की डली घी में भरकर हनुमानजीके मुख में देवें। मंगलवार के दिन पाँच सेव दान करें।
4) मंगल चतुर्थ भाव में उच्च का, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तोउसे भूमि से निश्चित लाभ होता है, व्यापार भी कर सकता है। रक्तविकार (ब्लड प्रेशर) की शिकायत हो सकती है। यदि शुक्र साथ हो तोवह अन्य स्त्रियों के साथ प्रेम करता है। प्रेम विवाह भी होते है। मंगलनीच का होने पर शरीर में सुख में कमी आती है। कमर में निशान होताहै। माता के सुख में कमी आती है। इसी के यदि शनि या राहु अष्टम् याद्वादश भाव हो तो वह जातक घर छोड़कर विदेश या अन्य स्थान मेंरहता हैं, ऐसे जातक को गर्म वस्तु का विशेष ध्यान रखना चाहिये। 18वर्ष 6 माह, 28 वर्ष 3 माह, 38 वर्ष 6 माह, 48 वर्ष 10 माह शारीरिककष्ट आता है।
उपाय - सवा किलो गेहूं, बिल्व पेड़ की छाल एवं रक्त गुलाब लाल कपड़़े में बाँधकर जंगल में दक्षिण दिशा में गाड़ देवें या लाल गेहुकी लापसी गांय को खिलावें।
5) मंगल पंचम् स्थान में उच्च, स्वग्रही अथवा मित्र क्षेत्रीय होतो पाचन क्रिया अच्छी रहती है, पुश्र निश्चित होता है। ऐसे जातक दूसरेधर्म की बात करने में बड़ा आनन्द आता है। अधिकतर फौज में होता है।प्रथम संतान से कुछ चिन्ता रहती है। मंगल नीच या पाप ग्रह से दृष्ट होतो संतान से विचारों से भिन्नता रहती है, कभी-कभी संतान से दुःखीहोता है। संतान को पाँचवें व छठे वर्ष में पीड़ा होती है। उच्च या स्वग्रहीहो तो शेयर और सट्ठे में लाभ होता है। पंचम् स्थान मंगल उच्च यानीच हो अधिकतर फल विपरित रहता है। यदि जातक डॉक्टर हो तबअच्छा सर्जन होता है, ऐसे व्यक्ति को रिश्वत से हानि उठानी पड़ती है।
उपाय -मंगलवार की सुबह बिना बात किये (मौन) हनुमानजी मेंमंदिर में पहले मुख में गुड़ देवें। बाद में पाँच अगरबत्ती लगायें एवं पाँचगुलाब अर्पण करे गोटा (सूखा नायिल) के पाँच टुकड़े चढ़ाकर शेषघर में प्रसाद बाँटे।
6) मंगल षष्टम् स्थान में उच्च हो शत्रु जीतने वाला, कोईसंस्था या समाज में अच्छी प्रतिष्ठा रखने वाला होता है, स्वभाव क्रोधीहोता है। यदि मंगल, शनि से दृष्ट हो अथवा शनि, सूर्य साथ हो जन्म सेमाँ के पक्ष में हानि होती है। नीच शत्र क्षेत्रीय हो तो झगड़ा करने वालाशरीर पर लोहे से चोट आती है, ये चालबाज होते है तथा आसानी सेपकड़ में नहीं आते।
उपाय - दक्षिणमुखी हनुमानजी को प्रत्येक मंगलवार एक गुलाबकी माला एवं एक इमरती (उड़़द) भोग लगावे।
7) मंगल सप्तम् भाव में उच्च हो विवाह में देरी करता है। 24%वर्ष विवाह न हो तो 28 वर्ष के बाद ही विवाह होता है। मंगल उच्च
अथवा नीच का हो शनि सूर्य से दुष्ट हो विवाह में देरी, पुरुष को स्श्रीसुख, स्त्री को पुरुष सुख नहीं मिलता। मंगल उच्च का हो तो मंगलदोष विशेष लगता है और नीच का होने से मंगल दोष न्यून हो जाता है,क्योंकि मंगल मित्र क्षत्रीय है, कर्क का मंगल होने से उसका नीचत्वसमाप्त हो जाता है। मंगल नीच का होने से विवाह के लिये सफेद मूँगाधारण करें। मंगल उच्च या नीच का हो तो लड़की के लिये घट विवाह्कराये। लड़के का मंगल दोष निवारण हेतु अर्की विवाह करावें। देहातमें मंगल होने पर लड़के का खोजड़ी से विवाह कराते है। उत्तर प्रदेश केकई पण्डित लड़के का विवाह गुड़िया के साथ कराते है। किन्तु शास्त्रोंमें अर्की विवाह का ही वर्णन है।
नोट : लग्न में, 4 स्थान, 7 स्थान, 8 स्थान, 12 स्थान में मंगलकिसी भी राशि का हो वह मांगलिक कहलाएगा इसके उपाय ऊपर दियेगये है।
उपाय - मंगलवार के दिन हनुमानजी को राम नाम की माला
(108) पहनावे तथा चमेली के तेल का दीया करें।
8) मंगल अष्टम् स्थान में हो रक्त विकार रहता है, जातक स्त्रीहो या पुरुष तेल व दही के मिश्रण से बनी सब्जी का सेवन न करें। नहींतो श्वेत दाग होने का पूर्ण भय रहेगा, चोट लगेगी, अपयश मिलता है।मंगल शनि राहु के साथ हो तो निश्चित लोहे से आघात, पत्थर गिरने सेआघात, शत्रुओं से प्रहार, कभी-कभी हाथ भी कुचला जाता है। विवाहमें देरी होती है। यदि मंगल जल तत्त्व राशी का हो पानी से दूर रहनाचाहिये। यदि साधु के ऐसे ग्रह हो तो हठ योगी होता है और सिद्धी प्राप्तकरता है।
उपाय-बालक हो तो उसे बिल्व पेड़ की छाल, रक्त चन्दन, रक्तपुष्प, मालकंगनी, मौलश्री तथा जटामानसी (जड़ी-बूटी) मिलाकरस्नान करायें।
उपाय -विवाह के लिए मंगल यंत्र बनाकर षोढशोपचार से पूजनकरे। एक हाथ से आटे का एक रोट बनाकर डाले घी एवं गुड़। फिर यंत्रके भोग लगाकर सात मंगलवार इसी प्रकार की विधि से उसी रोट काभोग कर व्रत का पालन करें, जातक अपने अलावा भोग का प्रसाद(रोट)को स्वयं ही खावे, किसी को न बाँटे।
विशेष -जहाँ पूजा का रोट बनाना है, उस स्थान पर पहले गोबरसे बड़ा त्रिकोण बनावें, उसके बाद सूखने के बाद उसी में पूजन कर रोटबनावे। व उसी स्थान पर रोट को खावे (भोजन करे)।
9) मंगल नवम् स्थान में उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तोदूसरों की सेवा करने वाला, स्पष्ट वक्ता होता है, तटस्थ होता है। अपनेभाग्य से कमाने वाला होता है। कई कुण्डलीयों में देखा गया है कि बड़ाभाई या बड़ा साला नहीं होता है। घूमने का शौक होता है। नेताओं सेमिश्नता होती है, लोगों से सम्मानित किया जाता है। 28 से 30 वर्ष मेंभाग्य उदय होता है। यदि नीच हो तो चिन्ता बनी रहती है, भाग्य मेंरुकावट पैदा करता है, स्वार्थी एवं झूठ बोलने वाला होता है। भाईयों सेविचार में भिन्नता, यात्रा करने वाला होता है।
उपाय - सात मंगलवार हनुमानजी के लाल कनेर की मालापहनावें तथा ताम्बे का त्रिकोण बनाकर उस पर चमेली के तेल का दीयाकरें।
10) दशम् स्थान में मंगल उच्च का हो तो वह कुलदीपक होताहै। कुल का नाम रोशन करता है। पराक्रमी होता है, गुरु, चन्द्र, बुध सेदृष्ट हो तो अच्छा पद प्राप्त करता है। राज्यसभा में मेम्बर भी चुना जाताहै या सरकार में अच्छी मान्यता होती है। नीच या पाप ग्रह दृष्ट हो तोजुकाम से पीड़ित रहता है। किसी भी कार्य में अड़चन आती है।अकारण बुराई आती है। कई विद्यावानों ने इसमें मिश्रित फल लिखे है।
माता-पिता के सुख में कमी रहती है। 26 वर्ष में कुछ लाभ होता है।
उपाय -11 मंगलवार हनुमानजी के मन्दिर में पाव मसूर की दाल,11 रुपये रोकड़ एक ताम्बे का टुकड़ा लाल कपड़े में बाँधकर चढ़ावें।
11) एकादश स्थान मंगल उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तो यशप्राप्त करने वाला, क्रय-विक्रय से धन कमाने वाला, ट्रक, मोटरसाईकल से, ताँबे तथा मिर्च से व्यापार में लाभ होता है। यदि शुक्र साथहो तो अन्य स्त्री से भोग करने वाला होता है। कभी-कभी अपने कोराजा समझता है अर्थात् घमण्ड आ जाता है। उच्च अधिकारी को रिश्वतसे हानि हो सकती है। डॉक्टर, वकील, वैद्य, इंजीनियर, सुनार औरलौहार के लिए विशेष लाभदायक है। नीच का, शत्रु क्षेत्रीय या पाप ग्रहसे दृष्ट हो तो ठगी करने वाला, झूठी कम्पनी बनाकर ठगने वाला, स्त्रीएवं बड़ी बहन से विचारों में भिन्नता एवं बड़ी बहन बीमार रहती है।
उपाय-मंगलवार को जल में रक्त चंदन डालकर स्नान करें। एकताम्बे के सिक्के पर ॐ भोमाय नमः लिखाकर गंगा में बहा दे।मंगलवार को घर से निकलने से पूर्व रक्त चंदन का टीका करें।
12) द्वादश भाव में मंगल होने से यह मांगलिक कुण्डलीकहलाती है। विवाह में देरी होती है। मंगल हमेशा जातक का ऋणयुक्तरखता है। चाहे वह बैंक का हो। घूमने-फिरने की विशेष रूचि रहती है।कचहरी सम्बन्ध विवाद होता है। कान, पैर या हाथ में कुछ तकलीफका योग बनता है। 28 वर्ष में माता को कष्ट, 26 वर्ष कुछ लाभ होताहै। खर्च करने वाला होता है।
उपाय - पंचमुखी हनुमानजी की पूजा करें। ताम्बे में त्रिकोण मुँगा (3कैरेट) अनामिका में धारण करें। एक ताम्बे के सिक्के में छेद कर लालधागे से बांधकर उसे मृगशिरा नक्षत्र के दिन खेजड़ी पेड़ पर बाँध देवें।
बुध
बुध लग्न में हो उच्च, स्वग्रही अथवा मित्र क्षेत्रीय हो तोबुद्धिमान होता है, हसमुख होता है। नाक नक्श अच्छे होते है, समाज केप्रतिष्ठा रहेगी, संगीत का शौक होता है, चतुर होता है। एक बार शरीर मेंफोड़े-फुंसी (चर्म रोग) होता है, यदि मिशुन राशि का हो जातकद्विस्वभाव (डुप्लीकेट) होता है।
