द्वी-गृह युति फलऔर उपाय
द्वि ग्रह योग फलानि -
1) सूर्य-चन्द्र : सूर्य-चन्द्रमा साथ होने से जातक साहसी, बलवान,क्रय-विक्रय करने वाला होता हैं। सूर्य नीच हो साथ चन्द्र हो तथा पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक की प्रतिष्ठा में नुकसान, तेज में कमी तथाधन्धे (व्यापार) में हानि होती है।
उपाय - एक पान के पत्ते पर लाल गुलाब एवं एक सफेद पुष्यशिव के वाण पर चढ़ावें।
2) सूर्य-मंगल : सूर्य मंगल साथ होने से जातक मूडी, तेजस्वी, झूठबोलने वाला और हिंसक स्वभाव का होता है। सूर्य मंगल साथ होमंगल नीच (कर्क) का हो तथा शनि से दृष्ट हो तब अचानक गुस्साज्यादा (अधिक) आता है, मन में अपराध करने की इच्छा रहती है।शरीर में चोट भी आती है। मित्रता क्षेत्र विस्तृत होता हैं।
उपाय-भोजन के समय ताम्र पात्र से जल पीये तथा सवेरे उसीताम्र पात्र के जल से मुँह धोवें इससे इसका प्रभाव कम होगा।
3) सूर्य -बुध : सूर्य-बुध साथ होने पर जातक धन संचय करने वाला,बोलने में कुशल, अतिथियों का सत्कार करने वाला, शास्त्र को जाननेवाला होता है। इसी के बुध नीच (मीन) का हो सूर्य साथ तो वाणी सेखुद का नुकसान करने वाला होता हैं। यदि मंगल से दृष्ट हो तो चर्मरोग होता है। इसी के साथ सरदर्द भी रहता है।
उपाय - बुधवार के दिन तीन मुट्ठी हरिया (मूँग) पकाकर व घीवशक्कर डालकर सूर्य उदय के समय गाय को खिलायें।
4) सूर्य-गुरू : सूर्य गुरू के साथ होने से जातक शास्त्र में निपुण, बड़ेआदमियों से मुलाकात, कई संस्थानों द्वारा सम्मानित होता है।अधिकतर प्रोफेसर, अध्यापक देखें गये हैं। इन्हें अपना नुकसान कर परोपकार करने की जिज्ञासा रहती है। सूर्य गुरू साथ है गुरू नीच(मकर) है तब विद्या ग्रहण में रूकावट अध्ययन करें, तब फल प्राप्तनहीं होता। संतान देरी से होती है अथवा संतान से पीड़ा पाता हैं।
उपाय -(1) पीतल के कटोरे में 200 ग्राम गेंदू डालकर दान करें।(2) ब्राह्मणों को धर्म-शास्त्र की पुस्तकें या पंचाग 14 जनवरी (मकरसंक्रांति) को दान करें।
5) सूर्य- शुक्र : सूर्य-शुक्र यदि शामिल हो तो जातक संगीत अर्थात्कला का शौकीन होता है। नेत्र उम्र से पहले कमजोर होते है। यदि 2-12भाव में हो तो विशेष प्रभाव करते है। कचहरी सम्बन्धी कार्य करनेवाला होता हैं। यदि सूर्य कन्या एवं शुक्र भी कन्या राशी तब किसी स्त्रीद्वारा अपमानित होता है। कोर्ट-कचहरी में पैसा खर्च होता है। स्वयं कीस्त्री पति पर शक करती है। गुप्त रोग भी होता है।
उपाय-रविवार को 5 कौड़ी लेवें, 5 दिन छाछ में भिगों देवें।वापिस शुक्रवार आए तब गंगाजल से धोकर इनका पूजन कर नदी यादरिया में बहा देवें। 2 शुक्रवार के दिन सफेद कपड़े में तीन मुट्ठी चावलबांधकर दो दिन तकिये के नीचे रख दे। रविवार को पकाकर शक्करडालकर आधा भाग सांड को आधा भाग गाय को खिलायें।
6) सूर्य-शनि : सूर्य शनि यह दोनों शत्रु है। फिर भी यह जातक कार्य मेंदक्ष होता हैं, कई विद्वान भी होते है। शनि उच्च का जिस भाव में आयेवह स्थान खराब हो जाता है। इससे पिता को पीड़ा व पुत्र को चिन्तारहती है। गर्मी में सरदर्द तथा सर्दी में पैरों को पीड़ा तथा आंतों में सूजनरहती है।
उपाय-1. शनिवार के दिन आटे का हलवा बनाकर लोहे के बर्तनमें शनि भगवान को चढ़ावें। 2. तिल से मिठाई बनाकर रविवार को सांडको या शनिवार को भैंस को खिलावें। (शनिवार को बनावें)
7) सूर्य-राहु : ग्रहण के समय फल तीव्र मिलते हैं। किन्तु प्रतिमास एक बार चन्द्र-राहु की व प्रति वर्ष एक बार रवि-राहु की युति होती है। इन के फल साधारण मिलते है। कोई भी ग्रह चन्द्र कक्षा के पात में हो उस के शुभ फल अधिक अच्छे मिलते हैंl
