चंद्र खंड सारगर्भित विवेचना व्याख्या
उस समय स्त्री और पुरुष नग्न रहते थे। संसार और घर-गृहस्थी की अवस्था नहीं थी। वे लोग समुहों में रहते थे, कंदमुल खाते थे और गुहाओं में रहते थे। बुद्धि और भावना का विकास नही हुआ था। मन में मलिनता या कठिनतानहीं थी। इस समय की स्त्री के स्वाभाविक गुणधर्म इस प्रकार थे -
१. आनन्द - उस समय संसार की झंझरटें नहीं थी। मृत्यु के सिवाय कोई गंभीर दुख नहीं था। कोई चिन्ता नहीं थी। खा-पीकर पुरुष के साथ आनन्द से रहना यही स्त्री की इच्छा थी। इसलिए उसका स्वभाव आनन्दमय था।
२. निर्व्याज प्रेम -अपना और पराया इस भेद का अभाव था इसलिए स्वार्थ का भी अभाव था। निसर्ग से ही अकृत्रिम के पाठ मिलतें थे।माता का स्वाभाविक (Motherly instinct) पशुपक्षियों में भी पाया जाता है। वही स्त्री के हृदय में प्रधान था। का लोभ नहीं था।
३. निर्लोभ वृत्ति - सगे सम्बधियों की चिन्ता न होने से संपत्ति
स्वभाव है।
४. लज्जा - लज्जा यही स्त्री का अलंकार है। वही उसका स्वाभाव है l
५. स्थिरता - यह भी स्त्री का स्वाभाविक गुण है। घर संसार,
गर्भधारणा, प्रसुति, संतान का संगोपन इन सब कार्यों से स्त्री में स्वभावतःयह गुण निर्माण होता है। इसी के कारण वह बन्धन में रहती है।
६. त्याग वृत्ति - उपभोग का त्याग करने की वृत्तिस्त्री मेंविशेषतः होती है। पुरुष में इसकी मात्रा कम होती है।
७. सेवा -दुसरों के सुख में ही अपना सुख मानना और सेवा को ही धर्म मानना यही स्त्रीत्व का सार है। मानवजाति की इस आदिम अवस्था में धीरे धीरे सुधार हुआ।वस्त्र धारण करने की और घर बसाने की पद्धति शुरू हुई। खेती करना औरगांब में रहना प्रारंभ हुआ। समाज की धारणा के लिए नितीनियम बनाए गए।विवाह संस्था स्थापित हुई। अधिकारों की कल्पना निर्माण हुई। सगेसम्बधियों और पड़ोसियों के कारण स्त्री के हृदय में भी परिवर्तन हुआ।उसके नैसर्गिक गुणों की जगह कुछ दुर्गुण भी आए। ‘अनृतं साहस माया'इन शब्दों से उसका वर्णन होने लगा। प्रतिदिन के व्यवहारों से ही ये सब गुणउसमें पैदा हुए। अपने सुख और इज्जत के लिए कोमल स्त्री को भी निष्टुरहोना पड़़ा।चन्द्र यदि अशुभ ग्रहों से सम्बन्धित हो तो उसमें भी स्त्री के येसब दुर्गुण दिखाई देते है।
चन्द्र का कार्य
'तूं जीव, तूं हृदय, तूं मजला विसांबातूं चंद्रिकाच अथवा सुखदा सुधा वा'
काव्य में प्रेमी अपनी प्रियतमा को चन्द्रिका की उपमा देते हैं।भर्तुहरि के अनुसार भी स्त्री की दृष्टी और विलासोंमें पुरुष को आकर्षितकरने का विलक्षण सामर्थ्य होता है। पहले स्त्री को देखने की इच्छा होती है।दर्शन होने पर संभाषण करने की उत्सुकता होती है। वह भी हुआ तोउपभोग की इच्छा होती है। इस कारण पुरुष के विचार और विकारों परअर्थात मन पर स्त्री स्वामित्व सहज ही स्थापित हो सकता है।
जगत में चन्द्र भी इसी प्रकार अपना स्वभाव प्रभाव बतलाता है।उसी के कारण पौर्णिमा को समुद्र को ज्वार आता है। पागलों का पागलपनभी बढ़ता है। मन पर चन्द्र का स्वामित्व है। इसीलिए शास्त्रों में ‘मनस्तुहिमगु:"ऐसा कहा है।
चन्द्र में स्री के समान ही लोहचुम्बक जैसी आकर्षण शक्ति(Magnetic force) है। पृथ्वी के चारों ओर कोई दो मील की दुरी परएक चुम्बकीय वलय (Magnetic range) है। इसी की शक्ति से पृथ्वीका संतुलन बना रहता है और वह अपने अक्ष पर घुमती रहती है। चन्द्र कापरिणाम इस वलय पर होता है। चन्द्र के कारण यह वलय पृथ्वी के चारोंओर घुमता है और उसकी आकर्षण शक्ति बनी रहती है। इस वलय कीएक प्रदक्षिणा ११ या ११।। वर्षों में होती है। इस विषय में श्रीमती बेसीलिओ ने कहा है-
Further we find the moon regulating the tidesand also affecting vegetation, her periodical waxingand waning is a constant Symbol of the Ebb and flowof the great magnetic tides that are ever sweepingthrough the various planes of Nature. She is mostcomplex of all symbols. Luner magnetisim generateslife, preserves it and destroys it, psychically as well asphysically.
चन्द्र भी ज्वार भाटे का नियमन करता है और वनस्पतियों पर भी उसकापरिणाम होता है। जगत के विभिन्न स्तरों में जो चुम्बकीय शक्तियाँ है उनमेंउतार-चढ़ाव होते रहता है। चन्द्र की वृद्धी और क्षय इसी का प्रतीक है।चन्द्र की चुम्बकीय शक्ति से जीवन का मानसिक और शारीरिक दोनोंदृष्टियों से निर्माण होता है, रक्षण होता है और विनाश भी होता है। सृष्टि केसमान प्राणियों पर भी चन्द्र के अनुकूल व प्रतिकुल परिणाम होते है। इन्हीका अब शास्त्रानुसार विवेचन करेगे।
चन्द्र का कारकत्व
बृहत्पाराशरी-माता-मनः-पुष्टि-गन्ध-रस-इक्ष-गोधूम-क्षारक-बीज-शक्तिकार्य-सत्य रजतादिकारकश्चन्द्रः।।
मातृ- चचन्द्र को पृथ्वी की माता माना गया है। माता के समानचचन्द्र पृथ्वी का पालनपोषण करता है और उसकी जीवनशक्ति का विकासकरता है और इसलिए चन्द्र को माता का कारकत्व दिया गया है।
मन-
चन्द्र के समान मन की स्थिति होती है और मानव का सुखदुःख मन पर हीअवलम्बित होता हैं इसलिए मन का कारकत्व भी चन्द्र को दिया है।जाना चाहिए क्यों कि चन्द्र के समान शरीर की भी स्थिति में क्षय और वृद्धिहोती है किन्तु इस विषय का विचार रवि और मंगल की स्थिति से अधिक
पुष्टि - शरीर की पुष्टि कैसी है इसका विचार चन्द्र की स्थिति से किया सम्बन्धित है।
गन्ध - सृष्टि में निसर्गतः एक अद्भुत सुगन्ध व्याप्त होती है।फुलों के अथवा इत्न के सुगन्ध से सर्वथा भिन्न ऐसा यह गुप्त सुगन्ध है।योगशास्त्र के अभ्यास से ही इसका ज्ञान हो सकता है। जिन्हें यह ज्ञान होजाता है वे संसार का त्याग कर वन में निवास करने लगते है। स्वामीविवेकानंद ने ‘राजयोग' में इसका कुछ वर्णन किया है। यह सुगन्ध चन्द्र सेही पृथ्वी पर आता है। फुलों का अथवा इत्र का गन्ध भी चन्द्र परअवलम्बित कहा गया है। वस्तुतः इस बाह्य सुगन्ध का विचार शुक्र पर सेकरना चाहिए। रस-द्रव पदार्थ यह कारकत्व चन्द्र पर दिया गया है क्योंकिचन्द्र भी द्रवस्वरूप है। रस शब्द का एक अर्थ पारा यह भी है।इक्षु-गोधुम-ईख तथा गेहूं यह कारकत्व चन्द्र को कैसे दिया गया यह समझ में नहीं आता। क्षारक-क्षार पदार्थों पर चन्द्र का स्वामित्व है यहस्पष्ट है। समुद्र शारों से परिपूर्ण है और इसे पीर्णिमा के दिन चन्द्र के हीकारण ज्वार आता है। यह परिणाम सादे पानी के तालाब पर नहीं होता।इससे स्पष्ट होता है कि क्षारों पर चन्द्र का स्वामित्व है। बीजशक्तिकार्य-स्त्री में गर्भधारणा की शक्ति है या नहीं इसका विचार चन्द्र की स्थिति सेहोता है। स्त्री पर चंद्र का स्वामित्व है। देहातियों में ऐसी एक धारणा है किखेत जोतते बक्त बीज बोने का काम पुरुषों ने ही करना चाहिए। यदि बीजबोने का काम स्व्रियों ने किया तो फसल नही आती। बीज बोये जाने परउसके संवर्धन का काम कुछ काल तक स्त्री को ही करना होता है। किसीग्रन्थकार ने लिखा है कि स्त्रियों की गर्भधारणा करने की शक्ति का तथापुरुषों के वीर्य की गर्भोत्पादन शक्ति का विचार चन्द्र की स्थिति से होता है।किन्तु हमारे मत से इस मत का दुसरा अंश बिलकुल गलत है। पुरुष के वीर्यकी गर्भोत्पादन शक्ति का विचार रवि की स्थिति से करना चाहिए। सस्यपश्चात्धान्यः- मुख्य फसल के बाद उगने वाली फसल (पश्चात धान्य)पर चन्द्र का स्वामित्व होता है। इसलिए चन्द्र पर यह कारकत्व दिया है।रजत-चांदी सफेद होती है इसलिए चन्द्र पर यह कारकत्व दिया गया है।किन्तु मेरे विचार से इस धातु का विचार शुक्र की स्थिती से करना चाहिए।सर्वार्थचिन्तामणि-धवल-चामर-यशो-दया-आमोद-कान्ति मुखला-वण्य-मातृ मनः प्रसादकारकश्चन्द्रधवल-सफेद रंग की योजना चन्द्र के साथ की गयी है यहस्वाभाविक ही है। चामर-राजा अथवा महान साधुसन्तों के सिर पर ढुरनेके लिए चामर का उपयोग किया जाता है। इसका कारकत्व राहु पर देनाचाहिए। यश-कार्य में सफलता प्राप्त होना यह शनि और राहू का कारकत्व है। इसी ग्रन्थकार ने राहू पर यह कारकत्व दिया भी है। यश प्राप्तकरने के लिए मन में जो स्थिरता और सातत्य की जरूरी होती है उसकाविचार चन्द्र से करना चाहिए। दया-आमोद-दया और आनन्द ये चन्द्र केस्वाभाविक गुण है अतः ये कारकत्व ठीक है। कान्ति-चन्द्र तेजस्वी हैइसलिए कान्ति अर्थात तेज का विचार चन्द्र से होता है।मुखलावण्य-मुख का सौन्दर्य यह कारकत्व भी योग्य है। चन्द्र कास्वामित्व जिन पर होता है वे बहुत मोहक होते है और उनका मुख विशेषरूप से तेजस्वी होता है। हमारे कवियों ने बहुत सुन्दर प्रकारों से चन्द्र कीस्त्रियों के मुखों से तुलना की है। कवि कुलगुरु कालिदास के लघुकाव्यऋतुसंहार में ऐसे वर्णन बहुत अच्छे हैं। इस प्रकार मुख की सुन्दरता यहचन्द्र का कारकत्व कहा गया है वह योग्य ही है।