यदि वह नीच का हो, पाप ग्रह साथ हो तो बुद्ध में नर्मलता नहींरहती है। सब जगह असफल होता है। चर्म रोग से ग्रसित होता है, शुक्रसाथ में हो तो कई कलाओं में निपुण होता है। पुस्तके प्रकाशन करताहै। बुध नीच होकर उसके साथ पाप ग्रह पड़े तो वह नीच (शुद्र) देवताकी पूजा करने वाला। जैसे-भूत-प्रेत निकालना, कर्ण (कण्ठ)पिशाचनी सिद्ध करना तथा मरने के बाद नर्क लोक में जाता है। 36 वर्षमें लाभ होता है।
उपाय - हर बुधवार गणेशजी लड्डु चढ़ावें और गणपति मंदिर मेंबैठकर ॐ गं गणपते नमः की माला का जप करें।
2) बुध द्वितीय भाव में उच्च, स्वग्रही या मित्र क्षेत्रीय तबजातक धार्मिक प्रवृत्ति, धर्मशास्त्र ज्ञाता, शुक्र साथ हो तो पैसो की कमीनहीं रहती है, सौम्य ग्रह से दृष्ट हो तो कविता करने वाला, भाषण देनेमें निपुण होता है। यदि मंगल साथ हो तो परोपकार करने वाला होता हैतथा न्यायधीशों ( मजिस्ट्रेट) के लिए विशेष लाभदायक है। 15 वर्ष 3माह के बाद पढ़ाई में विशेष रूचि रखता है। वर्ष 36 में पैसा कमाता है।बुध नीच या पाप ग्रह से दृष्ट हो तो वाणी में मिठास समाप्त हो जाता है,मेहनत का फल कम मिलता है। चर्म रोग से ग्रसित रहता है।
उपाय - नीम की जड़ के अगुष्ठ प्रमाण गणपति बनावें। गणेश चतुर्थीके दिन षोडशोपचार से पूजा करें। मंत्र -ॐ गेँ हस्ति पिशाची लिखे स्वाहा। इस मंत्र का गणपति के सामने सवा लाख जप करें तो बुध केबुरे फल नष्ट हो जायेगा।
3) बुध तृत्तीय स्थान में उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय तो उसकेमिन्न व्यापारी होते है। उच्च का गुरु से दृष्ट हो तो वह दूसरे व्यक्तियोंको अपनी मुट्ठी में कर लेता है। उच्च का हो तो बृद्धावस्था में सन्यासकी इच्छा रखता है। उसके भाई-बहन पास आने की इच्छा रखते है।पाप ग्रह के साथ अथवा नीच का हो तो भाई-बन्धुओं से विचार नहींमिलते। 12 या 13 वर्ष में पिता को नुकसान होता है। चमड़ी में खिंचावरहता है।
उपाय -बुधवार के दिन गणपति के लड्डु चढ़ावें तथा गाय को घासडालें।
4) बुध चतुर्थ भाव में स्वग्रही, उच्च, मित्र क्षेत्रीय हो तो 14 वर्ष6 माह के बाद पिता को फायदा होता है। माता बहुत चिन्ता करती है।मकान व वाहन सुख होता है। किसी संस्था या समाज का अध्यक्ष भीहोता है। पिता की सम्पत्ति की इच्छा कम रखता है, लेखन कला मेंप्रवीण होता है, बोलने में चतुर होता है। सूर्य-राहु साथ हो तो माताबीमार रहती है। यदि नीच का हो या पाप ग्रह साथ हो तो 24 वर्ष मेंभाई से धन हानि होती है। मानसिक तनाव बना रहता है। जमीनसम्बन्धी व्यापार में लाभ नहीं होता है, मकान बनाने में अड़चन आतीहै।
उपाय - (पुष्य नक्षत्र में) आक के गणपति बनावें प्राण प्रतिष्ठा करषोडशोपचार पूजन कर ईशान कोण में स्थापित कर दे। बुध का खराबफल समाप्त हो जाता है।
5) बुध पंचम् भाव में उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तो पुत्र एकही होता है। दो कन्या होती है (इस युग में) उसका स्वभाव कोई बात को लेकर उसकी जड़़ तक पहुंचना होता है। उसके मामा को गलेसम्बन्धी बीमारी होती है। 27 वर्ष में माता को पीड़ा, यदि गुरु व शनिकी दृष्टि हो तो सट्टे का शौक होता है, वह मंत्र विद्या में पूर्ण विश्वासरखने वाला होता है। कोई-कोई व्यक्ति कविताऐं लिखने के बड़ेशौकीन होते है। बुध नीच का हो तो ऊपर दी गई व्याख्या विपरित होतीहै।
उपाय - चंदन के गणपति बनावें। प्राण प्रतिष्ठा करके षोडशोपचारपूजन कर पूर्वाभिमुख स्थापित करें, विद्यार्थी हो तो साथ मेंसरस्वतीजी का भी पूजन करें। यदि हाथी दांत के गणपति हो तो विशेषलाभ प्राप्त होता है।
6) बुध षष्ठम् स्थान में होने से बन्धुओं से विरोधी होता है।कठोर वचन बोलने वाला, उपकार में रुचि नहीं लेता है। 37 वर्ष 8 माहमें शत्रुओं से नुकसान होता है, कहीं-कहीं अपमानित भी होना पड़ता है।शरीर में वायु रोग, कभी-कभी रहस्यमय बीमारी का भी सामना करनापड़़ता है।
उपाय - पीतल या पत्थर के गणपतिजी लेवें। उसे बड़े कटोरे अथवाभगोने में स्वस्तिक बनाकर उसमें पुष्पों को आसन देवें तथा गणेशजीको विराजमान कर नित्य 11 बार गणपतिजी का नाम लें। 11 नामअलग-अलग लेवे तथा दर्वा चढ़ावें तथा पहले 11 चम्मच पानी भी 11अलग-अलग नामों से जल चढ़ावें व धूप दीप करें। जब पात्र भर जायेतब उसे पीपल के वृक्ष में प्रवाहित करें। तीन बार करने से शत्रु नाशहोता है, रोग में कमी आती है तथा नौकरी में पैसा प्राप्ति के लिये यहएक अचूक उपाय है। रूका कार्य भी शुरू होगा।
7) बुध सप्तम् स्थन में स्वग्रही, उच्च, मित्र क्षेत्रीय हो तो स्त्रीका नाक नक्श अच्छा होता है। उस व्यक्ति को पत्नी से लाभ होता है।
दैनिक रोजगार में चतुर होता है। नारी सम्मान देने वाला होता है। यदिबुध अस्त, पाप ग्रहों के साथ नीच हो तो पत्नी को कामशास्त्र मेंसन्तुष्ट नहीं कर सकता। विवाह के समय अशांति उत्पन्न होती है। गुप्तरोग से पीड़ित रहता हैं।
उपाय-15 वर्ष होने पर हाथी को नारियल खिलावें या गाय को हराचारा या पीपल के पत्ते खिलावें। हाथी का पूजन करें।
8) बुध अष्टम् में उच्च मित्र क्षेत्रीय स्वग्रही होने से आयु दीर्घकरता है। घूमकर पैसा कमाने वाला होता है। विदेश योग भी बनता है।यदि सौम्य ग्रहों से सम्बन्ध करें तो दण्डनायक (मजिस्ट्रेट) भी होता है।25-26 वर्ष में लाभ होता है। बुध कमजोर हो (नीच, अस्त या शत्रुग्रह) कचहरी सम्बन्धी विवादों में फंसा रहता हैं। पैतृक सम्पत्ति कानाश होता हैं। बुध की दशा में मस्तिष्क में विकार उत्पन्न होता हैं।
उपाय -काशी की थाली में भोजन करना चाहिये। लंगर में घी का दानकरना चाहिये। बचपन में यदि विशेष कष्ट हो तो बुधवार के दिन मोती,चावल, गोलोचन, जायफल, पीपरामूल, सोना, गोमूत्र, गोबर, गर्मपानी में मिलाकर उसे ठण्डा करें। उससे रोगी को स्नान करावें तो रोगका नाश तथा बुद्धि मलीन हो तो सद्बुद्धिप्राप्त होती है।
9) बुध नवम् स्थान में उच्च, स्वग्रही मित्र क्षेत्रीय शुभ ग्रहो सेयुक्त तब जातक धर्म को मानने वाला, किसी संस्था का मुखिया, तीर्थस्थान में रुचि रखने वाला, मन्दिर में ध्वजा चढ़ाने वाला, घर के बाहरलोग उसका आदर करते हैं। बुध अस्त हो, नीच का हो, पाप ग्रह केसाथ हो, स्वयं के धर्म का कटाक्ष करने वाला होता है। वर्ष 29 से 31के बीच माता को विशेष कष्ट होता हैं। अपने कार्य से अहम् प्राप्त होजाती है। बुध के कारण अच्छा ज्योतिषी, गणितज्ञ भी होता है।
उपाय- गले में हाथी दाँत का गणपति धारण करें। गणपति मन्दिर मेंकपूर का दान करें।
10) बुध दशम् भाव में उच्च, मित्र क्षेत्रीय स्वग्रही हो तो धनधान्य व वाहन से युक्त होता है। ऊँचे पद को प्राप्त करता हैं। राजनेताहो तो उसकी वाणी से हजारों लोग प्रभावित होते हैं। पिता का नामरोशन करने वाला होता है। समाज में व राज्य में भी यश प्राप्त करनेवाला तथा अपनी भुजाओं से धन कमाने वाला होता है। वर्ष 28 माह 9के भीतर अचानक नेत्रों में विकार या चोट लगना होता है।
वणिक जाति हो तो व्यापार (दलाली) द्वारा बहुत पैसा कमानेवाला होता हैं। बुध नीच का, पाप ग्रहों से युक्त, शत्रु क्षेत्रीय तब पैसाकमाने का तरीका अच्छा नहीं होता। पिता से विचारों में भिन्नता रहतीहै। यदि बुध की दशा आवें तब व्यापार में घाटा होता हैं। उसके विचार(मस्तिष्क) में कभी-कभी चोरी का भाव आता हैं। धर्म से विमुखकार्य करता हैं।
उपाय - अनामिका ऊंगली में तीन कैरेट का पन्ना धारण करें। हरे कपड़ेमें सवा किलो मूँग उसमें स्वर्ण का टुकड़ा डालकर दान करें।
11) बुध एकादश भाव उच्च, मित्र क्षेत्रीय स्वग्रही हो साथ शुक्रहो तो नौकर रखने वाला होता है। प्रसिद्ध होता है, कई विद्याओं काजानकार होता हैं। अकेला बुध उच्च हो पाप ग्रहों से दृष्ट न हो तो 32वर्ष व 45 वर्ष में लाभ प्राप्त होता है। वाहन सुख रहता हैं, राज्य में भीप्रतिष्ठा रहती हैं। बुध यदि अस्त हो, नीच हो, शत्रु क्षेत्रीय हो उसकोमानहानि होती है। कन्यादान में भी असफल होता हैं। वाहन से लाभनहीं मिलता, चौपाया जानवर से भी हानि उठानी पड़ती हैं। अन्य स्त्री सेबदनामी होती है, सभी फल विपरित होते हैं।
