प्रकरण ४ - विवाह संस्कार
प्रकरण ४ - विवाह संस्कार
विवाह हेतु शास्त्रोक्त मास, वार, तिथि, नक्षत्र आदि -
मास- मेष राशि में रवि होनेपर चैत्र मास, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ (शुक्ल दशमी तक अथवा मिथुन राशि में जब तक रवि हो वहाँ तक का आषाढ़ मास, इन दोनों में जिसकी कालमर्यादा प्रथम हो वहाँ तक का आषाढ़ मास), कार्तिक (शुक्ल एकादशी के बाद अथवा वृश्चिक राशि में सूर्य प्रवेश के उपरांत शेष कार्तिक मास इन दोनों में जिसकी कालमर्यादा बाद में हो उसकेपश्चात् शोष कार्तिक मास), मार्गशीर्ष, पौष (मकर राशि स्थित सूर्य) माघ, फाल्गुन मास विवाह के लिए ग्राह्य हैं।
वर्ज्य तिथि - कृष्ण १३, १४, ३० ये तिथियाँ एवं शुक्ल १ का पूर्ण दिन वर्ज्य हैं, तथा क्षयदिन / वृद्धिदिन वर्ज्य हैं।
ग्राह्य नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृग, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तरा भाद्रपदा, रेवती यह नक्षत्र ग्राह्य हैं। परंतु ग्रहण नक्षत्र छः मास तक वर्जित हैं।
वर्ज्य योग - वैधृति, व्यतीपात पूर्ण वर्ज्य हैं तथा विष्कुंभ योग के आरंभ के १ घं. १२ मि., व्याघात २ घं. ३६ मि., शूल के २ घंटे, वज्र के ३ घं. ३६ मि., गंड के २ घं. २४ मि., अतिगंड के २ घं. २४ मि. तथा परिघ का पूर्वार्ध वर्ज्य हैं।
विष्टी करण की कालावधि पूर्णतः वर्ज्य हैं।
अधिकमास, ग्रहणदिन, करिदिन, संक्रमण पुण्यकाल, गुरु/शुक्र अस्तकाल वर्ज्य हैं। अस्त के पूर्व ३ दिन (वार्धक्य) तथा उदय के बाद ३ दिन (बाल्यत्व) वर्ज्य हैं।
आपात स्थिति में गुरु या शुक्र इन दोनों में से एक ग्रह का अस्त हो तो विवाह कर सकते हैं। परंतु दोनों ग्रह एक ही समय अस्त हो तो मंगलकार्य नहीं करना चाहिए। यद्येकस्यापि
मूढत्वे शुभंकर्म न दोषकृत् ।द्वयोर्मूढत्वमेवोक्तं दोषदं गुरुशुक्रयोः ।। (मुहूर्तसिंधु)
( गुरु अथवा शुक्र के अस्तकाल में विवाह करते समय जो ग्रह अस्तंगत हो उस ग्रह का १०८ जप करें तथा सुवर्ण प्रतिमा का पूजन कर के दान करना चाहिए।
अनेक प्रदेशों में चातुर्मास में विवाह के मुहूर्त दिए जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि चातुर्मास सभी जगह वर्ज्य नहीं हैं, अतः आपात्कालीन स्थिति में चातुर्मास में भी विवाह संपन्न करा सकते हैं। (चातुर्मास के गौणकाल में मंगलकार्य करते समय विष्णु भगवान के सुवर्ण प्रतिमा का पूजन व दान करना चाहिए।)
पिता न हो तो विवाह संस्कार के अधिकारी कौन?
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पिता न हो तो दादाजी, माता, ताऊ, चाचा, सगोत्री तथा सपिंडी रिश्तेदार अथवा असगोत्री अर्थात् मामा, मौसेर तथा बुआ के रिश्तेदार इनमें से कोई भी विवाह करवा सकता हैं। विवाह संपन्न करानेवाला व्यक्ति वर/वधु से उम्र में अधिक होना चाहिए। माता कन्यादान कर सकती है। (धर्मसिंधु, तृतीय परिच्छेद, पूर्वार्ध - कन्यादानकर्ताओं का क्रम)
शुभकार्य में मंडप देवता की स्थापना तथा उत्थापन कब कर सकते हैं?