वैद्यनाथ-चेतो-बुद्धि नृप-प्रसाद-जननीस पत्करश्चन्द्रमाः॥बुद्धि -बुद्धि का कारक चन्द्र माना है इसका स्पष्टीकरण नहीहोता। चन्द्र मन का कारक है। मन और बुद्धि अलग अलग है। उनको एकही मानना विचार-संगत नही होगा। बुद्धि का कारक बुध को माननाचाहिए।
नृपप्रसाद -राजा की कृपा का कारक चन्द्र है। किसी संस्थानया देशी रियासत में यदि रानी की कृपा किसी सेवक पर होती है तो राजा भीउस पर प्रसन्न होता था। चन्द्र को रानी का स्थान दिया है। इसलिए उसेराजकृपा का कारक माना गया है। संपत्ति - यह कारकत्व चन्द्र पर कैसेदिया गया इसका स्पष्टीकरण नहीं होता। चन्द्र को संपत्ति का कारक माननागलत है।विदयारण्य -मनोबुद्धिप्रसादंच मातृचिन्तां च चन्द्रमाः॥
मातृचिन्ता - रविविचार में जिस प्रकार पितृचिन्ता का विचारकिया गया उसी प्रकार यहां मातृचिन्ता का करना चाहिए।
कल्याणवर्मा-कवि-कुसुम-भोज्य-मणि-रजत-शंख-लवणोदकेशु वस्त्राणम्। भूषण-नारी-धृत-कुज-तैल-निद्रा-प्रभुशचन्द्रः।।कवि - यह कारकत्व अन्य सभी शास्त्रकारों ने शुक्र का कहाहै। कवि यह शुक्र का एक नाम ही है। किन्तु मेरे विचारों से कल्याणवर्मा नेचन्द्र पर यह कारकत्व विचारपूर्वक ही दिया है। संसार में कवि, ज्योतिषी,गायक, योगी और संशोधक ये पांच प्रकार के लोग ऐसे होते है जो अपनेकार्य में मग्न होने पर सारे बाह्य जगत को भूल जाते है। मन इतना एकाग्रऔर तन्मय हो जाता है कि वे अपने शरीर की सुध भी भूल जाते है। किसीकवि के हृदय से जब काव्य की निर्मिती होती है तब उसे बाह्य जगत कीपूरी विस्मृति हो जाती है। ऐसा नहीं हुआ तो नितान्त रमणीय और मनोहरकाव्य ही निर्माण नही होता। इस तरह तल्लीनता की मनोवृत्ति चन्द्र परअवलम्बित है। इसलिए इन पांचों लोगो का कारकत्व मेरे विचार से चन्द्रको ही देना चाहिए। कुसुम-फूल सुंदर और सुगन्धित होता है इसलिए यहकारकत्व चन्द्र का कहा गया है। भोज्य-रसोई बनाना स्त्रियों का कार्य हैऔर चन्द्र को गृहिणी का स्थान दिया गया है इसलिए खाद्य अन्न काकारकत्व चन्द्र पर दिया गया। मणि-स्त्रियों को प्रिय होते हैं इसलिए यहचन्द्र का कारकत्व कहा गया। शंख- लवणोदक- खारा पानी यहकारकत्व चन्द्र का है क्योंकि कि समुद्र पर चन्द्र का स्वामित्व है। शंखमुख्यतः समुद्र में पैदा होते हैं इसलिए उनका भी कारक चन्द्र ही कहागया है।
वस्त्र - चन्द्रस्त्री सदृश ग्रह हैं। स्त्रियों को विविध वस्त्र बहुत प्रिय होते है। इसलिए वस्त्रों का कारक चन्द्र माना है। भूषण-अलंकार भीस्त्रियों को बहुत प्रिय होते है इसलिए इनका कारक चन्द्र माना है। घृत औरतैल - ये द्रव पदार्थ है इसलिए इनका कारकत्व चन्द्र पर दिया गया।निद्रा -नींद का कारक वस्तुतः शनि होना चाहिए क्योंकि नींद प्रतिदिनप्राप्त होने वाली मृत्यु ही है। मृत्यु पर शनि का स्वामित्व है। अतः यहकारकत्व गलत है।
जीवनाथ दैवज्ञ - धवल-चामर-किर्ति-दया-मनो-मुख-कला-जननी-मनसामयि। विधुबलाबलयोग विमर्शतः-कृतिकलानिपुणःसुख-मादिशेत्॥
किर्ति- यही मानव को प्राप्त होने वाली सच्ची संपत्त है। किन्तुइसका विचार शनि और राहु से करना होता है। चन्द्र पर यह कारकत्व देनागलत है। कृति - यह कारकत्व सही है क्योंकि कृति का आरंभ मन से होताहै। कलानिपुण - कसीदा और झिग का काम, लकडी अथवा धातु कानक्षी काम, चित्रकला इत्यादि के लिए जो मनोवृत्ति और ज्ञान जरूरी होताहै उसका विचार चन्द्र से होता है किन्तु इन कलाओं का साक्षात् विचारशुक्र की स्थिती से होगा।
कालिदास- बुद्धिःपुष्प-सुगन्ध-दुर्ग-गमन-व्याधि-द्विजा-लस्यक-श्लेश्मापस्मृति-गुल्म-भाव-हृदय-स्त्री-सौम्य-पापाम्लकानिद्रा-सौख्य-जल-स्वरूप-रजत-स्थुलेक्षु-शीतज्वरा। यात्रा-कूप-तटाक मातृ-समद्ृग्-मध्यान्ह-मुक्ता-क्षयाः।१॥ धावल्यकटिसूत्र-कास्य-लवण-एस्वा मनः-शक्यतो वापी-बज्र-शरन्मुहूर्त-मुख-कान्तिश्वेत-चर्णोदराः। गौरिभक्ति-मधु-प्रसाद-परिहासाः पुष्टि -गोधूमकामोहाःकान्तिमुखे मनो-जव-दधि-प्रीतिस्तपस्वी यशः॥२॥
लावण्यं निशिवीर्य-पश्चिममुखे विट्ट्-क्षार-कार्याप्तयः प्रत्यग्-दिकू-प्रिय-मध्यलोक नवरलानीह मध्य वयः। जीवो भोजन -दूरदेशगमने लग्नंचदो्व्याधियः छन्नाद्यंचित-राजाचिन्ह-सुफले सदूरक्तधातुस्तथा॥३॥मीनाद्या जलजाः सरीसृपपदुकले सदविकासस्फुरत्-शुद्धस्तत्स्फटिकास्ततो मृदुलक वस्त्रत्वमी स्युर्विधोः
दुर्ग - किला यह मंगल के अधिकार का विषय है अतः यहकारकत्व गलत है। गमन- आना जाना यह कारकत्व सम्भवतः चन्द्र कीसतत गति को देखकर कहा गया है। व्याधि -विकार का विचार करते हुएयह कारकत्व ठीक होता है। किन्तु विशिष्ट रोगों के लिए अन्य ग्रहों का भीविचार आवश्यक होता है। द्विज-ब्राह्मण किन्तु हमारे विचार से यहां वैश्यअर्थात् व्यापारी यह कारकत्व मानना चाहिए। आलस्य - यह गुणधर्मचन्द्र में नहीं, शनि में है। अतः यह कारकत्व गलत है। श्लेष्मा - यह रोगशनि के अधिकार में है। अपस्मृति -इसके दो अर्थ हो सक़ते है-स्मृतिनष्ट होना अथवा अपस्मार होना ये दोनो राहु के अधिकार में है। गुल्म -उदर का वायुरोग यह गुरु के अधिकार में है। हृदय - इस पर चन्द्र कास्वामित्व है। सौम्य-चन्द्र शान्त है अतः यह कारकत्व दिया गया। पाप-चन्द्र की स्थिती कुछ पापमूलक है अतः यह कारकत्व दिया गया। स्थूल -यह कारकत्व योग्य नहीं है क्योंकि चन्द्र के स्वामित्व के लोग पतले कद केहोते है। शीतज्वर-चन्द्र का एक कारकत्व शीत यह कहा गया है उसी परसे यह कारकत्व कहा गया। यात्रा - देवस्थानों का दर्शन यह कारकत्वकैसे दिया यह स्पष्ट नहीं होता। कूपतटाक- कुंए और तालाब यहकारकत्व चन्द्र को दिया गया क्योंकि पानी उसी का स्वामित्व है।समद्ृक-साधी और सम दृष्टि यह कारकत्व चन्द्र का माना गया क्यों कि चन्द्र के किरण इसी प्रकार पृथ्वी पर आते है। मुक्ता-मोती का रंग चन्द्र केसमान है और आकार भी गोल है अतः यह कारकत्व सही है। क्षय-वद्यप्रतिपदा से अमावस्या तक चन्द्र क्षीण होता है अतः क्षयरोग का वह कारककहा किन्तु अकेले चन्द्र से यह रोग होता है ऐसा नहीं मानना चाहिए।कटिसूत्र -करधनी यह कारकत्व कैसे कहा गया यह स्पष्ट नहीं होता।न्हस्व-छोटा-इसके शरीर की ऊंचाई कम मानी है। मनःशक्तयः-मन की शक्तियां इसका कुछ विवेचन रवि-विचार में किया गया है।वज्न-यह इन्द्र के शस्त्र का नाम है उसका यहां कोई सम्बन्ध नहीं है। किन्तुवज्र यह नाम शुभ्र वर्ण के तेजस्वी हीरे का भी है। उस अर्थ में यह कारकत्वयोग्य है। शरद्-यह ऋतु चन्द्र के अधिकार में कहा गया क्यों कि चन्द्रकाधान्य पर स्वामित्व है और धान्य शरद ऋतु में ही तैयार होता है।
मुहूर्त - साडेतीन घटिका अथवा किसी कार्य के लिए नियोजितसमया यह कारकत्व सही है। मुखकान्ति-पुरुष के मुख पर जो एकनैसर्गिक तेज होता है उस पर चन्द्र का स्वामित्व है। उदर- यह कारकत्वकैसे दिया गया यह स्पष्ट नहीं होता। गौरिभक्ति -रवि को शंकर का औरचन्द्र को पार्वती का प्रतिनिधी माना गया है अतः पार्वती की भक्ति काकारकत्व चन्द्र को दिया गया।
मधु-मीठा यह कारकत्व अनुभव में नही आता। परिहास-हंसीमजाक यह चन्द्र का गुणधर्म नहीं है अतः यह कारकत्व गलत है।आमोद-आनन्द यह स्वभाव का कारकत्व सही है। मनोजव-मन कीगति यह कारकत्व किसलिए कहा गया यह स्पष्ट नही होता। मन की गतिकैसी और कितनी है इसका विचार जन्मकाल के चन्द्र की गति से होसकता है। गति अधिक हो तो चंचलता अधिक होगी और कम हो तो चंचलता भी कम होगी। दधि-दही सफेद रंग का क्षार से होनेवाला औरद्रव पदार्थ है अतः यह कारकत्व योग्य है। प्रेम - यह चन्द्र का गुणधर्म है।तपस्वी- यह कारकत्व गलत है। चन्द्र के स्वामित्व के व्यक्ति तपस्वीकभी नहीं हुए है। निशिवार्य - चन्द्र के स्वामित्व के व्यक्ति रात्रि मेंबलवान होते है। पश्चिममुख- चन्द्र के उदयास्त अच्छी तरह देखने परप्रतीत होगा कि वह पश्चिम से पूर्व की ओर जाता है। शुक्ल पक्ष में पश्चिममें ही उसका उदय होता है और उसी ओर की बाजू अधिक तेजस्वी होतीहै। फिर एक एक कला बढ़ती है। विट - हंसोड और स्त्रियों के विक्रय मेंमदद करने वाला यह कारकत्व बिलकुल गलत है। आप्त-सम्बन्धी लोगसम्बन्धित स्त्रियों के विषय में इस कारकत्व का उपयोग हो सकता है।प्रत्यक् दिकृप्रिय -जिसे पश्चिम दिशा प्रिय है, क्षार, लावण्य, श्वेतवर्ण,वापी - कुंआ, लवण - नमक, धावल्य- शुभ्रता इन कारकत्त्वों कावर्णन पहले हो चुका है। कालिदास ने निरर्थक कारकत्व बहुत कहा है।
William Lily - "She signifies queens,Countesses, ladies, all manners of women, as also thecommon people, travellers, pilgrims, sailors,Fishermen, Fishmongers, Brewers, Tapstes,Publicans, Letter carriers, Coachmen, Huntsmen,messengers, Mariners, Milkers, Maltsters, Drunkards,Oysterwives, Fisherwomen, Charmwomen,Tripewomen and generally such women as carrycommodities in the streets, as also Midwives, Nurses,etc. Hackneymen, Watermen, Waterbearers."
