1. रात्री में मिठाई न खावें।
2. दही से सिर धोवें या दूध से।
3. पक्षियोंको जवार चुगावे।
4. काली गाय का दान करें या सेवा करें।
हमारा अनुभव - यह शुक्र मेष, सिंह या धनु राशि में हो तो नौकरी से धनार्जन होता है। पैतृक सम्पत्ति मिलती है किन्तु टिक नही सकती। सट्टा, लॉटरी, रेस आदि का शौक होता है। एकदम बहुत धन प्राप्त करना चाहते है किन्तु सफल नही होते। वृषभ, कन्या, मकर इन राशियों में यह शुक्र हो तो पैतृक सम्पत्ति या तो होती ही नही और हो भी तो मिलती नही। सरकारी नौकरी में प्रगति करते है। पत्नी हमेशा बीमार रहती है। रोगों के उपचार में बहुत खर्च होता है। कुछ व्याभिचारी प्रवृत्ति होती है। स्त्रियों के सम्बन्ध से धन प्राप्त होता है। वाणी मधुर और लेखन अच्छा होता है। कवि हो सकते है। मिथुन, तुला या कुम्भ में यह शुक्र हो तो व्यापार में प्रगति होती है। पूर्वार्जित इस्टेट मिलती है। व्यापार में प्रगति के साथ पुत्र न होने की चिन्ता बनी रहती है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में यह शुक्र हो तो लेखनद्वारा प्रसिद्ध होते है। स्त्रीसुख कम मिलता है। अपत्यों में लड़कियां ज्यादा होती है। द्विभार्यायोग हो सकता है। धनस्थान के शुक्र का सामान्य फल यह है कि इन के धनार्जन में सतत स्थिरता नही होती। किन्तु धन की बहुत कमी भी कभी नही होती। विवाह के बाद भाग्योदय होता है और पत्नी की अच्छी मदद होती है। उच्च वर्गो में २३ वें वर्ष से और हलके वर्गो में छोटी आयु में ही धन मिलना शुरू हो जाता है। स्त्री भी धनार्जन करती है। आयु का पूर्वार्ध कष्टकर और मध्यकाल सुखसमृद्धि का होता है। मृत्यु के बाद पत्नी की स्थिति खराब होती है। ३२ वें वर्ष आकस्मिक हानि और ३८ वें वर्ष आकस्मिक धनलाभ का योग होता है। लग्न मेष हो तो विवाहित स्त्री से हमेशा झगड़ा होता है धन और तृतीयस्थान में रवि और बुध का योग हो तो ज्योतिष में अच्छा प्रवेश होता है। इनका शुभ फलों का वर्णन अनुभव में उत्तम आता है।
द्वितीय स्थान का शुक्र जातक को साँदर्य एवं प्रभावी वाणी देता है। जातकबोलने में तो चतुर होता है, साथ में लेखक एवं कवि भी रहता है। आर्थिकसंपन्नता इस शुक्र के कारण ही प्राप्त होती है। ऐसा जातक कामातुर, भोगी,विलासी एवं शाही मिजाज का होता है। कुछ जातक कलाकार होते हैं तो कुछजातक अपनी प्रभावी भाषण शैली के कारण सभा-सम्मेलनों में एक अलग हीसमां बांधते हैं। जातक आस्तिक एवं परंपरागत रूढ़ियों के पालनहार भीं होतेहैं। कुलपरंपरा से इनकी कुलस्वामिनी ही देवी होती है लेकिन कुलदेवता कायूजन भी भाग्योदय में सहायक बनता है। कुछ आचायोँ के मतानुसार घन स्थानमें स्थित शुक्र परकीय धन प्राप्त कराता है। संतान सुख उत्तम रहता है। समाजमें ख्याति, सरकारी नौकरी एवं बंधुजनों से मान प्राप्त होता है।
ऐसा जातक व्यापार में काफी धन कमाता है। उसे चांदी या शीशे के व्यापारमें लाभ होता है। धन स्थान में स्थित शुक्र एवं धनेश कमजोर हों या 6, 8,12 में से किसी स्थान में बैठे हों तो नेत्ररोग होते हैं। धन स्थान में शुक्र केसाथ चंद्र हो तो जातक को रतौंधी होती है, पारिवारिक सुख से वाचित रहनापड़ता है। मन अस्थिर एवं आंखें कमजोर रहती हैं। 32वां वर्ष उपलब्धियों काहोता है। इस काल में लाभ के मौके आते हैं एवं भोगविलास भी प्राप्त होता है।
पाशचात्य विद्वानों के मंतानुसार द्वितीय स्थान का शुक्र जातक को विजयी बनाताहै। जातक शृंगारप्रिय एवं भोगी रहता है। व्यापार में सफल होकर सामाजिकप्रतिष्ठा प्राप्त करता है। धन स्थान में स्थित शुक्र पर शनि की दृष्टि लाभदायकहोती है। किंतु धन स्थान में शुक्र-शनि युति अच्छी फलदायक नहीं होती है।शुक्र पापग्रह से युक्त धन स्थान में हो तो जातक शराबी एवं दुराचारी बनताहै। यवन ज्योतिषविदों के अनुसार धन स्थान में स्थित शुक्र शुभ फलदायी रहताहै। जातक को 60वें वर्ष में संपत्ति लाभ होता है, यह उनका विशेष मत है।
द्वितीय भावः धन भावस्थ शुक्र जल तत्वीय राशि में हो तो दाम्पत्य सुखमें कमी आती है। लड़कियां अधिक उत्पन्न होती हैं। जातक लेखन से मान-सम्मानपाता है लेकिन दूसरे विवाह की सम्भावना रहती है। वायु त्वीय राशि में हो तोजातक व्यापार में अच्छा धनार्जन कर लेता है। लेकिन भोगने वाला (पुत्रसंतान) न होने से सदैव चिंता करता रहता है। पृथ्वी राशि का शुक्र हो तोपैतृक संपत्ति का सुख प्राप्त नहीं होता। प्रथम तो पैतृक संपत्ति होती ही नहीं,होती भी है तो मिलती नहीं। पत्नी के स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती है, आय काकाफी धन बीमारी पर व्यय हो जाता है, राजकीय नौकरी में उन्नति होती है।अग्नि राशि का शुक्र हो तो जातक शीघ्रातिशीघ्र धन कुबेर बनने का प्रयत्करता है। फलत: जुआ, सट्टा, लॉटरी आदि में धन का अपव्यय करता है औरमिली पैतृक संपत्ति को नष्ट कर डालता है। नौकरी न रहे तो खाने के भी लालेपड़ सकते हैं। धनेश निर्बल हो तथा चंद्र से युक्त शुक्र धन स्थान में हो तो नेत्ररोग होते हैं, विशेषत: जब धनस्थान में कन्या, मकर और मीन राशि हो। शनिसे योग करता हो तो धनाभाव बना रहता है।
1. मेष मेष राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक भ्रमणप्रिय, विद्वान,लोभी, समर्थ, प्रभावी, अधिकारसंपन्न, परस्त्री एवं संपत्ति में आसक्त एवंकामातुर रहता है। आर्थिक मामलों में ऐसे जातक को सावधान रहना चाहिए।दूसरों को दिया गया धन लौटकर नहीं आता।
2.वृषभ वृषभ राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक लोभी, आलसी,नास्तिक एवं गर्ममिजाज होता है। पत्नी अच्छी नहीं मिलती। उसका स्वभावगर्म रहता है। वैवाहिक एवं संतान सुख में न्यूनता रहती है।
3. मिथुन मिथुन रशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक संपन्न, गुणवान, विद्वान, यशस्वी, आस्तिक एवं जमीन-जायदाद से युक्त, शरीर सेहृष्ट-पुष्ट एवं दीर्घायु होता है। जातक को जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है,शरीर लंबा-चौड़ा होते हुए भी रोगग्रस्त रहता है। वह अपने समाज का नेताया गांव का अगुआ या सरपंच होता है।
4. कर्क कर्क राशि का शुक्र द्वितीय स्थान में हो तो जातक के संपन्न,गर्ममिजाज होते हुए भी कई मित्र होते हैं। पेट की बीमारी रहती है। जातकगायक, कवि, लेखक या कलाकार होता है। जीवन संघर्षयुक्त रहता है। वहसमाज में विख्यात एवं अधिकारसंपन्न रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र द्वितीय स्थान में हो तो जातक संपन्न, दीर्घायु,उद्यमी, धैर्यवान, यशस्वी, विद्वान एवं मातृ-पितृभक्त रहता है। वह परस्त्री एवंपर-संपत्ति को भोगता है और संतान सुख से परिपूर्ण एवं जमीन-जायदाद सेयुक्त रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र द्वितीय स्थान में हो तो जातक अतिकामातुर,लोभी, संपन्न, गुणवान, आस्तिक, मातृभक्त, विद्वान, कटुभाषी एवं स्पष्ट वक्ताहोता है। अपने अधिकारों के कारण वह प्रसिद्ध रहता है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक धनवान,स्वाभिमानी, उद्यमी, पराक्रमी, विद्वान एवं समाज में प्रतिष्ठित रहता है। संतानकर्तव्यपालन करनेवाली रहती है। किंतु दो-तीन विवाह करने पर भी पुत्र नहींहोता। अपघात के कारण जातक के चेहरे पर कोई विकृति होने की संभावनारहती है। उसे परसंपत्ति का लाभ प्राप्त होता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक विद्वानकिंतु लोभी होता है, तस्करी का व्यापार करता है। आर्थिक दृष्टि से जीवनयशस्वी रहता है। शरीर की बनावट अच्छी रहती है और जातक निरोगी एवंदीर्घायु होता है। अनेक स्त्रियों से जातक के संबंध बनते हैं।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक आलसी, कामातुररहता है एवं अनेक स्त्रियों से उसका संबंध रहता है। पत्नी का स्वभाव तेजरहता है। दोनों की आपस में नहीं बनती। पत्नी में संतानोत्पादक शक्ति कमहो सकती है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक आस्तिक,सुखी, सभी साधनों से युक्त, परकीय संपत्ति का भोग करनेवाला, अनायासधन कमानेवाला, उत्कृष्ट वक्ता, उच्चपदस्थ, चतुर किंतु रोगी रहता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र धन स्थान में हो तो जातक संपन्न, संगीत,काव्य, साहित्य एवं ललितकला में रुचि रखनेवाला, कटुवक्ता, गर्ममिजाजरहता है। इसके मित्र बहुत होते हैं किंतु परिवार के सुख में न्यूनता रहती है।
12. मीन-मीन राशि का शुक्र द्वितीय स्थान में हो तो जातक उद्यमी, संपन्न,गुणवान, विद्वान, धार्मिक, सत्कर्मी एवं लोकप्रिय होता है। जमीन-जायदादकाफी रहती है। वाहनों से कष्ट होता है।
1. भैंस पाले।
2. गाय का घी मंदिर में देवें।
3. तांबे के बर्तन मंदिर मेंदान करें।
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3) तृत्तीयभाव - तृतीय स्थान (सहज भाव)
तिसरे स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - इन्होंने तृतीय में के गुरु के समान ही शुक्र के फल बतलाये है।
पराशर - शत्रुवृद्धि धनक्षयम्। शत्रु बढ़ते है और धन कम होते जाता है।
कल्याणवर्मा - सुखधनसहित शुक्रो दुश्चिकये स्त्रीजितं तथा कृपणम्। जनयति मन्दोत्साहं सौभाग्यपरिच्छदातीतम्।। यह सुखी, धनवान, कंजूस तथा स्त्री के अधीन होता है। उत्साह कम होता है। वसिष्ठ - सुविनीतवर्षं, सौख्यं। तरह तरह के वेष धारण करता है। सुखी होता है।
वैद्यनाथ - शुक्रे सोदरगे सरोषवचन: पापी वधूनिर्जितः। यह कोध से बोलता है, पापी और स्त्री के अधीन होता है। सोदरारातिगः शुक्रः शोकरोगभयप्रदः । तत्रैव शुभकारी स्यात् पुरतो यदि भास्करात्।। तृतीय और षष्ठ में शुक्र हो तो शोक, रोग और भय प्राप्त होते है। किन्तु यह रवि के आगे हो तो शुभ फल देता है।
गर्ग - भ्रातृस्थाने भृगोः पुत्रे भगिन्यो बहुलाः स्मृताः । भ्रातरश्च त्रयः प्रोक्ताः क्रूरेण निधनं गताः।। इसे बहुत बहने होती है और तीन 'भाई होते है। साथ में क्रूर ग्रह हो तो उनकी मृत्यु होती है। सहजस्थानगो दत्ते गौरांगी भगिनीं 'भृगुः। इसकी बहन गौर वर्ण की होती है। अशीतिनाथो भृगुनन्दनः। इस का परिवार ८० लोगों का होता है।
बृहद्यवनजातक सहजग सहजैः परिवारितो भृगुसुते पुरुषः पुरुषैर्नतः। स्वजनबन्धुविबन्धनतांगतः सततमाशुगर्तिर्गतिविक्रमः ।। यह बन्धुओं से युक्त होता है। शीघ्र काम करनेवाला, उत्साही, अपने लोगों को बन्धन से छुडानेवाला और सन्माननीय होता है। रत्ननखतः प्रकरोति चार्थम्। २९ वें वर्ष धनलाभ होता है।
ढुंढिराज - कृशांगयष्टिः कृपणो दुरात्मा द्रव्येण हीनो मदनानुतप्तः। सतामनिष्टो बहुदुष्टचेष्टो भृगोस्तनूजे सहजे नरः स्यात् ।। यह कृश, दुबला, कंजूस, दुष्ट, निर्धन, कामुक और सज्जनों को कष्ट देनेवाला होता है।
नारायण भट्ट - रतिः स्त्रीजने तस्य नो बन्धुनाशो गुरुर्यस्य दुश्चिक्यगोदानवानाम्। न पूर्णो भवेत् पुत्रसौख्येऽपि सेनापतिः कातरो दानसंग्रामकाले ।। इसे स्त्रीपुत्रों का सुख प्राप्त नही होता। बन्धुओं का नाश होता है। यह डरपोक और कंजूस होता है।
आर्यग्रन्थकार - सहजमंदिरवर्तिनि भार्गवे प्रचुरमोहयुतो भगिनीसुतः । भवति लोचनरोगसमन्वितो धनयुतो प्रियवाक् च सदंबरः ।। यह मोहयुक्त, धनी, मधुर बोलनेवाला और अच्छे कपडे पहननेवाला होता है। इसे आँखो के रोग होते है।
मन्त्रेश्वर - विदारसुखसंपदं कृपणमप्रियं विक्रमे। स्त्री, सुख तथा धन से रहित, कंजूस और लोगों को अप्रिय होता है।
जयदेव - कृशो दुरात्मा कृपणोऽधनोऽस्मरः कुचेष्टितोऽनिष्टकर- स्तृतीयगे। यह दुबला, दुष्ट, कंजूस, निर्धन, अनिष्ट काम करनेवाला और कामसुख से रहित होता है।
काशीनाथ - भार्गवे सहजे जातो धनधान्यसुतान्वितः । निरोगी राजमान्यश्च प्रतापी चापि जायते।। यह धन, धान्य तथा पुत्रों से युक्त, निरोगी राजा को माननीय तथा प्रतापी होता है।
जागेश्वर - कृशाङ्गो रतिः स्त्रीजने कातरोऽसौ रणे वै सुताद् दुःखितो द्रव्यशून्यः । नरःस्याद् दुराचारयुक्तो न जायाप्रसूतिर्भवेद् भूयसी भ्रातृशुक्रे।। दुबला, कामुक, युद्ध में डरनेवाला, निर्धन, दुराचारी होता । इस की पत्नी बहुत बार प्रसूत नही होती। पुत्र से दुःख होता है।
जीवनाथ -नारायण भट्ट के समानही फलवर्णन है। गते भ्रातुःस्थानं जनुषि यदे शुक्रे तनुभृतामतिप्रीतिः शश्वत् कमलवदनायां सिर्फ स्त्री पर बहुत आसक्त होना। यह फल अधिक कहा है।
हरिवंश – तृतीयगेहगे भृगौ कृशांग आतुरः पुमान् उद्यमी दुराग्रही सुशीलसत्यवर्जितः । कुकामुकः कलिप्रियः कलत्रकर्मकारको भवेत् पराभवौ परैः सहोदरैः समन्वितः।। यह दुबला, आतुर, उद्योगी, दुराग्रही, शीलरहित, झूठ बोलनेवाला, अवैध मार्ग से कामसुख प्राप्त करनेवाला, झगडालू, स्त्रियों के काम करनेवाला, शत्रुओं द्वारा पराभूत होनेवाला होता है।
लखनऊ के नवाब - जोहरा भवति बिरादरखाने चेन्मानावे जातः । जोरावरो हरीशः सालस्यः सानुजः साश्वः ।। यह सिंह जैसा बलवान किन्तु आलसी होता है। भाईयों से युक्त और घोड़े पालनेवाला होता है।
घोलप - यह जीवनभर स्त्रीधन का उपभोग करता है। सुशोभित, शत्रुरहित, सदाचारी, बन्धुसुख से युक्त और विपत्तिरहित होता है।
गोपालरत्नाकर - माता के पक्ष की वृद्धि होती है। यह दाक्षिण्ययुक्त, बलवान और लोभी होता है।
हिल्लाजातक - तृतीयोः तीर्थनिरतम्। यह हमेशा तीर्थयात्रा करता है।
यवनमत - यह आलसी और सुस्त होता है। नींद बहुत आती है। हमेशा स्त्रीयों को खुश करने में लगा रहता है।
पाश्चात्य मत - इसे बन्धु, मित्र, पडोसी आदि से अच्छी मदद होती है। पढ़ने की रुचि होती है। कलाओं का ज्ञाता, भाषाशास्त्रज्ञ, कवि, गायक या चित्रकार होता है। यह शुक्र अशुभ योग में हो तो व्याभिचारी, रंगीला होता है और उसे बहुत नुकसान सहना पड़ता है। यह आनन्दी और उत्साही होता है। प्रवास सुखपूर्ण होते है और प्रवास करते समय नये परिचय होते है। पत्रव्यवहार से भी मित्रता बढ़ती है। इसी प्रकार विवाह की बातचीत पक्की होती है।
भृगुसूत्र - अतिलुब्धः । दाक्षिण्यवान्। भ्रातृवृद्धिः । संकल्पसिद्धिः । पश्चात्सहोदराभावः । क्रमेण भ्रातृतत्परः । वित्तभोगपरः । भावाधिपतौ बलयुते उच्चस्वक्षेत्रे भ्रातृवृद्धिः। दुःस्थाने पापयुते भ्रातृनाशः ।। यह बहुत लोभी, नम्र, संपत्ति का उपभोग करनेवाला होता है। भाईयों की वृद्धि होती है। छोटे भाई नही होते। मन के विचार सफल होते है। तृतीयेश बलवान, उच्च में या स्वगृह में हो तो भाइयों की वृद्धि होती है। वही अशुभ स्थान में या पापग्रह से युक्त हो तो भाईयों का विनाश होता है।
हमारे विचार - इस स्थान में कुछ शास्त्रकारों ने शुभ और अन्य शास्त्रकारों ने अशुभ फल कहे है। यदि शुक्र इस स्थान में अकेला हो तो अशुभ फलों का अनुभव मिलेगा। रवि यदि धन, तृतीय या चतुर्थ स्थान में हो तो भी अशुभ फल मिलेंगे। लग्न में या पंचम में रवि हो तो शुभ फलों का अनुभव मिलेगा। हमारे विचार से शुक्र के लिए यह स्थान बहुत अशुभ है।
तृतीयस्थ शुक्र अधिक वाहन, नेत्रोगों, धन संपत्ति, मधुर वाणी,सुन्दर परिधान तथा संबंधियों के प्रति अनुराग प्रदान करता है।
-मानसागरी
होगा।जातक कंजूस, लोकप्रियता रहित, विपन्न, पत्नी-युक्त और प्रसन्न
-फलदीपिका
तृतीयस्थ शुक्र प्रसन्नता, धनाढ्यता आदि देता है। जातक महिलाओंसे पराजित, उत्साही और भाग्यहीन तथा व्यभिचारी होगा।
-सारावली
जातक कंजूस, सहनशील, बहुत से भाईयों वाला होगा। यदि तृतीयेशबलवान है तो वह संकल्प द्वारा प्रयासों में सफल होगा। भाईयों की संख्याघट जाएगी तथा उन्हे आर्थिक तंगी या हानि होगी। यदि षष्ठेश, अष्टमेशव द्वादशेश, तृतीय भाव व उसका स्वामी पापयुत है तो जातक कोभातृ-हानि होगी।
-भृगु
वह कला प्रेमी, माँ के लिए उन्नति कारक, धनी, कंजूस, उपकारक,सुप्रतिष्ठित, यात्रा का शौकीन और मौलिक होगा।-डॉ रामन
टिप्पणी
तीसरा भाव मित्रता का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें शुक्र की स्थितिजातक को स्त्रियों के प्रति आसक्त करती है। वह डरपोक, पापप्रवत्तवाला, अक्खड़, अपने सहोदरों व संबंधियों का प्रिय होगा। वह संपत्तितथा पत्नी सुख से वंचित होगा। ढुंढिराज के अनुसार तृतीयस्थ शुक्रदरिद्रता का द्योतक है।
हमारा अनुभव - शुक्र के लिए ३-६-८-१२ ये स्थान अशुभ है; अन्य स्थान शुभ है। तत्त्वप्रदीप जातक में यही कहा गया है। संप्राप्तो दर्पगेहे तनुसुखजनके कोणकोशे प्रशस्तः शेषे भावे न शस्तो वदति च भृगुजः पूर्व ग्रन्थेषु तज्ञः ।। इस शुक्र के अनिष्ट फल मुख्यतः विवाह के बारे में अनुभव में आते है। विवाह में विघ्न होना, पत्नी से ठीक सम्बन्ध न रहना, एक से अधिक विवाह होना, विजातीय स्त्री होना, पत्नी से दूर रहने के प्रसंग बारबार आना, पुनर्विवाहित स्त्री होना, विवाह के बाद आर्थिक कष्ट होना आदि अशुभ फल मिलते है। इन्हे अधिक आयु की और गम्भीर स्त्री पसन्द होती है।कामुक होते है। दिन में भी स्त्रीसंग की इच्छा रहता है। प्रथम पत्नी की मृत्यु हुआ तो दूसरा विवाह जल्दी नही होता। इन के बारे में स्त्रियों को हमेशा सन्देह बना रहता है। तात्पर्य स्त्रीसुख पूरी तरह न मिलना यह इस शुक्र का फल है। यह शुक्र पुरुष राशि में हो तो पत्नी आकर्षक, बुद्धिमान और अभिमानी होती है। स्त्रीराशि में हो सुन्दर, तो पत्नी अव्यवस्थित, साधारण रंगरूप की, व्यवहारज्ञान न होनेवाली होती है। पुरुषराशि में यह शुक्र हो तो अति कामुक प्रवृत्ति होने से स्त्रियों से अवैध सम्बन्ध रहते है। स्त्रीराशि में हो तो कामुकता होने पर भी घर से बाहर जाने की प्रवृत्ति नही होती। मंगल से दूषित शुक्र तृतीय में हो तो अनैसर्गिक चेष्टाओं-मुष्टिमैथुन आदि द्वारा कामपूर्ति करते है। दुराचारी होते है। चाहे जिस मार्ग का अवलम्बन करते है। इन के हाथ पर शुक्र का कंकण चिन्ह (girdle of venus) देखा जा सकता है। धन के बारे में यह शुक्र कभी स्थिरता नही देता। व्यवसाय में हानिलाभ होते रहने से हमेशा आर्थिक कष्ट होता है। शुक्र के कारकत्व के व्यवसाय करने पर इन व्यक्तियों को नुकसान होता है। फिर अन्य व्यवसायों की और जाते है। पुरुष राशि में हो तो यह शुक्र सन्तति कम देता है। एक दो पुत्र होते है- कन्याएं नही होती। भाईबहने कम होते है या होती ही नही। स्त्रीराशि में विशेषतः वृश्चिक और मीन में हो तो कन्याएं अधिक होती है पुत्र कम होते है। बहिने अधिक होती है। सन्तति का विचार मुख्यतः स्त्री की कुण्डली से करना चाहिए। मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में यह शुक्र हो तो ४५ वे वर्ष से कुछ बहिरापन आ जाता है। ५५ वें वर्ष तक एक कान पूरा बहरा हो जाता है। तृतीयस्थान में गुरु या शुक्र होने से हस्ताक्षर अच्छा नही होता। यह शुक्र स्त्री राशि में हो तो रसिकता नही होती। पुरुष राशि में हो तो विवाह निश्चित करते समय बहुतसी लड़कियाँ देखकर नापसन्द करते है किन्तु अन्त में किसी साधारण लड़की से ही विवाह करना पडता है। एक और अशुभ फल यह है कि इन्हें भोजन के बाद स्त्रीसंग की इच्छा होती है। इस से अन्नपचन ठीक नही होता और प्रकृति क्षीण होती जाती है।
तृतीय स्थान में शुक्र हो तो प्रायः जातक पत्नी के वशीभूत रहता है। अनेकआचायों के मतानुसार इसका कारण उसकी कामातुरता है। जातक आलसी,उत्साहहीन, अधिक शत्रु एवं बड़े परिवारवाला रहता है। भाई-बहनों में बहनेंअधिक होती हैं। शुक्र के साथ कोई पापग्रह हो तो सहोदरों का नाश होताहै। जातक स्वभाव से तेज, डरपोक एवं कंजूस होता है, आर्थिक स्थिति अच्छीनहीं होती। विलासीवृत्ति, कामातुरता एवं बन-ठनकर रहने की वृत्ति जातक मेंपाई जाती है। जातक मधुरभाषी होता है।
अधिकांश ज्योतिषविदों ने तृतीयस्थ शुक्र के जहां शुभ फल बताए हैं, वहींकुछ अशुभ फल भी बताए हैं। जातक समाज प्रतिष्ठा से वंचित, दुर्जन, नेत्ररोगी,दुर्बल, दुराग्रही, कामुक, अनैतिक, यौनसुख भोगनेवाला एवं दुश्चरित्र होता है।संतान कम रहती है एवं उनसे सुख प्राप्त नहीं होता।
आचार्य वैद्यनाद्य के मतानुसार शुक्र सूर्य से आगे हो तो शुभ फल प्रदानकरता है। सूर्य के पीछे होने पर जातक को अशुभ फल भोगने पड़ते हैं। महर्षिगर्ग के मतानुसार जातक का परिवार विशाल रहता है। महर्षि भृगु के अनुसारजातक के छोटे भाई नहीं रहते।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार तृतीयस्थ शुक्र के शुभ फल प्राप्त होते हैं।उनके मतानुसार जातक शक्तिशाली, सहोदरों के सुख से युक्त, कार्य तत्पर,सहोदरों की सहायता करनेवाला, स्त्री के प्रति आसक्त, आंशिक आलसी, सुस्त,निद्राग्रस्त होता है। जीवन के 29वें वर्ष में जातक का भाग्योदय होता है।
पाश्चात्य विद्वानों के मतानुसार तृतीयस्थ शुक्र के फल अन्य ग्रहों के साथहोनेवाले योग एवं दृष्टि संबंध पर अवलंबित रहते हैं। शुभ ग्रहों के संयोग मेंतृतीयस्थ शुक्र हो तो सहोदरों का उत्तम सुख प्राप्त होता है। मात्र पत्र-व्यवहारसे ही कई काम हो जाते हैं। जातक विद्वान, कवि, गायक या कलाकार होताहै। अशुभ ग्रहों के योगों के कारण जातक व्यसनी, दुराचारी एवं दुखी रहताहै।
तृतीय भाव-शुक्र यदि लग्नकुंडली के तीसरे भाव में हो तो जातकशास्त्रज्ञ, लेखक, सम्मानित, योगी, लोकप्रिय, कामुक, यात्राप्रेमी तथा अधिकप्रवास में रहने वाला होता है या उसे जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है। ऐसे जातककी बहनें अधिक होती हैं। वह खुशमिजाज तथा अच्छे पड़़ोस वा मित्रों वाला होताहै। जातक की रुचि कलाकार या गायक बनने की होती है।
मन्रेश्वर के अनुसार तीसरा शुक्र जातक को स्त्री सुख से हीन, दुराचारी,बदनाम बनाता है। (किन्तु ऐसा शुक्र के अशुभ होने पर ही देखने में आता है।)लाल किताब के अनुसार तीसरे शुक्र वाले जातक के अवैंध सम्बन्ध सम्भव होते हैंतथा स्त्रियों के माध्यम से उसे लाभ मिलने की भी सम्भावनाएं होती हैं। उसकीअपनी पत्नी दूसरों के प्रति गरम मिजाज वाली होती है। शुभ शुक्र हो तो जातकअपनी पत्नी को ही प्रेम व मान देने वाला तथा उसी में संतुष्ट रहने वाला होता है।(इससे जातक के भाग्य में वृद्धि होती है)। अशुभ प्रभाव में शुक्र हो तो जातकवैवाहिक सुख से हीन होता है, विवाह में बाधाएं आती हैं, पत्नी पूर्व विवाहिता यापुनर्भू (सेकंड हैंड) होती है अथवा उससे मनमुटाव रहता है। ऐसे जातक को प्रौढ़स्त्रियां अधिक पसंद आती हैं तथा पत्नी की चिंता बनी रहती है।.