उपाय - पन्ने के गणेश का पूजन करें। बुधवार का व्रत करें। गणपतिजीको पीले पुष्प व पीले लड्डू का भोग लगावें।
12) बुध द्वादश स्थान में उच्च, मित्र क्षेत्रीय तथा स्वग्रही हो तो
वह जातक अच्छा खर्च करने वाला, बाह्मणों को भोजन कराने वाला,धार्मिक कार्यों में पूर्णतया मन लगाने वाला होता हैं। यदि नीच काअस्त, शत्रु क्षेत्रीय, पाप प्रहों से युक्त हो तो लोभी और नशा करने
वाला तथा आलसी होता हैं। वह गुढ सिद्धिया (काला जादू) अथवा
नीच कर्म की सिद्धी करने वाला होता है।
उपाय-गले में बाण बनाकर पहनें, बाण की तरह का यंत्र बनाबें तथा
उसका पूजन करें। हाथी दाँत के गणेशजी का हर बुधवार 11 नाम मंत्र
से धूप व जल चढ़ावें, निश्चित लाभ होगा।
गुरू
1) लग्न में गुरु, गुरु उच्च, स्वग्रही मित्र क्षेत्रीय हो तो व्यक्तिप्रतिष्ठा वाला, यश प्राप्ति होती है। 6 व 12 वर्ष में उतार-चढ़ाबआयेगा। मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्ति होती है। दान में मन रहता है।नाक-नक्श सुन्दर होता है। कर्क का हो व सौम्य ग्रह के साथ होने से वबुद्धिमान पुत्र, लाभ होता है। स्त्री सुन्दर।
यदि नीच का हो, पाप ग्रहों के साथ हो गुरु अस्त हो तो अपयशप्राप्त होता है। उच्च का हो तो भी फल प्राप्ति नहीं होता है। माता-पिताको शारीरिक नुकसान या मृत्यु भी हो सकती है। संतान सुख में कमी यासन्तान देर में होती है।
उपाय - 1. गुरुवार का व्रत रखें, पीपल को पानी सींचे व पीले पुष्प
चढ़ावें। 2. एक पीपल का पत्ता लेवे उस पर चन्दन की पाँच टिकियाँलगावें व उस पर ॐ बृं बस्पतये नमः बोलते हुए पाँच पुष्प चढ़ावें। उसहर गुरुवार।
अबीर चढ़ावें बाद में पीपल के जड़ चढ़ावें। पीपल के 3 बार प्रदक्षिणा 2) दूसरे स्थान में गुरु उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तो समाजमें प्रतिष्ठा होगी। कुटुम्ब में जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। यदि गुरु उच्च काहो तो तथा पाप ग्रह के साथ या पापग्रह से दृष्ट हो तो स्त्री बीमार याद्विभार्या योग भी बनता है। नीच, शत्रु क्षैत्री हो तो घर में अपयश वघरेलू झगड़े होते रहते है। उच्च का गुरु हो तो पिता की सम्पत्ति नहींमिलती या त्याग देता है। गुरु अशुभ हो तो अटूट परिश्रम करने पर भीधन में कमी रहती है। द्वितीय स्थान में गुरु हमेशा धन प्राप्ति में बाधाउत्पन्न करता है चाहे वह उच्च हो या नीच। एक ओर बात है यदिजातक उच्च पद पर हो तो अच्छी तनख्वाह होते भी धन की कमीमहसूस करता हैं।
उपाय -1, पीपल के पाँच पत्ते लेवे। हर पत्ते पर चन्दन की बिन्दीलगावें। हर पत्ते पर हल्दी की गांठ रखें, फिर पानी में बहा देवें। 2. पीलेरंग का 3 करेट का पुखराज अनामिका अंगुली में गुरुवार को अमृत केचौघड़ियें में धारण करें।
3) गुरु तीसरे का स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय हो तो मित्रों से लाभहोता है। उनके भाई-बहन से भी लाभ मिलता है। पराक्रम वाला तथास्वयं अपने बल से अनेक मित्रों से लाभ होता है। मगर वह स्वयंएहसान फरामोश होता है। मेरे अनुभव से गुरु तीसरे होता है तो वह भाईबन्धुओं को उधार पैसा देता है तो वापस प्राप्त नहीं होता है। उसे धोखामिलता है।
यदि गुरु नीच, अस्त या पाप ग्रहों से दृष्ट होता है तो उसके मित्रअच्छे नहीं होते हैं। भाई भी धोखा देता है। पैसों की कमी होती है।पाराशर मतानुसार शुभ ग्रह तीसरे होने में शुभ नहीं होते है। उसके कन्धेपर दर्द रहता है। यदि गुरु की दशा चल रही है तो निश्चित कन्धे पर चोटया दर्द रहेगा। भाई छोटा होता है तो वह बीमार या किसी आफत में फसजायेगा। पेट में पाचन क्रिया में तकलीफ होती है।
उपाय-(1) पीले कागज पर अनार की कलम से चंदन या अष्टगंध सेलिखे यंत्र गुरुवार को पीपल की डाली पर बांधते समय पीला धागे सेबांधे। यंत्र -
१० ५१२
११ | ८l ७
३ |१३| ७
(2) काशी के पात्र में शक्कर रखें, फिर उस पर हजारे का फूल (पीलापुष्प) पात्र में रखें, फिर दान करें। गुरुवार के दिन।
4) लग्न से चौथे घर (स्थान) में गुरु उच्च स्वग्रही व मित्रक्षेत्रीय होने पर उसे सवारी योग पूर्ण। बड़े आदमियों से विशेष लाभहोता है। यदि चन्द्र व बुध से सम्बन्ध करता है तो बड़े जमीन का स्वामीहोगा। यदि त्रिकोण का स्वामी हो तो (मेष लग्न) चौथे स्थान में होनेसे उच्च का हो व गुरु की दशा आयेगी तो विशेष लाभ होगा। सभीदिशाओं से लाभ होगा। लोग सेवा में रहेंगे।
यदि नीच, पापग्रहों से सम्बन्ध, राहु के साथ गुरु चौथे हो तोअपमान का सामना करना पड़़ेगा। माता बीमार होगी। माता का सुखसमाप्त होगा। हार्ट में पीड़ा योग बनता है। कभी-कभी दमा कीशिकायत या श्वास लेने में पीड़़ा होगी।
उपाय - गुरुवार के दिन से ॐ ग्राँ ग्रीं ग्राँ सः गुरुवे नमः ॐ बृहस्पतयेऽअतिय दर्या का जाप ब्राह्मणों द्वारा 19000 करावें या स्वयं करें। विशेषफल देने के लिए 19000 x 4 चार गुणा करें। फिर दशां हवन कर 12ब्राह्मणों को भोजन करावें। फिर पीले (पीताम्बर) उन्हें दक्षिणा में देवें।साथ ही 1 केला साथ देवें।
5) पाँचवें स्थान में गुरु उच्च का स्वग्रही व शुभ ग्रहों से दृष्टहोने से वह ज्ञानी व विद्वान होता है। जातक तत्व में लिखा है कि गुरुपंचम् में फल नहीं देता है अर्थात् गुरु अकेला फल देने में सक्षम नहींहोता है। गुरु उच्च का तथा व अशां में भी उच्च हो तो वह पुस्तकलिखने वाला प्रोफेसर अध्यापक धार्मिक कार्यों में भाग लेने वालातथा कई संस्थाओं से सम्मानित होता है। पुत्र सुशील होता है।
यदि गुरु नीच का अस्त पाप ग्रहों से ग्रस्त होवे तो पुत्र से विचारनहीं मिलते, बहस करने वाला, आपत्तियों से गिरा हुआ होता है। पुत्रचिंता रहती है। राहु गुरु के साथ हो शनि की दृष्टि या सूर्य की दृष्टि होनेसे पुत्र नहीं होता है या वह पुत्र से पीड़ित रहता है। पुत्र बीमार रहता है।पेट में पीड़ा होती है। विद्या में रूकावट आयेगी।
उपाय - संतान हेतु शिव लिंग पर घी का अभिषेक करावें। एक चाँदीकी पट्िटका बनावें उसमें गुरु यंत्र बनावें। बीच में पुखराज जड़ावें। फिरचंदन से पूजा कर पीले पुष्प चढ़ावें। बाद में गले में धारण करें।
6) गुरु छठे स्थान में हो तो शत्रु उसकेसामने टीक नहीं सकते।उन्हें हारना ही पड़ता है। गुरु छठे हो तो मामा को अवश्य नुकसान होताहै। माता को लम्बी पीड़ा रहेगी। गुरु छठे होने से शत्रुओं में उसकादबदबा होगा। जानवर से लाभ होगा। इसको कृषि कार्यों से भी लाभहोगा। राजनीति में लाभ। नीच व अस्तगत या शत्रुक्षेत्री हो तो ननिहालपक्ष को हानि पैरों में चोट या फ्रेक्चर होगा। शत्रु भय रहता है। शरीर मेंरोग उत्पन्न होता है।
उपाय -1. सरसों, गूलर, मूलहरी, शहद, गऊमूत्र, पीले पुष्प को पानी मेंउबाल कर ठण्डा करें। फिर रोग के चौघड़ियें में स्नान करें तो रोग शांतहोता है। 2. नित्य कांशी के बर्तन में भोजन करें। 3. पीले रंग (मोतीचूर) लड्डू विष्णु भगवान को चढ़ावे।
7) गुरु सप्तम् में उच्च, स्व, मित्र क्षेत्रीय होने से स्त्री सुशील
होती है। लग्न को गुरु देखता है तो वह बुद्धिमान होता है। अनुभव वकई अन्य शास्त्रों में अध्ययन करने पर गुरु यदि अकेला उच्च का हो तोपत्नी से विचारों में अन्तर तथा कभी-कभी तलाक की नौबत आ जातीहै। यदि वह नीच का हो तो वह पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो पत्नी से विवाद,पत्नी बीमार रहती है। मानसिक चिंता बनी रहती है। नित्य रोजगार मेंकमी रहती है।
मंगल व गुरु शामिल हो गुरु व चन्द्र शामिल हो गुरु बुध शामिलहो तो स्त्री सुख मिलता है। लग्न में शुक्र व बुध, चन्द्र व शुक्र हो तो भीस्त्री सुख मिलता है। स्त्री की सलाह से लाभ होता है। विवाह के साथलाभ होता है।
उपाय -1. स्त्री वિवाह के बाद विष्णु पत्नी सहિत (तस्वीर) या मूर्तिका पूजन करें। बेसन की चक्की का भोग लगावें। हर गुरुवार को विष्णुसहस्त्राम का पाठ करें। 2. स्त्री नित्य केले का पूजन करें।
8) अष्टम् स्थान में गुरु उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय होने परजातक की आयु दीर्घ होती है। सभी ज्योतिष शास्त्र में गुरु का अष्टम् मेंहोना उचित नहीं माना है।