विलियम लिलि - रानियाँ, सरदारों की पलियाँ, कुलीन गृहिणी, स्त्रियँ, सामान्य जनता, प्रवासी, यात्री, खलासी, मछुआरे,प्रकाशक, पत्रवाहक, तांगेवाले, शिकारी, दूत, ग्वाले, पियक्कड, रास्तोंपर चीजें बेचनेवाली स्त्रियाँ, नर्स, पानी ढोनेवाले, मांत्रिक स्त्रियाँ, शराबबनानेवाले और बेचनेवाले इन व्यक्तियों का विचार चन्द्र से होता है। चन्द्रको सूर्य से प्रकाश प्राप्त होता है इसलिए उष्णता के निर्माण में भी उसका कुछ अंश है।
हमारे मत से चन्द्र का कारकत्व - विद्युत प्रवाह, चुंबकीयप्रवाह, माता का दूध (संतान को किस प्रकार और कितना मिलेगा),स्त्रियों का रजोदर्शन (मासिक धर्म किस प्रकार और प्रमाण में होगा), रेल्वेअधिकारी, जहाजों के कारखाने, दवाई के दूकानदार, लोककर्मविभाग,कांच के कारखाने, वेधशाला, पश्चिमीय द्रव औषध, पेटेंट दवाइयां,अनाज के दूकान, किराना सामान, सिंचाई विभाग, म्युनिसिपालिटी कापानी विभाग, नमक बनाने के कारखाने, आयात निर्यात कर विभाग,जहाज खलासी, टंकसाल, नोट छपाने के स्थान, दूध की डेअरी, वनस्पतिशास्त्र,वैद्यकशास्त्र, जंतुशास्त्र, सूक्ष्म जीवशास्त्र, समता कानून, विमान,चावल, कपास, सफेद वस्त्र।
जन्मकुण्डली में उपयोगी कारकत्व - माता, मन,बीजशक्ति, यश, पुष्टि, बुद्धि, तृपप्रसाद, संपत्ति, मातृचिन्ता, कवि,भक्ष्य, वस्त्र, नींद, कीर्ति, कलानिपुण, व्याधि, मां का दूध, स्त्री कारजोदर्शन, पश्चिमीय द्रव्य, औषध, पेटेंट दवाइयां अनाज की दुकाने,किराना माल की दुकानें, सिंचाई विभाग, पानी विभाग, नमक केकारखाने, आयात निर्यात कर, समुद्री विभाग, टंकसाल, कांच के कारखाने, वेध शाला, रेल्वे, जहाज, दवाई की दुकाने, लोककर्म विभाग,डेअरी, रेल्वे, पोस्ट विभाग, जहाजों के कारखानें, नोट छपाने केछापखाने।
जन्मकुण्डली से शिक्षण के विषय में चन्द्र का कारकत्व -नर्स, मिडवाइफ, लोककर्म विभाग, पानी विभाग, इंजीनियरिंग,वनस्पतिशास्त्र, वैद्यकशास्त्र, समताकानून, जंतुशास्त्र, सूक्ष्म जीवशास्त्रीस्वभाव का कारकत्व - दया, मोह, आलस्य, मजाक, मनकी गति, प्रीति।
मेदिनीय ज्योतिष में उपयोगी कारकत्व - रानी, सरदार कीपत्नी, उच्चकुलीन स्त्री, सामान्य जनता, प्रकाशक, किले, चांदी, यात्रा,गन्ध, रस, ईख, गेहं, चामर, फुल, रन, शंख, खारा पानी, अलंकार,घीट तेल। विलियम लिली ने जो उपयोग में न आने योग्य कारकत्व दिया हैवह सभी व्यवसायों के लिए है। इस विषय में मेरा अनुभव इस प्रकार है-
मेष- सार्वजनिक उपकार कार्य, जंगल विभाग। वृषभ-अस्पताल के कर्मचारी, रसोई बनानेवाले, पानी ढोनेवाले, तरकारीबेचनेवाले, अनाज और किराना माल की दुकाने। मिथुन - वैद्य,प्रवचनकार, पुराणवाचका कर्क - सोना चांदी गलाना। सिंह - बडेअधिकार पद की नौकरी। कन्या - रेल्वे, डाक तार विभाग, रेकार्डिंग।तुला - गायन शिक्षक, रेडियो के अधिकारी। वृश्चिक - डॉक्टर,हाफकिन्स इन्स्टिट्युट जैसी वैद्यकीय संस्थाओं के कर्मचारी। धनु -इंजीनियर। मकर - बिल्डिंग कॉॅन्ट्रॅक्टर। कुंभ - शास्त्रीय कार्यों के लिएनौकरी। मीन-लेखक, सन्मानयुक्त सरकारी नौकरी।
चन्द्र का अधिक वर्णन (ग्रहयोनि भेद)
वैधनाथ-चिलमिन्दुः। चन्द्र मानव के चित्त का स्वामी ऐसाकहा है। किन्तु चन्द्र का स्वामित्व मन पर है। चित्त और मन एक ही नही है।वेदान्त के अनुसार परब्रम्ह और माया इन दोनों से ही सारी सृष्टि की उत्पत्तिहोती है। इन में माया के कारण ही जीव और उसका मन उत्पज होते हैं। इनसम्बन्ध में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इस चतुष्टय का वेदान्त में वर्णनआता है। मेरे विचार से मन पर चन्द्र का, बुद्धि पर बुध का, चित्त पर गुरुका, शुद्ध सात्विक अहंकार पर शनि का, झूठे अभिमान पर मंगल का,ज्ञान पर शुक्र का और मोक्ष पर राहु का अधिकार है। इसलिए चन्द्र का जीवके मन पर स्वामित्व मानना चाहिए। राजाना - प्राचीन ग्रंथकारों ने चन्द्रको राजा माना है। स्व. गुरुवर्य नवाथेजी के मत से यह प्रजा का कारक है।किन्तु मेरे मत से सूर्य राजा और चन्द्र रानी है यही विभाजन अच्छा है।चन्द्रः सितांगो युवा - यह शुभ्न वर्ण का और युवक है। प्रकाशकशीतकरः -यह प्रकाश देता है।
शुभःशशी-यह शुभ ग्रह है ऐसा माना गया है। किन्तु यह पापफल भी बहुत देता है और अपने स्थान का फल नष्ट करता है। क्षीण चन्द्र केपाप फल का वर्णन इस श्लोक में मिलता है।
शुक्लादिकानि दशकेऽहनि मध्यवीर्यशाली द्वितीय दश-केऽतिशुभप्रदौसौ। चन्द्रस्तृतीय दशके बलवर्जितस्तु सौम्येक्षणा-दिसहितो यदिशोभनः स्यात्॥
अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक चन्द्र मध्यम बलवान होता है। इस के बाद के दस दिन तक अति बलवान होता है इसलिए शुभ फलदेता है। अन्तिम दस दिनों में चन्द्र बलहीन होता है। बलहीन चन्द्र शुभग्रह सेयुक्त अथवा दृष्ट हो तो उसके फल अच्छे मिलते है। पहले दस दिनों मेंकुमार अवस्था होती है इसलिए कोई विशेष कार्य नही हो सकता। बीच केदस दिनों में तारुण्य और प्रौद़ता होती है इस लिए उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यकिए जाते हैं। अन्तिम दस दिनों में वृद्धता और मृत्यु की स्थिति होती है इसलिएकोई कार्य नही हो पाता। इस प्रकार दिनमान से चन्द्र के फल कहेगये हैं।
शिरसा चन्द्रः व्रजेत् - इस का उदय सिर की ओर से होता है।इस कल्पना का स्पष्टीकरण करना कठिन है। क्यों कि संसार में ९६ फीसदीमानवों का जन्म सिर की ही ओर से होता है इसलिए इस फलनिर्देश में कोईमहत्व नहीं रहता। कुंडली में लग्न में चन्द्र हो और लग्न की राशि का उदयशिरोभाग से हो रहा हो तो शायद इस फलादेश का कोई विशेष अनुभवमिल सकेगा।
सरीसृपाकारयुतः शशांकः - जिन्हें पांव नही होते जो जमीनपर घसरते हुए ही चलते हैं- ऐसे सांप आदि प्राणियों पर राहु का स्वामित्वहै। इन्हं चन्द्र के अधिकार में मानना गलत है। चन्द्र को द्विपाद ही माननाचाहिए।
जलाशयः चन्द्रः -चन्द्र जलस्वरुप है इसलिए कुए, तालाब,समुद्र आदि जलाशयों पर इसका स्वामित्व होता है।
विधुरब्दसप्ततिः - चन्द्र की आयु सत्तर वर्ष की है। यह मतठीक प्रतीत नही होता। ७० वें वर्ष तक वृद्धता के कारण मन की शक्ति नष्टहोती है उस समय कोई विशेष कार्य नही हो सकता। उस वर्ष पर शनि कास्वामित्व मानना योग्य होगा। चन्द्र का अधिकार तारुण्य और प्रौढावस्था पर है। आचार्य ने २४ से २६ वें वर्ष का काल कहा है।
चन्द्रः सितः - यह शुभ्र वर्ण का है। प्रश्न कुण्डली में नष्ट हुई
वस्तुओं के बारे में विचार करते समय इस वर्णन का उपयोग करना चाहिएचन्द्रः मणिः - बच्चो के कंठ में नजर लगने से बचने के लिएएक मणि बांधा जाता है इसे चन्द्रमणि कहते हैं।
देवता अम्बुः - यह जल स्वरूप है इसलिए चन्द्र की देवता भी
पानी ही कही गयी है। रत्नों में मोती और नए वस्त्र इनका विचार कारकप्रकरण में किया है।
दिशा वायव्या - देवताओं को वायव्य दिशा दि है इसलियेदेवताओं के अधिकार में जलाशय होते है इसी कारण प्रश्नविचार में औरनाडीग्रथों में चन्द्र की वायव्य दिशा कही गयी है। चन्द्र यदि जन्मकुण्डली मेंप्रबल हो तो वायव्य दिशा में उस व्यक्ति का भाग्योदय होता है। कोई बच्चाभाग गया हो अथवा कोई जानवर राह भुल गया हो अथवा चोरी हुई हो उससमय यदि लग्न में चन्द्र हो तो वायव्य दिशा में उनका पता चलता है।वास्तव में दिशा के फल की उपपत्ति बतलाना सम्भव नही है। ये फल तोपुरातन आचार्यें ने अर्तींद्रिय दिव्य ज्ञान से ही बतलाए हैं। उपपत्ति की दृष्टिसे पूर्व या पश्चिम ये चन्द्र की दिशाएं हो सकती है क्यों कि उसका उदयइन्हीं दिशाओं में होता है।
ऋतु - जातकपारिजात में चन्द्र की वर्षा ऋतु कही गयी है यहठीक है। कालिदास ने यहां शरद कतु कहा है वह ठीक प्रतीत नही होता।
क्रीडास्थान - नदी, तालाब अथवा समुद्र के तीर पर केक्रीडास्थानों पर चन्द्र का स्वामित्व होता है।
चन्द्र के प्रदेश -कल्याणवर्मा ने वनदेश शब्द से इसका वर्णन किया है। मेरे मत से बंगाल प्रदेश चन्द्र के स्वामित्व में है। जातकपारिजात मेंकहे हुए प्रदेशों का और ग्रहां का सम्बन्ध ठीक नहीं है। आचार्य नेबृहतूसंहिता में दिया हुआ वर्णन उचित है।
वर्ण-चन्द्र का वैश्य वर्ण कहा गया है।
गुण - शीतकिरणः सत्वप्रधानो ग्रहः। इस में सच्व गुण प्रधानहोता है इसका विवरण पहले हो चुका है।
तत्व - चन्द्र के अधिकार में किसी भी तत्त्व का वर्णन नहीमिलता यह आश्चर्यजनक है। मेरे ख्याल से जल तत्त्व पर चन्द्र काअधिकार है। शास्त्रोंमे यह त्त्व शुक्र के अधीन कहा गया है वह ठीक नहीप्रतीत होता।
कधिर - खून पर चन्द्र का स्वामित्व है। इसे कुछ विद्वानज्योतिषियों ने गलत माना है। किन्तु मेरे मत से खून से चन्द्र का विशेषसम्बन्ध है। कुण्डली में चन्द्र यदि मंगलद्वारा दुषित हो तो उस व्यक्ति कारक्त नियम से दुषित होता है। कुण्डली में चन्द्र क्षीण हो तो रक्ताभिसरणठीक नही होता। रक्त की निर्मिती पर अवश्य मंगल का स्वामित्व है। किन्तुनिर्माण हो जाने के बाद रक्त की अवस्थाएं चन्द्र की ही स्थिती के अनुसारहोती हैं।
रस -लवण अर्थात नमकीन (खट्टापन) पर चन्द्र का अधिकारहै। नमक का उत्पतिस्थान जो समुद्र वह भी चन्द्र के ही अधिकार में है।
