प्रकरण ५ - भूमिपूजन, वास्तुशांति तथा गृहप्रवेश आदि मांगलिक कार्यभूमिपूजन

प्रकरण ५ - भूमिपूजन, वास्तुशांति तथा गृहप्रवेश आदि मांगलिक कार्य
भूमिपूजन 
धरती माँ है, इस कारण से घर, सार्वजनिक भवन, रास्ते, पाठशाला आदि कुछ भी बनाना हो तोभूमि सब जगत की जननी है। इसी धरतीपर घर, अन्न, नदियाँ, रास्ते आदि होते हैं।
भूमिपूजन आवश्यक होता है। जिससे कि हमारा कार्य बिना विघ्न के संपन्न हो सके तथा हमसे जाने-अनजाने में भी कोई भूल हुई हो तो उस दोष का भी निराकरण हो जाता है।
भूमिपूजन करने हेतु मास, नक्षत्र, तिथि एवं दिन आदि का विवरण 
ग्राह्य मास - वैशाख, ज्येष्ठ, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन
वर्ज्य तिथि - कृष्ण १३, १४, ३० ये तिथियाँ एवं शुक्ल १ का पूर्ण दिन वर्ज्य है, तथा क्षयदिन / वृद्धिदिन वर्ज्य हैं। ४, ९, १४ ये तिथियाँ रिक्ता मानी जाती हैं अतः वर्ज्य हैं।
भद्रा, ग्रहणदिन, करिदिन, रवि संक्रमण पुण्यकाल, गुरु/शुक्र अस्तकाल, अधिकमास वर्ज्य हैं।
ग्राह्य नक्षत्र - अश्विनी, भरणी, रोहिणी, मृग, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी,
उत्तराफाल्गुनी, हस्त, अनुराधा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा, रेवती
वर्ज्य वार रविवार एवं मंगलवार
वर्ज्य योग - वैधृति, व्यतीपात पूर्ण वर्ज्य हैं तथा विष्कुंभ योग के आरंभ के १ घं. १२ मि., व्याघात २ घं. ३६ मि., शूल के २ घंटे, वज्र के ३ घं. ३६ मि., गंड के २ घं. २४ मि., अतिगंड के २ घं. २४ मि. तथा परिघ का पूर्वार्ध वर्ज्य हैं।

अशौच में अथवा अधिक समय तक भूमिपूजन करना असंभव हो तब क्या
करना चाहिए?

यदि भूमिपूजन करना अति आवश्यक हो तब उपर्युक्त महिनों का नियम छोड़कर तिथि, नक्षत्रादि नियम के अनुसार पंचांगशुद्धि देखकर तथा भगवान विष्णु की सुवर्ण प्रतिमा का पूजन करें और प्रतिमा दान देकर भूमिपूजन कर सकते हैं। तत्पश्चात् वास्तु निर्माणकार्य प्रारंभ करना चाहिए। यदि
अशौच हो तो भूमिपूजन नहीं करना चाहिए। सूतक समाप्ति के बाद ही भूमिपूजन करना चाहिए।

भवन निर्माण उद्योजक तथा व्यापार हेतु संकुल बनाना हो तो भूमिपूजन
करना आवश्यक है।

भूमिपूजन के मुहूर्तपर भूमिपूजन करना चाहिए। परंतु यदि अधिक समय तक मुहूर्त उपलब्ध ना होनेपर विशेष परिस्थिति में उपरोक्त विचारों को ध्यान में रखकर भगवान विष्णु की सुवर्ण प्रतिमा का पूजन करें तथा प्रतिमा दान करने के पश्चात् भूमिपूजन कर सकते हैं और भवन निर्माण प्रारंभ कर सकते हैं।
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गृहप्रवेश हेतु वास्तुशांति
• प्रत्येक मनुष्य को अपना स्वयं का घर हो ऐसी इच्छा होती है। प्राप्त हुई वास्तु उसे लाभदायक होना भी महत्त्वपूर्ण है। इस हेतु कुछ बिंदुओं का विचार करना आवश्यक है। वास्तु निर्मिति करते समय अथवा उस वास्तु में पूर्व में रहनेवाले व्यक्तियोंद्वारा कुछ अपकर्म घटित होने से निर्माण हुए
दोष, बाधा इनका परिमार्जन करने हेतु वास्तुशांति की जाती है। वास्तुपुरुष की कृपा प्राप्त हो, इस हेतु वास्तुशांति करना आवश्यक है। उस संबंधी विस्तृत विचार यहा स्पष्ट किए है।