पुरुष राशि का शुक्र जातक को अतिकामुक बनाता है। ऐसा जातक दिन यारात का अंतर SEX के समय नहीं करता। मंगल के साथ शुक्र का अशुभ योगतीसरे भाव में हो जाए तो जातक बलात्कारी तथा जंगली ढंग से सहवास करनेवाला होता है। ऐसा जातक अनैतिक ढंग से वीर्यनाश करने वाला भी होता है,किन्तु उसकी पत्नी योग्य, सुन्दर, अभिमानिनी होती है। स्त्री राशि का शुक्र हो तोजातक की पत्नी साधारण नयन-नक्श की एवं व्यवहारकुशलता से शून्य होती हैपर जातक उसी में संतुष्ट रहता है।
तृतीयस्थ शुक्र रोग ज्योतिष की दृष्टि से जातक में बधिरता उत्पन्न करता है।(यदि पाप प्रभाव में हो तथा तृतीयेश भी निर्बल हो तो बहरा भी हो सकता है)अन्यथा मध्यायु के बाद जातक ऊंचा सुनने लगता है। चन्द्रमा से अशुभ योग हो तोकान बहने का रोग हो जाता है, जिसकी परिणिती बहरेपन पर हो सकती है।
तृतीय भावः सहज भावस्थ शुक्र अकेला हो तो प्रायः अशुभ फल प्रदानकरता है। यदि सूर्य लग्न या पंचम भावस्थ हो तो कुछ शुभ फल भी मिलते हैं।विवाह में विष्न आते हैं, पत्नी से मनोमालिन्य बना रहता है। दूसरा विवाह होताहै तो पुनर्भू (दूसरे की विवाहिता) पत्नी मिलती है। ऐसे जातक कामवासना सेइतने पीड़ित होते हैं कि देश, काल और परिस्थिति का भी विचार नहीं करते,स्त्रियों द्वारा संदेह से देखे जाते हैं। ये फल शुक्र के स्त्री राशि में होने पर मिलतेहैं। पुरुष राशि में हो तो पत्नी सुघड़, सुंदर परंतु अभिमानी मिलती है तथाजातक परकीया सेवन करता है। स्त्री राशि में शुक्र हो तो जातक स्वपतली से हीरमण करता है। मंगल से युक्त अथवा दृष्ट शुक्र सहज भाव में हो तो जातकअनैतिक रूप से कामवासना की पूर्ति करता है। धन संचय नहीं हो पाता,आर्थिक कष्ट आते हैं, कार्य-व्यवसाय में हानि-लाभ भी धन में स्थिरता नहींरहने देते। पुरुष राशि में शुक्र कन्या संतान नहीं होने देता, एक-दो पुत्र हीउत्पन्न होते हैं। शनि से संबंध करता हो तो कर्ण रोग होते हैं।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक उद्यमी, संपन्न,गुणवान, विद्वान, आस्तिक, कामातुर, माता-पिता एवं सहोदरों से कलहकरनेवाला किंतु लोकप्रिय रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,संपन्न, सुखी, सरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठित एवं नौकर-चाकरों से युक्त रहताहै। उसे आर्थिक नुकसान होता है, दूसरों को दिए रुपये-पैसे लौटकर नहीं आते।शरीर में कोई विकार रहता है। तृतीयस्थ शुक्र सहोदरों का नुकसान करता है।वे जीवित नहीं रहते किंतु जो जीवित रहते हैं उनसे सहयोग प्राप्त होता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक उद्यमी,आस्तिक, झगड़ालू एवं कलंकित चरित्र का रहता है। संतान सुख में बाधा रहतीहै यानी संतान अल्पायु होती है। प्रायः वह जीवित नहीं रहती। जातक स्वयंकामातुर रहता है। कुंडली में सप्तम स्थान में पापग्रह हो तो जातक की पत्नीका संबंध देवर से रहता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक गर्ममिजाज,नास्तिक, अभिमानी, चुगलखोर, कुसंगति होता है। उसकी आंखें लाल रहतीहैं। वह पैतृक संपत्ति का दुरुपयोग करनेवाला एवं नजदीकी लोगों को दुःखदेनेवाला भी होता है। किंतु उद्यमी एवं संपन्न रहता है और उसके दो पलनियांहोती हैं।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी, सुखी,समाज में प्रख्यात, कंजूस, बहुरूपी, चुगलखोर एवं मधुरभाषी होता है। सहोदरोंका सुख सामान्य रहता है। लड़कियां कर्तव्यपालक होती हैं।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक धार्मिक,प्रवासप्रिय, अनेक कार्यों में दक्ष, मित्र एवं सहोदरों से सुखी, उदार, परोपकारीएवं पुरुषार्थी होता है। माता-पिता से मतभिन्नता होते हुए भी उनकी सेवा करताहै। सिरदर्द से ग्रस्त रहता है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक अनेकनौकर-चाकरों से युक्त, सुखी एवं संपन्न रहता है। उसके मित्र काफी संख्यामें रहते हैं। जातक शासन एवं समाज में प्रतिष्ठित रहता है। यवनाचायों केअनुसार माता एवं सहोदरों से बनती नहीं।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र तृतीय स्थान में होने पर जातकउद्यमी, संपन्न, विद्वान, लोकप्रिय, सुंदर, समाज में प्रतिष्ठित, विशेष कार्य मेंसफल, पारिवारिक सुख से परिपूर्ण एवं अपनी जिम्मेदारियों को निभानेवालाहोता है। प्रायः यह अल्पायु रहता है। महर्षि लोमश के मतानुसार जातककामातुर रहता है, परस्त्री से उसके संबंध रह सकते हैं। वह आलोचक एवंनेता होता है। महर्षि गर्ग के अनुसार व्यापार में लाभ कमाता है किंतु जातकलोभी, चोर, कठोर एवं झगड़ालू होता है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी, संपन्न,सुखी और सहोदरों के सुख से वंचित रहता है। उसका शरीर विकारग्रस्त रहता है, दो विवाहों का योग बनता है। उसे धनहानि होती है उसका रुपया-पैसाडूबने का डर रहता है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र तृत्तीय स्थान में हो तो जातक स्वयं एवंउसकी संतान भी अल्पायु रहती है। विलंब से संतान सुख प्रप्त होता है। सप्तमस्थान में पापग्रह हो तो पत्नी का चरित्र भ्रष्ट होता है। उसका अपने देवर केसाथ अनुचित शारीरिक संबंध रहता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक प्रवासप्रिय,अनेक शास्त्रों में पारंगत, संपन्न किंतु गर्ममिजाज होता है। वह पैतृक संपत्तिका अपव्यय करता है। सहोदर एवं अड़ोस-पड़ोस के लोगों के लिए कष्टकारकसिद्ध होता है।
12. मीन-मीन राशि का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो जातक मधुरभाषी,शांत, सुखी, संपन्न, बहुरूपी, चुगलखोर एवं कंजूस रहता है। जातक कीलड़कियां कार्यकुशल होती हैं।
1. चौदस के दिन बाह्मण भोजन करावें।
2. तुलसी की पूजा करें।
3.अन्य स्त्री से सम्पर्क न करें।===========================
4) चतुर्थ भाव - चतुर्थ स्थान (सुख स्थान)
चतुर्थ स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकार इस स्थान में गुरु के समान फल बतलाए है।
कल्याणवर्मा - बन्धुसुहृत्सुखसहितं कान्तं वाहनपरिच्छदसमृद्धम्। ललितमदीनं सुभगं जनयाति हिबुके नरं शुक्रः ।। आप्त और मित्रों से युक्त, सुखी, सुन्दर, धन और वाहनों से संपन्न, स्नेहल और धीर स्वभाव का ऐसा यह व्यक्ति होता है।
वैद्यनाथ – स्त्रीनिर्जितः सुखयशोधनबुद्धिविद्यावाचालको भृगुसुते यदि बन्धुयाते ।। यह स्त्री के आधीन होता है। सुखी, कीर्तिमान, धनी, बुद्धिमान, विद्वान और बहुत बोलनेवाला होता है।
वसिष्ठ - प्रधानं धनाप्ति। यह प्रमुख मंत्री और धनी होता है।
गर्ग - परदयितविचित्री वासवासी विलासी बहुविधिबहुभोगी राजपूज्यश्चिरायुः । वरपरिकरभार्या भार्गवे बन्धुसंस्थे भवति मनुजवर्ग: सर्वदा विक्रमी च।। यह दूसरों का मित्र, विक्षिप्त स्वभाव का, घर में ही अधिक रहनेवाला, विलासी, कई प्रकार के उपभोग बहुत समय प्राप्त करनेवाला, राजा द्वारा सन्मानित, दीर्घायु, पराक्रमी और उत्तम स्त्री तथा परिवार से युक्त होता है। शुक्रे च तत्रस्थे धनं रौप्यमयं बहु । प्रचुरं च तथा धान्यं रसाश्च बहुला गृहे ।। शुक्रस्तु दाराश्रयसौख्यवृत्तं स्त्रग्वस्त्रसौभाग्यगृहं विदध्यात्।। चांदी के रूप में बहुत धन रहता है। विपुल धान्य और दूध, दही घर में रहता है। स्त्री के आश्रय से सुख मिलता है। फूलों के हार, वस्त्र आदि से घर सुन्दर लगता है।
बृहद्यवनजातक -मित्रक्षेत्रे ग्रामसद्वाहनानां नानासौख्यं वन्दनं देवतानाम्। नित्यानन्दं मानवानां प्रकुर्यादि दैत्याचार्यस्तुर्यभावस्थितश्चेत्। गांव, अच्छे वाहन आदि से विविध सुख और सदा आनन्द प्राप्त होता है। यह देवों की वन्दना करते रहता है। स्वं शुक्रोंऽम्बुजे सुखमथो। यह आयु के ४ थे वर्ष सुख देता है।
ढुंढिराज - इस लेखक ने यवनजातक जैसा वर्णन किया है।
आर्यग्रन्थ - भवति बन्धुगते भृगुजे नरो बहुकलत्रसुतेन समावृतः । सुरमते सुखमध्यगते गृहे वसनपानविलाससमावृतः ।। स्त्री तथा कई पुत्रों से युक्त, अच्छे घर में खानापीना तथा कपडे आदि के सुख युक्त, विलासपूर्वक रहता है।
जयदेव – सुभूमिमित्रालययानमानमृद्युत् सुखी धर्ममनाः सुखे सिते। यह जमीन, मित्र, घरबार, वाहन आदि से संपन्न, मानी, सुखी, आनन्दी तथा धार्मिक प्रवृत्ति का होता है।
जागेश्वर – सुखे भार्गवे वैभवं मानवानां सुखं दीयते वै जनन्या यथेष्टमा। परं राज्यसत्कारवत्त्वं नराणां गृहे गायकाः पण्डिताः वेदवन्तः। इसे माता का सुख अच्छा मिलता है। राजा द्वारा सन्मानित और वैभवशाली होता है। इस के आश्रय में गायक, पंडित और वेदाभ्यासी विद्वान रहते है।
मन्त्रेश्वर - सुवाहन सुमंन्दिराभरणवस्त्रगन्धं सुखे ।। इसे घर, वाहन, वस्त्र, आभूषण और सुगन्धी पदार्थ अच्छे प्राप्त होते है।
नारायण भट्ट - महित्वेऽधिको यस्य तुर्येऽसुरेज्यो जनैः किं च मे चापरै रुष्टतुष्टैः। कियत् पोषयेत् जन्मतः संजनन्या अधीनार्पितो- पायनैरेव पूर्णः।। यह सन्मानित होता है। लोगों के प्रेम या द्वेष की परवाह नहीं करता। माता का पोषण करता है। नौकरों से इसे अच्छा लाभ होता है।
गौरीजातक -लग्नाच्चतुर्थगे शुक्रे जन्मकाले गते सति।कफार्दितोऽक्षिरोगी च जन्मतो धन वर्जितः।। यह जन्म से ही निर्धन और कफरोग तथा आँखों के रोग से पिडित होता है।
काशीनाथ - सुखे शुक्रे सुखी विज्ञो बहुभार्यो धनान्वितः । ग्रामधिपो विवेकी स्याद यशस्वी च भवेन्नरः ।। यह सुखी, धनवान, गांव का मुखिया, यशस्वी, विवेकशील, विद्वान और बहुत स्त्रियों से युक्त होता है।
जीवनाथ - सुखं गोमातंगप्रवरतुरगैः सौख्यमाधिकं । गाय, घोडे, हाथी आदि से यह संपन्न होता है। इस लेखक का अन्य वर्णन नारायण भट्ट के समान है।
हरिवंश - जनाधिपं पुराधिपं कुलाधिपं करोति च। समस्तसौख्यं- संयुतं च देवदेवताप्रियं ।। नरं सुविद्ययान्वितं सुवाहनादिसंयुतं। सुहृत् सुरद्विषां सुहृद्गृहं गतः सुहृत्स्त्रियाम्।। यह अपने परिवार, शहर तथा लोगों में प्रमुख, सुखी, देवभक्त, विद्वान, अच्छे वाहनों से संपन्न और स्त्री मित्रों से युक्त होता है।
घोलप - यह दुष्टों का पराभव करता है। बलवान, पवित्र, सदाचारी सज्जनों का सेवक, धनवान, कामुक, सुन्दर, पराक्रमी, स्थावर-जंगम संपत्ति का उपभोग लेनेवाला और क्षमाशील होता है। इसे माता का सुख अच्छा मिलता है।
लखनऊ के नवाब - ऐयाशो मालदारो नेको कारश्च फारसश्चेत् स्यात्। जोहरा दोस्तमकाने भवति मनुष्यः प्रियंवदश्चाढ्यः ।। यह धनवान, प्रामाणिक, बुद्धिमान, मधुर बोलनेवाला और अच्छे काम करनेवाला होता है। व्यभिचार की ओर इस की प्रवृत्ति होती है।
गोपाल रत्नाकर - यह गायबैल पाल कर दूध दही का व्यापार करता है। धनधान्य से संपन्न, घोडो और वाहनों से युक्त, भाग्यवान, विद्वान, बुद्धिमान तथा आप्तों पर स्नेह करनेवाला होता है। इसे मातृसुख अच्छा मिलता है।
हिल्लाजातक - तुर्यगों बन्धुसौख्यदः। यह भाईयो को सुख देता है
पाश्चात्य मत -यह शुक्र पीडित न हो तो जीवन भर अच्छा सुख मिलता है। पैतृक संपत्ति मिलती है। मातापिता का सुख अच्छा मिलता है। आयु का उत्तरार्ध उत्तम होता है। मृत्यु अच्छी स्थिति में होती है। रवि और चन्द्र से शुभ योग हो तो विजय और लाभ प्राप्त होता है तथा स्थावर इस्टेट मिलती है। मंगल से अशुभ योग हो तो आयु के अन्तिम भाग में बहुत खर्च करना पड़ता है।
भृगुसूत्र - शोभनवान, बुद्धिमान् क्षमावान सुखी। भ्रातृसौख्यं- मातृसौख्यं। त्रिंशद्वर्षे अश्ववाहनप्राप्तिः । क्षीरसमृद्धिः । भावाधिपे बलयुते अश्वान्दोलिकाकनकचतुरंगदिवृद्धिः । तत्र पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे बलहीने क्षेत्रवाहनहीनः । मातृक्लेशवान् कलत्रान्तरभोगी। यह बुद्धिमान, सुशोभित, क्षमाशील तथा सुखी होता है। माता और भाईयों का सुख अच्छा मिलता है। तीस वे वर्ष घोडे और वाहन प्राप्त होते है। दूध दही खूब होता है। चतुर्थेश बलवान हो तो घोडे, पालकी, सोने के आसन आदि वैभव प्राप्त होता है। वही पापग्रह युक्त हो अथवा पापग्रह की राशि में, शत्रुराशि में या नीच में दुर्बल हो तो खेती, वाहन आदि नही होते। माता को कष्ट होता है। एकाधिक स्त्रियों का उपभोग करता है।
चतुर्थ भाव में शुक्र अनेक पत्लियों व पुत्रों तथा राजमहल सरीखेनिवास वाला, सुन्दर व महंगे परिधान, अच्छा भोजन और ऐश्वर्य कीसभी सामग्री देता है।
-मानसागरी
जातक के पास अच्छे वाहन, एक अच्छा-सा घर, आभूषण, वस्त्रऔर इत्रादि होगों।
-फलदीपिकाजातक संबंधियों मित्रों, वाहनों से युक्त, सुंदर, धनी और भाग्यशालीहोगा।
-सारावली
वह सुदर्शन, बुद्धिमान्, भाईयों की ओर से सुखी, प्रसन्न औरअनुकूल प्रकृति का होगा। 30 वर्ष की अवस्था में वह घोड़ों से खींचेजाने वाले वाहनों का स्वामी बने, पर्याप्त दूध, स्वर्णादि से युक्त होगा।यदि चतुर्थेश पापाक्रान्त के भाव में या शत्रुक्षेत्री या नीचगत या बलहीनहै। तो जातक भूमि और वाहनों से हीन होगा। वह स्त्रियों से अवैध संबंधरखने वाला और अवसाद ग्रस्त माँ का पुत्र होगा।
-भृगु
जातक बुद्धिमान, प्रसन्न, अनुरागी, विद्वान्, स्नेही माँ वाला, कृषिकरने वाला, शिक्षित, शान्त जीवन, वैज्ञानिक तरीके अपनाने वाला, पशुपालन, संबंधियों का प्रिय, दूध पीने का शौकीन, प्रसिद्ध, सफल औरलोकप्रिय होगा। शुक्र चतुर्थ भाव में दिग्बली होता है। अतः अच्छे फलप्रदान करता है।
डॉ रामन
हमारे विचार - शास्त्रकारो ने इस स्थान में सभी शुभ फल बतलाये हैं। इनका अनुभव पुरुष राशियों में अच्छा आता है। अशुभ फलों का वर्णन किसी ने नही किया है।
हमारा अनुभव यह शुक्र पुरुष राशि में हो तो माता का सुख कम मिलता है। माता जीवित रही तो हमेशा बीमार रहती है। इसे पैतृक संपत्ति मिलती है किन्तु चैनबाजी से या बड़े व्यवसाय के उलझन में वह संपत्ति नष्ट होती है। फिर अपनी मेहनत से काफी धन प्राप्त करते है । २२ वें वर्ष से स्थिरता प्राप्त होती है। स्त्रियों से अच्छी मदद मिलती है। नौकरी करते हो तो भी ये अन्य धन्धे भी करते है। यह शुक्र स्त्री राशि में हो तो पिता का सुख कम मिलता है। यह बहुत कंजूस होता है। मीठा बोलकर अपना काम कर लेता है। अपना स्वार्थ हो तो ही दूसरों के काम में मदद करता है। ३२ वे वर्ष तक स्थिरता नहीं मिलती। कुछ समय नौकरी, कुछ समय व्यवसाय ऐसा परिवर्तन कर के अन्त में व्यापार में यश प्राप्त करते है। पुरुष राशि में यह शुक्र हो तो स्त्री सुन्दर और आकर्षक होती है। स्त्री राशि में हो तो साधारण स्त्री होती है। वृषभ और तुला में हो तो बहुत ही साधारण या कुरूप पत्नी होती है। इसका रहनसहन बहुत सादा होता है। वृषभ, कन्या, मकर तथा मीन राशियों में यह शुक्र हो तो द्विभार्यायोग होता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में हो तो घरबार नही होता। इस स्थान का साधारण फल यह है कि विवाह के बाद भाग्योदय होता है। अपना घरबार होता है। आयु का अन्तिम भाग अच्छा जाता है। किन्तु उस समय स्त्री के आधीन रहना पड़ता है। बड़े लोगों से स्नेह होता है। उनसे मदद भी मिलती है। प्रथम पुत्र सन्तति होती है। तृतीय के शुक्र से हमेशा स्त्री का चिन्तन होता है वैसे ही चतुर्थ के शुक्र से हमेशा पैसो की चिन्ता होती है। आयु के २४ २६ और ३६ वे वर्ष में शारीरिक कष्ट बहुत होता है। तीसरे या छठे वर्ष में घर में किसी ज्येष्ठ व्यक्ति की मृत्यु होती है। माता या पिता में से एक की मृत्यु
में होती है। जो जीवित रहे उसका बचपन सुख ४५ वें वर्ष तक मिलता है।
जन्मकुंडली में चतुर्थ स्थान में शुक्र हो तो जातक इष्टमित्रों, भाई-बहनोंएवं परिवार की ओर से सुखी रहता है। जातक यशस्वी, संपन्न, सुखी, विद्वान,कुशल वक्ता, समाज में प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, सरकारी कर्मचारी, दीर्घायु, पराक्रमी,कामातुर होता है और भोगविलास एवं शाही ठाट-बाट से रहने का आदी होताहै। एक से अधिक स्त्रियों से प्रत्यक्ष रूप में उसके संबंध रहते हैं, परिवारबड़ा रहता है, माता को सुख देता है। चतुर्थ स्थान में बलवान शुक्र हो तोउसके शुभ फल अधिक प्राप्त होते हैं। उम्र के 30वें वर्ष में जमीन-जायदाद,वाहन आदि का लाभ होता है। गौरीजातक नामक ग्रंथ के अनुसार कफज,छाती के रोग, नेत्रविकार, निर्धनता जैसे बुरे फल मिलते हैं। शुक्र दुर्बल याशत्रक्षेत्र में होने पर ही उसे कुफल मिलेंगे।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार भारतीय ज्योतिषियों द्वारा कथित फल तोमिलते हैं परंतु भाग्योदय चौथे वर्ष में होता है।
पाशचात्य ज्योतिषियों ने भी चतुर्थ स्थान के शुक्र के विषय में सुखी जीवन,संपत्ति सुख, पैतृक संपत्ति की प्राप्ति ऐसे शुभ फल कहे हैं। उनके मतानुसारशुक्र-मंगल का योग चतुर्थ स्थान में अशुभ फलदायक रहता है।
चतुर्थ र्भाव-लग्नकुंडली में शुक्र चतुर्थ भाव में हो तो जातक सुन्दर,शक्तिसम्पन्न, दानी, चतुर, भाग्यवान, दीर्घायु, आरामतलब/विलासी, दूसरों कीमदद करने वाला, सन्तान से सुख पाने वाला तथा वाहनों के सुख व सुविधाओंवाला होता है। उसे वैभव तथा वाहन सुख विशेष मिलता है। पैतृक सम्पत्ति कीप्रात होती है। माता-पिता का सुख दीर्घकाल तक मिलता है। जीवन का उत्तरार्थविशेष रूप से सुखमय होता है।
लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक को जमीनी यात्राएं बहुत करनी पड़तीहैं, जो उसके लिए शुभ होती हैं। यदि जातक की पत्नी दुश्चरित्रा हो (जिसकीसम्भावनाएं होती हैं) तो परिणाम में जातक की संतान को कष्ट भोगना पड़ता है।शुक्र का ऐसा अशुभ प्रभाव समाप्त करने के लिए जातक को अपनी पत्नी से दो बारविवाह कर लेना चाहिए। ऐसा जातक प्रायः विवाहोपरांत भाग्योदयी होता है तथाप्रथम संतान पुत्र प्राप्त करता है। जातक की मैत्री भी बड़े लोगों से रहती है। जातकपत्नी के वशीभूत रहता है। माता-पिता में से किसी एक से वैमनस्य रह सकता है।अथवा किसी एक की शीघ्र मृत्यु सम्भावित होती है। धन की चिन्ता बनी रहती है।मंगल से अशुभ योग हो तो उत्तरार्थ के जीवन में जातक का अत्यधिक धन व्ययहोता है।
पुरुष राशि में चौथा शुक्र जातक को अय्याश, खर्चीला व पैतृक धन को नष्टकर देने वाला बनाता है। ऐसा जातक स्व उपार्जित धन से सुखे भोगता है तथास्त्रियों से उसे पूर्ण सहयोग मिलता है। परन्तु माता जीवन भर रुगण रहती है। स्त्रीराशियों में शुक्र हो तो जातक को सुन्दर पत्नी नहीं मिलती, पिता का सुख भी थोड़ामिलता है। ऐसा जातक कपटी, स्वार्थी, नौकरी के साथ अन्य कार्यों से भी धनोपार्जनकरने वाला होता है। अन्तत: वह नौकरी छोड़कर प्रायः व्यवसायी बन जाता है।पृथ्वी त्त्व राशि में या उच्च का शुक्र पुनर्विवाह कराता है। जलराशियों में जातकका घर बसने नहीं देता। ऐसा देखा गया है।
स्त्री जातकों में यदि चतुर्थ शुक्र चन्द्रमा से युति करे और पापदृष्ट हो (लग्न भी मेष या वृश्चिक हो) तो जातक व्यभिचारिणी हो जाती है। पापग्रहों की दृष्टिजितनी अधिक होगी उतना ही ऐसी जातक के व्यभिचारिणी होने की सम्भावनाबलवान होगी।
चतुर्थ भावः पुरुष राशि का शुक्र सुख स्थान में हो तो माता का तथा स्त्रीराशि में हो तो पिता का पूर्ण सुख नहीं मिलता। ऐसा जातक खर्च करने मेंकंजूसी करता है, मधुर बोलने का गुण विशेष उसमें होता है। दूसरे से कामनिकालने में वाणी का प्रयोग करते हैं, यदि किसी से कार्य हो तो उससे संबंधरखते हैं अन्यथा नहीं। पैतृक संपत्ति तो मिलती है लेकिन ऐशो-आराम में शीघ्रही नष्ट हो जाती है। जल राशि में चतुर्थ भावस्थ शुक्र घरबार नहीं होने देता,पृथ्वी राशि में दूसरे विवाह का योग बनाता है। साधारणतः चतुर्थ स्थानगतशुक्र के फल इस प्रकार से मिलते हैं-बड़े लोगों से संबंध होते हैं, भाग्योदयविवाहोपरान्त होता है, स्वयं का मकान तथा पत्नी के साथ प्रेम बना रहता है,प्रथम संतान पुत्र होती है। अर्थाभाव बना रहता है, फलतः धन की चिंता रहनास्वाभाविक है। शत्रु राशि या नीच का शुक्र हो तो अशुभ फल मिलते हैं। माताको कष्ट, शैशवकाल में माता की मृत्यु, वाहन, मकान आदि का नाश होता है।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक उदार, संपन्न, विद्वान, चरित्रवान, प्रतिष्ठित एवं सरकारी कर्मचारी रहता है। माता का सुखपर्याप्त प्राप्त होता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक समाज काअगुआ, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, धार्मिक, दानपुण्य करनेवाला एवं पराक्रमीहोता है। साथ ही वह विद्वान, निंदक, चुगलखोर भी रहता है। मातृ-पितृभक्तहोने पर भी उनसे पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता लेकिन सहोदरों का सहयोग प्राप्तरहता है। महर्षि लोमश के मतानुसार पत्नी गरममिजाज होती है। जातक पैतृकसंपत्ति का उपभोग करता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थी,विद्वान, संपन्न होता है। मातृ-पितृभक्त होते हुए भी उनका पर्याप्त सुख उसेप्राप्त नहीं होता। बांधवों से भी पर्याप्त सुख नहीं मिलता। सहोदरों से अच्छासुख-सहयोग प्राप्त होता है। जातक पैतृक धन-संपत्ति का उपभोग करता है।वह चुगलखोर, आलोचक भी रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार पत्नी भीक्रोधी स्वभाव की होती है।
4. कर्ककर्क राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थी,विद्वान, गुणवान, संपन्न, यशस्वी एवं दीर्घायु होता है। महर्षि लोमश केअनुसार जातक परस्त्रीगामी होता है। किंतु उसकी पत्नी पतिब्रता एवं सुयोग्यरहती है। पिता के साथ मतभिन्नता रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक संपन्न, सरकारीकर्मचारी, भरपूर जमीन-जायदाद से युक्त तथा दीर्घायु होता है। स्वभाव से तेजएवं कठोर रहता है, सहोदरों एवं पड़ोसियों के लिए उपद्रवकारक रहता है।कुछ आचायों के मतानुसार जातक वर्णसंकर रहता है जबकि कुछ के अनुसारजातक का पिता रोगी होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक संपन्न, विद्वान,पराक्रमी, परोपकारी एवं पुरुषार्थी रहता है। महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक कंजूसएवं रोगी रहता है। उसे सहोदरों एवं संतान का सुख कम प्राप्त होता है। संतानन होने की भी संभावना रहती है। विवाह एक से अधिक हो सकते हैं।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक अतिधनवान,चतुर, बुद्धिमान, भ्रमणप्रिय, दीर्घायु, सरकारी कर्मचारी एवं सभी सुख-सुविधाएंभोगनेवाला होता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक विद्वान,पुरुषार्थी, गुप्त कार्य करनेवाला, माता-पिता का आज्ञाकारी एवं आर्थिक दृष्टिसे संपन्न रहता है। पत्नी का स्वभाव तेज रहता है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, यशस्वी,संपन्न, पुरुषार्थी, विचारों का पक्का एवं आस्तिक रहता है। उसे माता-पिताएवं गुरु से पर्याप्त संपत्ति प्राप्त होती है। कामातुर होने से उसका परस्त्री समागम संभव रहता है। ऐसा जातक सेवा में अच्छा नाम कमाता है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक निरोगी,दीर्घायु, खूबसूरत, कामातुर, यशस्वी, संपन्न एवं सरकारी कर्मचारी होता है।माता-पिता का सुख पर्याप्त प्राप्त होता है। जातक परनिंदक एवं चुगलखोर होताहै। कुछ आचायों के मत से जातक को माता-पिता एवं भाई-बहन का पर्याप्तसुख प्राप्त होता है।
11. कुंभ-कुंभ रशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक आस्तिक,बुद्धिमान, सुखी एवं संपन्न रहता है। पत्नी सुशील एवं सदाचारिणी मिलती है।पिता के सुख में कमी रहती है, उनसे मतभिन्नता रहती है, एक से अधिकविवाह होते हैं। संतान सुख में न्यूनता रहती है। संतानहीन भी रहना पड़ सकताहै। स्त्री जातक की कुंडली में चतुर्थ स्थान में शुक्र हो तो उसे प्रसव के समयमृत्युसम पीड़ा होती है।
12. मीन-मीन राशि का शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक अनेक व्यवसाय करनेवाला, निपुण, भ्रमणप्रिय, अभिमानी, दीर्घायु, संपन्न एवं कर्तव्यनिष्ठ होनेके साथ ही चंचल, चुगलखोर एवं गर्म स्वभाव का भी रहता है। सहोदरों सेमतभिन्नता रहती है। उसे पैतृक संपत्ति एवं माता का भरपूर सुख प्राप्त होताहै।
1. केससयुक्त दूध पीये।
2. घर में टैंक न खुदावें।
3. सवा गज कपड़े मेंसवा किलो चावल बांधकर नदी में बहावें।
4. सवा किलो गेहूं ईशानकोण में गाड देवें।
===========================5) पंचम्भाव - पंचम स्थान (सुत भाव)पंचम स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - सुखी सुखयुतः प्रतिमास्थितेः। सुखी होता है।