गुरु अष्टम् में अशुभ फल देता है। मरने के बाद प्रसिद्ध होता है।गुरु अष्टम् में होने पर पिता से शीघ्र ही अलग रहता है या दूर नौकरी परचला जाता है।
शत्र क्षेत्रीय व नीच होने पर रोग उसे घेरे रहते है। शनि से दृष्ट होया राहु से दृष्ट हो तो गुप्त रोगी भी हावी रहते हैं। शत्रु उत्पन्न होते हैं।कोर्ट में यदि केश चल रहे है तो गुरुदशा हो तो विपरित फल देता है।कभी-कभी जेल भी हो जाती है। वर्ष 31 से 33 वें वर्ष में रोग कीउत्पत्ति होती है।
1. यदि रोग हो तो सरसु के तेल से शिव लिंग पर रुद्राभिषेक करें।
2. नित्य चन्दन का टीका सिर पर लगाबें।
3. शिव पर हर सोमबार हल्दी का टीका करें तथा पीले पुण्प अवश्यचढावें।
9) गुरु नवम् स्थान में उच्च, स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय होने से धर्मके प्रति पूर्ण आस्था रखने वाला होता है। शुभग्रहों से दृष्ट हो तो वहसाधु सन्तों, ब्राह्मणों की सेवा करने वाला होता है। भाग्य में गुरु उच्चका व सौम्य ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक के अच्छा बड़ा मकान होता है।मगर ये विशेष ध्यान रखें चौथे का पति 6, 8, 12 में न हो तथा चौथेघर का मालिक अस्त व नीच न हो अन्यथा नवें में पड़ा गुरु अपना फलदेने में सक्षम कम होगा।
भाई बन्धुओं पर खर्च करने वाला होगा। समाज के व्यक्ति उसेपसन्द करते हैं। गुरु उच्च तथा उसके सम्बन्ध त्रिकोण से हो जावे तोअच्छे पद को प्राप्त करता है। आत्मज्ञान व योगक्रिया में ईश्वर की देनहोती है।
यदि नीच व शत्रु क्षैत्रीय हो तो सभी फल विपरित होंगे। पुत्र से भीविचारों में अन्तर। मकान बनने में अड़चन भाई बन्धुओं से मानसिकचिंता।
उपाय - 1. तीन कैरेट का पुखराज अनामिका अंगुली में गुरुवार कोलाभ के चौघड़ियो में पहनें। 2. किसी बड़े यज्ञ व लंगर में घी दान करें,मगर किसी से नहीं कहे तो निश्चित ही फायदा होता है। 3. आम के पेड़के पत्ते को लेवें उस पर गुरु का यंत्र लिखकर सोते समय अपने तकियेके नीचे रखे। कई तरह के लाभ होंगे।
10) गुरु दसवें उच्च स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय होने से सरकारीनौकरी में उच्च पद पर आसीन होता है। यदि गुरु अस्त हो तो नौकरी में उच्च पद प्राप्त नहीं होता है। चाहे कितनी ही डिग्रीयां पास हो। अपनेपिता या दादा के नाम से समाज में कमरे बनाता है। मंदिर का निर्माण यामन्दिर पर शुभ खर्च करता है। माता-पिता, दादा का आज्ञा पालकहोता है।
गुरु नीच का व पाप ग्रहों से युक्त हो तो पिता से विचारों में अन्तरवर्ष 16 या 24 के पिता के शरीर को हानि होती है। सरकारी नौकरी होतो चार्जशीट मिलती है। सस्पेन्ड भी हो सकता है। पैसा जरूर प्राप्तहोता है।
उपाय -एक हांडी में नौ लवण के सात टुकड़े लेवे। एक मुट्ठी चने कीदाल लेवे, 1% गज पीला कपड़ा बांध कर जहाँ आम के पेड़ की जड़ केपास गाढ़ देवें या तालाब या नदी के किनारे गाढ़ देवें।
11) ग्यारहवें गुरु उच्च व स्वग्रही या मित्र क्षेत्रीय हो तो धंधे मेंनिपुण होता है। नौकर चाकर सभी से सुख प्राप्ति होती है। विद्या कमहोते हुए भी पैसा कमाने में होशियार होता है। बड़े भाई की इज़ज़त करनेवाला होता है। मित्र अच्छे होते है। वर्ष 32 में लाभ के चोपाये जानवरसे लाभ होता है। गुरु व मंगल हो तो लाभ होता है। बुध व शुक्र कीदृष्टि हो तो भी पैतृक अंधे में बढ़ोतरी करने वाला होता है। पुत्रों काभाग्य देरी से होता है।
गुरु नीच अस्त शत्रु क्षेत्रीय हो तो बड़े भाई से अनबन होती है।
पिता की सम्पत्ति नष्ट करने वाला होता है या पिता की सम्पत्तिनष्ट हो जाती है। कन्धे में पीड़ा होती है। पुत्रों से वाद-विवाद से हानिहोती है। एक ही पुत्र होता है।
उपाय -1. शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर अभिषेक कर रात्रि में हल्दीके गाठिये व बोर साबुत रखें। हल्दी व बोर जो बाण पर रखें है। किसीकपड़़े को बांधकर गल्ले या तिजोरी में रखें।
2. गुरु यंत्र चाँदी की पट्टी पर खुदवाकर चन्दन केसर से पूजन करें।पुष्य नक्षत्र या रविवार को लाभ के चौघड़िये में अपनी तिजोरी या गल्लेमें पीले कपड़़े में लपेट कर रखें।
3. घर से दुकान की तरफ निकले तो केसर की टीकी लगाकर निकले।
12) गुरु द्वादश स्थान में उच्च का स्वक्षेत्रीय मित्र क्षेत्रीय हो तोदान करने वाला होता है। मगर उसे घमण्ड आ जाता है। धन अच्छेकामों में खर्च होता है।
गुरु अस्त की शत्रुग्रहों से घिरा हुआ हो तो ठग कर भी दान करनेवाला होता है। अपने ही भाई बन्धुओं पर अपना प्रभाव जमानें वालाहोता है। बुद्धि विपरित कार्य में लगी रहती है। कभी-कभी चित्त भ्रमितहोता है।
उपाय-(1) पीला कपड़ा सवा गज, सवा किलो पीली चने की दाल,व सोने की विष्णु की मूर्ति चने की दाल के अन्दर रख कर फिर उसकादान करें। (2) गुरुवार के दिन पीले वस्त्र का दान करें।
शुक्र
1) लग्न में शुक्र उच्च, स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तो जातक केमुख मण्डल पर तेज तथा मुख सुन्दर होता है। वह संगीत प्रिय होता है।शुक्र व बुध का सम्बन्ध यदि लग्नेश पंचमेश होकर लग्न में होवे तोजातक बुद्धिमान होता हो प्रसिद्धि होती है। समाज व अन्य जातियों मेंउसका सम्मान होता है। शुक्र कलाप्रिय होने से कई कलाएं का जाननेवाला होता है। शुक्र लग्न में होने से अन्य ग्रहों के 300 दोषों का अशुभदोष दूर करता है। "निहंतिदोषान त्रिशंत भृगुरच" एक विशेष बात हैशुक्र व शनि शापित होने पर विष योग बनता हो तब फल विपरित होता है। लेकिन शुक्र मकर या कुम्भ राशि का हो तो शुक्र उत्तम फल देता है।स्त्रियों को वश में करने की कला होती है।
यदि शुक्र नीच का हो तो वह कामवासना से आशक्त तथाबदनामी भी होती है। शुक्र के साथ पापग्रहों तो सभी फल 60 प्रतिशतविपरित फल देता है। शुक्रनीच का होना उसकी बुद्धिभ्रष्ट होती है तथाउसको घमण्ड भी होता है। दूसरों को तुच्छ समझता है, चाहे पुरुष हो याअपने पति होते हुये भी अन्य से सम्पर्क हो या स्त्री अपने पति हो तो भीअन्य स्त्री से सम्पर्क रहता है। शुक्र नीच का लग्न में व बुध दूसरे स्थानमें हो तो उसके दो या तीन मकान होते हैं।
उपाय - 1. आयताकार चाँदी का टुकड़ा लेवें उस पर (हीं) शब्दखुदवाये। उस पर शिव वाण पर रखकर रुद्राभिषेक कर अपने पासरखें। अशुभ फल का नाश होता है।
2) दूसरे स्थान ये शुक्र उच्च स्वग्रहीय या मि्रक्षेत्रीय या मित्रग्रहोंसे दृष्ट हो तो उसकी वाणी में मधुरता होती है। सुनार जाति में जन्मा होतो हीरे जवाहरात का बड़ा व्यापारी होगा। मुख सुन्दर होता है। धनसंचय भी करता है। सुख भोग में खर्च करता है। खाने-पीने काशौकीन होता है। स्वभाव से स्त्रियों की ओर आकर्षित होता है। दूसरेस्थान में शुक्र, चन्द्र व शुक्र सूर्य का होना नेत्रों के लिए कष्टकारकहोता हैं।
शुक्र को पापग्रह देखने का अर्थ यह है कि कुटुम्ब पक्ष में यश नहींमिलता। विवाह में कुटुम्ब वाले अपमानित करते है। धननाश भी होताहै। अचानक गले या नेत्रों में पीड़ा अवश्य होती है। शुक्र नीच अस्त वपापग्रहों से ग्रसित हो तो धन कुटुम्ब में अड़चन पैदा करता है।
उपाय- 1. तीन मुट्ठी चावल पकाकर घी व शक्कर डालकर गाय कोखिलावें। 2. दूध में चावल डालकर खीर बनाकर चाँदी के बर्तन मेंशुक्रवार को खावें।
3) शुक्र तीसरे स्थान उच्च, स्व या मित्र क्षेत्रीय होने से मित्रों कीसंख्या ज्यादा होती है। अपनी ही चतुराई से ज्यादा पैसा कमाने वालाहोता है। विपरित लिंग के प्रति विशेष आकर्षण होता है। पापग्रह वदेखते हो या साथ न बैठे हो अर्थात् सूर्य मंगल व सौम्य ग्रह में गुरु देखेंया साथ बैठे तो भाई होता ही अन्यथा बहन ही होगी। केवल एककुण्डली देख यह फलादेश न देवें। भाई-बहन के लिए पिता कीकुण्डली भी साथ रखें। स्पष्ट वक्ता के साथ मधुर भाषी, बात घुमाकरकहता है। पुरुष अपनी उम्र से ज्यादा उम्र की स्त्री से सम्बन्ध रखता है।
यदि शुक्रनीच का पाप ग्रह से दृष्ट हो तो बहन या भाई से विचारोंमें अन्तर रहता है। उनके कान में पीड़ा अवश्य होती है। शुक्र की दशाआयेगी तो किसी स्त्री से विवाद व कान में दर्द रहता है।उपाय-दही में मिश्री मिलाकर हर शुक्रवार को कृष्ण भगवान के भोगलगावें।