काल-चन्द्र बहुत चंचल है। कभी एक जगह स्थिर नही रहताइसलिए क्षण यह इसका काल कहा गया है।
दृष्टि - समदृष्टि यह चन्द्र का विशेष है। नैसर्गिक कुण्डली मेंचतुर्थस्थान में कर्क राशि होती है जो चन्द्र का स्वगृह है। यहीं यह समदृष्टि बलवान होती है।
निशीन्दुः - चन्द्र रात के समय बलवान होता है इसका वर्णनपहले हुआ है।
गुरुणा निशाकरः - गुरु के द्वारा चन्द्र पराजित होता है। गुरु केसंयोग से चन्द्र के शुभ फल नष्ट होकर अशुभ फल मिलते हैं।
चन्द्र के बलवान होने का वर्णन अगले श्लोक में मिलता है -चन्द्रःकर्किणि गोपतौ निजजनद्रेष्काणहोरांशके।राश्यंते शुभवीक्षणे निशिसुखे याम्यायने वीर्यवान्॥इन्दु:सर्वकलाधरो यदि बली सर्वत्र सन्धिर्विना।सर्वव्योमचरेक्षितस्तु कुरुते भूपालयोगं नृणाम्॥
कर्क और वृषभ राशि में, सोमवार को, ट्रेष्क्राण और होराकुण्डली में स्वगृह में हो तो, राशि के अन्तिम भाग में, शुभ ग्रहों की दृष्टिमें, रात में, चतुर्थ स्थान में तथा दक्षिणायन में सांध्य छोड़कर अन्यत्र चन्द्रबलवान होता है। चन्द्र पर यदि सब ग्रहों की दृष्टि हो तो वह राजयोग होता है।
आचार्य ने बृहत्संहिता में चन्द्र किस समय कल्याणकारी होता हैइसका वर्णन अगले श्लोकों द्वारा किया है।
प्रालेयकुंदकुमुदस्फटिकावदातो। यतलादिवाद्रिसुतयापरिमृज्य चन्द्रः। उच्चैःकृतो निशि भविष्यति मे शिवाय। यो दृष्यतेसभवत जगत:शवययदकमदमृणलहगौरः तथ-नियमात् क्षयमेति वर्धते वा। अविकृतगरतिमंडलांशुयोगी भवतिनृणां विजयाय शीतरश्मिः॥२॥
बृहतसंहिता श्लोक ३०-३९ दैवज्ञ कामधेनु पान २७-२
अर्थात् बर्फ, कुंदपुष्प अथवा कुमुद या स्फटिक के समान शुभ्नचन्द्र जगत को आनंद देता है। तिथियों के नियमानुसार इसकी क्षयवृद्धि होतथा बीच में कोई विकार न हो तो वह सबका कल्याण करता है। पहलेश्लोक में राशि के अन्तिम भाग में चन्द्र बलवान कहा गया है। जैसे लेखककी ही कुण्डली में वृषभ राशि के दूसरे अंश में चन्द्र है अंश का वर्णनचारुबेलने अपने ग्रंथ मे - "8-20 ALarge figure 2 comes beforemy Vision" Denotes that he or she, born under thisdegree will live alone, isolated mentally; not in Sympathy with present state of things.
फिर भी चारुबेल का फलादेश पूरी तरह मिला है - इस अंश में उत्पन्न हुआ व्यक्ति एकाकी, असंतुष्ट और एकान्त प्रिय होता है।
रोग -पांडुदोषजलदोष कामिला-पीनसादिरमणीकृतामयैः।
कालिकासुरसुवासिनीगणैराकुलंच कुरुते तु चन्द्रमा।
पाण्डुरोग, पानी से उत्पन्न हुए रोग, कामिला, पीनस, स्त्रियों केसम्बन्ध से होनेवाले रोग तथा कालिका आदि देवियों से होनेवाली पीड़ा येबाधाएं चन्द्र के कारण होती हैं। इस फलादेश में चन्द्र को स्वतन्त्र मानकरवर्णन किया गया है। इसमें अन्य ग्रहों के योग भी देखने चाहिए।
जयदेव कवि-ने प्रायः बृहज्जातक का ही अनुकरण किया है।
इस में वैद्यनाथ के कहे हुए फलों का वर्णन पहले ही हो चुका है। अधिक इतना ही है की यहा चन्द्र अपरान्ह समय बलवान कहा गया है। यह ठीक भी है क्यों कि सायंकाल का समय रात के निकट ही होता है।
तपस्वी - इस विषय में पहले वर्णन हो चुका है।
मध्यमो वयः -वैद्यनाथ ने चन्द्र की आयु ७० वर्ष कही हैकिन्तु जयदेव के मत से यह मध्यम आयु का है। मेरे मत से २९ से ४८ वें वर्षतक की आयु पर चन्द्र का अधिकार होता है।
William Lily कहता है - She is a femine nocturnalplanet, cold, moist and phlegmatic. यह एक स्त्रीस्वभाव ग्रहहै। यह शीत, आई और श्लेश्मयुक्त है।
चन्द्र का मूल स्वरूप
कल्याणवर्मा - सौम्यः कान्तविलोचनो मधुरवागू गौरकृशांगो-युवा प्रांशुःसूक्ष्मनिकुंचितः सितकचः प्राज्ञो मृदुःसाल्विका। चारुर्वातक-फात्मकः प्रियसखो रक्तीकसारो घृणीवृद्धस्त्रीशु रतश्चलोऽतिसुभगः शुभ्राम्बरश्चन्द्रमाः।। यह शान्त होताहै। आंखे सुंदर होती हैं। वाणी मधुर होती है। वर्ण गोरा होता है। शरीर कृशतथा सदा तरुण प्रतीत होता है। उंचा होता है। इसके केश बारीक, घुंघरालेतथा काले होते हैं। यह ज्ञानी, कोमल तथा सात्विक होता है। वात अधवाकफ प्रकृति होती है। इसे प्रिय मित्र प्राप्त होते है। इसके शरीर में रक्त अच्छाहोता है। दूसरों के विषय में कुछ तिरस्कार होता है। वृद्ध स्त्रियों के साथरममाण होता है। चंचल, सुन्दर तथा शुभ्र वस्त्र पहननेवाला होता है।
इसका स्वभाव शान्त कहा है किन्तु यह दूसरों को उत्तेजित करताहै। आंखे सुन्दर, निष्याप, बडीं और हिरन जैसी तेजस्वी होती है। यह फलपुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में विशेष दिखाई देता है। इसकी वाणी मधुर स्त्रियोंके समान होती है। इसका शरीर कृश कहा है। किन्तु अनुभव से चन्द्र केस्वामित्व के व्यक्ति कृश और स्थूल दोनों प्रकार के होते हैं ऐसा प्रतीतहोता है। वर्ण गौर है - कभी कभी लम्न में चन्द्र होकर भी वर्ण बहुत कालादेखनें में आया है। किन्तु साधारण तौर पर ये व्यक्ति गोरे होते हैं। ये लोगसदा तरुण दिखाई देते हैं ४० वर्ष का प्रौढ भी २५ वर्षीय युवक जैसा प्रतीतहोता है। ये ज्ञानी होते हैं। मेरे विचार से इनमें व्यवहारज्ञान कम ही होता हैकिन्तु किसी एक विषय में इन्हें कुशलता प्राप्त होती है। इनका शरीरकोमल होता है यह फल देखने योग्य है। वात अथवा कफ प्रकृति के होते हैं।
चन्द्र स्वभावतः शीत है इसलिए कफ के रोग होना स्वाभाविक है किन्तुवात रोगों का विचार मेरे मत से गुरु की स्थिति से करना चाहिए क्योंकिउष्णता गुरुपर ही अवलम्बित है। यह सुन्दर, सात्विक और प्रिय मित्रों सेयुक्त होता है।
वैधयनाथ-संचारशीलों मृदुवाग् विवेकी शुभेक्षण शचा-रुतरः स्थिरांगः सदैव धीमांस्तनुवृत्तकायः कफिलात्माच सुधा-करःकृस्यात्।
यह प्रवासी, मधुरवाणी से युक्त, विवेकशील, सुंदर आंखों सेयुक्त, सुन्दर और सुदृढ़ शरीर का, बुद्धिमान, कुछ गोल आकार का तथावात अथवा कफ प्रकृति का होता है।
जयदेव-निशापतिर्वृत्तनु : सुनेत्र : कफानिलात्मा किलगौरवर्णः। प्राज्ञोऽतिलोलो मृदुवाग् घृणीच प्रियाप्रियोऽसौ खलुशोणितौजाः।
इसका शरीर वर्तुलाकार होता है, आंखें सुन्दर होती हैं, प्रकृतिकफ अथवा वात की होती है और वर्ण गोरा होता है। यह बुद्धिमान, बहुतचंचल, मित्रों को प्रिय, कुछ अहंकारी और बोलनेवाला होता है। इसकारक्त अच्छा होता है।
सर्वार्थचिन्तामणि-चन्द्र: सितांग :समगात्रयष्टिरवाग्मीपरिगविवेकयुक्तः। क्वचित् कृशः शीतलवाक्ययुक्तः सत्त्वाश्रयोवातकफानिलात्मा॥
पूर्वोक्त विवरण से इस में एक ही विशेषण अधिक है-इसकाशरीर सम होता है। अवयवों में विषमता नही होती। यह फल विशेषतःदेखने में आया है।
अन्य वर्णन-सोमश्च विद् वैश्यकुलप्रमुती। चन्द्र वैश्यवर्ण का है। चन्द्रस्य रक्तम्। रक्त पर चन्द्रका अधिकार है।वस्त्रकाठित्यम्। यह मोटे वस्त्र पहिनता है। नरपालमुख्यी। यह राजाके समान मुख्य होता है। धातु -धातुओं पर इसका स्वामित्व होता है।इसमें पहले दो वर्णन ठीक हैं। वस्त्र मोटे होना यह फल योग्य नही है- चन्द्रके स्वामित्व में महीन वस्त्र ही योग्य है। राजा के समान मुख्य-यह फल भीयोग्य नहीं क्योंकि चन्द्र को ग्रहमाला में रानी का स्थान दिया जाता है।धातुओं का स्वामित्व चन्द्र को कैसे मिला यह स्पष्ट नही होता।
कापोरेचर-Carporature - She generally presentsa fair stature. Whitely coloured, round face, grey eyes,and a little lowering; much hair both on the head, andface, and other parts, usually one eye a little larger thanthe other, short hands and fleshy; the whole bodyinclining to be fleshy, plump, Corpulent, andphlegmatic. इसका कद अच्छा और वर्ण गौर होता है। मुख वर्तुलाकारऔर आंखे काली होती है। सिर पर, मुख पर तथा शरीर के अन्य भागों परभी केश विपुल होते है। सामान्यतः एक आंख दुसरी से कुछ बडी होती है।हाथ छोटे किन्तु मांसल होते है। शरीर भी स्थूल और चौकोर आकार काहोता है। इस फल वर्णन में केश विपुल कहे है किन्तु चन्द्र का केशों से कोईसम्बन्ध नहीं है। एक आंख बड़ी होना यह फल यदि चन्द्र मिथुन राशि में होतो ही मिलता है-अन्य राशियों में नही मिलता।
विलियम लिली - यह चौकोर आकार का होता है। यह फलयोग्य नही है। इसका शरीर कृश किन्तु गठीला होता है।
डॉ. सिमोनाइट-Luna when well dginified, thenative has manners, a lover of sciences, a searcher anddelighter in novelties, naturally inclined to remove hishabitation, unsteadfast, caring for the present times,temorous, prodigal, and easily frightened, lovingpeace and to live free from the cares of life. When illdignified, the native is a vagabond, idle person, hatinglabour a drunkard, of no forecast, delighting to livebeggarly, carelessly, and discontented. कुंडली में चन्द्र यदिशुभ हो तो वह व्यक्ति व्यवहार में कुशल, शास्त्रीय विषयों में रुचिरखनेवाला होता है। नई नई चीजों में आनन्द लेने की तथा उनका संशोधनकरने की प्रवृत्ति होती है। निवासस्थान बदलने की स्वाभाविक इच्छा होतीहै। चंचल और सिर्फ वर्तमान कि ही चिन्ता करनेवाला होता है। डरपोकऔर खर्चीला होता है। शान्तिप्रिय और संसार की चिन्ताओं से मुक्त होनाचाहता है। चन्द्र यदि अशुभ हो तो वह व्यक्ति बदमाश, आलसी तथाशारीरिक काम करने का द्वेष करनेवाला, मदिरापान में रत, भिखारी जैसीरहनसहन में आनन्दित होनेवाला, असंतुष्ट और भविष्य की कोई चिंता नकरनेवाला होता है।