सूर्य राहु जहाँ भी पड़े तकलीफ ही देते है। राहु फल शीघ्रदेता है। सूर्य की दशा अच्छी जाती है तथा सूर्य की दशा कमजोर जातीहै। 10 वें स्थान राहु हो तो राहु की दशा में नाना प्रकार के लाभ होते हैं,मगर पिता से पीड़़ा रहती हैं। राहु और रवि ये दोनों शुभ राशि में अन्य ग्रहों से शुभ योग में हो तो तथा १।३।५।१०।१२ इन स्थानों में हो तो— हमेशा मान सन्मान मिलता है। बड़ा अधिकार पद मिलता हैं, सत्ताधीश होता है। स्वास्थ्य अच्छा होता है। विवाह एक ही होता है। स्त्री के साथ प्रेमपूर्वक रहते हैं। सन्तति कम होती है। धन मिलता है किन्तु पूर्वार्जित सम्पत्ति नहीं रहती, अपने कष्ट से धनार्जन होता हैं। बुध्दिमान, सावधान, नियमित, व्यवस्थित, शान्त, समाधानी वृत्ति का होता है। हाथ में लिये कार्य को पूरा करता I यथाशक्ति राजनीतिक वा सामाजिक कार्य कर के प्रसिद्ध होता है। न्याय अन्याय समझकर सत्य के लिये झगड़ता हैं। ईश्वर के सिवाय अन्य किसी से हार नहीं मानता । बरताव दयालु प्रेमपुर्ण, महत्वाकांक्षा से परिपूर्ण होता है। लोगों पर प्रभाव होता हैं किन्तु प्रेमपूर्वक, मन अनुकूल कर के कार्य करता है। यह युति २।४।६।७ १८ १९ । ११ इन स्थानों में हो तो फल साधारण मिलते हैं। २।४।७ इन स्थानों में - पूर्वार्जित धन नष्ट होता है। दो विवाह होते हैं। उद्योग में अस्थिरता रहती है। कुटुम्ब बहुत बड़ा होता है। यह युति अशुभ राशि में अशुभ ग्रह के योग में हो तो वह दुरभिमानी, कुल का झूठा अभिमान करने वाला, हठी, तामसी, दुराग्रही, आलसी, निरुद्योगी, स्वार्थी, नीच, झगड़े लगाने वाला, मुफ्त खाने वाला स्वैराचारी,अपवित्र दुष्ट बुद्धि का, लापरवाह, धूर्त, कनिष्ठों को कष्ट देनेवाला, सच झूठ में फरक न करने वाला अच्छे काम बिगाड़ने में मजा लेने वाला, अकारण विरोध व शत्रुता करने वाला होता है। दूसरों की प्रगति इसे सहन नहीं होती। बोलना बहुत कठोर व तीखा होता है। क्रोधी, चंचल, व्यसनी, पापपुण्य से उदासीन, परस्त्री में आसक्त, कामुक होता है।
उपाय-रवीबार के दिन भैरोजी की जोत रोट इमरती कचौड़ी दहीबड़ा मालपुवा चौमुखा आटे का (दीया) करें।(नोट:जिस राशी में सूर्य राहु हो उतनी ही जोत करें )
1) चन्द्र-मंगल: जिस जातक के जनम कुण्डली में चन्द्र-मंगल साथहो उसे व्यापार में लाभ तथा पराक्रमी होता है। कला का ज्ञाता, नेता होतो कुटनीतिज्ञ होता है। यदि मंगल नीच (कर्क) साथ ही चन्द्र उच्च होजातक के शरीर में रक्त की बीमारी, कलह करने वाला और माता सेविचारों में भिन्नता रहती है।
उपाय - चाँदी और ताम्बे धातु की मिश्रीत अंगुठी बनाकर तर्जनीया अनामिका में धारण करें।
2) चन्द्र-बुध : जिस कुण्डली में चन्द्र-बुध साथ हो तो वह हसमुख,
धर्म में रूचि रखने वाला, गुणवान, स्त्री का कहना मानने वाला, वक्ताहोता है।
यदि चन्द्र नीच का हो बुध साथ हो अथवा बुध नीच का चन्द्रसाथ हो तो जातक को मानसिक तनाव रहता हैं, वाणी या चर्म सम्बन्धीतकलीफ रहती है। मौसम से एलर्जी रहती हैं।
उपाय - कासी के बर्तन में शक्कर डालकर बुधवार को दान करें।
3) चन्द्र-गुरू :चन्द्र गुरू का साथ अमृत योग कहलाता है। समाज मेंप्रतिष्ठा रहती है। स्वभाव अच्छा रहता है। मित्रता में धोखा नहीं देता,कुटम्ब को आंदर देने वाला होता हैं।
गुरू मकर का व चन्द्र साथ हो तो बन्धु बान्धवों से विचारों में
अन्तर तथा सन्तान को भी पीड़ा होती हैं। ब्यापार में उतार-चदाव रहताहैं, कभी-कभी नास्तिकता आती हैं।
उपाय -1. पीले वस्त्र में सवा किलो चने की दाल डालकरगुरूवार को दान करें। 2. समचौरस चाँदी की अंगुठी में चाँद व पुखराजधारण करें।
