राहु का ससम्पूर्ण सारगर्भित व्याख्या

       राहु  
    राहु और केदु स्वतन्र य्रह नहीं बल्कि छाया ग्रह हैं। सूर्य कीपरिक्रमा चन्द्र और पूथ्वी दोनों करते हैं लेकिन दोनों की कक्षा(मार्ग) अलग-अलग है। चन्द्र का मार्ग और पूथ्वी का मार्ग 5°के कोण बनाते हुए दो स्थानों को काटते हैं। इन्हीं दोनों कटे स्थानोंको राह-केतु कहते हैं। जिस क्रॉस से चन्द्र पृथ्वी के परिश्रमण मार्गसे ऊपर की ओर जाता है वह राह या ड्रैगन्स हैड तथा जिस मार्गसे नीचे की ओर आता है उसे केतु या ड्रैगन्स टेल कहते है। यहदोनों कटान बिन्दु परस्पर 180° की दूरी पर विपरीत दिशा में भ्ूमणकरते दृष्टिगोचर होते है।

    नीलधुतिः दीर्घतनुः कुवर्णः पापी सभा पण्डितः सात्विकः।असत्यवादी कपटी च राहुः कुष्टीपरान् निंदति बुद्धिहीनः॥पैठीनस गोत्रीय राहु को चांडाल कहा गया है। इसका वर्ण धुएं जैसा है।वाहन सिंह (शेर) है। यह नैऋत्य कोण का स्वामी है।
    नीले रंग का, ऊंची कद-काठी का, कुरूप, पापी, विद्वान, हिचकी रोग सेपीड़ित, असत्यवादी, कपटी, कोढ़़ी, दूसरों की बुराई करने वाला, बुद्धिहीनजातक राहु प्रभाव वाला होता है।
    राहु और केतु स्वतंत्र ग्रह नहीं बल्कि छाया ग्रह हैं। सूर्य की परिक्रमा चंद्रऔर पृथ्वी दोनों करते हैं लेकिन दोनों की कक्षा (मार्ग) अलग-अलग है। चंद्रका मार्ग और पृथ्वी का मार्ग 5° के कोण बनाते हुए दो स्थानों को काटते हैं।इन्हीं दोनों कटे स्थानों को राहु-केतु कहते हैं। जिस क्रॉस से चंद्र पृथ्वी केपरिश्रमण मार्ग से ऊपर की ओर जाता है वह राहु या ड्रैगन्स टेल कहलाता हैl    यह दोनों कटान बिन्दु परस्पर 180° की दूरी पर विपरीत दिशा में भ्रमण करतेदृष्टिगोचर होते हैं।
    तम, असुर, अगु, स्वर्भानु, विद्युन्तुद, भुजंग, कपिलास, सर्प, धाता,सैंहिकेय, फाणी आदि राहु के पर्याय नाम हैं। रंग-नीला, प्रकृति-वात,वर्ण-शूद्र, लिंग-पुरुष, गुण-तामस, रस-कषाय, तत्व-वायु, धातु-सीसा,स्थान-वन, वस्त्र-रंग-बिरंगे (विचित्र), जाति-चाण्डाल, दिशा-नैऋत्यकोण, पाप ग्रह, रत्न-गोमेद, अधिष्ठाता-मद, स्वस्थान से पांचवें, सातवेंतथा नौवें स्थान को देखता है। एक राशि में यह लगभग 18 महीने स्थितरहता है। मिथुन राशि में उच्च तथा धनु में नीच होता है।
    छत्र, चामर, कुतर्क, अपस्मार, चेचक, नासूर, कृमि, प्रेतबाधा, कैद, कोढ़़,क्रूर भाषण, नीच जाति, सपेरे, यम, मलेच्छ, गांठ के रोग, झूठ बोलना, अयोग्यस्त्री से संबंध, जड़ता, कांटे, पशु, श्मशान, वाक्युद्ध, धर्मभ्रष्टता, जुआ, पशु,मैथुन, साहस, चोरबाजारी आदि राहु के कारकत्व में आते हैं। आर्द्रा, स्वातिऔर शतभिषा इसके नक्षत्र हैं। बुध, शुक्र, शनि मित्र ग्रह व सूर्य, चंद्र, मंगलशत्रु ग्रह तथा बृहस्पति सम ग्रह है। इसकी महादशा 18 वर्ष तक चलती है।


    तम, असुर, अगु, स्वर्भानु, विधुन्तुद, भुजंग, कपिलास, सर्प,धाता, सैहिकेय, फरणी आदि राहु के पर्याय नाम है। रंग-नीला,प्रकृति-वात, वर्ण-शूद्र, लिंग-पुरुष, गुण-तामस, रस-कषाय,तत्व-वायु, धातु-सीमा, स्थान-वन, वस्त्र-रंग-विरंगे (विचित्र)जाति-चाण्डाल, दिशा-नैऋत्य, पाप ग्रह, रल्-गोमेद, अधिष्ठाता-मद,स्वस्थान से पांचवें, सातवें तथा नवें स्थान को देखता है। एक राशिमें लगभग 18 महीने स्थित रहतर है। मिधुन रशि में उच्च तथा धनुमें नीच होता है।
    राहु को मत छेड़़ो
    लाल किताब में राहु को कुंडली के तृतीय व षण्ठम भाव में ही शुभदेने वाला कहा जाता है। तृतीय भाव में राहु को आयु व दौलत कामालिक कहा गया है। कहते हैं कि जिस जातक की कुंडली में राहु तृतीयभाव में हो, उसके लिए वह हाथ में बन्दूक लिए खड़ा पहरेदार या रक्षकहै। ऐसा राहु जातक को अच्छा स्वास्थ्य तो प्रदान करता ही है, धन हानिभी नहीं होने देता और जातक को दिलेर बनाता है। अन्य ज्योतिषीयमान्यताओं में भी तृतीय यानी पराक्रम भाव में क्रूर व पुरुष ग्रह जैसे-राहु,मंगल, सूर्य व केतु का होना शुभ बताया गया है, जबकि तृतीय भाव मेंही शुभ व स्त्री ग्रह जैसे-चन्द्रमा, शुक्र व बुध जातक को उतना दिलेरनहीं बनाते। इसी प्रकार कुंडली के षष्ठम भाव में बैठा राहु जातक केजीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी मुसीबत को टाल देता है।
    लाल किताब में कहा गया है कि षष्ठम भाव का राहु जातक के गलेमें पड़े हुए फाँसी के फन्दे को भी हाथों का रूप लेकर निकाल देता है। अतःषष्ठम भाव में इसे मुसीबत की हर रस्सी काटने वाला ‘मददगार हाथी’ कहागया है। ऐसी मान्यता है कि शीशे की एक छोटी-सी गोली सदैव पास मेंरखने से इस भाव में राहु की शुभता और बढ़ जाती है। लाल किताब में राहुको कच्चा कोयला, कैक्टस का पौधा, हाथी आदि का कारक माना गया है।अतः बेहतर होगा कि यह वस्तुएँ घर में न रखें। कालपुरुष की कुंडली मेंतृतीय व षष्ठम भाव में राहु के सबसे घनिष्ठ मित्र बुध की मिथुन व कन्याराशियाँ आती हैं। अतः इन दो भागों में राहु शुभ फलदायक है। कुंडली केचतुर्थ भाव में बैठा राहु किसी जातक को तब तक कोई नुकसान नहींपहुँचाता, जब तक वह उससे छेड़छाड़ न करे ।
    कालपुरुष की कुंडली के अनुसार चतुर्थ भाव में कर्क राशि आती     है, जिसका स्वामी चन्द्रमा है और चन्द्रमा को सभी ग्रहों की माता मानागया है। अतः चतुर्थ भाव में राहु चुपचाप बैठा रहता है और कोईशुभ-अशुभ फल नहीं देता, किन्तु चतुर्थ भाव में राहु की उपस्थिति केसमय यदि राहु की कारक चीजें जैसे-मकान की छत को बदलना याशौचालय को तुड़वाकर दुबारा बनवाना या शौचालय की मरम्मत करवानाराहु को नाराज कर देता है। अतः उस परिवार के किसी-न-किसी व्यक्तिको दिमागी बीमारियाँ होने की आशंका जताई जाती है। यहाँ राहु यदिपहले से ही अशुभ हो तो कई बार जातक को जेल या पागलखाने तकजाने की नौबत आ जाती है। चतुर्थ भाव का हमारे मकान से गहरासम्बन्ध है। ऐसा माना जाता है कि राहु के कारक व्यक्ति से जमीनखरीदकर उस पर मकान बनवाने या उसके द्वारा बनवाए हुए मकान कोखरीदकर उसमें रहने से साहु क्रोधित हो जाता है और उस परिवार मेंकोई-न-कोई मुसीबत खड़ी रहती है। अतः राहु से छेड़खानी करने केबजाय उससे दूरी बनाकर रहना चाहिए, क्योंकि तृतीय व षष्ठम भाव केअलावा राहु चाहे जहाँ भी हो, अपनी शरारत से बाज नहीं आता। कोईजातक अपने घर में यदि कच्चे कोयले की बोरियाँ भरकर रखता है तोराहु नाराज हो सकता है। यदि ऐसा हो तो राहु के क्रोध से बचने के लिएबार-बार गंगा स्नान करना या पीतल के बर्तन में गंगाजल भरकर, उसेढँककर घर में रखना श्रेयस्कर बताया गया है। लाल किताब के अनुसारगंगा या किसी भी पवित्र नदी का बहता पानी बृहस्पति है। इसी प्रकारपीले रंग का होने के कारण पीतल बृहस्पति की धातु है। बृहस्पति कोराहु के कहर से बचाने वाला माना जाता है। अष्टम भाव में स्थित राहुअशुभ होता है। वह जातक को राह चलते मुश्किलें दे सकता है तथा कुछऐसी अन्दरूनी बीमारियाँ पैदा कर सकता है, जिसे चिकित्सक भी आसानीसे न समझ सकें।ज्योतिष में राहु को ‘छाया ग्रह' कहा गया है, लेकिन लाल किताबके अनुसार यह छाया साधारण परछाई भर नहीं, आँधी जैसे धुएँ काकारक है। अतः अष्टम भाव के राहु को ‘कड़वा धुआँ कहा जाता है।     यह अचानक चोट, कोर्ट केस-मुकदमे, पुलिस ज्यादती, मुसीबतों, संकटआदि की ओर इशारा करता है। इस स्थिति में जातक को यह समझ मेंनहीं आता कि मुसीबतें कब और कैसे आती हैं। अष्टम भाव का राहु जबवर्षफल व गोचर फल में भी इसी भाव में होता है, तो जातक के ऊपरकोई बड़ी, मुसीबत आ सकती है। इसके अलावा राहु शुक्र जैसे कोमल वसुन्दर ग्रह को बेहद परेशान रखता है। सप्तम भाव में शुक्र व राहु का एकसाथ होना मांगलिक दोष से ज्यादा खतरनाक माना जाता है। ज्योतिष मेंशुक्र को पत्नी का कारक कहा गया है। अतः इसका शादी से गहरासम्बन्ध होता है। शुक्र हमारी त्वचा का भी कारक है। इसलिए सप्तमभाव में शुक्र के साथ बैठा राहु शुक्र के शुभ फल को भी दूषित कर देताहै। यदि ऐसा हो तो शाम के समय नीले रंग का फूल घर के बाहर जमीनमें दबाते रहना चाहिए।



    छत्र, चामर, कुर्तक, अपस्मार, चेचक, नासूर, कृमि,प्रेतवाधा, कैद, कोढ़, क्रूर भाषण, नीच जाति, सपेरे, यम, मलेच्छ,झूठ बोलना, अयोग्य स्त्री से संबंध, जड़तां, काटे, पशु, श्मशानघाट,वाकयुद्ध, धर्मश्रष्टता, जुआ, पशु मैथुन, साहस, चोरबाजारी आदिराहु के कारकत्व में आते हैं। आ्द्ा, स्वाति और शतभिषा इसकेनक्षत्र हैं, बुध, शुक्र, शनि मित्र ग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल, शत्रु ग्रहतथा बृहस्पति सम ग्रह है। इसकी महादशा 18 वर्ष तक चलती है।
राहु का स्वरूप-ग्रहयोनिभेद

वैद्यनाथ - स्थान -अहिध्वजाः सैलाटवी संचरन्तः । यह पर्वतशिखरों तथा बनों में संचार करते हैं। आयु-शताब्दसंख्या : राहूकेतवः । इन की आयु सौ वर्ष की है। रत्न-गोमेदवैडूर्यके । राहू का रत्न गोमेद तथा  दिशा- नैऋत्य । क्रीड़ा स्थान- वेश्मकोणे- राहु का स्थान घर तथा दृष्टि- अघोक्षिपातः तु अहिनाथः नीचे देखते है। बल के स्थान-मेषलिकुम्भ तरुणीवृषकर्कटेषु मेषूरणे च बलवारनुरगाधिपः स्यात् । कन्यावसानवृषचापधरे निशायामुत्पातकेतुजनने च शिखी बली स्यात् । मेष वृश्चिक, कुम्भ, कन्या, वृषभ तथा कर्क राशी में दशम स्थान में राहु बलवान होता है।  दोष- राहुदोषं बुधो हन्यात् । राहु के दोष को बुध दूर करता है।

पराशर - स्थान- वनस्थः। वन में रहता है। शिखिनः स्वर्भानोः वल्मीक स्थानमुच्यते । इस का स्थान वामी में है। जाति- चाण्डाल। धातु-सीसा। केतु का रत्न - नीलमणि । वस्त्र चित्रकन्था फणीन्द्रस्य केतोश्छद्रयुतं वस्त्रम् रंगीबेरंगी गोदडी राहु का तथा केतु का वस्त्र कटा हुआ होता है। काल-अष्टौ मासाः स्वर्भानोः केतोः मासत्रयम् । राहु का समय आठ मास 

मन्त्रेश्वर- सी संच जीर्णवसनं तमसस्तु केतोः मृद्भाजनं विविधचित्रपट प्रदिष्टम । राहु का धातु सीसा, वस्त्र- जीर्ण है।  राहु शालवृक्ष का निर्माता है।

नीलकण्ठ- वर्ण निषाद, लिंग-पुरुष, समय-दोपहर का, धातु-लोहा, गुण तामस, रस-कषाय, भूमि-ऊषर, धातु-वायु, अवस्था-वृध्द, स्थान विवर। यह अपाद(चरणरहित), पापग्रह, चरग्रह है ।

वेंकटेश्वर शर्मा - सर्पस्थानं सैहिकेयस्य । इस का स्थान सांप के बिल है रंग नीला, चित्रविचित्र है।


जयदेव- संध्यायां भुजंगमः । यह संध्या समय बलवान होता है। राहुः सरीसपः सरपट चलने वाला है। दक्षिणतोमुखः- मुख दक्षिण की ओर हैं। भोगीन्द्रः प्रकृत्या दुःखदो नृणाम। दुःख देता है। फणिनः स्थाविराः प्रहाः । यर वृध्द ग्रह है।

पुंजराज- सिंहीसूनम्लेंच्छवंशोद्भवानाम् । यह प्लेच्छों का अधिपति है। रस- तीखा है।


राहू स्वरूप का विवरण

पराशर- धूम्रकारो नीलतनु वनस्थोपि भयंकरः वात प्रकृति को धीमान् स्वर्भानूप्रतिमः शिखी । यह धुँए जैसा, नीले रंग का, वनचर, भयंकर, वात प्रकृती का तथा बुध्दिमान होता है।

मन्त्रेश्वर- नीलद्युतिर्दीर्घतनुः कुवर्णः पापी सभापंडितः सहिक्कः । असत्यवादी कपटी च राहु : कुष्ठी परान् निन्दति बुध्दिहीनः । यह नीले रंग का उंचे कद का, कुरूप, पापी पंड़ित हिचकियों से पीड़ित, झूठ बोलनेवाला, कपटी, कोढ़ी, परनिन्दक बुद्धिहीन होता है। 

नीलकण्ठ- राहुस्वरूप शनिवत् निषादजातिर्भुजंगोऽ स्थिपनै ऋतीशः। केतुः शिखी तद्वदनेकरुपः खगस्वरुपात् फलमित्थमुद्दाम।। इस का स्वरुप शनि जैसा, जाति- निषाद, धातु-आस्य, दिशा नैऋत्य होती है। 

अज्ञात – कर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम् । सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ।। सैहिकेयस्तमो राहुः कज्जलाचलनिभः । यः प्रणमाम्यहम्।। सैहिकेयस्तमो राहुः कज्जलाचलसनिभः । यः पर्वणि महाकायो ग्रसते चन्द्रभास्करो ।। प्रणमामि सदां राहुं सर्पाकारं किरीटिन्म। सैहिकेयं करालास्यं सर्वलोकभयप्रदम् ।। इस ग्रह का शरीर आधा, महाबलवान, काजल के पहाड़ जैसा, अन्धकाररूप, भयंकर, सांप जैसा, मुकुटयुक्त, भयंकर मुख से युक्त है। यह सिंहिका राक्षसी का पुत्र है तथा पर्व के समय सूर्य और चन्द्र का ग्रास करता है।

कारकत्व

पराशर- प्रयणसमयसर्परात्रि सकलसुप्तथद्यूतकारको राहुः । व्रणरोगचर्मातिशूलस्फुटक्षुर्धार्ति कारक : केतूः।। प्रवास का समय, रात्रि, सोए हुए प्राणी, जुंआ तथा सांपों का कारक राहु है। 

वेंकटेश्वर - यशःप्रतिष्ठाछत्रकारको राहुः । कीर्ति, सन्मान, राजवैभव का कारक राहु है।

मन्त्रेश्वर- बौध्दहितुण्डिखगराजवृकोष्ट्रसर्पान् ध्वान्तादयोमशक- मत्कुणकृम्युलूकाः । बौद्ध, सँपेरे, पक्षी, भेड़िये, ऊंट, सांप, कौए, मच्छर, खटमल, कीड़े, उल्लू यह सब राहु के अधिकार में है। 

वैद्यनाथ - सर्पेणैव पितामहं तु शिखिना मातामह चिन्तयेत् । राहू से दादा का तो केतु से नाना का विचार करना चाहिए। करोत्यपस्मारमसूरज्जूक्षुधाकृमि- प्रेतपिशाचभूतैः । उद्बन्धनाच्चाशुचिकुष्ठरोगैः विदुंतुदश्चातिभयं नराणाम् । अपस्मार, चेचक, नासूर भूख, कृमि, प्रेतपिशाच बाधा, अरुचि, कैद कोढ़, यह राहू का कारकत्व है। 

कालिदास- छत्रं चामरराष्ट्रसंग्रहकुतर्क क्रूरवाक्यान्त्यजाः पापस्त्रीचतुरन्तयानवृषलद्युताश्च सन्ध्याबलम् । दुष्टस्त्रीगमनान्यदेशगमनाशौचा स्थिगुल्यानृताऽधोदग् भ्रामिकगारुडा यमुमुखम्लेच्छादिनीचाश्रयाः ।। दुष्टग्रन्थिपहाटेवीविषम सचाराद्रिपीडा बहिःस्थानं नैऋतादिक् प्रियानिलकफ- क्लेशोहिविण्मारुतः । प्रयाणक्षणो वृध्दो वाहननागलोकजननीताता मरूच्छूलकाः ।। कासश्वासमहाप्रतापवान् दुर्गोपास का धृष्टता सांगत्यं पशुभिस्तवसव्यलिपिलेख्य क्रूरभाषाः त्वगः ।। राहु के कारकत्व में निम्न विषय आते हैं- छत्रचामर राजचिन्ह), देश की समृद्धि, कुतर्क, क्रूर भाषण, नीच जाति, पापी स्त्रीयाँ, सीमाएं, वाहन, शूद्र लोग, जुआ, सन्ध्या समय, अयोग्य स्त्री से सम्बन्ध, विदेश में प्रवास, अपवित्रता, हड्डी या गांठ के रोग, झूठ बोलना, नीचे की तथा उत्तर दिशा, सँपेरे, यम, म्लेंच्छ, आदि नीच लोग, बुरी गांठें, वन, पर्वत, बाहर के स्थान, नैऋत्य दिशा, वात तथा कफ की पीड़ा, सांप, हवा छोटे और बड़े सरपट चलनेवाले प्राणी, सोए हुए प्राणी प्रवास का समय, वृध्द, वाहन, नागलोक, नाना, वातशूल, खांसी, श्वास, दुर्गा की उपासना, ढीठपना, पशुओं की समृध्दि, दांए ओर से लिखी जानीवाली लिपि (उर्दू आदि तथा क्रूर भाषा।) 
हमारे मत से राहु के कारकत्व के विषय-तर्कशास्त्र, स्थानिक स्वायत्त संस्थाएं- म्युनिसिपालिटी, जिला परिषद, विधान सभा, लोकसभा, रेल्वे कर्मचारी, कमिशन एजेन्ट, विज्ञापन एजेन्ट, रबड़, डामर, बिजली सामान, गांजा, भांग उन्मादअवस्था, हिप्नाटिझम-मेस्मेरिजम, बदलते रंगों के फूल तथा प्राणी, बरफ, सर्कस, सिनेमा, सेल्यूलाइड, दुराग्रह, उद्धतपन, विनाशक बाते, भ्रम-आभास, पिशाच-भूतबाधा, दादा की स्थिति कल्पना तथा संशोधन में निपुणता, अफवाहें फैलाना, निराधार बातें करना, कार्य में प्रेरणा, पूर्वपरम्परा-प्राचीन संस्कृति का अभिमान, अद्भुत की रुचि, आकस्मिक-विलक्षण बातें, अस्पष्ट अव्यवस्थित जरताव, घपले-गबन, पवित्रता, विश्वबन्धुता, वासनारहित होना, भक्तियोग, आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान, मुक्ति, घरके खेल-ताश, कैरम, पांसें, पहेलियाँ सुलझाना आदि।


राहु का कुछ अधिक विवरण

इस ग्रह की गति दैनिक ३ कला २१ विकला है। इसे बारह राशियों के भ्रमण के लिए ६७८५ दिन २० घटी २५ पल ७१६३ विपल इतना समय लगता है। यह लगभग १८ वर्ष ७ मास २ दिन हेता है। इस के विषय में विलीयम लिली के विचार इस प्रकार हैं- यह पुरुष प्रकृति है। गुरु तथा शुक्र के मिश्रण जैसा स्वभाव है। यह भाग्यदायी है। यह शुभ ग्रहों के साथ हो तो उन के शुभ फल अधिक मिलते है। अशुभ ग्रहों के साथ हो तो वे फल कम अशुभ होते है। केतु यदि अशुभ ग्रहों के साथ हो तो अशुभ फल अधिक तीव्र होते है। शुभ ग्रहों से प्राप्त होनेवाले फलों में केतु की युति से आकस्मिक विघ्न आते हैं तथा बना-बनाया काम बिगड़ जाता है। शुभ ग्रह केन्द्र में या बहुत अच्छे योग में हो तभी केतु का यह दोष दूर हो सकता है।

मेष- यह पुरुष राशि, दिन की, स्थलांतर सूचक (चर), रुक्ष, उष्ण, अग्नि तत्व की है। तामसी, पशु चैनबाजी, उध्दतपन, असंयत व्यवहार, लाल रंग की द्योतक यह राशि मंगल की प्रधान राशि है। यह राहु के लिए अशुभ है।

वृषभ- यह स्त्री राशि, भूमि तत्व की, शीतल, रुक्ष, उदासीन, स्थिर, रात्रि की तथा नीम्बू रंग की राशि शुक्र की गौण राशि है। यह राहू के लिए शुभ है।

मिथुन- यह पुरुष राशि, वायु तत्व की, उष्ण, आर्द्र, लाल रंग की, दिन की, बुध की प्रधान राशि है। यह राहु की उच्च राशि है अतः राहु के लिए अशुभ है। कर्क- यह स्त्री राशि, जल तत्व की, शीत, आर्द्र, कफ प्रकृति की, नारंगी या हरे रंग की, रात्रि की, चर, कम वाणी की, चन्द्र की प्रधान राशि है। यह राहु के लिए शुभ है।

सिंह - यह पुरुष राशि, अग्नि तत्व की, उष्ण, रुक्ष, क्रोधी प्रकृति, दिन की, पशु वन्ध्या, लाल या हरे रंग की, सूर्य की प्रधान राशि राहु को बहुत प्रिय है।

कन्या यह स्त्री राशि, पृथ्वी तत्व की, शीत, उदासीन, वन्ध्या रात्री की, नीले-काले रंग की, बुध की गौण राशि, राहु के लिए अशुभ है । इस में राहु अन्ध ऐसा कहा गया है।

तुला - यह पुरुष राशि, उष्ण, आर्द्र, आरक्त, चर सांपातिक, मनुष्य प्रकृति, दिन की, काला या गहरा पीला रंग, शुक्र की प्रधान राशि, राहु के लिए अशुभ है।

वृश्चिक- यह स्त्री राशि, शीत जलतत्व की, रात्री की, कफ प्रकृति की, स्थिर, गहरे पीले रंग की, मंगल की गौण राशि है। वृश्चिक विषदर्शक है तथा राहु विषकारक हैं अतः यह राशि राहु की प्रिय राशि है।

धनु- यह पुरुष राशि, अग्नि तत्व की, उष्ण, रुक्ष, तामसी, दिन की, वन्ध्या, पीले या आरक्त हरे रंग की, गुरु की प्रधान राशि राहू के लिए अति अशुभ है।

मकर- यह स्त्री राशि की, शीत, रुक्ष, उदासीन, पृथ्वी तत्व की, चर चतुष्पाद, काले या गहरे पीले  नीले रंग की, शनि की गौण राशि राहू को शुभ है।

कुम्भ- यह पुरुष राशि, उष्ण, आर्द्र, दिन की, रक्ताधिक्य स्थिर सूचक,अस्मानी (फिरोज़ी) रंग की शनि की प्रधान राशि राहू की अशुभ राशि है।

मीन- यह स्त्री राशि, फलदायी, कफप्रकृति, जलतत्व की, द्विस्वभाव, चमकीले सफेद रंग की, रात्रि की, गुरु की गौण राशि राह को शुभ है। विलियम २१

लिली ने इसे आलसी, निष्क्रिय निस्तेज स्वभाव की कहा है किन्तु यह हमे उचित प्रतीत नहीं होता।

राहु का उच्च नीचत्व

राहोस्तु कन्यका गेहं मिथुन स्वच्चमं स्मृतम् । उच्चश्चं मिथुने सिंहिकासुतः । राहुर्युग्मे तु चापे च तमोवत्त्वेतुजं फलम् ।। कुछ आचार्यों के मत से राहु का स्वगृह कन्या तथा उच्च राशि मिथुन है- नीच राशि धनु है। राहोस्तु वृषभं केतोवृश्चिक तुंगसज्ञितम । मूलत्रिकोणं कुंभं च प्रियं मित्रमभमुच्यते।। अन्य आचार्यों के मत से राहु की उच्च राशि वृषभ, केतु की उच्च वृश्चिक, मूलत्रिकोणं कुम्भ एवं कर्क प्रिय राशि है। नारायणभट्ट ने राहू का स्वगृह कन्या, उच्च मिथुन, नीच धनु, वर्ण आदि शनि जैसा, मूलत्रिकोण कर्क माना है- कन्या राहुगृहं प्रोक्तं राहूच्चं मिथुनं स्मृतम् । राहुनीचं धनुर्णीदिक शानिविदस्यच ।। मूलत्रिकोणं कर्कचं ।।

राहु का शत्रु मित्रत्व व स्वभाव

राहु के लिए मंगल शत्रु, शनि सम एवं शेष ग्रह मित्र है। पश्चिमी ज्योतिषी राहु को पुरुष ग्रह मानते हैं। मन्त्रेश्वर ने इसे स्त्री ग्रह माना हैं शशितमःशुक्रःस्त्रियः । राहु १।३ १५ ॥७।९।११ इन स्थानों में पुरुष राशि में हो तो तामसी होता हैं। इन स्थानों में स्त्री राशि में तथा अन्य स्थानों में वह सत्त्वगुणी होता है।

राहुप्रधान व्यक्ति का वर्णन

यह व्यक्ति स्नेहशील होता हैं। काम करने के पहले बोलना पसन्द नहीं करता। विचारपूर्वक, परख कर कोई काम करता है। प्रंपच में आसक्त होता है, स्वार्थ पूरा कर फिर परोपकार करता है। अभिमानी, मान का इच्छुक होता है। तीव्र बुद्धि का, महत्वाकांक्षी तथा श्रेष्ठ इच्छाओं की पर्ति के लिए बहुत प्रयत्न करता है। बहुत बोलना नहीं चाहता किन्तु लेखन में सरस, तेजस्वी तथा काव्यपूर्ण होता है। स्वभाव से सरल, स्वतंत्र एक मागी व्यवस्थित, स्पष्ट होता है। यह दूसरे के काम मे दखल नहीं देता तथा दूसरों द्वारा अपने काम में दखल देना पसन्द नहीं करता । यह न्याय को समझ कर अन्याय के विरुध्द झगड़ता है। कल्पनाशक्ति स्वैर होती है किन्तु उस का दुरुपयोग नहीं करता। सामाजिक व राजनीतिक सुधार की कोशिश करता है। इसी से बरताव तथा बोलचाल में स्थिरता रहती है। अपने उद्योग में मग्न, वादविवाद में कुशल, दूसरों पर प्रभाव डाल कर काम कराने में निपुण, दूसरों के प्रभाव में न आनेवाला, जीवन मे सफल, प्रखर नैतिक आचरण से युक्त भाग्यवान, प्राचीन संस्कृति का अभिमानी, किन्तु पर धर्मों के बारे में सहिष्णु, परोपकार में तत्पर, कुटुम्ब के बड़ों से नम्रता का व्यवहार करनेवाला, धैर्यवान, बुद्धिमान, पैसे के लेन-देन में दक्ष व सरल होता है।

कुण्डली में राहु अशुभ योग मे हो तो वह व्यक्ति बुद्धिहीन, दुष्ट लोकसंग्रह से पराङमुख बहुत स्वार्थी, दुरभिमानी, मत्सरी, अविश्वसनीय झूठे आचरण से पूर्ण, विक्षिप्त, अव्यवहारी, उद्दण्ड, निर्लज्ज उद्देशरहित छिद्रान्वेषी, अपने ही मत को श्रेष्ठ मान कर दूसरों को ताने देनेवाला, दूसरों का अहित करने की इच्छा करनेवाला, अति अभिमानी होता है।

राहु के अन्य ग्रहों से होनेवाले युति के शुभ-अशुभ फल के बारे में श्री प्रधान द्वारा संपादित ज्योतिर्माला मासिक में थाना के स्व.स.ग. मुजुमदार ने इस प्रकार विवरण दिया था- राहू की गति राशिचक्र में उलटी-मीन- कुम्भ-मकर आदि तथा कुण्डली मे भी उलटी-लग्न-व्यय-लाभ - दशम इस प्रकार होती हैं। अन्य ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर जाते हैं तो राशिचक्र व राहू पूर्व से पश्चिम की ओर घूमते हैं- मानों अन्य ग्रह राहु के मुख में प्रवेश करते हैं। कल्पना कीजिए कि चन्द्र सिंह के १० वे अंश में है और राहू १५ वे अंश में है- इस स्थिति में चंद्र राहू के मुख में प्रवेश करता है। यह योग शुभ है। राहू १५ वे अंश में और चन्द्र २० वें अंश में हो तो चन्द्र राहू से पृष्ठभाग पर है- यह मध्यम शुभयोग है। राहू १५ वे अंश मे और चन्द्र २७ वे अंश मे हो तो चन्द्र राहू के पुच्छभाग पर है- यह अशुभ योग हैं।

राहू की दृष्टि

पराशर- सुतमदननवान्ते पूर्णदृष्टिं तमस्य युगलदशमगेहे चार्धदृष्टिं वदन्ति । सहजरिपुविपक्षान पाददृष्टिं मुनीन्द्रा निजभूवनपेतो लोचनान्धः प्रदिष्टः ।। राहू की दृष्टि ५-७-९-१२ इन स्थानों पर पूर्ण होती है, २-१० पर आधी होती है तथा ३-६ पर पाव दृष्टि होती हैं। यह स्वगृह में हो तो दृष्टि नहीं होती अन्ध होती है। यह दृष्टि अन्य ग्रहों के समान देखना चाहिए या राहू की गति के अनुसार उलटे स्थानक्रम से देखना चाहिए इस का स्पष्टीकरण नहीं मिलता। हमारे विचार से राहू की दृष्टि सिर्फ सप्तम स्थान पर मानना चाहिए।

राहु के राशिगत व स्थानगत फल
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक दुर्बल, निर्बुद्धि, कामचोरएवं चिड़चिड़े स्वभाव का होता है। चेहरे पर काले दाग रहते हैं। कामवासनातीव्र होती है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक अस्थिर, चंचल,वाचाल, कामी एवं उद्यमी एवं वादविवाद में माहिर रहता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक धैर्यवान,स्वाभिमानी, क्रूर, योगाभ्यासी, संगीत एवं कलाप्रेमी होता है।

    4. कर्क कर्क राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक संकुचित वृत्ति का,

    चिंताग्रस्त, निर्धन, रोगी एवं भूत-प्रेत बाधा से ग्रस्त रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक मननशील एवं सज्जनरहता है। उसे सजा का भय रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक साहित्य एवंकलाप्रेमी, विद्वान, लोकप्रिय, सामाजिक या सार्वजनिक कायों में रुचि लेनेवालाहोता है।

    7, तुला-तुला राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक रोगी, क्रोधी, स्वार्थी,अल्पायु एवं कामातुर रहता है। पत्ली के कारण वह हमेशा चिंताग्रस्त रहताहै।

    8, वृश्चिक वृश्चिक राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक दुष्ट, धूर्त,व्यसनी, कपटी, अभिमानी एवं चरित्र से भ्रष्ट रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक दतक बनकर यावसीयत से संपत्ति प्राप्त करता है।
    10. मकर-मकर राशि का राहु कुंडली में हों तो जातक अस्वस्थ, कुसंगति,दुष्प्रवृत्ति का एवं स्त्रियों के साथ विश्वासघात, करनेवाला होता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का राहु कुंडली में होने पर जातक आलोचक, गंभीरविचारवाला, संत, उपदेशक, शत्रुहंता एवं कंजूस रहता है।

    12. मीन-मीन राशि का राहु कुंडली में हो तो जातक सात्विक एवंकलाप्रेमी होता है।

द्वादश भावो  राहु का विशेष फलित
 राहु के फलित के विषय में मुख्य रूप से निम्न बातें ध्यान में रखनीआवश्यक हैं:
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    2. जिस भाव में राहु होगा उसके अनुसार वह फल देगा। भाव के शुभ फलमें वह न्यूनता रखेगा। भाव का स्वामी 6, 8, 12 में से किसी.स्थानमें हो तो उस स्थान के फलित में राहु न्यूनता रखेगा। जिस भाव कास्वामी राहु के साथ होगा उस भाव के अनिष्ट फल मिलेंगे।
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3. जिस भाव में राहु होगा और जिस भावेश के साथ उसकी अंशात्मकयुति रहेगी, उस भाव के अनिष्ट फल प्राप्त होंगे। राहु से 12 अंश केअंतर में भावेश हो तो ग्रहण जैसी स्थिति प्राप्त होती है एवं अशुभ फलप्राप्त होते हैं।
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    4. जिस भाव में राहु हो, ऐसे भाव के भावेश के साथ युति होती हो एवंपरस्पर अंतर 14 अंशों से अधिक हो तो उस भावेश का जो भला-बुराफल होगा वही प्राप्त हौगा। इसके विपरीत अंशात्मक युति यां परस्परअंतर 14 अंशों से कम हो तो बुरे फलों की तीव्रता बढ़ेगी। शुभ फलोंकी हानि होगी। उस भावेश को दुर्बल बनाकर शुभ फल देने से उसेभी प्रभावित करेगा।
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    5. राहु केंद्र में हो एवं त्रिकोण के स्वामी के साथ युति करता हो तो योगकारक एवं शुभ फल प्राप्त होंगे। किंतु परस्पर अंतर 14 अंशों सेअधिक होना चाहिए।
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    6. राहु के साथ रहनेवाले ग्रह यदि राहु के मित्र होंगे तो अशुभ फल कमपरिमाण में प्राप्त होंगे।
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द्वादश स्थानों में राहु के स्थानगत फल
1) प्रथम भाव -    प्रथम स्थान (लग्न भाव)
लग्नस्थान के राहू के फल
    1. जिस भाव में राहु हो उस भाव का जो भावेश होगा उसके अनुसार फलप्राप्त होंगे। अर्थात जिस भावेश के अच्छे-बुरे फल हों वही फल वहां राहु के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त होंगे। भावेश से अधिक तमो ग्रह राहु अधिक फल देगा!