4) शुक्र चौथे उच्च स्वग्रही, मित्र क्षेत्रीय हो तो सुन्दर घर में रहनेवाला होता है। अच्छे वस्त्र पहने वाला होता है, माता से प्रेम करने वालाहोता है। शुभ्रग्रहों की दृष्टि से बड़े मकान व जमीन का मालिक होगा।समाज में प्रतिष्ठा होगी सवारी निश्चित होगी। जहाँ जायेगा सम्मानहोगा। विद्या में डिग्री हासिल करेगा। घर में सुन्दर वस्तुऐ (सुख भोग)लाने में अग्रणी रहेगा। आस्तिक होगा। चौपाये जानवरों से सुख मिलेगाअर्थात् गाय आदि जानवरों से लाभ होगा। अब जमाने में घोड़े की जगहमोटर कार ने ली है। यानि वाहन सुख भी रहेगा। सब कुछ होते हुए भीपैसों की चिन्ता करता है। 36 व 39 में अचानक कष्ट होता है।
शुक्र नीच शत्र क्षेत्रीय व पापग्रहों से दूष्ट हो तो ग्रह कलह से दुःखीरहेगा। वाहन से निश्चित ही चोट आयेगी।स्त्री मेन्टल (मस्तिष्क रोगी)व माता बीमार रहेगी। अन्य स्त्री को पैसा उधार देना तो वापस आने वाला नहीं। मकान व प्लॉट खरीदेगा तो किसी झंझट में पड़ जायेगा।हॉर्ट व मूत्र रोग होने का योग है।
उपाय - हीरा मध्यमा अंगुली में या कनिष्का में धारण करें। शुक्रवार काव्रत रखें व सोते समय चाँदी के गिलास में दूध पीवें।
5) शुक्र पंचम् में स्वग्रही, उच्च व मित्र क्षेत्रीय हो तो विद्या मेंनिपुण होगा। जो पुरुष प्रकृति शुक्र हो तो पुत्र अवश्य होता है और स्त्रीप्रकृति (कन्या, तुला, मिथुन, वृषभ, मकर) हो तो पुत्री होती है।
ऐसा जातक को काव्य में रुचि होती है। वह मीठा भोजन में विशेषरुचि रखता है जो अहितकर होता है। उसे अचानक लाभ होता है। जिसेउसे उम्मीद नहीं होती है। पंचम् में शुक्र में दादा-दादी का सुख मिलताहै। सेना में भर्ती होता हैं तो वह सेनापति, कोई कर्नल तक पहुँचता है।यदि शुक्र नीच, अस्तगत, पापगृहों से दृष्ट हो तो विद्या के अध्ययन मेंअड़चन होती है। पुत्र से वियोग होता है। पुत्र हो तो उससे चिंता रहती है।पेट में पीड़ा होती है। पेट में शूल की बीमारी होती है।
पंचम् स्थान प्रारब्ध का है इस स्थान में शुक्र शुभ हो तो समझे किपूर्वजन्म में भी वह वणिक था तथा एशो-आराम के सभी भौतिक सुखप्राप्त थे।
उपाय - 1. इन्द्राक्षी स्त्रोत का पाठ शुक्रवार को करें। 2. शुक्र के दिनगुरू के अच्छे चौघड़ियें में नीम के तने के नीचे लक्ष्मी नारायण स्तोत्र कापाठ करें।
6) शुक्र छठे होने ते हर सुन्दर वस्तु का शौकीन होता है। पैसाकमाता है व खर्च भी खूब करता है। शत्रु उत्पन्न होते है और नष्ट भी होजाते है। मगर तुरन्त ही दूसरा आंतरिक शत्रु उत्पन्न हो जाता है। उसकेअन्य स्त्रियों से सम्बन्ध होते है। पत्नी के सुख में कमी आती है।ननिहाल पक्ष से सम्बन्ध अच्छे रहते है। मामी से आन्तरिक सम्बन्ध होता है।
यदि शुक्र नीच, पापग्रहों से ग्रस्त व अस्त हो तो मूत्र रोग का योगबनता है। अन्य स्त्री के सम्पर्क से गृह कलह होगा क्योंकि ऐसा जातकअन्य स्त्री से अवश्य सम्पर्क होता है। मगर शुक्र अस्त होने पर सभीफल निष्फल होते हैं। नीच का होने पर अवश्य होते है। यदि मंगलशामिल हो तो फल से ओर भी बढ़ोतरी होती है। यदि गुरु की दृष्टि उसपर होती है तो पाप फल में कमी आती है।
उपाय-1. शुक्र का यंत्र बनावे भोजपत्र पर बनाकर गले में धारण करें।
2. हीरा धारण करें। 3. शुक्र स्रोत का नित्य पाठ करें। शुक्रवार का व्रतव खीर का भोजन करें।
7) शुक्र सप्तम् में उच्च व मित्र क्षेत्रीय होने से स्त्री सुख प्राप्त
होता है। शुक्र को बुध, गुरु, चन्द्र देखते हैं तो स्त्री सुन्दर या पुरुष सुन्दरमिलता है। पति व पत्नी में सहभागिता अच्छी रहती है। स्त्रियाँ इसे देखमोहित होती है। पुरुष काम-क्रीड़ा में निपुण होता है। चतुराई से अन्यस्त्री सम्पर्क में आती है। मगर स्वयं की स्त्री को भनक तक नहीं होती है।स्वयं की स्त्री को भी अतिप्रेम करता है। हर बात छुपाकर रखता है।
यदि नीच, मंगल के साथ शुक्र हो तो पुरुष हो तो वैश्या से भीसम्बन्ध रखता है। राहु से सम्बन्ध हो तो विधवा स्त्री से सम्पर्क होता है।स्त्री हो तो अन्य कई पुरुषों से सम्पर्क होता है। वह स्वयं के पति सेमानसिक, शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं होती। तलाक तक की नौबत आजाती है। द्विभार्या योग बनता है। इसके लिए मांगलिक कुण्डली होती हैतथा सप्तम में शुक्र पापग्रहों से सम्बन्धित हो तो द्विभार्या योग बनता है।उपाय - स्फटिक लिंग पर दूध का अभिषेक करावें। उस दूध का कुछभाग स्वयं पीवे (शुक्र कमजोर है)। दूध को प्रसाद रूप में पीना शिवपुराण में भी लिखा है। श्लोक - रुद्रभुक्त भुज्जोयाद्ुद्रपीतंपिवद्ुद्राधातं जिध्नेदिति (वृहज्जावालोपतिषद)
हर शुक्रवार को शिव पर चंदन केसर को चढ़ावें।
8) शुक्र अष्ठम् में होना शुभ व अशुभ दोनों ही फल प्रदानकरता है। नीच व पापग्रहों से सम्बन्ध होने पर स्त्री हो या पुरुष बदनामीका योग निश्चित होता है। उसे मूत्र सम्बन्धी बीमारी होगी। हिरणीयासम्बन्धी बीमारी तथा ऑपरेशन होगा। भगचुम्बन योग बनेगा। अन्यस्त्रियों से सम्बन्ध या उनकी तरफ आकृष्ट होता है। लेकिन गुरु कीदृष्टि से सभी फल 60 प्रतिशत कम हो जाते है। मंगल साथ व राहु साथहो तो फल में विशेष बढ़ोतरी होती है।
शुक्र नीच तथा मंगल व राहु साथ हो तो जातक भगचुम्बन करनेवाला तथा स्त्रियों में आशक्त रहता है। 18 वर्ष के पहले ही अन्य स्त्रीसे सम्पर्क होता है।
उच्च का शुक्र का होने पर जानवरों से सुख प्राप्त करता है। आयुदीर्घ होती है। कभी विशेष घमण्ड से लोग दूर होने लगते है।
इसे रोग घेरे रहते है। कमर दर्द व गुप्त रोग निश्चित होता है।
करें।अग्नि कोण की तरफ मुख करके दुर्गा का यह मंत्र का नित्य पाठश्लोक :- ॐ एँ हीँ क्लीँ चामुण्डा यै विच्चे
2. चाँदी की अंगुठी पर शुक्र यंत्र बनाकर पहनें।
9) शुक्र नवम् स्थान में उच्च, स्व, मित्र क्षेत्रीय हो तो वहभाग्यवान होता है। शुक्र किस अवस्था में है इसका भी ध्यान रखनाचाहिये। यदि वह वृद्धावस्था में है तो फल में कमी आती है।
शुक्र का भाग्य में उच्च होना या मित्र क्षेत्रीय होने पर वर्ष 25 व 27बीच भाग्य उदय होता है। वह जातक का नाम आस-पास गांवों वशहरों तक होता है। शुक्र उच्च का मीन का होता है। साथ भाग्येश गुरुहुआ वह त्रिकोण में है तो सोने पे सुहागा होता है। वह बहुत पैसे वालाहोता है। जिससे जातक वैद्य, डॉक्टर होता है। कई मंत्रों द्वारा रोग का
उपचार करते हैं। ऐसा जातक उच्च के शुक्र में देखे गये है। यह जातक
का प्रभाव सब जगह होता है। बैंक मैनेजर या उधार रुपये देने वालाहोता है।
यदि शुक्र नीच, शत्रुओं से घिरा हुआ हो तो अच्छे कर्म नहीं करतेवाला तथा ठग भी होता है। मीठा बोलकर पैसा कमाता है। उसे यशप्राप्ति नहीं होती है। नौकरी में अर्थदण्ड मिलता है।
उपाय -(1) आसोज वद 8 से लक्ष्मी का ब्रत (स्त्री) पूजन कर खीरव खाजे का भोजन करना चाहिये।(2) शुक्रवार का ब्रत रखें। (3)स्वयं की जन्मतिथि के दिन 9 स्त्रियों को सुहाग का सामान देवें। जिससेलक्ष्मी प्रसन्न होती है।
10) दसवें शुक्र उच्च, स्वग्रही तथा मित्र क्षेत्रीय होने पर नौकरी मेंजातक राज्य में उन्नति होती है। अफसर मेहरबान होते है और अंधाकरने वाला होता है तथा उसका कारोबार बढ़ता रहता है।
शुक्र से भौतिक सुख की प्राप्ति होती है। स्त्रियों से लाभ होता है।अपनी बढ़ाई में उसे विशेष आनन्द आता है।
यदि पुत्र न हो तो उसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाना चाहिये। शिव पर घीका अभिषेक करें। ऐसा व्यक्ति धन प्राप्त करने के लिए अनेकों उपायकरता है। ऐसा होते हुए भी हाथ पर यमराज बैठे होने के कारण दानदक्षिणा में विश्वास कम करता है। ऐसा व्यक्ति भ्रमित होता है। प्रसिद्धिहोने पर वह खुश रहता है। स्त्री सात्विक होती है। स्त्री सुशील होती है।विवाद करने वाला होता है। संस्थाओं व उत्सवों में भाग लेने वालाहोता है। स्त्री के भी ये ही फल समझने चाहिये। माता की मृत्यु पहलेहोती है। कुछ उम्र बीत जाने पर ऐसा महसूस करता है कि विवाह करनाव्यर्थ है। चक्कर अधिक आते है।