मेरे विचार-भारतीय आचार्यो ने जो स्वभाव वर्णन किया हैवह प्रायः ठीक है। सिर्फ वृद्ध स्त्री के साथ रममाण होना यह एक फलअनुभव में नही आता। चन्द्र का पूरा स्वभाव चौथे प्रकरण में विस्तार सेस्पष्ट किया है। विशेष इतना है कि चन्द्र के स्वामित्व के लोग घरबार में मग्नहोते हैं। पैसे के बारे में बहुत चिकित्सा करते है। आगे पैसो के कारण कोईबडी विपत्ति आयेगी इस विचार से सदा ही पैसे का संग्रह करने की प्रवृत्ति
होती है। इस विषय में ये सदा ही चिन्ता करते रहते है। कम मेहनता करके ज्यादा धन प्राप्त करने की विशेष इच्छा होती है। ये स्वभाव से आनन्दी,ललित साहित्य की रुचि होनेवाले, लोगों से कम मिलते जुलते, बहुतबोलने वाले होते है। इन्ही में काव्य, नाटक, उपन्यासों के लेखक भी होसकते है। कुछ स्वार्थी और दूसरों के सुखदुख के बारे में उदासीन होते हैं।
ज्योतिष : कुण्डली में चंद्रमा राशि भाव नक्षत्र सकारात्मक नकारात्म विवेचन
चंद्र प्रभावित जातक उन्हें कहेंगे जिनकी कुण्डली में चंद्रमा बहुत ही बलशाली स्थिति में बैठा हो। कर्क अथवा वृषभ लग्न में बैठा चंद्रमा जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है। कुण्डली में अन्य स्थानों पर भी अगर चंद्रमा दूसरे ग्रहों से बल प्राप्त कर पावरफुल स्थिति में हो तो वह जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है।
सामान्य तौर पर चंद्र प्रभावित जातक मानसिक रूप से दृढ़ किंतु संवेदनशील होते हैं। चंद्रमा पानी की तरह होता है, जिस प्रकार के ग्रह का उसे प्रभाव मिल रहा हो, वह वैसा ही होने लगता है। चंद्रमा के मूल स्वभाव में रचनात्मकता और उत्पादकता शामिल होती है। अब अगर चंद्रमा मंगल के प्रभाव में हो तो इस रचनात्मकता में एक सहज तेजी आ जाती है वहीं शुक्र के साथ हो तो एक लग्जरी का सेंस आता है, शनि के साथ हो तो नकारात्मकता आएगी और बुध के साथ हो तो गणनाओं में चतुर बना देगी। हालांकि बुध और चंद्र नैसर्गिक रूप से शत्रु हैं, ऐसे में गणनाओं की चतुरता अधिकांशत: नकारात्मक पक्ष लिए हुए होगी। कुल मिलाकर अकेला चंद्रमा केवल संवेदनशीलता और भावनाओं की प्रबलता ही दिखा सकता है, किसी दूसरे ग्रह का साथ मिलने पर स्वच्छ निर्मल जल में उस तत्व के गुण समाहित हो जाते हैं। यही कुण्डली में भावों में विचरण करते चंद्रमा के साथ भी होता है। बजाय चंद्रमा अपने स्वतंत्र फल देने के, भाव से संबंधित फल अधिक तीव्रता से देने लगता है।
अगर कुण्डली में चंद्रमा नकारात्मक परिणाम दे तो सामान्य तौर पर यह मति को भ्रष्ट कर देता है। इससे जातक अनिर्णय की स्थिति में फंस जाता है, मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है, झूठ बोलने की प्रवृत्ति बनने लगती है और अफवाहें उड़ाने लगता है। बहुधा ऐसे जातक एंजाइटी के शिकार भी हो जाते हैं।
चंद्रमा लग्न में
नकारात्मक हो तो जातक चिंता युक्त, स्त्री से अपमानित, स्त्री को पूर्ण तृप्ति न करने वाला, संतान की प्राप्ति विलंब से होती है, रोगी, मानसिक बीमारियों का रोगी, पागल होता है, जातक को डूबकर मरने का भय रहता है।
चंद्रमा द्वितीय में
नकारात्मक हो तो जातक के विद्या अध्ययन में बताती है, पैतृक धन का लाभ नहीं होता, धन का अधिक व्यय करता है, स्त्री की अल्पायु होती है, जातक मदिरापान नशीली वस्तुओं का व्यसनी होता है, पिता के लिए रोगकारक होता है।
चंद्रमा तृतीय में
नकारात्मक हो तो जातक मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है, भरम रोग से पीड़ित होता है, कई बार निद्रा में चलने की बीमारी भी होती है, यात्रा में हानि होती है, पिता की आयु होती है, भाई बहनों द्वारा अपमानित होता है, पड़ोसी तथा रिश्तेदारों से विरोध होता है।
चन्द्रमा चतुर्थ भाव में
नकारात्मक हो तो जातक पैतृक धन का नाश करता है, गृहस्थ जीवन दुखी होता है, स्त्री द्वारा विरोध झेलना पड़ता है, स्वयं माता का विरोधी होता है, वाहन से दुर्घटना का भय होता है, गृहस्थ जीवन के संबंध में चिंतित रहता है।
चन्द्रमा पंचम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक अस्थिर मन वाला, दुखी, माता से अपमानित होता है, जातक की संतान उसकी विरोधी होती है, विद्या में विघ्न पड़ता है, व्यापार में हानि होती है।
चंद्रमा छठे भाव में
नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, जातक को लकवा, गुर्दे का रोग, मूत्र रोग आदी होने की आशंका रहती है, कई बार आंत के रोग भी हो जाते हैं, जातक को पालतू पशु रखने तथा मुर्गीखाना खोलने पर हानि होती है, अधिकांश जीवन में कर्जदार बना रहता है, धन का व्यय अधिक करता है, माता से झगड़ा करते हैं, मानसिक रूप से विक्षिप्त रहता है, गैस तथा अतिसार रोगों की आशंका सर्वाधिक होती है। यहाँ चन्द्रमा शनि से दृष्ट अथवा शनि के साथ हो तो विवाह विलम्ब से होता है अथवा विवाह नहीं होता।
चन्द्रमा सप्तम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, स्त्री का मन अस्थिर होता है, दूसरों से ईर्ष्या रखने वाला होता है, माता से कलह करने वाला होता है, नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाला होता है, यहाँ चन्द्रमा पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो स्त्री की मृत्यु होती है और दूसरा विवाह करना पड़ता है।
चन्द्रमा अष्टम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक अल्पायु और माता के लिए अशुभ होता है, जातक परस्त्रीरत तथा गुप्त रोगों से ग्रस्त होता है, पर स्त्री पर धन नाश करने वाला होता है, अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।
चन्द्रमा नवम भाव में
नकारात्मक हो तो पिता की अल्पायु का योग होता है तथा माता के लिए रोगकारक होता है, विदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती।
चन्द्रमा दशम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक का मन अस्थिर रहता है, नौकरी तथा व्यापार बदलने में हानि उठाता है, पैतृक धन प्राप्त करने में अड़चनें आती है, स्त्री से कलह रहती है, माता की अल्पायु होती है, अगर चुनाव लड़े तो पराजय होती है, स्त्री पक्ष से धन का लाभ नहीं होता, जातक रोगी होता है।
चन्द्रमा एकादश भाव में
नकारात्मक परिणाम दे रहा हूँ तो सन्तान का सुख अल्प होता है, पुत्र संतति कम होती है, माता से कलह रहती है, नपुंसकता के रोग का भय होता है।
चन्द्रमा द्वादश भाव में
नकारात्मक हो तो जातक आंख का रोगी होता है, ससुराल का धन नाश करने वाला होता है, परस्त्रीरत होता है, गुप्त रोग का रोगी होता है, अपनी स्त्री के लिए रोगकारक और दुष्चरित्र होता है। विदेश भ्रमण में असफलता मिलती है तथा धन का नाश होता है।
चन्द्रमा विवेचन और उसके के रुष्ट होने के संकेत केमद्रुम दोष और उपाय -
मन और मानव जीवन को प्रभावित करता है चन्द्रमा
चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह हैं, उन सभी का व्यक्ति के जीवन पर विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। मानव ने जब से काल के चिंतन का आरंभ किया, उसी समय से चन्द्रमा उसके लिए अपने घटने-बढ़ने की प्रक्रिया के कारण प्रकृति का अखंड और निर्विवाद पंचांग रहा है। संसार के सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में प्रत्येक काल में चन्द्रमा की तिथियों के अनुसार ही धार्मिक विधि रचने का उल्लेख पाया जाता है।
व्यक्ति के चरित्र के सूक्ष्म रूप, विशिष्ट गुण, उसकी प्रतिभा, भावनाओं, प्रवृत्तियों, योग्यताओं तथा भावनात्मक प्रवृत्ति आदि का ज्ञान जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति से मालूम हो जाता है।
समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे का मूल कारण चन्द्रमा की स्थिति है। पूर्णिमा का प्रभाव पशु-पक्षियों और रेंगने वाले कीड़ों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि उन्मादग्रस्त मनुष्यों पर भी पड़ता है। वे सभी अन्य दिनों की अपेक्षा पूर्णिमा के दिन ही अधिक उत्तेजित और अव्यवस्थित दिखाई देते हैं। संसार के जितने की ऊष्ण प्रदेश हैं, वहां को लोगों को पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की चांदनी में सोने पर विचित्र स्वप्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार के विचित्र स्वप्न अन्य किसी दिन में दिखाई नहीं देते। यही नहीं, स्त्रियों के मासिक धर्म और चंद्रमा के 28 दिवस चक्र के बीच सीधा संबंध है।