वास्तुशांति हेतु मास, नक्षत्र, वार(दिन), तिथि आदि का विवरण

ग्राह्य मास - वैशाख, ज्येष्ठ, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन
वर्ज्य तिथि - कृष्ण १३, १४, ३० ये तिथियाँ एवं शुक्ल १ का पूर्ण दिन वर्ज्य हैं, तथा क्षयदिन | वृद्धिदिन वर्ज्य हैं। ४, ९, १४ ये तिथियाँ रिक्ता मानी जाती हैं, अतः वर्ज्य हैं।
भद्रा, ग्रहणदिन, करिदिन, रवि संक्रमण पुण्यकाल, गुरु/शुक्र अस्तकाल, अधिकमास वर्ज्य हैं।
ग्राह्य नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृग, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती,
अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शततारका, उत्तरा भाद्रपदा, रेवती.
वर्ज्य वार- रविवार एवं मंगलवार
वर्ज्य योग - वैधृति, व्यतीपात पूर्ण वर्ज्य हैं तथा विष्कुंभ योग के आरंभ के १ घं. १२ मि., व्याघात २ घं. ३६ मि., शूल के २ घंटे, वज्र के ३ घं. ३६ मि., गंड के २ घं. २४ मि., अतिगंड के २ घं. २४ मि. तथा परिघ का पूर्वार्ध वर्ज्य हैं।

सूचना - वास्तुशांति गृहप्रवेश का अंगभूत कर्म होने के कारण अग्निवास देखने की
आवश्यकता नहीं है।

गृहप्रवेश के समय कलश या वृष (वास्तु) चक्र होना आवश्यक है। मेष, कर्क, तुला एवं मकर लग्न हो तो गृहप्रवेश नहीं करना चाहिए।

वास्तुशांति के कुछ दिन पूर्व सपिंडों का सूतक आनेपर वास्तुशांति कब कर
सकते हैं?

अ) माता-पिता, दादा-दादी, संयुक्त परिवार में सगा भाई, अविवाहित बहन आदि के मृत्युपर
सूतक में कार्य नहीं कर सकते, परंतु १४ दिन के पश्चात् क्रियाकर्म होने के बाद विनायक शांति कर के शुभ मुहूर्त देखकर मंगलकार्य कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त चाचा, ताऊ, चचेरे आदि सपिंडों के निधनपर यदि सूतक कालावधि में मुहूर्त का दिन होनेपर कूष्मांड होम कर के अथवा सर्व प्रायश्चित्तार्थ प्रजापति के लिए समस्त व्याहृति मंत्र से घृत की १०८ आहुति देकर उस कर्म हेतु सूतक की निवृत्ति कर के मंगलकार्य कर सकते हैं। (उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह / निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध)

• 
ब) सपिंडों का जननाशौच (बच्चे के जन्म के बाद का सूतक) आया हो तो मुहूर्त का दिन
होनेपर कृष्णांड होम कर के अथवा सर्व प्रायश्चित्तार्थ प्रजापति के लिए समस्त व्याहृति मंत्र से घऋत की २०८ आहुति देकर उस कर्म हेतु सूतक की निवृत्ति कर के मंगलकार्य कर सकते हैं।
(निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध) (विशेष निर्णय के लिए अशौच पालन प्रकरण देखें।)

वर्तमानकाल में अशौच पालन के नूतन नियमों के अनुसार यदि अशौच निवृत्ति हो रही हो, तो मंगलकार्य के लिए कुष्मांड होम तथा व्याहृति होम करने की आवश्यकता नहीं है।

पत्नी गर्भवती हो तो कितने मास तक वास्तुशांति कर सकते हैं?

