प्रकरण ३ - उपनयन संस्कार

प्रकरण ३ - उपनयन संस्कार

    उपनयन हेतु शास्त्रोक्त मास, वार, तिथि, नक्षत्र आदि-

    मास - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन मास ग्राह्य हैं।

    तिथि -शुक्ल २, ३,५,६, १०, ११, १२ तथा कृष्ण २, ३, ५, ६ ये तिथियाँ ग्राह्म हैं। कृष्ण १३, १४, ३० ये तिथियाँ एवं शुक्ल १ का पूर्ण दिन वर्ज्य हैं, तथा क्षयदिन / वृद्धिदिन वर्ज्य हैं।४,९, १४ ये तिथियाँ रिक्ता मानी जाती हैं अतः वर्ज्य हैं, चतुर्थी युक्त पंचमी ग्राह्य हैं परंतु नवमीयुक्त दशमी वर्ज्य है।

    शनिवार वर्ज्य है

    वर्ज्य प्रदोष-तृतीया तिथिपर रात्रि के पहले प्रहर में यदि चतुर्थी हो तो तृतीया वर्ज्य हैं। ष्ीतिथिपर रात्रि के पहले डेढ़ प्रहर में सप्तमी हो तो षष्ठी वर्ज्य हैं। द्वादशी तिथिपर रात्रि के पूर्वार्थमें त्रयोदशी (तेरस) हो तो द्वादशी वर्ज्य हैं।

    हैं।वर्ज्य नक्षत्र - भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा तथा ग्रहणनक्षत्र (६ मास तक) वर्ज्य

    वर्ज्य योग- वैधृति, व्यतीपात पूर्ण वर्ज्य हैं तथा विष्कुंभ योग के आरंभ के १ घं. १२ मि.,व्याघात २ घं. ३६ मि., शूल के २ घंटे, वजन के ३ घं. ३६ मि., गंड के २ घं. २४ मि., अतिगंड के२ घं. २४ मि. तथा परिघ का पूर्वार्ध वर्ज्य हैं।

    विष्टी करण की कालावधि पूर्णतः वर्ज्य है।

    अधिकमास, ग्रहणदिन, करिदिन, संक्रमण पुण्यकाल, गुरु/शुक्र अस्तकाल वर्ज्य हैं। अस्तके पूर्व ३ दिन (वार्धक्य) तथा उदय के बाद ३ दिन (बाल्यत्व) वर्ज्य हैं।

    सूचना - उपनयन के पश्चात् वेद पाठशाला में जाकर वेदाध्ययन करनेवाले माघ आदि५महिनों में ऊपर बताए गए तिथि आदि के नियमों का पालन कर उपनयन करें।

    टिप्पणी - वर्तमान समय में कहीं-कहीं बालिकाओं का भी उपनयन किया जाता है उसे प्रत्यवाय नहीं है,परंतु केशखंडन न करें।
    वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वेदाध्ययन न करनेवाले गौणकाल में उपनयन कर सकते हैं।

    वेदाध्ययन करने के लिए बच्चों का उपनयन (जनेऊ) किया जाता है। परंतु वर्तमान समयमें उपनयन कर वेदाध्ययन करनेवाले बालकों की संख्या २ या ३ प्रतिशत है। उपनयन संस्कारकरने के पश्चात् वेदाध्ययन न कर शालेय शिक्षा प्राप्त कर नौकरी या व्यवसाय करनेवाले ९८प्रतिशत हैं, अतः वर्तमान समय में उपनयन विधिवत् संस्कार ना होते हुए मात्र लौकिक हो गयाहै। विदेश में रहनेवाले भारतीय जुलाई, अगस्त या दिसंबर, जनवरी में यहाँ भारत में आकरअपने बच्चों का उपनयन संस्कार संपन्न कराते हैं। मुहूर्तशास्त्र का अभ्यास न होने के कारणज्योतिष के अभ्यासक तथा पुरोहित इस समय के मुहूर्त नहीं निकाल पाते है। अतः केवललौकिक समारोह हेतु उपनयन करनेवाले आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्षतथा पौष आदि गौणकाल में उपनयन मुहूर्त के नियमों का पालन कर उपनयन संस्कार संपन्नकर सकते हैं। इस तरह के संस्कार में गुरु - शुक्र इन दोनों में से किसी एक के अस्त होनेपर भीअस्तकाल ग्राह्य माना जा सकता है।

    यद्येकस्यापि मूढत्वे शुभंकर्म न दोषकृत्। द्वयोर्मूढत्वमेवोक्तं दोषदं गुरूशुक्रयोः।।(मुहूर्तसंधु, अपवाद प्रकरण, श्लोक २३ बृहस्पति का मत।)