4) चन्द्र-शुक्र: चन्द्र शुक्र साथ हो तो वह कुछ आलसी होता है, उत्तमवस्त्र तथा सुगन्धित चीजों का शौकीन होता है, कभी-कभी जातकनशे का आदी भी देखा गया हैं, व्यापार करने में भी निपुण होता है।
शुक्र कन्या का चन्द्र साथ हो तो मनुष्य अन्य स्त्रियों से आसक्तरहता है और प्रतिष्ठा में कमी आती हैं, व्यापार में हानि का योग बनताहै, शुक्र की दशा विपरित जाती है।
उपाय -1. शुक्रवार और सोमवार को सफेद चंदन का टीका करें।
2. शंख में श्वेत चावल कृष्ण मन्दिर में चढ़ावें।
5) चन्द्र-शनि : चन्द्र शनि साथ होने से धन ज्यादा खर्च होता है। चन्द्रशनि का साथ विष योग कहलाता है। इससे पुलिस सम्बन्धी केस(कचहरी) और बन्धन योग भी बनता है और अपनी उम्र से बड़ी स्त्रीसे प्रेम या उससे आसक्त रहता। कुण्डली में यदि 6, 8, 12 भाव में होतो विशेष पीड़़ा देता हैं।
उपाय-(1) 100 ग्राम सौंफ, सफेद चन्दन का टुकड़ा मिलाकरबहते पानी में शनिवार को बहा दें। (2) सवा किलो उड़द, स्फटिकपत्थर का टुकड़ा, काले कपड़े में बाँधकर जंगल में जाकर दक्षिण दिशामें गाड़ देवें।
6) चन्द्र-राहु: कुण्डली में यह ग्रहण योग कहलाता हैं। यह जिस स्थानमें यह पड़ता है, उस स्थान में हानि करता है, मानसिक कष्ट तथा माताको कष्ट होता है। 50 वर्ष के बाद हृदय में पीड़़ा। राहु और चन्द्र ये ग्रह शुभ राशि में अन्य ग्रहों से शुभ योग में हों तो विचार उच्च परिपक्व होते हैं। संकट बहुत आते हैं उन का धैर्यपूर्वक मुकाबला करता है। प्रपंच का ध्यान छोड़ कर यह समाजहित के कार्य करता हैं अतः लोकप्रिय होता है। इन्हें स्वतन्त्र व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती व्यवसाय के विपरीत मनोवृत्ति होती है। अतः संकट में कोई उपाय नहीं कर पाते । नौकरी करने की सलाह इन्हें अच्छी नहीं लगती। नीतिमान होते हैं। शान्त, समाधानी, एकतापूर्ण वातावरण चाहते हैं। इस में विघ्न हो तो। बहुत यत्न कर के दूर करते हैं बहुत निग्रही, निश्चयी, नियमित होते हैं। अन्याय के प्रतिकार के लिए राजनीतिक, सामाजिकया आध्यात्मिक दृष्टि से झगड़ा चालू रखते हैं। स्त्री अनुकूल होती है। पुत्र एक दो होते हैं, वे अच्छे और पिता के लिए गौरवास्पद होते हैं। यह युति १।३ ।९ इस स्थानों में अशुभ होती है। हमेशा असफलता, दारिद्र्य, ऋणग्रस्त होने से कष्ट होता है। मृत्यु आकस्मिक रीती से होती है।
करें।उपाय -ग्रहण के दिन अपने बराबर बजन अनाज का तुला दान गौशाला में करे
भैरव जी को मदिरा चढ़ावे l
1) मंगल-बुध : मंगल बुध एक स्थान में हो तो लोहे सम्बन्धी व्यापारकरने वाला अथवा कई कलाओं में निपुण, शरीर पराक्रमी रहता हैं,केमिकल का व्यापार करने वाला होता है।
बुध नीच का मंगल के साथ अथवा मंगल नीच हो बुध साथ होहर कार्य विपरित होता है। शारीरिक पीड़ा व्यापार में लाभ कम,उत्पादन के व्यापार में हानि का योग होता है और यदि राज्य कर्मचारी होतो सस्पेंड या चार्जशीट मिलती है। यदि दसवें भाव से सम्बन्ध तो हीयह फल होगा।
उपाय - गणपति अथर्वशीर्ष एवं हनुमान चालीसा का नित्य पाठकरें। मंगल-बुध करने में चूक न हो।
2) मंगल-गुरू : मंगल गुरू साथ होने से धर्म में रूचि रखने वाला,बातचीत करने में चतुर, पशु पक्षियों से प्रेम करने वाला, वेदों में रूचिरखने वाला, यदि जातक सेना में हो तो उच्च पद प्राप्त करता है।राजनीति में हो तब सरपंच या विधायक बनता हैं।
यदि मंगल-गुरू शनि से दृष्ट हो राहु साथ हो तब नास्तिक होता है,सेना या राजनीति से पदच्युत होता हैं।
उपाय - 1. मंगलवार के दिन बनदर को मोतीचूर (बुन्दी) के