कर्ता की पत्नी गर्भवती हो तो ६ महीने तक वास्तुशांति के धार्मिक कार्यों में पत्नी सहभागी हो सकती है। परंतु सातवें मास से वह ऐसे कार्यों में सहभाग नहीं ले सकती।

पुरानी वास्तु खरीदी हो तो पुनः वास्तुशांति करनी चाहिए? ऐसे समय निक्षेप
की हुई पुरानी वास्तुप्रतिमा का क्या करना चाहिए? यदि किसी कारणवश
निक्षेप की हुई वास्तुप्रतिमा बाहर आ जाए तो क्या करना चाहिए?
1. यदि पुराना मकान लिया हो तो पुनः वास्तुशांति करनी चाहिए। तथा पुराने मकान की वास्तुप्रतिमा निक्षेप की हुई प्रतिमा निकालकर पुरोहित को दान में देनी चाहिए और नई वास्तु प्रतिमा का निक्षेप करना चाहिए।
2. किसी कारणवश यदि निक्षेप की हुई प्रतिमा बाहर आ जाती है तो उस प्रतिमा का पूजन करें तथा वास्तुप्रीत्यर्थ हवन कर के उसी जगह उस प्रतिमा का निक्षेप करना चाहिए।
3. यदि वास्तुप्रतिमा निक्षेप किसी कारणवश गलत जगह हुआ हो तो वहाँ से प्रतिमा
निकालकर वास्तुप्रीत्यर्थ हवन कर के तथा उस प्रतिमा का पूजन कर सही जगह तथा
सही दिशा में उसका निक्षेप करना चाहिए।
मकान में दूसरी मंजिल या एक-दो कमरे यदि नए बनाए हो तो वास्तुशांति के संबंध में जानकारी

वास्तुनिर्माण करते समय जो दोष आते हैं, वह दूर हो जाए इसलिए वास्तु पूजन तथा
उदकशांति आदि करना उचित रहेगा, वास्तुप्रतिमा का निक्षेप न करें। परंतु नई बनाई हुई मंजिलपर यदि घर का कोई सदस्य स्वतंत्र रसोई करके विभक्त रहनेवाला हो तो नए बनाए हुए मंजिल की वास्तुशांति करना उचित होगा। यदि नई बनाई हुई मंजिल किराएपर देने वाले हो तब भी वास्तुशांति करना उचित होगा।

क्या दुकान, फॅक्टरी, दवाखाना, हॉटेल आदि व्यावसायिक जगहों की वास्तुशांति
करनी चाहिए?

स्वयं की जगह में व्यवसाय शुरु करना हो तो (वास्तुप्रतिमा निक्षेप किए बगैर) वास्तुशांति
करें। यदि व्यावसायिक वास्तु किसी को किराएपर देनेवाले हो तब भी वास्तुशांति करनी चाहिए। यदि आप अपना व्यवसाय किराए की वास्तु में प्रारंभ कर रहे हो, ऐसे समय वास्तुशांति करने की आवश्यकता नहीं हैं, केवल उदकशांति करें।

• एक ही व्यक्ति के एक से अधिक घर हो तो क्या प्रत्येक घर की वास्तुशांति करनी
चाहिए?

एक ही व्यक्ति के अथवा पतिपत्नी के एक से अधिक घर (वास्तु) होनेपर वास्तु निर्माण के समय उत्पन्न होनेवाले दोषों का निवारण करने हेतु प्रत्येक घर की (वास्तु की) वास्तुशांति करना उचित रहेगा। वास्तुप्रतिमा निक्षेप की दिशा आदि से संबंधित जानकारी।

संपूर्ण वास्तु के आग्नेय दिशा में अथवा ईशान्य दिशा में वास्तुप्रतिमा निक्षेप करें। यदि
आग्नेय अथवा ईशान्य दिशा में वास्तुप्रतिमा निक्षेप करना संभव ना हो तो पूर्व दिशा में या रसोई गृह के आग्नेय कोने में वास्तुप्रतिमा निक्षेप करना चाहिए। वास्तुप्रतिमा निक्षेप करते समय प्रतिमा अधोमुखी रखनी चाहिए तथा प्रतिमा का शीर्ष ईशान्य की ओर होना चाहिए।
(इस के अलावा कर्मकांड प्रदीप के अनुसार भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक मास में मस्तक पूर्व की ओर करते हैं। मार्गशीर्ष, पौष, माघ मास में मस्तक दक्षिण की ओर करते हैं। फाल्गुन, चैत्र, वैशाख मास में मस्तक पश्चिम की ओर करते हैं तथा ज्येष्ठ, आषाढ़ एवं श्रावण मास में मस्तक उत्तर की ओर करते हैं। वास्तुशांति करनेवाला व्यक्ति तथा कर्मकांड प्रदीप के अनुसार कर्म करनेवाले पुरोहित को इस बातपर विचार कर वास्तुप्रतिमा निक्षेप करना उचित होगा।)