वैद्यनाथ - क्रूरो दयाधर्मविहीनशीलो राहौ विलग्नोपगते तु रोगी। यह क्रूर, निर्दय, अधार्मिक, शीलहीन व रोगी होता है। रविक्षेत्रोदये राहौ राजभोगाय संपदि। स्थिरार्थ पुत्रवान् कुरुते मंदक्षेत्रोदये शिखी ।। लग्न में सिंह राशि में राहू हो तो राजवैभव मिलता है। 
नारायण - अजवृषकर्किणि लग्ने रक्षति राहुः समस्तपीडाभ्यः । पृथ्वी- पतिः प्रसन्नः शतापराध यथा पुरुषम् । राजा की कृपा हो तो सैकड़ों अपराध करनेवाले पुरुष की भी रक्षा होती है उसी प्रकार लग्न में मेष, वृषभ या कर्क में राहु समस्त पोड़ा दूर करता है।

गर्ग - सर्वांगरोगी विकलः कुमूर्तिः कुवेषधारी कुनखी कुकर्मा। अधार्मिकः साहसकर्मदक्षों रक्तेक्षणश्चंद्ररिपौ तनुस्थे ।। यह रोगी, विकल, कुरूप, दुराचारी, साहसी, लाल आंखों वाला तथा अधार्मिक होता है। इस के नख तथा वेष अच्छे नहीं होते। राहौ लग्नगते जातः संचयं कस्य कुत्रचित् सिंहकर्किणि मेषस्थे स्वर्णलाभाय मंगलः ।। लग्नस्थ राहु किसी तरह कहीं धनलाभ कराता है। सिंह, कर्क या मेष में हो तो धनलाभ के लिए यह शुभ होता है।
यस्य लग्ने स्थितस्तस्यान्दोलिता प्रकृतिर्भवेत् ।। यह चंचल स्वभाव का होता है। राहुः यत्रस्थो तत्र कृष्णलांछनम्। राहु जिस स्थान में हो वहां काला चिन्ह होता है (लग्न में हो तो चेहरे पर होगा ) ।

मन्त्रेश्वर- लग्नेऽहा वचिरा युरर्थबल वानू र्ध्वागरोगान्वितः । लग्न मेंराहु आयु, संपत्ति, तथा बल को चंचल करता है। इस से मुख के रोग होते हैं। 

बृहद्यवनजातक- लग्ने तमो दुष्टमतिस्वभावं नरंच कुर्याक् स्वजनानुवंच कम् । शीर्षव्यथां कामरप्सेन युक्तं करोति वादैविजय सरोगम् ।। इस की बुद्धि दुष्ट होती है, अपने ही लोगों की वंचना करता है। सिर में रोग होता है। कामभाव तीव्र होता है। बाद में जय मिलता है। 

आर्यधन्थ- रोगी सदा देवरिपौ तनुस्थे कुले च धारी बहुजल्पशीलः । रक्तेक्षणः पापरतः कृकर्मा रतः सदा साहसकर्म दक्षः।। यह रोगी, कुल का अभिमानी, बहुत बोलने वाला, दुराचारी, लाल आखों वाला, साहसी, पापी होता है। 

नारायणभट्ट- स्ववाक्ये समर्थःपरेषां प्रतापात् प्रभावात् समाच्छा- दयेस स्वान परार्थान् तमो यस्य लग्ने स भग्नारिवीर्यः ।। यह दूसरों की सहायता से कार्य सम्पत्र करता है, अपना कथन पूर्ण करता है, शत्रुओं का नाश करता है, अपने और दूसरे लोगों को प्रभावित करता है।

हरिवंश- उच्चसंस्थेपि कोणे तनी मानवं भूपतुल्य सद्रव्यं प्रकुर्यादहिः । शेषसंस्यो रुजाक्षिणदेहं शठं दुःखभाजं भयेनान्वितं संभवेत् । । लग्न में उच्चस्थ राहु राजवैभव देता है। अन्य राशि में हो तो रोगी, दुष्ट, दुःखी, भयभीत होता है।

घोलप - यह राहु मेष वृषभ व कर्क में हो तो सब दुःख दूर करता हैं। अन्य राशि में हो तो राजा से द्वेष, रोग, चिन्ता होती है। 

गोपाल रत्नाकर - यह राहु मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या तथा मकर में हो तो राजयोग होता है। सुखी व दयालु होता हैं । अन्य राशि में हो तो यह पुत्रहीन होता हैं अथवा मृत पुत्र होते हैं।

वसिष्ठ- यह राहु दुःखदायी है।

लखनऊ के नबाब - अव्वलखाने यदा राहुः खिश्मनाश्च काहिलः। मनुजः स्वार्थकर्ता स्याद्भवेद्वरो तु जाहिलः।। यह सदा दुःखी, कुरूप आलसी, स्वार्थी व मूर्ख होता है।

पाश्चात्य मत – लग्नस्थ राहु बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह व्यक्ति अति हीन दशा से अति उच्च दशा तक पहुंचता है। लोगों की नजरों मे श्रेष्ठता मिलती है। यह शक्तिमान, पराक्रमी, अभिमानी, जल्दी कीर्ति प्राप्त करने वाला, लोगों को परवाह न करने वाला होता है, शिक्षा की ओर इस का विशेष ध्यान नहीं होता। यह प्राचीन संस्कृति का अभिमानी होता है। नई बातों को जल्दी ग्रहण नहीं करता। इस का बदन छरहरा तथा कद ऊंचा होता है। 

अज्ञात मृतप्रसूतिः । मेषवृषभ, कर्कराशिस्थे दयावान् बहुभागो । अशुभेऽशुभदृष्टे मुखे लांछनम्। तनुस्थले यदा राहुः स्ववाक्य परिपालकः । बहुदाररतः पुंसः कामाधिक्यं सुवेषवान् ।। इस की सन्तति मृत होती है। मेष, वृषभ, कर्क में यह राहु हो तो यह दयालु तथा बहुत भोगों से संपन्न होता है। यह अशुभ हो अथवा अशुभ ग्रह से दुष्ट हो तो मुख पर दाग रहता है। यह अपने वचन का पालन करने वाला, अनेक स्त्रियों में आसक्त, अति कामी तथा सुन्दर वेष धारण करनेवाला होता है। धूने केतुः कलत्रादि न किंचित् सुखमाप्नुयात् । मार्गे चिन्ता जल भीतिः स्वगृहे लाभदायकः।। देहे मरुल्लतीपीडा कलही वैभवी क्षयम् । पुत्रमित्रादिकं कष्टं राही जन्मनि लग्नगे ।। लग्न मे राहू व सप्तम मे केतु से स्त्री तथा पुत्र का सुख नही मिलता, मित्र नही होते, मार्ग मे कष्ट, जल से भय रहता है।। वातरोग से पीड़ा होती है। यह झगड़ालू, धन का क्षय करने वाला होता है। राहु स्वगृह मे हो तो लाभ देता है।

श्री चित्रे - लग्न में राहू अल्पायुषी करता है। मेष वृषभ, कर्क, मिथुन तथा वृश्चिक में हो तो दीर्घ आयु मिलती है। यह व्यक्ति आलसी, अपने ही लोगों की वंचना करनेवाला, कामातुर तथा वादप्रिय होता है। यह अपनी पत्नी से असन्तुष्ट होता है। यह सन्ततिहीन, अन्यायी होता है। यह राहू सिंह में हो तो सम्पत्ति देता है। मेष, कर्क, मिथुन, कन्या या मकर में हो तो नौकरी सफल रहती है। यह दयालु, बुद्धिमान तथा सुस्वभावी पत्नी से युक्त होता है। कन्या, मिथुन व कुम्भ लग्न में राहु अच्छा वैभव देता है।
    राहु-राहु पाप प्रकृति का स्त्रीलिंग ग्रह है। यह पुनर्जन्म, व्यभिचार,महामारी, गंदे स्थान, विदेश यात्रा, नीच जाति के लोगों से संबंध, जातककी भोगवादिता, आदि का प्रतिनिधित्व करता है। यह त्वचा रोग, कॉलरा(विसूचिका), चेचक, कुष्ठरोग, मिर्गी, रक्त विशाक्तता खुजली, मलेरिया,प्लेगा, आदि रोगों का कारक होता है। यह दादा, नानी का धोतक होताहै। राहु व्यक्ति को एक ओर अपमार्गी, समस्याग्रस्त, श्रमित, शोषितबनाता है, तो दूसरी ओर उसे स्वभावतः भौतिक सुखों के प्रतिरूचि उत्पन्नकरता है। फल अधिकांशतः अन्य ग्रहों से इसकी राशि, युति और दुष्टिपर निर्भर करते है।
    (i) लग्न में राहु
    जातक हमेशा रोगी, असामाजिक व अधार्मिक मान्यताओं वाले लोगोंका संग करने वाला, बातूनी, लाल आँखों वाला, बुरे कर्म करने वाला,परन्तु बहादुर व साहसिक कार्य करने में दक्ष होगा।
    -मानसागरीहोगा।जातक अल्पजीवी, धनी, सुदृढ़ परन्तु सिर और चहरे के रोगों से ग्रस्त
    -फलदीपिका
राहु और केतु लग्नस्थ होने पर पत्नी की मृतजात (मृत संतान) केकारक होते है। यदि राहु या केतु, मेष, वृष, कर्क राशि में है तो जातकदयालु और मनोरंजन का शौकीन होगा। यदि उन पर पाप ग्रह की दृष्टिहैं तो जातक के चेहरे पर चेचक या अन्य किसी प्रकार के निशान होगें।
 -पृगु
 राहु की स्थिति जातक को गर्भपात्, रोगी पत्नी या पति देती है वजातक को कृतज्ञ और सहृदयी करती है।
-डॉ रामन
हमारे विचार- साधारणतः आचार्यों ने इस स्थान में राहू के फल अशुभ बताये है। ये फल सिंह से भिन्न पुरुष राशियों के हैं। (राहू के फल वर्णन में जहां पुरुष राशि कहा है वहाँ सिंह को छोड़कर अन्य राशि समझना चाहिए तथा स्त्री राशि कहा है वहां वृश्चिक का अपवाद करना चाहिए) लग्न मे राहू का साधारण फल - इस व्यक्ति की शिक्षा द्वितीय श्रेणी में चलती है। मजाक में यह अपमान भी सह लेता हैं किन्तु वह बात मन में रख कर समय पर बदला लेने की पूरी कोशिश करता है। इस के बोलने, और बरताव में मेल नहीं होता। खुद के दोष न देख कर दूसरों के दोष देखते रहता है। हमेशा दूसरों की निंदा करता हैं। अपनी गलतियों के लिये भी दूसरों को दोष देता है। आग्रही, हठी अस्थिर, कुछ व्यभिचारी होता है। राहु शुभ सम्बन्ध में हो तो- लोगों के कल्याण के लिये कोशिश करता है। शान्त, सरल, व्यवस्थित, सदाचारी, बोलने बरताव में शान्त, मान अपमान की फिक्र न करने वाला, हंसमुख, उच्च व्यक्तियों की मित्रता प्राप्त करने वाला होता है। यह राहु पुरुष राशि में हो तो द्विभार्या योग होता है। स्त्री राशि में हो तो एक विवाह होता है, स्त्री सुख कम मिलता है। मेष, सिंह, धनु में- उद्दन्ड पौरुष की वृत्ति होती है। यह दत्तकयोग होता है। यह मित्रों का कहना नहीं मानता अपनी इच्छा से ही बरताव करता है। अभिमानी होता है, मिलनसार नहीं होता । दैववादी, किसी बात के पीछे पड़नेवाला होता है। शिक्षा अधूरी होती है। मेष में खुले दिल का, उदार होता है। सिंह में दयालु, व्यवस्थित होता हैं । धनू में दूसरों के व्यवहार से अलग, लोगों पर प्रभाव रखता है। वृषभ, कर्क, कन्या, मकर मीन में-लोगों के कामों में दखल देता है। ध्येय्यरहित, कुल के अभिमानी होता है। मिथुन, तुला, कुम्भ में छिद्रान्वर्षा, लोगों का बुरा चाहने वाले, विपत्ति में शत्रु पर प्रतिशोध लेने वाले, गद्दार स्वभाव के, गप्पे लड़ाने वाले, सदा आनन्दी, बहुत बोलने वाले, काम अधूरा छोड़कर उसे भूल जाने वाले होते हैं। स्त्री राशियों में बरताव अव्यवस्थित, हावभाव के साथ बोलना, साधारण बोलने में बहुत अंगविक्षेप करना, दुष्ट स्वभाव होता है। वृश्चिक में- मन के साफ, निष्कपट होते हैं। इन का क्रोध क्षणिक होता है। वातरोग होते है। यह द्विभार्यायोग होता है। पहली पुत्रसन्तति की मृत्यु होती है।

आयु के विषय में विचार- लग्न या दशम में राहु से १६ वे वर्ष में मृत्यु होती है। ऐसा एक मत है- लग्ने च दशमे राहुः जन्मकाले यदा भवेत् । षोडशाब्दे भवेन्मृत्युयंदि शक्रोऽ पि रक्षति।। दशमो यस्य वै राहुर्जन्मलग्ने यदा भवेत्। वर्षे तु षोडशे ज्ञेयो बुधैमुत्युनैस्य च । किन्तु हमारे मत से राहु मृत्युकारक ग्रह नहीं है अतः इन फलों का अनुभव मिलना कठिन है। श्री. चित्रे ने सारावली के एक श्लोक का आधा भाग देख कर लग्नस्थ राहु में पांचवे वर्ष में मृत्यु होती है ऐसा कहा है। किन्तु यह पूरा श्लोक इस प्रकार है- दर्शनभागे सौम्याः कूराःत्वादृश्यके प्रसवकाले । राहुलग्नोपगतो यमक्षयं नयति पंचमभिर्वर्षेः । अर्थात् सौम्य ग्रह कुण्डली के दृश्य भाग में और क्रूर ग्रह अदृश्य भाग में हो कर लग्न में राहु हो तो पांचवें वर्ष मृत्यु होती है। इस विषय में एक और मत इस प्रकार है- घटसिंहवृश्चिकोदयकृत- स्थितिर्जीवितं हरती राहुः । पापैर्निरीक्ष्यमाणः सप्तमितैर्निश्चितं वर्षेः कुम्भ, सिंह या वृश्चिक लग्न में राहु पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो सातवें वर्ष में मृत्यु होती है। हमारे विचार से राहु मृत्यु कारक ग्रह नहीं है। इस से शारीरिक कष्ट का फल मिलता हैंl

लग्न में राहु हो तो उसके भले-बुरे दोनों फल प्राप्त होते हैं। ऐसा जातकक्रूर, निर्दयी, चरित्रहीन, नास्तिक, रोगी, चंचल, बदसूरत, धैर्यवान, लालआंखोंवाला, कुसंगति से युक्त, शत्रुहंता, वादविवादपटु, कामातुर, वाचाल, सिरएवं छाती के रोगों से ग्रस्त और बात का पक्का होता है। संतान अल्पायु यामृत जन्म लेती है।

    लग्न में सिंह, मेष, वृषभ, कर्क या मिथुन राशि का राहु हो तो वह शुभफलदायी होता है। जातक दयालु, भाग्यवान, राजपुत्र जैसा वैभवयुक्त, प्रभावी,धनवान, शासन का कृपापात्र रहता है। इसके द्वारा चाहे जितने अपराध होनेपर भी कृपा के कारण उसकी रक्षा होती है। 5, 7, 19 आदि वर्षों में शारीरिककष्ट होता है। यवन ज्योतिषविदों ने भी यही वर्ष शारीरिक कष्ट के बताए हैं।

    पाश्चात्य विद्वानों की राय में लग्न में राहु हो तो जातक प्रभावी, निम्न स्तरसे शिखर तक पहुंचनेवाला, समाज में उच्च स्थान प्राप्त करनेवाला, सांस्कृतिक,अभिमानी, संरक्षक एवं वचन का पक्का, दूसरों की उपेक्षा करनेवाला होता है।लग्न में राहु-शनि की युति हो तो जातक हमेशा बीमार रहता है।
    प्रधस भाव-लग्नकुंडली के प्रथम भाव में राहू हो तो जातक स्वार्थी,शकी, वहमी, कामुक, नीचकर्मा, कम संतान वाला, दुर्वल स्वास्थ्य वाला, शिरीरोगसे पीड़ित, विद्रोही स्वभाव का लेकिन पढ़ाकू होता है। प्रायः ऐसा जातक, धनी वतरकी करने वाला होता है (किन्तु कुंडली के जिस भाव में सूर्य बैठा हो, उस भावसे सम्बन्धित फलों का ह्ास होता है) । ऐसे जातक का सम्पूर्ण जीवन अंधकारपूर्णनहीं होता। कोई पक्ष यदि खराब होता है तो कोई पक्ष काफी अच्छा भी हो.जाता है।फिर भी ऐसे जातक को संघर्ष करना पड़ता है। जिससे वह अभिमानी हो जाता है।वैवाहिक जीवन के कलेश एवं वियोग सम्भावित होता है।
    लाल किताबं के अनुसार लग्न में राहू हो तो जातक दीन घर में जन्म लेकरभी संघर्ष करके ऊंचा स्थान पाता है। शिक्षा में व्यवधान या लापरवाही सम्भव है।पर जातक अभिमानी, शक्तिशाली, कीर्ति प्रास्त करने वाला व समाज की परवाह नकरने वाला होता है। यदि पुरुष राशि (सिंह को छोड़कर) का राहू हो तो 'द्विभार्यायोग' बनाता है। किन्तु स्त्री राशि (वृश्चिक को छोड़कर) में एक ही विवाह रहताहै। मेष राशि में उदार, सिंह राशि में दयावान, धनु राशि में औरों से अलग रहनेवाला, मकर व मीन में दूसरों के फटे में टांग अड़ाने वाला तथा मिथुन, तुला औरकुम्भ राशियों में राहू हो तो जातक मीन-मेख निकालने वाला, छिद्रान्वेषी होता है।
    उच्च का राहू (वृष/मिधुन) जातक को साहसी बनाता है व शत्रुओं का मान-मर्दन करने वाला होता है। ऐसे जातक की नाक चौड़ी होती है (वृष में विशेष रूपसे)। शुक्र व चन्द्र भी राहू के साथ लग्न में हाँ तो जातक प्रेम विवाह करता है।लग्नस्थ राहू गुसांग सम्बन्धी कोई विकार भी दे सकता है।
    स्त्री जातकों में लग्नस्थ राहू जातक को बातूनी, ऊंचा बोलने वाली, कलेशकारिणी, फूहड़ तथा सामंजस्य न करने वाली बनाता है। ऐसी जातक कोगुस्तांग/गर्भाशय या माहवारी सम्बन्धी तकलीफ रहती है। वह सन्तान उत्पन्न करनेमें या तो अक्षम होती है या परेशानी से सन्तान प्राप्त होती है। चन्द्रमा भी पाप प्रभावमें हो तो ऐसी जातक का चरित्र भी संदिग्ध होता है। लगनस्थ राहू तलाक या वैधव्ययोग भी बनाता है। सप्तमेश भी निर्बल और पाप प्रभाव में हो तो ऐसा होना लगभगसुनिश्चित हो जाता है।
मेरा अपना अनुभव है कि राहू के अशुभ प्रभाव से यदि लगन या जातकप्रभावित हो तो उसके ऊपर के दांत बाहर को निकले हुए, चौड़े या टेढ़े होते हैं।ऐसी जातक एक नम्बर की अड़ियल बुद्धि की, मूर्ख, झगड़ालू, बहस करने वालीतथा चिल्लाकर बोलने बाली होती है। ऐसी जातक का विवाह तो देर से होता हीहै, सफल भी नहीं रहता। विधवा हो या तलाक हो, पति लापता हो जाए या अलगरहने लगे-कारण जो भी हो--उसे पति का वियोग झेलना ही पड़ता है तथा स्थितिदैन्य हो जाती है। सन्तान होती है, परन्तु गर्भाशय, गु्ांग या गुददा में कोई न कोईरोग स्थायी रूप से बना रहता है। किन्तु ऐसी जातक साहसी तथा स्वयं काम करकेजीवनयापन कर सकने वाली अवश्य होती है। तथा पुरुषोचित गुणों से युक्त होतीहै। यदि शनि का भी प्रभाव शामिल हो तो रंग कालिमायुक्त, दांत बड़़े व फैले हुएतथा शरीर पर बाल अधिक होने भी सम्भव हो जाते हैं। ऐसी महिलाओं को प्रायःदासवृत्ति (घर की नौकरी/बर्तन-पौँचे आदि का कार्य) द्वारा जीवनयापन करनापड़ता है। गुस्सा व अभिमान उनमें बहुत होता है तथा एक से अधिक शारीरिकसम्बन्ध तीव्रता से सम्भावित होते हैं। ऐसी महिला जातकों की रुचि मैथुन (मुखया गुदा मैथुन आदि) में विशेष रहती है।
प्रथम भावः लग्नस्थ राहु अति महत्वपूर्ण फल प्रदान करता है। शुभप्रभाव में आया राहु दीनावस्था में उत्पन्न जातक को भी महत्त्वपूर्ण स्थान तक ले जाने में सक्षम होता है। ऐसा जातक समाज में श्रेष्ठ समझा जाता है तथाशक्तिशाली, अभिमानी, पराक्रमी और शीघ्र कीर्ति पाने वाला होता है। उसेलोगों की निन्दा या बड़ाई से कुछ लेना-देना नहीं होता, किसी की परवाह भीउसे नहीं होती, शिक्षा में भी उसकी विशेष रुचि नहीं होती। पुरुष राशि का राहुलग्नस्थ हो तो द्विभार्या योग बनाता है। अग्नि राशि का राहु दत्तक पुत्र कीस्थिति बनाता है। पृथ्वी या जल राशि (वृश्चिक को छोड़कर) का व्यक्तिदूसरों के कायों में टांग अड़ाता है। वायु राशि का राहु हो तो व्यक्ति निंदक वपराये दोष ढूंढ़ने वाला होता है। स्त्री राशि का राहु एक पत्नी का अल्प सुखदेता है तथा जीवन में अव्यवस्थित रखता है।
1. लाल गेहूं लाल कपड़े में बांध कर नदी में बहावे या दान करें। 
2.चौकोर चांदी का टुकड़ा बटुये में रखें। 
3. गंगा में चांदी का सिक्काबहावें।
===========================2) द्वितीय भाव -द्वितीय स्थान (धन भाव)
धन. स्थान में राहु के फल

वैद्यनाथ- विरोधवान् वित्तगते विधुन्तुदे जनापराधी शिखिनि द्वितीयगे। राहु द्वितीय स्थान में हो तो उस व्यक्ति का बहुत विरोध होता है। 
गर्ग-मत्स्यमांसधनोनित्यं नखचर्मादिविक्रयी। जीविका चौरकृत्याच्च राहौ धनगते नरः ।। यह मांस मछली से, नख और चमड़ी बेच कर तथा चोरी के कामों से धन प्राप्त करता है। 
पुंजराज- स्याद् दन्तुरो दन्तरुगर्दितो वा सिंहीसुते चेत् धनभावसंस्थे इस के दांत टेढेमेढे होते है। अथवा दांत के रोग होते है।

बृहद्यवनजातक- धनगते रविचन्द्रविमर्दने मुखरतांकितभावयुतो भवेत्। धनविनाशकरो हि दरिद्रतां स्वसुहृदां न करोति वचग्रहम् ।। यह बहुत बोलने वाला, धन का नाश करने वाला, दरिद्री तथा मित्रों की बात न माननेवाला होता है। आर्यग्रन्थ में राहु का फल गर्ग के अनुसार तथा केतु, का फल यवन जातक के अनुसार दिया है।

मन्त्रेश्वर- छन्नोक्तिर्मुखरुग् घ्राणी नृपधनविदेषः । अस्पष्ट बोलने वाला, मुख में रोग से युक्त, राजा से धन प्राप्त करनेवाला, सुखी होता है। इस की नाक बड़ी होती है। 

नारायणभट्ट - कुटुम्बे तमो नष्टभूतं कुटुम्बं मृषाभाषिता निर्भयो वित्तपालः । स्ववर्गप्रणाशो भयं शस्त्रतश्चेत् अवश्यं खलेभ्यो लभेत, पार-वश्यम् ।। इस का कुटुम्ब नष्ट होता है, झूठ बोलता है, निडर धन का रक्षण करने वाला होता है। इस के बान्धवों का नाश होता है। शस्त्र से डरता है तथा दुष्टों के अधीन रहता है। 

जागेश्वर - धने राहुणा वर्तमाने धनी स्यात् कुटुम्बस्य नाशो भवेद् दृष्टखेटे । स्थितिर्वक्रघातस्तथा नोधनं स्याद् धन वर्धते माहिषं शत्रु नाशः ।। यह धनवान तथा गाय भैसों का स्वामी होता है। कुटुम्ब का नाश होता है। शत्रु नष्ट होते हैं। मतान्तरम्- नीचविद्यानुरक्तः यह हलके शास्त्रों में रुचि रखता है।

हरिवंश- वित्तवाताधिककान्तिः कान्ताधिको गौरवाधिक्ययुक्तो नरःस्यात् । अन्यदेशे महोद्योगः धनवान, वातरोगी कान्तिमान, सन्मानित होता है। यह विदेश में बहुत उद्योग करता है। एक से अधिक स्त्रियाँ होती हैं।

घोलप - यह गुणवान किन्तु धनहीन होता है। कठोर, दूसरों का अहित करने वाला, कुटुम्ब में झगड़े लगाने वाला, प्रवासी होता है। 

वसिष्ठ- धनभुवनगतो वित्तनाशं करोति । धन का नाश करता है।

गोपाल रत्नाकर- शरीर पुष्ट होता है। वर्ण साँवला, मुख टेढ़ा मेढ़ा, आँखें रोगयुक्त, विवाह एक से अधिक तथा पुत्र सन्तति से युक्त होना ये फल है। यह धनहीन होता है।

लखनऊ के नबाब - कृजी बाहासिदरासे मालखाने च मुप्लिसम् । करोति मनुजं वान्यदेशे धनसमन्वितम् । यह अपने काम छोडने वाला, स्वार्थी, दुःखी, विदेश में धन प्राप्त करने वाला होता है।

पाश्चात्य मत- यह दैववाला, धनवान, व्यवहार में व्यवस्थित, लोगों का विश्वासपात्र होता है। 

अद्यात- निर्धनः । देहव्याधिः । पुत्रशोकः । श्यामवर्णः । पापयुते कलत्रत्रयम् ।। शुभयुते चुबुके लांछनम् । धनव्यमनारोग्यं चिन्ता बस्तादिपीडनम् । वक्त्रलोचनपीडाच धनस्ये सिंहिकासुते।। यह धनहीन, रोगी, साँवले रंग का, पुत्र की मृत्यु से दुखी होता है। राहु के साथ पापग्रह हो तो तीन विवाह होते है। शुभ ग्रह हो तो ठोड़ी पर दाग होता है। इसे आंख के रोग होते हैं।

श्री. चित्रे यह राहु सिंह में हो तो निर्जन प्रदेश में निवास हो कर धन मिलता है। यह मनुष्यों की जीवित हानि का कारण बनता है। उच्चगो नीचगेहस्थों ग्रहो नैवात्र दोषकृत्त ।। धन स्थान में उच्च अथवा नीच ग्रह का कोई बुरा फल नहीं मिलता । इस नियम से यह राहु मिथुन कन्या या कुम्भ में हो तो शुभ फल देता है। यह स्वकार्य छोड़ने वाला, दुःखी, धनहीन, पुष्ट शरीर का, कठोर, अविवेकी होता है। विदेश में धन प्राप्त करता है। चोरी में आसक्त, हिंसक, मद्यपी, झगड़ालू, मुखरोगी, बान्धव नाशक हो सकता है । इस के दो स्त्रियां होती हैं।

हमारे विचार- इस स्थान में नारायण भट्ट, जागेश्वर, तथा पाश्चात्य लेखक ने धन के विषय में शुभ फल बताये हैं, अन्य आचार्य अशुभ फल बतलाते हैं। शुभ फल स्त्री राशियों के तथा अशुभ फल पुरुष राशियों के हैं। इस स्थान का कुछ फलादेश जैसे चोरी करना, मांस मछली बेचना आदि-उच्च वर्ग के लोगों के विषय में संभव प्रतीत नहीं होता ।

हमारा अनुभव- इस स्थान में राहु के साधारण फल शनि जैसे होते हैं। पूर्वार्जित सम्पत्ति थोड़ी मिलती है उसे बढ़ा कर सुख पूर्वक उपभोग करते हैं। इन्हे खाने के पदार्थों की विशेष रुचि होती है। बड़े व्यवसाय करने की बहुत इच्छा से कभी कभी स्थावर सम्पत्ति गिरवी रख कर भी पूंजी इकट्टी करते हैं। एक बार दिवालिया होते हैं। किन्तु फिर मेहनत से बड़े व्यवसाय में ही सफल हो कर बाजार में साख जमाते है। यह न तो कंजूस होता है, न खर्चीला- आय के अनुसार व्यवस्थित खर्च करता है। इन्हें पैसे की फिक्र नही होती- कीर्ति की इच्छा करते है। ये लोगों के प्रभाव में नही आते। ये देखने में अच्छे, स्वस्थ प्रकृति के होते है। आवाज स्त्रियों जैसा कोमल होता हैं। यह सब वर्णन स्त्री राशि में शुभ योग में राहु हो तो ठीक समझना चाहिये। अन्य राशियों में राहु अशुभ योग में न हो तो खाने पीने की कमी नहीं होती। ये लोगों के कामों में दखल नहीं देते। इन्हें मित्र कम होते हैं। अपने ही घर में मग्न रहते है। ये दूसरों को तकलीफ नहीं देते लेकिन इन्हें कोई कष्ट दे तो सहन भी नहीं करते। इस स्थान में राहु पुरुष राशि में अशुभ संबंध में हो तो - पूर्वार्जित सम्पत्ति नहीं होती, हुई तो विवादग्रस्त होती है। अथवा अपने ही हाथ से नष्ट होती है। इन की खुद की कमाई सम्पत्ति भी टिकती नही है। इन्हे अचानक अन्याय से मिली हुई सम्पत्ति कायम रहती है। उस के दुष्परिणाम उस के पुत्र पौत्रों को भोगने पड़ते हैं। यह दत्तक योग है। पिता की मृत्यु की बाद भाग्योदय होता है। मां-बाप का नाम बढ़ाते हैं। तेजस्वी, पराक्रमी होते हैं। मां बाप के जीवनकाल में यें इन्हें सुख नही दे सकते, मां बाप भी इन का मूल्य नहीं समझते। (दत्तक योग में १।३/५/७/१०/११/१२ स्थानों में शनि भी पाया जाता है। इस से शनि के शुभ फल देने की शक्ति का विचार हो सकता है।) यह द्विभार्यायोग होता है। हाथ में पैसा बचता नहीं है। कमाया हुआ सब खर्च हो जाता है। इन के मामा को सन्तति कम होती है। धन प्राप्ति के ऐन मौके पर विघ्न आते हैं। पैसे के बारे मे फिक्र नही होती। लोगों के धन के अव्यवस्थित उपयोग से अपवाद फैलाते है। २५ वें वर्ष में हानि होती हैं। २६ वें वर्ष से भाग्योदय शुरू होता है। जीविका शुरू होने के बाद विवाह होता है।३०वे वर्ष में लाभ होता हैं। इन के कुटुम्ब मे कोई न कोई बीमार बना रहता है। वृध्द वय में आंख के रोग होते हैं।

    द्वितीय स्थान में राहु हो तो जातक अनर्गल बात कहनेवाला होता है। दूसरोंकी बात नहीं मानता, वाणी अस्पष्ट एवं नाक बड़ी होती है। चोरी करने कीप्रवृत्ति रहती है। पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है। आकस्मिक रूप से परिवारकी हानि होती है, विवाह एक से अधिक होते हैं, परस्त्री संबंध रहता है।पापग्रह युक्त राहु द्वितीय स्थान में हो तो तीन विवाह या अन्य स्त्रियों से संबंधरहते हैं। शत्रु रहते हैं पर वे खत्म हो जाते हैं। द्वितीय स्थान में स्थित राहुके साथ शुभ ग्रह हो तो चिबुक या ठोड़ी पर तिल पाया जाता है। जातक आंखोंके विकारों से ग्रस्त रहता है, आर्थिक स्थिति उत्तम रहती है एवं जन्म स्थानसे अन्यत्र भाग्योदय होता है। कुछ आचायों के मतानुसार पुत्र शोकजनक फलदेता है। हमारी राय में धन स्थान में राहु हो तो जातक बड़े परिमाण मेंरिश्वतखोरी करता है। पत्नीवियोग एवं परस्त्री संबंध यह राहु करवाता है।

    यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार द्वितीयस्थ राहु दरिद्रता देता है। जातकआस्तिक, व्यवहारकुशल एवं भरोसेमंद रहता है।
द्वितीय भाव में राहु
    जातक चोर, घमंडी, अत्यधिक प्रतिकूलता भोगने वाला, माँस विक्रीया मछली के व्यापार से संपत्ति अर्जित करने वाला और नीच लोगों कीसंगति में रहने वाला होगा।
    -मानसागरी
    जातक चेहरे या मुख रोग से ग्रस्त, असत्य वाणी वाला, द्वयर्थक भाषाका प्रयोग करने वाला होगा। वह दयालु, राजा के कृपा पात्रों द्वारा सम्पदाअर्जित करने वाला, क्रोधी परन्तु प्रसन्न व्यक्ति होगा।
    -फलदीपिका
    जातक दरिद्र, शारीरिक रोगों से पीड़ित और संतान हानि से ग्रस्तहोगा। द्वितीय भाव में राहु-केतु के करण वह सांवली रंगत वाला होगा।यदि वे पापाक्रान्त है तो उसके होठों पर निशान होगा।
    -भृगु
    जातक दरिद्र एकाधिक पत्नी वाला होता है। यदि राहु पापाक्रान्त हैतो वह सांवले रंग का, रोगी चेहरे वाला, व्यग्र और राजसी भोजन करनेवाला, होगा।
    -डॉ रामन
द्वितीयस्थ राहु से परिवार में बिखराव होगा। व्यक्ति झूठा औरसंभवतया निर्भीक होगा। वह शत्रुहनन करके अपनी संपत्ति की रक्षाकरेगा।
    -चमत्कार चिंतामणि
    
    द्वितीय भाव-लग्नकुंडली के दूसरे भाव में राहू हो तो जातक कुटुम्ब सेअलग रहने वाला, विदेश में प्रसिद्धि व समृद्धि प्राप्त करने वाला, कटुभाषी/गाली-गलौच करने वाला, कंजूस व अल्प संतान वाला होता है। ऐसा जातक भक्ष्य-अभक्ष्य का सेवन करने वाला/मांसाहारी हो सकता है। यदि सूर्य द्वितीयेश भी पापप्रभाव में हो तो नेत्ररोगी भी हो सकता है। ऐसे जातक का धन या सामान भी चोरीहो सकता है। वह मदिरा सेवन करने वाला होता है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक का भाग्य एक झूले की भांति झूलतारहता है। प्रायः उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती, किन्तु गुरु की स्थितिसुद्ृढ़ हो तो. जातक आर्थिक रूप से अच्छा होता है (क्योंकि गुरु की कुंडली मेंजैसी स्थिति होती है दूसरा राहू जातक को वैसा ही आर्थिक फल देता हैं)। तबजातक की हैसियत राजा के समान भी हो सकती है। दूसरे राहू का अशुभ प्रभावदूर करने के लिए जातक को चांदी की ठोस गोली सदा अपने पास रखनी चाहिएमटर बराबर।
    राहू द्वितीयस्थ हो तो जातक स्वार्थी, आर्थिक रूप से सुदृढ़ नहीं, मांस-मदिरा का सेवन करने वाला तथा विशेष परिश्रम करने पर ही सफल होने वालाहोता है। ऐसा लाल किताब का भी मत है। ऐसे जातक को परदेस में ही जीविकामिलती है। जो काम करें उसमें अड़चनें जरूर आती हैं। पाप प्रभाव में राहू हो तोजातक गालियां देने वाला या वाणी दोषयुक्त/अपनी बात ढंग से न कह सकनेवाला, मुखरोगी तथा बड़ी नाक वाला होता है। मिधुन, कन्या या कुम्भ राशि काराहू हो तो दूसरे घर में प्रायः शुभ फल देता है। सिंह राशि का हो तो गड़ा हुआ धनप्रात होता है। स्त्री राशियों में पूर्वजों की सम्पत्ति प्रास कराता है। पुरुष राशियों मेंपूर्वजों की सम्पत्ति नहीं मिलती लेकिन बिना कमाया धन मिलता है। पंचमेश कीस्थिति सुद्ृढ़् हो तो जुआ, सट्टा, लॉटरी आदि से भी जातक को लाभ होता है।द्वितीयस्थ राहू दाई आंख में भेंगापन दे सकता है।
द्वितीय भावः द्वितीयस्थ राहु पुरुष राशि में अशुभ संबंध में हो तो पूर्वजोंद्वारा अर्जित संपत्ति का नाश होता है अथवा उसे संपत्ति प्राप्त ही नहीं होती।उसे दूसरे तरीके से संपत्ति मिलती है तथा उसका उपभोग भी जातक करता है।उस संपत्ति के मिलने के दुष्परिणाम जातक की संतान को भोगने होते हैं। राहुप्रायः शनि जैसे फल देता है इसलिए धन भावस्थ राहु भी धनाभाव देता है।स्त्री राशि का राहु हो तो व्यक्ति ब्याज पर पैसा लेकर या स्थायी संपत्ति (कृषिभूमि, मकान आदि) को गिरवी रख उद्योग करके धनार्जन करता है। न तोऐसा जातक फिजूलखर्च करता है, न ही कंजूस होता है। ऐसे लोग धन कीअपेक्षा मान-सम्मान को अधिक महत्व देने वाले होते हैं।

1. केसर का टीका लगाकर बाहर निकले। 
2. हाथी के पैर की मिट्टीकुऐं में गिरावें। 
3. हल्दी का टुकड़ा जेब में रखें।
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3) तृतीय भाव -तृतीय स्थान (सहज भाव)
तीसरे स्थान के फल

वैद्यनाथ- राहौ विक्रमगेऽतिवार्यधनिकः केतौ गुणी वित्तवान्। यह पराक्रमी, धनवान होता है। केतु हो तो गुणवान, धनी होता हैं।

गर्ग- भ्रातृगोहन्ति वा व्यंगमथवा भ्रातरं तमः । लक्षेश्वरं कष्टहीनं चिरं च तनुते धनम्। इस के भाई की मृत्यु होती है अथवा उन के शरीर मे व्यंग रहता है। यह लक्षाधीश, सुखी और चिरकाल तक धन पाने वाला होता है।

मन्त्रेश्वर- मानी भ्रातृविरोधको दृढमतिः शौर्ये चिरायुर्धनी। यह अभिमानी, धनवान, दृढ़ विचार का, दीर्घायु तथा भाईयों का विरोध करने वाला होता है। 

बृहद्यवनजातक- न सिंहो न नागो भुजाविक्रमेण प्रतापीह सिंहीसुते तत्समत्वम् । तृतीये जगतसोदरत्वं समेति प्रभावपि भाग्यं कुतो यत्र केतुः ।। यह हाथी या सिंह से अधिक पराक्रमी होता है। तथा विश्व को ही बन्धु समझता है। 

आर्यग्रन्थ- भ्रातुर्विनाशं प्रददाति राहुस्तृतीयगेहे मनुजस्य देही। सौख्यं धनं पुत्रकलत्रमित्रं ददाति शृगी गजवाजिभत्यान् ।। यह राहु भाईयों का नाश करता है। धन, पुत्र, स्त्रि, मित्र, हाथी, घोड़े, नौकर आदि का सुख देता है। 

ढुंढिराज- दुश्चिक्येऽरिभवं भयं परिहरन् लोके यशस्वी नरःश्रेयोवादिभं तदाहिलभते सौख्ये विलासादिकं । भ्रातृणानिधनं पशोश्च मरणं दारिद्रभावैर्युतं नित्य सौख्यगणैः पराक्रमयुतं कुर्याच्च राहु सदा। यह शत्रु का भय नष्ट कर कीर्ति देता है बाद में जय, विलास के सुख तथा पराक्रम से युक्त होता है। इस के भाईयों की तथा पशुधन की मृत्यु होती है। इस लेखक ने 

नारायणभङ्ग - प्रयत्नेऽपि भाग्य कुतोऽयत्नहेतुः । इसे बिना प्रयास के भाग्योदय होता है। शेष फल यवनजातक के दिये है। 

वसिष्ठ- दुश्चिक्ये भुपपूज्यः । यह राजा से सन्मानित होता है।

जागेश्वर- तमो विक्रमे विक्रमान्नागयूथैर्भजेत् मल्लविद्यां तु कि मानुषैव। तथा तेजसातजसां वि विनाशं करोति स्वयं पुण्यमार्गे वियाति ।। यह हाथियों से भी कुश्ती लड़ सकता है। अपने तेज से शत्रु का तेज नष्ट करता है। शुभ मार्ग पर चलता है। 

हरिवंश- भ्रातृसौख्येन हीनो भवेत् भ्रातृगेहेशीतभानुशत्रौ भाईयों के सुख से रहित होता है।

घोलप - आर्यग्रन्थ जैसे फल दिये है।

गोपाल रत्नाकर - यह धनवान, लक्षाधीश, पराक्रमी होता है। इसे पुत्र, भाईयों का सुख कम मिलता है। कान में रोग होते हैं।

लखनऊ के नबाब - पाकःशाहबल स्यात् वै नेकनामो गनी सखी। शेयुमखाने यदा रासः प्रभवेन् मनुजो धनी।। यह प्रवित्र, राजाश्रय पानेवाला- कीर्तिमान, उदार, सत्ताधारी, धनवान होता है।

पाश्चात्य मत- त्वरित बुद्धि, चपल होते हैं। 

श्री. चित्रे- यह पवित्र स्वभाव का, राजा द्वारा सन्मानित अतएव प्रभावी, कीर्तिमान, उदार, धनवान, विलासी, सुदृढ पुत्र- मित्र-वाहन के सुख से सपन्न होता है। इसे साझेदारी के व्यवहार में लाभ होता है। कान के रोग होते हैं। शत्रु का नाश होता है। भाई तथा पशुधन का नाश होता है। ये फल तब पूर्णरूप से मिलते है जब राहू उच्च, स्वगृह का अथवा शत्रु की राशि में होता है। सिंह में राह तेजस्वी होता है।

अज्ञात- पराक्रमी । साहसोद्यमी । भाग्यैश्वर्यपत्रः । परदेशयुतः । राजमानस्तयैश्वर्यमारोग्यं विभवागमम् । शत्रुक्षयं सुहृत्सोख्यं राहौ लग्ने तृतीयगे।। यह पराक्रमी, साहसी,उद्योगी, भाग्यवान, धनवान, राजा द्वारा सन्मानित, स्वस्थ, मित्रों से युक्त होता है। यह विदेश में जाता है। शत्रुओं का नाश करता है।
तृतीय भाव में राहु
    जातक भ्रातृ-हानि से ग्रस्त, पत्नी, पुत्र व संपत्ति से युक्त तथामैत्रीपूर्ण स्वभाव वाला होगा। यदि राहु उच्चस्थ है तो व्यक्ति हाथी घोड़ोंकी सवारी करने वाला और सुखसंपदा युक्त होगा।
    -मानसागरी
    जातक घमंडी, सहोदरों से शत्रुतापूर्ण संबंधो वाला, संपन्न, दीर्घायुऔर दृढ़ इच्छाशक्ति वाला होगा।
    -फलदीपिका
    राहु-केतु की तृतीय भाव में स्थिति जातक को सरसों, तिल आदिबीजों के तेल के व्यापार के द्वारा धन अर्जन करने वाला होगा। यदि वेशुभयुत है तो जातक की गर्दन पर निशान होगा।
    -भृगु
    राहु के कारण जातक अत्यधिक साहसी होगा। वह अपने शत्रुओं कादमन, प्रतिकूलताओं को झेलने में सक्षम और पर्याप्त प्रगतिशील होगा।यदि तृतीय भाव में केतु है तो उसके मित्रों का अभाव होगा।
    -चमत्कार चिंतामाणि
    जातक के भाई बहन कम, धनी, बहादुर, महत्वाकांक्षी, साहसिक,अच्छा जिमनास्ट और बहुत से लोगों से संबंध बनाने वाला होगा।
    -डॉ रामन

हमारे विचार- इस स्थान में अनेक लेखकों ने शुभ फल बतलाये हैं। ये फल स्त्री राशि के हैं। अशुभ फल पुरुष राशि के हैं। पश्चिमी ज्योतिषियों ने ३।४।५।६।७।८ इन स्थानों में राहु के फल विशेष नहीं दिये है क्यों कि ये स्थान अनुदित गोलार्ध के हैं । २ । १ । १२।११।१०।९ ये स्थान उदित गोलार्ध के हैं अतः उन में राहु के फल उन्हों ने शुभ बतलाये हैं।

हमारा अनुभव- इस स्थान में पुरुष राशि में राहु भाईयों के लिए मारक हैं। भाई नही होते अथवा उन का संसार ठीक नहीं चलता, निरुद्योगी, निपुत्रिक होते हैं। किसी भाई की अपघात से मृत्यु होती है। अथवा वह लापता होता है, भाई से अदालत में झगड़े चलते हैं। ये व्यक्ति अतिशय आत्मविश्वासी, घमंडी होते हैं। इन्हे मित्र विशेष नहीं होते। लोगों की हंसी उड़ाते हैं। दुष्ट, कम बोलने वाले, ढोंगी होते हैं। ४२ वें वर्ष तक ये कष्ट में रहते हैं। प्रगति के लिये हर तरह के बुरे काम करते हैं। निर्दय, दूसरों के बारे मे बेफिक्र होते हैं। इन की शिक्षा में रुकावटे आती है, शिक्षा अधूरी रह सकती है। यह राहु स्त्री राशी में हो तो- भाईयों को मारक नहीं होता, बहनों को मारक होता है। ३० वें वर्ष तक कष्ट सहते हैं फिर अपने ही प्रयत्न से प्रगति करते हैं। ये सीधे मार्ग से चलते है। रहन सहन अधिकार जैसा होता है। बुद्धि शान्त, विचारपूर्ण, तेजस्वी होती है। मिलनसार, परोपकारी, दयालु होते हैं। शिक्षा पूरी होती है। सच बोलने वाले, काल को देख कर चलने वाले, कीर्तिमान, सूझबूझ से युक्त, संकट से न डरने वाले तथा अपने उद्देश में सफल होते हैं। ये बटवारे में अदालत का सहारा नही लेते। इस स्थान में राहु का साधारण फल भाईयों के लिए अच्छा नही है। दो भाई एक साथ प्रगति नहीं कर सकते। इन्हें सौतेली मां आ सकती है। २१ वें वर्ष पिता की स्थिति बिगड़ती है। २१ वे वर्ष जीविका का आरम्भ, २७ वें वर्ष विवाह तथा ४२ वें वर्ष विशेष लाभ होता है। पहले पुत्र को यह राहू मारक है।

तृतीयस्थ राहु का एक ही अशुभ फल सभी ज्योतिषाचायों ने बताया है। वह है-भाई-बहनों का उचित सुख प्राप्त न होना। तृतीयस्थ राहु होने केबावजूद सहोदरों का सुख प्राप्त होता है, ऐसा अक्सर देखा गया है। शुभ ग्रहोंसे युक्त राहु तृतीय स्थान में हो तो जातक के सब दुख दूर करता है।यवन ज्योतिषविदों ने राहु के शुभ फल बताए हैं। पाश्चात्य ज्योतिषविदोंके राहु के संबंध में फल अन्य ज्योतिषविदों से अलग हैं। उनके अनुसार जातकअस्थिर बुद्धि का एवं चंचल विचारों का होता है। मानसिक दृष्टि से वहअस्वस्थ रहता है। उसे सपने बहुत दिखते हैं। मंत्र-तंत्र चमत्कारों में विश्वासरखने के कारण वह नुकसान उठाता है।
तृतीय भावः राहु सहज भाव में हो तो जातक त्वरित निर्णय लेने वालाऔर चपल होता है। संतान की उसे चिंता होती है, प्रवृत्ति संशयालु होती है।भाइयों के लिए तीसरा राहु शुभ फलदाता नहीं होता। या तो भाइयों की मृत्युहोती है या उनमें झगड़े चलते रहते हैं। भाई नकारा, कामचोर तथा संतानहीनहोते हैं। भाइयों में से किसी भी भाई को दाम्पत्य सुख नहीं मिलता। कोईअपघात से काल का ग्रास बनता है। राहु स्त्री राशि का हो तो भाइयों कीबजाय बहिनों के लिए मारक होता है। तीसरे राहु से प्रथम संतान का क्षय तथाभाइयों का एकसाथ प्रगति न करना जैसे फल मिलते हैं।
1. हाथी दांत का प्रयोग न करें 
2. गणपति पूजन करें।
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4) चतुर्थ भाव -चतुर्थ स्थान (सुख भाव)
चौथे स्थान के फल

वैद्यनाथ- राहौ कलत्रादिजनावरोधी केतौ सुखस्थेच परापवादी। स्त्री आदि को कष्ट होता है। 

गर्ग- बन्धुस्थानगतो राहुर्बन्धुपीडाकरो भवेत् । गावे ककिणि मेषे च स च बन्धुप्रदो भवेत् ।। यह राहु मेष, वृषभ, कर्क मे हो तो बन्धुओं का सुख देता है। अन्य राशियों में बन्धुओं को कष्ट देता है। 

मन्त्रेश्वर - मूर्खो वेश्मनि दुःखकृत् ससहृदल्पायुः कदाचित् सुखी। यह मुर्ख, दुःखी, अल्पायु, मित्रों से युक्त होता है। इसे सुख कदाचित ही मिलता है

नारायणभट्ट – चतुर्थे कथं मातृनै रुज्यदेहो हृदि ज्वालया शितल कि बहि: स्यात् । स चेदन्यथा मेषगोकर्कगो वा बुधक्षेसुरो भूपतेर्बन्धुरेव ।। इस की माता रोगी होती है। हृदय में चिन्ता रहती है। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क या कन्या में यह राहू देव जैसा सुख और राजा का स्नेह देता है। 

ढुंढिराज- सुखगते रविचन्द्रविमर्दने सुखविनाशनतां मनुजो लभेत् स्वजनता सुतमित्रसुखं नरो न लभेतच सदा भ्रमणं नृणाम् ।। यह दुखी, पुत्र, मित्र तथा स्वजनों से रहित एवं सदा घूमनेवाला होता है। 

आर्यग्रन्थ- राहौ चतुर्थे धनबन्धुहीनो ग्रामैकदेशे वसति प्रकृष्टः । नीचानुरक्तः पिशुनश्च पापी पुत्रैकभागी कृतयोषि दासाम् ।। यह निर्धन बन्धु रहित, नीचों की संगति में आसक्त, दुष्ट पापी होता है। इसे एक ही पुत्र होता है। यह गांव मे रहता है।
बृहद्यवनजातक- चतुर्थे भवने चैव मित्रभ्रातृविनाशकृत् । पितुर्मातुः क्लेशकारी राहौ सति सुनिश्चितम् ।। यह माता-पिता को कष्ट देता है। इस के मित्र के भाइयों का नाश होता है। 

वसिष्ठ- सुहृदि न विनयो भ्रातृमित्रादिहानिः । यह उद्धत होता है। भाई या मित्र नही होते।

जागेश्वर- सुखे वाथवा सैंहिकेयो केतुस्तदा मातृपक्षे विषाच्छस्त्रघातात् ।। व्यथावा जनन्या भवेद् वायुपीडाथवा काष्ठवाषाणघातैर्हता स्यात् ।। इस की माता को वात रोग होता है अथवा लकडी या पत्थर के आघात से मृत्यु होती है। मामा के घर में विष या शस्त्र से मृत्यु होती है। ।

घोलप - घर, धन आदि नष्ट होते हैं। मित्र अच्छे हो कर भी उपयोग नहीं होता। कुल के दोष से शारीरिक कष्ट होता है। यह सुखहीन, प्रवास बहुत, करने वाला होता है। इसे पुत्र सुख कम मिलता है।

गोपाल रत्नाकर- यह नौकरी करता है। इसे सौतेली माँ होती है। द्विभार्या योग होता है

हरिवंश - बन्धुगे है विधोर्मर्दके मानवो बन्धुवर्गस्य वैरी कुकामातुरः । आलसी साहसी पूजिते निन्दिते सौख्यहीनो भवेत् सर्वदा।। यह अपने ही लोगों का शत्रु, अति कामुक, आलसी, साहसी होता है। यह राहू अशुभ योग में हो तो कभी सुख नहीं मिलता।

लखनऊ के नबाब- रासश्चेद् दोस्तखाने स्यात् परेशानो मुसाफिरः । नादानोऽपिच वादी च सौख्यहीनो विपक्षकः।। यह चिन्तित, प्रवासी, नादान, झगड़ालू, दुःखी, शत्रुओं से युक्त होता है।

पाश्चात्य मत- राहु चतुर्थ में और केतु दशम में हो तो उस व्यक्ति को अवैध सम्बन्ध से सन्तति होती है।

अज्ञात- बहुभूषणसमृद्धः। जायाद्वयम् । सेवकाः । मातृक्लेशः । पापयुते निश्चयेन। शुभयुतेदृष्टे वा न दोषः । चिन्तादुःख प्रवासश्च प्रवादः स्वजनैः सह । चतुष्पदःक्षयं यान्ति, राहुस्तुर्यगतो यदि। इस के पास बहुत अलंकार होते है। दो स्त्रियां होती हैं। नौकरी करता है। माता को कष्ट होता है। शुभग्रह राहु के साथ हो अथवा उनकी दृष्टि हो तो ये दूषित फल नहीं मिलते है। पाप ग्रह साथ हो तो अवश्य मिलते है। यह चिन्तित रहता है, बहुत घुमता है, अपने लोगों से झगड़ता हैं। इस के यहां के पशु नष्ट होते हैं।

श्री चित्रे- यह राहु दो विवाह तथा सौतेली माँ का योग करता है। यह मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क वा कन्या में हो तो उत्तम राजयोग होता है। प्रवास बहुत होता है, विविध चमत्कार देखने को मिलते है। साहसी होता है। यह राहु रवि के योग में हो तो कष्ट देता है। राजयोग में ३६ से ५६ वें वर्ष तक बहुत भाग्योदय होता है।
चतुर्थ भाव में राहु
    जातक निर्धन और बिना भाईयों वाला होगा। वह गाँव का मुखिया,नीच जाति के लोगों से व्यवहार व प्रेम करने वाला, परनिदंक, नीच औरएकमात्र पुत्री का पिता होगा। उसकी पत्नी का शरीर कमज़ोर होगा।-मानसागरी
    जातक अल्पायु और अत्यन्त प्रसन्न होगा।
    -फलदीपिका
    चतुर्थ भाव में राहु-केतु जातक को अनेक आभूषणों से युक्त, दोपतलियों का स्वामी और अन्यों का सेवक बनाता है। यदि राहु-केतुपाषाक्रान्त है तो जातक की माँ विषादग्रस्त होगी, परन्तु यदि ये शुभयुतहै तो प्रसन्नचित होगी।
    -भृगु
    उसका संबंध बाजारू किस्म की महिलाओं से, किसी के अधीनस्थरहने वाला और पाश्चात्य (यूरोपीय) भाषाओं में दक्ष होगा।
    -डॉ रामन
    चतुर्थस्थ राहु माँ के लिए रोगकारक है। यदि राहु मेष में कर्क याकन्या राशि में है तो शुभफल होंगे और जातक राजा बनेगा।
    -चमत्कार चितांमणि
    टिप्पणी
    हमारे अनुभवानुसार यदि राहु चतुर्थ भाव में हो तो जातक की माँदीर्घायु अर्थात् पिता के बाद तक जीवित रहने वाली होगी।
    
हमारे विचार - प्रायः सभी लेखकों ने इस स्थान में अशुभ फल बतलाये हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क व कन्या में शुभ फल दिये हैं। हमारे अनुभव में मेष व मिथुन में अशुभ फल ही मिले हैं। वृषभ, कर्क व कन्या में साधारण शुभ फल मिलते हैं द्विभार्यां व द्विमाता योग गोपाल रत्नाकर व चित्रे ने बतलाया हैं। यह पुरुष राशि का योग है। स्त्री राशि में यह योग क्वचित मिलता हैं। सावत्र माता की ही स्थिति इस की स्त्रियों की भी होती है। बृहद्यवनजातक नें बन्धुनाश का फल कहा है। हमारे अनुभव में बन्धुओं का नाश तो नही मिला किन्तु बन्धुओं को परस्पर कुछ लाभ नही हुआ ऐसा देखा है। दत्तक योग से बन्धुओं से अलग होना संभव है। माता-पिता को कष्ट होना दारिद्र्य आदि फल साधारणतः ठीक है। अवैध सन्तति का जो फल पश्चिमी मत में कहा है उस का अनुभव हमे नहीं मिला।

हमारा अनुभव- इस स्थान में घोलप ने कुल के दोष से कष्ट होना यह जो फल कहा है उस का अनुभव हमें अच्छी तरह मिला है। अतः हम ने इस स्थान को शापस्थान माना है । इस में कुल में तीनचार पीढ़ी पहले खून, विषप्रयोग, । आत्महत्या, किसी स्त्री को घर छुड़ा कर तकलीफ देना आदि कुछ पापकृत्य हुआ होता है। उसके शाप स्वरूप कुल की स्थिती बिगड़ती जाती है। स्त्री को कष्ट देने से सात पीढ़ि तक अन्य पापों से चार पीढ़ि तक कष्ट होता है वंशपरम्परा से दारिद्र्य, कोढ़, रक्त पित्त, पागलपन, किसी व्यक्ति द्वारा गृहत्याग, गूंगापन क्षयरोग, अकाल मृत्यु, सन्यास लेना आदि अशुभ फल मिलते हैं। इन फलों के कारण योग इस प्रकार हैं- राहु के समीप या केन्द्र में शनि व मंगल के युति- प्रतियोग से खून होते हैं। राहु के समीप या युति में मंगल हो कर शनि-चन्द्र का अशुभ योग हो तो विष प्रयोग, आत्महत्या का योग होता है। राहु के २।४ १६ १७ १८ ११२ इन स्थानों में यह योग होता है। वृषभ, सिंह, कुम्भ लग्न में यह योग संभव है। राहु१ । ४।६।८।१२ में हो, शनि से चन्द्र, रवि, मंगल दूषित हो तो क्षय, कोढ़, रक्तपित्त से कष्ट होता है। लग्न राशि से चतुर्थ राहु रवि-चन्द्र, अथवा मंगल से दूषित हो अथवा चतुर्थेश के साथ राहु हो या केन्द्र में शनि-राहु की युति हो तो दारिद्र्य योग होता हैं। यहीं योग धनस्थान में भी हो सकता है। ये सब योग पुरुषराशि में विशेष रूप से होते हैं। स्त्री राशि में सन्तति बहुत हो कर दारिद्र्य अथवा सम्पत्ति व कीर्ति मिलने पर सन्ततिहीन होने का फल मिलता है। इस स्थान में राहु से चन्द्र या मंगल की युति, चतुर्थेश की युति हो (इसी प्रकार धनस्थान में राहु से धनेश की युति हो व चन्द्र से राहु चतुर्थ हो) तो घर या खेती खरीदते समय वह घर आदि पिशाच पीड़ित नहीं है यह देख लेना चाहिए। एलन लिओ ने चतुर्थ में नेपच्यून के फलस्वरूप पिशाच पीड़ित घर आदि मिलने का अनुभव कहा है वही हम ने उपर्युक्त योगों मे देखा है। चतुर्थ के शनि से भी इस योग की आशंका है। इस स्थान में पुरुष राशि में राहु जन्म समय से पिता को आर्थिक कष्ट, दीवाला निकलना, नौकरी छूटना, सस्पेण्ड होना, माता को व स्वयं को शारीरिक कष्ट, शिक्षा में रुकावटें, छोटे भाई न होना अथवा हो कर मृत होना, विवाह जल्दी होना, दो विवाह होना, पत्नी अच्छी मिलना ये फल देता है। यह राहु विशेष उन्नति नहीं देता। नौकरी में दिन सुख पूर्वक कटते है। मिथुन, सिंह, कुम्भ में सम्पत्ति मिलती है किन्तु सन्तति नहीं होती, उस के लिए दूसरा विवाह करता है। शिक्षा पूरी नहीं होती किन्तु बुद्धिमत्ता होती है। यह पाप कार्यों से धन कमाता है। शुरू में यह बात छिप जाती है किन्तु मृत्यु समय तक लोग जान जाते है। माता-पिता मे एक का मृत्यु बचपन में होता है। इन में एक की मृत्यु अकस्मात होती है। स्त्री राशि में अत्यन्त सदाचरण के कारण व्यवसाय में असफल होते हैं। शील के विपरीत बरताव से ही धन मिलता है। इन की व्यावहारिक बुद्धि से दूसरों का फायदा होता है किन्तु खुद का फायदा नहीं होता। ये अपनी बुद्धि के बारे में घमंडी होते हैं। लोगों को ये मूर्ख किन्तु इन के शिष्य विद्वान प्रतीत होते है। असफलता और बेइज्जती के बावजूद ये व्यवसाय से ही धनवान होने की कोशिश नहीं छोड़ते । इन्हें हमेशा अस्थिरता रहती है। संकट, दारिद्र्य, मानहानि बनी रहती है, वृद्ध वय में विशेष रूप से कष्ट होता है। स्त्री पुत्र भी विरोधी होते हैं। साझीदारी या नौकरी में ये सफल हो सकते हैं। इन्हें ज्योतिषी शुभ फल बतायें तो उसका अनुभव कभी मिल नहीं सकता। यह योग दत्तक लिए जाने का हो सकता है। स्त्री राशि में राहु एक विवाह तथा तीन-चार तक सन्तति देता है। पत्नी शीलवान, स्नेहपूर्ण, संकट में धीरज देने वाली, योग्य सलाह देने वाली होती है। इन लोगों को यही आत अच्छी होती है। पत्नी की मृत्यु पति के पहले होती है। यह राहु अशुभ है किन्तु शनि या गुरु के शुभ युति में व अन्य ग्रहों के शुभ सम्बन्ध में हो तो ३६ से ५६ वें वर्ष तक अच्छा भाग्योदय होता है।

    चतुर्थ स्थान में स्थित राहु जातक की माता के लिए कष्टकारी होता है।यह राहु पापग्रहों से युक्त हो तो इसका यह फल तीव्रता से अनुभव में आताहै। जातक को जायदाद एवं वाहन का सुख मिलता है। मित्र एवं सहोदरों सेस्नेहपूर्ण संबंध नहीं रहते। उसे सुख-शांति कम प्राप्त होती है। आर्थिक दृष्टिसे जीवन सुखी एवं संपन्न रहता है। महर्षि गर्ग के मतानुसार वृषभ या कर्कराशि का राहु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सहोदरों को सुख देता है। कुछआचायों के मतानुसार चतुर्थस्थ राहु जातक को पुत्र देता है जबकि कुछ अन्यआचारयों के मतानुसार मातृसुख में न्यूनता रहती है। जातक विदेशी भाषाओंका जानकार होता है।

    यवन ज्योतिषविदों ने चतुर्थस्थ राहु के अशुभ फल बताए हैं। उनकेमतानुसार जातक माता-पिता के लिए कष्टकारक रहता है। मित्र एवं सहोदरोंका सुख प्राप्त नहीं होता। जातक चिंतातुर, प्रवासी, झगड़ालू, शत्रुओं से घिराहुआ, दुखी एवं अज्ञानी रहता है।