लड्डू लिखाये ।2. गुरूवार के दिन बन्दर को केले खिलायें।3) मंगल-शुक्र : मंगल-शुक्र शामिल हो तो अनेक स्त्रियों से सम्बन्धहोते है, फिजुल परपंच करने वाला एवं झूठ बोलने में माहिर होता हैं।यदि ज्योतिषी हो तो प्रसिद्ध होता हैं।
मंगल कर्क का हो शुक्र साथ हो शुक्र कन्या का हो मंगल साथ हो
तो जातक की बदनामी होती है। मूत्र सम्बन्धी बीमारी होती है, चोटलगने का भी योग बनता है।
उपाय-केले के पेड़ में दूध चढ़ावें। (दूध में पानी मिलावें )
4) मंगल-शनि: मंगल-शनि साथ हो तो उसकी वाणी में प्रभावशीलता होती है, चोरी के काम में निपुण होता है। कलह, प्रेमी होता है,युद्ध कला में चतुर होता है, अस्त्र-शस्त्र बनाने में रूचि होती है।
उपाय - मंगल एवं शनिवार को सुन्दर काण्ड का पाठ करें।
मंगलवार के दिन तिकुणा रोट (आटे का) बनाकर हनुमानजी कोचढ़ावें। रोट में गुड़ व घी डाले।
5) मंगल-राहु : मंगल राहु साथ जिस भाव में हो उस स्थान की हानिकरता हैं। जमीन सम्बन्धी विवाद कार्य में रूकावट, शरीर में जोड़(Joint) सम्बन्धी पीड़ा करता है, ज्यादातर शुभ प्रभाव कम देता है। राहु व मगल
इन की युति शुभ राशि में अन्य ग्रहों के शुभ योग में हो तो - ११३१६,११० इन स्थानों में यह बहुत पराक्रमी, कर्तुत्ववान, अदालती व्यवहार में सफल, साहसी, निन्दा की परवाह न करने वाला, सुधारवादी, कार्य पूर्ण करने वाला, संसार में व्यवहार कुशल होता है। यह दत्तक जाने का योग है। बड़े भाई नहीं होते। भाई बहिनों का पोषण करना पड़ता है। बहु विवाह योग होता है। यह युति अशुभ सम्बन्ध में हो तो विवाहित स्त्री से असुन्तुष्ट, व्यभिचारी होते है। अदालती व्यवहार में असफल होते है। पूर्वार्जित सम्पत्ति नष्ट होती हैं। धनस्थान में यह युति शुभ सम्बन्ध में हो तो सूद के रूप में धनलाभ होता हैं। उदार स्वभाव के कारण खर्च भी बहुत होता है। स्थावर सम्पत्ति खरीदने के लिए अनुकूलता रहती है- ये जिसे लेना चाहे वह घर-जमीन आदि दूसरे नहीं खरीद पाते। इन के धन से दूसरों का कल्याण नहीं होता। चतुर्थ में यह युति हो तो पूर्वार्जित व स्वकष्टार्जित सम्पत्ति भी नष्ट होती है। चतुर्थ में राहु व दशम में मंगल हो तो निवासस्थान दोषपूर्ण होता हैं। उस घर में पिशाचबाधा अथवा निरन्तर द्रव्यहानि अथवा सन्तति का घात, स्त्री का घात आदि से कष्ट होता है। पंचम स्थान में इस युति से सन्तति सम्बधी दोष -स्त्री को ऋतुसम्बन्धी रोग होते है अथवा सन्तति नष्ट होती है। ऐहिक सौख्य कम मिलता है। सप्तम में -विवाह बहुत देर से होता है। पहली स्त्री से सम्बन्ध ठीक न रहने से दूसरा विवाह होता है। व्यवसाय-नौकरी मे स्थिरता नही रहती। अष्टम में- स्वास्थ ठीक नहीं रहता, जादू-रसायन के पीछे सम्पत्ति को नष्ट करते हैं, आयु मध्यम होती है। नवम में भाई बहन नहीं होते एकाध बड़ा भाई या बहन होती है, छोटे नहीं होते व्ययस्थान में - स्त्री सुख नहीं मिलता, रक्तपित्त, कोढ़, विषबाधा की सम्भावना होती है। राहु सर्प के समान व मंगल नेवले के समान हैं अत: मंगल के प्रभाव से विष घातक नहीं हो पाता । डॉक्टर की मदद से या वमन हो कर विष से छुटकारा मिलता है।
केतु का प्रभाव हो तो शरीर में दर्द रहता है।
उपाय - मंगलवार के दिन शिवलिंग पर ऊँ नमः शिवायः मंत्र काउच्चारण करते हुए 108 गुलाब के पुष्प अर्पित करें। तवा अंगार भट्टी सिगड़ी कोयला दान करे हलवा लापसी बांटे
चामुंडा, रक्त गणपति, हनुमान जी नरसिंह जी रक्तांग भैरव की पूजा करे ल
1) बुध-गुरू : बुध-गुरू कुण्डली में साथ हो तो जातक संगीत काशौकीन, इत्र व पुष्प (सुगन्धित वस्तु) में रूचि रखने वाला, सुन्दरशरीर वाला, हसमुख, कानून जानने वाला, कभी-कभी न्यायधीशहोते हैं, उदार ( दयालु) होते हैं।