चंद्रमा के घटने-बढ़ने का व्यक्ति के मस्तिष्क के साथ परंपरागत संबंध होता है। शुक्ल पक्ष में मनुष्य का मस्तिष्क जागरूक होता है। इन दिनों उसे नींद भी अच्छी आती है। हम अपने जीवन में चंद्रमा के प्रभाव का स्पष्ट अनुभव करते हैं। चंद्रमा का सृष्टि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण प्रकृति, भले ही वह जड़ हो या चेतन, उसमें धड़कन होती है, स्पंदन होता है और वह नित्य परिवर्तनशील है।
चन्द्रमा का अपनी तिथियों के अनुसार विश्व के जड़ और चेतन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जो मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने जाते हैं, वे चंद्रमा के इस प्रभाव से भलीभांति परिचित होते हैं।
चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। स्त्रियों में स्थित कामभावना चंद्रमा की कलाओं के उपचय-अपचय के अनुसार विभिन्न अंगों में तिथिक्रम से केंद्रित रहा करती है। कामशास्त्र इस संबंध में सलाह देता है कि तिथि के अनुसार स्त्री के संबंधित अंग को सहलाने से वह जल्दी उत्तेजित हो जाते है
चंद्रमा सुख स्थान का और माता का कारक होता है। यह मन की संकल्प-विकल्पमूलक कल्पनाशक्ति का परिचायक होता है। शारीरिक स्थिति में यह जल ग्रह होने के कारण न्यूमोनिया तथा कफजनित रोग सर्दी-जुकाम आदि का सूचक रहता है। जन्म कुंडली में जिन पर चंद्रमा निर्बल रहता है, वे प्राय: शीतजनित रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त प्रवाह और हृदय इसके अधिकृत क्षेत्र हैं, किंतु अन्य ग्रह के साथ अशुभ युति करने पर ही यह रक्तचाप, हृदय रोग आदि दिया करता है।
चंद्रमा द्विस्वभाव रहता है अर्थात अकेला ही यह पाप और शुभ बन जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण प्रकाशमान रहने के कारण यह बली रहता है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी माना जाता है। चंद्रमा कर्क राशि में उच्च का एवं वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। चंद्रमा उच्च राशि का होने पर मिष्ठान्न भोजी और अलंकार प्रिय बनाता है तथा इनके प्राप्त होने के योग भी बनाता है। मूल त्रिकोणी होने पर यह धनी और सुखी भी करता है। चंद्रमा नीच राशिगत होने पर धर्म, बुद्धि का ह्रास करता है तथा दुरात्मा व दुखी बनाता है। शुक्र ग्रही होने पर यह माता के स्नेह और सुख से वंचित करता है।
ज्योतिष एवं चन्द्रमा का सम्बन्ध,महत्त्व एवं प्रभाव.तथा उपाय
भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हों, उसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है। भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैं, वह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है।
पूर्णिमा का चंद्रमा मन को बहुत आनंद देता है। इसकी तुलना बिजली की सजावट से नहीं हो सकती। चंद्रमा की इसी विशेषता के कारण स्नेह के लिए उसे देखा जाता है। स्नेह के बारे में सोचते ही मां का चेहरा सामने आ जाता है, इसलिए चंद्रमा को मातृकारक कहा गया है, इसीलिए बच्चे उसे मामा कहते हैं। भूखा बच्चा जब मां की गोद में बैठकर स्तनपान करता है तब मां के मन से जो स्नेह भावना उभरती है, उसी स्नेह का कारक ग्रह है चंद्रमा। चंद्रमा सबसे गति वाला ग्रह है और उसकी गति में सर्वदा परिवर्तन होता है, इसलिए जहां गति से जुड़ी बातें आ जायं, वहां चंद्रमा महत्वपूर्ण हो जाता है। धरती पर सबसे अधिक गति होती है मन की। पल भर में गति बदलने वाला मन चंद्रमा से भी गतिशील है, अत: चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। मन को बेहद खुशी या गम हो तो आंखों से आंसू आ जाते हैं, अत: पानी, दूध, शरबत जैसी बहने वाली चीजें चंद्रमा के अधिकार में होती हैं। पानी के साथ पानी से जुड़े पौधे, मछली, कुएं, तालाब, सागर आदि का भी कारक ग्रह चंद्रमा है।
शास्त्रों के अनुसार भी चन्द्रमा मन का कारक है। चन्द्रमा दिल का स्वामी है। चांदी की तरह चमकती रात चन्द्रमा का विस्तार राज्य है। इसका कार्य सोने चांदी का खजाना शिक्षा और समृद्घि व्यापार है। चन्द्रमा के घर शत्रु ग्रह भी बैठे तो अपने फल खराब नहीं करता। प्रकृति की हलचल में चंद्र के प्रभाव विशेष होते हैं।
चन्द्रमा एवं विश्व—–
चन्द्रमा धरती का सबसे निकटतम ग्रह है. इसमें प्रबल चुम्बकीय शक्ति है. यही कारण है क़ि समुद्र के जल को यह बहुत ही ऊपर तक खींच देता है. और जब घूमते हुए धरती से कुछ दूर चला जाता है तो यही जल वापस पुनः समुद्र में बहुत भयानक गति से वापस आता है. जिसके कारण समुद्र में ज्वार भाटा एवं तूफ़ान आदि आते है. जिस तरह एक साधारण चुम्बक के दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति का केंद्र होता है. उसी प्रकार इसके भी दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति बहुत ज्यादा होती है. इसका आकार पूर्णिमा को छोड़ कर शेष दिनों में नाल चुम्बक के आकार का होता है. किन्तु पूर्णिमा के दिन जब इसका आकार पूरा गोल होता है, उस समय में इसमें भयानक आकर्षण शक्ति होती है. किन्तु यह शक्ति इसके चारो और की परिधि पर होने के कारण भयावह नहीं होती है. इसके विपरीत यह द्वितीया के दिन जब बिलकुल ही पतला होता है, बहुत ही हानि कारक होता है. कारण यह है क़ि इस दिन यह धरती से दूर होता है. तथा धरती के पदार्थो को बहुत दूर तक खींच देता है. और जब छोड़ता है तब बहुत ही ऊंचाई से उन पदार्थो के गिरने के कारण धन जन की बहुत हानि होती है. आप लोगो ने ध्यान दिया होगा क़ि अभी भी ग्रामीण इलाको में द्वितीया के चन्द्रमा को देखने की तथा उसे प्रणाम करने की होड़ या उत्सुकता लगी रहती है. और यह मान्यता है क़ि कम से कम हाथ में या शरीर के किसी न किसी हिस्से में सोने का कोई आभूषण हो तो और भी शुभ होता है. सोने की चमक दार सतह चन्द्रमा की किरणों को परावर्तित कर देती है. तथा उसकी परम लाभकारी ऊर्जा को शरीर में अवशोषित कर लेती है. परावर्तित करने की क्षमता तो दर्पण में ज्यादा होती है. किन्तु दर्पण विद्युत् या ऊष्मा का कुचालक होता है. इसलिए उससे केवल प्रकाश का परावर्तन ही हो पाता है. किन्तु चन्द्रमा की किरणों की लाभ कारी ऊर्जा शरीर को नहीं मिल पाती. इसीलिए शरीर के किसी भी अँग में सोने के आभूषण की उपस्थिति अनिवार्य बताई गयी है.
चन्द्रमा को सुधांशु भी कहा जाता है. पौराणिक मतानुसार चन्द्रमा पर अमृत पाया जाता है. इसके अलावा इसकी सतह पर अनेक अमोघ औषधियों की उपस्थिति भी है. संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए कहा गया है क़ि
“यातीति एकतो अस्त शिखरं पतिरोषधीनाम आविषकृतो अरुण पुरः सरः एकतो अर्कः.
तेजो द्वयस्य युगपद व्यसनोदयाभ्याम लोको नियम्यदिव आत्म दशांतरेषु.”
अर्थात एक तरफ तो औषधियों के एक मात्र स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल पर जा रहे है. तथा दूसरी तरफ उदयाचल पर अरुण को आगे किये हुए सूर्य उदय हो रहे है. इस प्रकार ये दोनों अपनी अपनी इस अस्त एवं उदय की स्थिति से यह समस्त विश्व को बता रहे है क़ि यह संसार का उत्थान एवं पतन चक्र है.
शुक्ल पक्ष की द्वितीया लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा निरंतर धरती के नज़दीक आता चला जाता है. तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावश्या तक चन्द्रमा धरती से दूर चलता जाता है. चन्द्रमा ज्यो ज्यो धरती से दूर चलता जाता है. यह पतला होता चला जाता है. उस समय इसके दोनों नुकीले हिस्से बहुत ही शक्ति शाली चुम्बक की तरह धरती की समस्त वस्तुओ को खींचता चला जाता है. संभवतः इसीलिए कृष्ण पक्ष और उसमें भी रात के समय और उसमें भी पाप राशि एवं लग्न में जन्म लेना थोड़ा अशुभ माना गया है.
चन्द्रमा के घर घर अर्थात कर्क राशि में होते हुए अपने घर अर्थात सिंह राशि में विश्राम करते हुए दुबारा फिर से धरती से दूर जाने लगेगा तो वर्षा शुरू हो जायेगी. क्योकि जो भाप अंतरिक्ष में एकत्र हुआ है, सूर्य के दूर जाते ही ठंडा होकर धरती पर गिरना शुरू हो जाएगा. कहा भी गया है क़ि 14 जनवरी या मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है. दिन बड़ा होगा तो ज्यादा देर तक सूर्य की किरणे धरती के ऱस को अवशोषित करेगी, और ज्यादा भाप आकाश में जाएगा.
यदि किसी की कुंडली में पांचवे भाव में सूर्य हो तथा चौथे भाव में चन्द्रमा हो और ये दोनों मीन से लेकर सिंह राशि के मध्य ही हो तो वह बालक कुशाग्र बुद्धि, उच्च संस्कार से उक्त संतान एवं देश विदेश में ख्याति अर्जित करने वाला होगा. कारण यह है क़ि ऐसी अवस्था में मष्तिष्क के परासवी द्रव्यों का सघनी करण एवं शोधन दोनों ही सूक्षमता एवं गहनता से होता रहेगा. क्योकि जितने द्रव्य चन्द्रमा के द्वारा उद्वेलित होगे, सूर्य के द्वारा उतने का सघनी करण एवं शोधन होता चला जाएगा. इसके विपरीत यदि सूर्य तुला राशि में हो तथा चन्द्रमा मीन में हो तो ऐसी अवस्था में इनकी चौथे भाव की उपस्थिति माता पिता एवं धन संपदा के लिए हानि कारक होगी. कारण यह है क़ि न तो चन्द्रमा का प्रभाव मष्तिष्क पर पडेगा और न तो सूर्य के द्वारा इसका कोई शोधन या सघनीकरण होगा. क्योकि चंद्रामा सूर्य से बहुत ही दूर जा चुका होगा.