    (गुरु अथवा शुक्र के अस्तकाल में उपनयन करते समय उस अस्तंगत ग्रह के मंत्र का १०८जप कर सुवर्णप्रतिमा का पूजन व दान करना चाहिए।) गौणकाल/चातुर्मास में मंगलकार्य करते.समय विष्णु की सुवर्ण प्रतिमा का पूजन तथा दान करें।

    उपनयन के पश्चात् वेदाध्ययन करनेवाले माघ आदि ५ मास में शास्त्रोक्त मुहूर्तपर हीउपनयन करें।

    सूचना - उपनयन के पश्चात् वेद पाठशाला में जाकर वेदाध्ययन करना हो तो गौणकाल/अस्तकाल में उपनयन नहीं करना चाहिए।

    उपनयन हेतु मुख्यकाल (आयु) तथा गौणकाल कौनसा है?

    उपनयन हेतु जन्म के बाद आठ वर्ष की आयु मुख्यकाल है। यदि आवश्यकता हो तो गर्भधारणसे आठ वर्ष भी मुख्यकाल माना जाता हैं। आठ वर्ष की आयु के बाद १६ वें वर्ष तक गौणकाल

    माना जाता है। गौणकाल के पश्चात् उपनयन करना हो तो बटुक प्रायश्चित्त करके उपनयन करें।

    द्विज किसे कहते हैं?

    उपनयन को दूसरा जन्म माना जाता है, अतः जिसका उपनयन होता है उसे द्विज कहते हैं।

    उपनयन संस्कार के समय पिता न हो तो अधिकारी कौन?

    पिता ना हो तो दादा, ताऊ, चाचा, सगोत्री, सपिंडी रिश्तेदार अथवा गोत्र के बाहर के परंतु सर्पिटीयानि नाना, मामा, मौसाजी, फुफाजी यह आप्त अधिकारी माने जाते हैं। (उपनयन संस्कार संपन्नकरानेवाला व्यक्ति जिसका उपनयन होनेवाला है उससे आयु में बड़ा होना चाहिए तथा उपनीत भीहोना चाहिए।) यदि कोई भी आप्त, स्वकीय ना हो तो आचार्य उपनयन करने के अधिकारी हैं।

    • दो सगे भाईयों का उपनयन एक ही दिन तथा एक ही मंडप में करने के विषय में

    उपनयन के पश्चात् वेदाध्ययन करनेवाले दो भाई (जुड़़वा ना हो तो) एक ही दिन तथा एकही मंडप में उपनयन ना करें। उपनयन के बाद शालेय शिक्षा लेनेवाले तथा लौकिक समारोह हेतउपनयन करनेवाले दो भाईयों का उपनयन एक ही दिन तथा एक ही मंडप में कर सकते हैं। परंतुउन दोनों के लिए संस्कार विधि दो पंडितों से स्वतंत्र करवाना चाहिए। पिता और चाचा आदि कोआचार्य बनना चाहिए। परंतु गायत्री का उपदेश दोनों भाईयों को पिता से ही करवाना चाहिए।(जुड़वा भाईयों का उपनयन एक ही दिन तथा एक ही मंडप में कर सकते हैं।)

    द्विज्येष्ठ वर्ज्य योग का परिहार

    ज्येष्ठ पुत्र का उपनयन ज्येष्ठ मास में वर्जित है। इसे ही द्विज्येष्ठ वर्ज्य योग कहते हैं। यदिबालक ज्येष्ठ नहीं हो तो उसका उपनयन ज्येष्ठ मास में कर सकते हैं। परंतु यदि सूर्य कृत्तिकानक्षत्र से आगे रोहिणी, मृग नक्षत्र में हो तो ज्येष्ठ मास में भी ज्येष्ठ पुत्र का उपनयन कर सकतेहैं। ऐसे समय द्विज्येष्ठ वर्ज्य योग का दोष नहीं रहता है।

    कृत्तिकास्थ रवि त्यकत्वा ज्येे ज्येस्य कारयेत। (संदर्भ-मुहूर्त चिंतामणि, ज्येष्ठे विशेषः)

    • शुभकार्य के कुछ दिन पूर्व सपिंडों का सूतक आनेपर उपनयन कब कर सकते हैं?