गृहप्रवेश मुहूर्त यदि प्रातःकाल अथवा मध्याह्न के बाद हो तब वास्तुशांति की
कौनसी विधि प्रथम करनी चाहिए तथा कौनसी विधि बाद में करनी चाहिए?
गृहप्रवेश व वास्तुप्रतिमा निक्षेप कब करना चाहिए?
गृहप्रवेश का मुहूर्त यदि प्रातःकाल का अर्थात् सुबह जल्दी का हो तो संकल्प, पुण्याहवाचन
कर अथवा गणेश पूजन कर समंत्रक गृहप्रवेश करना चाहिए। उसके उपरांत विधि-विधान के अनुसार वास्तुशांति कर वास्तुप्रतिमा निक्षेप करना चाहिए। परंतु यदि गृहप्रवेश का समय मध्याह्न के पश्चात् हो तो वास्तुशांति की पूर्ण विधि पहले संपन्न कर लेनी चाहिए तथा शुभ मुहूर्त की कालावधि में समंत्रक गृहप्रवेश कर वास्तुप्रतिमा निक्षेप करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि शुभ घड़ी समाप्त होने के पहले समंत्रक गृहप्रवेश होना चाहिए।

व्यावहारिक (लौकिक) गृहप्रवेश

अनेक बार ऐसा होता है कि वास्तु खरीदने तथा भवन निर्माण पूर्ण होने के बाद बहुत दिनों तक वास्तुशांति हेतु उचित मुहूर्त नहीं होता है। ऐसे समय यदि गृहप्रवेश करना हो तो लौकिक गृहप्रवेश मुहूर्तपर नए मकान में जा कर रह सकते हैं तथा आगे चलकर अपने तथा अपने पुरोहित की उपलब्धता के अनुसार वास्तु मुहूर्तपर वास्तुशांति कर सकते हैं।
इस तरह का लौकिक गृहप्रवेश करते समय निम्नलिखित विधि-विधान में से जो संभव हो वह कर गृहप्रवेश कर लेना चाहिए। उदकशांति अथवा ग्रहयज्ञ संपन्न कर रहना प्रारंभ कर सकते हैं अथवा जल से भरे कुंकुमार्चित कलश को कुंकुमार्चित अक्षतोंपर पूजा स्थान में स्थापित कर अपने इष्टदेवता की प्रतिमा रखकर पति-पत्नी ने उनकी यथावत पूजा करनी चाहिए। घरपर
वंदनवार अर्थात् तोरण लगाना चाहिए। पूजा आदि होने के पश्चात् गृहस्थी का अन्य सामान
रखना चाहिए। ऐसा किराए के मकान में रहने के लिए जाते समय भी करना चाहिए।

मूर्ति प्रतिष्ठा
ग्राह्य मास
सभी देवी/देवताओं हेतु - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, माघ (भगवान विष्णु के अतिरिक्त), फाल्गुन
केवल भगवान महादेव हेतु - आषाढ़, भाद्रपद (शुक्ल पक्ष) एवं मार्गशीर्ष
भगवान महादेव तथा भगवान विष्णु हेतु - श्रावण
सभी देवियाँ एवं भगवान विष्णु हेतु - आश्विन
मुख्य देवी देवताओं के अवतार स्वरूप देवी देवताओं की यदि प्रतिष्ठा करनी हो, तो मुख्य
देवताओं के लिए जो मुहूर्त होता है वही लेना चाहिए। उदा- भगवान महादेव हेतु जो मास दिए हैं उस मास में गणेश, हनुमान, भैरव, कार्तिकेय आदि की स्थापना कर सकते हैं। इसी तरह भगवान विष्णु के मुहूर्तपर श्रीराम, श्रीकृष्ण, पांडुरंग, नरसिंह आदि विष्णु स्वरूप मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा कर सकते है। गुरु तथा संतों की चरण पादुकाओं की स्थापना की जाती है, ऐसे समय वे जिस
देवता के उपासक थे उस देवता के मुहूर्तपर उनकी स्थापना कर सकते है। पादुकाओं के साथ प्रतिकात्मक रूप में संत तथा उपास्य देवता की मूर्ति विधिवत् स्थापन कर सकते है।
वर्ज्य तिथि - चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी (रिक्ता) वर्ज्य, कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल
प्रतिपदा तक वर्ज्य है।