अष्टम् स्थान बुध नीच का गुरू साथ हो या गुरू नीच का बुधसाथ हो तो सब फल विपरित होते है। परन्तु 40 प्रतिशत अपना स्वभावनहीं बदलते।
उपाय -1. अक्षत् (चावल) को शहद में मिलाकर गुरूवार के
दिन बहते पानी में डाल देवें। 2. बुधवार के दिन पान के पत्ते में मुलहटीडालकर सेवन करें।
2) बुध-शुक्र: बुध-शुक्र साथ हो तब जातक हसमुख, गायन विधाका ज्ञाता, मधुर भाषी, कई कलाओं का जानने वाला, अपने कुल मेंश्रेष्ठ, भोजन कराने वाला एवं कला का प्रेमी होता है।
बुध-शुक्र कन्या का हो उच्च-नीच बनने से राजयोग भी बनता है।यदि नीच शुक्र अंशों में बलबान हो तब वह स्त्रियों से आसक्त रहता हैतथा स्वप्न दोष से युक्त होता है।
उपाय -1. श्रीसुक्त का पाठ बुध व शुक्रवार को करें। 2. बुधवारके दिन गन्ने के टुकड़ों से यज्ञ (हबन) करें।(श्रीसुक्त से)
3) बुध-शनि : बुध-शनि के योग से शरीर में कमजोरी आती है,पाखण्ड में विश्वास रखने वाला, मधुर वाणी से आकर्षित करने वालाहोता है।
शनि मेष का अथवा बुध मीन का हो तो वाणी में कटुता, झगड़ाकरने की प्रकृति, स्वार्थी होता है।
उपाय-शनिवार के दिन गाय के गोबर से हाथ धोवें। शनिवार केदिन गाय के कन्डे (सूखा गोबर) के अन्दर लोबान डालकर घर में धूपकरें।
4) बुध-राहु : बुध-राहु साथ हो तो मामा को पीड़ा पहुँचाता है, जाँध केपास दाग होते है, विद्या में बाधा उत्पन्न करता है। राहु व बुध इन की युति शुभ राशि में शुभ सम्बन्ध में हो व १।३।५।९।१०।११ । इन स्थानों में हो तो बुद्धिमत्ता अच्छी होती है। किसी भी विषय को सूक्ष्मता से समझना, संशोधन, गहन विचार, विस्तृत ग्रहणशक्ति, दूरदृष्टि से सम्पन्न होतेहैं। इन्हें शिक्षा की अवधि में पहली श्रेणी नहीं मिलती । यह युति अशुभ सम्बन्ध में हो तो शिक्षा अधूरी रहती है। बुद्धि चंचल, बरताव विक्षिप्त व अस्थिर, स्वभाव घमंडी होता है। खुद को होशियार व दूसरों को मूर्ख समझते हैं। इस का क्रोध क्षणिक होता है। अन्य स्थानों में यह योग हो तो बुद्धि शान्त, समाधानी होती है। शिक्षा नहीं होती, व्यवसाय में स्थिरता नहीं होती। दो विवाह होते हैं। ये क्रोध में बहकते नहीं, मित्र काफी होते हैं। इन स्थानों में अशुभ सम्बन्ध में यह योग तो मस्तिष्क के विकार होते हैं- फिट आना, भ्रम, पागलपन, निद्रानाश, बालग्रह, सूखा, स्मरणशक्ति नष्ट होना, हिस्टेरिया आदि की सम्भावना होती है।
मातंगी माता की उवासना करे और गणेश जी की पूजा करे चतुर्थीव्रत काली गयी भैस या हाथी को घास खिलावे
उपाय-बुधवार के दिन गणपतिजी को लड्डु चढ़ावें एवं बुधवारका व्रत अवश्य कों।
1) गुरू-शुक्र : कुण्डली में गुरू-शुक्र की युति हो तब शास्त्र जानने
वाला अच्छे मित्न होते है, पत्नी सुशील होती है, अध्यापक या प्रोफेसरसे भी जीविका करने वाला होता है।
गुरू मकर का या शुक्र कन्या का हो तो स्त्री रोगिणी विचारों मेंभिन्नता होती है। गुरू नीच का शुक्र साथ है तब पुत्रों से वैमनस्यता वपीलीया रोग होता है।
उपाय -1. शुक्रवार के दिन भुने हुए चने मोर को खिलायें। 2. गुरुवार
के दिन किसी भी मन्दिर में श्वेत चंदन का लकड़़ी का दान करें।
2) गुरू-शनि : गुरू-शनि साथ हो तो शहर या गाँव में उसे मुखियाससझते है। स्त्री की सलाह से आगे बढ़ने वाला होता है, सुधार जातिका हो, लकड़ी के काम में बहुत निपुण होता है। ये घुमने वाले होते हैं।
यदि गुरू मकर का शनि साथ हो तो धन में कमी पैदा करता हैं,यश कम मिलता है। शनि मेष का गुरू साथ हो स्त्री से पीड़ा, स्वयं केनजदीक रिश्तेदारों से अपयश मिलता हैं। यात्रा में रूकावट आती हैं।
उपाय-1. शनि भगवान पर श्वेत सरसों का तेल चढ़ावें। 2.