    अ) माता-पिता, दादा-दादी, संयुक्त परिवार में सगा भाई, अविवाहित बहन आदि के मृत्युपरसूतक में कार्य नहीं कर सकते, परंतु १४ दिन के पश्चात् क्रियाकर्म होने के बाद विनायक शांति कर के शुभ मुहूर्त देखकर मंगलकार्य कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त चाचा, ताऊ, चचेरे आदि सपिंडों के निधनपर यदि सूतक कालावधि में मुहूर्त का दिन होनेपर कूष्मांड होम कर के अथवा सर्व प्रायश्चितर्थ प्रजापति के लिए समस्त व्याहृति मंत्र से घृत की १०८ आहुति देकर उस कर्म हेतु सूतक की निवृत्ति कर के देवता स्थापना आदि मंगलविधि तथा मंगलकार्य कर सकते हैं। उपनयन मुहूर्त के पूर्व ६ दिन देवता-स्थापना कर सकते हैं। (उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह। निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्थ) (विवाह प्रकरण में कार्यारंभ और अशौच विचार देखें।)दिनों की गणना करते समय देवता उत्थापन का दिन महत्त्वपूर्ण है। देवता स्थापना हो गई हो और सपिंडों का सूतक आया हो तो कूष्मांड होम किए बिना ही कार्य संपन्न कर सकते हैं।(संदर्भ-निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वा्ध)

ब) सपिंडों का जननाशौच (बच्चे के जन्म के बाद का सूतक) आया हो तो मुहूर्त का दिन
होनेपर कूष्मांड होम कर के अथवा सर्व प्रायश्चित्तार्थ प्रजापति के लिए समस्त व्याहृति मंत्र से घृत की १०८ आहुति देकर उस कर्म हेतु सूतक की निवृत्ति कर के देवता स्थापना आदि मंगलविधि तथा मंगलकार्य कर सकते हैं। परंतु देवता स्थापना हो गई हो और सपिंडों का सूतक आया हो तो कूष्मांड होम किए बिना ही कार्य संपन्न कर सकते हैं। (निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध) (विशेष निर्णय के लिए अशौच पालन प्रकरण देखें।)

वर्तमानकाल में अशौच पालन के नूतन नियमों के अनुसार यदि अशौच निवृत्ति हो रही हो, तो मंगलकार्य के लिए कूष्मांड होम तथा व्याहृति होम करने की आवश्यकता नहीं है।

उपनयन से पूर्व कितने दिनों तक माता को रजोदर्शन स्थिति प्राप्त हो तो श्री
पूजनादि शांति कर के उपनयन कर सकते है? 
वाक्यसार ग्रंथ में कहा गया हैं कि यदि देवता स्थापना नहीं हुई हो और स्त्री रजस्वला हो गई हो, तो ऐसे संकटकाल में श्री पूजनादि शांति करवा के कार्य संपन्न करना चाहिए। (उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह)
वर्तमान में उपनयन का दिन इसका अर्थ वही दिन ऐसा नहीं है। मुहूर्त के पहले ५ दिन तक
रजस्वला होनेपर श्री पूजनादि शांति करवा के देवकार्य, देवतास्थापन कर के उपनयन कर सकते हैं। श्री पूजनादि शांति करना अशक्य होनेपर उस देवता के प्रीत्यर्थ १०८ जप कर कार्य करें और कार्य के पश्चात् तुरंत श्री पूजनादि शांति करनी चाहिए।
(अधिक जानकारी के लिए रजस्वला की शुद्धि का प्रकरण देखें।)

देवता स्थापना व उसका उत्थापन (विसर्जन) कब करना चाहिए?
संकटकाल में उपनयन हेतु देवता (मंडप देवता) ६ दिन पूर्व बिठा सकते हैं। परंतु तीसरे दिन उसे उठा नहीं सकते। देवता स्थापना के बाद तीसरे दिन मंगलकार्य संपन्न कर सकते है और चौथे दिन उत्थापन करें। वर्तमान समय में उपनयन जिस स्थलपर संपन्न होनेवाला है, उसी दिन यानि उपनयन के दिन देवता स्थापना की जाती है। तथा उसी दिन कार्य संपन्न होने के पश्चात् उत्थापन करते है।

• मंडप देवता की स्थापना करने के बाद यदि अमावस्या या श्राद्धदिन आया तो वार्षिक श्राद्ध अथवा अमावस्या को ध्यान में रखकर ही मुहूर्त निश्चित करें। अपितु किसीकारणवश ऐसा होनेपर मंगलकार्य संपन्न होने के पश्चात् व्यतीपात, कृष्ण अष्टमी अथवाअमावस्या इन में से किसी भी दिन अंतरित श्राद्ध कर सकते हैं।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नवरात्री में देवी के दिव्य पाठ एवं 7 शक्तिशाली रक्षक पाठ

समपूर्ण नरसिंह आराधना जयंती विशेष

सम्पूर्ण गणेश उपासना स्तोत्र मन्त्र सहित