    पाश्चात्य ज्योतिषाचारयों के अनुसार ऐसे जातक के अवैध संतान होती है।कुछ विद्वानों के अनुसार चतुर्थस्थ राहु सौतेली मां देता है, यह बात अनुभव में भी आती है।
तृतीय भाव-राहू लग्नकुंडली के तीसरे भाव में हो तो जातक के लिए शुभही रहता है। ऐसा जातक महाबली, पराक्रमी, शत्रुओं को जीतने वाला, दीर्घायु,विद्वान, जन्मस्थान से दूर रहने वाला, धनाद्य होता है। ऐसे जातक के योगी होनेकी सम्भावना भी होती है। मेरे ज्योतिषीय गुरु तथा लाल किताब के मर्मज्ञश्री सुरेशदत्त शर्मा जी के अनुसार तृतीयस्थ राहू जातक की अन्तप्रेरणा प्रदान करता है। ऐसेजातक को घटने वाली घटना का पूर्वाभास हो सकता है या स्वप्न में वह जो देखेवो सच होता है। किन्तु उसे कानूनी कागजों पर हस्ताक्षर करते समय सतर्कतारखनी चाहिए। जातक इस प्रकार के मामलों में फंस सकता है या धोखे का भीशिकार हो सकता है। (विशेषकर तब जब राहू अशुभ स्थिति में हो। क्योंकि तबउसके भाई और रिश्तेदार उससे धोखा करते हैं। उसके धन को हड़पते या बर्बादकरते हैं।) ऐसा जातक किसी को कर्ज दे तो धन वापस नहीं आता।
    लाल किताब के अनुसार तृतीयस्थ राहू यदि सिंह राशि में हो तो विशेष रूपसे फलदायी होता है। तृतीयस्थ राहू जातक को साहसी, वीर, शत्रुजित्, शक्तिशालीकिन्तु संदेही बनाता है।मानसिक तनाव से ग्रस्त रखता है। ऐसे जातक में कल्पनाजीवीहोने या दिवास्वप्न देखने की प्रवृत्ति हो सकती है। वह त्वरित निर्णय नहीं ले पाता।भाइयों के लिए तीसरा राहू अशुभ प्रभाव देता है (भाई होता नहीं। होता है तो मरजाता है अथवा भाई को सन्तान कष्ट बना रहता है)। पुरुष राशि का राहू जातक केभाइयों के लिए विशेष रूप से मारक या घातक होता है। स्त्री राशि का राहू प्रायःशनि जैसे ही फल देता है किन्तु जातक की बहनों के लिए मारक होता है। फिर भीऐसे जातक की विशेषता यह होती है कि वह ‘हाय'/शाप देने में समर्थ होता है।वह किसी को बहुआ देता है तो उसकी बहुआ फलीभूत हो जाती है।
चतुर्थ भाव-राहू यदि लग्नकुंडली के चौथे भाव में हो तो जातक माता कीओर से दुखी, झूठा तथा दुखद घरेलू जीवन वाला होता है। माता का स्वास्थ्य नरमरहता है। ऐसा जातक बाहर से भले ही शांत दिखाई दे भीतर से संतस होता है।धन-सम्पदा सम्बन्धी चिन्ताएं बनी रहती हैं। ऐसा व्यक्ति वहमी हो सकता है याअनजाने भय से भयभीत रह सकता है।
    लाल किताब के अनुसार चौथा राहू जातक की सौतेली माता या पिता की दूसरी पत्नी की सूचना देता है। जातक चिंतित व अशांत रहता है। यदि कुंडली मेंचन्द्रमा की स्थिति शुभ हो तो धन-दौलत की कमी नहीं रहती। अशुभ स्थिति मेंचित्तभ्रम, भय, संतस होना आदि दुष्परिणाम विशेष होते हैं। पिता से अलगाव तथाकार्यक्षेत्र में बाधाएं आती हैं। घर में कोयलों का ढेर होना, पाखाने की सीट या घरकी मात्र छत का बदला जाना अशुभ राहू का लक्षण होता है। प्रायः 45 वर्ष कीआयु से राहू व केतु के अशुभ प्रभाव समास होने लगते हैं। मेष, वृष, मिथुन, कर्कराशियों में चौथा राहू प्रायः शुभ फल देता है। ऐसे जातक को प्रवास अधिक करनापड़ सकता है तथा 36 से 54 वर्ष के भीतर सफलता प्रास होती है।
    पुरुष राशि का राहू 'द्विभार्या योग' बनाता है। जातक को विचित्र चमत्कारया विचित्र घटनाएं देखने व भोगने को मिलते हैं। मिधुन, कन्या व सिंह राशि मेंसन्तति के अभाव के कारण जातक को दूसरा विवाह करना पड़ता है। यद्यपिसम्पत्ति मिलती है, परन्तु सन्तान लाभ रहता है। चन्द्र व सूर्य पाप प्रभाव में हों तोजातक के माता-पिता की आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है। राहू चतुर्थ हो औरचतुर्थेश शनि के साथ हो (शनि की स्वराशि में) तो दरिद्रता होती है। राहू चतुर्थस्थहो और सूर्य के साथ मंगल बैठा हो तो भी दरिद्रता होती है। राहू चौथे भाव में मंगलके साथ हो अथवा शनि व चन्द्र से अशुभ योग करे तो जातक विष खाकरआत्महत्या करता है। स्त्रीराशि में राहू हो तो एक ही पत्नी (विवाह) होता है तथासन्तान भी प्राप्त होती है। पत्नी भी गुणवती व आज्ञाकारिणी होती है, किन्तुव्यवसाय में हानि होती है। ऐसे जातक को नौकरी या साझे में लाभ होता है। अशुभराहू हो तो सन्तान अवैध ढंग से ही मिलती है।
    स्त्री जातक में राहू के साथ चन्द्रमा भी बैठे तथा चतुर्थ भाव पर पाप प्रभावभी हो तो जातक व्यभिचारिणी होती है। साथ ही शुक्र व बुध की युति जातक केचरित्र को अति नीच बना सकती है।
    विशेष--चतुर्थेश व चन्द्र नीच राशि में हों/अस्त हों/6, 8, 12 भाव में हों,तथा पाप ग्रहों से दृष्ट हों और राहू चौथे भाव में बैठा हो तो जातक की माता शीघ्रही मर जाती है।
चतुर्थ भावः स्त्री राशि का राहु सुख स्थान में हो तो जातक व्यवसाय मेंसफलता प्राप्त नहीं कर पाता और सामाजिक नियमों के विरुद्ध आचरण करकेही संपत्ति अर्जित कर पाता है। नौकरी अथवा साझेदारी करने से लाभ मिलसकता है। जातक किसी के द्वारा गोद लिया जा सकता है। विवाह एक औरसंतान अल्प होती है, पत्नी स्नेहिल और मधुरभाषिणी मिलती है तथा जातकसे पूर्व ही मर जाती है। पुरुष राशि का राहु हो तो जन्मदाता पिता बहुत कष्टउठाता है। व्यवसायी (पिता) हो तो दिवालिया होता है, नौकरी करता हो तोनिकाला जाता है। मेष, सिंह, कुम्भ का राहु संपत्ति देता है लेकिन संतान नहींदेता। संतान के लिए दूसरा विवाह-करना पड़ता है। शनि के साथ अशुभ योगमें हो तो दरिद्रिता, सहु चतुर्थस्थ हो तथा चंद्र, सूर्य या मंगल, शनि से अशुभयोग करते हों तो क्षय, कुष्ठ या रक्तपित्त से पीड़ा होती है।
1. गंगा स्नान करें। 
2. चाँदी का कड़ा पहने। 
3. बादाम व आखे(साबूत) धनिया कपड़े में बांधकर नदी में बहावें।
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5) पंचम् भाव -पंचम स्थान (सुत भाव)
पाँचवें स्थान के फल

वैद्यनाथ-भीरुर्दयालुरधनः सुतगे फणीशे। केतौ शठःसलिलभीरुरतीब रोगी। यह डरपोक, दयालु, धनहीन होता है। 

गर्ग-तनयं दीनमलिन सुतर्क्षे रचयेत् तमः । यदि चन्द्रगृहं तत स्यात् तदानीं सन्ततिर्भवेत् ।। सिंहे कुलीरसंस्थे राहुः पुत्रेऽथ पुत्रेण कुरुते । अन्यस्मित्रपि राशौ पुत्रविहीनो भवेन्मनुजः ।। इन का पुत्र दीन व मलिन होता है। राहु कर्क या सिंह में हो तो पुत्रसन्तति होती है, अन्य राशियों में नहीं होती। 

बृहद्यवनजातक - सुते सद्मनि स्या सदाद् सैंहिकेयः सुतार्तिः चिरं चित्तसन्तापनीया । भवेत् कुक्षिपीडां मृतिः क्षुत्प्रबोधाद् यदि स्यादयं स्वीयवर्गेण दृष्टः ।। पुत्र न होने से चिरकाल चिन्ता रहती है। कोख मे पीडा होती हैं। यदि इस राहु पर अपने वर्ग की दृष्टी हो तो भूख से मृत्यु होती हैं। यदा पंचमे जन्मतो यस्य केतुः स्वकीयोदरे वातघातादिकष्टम् । स्वबुद्धिव्यथा सन्ततिः स्वल्पपुत्रः सदा धेनुलाभादियुक्तो भवेच्च।। इस के पेट मे वातरोग होते हैं। बुद्धि दूषित होती हैं। थोडे पुत्र होते हैं। गाय आदि पशुओं का लाभ होता है।

नारायणभट्ट- सुते तत्सुतोत्पत्तिकृत् सिंहिकायाः सुतौ भामिनीचिन्तया चित्ततापःपसति क्रोडरोगे किमाहारहेतुः प्रपंचेन किं प्रापकादृष्टवर्ज्यम् ।। इसे पुत्र होते हैं। स्त्री की चिन्ता रहती है। भोजन के कारण पेट के रोग होते हैं। व्यवसाय में लाभ नहीं होता। भाग्य पर अवलम्बित रहता है।
अन्तर इतना है- इस के भाई को वातरोग या शस्त्र से कष्ट होता है, यह पराक्रमी हो कर भी नौकरी करता है- तदात सोदरे घातवातादि कष्टम् । सदासो भवेद् वीर्ययुक्ती नरोऽपि । ।

मन्त्रेश्वर- नासोद्यद्वचनोऽसुतः कठिनहृद् राहौ सुते कुक्षिरुक् ।। यह नाक से बोलता है। निष्ठुर व पुत्ररहित होता है। कोख में पीड़ा होती है। 

ढुंढिराज- सुखगतो न हि मित्रविवर्धनं उदरशूलविलासविपीडनम्। खलु तदा लाभते मनुजो भ्रमं सुतगते रविचन्दविमर्दने ।। यह सुखरहित, मित्ररहित, पेट में रोग से युक्त, भ्रमयुक्त होता है। इस के विलास में नित्य बाधा होती है। 

आर्यग्रन्थ- राहुःसुतस्थशशि नानुगो हि पुत्रस्य हर्ता कुपितः सदैव । गेहान्तरे सोऽपि सुतैकमात्रं दत्ते प्रमाण मलिनं कुचैलम् ।। यह राहु चन्द्र के आगे हो तो पुत्र का नाश होता है। घर बदलने पर एक पुत्र होता है तथा वह भी गन्दा व गन्दे वस्त्र पहनने वाला होता है। 

जागेश्वर सुते सैंहिकेयः सुतोत्पत्तिकृत स्यात् परं जाठराग्निःस। रोगान्त्र दीप्तः। परं विद्यया वैयारभावं प्रयातः प्रयासेपि नो लभ्यते काकणी वा ।। यह पुत्रसहित होता है। रोग के कारण भूख मन्द होती है। विद्या से शत्रुता होती है। बहुत प्रयत्न से भी इसे धन नहीं मिलता। 

हरिवंश- पुत्रभावगते सिंहिकात्रपुत्रे पुत्र सौख्येन हीनो मलिनो भवेत् नीचसंगी कुरंगी दशामानहा मन्दविमन्दबुद्धिः मनुष्यो भवेत्।। इसे पुत्र सुख नहीं मिलता, नीचों की संगति में रहता है। गन्दा रहता है। बुद्धि अति मन्द होती है। शरीर का वर्ण अच्छा नहीं होता। इस की दशा में मानहानि होती है।

पुंजराज- तीक्ष्णाप्यही बुद्धि तीक्ष्ण होती है। कृमणानिलेन दृष्टा काष्ठेन नीरेण वा शैलेयेन । राही कतौ स्यात् कुत्री नमस्तु ।। इस के सन्तति की मृत्यु कृषि, वायु, पत्थर, लकड़ी, पानी या पर्वतीय सम्बन्ध की किसी वस्तु से होती है। इस स्थान में राहु या केतु से अयोग्य पुत्र मिलते हैं।

गणेश देवज्ञ- पंचस्थः केतु राहौर किर्यवृषभवने कर्कटे नो विलम्ब पंचम में मेष, वृषभ या कर्क में राहु या केतु हो तोशीघ्र ही सन्तति होती है।

वसिष्ठ- पुत्रभ्रंशः । पुत्र नष्ट होते है।

घोलप - यह धर्म, अर्थ, काम से युक्त, सर्वत्र पूज्य, प्रामाणिक, सुशोभित पुत्रयुक्त, शत्रुरहित, होता हैं। इसे मित्र व सुख की प्राप्ति कम होती है। पेट में शूल व बुद्धि में भ्रम होता है। 

गोपाल रत्नाकर- पुत्र प्राप्ति में विघ्न होता है। पूर्वजन्म के सर्पशाप से कष्ट होता है।(नाग या विष्णु) उपासना से पुत्र प्राप्त हो सकता है। यह गांव का अधिकारी, दुष्ट, राजा के क्रोध से पीड़ित, वमन रोग से त्रस्त होता है।

लखनऊ के नबाब- पिसरखाने स्थितो रासःपुत्रसौख्यविवर्जितम्। बेहोशी दर्दशिकमं नादानं कुरुते नरम्।। यह पुत्र सुख से रहित, रोगी, नादान, असावधान होता है।

पाश्चात्य मत-कम्पनी के व्यवसाय में सफल होता है। कोख में रोग होता है। यह अनुदित गोलार्ध का स्थान है अतः इस मत में राहु के फल का वर्णन नहीं किया है।

श्री. चित्रे - यह पुत्रहीन, रोगी, बुरे विचारों का, क्रोधी, विकल मन का, राजा से भययुक्त, डरपोक, दयालु व्यभिचारी होता है। शुभ योग में हो तो राजा से सन्मानित, शत्रुहीन, पुत्रवान, विवेकी, विद्वान होता है, अनेक लाभ होते हैं।

अज्ञात- पुत्रसौख्यं सुतप्राप्तिर्दुर्मतिर्वैरिविग्रहः । नियतं जठरे पीडां सैंहिकेयस्तु पंचमः । इसे पुत्र होते हैं। पेट में कष्ट रहता है। बुद्धि अशुभ होती है। शत्रु झगड़ा करता है। शेष फल गोपाल रत्नाकर जैसे हैं।

हमारे विचार- इस स्थान में कुछ लेखकों ने, पुत्र नहीं होते यह फल कहा है कुछ लेखक पुत्र रोगी होते हैं यह कहते हैं। इन में अशुभ फल पुरुष राशि के तथा शुभ फल स्त्री राशि के हैं। प्रयत्न से भी कुछ धन प्राप्त नहीं होता यह जागेश्वर का वर्णन अनुभव सिद्ध है।

हमारा अनुभव - इस स्थान में पुरुष राशि में राहु से अभिमानी, बुद्धिमान, कीर्तिमान होते हैं। आर्थिक या शारिरिक कष्ट से शिक्षा में रुकावटे आती है। शिक्षा गलत प्रकार की मिलती है- वकील होने की योग्यता हो तो डॉक्टरी पढ़ते हैं, डॉक्टर होने की योग्यता हो तो इंजीनियरी पढ़ते है। इस से व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती। बुद्धिमत्ता, कल्पना शक्ति, संशोधक वृत्ति व्यर्थ होती है यह राहु स्त्री पुत्रों के सुख को नष्ट करता हैं। स्त्री को ऋतु सम्बन्धी रोग होते है। अथवा स्वयं पुत्रोत्पत्ति में अक्षम होते है। सन्तति के लिये दूसरा विवाह होता है। यह सुधारवादी, मन का दयालु, कोमल होता है। राहु अधिक अशुभ योग में हो तो विवाह न होना, अवैध स्त्री सम्बन्ध, विपरीत रति के फल मिलते हैं। बुद्धि, ज्ञान, उद्योग का उपयोग न होने से निराशावादी होते हैं। ये सरल बरताव करते हैं। चमत्कारिक प्रतीत होते हैं। किन्तु लोगों को स्त्री के बारे में सन्देह होता है। खुद को सर्वज्ञ समझते है। सांसारिक बातों में इन्हें योग्य अयोग्य की समझ नही होती तथा दूसरों की सलाह नहीं मानते अतः नुकसान सहना पड़ता है। इन्हें स्त्री पुत्र सुख नही मिलता । लेखन, संशोधन में मग्न होना पड़ता है ग्रन्थ ही इन की सन्तति समझनी चाहिए। इन के उत्तम संशोधन, लेखन अथवा कविता का मूल्य इन की मृत्यु के बाद ही लोग समझ पाते है। जीवनकाल में इन का उपहास ही होता है। यह राहु स्त्री राशि में हो तो स्वभाव शान्त विचारी, समाधानी, विरक्त होता है। शिक्षा पूरी होती है किन्तु जीविका में शिक्षा का उपयोग नहीं होता । इन के लेखन, कविता, संशोधन की ख्याति फैलती है। इन की यह कीर्ति तात्कालिक होती है। थोड़े ही समय में लोग भूल जाते है। इन के दो विवाह होते हैं। पुत्र होते हैं, वे पिता के नाम को कलंकित करते है। इन के जीवनकाल में ठीक तरह समय बीतता है। पंचम के राहु या केतु से पहली सन्तति बहुधा कन्या होती हैं। इन लोगों को सन्तति का कष्ट हो तो बहुधा सर्प सम्बधी स्वप्न आते हैं। यह पूर्व जन्म के सर्प सम्बन्धी शाप का परिणाम होता है।

    पंचम स्थान में राहु हो तो वह संतान सुख में व्यवधान लाता है। जातकमंदबुद्धि, उदर रोगी होता है। पत्नी को मासिक संबंधी रोग रहता है। प्रथमगर्भपात होता है। हमारी राय में जातक की शिक्षा में दिक्कत आती है, यहबात तर्क की कसौटी पर खरी उतरी है। जातक धनवान, शस्त्रप्रिय, भाग्यवानरहता है, वाणी में दोष होता है, नाक में बोलता है। उसे संतान सुख प्राप्तहोता है पर अपेक्षित संतान सुख प्राप्त नहीं होता। पुत्र विलंब से होता है। कन्यासंतान अधिक रहती है। प्रायः पंचमस्थ राहु के कारण जातक जिद्दी, दयालु,डरपोक, हृदयविकारी, मानसिक दृष्टि से अशांत, पत्नी के विषय में चिंताग्रस्त,कम मित्रोंवाला, कमबुद्धि का एवं पढाई में कमजोर होता है।
पंचम भाव में राहु
    यदि राहु और चन्द्रमा की पंचम भाव में युति है तो पुत्र हानि औरजातक स्वयं हमेशा क्रोधित रहने वाला होगा। यदि राहु व चन्द्रमा कीअन्य किसी भाव में युति होती है तो जातक के एकमात्र पुत्र और वहमैले-कुचैले वस्त्र पहनने वाला होगा।
    -मानसागरी
जातक की वाणी में नाक से उच्चारण करने का दोष, निसंतान,कठोर हृदयी और उदर की पीड़ा से ग्रस्त होगा।
    -फलदीपिका
    यदि राहु या केतु पंचमस्थ हैं तो जातक निसंतान या नाग के शाप केकारण मृतवत्स होगा। वह नाग-प्रतिमा की पूजा के बाद ही संतति प्राप्तकर सकता है। वह वात रोगों से ग्रस्त पाप प्रवृत्त और राजकोप का भाजनव अवाछित स्थानों पर रहेगा।
    -भृगुजातक निसंतान, अत्याचारपूर्ण (निरंकुश), विनम्र, संकीर्ण मस्तिष्कवाला, संगदिल होगा।
    -डॉ रामनराहु जातक को पत्नी के संबंध में चिंतातुर करता है तथा उदर रोगोंसे ग्रस्त रखता है।
    -चमत्कार चिंतामणि
    
    पंचम भाव---राहू यदि लग्नकुंडली के पांचवें भाव में हो तो जातक भाग्यवानतथा शास्त्रज्ञ होता है। किन्तु उदर रोगी, पैतृक सम्पत्ति को नष्ट करने वाला होता है।ऐसे जातक की पत्नी गर्भपात की समस्या से पीड़ित हो सकती है, क्योंकि पांचवांराहू संतान के लिए अशुभ होता है। ऐसा ही मत मेरे सुयोग्य आचार्य कौशिकजी काहै।
    पांचवां राहू जातक की शिक्षा में व्यवधान पैदा करने वाला हो सकता है।
    यदि सूर्य एवं सिंह राशि पाप प्रभाव में हो तथा पंचमेश भी निर्बल या पीड़ित हो तो पांचवां राहू हृदय रोग या हार्टअटैक भी करा सकता है। पांचवां राहू जातक कीसंगति को निम्न कोटि का बनाता है। ऐसा जातक कुमार्गी होता है।भाग्य व संतानके साथ जातक की मति व आय ये सभी पांचवें राहू से प्रभावित होते हैं। अतःपांचवां राहू जातक को भाग्यवान नहीं बना सकता। ऐसा मेरा अपना दृष्टिकोण है।
    लाल किताब के अनुसार पांचवां राहू जातक को शरारती स्वभाव देता है।कम से कम अपनी एक संतान के सम्बन्ध में जातक को चिंता अवश्य रहती है।जब तक जातक की मां जीवित रहती है, जातक के पास धन व संतान की दृष्टि सेबरकत रहती है, क्योंकि तब तक राहू अशुभ प्रभाव नहीं देता। राहू अशुभ हो जाएतो जातक के स्वास्थ्य को अचानक बिगाड़ कर व्यर्थ के खर्च बढ़ाता है। तबजातक संतानाभाव तथा राजदण्ड के भय को झेलता है। ऐसा जातक नीच संगति मेंप्रसन्न रहता है तथा कुमार्गी हो जाता है। ऐसे जातक को चांदी का ठोस हाथी(मूर्ति/खिलौना) अपने पास/घर में रखना शुभ होता है।
    पांचवें राहू का चन्द्रमा से अशुभ योग हो तो जातक के सन्तान होती ही नहीं,हो भी जाए तो जिन्दा नहीं रहती। शत्रु ज्यादा, दोस्त कम होते हैं। गृहकलह, चिन्तातथा हृदय रोग सम्भव होते हैं, फिर भी जातक हार नहीं मानता। स्त्री व संतान केसुख में पांचवां राहू बाधक बनता है। पत्नी होती नहीं, होती है तो रोगिणी रहती है।अत्यधिक पाप प्रभाव हो तो पांचवां राहू जातक के लिए ‘विवाह प्रतिबन्धक योग'भी बनाता है। ऐसे जातक के बड़ी आयु की एवं नीच जाति/स्तर की महिलाओं सेअवैध सम्बन्ध रहते हैं। पुरुष राशि का राहू जातक को घमंडी तथा असफल बनाताहै, जिस शिक्षा या व्यवसाय के योग्य जातक होता है, वह उसे प्राप्त नहीं हो पाते।किन्तु स्त्री राशि का राहू जातक को शांतिप्रिय, विदेशी, यशस्वी बनाता है। ऐसाजातक अच्छी शिक्षा व अच्छे लेख वाला होता है तथा विवाह होने पर उसे संतानकी प्राप्ति भी होती है।
    विशेष-कि पांचवां राहू जातक को भाग्यवान, शास्त्रज्ञ बनाता है) यह कहकर दूर करते हैं कि यदि पांचवां राहू स्त्री राशि में है तथापंचमेश व नवमेश बली है तो जातक शास्त्रज्ञ व भाग्यवान हो. सकता है। लालकिताब उनके मत को पुष्ट करती है।
पंचम भावः स्त्री राशि का राहु पंचमस्थ हो तो जातक शांत स्वभावी,विवेकी और विरक्त होता है। शिक्षा उत्तम प्राप्त होती है, लेखन से कीर्ति औरधन दोनों मिलते हैं। पुरुष राशि में हो तो जातक बुद्धिमान, विख्यात औरअभिमानी होता है। शिक्षा में अवरोध आते हैं, योग्यता के अनुरूप शिक्षा नहींमिलती। जैसे जातक डॉक्टर बनना चाहता हो, लेकिन माता-पिता या अभिभावकउसे वकील बनाने का प्रयलन करें। फलतः जातक कुछ भी नहीं बन पाता। स्त्रीतथा संतान सुख भी अल्प मिलता है। स्त्री रुग्णावस्था में रहती है, मासिकधर्म की गड़बड़ी के कारण संतानोत्पत्ति में कठिनाई आती है। पंचमस्थ राहु सेप्रायः जातक को प्रथम संतान के रूप में कन्या रत्न की प्राप्त होती है। पूर्वजन्म के पापवश संतानाभाव रहता है। नागदेव की पूजा से संतान की प्राप्ति हो सकती है। (नागपूजा का अर्थ जीवित सर्पपूजा से नहीं है)
1. मूलियां मंदिर में दान कर रात्रि में सोने के स्थान पर रखें। 
2. चौखटके नीचे चांदी रखें।
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6) षष्टम् भाव - षष्ठ स्थान (रात्रु भाव)
छठवें स्थान के फल

वैद्यनाथ- राहौरिपुस्थानगते जितारिश्चिरापुरत्यन्तसुखी कुलीनः । बन्धुप्रियोदारगुणप्रसिद्धः विद्यायशस्वी रिपुगे च केतौ ।। यह शत्रु को जीतने वाला, दीर्घायु, बहुत सुखी, कुलीन होता है। 

गर्ग- शूरः सुभगः प्राज्ञो नृपतुल्यो जायते मनुजः । रिपुभवनस्थो राहुर्जन्मनि मान्योऽतिविख्यातः । । यह शूर, सुन्दर, बुद्धिमान, राजा जैसा, सन्मानित, विख्यात

होता है। राहुः शत्रुगृहे कुर्याच्छत्रु संग्राममूर्धनि । हान्ति सर्बाण्यारिष्टानि सर्वग्रहनिरीक्षितः ।। राहु युद्ध में शत्रु का घात करता है। यदि अन्य सब ग्रहों की दृष्टि हो तो सब अरिष्ट दूर करता है। बलिष्ठे च तता राहौ शनौ केतौ तथैव च। महिषाणां धनं तस्य बहुलं जायते गृहे ।। सैंहिकेयः शनिश्चैव मातुले भवने स्थितौ । प्रजाहीनों मातुलः स्यात् कन्यापत्योऽथवा तदा।। तस्य वंशोद्भवः कोपि गतौ देशान्तर मृतः । मातष्वसा मृतापत्या रण्डा देशान्तरं गता।। दानवः अधरदन्तरुजाय शिखी रिपौ ।। इस स्थान में राहु, शनि या केतु बलवान हो तो घर में बहुत भैंसे होतीं हैं। षष्ठ में राहु व शनि हो तो मामा को सन्तति नही होती अथवा सिर्फ कन्याएं होतीं हैं। मामा के वंश का कोई व्यक्ति विदेश में मरता है। मौसी की सन्तति की मृत्यु होती है, वह विदेश में जाती है, विधवा होती है। 

गणेश दैवज्ञ- दन्ते दन्तच्छदे वा कुमुदपतिरिपुः संस्थितः षष्ठभावे केतुर्वा । दांत या होठ के रोग होते है।

आर्यग्रन्थ- षष्ठे स्थितःशत्रुविनाशकारी ददाति पुत्रं धनवित्तभोगान् । स्वर्भानु रूच्चैरखिलाननर्थान् हन्त्यन्ययोषिद्गमनं करोति ।। यह शत्रु का नाश करता है। पुत्र, धन देता है। सब संकट नष्ट होते हैं। यह परस्त्री से सम्बन्ध रखता है। 

ढुंढिराज- शत्रुक्षयं द्रव्यसमागमं च पशुप्रपीडां कटिपीडनं च। समागमं प्लेच्छजनैर्महाबलं प्राप्नोति जन्तुर्यदि षष्ठगस्तमः ।। इस के शत्रु नष्ट होते हैं, धन मिलता है, पशुओं को कष्ट होता है, कमर में रोग होते हैं, विदेशियों से सम्बन्ध आता है। 

मन्त्रेश्वर- स्यात्क्रूरग्रहपीडितः स गुदरुक् श्रीमांशिचिरायुः क्षते ।। यह क्रूर ग्रह से पीड़ित हो तो गुदरोगी, श्रीमान व दीर्घायु होता है। 
बृहद्यवनजातक- बलाद् बुद्धिहानिर्धनं तद्वशे च स्थितो वैरभावे ऽ पि येषां तनूनाम्। रिपूनामरण्यं दहेदेकराहुः स्थिरं मातुलं मानसं नो पितृभ्यः ।। यह बलहीन बुद्धिहीन, शत्रुरहित, धनवान होता है। इस के पिता व मामा का चित्त चंचल होता है। 

नारायणभट्ट - बलं बुद्धिवीर्य धन तद्वशेन स्थितो वैरिभावेपि येषां जनानाम्। रिपूनामरण्यं दहेदेव राहुः स्थिरं मानसं तत्तुला नो पृथिव्याम् ।। यह बल, बुद्धि, वीरता, धन से सम्पन्न, शत्रु का नाश करने वाला, स्थिर चित्त और अनुपम होता है।

पुंजराज- स्वर्भानौ वा सूर्यजे शत्रु संस्थे तत्कट्यां स्याच्छ्यामलं लांछन च। शनिस्तमो वाऽरिगृहस्थितश्चेत् स्यादप्रजत्व खलु मातुलस्य। काष्ठाश्मघातेन चतुष्पदा वा तरुप्रपातेन जलेनमृत्युः ।। षष्ठ में शनि अथवा राहु हो तो कमर में काला दाग होता है। मामा को सन्तति नहीं होती। लकड़ी, पत्थर के आघात से, चौपाये पशु द्वारा, पेड़ पर से गिरने से अथवा पानी में डूब कर मृत्यू होती है।

वसिष्ठ- रिपुभवनगतो शत्रुसन्तापहानिम् ।। शत्रु का कष्ट दूर करता है। जागेश्वर- यदा सैंहिकेयोऽरिगेहे नराणाम् तदा मातुलाना तथा पितृभ्रातुः । सुखं किं धनं महिषं तस्थ गेहे तथा वीर्यवान्वीर्यशाली नरःस्यात् ।। इसे मामा, चाचा का सुख नहीं मिलता । यह भैंस आदि से समृद्ध तथा पराक्रमी होता है। 

हरिवंश- नृप्रसूतौ तनौत्युग्रतामन्वये वाहनं भूषणं भाग्य मर्थाधिकं । सौख्यमारोगतां शत्रुहानिं तथा शत्रुगैहं, गतो मित्र शत्रुग्रहः ।। यह उग्र कुल में उत्पन्न वाहन अलंकार, भाग्य तथा धन से समृद्ध, सुखी, नीरोग, शत्रुरहित होता है।

घोलप - यह बेफिक्र व कलाओं का ज्ञाता होता है। इस स्थान मे केतु से राजा द्वारा सन्मानित, सत्संगति मे रहने वाला, क्वचित राजपद का अधिकारी, अच्छे कामों में खर्च करने वाला, धनवान होता है। अन्य वर्णन अब तक के वर्णनों जैसा है।

गोपाल रत्नाकर-यह शत्रु का नाश करने वाला, बहुत धनवान, अतिशय सुखी होता है। इस की स्त्री नष्ट होती है।
लखनऊ के नबाब- म्लेच्छावनीशाद् द्रव्याप्तिदिलं च साहवं नरम् । बदखाने स्थितो रास; करोति रिपुसंक्षयम।। यह विदेशी राजा से धन प्राप्त करता है। उदार, अधिकारी तथा शत्रु का नाश करने वाला होता है।

पाश्चात्य मत- यह नीचों के व्यवसाय करते है। सेना या जहाजों की नौकरी में खतरा रहता है।

अज्ञात- धारिष्टवान् । अतिसुखी । इन्दुयुते राजस्त्रीभोगी। निर्धनः। चौरः। शुभयुते धनसौख्यम्। नृपप्रसादमारोग्यं धनलाभो रिपुक्षयः । कलत्रपुत्रजं सौख्यं लग्ने षष्ठे विधुन्तुदे।। यह धैर्यवान्, बहुत सुखी होता है। इस राहु के साथ चन्द्र हो तो राजस्त्री से सम्बन्ध होता है। शुभ ग्रह साथ हो तो धन मिलता है। राजा की कृपा, नीरोगता, धन, स्त्री पुत्रों का सुख तथा शत्रुओं का नाश ये इस राहु के फल हैं।

श्री चित्रे - राहुरुदरभागे व्रणम्। पेट में व्रण होता है। यह धनवान, स्थिरचित्त, बुद्धिमान होता है। म्लेच्छों के साथ रहता है। शत्रु नष्ट होते है। इस की कमर में कष्ट होता है। यह माता पिता का विरोधी होता है। पुत्र नष्ट होता है। पशुओं को कष्ट होता है। यह राहु उच्च या स्वगृह में हो तो धन नष्ट होता है। यह उदार हृदय होता है। व्यभिचारी दीर्घायु, सुखी होता है। इस की स्त्री नष्ट होती है।

हमारे अनुभव - इस स्थान में राहु के जो शुभ फल शास्त्रकारों ने बताये हैं वे स्त्री राशि के एवं अशुभ फल पुरुष राशि के हैं। पुरुष राशि में यह राहु हो तो क्रिकेट, पोलो, हॉकी, कबड्डी, कुश्ती आदि खेलों में अपघात से कष्ट होता है। बचपन में नजर लगना, पिशाच पीड़ा, नख का विष फैलना, तालु सूखना मस्तिष्क के रोग आदि से कष्ट होता है। क्वचित मिरगी, कोढ़, रक्तपित्त का उपद्रव होता है। लग्नस्थ राहु मंगल से दूषित होने पर भी यही फल मिलते हैं। पेट में रोग अथवा हाथ-पांव के सन्धिवात से असमय में पेन्शन लेना पड़ता है। स्त्री राशि में यह राहु हो तो खेलों में विजय मिलती है। अच्छा पहलवान बन सकता है। शरीर नीरोग व चपल होता है। स्त्री अच्छी मिलती है किन्तु पिशाच पिड़ीत हो कर उस की मृत्यू होती है। नौकरी में प्रगति मुश्किल से होती है किन्तु पेन्शन में आराम रहता हैं। यह राहु घर में पिशाचबाधा निर्माण करता है। शुभ योग में हो तो २३ वें वर्ष से जीविका शुरू होती है। ७ वे व १० वे वर्ष में बड़े संकट आते है। ३० वें वर्ष से भाग्योदय होता है। 
    षष्ठ स्थान में राहु हो तो आमतौर पर वह शुभ फलदायी रहता है। जातकके शत्रुओं का नाश होता है। सभी प्रकार के अनिष्ट दूर होते हैं। मिथुन राशिका राहु षष्ठ स्थान में हो तो स्त्रियों से सुख प्राप्त होता है। चंद्रयुक्त राहु होतो किसी स्त्री से रुपया-पैसा मिलता है। जातक भाग्यवान, उद्यमी, समाज मेंख्याति प्राप्त एवं सुखी होता है। महर्षि गर्ग और आचार्य जागेश्वर केमतानुसार जातक को भैसे या भैंस से कष्ट पहुंचता है। दांत एवं होंठ रोगग्रस्तरहते हैं। मंत्रेश्वर के मतानुसार पापयुक्त राहु षष्ठ स्थान में हो तो बवासीरएवं अन्य गुदारोग होते हैं। पेट में फोड़ा होने की संभावना रहती है। कुछ अन्यविद्वानों के मतानुसार षष्ठ स्थान में राहु हो तो कमर पर काला तिल या दागरहता है। शरीर पर पत्थर गिरने से या पानी में डूबने से मृत्यु होती है। जातकको चाचा एवं मामा का सुख प्राप्त नहीं होता, जीवन सुखी रहता है पर धनसंग्रहकम रहता है।

    यवन ज्योतिषविदों के अनुसार षष्ठस्थ राहु राजसम्मान दिलाता है। जातकके पिता एवं मामा दोनों अस्थिर बुद्धि के होते हैं।
छठे भाव में राहु
    जातक शत्रुनाशक, पुत्र व अन्य सुखों को प्राप्त करने वाला, अपनेपुत्र को गोद दे देने वाला व संपत्ति दूसरों को देने वाला होगा। यदि राहुउच्दस्थ है तो वह सभी विरोधियों का नाश करता है और जातक अन्यलोगों की पत्ियों से संबंध बनाता है।
    -मानसागरी
    जातक उत्पीड़ित, शत्रुपीड़ित, धनी, सम्पन्न, दीर्घायु होगा और गुदा मेंअल्सर से पीड़ित होगा।
    -फलदीपिका
    जातक सहनशील व प्रसन्नचित्त होगा। यदि चन्द्रमा व राहु या केतुकी युति है तो वह राजपरिवार की महिलाओं से प्रेम संबंध रखने वाला,दरिद्र व चोर होगा।
    -भृगु
वह मनोरंजनों से युक्त, मौन रोगी व अनेक चचेरे-ममेरे भाई-बहनोंवाला होगा।
    -डॉ रामन
    यदि राहु छठे भाव में है तो जातक के शत्रुओं का नाश, शक्तवर्धक,सम्पन्तता व दृढ़ मानवीय गुणों से सम्पन्न होगा।
    पाश्चात्य ज्योतिषविदों की राय में ऐसे जातक जहाज पर नौकरी न करें,उनके जीवन को खतरा रहता है।
    