शुक्र नीच व शत्रु क्षेत्रीय हो तो वंश में विवाद करने वालामाता-पिता के सुंख में कमी उत्पन्न करता है। व्यापार में हानि व्यापार मेंपैसा उधार लेने के बाद चुकाना मुश्किल होता है। आस्तिक व नास्तिकदोनों रहते है। स्वयं के घमण्ड से कार्य असफल होता है। राज्य में कुछपरेशानियाँ उठानी पड़ती है तथा यश नहीं मिलता।
उपाय - पद्मावती का पूजन करें। हर शुक्रवार को दूध के पेड़े भोगलगावें तथा लाल ड्रेस देवी को अर्पित करें या नवरात्रि में नौ दिन व्रतरखकर नौ कन्याओं में खीर या भोजन करावें।
11) शुक्र ग्यारवें उच्च, स्व या मित्र क्षेत्रीय हो तो लग्न में हो तोअपने हाथ से मकान बनाता है। व्यापार में होशियारी से कार्य करें। बड़ेभाई व बड़ों का आदर करना चाहिये। स्त्रियाँ उस पर विशेष मोहितहोती है। शुक्र मंगल के साथ हो तो स्त्रियाँ उस पर मोहित होती है।
ग्यारवें स्थान के विशेष फल लाभदायक का होता है।नौकर-चाकर होते है। स्वर्णकार हो तो सोने-चाँदी व जौहरी का व्यापारकर पैसा कमाता है। चिंता ज्यादा रहती है। मित्र भी अच्छे होते है।विवाह नजदीक में होते है। शुक्र व बुध होने पर स्थिति विपरित होती है।शुक्र गुरु से सम्बन्ध के लाभ होता है।
शुक्र नीच व पाप ग्रहों के साथ हो तो लाभ की जगह हानि मित्रों सेघोखा स्त्री से चिंता तथा बड़ा भाई से विवाद होता है। कई यत्न करनेपर भी पैसा नहीं टिकता।
उपाय -(1) भोजन करતे समय पानी चाँदी की ग्लास में पीये। भोजनके बाद पानी की ग्लास को रात भर उल्टा ही रहने देवे। (2) शुक्र यंत्रकी नित्य पूजा केसर से करें। (3) ॐ श्री हीं श्रीं कमलालये प्रसीदप्रसीद श्री ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। निम्न मंत्र की एक माला कमल गट्टेसे फेरे।
नोट-दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन कर इस मंत्र की खीर से आहुति देवे।
13) शुक्र बारवें स्थान में उच्च, स्व या मित्र क्षेत्रीय हो तो वहनौकरी में उच्च पद प्राप्त करता है। शुभ खर्च करने वाला होता है।बारहवां स्थान पिलंग स्थान कहलाता है अर्थात् घर में सभी प्रकार कीसुख-सुविधा सुख भोग की वस्तुए होती है। स्त्री सुख की प्राप्ति होतीहै। मगर नैत्र में कमजोरी आती है।
शुक्र नीच का हो तो भी जातक पैसा खूब खर्चता है। एलिजाबेध
के भी शुक्र नीच का द्वादश में था। शुक्र नीच ऐशो आराम करवाता है।
मगर किसी न किसी प्रकार का व्यसन जरूर करवाता है। चाहे पुरुष हो
या स्त्री काम वासना में अपना मन अटका रहता है।
उपाय -(1) कामाक्षी देवी की पूजा करें। (2) हर शुक्रवार को वरत
रखे। महालक्ष्मी का पूजन करें। हल्दी की गांठ सामने रखें। दूध कीमिठाई का भोग लगावें।
शनि
1) शन उच्च, स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय होने से मनुष्य के स्वभाव
में सनक रहती है। स्थिर सम्पत्ति का योग बनता है। तृष्णा बनी रहती है।नाक व बगल में कुछ रोग होता है। शनि लग्न में होने से कुछ आलसीभी होता है। अकेला भ्रमण करेगा तो आन्तरिक भय रहेगा। डिपरेशनकी बीमारी का योग बनता है। यदि मंगल साथ हो तो लोहे द्वारानिश्चित ही आघात पहुंचता है। स्त्री से विचारों में अन्तर या स्त्री बिमारहोगी। गुप्तेन्द्रीय में पीड़ा का योग बनता है। शनि की दशा हो तो व्यापारमें उतार-चढ़ाव आयेगा। पिता को पीड़ा होगी। मित्र से विवाद होगा।शनि नीच शत्रु क्षेत्रीय व पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो स्वभाव में गुस्सारहेगा। पैसे की तृष्णा बनी रहेगी। विवाद व झगड़े में रुचि रहेगी।सहनशक्ति कम रहेगी। स्वयं के आलस्य से नुकसान उठाना पड़ सकता है। मन में दूसरे के प्रति नीचा दिखाने में आनन्द आयेगा। पिता सेविचारों में अन्तर रहेगा।
उपाय -काले घोड़े की नाल की अंगुठी बनाकर शनिवार को पहनें याहाथ में स्टील या लोहे का कड़ा धारण करें।
2) शनि द्वितीय स्थान में उच्च स्व व मित्र क्षेत्रीय होने परजातक स्पष्टवकत्ता होगा। धन संग्रह की हर समय चिंता रहेगी। कुटुम्बपर खर्च करने वाला होगा। हैण्डीक्राफ्ट में लाभ जिसमें लोहे सम्बन्धीधंधे में काम अर्थात् धातु सम्बन्धी कार्य भी करता है। बड़े व्यापारी काव्यापार विदेशों तक होता है। वाहन सुख भी मिलता है। शनि व मंगलशामिल हो तो कुटुम्ब से विचारों में अन्तर रहेगा। विद्यार्थी हो तो जिसविषय में भर्ती हुआ उसे छोड़ने की इच्छा रहेगी। कुटुम्ब पक्ष हानि कायोग बनता है।
शनि व शुक्र शामिल हो तो पिता की मृत्यु के बाद या पिता के घरसे दूर रहने पर उसका भाग्योदय होगा। पापग्रह के साथ शनि हो तोद्विभार्या योग भी बनता है। स्त्री बिमार रहती है। इसके साथ सप्तमेश 6व 12 या 2 में हो तो स्त्री की मृत्यु 53 से 55 वर्ष में होती है। शनि मंगलकी दृष्टि सम्बन्ध से भी वर्ष 28 में आजीविका करने वाला लेकिन वर्ष30 से 32 के बीच स्थाई जीविका करने वाला होता है।
उपाय - (1) अष्ट धातु की अंगुली मध्यमा में धारण करें। (2)
मंगलवार को सुन्दरकांड का पाठ करें।
३) शनि तीसरे स्थान से उच्च, स्व ग्रही या मित्र क्षेत्रीय हो तोमित्रों की संख्या विशेष रहती है। बड़े आदमियों से मुलाकात होती है।शनि तीसरे होने से भाग्य में रुकावट पैदा करता है। धन्धे में सफलता मेंकमी आती है। स्वयं अति परिश्रम करने पर भी सुख में कमी रहती है।तृष्णा नहीं मिटती है। स्वयं के कटुवचन से नुकसान का योग बनता है।भाई से भी विचारों से अन्तर रहेगा।
यदि शनि नीच, पाप ग्रहों से ग्रंस्त हो तो घूमकर पैसा कमाने वालाहोता है। क्रूर ग्रहों से उसे बिमारी होती है। गले के नीचे नशों में तनावरहता है। कन्धे में पीड़ा होती है। हाथ ऊपर निचे करने में भी पीड़ा होतीहै। मंगल राहु सूर्य शनि को देखते है तो अपने विरोध मित्र को त्यागनापड़ता है। घर में मानसिक शांति नहीं मिलती। अपने पराक्रम से शत्रुओंपर विजय होती है। मगर घर के शत्रु ज्यादा तकलीफदेह होते हैं। छोटेभाई से सम्बन्ध विच्छेद या उसकी मृत्यु होती है। (शनि मंगल केसम्बन्ध में) स्त्री के शनि होने पर तथा शनि मंगल देखने से भाई कीमृत्यु नहीं होती। केवल भाई से वैमनस्य बना रहता है।
उपाय -(1) लोहे के बर्तन में सवा किलो उड़द काले कपड़े में बांधकरशनि भगवान को चढ़ावे। (2) शनिवार के दिन कोईली के पुष्य शिवपर चढावें।
4) शनि चौथे स्थान में स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय हो तो कम मेहनतसे कमाने वाला होता है। कभी जातक गोद भी जाते है। आजकल गोदका सिलसिला न होने से शनि उच्च का होने से उसे कम मेहनत में धनकमाता है। माता-पिता से प्रेम रहता है। वाहन-सुख होता है। प्रसिद्धीहोती है। यह चौथे स्थान से शनि कुम्भ या मकर का हो तो वह बहुतधन कमाता है।
शनि नीच शत्रुक्षेत्री हो तो जातक को बहुत कष्ट उठाने पड़ते है।मित्र व बन्धु हर तरह से घाटा देने वाले होते हैं। पैतृक सम्पत्ति नहींमिलती है। यदि मिलती तो वह बिक जाती है। शनि से माता को कष्टभुगतने पड़़ते है।
नोट:शनि चौथे होने से वह जातक पूर्वजन्म में पूर्ण आराम भुगतने करइस जन्म में कष्ट भोगने आता है। वर्ष 58 से 68 में पत्नी की मृत्यु तुल्यकष्ट होता है। पैरों में चोट आयेगी।
उपाय -एक प्लाश में पत्ते पर 4 साबुत उड़द लेवें। उस पर एक चम्मचदही डाले तथा उस सिन्दूर व 1 रूपया रोकड़ रखकर शनिवार के दिनपीपल के थान में रखें।
5) शनि पंचम् स्थान में होने से उच्च, स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय होतो जातक विद्या में निपुण होता है। मगर गति धीमी होती है। कुम्भ काशनि या उच्च का शनि हो तो एक पुत्र अवश्य होता है। मगर अधिकतरपहले पुत्री होती है। उसके पेट में घाव होगा तथा शूल अवश्य होगा।शनि मंगल का सम्बन्ध हो तो सन्तान की चिंता बनी रहती है। पूर्व जन्ममें के हिसाब से वह पूर्व जन्म में कष्ट भुगतकर शेष कष्ट इस जन्म मेंभुगतने आया है। स्वयं की प्रसिद्धी होती है। पैसो में उतार-चढ़ाव आताहै। वह पूर्ण नास्तिक होता है न नास्तिक। कभी-कभी स्वयं के गलतनिर्णय से उसे बहुत दुःख होता है। शनि पंचम् में कभी अन्य सम्बन्धियोंसे या अच्छे मित्रों से पैसा आता है। शनि पंचम् में अशुभ हो तो किसीप्रकार का सट्टा न करें। जिसमें शेयर बाजार भी शामिल है।