आपात्कालीन स्थिति में विवाह हेतु मंडप देवता की स्थापना १० दिन पूर्व कर सकते हैं।(मंडप देवता का उत्थापन १०वें दिन होना चाहिए।) तीसरे दिन तथा छठे दिन मंडप देवता का उत्थापन नहीं कर सकते। इसका अर्थ यह है कि मंडप स्थापना के बाद तीसरे तथा छठे दिन विवाह कार्य संपन्न कर सकते हैं, परंतु देवता उत्थापन चौथे अथवा सातवें दिन करना चाहिए। वर्तमान समय में विवाहस्थलपर ही मंडप देवता को स्थापित करते हैं अतः शुभ कार्य संपन्न होनेपर उसी दिन उत्थापन करने की प्रथा है।
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मंडप देवता की स्थापना करने के बाद यदि अमावस्या या श्राद्धदिन आया तो
वार्षिक श्राद्ध अथवा अमावस्या को ध्यान में रखकर ही मुहूर्त निकालना चाहिए। अपितु
किसी कारणवश मंडप देवता की स्थापना के बाद श्राद्ध अथवा अमावस्या का दिन आता है, तो मंगलकार्य संपन्न होने के पश्चात् व्यतीपात, कृष्ण अष्टमी अथवा अमावस्या इन में से किसी भी दिन अंतरित श्राद्ध कर सकते हैं।
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मंगलकार्य के पूर्व रजोदर्शन? श्रीपूजनादि शांति कब कर सकते हैं?
मंगलकार्य के पूर्व ५ दिनों तक यदि माता या वधु रजस्वला होती है तो रजस्वला होने के दिन ही श्रीपूजनादि शांति करनी चाहिए, तत्पश्चात् मंगलकार्य संपन्न कर सकते हैं। (वाक्यसार ग्रंथ, उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह, द्वितीय भाग, संस्कार निर्णय) तथा ५ दिन तक पानी में गोमूत्र मिलाकर रोज सिरसे
स्नान करना चाहिए और गोमूत्र पीना भी चाहिए। गोमूत्र ना मिलनेपर तुलसी, गंगाजल, सुवर्णसिद्ध जल का भी उपयोग कर सकते हैं। (अधिक जानकारी हेतु शुद्धि प्रक्रिया नामक प्रकरण देखें।)
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सूचना - रजोदर्शन के धार्मिक नियमों का जिस परिवार में पालन किया जाता है, उनके संबंध में यह कहा गया हैं कि प्राचीन नियमों के अनुसार मंडपदेवता स्थापना के बाद मंगलकार्य के दिन यदि माता अथवा वधु रजस्वला होती हैं तो सचैल स्नान कर श्रीपूजनादि शांति करें, उपरांत विवाहकार्य संपन्न कर सकते है। श्री पूजनादि शांति करना असंभव होनेपर उस देवता के प्रीत्यर्थ १०८ जप कर कार्य करें और कार्य के पश्चात् तुरंत श्री पूजनादि शांति करनी चाहिए।
(अधिक जानकारी के लिए रजस्वला की शुद्धि का प्रकरण देखें।)
कार्यारंभ और सूतक
हेतु
• प्राचीन काल में धर्मग्रंथों में मंडप देवतास्थापन, नांदिश्राद्ध होने के पश्चात् ही कार्यारंभ माना गया है। यह कार्यारंभ उपनयन हेतु ६ दिन पूर्व, विवाह हेतु १० दिन पूर्व तथा यज्ञ-यागादि २१ दिन पूर्व संकटकाल का विचार कर संपन्न कर सकते हैं ऐसा कहा गया है। परंतु इन नियमों घट सकती हैं और वर्तमान समय में तुरंत ही उसकी जानकारी मिलती है। वर्तमान समय में विवाहस्थलपर ही मंडप देवता की पूजा की जाती है। ऊपर दिए हुए पर्याय के अनुसार १० दिन पहले मंडप देवतास्थापन करना संभव नहीं होता है। अतः इस कालावधि में यदि सूतक आता है तो कार्य संपन्न करने में कठिनाई आती है।