कल्याणवर्मा - सुखंसुतमित्रोपचितं रतिपरमतिधनमखण्डितं शुक्रः। कुरुते पंचमराशौ मन्त्रिणमथ दण्डनेतारम्।। यह सुखी, पुत्र तथा मित्रों से युक्त, कामुक, धनवान तथा मन्त्री या सेनापति पद प्राप्त करनेवाला होता है।
वसिष्ठ - पुत्रबहुलं । बहुत पुत्र होते है।
वैद्यनाथ - सत्पुत्रधनवानतिरूपशाली सेनातुरंगपतिरात्मजगे च शुक्रे। उत्तम पुत्र और मित्र होते है। यह धनवान, बहुत सुन्दर और सेनापति या अश्वदल का मुख्य होता है।
गर्ग - सुतसुखविविधोपचितं परमधनं पंडितं शुक्रः । कुरुते पंचमराशौ मन्त्रिणमथ दण्डनेतारम्।। इस में प्रायः कल्याणवर्मा के समान वर्णन है। सिर्फ पण्डित होना इतना अधिक फल बतलाया है। बृहद्यवनजातक सकलकाव्यकलाभिरलंकृतः कृतकृतनय- वाहनधान्यसमन्वितः नरपतेर्गुरुगौरवभाक् नरो भृगुसुते सुतसद्भनि संस्थिते।। कविता तथा कलाओं में कुशल, पुत्र, धनधान्य तथा वाहनों से संपन्न और राजाद्वारा सन्मानित ऐसा यह व्यक्ति होता है। उशना शरवर्षलक्ष्मीम् पांचवें वर्ष में धन प्राप्त होता है। यही वर्णन ढुंढिराज ने भी दिया है।
आर्यग्रन्थकार- तनयमंदिरगे भृगुनन्दने भृगुसुतोदुहितावरपूजितः। बहुधनो गुणवान् वरनायको भवति चापि विलासवतीप्रियः ।। इसे पुत्र कम और कन्याए अधिक होती है। अतः दामादों का सत्कार करते रहना पड़ता है। यह धनी, गुणवान, प्रमुख तथा विलासिनी स्त्रियों को प्रिय होता है।
गौरीजातक - लग्नात् पंचमगः शुक्रो जन्मकाले यदा भवेत् बहुकन्या समायुक्तो धनवान् कीर्तिवर्जितः ।। यह धनी किन्तु कीर्तिरहित होता है। इसे कन्याएं बहुत होती है।
नारायण भट्ट - सुपुत्रेऽपि किं यस्य शुक्रों न पुत्रे प्रयासेन कि यत्नसंपादितोऽर्थाः। व्युदर्के विना मन्त्रमिष्टाशनाभ्यां अधित्वेन किंचेत् कवित्वेन शक्तिः।। अच्छे पुत्र होते है। विशेष प्रयास न करते ही धन मिलता है। मन्त्र और मिष्टान्न प्राप्त होते है। कविता करने की शक्ति अच्छी होती है।
जयदेव - नानाऽगमी भूरिधनात्मजः सुखी समानदानः सुतगे भृगौः सुते। यह विविध शास्त्रों का अभ्यास करनेवाला, धनवान, सुखी, बहुत पुत्रों से युक्त, सन्मानित तथा दानी होता है।
काशीनाथ - सुते शुक्रे समृद्धश्च सुरूपोऽपि सदा नरः । पुत्रकन्या पौत्रयुतः सुभगोपि भवेन्नरः ।। यह संपन्न सुन्दर तथा लडके-लड़कियों और पोतों से युक्त होता है।
जागेश्वर यदा पंचमे भार्गवः सौभगः स्यात् परं विद्यया काव्यकल्पः सकल्पः। परं पंडितैर्लिख्यते यत्तदुक्तं सुतै राजमान्यैः प्रतापी भवेद् वा । यह धनवान, विद्वान, कवि, लेखक होता है। इसके पुत्र राजाद्वारा सन्मानित होते है। प्रतापी होता है।
मंत्रेश्वर - अखंडितधनं नृपं सुमतिमात्मजे सात्मजे। यह सदा धनवान, राजा के समान वैभवयुक्त, सद्विचारी तथा पुत्रों से युक्त होता है
जीवनाथ- नारायण भट्ट के समान वर्णन दिया है।
हरिवंश - सुराजमन्त्रवित् सखा सुधर्मकर्मसंग्रही। सुरूपवान् सदोन्नत: सुभाग्यभोग-भूषणै सुताधिको भवेद् भृगोः सुते सुतालयं गते ।। यह विद्वान, कवि, राजनीतिज्ञ, उत्तम मित्र, धार्मिक, क्रियाशील, सुन्दर, भाग्यवान, उपभोग और अलंकार प्राप्त करनेवाला तथा बहुत पुत्रों से युक्त होता है।
स्वलंकृतः सुविद्यया सुकाव्यकौशले पुमान्
लखनऊ के नवाब - दानीश्वरो मनुष्यः सुतधनधान्यैश्च संकुलो यस्य। जोहरा पंचमखाने भवति यदा हि महीपतेः प्रीतिः।। यह उदार, धनवान, पुत्रों से युक्त तथा राजा का प्रिय व्यक्ति होता है।
घोलप - यह सत्पुरुषों की सेवा करता है। राजा जैसा वैभवशाली सुखी, गुणवान, बुद्धिवान, सभा में श्रेष्ठ, शत्रुरहित, अपने देश में ही धन प्राप्त करनेवाला तथा स्त्रीपुत्र और वाहनादि से सुशोभित होता है।
गोपाल रत्नाकर - यह बुद्धिवान, मन्त्रिपद प्राप्त करनेवाला, सेनापति, बुद्धिवान तथा विद्वान होता है। माता को अरिष्ट उत्पन्न होता है। पुत्र होते है।
हिल्लाजातक - पंचमः पंचमे वर्षे पितृलाभकरो भृगुः। यह पांचवे वर्ष पिता को लाभदायी होता है।
पाश्चात्य मत – यह वैभवशाली तथा स्त्रियों में बहुत आसक्त होता है। इसे पुत्रों से कन्याएं अधिक होती है। साहसी, विद्याभिलाषी और विजयी होता है। मन समाधानी रहता है बहुत हर्ष या बहुत खेद इसे नही होता। व्यवहारी और संसारसुख प्राप्त करनेवाला होता है। नाटक, सिनेमा देखने का बहुत शौक होता है। सन्तति विपुल होती है। पुत्र सुन्दर, आज्ञाधारक और माँ बाप को प्रसन्न रखनेवाले होते है। इस स्थान में शुक्र बलवान हो तो सट्टा, लॉटरी, जुआ आदि में आकस्मिक लाभ होता है। पहला पुत्र (या कन्या) बहत सुंदर और ललितकलाओं का अभ्यासक होता है। इस शुक्र से नाटक-सिनेमा आदि से लाभ होता है। शनि या मंगल से यह शुक्र पीडित हो तो अशुभ फल देता है।
भृगुसुत्र - कवित्वे मतिः । मन्त्री, सेनापतिः। मातृसेवकः । काव्यशक्तियौवनदारपुत्रवान्। प्रगल्ममतिमान् । राजसन्मानी। सुज्ञः । स्त्रीप्रसन्नतावृद्धिः । लौकिको न्यायवृत्तिः । तत्र पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे बुद्धिजाड्ययुतः। पुत्रनाशः। तत्र शुभयुते बुद्धिमान्। नीतिमान् । पुत्रप्राप्तिः । वाहनयोगः ।। यह मन्त्री या सेनापति होता है। कवि, प्रौढ बुद्धि का, माता की सेवा करनेवाला, सुज्ञ, राजा द्वारा सन्मानित, तरुण स्त्री तथा पुत्रों से युक्त होता है। स्त्री हमेशा प्रसन्न रहती है। यह कीर्तिमान, न्यायी होता है। पापग्रह के साथ, पापग्रह की राशि में, शत्रु राशि में या बीच में हो तो बुद्धि जड होती है तथा पुत्रों का नाश होता है। शुभग्रह साथ हो तो बुद्धिमान, नीतिमान, पुत्रों से युक्त तथा वाहनों से समृद्ध होता है।
हमारा अनुभव
इस स्थान में सभी लेखकों ने शुक्र के शुभ फल बतलाये है। किन्तु हमें कई बार अशुभ फलों का भी अनुभव मिला है। यह शुक्र पुरुष राशि में हो तो पुत्रसन्तति होती है। कन्या एक ही होती है और वह भी कई पुत्रों के बाद होती है अथवा होती ही नही। मेष, सिंह तथा धनु में यह शुक्र हो तो शिक्षा कम होने पर भी वे लोग विद्वान माने जाते है। चैन की प्रवृत्ति होने से पैसा बचता नही। नाटक या सिनेमा में अभिनेता के रूप में प्रसिद्ध होते है। ३६ वें वर्ष तक इन्हे स्थिरता नही मिलती। ये बहुत कामुक होते है। अतः अपनी पत्नी पर प्रेम होते हुए भी अन्य स्त्रियों से सम्बन्ध रखते है। सन्तति के लिए इन्हे इतनी फिक्र नही होती। मिथुन, तुला तथा कुम्भ में यह शुक्र हो तो शिक्षा पूरी होकर बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ प्राप्त होती है। ये अति कामुक और विद्वान होते है। शिक्षक, प्राध्यापक और लेखक होते है। इन्हें सन्तति नही होती। ग्रन्थों के कारण कीर्ति मिलती है। इन्हें किसी बुद्धिमान, सुशिक्षित स्त्री मित्र की बहुत चाह होती है। वह नही मिली तो उदास भाव से रहते है। इस योग में स्त्रियों को मासिक स्त्राव सम्बन्धी कष्ट होता है। स्त्राव कम जादा होता होना, दर्द होना, स्त्राव बन्द होना, प्रदर आदि विकार होते है। वन्ध्या होना भी सम्भव है। कर्क, वृश्चिक, मीन एवं वृषभ, कन्या तथा मकर राशियों में यह शुक्र हो तो बी.एस.सी., एम.बी.बी.एस., आदि विज्ञान की उपाधियां प्राप्त होती है। इन्हें कन्याएं अधिक होती है। पुत्र नही होते अथवा होकर जीवित नही रहते या बहुत वृद्ध आयु में पुत्र होता है। इन का अपनी पत्नी पर विशेष प्रेम या आसक्तिभाव नहीं होता। हमसफर मुसाफिरों जैसा घर में व्यवहार करते है। ये अपने व्यवसाय में मग्न, अभिमानी, लोगों की ओर ध्यान न देनेवाले होते है। पंचम के शुक्र से २० वें वर्ष से ही अवैध स्त्रीसुख प्राप्त करने की इच्छा होती है। यह द्विभार्या योग भी होता है। स्त्रीराशि में यह शुक्र हो तो विवाह सफल होता है। पुरुषराशि में शुक्र हो तो स्त्रियों के बारे में सात्त्विक आदर और उदात्त प्रेम होता है। इन की सन्तति चैनी और अन्त में दरिद्री होती है। स्त्रीराशि के शुक्र से स्त्री के बारे में विशेष आदर या प्रेम नही होता।
पंचमस्थ शुक्र अनेक पुत्र-पुत्री प्रदायक, दामाद का आदरणीय, धनी,विह्वान्, प्रसिद्ध, अभिनेता, सैक्सी महिलाओं के प्रति आकृष्ट, चतुर पत्नीवाला होगा।
-मानसागरी
जातक सम्पन्न, प्रभावशाली और राजा की भांति प्रसिद्ध होगा। वहसंतान सुख से युक्त व विद्वान् होगा।
-फलदीपिका
जातक प्रखर बुद्धि, मंत्री या सेनापति, दीर्घजीवी दादी वाला, युवतिपत्ी वाला, संतान व सरकार से सम्मान प्राप्त करेगा। उसकी पलनि कोसभी सुख मिलेंगे। यदि शुक्र पापाक्रान्त या पाप ग्रहों के भाव में यानीचस्थ है तो जातक मंद बुद्धि व अल्पसंतित होगा। यदि शुक्र शुभ ग्रहोंसे युत, स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक बहुत चतुर, लौकिक मामलोंमें दक्ष, वाहनों का स्वामी तथा जीवन की सुख सुविधाओं से युक्त होगा।
वह चतुर, बुद्धिमान्, राज्याधिकार जैसी क्षमताओं वाला, अच्छापरामर्शदाता, माँ को भारी (खतरा), सेनापति सुशिक्षित, सक्षम, सामाजिक,दयालु, अच्छे स्वभाव वाला पुत्रों की अपेक्षा अधिक पुत्रियों वाला, नम्रऔर मैत्रीपूर्ण तौर-तरीकों वाला होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
जातक ज्योतिर्विंद् होगा, अधिक रति के परिणामस्वरूप दृष्टि गवाँनेवाला, शत्रुओं से ग्रस्त और सम्पन्न होगा।
वृश्चिक, मिथुन या मकर लग्नों के लिए पंचमस्थ शुक्र उच्चराशि यास्वक्षेत्री होने के कारण अत्यन्त शुभ है। पंचम भाव में शुक्र भिन्न-भिन्नलग्नों में तदनुरूप ही भिन्न-भिन्न फल देता है।
पंचम स्थान में शुक्र हो तो जातक को पर्याप्त संतान सुख प्राप्त होता है। कन्यासंतान अधिक रहती है। जातक कामुक रहता है। मित्रों का सुख प्रप्त होता है,आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है। जातक सुंदर, विद्वान, सरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठितएवं अधिकारसंपन्न रहता है। किंतु उसका विशेष नाम नहीं रहता। वह काव्य,संगीत-कला का रसिक रहता है। वाहन एवं जमीन-जायदाद का सुख पर्याप्तमिलता है। संतान कार्यकुशल एवं शासन की ओर से सम्मान प्राप्त करती है।
यवन ज्योतिषविदों ने भी पंचस्थ शुक्र के अच्छे फल बतलाए हैं। उनकेअनुसार पांचवां वर्ष पिता के लिए भाग्योदयकारक एवं लाभदायी रहता है।
पाश्चात्य ज्योतिषविदों की राय में जातक राजसी स्वभाव का, विलासी एवंकामातुर रहता है। भौतिक घटनाओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। जातकस्थितप्रज्ञ, विद्वान एवं संपन्न भी रहता है। संतान कार्यकुशल रहती है।
पंचम भाव-पांचवें भाव में शुक्र हो तो जातक सुखी, न्यायप्रिय, वक्ता,बहुत विद्वान व प्रसिद्ध (अन्र्राष्ट्रीय स्तर का) कवि तथा प्रेमी हृदय (रोमांटिक)होता है। ऐसे जातक सन्तान से सुख पाता है। कलाकार भी हो सकता है। ऐसाजातक की सन्तानों में कन्याएं, अधिक होती हैं। मित्र वर्ग बढ़ा-चढ़ा होता है।जातक भोगी-विलासी, मौजमस्ती पर अधिक खर्च करने वाला, हंसमुख, विनोदीतथा धुन का पक्का होता है। शुक्र बलवान स्थिति में हो तो जुआ, लॉटरी, सट्टेआदि से आकस्मिक लाभ प्राप्त कराता है। या पैसे पड़े हुए मिलते रहते हैं।(आकस्मिक लाभ)। बुध से शुक्र की युति हो तथा चतुर्थेश पंचमेश का राशिपरिवर्तन हो तो क्लब, सिनेमा, खेल आदि में जातक की अधिक रुचि होती है।पंचम भाव तथा पंचमेश बलवान हो तो इन कार्यों में ख्याति भी मिलती है।लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक की सन्तानें ज्यादा होती हैं (लड़कियांअधिक) तथा घर बच्चों से भरा रहता है। रोटी-रोजी की कमी नहीं रहती। जातककवि या कलाकार होता है। यदि वह सात्विक विचारों के साथ जीवन जीता है तोउसका भाग्य, यश व सुख सब बढ़ते जाते हैं। परन्तु चरित्रहीन हो तो उसका भाग्यकटी पतंग की तरह पेड़ पर अटके जैसा होता है। अतः पांचवें शुक्र वाले जातक कोचाहिए कि वह अपनी आशिक मिजाजी पर नियंत्रण रखे और सूफी विचारों का बने।अग्निराशियों में शुक्र पंचमस्थ हो तो जातक शिक्षा पूर्ण न होने पर भी विद्वानकहलाता है। अदाकारी तथा कलाकारी से धनोपार्जन करता है, पर धन संचय नहींकर पाता, एक पत्नीव्रती नहीं होता। कामुक होता है। सन्तान हो या न हो इसकीचिन्ता नहीं करता। पृथ्वी तत्त्व राशियों में शुक्र जातक को विद्वान तथा विज्ञान याटेक्नोलॉजी की उच्च शिक्षा पाने वाला बनाता है। ऐसे जातक को पुत्रसुख या तोमिलता नहीं अथवा देर से मिलता है। जलराशियों में शुक्र हो तो जातक कचच्ची उम्रमें ही स्त्री सुख पाने वाला अथवा व्यभिचारी बन जाता है। शास्त्रकार के मत से-
सुपुत्रेपि कि यस्य शुक्रो न पुत्ने प्रयासेन कि यत्न संपादितार्थ।
व्युदक विनामन्त्र मिष्टासनाभ्याम धातन कियेत्कवित्वे न शक्ये॥
अर्थात् पंचमस्थ शुक्र हो तो जातक को पुत्र हो भी जाए तो भी उसे पुत्र जन्म
का फल प्रास नहीं होता (पुत्र सुख नहीं होता)। धनसंग्रह के प्रयास न करे तो भी
ऐश्वर्यवान होता है। मन को संतुष्ट करने वाले भोज्य पदार्थ मिलते रहते हैं। मन्त्र,
जप, इष्टदेवाराधन तथा कविता करने में समर्थ होता है। कवि, धनवान तथा उत्तम
भोगों को भोगने वाला होता है। शुक्र आविष्कार का भी कारक होता है।
पंचम भावः पंचमस्थ शुक्र यदि पुरुष राशि में हो तो पुत्र संतान ही उत्पन्नहोती है। अपवाद रूप में ही कन्या संतान पुत्रों के पश्चात उत्पन्न होती है। वायुराशि में बुध पंचम भावस्थ हो तो जातक अत्यधिक कामवासना से पीडितहोता है। हालांकि ऐसे लोग उच्च शिक्षित होते हैं। शिक्षक, प्राध्यापक अथवालेखक बनकर मान-सम्मान प्राप्त करते हैं। संतान सुख नहीं मिलता, पत्नीमधुरभाषी और विदुषी हो, ऐसी इच्छा अवश्य करते हैं। किसी स्त्री की इनराशियों का शुक्र पंचमस्थ हो तो उसे मासिक धर्म में गड़बड़ी रहती है, प्रदररोग या बन्ध्यत्व की भी संभावना रहती है। जल या पृथ्वी राशि का शुक्र हो तोकन्या संतान अधिक होती है। पुत्र या तो होते नहीं अथवा होते हैं तो मर जातेहैं। ऐसे जातक विज्ञान विषयक उपाधियां (एम.एससी. आदि) प्राप्त कर लेतेहैं। पंचमस्थ शुक्र होने से जातक भले ही अर्धशिक्षित हों लेकिन विद्वान मानेजाते हैं, आराम-तलबी उनके स्वभाव में होती है। अनाप-शनाप खर्च करनेकी आदत के कारण आर्थिक संकट आते रहते हैं। पुरुष राशि का शुक्र हो तोपत्नी के प्रति जातक आदर-भाव रखता है, स्त्री राशि का हो तो पत्नी के प्रतिविशेष ध्यान नहीं देता, अवैध स्त्री सुख प्राप्ति की इच्छा बनी रहती है।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,किसी भी क्षेत्र में यश कमानेवाला, संतान के विषय में सुखी एवं माता-पिताका आज्ञाकारी रहता है। महर्षि लोमश के मतानुसार जातक अल्पायु रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक संपन्न, विद्वानस्वाभिमानी, प्रतिष्ठित, अधिकारसंपन्न, चतुर, आस्तिक एवं संगीतादि कलाओंमें प्रवीण होता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक लोकप्रिय,आस्तिक, पुरुषार्थी, संपन्न, सुखी, सुंदर, मधुरभाषी, दीर्घायु एवं विद्वान होता है। ऐसे जातक के हस्ताक्षर बहुत सुंदर होते हैं। वह लेखक बन सकता है।उसे पैतृक संपत्ति मिलती है। संतान सुख उत्तम रहता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक संपन्न, संतानसुख से युक्त, कामातुर, परोपकारी, पुरुषार्थी एवं प्रसिद्ध रहता है। लेकिन वहधनसंचय नहीं कर पाता। महर्षि लोमश के मतानुसार पत्नी गर्ममिजाज होतीहै।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक संपन्न, संतानसे सुखी, कामातुर, परोपकारी, पुरुषार्थी एवं प्रसिद्ध होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक सुखी एवंसंपन्न होता है, धनसंग्रह कम रहता है। मित्र स्वार्थी एवं समय पर काम नआनेवाले होते हैं। जातक संगीतकला प्रवीण, दीर्घायु, सदाचारी, यशस्वी, चतुर,हर काम में सफल होनेवाला होता है, संतान विनम्र, आज्ञाकारी, दीर्घायु, धार्मिकएवं कार्यकुशल रहती है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक विद्वान, यशस्वी,सुखी एवं प्रभावी व्यक्तित्व का होता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक केहस्ताक्षर सुंदर होते हैं। वह विद्वान, लेखक, लोकप्रिय, पुरुषार्थी, मातृ-पितृभक्त,अल्पाहारी एवं सुखी रहता है। उसे उत्तम संतान सुख प्राप्त होता है। मानसागरीके अनुसार संतान अल्पायु रहती है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक संगीतज्ञ अथवा संगीतप्रेमी, संपन्न, संतान से सुखी, सरकारी कर्मचारी, परोपकारी एवं दीर्घायु होता है। महर्षि लोमश के अनुसार पत्नी गर्ममिजाज होती है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक कामातुर,कंजूस, यशस्वी, सरकारी कर्मचारी, विद्वान, परोपकारी एवं संतान सुख से युक्तहोता है।
11. कुंभ-कुंभ रशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक सुखी एवंसंपन्न जीवन जीता है लेकिन धनसंचय नहीं कर पाता। उसके विचार चंचलएवं अस्थिर होते हैं और संतान दीर्घायु, यशस्वी एवं कार्यकुशल होती है।
12. मीनमीन राशि का शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक प्रसन्नचित्त,यशस्वी, सुखी, संपन्न रहता है। उच्च का होकर भी यह शुक्र सप्तमेश एवंव्ययेश होने के कारण अच्छे फल नहीं देता।
1. बहन को चाँदी के गहने भेंट देवे।
2. अपनी मर्जी से विवाह करे।
3.दूध पानी में बहावें।
===========================6) षष्टम् भाव - षष्ठ स्थान (शत्रु भाव)षष्ठ स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - इन्होंने गुरु के समान फल बतलाये है। कल्याणवर्मा - अधिकमनिष्टं स्त्रीणां प्रचुरामित्रं निराकृतं विभवैः ।
विक्लवमतीव नीचं कुरुते षष्ठे भृगोस्तनयः।। इसे शत्रु बहुत होते है, धन नही होता। स्त्री के लिए अनिष्ट होता है। यह बहुत नीच और दुर्बल होता है।
पराशर - पराजयम्। सदा पराभव होता है।
वशिष्ठ - काव्यः मतिविहीनम अनल्परोगं रिपोः साध्वसम् । यह बुद्धिहीन होता है। इसे बहुत रोग होते है तथा शुत्रुओं से भय होता है।
गर्ग - नीचास्तगामी रिपुमन्दिरस्था करोति वैरं कलहागमं च। अन्यत्र शुक्रो रिपुदर्पहारी स्वर्क्षे तु षष्ठे हि सदातिसिद्धिः ।। इस स्थान में शुक्र अस्तंगत या नीच राशि में हो तो झगड़े और वैर निर्माण होते है। अन्य राशि में हो तो शत्रुओं का पराभव होता है। वृषभ या तुला में हो तो सर्वदा सफलता मिलती है। भीरु भूरिरिपुः स्त्रीणामनिष्टो विभवेप्सितः। विक्लवश्च भवेल्लग्नाद् भार्गव रिपुराशिगे।। यह डरपोक, बहुत शत्रुओं से युक्त, स्त्रियों को अप्रिय, धन का इच्छुक और दुर्बल होता है। भृगुः रिपुगेहे यदा भवेत् तदा भ्रातृस्वसृणां च मातुलानां महासुखम्। शुक्रः कन्यापत्योऽथ मातुलः। दशाधिपस्तीक्ष्णकरः प्रतिष्टः सहस्त्र नाथो रजनीकरश्च वक्रार्कजौ हीनदरौ सदैव। दोषाणि चन्द्रेण समाः पतंगाः।। इस स्थान में रवि दस दोष उत्पन्न करता है। चन्द्र तथा बुध, गुरु, शुक्र हजार दोष उत्पन्न करते है। मंगल और शनि दोषरहित होते है। इस स्थान में शुक्र हो तो भाईबहिने तथा मामा को सुख प्राप्त होता है। मामा को कन्याएं अधिक होती है।
बृहद्यवनजातक - अभिमतो न भवेत् प्रमदाजने ननु मनोभवहीनतरो नरः। विकलताकलितः किल संभवे भृगुसुतेऽ रिगतेऽरिभयान्वितः।। शुक्रो भूयुगवत्सरे रिपुमृतिम्।। यह स्त्रियो को प्रिय नही होता। कामेच्छा कम होती है। दुर्बल, डरपोक और शत्रुओं से युक्त होता है। आयु के ४१ वें वर्ष में शत्रुओं का नाश होता है।
नारायण भट्ट -सदा दानवेज्ये सुधासिक्तशत्रुर्व्यय शत्रुगे चौत्तमौ तौ भवेताम्। विपद्येत् संपादितं चापि कृत्यं तपेन्मन्त्रतः पूज्य: सौख्यं न धत्ते।। इस के शत्रु मीठा बोलनेवाले होते है। खर्च बहुत होता है। बना हुआ काम भी बिगडता है। इसे दूसरो की सलाह से क्रोध आता है। माता-पिता का सुख नही मिलता।
वैद्यनाथ – शोकापवादसहितो भृगुजे रिपुस्थे । इसे शोक तथा निन्दा के अवसर बहुत आते है।
मन्त्रेश्वर – विशत्रुमधनं क्षते युवतिदूषितं विक्लवम्। यह शत्रुरहित निर्धन दुर्बल तथा युवतियों द्वारा दूषित होता है।
काशीनाथ षष्ठे शुक्रे भवेद् दम्भी जाड्यहानिभयान्वित। दुःसंगी कलही तातद्वेषी चैव सदा नरः ।। यह ढोंगी, बुद्धिहीन, डरपोक, झगडालू, बुरी संगति में रहनेवाला, पिता से द्वेष करनेवाला तथा नुकसान सहनेवाला होता है।
जागेश्वर-सदा गीतनृत्ये भवेच्चित्तवृत्तिः परं बैरिवृन्दस्य नाशो नराणा। सदातो भवेद् रोगयोगादिचिन्ता यदा शत्रुगोऽदेवपूज्यो न पूज्यः ।। यह नाचगानो में आसक्त रहता है। शत्रुओं का नाश करता है। इसे सदा रोगो से चिन्तित रहना पड़ता है और सन्मान प्राप्त नही होता।
आर्यग्रन्थ - भवति वै कुशलोद्भवपण्डितो रिपुगृहे भृगुजेऽ स्तगते नरः । जयति वैरिबलं निजतुंगङ्गे भृगुसुते सुखदे किल षष्ठगे।। यह शुक्र अस्तंगत हो तो वह कुशल, पण्डित तथा शत्रुओं को जीतनेवाला होता है। उच्च राशि में हो तो सब सुख मिलता है।
जयदेव - स्त्रीसौख्यहीनस्तनुरोगभाग् नरो विभृत्ययुक्तो मलिनः सितेऽरिगे।। इसे स्त्री सुख और वैभव नही मिलता। यह मलिन और रोगी होता है।
पुजराज - शत्रुस्थाने यदा शुक्रस्तदा मातृष्वसुः सुखम् । त्रयाणांच द्वयोर्वापि वक्तव्यं दैववेदिना।। इसे दो या तीन मौसियां होती है।
हरिवंश अकामुकः सुकामिनीसुपौरुषेण वर्जितः कलिप्रिय कुकर्मकृद् भवेत् कुसंगसैरतः । रुजांगदुर्बलो जडोऽतिदंभलोभसंयुतः शंकया नरः सुरारिपेऽरिगेहगेऽकविः ।। इसे अच्छी स्त्री नही मिलती और कामेच्छा नही होती। यह दुर्बल, रोगी, झगडालू, बुरे काम करनेवाला, बुरी संगति में रहनेवाला, बुद्धिहीन, दोंगी, लोभी और हमेशा शंकाओसे चिन्तित होता है।
लखनऊ के नवाब - यारो न कम सहबद बेदर्दो जाहिलो जातः। खलु जोहरा वै दुश्मनखाने बेदिलो भवति।। इसे मित्र नही होते। यह अभिमानी, निर्दय, मूर्ख और निरोगी होता है।
घोलप यह निर्भय, दुराचारी तथा हमेशा रोगो से पीडित होता है। दुष्टो की संगति से और अपने दुर्गुणो से भी राजदरबार में कृपाहीन हो कर यह निर्धन होता है। इस के परिवारवाले, कुटिल स्वभाव के होते है।
हिल्लाजातक - एकवेदमिते वर्षे, षष्ठः शस्त्रमृतिप्रदः । इस की *मृत्यु शस्त्रघात से ४१ वें वर्ष में होती है।
गोपाल रत्नाकर - यह शत्रुओं का नाश कर अपनी जाति का हित करता है। परस्त्रीगमन करता है। पोते होने तक जीवित रहता है। स्त्री रोगी होती है।
पाश्चात्य मत - यह निरोगी होता है किन्तु अतिश्रम से स्वास्थ्य बिगड़ता है। इसके मित्र अच्छे होते है। यह नियमित नहीं होता। इसे सुख और वैभव अच्छा मिलता है। अपने नाम से स्वतन्त्र व्यवसाय में इसे अच्छा लाभ नही होता। नौकरी के रूप में यशस्वी होता है। अच्छे नौकरों से इसे लाभ होता है। यह शुक्र शुभ सम्बन्ध में हो तो अच्छे कपड़ों की रुचि रहती है। नौकरी से और नौकरों से लाभ होता है। विवाह के बाद आहारविहार नियमित रखने से प्रकृति अच्छी रहती है। यही शुक्र अशुभ सम्बन्ध में हो तो अति विषयभोग से स्वास्थ्य गिरता है। जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग होते है। मूत्रपिण्ड के विकार, मधुमेह, उपदंश आदि तथा गले के रोग होते है।
भृगुसूत्र - ज्ञातिप्रजासिद्धिः। शत्रुक्षयः। मदनः। नेत्रव्रणः । पुत्रपौत्रवान्। अपात्रव्ययकारी। मायावादी रोगवान्। भावाधिपे बलयुते शत्रुज्ञातिवृद्धिः। शत्रुपापयुते नीचस्थे शत्रुज्ञातिनाशः।। इसकी जाति के लोग तथा सन्तति अच्छी होती है। शत्रु नष्ट होते है। कामुक होता है। आँख में जखम होती है। यह बच्चों और पोतोंसे युक्त होता है। अयोग्य बातों में खर्च करता है। कपटी, रोगी होता है। षष्ठेश बलवान हो तो शत्रु बढ़ते है। वही शत्रु या पाप ग्रह की राशि में अथवा नीच में हो तो शत्रुओं का नाश होता है।
हमारे विचार - इस स्थान में शुक्र के फल कुछ लेखकों ने बहुत अच्छे और कुछ ने बहुत अशुभ बतलाये है। शुभ फल पुरुष राशि के और अशुभ फल स्त्री राशि के प्रतीत होते हैं।
जातक का जन्म शिक्षित परिवार में और वह स्वयं भी विद्वान होगा।यदि शुक् स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो वह शत्रुजित् और हमेशा खुश रहनेवाला होगा।
-मानसागरी
वह सम्पत्ति गवाँने वाला, परन्तु शत्रु रहित व प्रसन्नचित्त होगा। उसकेअनेक युवतियों से अवैध संबंध होगें और. आनन्द लेगा।
-फलदीपिकाजातक के अनेक शत्रु, सम्पत्ति नाश, पत्नी को नापसंद करने वाला,नीच तथा भयभीत होगा।
-सारावलीजातक के बहुत से संबंधी होंगे। वह शत्रुहन्ता होगा। पुत्र-पौत्रों सेयुक्त होगा। वह दगाबाज, रोगी व अपव्ययी होगा। यदि षष्ठेश बली है तोसंबंधियों और शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है। यदि पष्ठेश पापयुत, नीच याचच्ट्रयुत है तो संबंधियों की हानि व शत्रुओं का नाश होगा।
