प्रकरण २ - जन्म से चौल तक (चोटी रखना) विधि एवं शांति


    प्रकरण २ - जन्म से चौल तक (चोटी रखना) विधि एवं शांति

    पंचम दिन तथा षछी पूजन

    यह पूजन नवजात शिशु के पिताजी, दादाजी, नानाजी, मामाजी, ताऊ, चाचाजी तथा अन्यरिश्तेदारों को प्रसूति के पश्चात् पांचवे दिन तथा षषठी पूजन छठे दिन करना चाहिए। नवजातशिशु के आयुरारोग्य हेतु यह पूजन जननाशीच में भी कर सकते है। यदि सूतक (मृताशीच) होतो जिन रिश्तेदारों को सूतक नहीं हैं, वह ब्राह्मणद्वारा भी यह पूजन कर सकते हैं। अन्यथा सूतकसमाप्त होनेपर भी कर सकते हैं।

    (जननाशौच / वृद्धि इस संदर्भ में अधिक जानकारी अशीच निर्णय में देखें।)

    • जन्म के बाद लड़का/ लड़की का दोलारोहन (पालना) तथा नामकरण।लड़का या लड़की का नामकरण (दोलारोहन) जन्म के सूतक (१० दिन) बाद अर्थात् ११ वेंअथवा १२ वें दिन करना चाहिए। यदि उस दिन पंचांगशुद्धि न हो तथा किसी अन्य कारण सेनामकरण संस्कार करना संभव न हो तो उसके पश्चात् पंचांगशुद्धि के दिन नामकरण संस्कारकरना चाहिए। (इस कार्य हेतु अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) अथवा गुरु/ शुक्र अस्त का दोषनहीं होता हैं।)

    वृद्धि के साथ यदि मृताशौच हो तो सूतक समाप्त होने के बाद पंचांगशुद्धि देखकर नामकरणकरना चाहिए।

    कर्णवेध (कान छिदवाना)

    शिशु के जन्म के उपरांत बारहवें अथवा सोलहवें दिन तथा यथाशीघ्र संभव हो उसके कानछिदवाकर कानों के अलंकार (बाली) धारण करना चाहिए। महर्षि सुश्रुत इस विषय में कहतेहै कि - रक्षाभूषण निमित्तं बालस्य कर्णो विध्येत्। (१६.०१) अर्थात् शिशु की रक्षा हेतु तथाआभूषित करने हेतु यह संस्कार अत्यावश्यक है।

    निम्न योगोपर जन्म हुआ हो तो जननशांति करनी चाहिए।

    तिथि -कृष्ण चतुर्दशी, अमावस्या एवं क्षयतिथि

    नक्षत्र - अश्विनी के पहले ४८ मिनट, पुष्य नक्षत्र का दूसरा एवं तीसरा चरण, आश्लेषा पूर्ण,मधा नक्षत्र का पहला चरण, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का पहला चरण, चित्रा का पहला तथा दूसराचरण, विशाखा का चौथा चरण, ज्येष्ठा एवं मूल नक्षत्र पूर्ण, पूर्वाषाढ़ा का तीसरा चरण, रेवतीके अंतिम ४८ मिनट।
    माँ, पिताजी, सगा भाई/ बहन इनमें से किसी एक के भी जन्म नक्षत्रपर जन्म हुआा हतो एक नक्षत्र जननशांति करनी चाहिए। जुड़वा या तिड़वा (तीन बच्चे), दन्तसहित जन्मअधोमुख, तीन कन्याओं के बाद पुत्र या तीन पुत्रों के बाद कन्या का जन्म हुआ ही तो शातिकरनी चाहिए। सूर्य संक्रमण के पुण्यकाल तथा ग्रहण पर्वकाल में जन्म हुआ हो तो शाति करचाहिए।

    वैधृति, व्यतीपात, भद्रा (विष्टि) की संपूर्ण कालावधि तथा विष्कुंभ और वज्न योग के प्रथमघंटा १२ मि., गंड और अतिगंड के प्रथम २ घंटे २४ मि., शूल योग के प्रथम २ घंटे, व्याचात योगके प्रथम २ घंटे ३६ मि. इस कालावधि में जन्म हुआ हो तो जनन शांति करनी चाहिए। इसकेअतिरिक्त नक्षत्र गंड, तिथि गंड, लग्न गंड, विष घटी आदि कारणों से जननशाति करनी चाहिए(विस्तृत जानकारी हेतु धर्मसिंधु आदि ग्रंथों में देखें।)

    सूर्य संक्रमण जननशांति तथा ग्रहण जननशांति कब होती है?