    षष्ठ भाव-छठे भाव में बैठा राहू जातक को धनी, दीर्घायु, साहसी, प्रसिद्ध,विदेशियों से लाभ कराने वाला तथा शत्रुहन्ता किन्तु कमर दर्द का रोगी भी बनाताहै। ऐसा जातक प्रायः चौपाए पशु पालकर धनी बनता है। नीच व्यवसाय काइच्छुक होता है। मामा की संतान के लिए अशुभ तथा दाद, मिरगी, नजर लगना या प्रेतव्याधि से पीड़ित हो सकता है। ऐसे जातक को नखविष की पीड़ा भी सम्भावितहोती है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक शत्रुओं के लिए साक्षात् काल होता है,किन्तु उसकी बाल्यावस्था कष्ट में बीतती है। पाराशरी मत के साथ लाल किताबका मत साम्यता रखता है। लाल किताब छठे राहू को ‘मुसीबतों की रस्सी काटनेवाला चूहा' कहकर भी पुकारती है। ऐसा जातक दिमागदार व चतुर होता है। राहूअशुभ हो तो जातक के ससुराल पक्ष तथा मामा-मौसी आदि को प्रभावित करताहै। जिसका राहू छठे भाव में हो उसे अपने भाई के साथ मार-पीट नहीं करनीचाहिए अन्यथा जातक को राहू के फल अशुभ प्रास्त होने लगते हैं। ऐसा लालकिताब का मत है।
    छठा राहू यदि स्त्री राशि में हो तो जातक को प्रायः अधिक शुभ रहता है। ऐसे
    जातक को पहलवानी में सफलता मिलना सम्भावित होता है तथा शरीर भी निरोगीहोता है। ऐसे जातक की स्त्री पतिब्रता होती है। पर जातक की नौकरी व पत्नी के
    स्वास्थ्य के सम्बन्ध में यह राहू शुभ नहीं होता। आकस्मिक रोगों या पिशाच पीड़ासे जातक की पत्नी की मृत्यु भी हो सकती है।
    छठा राहू जातक को कार्यक्षेत्र में आलसी या अस्थिर बना सकता है। दशमेशभी पीड़ित हो तो व्यवसाय या आजीविका में अड़चन व पिता के लिए अशुभ फलदे सकता है। जातक की प्रायः कुटुम्ब से नहीं बनती।
षष्ठ भावः स्त्री राशि का राहु छठे स्थान में हो तो प्रायः शुभ फल मिलते हैं। शुभ ग्रह से योग करता हो तो धन का सुख, निरोगता, स्त्री-पुत्र का सुख,राज्यकृपा की प्राप्ति तथा शत्रु पक्ष का नाश जैसे फल मिलते हैं। पुरुष राशि काराहु हो तो जातक का शैशवकाल सुखमय व्यतीत नहीं होता। उसे दृष्टि दोष सेपीड़ा, भूत-पिशाच बाधा से भय, विषभय तथा मस्तिष्क रोग की सम्भावनारहती है। मिरगी रोग या कुष्ठ रोग भी अनुभव में आते हैं। शुभ योग में छठेभाव में राहु हो तो आजीविका की शीघ्र प्ाप्ति होती है तथा युवावस्था में हीभाग्योदय हो जाता है।
1. कुत्ता काला पाले। 
2. पास में कांच के बटे (गोली) रखें।
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7) सप्तम् भाव - सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)सातवें स्थान के फल

वैद्यनाथ- गर्वी जारसिखामणिः फणिपतौ कामस्थिते योगवान्। अंगवागोपगतें तु केतौ कुदारको वा विकलत्रभोगः ।। निद्री विशीलः परिदीनवाक्यः सदाटनो मुर्खजनाग्रगण्यः ।। यह गर्विष्ठ, बहुत व्यभिचारी, रोगी होता है। 

आर्यग्रन्थकार - जायास्थराहुर्धनहानिजाया ददाति नाय विविधाश्च भोगान् । पापानुरक्तां कुटिलां कुशीलां ददाति शेषैर्बहुबिर्युतश्च।। यह धनहीन होता है। स्त्री तथा विविध भोग मिलते है। यह पापग्रह के साथ हो तो स्त्री पाप में आसक्त, कुटिल, शीलहीन होती है। 

गर्ग - आर्यग्रन्थ के समान वर्णन है। सिर्फ स्त्री कामेच्छारहित होना यह अधिक कहा है- क्लीबा राहौ ।

ढुंढिराज- जायाविरोधं खलु वा प्रणाशं प्रचण्डरुपामथ कोपयुक्ताम्।। विवादशीलामथ रोगयुक्ताम् प्राप्नोति जन्तुर्मदने पत्नी स्मरण तमेच ।। इस की स्त्री नष्ट होती है। अथवा स्त्री विरोधी, गुस्सैल, उग्र स्वभाव की झगड़ालू, रोगी होती है। 

बृहद्यवनजातक- विनाशं चरेत् सप्तमे सैंहिके:कलत्रादिनाशं करोत्येव नित्यम् । कटाहो यथा लोहजो वन्हितप्तस्तथा सोऽतिवादान्न शान्ति प्रयाति । । यह राहू स्त्री आदि नष्ट करता है। तपी हुई लोहे की कढ़ही जैसा उग्र स्वभाव होता है अतः वादविवाद में यह कभी शान्त नहीं रह सकता। 

नारायण– काम्ये कलत्रे रिपुलग्नछिद्रे केन्द्रत्रिकोणे व्ययगे च राहुः। मन्त्री दोष नही होता। मस्तष्क व मध्यभाग में यह मन्द होता है।

हरिवंश - मानवांनां प्रकुर्याद् भयं सर्वतो धर्महानिं, दयाहिनतां तीक्ष्णताम् । कायकां कामिनीसौख्यहानिर्भवेत् भामिनीभावगो या मिनीशन्तुदः ।। सब ओर से भय, धर्म हीन, निर्दय होना, तीक्ष्णता तथा स्त्रीसुख नष्ट होना ये फल हैं

घोलप - दुष्टों के सहवास से यह सज्जनों को कष्ट देता है। स्त्री, पुत्र, धन, मित्र, का सुख नहीं मिलता । स्त्री की मृत्यु होती है। इस की स्त्री अति क्रोधी, रोगी अथवा वादविवाद करने वाली होती है।

गोपाल रत्नाकर-इस के दो विवाह होते हैं। पहली स्त्री को ऋतुसम्बन्धी रोग होते हैं तथा दूसरी को गुल्मरोग(गांठ होना) होते हैं। बुरी स्त्रियों के संपर्क से यह रोगी होता है।

लखनऊ के नबाब- हिर्जगर्दश्च वेतालो गुस्वरो बदजनो भवेत् । हप्तमखाने यदा रासः कलही मनुजस्तदा ।। पागल जैसा भटकने वाला, क्रोधी, झगड़ालू, बदचलन होता है।

वसिष्ठ- जायास्थे स्त्रीविनाशः । स्त्री का नाश होता है।

पाश्चात्य मत- इस का कद बहुत नाटा होता है।

अज्ञात. दारद्वयं तन्मध्ये प्रथमस्त्रीनाशः द्वितीयकलत्रे गुल्मव्याधिः । पापयुते गण्डोत्पत्तिः । शुभयुते गण्डनिवृत्तिः नियमेन दारद्वयम् । शुभयते एकमेव। प्रवासात् पीडनं चैव स्त्रीकष्ट पवनोंत्थरुक् । कटिबस्तिश्च जानुभ्यां सैंहिकेये च सप्तमे ।। इस के दो विवाह होते हैं, पहली स्त्री की मृत्यु होती है, दूसरी को गुल्मरोग होता है। यह राहु पापग्रह के साथ हो तों गण्डरोग होता है शुभग्रह के साथ हो तो विवाह एक ही होता है। प्रवास में कष्ट, स्त्री को कष्ट, कमर, वस्ति, घुटनों में वातरोग ये इस राहु के फल हैं।

हमारा अनुभव - इस स्थान में राहु के फल सभी लेखकों ने अशुभ बतलाये । ये मुख्यतः पुरुष राशियों के हैं। पुरुष राशि मे यह राहु पूर्वजन्म के शाप के समान होता है। यह स्त्री को बहुत कष्ट देता हैं । घर में सतत असन्तोष बना रहता है। व्यवसाय, नौकरी में हानि हो कर धन की कमी रहती है। स्थिति हमेशा अस्थिर रहती है। पहली पत्नी की अपघात में मृत्यु होती है। दूसरी पत्नी से भी ठीक सम्बन्ध नहीं रहते। मिथुन, कन्या, तुला, धनु में विवाह ही न होने का अनुभव है। अन्य राशियों में विवाह तो होते हैं किन्तु मनःपूर्वक प्रेम कभी नहीं होता, अकारण विभक्त होते हैं। केवल शारीरिक सम्बन्ध ही इन के विवाह का उद्देश होता है। दूसरी कुलीन स्त्रियों को व्यभिचारमार्ग पर ले जाते हैं। विधवा स्त्रियों से सम्बन्ध रख कर अवसर पर गर्भपात, बालहत्या करवाते हैं। इन्हें अपनी स्त्री से सुख नहीं मिलता अतः अन्य स्त्रियों पर पैसा खर्च करते हैं। व्यवसाय ठीक नहीं होता, नौकरी में आक्षेप आते हैं। सस्पेण्ड होना, डिग्रेड होना आदि प्रकारों से कष्ट होता है। ये दूसरों के घर रहते हैं। इन की स्त्री सुस्वभावी, शीलवान होती है। सन्तति अति अल्प होती है। यह राहु स्त्री राशि में हो तो विवाह जल्दी होता है, स्त्री सुस्वभावी होती है व दोनों में अच्छा प्रेम रहता है। नौकरी अच्छी चली है किन्तु ये स्वतन्त्र व्यवसाय के लिए बहुत कोशिश करते हैं। यदि अन्य ग्रहों से शुभ सम्बन्ध हो तो व्यवसाय में यशस्वी होते हैं। दो विवाह होते हैं। यह राहु कुम्भ में हो तो विवाह एक ही होता है। सन्तति अधिक होती है। सन्मानित होतें हैं। स्त्री धन मिलता है। स्वभाव साधारणतः अच्छा होता है। इन्हें बीमा कंपनी नगरपालिका, जिल्हापरिषद, रेल्वे आदि की नौकरी में सफलता मिलती है क्यों कि ये विषय राहु के कारकत्व के हैं । इस स्थान में राहु के फलस्वरूप विवाह में अनियमितता प्राय: पाई जाती है। विवाह बहुत देर से होना, आन्तरजातीय विवाह होना, विधवा से विवाह, उम्र से बडी स्त्री से विवाह, अवैध स्त्रीसम्बन्ध, विवाह न होना आदि फल देखे जाते हैं। पूर्वजन्म में किसी स्त्री को कष्ट देने से ये बातें शापस्वरुप भोगनी पड़ती हैं। विवाह होने पर प्रेम न होना, विवाहविच्छेद होना, अधिक विवाह करने पर भी स्त्री अच्छी न मिलना ये इसी के फल हैं।

राहु से मृत्युविषयक फलों का वर्णन कुछ आचार्यों ने किया है। उदाहरणार्थ- - सप्तमे नवमे राहुः शत्रुक्षेत्रो यदा भवेत् । प्राप्ते च षोडशे वर्षे तस्य मृत्युर्न सशयः ।। नवमे दशमे राहुर्जन्मकाले यदा स्थितः । षोडशाब्दे भवेन्मृत्युर्यदिशक्रोऽपि रक्षति।। सप्तम या नवम में शत्रुग्रह की राशि में राहु हो तो १६ वे वर्ष में मृत्यु होती है। नवम या दशम में राहु हो तो १६ वे वर्ष में मृत्यु होती है-उसे इन्द्र भी टाल नहीं सकता। किन्तु सप्तम, नवम, दशम ये तीनों स्थान मृत्यु कारक नहीं है तथा राहु ग्रह भी मृत्युकारक नही है अतः यह योग फल ठीक प्रतीत नही होता। अन्य स्थानों में भी राहु स्वयं उस व्यक्ति के लिए मारक नही होता-उस स्थान से सम्बन्धित व्यक्ति के लिये मारक होता है। लग्न में- माता पिता को, धनस्थान में घर के किसी बड़े व्यक्ति को, तृतीय में भाई बहिनों को, चतुर्थ में माता पिता को, पंचम में पुत्र को, अष्टम मे बहिन को, नवम मे भाई बहनों को, दशम मे माता-पिता को, लाभ में बड़े भाई या पुत्र को तथा व्यय में पत्नी या चाचा को यह राहु मारक हो सकता है।

    सप्तम स्थान में राहु हो तो जातक अभिमानी एवं कामातुर रहता है। किंतुपत्नी में कामेच्छा का अभाव होने से जातक व्यभिचारी बन सकता है। पत्नीरोगी, क्रोधी, झगड़ालू, चरित्रहीन, कुटिल, षड्यंत्री होती है। सप्तमस्थ राहु केये फल पापग्रह से युक्त हो तो विशेषरूप से अनुभव में आते हैं। पत्नी अल्पायुरहती है एवं उसका जातक को पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता। विवाह एक सेअधिक होते हैं। राहु शुभग्रह युक्त हो तो एक ही विवाह होता है अन्यथा एकपत्नी की मृत्यु पश्चात दूसरा विवाह होता है, दूसरी पत्नी भी गुल्म एवं गंडरोगीहोगी। कुल मिलाकर वैवाहिक जीवन में सुख प्राप्त नहीं होता। जातक कोसाझेदारी के व्यवसाय में घाटा होता है।

    पाश्चात्य ज्योतिर्विद भी उपरोक्त राहु के फलकथन से सहमत हैं। सिर्फसप्तमस्थ राहु होने पर जातक ठिगना होता है, यह विशेष फल उन्होंने बताया है।यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार जातक अधिकार एवं वैभवयुक्त रहता है। लेकिन राहु बलवान होने पर ही ऐसा संभव है।
सप्तम भाव में राहु
    जातक महिलाओं संबंधी सभी सुखों से सम्पन्न व महिलाओं ही केकारण आर्थिक हानि उठाने वाला होगा। यदि राहु पापाक्रान्त है तो पत्नीबुरे स्वभाव, गंदी मानसिकता और विचारों वाली तथा पापिनी होगी।
    -मानसागरी
    जातक मूर्ख, महिलाओं पर धन लुटाने वाला, विधुर, नपुंसक, संभोगमें असमर्थ और स्वतन्त्र विचारों वाला होगा।
    -फलदीपिका
    व्यक्ति की दो पल्ियाँ होंगी। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरीभी ट्यूमर से ग्रस्त होगी। यदि राहु या केतु पापाक्रान्त है तो व्यक्ति स्वयंरोगी होगा। यदि ये शुभ प्रभावों में है तो निरोगी व एक पत्नी वाला होगा।-भृगु
    जातक की पत्नी को रजोधर्म संबंधी गड़बड़ होगी। वह विधुर यातलाकशुदा होगा और विधवा या तलाकशुदा महिलाओं से संबंध रखेगा,मधुमेह ग्रस्त, राजसी भोजन प्राप्त करने वाला परन्तु खिल्नमना होगा।,
    -डॉ रामन
    राहु पत्नी वियोग का दुखः दायक होता है।
    

    सप्तम भाव--यदि लग्नकुंडली के सातवें भाव में राहू हो तो स्त्री और पुरुषदोनों जातकों के लिए ही बहुत अशुभ होता है। स्त्री जातकों में सातवां राहू गर्भ,मूत्र या गुप्तांग सम्बन्धी विकार देता है तथा पति से तलाक की स्थिति बनाता है।वैवाहिक जीवन को कलहकारी बनाता है। तलाक न भी हो तो वियोग अवश्यहोता है।
    पुरुष जातकों को सातवां राहू व्यापार में हानि, धन-दौलत की बर्बादी, पत्नीकी मृत्यु/वियोग (प्रायः विधुर होना पड़ता है), अनैतिक सम्बन्ध, अनैतिक कार्य,लालच, आवारापन, एक से अधिक विवाह (यदि विवाह 21 वर्ष की आयु में ही,जो प्रायः कम सम्भव होता हो तो विवाहोपरांत संसुराल पक्ष वाले बर्बाद हो जाते
    हैं)। आदि दुष्परिणाम देता है। जातक पैसा होने पर भी परेशान ही रहता है।
    लाल किताब के अनुसार सातवां राहू पूर्व जन्म के दुष्कर्मों का परिणाम होताहै। ऐसे जातक का विवाह नहीं होता (अड़चनें आती हैं, विवाह नहीं होता याविलम्ब से होता है), होता है तो पति-पत्नी में प्रेम नहीं रहता, कलेश होता है।अन्ततः तलाक या वियोग होता है। प्रायः सातवां राहू अन्तर्जातीय विवाह कराताहै। विवाह में देर होती है, पत्नी दूसरे धर्म की (प्रायः अपने से नीची जाति की)    या आयु में बड़ी होती है। अथवा पुनर्भू होती है। सातवां राहू विधवा, परित्यक्ता या
    नीच कुल की स्त्रियों से अवैध सम्बन्ध बनवाता है। ऐसा जातक पत्नी को मात्र
    वासनापूर्ति का माध्यम ही समझता है तथा वह प्रायः नीच रति में सुख मानता है।
    यदि सातवां राहू स्त्री राशि में हो तो अपेक्षाकृत शुभ होता है। बाकी दिकतें
    तो बनी रहती हैं (कम या ज्यादा), किन्तु जातक का विवाह शीष्र हो सकता है।
    तथा विवाह के बाद पत्नी के साथ सामंजस्य भी बना रहता है (वियोग तो सम्भव होता है किन्तु तलाक का भय कम हो जाता है)।
सप्तम भावः राहु सप्तमस्थ हो तो स्त्री सुख का नाश होता है। बड़ी आयुमें विवाह होना, पत्नी का विजातीय होना, पुनर्भू पत्नी मिलना, अपनी आयु सेअधिक आयु की पत्नी होना, परकीया से अवैध संबंध होना या विवाह ही नहोना जैसे फल अनुभव में आते हैं। भारतीय मान्यता के अनुसार अशुभ फलपूर्वजन्म के कृत्यों से मिलते हैं। जैसे पूर्वजन्म में जातक ने किसी के दाम्पत्यजीवन को बिगाड़ा हो अथवा किसी स्त्री का सतीत्व नष्ट किया हो आदि केपरिणामस्वरूप जातक को दाम्पत्य सुख नहीं मिलता। मिथुन, कन्या, तुला,धनु राशि का राहु सप्तमस्थ हो तो विवाह प्रतिबन्धक योग बनाता है। अन्यराशियों में राहु के होने से विवाह होने पर भी दाम्पत्य सुख नहीं मिल पाता।जातक परकीया विशेषतया विधवा स्त्रियों से अवैध संबंध बनाता है, उनकेगर्भ में आए भ्रूण की हत्या (गर्भपात) कराता रहता है। फलत: ऐसे जघन्यकृत्यों में धन का नाश कर निर्धनता को न्योता देता है। ऐसा जातक कर्मजन्यफल को नौकरी छूटना, व्यवसाय में हानि होना जैसे रूप में भोगता है।

1. सोने के स्थान पर गंगा जल रखें। 
2. गंगा में सिक्के डाले। 
3. पेटी मेंठोस चाँदी कपड़़े में बांध कर रखें।
===========================8) अष्टम् भाव- अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
आठवें स्थान के फल

वैद्यनाथ- राहौ क्लेशापवादी परिभवगृहगे दीर्घसूत्री च रोगी । केतौ यदा रन्ध्रगृहोपयाते जातः परद्रव्यवधूरतेच्छुः । रोगी दुराचाररतोऽतिलुब्धः सौम्येक्षितेःऽ तीव धनी चिरायुः ।। यह क्लेशयुक्त, निन्दित, दीर्घसूत्री, रोगी होता है। सौम्य ग्रह की दृष्टि हो तो दीर्घायु व धनी होता हैं।

गर्ग- दुष्टचौर्यापवादेन निधनं कुरूते तमः । बहुकिल्मिषमाधत्ते धत्ते कष्टात् स यातनाम् ।। दुष्ट चोरी के अपवाद से मृत्यु होती है। बहुत पाप और कष्ट यातना होती है।

बृहद्यवनजातक- नृपैः पण्डितैर्वन्दितोऽनिन्दितश्च सकृद्भाग्यलाभः सकृभ्रंश एव । धनं जातकं तज्जनाश्च त्यजन्ति श्रमग्रन्थिरुग् रन्ध्रगश्चेद् हि राहुः । । यह राजा व पण्डितों द्वारा प्रशंसित होता है। कभी भाग्योदय तो कभी हानि होती है। पूर्वार्जित धन नष्ट होता है। पहले के सम्बन्धी भी इसे छोड़ देते है। श्रम से या ग्रन्थिरोग से पीड़ा होती है। 

ढुंढिराज- अनिष्टनाशं खलु गुह्यपीडां प्रमेहरोगं वृषणस्यवृद्धिम् । प्राप्नोति जन्तुर्विकलारिलाभं सिंहीसुते वा खलु मृत्युगेहे।। अनिष्ट दूर होते है। इसे गुह्य रोग, प्रमेह, अण्डवृद्धि से कष्ट होता है। शरीर दुर्बल होता है। 

आर्यग्रन्थ-राहुःसदा चाष्टममन्दिरस्थो रोगान्वितं पापरतं प्रगल्भं । चौरं कुशं कापुरुषं धनाढ्यं मायामतीतं पुरुष करोति। गुदं पीड्यर्तेशादि रोगैरवश्यं भयं वाहनादेः स्वद्रव्यस्य रोधः । भवेदष्ट मे राहुपुच्छेऽर्थलाभऽर्थलाभः सदा कीटकन्या, जगोयुग्मकेतुः ।। यह सदा रोगी, पापी, ढीठ, चोर, दुबला, डरपोक, धनी, मायारहित होता है। 

नारायणभट्ट - इस ने राहु का फल बृहद्यवनजातक जैसा व केतू का फल आर्यग्रन्थ जैसा दिया है।

मन्त्रेश्वर- रन्ध्रेल्पायुरशुद्धिकृच्च विकलो वातामयोऽल्पात्मजः । यह अल्पायु, अपवित्र काम करने वाला, वातरोगी, विकल होता है। इसे पुत्र कम होते हैं। 

जागेश्वर - यदा श्रेष्ठकर्मामयैर्द्वरत्यक्तो भवेद्गोधनं वार्धके वै सुभाग्यम् कदाचित् गुदे क्रूररोगा भवेयुः स्थितो राहुनामा नराणां विनाशे ।। यह श्रेष्ठ काम करनेवाला, नीरोग, गाय आदि पशुओं से समृद्ध, वृद्ध वय मे सुखी होता है। कदाचित इसे गुप्त रोग होते है। 

हरिवंश-नैंधने सिंहिकाजे नरो निर्धनो भीरुरालस्यधीरोऽतिधूर्तो भवेत् । दुर्बलो देहदानश्च दुःखान्वितो निर्दयो दगुयुक्तो दरिद्रोदयः ।। यह धनहीन, डरपोक, आलसी, उतावला, बहुत धूर्त, दुबला, दुखी, निर्दय, भाग्यहीन, खुजली से पीड़ित होता है।

वसिष्ठ- निधनगते स्वेच्छया भूपपूज्यः । राजा द्वारा सन्मानित होता है। घोलप-स्त्री-पुत्र सुख नहीं मिलता। मानहीन, विद्याहीन, गुदरोग, प्रमेह, अन्तर्गल व शत्रु से पीड़ित होता है। यह राहु मिथुन में हो तो विशेष फल देता है । वह महापराक्रमी व कीर्तिमान होता है ।

गोपाल रत्नाकर- यह झगड़ालू होता है। ३२ वे वर्ष में संकट आता है। शुभग्रह के साथ हो तो ५० वे वर्ष में संकट आता है। 

लखनऊ के नवाब- हस्तमखाने यदारासः शरीरीस्यान्मुसाफिरः । वेदीनः खिश्मनाक: स्यादवकारश्च मुफ्लिसः।। यह पुष्ट शरीर का, प्रवासी, धर्महीन, क्रोधी, दुराचारी व दरिद्री होता है।

पाश्चात्य मत- इस राहु से स्त्रीधन, किसी सम्बन्धी के वसीयत का धन प्राप्त होता है। किन्तु इस धन की प्राप्ति में कुछ उलझने भी होती है। फायदा तात्कालिक होता है। यह स्थान वैसे गौण और दुर्बल है. किन्तु यहां उच्च में राहु हो तो विशेष फल दे सकता है।

अज्ञात- अतिरोगी। द्वात्रिंशद्वर्षायुष्मान् । शुभयुते पंचचत्वारिंशद्वर्षाणि । भावाधिपे बलयुते स्वोच्चे षष्ठिवर्षाणि जिवितम्। धनव्यस्त्वनारोग्यं विवादो बन्धुभिः सह। स्त्रीकष्ट च प्रवासश्च राहुरष्टमगो यदि।। यह बहुत रोगी होकर ३२ वे वर्ष में मरता है। शुभग्रह साथ हो तो ४५ वे वर्ष तक जीवन होता है। अष्टमेश बलवान हो या उच्च में हो तो ६० वर्ष तक जीवन होता है। यह खर्चीला, रोगी, भाईयों से झगड़ने वाला, प्रवासी, स्त्री सुख से रहित होता है।

चित्रे - यह ३२ वे वर्ष में शारीरिक कष्ट से पीड़ित होता है। धनवान, विद्वान, राजा द्वारा पूजित होता है। यह राहु उच्च या स्वगृह में हो तो पराक्रमी, कीर्तिमान होता है। यह रोगी, अभिमानी होता है।

हमारा अनुभव- यह स्थान दुर्बल है, अतः सब लेखको ने प्राय: अशुभ ही फल दिये हैं। किन्तु हमारे विचार से शुभ फलों का भी अनुभव मिलता है। यह राहु पुरुष राशि में हो तो स्त्री झगड़ालू होती है, घर की बातें बाहर बतलाती है, अभागी होती है। इस से ४२ वे वर्ष तक स्थिरता नहीं मिल सकती। अकस्मात धन प्राप्त करने की इच्छा से रेस, सट्टा, लॉटरी, जुआ आदि में मग्न होते हैं। इसे धनप्राप्ति ठीक नहीं होती, रिश्वत ले तो पकड़ा जाता है। पत्नी के पहले मृत्यु होती है। मृत्यु के समय भ्रम फिट, मज्जाविकार हो कर बेहोशी में मृत्यु होती है। मिथुन मे यह राह हो तो स्त्री झगड़ालू होती है। विवाह से भाग्योदय बन्द होता है। स्वतन्त्र व्यवसाय छोड़कर नौकरी करनी पड़ती है। स्त्री निर्धन घर की होती है। शीलवान होती है। स्त्री राशि में यह राहु स्त्री अच्छी देता है। स्वभाव से शान्त, संकट में धीरज रखने वाली, धनसंचय करने वाली, कम बोलने वाली, घर की बाते बाहर न बतलाने वाली होती है। पति के पहले पत्नी की मृत्यु होती है। मृत्यु के समय सावधान स्थिति रहती है। कुछ समय पहले मृत्यु का आभास मिल जाता है। ये अधिकारी हो कर रिश्वत ले तो पकड़े नहीं जाते। २६ से ३६ वें वर्ष तक भाग्योदय होता है। साधारणतः आयु के पूर्वार्ध में यह राहु कष्ट देता है। दूषित हो तो वृद्ध अवस्था में भी कष्ट होता है। वें वर्ष में सकंट, ३० वें वर्ष में बन्धनयोग, ३२ वें वर्ष में स्त्री को कष्ट अथवा मृत्यु एवं ४२ वें वर्ष में लाभ का योग होता है।

    अष्टम स्थान में राहु अनिष्ट फलदायक होता है। गुप्तरोग, गुदारोग, प्रमेह,अंडवृद्धि आदि रोग जातक में उत्पन्न होते हैं और जीवन कष्टमय रहता है। चोरीया असामाजिक तत्त्वों के कारण जीवन को खतरा रहता है। सामाजिक क्षेत्र मेंनिंदा होती है। जातक हर काम में आलसी होता है। उसे आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं।  
महर्षि वशिष्ठ एवं आचार्य जागेश्वर के मतानुसार ऐसा जातक सरकारीकर्मचारी, प्रख्यात, पशुधन से समृद्ध रहता है। बुढ़ापा सुख में गुजरता है।अष्टमस्थ राहु अनिष्टकारक होता है। जातक के जीवन में 32, 45, 50,60वां वर्ष कष्टसाध्य रहता है, विशेषकर 32वां वर्ष।

    अष्टमस्थ राहु के कारण जातक रोगी, धन का अपव्यय करनेवाला, अल्पायु,सहोदरों से मनमुटाव रखनेवाला, दूर का प्रवास करनेवाला एवं पत्नी के कारण दुःखी रहता है।

    पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार अष्टमस्थ राहु आर्थिक दृष्टि से शुभफल प्रदान करता है। स्त्री या वसीयत से जातक को धनप्राप्ति होती है। उच्चराहु होने पर ही यह फल प्राप्त होता है।

    यवन ज्योतिषविदों के अनुसार अष्टमस्थ राहु के मिश्रित फल मिलते हैं।जातक विद्वान, शासन में सम्माननीय रहता है। दिखने में शरीर हट्टा-कट्टारहता है किंतु जातक रोगी रहता है। वह रोगी, क्रोधी, दुराचारी एवं साधारणआर्थिक स्थिति में गुजारा करता है।

    अष्टमस्थ राहु के फल हमने राजनीति के धुरंधरों की जन्मकुंडलियों में शुभपाए हैं। अष्टमस्थ राहु के कारण वे रिश्वत लेकर पचा लेते हैं। आर्थिक घोटालेकितने ही बड़े हों वे उनसे बच जाते हैं।
अष्टम भाव में राहु अष्टमस्थ राहु जातक को रोगी, पाप प्रवृत्त और निर्भीक करता है।जातक चोर, असंतुष्ट, अशान्त, डरपोक, धनि, संपन्न व वैरागी होगा।
    -मानसागरी
    व्यक्ति दयनीय दशा में, गठिया (स्यूमैटिक) रोगों से ग्रस्त, अल्पसंतति वाला और असत्कर्म करने वाला होगा।
    -फलदीपिका
    अष्टम भाव में राहु या केतु जातक को अत्यधिक रोगी बनाते हैं।जातक की आयु 32 वर्ष होगी। यदि राहु या केतु शुभ प्रभावों में है तोआयु 45 वर्ष हो सकती है। अष्टमेश की अच्छी स्थिति भी जातक को60 वर्ष की आयु दे सकती है।
    -भृगुजातक गिरा हुआ, झगडालू, संकीर्ण विचारों वाला, अनैतिक, व्यभिचारीऔर मिलावट करने वाला होगा।
    -डॉ रामन
    राहु के कारण वातजनित रोग, पैतृक संपत्ति में झगड़ा, संबंधियों सेअनबन और संबंधियों व विद्वानों में मान-सम्मान प्राप्तकर्ता होता है।जातक परिवार के सदस्यों से सम्मानित नहीं होगा।
 
    अष्टम भाव-लग्नकुंडली के आठवें भाव में राहू हो तो जातक क्रोधी,
    कामुक और बड़बोला होता है। उसको गुसरोग सम्भावित होते हैं। भाग्य की स्थितिडांवाडोल होती है। यदि अष्टम राहू अशुभ हो तो जातक को बुढ़ापे तक भी सुखनहीं मिलता। ऐसा जातक यदि बेईमानी से धन कमाए तो उसके धन में 8 गुनाकमी आ जाती है। किन्तु यदि कुंडली के बारहवें भाव में मंगल हो तो आठवां राहुूअशुभ नहीं होता। ऐसा लाल किताब का मत है।
    लाल किताब के अनुसार पुरुष राशि का आठवां राहू जातक के दाम्पत्य
    जीवन को नरक तुल्य बनाता है। पत्नी क्लेश करने वाली व संदिग्ध चरित्र की
    होती है। ऐसा जातक नैतिक/अनैतिक का विचार न कर धनोपार्जन की धुन में रहता
    है। राजकीय नौकरी हो तो रिश्वत अवश्य लेता है (यद्यपि पुरुष राशि में आठवें राहू
    वाला जातक यदि रिश्वत लेता है तो पकड़ा जाता है तथा दण्ड भुगतता है)। ऐसे
    जातक की मौत बेहोशी में होती है।
    स्त्री राशि में राहू आठवें घर में हो तो फल विपरीत हो जाते हैं। पत्नी अच्छी
    मिलती है किन्तु जीवन के अन्त में जातक विधुर हो जाता है। मृत्यु का उसे
    पूर्वाभास हो जाता है। मरते समय चेतना बनी रहती है। जातक प्रायः स्वतंत्र व्यवसाय
    करता है। यदि नौकरी में हो तो रिश्वत जरूर लेता है किन्तु पकड़ा नहीं जाता।
    आठवां राहू जातक को मांस-मदिरा सेवी, खाद्यादि में अन्तर न करने वाला,गाली-गलौच करने वाला या कटुभाषी तथा गुदा रोगी भी बनाता है। प्रायः बवासीरसे पीड़ा होती है। अपने कुटुम्ब से ऐसे जातक की नहीं बनती। यदि सूर्य दुर्बल या
    पापाक्रांत हो तथा द्वितीयेश भी निर्बल हो तो नेत्र.रोग या नेत्र विकार सम्भव होता
    है (विशेष कर बायां नेत्र)।
    स्त्री जातक की कुंडली में आठवें भाव में बैठा हुआ राहू जातक को वैधव्य
    योग प्रदान करता है। यदि ससमेश, सस्म भाव तथा गुरु दुर्बल या पाप प्रभाव में हो
    तो जातक जरूर विधवा हो जाती है।
    
अष्टम भावः अष्टमस्थ राहु पुरुष राशि का हो तो प्रायः अशुभ फल,जैसे स्त्री का कलहप्रिय होना, विश्वासपात्र न होना, चरित्रहीन होना आदिमिलते हैं। धनार्जन नहीं हो पाता, अत्यधिक धन लोलुपता के कारण ऐसेजातक राजकीय सेवा में रहते रिश्वत लेते हैं तथा पकड़े जाते हैं और दण्ड भीभोगते हैं। पत्नी से पूर्व तथा बेहोशी की हालत में मरते हैं। पत्नी निर्धन परिवारसे आती है, व्यवसाय में असफलता के पश्चात नौकरी करनी पड़ती है। स्त्रीराशि का राहु हो तो पत्नी भले स्वभाव की घर-संसार को कुशलता से चलानेवाली तथा विश्वासपात्र मिलती है। ऐसे व्यक्ति नौकरी में रिश्वत लेकर भीपकड़े नहीं जाते। राहु मिथुन में हो तो जातक पराक्रमी और यशस्वी होता है। दाम्पत्य सुख अच्छा मिलता है। अशुभ प्रभाव में आया राहु अष्टम भाव में होतो गुदा, प्रमेह रोग से पीड़ा तथा शत्रुओं से भय रहता है।
1. नारियल पानी में बहाबें। 
2. शिव मंदिर में चार बादाम ले जावे।चढ़ाकर वापस ले आवें व छः माह ऐसा करें, फिर पानी में बहा देवे।
===========================
9) नवम् भाव -नवम स्थान (भाग्य भाव)
नौवें स्थान के फल