चन्द्रमा से ही मनुष्य का मन और समुद्र से उठने वाली लहरे दोनों का निर्धारण होता है। माता और चंद्र का संबंध भी गहरा होता है। मूत्र संबंधी रोग, दिमागी खराबी, हाईपर टेंशन, हार्ट अटैक ये सभी चन्द्रमा से संबंधित रोग है।
वैसे तो चन्द्रमा को सुख-शांति का कारक माना जाता है…लेकिन यही चन्द्रमा जब उग्र रूप धारण कर ले तो प्रलयंकर स्वरूप दिखता है। तंत्र ज्योतिष में तो ये कहावत है कि चन्द्रमा का पृथ्वी से ऐसा नाता है कि मानो मां-बेटे का संबंध हो, जैसे बच्चे को देख कर मां के दिल में हलचल होने लगती है, वैसे ही चन्द्रमा को देख कर पृथ्वी पर हलचल होने लगती है, चन्द्रमा जिसकी सुन्दरता से मुग्ध हो कवि रसीली कविताओं और गीतों का सृजन करते हैं वहीँ भारतीय तंत्र शास्त्र इसे शक्तियां अर्जित करने का समय मानता है।
आकाश में पूरा चांद निकलते ही कई तांत्रिक सिद्घियां प्राप्त करने में जुट जाते हैं। चन्द्रमा प्राकृतिक तौर पर बहुत सूक्ष्म प्रभाव डालता है जिसे साधारण तौर से नहीं आंका जा सकता लेकिन कई बार ये प्रभाव बहुत बढ जाता है जिसके कई कारण हो सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र इसके संबंध में कहता है कि चन्द्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर भूकंप, समुद्री आंधियां, तूफानी हवाएं, अति वर्षा, भूस्खलन आदि लाता हैं। रात को चमकता पूरा चांद मानव सहित जीव-जंतुओं पर भी गहरा असर डालता है।
चन्द्रमा एक शीत और नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में मुख्य रूप से माता तथा मन के कारक माने जाते हैं और क्योंकि माता तथा मन दोनों ही किसी भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व रखते हैं, इसलिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्त्वपूर्ण होती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियों, जन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों, परा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, होटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों, सागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं।
किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चन्द्रमा की स्थिति अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चन्द्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चन्द्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चन्द्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चन्द्रमा की अपनी राशि है। चन्द्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदु, संवेदनशील, भावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐशवर्य प्राप्त हो जाते हैं।
शरीर के हिस्से——
चंद्रमा का मन पर प्रभाव होता है। सीना, बहती वस्तुओं का कारक ग्रह होने से शरीर में स्थित द्रव्य जैसे रक्त, मूत्र, पाचक रस, पाचन क्रिया पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। रात में प्राकृतिक रोशनी चंद्रमा से ही मिलती है इसलिए दृष्टि व आंख चंद्रमा के अधिकार में है। पुरुषों की बांयी तथा स्त्रियों की दायीं आंख तथा वक्षस्थल पर चंद्रमा का प्रभाव होता है।
गुण——
चंद्रमा की रोशनी शीतल है इसलिए शीतलता, ठंडक, पानी से जुड़ा हुआ, हवा में स्थित भांप, गति में बदलाव, सैर की चाह इत्यादि चंद्रमा का गुण धर्म है। चंद्रमा की कर्क राशि कुण्डली में (कालपुरुष की गणना में) चतुर्थ स्थान पर है। यह चतुर्थ स्थान भवन, भूमि, मातृभूमि को दर्शाता है, इसलिए भूमि, भवन, देशप्रेम की भावना का भी विचार चंद्रमा से किया जाता है।
बीमारियां——
चंद्रमा का मन पर प्रभाव है। इसलिए मन के रोग, अजीब व्यवहार, चिड़चिड़ापन, उन्माद की बीमारियां आदि चंद्रमा से देखी जाती हैं। पाचन की शिकायतें, बहती वस्तुओं पर अधिकार जैसे खांसी, जुकाम, ब्राकायटीस, हाइड्रोशील, कफ से जुड़ी बीमारियां, दृष्टि दोष चंद्रमा से देखे जाते हैं।
कारोबार—–
चंद्रमा जल से जुड़ा है इसलिए सिंचाई, जल विभाग, मछली, नौसेना, मोती आदि का कारोबार इससे देखा जाता है। चूंकि चंद्रमा बहती वस्तुओं से संबंधित है इसलिए कैरोसिन, पेट्रोल के कारोबार पर इसका नियंत्रण है। स्नेह का कारक ग्रह होने से फूल, नर्सरी व रसों से जुड़ा कारोबार इसके अधिकार क्षेत्र में आता है।
उत्पाद—–
चंद्रमा तेज गति वाला ग्रह है इसलिए जल्दी बढ़ने वाली सब्जियां, रसदार फल, गन्ना, शकरकंद, केसर और मक्का इसके उत्पाद हैं। चंद्रमा रंगों का भी कारक ग्रह है इसलिए निकिल, चांदी, मोती, कपूर, मत्स्य निर्माण, सिल्वर प्लेटेड मोती जैसे वस्तुएं बनाने का कारोबार चंद्रमा के अधिकार में है।
स्थान—–
शीतलता का कारक ग्रह होने से हिल स्टेशन, पानी से जुड़े स्थान, टंकियां, कुएं, हरे पेड़ों से सजे जंगल, दूध से जुड़ा स्थान, गाय-भैंसों का तबेला, फ्रिज, पीने का पानी रखने का स्थान, हैंडपंप आदि को चंद्रमा का स्थान माना जाता है।
जानवर व पंक्षी—–
छोटे पालतू जानवर, कुत्ता, बिल्ली, सफेद चूहे, बत्तख, कछुआ, केकड़ा, मछली के शरीर पर चंद्रमा का अधिकार होता है। चंद्रमा रस निर्माण का कारक ग्रह है इसलिए रसदार फल, गन्ना, फूल-गोभी, ककड़ी, खीरा, व जल में पनपने वाली सब्जियों पर चंद्रमा का अधिकार है।
चन्द्रमा मनुष्य के शरीर में कफ प्रवृति तथा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शरीर के अंदर द्रव्यों की मात्रा, बल तथा बहाव को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्य से अधिक वजनी हो सकते हैं जिसका कारण मुख्य तौर पर चन्द्रमा का जल तत्व पर नियंत्रण होना ही होता है जिसके कारण ऐसे जातकों में सामान्य से अधिक निद्रा लेने की प्रवृति बन जाती है तथा कुछेक जातकों को काम कम करने की आदत होने से या अवसर ही कम मिलने के कारण भी उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे जातकों को आम तौर पर कफ तथा शरीर के द्रव्यों से संबंधित रोग या मानसिक परेशानियों से संबंधित रोग ही लगते हैं।
कुंडली में चन्द्रमा के बलहीन होने पर अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर दूषित होने पर जातक की मानसिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उसे मिलने वाली सुख-सुविधाओं में भी कमी आ जाती है। चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होकर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष और अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण भी चन्द्रमा बलहीन हो जाते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु तथा केतु का प्रबल प्रभाव चन्द्रमा को बुरी तरह से दूषित कर सकता है तथा कुंडली धारक को मानसिक रोगों से पीड़ित भी कर सकता है। चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को अनिद्रा तथा बेचैनी जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है जिसके कारण जातक को नींद आने में बहुत कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की बलहीनता अथवा चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार के जातकों को उनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों से संबंधित समस्याएं आ सकती हैं।
गोचर और चन्द्रमा—
व्यक्ति के जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में होते हैं, लग्न निकालकर कुंडली में उस राशि में लिखे जाते हैं। ग्रहों की गति के आकार पर राशि परिवर्तन की अवधि होती है। सूर्य की गति स्थिर अर्थात् एक अंश प्रतिदिन के हिसाब से 30 दिवस में राशि परिवर्तन कर लेता है। चंद्रमा की गति काफी तीव्र होने से राशि परिवर्तन सवा दो दिन में कर लेता है।समाचार पत्रों में जो दैनिक भविष्यफल दिया जाता है, उसके अंत में आमतौर पर लिखा होता है, गोचर देखें। आम व्यक्ति गोचर समझता नहीं है। ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण को गोचर कहते हैं। पाश्चात्य देशों में लग्न एवं सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर गोचर फलादेश तैयार करते हैं, लेकिन हमारे यहां चंद्रमा जिस राशि में होता है, उसे लग्न मानकर गोचर फलकिया जाता है।
कल्याण शकट योग—
वैद्यनाथ दीक्षित के अनुसार कल्याण शकट योग का निर्माण तभी होता है जब गुरू से चन्द्रमा 6 या आठ भाव में हो। इस योग का केवल एक ही अपवाद है कि यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो यह योग भंग हो जाता है।
शषष्टमा गताश्चन्द्र सूर्य राज पुरोहित: केन्द्र दान्य गतो लग्नाद्योग: शकट समग्नित:।। परिणामों पर विचार करते हैं तो—
अपि राजा कुले जातो निश्व शकट योगज:। क्लेश यशवस नित्यम संतोप्त निरूप विप्रय:।।
अर्थ—चाहे कोई व्यक्ति राज परिवार में क्यों नहीं जन्मे, इस योग वाले को निर्धनता, दिन-प्रतिदिन दु:ख-कष्ट और अन्य राजाओं के क्रोध का भाजन बनना प़डता है।
मंत्रेश्वर, फलदीपिकाकार के अनुसार, जीवन्त्यश्तरी समष्टे शशिनितु शकट:, केन्द्रगे नास्ते लग्नथ:।।
जब बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में चन्द्र हो तो शकट योग बनता है परन्तु यदि चन्द्र केन्द्र में हो तो शकट योग भंग हो जाता है।
क्वचित क्वचित भाग्य परिचयत: सन् पुन: सर्वा मुपैते भाग्य:,
लोके प्रस्तीधो परिहर्य मन्त: सल्यम प्रपन्न: शकटे ति दु:खी:।।
इस शकट योग में जन्मा जातक प्राय: भाग्यहीन होता है अथवा भाग्यहीन हो जाता है और जीवन में खोए हुए को पुन: पा भी सकता है और प्रतिष्ठा आदि में एक सामान्य व्यक्ति होता है और इस दुनिया में उसका कोई महत्व नहीं होता है। वह नि:स्संदेह भारी मानसिक वेदना सहता है और जीवन में दु:खी ही रह जाता है। दूसरे विद्वानों के विचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो यह देखते हैं कि—
यदि चन्द्र अपनी उच्चा राशि में हो, स्वग्रही हो अथवा बृहस्पति के भावों में हो और चन्द्रमा बृहस्पति से छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो यह शकट योग का अपवाद बन जाता है। ऎसी स्थिति में शकट योग ही भंग नहीं होता अपितु उसके दुष्परिणाम भी आते हैं परन्तु यही योग जातक को मुकुट योग देकर ऊंचाइयों पर भी पहुंचा देता है।
यदि चन्द्रमा बृहस्पति से छठे-आठवें भाव में हो परन्तु वह मंगल से दृष्ट हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
यदि राहु-चन्द्र की युति हो अथवा राहु उन्हें देखें तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पूर्ण चन्द्र स्थित हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
यदि षड्बल में बृहस्पति चन्द्र से बली हों तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
यदि चन्द्र बृहस्पति से छठे आठवें भाव में स्थित होकर द्वितीय भाव में बैठे तो शकट योग भंग हो जाता है और व्यक्ति धनी होता है। ऎसी ग्रह स्थिति मिथुन लग्न वाले जातकों की ही होती है। चन्द्र से छठे भाव में स्थित बृहस्पति से हंस योग का निर्माण होता है क्योंकि वे निज भाव में होंगे जो सप्तमेश और दशमेश का लग्न से केन्द्र स्थान होगा, चन्द्रमा से अष्टम भाव में स्थित होने पर जातक धनवान नहीं बन सकता है। सूर्य नवम भाव में स्थित होकर गुरू से युति करें और द्वितीय भाव में चन्द्रमा पर उनकी पूर्ण रश्मियां प़डें तो जातक प्रचुर धन का स्वामी हो सकता है परन्तु ऎसी स्थिति में गुरू अस्तंगत दोष से मुक्त हों अथवा दुष्प्रभाव में नहीं हों।
द्वितीय भाव में स्थित उच्चा के गुरू से अष्टम भाव में चन्द्र की स्थिति शुभ नहीं होती है और ऎसे जातक संभवत: 40 वर्ष की आयु होते-होते सब कुछ गंवा देते हैं परन्तु यह बाद में आने वाली दशाओं पर निर्भर करता है कि वह अपना खोया धन और सम्मान पुन: प्राप्त कर लें। माना कोई जातक शनि महादशा में हो और 40 वर्ष की आयु का हो चुका है तो वह बृहस्पति की दशा में सब कुछ गंवा देगा और शनि की अंतर्दशा में पुन: प्राप्त कर लेगा। यदि शनि उनकी कुंडली में शुभ स्थिति में हो। तुला और मीन लग्न के जातकों का शनि शुभ स्थिति में होता है। वृश्चिक में भी शनि की स्थिति ठीक होती है। बृहस्पति से द्वादश भाव में स्थित चन्द्रमा अनफा योग का सृजन करते हैं। द्वितीय भाव के स्वामी लग्नस्थ होकर चन्द्र या बृहस्पति की अन्तर्दशा में किसी जातक को बर्बाद नहीं करते। बहुत सी कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद अब मुझे यह विश्वास हो गया है कि शकट योग के कुछ भी परिणाम होते हों परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि जीवन में बुरे दिन सदा नहीं रहते। जीवन परिवर्तनशील है। बुरा समय जीवन में परीक्षा लेता है और इस परीक्षा एवं कसौटी के लिए शकट योग एक महत्वपूर्ण स्थिति है। योग जीवन में बहुत लंबे समय तक फलीभूत नहीं होते हैं। कुछ समय बाद ये योग स्वत: विलीन होने लगते हैं। यहां मंत्रेश्वर महाराज हमें आशा दिलाते हैं कि रूठा हुआ भाग्य पुन: मनाया जा सकता है, खोई हुई प्रतिष्ठा और धन पुन: अर्जित किए जा सकते हैं। एक साधारण एवं गरीब व्यक्ति भी मानसिक रूप से बहुत प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो सकता है अथवा वही व्यक्ति बहुत अधिक दु:खी, पीç़डत और कष्ट से भरा जीवन व्यतीत करता है। ये सभी परिस्थितियां विभिन्न प्रकार के योगायोग, शकट योगादि के कारण बनती हैं और कई बार इनके अपवाद भी पाए जाते हैं।
चन्द्र ग्रह शांति के उपाय—–
क्या दान करें..???