इन सभी मुद्दों का विचार कर उपनयन, विवाह, वास्तुशांति, वयोवस्था शांति जैसे समारंभपूर्वक किए जानेवाले शुभकार्यों का प्रारंभ करने के पूर्व अपनी कुलदेवता तथा ग्रामदेवता को कुंकुम् पत्रिका अथवा निमंत्रण पत्र दिया जाता हैं, यह एक तरह से कार्य का प्रारंभ ही है। इस तरह का आरंभ होने के बाद शुभकार्य के कुछ दिन पूर्व सगे चाचा आदि सपिंडों का सूतक आता है तो अशौच निवृत्ति की प्रक्रिया कर के संभव हो तो कूष्मांड होम करना चाहिए अथवा विनायक शांति करनी चाहिए और नियत समयपर कार्य संपन्न करें। (धर्मसिंधु - निर्णयसिंधु) मंगलकार्य के एक या दो दिन पूर्व यदि ऐसी घटना घटती हैं तो कूष्मांड होम, विनायक शांति करने के लिए भी अवसर नहीं मिलता हो, तथा साधनसामुग्री, पंडित की उपलब्धता असंभव होनेपर मंगलकार्य के दिन मंडपदेवता की स्थापना के पूर्व पंचगव्य से शुद्धि करनी चाहिए तथा सर्व के प्रायश्चित्तार्थ प्रजापति हेतु व्याहृति मंत्र से १०८ घृत आहुति देने के पश्चात् मंडप देवता की स्थापना करके कार्य संपन्न कर सकते हैं परंतु जिसका उपनयन, विवाह आदि होने जा रहा है, उसके माता-पिता, दादा-दादी तथा संयुक्त परिवार में (एक ही आवास में) रहते हैं और ऐसी स्थिति में यदि सगे भाई, बहन की मृत्यु हो तो १६ दिन के बाद ही प्रतिकूल शांति करवा कर कार्य संपन्न करना चाहिए।
शुभकार्य के कुछ दिन पूर्व सपिंडों का सूतक आनेपर विवाह कब कर सकते हैं?
अ) माता-पिता, दादा-दादी, संयुक्त परिवार में सगा भाई, अविवाहित बहन आदि के मृत्युपर सूतक में कार्य नहीं कर सकते, परंतु १४ दिन के पश्चात् क्रियाकर्म होने के बाद विनायक शांति कर के शुभ मुहूर्त देखकर मंगलकार्य कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त चाचा, ताऊ, चचेरे आदि सपिंडों के निधनपर सूतक कालावधि में मुहूर्त का दिन होनेपर कूष्मांड होम कर के अथवा सर्व प्रायश्चित्तार्थ प्रजापति के लिए समस्त व्याहृति मंत्र से घृत की १०८ आहुति देकर उस कर्म हेतु सूतक की निवृत्ति कर के देवता स्थापना आदि मंगलविधि तथा मंगलकार्य कर सकते हैं। विवाहमुहूर्त के पूर्व १० दिन देवता-स्थापना कर सकते हैं। (उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह / निर्णयसिंधु,
तृतीय परिच्छेद पूर्वार्थ)
दिनों की गणना करते समय देवता उत्थापन का दिन महत्त्वपूर्ण है। देवता स्थापना हो गई
हो और सपिंडों का सूतक आया हो तो कूष्मांड होम किए बिना ही कार्य संपन्न कर सकते हैं।(विष्णुमत निर्णयसिंधु तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध)
ब) सपिंडों का जननाशौच (बच्चे के जन्म के बाद का सूतक) आया हो तो मुहूर्त का दिन
होनेपर कूष्मांड होम कर के अथवा सर्व प्रायश्चित्तार्थ प्रजापति के लिए समस्त व्याहृति मंत्र से घृत की १०८ आहुति देकर उस कर्म हेतु सूतक की निवृत्ति कर के देवता स्थापना आदि मंगलविधि तथा मंगलकार्य कर सकते हैं। परंतु देवता स्थापना हो गई हो और सपिंडों का सूतक
आया हो तो कूष्मांड होम किए बिना ही कार्य संपन्न कर सकते हैं। (निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध) (विशेष निर्णय के लिए अशौच पालन प्रकरण देखें।) वर्तमानकाल में अशौच पालत के नूतन नियमों के अनुसार यदि अशौच निवृत्ति हो रही हो, तो मंगलकार्य के लिए कूष्मांड होम
तथा व्याहृति होम करने की आवश्यकता नहीं हैं।
त्रिज्येष्ठ योग किसे कहते हैं ?