गुरूवार को दूध में केसर मिलाकर ब्राह्मण या भान्जे को पिलावें।
3) गुरू-राहु : गुरू राहु साथ होने से चाण्डाल योग बनता है। जिसस्थान में बैठे उस स्थान में हानि करता हैं।राहु व गुरु इन की युति शुभ सम्बन्ध में हो तो सन्मान बहुत मिलता है। अधिकार की इच्छा न होते हुए भी अधिकार मिलता है। लोकप्रिय हो कर विधानसभा आदि का सदस्य चुना जाता है। बुद्धिमान, व्यासंगी, होशियार होता है। यह युति १।५।९।१० स्थानों में बहुत अच्छा फल देती है। २।४।७।११ में कुछ कम फल मिलता है। सम्पत्ति अच्छी मिलती है, शिक्षा कम होती है। ३।६।८।१२ इन स्थानों में सम्पत्ति कम, शिक्षा अधिक होती है। पराशर के मतानुसार राहु व गुरु धनु या मीन में हो और गुरु षष्ठ या अष्टम का स्वामी हो तो अल्पायु योग होता है। इस के टीकाकार ने यह अर्थ किया है कि राहु व गुरु लग्न में धनु या मीन में हो तो अरिष्ट योग होता है- द्वयं राहुयुक्तगुरुरिति यस्य जन्मलग्न धनु मीनराहुस्ति तत्र राशिगते गुरौ रिष्टसम्भवो वाच्यः । तत्त्रिकोणे वा अथवा यत्रकुत्र राशौ राहुयुक्तो गुरुरस्ति तत्र राशिगते शनौ अरिष्टसम्भवो वाच्यः ।। त्रिकोण मे अथवा अन्यत्र राहु के साथ गुरु हो व शनि भी हो तो अरिष्ट का योग होता है। अष्टम स्थान में धनु या मीन में राहु गुरु युति हो तो अल्पायु होना सम्भव है। साधारणतः गुरु ब्राम्हण वर्ण का और राहु चाण्डाल जाति का माना जाता है अतः इन की युति गुरुचाण्डाल योग के रुप मे अशुभ मानी जाती है। किन्तु अनुभव में यह शुभ फल देने वाली सिध्द हुई है। इन ग्रहों के युति या प्रतियोग के फलस्वरुप कोई व्यक्ति बहुत धनी या कीर्तिमान हो तो उस के वंशजों की स्थिति प्रायः बिगड़ते जाती है। इस पुरुष को किर्ति मिली हो व द्रव्य न मिला हो तो अगली पीढ़ी के लोग शिक्षा पूरी कर अच्छा धनार्जन करते है यद्यपि उन्हें कीर्ती नहीं मिलती।
उपाय -तिल पत्र को सरसों के तेल में मिलाकर शनि भगवान केचरणों में अर्पित करें।
1) शुक्र-शनि : कुण्डली में शुक्र-शनि साथ होने से चित्रकला काशौकीन, लेखन कला में प्रवीण, कारीगरी में चतुर, पर्यटनशील तथापशुओं का प्रेमी होता है। विशेषकर घोड़ों का आज युग में कारों काशौकीन होता हैं।
यदि शुक्र नीच का साथ शनि या शनि नीच का साथ शुक्र है तोभाग्य देर से उदय होता हैं। यदि दूसरे भाव में हो तब माता-पिता कीमृत्यु के बाद पूर्ण भाग्य उदय होता है।
उपाय -1. देसी काली गाय के दूध का दही जमाकर शुक्रवार कोसेवन करें। 2. दही में काले तिल डालकर शिवलिंग पर रूद्राभिषेककरें।
राहु व शुक्र
इन की युति शुभ सम्बन्ध में हो तो विवाह आकस्मिक होता है। स्त्री निर्धन तथा सम्बन्धी रहित घर की होती है। स्त्री सुख अच्छा मिलता है। पति के पहले पत्नी की मृत्यु होती है। यह परस्त्री से पराङ्मुख होता है। यह युति ३।६ ॥७ १८ ११२ इन स्थानों में अशुभ होती है। एक स्त्री से चिरकाल सुख नहीं मिलता। व्यवसाय में कठिनाइयां आती हैं। विवाह के बाद आर्थिक कष्ट होता है।
2) शनि-राहु : शनि-राहु साथ होने से स्वयं के सुन्दरता में कमी आतीहै, स्त्री से विवाद होता है, स्त्री के पिता से विचारों में अन्तर अथवा स्त्रीके कारण स्वयं के पिता से विवाद होता है।