वैद्यनाथ- भाग्यस्थे दितिजे तु धर्मजनकद्वेषी यशोवित्तवान्।। यह अपने धर्म व पिता का द्वेष करने वाला, किर्तिमान व धनी होता है। 

गर्ग- नीचधर्मानुरक्तः स्यात् सत्यशौचविवर्जितः । भाग्यहीनश्च मन्दश्च धर्मगेसिंहिकासुते।। यह नीचों के धर्म में आसक्त, सत्यहीन, अपवित्र, अभागा व मन्द होता है। 

वसिष्ठ- धर्मस्थेधर्मनाशम्।। धर्म नष्ट होता है।

बृहद्यवनजातक- तमोंङगीकृतं न त्यजेद् वा व्रतानि त्यजेत् सोदरान नैव चातिप्रियत्वात् ।रतिःकौतुके यस्य तस्यास्ति भाग्यं शयानं सुकं बन्दिनो बोधयन्ति ।।यह लिये हुए काम को अधूरा नही छोड़ता। बन्धुओं पर स्नेह होने से उन्हें अलग नहीं करता। कामक्रीड़ा में उत्साही, सेवकों से सम्पन्न होता है ( सुबह नौकर सुखपूर्वक उसे जगाते हैं ।)

ढुंढीराज- धर्मार्थनाशः किल धर्मगे तमे सुखाल्पता वै भ्रमणं नरस्य। दरिद्रता बन्धुसुखाल्पता च भवेच्च लोके किल देहपीडा ।। धर्म व धन का नाश होता है।
सुख कम मिलता है, बन्धु कम होते हैं, शरीर में पीड़ा होती हैं, दरिद्रता होती है। 

आर्यग्रन्थ- धर्मस्थिते चन्द्र रिपो मनुष्यश्चण्डालकर्मा पिशुनःकुचैलः । ज्ञातिप्रमोदेऽ निरतश्च दीनः शत्रोः कुलाद् भीतिमुपैति नित्यम् ।। यह चण्डाल जैसे काम करने वाला, दुष्ट, गन्दे वस्त्र पहनने वाला, दीन, शत्रु से डरा हुआ, जाति के आनन्द में उत्साह न रखने वाला होता है। 

नारायणभट्ट - मनीषी कृतं न त्यजेद् बन्धुवर्ग सदा पालयेत् पूजितः स्यात् गुणैःस्वैः । सभाद्योतको यस्य चेत् त्रित्रिकोणे तमः कौतुकी देवतीर्थे दयालुः।। यह अपने काम को तथा अपने लोगों को नहीं छोड़ता । गुणों के कारण सन्मानित होता है। सभा में विजयी, देव व तीर्थ के विषय में उत्साही तथा दयालु होता है।

जागेश्वर- यदा धर्मभा भवेद् राहुनामा भवेद् धर्महीनस्तथा पापकारी। स्वयंदुष्टसंगं करोत्येव नूनं परं विक्रमात् पाद देशे सघातः ।। भवेद् विक्रमी शस्त्रपाणिश्च मित्रधनैर्धर्मशीलैः सदा वर्जितःस्यात् तथा भ्रातृ-पुत्रादिचिन्तायुतः स्यात् यदा पातछाया गता पुण्यभावे ।। यह धर्महीन, पापी, दुष्टों की संगति में रहने वाला होता है। युद्ध में इस का पैर जखमी होता है। इस स्थान में केतु हो तो पराक्रमी, सदा शस्त्र धारण करने वाला होता है। मित्र, धर्म व शील से रहित और बन्धु तथा पुत्र के विषय मे चिन्तित होता है।

चित्रे- सेवक बहुत होते हैं। धनी, सुखी, दैववान होता है। धर्म पर श्रद्धा कम होती है। शरीर कष्टी रहता है। सभा में विजयी होता है। स्त्री की इच्छा पालन करता है। बन्धुओं से स्नेह करता है। यह सन्ततिहीन, जाति का अभिमानी, झूठ बोलने वाला, धर्म की निन्दा करने वाला, कर्तव्य रहित होता है। यह राहु वृषभ, मिथुन, कर्क, कन्या व मेष में हो तो उत्तम यश देता है। राहु दूषित हो तो अनिष्ट फल देता है। यह बहुत प्रवास करता है।

मन्त्रेश्वर- धर्मस्ये प्रतिकूलवान् गणपुरग्रामाधिपोऽपुण्यवान् ।। पापप्रवृत्तिशुभं पितृभाग्यहीन दारिद्र्यमार्य जनदूषणमाह धर्मे।। यह प्रतिकूल बोलने वाला, लोगों का, गांव या नगर का प्रमुख व पापी होता है। केतु हो तो पापी, पिता के सुख से रहित, द्ररिद्री व अच्छे लोगों द्वारा निन्दित होता है।

हरिवंश - धर्महीनः कर्महीनो निर्धनोऽतिधूर्तो धूर्तप्रियःसर्व सौख्येन हीनो भवेत् संभवे हीनभाग्यो नरो भाग्यगे भास्वरौ।। यह धर्महीन, कर्म हीन, निर्धन, बहुत धूर्त, धूर्तों को प्रिय, सभी सुखों से रहित, अभागी होता है।

घोलप - यह धर्महीन, प्रवासी, दरिद्री, कम सुख से युक्त, शरीर कष्ट से पीड़ीत होता हैं। बन्धु का सुख कम होता है। यह राहु २।३।४।१ १६ इन राशियों में सदा अच्छा फल देता है।

गोपाल रत्नाकर - यह स्त्री के वश होता है। धर्महीन, नौकरी करने वाला, शूद्र सम्प्रदाय का, पुत्रहीन होता है।

पाश्चात्यमत - यह धन की इच्छा से विदेश से व्यापार करे तो नुकसान होता है। विदेशी बैंकों में धन डूबता है। स्वदेशी उद्योग में लाभ होता है। इस स्थिति में राहु अनुदित भाग में होता है 

लखनऊ के नबाब - वख्तखानेयदा रासः प्रभवेन् मनुजस्तदा । जवहिर्जर्कशीयुक्तः साहाबःसौख्यवान् सरः ।। यह अधिकारी, अच्छे वस्त्र भूषणों से सम्पन्न, श्रीमान, सुखी होता है।

हमारा अनुभव- यहां राहु के अशुभ फल पुरुष राशि के व शुभ फल स्त्री राशि के हैं। पुरुष राशि में यह पिता का इकलौता पुत्र होता है। अथवा सब से बड़ा या छोटा होता है। इस से बड़ी या छोटी बहिने होती है। बहनें न हो तो भाई को मारक होता है। भाई का संसार ठीक नहीं होता। बहिनों की हालत ठीक रहती है। नास्तिक वृत्ति होती हैं। स्त्री सम्बन्ध मे जाति या वर्ग का ख्याल नहीं रखते । विजातीय विवाह करते हैं। उम्र में बड़ी स्त्री अथवा विधवा से विवाह होता है। इन का प्रेम अस्थिर होता है। ये फल मिथुन, तुला, कुम्भ के हैं। मेष, सिंह, धनु में स्थिरता रहती हैं,स्त्री के साथ आदरपूर्वक रहते हैं। मिथुन, तुला कुंभ में स्त्री पर स्वामित्व की भावना, पौरुष के अधिकार की वृत्ति होती है। पुत्रसन्तति
नहीं होती या हो कर मृत होती है। सन्तति के लिए दुसरा विवाह करते हैं। क्वचित विदेश में प्रवास तथा विदेशी स्त्री से विवाह का योग होता है। ३३ वें वर्ष से भाग्योदय होता हैं । ५ वे वर्ष में भाई की मृत्यु होती है। स्त्री राशि में हो तो सन्तति हो कर कुछ की मृत्यु होती है । पहले कन्याएं व वृद्ध वय में पुत्र होता हैं रहते हैं। यह भी पिता का इकलौता या सब से बड़ा, या छोटा पुत्र होता है। यह बन्धु बहनों के लिए मारक होता है। भाईयों के निर्वाह की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। ये लोग शिक्षक, समाज के उपयुक्त ज्ञान देनेवाले, विद्वान, संशोधक, शीलवान होते हैं। इन्हें विचित्र स्वप्न विशेषतः पक्षी के समान उड़ने के स्वप्न आते हैं। स्त्री राशि में राहु भगवान हनुमान की उपासना करता है। यह राहु भाईयों की एकत्र प्रगति में बाधक है। बंटवारा होने पर दोनों की प्रगति होती है। १६ वे वर्ष से भाग्योदय, ९ वें वर्ष में बंधु को कष्ट, बहन की मृत्यु, २२ वे वर्ष मे बड़े भाई की मृत्यु के योग होते हैं।

    जन्मकुंडली में नवम स्थान में राहु हो तो जातक धर्म-कर्म में बहुत ही कमरुचि रखता है। वह दुराचारी रहता है। धर्म में थोड़ी आस्था दिखाई दे भी तोवह आडंबरपूर्ण एवं खुदगर्जी के लिए रहती है। ऐसा जातक मां दुर्गा की भक्तिकरते पाया जाता है। पारिवारिक सुख एवं आर्थिक स्थिति साधारण रहती है।जातक के शत्रु बहुत रहते हैं। सहोदरों से स्नेहपूर्ण संबंध नहीं रहते। जातकचुगलखोर रहता है। पैरों में जख्म होने का डर रहता है।कई ज्योतिष विद्वानों ने नवमस्थ राहु के शुभ फल बताए हैं। मंत्रेश्वर एवंनारायण भट्ट के मतानुसार ऐसा जातक अपने सहोदरों के विषय में कर्तव्यपूरा करता है। वह समाज में प्रतिष्ठित, दयालु, विनोदी, धर्म, जिज्ञासु, लोकनेताएवं अपनी बात के लिए जागरूक रहता है।यवन ज्योतिर्विदों ने आचार्य मंत्रेश्वर एवं नारायण भट्ट के मतों से सहमतहोते हुए जातक को कर्तव्यनिष्ठ, आस्तिक, भोगविलासी, नौकरों के सुख सेपरिपूर्ण, सुखी, अधिकारसंपन्न, सहोदरों के साथ स्नेहपूर्ण संबंध रखनेवाला एवंकामातुर बताया है।हमारी राय में नवमस्थ राहु बलवान हो तो शुभ फलदायी होता है। दुर्बल या पापपीड़ित होने पर अशुभ फल देता है। नवमस्थ राहु परदेश जाने का योग बनाता है। पाश्चात्य ज्योतिषियों के मतानुसार नवमस्थ राहुवाला जातक स्वदेश में प्रगति करता है और विदेश या विदेश से संबंधित व्यवसाय में लाभ कमाता है। नवमस्थ राहु परदेशगमन करवाता है। यह हमारा अनुभव है।
नवम भाव में राहु
    जातक उग्र, निदंक, गंदे वस्त्रधारण करने वाला, संबंधियों की मददव तालमेल से रहने वाला, भाग्यहीन और शत्रु से पीड़ित होगा।
    -मानसागरी
    नवम भाव में राहु कटुभाषी, अनधिकृत क्रियाकलापों में लिप्त तथाकिसी गाँव या शहर या कुटुम्ब का मुखिया होगा।
    -फलदीपिका
यदि राहु या केतु नवमभाव में है तो जातक निसंतान, निम्न जातीयमहिलाओं से संपर्क रखने वाला, स्वयं जीवनयापन के लिए पराश्रित वअधार्मिक होगा।
    नवम भाव में राहु जातक को पत्नी का अनुगामी, क्रूर, अपुष्टवक्ष वढुलमुल नीतियों वाला बनाता है।
    -भृगु
    -डॉ रामन
    नवम भाव में राहु की स्थिति जातक को गुणी, तीर्थ प्रेमी व दयालुहृदयी आदि गुणों की ओर संकेत करती है।
    केतु जातक को संतान प्राप्ति के प्रति उतावला और हिन्दू जाति केअतिरिक्त अन्य व्यक्तियों की मदद से धनार्जन करने वाला बनाता है।
    नवम भाव-लग्नकुंडली के नवम भाव में राहू बैठा हो तो जातक काभाग्योदय प्रायः 40 वर्षों के बाद (42वें साल में) ही होता है। ऐसा जातक,जालसाज, अविश्वस्त, धोखेबाज, ढोंगी, पाखंडी (धार्मिक आचरण करे तो भीदिखावे के लिए करे) तथा तीर्थ यात्राएं करने वाला होता है (यद्यपि भक्तिभाव सेनहीं करता)। ऐसे जातक को अक्सर जन्मस्थान से दूर जाना पड़ता है। जातक केभाइयों व सन्तान के विषय में भी नौवां राहू शुभ नहीं होता। ऐसा जातक धर्म केलिए घातक होता है। ईमानदार तो बिल्कुल ही नहीं होता। लेकिन पागलों काअच्छा डॉक्टर हो सकता है। अशुभ प्रभाव में हो तो संतान पैदा नहीं होती या मरीहुई पैदा होती है या होते ही मर जाती है।
    लाल किताब के अनुसार नौवां राहू हो तो जातक को अपने खून के रिश्तेदारों
    से मुकदमेबाजी करना संतान के लिए शुभ नहीं होता। नौवां राहू जातक में विदेश
    यात्रा की अदम्य इच्छा पैदा करता है, जो कम ही पूर्ण होती है। ऐसे जातक के भाईप्रायः नहीं होते, या मर जाते हैं। धन हानि होती है। पत्नी से विशेष मोह रहता हैअतः पत्नी के कारण मां-बाप आदि बुजुर्गों का निरादर करता है। बेईमान व अधमीहोता है।
    वायुराशि का राहू हो तो जातक को या तो विवाह की इच्छा ही नहीं होती(शुक्र व मंगल की स्थिति विचार कर निर्णय ले सकते हैं) या इतनी उतावलीकरता है कि जाति, वर्ण तथा आयु का भी ध्यान नहीं रखता। स्त्री पर अपना इतनाहक समझता है कि उसका अपने भाई या पुत्र के प्रति प्रेम भी बर्दाश्त नहीं करताहै। अग्निराशि का राहू जातक को व्यवहारकुशल, दूसरों का मान करने वालाबनाता है। पर पुत्र सन्तान की ओर से चिंता रहती है। प्रायः पुत्र पाने के लिए दूसराविवाह करता है। स्त्री राशि का राहू सन्तान अधिक देता है, पर उनमें जीवित प्रायःकम ही रहती हैं। ऐसे जातक की प्रथम सन्तान प्रायः कन्या होती है। जातक दीर्घायुहोता है। परन्तु बहनों के लिए अशुभ रहता है।
नवम भावः नवमस्थ राहु अग्नि राशि का हो तो जातक पत्नी के साथसुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। वायु राशि में हो तो पत्नी को मात्र भोग्यासमझता है। पुत्र या तो उत्पन्न नहीं होता, होता है तो मृतावस्था में। संतानप्राप्ति के लिए दूसरा विवाह करना पड़ता है। इस भाव का राहु विदेशी स्त्री सेविवाह और विदेश गमन कराता है। छोटे भाई की मृत्यु भी सम्भव है। स्त्रीराशि का राहु हो तो संतति होती है जिनमें से कई कालकवलित होती हैं। पहलेकन्या संतानोत्पत्ति तथा उत्तरवय में पुत्र की प्राप्ति सम्भव होती है। स्त्री राशिका राहु बहिनों के लिए अनिष्टप्रद होता है। भाई एकसाथ रहें तो प्रगति नहींकर पाते। पुरुष राशि का राहु नवमस्थ हो तो भाई नहीं होते। अनिष्ट राहुप्रवास अधिक कराता है।
1. सर पर चोटी रखें। 
2. कुत्ता पाले। 
3. केसरयुक्त खीर पान करें।
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10) दशम् भाव -  दशम स्थान (कर्म भाव)
दसवें स्थान के फल

वैद्यनाथ- चौरक्रियानिपुणबुद्धिरतो विशीलो मानं गते फणिपतौ तु रणोत्सुकः स्यात् ।।  यह चोरी में निपुण, शीलरहित, झगड़ालू होता है। 

गर्ग- भवेद् वृन्दपुरग्रामपतिर्वा दण्डनायकः । कर्मस्थिते तमे प्राज्ञःशुरो मन्त्री धनान्वितः ।। यह लोकसमूह, गांव या नगर का अधिकारी, मन्त्री या सेनापति, शूर व बुध्दिमान होता है। 

बृहद्यवनजातक-धनाद् न्यूनता न्यूनता च प्रतापे जनैर्व्याकुलोऽसौ सुखं नातिशेते। सुहद्दुःखदग्धो जलाच्छीतलत्वं पुनः खे तमो यस्य स क्रूरकर्मा।।  यह धन व पराक्रम से हीन, लोगों द्वारा पीड़ित, सुख की नींद से रहित, पित्रों के दुख से कष्टी, क्रूर काम करने वाला होता है वसिष्ठ- दशमभवनगे पापबुद्धिर्ददाति। पापी विचार होते है।

नारायणभट्ट - सदा म्लेच्छसंसर्गतोऽतीनगर्वः लथेन मानिनी कामिनी भोगपुचैःल जनैर्व्याकुलोऽसौ सुखं नाधिशैते मदार्थव्ययी क्रूरकर्मा खगेऽही।। विदेशियों के सम्बन्ध से गर्विष्ठ होता है। अभिमानी स्त्रियों का भोग करता है। लोगों से कष्ट होता है। सुख से बैठ नहीं सकता । नशाबाजी में धन खर्च करता है। क्रूर काम करता है। 

आर्यग्रन्थ- कामातुरःकर्मगते च राहौ पदार्थलोभी मुखश्च दीनः । म्लानो विरक्तः सुखवर्जितश्च विहारशीलश्चपलोऽतिदुष्ट: ।। यह कामुक, दुसरों का धन चाहने वाला, वाचाल, दीन, निरुत्साही, विरक्त, सुखरहित, प्रवासी, चपल, अति दुष्ट होता है। केतु का फल नारायणभट्ट जैसा बतलाया है।

ढुंढिराज- पितुन सुखं कर्मगो यस्य राहुः स्वयं दुर्भगः शत्रुनाशं करोति । रुजो वाहने वातपीडां च सन्तोर्यदा सौख्यगो मीनगः कष्टभाजम् ।। पिता का सुख नहीं मिलता, शत्रु नष्ट होते है। वाहनों से कष्ट, वातरोग होते हैं । दुर्भागी होता है। यह राहु वृषभ में सुख दायक व मीन में कष्ट दायक होता है। 

मन्त्रेश्वर- ख्यातः खेऽल्पसुतोऽन्यकार्यानिरतः सत्कर्महीनोऽ भयः ।।  यह दूसरों का काम करने वाला, अच्छे काम न करने वाला, निडर, कम पुत्रों से युक्त होता है। 

जागेश्वर- भवेद् गर्वभंगो गरिष्ठो विशेषात् तथा मातृकष्टं कुले घातपातः । पितृर्वाथवा भ्रातृदुःखकरः स्याद् यदा पातनामा भवेत् कर्म गोऽयम् ।। कथं वै सुखं पैतृकं वै जनानां तथा कर्मलाभः कथं हृत्सुखं स्यात् । परं पारदेशे भवेत चोरपीडा यदा केतुनामा गतःकर्मभावे।। इस का गर्व दूर होता है। माता को कष्ट तथा कुल में अपघात से मृत्यु होती है। पिता या भ्राता को दुःख होता है। यह बड़ा व्यक्ति होता है। यहां केतु हो तो पिता का सुख नहीं मिलता । काम से कुछ लाभ नहीं होता, मन में सुख नहीं होता। पांव में रोग तथा चोरों से कष्ट होता है

हरिवंश - युग्मसंस्थोऽथवा कन्यकासस्थितः कर्मभावे यदा सैहिकेयो भवेत् । राजमान्यो प्रकुर्यात् स तापाधिकं शेषसंस्थो नरं वैपरीत्यं सदा।। यह मिथुन या कन्या में हो तो राजमान्य होता है, अधिक कष्ट देता है। अन्य राशियों में सदा विरुद्ध फल मिलते हैं।

घोलप - राजा का द्वेष करने से दरिद्री होता है। पापी, झगड़ालू, दुर्भागी, पिता के सुख से रहित शत्रु का नाश करने वाला, वातरोगी, घर बार से रहित होता है। यह शूर हुआ तो बहुत लड़ाइयां लड़ता है, इच्छाएं पूरी नहीं होती। यहां राहु मीन में हो तो घर आदि का सुख प्राप्त होता है।

गोपाल रत्नाकर- यह काव्य, नाटक, साहित्यशास्त्र की रुचि रखने वाला श्रीमान, विद्वान, प्रवासी, वातरोग होता है। विधवा स्त्री से सम्बन्ध रखता है। अच्छे कामों में विघ्न करता है।

लखनऊ के नबाब- रासो बादशाहखानें भवेज्जोरावरो गनी। विपक्षपक्षरहितो मुईशः पूर्वरुद्दतः ।। यह बलवान, मित्रों से युक्त, शत्रु रहित, श्रेष्ठ व्यक्ति होता है। इसे चिन्ता बहुत रहती है।

श्री. चित्रे - यह बलवान लोगों का साहाय्य प्राप्त करता है। पिता का सुख नहीं मिलता, वातरोग होते हैं। चतुर किन्तु चिन्तित होता हैं। यह राहु मीन में हो तो प्राप्त स्थावर सम्पत्ति का उपभोग कर सकता है। अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध रखता है। खर्चीला, राजवैभव से युक्त, शत्रु का नाश करनेवाला, अस्थिर चित्त का होता है। इसे कविता, नाटक आदि में रूचि रहती है। युद्ध प्रिय होता है। यह प्रवासी, व्यापार में निपुण होता हैं। यह राहु उच्च हो तो राजा का पद प्राप्त होता है।

वेंकटेश शर्मा- राहौ च माने भागीरथीस्नानमुशन्ति तज्ज्ञा:विवर्जितः स्यात् शिखिराहुपापैज्ञस्य कर्ता स भवेत् तदानीम् ।। यहां राहु हो तो गंगास्नान का लाभ मिलता है। यदि यहां राहु या केतु पापग्रह के साथ न हो तो वह यज्ञ करता है।

पाश्चात्य मत - यह राहु बहुत उत्तम फल देता है। पूरे जीवन में सफलता, सन्मान, कीर्ति व अमर्याद श्रेष्ठता मिलती है। उदाहरण के रूप में महात्मा गांधी की कुण्डली दी है।

अज्ञात-वितन्तुसंगमः दुर्ग्रामवासः शुभयुते न दोषः । काव्यव्यसनः । दासीसम्प्रदायी।। भूमिनासो भयन्नित्यं देहपीडां धनक्षयः। इष्टस्वजन-विद्वेषं राहौ वै दशमे स्थिते ।। यह विधवा से सम्बन्ध रखता है । बुरे गांव में रहता है। राहु के साथ शुभ ग्रह हो तो ये दोष नहीं होते। काव्य की रुचि रहती है। दासियां रखता है। भूमि का नाश, डर, शरीर को कष्ट, धन की हानि, अपने लोगों से द्वेष ये इस राहु के फल होते हैं।

हमारे विचार - इस स्थान में गर्ग, हरिवंश तथा पाश्चात्य मत में शुभ फल बताये हैं। अन्य लेखक अशुभ फल बतलाते हैं। शुभ फल स्त्री राशि के व अशुभ फल पुरुष राशि के हैं। दशमस्थान का पुत्र से सम्बन्ध नहीं किन्तु इस स्थान में दूषित रवि, मंगल, गुरु, शनि, या राहू हो तो माता, पिता भाई व पुत्र के सम्बन्ध में शोक होता है। यह स्थान पिता का कारक है, मातृ स्थान (चतुर्थ) से सप्तम एवं बन्धु स्थान (तृतीय) से अष्टम स्थान होता है। अतः इस स्थान में अशुभ योग से माता, पिता व बन्धु के सुख की हानि की उपपत्ति मिलती है। पुत्र के सुख की हानि का कारण शायद यह है कि यह स्थान लाभ स्थान से बारहवां (वंश व व्यय) एवं भाग्य स्थान से दूसरा (धन व मारक) स्थान होता है। अतः अपने वंश के सातत्य को मारक योग दशम स्थान से हो सकते हैं- पुत्र न होना हो कर मरना, कन्याएं ही होनी ऐसी प्रवृत्ति मिलती है। अज्ञात व गोपाल रत्नाकर ने विधवा का सम्बन्ध होना यह फल कहा है। यह पुरुष राशि का है। स्त्री राशि में इस का अनुभव नहीं मिलता।

हमारा अनुभव- यह राहु पुरुष राशि मे हो तो वह विक्षिप्त, दुरभिमानी, वाचाल, लोगों से अलग रहने वाला होता है। पुलिस, रेल्वे, बीमा कम्पनी, बॅन्क, आदि में नौकरी करते हैं। आर्थिक स्थिति अस्थिर होती है, लोगों का विश्वास नहीं रहता। इन के जन्म से माता-पिता को शारीरिक व आर्थिक कष्ट रहता है। पिता को पंगु हो कर पेन्शन लेनी पड़ती है। माता या पिता की बचपन में मृत्यु होती है। ये लोग अधिकारी हो तो ही काम करते हैं, व्यर्थ काम नहीं करते। सुखासक्त होते हैं। स्त्री राशि में यह राहु हो तो पूर्वार्जित इस्टेट नहीं मिलती, मिली तो अपने हाथ से नष्ट होती है। पूर्व वय में बहुत कष्ट सह कर प्रगति करता है। प्रौढ़ अवस्था मे सन्तति, धन, कीर्ति, सन्मान आदि सभी प्राप्त होते है। पुत्र बहुत होते हैं। अदालत के कामों मे हमेशा जय मिलता हैं। लेखन वृत्तपत्र या मासिक पत्रों का सम्पादन, कानून का ज्ञान आदि में कुशल होते हैं। मिलनसार, निश्चयी, तपस्वी,स्नेहशील, नियमित, परोपकारी स्वभाव होता है। स्वतन्त्र व्यवसाय, बिना पूंजी के व्यवसाय में लाभ होता है। सच बोलनेवाला, प्रामाणिक, प्रभावशाली, निडर, अपने काम में अड़ंगे को बरदाश्त न करने वाला, संख्याओं का स्थापक होता है। आयु के ३ रे वर्ष माता को, ७ वे वर्ष पिता को, ८ वें वर्ष पैतृक सम्पत्ति को, गंभीर खतरा होता है। २१ वे वर्ष भाग्योदय को आरम्भ, ३६ वें वर्ष पूर्ण उन्नति, ४२ वे वर्ष सार्वजनिक सन्मान का योग होता है।

    दशमस्थ राहु जातक की सर्वांगीण प्रगति करवाता है। उसे नापसंद जगहरहना होता है। विधवा या अन्य स्त्री से समागम होता है किंतु दशमस्थ राहुशुभ होने पर ऐसा नहीं होता। दशम स्थान में राहु वृषभ, मिथुन या कन्याराशि का एवं बलवान हो तो जातक अधिकारसंपन्न, समाजप्रतिष्ठित, बुद्धिमान,धैर्यवान, काव्यरसिक, वाचाल, विदेशों से संबंध रखकर धन कमानेवाला,स्वाभिमानी, कविता प्रेमी, निर्भय, विद्वान, प्रवासी, धार्मिक, अल्पपुत्रवान एवंकामकला रसिक रहता है। दशमस्थ राहु दुर्बल होने पर या पापपीड़ित होनेपर जातक पापकर्म की ओर प्रवृत्त रहता है। चोरी करने जैसा अवगुण भी उसमेंहोता है। जातक विवादास्पद, चरित्रहीन, दुखी, मित्र एवं समाज के सहयोगसे वंचित, निर्दयी, व्यसनी, माता-पिता के पूर्ण सुख से वंचित, वाहनों के कारणकष्ट भोगनेवाला होता है। उसे हमेशा आकस्मिक संकटों से जूझना पड़ता है।यवन ज्योतिषविदों ने प्रायः दशमस्थ राहु के शुभ फल गिनाए हैं। उनकेमतानुसार जातक अजातशत्रु, बलवान, मित्रों से सुखी, संपन्न एवं समाज मेंरहता है।प्रतिष्ठित रहता है। जातक मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं रहता, हमेशा चिंताग्रस्तपाश्चात्य ज्योतिषी हर स्थिति में दशमस्थ राहु को शुभ मानते हैं। उनकोमतानुसार ऐसा जातक निरंतर प्रवासी रहता है। सफलता उसके चरण चूमती है।
दशम भाव में राहु
    जातक दूसरों की संतत्ति हड़ंपने की नीयत वाला, अत्यधिक कामुकताके कारण परेशानी में पड़ेगा। जातक भाग्यहीन, गंदा, सांसारिक बंधनों सेमुक्त, विपन्न व दुखी, घुम्मकड़ अस्थिर और अत्यन्त क्रूर होगा।
    -मानसागरीदशम भाव में राहु अल्प संतति कारक होता है। जातक दूसरों केलिए काम करने वाला होगा। वह निर्भीक, प्रसिद्ध व अनुचित कर्म करनेवाला होगा।
    -फलदीपिका
    राहु या केतु की स्थिति जातक को झोंपड़पट्टी में रहने व विधवाओंसे यौन संबंधित करने वाली होगी। यदि राहु या केतु शुभ प्रभाव है तोजातक एक अच्छे घर में रहते है। वह काव्य-प्रेमी होगा।-भगु
    जातक के विधवाओं से गहरे संबंध होगें। उसकी काव्य व साहित्यमें रूचि, अच्छा कलाकार और विद्वान् होगा।
    -डॉँ रामन
दशम भाव में राहु की स्थिति से जातक शराब पर धन लुटाने वाला,क्रूर, हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य जातियों की संगति करने वाला औरसुंदर महिलाओं में आनंदित रहने वाला होगा। दशमस्थ राहु जातक कोप्रसिद्ध, अल्प संतति वाला, दूसरे के व्यापार में संलग्न व निर्भीक बनाताहै। वह चोरी करने में कुशल, दुश्चरित्र, लड़ाई-झगड़ों का शौकीन, जीवनके उत्तरारद्ध में प्रशासक बनने वाला, कर्जावान्, बहादुर विश्वविख्यातहोगा। ये सभी फल राहु की स्थिति, राशि, भाव और युति व अन्य ग्रहांकी दृष्टि पर निर्भर करता है।
     
    दशम भाव-राहू जब लग्नकुंडली के दसवें भाव में हो तो जातक कोराजनीति में विशेष रुचि प्रदान करता है। ऐसा जातक कुछ आलसी, वाचाल (बहुतबोलने वाला), मूड़ी (अनियमितता से चलने वाला), उच्छूंखल, संतान से दुखीतथा धर्म के मामले में कुछ वहमी-सा होता है। यदि अन्य शुभ योग हों तो जातकराजनीति में प्रवेश कर निश्चित रूप से विधान सभा/संसद का सदस्य बनता है।अनेक नेताओं की कुंडलियों में दशमस्थ राहू पाया गया है। (पाठकों की सुविधा,विश्वास व ज्ञान वृद्धि के लिए कुछ नेताओं की कुंडलियां भी पुस्तक में दी गई हैं।पाठक कन्फर्म कर सकते हैं)। दसवां राहू यद्यपि जातक की माता के लिएकष्टकारी होता है। (विशेष स्थितियों में पिता का सुख भी अल्प कर देता है)।अशुभ राहू हो तो जातक की माता, धन तथा कार्यक्षेत्र पर विशेष खराब प्रभावडालता है।
    लाल किताब के अनुसार भी दसवां राहू राजनीति का कारक होने से उस ओर जातक की रुचि बनाता है। यदि शुभ योगों के अभाव में जातक नेता न भी बनसके तो भी राजनीतिज्ञ तो होता ही है तथा राजनीतिज्ञों के निकट सम्पर्क में रहताहै। (लग्न, लग्नेश, दशम, दशमेश-चारों यदि राहू से प्रभावित हों तो व्यक्तिशत-प्रतिशत राजनेता होता है). ऐसे जातक को पिता का सुख अल्प होता है तथावात रोगों की तीव्र सम्भावना होती है।
    मीन राशि का दशमस्थ राहू जातक को अति कामुक, परस्त्री भोगी बनाता है।पुरुष राशि का राहू अभिमानी, बातूनी, अलग रहने वाला तथा समाज में अविश्वसनीयबनाता है। स्त्री राशि का राहू हो तो पूर्वजों की सम्पत्ति जातक को नहीं मिलती,मिलती है तो जातक नष्ट कर देता है। पूर्वायु में कष्ट भोगने के बाद प्रगति होती है।मध्यायु में धनपुत्र आदि का सुख प्राप्त हो जाता है।
दशम भावः यदि स्त्री राशि का राहु दशमस्थ हो तो पूर्वार्जित संपत्ति नहींमिलती। अपवाद रूप में मिल भी जाए तो जातक स्वयं ही उसे नष्ट करडालता है। ऐसा जातक जीवन के पूर्वार्ध में बहुत कष्ट पाता है तब कहीं काफीसंघर्ष के पश्चात प्रगति हो पाती है। उत्तरवय में धन-संतति, मान-सम्मान कीप्राप्ति होती है। मुकदमा हो तो उसमें विजय तथा लेखन कार्य से भी धनमिलता है। ऐसा जातक लोक व्यवहारी, परोपकार करने वाला तथा स्नेहशीलस्वभाव का होता है। अपने कार्यों में दूसरों की दखलन्दाजी से आपा खो बैठताहै। राहु पुरुष राशि में हो तो जातक अभिमानी, अविवेकी, समाज से अलगरहने वाला तथा व्यर्थ की बातें करने वाला होता है। ऐसे जातक सैन्य सेवा,पुलिस सेवा, बीमा, बैंक या रेल विभाग में नौकरी करें तो श्रेयस्कर रहेगा। लोगऐसे जातकों का विश्वास नहीं करते। जातक जन्म लेते ही माता-पिता के लिएकष्टों का कारण बनता है।
1. तांबे के सिक्के जल में बहावें। 
2. तांबे का कड़ा पहनें।
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11) एकादश भाव -एकादश स्थान (लाभ भाव) ग्यारहवें स्थान के फल