वर तथा वधु दोनों ही अपनी माता-पिता की ज्येष्ठ संतान हो तो उन दोनों का विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं करना चाहिए। इसे त्रिज्येष्ठ योग कहते हैं। तथा यह योग उनके विवाह के लिए वर्ज्य हैं। परंतु वर अथवा वधु में से एक अपनी माता-पिता की ज्येष्ठ संतान ना हो तो त्रिज्येष्ठ योग नहीं होता हैं, इसलिए ज्येष्ठ मास में उनका विवाह कर सकते हैं। परंतु यदि सूर्य कृत्तिका नक्षत्र
से आगे रोहिणी, मृग नक्षत्र में हो तो ज्येष्ठ मास में भी ज्येष्ठ पुत्र और ज्येष्ठ कन्या का विवाह कर सकते हैं। ऐसे समय त्रिज्येष्ठ वर्ज्य योग का दोष नहीं रहता है। कृत्तिकास्थं रविं त्यक्त्वा ज्येष्ठे
ज्येष्ठस्य कारयेत्। (संदर्भ- मुहूर्त चिंतामणि, ज्येष्ठे विशेषः)
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सगे भाईयों का (सहोदर) विवाह एक ही दिन एक ही मंडप में कर सकते है।
दो सगे भाई अथवा बहनों का विवाह एक ही दिन एक ही मंडप में कर सकते है, परंतु मंडप देवता स्थापना स्वतंत्ररूप से करनी चाहिए। दोनों के विवाह विधि दो पंडितों से स्वतंत्र करवाने चाहिए। एक की विधि माता-पिता कर सकते है, दूसरे की विधि ताऊजी, चाचा अथवा मामा से करवाएँ। एक ही परिवार के दो कार्यों के लिए दो स्वतंत्र देवतास्थापना करें। नांदीश्राद्ध एक ही करें, दोनों में से जो ज्येष्ठ हो उसके कार्य हेतु नांदीश्राद्ध करें।
• दग्ध, मृत्यु, यमघंट योग होनेपर मंगलकार्य कर सकते हैं।
उपरोक्त दग्धादि योग हूण, बंग तथा खश प्रदेश में वर्ज्य हैं, तथा विवाह के दिन चंद्रबल हो तो ऐसे दोष अपने आप नष्ट हो जाते हैं। हूण, बंग ये प्रदेश भारत के ईशान्य भाग में स्थित हैं। • हिमालय के निकट प्रदेश को खश कहते हैं। तात्पर्य दग्धादि योग होते हुए भी विवाह आदि । मंगलकार्य संपन्न कर सकते हैं। (मुहूर्त चिंतामणि, दुष्टयोग परिहार)
कुंडली की ग्रहस्थिति के अनुसार आनेवाला वैधव्य तथा द्विभार्या योग के दोष परिहार हेतु कौन से उपाय हैं?
पुरुष जातक की कुंडली में यदि पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी करने का (द्विभार्या) योग हो तो दुर्गासूक्त से दुर्गाग्नि होम यह परिहार करना चाहिए। (धर्मसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध, वैधव्य परिहार) वैधव्य दोष का परिहार करने हेतु कन्या का कुंभविवाह अथवा भगवान विष्णु की चतुर्भुज सुवर्ण प्रतिमा की षोड़शोपचार पूजा कर के निम्नलिखित दानमंत्र से प्रतिमा का दान करना चाहिए। (निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध - प्रतिकूलादिनिर्णयः)
दानमंत्र -
यन्मया प्राञ्चि जनुषि घ्नंत्या पतिसमागमम्। विषोपविषशस्त्राद्यैर्हतोवापि विरक्तया ।। प्राप्यमाणं महाघोरं यशःसौख्यधनापहम्। वैधव्याद्यतिदुःखौघं तं नाशय सुखाप्तये।। बहुसौभाग्यलब्ध्यै च महाविष्णोरिमां तनुम्। सौवर्णी निर्मितां शक्त्या तुभ्यं संप्रददे द्विज।।
विवाह के उपरांत प्रथम वर्ष में नववधु को किस विशिष्ट मास में ससुराल में नहीं रहना चाहिए? इस संदर्भ में आधुनिक विचार -