राहु व शनि इन की युति शुभ सम्बन्ध में हो तो बुद्धि गहरी, परिपक्व, गूढ़, अगाध होती है। बरताव लोकविलक्षण होता है। व्यवसाय में चतुराई से बहुत धन मिलता है। बैन्क, कारखाने, कम्पनियां, शेअर बाजार, सट्टा विदेश-व्यापार आदि से कीर्ति व धन मिलता है। दयालू, शान्त, जन्मजात श्रेष्ठता से विभूषित होता है। खास शिक्षा के बिना ही विद्वान के रूप में प्रसिद्ध होता है। व्यवहारकुशल, न्याय को समझने वाला, लोगों की सुनकर अपने मन की करनेवाला होता है। थोड़ा किन्तु मार्मिक बोलता है, काम अधिक करता है। परोपकारी, आत्मविश्वासी कर्तुत्ववादी, दैववाद का विरोधक, महत्वाकांक्षी, प्रभावशाली होता है। हजारों लोगों के रोजगार का प्रबन्ध करता है। सामाजिक व शिक्षाविषयक क्षेत्र में दान द्वारा कीर्ति मिलती है। क्रान्ति के इच्छुक, अध्यात्मप्रेमी, संस्थाओं के स्थापक होते हैं। यह युति मध्यम रूप में हो तो वे लोग अपने कामों में मग्न, लोगों से अलग रहते हैं। शान्त रीति से नौकरी या साधारण व्यवसाय करते हैं, । स्त्री-पुत्रों का सुख अच्छा मिलता है' सूद, रेस में एजन्ट (बुकी), इंजिनियरिंग, वॉटरवर्क्स, प्लम्बिंग द्वारा धनार्जन होता है। यह युति अशुभ हो तो व्यवसाय में या नौकरी में हमेशा हानि, दीनता, सदा कर्ज रहना, एक के पीछे एक आपत्ति, दूसरों की हानि करने की इच्छा ये फल होते हैं। ये लोग अपने ही घर का नुकसान करते हैं। भ्रमिष्ट, पैशाचिक वृत्ति के धर्म छोड़ने वाले, भाषण में क्रूर व अश्लील होते हैं । दूसरों को ताने दे कर कष्ट देते हैं। खुद को होशियार, दूसरों को मूर्ख समझते हैं। दूसरों पर आश्रित रहते हैं, समाज के अच्छे काम में विघ्न लाते हैं। निन्दा में निपुण, लोभी, परद्रव्य के इच्छुक, मत्सरी, क्रोधी, अकारण अपकार करने वाले, व्यभिचारी, अविचारी होते हैं। इन के घर मे किसी को भूत प्रेत की बाधा होती है। (राहुकेतुसमायुक्ते बाधा पैशाचिकी स्मृता-सर्वार्थ-चिन्तामणि)
यह युति लग्न में मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक या मीन में हो तो दीर्घायु होता हैं। बचपन में माता या पिता की मृत्यु होती है। बचपन दुःखमय होता है। उपजीविका में विघ्न होते हैं। दूसरे विवाह के बाद भाग्योदय शुरू होता है। पुत्रसन्तति में विघ्न होते है। प्रगति करते हैं। अन्य राशियों मे अशुभ फल होते हैं। धनस्थान में शुभ राशि में अन्य ग्रहों से शुभ सम्बन्ध में हों तो एक विवाह, सन्तति बहुत, पूर्वार्जित धन की वृद्धि होती है। यह व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी अधिक करता है। अन्य ग्रहों से अशुभ योग हो तो पूर्वार्जित सम्पत्ति नहीं मिलती । बचपन माया या मौसी के घर बीतता है। बहुभार्या योग होता है। वरिष्ठ अधिकारी की कृपा से नौकरी में तरक्की होती हैं। सन्तति बहुत होती है। दुसरे विवाह के बाद भाग्योदय हो कर पेन्शन के बाद सुखपूर्वक रहता है। घर स्थावर सम्पत्ति अर्जित करते हैं। तृतीय स्थान में शुभ सम्बन्ध में हो तो २६ वें वर्ष तक बहुत कष्ट रहता है। बचपन में माता की व थोड़े ही दिन बाद पिता की मृत्यु होती है। भाई के साथ बटवारा नहीं हुआ तो एक की प्रगति रुकती है। धीरे-धीरे भाग्योदय हो कर अन्त तक कायम रहता है। स्वभाव शान्त होता है। विवाह एक, नौकरी या व्यवसाय में स्थिरता यह फल मिलते हैं। चतुर्थ स्थान में शुभ सम्बन्ध में हो तो धन या पुत्रसन्तति में एक की प्राप्ति होती है। पिता अल्पायु, माता दीर्घार्यु होती है। बड़े व्यवसाय में लाभ, दान से कीर्ती प्राप्त होती है। धन व कीर्ति के साथ पुत्र लाभ नहीं होता अतः दूसरा विवाह करते है। दत्तक लेने का सम्भव होता है। बड़ी संस्थाओं को विपुल दान देते हैं। उदार होते हैं किन्तु आलसी लोगों या अविश्वसनीय संस्थाओ की बिलकुल मदद नहीं करते। बुद्धिमान, व्यवहार कुशल, प्रसंगावधानी, बहुश्रुत, व्यासंगी होते