शनि नीच शत्रु क्षेत्रीय हो तो संतान से विचारों में अन्तर कुटुम्बपक्ष विरोधी। स्त्री की संतान की ओर विशेष झुकाव होता है। पेट मेंपीड़ा तथा ऑपरेशन योग बनता है। शनि उच्च का तथा पाप ग्रह साथहो तो प्रथम पुत्र से ही सुख की आशा होती है। दूसरे की मुंह पर प्रशंसावह पीछे निन्दा करने वाला होता है। जातक मजिस्ट्रेट, सर्जन, बाबू यानर्स आदि होती है।
उपाय-शनि भगवान के चरणों पर तेल का अभिषेक व शनि स्त्रोत कापाठ करें।
6) शनि छठे उच्च स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय होने से या शनि नीच काया शत्रु क्षेत्रीय है वह जातक शत्रु पक्ष में भी अपना कार्य कराने वाालाहोता है। नीच का होने पर यदि राजनेता तो राजनीति में निपुण होता है।
अपने बल पर जीतने वाला होता है। उसके चर्चे दूर-दूर तक होते हैं।मंगल से युक्त या चन्द्र से युक्त हो तो श्वास सम्बन्धी बीमारी होती है।उसके नशों सम्बन्धी पीड़ा होती है। अर्थात् पैरों में चोट या दर्द होता है।उच्च का हो तथा पाप ग्रह से ग्रस्त न हो तो मामा को लाभ होता है। शत्रुक्षेत्रीय व पाप ग्रहों से ग्रस्त हो तो जन्मते ही ननिहाल पक्ष में हानि होतीहै। नाभि के नीचे अंग में पीड़़ा होती है।
उपाय-(1) यदि जातक रोगी हो तो पानी के अन्दर काले तिल, खस,
लोबान, 2 मरेटी (मुलेटी), 3 ताले फिर ठण्डा पानी कर स्लान करें।
(2) लोहे के बर्तन में तिल व चिपीया (चिमटा) अन्दर रखकर शनिअमावस्या को शनि भगवान के मंदिर में चढ़ावें।
7) शनि सातवें स्थान में उच्च मित्र क्षेत्रीय हो तो स्त्री श्रेष्ठ भीमिलती है। उनके आने से भाग्योदय होता है। शनि उच्च का पत्नी केसहयोग से लाभ होता है। शनि मंगल का सम्बन्ध हो तो लाभ होगातथा लग्न में भी पापग्रह हो तो द्विभार्या योग बनता है या विवाह भीनहीं होता है।
शनि नीच व पाप ग्रहों से ग्रस्त होता है तो स्त्री के विचारों से घरनरक बन जाता है। वह स्वयं घर तयागने की इच्छा रखता है।न तो घरत्याग सकता है न ही शांति मिलती है। वह उम्र भर संताप से ग्रस्त रहताहै।
शनि शुभ उच्च कुम्भ का हो तो तथा गुरु व शुक्र या बुध की दृष्टिहो तो या शामिल पड़े हो तो निश्चित ही स्त्री आने से प्रसिद्धी होती है।मांगलिक कुण्डली होने पर व शनि मंगल का सम्बन्ध होने पर नौकरीलगना हर कार्य में प्रसिद्धि होती है। शुक्र होने पर व अन्य स्त्रियों से यास्त्री हो तो अन्य पुरुष से सम्बन्ध होता है। शनि चन्द्र का सम्बन्ध सेसुख प्राप्त नहीं होता है। शनि शुभ हो तो राजकार्य में फायदा निश्चितहै।
उपाय - (1) जहाज के कील की अंगुठी बनाकर मध्यमा अंगुली मेंधारण करें। (2) काले चने उबालकर फिर तेल लगाकर शनिवार केदिन शनि के चरणों में चढ़ावें।
8) शनि अष्टम् में होने से उच्च स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय हो तोआयु दीर्घ होती है। कुटुम्ब से विचारों में अन्तर रहता है। अपने हीसम्बन्धी आंतरिक विरोधी हो जाते है। विदेश योग भी बनता है। विवाहमें देरी करता है। यदि मंगल व शनि शामिल हो तो डबल मांगलिककुण्डली कहलाती है। इसमें विवाह 24 वर्ष 6 माह तक विवाह करें तोश्रेष्ठ है अन्यथा 28 वर्ष के बाद होगा। पैरों में चोट शनि की दशा मेंनिश्चित पैरों सम्बन्धी बीमारी का योग बनता है। शुभ ग्रहों सम्बन्धितहो तो हैण्डीक्राफ्ट धंधे में फायदा।
नीच का शनि व पापग्रहों के ग्रसित हो तो गुदा में कुछ तकलीफहोती है। विदेश योग बनता है। विदेश में कुछ पीड़ा होगी। राहु शामिलहो तो किसी अंग की शारीरिक हानि का योग बनता है। सर्पभय भीहोगा। धंधे से ज्यादा नौकरी करना उचित रहेगा। वर्ष 32, 54 व 75कष्टमय होगा। वायु का प्रभाव शरीर पर होगा।
उपाय -(1) शनि यंत्र का पूजન कर पानी में बहा देवें। (2) शनि काजाप करें फिर 1.1/4 गज काला कपड़़ा उसमें 1.1/4 किलो तिल व अन्दरकुछ सुवर्ण, 1 चाकु डालकर दान करें।
9) शनि नवम् स्थान में उच्च, स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय हो तो वहजातक भाग्यशाली होता है। दूसरों को हृदय के दुःख को समझने वालाहोता है। कभी-कभी उसे संसार से विरक्ति की इच्छा होती है। कटुवचन बोलने वाला होता है। धर्म में पूर्ण विश्वास करने वाला होता है।कुटुम्ब को साथ लेकर चलने वाला होता है। लोहे सम्बन्धी धंधा करनेवाला होता है। भाग्य वर्ष 36 से 38 के बीच में है। लोग उसे धनवान समझते है। भाई व बहनों से विचारों में अन्तर होता है। इसके पूर्व जन्मभी अच्छा व इस जन्म में भी वह प्रसिद्धी प्राप्त करता है।
शनि नीच व पाप ग्रहों से ग्रस्त रहे तो भाग्योदय देरी से होता है।उसे मेहनत का फल प्राप्त नहीं होता है। स्वयं की बोली से सभी कार्य मेंअड़चन आयेगी। वर्ष 34 से 36 तक खार्च अधिक होता है। शनिकमजोर होने से शारीरिक स्थिति भी कमजोर होगी। वह धर्म मेंविश्वास करता है। मगर दिखावटी करता है। लाभ में भी कमी करताहै। बड़े भाई को पीड़ा देता है। पेट में वायु का प्रभाव रहता है।
उपाय - (1) 3 कैरेટ का નीलम धारण करें, નीलम लाल झाई न होमध्यमा अंगुली में पहनें। (2) पंच धातु की अंगुली मध्यमा अंगुली मेंधारण करें।
10) दशम् स्थान में शनि उच्च स्वग्रही व मित्र क्षेत्रीय हो तो वहनौकरी करने वाला या धातु सम्बन्धी व्यापार करने वाला होता है।नौकरी में पैसे का लेन-देन करने वाला होता है। पंचमेश मजबूत है तोवह मजिस्ट्रेट व प्रशासनिक अधिकारी होता है। इसके लिए यह विशेषध्यान रखने वाली बात है केवल शनि जब तक नवें शनि शुभ इसकेसाथ में पंचमेश मजबूत हो तो वह बड़ा व्यापारी होगा। अच्छे पद कोप्राप्त करेगा। शनि बारहवें होने पर तथा चतुर्थेश कमजोर हो तो माताका सुख उसे प्राप्त नहीं होता है। गाय का दूध पीना पड़ता है। माता केस्तन में दूध प्राप्त नहीं होता है। या उस स्थान पर पीड़ा हो जाती है।पापग्रह से चतुर्थ भाव ग्रस्त शनि भी पूर्ण दृष्टि से माता को मृत्यु तुल्यकष्ट भोगना पड़ता है। कभी-कभी मृत्यु भी हो जाती है। मृत्यु शब्दकहने से पहले पूर्ण कुण्डली का अध्ययन कर जवाब देवें। दशा काअध्ययन भी जरूरी है। जमीन जायदाद होती है। खेती में भी लाभ होताहै। 25 से 26 के बीच में तीर्थ यात्रा या लम्बी यात्रा करनी पड़ती है।
नीच का शनि माता को पीड़ा व हमेशा माता को चिंता रहती है। व्यापारमें हानि व पिता से भी दूर रहता है। व्यापार में घाटा। नौकरी मेंनिलम्बित चार्जशीट मिलती है। निलम्बित होता है। शनि पापग्रहों सेग्रस्त हो तो इसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। वाद विवाद से या गलतनिर्णय से कोर्ट कचहरी आना जाना पड़ता है। पैतृक सम्पत्ति के लिएबहुत कष्ट उठाना पड़़ता है।
उपाय - (1) लोहे के बर्तन में 1.1/4 किलो तेल ड़ालकर शनि भगवानको चढ़ावे। (2) शिव पर आम के फलों के रस से रूद्राभिषेक करने परराज्य में शांति तथा दण्ड से वंचित हो जाता है।
11) ग्यारहवें होने पर उसे व्यापार से लाभ होता है। सवारी सुखमिलता है। यह ध्यान रहे दसवां स्थान में कोई शुभ व दशमेश शुभस्थानों में बैठा है तो वह जातक अच्छा पैसा कमायेगा। प्रसिद्धी होगी।स्थिर सम्पत्ति रहेगी। प्रथम संतान से चिंता तथा पुत्र से विचारों में इतनाअन्तर रहेगा कि वह दूर रहना ही पसंद करेगा। शनि के कारण जातकबहुत ही चालाक होगा। मगर दया भी होगी। बचपन से शारीरिक व्याधिरहेगी। उसे जानवरों से लाभ। खेतीहर से पूर्ण लाभ, क्रोध भी आता है।
शनि नीच में होता भी लगभग यही फल है। व्यापार में कुछ उतारचढ़ाव रहता है। विद्या में अचानक रुकावट का सामना करना पड़़ता है।पैर में बिमारी का योग बनता है। कन्धें में पीड़ा योग है। बड़े भाई सेकुछ विवाद व विचारों में अन्तर रहेगा।
उपाय -(1) नीलम 5.1/4 रति का अंगुली में धारण करें। (2) शनिमंदिर में लोहे का दरवाजा रेलिंग या अन्य कोई ऐसी लोहे की वस्तु जोमंदिर के कार्य में आवश्यक है। (3) शनिवार का व्रत व तेल लगाकररोटी काले कुत्ते को दें।