भद्रा वर्ज्य, क्षयदिन, वृद्धिदिन, ग्रहणदिन, करिदिन वर्ज्य, रवि संक्रमण पुण्यकाल वर्ज्य,
गुरु/शुक्रास्त काल तथा अधिकमास वर्ज्य है।

(विशेषतः गणेशजी हेतु चतुर्थी, देवी हेतु नवमी तथा भगवान शिव हेतु आर्द्रा नक्षत्र ग्राह्य हैं। परंतु इन तिथियों या नक्षत्रों के दिन पंचांगशुद्धि आवश्यक हैं।)

ग्राह्य नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृग, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती,
अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शततारका, उत्तराभाद्रपदा, रेवती (आषाढ़ व मार्गशीर्ष मास में भगवान महादेव हेतु आर्द्रा नक्षत्र ग्राह्य हैं।)
वर्ज्य वार मंगलवार तथा शनिवार
वर्ज्य योग- वैधृति, व्यतीपात पूर्ण वर्ज्य हैं तथा विष्कुंभ योग के आरंभ के १ घं. १२ मि., व्याघात २ घं. ३६ मि., शूल के २ घंटे, वज्र के ३ घं. ३६ मि., गंड के २ घं. २४ मि., अतिगंड के २ घं. २४ मि. तथा परिघ का पूर्वार्ध वर्ज्य हैं।

मूर्ति खंडित हो गयी हो तो संकट समय में गुरु अथवा शुक्र के अस्तकाल में भी पुनः प्रतिष्ठा कर सकते हैं। उस अस्तंगत ग्रह का १०८ जप करें तथा सुवर्ण प्रतिमा का पूजन कर दान करने के पश्चात् मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा करनी चाहिए।
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वयोऽवस्था शांति !
कलियुग में मानव की आयु सौ वर्ष मानी गई हैं। आयु के ५० वर्ष समाप्त होने के पश्चात् आयु का अर्थात् जीवन का उत्तरार्ध प्रारंभ होता हैं। इस समयावधि में अनेकानेक आघात, बीमारी, इन्द्रियों का कमजोर होना आदि होने लगते हैं। इस समयपर अरिष्ट का निवारण हो तथा साथ ही शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहे, इसलिए ५० वर्ष की आयु के पश्चात् प्रति पांच वर्ष
के उपरांत वयोऽवस्था शांति करनी चाहिए ऐसा शौनकादिकोंने कहा हैं। इन शांतियों के भिन्न भिन्न नाम हैं १) ५० वें जन्मदिवसपर वैष्णवी शांति २) ५५ वर्ष की वर्षगांठपर वारुणी ३) ६० वें वर्षगांठपर उग्ररथ ४) ६५ वर्ष की वर्षगांठपर मृत्युंजय (महारथी) ५) ७० वें वर्षगांठपर भैमरथी ६) ७५ वर्ष की वर्षगांठपर ऐन्द्रिशांति ७) ८०/८१ की वर्षगांठपर सहस्रचंद्रदर्शन शांति ८) ८५
वीं वर्षगांठपर रौद्री शांति ९) ९० वीं वर्षगांठपर सौरी शांति १०) ९५ वीं वर्षगांठपर त्र्यंबक, ११) १०० वीं वर्षगांठपर महामृत्युंजय शांति का प्रावधान हमारे धर्मग्रंथों में हैं। वर्तमान में ६०, ७०, ७५ व ८१ वीं वर्षगांठपर शांति की जाती हैं। आयु के ५० वर्ष से १०० वर्ष तक की शांति संबंधी जानकारी "वयोऽवस्थाभिध शांति समुच्चय" (लेखक पं. नारायणशास्त्री आंजर्लेकर) इस पुस्तक में विधि-विधान के साथ दी गई हैं।
किसी कारण से यदि हम उपरोक्त शांति उक्त कालावधि में नहीं कर पाए तो गौणकाल में
अर्थात् ५० आयु की ५१ वें वर्ष में, ६० की ६१ वर्ष में कर सकते हैं। यह वर्षमान चांद्रमास के अनुसार माना जाए न कि अंग्रेजी वर्षमान के अनुसार।