हैं। खान, इंजिनीयरिंग, खेती, बिल्डिंग, लोहा-चूना पत्थर, मिट्टी, बालू, विदेशी यन्त्र, स्थावर सम्पत्ति के दलाल आदि के व्यवसाय में विपुल धन मिलता है। इन्हें अपनी मृत्यु का पहले आभास मिलता है। पंचम स्थान में यह युति हो तो विवाह में विलम्ब, दो विवाह, बहुत सन्तति हो कर दो तीन ही जीवीत रहना, अच्छा ऐहिक सुख, कीर्ति, विक्षिप्त स्वभाव, कथनी-करनी मे अन्तर, पहले स्वार्थ-फिर परमार्थ, अविश्वासी स्वभाव, जगत को विरोधी समझना वृद्ध वय में पत्नी-पुत्रों का विरोध ये फल मिलते हैं। षष्ठ स्थान में - विरोध बहुत होता है, अन्त में शत्रु नष्ट होते हैं। विचित्र रोग, सर्दी, सन्धिवात आदि होते हैं। तरुणायू में ही स्त्री की मृत्यु होती है। अधिकार, धन, सन्मान मिलता है। वृद्धावस्था में शारिरीक कष्ट बहुत होता है। कोई आनुवंशिक रोग रहता है । सप्तम स्थान में -दो विवाह की प्रवृत्ति होती हैं। दूसरे विवाह के बाद व्यवसाय में बहुत लाभ होता है। एक ही विवाह हो कर सन्तति हुई तो धनलाभ नहीं होता। बड़े व्यवसाय में बहुत लाभ होता हैं। एक ही विवाह हो कर सन्तति हुई तो धनलाभ नहीं होता बड़े व्यवसाय में बहुत लाभ होता है। किन्तु फिर हानि भी होती है। पतिपत्नी में कलह नहीं होती, वृद्धायूं मे पत्नी का प्रभुत्व होता है। पुत्रों का विरोध होता है। पूर्व आयु में सुख व उत्तर आयु में दारिद्र्य का योग होता है। यह बात ४-५ पीढ़ी तक चलती है। जो कुल की किसी स्त्री के शाप का परिणाम होता है। अष्टम स्थान में स्त्री दरिद्र कुटुम्ब की होती है। अपने कष्ट से प्रगति करनी पड़ती है। धन काफी मिलता है। व खर्च भी होता है। उत्तर आयु में दारिद्र्य आता है। दीर्घायु होते हैं। मृत्यु का आभास पहले मिल जाता है। यहाँ कर्क व सिंह राशि में शुभ फल मिलते हैं, अन्य राशियों मे साधारण फल मिलते हैं। नवमस्थान में यह पिता का सब से बड़ा या छोटा पुत्र होता है। शिक्षा पूरी होती है। विवाह से इच्छापूर्ति नही होती, विजातीय या बड़ी स्त्री से प्रेम करते हैं। मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक, मीन व मिथुन में, शिक्षा के लिए विदेश प्रवास होता है। भाग्योदय ३२ वें वर्ष से शुरू हो कर ४८ वें वर्ष बहुत उन्नत्ति होती है। दशमस्थान में - पूर्व वय में कष्ट रहता है। बाद में अच्छी प्रगति होती है। ३६ वें वर्ष से भाग्योदय होता है। विवाह अधिक होते हैं या सन्तति कम होती हैं। क्वचित सन्तति नहीं होती । कीर्ति बहुत मिलती है। लाभस्थान में - धन अच्छा मिलता है। लोभी होता है। सन्तति में बाधा होती है। लोगों में निंदा होती हैं। व्ययस्थान में - जन्म समय की स्थिती से काफी तरक्की करते हैं। अधिकार व सम्पत्ति के लिये बुरे मार्गो का उपयोग करता हैं, खून, विषप्रयोग से भी नहीं डरता है। बाद में ये सब छुपाने के लिए बहुत दानधरम करता है। पुत्र कम - एक या दो होते हैं। एक पुत्र की पिता के पहले मृत्यु होती है। स्त्री से हमेशा झगड़ा होता है। बड़े व्यवसाय मे कीर्ति मिलती है, विदेशी प्रवास होता है।
इस प्रकरण में राहु की अन्य ग्रहों के साथ युति के फल दिये हैं। केन्द्र व प्रतियोग में भी ये फल मिलते हैं। धन, षष्ठ, अष्टम और व्यय में प्रतियोग के तथा तृतीय, पंचम, षष्ठ, अष्ठम, नवम व व्यय में केन्द्रयोग के फल विशेष तीव्र मिलते हैं।
उपाय -1. बुधवार के दिन कम्बल दान करें। 2. शनिवार के दिनलोहे के सुपड़़े में उड़़द दाल शनि भगवान चढ़ावें। मशीन दान करे लोहा दान करे सिगड़ी दान करे तेल दान करे सरसो उड़द दान करे