-भृगु
वह नैतिकता में पिछड़ा हुआ, शत्रुरहित, गंदी आदतों से ग्रस्त, क्रोधी,भली प्रकार से परिचित, नीच मानसिकता वाला, शत्रुहन्ता और स्त्रियों केप्रति आसक्त होगा।
जातक के शत्रुओं का कभी नाश नहीं होगा (नारायण भट्ट तथाजीव नाथ)। कुछ ज्योतिषाचार्यों का मत है कि-षष्ठस्थ शुक्र बिनासमुचित कारण वैर व शत्रुता भाव का कारण होता है। जातक दयनीयतथा रोगी होगा। भारत की भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी काशुक्र छठे भाव में था।
हमारा अनुभव - यह शुक्र वृषभ, कन्या या मकर में हो तो पत्नी अच्छी मिलती है। झगडालू होने पर भी प्रेम से रहती है। उसे ३० वे वर्ष के बाद कुछ व्याधि होती है। कामुक होने पर भी ये लोग बाहर के माथों का अवलम्ब नही करते। इन्हें हमेशा कर्ज बना रहता है। एक कर्ज चुकाते चुकाते ही दूसरा तैयार हो जाता है। मृत्यु भी ऋणी स्थिति में ही होती है। इनकी कन्या विधवा होकर पिता के आश्रय से रहती है। व्यवसाय में और सन्मान के बारे में जलदी प्रगति नही होती। पत्नी गरीब परिवार की होती है। सन्तति कम होती है। अति खाने से रोग होते है। कर्क, वृश्चिक या मीन में यह शुक्र हो तो व्याभिचारी प्रवृत्ति होती है। दूसरा विवाह हो सकता है। यह शुक्र पुरुष राशि में हो तो पत्नी पुरुषी पद्धति की - सुन्दर, आवाज कुछ कर्कश और केश अधिक-इस प्रकार की होती है। स्त्री राशि के शुक्र से जनानी कोमलता से युक्त स्त्री मिलती है। किन्तु उसके विचार पुरुषों जैसे होते है। सन्तति कम होती है। व्यवसाय पर इस शुक्र का बहुत परिणाम होता है। अपनी पूंजी लगा कर किये गये व्यवसाय बिलकुल असफल होते है। शुक्र के कारकत्व के व्यवसायों में भी नुकसान ही होता है। बिना-पूंजी के धन्धे ही अच्छे हो सकते है। स्त्री राशि के शुक्र से मामा-मौसियों की स्थिति अच्छी नही होती। पुरुष राशि के शुक्र से सुख मिलता है। २८ वें वर्ष नुकसान होता है। ३६ वे वर्ष या ४० वें वर्ष पत्नी की प्रकृति अस्वस्थ होती है।
ज्योतिषाचायों ने षष्ठस्थ शुक्र के फल अशुभ बताए हैं। ऐसे जातक के शत्रुबहुत होते हैं और उसे पत्नी का सुख प्राप्त नहीं होता। आर्थिक स्थिति साधारणरहती है, जीवन सुख वैभव से युक्त नहीं रहता, स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं रहता।शुक्र नीच का या शत्रु क्षेत्र का हो तो जातक को अशुभ फल अधिक मिलेंगे।इसके विपरीत उच्च, स्वक्षेत्र का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो शुभ फल अधिकमिलेंगे। जातक को भाई-बहन, मामा-मौसी का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है।माता-पिता के सुख में कमी रहती है। गुप्त शत्रु बहुत होते हैं और मित्र बनकरहानि पहुंचाते हैं। जातक शक्की रहता है। अपने हित की बातें भी वह अनसुनीकरता है। शुक्र कमजोर हो तो नेत्ररोग होते हैं, पुरुषत्व की भी कमी रहती है।
पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार ऐसे जातक के लिए अधिक परिश्रमकरना हानिकर होता है। वह बौद्धिक कार्य कर सकता है। नौकरी में यश पाता है, व्यवसाय में असफल होता है। विषयभोग का अतिरेक होने से मूत्रविकार, मधुमेह, उपदंश, गुप्तरोग, गलेके विकार होते हैं।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार 41वें वर्ष में जातक को शत्रु एवं शस्त्र भयरहता है। वह स्त्रीवश में रहता है, पुरुषत्व की कमी होती है। जातक अभिमानीहोता है।
षष्ठ भाव-यदि शुक्र लग्नकुंडली के छठे भाव में हो तो जातक के अनेकमित्र होते हैं। जातक भाग्यवादी परंतु अनैतिक कार्य करने वाला, संगीतप्रेमी होताहै। किन्तु उसे मूत्र, वीर्य या गुप्तांग सम्बन्धी रोग हो सकते हैं। उसके पौरुष पर भीप्रश्नचिह्न होता है (यदि शुक्र अशुभ स्थिति में हो तो जातक नपुंसक या स्त्री कोसंतुष्ट करने व सन्तानोत्पति में असमर्थ होता है)। मेरे सुयोग्य आचार्य श्री मदनमोहन
कौशिक के अनुसार ऐसे जातक के शुत्र नहीं होते।
लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक उल्टे-पुल्टे कार्य करता है परन्तु ईश्वरउसके कार्यों को सीधा कर देता है। ऐसे जातक को अपना विवाह उससे करानाचाहिए जो अपने मां-बाप की इकलौती संतान न हो अन्यथा शुक्र यहां अशुभप्रभाव देता है। जिससे स्त्री सुख में कमी व सन्तान उत्पत्ति में समस्याएं आती हैं।ऐसे जातक के शत्रु कभी समास नहीं होते, सदा दुख देते रहते हैं। मानसिक शांतिको भंग करते रहते हैं। षष्स्थ शुक्र से जातक की कामेच्छा तीव्र होती है, किन्तुजलराशि में शुक्र हो तो जातक को व्यभिचारी बना देता है। पृथ्वी राशि में
अतिमैथुन से स्वास्थ्य खराब होता है। मुत्रविकार, उपदंश, प्रमेह, वीर्याल्पता तथा
गुप्त रोग या जननेन्द्रिय रोग तीव्रता से सम्भव होते हैं।
जातक ऋणग्रस्त. रहता है। पत्नी अच्छी मिलती है। झगड़ालू होती है किन्तु प्रेम
जताकर मना लेती है। पुरुष राशि का शुक्र सुन्दर पत्नी दिलाता है किन्तु वह
कर्कशा होती है। स्त्री राशि का शुक्र कोमलांगिनी पत्नी दिलाता है परन्तु वह पुरुष
जैसे विचारों वाली होती है। ऐसे जातक के मामा-मौसी की स्थिति अच्छी नहीं
रहती। पूंजी अधिक लगाए तो व्यवसाय में जातक को हानि होती है। कम पूंजी
लगाए तो लाभ होता है। अतः ऐसे जातक को लघु उद्योग ठीक रहते हैं।
षष्ठम भावः षष्ठम भावस्थ शुक्र पुरुष राशि में हो तो जातक की स्त्रीसुंदर किंतु कठोर वाणी वाली होती है। स्त्री राशि में हो तो देह से कोमल परन्तुस्वभाव से पुरुष सरीखी होती है। अल्प संतान उत्पन्न होती है, स्वधन से यदिजातक व्यापार करता है तो असफल रहता है। भले ही उस व्यवसाय पर शुक्रका ही अधिकार क्यों न हो। बिना धन के किए गए कार्य-व्यवसाय सफल होते हैं। मामा-मौसियों के लिए यह स्थिति अशुभ फलप्रद रहती है। पुरुषराशि का हो तो मामा-मौसियों को सुख मिलता है। पृथ्वी राशि का शुक्र छठेभाव में हो तो जातक की पत्नी सुंदर और झगड़ालू होती है लेकिन परिवार मेंप्रेमपूर्वक रहती है। ऐसे जातक कामुक होकर भी परकीया का सेवन नहींकरते, ऋण लेकर चुकता नहीं कर पाते, फलतः मृत्युपर्यन्त ऋणी बने रहते हैं।कोई एक पुत्री विधवा होती है तथा उसका भरण-पोषण करना पड़ता है।बहुभोजी होते हैं, फलत: रोगी हो जाते हैं। अति विषयासक्त होने से जननेन्द्रियसंबंधी रोग, मूत्रपिण्ड के विकार, प्रमेह, उपदंश एवं गले के रोग होते हैं। जलराशि का शुक्र व्यभिचारी बनाता है।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक क्रोधी, गर्ममिजाज,आचरणहीन, परस्त्रीगमन करनेवाला, नेत्ररोगी एवं कंजूस रहता है। बुद्धि अच्छीएवं संतान सुख में बाधा रहती है। पति-पत्नी में मतभेद एवं झगड़े होते हैं।पत्नी रोगी होती है। उसके संसर्ग से तपेदिक या यौन रोग होते हैं। जातकअल्पायु होता है।
2. वृषभ--वृषभ राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक बहुत अभिमानीरहता है। नजदीकी रिश्तेदार एवं भाई-बहनों से उसका विरोध रहता है, स्वास्थ्य मध्यम रहता है। चोर या डाकुओं के हाथों उसकी मौत होती है। जातक चतुर,यशस्वी एवं परोपकारी होता है।
3. मिथुन-मिधुन राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक बचपन मेंरोगी रहता है। यौवनावस्था में कामातुर एवं झगड़ालू बनता है। शत्रु बहुत होतेहैं। मां का चरित्र संदेहास्पद रहता है। नौकरी के विषय में यह शुक्र मिश्रितफलदायी होता है। फिर भी जातक अधिकारसंपन्न होता है। उसे संतान सुखसे वंचित रहता पड़ता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक कामातुर, परस्त्रीआसक्त, स्वाभिमानी, शत्रुओं से घिरा हुआ, पिता से मतभिन्नता रखनेवाला,दंतरोगी, विकराल दातोंवाला, दिखने में विद्रूप एवं निद्रालु रहता है। प्रेमसंबंधबनाने में जातक चतुर रहता है। ज्येष्ठ भ्राता एवं माता के सुख से वह वंचितरहता है। समाज कार्य में अपयश प्राप्त होता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक को जल, सर्पएवं विषाक्त जीव-जंतुओं से डर रहता है। नेत्र रोगों का कष्ट रहता है। बांधवोंएवं मामाओं का सुख नहीं मिलता। शत्रु अधिक होते हैं। महर्षि लोमश केमतानुसार जातक के मामी से अनुचित संबंध रहते हैं। जातक की पत्नी केअपने मामा से अनुचित संबंध रहते हैं।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक गुप्तरोगी एवंअल्पायु होता है। शत्रुओं से परेशानी रहती है, पत्नी रोगी रहती है। उसके साथअनबन रहती है। पत्नी के संसर्ग से यौन रोग होते हैं। पति-पत्नी दोनोंगर्ममिजाज एवं स्वाभिमानी होने से दांपत्य जीवन में दरार रहती है। यवनाचायोंके मतानुसार जातक धन-संपत्ति एवं शत्रुरहित होता है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक पराक्रमी, संपन्नएवं दीर्घायु होता है। स्वजातीय लोगों एवं परिवारजनों से उसका बैर रहता हैजबकि बाहर के लोगों से मैत्रीभाव रहता है। माता-पिता का सुख उत्तम रहताहै। जमीन-जायदाद बड़ी मात्रा में रहती है। दो विवाह होने का योग रहता है।8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक रोगी,शस्त्रप्रिय, परस्त्रीगामी, गर्ममिजाज किंतु बुद्धिमान रहता है। संतान सुख में न्यूनता और माता से मतभिन्नता रहती है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक सर्वसुख, वैभवप्राप्त होते हुए शरीर रोगग्रस्त होने से उसके उपभोग से वंचित रहता है। उसेजन्म स्थान से दूर रहना होता है, समाज में मान्यता प्राप्त होती है। जातक क्रोधीएवं परस्त्रीगामी होता है, धन का दुरुपयोग करता है। शत्रु अधिक होते हैं।चोरी या डकैती के कारण धनव्यय होता है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक आर्थिक दृष्टि से संपन्न, चतुर एवं अधिकारसंपन्न रहता है। राजसत्ता एवं उच्चाधिकारियों से मतभेद रहते हैं। फलस्वरूप जीवन संकटग्रस्त रहता है। नेत्रोग का कष्ट रहता है। महर्षि गर्ग एवं लोमश के मतानुसार जातक की मां का चरित्र संदेहास्पद
रहता है एवं जातक के अपनी मामी से अनुचित संबंध रहते हैं।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक के कई प्रेम प्रकरण रहते हैं। प्रत्येक कार्य में विष्न-बाधा रहती है। शत्रु अधिक रहते हैं।मामा एवं ज्येष्ठ भ्राता से प्रेम एवं सुख प्राप्त नहीं होता।
12. मीन-मीन राशि का शुक्र षष्ठ स्थानों में हो तो जातक पराक्रमी, संपन्नएवं दीर्घायु होता है। शत्रु अधिक रहते हैं। उसे माता, मामा, संतान एवं वाहन का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है। दो विवाह होते हैं। आयुयोग उत्तम रहते हुए भी स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। बचपन में जल, सर्प एवं शस्त्र भय रहता है। नेत्रविकार भी त्रस्त करते हैं।
1. ससुराल से कुछ सिक्के के रूप में मांगे व भेंट स्वरूप लेवे तो भाग्यबदलेगा।
2. चमड़े की वस्तु (पट्टा) न पहने।
3. नारियल को पानी मेंबहावें कुंकुम का टीका लगावे।===========================7) सप्तम् भाव- सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)सप्तम स्थान के शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - प्रियकलहोऽस्तगते सुरतेप्सुः । कंदर्पगे कलहकृत् सुरताभिलाषी।। यह झगड़ालू और कामुक होता है।
कल्याणवर्मा - अतिरूपदारसौख्यं बहुविभवं कलहवर्जित पुरुषं। जनयति सप्तमधामनि सौभाग्यसमन्वितं शुक्रः ।। इस की पत्नी बहुत सुन्दर होती है। यह धनवान, भाग्यवान तथा झगड़ों से दूर रहनेवाला होता है।
वैद्यनाथ - वेश्यास्त्रीजनवल्लभश्च सुभगो व्यंगः सिते कामगे। यह वेश्या तथा स्त्रियों को प्रिय, भाग्यवान किन्तु शरीर में कुछ व्यंग होता है। शुक्रे मन्मथराशिगे बलवति स्त्रीणां बहूनां पतिः । यह शुक्र बलवान हो तो इसे बहुत स्त्रिया मिलती है। शुक्रे सौभाग्यसंयुक्ता श्रीमतीच बलान्विते। यह शुक्र बलवान हो तो पत्नी भाग्यवान और धनवान होती है। पराशर सप्तमस्थ गुरु के समान फल बतलाये है।
गर्ग - युवतिमन्दिरगे भृगुजे नरो बहुसुतेन धनेन समन्वितः । विमलवंशभवप्रमदापतिर्भवति चारुवपुर्मुदितः सुखी।। यह पुत्रो तथा धन से युक्त सुन्दर, आनन्दी तथा सुखी होता है। इस की स्त्री कुलीन होती है। शुक्रे यौवनाढ्या। गौरी सुरूपां स्फुटपंकजाक्षीं सितः शुभर्क्षे शुभदृष्टयुक्तः । भौमांशकगते शुक्रे भौमक्षेत्रगतेऽथवा ।। भौमेन युतदृष्टे वा पर स्त्रीभोगमिच्छति।। पत्नी तरुण होती है। यह शुक्र शुभ राशि में, शुभ ग्रह के साथ या दृष्टि मे हो तो स्त्री बहुत सुन्दर, गोरे वर्ण की और कमलो जैसे आँखोवाली होती है। यह शुक्र मंगल के साथ, दृष्टि में, नवांश में या मंगल की राशियों में हो तो परस्त्रीगमन की प्रवृत्ति होती है।
बृहद्यवनजातक - बहुकलाकुशलो जलकेलिकृद् रतिविलासवि धानविचक्षणः । अधिकृतां तु नटीं बहु मन्यते सुनयनाभवने भृगुनन्दने।
यह कलाओं में कुशल, जलक्रीडा करनेवाला, काम क्रीडा में निपुण तथा किसी अभिनेत्रीपर प्रेम करनेवाला होता है। मनुके सित स्त्री वर्षों। १४ वें वर्ष स्त्री प्राप्ति होती है।
वसिष्ठ - जनमनोहरा, सशोकम्। इस की स्त्री बहुत आकर्षक होती है। इसे शोक के प्रसंग बारबार आते है।
वेंकटेश्वरशर्मा - शुक्रे कलत्रेत्वतिकामुकः स्यात्। गर्भिणीसंगमो भृगौ। जलं। वाणिज्याद् विभवागमम्ः। यह बहुत कामुक होता है। गर्भवती से भी क्रीडा करता है। जलक्रीडा करता है। व्यापार में धनलाभ होता है।
जयदेव - कलिप्रियो गीतरुची रतिप्रियः श्रेष्ठोऽम्बुलीलाकुशल: सितेऽस्तगे। यह झगड़ालू, गायन तथा कामक्रीडा में आसक्त, जलक्रीडा में प्रवीण और श्रेष्ठ होता है।
मन्त्रेश्वर - सुभार्यमसतीरतं मृतकलत्रमाढ्यं मदे ।। इस की पत्नी अच्छी होती है किन्तु उस की मृत्यु जलदी होती है। यह धनवान और व्याभिचारी होता है।
काशीनाथ - सप्तमे भृगुपुत्रे स्याद् धनी दिव्यांगनायुतः । नीरोगः सुखसंपन्नो बहुभाग्यश्च जायते।। यह धनवान, उत्तम स्त्री से युक्त, नीरोग:, सुखी और बहुत भाग्यवान होता है।
नारायण भट्ट - कलत्रे कलत्रात् सुखं नो कलत्रात् कलत्रं तु शुक्रे भवेद् रत्नगर्भ। मविलासीधिको गण्यतेच प्रवासी प्रयासाल्पकः के न मुह्यन्ति तस्मात्।। इसे स्त्रीसुख अच्छा नही मिलता किन्तु पुत्र भाग्यवान होते है। यह बहुत विलासी, प्रवास करनेवाला, कम कष्ट करनेवाला और बहुत आकर्षक होता है
जागेश्वर - भृगुर्गौरवर्णो वरिष्ठां। इस की स्त्री गौर वर्ण की और श्रेष्ठ होती है। कलत्रात् सुखं लभ्यते तेन पुंसा भवेत् किन्नरः
किन्नराणां च मध्ये। स्वयंकामिनी वै विदेशे रतिः स्याद् यदा शुक्रनामा गतः शुक्रभूमौ। इसे स्त्रीसुख प्राप्त होता है। यह गायन में कुशल होता है। तथा परस्त्रियों से आसक्त होता है।
गौरीजातक - लग्नात् सप्तमगः शुक्रो जन्मकाले यदा भवेत्। पुरुषार्थीर्विहीनः स्यात् शंकितश्च पदे पदे ।। यह पुरुषार्थ नही करपाता और सदा शंकायुक्त होता है।
लखनऊ के नवाब - साहेबदर्दः कुशलः सकलकलासु फारसो ना स्यात्। जोहरा हफ्तुमखाने स्त्रीगणचिन्तासु रंजको भवति।। यह दयालु, सब कलाओं में कुशल, चतुर और स्त्रियों के बारे में चिन्तातुर होता है।
हरिवंश - उदारबुद्धिमुज्वलांगमुन्नतिं कुलेऽधिकां नृप्रतापमूर्जितं प्रसन्नता प्रवीणतां । न रोगतां सुभोगतां करोति मानवस्य चेत् सुकामिनीः सुखाधिकं भृगुः सुभामिनीगृहे।। इस की बुद्धि उदार, शरीर उज्वल, कुल उन्नत, तथा प्रतापी राजा जैसा होता है। यह प्रसन्न, प्रवीण, निरोगी, उपभोगोंसे युक्त और अच्छी स्त्रीसे सुख प्राप्त करनेवाला होता है। गोपाल रत्नाकर यह बहुत कामुक, परस्त्री में आसक्त, वैभवशाली और दुराचारी होता है। यह शुक्र शनि से युक्त हो तो इसकी स्त्री व्याभिचारी होती है।
घोलप - स्त्री, पुत्र, धन, बल, गुण आदि से यह सुखी होता है। गौर वर्ण का, सत्संगति में रहनेवाला, अजेय, देव गुरु तथा अतिथियों का सन्मान करनेवाला एवं धन का विशेष व्यय करनेवाला होता है। षड्वर्ग कुण्डली में सप्तमेश शुक्र हो तो सप्तम पर शुक्र दृष्टि हो तो अनेक स्त्रियों का उपभोग करता है। हिल्लाजातक - स्त्रीलाभकृत् सप्तमगः। स्त्रीलाभ होता है।
पाश्चात्य मत - इस स्थान में शुक्र निसर्गतः बलवान होता है। इस व्यक्ति का विवाह कम उम्र में ही सुन्दर और सद्गुणी युवती से होता है। तथा विवाहसुख अच्छा मिलता है। विवाह के बाद भाग्योदय होकर धनलाभ विपुल होता है। इस शुक्र से साझीदारी में तथा कचहरियों के मामलों में सफलता मिलती है। गायन, नाटक आदि लोगों के मनोरंजन के साधनों से सम्बन्ध रहता है। सार्वजनिक स्वरूप के व्यवहारों में यह अच्छी सफलता प्राप्त करता है। इन व्यवहारों में झगडों की सम्भावना भी नही होती। इस व्यक्ति को स्त्री, पुत्र, मित्र, साझीदार आदि से अनुकूल व्यवहार प्राप्त होने से सुखी जीवन व्यतीत होता है। पुत्रों पर विशेष प्रेम होता है। यह शुक्र वृश्चिक या मकर में हो तो व्याभिचारी वृत्ति होती है। यह शुक्र दूषित हो तो विवाह देर से हो कर स्त्रीसुख अच्छा नही मिलता। साझीदार तथा मित्रों से नुकसान होता है।
भृगुसूत्र - अतिकामुकः । भगचुंबकः । अर्थवान्। परदाररतः । वाहनवान्। सकलकार्यनिपुणः । स्त्रीद्वेषी। सत्प्रधानजनबन्धुकलत्रः । पापयुते शत्रुक्षेत्रे अरिनीचगे कलत्रनाशः, विवाहद्वयम् । बहुपापयुते अनेक कलत्रान्तरप्राप्तिः। पुत्रहीनः । शुभयुते उच्चे वृषभे तूले कलत्रदेशे बहुवित्तवान्। कलत्रमूलेन बहुप्राबल्ययोगः । स्त्रीचिंन्तकः ।। यह बहुत कामुक, परस्त्रियों में आसक्त, धनवान, वाहनो से युक्त, सब कामों में निपुण, स्त्रियों का द्वेष करनेवाला होता है। इस के सलाहगार, आप्त, स्त्री आदि अच्छे होते है। यह शुक्र पापग्रह के साथ, शत्रुग्रह की राशि में या नीच में हो तो पत्नी की मृत्यु होकर दूसरा विवाह होता है। बहुत पापग्रह साथ हो तो अनेक विवाह होते है। पुत्र नही होते । शुभग्रह के साथ, उच्च में या वृषभ अथवा तुला में यह शुक्र हो तो वह धनवान होता है। स्त्री के सम्बन्ध से इसे बहुत उन्नति प्राप्त होती है। स्त्री के ही विषय में वह बहुत चिन्ता करता है।
हमारे विचार - इस स्थान में शुक्र निसर्गतः बलवान है। क्यों कि नैसगिक कुण्डली में यह सप्तमेश होता है। अतः इस स्थान में शुभ फल ही मिलने चाहिये। पुराणों में शुक्राचार्य को दैत्यों का गुरु तथा ज्ञानी कहा गया है। सप्तम की तुला राशि का स्वरूप भी ज्ञान एवं पौरुष का द्योतक है। इस स्थान में नारायणभट्ट एवं लखनऊ के नवाब को छोड अन्य लेखकों ने शुभ फल बतलाये है। इनका अनुभव पुरुष राशि में अच्छा मिलता है। अशुभ फल स्त्री राशि में मिलते है। नैसर्गिक कुण्डली में धन और सप्तम इन दोनो मारक स्थानों का स्वामी शुक्र है। अतः कुछ लेखकों ने इसके अशुभ फल बतलाये है।
सप्तमस्थ शुक्र धन की वर्षा करने वाला होगा। जातक अनेक पुत्रोंका पिता होगा और उसका विवाह उच्चप्रतिष्ठित परिवार की कन्या सेहोगा। वह स्वयं सुदर्शन, स्वस्थ और अच्छी देह वाला होगा। वह प्रसन्नऔर सुख-सुविधा सम्पन्न होगा।
-मानसागरी
जातक विश्वस्त और सुन्दर पत्नी से युक्त होगा। परन्तु कालान्तर मेंउसका वियोग प्राप्त करेगा। वह धनी और बुरी औरतों से संबद्ध रखनेवाला होगा।
-फलदीपिका
वह अत्यधिक सैक्सी और मुखचुम्बन का शौकीन होगा। वह सम्पन,अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य महिलाओं में रूचि रखने वाला, वाहनोंका स्वामी, काम करने में चुस्त, स्त्री संसर्ग में पाप प्रवृत्त और भाईयों वपत्नी से युक्त होगा।
यदि शुक्र पापयुत या पाप ग्रह के भाव में (सिदृयु)' या नीचस्थ है।तो वह पत्नी का दुख देखे, परन्तु पुनर्विवाह करने वाला होगा। यदि शुक्रएकाधिक पाप ग्रहों से युत है तो वह पत्नी की मृत्यु के कारण अनेकोंविवाह करने वाला और संतानहीन हो सकता है।
यदि शुक्र का शुभग्रहों से दृष्टि-युत-स्थिति (सिदुयु), स्वक्षेत्री याउच्च राशि में हो तो जातक ससुराल से प्राप्त उपहारों से धनी हो जाए।वह स्त्रियों से घिरा रहने वाला तथा पत्नी की मदद से प्रभावशाली होगा।
-भृगु
सप्तमस्थ शुक्र जातक को प्रसन्नतादायक होता है। जातक अपनीपतली को नापसंद करने वाला, अनेक शत्रुओं वाला, विपन्न, नीचमानसिकता वाला, सुन्दर, सुशील व उत्तम पत्नी वाला और भयभीत होगा।
-सारावली
वह शान्त, तृप्त, व्यसनी, सुखी विवाहित जीवन वाला, यौन सुख केप्रति आसक्त तथा दैहिक मनोवृत्ति वाला होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
शुक्र मनोभाव, प्रेम महिला-वर्ग आदि का द्योतक है। सप्तम भावमें शुक्र की स्थिति-‘कारक अपने भाव में’ जैसी है जो भाव की महत्तासमाप्त करती है। सप्तम भाव की विशिष्टता शुक्र वाली ही है। जिससेजातक अत्यधिक (सैक्सी) कामुक, जिसकी एक पतनि से तृप्ती न होऔर उसके कई संबंध हों। लौकिकता के ग्रह शुक्र की स्थिति जातक कोधनी, सुख सुविधा सम्पन्न, वाहनों से युक्त करती है। अपनी सम्पत्ति वप्रतिष्ठा के कारण वह महिलाओं का प्रिय बन जाता है।
यददि शुक्र गुरू युत या दृष्ट हो तो जातक का वैवाहिक जीवन प्रसन्न,सुशील व पवित्र पत्नी और जातक स्वयं भी पत्नीव्रतधारण करने वालाहोगा।
जातक अनेक विद्याओं का ज्ञाता, धनी, राजनीतिज्ञ, पानी के खेलों मेंमाहिर, व्यापार व व्यवसाय में लाभ प्राप्त करने वाला होगा।
सप्तम भाव में शुक्र की स्थिति अनेकचार्यों के मतानुसार विवाह के संदर्भ में अच्छी नहीं है, क्योंकि सप्तम भाव सहभागिता का प्रतिनिधित्वकरता है। सप्तम में शुक्र महिलाओं से संगति या साझेदारी या मित्रता पूर्ण संबंध बताता है।
हमारा अनुभव
यह शुक्र, मेष, मिथुन या तुला में हो तो स्त्री का सौन्दर्य पुरुष जैसा होता है। चेहरा कुछ लम्बा, आँखे तेजस्वी, ऊंचा कद प्रमाणबद्ध शरीर, लम्बे और घने केश, आवाज हुकूमत से भरी हुआ- इस प्रकार रुप होता है। वह बुद्धिमान, संसार में दक्ष, परिवार में मिलजुल कर रहनेवाली, पति को प्रिय, कामुक, धैर्यशाली, आनन्दी, कलाओं में कुशल तथा सुशिक्षित होती है। पति पर अधिकार रखती है। इसे सन्तति कम होती है। पति की अति कामुकता से इसे शारीरिक विकृति से कष्ट होता है। सिंह या कुम्भ में यह शुक्र हो तो स्त्री शरीर से मोटी, गम्भीर चेहरे की, मंझले कद की होती है। आँखे मादक, नाक कुछ चपटा होता है। यह संसार में मग्न, बुद्धिमान होती है। पुरुष राशि में यह शुक्र हो तो स्त्री संसार में विशेष आसक्त नही होती। विपत्ति में घबड़ा जाती है किन्तु दैव की सहायता से किसी रुकावट के बिना व्यवहार चलते रहते है। धनु राशि में यह शुक्र हो तो स्त्री सुन्दर, ऊंचे कद की प्रमाणबद्ध शरीर की होती है। उस की आँखे बहुत सुन्दर, वर्ण आकर्षक, केश लम्बे और घने होते है। यह विपत्तियों में स्थिर होती है। कामेच्छा कम होती है। रहनसहन व्यवस्थित होता है। इस का व्यवहार किसी वृद्ध स्त्री जैसा सोच समझकर चलता है। पति को योग्य सलाह देती हैं। किन्तु यह पति को विशेष प्रिय नहीं होती। कर्क, वृश्चिक या मीन में यह शुक्र हो तो दुबलापतला शरीर, ऊँचा कद, लम्बा चेहरा, तेजस्वी आँखे, लम्बे तथा चमकीले केश, त्वचा कोमल तथा मनोहर इस प्रकार स्त्री का स्वरूप होता है। वह कुछ स्वार्थी, झगडालु, परिवार में मिलजुलकर न रहनेवाली, प्रपंच की विशेष फिक्र न करनेवाली तथा खर्चीली होती है। सत्ता अपने हाथ में रखने की कोशिश करती है। रहनसहन तथा बोलने में व्यवस्थित होती है। वृषभ, कन्या या मकर राशि में यह शुक्र हो तो स्त्री कुछ मोटी, नाटे कद की, गोल चेहरे की होती है। उस के केश थोडे किन्तु घने होते है। संसार में आसक्त, सत्ता की इच्छुक घर के सब काम सम्हालनेवाली, सब के साथ समान व्यवहार करनेवाली तथा रोगियों की सेवाशुश्रूषा करनेवाली होती है। स्त्री राशि के शुक्र से स्त्री के गुणों का पूर्ण विकास होता है। ये स्त्रियां विपत्ति में स्थिर और शान्त रहकर स्थिति सम्हालती है तथा प्रसंगावधानी होती है। कुछ उदाहरणों में हमने स्त्रीसुख का अभाव भी देखा है। अविवाहित रहना, पत्नी से विभक्त होना, दो विवाह होना ये इस शुक्र के अशुभ फल है। वृषभ, कर्क, वृश्चिक, मकर तथा मीन इन राशियों में इन का अनुभव आता है। राशियों में मिथुन और धनु में यही अनुभव आता है। पुरुष पुरुष राशि में शुक्र से कामुकता बहुत होती है। मेष, वृश्चिक, मकर तथा में यह शुक्र विजातीय अथवा पति से अधिक आयु की पत्नी कुम्भ देता है। सिंह और मीन में यह शुक्र विवाह के बाद भाग्योदय कराता रहता है।
स्त्री जबतक जीवित हो तभी तक वैभव बना