वैद्यनाथ- राहौ श्रोत्रविनाशको रणतलश्लाधी धनी पण्डितः। यह युद्ध में प्रशंसित, धनी, विद्वान, बहरा होता है। 

गर्ग- यस्य लाभगतो राहुलाभो भवति निश्चयात् । म्लेंच्छादिपतितैर्नूनं गजवाजिथादिकम् ।। यह राहु लाभदायी होता है। विदेशियों और बुरे लोगों से हाथी, घोड़े, रथ आदि की प्राप्ति होती है।

वसिष्ठ- लाभस्थाने विलासोभवति सुकविता वा सुलक्ष्म्यादिभोगम्। यह विलासी, कविता प्रिय, धनवान होता है।

बृहद्यवनजातक - लभेद्वाक्यतोऽर्थं चरेत् त्किंकरेण ब्रजेत् किं च देशं लभेत् प्रतिष्ठाम् । द्वयोः पक्षोयोविंश्रुतः सत्प्रजावान्नतः शत्रवः स्युस्तमो लाभगश्चेत् ।। यह वक्ता हो कर धन प्राप्त करता है, सेवकों के साथ विदेश में घूमता है। किर्तिमान, दोनों पक्षों को मान्य, अच्छे पुत्रों से युक्त होता है। इसे के शत्रु भी नम्र हो जाते हैं। सुभाषी सुविद्याधिको दर्शनीयः सुभोगः सुतेजाः सुवस्त्रोऽपि यस्य । भवेदोदरार्तिः सुता दुर्भगाश्च शिखी लाभगः सर्वलाभं करोति।। इस का बोलना, शिक्षा, रूप, भोग, तेज, वस्त्र ये सब अच्छे होते है। पेट में रोग होता है, पुत्र भाग्यहीन होते हैं। सदा लाभ होता है।

नारायणभट्ट - सदा म्लेंच्छतोऽर्थ लभेत् साभिमानश्चरेत, किंकरेण व्रजेत् किं विदेशम् । परार्थाननथी हरेत् धूर्तबन्धुः सुतोत्पत्ति सोख्यं तमो लाभगश्चेत् ।। यह विदेशियों से धन प्राप्त करता है। सेवकों के साथ अभिमान पूर्वक विदेश में घूमता है। धूर्तों से मित्रता कर दूसरों का धन हरण करता है । पुत्रसन्तति होती है। केतु का फल यवनजातक जैसा है।

आर्यग्रन्थ- आयस्थिते सोमरिपौ मनुष्यो दान्तो भवेत्रीलवपुः सुमूर्तिः । वाचाल्पयुक्तः परदेशवासी शास्त्रज्ञवेत्ता चपलो विलज्जः ।। यह संयमी सांवले रंग का, सुन्दर, कम बोलने वाला विदेश में रहने वाला, शास्त्रों का ज्ञाता, चंचल और निर्लज्ज होता है। केतु का फल यवनजातक जैसा दिया है।

ढुंढिराज- लाभे गते यदि तमे सकलार्थलाभं सौख्याधिकं नृपगणाद् विविधंच मानम्। वस्त्रादिकांचनचतुष्पदसौख्यभावं प्राप्नोति सौख्यविजयीच मनोरथंच ।। यह सब प्रकार का लाभ, अधिक सुख, राजा द्वारा विविध सन्मान, वस्त्र भूषण व पशु आदि की समृद्धि, सुख तथा विजय प्राप्त करता है। मन की इच्छाएं पूरी होती है। केतु का फल यवनजातक जैसा है, सिर्फ,' गुदे पीड्यते', गुदरोग होना- यह अधिक कहा है।

मन्त्रेश्वर- श्रीमान्नतिसुतश्चिरायुरसुरे लाभे सकर्णामयः ।। लाभेऽर्थ-संचयमनेक गुणं सुभोगं सद्रव्यसोपकरणम् सकलार्थसिद्धिम् ।। यह धनी, कम पुत्रों से युक्त, दीर्घायु, कान के रोग से युक्त होता है। केतु हो तो धन का संचय, अनेक गुण, अच्छे भोग, सब अर्थो की सिद्धि व द्रव्य तथा उपकरणों की प्राप्ति होती है।

जागेश्वर- भवेन्मानवो मानयुक्तः सदैव प्रतापानलैस्तापयेच्छत्रुवर्गम् । सुतैः कष्टभाग् गोत्रचिन्तासुयुक्तः सदा सैहिंकेयो नराणां च लाभे ।। भवेत् पुत्रचिन्ता धनं तस्य गेहे कथं स्यात् सुतानां च चिन्ता विशेषात् । भवेज्झाठरे तस्यं वातप्रकोपो यदा केतवो लाभगाः स्युर्नराणाम् ।। यह सन्मानित प्रभाव से शत्रु को संतप्त करने वाला होता है। इसे पुत्र तथा कुटुम्ब की चिन्ता से कष्ट होता है। केतु हो तो पुत्र तथा धन की चिन्ता रहती है। पेट में वात रोग होते है।

हरिवंशं- आयभावस्थितः कायहीनग्रहः सर्वदायं तनोत्यंगपुष्टिं नृणाम् । भूपतो गौरव शत्रुहानि बलम् वाहनं भूषणं भाग्यमर्धागम् ।। इस का शरीर पुष्ट होता है, राजा से सन्मान प्राप्त होता है, शत्रु नष्ट होते हैं। बल, वाहन, आभूषण, धन तथा भाग्योदय प्राप्त होता है।

घोलप - यह कीर्तिमान, निरोगी, राजमान्य, धनी, उत्तम गुणों से युक्त, सुवर्ण भूषणों से सम्पन्न होता है। पशुओं से समृद्ध होता है। इच्छाएं पूरी होती है। राहु ३ १६ । ११ इन स्थानों में अरिष्ट दूर करता हैं। केतु हो तो पूज्य कार्यकर्ता, घोड़े और वाहन आदि से समृद्ध मीठा बोलने वाला, विद्वान, उत्तम भोगों से सम्पन्न, गुदरोग से पीड़ित होता है।

गोपाल रत्नाकर - यह धनधान्य से समृद्ध, पुत्रयुक्त, विदेशियों द्वारा सन्मानित होता है।

पाश्चात्य मत- यह व्यक्ति श्रेष्ठ होता है। जिस का व्यवसाय किसी दूसरे पर अवलम्बित हो उसे यह लाभदायक है। रेस, सट्टा जुआ, लॉटरी में इसे लाभ नहीं होता। अन्य बातों में भाग्यशाली होता हैं। 

अज्ञात - शरीरारोग्यमैश्वर्य स्त्रीसुखं विभवागमः । सकीर्णवर्णतो लाभो राहुलभगतो यदि ।। इसे आरोग्य, ऐश्वर्य, स्त्रीसुख धनलाभ व नीच जाति के लोगों से लाभ की प्राप्ति होती है।

चित्रे- इस का व्यवसाय ठीक नहीं चलता,कर्ज रहता है। यह राहु उच्च या स्वगृह का हो तो राजाद्वारा सन्मानित, सुखी, धनी होता है। विदेशियों से धन व कीर्ति मिलती है। यह विद्वान, विनोदी, लज्जाशील, शास्त्रज्ञ, युद्ध में विजयी, बहरा होता है। सन्तति कम होती है।

हमारा अनुभव - इस स्थान में प्रायः शुभ फल बतलाये हैं वे स्त्री राशि के हैं। अशुभ फल पुरुष राशि के है। यह राहु पुरुष राशि में हो तो पूर्वजन्म के शाप के कारण पुत्रसन्तति में बाधा रहती है। पुत्र मरना, गर्भपात होना, स्त्री को सन्ततिप्रतिबन्धक रोग होना आदि प्रकार होते हैं। इन्हें एका एक श्रीमान होने की इच्छा रहती है। इसलिए रेस, लॉटरी, सट्टा, जुआ आदि में धन खर्च करतें

। अधिकार मिले तो अन्धाधुन्ध रिश्वत लेते हैं किन्तु पकड़े भी जाते है। लोभी, परद्रव्य के इच्छुक बरताव में अनियमित होते हैं। इन्हें इष्ट मित्र कम होते हैं। मित्रों से नुकसान होता है, किसी से मदद नही मिलती । भाग्योदय में हमेशा रुकावट आती है। ये कल्पक, संशोधक, प्राचीन वस्तुवेत्ता होते हैं। नौकरी में ही इन की योग्यता का उपयोग होता है। यह राहु स्त्री राशि में हो तो पहले कन्या होती है, फिर बहुत काल बाद पुत्र होता है। सन्तति बहुत होती है। कन्याएं अधिक होती हैं । मित्र अच्छे होते है, उन की मदद से जीवन को अच्छी दिशा मिलती है। व्यसन नहीं होता, सरल मार्ग से जीविका प्राप्त करने की इच्छा रहती है। इन के मित्र ज्योतिष, मंत्रशास्त्र के जानकार होते हैं। इच्छा-आकांक्षाएं अच्छी होती हैं। सन्तति होती है। अधिकारी होने पर रिश्वत लेने में पकड़े नहीं जाते । व्यवसाय या नौकरी स्थिर रहती है। बड़े भाई की मृत्यु होती है, अथवा वह बेकार या पुत्र हीन होता है, उस के कुटुम्ब का भार वहन करना पड़ता है।४२ वे वर्ष एकदम धनलाभ होता है, कीर्ति नहीं मिलती। विधानसभा के सदस्य हो सकते हैं। इन्हें स्वतन्त्र व्यवसाय अधिक अनुकूल होता है। ६ वें वर्ष शरिरकष्ट, ९ वें वर्ष शिक्षा का आरम्भ, १२ वें वर्ष बडे भाई को गम्भीर शारीरिक कष्ट, २७ वें वर्ष विवाह, २८ वें वर्ष जीविका का आरम्भ का योग होता हैl

    एकादश स्थान में राहु शुभ फलदायी होता है, ऐसा आम ज्योतिषियों कामत है। ऐसा जातक निरोगी, हृष्टपुष्ट, पराक्रमी, विद्वान, काव्यरसिक, उचित-अनुचित मागों से धन कमानेवाला होता है। परजातीय, विदेशी एवं समाज केनिम्न स्तर के लोगों से और गुप्तमागों से जातक काफी संपत्ति अर्जित करताहै। कानों में विकार होने की संभावना रहती है। जातक वाचाल, शत्रुहंता एवंदेश-विदेशों में घूमनेवाला रहता है। संतान सुख अच्छा प्राप्त होता है। शासनमें सम्मान भी प्राप्त होता है। आचार्य जागेश्वर एवं मंत्रेश्वर के मतानुसारऐसा जातक अल्पसंतान युक्त रहता है जबकि अन्य आचायों के मत भिन्न हैं।इसलिए जन्मकुंडली के अन्य योगों का भी अवलोकन अवश्यंभावी है।यवन ज्योतिषविदों के मत भी उपरोक्त फलों से मिलते-जुलते हैं। पाशचात्यज्योतिषविदों ने एकादशस्थ राहु को शुभ माना है। जातक अन्यों पर अवलंबितव्यापार या साझेदारी के व्यवसाय में लाभ पाता है। जुए, सट्टे, लॉटरी में उसेफायदा नहीं होता।
एकादश भाव में राहु
    जातक जितेन्द्रिय, सांवले रंग का, सुदर्शन, मितभाषी, विदेश में रहनेवाला, शास्त्रज्ञ, चतुर, व निर्लज्ज होगा।
    -मानसागरी
    जातक दीर्घजीवी, अल्प संतति वाला, कर्ण रोगी व संपन्न होगा।-फलदीपिकाहोगा।एकादश भाव में राहु व केतु के होने पर जातक संतानयुक्त व सम्पन्न
    -भृगु
    वह समृद्ध, निम्न वर्गों में प्रभावशाली, अधिक संतान वाला, औरअच्छा किसान होगा।
    -डॉ रामन
    राहु हिन्दु जाति से इतर जाति द्वारा धन लाभ और संतान की और सेसुख संतोष देता है।
एकादश भाव-लग्नकुंडली के ग्यारहवें भाव में राहू हो तो जातक अल्पसन्तान वाला, विदेश से धन लाभ की सम्भावनाओं से युक्त, दीर्घायु, परिश्रमीकिन्तु अवैध/अनैतिक तरीके से धन कमाने वाला होता है। यहां का राहू अशुभ होतो जातक के पिता/दादा पर बुरा प्रभाव डालता है (स्त्री जातकों में अशुभ हो तोससुर पर प्रभाव डालता है)। जातक लम्बे समय तक उनके साथ नहीं रह पाता।
    लाल किताब के अनुसार ग्यारहवां राहू संतान के लिए अशुभ होता है।भाइयों तथा गृहस्थ के सुख में भी अड़चन डालता है। पुरुष राशि का राहु जातकको नीच संगति वाला, चतुराई से दूसरों का धन हरने वाला (ठग), राज्य कर्मचारीहो तो रिश्वतखोर बनाता है। ऐसे जातक को लाभ के अनेक अवसर मिलते हैं जोप्रायः अनैतिक होते हैं। ऐसा जातक लोभी, यशस्व्री और अग्रणीय बनाता है। जुए,लॉटरी, सट्टे का व्यसन होता है। किन्तु सन्तान में बाधा रहती है। या तो होती नहींया गर्भस्नाव हो जाता है। हो जाती है तो कम आयु में मर जाती है। (शुभ दृष्टियोंके प्रभाव से बच भी जाए तो बड़े होकर जातक को अपमानित करती है।) यानीसन्तान से सुखी नहीं मिलता। जातक का धन जुए आदि अनैतिक कामों में ही नष्टहोता रहता है। स्त्री राशि का राहू हो तो जुए, सट्टे आदि से भी लाभ करा देता है।
    स्त्री राशि में राहू हो तो जातक के मित्र अच्छे होते हैं। तांत्रिकों, ज्योतिषियोंआदि से सम्बन्ध होते हैं। जुए, लॉटरी आदि से धन संचय होता है, किन्तु कन्याएंअधिक होती हैं। अतः प्रायः दहेज में अधिकांश धन चला जाता है। ग्यारहवां राहूकन्धे/भुजा, कण्ठ, हृदय, उदर तथा गुप्तांग सम्बन्धी रोग देता है। प्रायः स्मगलरों,तस्करों, ठगों, जालसाजों, घोटाले. करने वालों तथा 420 की कुंडलियों में राहूग्यारहवां ही होता है। भ्रष्ट नेताओं में भी यह मिल सकता है।
एकादश भावः पुरुष राशि का राहु आय भाव में हो तो प्रायः पुत्राभावबना रहता है। शास्त्रकारों ने इसे पूर्वजन्म के शाप की संज्ञा दी है। जातक कीपत्नी को गर्भस्राव या मृतावस्था व बन्ध्यत्व के कारण संतान नहीं होती। ऐसेजातक में धनी होने की अदम्य इच्छा उसे जुआ, सट्टा, रेस, लॉटरी की ओरआकर्षित करती है। यदि जातक राजकीय सेवा में हो तो अन्धाधुन्ध रिश्वतलेता है और परिणामस्वरूप पकड़ा भी जाता है। ऐसे लोग लोभी तथा परायेधन को हड़पने के प्रयास में लगे रहते हैं। मित्रों से वैमनस्य होता है। स्त्री राशिका राहु हो तो प्रथम संतान कन्या तथा काफी अंतर से पुत्र उत्पन्न होता है।मित्र अच्छे होते हैं तथा जातक के लिए सहायक रहते हैं। ऐसे जातक अधिकारीहों तो रिश्वत लेते हैं लेकिन पकड़े नहीं जाते।

1. सोने की अंगुठी पहनें। 
2. चाँदी की गिलास में पानी पिये। 
3. शुद्र कोदान करें।
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12) बारहवां भाव - द्वादश स्थान (व्यय भाव)बारहवें स्थान के फल

वैद्यनाथ - विधुन्तुदे रि:फगते विशीलः सम्पत्तिशाली विकलश्च साधु: । यह शीलरहित, धनवान, व्यंग से युक्त, परोपकारी होता है। 

गर्ग- व्ययस्थानगतें राहौ नीचकर्मरतः सदा । असद्व्ययी पापबुद्धिः कपटी कुलदूषकः ।। यह नीच काम करने वाला, बुरे कामों में धन खर्च करनेवाला, पापी विचारों का, कपटी, कुल को दूषण जैसा होता है।

बृहद्यवनजातक-तमे द्वादशे विग्रहे संग्रहेपि प्रपातात् प्रयातोऽथ संजायने हि । नरो भ्राम्यतीतस्ततो नार्थसिद्धिर्विरामे मनोवांछितस्य प्रवृद्धि ।। यह घर में झगड़े करता है। गिर पड़ता है, इधर उधर भटकता है, धन नही मिलता, एक जगह स्थिर होने पर इच्छाएं पूरी होती हैं। 

आर्यग्रन्थ- व्ययस्थिते सोमरिपौ नराणां धर्मार्थहीनो बहुदुःखतप्तः । कान्तावियुक्तश्च विदेशवासी सुखैश्च हीनः कुनखी कुवेषः ।। यह धर्महीन, निर्धन, बहुत दुःखी, पत्नी से दूर रहने वाला, विदेश मे जाने वाला, सुखरहित होता है। के नख और वेष अच्छे नहीं होते। 

ढुंढिराज - नेत्रे च रोगं किल पादघातं प्रपंचभावं किल वत्सलत्वम्। दृष्टे रति मध्यमसेवनं च करोति जातं व्ययगे तमे वरं ।। आंख में रोग व पांव पर आघात होते है। प्रपंच में आसक्त, स्नेहशील होता है। दुष्टों की संगति में व मध्यम लोगों की सेवा में रहता है। 

नारायणभट्ट - तमो द्वादशे दिनतां पार्श्वशूलं प्रयत्ने कृतेऽनर्थतामात नौति । खलैमित्रतां साधुलोके रिपुत्वं विरामे मनोवांछितार्थस्य सिद्धिम् ।। यह दीन, दुष्टों का मित्र, सज्जनों का शत्रु होता है। इस के व्यवसाय में नुकसान होता है। पीठ में रोग होता है। अन्त समय में इच्छाएं पूरी होती है। 

मन्त्रेश्वर- प्रच्छन्नाधरतो बहुव्ययकरो रि:फेंऽम्बुरुक्पीडितः । । यह गुप्त रूप से पाप करता है, बहुत खर्च करता है, जलोदर से पीड़ित होता है। 

जागेश्वर - तथा राहुणा बुबुदं नेत्रयुग्मम्। यदा सैहिकेयस्तथा पातनामा व्यये चेन्नराणां तदा म्लेंच्छभिल्लैः । धनं भुज्यते मातुले वै कुठारः स्वयं तप्यते क्रोधयुक्तो जनेषु ।। यदा राहुणा केतुना वापि युक्तं व्ययं वै नराणां तदा मानसे किम् । भवेत् सौख्यकं किंकरोऽयं विधाती सुघाती भवेन्मातुले मानवृद्धः ।। आंख में दोष होता है। इस का धन विदेशी या भील लूटते हैं। मामा की मृत्यु होती है। लोगों पर क्रोध कर स्वयं त्रस्त होता है। मन मे सुख नहीं होता । नौकर घात करते हैं। मामा के विषय में इन्हें बहुत सन्मान होता है। ये फल राहु केतू दोनों के हैं। 

हरिवंश- बुद्धिमन्दः कुशांगाभिभूतस्तथा बन्धुर्वैरी विरोधी शठो दुर्बलः । कुव्ययेनान्वितो मानवः सम्भवेत् भानुभावस्थितो भानुशत्रुर्भवेत् ।। यह मन्द बुद्धि का दुबला, अपने लोगों का वैरी, विरोधी, दुष्ट, दुर्बल, बुरे काम में खर्च करने वाला होता है। 

घोलप- सज्जनों के आश्रय से शत्रु का नाश करता है। उत्तम प्रदेश में जीवन यापन करता है। आंख व पांव में पीड़ा होती है। हाथ बढ़ा होता है। यह स्नेहशील होता हैं। इस स्थान में केतु हो तो जगत में पूज्य, कीर्तिमान, ऐश्वर्यवान, कपड़े के व्यापार में सम्पन्न होने वाला, न्यायी, राजा के समान खर्च करने वाला, शत्रुहीन, सुख रहित होता हैं। आंख, पांव, बस्ति, गुद में रोग से पीड़ा होती हैं। इस स्थान में मिथुन, धन या मीन में राहु मुक्ति दायक होता है ऐसा कुछ आचार्यों का मत है।

गोपाल रत्नाकर- कंजूस, कम पुत्रों से युक्त, नेत्र रोगी होता है। खर्च बहुत होता है।

लखनऊ के नबाब - रास स्थितो यदा चैव खर्चखाने भवेत् तदा। कलहप्रियो बेकारः कर्जमन्दश्च मुफिलसः।। यह झगड़ालू, बेकार, ऋणग्रस्त व दुःखी होता है।

पाश्चात्य मत- सार्वजनिक संस्थाओं से लाभ होता है। अध्यात्म ज्ञान के लिए यह शुभ है। यह राहु अवैध सम्बन्ध से जन्म सूचित करता है। ऐसे तीन बालकों की कुण्डली में व्यय में राहु था। उन का बाद में कैसे पालन पोषण हुआ इस का पता नहीं चला। एक माता ने जिस के व्यय में राहु था अपना बच्चा अनाथालय को सौंपा था, वह लड़का बहुत अच्छा था और उस के चतुर्थ मे राहु था। इस माता ने अपने दो और बच्चे इसी तरह अनाथालय को सौपें थे । 

वसिष्ठ- रुपत्व द्वादशस्थः सुखमतिनितरां चक्षुरोगं प्रसूतौ। यह सुन्दर, बहुत सुखी, नेत्र रोगी होता है।

अज्ञात- अल्पपुत्रः नेत्र रोगी पापगतिः । धनव्ययं च कष्टं च राजपीडा रिपुक्षयम् । जायपीडा भवेत्रित्य स्वर्भानुद्वदिशे यदि । । इसे पुत्र कम होते हैं, आंख में रोग होता है। पापी आचरण होता है। धन का खर्च, कष्ट, राजा से तकलीफ, शत्रु का नाश, स्त्री को कष्ट ये इस राहु के फल है।

चित्रे - यह झगड़ालू, नेत्र रोगी, दुर्जनों की संगति मे रहने वाला, मध्यम लोगों की सेवा करने वाला, स्त्री से वियुक्त, विदेश वासी, दरिद्री, बुरा वेष पहनने वाला, धर्मभ्रष्ट होता है। पाँव मे रोग होता है। क्वचित् शरीर में व्यंग से युक्त, धनवान, परोपकारी होता है। यह राहु उच्च या स्वगृह मे हो तो शुभ फल देता है।

हमारे विचार- इस स्थान में वसिष्ठ व घोलप को छोड़कर बाकी सब ने अशुभ फल बताये हैं वैद्यनाथ ने धनप्राप्ति तो बाकी सब ने दारिद्र्य ऐसा फल कहा हैं। नेत्ररोग का उल्लेख सब ने किया है। धन व व्यय ये नेत्रकारक स्थान हैं तथा राहु पापग्रह है अत: यह फल कहा है। पुत्र कम होना यह फल अनुभव से ठीक प्रतीत होता है यद्यपि इस स्थान से पुत्रों का सम्बन्ध नहीं है। पाश्चात्य मत से अवैध सम्बन्ध से जन्म का जो फल कहा है वह हमें ठीक नहीं प्रतीत होता।

हमारा अनुभव - यह राहु पुरुष राशि में हो तो नेत्र रोग हो सकते है। बड़प्पन दिखाने के लिये बहुत खर्च करते हैं। पुत्रसन्तति कम होती है एक या दो ही सन्तति होती है। दो विवाह होते हैं। यह विवाहित स्त्री से असन्तुष्ट रहता है । अतः व्यभिचारी प्रवृत्ति होती है। स्त्री हमेशा बीमार रहती है। अथवा ज्यादा दिन मायके रहती है। पूर्व वय में स्थिरता नहीं मिलती। स्त्री राशी मे यह राहु स्त्री सुख साधारणतः अच्छा देता है किन्तु दो विवाह होते है। खर्च व्यवस्थित रूप से करते हैं। इन्हें नेत्ररोग बिलकुल नहीं होते। आखिर तक दृष्टि अच्छि रहती है । सन्तति अधिक होती है। स्वभाव शान्त व अत्यन्त विरक्त होता है। पूर्ववय में स्थिरता नहीं होती। जीविका के लिए कुटुम्ब छोड़ कर उत्तर की ओर जाना पड़ता है। ईशान्य प्रदेश में भाग्योदय होता है। यह राहु जन्मभूमि मे लाभ नहीं देता। विदेश में रहने और पढ़ने पर भी अपनी संस्कृति को ही श्रेष्ठ समझता है। प्रसिद्ध, पराक्रमी होता है । किर्ति मिलने के साथ साथ इन के प्रपंचसुख मे कमी होती है। ये उपभोग में रुचि रखते हैं, बहुत कमाते हैं और खर्च भी करते हैं । दयालु, आप्तमित्रों को मदद करने वाले, शत्रुरहित, महत्वाकांक्षी, उच्च ध्येय से प्रेरित, उदार, वाङमयप्रेमी, मिलनसार होते हैं वेदान्त की ओर प्रवृत्ति हो तो साधु - सत्पुरुष हो सकते हैं। इस राहु से १२ वें वर्ष से माता या पिता के मृत्यु, २१ या २३ वें वर्ष में जीविका का आरम्भ, १६ वें वर्ष में पैतृक धन का लाभ, ३५ वें वर्ष भाग्योदय का योग होता है । बचपन में विवाह हो तो २१ वें वर्ष में दूसरा विवाह होता है। अथवा ३२ से ३६ वें वर्ष तक दूसरे विवाह की सम्भावना होती है।

    द्वादश या व्यय स्थान में राहु के फल प्रतिकूल ही प्राप्त होते हैं। ऐसा जातकपापी, कपटी, कुलहीन, विदेशी, घुमक्कड़, खर्चीला, निर्धन, पत्नी सुख सेवंचित, षडयंत्री, कुसंगति में रहनेवाला, नेत्रविकारी, पेट विकार, सिरदर्द रोगसे ग्रस्त रहता है।

    महर्षि वशिष्ठ एवं आचार्य वैद्यनाथ ने व्ययस्थ राहु के शुभ फल गिनाएहैं। उनके मतानुसार ऐसा जातक खूबसूरत, धनवान, सुखी एवं साधु स्वभावका होता है। मिथुन, धनु या मीन राशि का राहु व्यय स्थान में हो तो ऐसेफल अवश्य प्राप्त होते हैं।

    यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार व्ययस्थ राहु शुभ फल प्रदान नहीं करता।आध्यात्मिक दृष्टि से यह राहु विशेष फलदायी होता है। सार्वजनिक संस्थाओंसे जातक लाभान्वित होता है। वह स्वयं वर्णसंकर होता है तथा स्त्री जातक कीजन्मकुंडली में व्यय स्थान में राहु हो तो वह भी वर्णसंकर संतान को जन्म देती है।
द्वादश भाव में राहु
    जातक नास्तिक, परेशान, पत्ि विहीन, विदेश में रहने वाला, विपन्नया सुखरहित, भद्दे नाखूनों वाला व देखने में सुदर्शन न होगा।
    -मानसागरी
    राहु की स्थिति जातक को अपव्ययी, पापप्रवृत्त और कोढ़ आदि रोगोंसे पीड़ित करती है।
    -फलदीपिका
    यदि राहु या केतु बारहवें भाव में है तो जातक अल्पसंतति, नेत्र रोगसे ग्रस्त और मृत्यूपरान्त नर्कगामी होता है।
    -भृगुजातक विधवाओं से घनिष्ठता रखने वाला, साहित्य व काव्य प्रेमी,अच्छा कलाकार, यात्री या पर्यटन का शौकीन और विद्वान् होगा।
    -डॉ रामन
    जातक दरि्द्रि, असफल, और बुरी मानसिकता वालों से दोस्ती रखेगा।-चमत्कार चिंतामाणि
द्वादश भाव-राहू यदि बारहवें भाव में लग्नकुंडली में हो तो जातकपतित, चरित्रहीन, अनैतिक सम्बन्धों वाला मूर्ख/जड़मति तथा कामुक होता है।

    ऐसा जातक प्रायः नीचरति या मुख मैथुन में रुचि रखता है। ऐसा जातककल्पनाजीवी/शेखचिल्ली स्वभाव का हो सकता है। यदि राहू शुभ प्रभाव में हो तोजातक को रात को नींद अच्छी आती है और उसकी ससुराल प्रायः पैसे वाली होतीहै। राहू अशुभ हो तो रातों की नींद हराम होती है। भारी परिश्रम के बाद खानानसीब होता है। उम्मीदों के सहारे जोवन कटता है। लाल किताब के मत से कुंडलीमें बुध ग्रह जिस स्थिति में हो तदानुसार ही राहू बारहवें घर में फल देता है।

    पुरुष राशि का बारहवां राहू नेत्र रोग (फूला/जाला/मोतिय्याबिन्द/दृष्टिमंदताआदि), पैरों में चोट लगने से पीड़़ा आदि समस्याएं देता है। जातक बकवादी, दुष्टोंकी संगति में पैसा बर्बाद करने वाला तथा व्यभिचारी होता है। शय्या सुख अल्पतथा तलाक भी सम्भव होता है।
    स्त्री राशि का राहू अपेक्षाकृत शुभ फल देता है। फिर भी जातक का पुनर्विवाहसम्भव होता है। जन्मभूमि से उसे सफलता नहीं मिलती, विदेशवास करना पड़ताहै। अच्छा कमाता है लेकिन अनाप-शनाप खर्च करता है। अध्यात्म में रुचि फिरभी बनी रहती है। दाम्पत्य सफल नहीं होता।

    विशेष (अपनी बात)-राहू भ्रम का कारक है। भ्रम ही अज्ञान/माया है।अतः राहू मोह का भी कारक होता है (बुद्धि भ्रमित/मोहित करता है)। बारहवांकेतु ज्योतिष शास्त्र में मोक्ष का कारक माना जाता है (केतु के मोक्ष के कारक होनेके सम्बनध में पहले पुस्तक के प्रारम्भ में केतु के परिचय में चर्चा हो चुकी है)।अतः उससे एकदम विपरीत ग्रहण के कारक राहू को बारहवें भाव में बन्धन यासंसार में पुनः आगमन का कारक/प्रतीक माना जाना चाहिए (अभी विचाराधीनतथ्य है)।

1. सिरहाने तांबे का सिक्का रखें। 
2. घर में अंधेरी जगह सौंफ दबा कररखें। 
3. चिनी पानी में बहावें।
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    राहु के अन्य ग्रहों से योग
    प्रहण विचार में रवि, चन्द्र व राहु के युति योग के फल दिये हैं। प्रहण केसमय फल तीव्र मिलते हैं। किन्तु प्रतिमास एक बार चन्द्र-राहु की व प्रति वर्षएक बार रवि-राहु की युत्ति होती है। इन के फल साधारण मिलते है। कोई भीग्रह चन्द्र कक्षा के पात में हो उस के शुभ फल अधिक अच्छे मिलते हैं।
   
 राहु और रवि
    ये दोनों शुभ राशि में अन्य ग्रहों से शुभ योग में हो तो तथा १।३।५ ।२०।१२इन स्थानों में हो तो- हमेशा मान सन्मान मिलता है। बड़ा अधिकार पद मिलताहैं, सत्ताधीश होता है। स्वास्थ्य अच्छा होता है। विवाह एक ही होता है।स्त्री केसाथ प्रेमपूर्वक रहते हैं। सन्तति कम होती है। धन मिलता है किन्तुपूर्वाजित सम्पत्ति     नहीं रहती, अपने कष्ट से धनाजेन होता हैं। बुध्दिमान, सावधान, नियमित,व्यवस्थित,शान्त, समाधानी वृत्ति का होता है। हाथ में लिये कार्य को पूरा करताहै। यथाशक्ति राजनीतिक वा सामाजिक कार्य कर के प्रसिद्ध होता है। न्यायअन्याय समझसकर सत्य के लिये झगड़ता हैं। ईश्वर के सिवाय अन्य किसी से हारनहीं मानता । बरताव दयालु प्रेमपुर्ण, महत्वाकांक्षा से परिपूर्ण होता है। लोगों परप्रभाव होता हैं किन्तु प्रेमपूर्वक, मन अनुकूल कर के कार्य करता है। यह युत्ति२।४।६।७८।९।११ इन स्थानों में हो तो फल साधारण मिलते हैं। २।४।७ इनस्थानों में - पूर्वाजित धन नष्ट होता है। दो विवाह होते है। उद्योग में अस्थिसतारहती है। कुटुम्ब बहुत बड़ा होता है। यह युति अशुभ राशि में अशुभ ग्रह के योगमें हो तो- वह दुरभिमानी, कुल का झूठा अभिमान करने वाला, हठी, तामसी, दुरायही,आलसी, निरुद्योगी, स्वार्थी, नीच, झगड़े लगाने वाला, मुफ्त खाने वाला स्वैराचारी, अपवित्र दुष्ट बुद्धि का, लापरवाह, धूर्त, कनिष्ठों को कष्ट देनेवाला, सच झूठमें फरक न करने वाला अच्छे काम बिगाड़ने में मजा लेने वाला,अकारण विरोधव शत्रुता करने वाला होता है। दूसरों की प्रगति इसे सहन नहीं होती। बोजना बहुतकठोर व तीखा होता है। क्रोधी, चंचल,व्यसनी, पापपुण्य से उदासीन, परस्त्री मेंआसक्त, कामुक होता है।
 