    सूर्य संक्रमण शांति यह सूर्य संक्रमण प्रवेशकाल से संबंधित नहीं है, संक्रमण के पुण्यकाल में जन्महुआ हो तो शांति करना चाहिए। यदि ग्रहण पर्वकाल में जन्म हुआ हो तो ग्रहण शांति करनी चाहिए, वेथ(सूतक) काल में जन्म होनेपर नहीं। संदर्भ - यजुःशाखीय शांतिकांड प्रदीप (ले. वारे शास्त्री)

    जननशांति बारहवें दिन के बाद कब करनी चाहिए? क्या अन्निवास महत्त्वपूर्ण हैं?

यदी १२ वें दिन जननशांति करनी हो तो पंचांगशुद्धि, अग्निवास न होते हुए भी कर सकते हैंतथा अधिकमास, गुरु-शुक्रास्त काल में भी कर सकते हैं। १२ वें दिन के बाद पंचागशुद्धि तथाअग्निवास देखकर शांति कर्म करना चाहिए। नक्षत्र शांति हेतु उसी नक्षत्रदिन की आवश्यकतानहीं हैं। कृष्ण चतुर्दशी, अमावस्या, क्षयतिथि, भद्रा, वैधृति, व्यतीपात, दग्धादि योगों कि शांतिवह योग जिस दिन होते है उस दिन नहीं करनी चाहिए। पंचांगशुद्धि तथा अग्निवास के दिन करसकते हैं। १२ वें दिन के पश्चात् तथा नामकरण संस्कार से पूर्व अधिकमास (पुरुषोत्तम मास)गुरु-शुक्र अस्त काल होनेपर भी पंचांगशुद्धि एवं अग्निवास देखकर जननशांति कर सकते हैं।परंतु यदि संभव हो तो अस्तकाल के समाप्तिपर करना चाहिए।

    मूल नक्षत्र पिता के लिए अशुभ होने से नवजात शिशु के मुखदर्शन हेतु उपाय।

    पुराने ग्रंथों में मूल नक्षत्रपर जन्मे शिशु की जननशांति करने के पश्चात् ही पिता अपने नवजात का मुँह देखें ऐसा वचन है। परंतु वर्तमान में इस नियम का पालन नहीं हो रहा हैं। अतः पिता को भविष्य में जननशांति करने का संकल्प लेना चाहिए तथा उस कार्य हेतु कुछ धनराशि और उसके साथ सुपारी गृह के पूजा मंदिर में रखनी चाहिए। जब शांति संपन्न होगी तब उस धनराशि का उपयोग करना चाहिए। यह उपाय करके शांति पूजा के समय विधिवत् मुखदर्शन करें।

    जुड़वां (यमल) में ज्येष्ठ कौन?

    इस संदर्भ में भिन्न-भिन्न मत हैं, परंतु जो बालक बाद में जन्म लेता हैं उसे बड़ा माननाचाहिए।

    प्रसूता की शुद्धि कितने दिनों पश्चात् होती हैं?

    प्रसूता को पुत्रया कन्या कोई भी हो तो देवकार्य, मंगलकार्य आदि हेतु४० दिन पश्चात् शुद्धिमानी जाती हैं परंतु जननशांति एवं नामकरण हेतु ४० दिन के पूर्व भी प्रसूता ऐसे कार्यों मेंसहभागी हो सकती हैं (प्रसूता के स्वास्थ्य हेतु वैद्यकशास्त्र के अनुसार ४० दिन आवश्यक हैं।)

    प्रथम केशखंडन (झडडुला/ मान उतारना)

    यह षोड़ष संस्कार का भाग नहीं है। बालक की आयु ६ माह पूर्ण होनेपर एक वर्ष तक किसीभी माह में बाल उतार सकते हैं। यह विधि भी पंचांगशुद्धि, नक्षत्र, तिथि, वार आदि को ध्यान मेंरखकर करना चाहिए। कुछ जन-जातियों में लड़कियों के भी बाल उतारने की प्रथा है।

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