पूर्वायुष्य में ४० वें वर्ष तक स्थिरता या सुख नही मिलता। उस के बाद एकदम प्रगति होती है। पुरुष राशि में यह शुक्र २१ से २६ वें वर्ष तक अथवा
२८ से ३२ वे वर्ष तक विवाहयोग कराता है। हलके वर्गों में १८ से २२ तक भी होते है। शुक्रप्रधान व्यक्ति मुख्यतः स्वतन्त्र व्यवसाय में प्रवृत्त होते है। किन्तु स्त्री राशि में यह शुक्र नौकरी में भी यश देता है। इन्हें व्यवसाय और नौकरी दोनों में सफलता मिलती है। ये लोग उपव्यवसाय करते है। किन्तु साझीदारों के साथ धंधा करना इन्हें पसन्द नही होता। मेष, मिथुन, तुला तथा धनु में गायन, वादन, अभिनय आदि क्षेत्रों में या लेखन, संपादक, मुद्रण, अध्यापन आदि में प्रवृत्ति होती है। अन्य राशियों में व्यापार करते | प्रवृत्ति विलासी, रंगीली किन्तु स्त्री का सम्मान करनेवाली होती है। स्त्री को अपने से हीन नही समझते। स्त्री राशि में इस के प्रतिकूल वृत्ति होती है। स्त्री को तुच्छ तथा सिर्फ वासनापूर्ति का साधन मानते है।
सप्तम स्थान में स्थित शुक्र कामुकता-सूचक है। ऐसा जातक अधिककामातुर होता है। फलस्वरूप इसके अनेक स्त्रियों से संबंध बनते हैं। जातकवेश्यागामी बन सकता है। ऐसे जातक का विवाह समय पर होकर उसे अनुरूपपत्नी मिले तो इस दोष से वह मुक्त हो सकता है। यदि सप्तमस्थ शुक्र मंगलनवांश का, मंगल से दृष्ट या युक्त हो तो निश्चित रूप से कामुकता अधिकरहती है। ऐसा जातक इतना कामविह्वल होता है कि वह रजस्वला या गर्भवतीस्त्री से भी समागम करने से नहीं चूकता है।
ऐसे जातक भाग्यवान, आर्थिक दृष्टि से संपन्न, ललितकला, गायनवादन,संगीत, तैराकी आदि में प्रवीण होता है एवं व्यक्तित्व खूबसूरत होता है।
मंत्रेश्वर एवं उनके जैसे अन्य आचायों के मतानुसार जातक की पत्नी अल्पायुरहती है। शुक्र पापग्रह से युक्त, पापक्षेत्री, नीच का सप्तम स्थान में हो तो ऐसेफल अनुभव में आते हैं। जातक के दो विवाह संपन्न होते हैं। अनेक पापग्रहोंसे युक्त या दृष्ट शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक के अनेक विवाह होते हैं।जातक सरकारी कर्मचारी एवं प्रतापी होता है। उसे जन्म स्थान से दूर रहनाहोता है। संतान कार्यकुशल होती है। अल्प परिश्रम से धन-प्राप्ति होती है,वाहनादि का सुख मिलता है। वृषभ, मीन या तुला राशि का शुक्र सप्तम स्थानमें हो तो अधिक शुभ फल प्राप्त होते हैं। स्त्रियों के माध्यम से विवाह केबाद भाग्योदय होता है।
महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जातक शक्की रहता है। उसके जीवन मेंशोकजनक प्रसंग अधिक होते हैं। शरीर में विकार रहता है।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार सप्तमस्थ शुक्र के शुभ फल प्राप्त होते हैं।स्त्री सुख जल्दी प्राप्त होता है।
पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार सप्तमस्थ शुक्र होने पर विवाह जल्द होताहै। पत्नी सुंदर मिलती है। दांपत्य-जीवन सुख से परिपूर्ण रहता है। वृश्चिकया मकर राशि का शुक्र सप्तम में हो तो जातक व्यभिचारी बनता है। साझेमें किए व्यापार में लाभ होता है। विवाह के बाद भाग्योदय होता है।
सपतम भाव-लग्नकुंडली के सातवें भाव में शुक्र हो तो जातक लोकप्रिय,
उदार, धनी, कामुक, विवाहोपरांत उन्नति करने वाला, सुखी विवाहित जीवन
वाला होता है। परन्तु चरित्र उत्तम नहीं होता। अवैध सम्बन्ध सम्भव होते हैं।
जातक का जीवन प्रायः सफर में गुजरता है। रोजी-रोटी के लिए परदेस में जीवन
काटना पड़ सकता है।
लाल किताब के अनुसार यहां शुभ शुक्र हो तो विवाह तथा गृहस्थी अच्छे
रहते हैं। अशुभ शुक्र हो तो जातक स्त्रियों पर (वैश्याबाजी या उन्हें घुमाने-फिराने
आदि) अधिक धन का व्यय करने वाला होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार सातवेंघर में शुक्र जिस ग्रह के साथ बैठता है, तदनुसार फल देता है तथा यदि शुक्र इस
भाव में अकेला बैठा तो कभी अशुभ नहीं होता। परन्तु मैं इस दृष्टिकोण से सहमत
नहीं हूं। मेरी यह मान्यता है कि शुक्र इस भाव में कितने ही शुभ फल क्यों न दे।
जातक को स्त्री लोलुप व दुर्बल चरित्र का अवश्य बना देगा। क्योंकि शुक्र सातवेंभाव का कारक है तथा फलादेश का महत्त्वपूर्ण सूत्र-कारको भावः नाशाये केअनुसार कारक यदि अपने ही भाव में बैठे तो भाव के फलों को नष्ट कर देता हैं।अतः जातक की इस चरित्रहीनता का प्रभाव उसके गृहस्थ जीवन पर भी कम-ज्यादा जरूर पड़ता है।
उच्च का शुक्र सातवें भाव में हो तो जातक को धनाद्य खानदान की पत्नीदिलाता है। मेष, मिधुन व तुला राशि में शुक्र हो तो पत्नी सुन्दर होती है औरव्यवहारकुशल भी होती है परन्तु पुरुषोचित गुणों से युक्त होती है। ऐसे जातक केसन्तान कम होती है तथा अतिकामुकता के कारण जातक का स्वास्थ्य क्षीण होजाता है। सिंह व कुम्भ राशि का शुक्र हो तो मध्यम कद व स्थूल देह की पतनीजातक को मिलती है। मगर वह खुशमिजाज व अक्लमंद होती है। धनु राशि काशुक्र हो तो जातक की पत्नी लम्बी, सुन्दर व धीर होती है पर बनाव-शृगार में हीलगी रहती है। जलराशि का शुक्र हो तो जातक की पत्नी स्वार्थी, कलहप्रिय,कुटुम्ब से अलग रहने की इच्छुक, खर्चीली तथा सत्ता अपने हाथ में रखने वालीहोती है।
जो भी स्थिति हो सातवां शुक्र जातक को कामुक व कमजोर चरित्र काबनाता है। शुक्र अशुभ प्रभाव में हो तो 'विवाह प्रतिबन्धक योग' बनता है। विवाहहो जाए तो पत्नी से अलगाव, पत्नी को कम आयु में मृत्यु, पुनरविवाह जैसे परिणामहोते हैं। मंगल व शनि की राशियों(मेष, वृश्चिक, मकर, कुम्भ) में शुक्र हो तोप्रायः विलम्ब से विवाह होता है। कभी-कभी विजातीय विवाह होते भी देखा जाताहै। ससमस्थ शुक्र से भाग्य पत्नी के आने पर ही उदित होता है। किन्तु कोर्ट-कचहरी में जातक को विजय मिलती है तथा यदि साझे का व्यापार करे तो सफलहोता है। संतान से प्रेम अधिक व स्वतंत्र व्यवसाय की प्रवृत्ति रहती हैं। शास्त्रकारोंके मत से-
कलन्ने कलयात्मुखं नो कलात्रत्कलन्नं तु शुक्रे भवेद्रलगर्भम्।विलासाखिको गण्यतेचप्रवासी प्रयासाल्पकः केन मुह्मतितस्म्॥अर्थात् शुक्र ससमस्थ हो तो जातक को स्त्रीसुख तो प्राप्त होता है परन्तुकुक्षि/कटि स्थान में पीड़ा रहती है। उसकी पत्नी सद्पुत्र उत्पन्न करने वाली होतीहै। जातक अतिकामी व नित्य प्रवासी होता है। आलसी/विशेष श्रम न करने वालाहोता है। उसकी पत्नी अपनी चतुरता से सबको मोहित करने वाली होती है। परन्तुजातक स्त्री लोलुप होता है।
सप्तम भावः सप्तम भाव में शुक्र का बलवान होना स्वाभाविक है,क्योंकि शुक्र इस भाव का नैसर्गिक अधिपति है। जल राशि का शुक्र हो तोपत्नी देह से दुबली-पतली, कोमल त्वचा, लम्बे बालों वाली, मृगनयनी तथामनोहारी होती है। लेकिन स्वभाव से अक्खड़, स्वार्थी, कलहप्रिय तथा परिवारसे अलग रहने वाली होती है ताकि सभी उसके अधीन रहें। मंगल या शनिअधिष्ठित राशियों में से किसी राशि में शुक्र हो तो पत्नी या तो आयु में बड़ी याप्रौढ़ा स्वभाव वाली अथवा विजातीय होती है। मेष, मिथुन, तुला, धनु में शुक्रहो तो गायन, वादन, लेखन, अध्यापन आदि से वृत्ति चलती है। अन्य राशियोंमें हो तो व्यवसाय से जीविका चलती है। मीन और सिंह में शुक्र हो तोविवाहोपरान्त भाग्योदय होता है तथा पत्नी की मृत्यु के पश्चात स्थिति बिगड़जाती है। पृथ्वी राशि का शुक्र हो तो स्त्री स्थूल शरीर वाली, छोटे कद की,घर-परिवार को संभालने वाली, सभी से समान व्यवहार करने वाली तथासेवाभावी होती है। लेकिन सत्ता उसी के हाथ में रहे ऐसी इच्छा बनी रहती है।सप्तम भाव का शुक्र जातक को विलासी बनाता है लेकिन पत्नी के प्रति उसकेमन में आदर-भाव बना रहता है।
राशिगत फल
1. मेष मेष राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक तेजस्वी एवंसंपन्न होता है, दो विवाह होते हैं, रक्तविकार एवं चर्मरोग होते हैं। जातकनास्तिक होता है या तो वह वैभवशाली जीवन जिएगा या फिर संन्यासी बनजाएगा। संतान अच्छी रहती है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक शांत, सुशील,निरोगी, शस्त्रकला प्रवीण, निशानेबाज एवं संपन्न होता है। वह परस्त्रीगामी होताहै। महर्षि गर्ग के अनुसार ऐसा जातक वेश्या के फंदे में पड़कर अपने धनका अपव्यय करता है।
3. मिथुनमिथुन राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक उदार,संपन्न, दीर्घायु तथा दिखने में उग्र रहता है। पत्नी सुंदर होती है। शुक्र पापग्रहसे युक्त हो तो जातक अति कामातुर रहता है। महर्षि लोमश एवं गर्ग केमतानुसार संतान सुख में बाधा रहती है। पत्नी के गर्भपात होते हैं या वह बांझरहती है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी,लंबा किंतु पतला एवं अधिकारसंपन्न होता है। पत्नी सुंदर एवं सुपुत्रों को जन्मदेनेवाली, सास की सेवा करनेवाली एवं आज्ञाकारिणी रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक सुंदर, संपन्नएवं सदाचारी रहता है। पत्नी सुंदर, चतुर एवं आज्ञाकारिणी रहती है। पैतृकसंपत्ति कम मिलती है। जातक स्वपरिश्रम से आगे बढ़ता है। कम बोलनेवाला,अनेक विद्याओं का ज्ञाता एवं विद्वान होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो इसके शुभ फलकम प्राप्त होते हैं। जातक के दो विवाह होते हैं। वह नास्तिक होता है, बचपनपरेशानियों में बीतता है और त्वचा रोग, बवासीर, भगंदर, गुप्त रोगों से कष्टपाता है। जातक स्त्री से नफरत करनेवाला, चोरी जैसे दुर्गुणों से युक्त होताहै। महर्षि लोमश के अनुसार जातक की मृत्यु सेवाकाल में होती है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक सुंदर, संपन्न, कंजूस, निरोगी, यशस्वी, दीर्घायु, परस्त्रीलंपट, अस्थिर विचारों का किंतुमधुरभाषी होता है। चिकित्सा या औषध विषयक कारयों में जातक की अच्छोप्रगति होती है। महर्षि लोमश के अनुसार स्वयं जातक, उसकी मां एवं पत्नीतीनों ही व्यभिचारी होते हैं।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक यातो राजसी वैभव भोगता है या फिर संन्यासी या फकीरों जैसा जीवन बिताताहै। पत्ली, सुंदर, सदाचारी, कलानिपुण एवं विद्वान होती है। शुक्र पापग्रह सेयुक्त हो तो वह बड़ी कामातुर रहती है। महर्षि लोमश एवं गर्ग के अनुसारजातक को पत्नी सुख अल्प मिलता है। संतान सुख में बाधा रहती है। गर्भपातहोते हैं या पत्नी बांझ रहती है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी,यशस्वी एवं अधिकारसंपन्न होता है। वह शस्त्रविद्या में कुशल एवं निशानेबाजरहता है, चर्म रोग होने की संभावना रहती है। शरीर लंबा किंतु पतला रहताहै। पत्नी सुंदर, सदाचारी एवं आज्ञाकारिणी होती है। जातक परस्त्रीगामी एवंवेश्यागामी होता है एवं इसके लिए पैसा खर्च करता है। आचार्य मंत्रेश्वर केमतानुसार जातक पत्नी एवं पुत्रसुख कम मात्रा में पाता है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न,उदार, दीर्घायु, सुशील, सदाचारी, समाज में प्रतिष्ठित, अनेक विधाओं का ज्ञाताएवं मितभाषी होता है। उसे पिता से संपत्ति नहीं मिलती और स्वयं के परिश्रमसे आगे बढ़ता है। दिखने में जातक उग्र नजर आता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक का बचपनकष्ट एवं परेशानियों में गुजरता है। पत्नी अच्छी रहती है किंतु जातक का उसकेसाथ व्यवहार ठीक नहीं रहता। जातक परस्त्रीगामी होता है।
12. मीनमीन राशि का शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक सुंदर, संपन्नएवं कंजूस रहता है। चिकित्सा एवं औषध विषयक कार्य में प्रगति करता है।पत्नी सुंदर, चतुर एवं धनसंग्रह करनेवाली, पति को चाहनेवाली होती है। शुक्रपापग्रहों से युक्त हो तो संतान सुख में बाधा रहती है।
1. दूध में शहद मिलाकर पानी में बहावें।
2. भोजन करते समय गाय वकुत्ते का ग्रास अलग रखें।
3. महालक्ष्मी की आराधना करें।
===========================8) अष्टम् भाव - अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
अष्टम स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - इस स्थान में गुरु के समान ही अशुभ फल बतलाये है। पराशर तथा
वसिष्ठ - गुरु के समान फल बतलाये है।
कल्याणवर्मा - दीर्घायुरनुपमसुखः शुक्रे निधनाश्रिते धनसमृद्धः । भवति पुमानः नृपतिसमः क्षणे क्षणे लब्धपरितोषः।। यह दीर्घायु, बहुत सुखी, धनवान तथा राजा के समान सर्वदा सन्तुष्ट होता है।
गर्ग - अनृणं पितुराधत्ते तीर्थे मरणमेव च। नयेत् पितृकुलं पुण्यं रन्ध्रगो भृगु नन्दनः।। सूर्यादिभिर्निधनगैर्निधनं हुताशेनौका युधज्वरजमामयजं क्रमेण।। कफाच्चानिलात्। गुरुसितेन्दुसुता निधनेऽथवा स्थिरभंगाः सततं (६७)
बहुकष्टदाः।। यह पिता का ऋण चुकाता है तथा कुल की उन्नति करता है। इस की मृत्यु किसी तीर्थक्षेत्र में होती है। इस की मृत्यु वातकफ से या क्षुधा से होती है। यह शुक्र स्थिर राशि में हो तो सतत कष्ट होता है।
काश्यप - तृष्णातो मुखरोगाच्च दन्तदोषात् त्रिदोषतः। विषूच्या वनसत्वेन भुजंगात् विषभक्षणात्।। लूतया विषकण्ठेन सुरतोत्थप्रकोपतः । बहुदुःखाद् भवेन्मृत्युः मृत्युभावगते सिते।। यह शुक्र मेष में हो तो तृष्णा से, वृषभ में मुखरोग से, मिथुन में दन्तरोग से, कर्क में त्रिदोष से, सिंह में विषूची से, कन्या में जंगली जानवर से, तुला में सांप से, वृश्चिक में विष खाकर, धनु में लूत से, मकर में विषप्रयोग से, कुम्भ में अति कामभोग से और मीन में अति दुःख के कारण मृत्यु होती है।
वैद्यनाथ - दीर्घायुः सर्वसौख्याऽतुलबलधनिको भार्गवे चाष्टमस्थे। यह दीर्घायुः, बलवान, धनवान तथा सब तरह से सुखी होता है।
बृहद्यवनजातक - प्रसन्नमूर्तिर्नृपलब्धमानः सदा हि शंकारहितः सगर्वः । स्त्रीपुत्रचिन्तासहितः कदाचिन्नरोऽष्टमस्थानगते सिताख्ये प्रसन्नमूतिः ।। यह दीखने में सुन्दर, राजा द्वारा सन्मानित, निर्भय, गर्विष्ठ और कभी कभी स्त्रीपुत्रों की चिन्ता से युक्त होता है। सितो दशागमे स्वपराक्रमं च। दसवें वर्ष अपने पराक्रम से धनलाभ करता है।
आर्यग्रन्थ - निधनसद्मगते भुजगे जरो विमलधर्मरतो नृपसेवकः । भवति मांसप्रियः पृथुलोचनो निधनमेति चतुर्थवयेऽपि वा।। यह राजा का सेवक, धार्मिक, बडी आँखोंवाला तथा मांसाहार की ओर रुचि रखनेवाला होता है। चौथे वर्ष में इसकी मृत्यु होने की सम्भावना रहती है।
नारायण भट्ट - जनः क्षुद्रवादी चिरं चारु जीवेत् चतुष्पात्सुखं दैत्यपूज्यो। ददाति जनुष्पष्टमे कष्टसाध्यो जयार्थः पुनर्वर्धते दीयमानं धनर्णम्।। यह दीर्घायु होता है। बोलना नीचों जैसा होता है। इसे चौपाये पशुओं से समृद्धि होती है। विजय मिलने में कष्ट होता है।
ऋण कितना भी देने पर चुकाया नही जाता-सूद बढ़ते जाता है। जागेश्वर - नरो नीचवक्ता पशुयूथयुक्तो धनं वर्धते रोगकर्ता ग्रहः स्यात्। चिरंजीवते मृत्युगेहे च नूनं यदा चाष्टमे भार्गवः स्यात् _ तदानीम्।। यह नीच बातें बोलनेवाला, पशुओं से युक्त, धनवान, रोगी किन्तु दीर्घायु होता है।
जयदेव - नीचः सकान्तो निधनः शठोऽभयः स्त्रीपुत्रचिन्तास- हितोऽअष्टमे भृगौ। यह नीच, निर्धन, दुष्ट, निडर और स्त्रीपुत्रों की चिन्ता से युक्त होता है।
मन्त्रेश्वर - चिरायुषमिलाधिपं धनिनमष्टमे संस्थितः। यह दीर्घायु, धनवान और भुमि का स्वामी होता है।
काशीनाथ - अष्टमस्थे दैत्यपूज्ये सरोगः कलहप्रियः । वृथाटनी कार्यहीनो चनानां च प्रियो मतः।। यह रोगी, झगडालू, बेकार, बिना काम के घूमनेवाला किन्तु लोगों में प्रिय होता है।
लखनऊ के नवाब - मगरूरो बदखुल्कः स्त्रीसौख्येश्च वर्जितो मनुजः । हस्तमुखाने जोहरा भवति वितृप्तं मनोन संग्रामे ।। यह उद्धत, बीभत्स बोलनेवाला और झगडालू होता है। इसे स्त्रीसुख नही मिलता।
घोलप - दुर्बुद्धि, दोषयुक्त और सब तरह से हानि सहनेवाला होता है। यह बुद्धिमान, धनवान और पण्डितो को आश्रय देनेवाला होता है।
गोपाल रत्नाकर - यह अल्पायुषी, सुखी, ऐश्वर्यवान, प्रसिद्ध, दुराचरण में प्रवृत्त और मातृसुख से वंचित होता है। हिल्लाजातक - शत्रुदिश्यष्टमः अजीः । सितोऽभ्रयमके स्वपराक्रमं च।। यह बहुत शत्रुओं से युक्त होता है। २० वें वर्ष से पराक्रम प्रदर्शित करता है।
पाश्चात्य मत - यह शुक्र बलवान हो तो विवाह से, सट्टे के व्यवहार में या वारिस के रूप में अच्छा धनलाभ होता है। स्त्रीधन प्राप्त होता है या किसी आप्त स्त्री की मृत्यु से धन प्राप्त होता है। से या साझीदारी से लाभ होता है। यह शुक्र पीडित हो तो पत्नी (या पति) बहुत खर्चीली होती है। इस शुक्र से बीमे के व्यवहार में लाभ होता है। मृत्यु शान्त स्थिति में होती है। दुर्घटनाओं का भय इन्हे नही होता। यही शुक्र निर्बल हो तो बीमे की पूरी रकम नही मिलती। मूत्राशय के रोग होते है। ये लोग दूसरों के इस्टेट के ट्रस्टी के रूप में अच्छा धन प्राप्त करते है।
भृगुसूत्र - सुखी । चतुर्थवर्षे मातृगण्डः । मध्यायुः । रोगी। हितदारवान्। असन्तुष्टः शुभयुते शुभक्षेत्रे पूर्णायुः । तत्र पापयुते अल्पायुः।। यह सुखी, मध्यम आयुष्य का, रोगी, असन्तुष्ट होता है। इस के चौथे वर्ष में माता पर संकट आता है। इस की पत्नी हितकर होती है। शुभग्रह की राशि में या युति में हो तो पूर्ण आयु प्राप्त होती है। वही पापग्रह के साथ हो तो अल्प आयु प्राप्त होती है।
हमारे विचार - आठवां स्थान मृत्युस्थान है। यहाँ शुभग्रह हो तो आयुष्य में थोड़ाबहुत सुख तो अवश्य मिलता है। मानसिक, आर्थिक, शारिरीक या स्त्रीविषयक सुखों में कोई एक सुख अच्छा मात्रा में मिलता है। इस स्थान में स्त्रीराशि या पुरुष राशि का भेद ज्ञात नही होता। काशीनाथ और लखनऊ के नवाब ने अशुभ फल बतलाये है। उनका भी अनुभव आता है। यवनजातक में १० वें वर्ष पराक्रम का फल कहा वह शारीरिक दृष्टि से सम्भव नही है। किन्तु, गायन, वादन आदि कलाओं में सफलता द्वारा इतनी छोटी आयु में प्रसिद्धि मिल सकती है। किन्तु यह शुभ फल लग्न, पंचम, सप्तम, नवम या एकादश स्थान का । अष्टम स्थान में इस का अनुभव मिलना कठिन है।
जातक धर्मानुरागी, सरकारी नौकरी करने वाला, मांसाहार का शौकोन,विशाल नेत्रों वाला और पूर्णायु होगा।
-मानसागरी
है।
अष्टम भाव का शुक्र जातक को धनी, दीर्घायु और भू-स्वामी बनाता
-फलदीपिका
जातक चिरंजीवी, राजा जैसा अत्यन्त धनी अतुलित प्रसन्नतावानहोगा।
-सारावली
जातक प्रसन्न, उसकी चार वर्ष की अवस्था होने पर माँ को गलेके रोगों से पीड़ा होगी। वह रोगी-सा तथा मध्यायु होगा। वह अपनीसमर्पिता पत्नी से असंतुष्ट होगा। यदि शुक्र शुभ राशि में है तो पूर्णायुअन्यथा अल्पायु होगा।
-भृगुजातक की माँ को खतरा, वह स्वयं प्रसन्न, बुरी आदतों को छोड़नेवाला, अल्पायु, प्रसिद्ध, यशस्वी, मस्तिष्क असंतुलन, प्रेम प्रसंगों मेंअसफल और जीवन के उत्तरद्ध में पवित्र होगा।
-डॉ रामन
कल्याण वर्मा, जीवनाथ, नारायण भट्ट, मंत्रेश्वर व जोगेश्वरसभी के मतानुसार अष्टम भाव में शुक्र दीर्घ आयु प्रदान करता है।
जातक सभी पैतृक ऋणों को चुकाने वाला और किसी धार्मिक स्थानमें देह त्यागने वाला होगा। यदि शुक्र अष्टम भाव में स्थिर राशि में है तोजातक के जीवन में हमेशा निराशाएँ ही रहेंगी। स्त्री जातकों के लिएअष्टमस्थ शुक्र दयनीय (संकटपूर्ण) वैवाहिक जीवन का कारण बनता है।
-गर्ग ऋषि
टिप्पणी
ये निराशाएँ पत्नी, संतान के कारण होंगी क्योंकि पत्नी का कारकशुक्र दुःस्थानगत है।
आर्थिक उन्नति में भी अनेक उतार-चढ़ाव आएँगे क्योंकि शुक्रलौकिक उपलब्धियों और प्रगति का भी कारक ग्रह है। किन्तु जातकधनी होगा। वह रोगग्रस्त और स्त्री के कारण मान हानि उठाने वाला होगा।पत्ली के कारक शुक्र का गुप्त या गुह्मभाव में होना जातक का अन्यमहिलाओं से संबंध दर्शाता है।
हमारा अनुभव - इस स्थान में शुक्र हो तो वे व्यक्ति विद्वान और सदाचारी होते है।
इस शुक्र से पत्नी अभिमानी, विपत्तियों में धैर्य रखनेवाली, सुस्वभावी, घर की बातें बाहर न बतानेवाली, व्यवस्थित, मधुर बोलनेवाली होती है। मिथुन तथा वृश्चिक में यह शुक्र स्त्रीपुत्रों से कलह कराता है। स्त्री सुख नही मिलता। धन कम मिलता है। व्यवसाय ठीक नही चलता। अस्थिरता बहुत होती है। वृषभ, कर्क और धनु में प्रकृति ठीक नही रहती। मधुमेह, प्रमेह, उपदंश आदि रोग होते है। व्याभिचारी प्रवृत्ति होती है। सिंह और मकर में पुत्र झगड़ा होता है। सन्तति कम होती है। पत्नी से सुख नही मिलता। किन्तु परस्त्रियों से सुख और धन प्राप्त होता है। मेष और कन्या विवाह के बाद भाग्योदय नष्ट होता है। आर्थिक संकट आते है। व्यवसाय या नौकरी में सफलता नही मिलती। हमेशा ऋण बना रहता है। कुम्भ, मीन और तुला में प्रपंच ठीक चलता है। साधारणतः सुखी और धनवान होते है। परित्यक्ता या विधवा परस्त्रियों से स्नेह रखते है। कर्क, सिंह और मीन में शराबी होते है। वृश्चिक और कुम्भ में अफीमची होते है। यह शुक्र पूर्ण दूषित हो तो खुद को और पत्नी को गुप्त रोग होते है। १६ वें वर्ष से ही कामसुख चाहते है। अति विषयी होने से अनैसर्गिक सम्भोग करते है। मीन राशि में अष्टमस्थ के फल बहुत अशुभ मिलते है। इन की पत्नी मर्दानी प्रकृति की, व्याभिचारी होती है। व्यवसाय में नुकसान होता है। कारावास की नौबत आती है।
अष्टम स्थान में शुक्र शुभ फलदायी होता है। इस विषय में सभीज्योतिषविदों की आम राय है। कुछ आधुनिक ज्योतिष विद्वान अष्टमस्थ शुक्रको अशुभ फलदायी मानते हैं।
अधिकांश ज्योतिष विद्वान अष्टमस्थ शुक्र को शुभ फलदायी मानते हैं औरयह बात अनुभवों से भी सिद्ध होती है। इसलिए अष्टमस्थ शुक्र को शुभ माननाचाहिए बशर्ते वह नीच का, पापग्रहयुक्त एवं पापक्षेत्र में न हो। ऐसा जातक सुखी, दीर्घायु, कर्तव्यपालन में दक्ष, अधिकारसंपन्न, अपने कुलमें प्रतिष्ठित एवं सुलह वृत्ति का होता है। तीर्थ स्थान में सुखपूर्वक मृत्यु होतीहै। पशुवाहनादि का सुख उसे पर्याप्त रहता है, आंखें बड़ी होती हैं।
अष्टम स्थान में स्थित शुक्र निर्बल, नीच का हो तो जातक कटु एवं नीच,बड़बोला, झगड़ालू, धूर्त, कर्ज में डूबा किंतु निर्भय रहता है। पत्नी सुख में न्यूनतारहती है। 40वें वर्ष में माता को एवं स्वयं को कष्ट होता है।
अष्टम स्थान का संबंध आयु से रहता है। इसी कारण कई आचारयों ने अष्टमस्थशुक्र के आधार पर कफ एवं वातज रोग के कारण जातक की मृत्यु होना बतायाहै किंतु इसके लिए अन्य योग भी देखने चाहिए। अकेले अष्टमस्थ शुक्र केकारण मृत्यु का कारण निश्चित नहीं किया जा सकता। महर्षि कश्यप ने अष्टमस्थशुक्र जिस राशि में हो उसके अनुसार मेषादि क्रमानुसार मृत्यु का कारण बतायाहै। प्यास, मुखरोग, त्रिदोष, अतिसार, जंगली पशु, सर्प, विषपान, अति स्त्रीसंग,दुखातिरेक या सजा के कारण मृत्यु हो सकती है।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार अष्टमस्थ शुक्र के कारण जातक के शत्रुअधिक रहते हैं। पत्नी एवं बच्चों को लेकर चिंता रहती है। जातक झगड़ालू,कठोर एवं कटु बोलनेवाला, संपन्न, स्वाभिमानी होता है।
अष्टमस्थ शुक्र 10वें एवं 20वें वर्ष में शुक्र महादशा में फलदायी होता है।पाश्चात्य विद्वानों की राय के अनुसार अष्टम स्थान में बलवान शुक्र हो तोजातक को लॉटरी, सट्टा, विवाह, वसीयत, साझेदारी, बीमा एवं स्त्रियों केमाध्यम से धन प्राप्त होता है। अष्टमस्थ शुक्र अकस्मात दुर्घटना से बचाव करताहै। मृत्यु सुखपूर्वक होती है। दुर्बल शुक्र के कारण व्यापार में घाटा होता है।अष्टमस्थ शुक्र के शुभ फल ही अनुभव में आते हैं। ऐसा जातक सदाचारी,परोपकारी एवं सौम्य स्वभाव का होता है। उदाहरण के तौर पर स्वर्गीय मदनमोहन मालवीय का उदाहरण लिया जा सकता है। उनके अष्टम स्थान में कुंभका शुक्र था।
अष्टम भाव-शुक्र यदि लग्नकुंडली के आठवें भाव में हो तो जातक रोगी, क्रोधी, दुखी, परलिंगी से अवैध सम्बन्ध बनाने वाला तथा विदेश यात्रा करने वाला
होता है। ऐसे जातक को अकस्मात् धन प्राप्ति का योग भी होता है। सट्टा, लॉटरी,विरासत आदि से उसे लाभ हो सकता है। विशेषकर किसी विधवा स्त्री की सम्पत्ति
उसकी मृत्यु के बाद जातक को मिलंती है। जातक को नशे की लत सम्भव होती
है। वह दीर्घायु तथा अर्थ व स्त्री सुख पाने वाला, विद्वान होता है। उसकी पत्नीसुन्दर, विश्वासपात्र व प्रिय बोलने वाली होती है।
लाल किताब के अनुसार ऐसे व्यक्ति को ज्ञान तो बहुत होता है परन्तु उसकी
समाज में कद्र नहीं होती। ऐसे जातक को धर्मस्थानों पर सिर झुकाने से लाभ
मिलता है। परन्तु दूसरों से दान आदि लेना अशुभ रहता है। ऐसे जातक की पत्नी
अनुशासन पसंद या सख्त स्वभाव की होती है। परन्तु प्रायः सुन्दर व अच्छी
आवाज वाली होती है!