विवाहोपरांत प्रथम वर्ष में आनेवाले आषाढ़ मास में यदि नववधु ससुराल में रहती हैं तो वह सास के लिए अनिष्ट होता है। ज्येष्ठ मास पति के बड़े भाई यानि जेठजी को अनिष्ट होता है। पौष मास श्वसुर के लिए अनिष्ट होता है। पुरुषोत्तम (अधिक) मास पति के लिए अनिष्ट होता है। अतः इन महिनों में नववधु को ससुराल में नहीं रहना चाहिए अर्थात् मायके में रहना चाहिए, ऐसा शास्त्र कहता है। पुराने समय का यह विचार अब कालबाह्य हो गया है। पुराने समय में कन्या का विवाह ८ से १२ वर्ष की आयु के बीच हो जाता था। इस उम्र में कन्या को ससुराल, वैवाहिक जीवन आदि का ज्ञान नहीं होता था, उस समय कन्या की इच्छा माँ के पास रहने की होती थी। अतः कुछ कुछ अंतराल से उसे पीहर भेजा जाता था। माँ के पास रहकर वह रीति-रिवाज आदि बातें सीखकर आती थी। कुछ दिन ससुराल में और कुछ दिन पीहर में रहने हेतु यह व्यवस्था की गई होगी। अतः इसी को नियम का रूप दे दिया गया होगा। परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कन्या के विवाह की बढ़ती नौकरी करनेवाली महिलाएँ आदि का विचार करते हुए अब विवाहित कन्या संपूर्ण मास पीहर नहीं रह सकती है, अतः इस नियम का अनुपालन करना आवश्यक नहीं रहा हैं।
एक वर्ष में मंगलकार्य के क्रम के संदर्भ में।
एक ही वर्ष में लघु मंगलकार्य के बाद ज्येष्ठ मंगलकार्य कर सकते हैं। अर्थात् अविभक्त परिवार में पहले उपनयन तथा उसके पश्चात् विवाह कर सकते हैं अथवा पहले वास्तुशांति कर बाद में उपनयन कर सकते हैं अथवा विवाह भी कर सकते हैं। परंतु विवाह के बाद उपनयन तथा उपनयन के पश्चात् वास्तुशांति ६ मास के पश्चात् अथवा संवत्सर बदलनेपर कर सकते हैं। विभक्त परिवारों में यह नियम लागू नहीं है।
मंगलकार्य के पूर्व विधियों के लिए कुयोग के दिन ले सकते हैं।
विवाह दिन के पूर्व कुछ दिन विवाहांगभूत देवब्राह्मण, ग्रहपूजन आदि हेतु पंचांगशुद्धि देखनी चाहिए। परंतु मंगलकार्य के लिए एक दिन पहले पंचांगशुद्धि न हो तो भी देवब्राह्मण, ग्रहपूजन, गणपतिपूजन, हल्दी, सीमांतपूजन आदि (कुयोग होते हुए भी) कर सकते हैं।
विधवाओं का पुनर्विवाह / घटस्फोटिता स्त्री का पुनर्विवाह करना शास्त्र सम्मत हैं, इस विषय का आधारसहित विचार
विधवा विवाह संबंध में वसिष्ठ, बौधायन, पराशर व नारद आदि स्मृतिकार अनुकूल हैं।
पाणिग्राहे मृते बाला केवलं मंत्रसंस्कृता ।
साचेदक्षतयोनिः स्यात्पुनः संस्कारमर्हति।। (वसिष्ठ अ. ५)
निसृष्टायां हुतेवाऽपि यस्यै भर्ता म्रियेत सः।
सा चेदक्षतयोनिः स्याद् गतप्रत्यागता सती ।।
पौनर्भवेन विधिना पुनः संस्कारमर्हति।। (बौधायन प. ४ अ. १) नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीबे च पतिते पतौ।
पंचस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधियते।। (पराशर अ. ४)
वसिष्ठ अथवा बौधायन से पराशर मत अधिक अनुकूलता दर्शाता है। पति भाग गया, मृत्यु हो गई, संन्यासी हो गया, नपुंसक हो तथा पतित (वेश्यागमन करने वाला, व्यसनग्रस्त, हत्यारा, अपराधी, पीड़ा देनेवाला इन्हे पतित मानना चाहिए) तो ऐसी स्थिति में वह स्त्री पुनर्विवाह कर सकती है, ऐसा पराशर का मत है। कौटिल्य का भी यही मत है। विगत वर्षों में विधवा विवाह तथा घटस्फोटिता स्त्री के पुनर्विवाह को समाज में मान्यता नहीं थी। परंतु उपर्युक्त मतों के अनुसार हमें यह ज्ञात होता है कि प्राचीन समय में ऐसे विवाह को मान्यता थी। वर्तमान समय में अधिक मात्रा में पुनर्विवाह होते हैं। अर्थात् उसे लोकमान्यता भी मिली है।