12) शनि बारहवें स्थान में उच्च का स्वग्रही मित्र क्षे्रीय हो तोवह शुभ खर्च करने वाला होता है। मंगल व शनि शामिल हो तो व्यथ्खर्च करने वाला होता है। व्यसन भी कर सकता है। यदि शुभ ग्रह नदेखें तो तीखा भोजन करने की इच्छा रखता है। गलत कार्यों में इच्छारहती है। विदेश गमन भी होता है। गांव या शहर में जातक मुखिया केरूप में होता है। अर्थात् उसके निर्णय लोग मानते है।
नीच का शनि होना शरीर हेतु कमजोर है। वर्ष 50 तक बाद घुटनेमें पीड़ा। पसली में दर्द होगा। संगत अच्छी नहीं होगी। मित्रों के साथदुविधा में फंसना पड़ता है। इसलिए मित्रों से सावधान रहे। पैसा शामिलनहीं होता है। खर्च की अधिकता से कभी-कभी बहुत दुःखी होता है।कुत्ता काटना या किसी पशु से चोट आती है। झूठे मुकद्दमें से परेशानीहोती है। मगर उसके साथ नवें स्थान व पांचवा स्थान कमजोर हो तोभी हो सकता है। शनि बारहवें आध्यात्मिकता में रूचि होती है।
उपाय-लोहे की थाली में शनि की मूर्ति लोहे से बनी हुई हो। उसकापूजा करें। इमरतियाँ या मीठा भोग लगावें। उड़द चढ़ावें फिर उस थालीको जंगल में जाए जमीन में गाड़ देवें।
राहु
1) राहु लग्न में होने से जातक को सोचता है वही करता है। दूसरे
का कार्य अपना समझ कर करता है। स्त्रियों की ओर आकर्षण होता है।यदि नीच व शत्रु क्षेत्रीय हो तो चिंता घेरे रहती है। सिर पर फोड़े फुंसी भीहो जाते है। सिर दुखता है, मुख पर दाग होता है।
उपाय - गणपति के हर बुधवार दर्शन करें। लड्डु चढ़ावें।
2) दूसरे स्थान से राहु होने से कुटुमब में कुछ परेशानी तथा उसमें विचारों में अन्तर रहता है। वाद-विवाद में होता है।स्री को पीड़ा होतीहै। धन नाश यानि पैसा शामिल नहीं होता। विदेश जाना इसके लिएपूर्णत लाभदायक है। रुकावट से आगे बढ़ता है। शुभ-अशुभ दोनोंप्रकार के फल देता है। उच्च मिश्न क्षेत्रीय होना 50 प्रतिशत शुभ फलप्रदान करता है। किसी की बात नहीं मानता है। डेयरी में लाभ वजानवरों से लाभ होता है।
उपाय - ताम्बे या चाँदी का नाग बनाकर उसका पूजन कर शिव-लिंगपर चढ़ावे। धतुरा भावण मास में शिवरात्रि पर चढ़ावें।
3) तीसरे स्थान में राहु होने पर पराक्रमी होता है। उसमें सामनेशत्रु नहीं टिकते है। शत्रु उसकी प्रशंसा करता है। शत्रु पर विजय प्राप्तकरता है। मुकद्दमें में अपने ताकतों से विजय प्राप्त करता है। भाईबन्धुओं से कष्ट मिलता है। छोटे भाई से विचार नहीं मिलते। राहु कीदशा हो तो भाई को भी पीड़ा या बिमारी व स्वयं के हाथ या जोड़ों मेंचोट या दर्द होता है। पैसा उधार दिया हुआ डूब जाता है।
उपाय -
4) चौथे स्थान पर राहु होने पर माता को कष्ट या माता सेविचार नहीं मिलते। सुख में कमी आती है। एक जगह मन नहीं लगताहै। किसी से भी अकारण ही झगड़ा करने वाला होता है। घमण्डी होताहै। पशुओं से लाभ नहीं होता। वर्ष 48 से 52 में लाभ होता है। यदिशनि मंगल सूर्य के साथ हो तो किसी में फंसता है या बदनामी भी होतीहै। वर्ष 5 में माता पिता किसी एक को कष्ट होता है।
उपाय - सांप की बांबी से मिट्टी लाने तथा उसे रंग बिरंगे कपड़े मेंलाकर तिजोरी में रखें।
5) राहु पंचम् स्थान में होने से पेट में पीड़ा का योग होता है। पुत्र
या पुत्री सम्बन्धी चिंता उनसे वियोग अर्थात् माता-पिता से दूर रहता है।
यदि राहु की महादशा आयेगी तो संतान को पीड़ा व अन्य प्रकार केकष्ट आयेंगे। शारीरिक सुख में बाधा उत्पन्न होती है। पुत्र प्राप्त होताहै। स्त्री हो व उसके राह पांचवें है। उस पर शत्रु पापग्रह से ग्रस्त है।संतान स री से होती है। कभी-कभी 4 या 5 माह का गभृपात भी होताहै। या प्रथम संतान की मृत्यू हो जाती है। कभी-कभी केश में भीतकलीफ उठानी पड़ती है। एकरुकावट भी आती है। सर्प दोषसंतान का कष्ट या संतान नहीं होती या देरी से होती है।
उपाय -(1) घर में नाग देवता की तस्वीर ग मूर्तियाँ रखें। उसकी पूजाकरें। (2) नाग पंचमी को नाग का पूजन तथा प्रसाद चढ़ावें। पूजा सेपुत्र प्राप्ति होती है। (3) किसी मंदिर या देवभूमि में आम वृक्ष लगावें।
6) राहु छठे स्थान में होने से ननिहाल पक्ष में मामा को पीड़ा याहानि होती है। राहु का चन्द्र साथ हो तो वर्ष 8 तक बच्चे को पानी से दूररखें। शत्रु पर अपना प्रभाव रहता है। वहाँ उसे वहम रहता है। मेहनत काकार्य करता है। बचपन में बिमारी होती है। सौम्य ग्रह देखते हो तो रोगनष्ट होता है। राहु के साथ पाप ग्रह हो तो मामा को पीड़ा या शारीरिकक्षति होती है।
मामा की कुण्डली में दशा व ग्रह मजबूत हो तो मामा व भांजे कासम्बन्ध समाप्त हो जाता है। ननिहाल से फायदा नहीं होता है। यदिसौम्य गृह देखते है तो मामी से प्रेम तथा ननिहाल से फायदा होता है।
छठे स्थान का पति दूसरे तथा छठे का पति पाप ग्रह से साथ हो तोबचपन में ही मामा या नाना की मृत्यु हो जाती है। मासी को भी पीड़ाहोती है।
उपाय-1. साल की लकड़ी के गणपित बनावें तथा पूजन करें या राहुयंत्र की पूजा कर गंगा या नदी में बहा देवे।
7) राहु सप्तम् में होने से स्त्री के विचार नहीं मिलते। राहु के साथ मंगल व शनि तथा सूर्य की दृष्टि हो सौम्य ग्रह नहीं देखते हो तो
तलाक हो जाता है या स्त्री की मृत्यु हो जाती है। स्त्री का स्वभाव भीतेज होता है। हमेशा कटु वचन बोलने वाली होती है।
पति व पत्नी से नित्य विवाद होता है। शांति नहीं रहती। घुटने कादर्द होता है।
राहु के साथ शुक्र मंगल हो तो स्त्री के अन्य पुरुषों से सम्बन्ध होतेहैं।
पूर्व जन्म में किसी स्त्री की हत्या से यह साबित होता है तो स्त्रीसुख नहीं मिलता। अपने से उम्र से बड़ी स्त्री से शारीरिक सम्बन्ध बनतेहै। नित्य रोजगार में भी कमी रहती है।
उपाय - बुधवार के दिन गणपति के लगा हुआ पान चढ़ावें। (मसालेसहित)
8) राहु अष्टम् स्थान में होने से उस व्यक्ति से कुटुम्ब सेसम्बन्धों में कड़वाहट उत्पन्न होती है। पैतृक सम्पत्ति मिलने में अड़चन।राहु धन का होने से पैसा खूब मिलेगा मगर पैर में चोट का योग बनेगा।हर कार्य में शीघ्रता करने वाला होता है। वर्ष 45 में पीड़ा वर्ष 60 मेंपरेशानी व कुटुम्ब से हानि। वर्ष 32 में रोग का योग
उपाय - (1) बुधवार को गणपति पर दूध से गणपति अथर्वशीर्ष कापाठ करें। (2) बुधवार के दिन गणपति को खजूर चढ़ावे। (3) खजूरकी बनी मिठाई चढ़ावें।
9) नवम् स्थान में राहु अच्छा फल देता है। बड़े आदमियों सेमुलाकात होती है। वह चतुर होता है। तीर्थ यात्रा तथा भगवान के पूर्णविश्वास से कार्य अवश्य होगा। परिजनों पर खर्च करने वाला होता है।सौम्य ग्रह से दृष्ट हो तो उसके भाग्य में नाना प्रकार के सुख प्राप्त होते है। धन राशि का हो तो विशेष फलदायक होगा। उसके नौकरी में भी
लाभ होगा। वर्ष 48 से 52 के बीच फायदा, वर्ष 16 से 28 के बीचउसके भाई को फायदा होता है।
उपाय -बुधवार के दिन सवा गज हरे कपड़े में 1%4 किलो साबुत मूंग व11 रूपये रोकड़ अन्दर फिर गणपति को चढ़ावें।
10) राहु दशम में होना जातक उच्च पद पर रहता है। यदि वहबिना पढ़ा लिखा हो तो भी नौकरी में अपने स्तर का उच्च पद प्राप्तकरता है। चिंता रहती है। शत्रु समाप्त हो जाते है। पंचम स्थान कमजोरहो तो उसे नींद की कमी तथा पिता को शारीरिक कष्ट होता है। स्वयं केजाति के अलावा दूसरी जाति वाले लाभ देता है। कालीदास ने नवम् वदशम् राहु को श्रेष्ठ माना है, कोर्ट कार्य में सफलता प्राप्त करता है।उपाय -बुधवार को हांडी में ताम्बे का सर्प डालकर ऊपर कपड़ा बांधे।फिर जमीन में गाड दे या नाग पंचमी को नाग की पूजा करें।
11) राहु ग्यारहवें होना शुभ है। मगर दशा राहु की आयेगी तोकष्ट कारक होगी। मित्रता का क्षेत्र विस्तृत रहेगा। बिना बात कीपरेशानी मोल लेता है। उसे कान में रोग का योग होता है। बड़े आदमियोंसे मुलाकात होगी। मंत्रियों तक उसकी पहुंच होगी।
उपाय -(1) यद રाहु कष्ट दें તો उपाय शिव पर शहद का अभिषेक वनाग पर तुरा लगावें। नाग का विशेष पूजन करें। (2) राहु के 11 नामलेवें।
12) राहु बारहवें होने पर क्लेश करने वाला। उसके वहम केकारण रोग की उत्पत्ति होती है। चित्त अस्थिर रहता है। आधात्म मेंलाभदायक। पेट व आँख में पीड़ा उत्पन्न करता है। खर्च अधिककभी-कभी।
उपाय-राहु स्त्रोत का पाठ करें नित्य। शिव पर पेठा (आगरे वाले)बाण व नंदी को चढ़ावे।