वृष, धनु या कर्क राशि का शुक्र हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन अच्छा नहींरहता। पत्नी व संतान से वैमनस्य रहता है। जातक अतिकामी तथा व्यभिचारी
प्रवृत्ति का होता है। मधुमेह, शुक्रमेह, उपदंश आदि गुप्त रोग होना सम्भावित होता
है। मिथुन या वृश्चिक राशि में शुक्र स्त्री सुख में न्यूनता लाता है तथा व्यवसाय
सुचारू नहीं रखता। आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। मकर व सिंह राशि का शुक्रसन्तान व स्त्री का सुख अल्प करता है। परस्त्री से सम्बन्ध बनवाता है, जिससेजातक को अर्थ लाभ होता है। कन्या व मेष राशि में विवाहोपरांत जातक अवनति
को प्राप्त होता है, व्यवसाय में हानि, नौकरी में पदावनति होती है। जातक पर सदा
ऋण रहता है। अन्य राशियों में और तो सब ठीक होता है पर परित्यक्ता या विधवा
से अवैध सम्बन्ध रहते हैं। शुक्र पाप प्रभाव में या दूषित हो तो अनैतिक संसर्ग
निश्चित होते हैं।
अष्टम भावः अष्टम भाव आयु भाव है। यहां शुभ ग्रह की स्थिति जातकको सुख प्रदान करती ही है। यहां स्थिर बलवान शुक्र जातक को विवाह, जुएया सट्टे से अथवा वारिस बनवाकर अच्छा धनलाभ कराता है। किसी वृद्धासंबंधी स्त्री की मृत्यु या साझेदारी से अच्छा लाभ मिलता है। मिथुन यावृश्चिक का शुक्र अष्टमस्थ हो तो जातक स्त्री एवं पुत्रों के कलहपूर्ण व्यवहारसे परेशान रहता है। कार्य-व्यवसाय में स्थिरता नहीं रहती, धनाभाव बनारहता है। वृष, कर्क या धनु का शुक्र हो तो स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता क्योंकिजातक के व्यभिचार में लीन रहने के कारण उसे मधुमेह, उपदंश तथा प्रमेह जैसे रोग होते हैं। मकर और सिंह राशि का शुक्र पत्नी और पुत्र का अल्प सुखदेता है। प्रायः उनसे मतैक्य नहीं हो पाता, फलतः जातक परस्त्रयोंमें सुखखोजता है। मेष और कन्या राशि में शुक्र हो तो विवाह के पश्चात स्थितिदयनीय हो जाती है। कार्य-व्यवसाय का नाश हो जाता है। ऋण लेकर कामचलाना पड़ता है, फलतः ऋणी रहते मृत्यु हो जाती है। वृश्चिक, कुम्भ, कर्क,मीन में शुक्र हो तो व्यक्ति नशे की लत पाल लेता है। वह अफीम, गांजा,शराब आदि का सेवन करता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक दुष्ट, उग, धूर्त,क्रूर, हिंसक, आचरणभ्रष्ट एवं पुरुषार्थहीन रहता है। स्त्री एवं परिवार सुख मेंकमी रहती है। जातक विलासी एवं आत्मघाती होता है। महर्षि लोमश केअनुसार बड़े भाई एवं पत्नी सुख में न्यूनता रहती है परंतु गुप्त धनलाभ होताहै। यवनाचार्य के मतानुसार जातक दुर्गुणी रहता है किंतु उसकी आर्थिक स्थितिउत्तम रहती है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक एवं उसकी पत्नी दोनों ही व्यभिचारी होते हैं। उनके परसंबंध रहते हैं। ऐसे जातक में दूसरोंको धोखा देने की प्रवृत्ति, जुआ, चोरी जैसे दुर्गुण पाए जाते हैं। यह दूसरों कीआलोचना करने में माहिर होता है। व्यापार में लाभ कमाता है। शुक्र पापग्रह से युक्त न होने पर जातक विद्वान एवं सदाचारी रहता है। वह शिल्पशास्त्रमें भी कुशल रहता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक आस्तिकएवं सच्चरित्र होता है। पत्नी के सुख में न्यूनता रहती है, पति-पत्नी में मतभिन्नता रहती है। अनेक ज्योतिषाचायों के अनुसार ऐसा जातक वेश्यागामीहोता है। कई बार तो विवाह भी नहीं करता। धनसंग्रह करने में जातक चतुरहोता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक का शरीररोगयुक्त रहता है, स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। संग्रहणी, नेत्ररोग, विषभय रहताहै। पत्नी सुंदर एवं सुस्वभावी होती है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक उदररोग ग्रस्त,स्वभाव से क्रोधी, शारीरिक एवं आर्थिक दृष्टि से मध्यम रहता है।न्याय-अन्याय का विवेक नहीं होता, मित्र बहुत होते हैं।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो शुक्र शुभ फलदायीनहीं होता। जातक ठग, दुष्ट स्वभावी, आचारहीन, कुसंगति से युक्त, क्रूर, दुखीएवं पुरुषार्थहीन रहता है। स्वास्थ्य मध्यम रहते हुए भी वह दीर्घायु होता है।माता-पिता के सुखों में न्यूनता रहती है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक व्यभिचारी,चोर, जुआरी होता है लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। महर्षि लोमश के अनुसार जातक की पत्नी का चरित्र संदिग्ध रहता है।8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक कोगुप्त धनलाभ होता है। जातक संपन्न, पुरुषार्थी एवं विलासी होने के साथ हीझगड़ालू, हिंसक, क्रूर एवं आत्मघाती प्रवृत्ति का होता है। अधिकांश आचायोंके अनुसार जातक अविवाहित रहता है या उसे पत्नी सुख न मिलने से वहवेश्यागामी बनता है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक को संग्रहणी,विष, सर्प एवं नेत्रोग से कष्ट रहता है। स्वभाव दुष्ट रहता है, आचरण अच्छानहीं होता। जुआखोरी एवं परस्त्री समागम जैसे दुर्गुण उसमें होते हैं। पापग्रह से रहित शुक्र हो तो जातक सत्कर्मी एवं विद्वान होता है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक क्रोधी स्वभाव का एवं उदर रोगी रहता है। धनसंग्रह करने में वह कुशल रहता है जिससे आर्थिक स्थिति उत्तम रहती है। भाइयों एवं संतान का सुख उसे नहींमिलता किंतु मिन्र काफी होते हैं।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक विद्वान, उदारएवं संपन्न रहता है। पत्नी सुंदर एवं अच्छे स्वभाव की मिलती है। उसे रोगएवं शत्रुभय रहता है, जीवन में सुख कम ही मिलता है। जातक दीर्घायु होताहै। माता-पिता एवं जायदाद के सुख में कमी रहती है।
12. मीन-मीन राशि का शुक्र अष्टम स्थान में हो तो जातक को बचपन मेंकष्ट सहने पड़ते हैं। स्वास्थ्य मध्यम रहता है, आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती।मन में हमेशा कोई-न-कोई चिंता रहती है। चोरी, दुराचार जैसे दुर्गुण भी जातकमें रहते हैं। महर्षि लोमश के अनुसार जातक की सेवाकाल में मृत्यु होती है।
1. पत्नी की सेवा में रहे तो भाग्य उन्नति होगी।
2. लक्ष्मी के नित्य मंदिरजाकर दर्शन करें।
3. स्नान मिट्टी में बैठकर न करें।
4. सांप का पूजनकरें।
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9) नवम् भाव - नवम स्थान (भाग्य भाव)
नवम स्थान में शुक्र का फल
आचार्य व गुणाकर -गुरु के समान फल बतलायें है।
कल्याणवर्मा - सममायततनुवित्तो दारयुवतिसुखसुहृज्जनोपेतः । भृगुतनये नवमस्थे सुरातिथिगुरुप्रसक्तः स्यात्।। यह सृदुढ शरीर का, धनवान, स्त्री और मित्रों से युक्त तथा देव, गुरु, एवं अतिथि का आदर करनेवाला होता है।
वैद्यनाथ - विद्यावित्तकलत्रपुत्रविभवः शुक्रे शुभस्थे सति। यह विद्या, धन, स्त्री, पुत्र आदि से संपन्न होता है।
गर्ग - भवति भाग्यविधिर्धनवल्लभो बहुगुणी द्विजभक्तिपरायणः । निजभुजार्जितभाग्यमहोत्सवे भवति धर्मगते भृगुनन्दने।। यह भाग्यवान्, धनवान, बहुत गुणों से युक्त, ब्राह्मणों का सन्मान करनेवाला ओर अपने परिश्रम से उन्नति करनेवाला होता है।
बृहद्यवनजातक - अतिथिगुरुसूराचतीर्थयात्रोत्सवेषु पितृकृत- धनसन्धात्यन्तसंजाततोषः। मुनिजनसमवेषो जातिमान्यः कृशश्च भवति
नवम भावे संस्थिते भार्गवेऽस्मिन्।। यह पिता से प्राप्त हुई सम्पत्ति का व्यय तीर्थयात्रा, उत्सव, देव, गुरु तथा अतिथियों का पूजन आदि में करता है। बहुत सन्तुष्ट, मुनि के समान सादे वेष में रहनेवाला, दुबला और अपनी जाति में माननीय होता है। सितोऽत्र लक्ष्मीं, पंचविशतिं भृगुः लाभोदये संस्मृतः । १५ वें वर्ष धनलाभ होता है तथा २५ वें वर्ष भाग्योदय होता है।
वशिष्ठ - बृहद्वस्त्रलाभम्। अच्छे वस्त्रों की प्राप्ति होती है। नारायण भट्ट - भृगौस्त्रित्रिकोणे पुरे के न पौराः कुसीदेन ये वृद्धिरस्मै ददीरन्। गृहं ज्ञायते तस्य धर्मध्वजादेः सहोत्यादि सौख्यं शरीरे सुखं च।। इस से सब लोग ऋण लेते है और ब्याज देते है। इसके घर में हमेशा धार्मिक कार्य चलते रहते है। भाईयों का सुख तथा शारीरिक सुख मिलता है।
काशीनाथ - धर्मे शुक्रे धर्मपूर्णो ज्ञानवृद्धः सुखी धनी। नरेन्द्रमान्यो विजयी नराणांच प्रियः सदा।। यह धार्मिक, ज्ञानी, सुखी, धनवान, लोकप्रिय तथा राजा को भी माननीय होता है।
जयदेव - सकलसुकृतकर्मा पापहर्ता संतोषो विगतसकलरोषो धर्मगेभार्गवेऽस्मिन्।। पापकार्य दूर करके अच्छे कार्य करनेवाला, समाधानी और क्रोधरहित होता है।
मन्त्रेश्वर - सदारसुहृदात्मजं क्षितिपलब्धभाग्यं शुभे।। यह स्त्री पुत्र तथा मित्रों से युक्त एवं राजा से भाग्योदय प्राप्त करनेवाला होता है।
लखनऊ के नवाब - नेकोकारः सुभगः खुसरो दानी च पानवो जोहरा । बख्तमखाने मुर्ताजनशरश्च मज्लसी भवति स इति ।। यह सुन्दर, आनन्दी, प्रामाणिक, दानी, धनवान, मानी, स्वतन्त्रता उपजीविका प्राप्त करनेवाला और सभाओं में सफल पण्डित होता है।
हरिवंश - सुखसमृन्नतिं कुले नृपप्रतापपूर्तिते सुकीर्तिमुज्वलं* सुधर्मकर्मसंग्रहैः । सुविद्यया प्रवीणतां समृद्धिवंशजाततां करोति भाग्यमव्ययं नरस्य भाग्ययो भृगुः ।। यह राजा की कृपा से कुल की उन्नति करता है। सुखी, कीर्तिमान, धार्मिक कार्य करनेवाला विद्वान और धनवान होता है। इस का भाग्य कभी कम नही होता।
गोपाल रत्नाकर यह धार्मिक अनुष्ठान करता है, बहुतों को नौकरी देता है, गुरु पर श्रद्धा रखता हैं तथा अपने काम में मग्न रहता है। घोलप - यह दानशूर, धार्मिक, पवित्र, बहुत मित्रों से युक्त पृथ्वी का स्वामी, पुत्रों से युक्त, गुणवान, स्त्रीसुख से युक्त होता है।
हिल्लाजातक - नवादिगृहगः काव्यः धनसौख्यधनान्वितम्।। नवम से व्यय तक के यह चार स्थानों में शुक्र हो तो वह धनवान और सुखी होता है।
पाश्चात्य मत यह प्रवासी, आनन्दी, सुस्वभावी, स्नेहिल, धार्मिक, शुद्ध चित्त का, काव्यनाटकादि पढ़नेवाला, परोपकारी, विद्याव्यासंगी होता है। यह समुद्री प्रवास भी करता है। अलभ्य वस्तुओं की प्राप्ति के लिये कोशिश करता है। विवाह से होनेवाले आप्तों की सहायता इसे अच्छी मिलती है।
भृगुसूत्र - धार्मिकः तपस्वी अनुष्ठानपरः । पादे बहुत्तमलक्षणः । धर्मी भोगवृद्धिः सुतदारवान् पितृदीर्घायुः। तत्र पापयुते पित्रारिष्टवान्। पापयुते पापक्षेत्रे अरिनीचगे धनहानिः गुरुदारगः । शुभयुते भाग्यवृद्धिः महाराजयोगः। वाहनकामेशयुते महाभाग्यवान्। अश्वान्दोल्यादि- वाहनवान्। वस्त्रालंकारप्रियः ।। यह धार्मिक, तपस्वी तथा जपादिक कार्य करनेवाला होता है। इसके पांव पर अच्छे सामुद्रिक लक्षण होते है l
है। उपभोग बहत मिलते है। स्त्री पुत्रों से युक्त होता है। इसका पिता दीर्घायु होता है। पापग्रह साथ हो तो पिता पर संकट आता है। पापग्रह के साथ, उस की राशि में, शत्रुग्रह की राशि में या नीच में हो तो धनहानि होती है। गुरुपत्नी से व्याभिचार करता है। शुभग्रह साथ हो तो भाग्योदय होता है। अधिकारपद प्राप्त होता है। चतुर्थेश तथा सप्तमेश के साथ हो तो बहुत भाग्यवान होता है। घोड़े, पालकी आदि वाहन प्राप्त करता है। विविध कपड़े और आभूषणों का शौकीन होता है।
हमारे विचार - प्राचीन लेखकों ने इस स्थान में शुक्र के फल प्रायः शुभ बतलाये है। इनका अनुभव मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों में मिलता है। जो थोडे अशुभ फल कहे है वे बाकी राशियों के है। नारायण भट्ट ने व्याज से रुपये देने का विशिष्ट फल कहा है। अप्राप्य वस्तु (जैसे तांबे का सोना करना, असाध्य रोगों की दवाईयाँ खोजना, स्त्री का पुरुष में परिवर्तन करना आदि) की खोज की ओर प्रवृत्ति होना कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों में ठीक प्रतित होता है। अज्ञात ने पिता दीर्घायु होने का फल कहा किन्तु हमारे अनुभव में माता का दीर्घायु होना अधिक पाया गया है। पांव में शुभ लक्षण होने का नवमस्थान से अथवा शुक्र कोई विशेष सम्बन्ध नही है। यवनजातक में १५ वें वर्ष धन प्राप्ति का फल कहा गया है वह वारिस के रूप में ही मिल सकता अपने परिश्रम से नही ।
नवम भाव को शुक्र जातक में तीर्थ यात्राओं की रूचि उत्पन्न करंताहै। वह सुंदर देह वाला, प्रसन्न, ईश्वर और ब्राह्मणों का आदर करने वाला,स्वार्जित सम्पति का भोग करने वाला व शुभकर्मी होगा।
-मानसागरी
जातक राजकृपा से सम्पत्तिवान् और उन्नतिशील होगा। वह पलि,संतान व मित्र सुख से युक्त होगा।
-फलदीपिका
नवम भाव में शुक्र स्वच्छ सुन्दर और विशाल देह प्रदान करता है।जातक सम्पत्तिशाली, प्रसन्न धार्मिक अभिरूचियों और दयालु प्रवृत्तिवाली पत्नी से युक्त, मित्र सुख से युक्त और ईश्वर, अतिथि और बड़ोंका सम्मान करने वाला होगा।
-सारावली
व्यक्ति धार्मिक मानसिकता वाला, साधना-ध्यान के प्रति समर्पित,धार्मिक अनुष्ठान करने वाला, सभी सुखों को प्राप्त करने वाला औरसंतान वाला होगा। उसके पैर में कमल-शंख-अंकुश आदि पवित्र चिन्हहोगें। नवम भाव में शुक्र पिता को दीर्घायु प्रदान करता है। यदि शुक्रपापाक्रान्त है तो जातक के पिता का देहान्त हो। यदि शुक्र शुभयत,स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक की उन्नति होगी। यदि शुक्र चतुर्थ यासप्तम भावों से संबंद्ध है तो जातक अत्यन्त भाग्यवर्धक और सभी प्रकारके वाहनों के सुख व आभूषणों से युक्त होगा।
-भृगु
वह स्वार्थी, धार्मिक, बड़ों का आदर करने वाला, सक्षम, सफल,सेनापति, कलाप्रेमी और उदार होगा।-डॉ रामन
जातक धर्मपरायण तथा दार्शनिक होगा।
-वृहत्जातक
वह प्रगतिशील, ऋण देने वाला, भाईयों की ओर से सुखी व प्रसन्नतथा शान्त व प्रसन्तापूर्वक सुखी जीवन यापन करने वाला होगा।
-चमत्कार चिंतामण
टिप्पणी
शुभ ग्रह शुक्र पवित्रता, धर्म व भाग्य स्थान में स्थित होकर, इस भावके शुभफल देता है। शुभ ग्रहों से दृष्टि-युति व स्थिति संबंध या शुक्रकी स्वक्षेत्री या उच्चस्थिति से फलों में शुभता का विकास होता है।
हमारा अनुभव - इस स्थान में शुक्र पुरुष राशि में हो तो भाई अधिक और बहने कम होती है। तथा लड़के कम और लड़कियां अधिक होती है। पत्नी अच्छी होती है फिर भी इन की प्रवृत्ति कुछ व्याभिचारी होती है। स्त्री राशि में हो तो भाईबहनों और पुत्रों की स्थिति पुरुष राशि के समानही होती है। पत्नी साधारण होती है। उसी के साथ प्रेमपूर्वक रहते है। मिथुन, धनु, कर्क तथा मकर में विवाह के बाद भाग्योदय होता है। व्यवसाय के लिये स्त्रियों से पूंजी मिलती है। सन्मान मिलता है। किन्तु स्त्री की मृत्यु के बाद सब वैभव नष्ट होता है। कन्या और कुम्भ में सन्तति से भाग्योदय होता है। पहली कन्या हो तो वैभव स्थिर रहता है। पुत्र हो तो पहले अच्छी स्थिति प्राप्त होकर बाद में अवनति होती है। मिथुन और वृश्चिक में मृत्यु वैभवशाली स्थिति में होती है। मेष, मिथुन, सिंह, तुला तथा धनु में पत्नी सुन्दर होती है। उस का भाल विशाल, आँखे बड़ी और तेजस्वी, प्रमाणबद्ध शरीर, चेहरा कुछ लम्बा, केश लम्बे, काले तथा चमकीले होते है। स्वभाव आनन्दी होता है तथा काव्यनाटकादि साहित्य की ओर रुचि होती है। संसार में आसक्त नही होती तथा सन्तति की भी विशेष इच्छा नही होती। बहुत कुछ उदासीन रहती है। इस स्थान में शुभ योग में शुक्र ललितकलाओं-गायन, वादन, साहित्यलेखन, सिनेमा आदि में निपुणता द्वारा कीर्ति देता है। अभिनय, और दिग्दर्शन में इन्हे स्वभावतः निपुणता प्राप्त होती है। इन्हें २१ वें वर्ष से लाभ होता है। और ३३ वें वर्ष में नुकसान होता है। कर्क, वृश्चिक और मीन में पत्नी गोरे वर्ण की, ऊंची, निजी हावभाव के साथ बोलनेवाली, दूसरों पर प्रभाव डालनेवाली तथा घर में अपना ही स्वामित्व चाहनेवाली होती है। यह संसार में विशेष आसक्त नही होती। वृषभ, कन्या, मकर में चेहरा गोल, अभिमानी और क्रोधी स्वभाव होता है। इनकी किसी से बनती नही। संसार में बहुत आसक्त और स्वार्थी प्रवृत्ति होती है। इस
स्थान में शुक्र दूषित हो तो विजातीय अथवा आयु में अधिक या विधवा स्त्री से विवाह होता है। अथवा अनैतिक सम्बन्ध रहते है। इन की पढ़ाई का जीवन में इन्हें कुछ उपयोग नही होता। यह स्त्री के अधीन हो कर मातापिता के विरोध में कार्य करता है। पैतृक सम्पत्ति नष्ट होता है। धन का संकट बना रहता है। बरताव व्यवस्थित होता है। राजनीति से दूर रहते है क्योंकि संकट से डरते है। बिना श्रम के सुखपूर्वक रहना चाहते है। स्त्रियों में ये अप्रिय होते है। मीन में तृतीयस्थान के समान फल मिलते है। अनैसर्गिक स्त्रीसम्बंध की रुचि होती है। रिश्ते में बड़ी स्त्रियों-जैसी फूफी, मौसी, मामी या मित्र की पत्नी से अनैतिक सम्बन्ध होता है। कभी कभी पत्नी के धन से ही उपजीविका करनी पड़ती है।
नवम स्थान में शुक्र शुभ फलदायी होता है। ऐसा जातक निरोगी, संपन्न,आस्तिक, विद्वान, गुणवान, उद्यमी, स्वपरिश्रम से प्रगति करनेवाला, पारिवारिक,सुख-सहयोग से युक्त, चरित्रवान, सरकारी कर्मचारी, यशस्वी एवं परोपकारीहोता है। शुक्र बलवान हो तो पितृसुख पर्याप्त प्राप्त होता है। शुक्र चतुर्थेशएवं नवमेश के साथ नवम स्थान में हो तो ऐश्वर्य एवं वाहन सुख उत्तम रहताहै। जातक के पैर के तलवों पर शुभचिह्र अंकित होते हैं। नवम स्थान में शुक्रपापग्रह से युक्त, शत्रुक्षेत्री एवं नीच का हो तो नवमस्थ शुक्र के शुभ फलकम मिलते हैं। जातक विलासी एवं व्यभिचारी बन सकता है।यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार नवमस्थ शुक्र शुभ फलदायी होता है।जातक भाग्यवान, धार्मिक एवं दानपुण्य करनेवाला रहता है। पाश्चात्यज्योतिषविदों के अनुसार नवमस्थ शुक्र के फल उपरोक्त प्रकार के ही हैं।जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है।
नवम भाव-लग्नकुंडली के नौवें भाव में शुक्र हो तो जातक धार्मिक,
चतुर, बुद्धिमान, अच्छा वैवाहिक जीवन, दयालु, तीर्थयात्राएं करने वाला तथा
सरकार से सम्मान पाने वाला होता है। धार्मिक तथा तपस्वी भी होता है। पैसे की
स्थिति अच्छी होती है। परन्तु परिश्रम अधिक करना पड़ता है। सन्तान का सुख भी
उल्लेखनीय नहीं होता।
‘लाल किताब' ने नौवें शुक्र को ‘मिट्टी की काली आंधी' कहा है। यानीसामान्यतः नौवां शुक्र शुभ नहीं माना है। लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक
बुद्धिमान होता है। पैसे वाला भी होता है, किन्तु खुद परिश्रम करने पर ही उसकोभोजन नसीब होता है। सन्तान की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं होती। किन्तु ऐसा
जातक यदि तीर्थयात्राएं करे तो उसके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।
नवम भाव-लग्नकुंडली के नौवें भाव में शुक्र हो तो जातक धार्मिक,चतुर, बुद्धिमान, अच्छा वैवाहिक जीवन, दयालु, तीर्थयात्राएं करने वाला तथासरकार से सम्मान पाने वाला होता है। धार्मिक तथा तपस्वी भी होता है। पैसे कीस्थिति अच्छी होती है। परन्तु परिश्रम अधिक करना पड़ता है। सन्तान का सुख भीउल्लेखनीय नहीं होता।
‘लाल किताब' ने नौवें शुक्र को ‘मिट्टी की काली आंधी' कहा है। यानीसामान्यतः नौवां शुक्र शुभ नहीं माना है। लाल किताब के अनुसार ऐसा जातकबुद्धिमान होता है। पैसे वाला भी होता है, किन्तु खुद परिश्रम करने पर ही उसकोभोजन नसीब होता है। सन्तान की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं होती। किन्तु ऐसाजातक यदि तीर्थयात्राएं करे तो उसके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।
नवमस्थ शुक्र माता-पिता को चिरायु तथा जातक को गायन-वादन, कला-सिनेमा आदि का प्रेमी बनाता है। ऐसा जातक जन्मजात कुशल अभिनेता होता हैतथा सम्मान पाता है। पुरुष राशि का शुक्र हो तो जातक के बहनें कम, छोटे भाईअधिक होते हैं। स्त्रीराशि का हो तो भाई कम बहनें अधिक होती हैं। प्रायःविवाहोपरांत भाग्योदय होता है। स्त्रियों के माध्यम से धन मिलता है। जब तकपत्नी जीवित रहे, व्यवसाय में उन्नति होती है। पत्नी के मरने के बाद स्थिति बिगड़जाती है। कन्या व कुम्भ राशि में शुक्र हो तो जातक का भाग्योदय सन्तान के द्वाराहोता है। यदि प्रथम कन्या हो जाए तो स्थिति सुदृढ़ हो जाती है। यदि पहले पुत्र होजाए तो प्रारंभ में स्थिति सुधरकर फिर बिगड़ जाती है।
जलराशि का शुक्र हो तो जातक खोजी विचारधारा का होता है। अग्नि एवं वायुराशियों में हो तो पत्नी लावण्यमयी व यौवन सम्पन्न नहीं होती है। शुक्र पाप प्रभावमें हो तो विजातीय विवाह को प्रेरित करता है तथा पत्नी की आयु जातक से प्रायःअधिक होती है। माता-पिता से भी जातक का विरोध रहता है। उच्च का शुक्र होतो जातक मामी, मौसी तथा मित्र की पत्नी से अवैध सम्बन्ध बनाने वाला होता है।
नवम भावः पुरुष राशि का शुक्र नवमस्थ हो तो जातक के भाई अधिकऔर बहिनें कम होती हैं तथा पुत्री अधिक और पुत्र कम होते हैं। साधारणनयन-नक्श की पत्नी के रहते भी परस्पर दोनों प्ेमपूर्वक रहते हैं। कन्या, कुम्भराशि का शुक्र हो तो व्यक्ति के भाग्योदय में संतान सहायक होती है। यदिप्रथम संतान पुत्री हो तो आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी बनी रहती है। इसकेविपरीत प्रथम पुत्र की स्थिति से पूर्व में धनार्जन होकर बाद में सबकुछ समाप्तहो जाता है। जल राशि में शुक्र हो तो पत्नी गौरवर्णी, निर्भीक, घर की सत्ता कोसंभालने वाली तथा सभी पर अपना प्रभाव छोड़ने वाली होती है। पृथ्वी राशिका शुक्र हो तो पत्नी कोप करने वाली अभिमानी होती है, स्वार्थपूर्ति में अग्रणीऔर गली-मोहल्ले में किसी से भी पटरी न बिठाने वाली होती है। उच्च काशुक्र नवमस्थ हो तो बहुत अशुभ रहता है। व्यक्ति पापाचारी होता है, रिश्ते मेंबड़ी स्त्रियों (मामी, मौसी आदि) से भी अनैतिक संबंध जोड़ने में शर्म महसूसनहीं करता। अशुभ संबंध में आया शुक्र व्यक्ति के अपनी आयु से बड़ी स्त्री सेवैवाहिक संबंध जुड़वाता है या पुनर्भू (विधवा) स्त्री से अथवा उसके संबंध(अवैध) ऐसी स्त्रियों से रहते हैं। ऐसा जातक माता-पिता से वैर रखने वालाहोता है।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक आस्तिक, धार्मिक,संपन्न, सत्यवक्ता, पराक्रमी, यशस्वी एवं दानशील होता है। बचपन में स्वास्थ्यमध्यम रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान, सहोदरों
एवं पारिवारिक सुख से परिपूर्ण, सरकारी कर्मचारी एवं यशस्वी होता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक ऐश्वर्यशाली,सुख से परिपूर्ण, सरकारी कर्मचारी एवं कीर्तिवान होता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक धार्मिक, उदार, लोककल्याण के लिए धन खर्च करनेवाला, शिल्पशास्त्र का जानकार होता है।पत्नी मनपसंद नहीं मिलती, परस्त्री समागम संभव होता है। जातक केअविवाहित होकर तपस्वी बनने की संभावना रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक चतुर, भाग्यवान, आस्तिक, शास्त्रों का जानकार एवं विद्वान होता है। उसे आर्थिक दृष्टि से कईउतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। लकड़ी, पत्थर के व्यवसाय में जातक लाभ व यश कमाता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक अनेक शास्त्रों का जानकार, कर्मठ या तार्किक, सरकारी कर्मचारी, संगीत-नाटक आदि ललित कलाओं का रसिक, आस्तिक, सहोदरों तथा मित्रों के सुख से परिपूर्ण,अधिकारसंपन्न, लेखक, कवि एवं सुधारक होता है। संतान कार्यकुशल,सच्चरित्र एवं सुशील होती है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक धार्मिक, लोकप्रिय, भाग्यवान, स्वपरिश्रम से प्रगति करनेवाला, सुंदर आंखोंवाला, परदेश निवासी, विद्वान, पितृभक्त एवं सहोदरों के सुख से सुखी होता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक लोभी, हिंसक, सदाचारहीन किंतु सहोदरों से सुखी रहता है। चेहरे पर कोई विकार रहता है। उसके भाग्योदय में स्त्रियों का बड़ा हाथ रहता है।
9. धनु--धनु राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, भाग्यवान एवं समाज में प्रसिद्ध होता है। पत्नी का स्वभाव तेज रहता है। उसके उससे मतभेद रहते हैं। जातक के अविवाहित रहने की भी संभावना रहती है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक भाग्यशाली,लोकप्रिय, सरकारी कर्मचारी, सदाचारी, यशस्वी, दीर्घायु रहता है। वह लकड़ी-पत्थर के व्यवसाय में सफल होता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र नवम स्थान में हो तो जातक अपने सुधारों,कृतियों या दान देने से नाम कमाता है। वह भाग्यवान, तर्क करने में निपुण,विद्वान संगीतादि ललितकलाओं का रसिक एवं दानपुण्य करनेवाला होता है।
12.मीन मीन राशी का शुक्र नवम स्थान में होतो जातक शास्त्र वेत्ता विद्वान, पुरुषार्थी, लोकप्रिय एवं दीर्घायु होता है। उसकी आंखें सुंदर होती हैं। वह पिता का अनुसरण करनेवाला एवं पितृभक्त होता है।
1. चांदी की मूर्ति पूजा में रखें।
2. चांदी व शक्कर बहते पानी में या कुए में डाले। चांदी की रोड नीम के तने में डालें।
===========================10) दशम् भाव -दशम स्थान (कर्म भाव)
दशमस्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - सधनः । यह धनवान होता है।
कल्याण वर्मा - उत्थानविवादजिताः सुखरतिभावार्थकीर्तयो यस्य। दशमस्थे भृगुतनये भवति पुमान् बहुमातिख्यातः ।। यह वादविवाद में अजेय, सुखी, विलासी, धनवान कीर्तिमान तथा बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध होता है।
वैद्यनाथ – शुक्रे कर्मस्थानगे कर्षकाच्च स्त्रीमूलात् वा लब्धवित्तो विभुःस्यात्। इसे किसानों या स्त्रियों से धन प्राप्त होता है। शुक्रचरकः । यह संन्यासी होता है।
वसिष्ठ - यह शुक्र विपत्तिदायक है।
बृहद्यवनजातक - सौभाग्यसन्मानविराजमानः कान्तासुतप्रीतिर- तीव नित्यं । भृगौः सुते राज्यगते नरः स्यात् स्नानर्चनध्यानविराजमानः । । भृगुजोऽत्र सौख्यम्।। यह भाग्यवान, सन्मानित तथा स्नान, ध्यान, पूजा आदि में मग्न होता है। यह स्त्रीपुत्रों पर बहुत प्रेम करता है। यह १२ वें वर्ष धन प्राप्त करता है।
आर्यग्रन्थ - दशममन्दिरगे भृगुवंशजे बधिरबन्धुयुतः स च भोगवान। वनगतोऽपि च राज्यफलं लभेत् समरसुन्दरवेशसमन्वितः । । यह कुछ बहरा, भाइयों से युक्त, भोगयुक्त तथा युद्ध के वेश में सुन्दर दीखता है। इसे जंगल में भी राज्य मिलता है - यह बहुत भाग्यवान होता है।