इस शांति को संपन्न करते समय उस विशिष्ट वर्ष में जन्मनक्षत्र एवं जन्मतिथि के दिन पंचांगशुद्धि तथा अग्निवास देखकर करनी चाहिए। परंतु किसी अन्य कारण से यदि उस दिन शांति नहीं कर पाए तो किसी भी अन्य दिन करते समय चंद्रबल, पंचांगशुद्धि व अग्निवास देखकर कर सकते हैं।
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सहस्रचंद्रदर्शन शांति कब करनी चाहिए?
सहस्रचंद्रदर्शन विधि संपन्न करने का सौभाग्य पहलीवाली पीढ़ी में बहुत कम व्यक्तियों को
प्राप्त होता था। परंतु आजकल बहुत से लोग ८१ वर्ष की आयु पूर्ण करते हैं। ऐसे वृद्ध लोगों का शेष जीवन निरामय रहे तथा अपमृत्यु ना आये इसलिए सहस्रचंद्रदर्शन विधि संपन्न किया जाता हैं। सहस्रचंद्रदर्शन यानि १००० चंद्रदर्शन होना। अमावस्या के बाद प्रथम चंद्रकला का दर्शन होना चंद्रदर्शन माना जाता है। अर्थात् १००० चंद्रदर्शन यानि १००० महीने जीवित रहना ऐसा अर्थ हैं। वयोऽवस्थाभिध शांति यानि विशिष्ट उम्र प्राप्त करने के पश्चात् की जानेवाली शांति। आयु का संबंध चांद्रमास से है। ८० वर्ष और १० मास में आनेवाले पुरुषोत्तम मास इस में
शामिल हैं। पुरुषोत्तम मास के साथ १००० मास में एक हजार चंद्रदर्शन अर्थात् ८० वर्ष व १० महीने पूरे होने के उपरांत अर्थात् ८१ वर्ष समाप्त होने के उपरांत का जन्मदिवस, जन्म नक्षत्र या चंद्रबल तथा पंचांगशुद्धि व अग्निवास देखकर ही सहस्रचंद्रदर्शन की विधि करनी चाहिए। शौनकादिक कुछ ऋषियों के मतानुसार ७९ वर्ष पूर्ण होने के पश्चात् भी सहस्रचंद्रदर्शन शांति की जा सकती हैं। चंद्रदर्शन तिथिगणित भूमध्य पद्धति से होने के कारण अमावस्या के पश्चात् १२ अंश का अंतर होना (प्रतिपदा) अर्थात् चंद्रदर्शन होना यह घटना घटती हैं। सहस्रचंद्रदर्शन के लिए चंद्रदर्शन की गणना करते समय कुछ लोग अमावस्या के पश्चात् होनेवाले चंद्रदर्शन के साथ खग्रास चंद्रग्रहण के पश्चात् होनेवाले चंद्रदर्शन का भी समावेश करते हैं। कोई भी खग्रास चंद्रग्रहण संपूर्ण पृथ्वीपर दिखाई नहीं देता हैं। पृथ्वी के कुछ प्रदेशों में ग्रहण होता हैं, तो कुछ प्रदेशों में नहीं होता है। इसलिए खग्रास चंद्रग्रहण से चंद्रदर्शन का संबंध जोड़ना उचित नहीं हैं,
तथा पूर्णिमा के दिन संपूर्ण चंद्रबिंब दिखाई देता हैं। मात्र ग्रहण की कालावधि में कुछ मिनटों तक ग्रास होने के पश्चात् फिर से चंद्र दिखाई देना यह चंद्रदर्शन नहीं हैं। अमावस्या के पश्चात् चंद्रमा की प्रथम कला दृष्टिगत होना इसे चंद्रदर्शन कहते हैं। वस्तुतः कोई भी व्यक्ति १००० बार इस प्रकार से होनेवाला चंद्रदर्शन नहीं कर सकता। इसलिए यहाँपर खगोलीय गणित के अनुसार होनेवाला चंद्रदर्शन ही अभिप्रेत हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि सहस्रचंद्रदर्शन अर्थात् १००० मास
की आयु पूर्ण होना है और इसलिए वयोवस्थाभिध शांति कर उस व्यक्ति का यथोचित सम्मान करना हैं।

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