राहु और चन्द्र
 ये ग्रह शुभ राशि में अन्य ग्रहों से शुभ योग में हों तो विचार उच्च परिपक्व होते हैं। संकट बहुत आते हैं उन का धेर्यपूर्वक मुकाबला करता है। प्रपंच का ध्यानछोड़ कर यह समाजहित के कार्य करता हैं अतः लोकप्रिय होता है।इन्हेंस्वतनत्र व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती व्यवसाय के विपरीत मनोवृत्ति होती है। अतः संकट में कोईउपाय नहीं कर पाते । नौकरी करने की सलाह इन्हें अच्छी नहीं लगती। नीतिमान होते
    हैं। शान्त, समाधानी, एकतापूर्ण वातावरण चाहते हैं। इस में वि्न हो तो। बहुत यल्नकर के दूर करते हैं बहुत निग्रही ,निश्चयी, नियमित होते हैं। अन्याय के प्रतिकार केलिएराजनीतिक, सामाजिकया आध्यात्मिक दृष्टिसेझगझ़ा चालू रखते हैं।सत्री अनुकूल होती है। पुत्र एक दो होते हैं, वे अच्छे और पिता के लिए गौरवास्पद होते हैं। यह युति
    १।३।९ इस स्थानों में अशुभ होती है। हमेशा असफलता, दाखिद्िय, ऋणय्रस्त होने से कष्ट होता है। मृत्यु आकस्मिक रीती से होती है।
    राहु व मगल
    इन की युति शुभ राशि में अन्य प्रहों के शुभ योग में हो तो - १।३।६।१०इन स्थानों में - यह बहुत पराक्रमी, कर्तुत्ववान, अदालती व्यवहार मेंसफल, साहसी, निन्दा की परवाह न करने वाला, सुधारवादी, कार्य पूर्ण करने वाला,संसार में व्यवहार कुशल होता है। यह दत्तक जाने का योग है। बड़े भाई नहीं होते।भाई बहिनों का पोषण करना पड़ता है। बहु विवाह योग होता है। यह युति अशुभसम्बन्ध में हो तो विवाहित स्त्री से असुन्तुष्ट, व्यभिचारी होते है। अदालती व्यवहारमें असफल होते है। पूर्वारजित सम्पत्ति नष्ट होती हैं। धनस्थान में यह युति शुभसम्बन्ध में हो तो सूद के रूप में धनलाभ होता है। उदार स्वभाव के कारण खर्चभी बहुत होता है। स्थावर सम्पत्ति खरीदने के लिए अनुकूलता रहती है- येजिसे लेना चाहे वह घर-जमीन आदि दूसरे नहीं खरीद पाते। इन के धन से दूसरोंका कल्याण नहीं होता। चतुर्थ में यह युति हो तो पूर्वारजित व स्वकष्टार्जित सम्पत्तिभी नष्ट होती है। चतुर्थ में राहु व दशम में मंगल हो तो निवासस्थान दोषपूर्णहोता हैं। उस घर में पिशाचबाधा अथवा निरन्तर द्रव्यहानि अथवा सन्तति काघात, स्त्री का घात आदि से कष्ट होता है। पंचम स्थान में इस युति से सन्ततिसम्बधी दोष -स्त्री को ऋतुसम्बन्धी रोग होते है अथवा सन्तति नष्ट होती है।ऐहिक सौख्य कम मिलता है। सप्तम में -विवाह बहुत देर से होता है। पहलीस्त्री से सम्बन्ध ठीक न रहने से दूसरा विवाह होता है। व्यवसाय-नौकरी में स्थिस्तानही रहती। अष्टम में- स्वास्थ ठीक नहीं रहता, जादू-ससायन के पीछे सम्पत्तिको नष्ट करते हैं, आयु मध्यम होती है। नवम में भाई बहन नहीं होते एकाथबड़ा भाई या बहन होती है, छोटे नहीं होते व्ययस्थान में - स्त्री सुख नहीं मिलता,रक्कपित्त, कोढ़, विषबाधा की सम्भावना होती है। राहु सर्प के समान व मंगलनेवले के समान हैं अतः मंगल के प्रभाव से विष घातक नहीं हो पाता। डॉक्टरकी मदद से या वमन हो कर विष से छुटकारा मिलता है।

राहु व बुध
    इन की युति शुभ राशि में शुभ सम्बन्ध में हो व १।३५९।९०।११।इनस्थानों में हो तो बुद्धिम्ता अच्छी होती है। किसी भी विषय को सूक्ष्मता सेसमझना,संशोधन, गहन विचार, विस्तृत प्रहणशक्ति, दूरवृष्टि ,से सम्पन्न होते
    हैं। इन्हें शिक्षा की अवधि में पहली श्रेणी नहीं मिलती । यह युति अशुभ सम्बन्धमें हो तो शिक्षा अधूरी रहती है। बुद्धि चंचल, बरताव विक्षिप्त व अस्थिर, स्वभावघमंडी होता है। खुद को होशियार व दूसरों को मूर्ख समझते हैं। इस का क्रोधक्षणिक होता है। अन्य स्थानों में यह योग हो तो बुद्धि शान्त, समाधानी होती है।शिक्षा नहीं होती, व्यवसाय में स्थिस्ता नहीं होती। दो विवाह होते हैं। ये क्रोधमें बहकते नहीं, मित्र काफी होते हैं। इन स्थानों में अशुभ सम्बन्ध में यह योगहो तो पस्तिष्क के विकार होते हैं- फिट आना, भ्रम, पागलपन, निद्रानाश,बालप्रह, सूखा, स्मरणशक्ति नष्ट होना, हिस्टेरिया आदि की सम्भावना होती है।
    राहु व गुरु
    इन की युति शुभ सम्बन्ध में हो तो सन्यान बहुत मिलता है। अधिकार कीइच्छा न होते हुए भी अधिकार मिलता है। लोकप्रिय हो कर विधानसभा आदिका सदस्य चुना जाता है। बुद्धिमान, व्यासंगी, होशियार होता है। यह युति१।५।९।१० स्थानों में बहुत अच्छा फल देती है। २।४।७।११ में कुछ कमफल मिलता है। सम्पत्ति अच्छी मिलती है, शिक्षा कम होती है। ३।६।८।१२इन स्थानों में सम्पत्ति कम, शिक्षा अधिक होती है। पराशर के मतानुसार राहुव गुरु धनु या मीन में हो और गुरु षष्ठ या अष्टम का स्वामी हो तो अल्पायु योगहोता है। इस के टीकाकार ने यह अर्थ किया है कि राहु व गुरु लग्न में धनु यामीन में हो तो अरिष्ट योग होता है- इयं राहुयुक्तगुरुरिति यस्य जन्मलग्न धनुमीनगाहस्ति त्र राशिगते गुरौ रिष्टसम्भवो वाच्यः । तत्त्रिकोणे वा अथवा यत्रकुत्ररशी राहयकको गुुरस्ति तत्र राशिगते शनौ अरिष्टसम्भवो वाच्यः ।। त्रिकोण मेंअथवा अन्यत्र राहु के साथ गुरु हो वशनि भी हो तो अरिष्ट का योग होता है।आष्टम स्थान में धनु या मीन में राहु गुरु युति हो तो अल्पायु होना सम्भव है।साधारणतः गुरु ब्राम्हण वर्ण का और राहु चाण्डाल जाति का माना जाता है अतःइन की युति गुरुचाण्डाल योग के रूप में अशुभ मानी जाती है। किन्तु अनुभवमें यह शुभ फल देने वाली सिध्द हुई है। इन प्रहों के युति या प्रतियोग के फलस्वरुपकोई व्यकि बहुत धनी या कीर्तिमान हो तो उस के वंशजों की स्थिति प्रायः बिगड़तेजाती है। इस पुरुष को किर्ति मिली हो व द्रव्य न मिला हो तो अगली पीढ़ी केलोग शिक्षा पूरी कर अच्छा धनार्जन करते है यद्यपि उन्हें की्ती नहीं मिलती।
    इन की युत्ति शुभ सम्बन्ध में हो तो विवाह आकस्मिक होता है। स्त्री निर्धनतथा सम्बन्धी रहित घर की होती है। स्त्री सुख अच्छा मिलता है। पति के पहलेपत्नी की मृत्यु होती है। यह परस्त्री से पराङमुख होता है। यह युति ३।६।७।८।१२
    इन स्थानों में अशुभ होती है। एक स्त्री से चिरकाल सुख नहीं मिलता। व्यवसाय
    में कठिनाइयां आती हैं। विवाह के बाद आर्थिक कष्ट होता है।
    राहु व शनि
 इन की युति शुभ सम्बन्ध में हो तो बुद्धि गहरी, परिपक्व, गूढ, अगाथ होती है। बरताव लोकविलक्षण होता है। व्यवसाय में चतुराई से बहुत धन मिलता है। बैन्क, कारखाने, कम्पनियां, शेअर- बाजार,सट्टा विदेश-व्यापार आदि से कीति व धन भिलता है। दयालू, शान्त, जन्मजात श्रेष्ठता से विभूषित होता है। खास शिक्षा के बिना ही विद्वान के रूप में प्रसिद्ध होता है। व्यवहारकुशल, न्याय कोसमझने वाला, लोगों की सुनकर अपने मन की करनेवाला होता है। थेड़ा किन्तु मार्मिक बोलता है, काम अधिक करता है। परोपकारी, आत्मविश्वासी कर्नुत्ववादी,दैववाद का विरोधक, महत्त्वाकांक्षी, प्रभावशाली होता है। हजारों लोगों के रोजगार का प्रबन्ध करता है। सामाजिक व शिक्षाविषयक क्षेत्र में दान द्वारा कीति मिलती
है। क्रान्ति के इच्छुक, अध्यात्मप्रेमी, संस्थाओं के स्थापक होते हैं। यह युति मध्यम रूप में हो तो वे लोग अपने कामों में मग्न, लोगों से अलग रहते हैं। शान्त रीति से नौकरी या साधारण व्यवसाय करते हैं, । स्त्री-पुत्रों का सुख अच्छा मिलता है' सूद,रेस में एजन्ट (बुकी), इंजिनियरिंग, वॉटरवर्क्स, प्लम्बिंग द्वारा धनार्जन होता है। यह युति अशुभ हो तो व्यवसाय में या नौकरी में हमेशा हानि, दीनता, सदा कर्ज रहना, एक के पीछे एक आपत्ति, दूसरों की हानि करने की इच्छाये फल होते हैं। ये लोग अपने ही घर का नुकसान करते हैं। अ्रमिष्ट, पैशाचिक वृत्ति के धर्म छोड़ने वाले, भाषण में क्रूर व अश्लील होते हैं। दूसरों को तानेदे कर कष्ट देते हैं। खुद को होशियार, दूसरों को मूर्ख समझते हैं। दूसरों परआश्रित रहते हैं, समाज के अच्छे काम में विष्न लाते हैं। निन्दा में निपुण,लोभी, परद्रव्य के इच्छुक, मत्सरी, क्रोधी, अकारण अपकार करने वाले,व्यभिचारी, अविचारी होते हैं। इन के घर मे किसी को भूत प्रेत की बाधा होती     है। (राहुकेतुसमायुक्ते बाधा पैशाचिकी स्मृता-सर्वार्थ-चिन्तामणि) यह युति लग्न में भेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक या मीन में हो तो दीर्घायु होता हैं। बचपन में माता या पिता की मृत्यु होती है। बचपन दुःखमय होता है।
    उपजीविका में विन होते हैं। दूसरेविवाह के बाद भाग्योदय शूरू होता है। पुत्रसन्तिमें विष्न होते है। प्रगति करते हैं। अन्य राशियों में अशुभ फल होते है। धनस्थानमें शुभ राशि में अन्य प्रहों से शुभ सम्बन्ध में हों तो एक विवाह, सन्ति बहुत,पूर्वाजित धन की वृद्धि होती है। यह व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी अधिक करताहै। अन्य प्रहों से अशुभ योग हो तो पूर्वार्जित सम्पत्तिनहीं मिलती । बचपन मामाया मौसी के घर बीतता है। बहुभार्या योग होता है। वरिष्ठ अधिकारी की कृषासे नौकरी में तरक्की होती हैं। सन्तति बहुत होती है। दुसरे विवाह के बाद भाग्योदयहो कर पेन्शन के बाद सुखपूर्वक रहता है। घर स्थावर सम्पत्ति अर्जित करते हैं।तृतीय स्थान में शुभ सम्बन्ध में हो तो २६ वें वर्ष तक बहुत कष्ट रहता है। बचपनमें माता की व थोड़े हीं दिन बाद पिता की मृत्यु होती है। भाई के साथ बटवारानहीं हुआ तो एक की प्रगति रुकती है। धीरे-धीरे भाग्योदय हो कर अन्त तककायम रहता है। स्वभाव शान्त होता है। विवाह एक, नौकरी या व्यवसाय मेंस्थिस्ता यह फल मिलते हैं। चतुर्थ स्थान में शुभ सम्बन्ध में हो तो धन या पुत्रसन्ततिमें एक की प्राप्ति होती है। पिता अल्पायु, माता दीर्घार्यु होती है। बड़े व्यवसायमें लाभ, दान से कीती प्राप्त होती है। धन व कीर्ति के साथ पुत्र लाभ नहीं होताअतः दूसरा विवाह करते है। दत्तक लेने का सम्भव होता है। बड़ी संस्थाओं कोविपुल दान देते हैं। उदार होते हैं किन्तु आलसी लोगों या अविश्वसनीय संस्थाओंकी बिलकुल मदद नहीं करते। बुद्धिमान, व्यवहार कुशल, प्रसंगावधानी, बहुश्रुल, व्यासंगी होते हैं। खान, इंजिनीयरिंग, खेती,बिल्डिंग, लोहा-चूना पत्थर, मिट्टी,बालू, विदेशी वन्त्र, स्थावर सम्पत्ति के दलाल आदि के व्यवसाय में विपुल धनमिलता है। इन्हें अपनी मृत्यु का पहले आभास मिलता है। पंचम स्थान में यह युति हो तो विवाह में विलम्ब, दो विवाह, बहुत सन्तति हो कर दो तीन ही जीवीतरहना, अच्छा ऐहिक सुख, कीर्ति, विक्षिप्त स्वभाव, कथनी-करनी मे अन्तर, पहलेस्वार्थ-फिर परमार्थ, अविश्वासी स्वभाव, जगत को विरोधी समझना वृद्ध वयमें पत्नी-पुत्रों का विरोध ये फल मिलते हैं। षष्ठ स्थान में - विरोध बहुत होताहै, अन्त में शत्रुनष्ट होते हैं। विचित्र रोग, सरदी, सन्धिवात आदि होते हैं। तरुणायू     में ही स्त्री की मृत्यु होती है। अधिकार, धन, सन्मान मिलता है। वृद्धावस्था मेंशारिरीक कष्ट बहुत होता है। कोई आनुवंशिक रोग रहता है। सप्तम स्थानमें -दो विवाह की प्रवृत्ति होती हैं। दूसरे विवाह के बाद व्यवसाय में बहुत लाभहोता है। एक ही विवाह हो कर सन्तति हुई तो धनलाभ नहीं होता। बड़े व्यवसायमें बहुत लाभ होता हैं। एक ही विवाह हो कर सन्तति हुई तोधनलाभ नहीं होता।बड़े व्यवसाय में बहुत लाभ होता है। किन्तु फिर हानि भी होती है। पतिपत्नी मेंकलह नहीं होती, वृद्धायूं मे पत्नी का प्रभुत्व होता है। पुत्रों का विरोध होता है।पूर्व आयु में सुख व उत्तर आयु में दारिद्रध का योग होता है। यह बात ४-५ पीढ़ीतक चलती है। जो कुल की किसी स्त्री के शाप का परिणाम होता है। अष्टमस्थान में स्त्री दरिद्र कुटुम्ब की होती है। अपने कष्ट से प्रगति करनी पड़ती है।धन काफी मिलता है। व खर्च भी होता है। उत्तर आयु में दार्द्रय आता है। दीर्घायुहोते हैं। मृत्यु का आभास पहले मिल जाता है। यहाँ कर्क व सिंह राशि में शुभफल मिलते हैं, अन्य राशियों मे साधारण फल मिलते हैं। नवमस्थान में यह पिताका सब से बड़ा या छोटा पुत्र होता है। शिक्षा पूरी होती है। विवाह से इच्छापूर्तिनही होती, विजातीय या बड़ी स्त्री से प्रेम करते हैं। मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक,मीन व मिथुन में, शिक्षा के लिए विदेश प्रवास होता है। भाग्योदय ३२ वें वर्षसे शुरू हो कर ४८ वें वर्ष बहुत उन्नत्ति होती है। दशमस्थान में - पूर्व वय मेंकष्ट रहता है। बाद में अच्छी प्रगति होती है। ३६ वें वर्ष से भाग्योदय होता है।विवाह अधिक होते हैं या सन्तति कम होती हैं। क्वचित सन्तति नहीं होती ।कीति बहुत मिलती है। लाभस्थान में -धन अच्छा मिलता है। लोभी होता है।सन्तति में बाधा होती है। लोगों में निंदा होती हैं। व्ययस्थान में - जन्म समयकी स्थिती से काफी तरक्की करते हैं। अधिकार व सम्पत्ति के लिये बुरे मागोंका उपयोग करता हैं, खून, विषप्रयोग से भी नहीं डरता है। बाद में ये सब छुपानेके लिए बहुत दानधरम करता है। पुत्र कम- एक या दो होते हैं। एक पुत्र कीपिता के पहले मृत्यु होती है। स्त्री से हमेशा झगड़ा होता है। बड़े व्यवसाय मे कीतिमिलती है, विदेशी प्रवास होता है।
    इस प्रकरण में राहु की अन्य ग्रहों के साथ युति के फल दिये हैं। केन्द्र व प्रतियोगमें भी ये फल मिलते हैं। धन, षष्ठ, अष्टम और व्यय में प्रतियोग के तथा तृतीय, पंचम,षष्ठ, अष्ठम, नवम व व्यय में केन्द्रयोग के फल विशेष तीव्र मिलते हैं।

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    राहु का द्वादश भावगत भ्रमण
    राहु राशि चक्र में उलटी परिक्रमा करता है- लग्न-व्यय लाभ-दशम इसक्रम से श्रमण करता है। भ्रमण के फल देखते समय मूल कुण्डली में रवि व चन्द्रके साथ राहु के सम्बध शुभ है या अशुभ यह देखना चाहिए। मूल सम्बन्ध शुभ
    हैं तो भ्रमण के फल शुभ मिलते हैं, अशुभ हो तो अशुभ मिलते हैं।
    लग्तस्थान-वृषभ, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर व मीन इन राशियों मेंराहु का भ्षमण मन को शान्ति देता है, वृत्ति गम्भीर होती है, बड़े व्यवसाय कीयोजना बनती है, यश मिलता है। अच्छे कामों से लोगों पर प्रभाव रहता है। धनीस्त्री से सम्बन्ध आता है। लोग मदद करते हैं। व्यवसाय ठीक चलता है। लोगोंके विवाह, उपनयन आदि में मदद होती हैं। मेष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु, कुम्भराशियों में से राहु का भ्रमण हो तो स्त्री-पुत्र बीमार होते हैं। व्यवसाय में व छोटेकामों में भी असफल होता है। मन अशान्त विक्षिप्त होता है। स्मरणशक्ति दुर्बलहोती है। अपने नुकसान के काम करता है, लोग गलती बतायें तो मानता नहीं,थोड़े से संकट से घबराता है। मन दुर्बल, मस्तिष्क भ्रमिष्ट होता है। पेट में दर्द,पित्त-विकार होता है।
    व्ययस्थान -वृषभ, कर्क, सिंह, वृश्चिक,मकर व मीन इन राशियों में इसस्थानों में से राहु का भ्रमण हो तो, कर्ज दूर होता है। प्रवास बहुत होता है, नयेपरिचयों से लाभ होता है, स्त्री को साधारण शरीर कष्ट होता रहता है, अच्छे कामहोते हैं। व्यवसाय ठीक चलता है, नौकरी में तरक्की होती है, कीर्ति मिलती हैं।अन्य राशियों में - व्यवसाय में दिवाला निकलता है। मूल कुण्डली में द्विभार्यायोग हो तो इस समय पत्नी की मृत्यु होती है। हमेशा कर्ज लेने से अपमान होताहै। लोगों का विश्वास नहीं रहता है। घर में किसी स्त्री को पिशाचबाधा होती है।स्त्री के साथ झगड़े होते हैं। अपने लोगों से विरोध बढ़ता है। खर्च बहुत होताहै। लोगों का कर्ज चुकाना पड़ता है किन्तु इन की बाकी वसूल नहीं होती। घडी,फाउन्टन पेन,पाकिट, जूते, छाते, कपड़े आदि चुराये जाते हैं।
    लाभस्थान-वृषभ, कन्या,कके सिंह, वृश्चिक, मकर व मीन में भ्रमण होतो व्यवसाय अच्छा चल कर लाभ होता है। कन्या होती है। अनपेक्षित मदद मिलतीहै। चुनाव में जीतते हैं। अपने काम छोड़कर परोपकार में समय बिताते है। किसीलावारिस का धन मिलता है। काम पूरे हो कर कीर्ति मिलती है। अन्य राशियों में
    भ्रमण से व्यवसाय में नुकसान होता है। लेनदेन में झगड़ों से हानि होती है। सन्तति 
को कष्ट, चुनाव में हार, कामों में असफलता, विष्न आदि से कष्ट होता है।
    दशमस्थान - वृषभ, कर्क, सिंह, कन्या मकर, वृश्चिक व पीन में भ्रमण
    हो तो लोगों की सहानुभूति से चुनाव में जीत, उद्योग में सफलता, लाभ में वृद्ध्धि,
    नौकरी में तरक्की, अकस्मात पदवृद्धि, बड़ों की मदद, इस्टेट में वृष्दि, बड़े कामों
    में सफलता, कीरति, अदालती मामलों में जीत अधिकारियों की अनुकूलता आदिफल मिलते हैं। अन्य राशियों में भ्रमण हो तो नौकरी में हानि, सरकारी धन का
    अपव्यय, अधिकारी की प्रतिकूलता कनिष्ठों का असन्तोष, मानहानि, व्यवसाय
    में दिवाला, पुत्र की मृत्यु आदि से कष्ट होता है।
    नवम- वृषभ, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन में भ्रमण हो तो
    प्रवास,विवाह की सम्भावना, विदेशयात्रा, तीर्थयात्रा, पत्नी की अनुकूलता, भाई
    बहिनों का विवाह, अध्ययन से कीर्ति होती हैं। अन्य राशियों में भाई या बहन
    की मृत्यु या वैधव्य, भाई बहन को कष्ट,बेकारी, नीच स्त्री के सम्बन्ध से बेइज्जती,
    भाईयों में झगड़ा हो कर बटवारा आदि फल मिलते हैं।
    अष्टमस्थान -वृषभ, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन में से
    भ्रमण हो व मूल कुण्डली में आकस्मिक लाभ का योग हो तो इस समय रेस,
    सट्टा, जुआ, लॉटरी, शेअर आदि में या स्त्री सम्बन्ध से आकस्मिक लाभ होता
    है। पुत्र होता है। किन्तु अल्पायु होता है। लावारिस का धन मिलता है। अन्य
    राशियों मे शारीरिक कष्ट, आर्थिक अड़चने, मानसिक अशान्ति, ऐहिक सुख
    में विष्न, धनहानि आदि से कष्ट होता है।
    सप्तमस्थान-वृषभ, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक,मकर,मीन में से भ्रमण
    हो तो व्यवसाय में आकस्मिक वृद्धि, लोगों से मदद मिलना, भाई से सहायता, स्त्रीसुख
    की प्राप्ति ये फल मिलते है। कन्या होती हैं। अन्य राशियों में-स्त्री पुत्रों की
    बीमारी, व्यवसाय बन्द होना, कर्ज होना, लोगों का विश्वास न रहना, कर्ज के
    लिए अदालत के मालले होना, बटवारा, नौकरी में नुकसान, स्थानान्तर स्त्री सम्बन्धी
    अपवाद आदि से कषह हो कर लाभ में विज आते है।
    पषठस्थान - वृषभ, कर्क, सिंह, कन्या वृश्चिक, मकर मीन में से प्रमण होतो अदालती मामलों मे यश, शत्रु का नाश, चिन्ता दूर होना व्यापार में वृद्धि, कर्जदूर होना, स्वीसुख की प्राष्ति, पुराने-मित्रो सेव स्त्री सम्बन्धों से लाभ, खेलॉँ मैं सफलताआवि फल मिलते हैं। अन्य राशियों में - अपने लोगों का विरोष, विश्वासवात, गुप्तशत्रुओं मे वृद्धि,व्यवसाय में हानि, कर्ज होना, अचानक नुकसान, स्त्री को शारीरिककषट, स्वीं की मृत्यु की सम्भावना, पुराने साहूकारों का तकाजा, कोद आदि रोग,अदालती मामलों में हार, खेलों में हार आदि फल मिलते है।
    पंचमस्थान-वृषभ कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन में भ्रमणहो तो सन्तति होना, कीतिदायक काम होना, शिक्षा पूरी हो कर डिश्री मिलना, विवाहकी सम्भावना, जीविका का आरम्भ आदि फल मिलते हैं। अन्य राशियों में सन्तिकी मृत्यु, गर्भपात, श्रम,पागलपन, सन्तति व स्त्री को शारीरिक कष्ट, स्त्रीसुखनमिलना, भाग्योदय शुरू होते ही विष्न, पतिपत्नी में झगड़े, पत्नी के बारे में सन्देह,अपवाद, अपकीति, आर्थिक कष्ट, व्यवसाय में अरुचि, मित्रों का विरोध आदिफल मिलते हैं।
    चतुर्थस्थान - इस स्थान में सभी रशियों में से राहु का भ्रमण अनिष्ट है।आपत्ति, अस्थिरता, विरक्त भाव, घर में झगड़, शारीरिक कष्ट, पेट मेंदर्द, नौकरीमें विष्न, व्यवसाय बन्द होना, माता को शारीरिक कष्ट, स्थावर सम्पत्ति की हानि,आदि फल मिलते हैं।
    तृ्तीयस्थान- वृषभ,कर्क, सिंह,कन्या,वृश्चिक, मकर और मीन में भ्रमणहो तो चित्त में समाधान, विष्न दूर हो कर काम पूरे होना, आत्मविश्वास, बड़े कामोंकी पूर्ति, इच्छाओं की पूर्ति, समाज व व्यवसाय में मान्यता, सन्मान, योग्यता मेंवृद्धि ये फल मिलते हैं। अन्य राशियों में भाईयों में झगड़ा, बटवारा बहनों का वैधव्यअथवा भाई बहनों को शारिरिक या आर्थिक कष्ट, प्रवास में कष्ट, पड़ोसियों सेतकलीफ, बयानों या गवाहियोंमे झूठेपन का आरोप, आदि अशुभ फल मिलते है।
    द्वितीयस्थान-वृषभ, कर्क, सिंह, कल्या, वृश्चिक, मकर व मीन में अ्रमण होतो धनलाभ, बड़े व्यवसाय, स्थावर सम्पत्ति गिरवी रखी हो तो मुक्त होना, आदि शुभफल मिलते है। अन्य रशियों में-अदालती मामलों में नुकसान, सबूत मिलने में देरी,व्यवसाय के लिए कर्ज, स्थावर सम्पत्ति गिरवी रखना, अन्त में स्थावर सम्पत्ति बेच देना, घर में स्त्रियों का व गांव के लोगों का विरोध आदि फल मिलते है।

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 भ्रमण में अन्य ग्रहों की युति के फल

    जन्मस्थ राहु से गोचर राहु की युति हो तो अकस्मिक संकट, अकारण लोगोंका विरोध, व्यवसाय या नौकरी में हानि, दांत और पेट के रोग, घर में बीमारी,प्रवास, स्थानान्तर आदि से कष्ट होता है। रवि से राहु का भ्रमण हो तो वरिष्ठलोगों का रोष,अपमान, मन में उद्विग्नता, शारीरिक कष्ट, व्यवसाय में अड़चनेंआदि फल मिलते हैं। ये फल २।४५।८।१२ इन स्थानों में तीव्र होते हैं,तथाआगे पिछे तीन महीनों तक मिलते हैं। चन्द्र से राहु का भ्रमण हो तो मन में विरक्ति,असमाधान व्यवसाय में नुकसान होने से नौकरी की जरूरत होना, बेईज्जती आदिफल मिलते है। ३।६।८।१०।१२ इन स्थानों में तीव्र फल मिलते हैं, तथा आगेपीछे पांच महीनों तक मिलते हैं। चन्द्र राहु पर से भ्रमण करता हो वे २। दिनभी असमाधानकारक आर्थिक कष्ट, साहूकार का तकाजा आदि से तकलीफ होतीहै। किन्तु चन्द्र अगली राशि में जाने पर अच्छा फल देता है। मंगल से राहु काभ्रमण हो तो खर्च बढ़ना, व्यसनों से इस्टेट की हानि अदालती मामलों में नुकसान,बुरे कामों में रचि, गुप्त रोग, कमर पीठ में रोग ये फल मिलते हैं। २।४।७।८।१२इन स्थानों में तीव्र फल मिलते है। मंगल राहु पर से ४५ दिन में भ्रमण करताहै। इन में २० दिन बहुत कष्ट के होते है। बुध पर से राहु का भ्रमण हो तो बुद्धिमें विकृति, बयान व गवाही झूठी सिद्ध होना, स्मरण शक्ति नष्ट होना आदि फलमिलते हैं। २।३५।६।८।१२ स्थानों में पुरुष राशि में बुध हो तो विशेष कष्टहोता है। स्त्री राशि में अकेला बुध हो तो लेखक, कवि, उपन्यासकार,नाटककार, ज्योतिषी, विद्यार्थी आदि को यह समय अच्छा रहता है। गुरु से राहुका भ्रमण हो तो आकस्मिक विवाह, स्त्री से अच्छे सम्बन्ध, नौकरी में तरक्की,व्यवसाय में लाभ, कीर्ति, चुनाव में जीत, विवाह हुआ हो तो पुत्रसन्तति, बडोंके परिचय से लाभ, परीक्षा में सफलता, लेखन में यश और किति ये फल मिलतेहैं। शुक्र से राहु का भ्रमण हो तो स्त्री पुत्रों की बीमारी, धनहानि, घर में स्त्रियोंको भूतबाधा, शारीरिक कष्ट, गुप्त रोग ये फल मिलते हैं। २।४।६।८ इन स्थानोंमें फल तीव्र होते है। शनि पर से राहु का भ्रमण हो और शनि या राहु केन्द्रया त्रिकोण में हो तो व्यवसाय बन्द होना, दिवाला निकलना, कर्ज, बेइज्जती, नौकरी     में हानि, वरिष्ठों की अवकृषा, स्त्री पर संकट, पुत्र की मृत्यु आदि फल मिलतेहैं। अन्य स्थानों में अशुभ फल कम होते हैं। केन्द्र या त्रिकोण में पुरुष राशिमे शनि या राहु हो तो तीव्र फल मिलते है।
    भावाधिपति के राहु से युति के योग
    लग्नेश से युति १।५।९।१९ स्थानों में हो तो सन्तति जीवित न खना, गर्भपात,शिक्षा में रुकावट, विक्षिप्त स्वभाव, तीव्र बुद्द्धी, अच्छी स्परण शक्ति ये फल होतेहैं। लग्नेश रवि चन्द्र, मंगल या गुरू हो तो शुभ फल और शनि,बुद या शुक्रहो तो अशुभ फल मिलते हैं।
    धनेश से युति हो तो दत्तक योग, स्त्री बीमार रहना, कुटुम्ब में अस्वस्थता,बड़ों के मृत्युयोग, व्यसन, पैतृक संपत्ति का नाश, व्यवसाय में आकस्मिक संकट,यश के लिए दीर्घ काल कष्ट,मानसिक कष्ट, व्यवसाय में उलझने, कर्ज ये फलमिलते हैं।
    वृतीयेश से युति हो तो प्रयल्न से प्रगति, उस के पहले माता पिता की मृत्यु, भाईदत्तक जाना, भाई या बहन की अकस्मात मृत्यु, तृतीयेश प्रह के उदय वर्ष सेभाग्योदय ये फल होते है। चतुर्थेश से युति हो तो माता व पुत्रों को कष्ट, एक भाई
    की मृत्यु,सदा असफलता,साझीदारी में विश्वासघात होना ये फल मिलते है।
    पंचमेश से युति हो तो पुत्र जीवित न रहना, शिक्षा में रुकावट, तीव्र किन्तु
    विक्षिप्त बुद्द्धि, अस्थिसता,स्त्री सुख कम होना, स्रीसुन्दर किन्तु झगझालू मिलना,दोविवाह,खुद को कष्ट, सन्तति का भाग्योदय ये फल मिलते हैं।
    षष्टेश से युति हो तो हमेशा अदालती मामलों में उलझनें, जीवन भर कष्ट,विविध रोग, संसार में कठिनाई ये फल मिलते हैं।
    सप्तमेश से युति हो तो स्त्री से कष्ट, झगडे, अवैध स्त्री सम्बन्ध से सुखव धनलाभ, जीविका में रुकावटें, व्यसन, अदालती मामलोंमें उलझनें, बहुत प्रवासये फल है।
    अष्टमेश से युति हो तो दीर्घकालीन रोग, अकस्मात मृत्यु होती है। अष्टमेश गुरुसे २।४।८ स्थानों में से युति हो तो स्त्री सुख कम मिलना पुत्रों की मृत्य, बड़े भाईकी मृत्यु, अकस्मात धनलाभ, दत्तक जाना श्रीमान बनना ये फल मिलते हैं।
    नवमेश से युति हो तो धर्म श्रध्दा नष्ट होना, सुधारवादी विचार,पुनर्विवाह,    बहुत प्रवास, शिक्षा थोडी व जीविका में शिक्षा का उपयोग न होना ये फल है।
    दशमेश से युति हो तो पुत्र न होना या बहुत देर से होना धीरे धीरे प्रगति,कीति, उद्योग में स्थिरता, प्रयत्नवादी किन्तु प्रंसगवश दैववादी व निरुद्योगी होना,और दो विवाह ये फल मिलते हैं।
    लाभेश से युति हो तो बार बार लाभ, लोगों में गलतफहमी, लोगों मे प्रमुखस्थान,पिता पुत्र में अनबन, प्रसंग के विपरीत बुद्धि ये फल हैं।
    व्ययेश से युति हो तो अचानक खर्च, जमानत डूबना, विवाहित स्त्री से अच्छेसम्बन्ध, अवैध स्त्री सम्बन्ध से नुकसान, उद्योग के लिए विदेश गमन, भाई बहनऔर कुछ पुत्रों का और माता पिता की मृत्यु ये फल हैं।
    
    द्वादश भावः स्त्री राशि का राहु द्वादश भाव में हो तो द्वभार्या योग बनाताहै। साधारणतया स्त्री सुख भी मिलता है, संतान अधिक होती है, जीवन केप्रारम्भिक वर्ष कठिनाई में व्यतीत होते हैं। जीविकोपार्जन के लिए कुटुम्ब-परिवारको छोड़ परदेसवास करना पड़ता है। ऐसा जातक पराक्रमी और यशस्वी होताहै, खूब धनार्जन करता है तथा व्यय भी करता है। वह मिलनसार, उदार तथामहत्वाकांक्षी होता है। ऐसा राहु जन्मभूमि से इतर स्थान में भाग्योदय कराताहै। राहु पुरुष राशि का हो तो नेत्र रोग होते हैं, विवाहित स्त्री से असंतुष्ट होपरस्त्रीगमन करता है। इसके कारण पत्नी का रोगी होना, माता-पिता के पासअधिक रहना भी कारण हो सकते हैं। संतति कम होती है। मिथुन, धनु औरमीन का राहु मुक्तिदाता माना गया है।






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