जयदेव - स्वजनयुतकलत्रप्रीतियुक्तः । सवित्तः शुचितरवरचित्तः सन्मतिः कर्मसंस्थे ।। यह आप्तों से युक्त, पत्नी पर प्रेम करनेवाला, धनवान, पवित्र चित्त का और सदा विचारी होता है।
मन्त्रेश्वर – नभस्यतियशः सुहृत्सुखितवृत्तियुक्तं प्रभुम ।। यह कीर्तिमान मित्रों से युक्त, व्यवसाय में सफल तथा प्रभावशाली होता है।
नारायण भट्ट - भृगुः कर्मगो गोत्रबीजं रुणद्धि क्षयार्थो भ्रमः किन्न आत्मीय एवं। तुलामानतो हाटकं विप्रवृत्त्या जनाङ्गबरैः प्रत्यहं वा विवादात्।। यह पुत्रसन्तति के होने में विघ्न उत्पन्न करता है। सोनेचान्दी के व्यवहार में यह धन प्राप्त करता है। लोगों से हमेशा विवाद करता है और अपने बारे में बहुत अवमबर (बडप्पन) बतलाता है।
काशीनाथ - कर्मस्थिते भृगोः पुत्रे सुकर्मा निधिरत्नवान् राजसेवी धार्मिकश्च जायते दयिताप्रियः।। यह अच्छे काम करनेवाला, रत्न तथा सम्पत्ति से युक्त, सरकारी नौकर, धार्मिक तथा स्त्री को प्रिय होता है।
हरिवंश - नृपप्रियं नरोत्तमं प्रभू सुभाग्यभूषितम् भवेत् सुयज्ञदानसुसंस्तुतं सुकीर्तिविस्तृतं। धनैः सुपूरितं शरीरसुन्दर मनोहर सुकाव्यकर्मकौशलं करोति कर्मगः कविः ।। यह श्रेष्ठ पुरुष, प्रभावी, राजा को प्रिय, भाग्यवान, यज्ञदानादि कामों से प्रशंसनीय होनेवाला, कीर्तिमान, धनवान, सुन्दर, आकर्षक तथा कविता लिखने में निपुण होता है।
लखनऊ के नवाब - दर्साको जरदार: पितृगुरुभक्तश्च काबिलो मनुजः । जोहरा शाहमकाने भवति मुशीरश्च साहबो वा _स्यात्।। यह धैर्यवान, धनाढ्य, पिता तथा गुरु का भक्त, योग्य राजाका मन्त्री या राजा ही होता है।
जागेश्वर- यदा कर्मगो भार्गवो वै नराणां भवेत् पुत्रसौख्यं तथा कामिनीनां । ध्रुवं वाहनानां सुखं राजमानं सदा सौत्सवो विद्यया वै विवेकी। इसे स्त्री, पुत्र तथा वाहनों का सुख मिलता है। राजा द्वारा सन्मान मिलता है। विद्वान और विवेकी तथा हमेशा उत्सवों में भाग लेनेवाला होता है।
घोलप - यह किसी प्रसिद्ध पिता का पुत्र होता है। सुशोभित, शत्रुरहित, सुन्दर घर से युक्त, स्त्री पुत्रादि से युक्त तथा वाहनों का स्वामी होता है। इसके मनोरथ पूर्ण होते है।
गोपाल रत्नाकर - यह पिता और देवों का आदर करता है। संपत्ति और वाहनों से समृद्ध होता है। इसे बड़ा भाई नही होता और शिक्षा अधूरी रहती है।
पाश्चात्य मत - यह शुक्र शुभ सम्बन्ध में हो तो सब तरह से ऐश्वर्य देता है। नौकरी, व्यवसाय, सन्मान, इज्जत, कीर्ति आदि के लिये यह शुक्र शुभ होता है। जीवन सुखी होता है। स्वभाव शान्त और मिलनसार रहता है। इन्हें झगड़े बिलकुल नही सुहाते। स्त्री से इन्हें अच्छा लाभ और सन्मान प्राप्त होता है। प्रसिद्ध या श्रीमान कुल की तरुणी से विवाह होता है। विवाह से भाग्योदय और धनलाभ होता है। गायन, वादन, साहित्यरचना, चित्रकारी आदि कलाओं में । रुचि होती है। इन कलाओं से सम्बद्ध व्यवसाय करता है। सम्पत्ति का कष्ट सहसा नही होता नैतिक आचरण अच्छा होता है। दशमस्थ शुक्र पीडित या अशुभ सम्बन्ध में हो तो स्वैराचारी वृत्ति से अपमान होता है। वृषभ, तुला और मीन में इस शुक्र से बहुत अच्छे फल मिलते है। जन्मस्थ चन्द्र से शुभ योग हो तो आर्थिक और पारिवारिक सुख अच्छा मिलता है। यह नीतिमान और विजयी होता है। दूरदूर के प्रदेशों में प्रवास करता है। रवि और चन्द्र की शुभ दृष्टि हो तो कई उपाधियां मिलती है। यह किसी को शरण जाना स्वीकार नही करता। गुणवान और धनवान होता है। अभिजित नक्षत्र जिस प्रकार सर्वविजय बतलाता है वैसे ही दशमस्थ शुक्र सर्वोन्नति करता है।
भृगुसुत्र - बहुप्रतापवान्। संकल्पसिद्धिः। शुभकर्मकारी। अनेक वाहनवान्। मणिगौरोप्यचयै भृगुः। पापयुते कर्मविघ्नकरः । गुरुचन्द्रबुधयुते अनेकवाहनारोहणवान्। अनेकऋतुसिद्धिः । दिगन्तविश्रुतकीर्तिः। अनेक राजयोगः। बहुभाग्यवान्। वाचालः । सधनसुशीलदारवान्।। यह बहुत प्रतापी और अच्छे काम करनेवाला होता है। इसके संकल्प पूर्ण होते है। वाहन, रत्न, गायबैल और चान्दी से यह सम्पन्न होता है। पापग्रह साथ हो तो कामों में विघ्न आते है। गुरुचन्द्र या बुध साथ हो तो कई वाहन मिलते है। कई यज्ञ करता है। बहुत कीर्ति प्राप्त होती है। आधिकारपद प्राप्त होते है। भाग्यवान, धनी और सुशील स्त्री से युक्त तथा बडबड करनेवाला होता है।
जातक का भाई बहरा होगा। जातक प्रसन्नता का इच्छुक, ऐन्द्रिकरूप से सुखासक्त, वह वन में चला भी जाए परन्तु राजा बनेगा। उसकाव्यक्त्व एक बहादुर योद्धा जैसा होगा।
-मानसागरी
जातक मित्रों से पूर्णयता सुखी, सम्मानित, धार्मिक व नैतिक कार्यकरने वाला, अच्छी प्रतिष्ठा वाला और जीवन में उच्चपद प्राप्त करेगा।
-फलदीपिका
जातक झगड़े मुकदमें में विजयी, प्रसन्न, यौन सुख प्राप्त करने तालाहोगा। वह प्रतिष्ठा, सम्पत्ति, ख्याति तथा बुद्धि-चातुर्य प्राप्त करेगा।
-सारावली
जातक कीर्तिवान होगा। शुक्र के पापयुत होने पर शुरू किए हुए(हाथ में लिए हुए) कामों में बाधा कठिनाईयाँ तथा असफलताएँ बढ़ेंगी।यदि शुक्र, बुध, गुरु व चन्द्र से युत है तो जातक को वाहन सुख से युक्त,धार्मिक कार्यकर्ता, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति और विविध राजयोग प्रदान करेगा।वह बहुत बोलने वाला और भाग्यशाली होगा।
6वह दिव्य पुरूषों व धर्माचायों का आदर करने वाला, वाहनों से युत,पढ़ाई में रकावटों का सामना करने वाला, सफल वकील, लोकप्रियसामाजिक कार्यकर्ता तथा मिताहारी (संतुलित भोजन करने वाला) होगा।
टिप्पणी
-डॉ रामन
जातक बुद्धिमान, प्रसिद्ध, अनेकों मित्रों वाला तथा प्रसन्न होग। उसेआदर सम्मान, सम्पत्ति और ख्याति प्राप्त होगी तथा वह उद्यानादि अन्यसुविधाओं से युक्त होगा। उसकी आय का साधन कृषिकर्म, महिलाएँकला, आभूषण, पोशाकें, इत्र (सुगंधित द्रव्य), वाहन, रत्ल, जलीयपदार्थ, फूल आदि होंगे। वह भाग्यशाली, प्रतिष्ठित और पत्नी व बच्चों केप्रति अत्यन्त लगाव रखने वाला होगा।
प्रबलतम केन्द्र दशम भाव में अवस्थित शुभग्रह शुक्र शुभ फलों मेंवृद्धि देता है। यदि यह गुरू, बुध तथा चन्द्रमा जैसे शुभ ग्रहों से युत है।तो फलों में शुभता अधिक पाई जाएगी।
परन्तु नारायण भट्ट और जीवनाथ के मतानुसार दशमस्थ शुक्रवीर्य में कमजोरी और संतान प्राप्ति में बाधक होता है।
कन्या लग्न के लिए द्वितीयेश और नवमेश शुक् दशम भाव में औरमकर लग्न के लिए यही शुक्र पंचमेश और दशमेश होकर दशम मेंस्वक्षेत्री होता है। कुंभ लग्न के लिए चतुर्थेश और नवमेश होकर दशममें बैठता है। इसी प्रकार मिथुन लग्न के लिए पंचमेश और द्वादशेश होकरदशम भाव में उच्चस्थ होता है। यदि लग्न कर्क है तो शुक्र चतुर्थेश वएकादशेश होकर दशम में बैठता है। सिंह लग्न के लिए तृतीयेश वदशमेश होकर स्वगृही तथा तुला लग्न में लग्नेश व अष्टमेश होकर दशममें होने से एकाएक व्यवसायिक बदलाव देता है। शुक्र व चन्द्रमा का राशिपरिवर्तन अच्छे व शुभ फल प्रदान करता है। वृश्चिक लग्न के लिएसप्तमेश व द्वादशेश शुक्र सिंह राशि (शत्रु) में दशम भाव शत्रुक्षेत्री होनेके कारण शुभफलदायक नहीं होता। इसी प्रकार धनु लग्न के लिए शुक्रषष्ठेश और एकादशेश होकर कन्या राशि में नीचस्थ हो जाता है। अतः स्पष्ट ही है कि दशमस्थ शुक्र के प्रभाव दशम भाव की राशि, शुक्र केभावेश के रूप में प्राप्त अधिपत्य आदि पर निर्भर करता है। ये सभीस्थितियाँ शुभफलोत्पादक हैं या धनयोग या सम्पत्ति, प्रसिद्धि तथा नामख्याति देने वाली कही जाती है।
जातक काव्य-सृजन करने वाला, कला प्रेमी, समाजोपयोगी कार्यकरने वाला और बहुत से पुत्रों का पिता होगा।
राष्ट्रपति ज़ञाकिर हुसैन का मिथुन लग्न, द्वितीय भाव में कंतु, तृतीयमें गुरु, छठे में शनि, आठवें में सूर्य, बुध, राहु और दसवें में शुक्र,एकादश में चन्द्रमा तथा द्वादश भाव में मंगल था। शुक्र ने उन्हे चिरख्याति व यश प्रदान किया।
हमारे विचार - इस स्थान में वसिष्ठ और नारायण भट्ट सिवाय अन्य सभी लेखकों ने शुक्र के शुभ फल बतलाये हैं। वसिष्ठ ने विपत्ति और नारायण भट्ट ने पुत्रसन्तति को प्रतिबन्ध होना ये फल कहे है । इन का अनुभव पुरुष राशियों में और क्वचित मीन में मिलता है। अन्य राशियों में शुभ फल ही मिलते है
हमारा अनुभव दशमस्थानमें राशि में शुक्र हो तो पुरुष अविवाहित रहने की ओर प्रवृत्ति होती है। स्त्रीसम्बन्ध नही चाहते। धनार्जन शुरू होने पर ही विवाह का विचार करते है। स्त्री से सम्बन्ध अच्छे नही होते। सन्तति की चिन्ता रहती है। स्त्रीपुत्रों का सुख मिला तो व्यवसाय ठीक नही चलता। यह द्विभार्यायोग भी हो सकता है। यही फल मीन राशि में भी मिलते है। मां या पिता की मृत्यु बचपन में ही होती है। स्त्री राशि में दशमस्थ शुक्र विवाह के बाद स्थिरता और भाग्योदय दर्शाता है। एक दो पुत्र होते है। इस स्थान में शुक्र होने से नौकरी पसन्द नही होती। व्यवसाय की ओर रुचि होती है। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु तथा कुम्भ में - बी.एस.सी., एम.एस.सी., बी.ई इत्यादि विज्ञान की उपाधियां मिलती है। वनस्पतिशास्त्र, पुरातत्त्व, शुश्रूषा, चिकित्सा, दर्जीकाम आदि कामों में कुशलता प्राप्त होती है। गणित तथा ज्योतिष में भी प्रवीण हो सकते है। गायन, वादन, रेकार्डिंग, सिनेमा व्यवसाय, रसायन, भौतिक शास्त्र, भौतिक शास्त्र, फोटोग्राफी, मोटर ड्रायव्हिंग आदि व्यवसाय भी होते है। स्त्री राशि के शुक्र से व्यापार या नौकरी में प्रगति होती है। इस शुक्र से व्यक्ति उदार, मिलनसार, लोकप्रिय किन्तु किसी व्यसन के आधीन होती है। पैसा बहुत मिलता हे किन्तु संचय नही हो सकता। संकट आते है। आलसी स्वभाव होता है। यह शुक्र दूषित हो तो स्त्रियों के सम्बन्ध से बेइज्जत होती है। परस्त्रियों के आधीन हो कर धन खर्च करते है। मंगल से शुभ योग हो तो शीलवान होते है। पुरुष राशि में दशमस्थ शुक्र पिता का सुख नही देता। शुक्र के कारकत्व के व्यवसायों में यश नही मिलता। सभी धन्धे करना चाहते है किन्तु एक भी सफल नही होता।
दशम स्थान में शुक्र का होना ज्योतिषशास्त्र में शुभ माना गया है। ऐसा जातकवाद-विवाद पटु, चतुर, व्यवहारदक्ष, विलासप्रिय, सुखी, संपन्न, विद्वान एवं यशस्वी होता है। ऐसा जातक पशुपालन या स्त्रियों से संबंधित सौंदर्य-प्रसाधन,कपड़़े, साड़़ियों आदि का व्यापार करे तो उसमें अच्छा लाभ पाता है।
जातक यशस्वी, सरकारी कर्मचारी, अधिकारसंपन्न, प्रतिष्ठित एवं कामातुरहोता है। अधिक कामुकता के कारण शुक्र दुर्बलता या वीर्य संबंधी विकारउत्पन्न होने की संभावना रहती है। जातक के कन्या संतान अधिक रहती हैं।
महर्षि भृगु के मतानुसार दशम स्थान में शुक्र के साथ चंद्र या बुध कीयुति हो तो उत्तम फलदायक योग बनता है।
महर्षि वशिष्ठ के मतानुसार दशमस्थ शुक्र शुभफलदायी नहीं होता। जातकको अपने जीवन में कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।
यवन ज्योतिषविदों ने दशमस्थ शुक्र के अच्छे फलित को मान्य किया है।उन्होंने 12वें वर्ष में धनलाभ होने का विशेष फलित कहा है।
पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार दशमस्थ शुक्र हो तो ऐसा जातक संपन्न,प्रतिष्ठित एवं सुखी जीवन जीता है। उसे ललितकला में रुचि होती है। पत्नीअच्छी मिलती है एवं भाग्योदय विवाह के बाद होता है। जातक स्वाभिमानीएवं विजयी होता है। शुक्र दुर्बल या पापयुक्त हो तो चरित्र दोष निर्माण होताहै। फलस्वरूप सामाजिक अप्रतिष्ठा होती है।
दशम भाव—दसवें भाव में शुक्र हो तो जातक न्यायप्रिय, दयालु, भाग्यवान,धनाद्य, शुभकर्मा, ज्योतिष में रुचि लेने वाला, प्रतापी किन्तु धन को विशेष महत्वदेने वाला तथा विपरीतलिंगी के साथ जहनी अय्याशी (काल्पनिक सति) करनेवाला होता है। ऐसे जातक के युवावस्था में अवैध सम्बन्ध सम्भावित होते हैं।भाइयों से उसके सम्बन्ध प्रायः मधुर नहीं रहते। यदि शुक्र दूषित हो तो जातकवैश्यागामी होता है।
लाल किताब के अनुसार दसवां शुक्र यदि स्त्री राशि में हो तो जातकमृदुभाषी, लोकप्रिय, मिलनसार व विवाहोपरांत भाग्योदयी होता है। ऐसे जातक कीपत्नी भी जातक की धनवृद्धि में सहायक होती है। प्रायः जातक नौकरी नहीं करताक्योंकि स्वतन्त्र कार्य की इच्छा उसे जन्मजात होती है। यदि नौकरी करता है तोऊबकर शीघ्र त्यागपत्र दे देता है और अपना व्यवसाय करता है। सन्तान कम होतीहैं। बुरी आदतें सम्भावित होती हैं।
पुरुष राशि में शुक्र हो तो (या उच्च का हो तब भी) जातक को विवाहेच्छानहीं होती। विवाह कर लेता है तो पत्नी के साथ अधिक समय नहीं रहता। पत्नीके साथ सौमनस्य भी नहीं रहता। कामकाज में ही लगा रहता है अतः पत्नी असंतुष्टही रहती है, जिससे कलह उत्पन्न होती है।
शुक्र यदि राहू व शनि के प्रभाव में हो तो 'द्विभार्या योग' बनता है। संतान कीचिंता बनी रहती है। यदि स्त्री-पुत्र का सुख मिल जाए तो व्यवसाय ठीक नहीं चलता, व्यावसायिक सफलता संदिग्ध हो जाती है। पिता का सुख भी अल्प होजाता है। शास्त्रकारों ने दशमस्थ शुक्र को बहुत सन्तान प्रदान करने वाला भी मानाहै तथा जातक का आडम्बरप्रिय होना कहा है।
दशम भावः स्त्री राशि का शुक्र शुभ प्रभाव में होकर दशम स्थान में होतो जातक का भाग्योदय विवाहोपरान्त होता है। संतान अल्प (एक या दोपुत्र) होती है, किसी के अधीन कार्य करने की प्रवृत्ति न होने से स्वतंत्रव्यवसाय करता है। वायु और अग्नि राशि का शुक्र जिन जातकों की कुण्डलीमें दशमस्थ हो वे विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त कर वैज्ञानिक, वनस्पतिशास्त्रज्ञ या चिकित्सक बनते हैं। गणितज्ञ, ज्योतिषी, गायन-वादन, चित्रकारीमें भी ऐसे जातक निपुण देखे गए हैं। ऐसे जातकों की नौकरी या व्यवसायदोनों में उन्नति होती है। स्त्री राशि का शुक्र व्यक्ति को उदार,मिलनसार,लोकप्रिय तो बनाता है परंतु किसी-न-किसी व्यसन की लत भी लगा देता है।ऐसे जातक खूब धनार्जन करते हैं लेकिन संग्रह नहीं कर पाते। पुरुष राशि काशुक्र हो तो विवाह की इच्छा ही नहीं होती। ऐसे व्यक्ति अपवाद रूप में जबखूब धन कमाने लगते हैं तब विवाह का विचार करते हैं। स्त्री सुख में कमीतथा संतान की चिंता बनी रहती है। इन दोनों का सुख मिले तो कार्य-व्यवसायठप्प हो जाता है। अशुभ संबंध में आया शुक्र परकीया से धन और मान दोनोंकी हानि कराता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक व्यवहारकुशल,सच्चरित्र, संपन्न, सरकारी कर्मचारी एवं मातृभक्त होता है। उसे पत्नी सुखअच्छा मिलता है, आंखें सुंदर होती हैं।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक सच्चरित्र,माता-पिता का आज्ञाकारी, पुरुषार्थी, विद्वान एवं संपन्न रहता है। महर्षि लोमशके अनुसार पत्नी श्रेष्ठ कुल की होती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक धैर्यवान,अधिकारसंपन्न, बुद्धिमान, आस्तिक, मातृभक्त, संपन्न, सरकारी कर्मचारी होताहै। लोक कल्याणकारी कार्यों के कारण उसका नाम होता है, पत्नी विद्वान होतीहै। महर्षि लोमश के मतानुसार पुत्र सुख में बाधा उत्पन्न होती है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक विद्वान, संपन्नएवं शासनाधिकारियों का मित्र रहता है। माता-पिता एवं बांधवों का सुखभोगता है। माता-पिता अधिक समय तक जीवित नहीं रहते।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक शासन काआलोचक, वातरोग से ग्रस्त होता है। उसे पत्नी सुंदर एवं सच्चरित्र मिलतीहै, ससुराल के लोगों से विशेष स्नेहभाव रहता है। महर्षि लोमश के मतानुसारपुत्रसुख में बाधा रहती है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, धैर्यवान, व्यवहारकुशल, आस्तिक, मातृपितृभक्त एवं यशस्वी औरजन्म स्थान से दूर रहता है। पिता से मतभिन्नता रहती है या उसका सुख कमप्राप्त होता है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक सच्चरित्र,राजतुल्य वैभव से युक्त, अधिकारसंपन्न, यशस्वी, अनेक शास्त्रों का जानकार,संगीत-नाटक आदि कलाओं का रसिक, तर्क-वितर्कंकुशल, लोकहित के कार्यकरनेवाला होता है। पत्नी सुख अच्छा मिलता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न,धार्मिक, सरकारी कर्मचारी, अधिकारसंपन्न एवं यशस्वी होता है। लोककल्याणके कार्य करता है। पत्नी सुख उत्तम रहता है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक को सामान्य फलप्राप्त होते हैं। जीवन संपन्न होते हुए भी उसे अनेक परेशानियों से गुजरना पड़ताहै, माता-पिता के सुख में कमी रहती है। महर्षि लोमश के अनुसार पत्नीतेज स्वभाव की मिलती है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक कामातुरएवं परस्त्रीगामी रहता है। जातक शासन का आलोचक, गुणवान, पराक्रमी,आस्तिक, दीर्घायु एवं व्यवहारकुशल रहता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक धैर्यवान एवंअपने कुल में प्रसिद्ध रहता है। इसे जन्म स्थान से दूर रहना होता है।
12. मीन मीन राशि का शुक्र दशम स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी एवं कुलप्रसिद्ध रहता है। वह सुधारक, लेखक या नेता बनता है, अपनेकामों से प्रसिद्धि पाता है और कामातुर रहता है। महर्षि लोमश के अनुसारजातक कामातुर तो रहता है किंतु पुत्रसुख में बाधा होती है।
1. हजारा के पौधे लगावें।
2. चांदी की रोड (सिल्ली) नीम के तने में डालें।
3. बेसन से बनी मिठाई गाय को खिलावें।
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11) एकादश भाव -एकादश स्थान (लाभ भाव)लाभ स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकार - गुरु के समान फल बतलाया है। कल्याणवर्मा - प्रतिरूपदासभृत्यं बव्हायं सर्वशोकसंत्यक्तं । जनयति भवभवनगतो भृगुतनयः सर्वदा पुरुषं । वेश्यास्त्रीसंयोगैर्ग- मनागमनैर्धनं भवति पुंसां । आये सितेऽपि चैव, मुक्तारजतादिभूयिष्ठं ।। यह सुन्दर, नौकरचाकरों से युक्त, शोकरहित होता है। इसे अच्छी आय होती है। इसे वेश्याओं के सम्बन्ध से और घूमने फिरने के व्यवसायों से (जैसे सेलिंग एजेन्ट आदि) काफी धन मिलता है।
नगरपूरवृन्दयोगैः स्थावरकर्मक्रियाभिरपि वित्तम्।। गांव या शहर के सम्बन्ध से और इमारते बनवाने के कामों से इसे धनलाभ होता है।
वैद्यनाथ – लाभस्थे भृगुजे सुखी परवधूलोलोsटनो वित्तवान्। यह सुखी, परस्त्री में आसक्त, प्रवासी और धनवान होता है। शुक्र स्त्रीजनकाव्यनाटक कला संगीतविद्यादिभिः । इसे स्त्रियों से, कविता,
नाटक संगीत आदि कलाओं से धनलाभ होता है।
वसिष्ठ - शुक्रः करोति सुगुणं धनाप्तिं।
यह गुणवान और धनी होता है।
गर्ग - स्त्रीरत्नवररत्नाढ्यो स्वस्थः शोकविवर्जितः । सम्पन्नधन- भृत्यश्च मर्त्यो लाभगते सिते।।
यह उत्तम स्त्री और रत्नों से युक्त, शोकरहित, धनवान तथा नौकरों से युक्त होता है।
बृहद्यवनजातक - सद्गीतनृत्यादिरतो नितान्तं नित्यं च वित्तागमनानि नूननं। सत्कर्मधर्मागमचित्तवृत्तिः भृगोः सुतो लाभगतो यदि स्यात् ।। यह गायन नृत्य आदि कलाओं का शौकीन, धार्मिक, सदाचारी, धनवान तथा शास्त्रानुकूल काम करनेवाला होता है। इनाब्दे शुक्रः करोतिं धनं । यह १२ वें वर्ष धनलाभ कराता है।
ढुंढिराज - प्रायः यवनजातक का उद्धरण दिया है। चिन्तागमनानि प्रवास और चिंता होना यह अधिक बतलाया है।
आर्यग्रन्थ - विभवभागवते भृगुनन्दने वरगुणावहितोऽप्यनलैर्युतः । मदनतुल्यवपुः सुखभाजनं भवति हास्यरतिः प्रियदर्शनः ।। यह सुन्दर, सद्गुणी, अग्निपूजक, सुखी और हंसमुख होता है।
जयदेव - बहुधनागमवान् सुमतिः पुमान् नटनगीतविदायगते सिते। यह धनवान, बुद्धिवान तथा नृत्यगीत का ज्ञाता होता है। काशीनाथ - लाभे शुक्रे सदालाभो यशः सत्यगुणान्वितः ।धनीभोगी क्रियाशुद्धो जायते मानवोत्तमः।। यह मानव श्रेष्ठ, सदाचारी,
धनवान, उपभोग प्राप्त करनेवाला, कीर्तिमान, सच बोलनेवाला तथा सदा लाभयुक्त होता है।
जागेश्वर -सदा गीतनृत्यं धनं तस्य गेहे सुकर्मी सुधर्मागमे तस्य चित्तं। दृढं विद्यया ईश्वरे तस्य चित्तं यदा भार्गवो लाभभाव प्रयातः।। इस के घर में हमेशा नाचगाना चलता है। यह धनवान, धार्मिक और सदाचारी तथा ईश्वरभक्त होता है।
नारायण भट्ट - भृगुर्लाभगो लाभदो यस्य लग्नात् सुरूपं महीपं च कुर्याच्च सम्यक्। लसत्कीर्तिसत्यानुरक्तं गुणाढ्यं महाभोगमैश्वर्ययुक्तं सुशीलं ।। यह लाभयुक्त, सुन्दर, कीर्तिमान, सत्यप्रिय, गुणी, वैभवशाली, शीलवान, उपभोग प्राप्त करनेवाला तथा राजा (बड़ा अधिकारी) होता है।
मन्त्रेश्वर - धनाढ्यमितरांगनारतमनेकसौख्यं भवे ।। यह धनवान, सुखी, परस्त्री में आसक्त होता है।
लखनऊ के नवाब - जरदारं महबूब सिरदारं बाभुरौवतं मनुजं याफ्तिमकाने जोहरा मईशं पुरुदनं कुरुते।। यह धनवान, श्रेष्ठ, सरदार, लोगों की फिक्र न करनेवाला, तेजस्वी, शीलवान तथा राजा जैसा प्रभावी होता है।
हरिवंश - सुसौख्यबाहुलं सुवित्तवाहनादिबाहुलं सभृत्यबाहुलं कुटुम्बबाहुलं नरस्य च। सुभाग्यबाहुलं सुभोगभूषणादिबाहुलं* सुलभदो नृपात् करोति लाभगो भृगुः।। यह बहुत सुखी, भाग्यवान तथा राजा द्वारा सन्मानित होता है। इसे धन, वाहन, नौकर, परिवार, उपभोग, आभूषण आदि विपुल मात्रा में मिलते है।
घोलपयह - अनेक मित्रों से युक्त, पुत्रयुक्त, सत्संगति में रहनेवाला, बलवान, शत्रुरहित, लोकप्रिय, गीत तथा नृत्य का शौकीन होता है।
गोपाल रत्नाकर - यह विद्वान, श्रीमान, भूमि का स्वामी तथा सन्मानयुक्त होता है।
पाश्चात्य मत - यह अच्छे मित्रों की मदद से प्रगति करता है। व्यापार में सफल हो कर धन प्राप्त करता है। विवाह से भी धनलाभ
होता है। स्त्रियों के आश्रय से भाग्योदय होता है। आकांक्षाये पुरी होती है। पुत्र बहुत होते है। मित्रों के परिवारों से विवाह सम्बन्ध होते है। यह शुक्र दूषित या निर्बल नही होना चाहिये। यह मंगल, शनि, हर्षल या नेपच्यून से युक्त हो तो अशुभ फल मिलते है। यदि रवि से शुभयोग हो तो स्त्रियों से, चन्द्र से शुभ योग हो तो मनोरंजक खेलों से, मंगल से हो तो आकस्मिक प्रेम से, बुध से हो तो चालाक लोगों से, गुरु से हो तो मित्रों से अच्छा लाभ होता है। शनि के सम्बन्ध से शोकमय स्थिति पैदा होती है।
भृगुसुत्र - विद्वान्, बहुधनवान्, भूमिलाभवान्, दयावान्। शुभयुते अनेकवाहनयोगः कनकसमृद्धिः दिव्यकायासुकान्तिः । पापयुते पापमूलात् धनलाभः । शुभयुते शुभमूलात्। नीचर्क्षे पापरन्ध्रेशादियोगे लाभहीनः ।। यह विद्वान, बहुत धनवान, भूमि प्राप्त करनेवाला, दयालु होता है। शुभ ग्रहों के साथ हो तो शरीर बहुत कान्तिमान होता है तथा बहुत वाहन और विपुल सुवर्ण प्राप्त होता है। पापग्रहों से युक्त हो तो बुरे कामों से और शुभ ग्रहों से युक्त हो तो अच्छे कामों से लाभ होता है। नीच में, पापग्रह के साथ या अष्टमेश से युक्त हो तो लाभ नही होता।
व्यक्ति गुणवान्, अग्निपूजक, कामदेव जैसी देहवाला, रोमांस वहँसने-हँसाने वाला, सुदर्शन व्यक्तित्व वाला, व्यक्तियों को दर्शनमात्र सेसंतुष्ट करने वाला होगा।-मानसागरी
जातक प्रसन्न, एकाधिक पल्ियों से संबंधित और सभी प्रकार सेसुखी होगा।
-फलदीपिका
ग्यारहवें भाव में शुक्र होने से जातक आज्ञाकारी सेवकों वाला होताहै। वह सभी दुखों से मुक्त और पर्याप्त लाभ प्राप्त करने वाला होगा।-सारावली
ग्यारहवें भाव में शुक्र होने से जातक विद्वान् सम्पन्न, भूखण्डों कास्वामी, दयालु आदि होगा। यदि शुक्र शुभयुत है तो वह वाहन सुख पाये।यदि शुक्र पापयुत है तो सम्पत्ति-लाभ संदिग्ध स्रोतो से होगा। यदि शुक्रनीच या पापग्रहों से (सिद्टयु) दृष्टि-युतयादि संबंध बनाता है या छठे,आठवे या बारहवें भावों के स्वामियों से संबंद्ध है तो जातक को आर्थिकलाभ नहीं होंगे।
-भृगु
व्यक्ति प्रभावशाली, विद्वान्, सम्पन्न, अच्छे वाहनों का स्वामी, सफलव लोकप्रिय होगा। उसके बहुत से मित्र होंगे।
-डॉ रामन
जातक की तीन पत्ियाँ, वह स्वयं अल्पजीवी और प्रसन्नतापूर्वकजीने वाला होगा।
-जातक सागर
टिप्पणी
जातक शत्रुरहित होगा। एकादश भाव लाभ का भाव है। यह दशम सेदूसरा व सप्तम से पाचवाँ है तथा धनभाव द्वितीय से दशम है। इसमेंशुभग्रह की स्थिति संपदा, विद्या, भाग्य आदि गुणों को बढ़ाने वाली होगी।शुक्र मानसिकता व रूचि के प्रतिनिधि पंचम भाव को प्रभावित करते हुएजातक में संगीत, नृत्य, अभिनय काव्यादि के प्रति रूचि उत्पन्न करता है।वह संभोगी भी हो सकता है।
हमारे विचार - इस स्थान में सभी लेखकों ने शुभ फल बतलाये है क्योंकि सभी ग्रहों के लिए एकादश स्थान अच्छा माना गया है।
हमारा अनुभव - यह शुक्र पुरुष राशि में हो तो पुत्र कम होते है - कन्याएँ अधिक होती है। मेष, सिंह, तथा धनु में पुत्र नही होते या होकर मर जाते है। बड़े भाई का खर्च उठाना पड़ता है। धन बहुत मिलता है किन्तु खर्च भी बहुत होता है। व्यापार या नौकरी व्यवस्थित रहती है। स्त्रीराशियों में पुत्र अधिक और कन्याएँ कम होती है। इन का आचरण दूषित होता है। पतित स्त्रियों से सम्बन्ध होता है। कंजूस होते है। इन के बारे में तरह तरह की अफवाहें फैलती है। स्वार्थी, मित्रता की फिक्र न करनेवाले होते है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में सन्तति नही होती अथवा सिर्फ कन्याएँ होती है। द्विभार्यायोग हो सकता है। हीन वर्गो में २२ वें वर्ष से और उच्च वर्गो में ३२ वें वर्ष से भाग्योदय होता है। अस्थिरता, अति अभिमान, शीलभ्रष्टता ये फल होते है।
एकादश स्थान में प्रायः सभी ग्रह शुभ फलदायी होते हैं। शुक्र भी एकादशस्थान में शुभ फलदायी होता है। ऐसा जातक धनसंपत्ति से परिपूर्ण, नौकर-चाकरों,वाहनादि से सुखी एवं संपन्न रहता है। वह चिंतारहित, प्रसन्नचित्त होने के साथही अभिनय, संगीत में रुचि रखता है। पर्यटन, जमीन-जायदाद की खरीददारीएवं स्त्रियोपयोगी सौंदर्य प्रसाधनों के व्यापार में जातक अच्छा धन कमाता है।पशुपालन, कैमिकल्स, दवाइयों आदि के व्यापार में लाभ होता है।
जातक सुंदर, प्रभावी, यशस्वी एवं आस्तिक होता है। कामवासना अधिकहोने से जातक परस्त्रीगामी बन सकता है।
यवन ज्योतिषविदों ने भी उपरोक्त फल बताए हैं। पाशचात्य बिद्धानों कोअनुसार जातक व्यापार में पूरी तरह सफल होते हैं। इष्ट मित्रों के सहयोग सेउनका भाग्योदय होता है।
एकादश भाव-लग्नकुंडली के ग्यारहवें भाव में शुक्र हो तो जातकवाहनसुखी, धनपति, रत्नादि का व्यापारी (या शुक्र से सम्बन्धी व्यवसाय वाला),सन्तान से सुखी, कामुक किन्तु परमार्थी होता है। यदि शुभ प्रभाष में हो तो मित्रवर्गउत्तम एवं धनोपार्जन में सहायक होता है। ऐसे जातक को स्त्रियों के माध्यम से भीलाभ होता है। किन्तु शुक्र पाप प्रभाव में हो तो अशुभ फल प्रा्स होते हैं।
लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक गुप्त कार्य करने वाला, क्षण में रंगबदलने वाला होता है। यदि कुंडली में बुध व चन्द्रमा स्थिर राशि में हों तो ग्यारहवांशुक्र विशेष धनदायक होता है। शुक्र अशुभ हो तो गुस्रोग, चर्मरोग या शुक्राणुसम्बन्धी रोग देता है। ऐसा जातक ऊपर से भोला परन्तु भीतर से तेज व शातिर होताहै। पत्ी को यदि घर का खजांची बनाए तो अशुभ रहता है।
पुरुष राशि में ग्यारहवां शुक्र कन्याएं अधिक देता है। स्त्री राशि में पुत्रअधिक देता है। किन्तु अग्निराशि में पुत्र अभाव या पुत्र सुख अल्प कर देता है।
जलराशि का शुक्र सन्तान के लिए अशुभ होता है। ग्यारहवां शुक्र किसी भी राशि
का हो जातक के चरित्र को संदिग्ध बनाता है। ऐसा जातक प्रायः स्वार्थी, कंजूस,
मित्रों की अवहेलना करने वाला होता है तथा उसके विषय में अफवाहें अधिक
उड़ती हैं।
शास्त्रकारों ने ग्यारहवें शुक्र की कुछ और विशेषताएं भी गिनाई हैं। ऐसेजातक को सौंदर्य, ऐश्वर्य, भोग व सामर्थ्य गुण व कीर्ति सहित प्रात्त होते हैं औरशुभ प्रभाव का शुक्र हो तो जातक राजा के समान वैभव ऐश्वर्य का भोग करता है।
एकादश भावः शुक्र एकादश भाव में हो तो जातक के मित्र सच्चे तथाउसकी उन्नति में सहायक होते हैं। व्यवसाय तथा विवाह से धनलाभ होता है।स्त्रयों के संपर्क से भी उन्नति होती है, पुत्रों की संख्या अधिक होती है।जातक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। अग्नि राशि का शुक्र हो तो पुत्र सुखनहीं मिलता। पुत्र या तो होते नहीं अथवा होकर मर जाते हैं। बड़े भाई कादायित्व वहन करना पड़ता है, जहां आय अधिक होती है वहीं व्यय भीअत्यधिक होता है। जातक चाहे व्यवसायी हो अथवा नौकरी करने वाला,व्यवस्थित रहता है। स्त्री राशि का शुक्र पुत्र संतान अधिक देता है, पुत्रों केबाद एक-दो कन्या रल की प्राप्ति होती है। एकादश भावस्थ किसी राशि काशुक्र हो तो उसके विरुद्ध भ्रम की स्थिति बनी रहती है तथा अफवाहें फैलतीरहती हैं। जल राशि का शुक्र पुत्र संतान का अभाव रखता है। मंगल से योगकरे तो आकस्मिक प्रेम से, बुध से योग हो तो चालाक लोगों से, बृहस्पति सेयोग हो तो मित्रों से लाभ मिलता है। शनि से योग हो तो शोक भय देता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान, संगीत,नाटकादि कलाओं में प्रवीण, दीर्घायु, परोपकारी एवं संपन्न रहता है। अपने श्रेष्ठकारयों के कारण नाम कमाता है। संतान सुख अच्छा प्राप्त होता है। महर्षिलोमश के अनुसार संतान होने में बाधा रहती है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,साहित्यकार, बोलने में चतुर, दीर्घायु, संपन्न एवं पारिवारिक सुख से पूर्ण रहताहै, अपने परिश्रम से प्रगति करता है। वह उदार, परोपकारी और मातृभक्त भीहोता है। इसे जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है।
3. मिथुनमिथुन राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,साहित्यकार, बोलने में चतुर, अपनी मेहनत से प्रगति करनेवाला, पारिवारिकसुख से पूर्ण रहता है। वाद-विवाद एवं कोर्ट-कचहरी के कामों में यशस्वीहोता है। सफल वकील बनता है। जातक की मां आदर्श महिला एवं चरित्रशीलहोती है। जातक मातृसुख से पूर्ण रहता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक उदार, संपन्न,विद्वान, आस्तिक, लोकप्रिय, सामाजिक नेता, सरकारी कर्मचारी एवं दीर्घायुहोता है। बचपन में स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता । बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्यमें सुधार होता है। जातक चतुर, व्यवहारकुशल एवं अनेकों का पोषणकर्ता एवंसहयोगी रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,सरकारी कर्मचारी, तेजस्वी, दीर्घायु, विवेकशील एवं संपन्न रहता है। जातकको धन मिलता तो है पर टिकता नहीं। बचपन परेशानियों से गुजरता है, बादमें जीवन सुखी रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक धनवान,दीर्घायु एवं मधुरभाषी होता है, पुत्रसुख में बाधा रहती है। स्त्री की जन्मकुंडलीमें एकादश स्थानस्थ शुक्र मृत संतान को जन्म देता है। प्रसवकाल में स्त्री कोमृत्युभय रहता है। विशेष प्रयास से ही पुत्रसुख प्राप्त होता है। जातक की पल्ीसुशील, आज्ञाकारिणी एवं चरित्रशील होती है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक वाचाल,विद्वान, साहित्यकार, खूबसूरत, हृष्टपुष्ट, विपुल संपत्ति से युक्त एवं सुखीजीवन जीनेवाला रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार पुत्रसुख में बाधा रहतीहै। शत्रुभय रहता है। शत्रुओं के कारण जीवन संकट में पड़ता है। शासन एवंचोरों के कारण धनक्षय होता है। जातक अपने मित्र-परिवार के लिए बहुतही साबधान रहें अन्यथा मुसीबतें उठानी पड़ेंगी।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातकसंगीतादि ललितकलाओं का रसिक एवं प्रवीण होता है। समाज में एवं शासनमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जातक संपन्न एवं सुखी रहता है। माता का सुखपर्याप्त रहता है। संतान कार्यकुशल रहती है। अपने विशिष्ट कारयों के कारणउसे प्रसिद्धि मिलती है। जातक वाद-विवादपटु होने से वकालत में धन औरनाम कमाता है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक स्वपरिश्रमसे प्रगति करनेवाला, दानशील, परोपकारी, मातृपितृभक्त, दीर्घायु, धनसंपन्न एवंयशस्वी होता है। जन्म स्थान से दूर विदेश में निवास करता है। पिता का सुखपर्याप्त प्राप्त होता है। समाज में भी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक का बचपनसाधारण स्थिति में गुजरता है। वह अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़कर सुखी जीवनजीता है। जातक परोपकारी, विद्वान, सुखी, संपन्न एवं कुछ सीमा तक क्रोधीभी होता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक बचपन मेंरोगी रहता है। व्यापार में निष्णात, आर्थिक दृष्टि से संपन्न, समाज प्रतिष्ठित, औरोंको सहयोग देनेवाला रहता है। संतान अल्पायु होती है, पत्नी सुशील एवं पतिब्रतारहती है। स्त्री जातक की जन्मकुंडली में एकादश स्थान में शुक्र हो तो पति अच्छामिलता है। स्त्री के पिता के बारे में संदेह रहता है। संतान सुख में बाधा रहतीहै। प्रसव के समय काफी कष्ट सहने पड़ते हैं। मृत संतान जन्म लेती है।
12. मीन-मीन राशि का शुक्र एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न,सुखी, दीर्घायु एवं विद्वान होता है। शत्रु अधिक होते हैं। शासन एवं चोरों सेभय रहता है। महर्षि लोमश के मतानुसार पुत्रसुख में बाधा रहती है।
1. गणपति को लड्डु खिलावें।
2. सरसों का तेल शनि भगवान कोचढ़ावें। 3. हर कार्य से पहले पैर धोवें।
===========================12) बारहवां भाव -द्वादश स्थान (व्यय भाव)
व्यय स्थान में शुक्र के फल
आचार्य व गुणाकर - गुरु के समान फल बतलाये हैं- यह दुर्जन होता है। झषे द्रविणी स्यात्। यह मीन राशि में हो तो धनवान होता है।
कल्याणवर्मा - अलसं सुखिनं स्थूलं पतितमष्टाशिनं भृगोस्तनयः शयनोपचारकुशलं द्वादशगः स्त्रीजितं जनयेत्।। यह आलसी, सुखी, मोटा, दुराचारी, बहुत खानेवाला, स्त्री के अधीन और कामक्रीडा में कुशल होता है।
वसिष्ठ - शुक्रो बहुव्ययकरः व्याधिकारः । खर्च बहुत होता है तथा रोग होते है।
गर्ग - श्रद्धाहीनो घृणाहीनः परदाररतः सदा। व्ययस्थानगते शुक्रे रोगार्तः स्थूलदेहकः।। यह श्रद्धाहीन, निर्दय, व्याभिचारी, रोगी तथा मोटा होता है।
बृहद्यवनजातक - सन्त्यक्तसत्कर्मविधिर्विरोधी मनोभवाराधन- मानसश्च । दयालुता सत्यविवर्जितः स्यात् काव्ये प्रसूते व्ययभावयाते।। यह अच्छे काम बिलकुल नही करता। कामुक और निर्दय तथा झूठ बोलनेवाला होता है। शुक्रो धनं द्वादशे । यह १२ वे वर्ष धन देता है।
वैद्यनाथ- शुक्रे बन्धुविनाशको ऽन्त्यगृहगे जारोपचारोऽधनी। यह आप्तों का नाश करनेवाला, व्याभिचारी तथा निर्धन होता है।
आर्यग्रन्थ - निजमते व्ययवर्तिनि भार्गवे भवति रोगयुतः प्रथमं नरः । तदनु दम्भपरायणचेतनः कृशबलो मलिनः सहितः सदा।। यह बचपन में रोगी रहता है। दाम्भिक, दुर्बल और मलिन होता है।
काशीनाथ - व्यये शुक्रे व्ययाढ्यश्च गुरुमित्रविरोधवान् । मिथ्यावादी बन्धुवर्गे गुणहिनोऽपिजायते।। यह खर्चीला, मित्रों और बड़ों से झगड़नेवाला झूठ बोलनेवाला और गुणहीन होता है।
मन्त्रेश्वर - भृगुर्जनयति व्यये सरतिसौख्यवित्तद्युतिम्। यह धनवान, तेजस्वी तथा स्त्रीसुख से युक्त होता है।
जयदेव - गतसुकर्मक्रियः स्मरचेष्टितः कलिरुचिः सधनो व्ययगे भृगौ। यह दुराचारी, कामुक, झगडालू और धनवान होता है।
जागेश्वर स्वयं सत्यहीनो दयानाशपीनः प्रपंची भवेत् कामवार्तावरिष्ठः। त्येजत् सत्क्रियां पापवार्तागरिष्ठः कुशीलः कुलीलो व्यये शुक्रनामा।। यह झूठा, निर्दय, संसारी, कामुक, पापी, दुराचारी होता है।
हरिवंश - स्वमानवेषु शत्रुतां तथा परेषु मित्रतां तथा दयाविहीनतां तथा शरीरदीनतां। मलिनतां कुकर्मतां कठोरतामसत्यतां भृगुर्व्ययाढ्याता करोति व्ययालयं गतः ।। यह आप्तों को शत्रु बनाता है। तथा शत्रुपक्ष से प्रेम करता है। यह निर्दय, दुर्बल, मलिन, दुराचारी, कठोर, झूठा और खर्चीला होता है।
नारायण भट्ट - कदाप्येति वित्तं विलीयेत पित्तं सितो द्वादशे
केलिसत्कर्मशर्मा। गुणानांच कीर्तेः क्षयं मित्रवैरं जनानां विरोधं सदाऽसौकरोति। कभी धन मिलने से चित्त शान्त होता है। यह कामक्रीडा में कुशल, गुणहीन, कीर्तिहीन, झगड़ालू और मित्रों से भी वैर करनेवाला होता है।
लखनऊ के नवाब - खर्वो बदकारः कमसहश्च मानवो मुदितः। स्याद् बदअक्लो जातो जोहरा खर्चमकाने हि गुस्वरो भवति।। यह खर्चीला, दुष्कमों में धन खर्च करनेवाला, बेअकली और क्रोधी होता है।
हिल्लाजातक - भृगुसुतोऽर्कमितेऽक्षिपीडां । यह १२ वें वर्ष में आँख में पीडा निर्माण करता है।
घोलप - यह बहुत क्रूर, दूसरों के घर रहनेवाला, दुष्टों के आश्रय से दुःख भोगनेवाला होता है। स्त्रीपुत्रों को यह सुख नही दे सकता। गाँव में और बाहर भी दुख सहता है। बहुत कामुक और द्वेषी होता है।
गोपाल रत्नाकर - यह ऐश्वर्यवान, कामुक और कंजूस होता है। नेत्ररोग से पीडित और उन रोगों का चिकित्सक होता है।
पाश्चात्य मत - इस का विवाह जल्दी होता है। यह व्याभिचारी होता है। गुप्त रीति से विषयसुख प्राप्त करना चाहता है। शुभग्रह से सम्बन्ध हो तो ये सम्बन्ध गुप्त रहते है। किन्तु शनि, मंगल, हर्षल या नेपच्यून से अशुभ सम्बन्ध हो तो दुष्कीतीं और संसारसुख का नाश होता है। कई बार विवाहिता स्त्री को छोड़कर रखैल के साथ रहते है। वृश्चिक, मकर, कन्या, कर्क तथा मेष में यह शुक्र अशुभ होता है। यह शुक्र स्त्रियों को शत्रुता और उस से धनहानि का फल देता है। इस स्थान में बलवान शुक्र पशुपालन की रुचि और उस से लाभ बतलाता है। इस शक्र पर शनि की अशुभ दृष्टि हो तो पत्नी की मृत्यु,
स्त्रीवियोग, तलाक देना आदि प्रकारों से स्त्रीसुख नष्ट होता है। चन्द्र, और मंगल का शुभ सम्बन्ध हो तो इस का व्याभिचार गुप्त रहता है। यह चन्द्र १२ वें स्थान में हो तो व्याभिचारी प्रवृत्ती बहुत तीव्र होती है। यह शुक्र पीडित होने से ठगों द्वारा बहुत नुकसान होता है।
भृगूसुत्र - बहुदारिद्र्यवान्। पापयुते विषयलोभपरः । शुभयुक्तश्चेद् बहुधनवान्। शय्यामंचकादिसौख्यवान्। शुभलोकप्राप्तिः। पापयुते नरकप्राप्तिः।। यह बहुत दरिद्री होता है। पापग्रह के साथ हो तो विषयी होता है। इसे मृत्यु के बाद नरक प्राप्त होता है। शुभग्रह के साथ हो तो धनवान, शय्या आदि सुख से युक्त होता है तथा मृत्यु के बाद अच्छी गति प्राप्त करता है।
जातक रोगी, कमज़ोर शरीर बाला, मित्रों के संग से आनंदित व कुशल प्रदर्शक स्वभाव वाला होगा। वह सदा गंदा, कान्तिहीन और नीच मानसिकता वाला होगा।
_मानसागरी
व्यक्ति धनी व प्रगतिशील होगा। वह अन्य स्त्रियों से यौनसुख प्राप्त करेगा। -फलदीपिका
जातक आज्ञाकारी सेवकों वाला, आलसी, सुस्त, प्रसन्न, अनैतिकता का सहारा लेने वाला, थुलथुल देही, अच्छे भोजन का शौकीन, स्त्रियों मे पराजित व शैय्या सुख से युक्त होगा।
-सारावली
जातक अत्यन्त दरिद्र होगा। यदि शुक्र पापाक्रान्त है तो वह यौन संबंधों में रूचियों वाला होगा। यदि शुक्र शुभयुत है तो वह स्वर्ग प्राप्त करेगा। शुक्र के पापयुत होने पर वह मृत्यु के बाद नर्कगामी होगा।
- भृगु
वह निम्न विचारों वाला, नीच महिलाओं में आसक्ति वाला, कंजूस, आदर्शरहित, कमजोर दृष्टि वाला, अस्पष्ट व भ्रमित, अनैतिक, अत्यधिक कामुक, चतुर, झूठा, महत्ता प्राप्त करने का इच्छुक तथा असफल प्रेम प्रसंगो वाला होगा।
टिप्पणी
-डॉ रामन
द्वादश भाव शैय्या सुख व व्यय का प्रतिनिधित्व करता है। सैक्स व महिलाओं के कारक ग्रह शुक्र की इसमें स्थिति जातक की रूचि को इसी ओर मोड़ती है। इस भाव में शुक्र बलवान् होता है। क्योंकि यही भचक्र में उसकी उच्च राशि है। अतः शुक्र बारहवें भाव में बली होता है व जातक शुक्र के इस भाव में होने के सभी फल प्राप्त करता है।
हमारे विचार - इस स्थान में शुक्र के फल प्रायः सभी लेखकों ने अशुभ बतलाये है। यह ग्रह किसी न किसी अशुभ स्थान का स्वामी होता है। मेष लग्न हो तो धनेश और सप्तमेश (मारक स्थानों का स्वामी), वृषभ लग्न हो तो लग्नेश और षष्ठेश, मिथुन लग्न को पंचमेश व व्ययेश, कर्क लग्न को लाभेश और चतुर्थेश, सिंह लग्न को तृतीयेश और लाभेश, कन्या लग्न को धनेश और लाभेश, तुला को लग्नेश व अष्टमेश, वृश्चिक में सप्तमेश व व्ययेश तथा धनु लग्न को लाभेंश व षष्ठेश होता है। मकर और कुम्भ लग्न के लिये सिर्फ यह राजयोगकारक है। मीन लग्न में भी अष्टमेश और तृतीयेश अर्थात अशुभ ही है। यवनजातक ने १२ वें वर्ष में नेत्ररोग होना कहा है और हिल्लाजातक ने इसी वर्ष धनलाभ बतलाया है यह चिन्तनीय है।
हमारा अनुभव - इस स्थान में मेष, सिंह, धनु में शुक्र हो तो स्त्री झगड़ालू होती है। मिथुन, तुला, कुम्भ में सुन्दर और आकर्षक पत्नी होती है। नौकरी में सफलता मिलती है किन्तु इच्छा स्वतन्त्र व्यवसाय की ओर रहती है। इसलिये अस्थिरता रहती है। धनलाभ साधारण होता है। नैतिक आचरण अच्छा होता है। स्त्री मित्र का प्रेम चाहते है किन्तु उसके योग्य नहीं होते। कवि, लेखक, चित्रकार, गायक, नर्तक, फोटोग्राफर आदि कलाकार हो सकते है। स्त्री राशि में-कामुकता अधिक होती है और व्याभिचारी प्रवृत्ति होती है। दो विवाह होते है। वैसे ये लोग भाग्यवान होते है। इस स्थान में स्त्री के साथ कलह होना यह फल मुख्यतः मिलता है। शनि से दूषित हो तो इस शुक्र से विजातीय स्त्री से विवाह होता है। अथवा अविवाहित रहते है। अवैध सम्बन्ध निभाने की कोशिश करते है। आर्थिक स्थिति साधारण होती है। ऋण बना रहता है। सिर्फ मृत्यु के समय ऋणरहित होते है।
द्वादश स्थान में स्थित शुक्र जातक को खर्चीला बनाता है, वह स्वभाव सेराजसी रहता है। जातक भोगविलास में धनव्यय करता है और अति कामातुररहता है। व्यभिचार एवं दुराचार का संगम ऐसे जातक में पाया जाता है। प्रायःवह आलसी, रोगी, निष्टुर एवं गुणहीन रहता है। लोगों से तथा स्वकीयों सेभी मधुर संबंध नहीं रहते, आंखें कमजोर रहती हैं। महर्षि भृगु के अनुसार
शुक्र पापक्षेत्र में या पापग्रहयुक्त होकर व्यय स्थान में हो तो जातक में दुराचारकी प्रवृत्ति रहती है। जातक बहुत धनवान नहीं होता किंतु उसकी आर्थिकस्थिति सामान्यतया अच्छी रहती है।
यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार उपरोक्त फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथही 12वें वर्ष में नेत्रविकार एवं धनप्राप्ति भी होती है।
पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार द्वादश स्थान का शुक्र जातक को कामातुरबनाता है। उसके परस्त्री संबंध होते हैं। शुक्र शुभ ग्रहों से युक्त हो तो संबंधगुप्त रहते हैं। जबकि पापग्रहों से युक्त शुक्र हो तो व्यभिचार छुपता नहीं।
द्वादश भाव-जन्मकुंडली में शुक्र यदि बारहवें भाव में हो तो जातकन्यायप्रिय, बहुभोजी/पेटू, खर्चीला, पापी, वीर्यरोगी तथा परलिंगियों से सम्बन्धबनाने वाला व आलसी होता है। किन्तु पत्नी प्रायः पतिब्रता एवं मुसीबतों में साथदेने वाली होती है (यह लाल किताब का मत है)। शुक्र अशुभ हो तो भी जातककी पत्नी रोगिणी भले ही रहे, पति की परेशानियों को स्वयं झेलनी वाली होती है।पत्नी का भाग्य पति के लिए सहायक रहता है। वैसे बारहवां शुक्र सामान्यतःपाराशरी ज्योतिष व लाल किताब दोनों ने अशुभ माना है।लाल किताब के अनुसार बारहवां शुक्र व्यभिचार की प्रवृत्ति देता है। ऐसाजातक गुप्त रूप से जननेन्द्रिय सुख प्राप्त करता है (शुक्र शुभ हो तो गोपनीयता बनी
रहती है। नहीं तो सबको ज्ञात हो जाता है) । वह परस्त्रीगामी व शुक्र सम्बन्धी रोगों
से त्रस्त हो सकता है। राहू जैसे पापग्रहों से अशुभ संबंध बनाए, या दृष्टि आदि सेपीड़ित हो तो बारहवां शुक्र स्त्रियों की शत्रुता के कारण धनहानि कराता है। पत्नीकी मृत्यु/तलाक/वियोग की सम्भावना तीव्र होती है। अग्निराशि का शुक्र जातकको झगड़ालू, क्लेशकारिणी व गुस्सैल या कर्कशा पत्नी दिलाता है।
वायु राशि का शुक्र हो तो पत्नी आकर्षक होती है। चित्रकला, कविता,लेखन आदि में रचि होती है, नौकरी करते हुए भी व्यवसाय करने की इच्छा बनीरहती है। ऋण बना रहता है। द्विभार्या योग की सम्भावना भी बनती है। ऐसे जातकको पशुपालन द्वारा लाभ सम्भावित होता है। यदि मंगल के साथ शुक्र की युति होजाए तो जातक SEX के विषय में सैडिस्ट (परपीड़क) बन जाता है। किन्तु शनिव बुद्ध की युति हो तो काम शीतलता या अर्धनपुंसकता (शीघ्रपतन या अर्धउत्तेजना आदि) का भी शिकार हो सकता है। स्त्री जातकों में बारहवां शुक्र यदिपापदृष्ट हो तथा चन्द्रमा की युति हो तो जातक व्यभिचारिणी होती है।
द्वादश भावः व्यय भावगत शुक्र के फल प्रायः अशुभ ही मिलते हैं।क्योंकि मकर और कुम्भ लग्नों को छोड़कर यह अन्य लग्नों में किसी-न-किसीअशुभ भाव का अधिपति होता है। अग्नि राशि का शुक्र व्यय स्थानगत हो तोपत्नी कटु स्वभावी, व्यर्थ में लड़ाई-झगड़ा करने वाली, वायु राशि में हो तोमधुरभाषी होती है। स्त्री तथा मित्र से प्रेम बना रहता है। जातक नौकरी करतेहुए भी व्यवसाय करने की इच्छा करता है। स्त्री राशि का शुक्र जातक कोव्यभिचारी बनाता है। दूसरा विवाह होने की सम्भावना प्रबल रहती है, पत्नी सेमधुर संबंध नहीं रहते। शनि से दूषित हो तो विजातीय स्त्री से विवाह होता है।उच्च का शुक्र मंगल के साथ हो तो जातक स्त्री ही क्यों न हो, बलात्कारकरने में हिचकते नहीं। ऐसा जातक अवैध संबंधों को बनाए रखने का पूराप्रयल करता है। वृश्चिक, मकर, कर्क, कन्या, मेष में शनि मंगल से अशुभसंबंध करता हो तो पत्नी की मृत्यु अथवा वियोग या तलाक से स्त्री सुख नष्टहो जाता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शुक्र द्वादश स्थान में हो तो जातक शिल्पशास्त्र मेंनिपुण, मधुरभाषी, चतुर और जुआ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार आदि दुर्गुणों सेयुक्त रहता है। जातक का स्वास्थ्य मध्यम रहता है, शत्रु अधिक होते हैं। प्राणीएवं वाहन के कारण उसे प्रवास में हानि होती है। वसीयत में संपत्ति प्राप्तहोती है। जन्म स्थान से दूर भाइयों के साथ रहना पड़ता है।
2. वृषभ वृषभ राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक पेटूविदेशप्रवासी एवं भ्रमणप्रिय रहता है। पशुपालन में रुचि रखता है। पुत्रसुख मेंन्यूनता रहती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक बुरी संगतमें रहता है। पुरुषार्थी, कामातुर, स्त्रीगामी एवं उपद्रवी रहता है। पिता केसुख-सहयोग में न्यूनता रहती है।
4. कर्क-कर्क राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक बचपन में दुखीरहता है। मित्रों एवं सहोदरों के साथ उसके मधुर संबंध नहीं रहते, शत्रु अधिकरहते हैं। प्रायः सेवाकाल में मृत्यु होती है।
5. सिंह-सिंह राशि का शुक्र वयय स्थान में हो तो जातक सुंदर, धूर्त, प्रवासी,राजकाज में पारंगत रहता है। अपनी कार्यसिद्धि के लिए अनेक रूप धारण करताहै। ज्येष्ठ पुत्र का सुख प्राप्त नहीं होता। मामा के सुख में भी न्यूनता रहती है।
6. कन्या-कन्या राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक भरोसेमंद नहींहोता, वसीयत से धन प्राप्त करता है, जन्म स्थान से दूर रहता है। स्वास्थ्यमध्यम रहता है। बचपन में सर्प, पानी एवं विषभय रहता है। जुआखोरी, चोरी,व्यभिचारिता, जैसे दुर्गुण जातक में रहते हैं। जहरीली वस्तुओं के सेवन से जीवन
खतरे में पड़ता है। शरीर में कोई विकृति होती है।
7. तुला-तुला राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक विपरीत बुद्धि का, कंगाल एवं कंजूस रहता है। कपड़े का व्यापार उनके लिए लाभदायी होता
है। पत्नी लोभी, झगड़ालू, खर्चीली एवं दुश्चरित्रा होती है। माता एवं संतानके सुख में न्यूनता रहती है। घर में चोरी होने का डर रहता है।
8. वृश्चिकवृश्चिक राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक की आर्थिकस्थिति संतोषजनक रहती है। शत्रु अधिक और स्वास्थ्य मध्यम रहता है। जातककामातुर एवं स्त्रीकामी रहता है। अच्छी संगत नहीं रहती। वह स्वयं धूर्त, पुरुषार्थीएवं यशस्वी रहता है। प्रवास एवं पानी के कारण उसे नुकसान होता है।
9. धनु-धनु राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक भ्रमणप्रिय रहताहै। उसके शत्रु बहुत होते हैं, संतान एवं मातृसुख में न्यूनता रहती है।
10. मकर-मकर राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान,यशस्वी, परदेश प्रवासी, सुंदर एवं धूर्त रहता है। पिता, ज्येष्ठ भ्राता एवं माताके सुख में न्यूनता रहती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक विदेश प्रवासी,बाल्यावस्था में सर्प, पानी एवं विष से भययुक्त रहता है और स्वास्थ्य मध्यमहोता है। मित्रों एवं सहोदरों से संबंध मधुर नहीं रहते। महर्षि लोमश के अनुसारजातक चोर एवं दुराचारी रहता है।
12. मीन मीन राशि का शुक्र व्यय स्थान में हो तो जातक चतुर एवंबहुरूपी होता है। ज्येष्ठ पुत्र के सुख में न्यूनता रहती है। आर्थिक स्थितिसाधारण रहती है। पत्नी अच्छी नहीं मिलती। वह दुश्चरित्रा, लोभी एवं खर्चीलीरहती है। ससुर चोर होता है।
1. गदे नाले में कोयली का फूल 41 दिन तब बहावें।
2. सूपड़ा दानके।
3. पीपल का पूजन करें।
शुक्र का राशिगत फल
जन्मराशि में: जब शुक्र जन्मराशि में भ्रमण करता है तब शत्रुओं का नाशहोता है। विषयोपभोग का सुख प्राप्त होता है। व्यापार-व्यवसाय में प्रगतिहोती है। नए वस्त्रालंकारों की उपलब्धि होती है। विद्याभ्यास में यश प्राप्ति,व्यापार वृद्धि, तरल पदार्थ, फैन्सी गुड्स एवं सुगंधित द्रव्यों के व्यापार में लाभहोता है। विवाहोत्सुकों के विवाह होते हैं।
जन्मराशि से दूसराः शुक्र जब जन्मराशि से दूसरे स्थान में भ्रमण करता हैतब सुख, लाभ, नीरोगता, पारिवारिक सुख-समाधान, धनलाभ, कोर्ट-कचहरी,एवं सरकारी कामों में यश, प्रेमियों को प्रेम संबंधों में यश एवं गायन-वादनादिकलाओं में उन्नति होती है।
जन्मराशि से तीसराः शुक्र जब जन्मराशि से तीसरे स्थान में भ्रमण करताहै तब ऐश्वर्यसुख, शत्रु पराजय, शारीरिक स्वस्थता, समाज में मान-प्रतिष्ठा,धनप्राप्ति, नौकरों एवं भाई-बहिनों का सुख, सरकार से लाभ, धार्मिक वृत्ति मेंबढ़ोत्तरी होती है।
जन्मराशि से चौथाः शुक्र जब जन्मराशि से चौथे स्थान में भ्रमण करता हैतब सुख, धनलाभ, पारिवारिक सुख, सामाजिक कार्यों में यश, प्रतिष्ठा प्राप्ति,साइकिल, स्कूटर, मोटर खरीदने का योग बनता है।
जन्मराशि से पांचवां: शुक्र जब जन्मराशि से पांचवें स्थान में भ्रमणकरता है तब प्रीति प्राप्ति, संतान का उत्कर्ष, धनप्राप्ति का योग, बड़े-बुजुगोंका आशीर्वाद, आत्मसंतोष, घर में सुख-शांति, कलाक्षेत्र में सुयश, विद्या मेंयशलाभ, प्रेमपात्र के संबंधों में घनिष्ठता, नौकरी करने वालों की उन्नति,विभागीय परीक्षा में सफलता, सिनेमा, क्लब आदि मनोरंजन के स्थानों मेंबारंबार जाने का योग होता है।
जन्मराशि से छठाः गोचर शुक्र जब जन्मराशि से छठे स्थान में भ्रमणकरता है तब विपत्ति, शत्रुवृद्धि, पराजय का डर, शारीरिक अस्वस्थता, अपमाजनकप्रसंग, अपयश, अशांति आदि बातें होती हैं।
जन्मराशि से सातवां: गोचर शुक्र जब जन्मराशि से सातवें स्थान में भ्रमणकरता है तब स्त्रीपीड़ा, पत्नी से झगड़ा, साझेदारों से अलगाव, प्रवास मेंअपघात, भय, शोकजनक समाचारों की प्राप्ति, जननेंद्रियों के विकार, प्रेमसंबंधों में अपयश, बार-बार व्यर्थ प्रवास, विवाहोत्सुकों के विवाह में यशप्राप्त होता है।
जन्मराशि से आठबां: शुक्र जब जन्मराशि से आठवें स्थान में भ्रमण करता है तब सुख-संपत्ति का लाभ होता है। शारीरिक स्वस्थता, वैवाहिकजीवन में सुख, जमीन-मकान इत्यादि मिल्कियत के विषय में अनुकूलता,विद्याभ्यास में प्रगति एवं समस्याओं का अंत आदि सुख में बढ़ोत्तरी करनेवाली घटनाएं घटती हैं।
जन्मराशि से नौवां: शुक्र जब जन्मराशि से नौवें स्थान में भ्रमण करता हैतब सुखप्राप्ति, लाभ, व्यवसायोन्नति, वैवाहिक जीवन में आनंद, धार्मिककार्य, तीर्थयात्रा, परोपकार, आशा से अधिक लाभ, घर में मंगलकार्य, स्त्री केमाध्यम से भाग्यवृद्धि, देशांतर्गत दूर-दूर की यात्राएं, मित्रों से लाभ, सहोदरोंका सहयोग, महत्वपूर्ण कार्यों में सफलता, यश मान में बढ़ोत्तरी आदि बातेंहोती हैं।
जन्मराशि से दसवां: शुक्र जब जन्मराशि से दसवें स्थान में भ्रमण करताहै तब कलह, पीड़ा, कोर्ट-कचहरी एवं सरकारी कामों में असफलता, समाजमें अपमान नौकरी-व्यवसाय में विष्न, वाद-विवादपूर्ण बातें होती हैं।
जन्मराशि से ग्यारहवां: शुक्र जब जन्मराशि से ग्यारहवें स्थान में भ्रमणकरता है तब लाभ, धन प्राप्ति, व्यवसायोन्नति, शारीरिक स्वस्थता, सुख-शांति,मित्र, स्त्री, पुत्रों का सहकार्य, प्रेम के मामले में यश, स्त्री संबंधी सभी सुखोंकी प्राप्ति, हर दृष्टि से शुभ फल मिलते हैं।
जन्मराशि से बारहवां: शुक्र जब जन्मराशि से बारहवें स्थान में भ्रमणकरता है तब मित्र, धन, रुचिकर भोजन, सुगंधित द्रव्य आदि की प्राप्ति होतीहै। धन बड़े परिमाण में मिलता है और खर्च भी होता है। प्रवास में कपड़े चोरीहोने जैसी घटनाएं भी घटती हैं।