चन्द्रमा के नीच अथवा मंद होने पर शंख का दान करना उत्तम होता है. इसके अलावा सफेद वस्त्र, चांदी, चावल, भात एवं दूध का दान भी पीड़ित चन्द्रमा वाले व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है. जल दान अर्थात प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना से भी चन्द्रमा की विपरीत दशा में सुधार होता है. अगर आपका चन्द्रमा पीड़ित है तो आपको चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न दान करना चाहिए. चन्दमा से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करते समय ध्यान रखें कि दिन सोमवार हो और संध्या काल हो. ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा से सम्बन्धित वस्तुओं के दान के लिए महिलाओं को सुपात्र बताया गया है अत: दान किसी महिला को दें. आपका चन्द्रमा कमज़ोर है तो आपको सोमवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गूंथा हुआ आटा खिलाना चाहिए तथा कौए को भात और चीनी मिलाकर देना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को दूध में बना हुआ खीर खिलाना चाहिए. सेवा धर्म से भी चन्द्रमा की दशा में सुधार संभव है. सेवा धर्म से आप चन्द्रमा की दशा में सुधार करना चाहते है तो इसके लिए आपको माता और माता समान महिला एवं वृद्ध महिलाओं की सेवा करनी चाहिए.
जन्म कुंडली में चंद्र ग्रह यदि अशुभ कारक हो तो निम्न लिखित मन्त्रों का जप करने से चंद्र ग्रह की शांति हो जाती है।
वैदिक मंत्र– ॐइमं देवा असपत्न℧ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना ℧ राजा।
पुराणोक्त मंत्र- ॐ दधिशंख, तुषाराम्भं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।नमामि शशिनं सोमं शंभोः मुकुट भूषणम्।।
स्नान तथा दान काल में यह मंत्र का उच्चारण लाभप्रद होता है।
तंत्रोक्त मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।
चन्द्रमा के जप की संख्या 11000 है।
चन्द्र गायत्री मंत्र- ॐ अमृतांगाय विद्महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्।
अर्घ्य मंत्र- ॐ सों सोमाय नमः।
चन्द्र रत्न- चन्द्र ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु मोती रत्न धारण किया जाता है।
औषधि स्नान – चन्द्र ग्रह की शांति के लिए पंचगव्य, बेल गिरी, गजमद, शंख, सिप्पी, श्वेत चंदन, स्फटिक से स्नान करना चंद्रमा जनित अनिष्ट प्रभावों को कम करता है। भगवान शिव का पूजन सोमवार के दिन करना तथा पूर्ण चन्द्र के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करने से चन्द्र ग्रह की शांति हो जाती है।
चन्द्र यंत्र- चन्द्रमा ग्रह की शान्ति हेतु चन्द्र होरा में चांदी के पत्र में चन्द्र यंत्र खुदवाकर या अष्टगन्ध से भोजपत्र पर लिखकर उसकी विधिवत, पूजन कर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए। अन्य उपाय- सोमवार का व्रत रखकर चावल सफेद वस्त्र, आदि सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए। सोमवार को प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शंकर की मूर्ति पर जल तथा दूध चढाना चाहिए।
कुछ मुख्य अन्य उपाय/टोटके निम्न है-
व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए। रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।
सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पीना चाहिए।
सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
क्या न करें..???
ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को प्रतिदिन दूध नहीं पीना चाहिए. श्वेत वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए. सुगंध नहीं लगाना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिएल
वैसे तो चन्द्र देव का स्वभाव स्वभाव बहुत शांत और ठंडा होता है और यही वजह है कि वो हम सभी को शीतलता प्रदान करते है किन्तु जब वे गुस्से में आते है तो उसके परिणाम बहुत भयंकर और विनाशकारी हो सकते है. इसलिए कभी भी चन्द्र देव को कुपित ना होने दें और अगर वे कभी आपसे रुष्ट हो भी जाएँ तो आप तुरंत कुछ उपायों को अपनाकर उन्हें जल्दी से प्रसन्न कर लें. आज हम चन्द्र देव से जुडी कुछ ऐसी बातें बताने वाले है जिन्हें जानकार आप पता लगा सकते हो कि चन्द्र देव आपसे रुष्ट है या नहीं और अगर है तो उन्हें किस तरह मनाया जा सकता है.
कुपित चन्द्रमा के संकेत
1. मानसिक परेशानी : चंद्रमा के रुष्ट होते ही जो पहला संकेत सामने आता है वो है मानसिक चिंता व परेशानी, ऐसे में जातक खुद को फंसा फंसा महसूस करता है, उसे समझ नहीं आता कि वो अपनी समस्याओं से कैसे बाहर निकलें.
2. माता से दूर होना : जातक की माता भी उससे रुष्ट हो जाती है और वो अपनी माँ के सुख की कमी महसूस करता है. कहने का अर्थ ये है कि उसके और उसकी माता के बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहता.
3. बायीं आँख में कमजोरी : अगर किसी व्यक्ति की बायीं आँख अचानक कमजोर हो जाती है तो उन्हें समझ जाना चाहियें कि उनकी कुंडली में चन्द्रमा रुष्ट हो चुके है.
4. आँखों के पास कालापन : यहीं नहीं जातक की आँखों के पास कालापन भी दिखने लगता है जो उसके बुरे समय और थकान को दर्शाता है.
5. छाती में मलगम जमना : सुनने में तो ये आपको सामान्य सा लक्षण लगता है किन्तु जब अगर आप बाकी संकेतों के साथ इसे देखा जाए तो ये पुष्टि करता है कि हाँ सच में चन्द्रमा कुपित हो चुके है. यहीं नहीं उन्हें अन्य वात रोग भी अपना शिकार बना लेते है.
6. पुराने दिनों का स्मरण : क्योकि चन्द्रमा के गुस्सा होने पर जातक का बुरा समय आरम्भ हो जाता है इसलिए उसे बार बार अपने पुराने दिन स्मरण होते रहते है.
7. अधिक नींद आना : ऐसे में जातक खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से इतना थका लेता है कि उसे नींद आने लग जाती है और वो बिस्तर पर पड़ा रहता है.
8. मासिक धर्म में अनियमितता : अगर किसी महिला पर चन्द्र रुष्ट होते है तो उनके माहवारी चक्र में अनियमितता होनी शुरू हो जाती है.
9. बालों का सफ़ेद होना : कहा जाता है कि चिंता करने से बाल सफ़ेद होते है जबकि बालों के सफ़ेद होने के पीछे भी चन्द्र देव का ही हाथ होता है.
10. सिर दर्द : जातक को धीरे धीरे अन्य बीमारियाँ अपना शिकार बना लेती है और उनमे सबसे पहले आता है साइनस.
11. जल का असंतुलन : इसके अलावा जातक के अंदर जल का अभाव व असंतुलन बना रहता है, उसकी त्वचा शुष्क हो जाती है, वो खुद को कमजोर महसूस करने इस स्थिति में कुछ लोग तो जल्दी जल्दी पानी पीना आरम्भ कर देते है.
12. शरीर में कैल्शियम की कमी : पानी के साथ साथ पीड़ित के शरीर का कैल्शी लगातार कम होता जाता है और उसके शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगती है.
तत्व अनुसार रुष्ट चंद्रमा को मनाएं -
अग्नि तत्व : अगर चन्द्अग्नि तत्व में होने पर कुपित होता है तो जातक को सोमवार के व्रत रखने के साथ साथ चंद्रा की हवन सामग्री से हवन अवश्य कराना चाहियें.
वायु तत्व : वहीँ उनके वायु तत्व में नाराज होने पर आपको चन्द्रमा के सामान को जमीन में दबा देना चाहियें. अगर आप ये ना कर सकें तो आप चन्द्रमा की अंगूठी को अवश्य पहनें.
जल तत्व : लेकिन अगर चन्द्र जल तत्व में रुष्ट है तो आपको सोमवार के दिन कच्चे चावल लेने है और उन्हें बहते पानी में प्रवाहित करना है. इसके अलावा आप किसी महिला को चन्द्रमा का सामान भी अवश्य दें.
पृथ्वी तत्व : पृथ्वी तत्व में चन्द्र के गुस्सा होने पर आपको “ ॐ श्राम् श्रीं श्रोम् सः चंद्रमसे नमः ” मंत्र का जाप करना है, ध्यान रहें कि मंत्र जाप रात को या शिवजी की पूजा के वक़्त ही करें.
चंद्रमाँ के लिए शिव, कृष्ण, भगवती पार्वती, की उपासना और संकस्टी चतुर्थी और पूर्णिमा को सत्यनारायण का व्रत श्रेष्ठ
कस्टप्रद नीच या बल हीन चंद्र के दान करे
चावल, पानी, दूध , चाँदी, सफ़ेद वस्त्र , का दान करे l पीने के पानी की व्यवस्था करे
पुष्य नक्षत्र में शिव अभिषेक जल और दूध से श्रेष्ठ, पितरो को प्रसन्न करे, माता को सम्मान करे और उन्हें खुश रखे ल
चन्द्र
चांदी, शंख, सीपी, गौदुग्ध, गोदही, मोती, सफेद कमल/सफेद गुलाब,
गौमूत्र, गौघृत, गाय का मट्ठा आदि जल में डालकर प्रथम उससे स्नान करें, फिर
शुद्ध जल से।
कपूर, मोती, चांदी, चावल, चीनी, खीर, दूध, मिश्री, खांड़, दही, मट्ठा,
बताशे, सफेद गाय/बैल, सफेद वस्त्र, पेठा आदि का सोमवार को दान करें तथा
सफेद वस्त्र पहनें। यह पूर्णमासी की शाम को भी कर सकते हैं।
→ अश्विनी पूर्णिमा से वर्षभर पूर्णमासी का व्रत करें अथवा शुक्ल पक्ष के
प्रथम सोमवार से दस सोमवार का व्रत करें तथा रात को चन्द्र पूजन करके सफेद
फूल, सफेद चन्दन मिले जल से चन्द्र को अर्घ्य दें। चन्द्र मन्त्र का जाप करें। सफेद
वस्त्र व सफेद चंदन धारण करें। प्रदोष व्रत या सावन के सोमवार के शिव के व्रत
करें। शिवलिंग पर जल व दूध का नित्य अभिषेक करें। शिव चालीसा का पाठ करेतथा रुद्राक्ष पूजन करें।
→ चन्द्र के 11000 मंत्रों का जाप करें अथवा 'ॐ हिम् नमः शिवाय' यंत्र
का सवा लाख जाप का अनुष्ठान करे और बाद में किसी सुन्दर स्त्री को भोजन
कराकर चन्द्र सम्बन्धी वस्तुएं दान दें
चांदी के आभूषण तथा मोतियों की माला पहनें, सोमवार को नमक न
खाएं व भोजन एक बार ही करें। ब्राह्मण/सुंदर स्त्री को खीर/दूध खिलाएं/पिलाएं
सफेद शंख को घर में रखें तथा उसका पूजन नित्य करें।
शिवपुराण से चन्द्रमा के शापग्रस्त होकर क्षय रोगी हो जाने तथा फिऱ
शिवोपासना से स्वस्थ हो जाने वाले प्रसंग का नित्य पाठ करें अथवा चन्द्र स्तोत्र क
पाठ करें। सफेद गाय को सफेद खाद्य पदार्थ नित्य खिलाएं व उसकी सेवा करें।
पूर्णमासी (विशेषकर शरद पूर्णिमा) की रात को खीर छलनी से ढकक
रात भर खुली छत पर चांदनी में रखें और प्रात: उसका सेवन बिना गरम किए ही
करें। माता, मौसी का आशीर्वाद लें व सेवा करें।
चंद्र माता योगिनी मङ्गला स्तोत्र (सिद्ध साबर तन्त्र)
श्री पार्वत्युवाच
सृष्टिस्थित्यन्तकारक |
मंगलायाश्चन्द्रमातुः स्तवनं ब्रूहि शंकर । '
देवदेव महादेव श्री शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।
ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||
मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।
चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥
चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।
शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥
वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।
त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥
दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।
सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥
एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।
चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।
मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥
(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)
श्री शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।
ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||
मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।
चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥
चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।
शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥
वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।
त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥
दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।
सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥
एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।
चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।
मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥
(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)
अथ चंद्र कवच
विनियोग : अस्य
छन्द, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
चन्द्रकवचम्
श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य
गौतम-ऋषिः, अनुष्टुप्-
अथ कवचम्
केयूरमुकुटोज्वलम् ।
समं चतुर्भुजं वन्दे
वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।
शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥
चक्षुषी चन्द्रमा पातु श्रुती पातु निशापतिः ।
प्राणं छपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥
पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा।
करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः
हृदयं पातु मे चंद्रौ नाभि शंकरभूषणः ।
मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ।।
ऊरू तारापतिः मृगाको जानुनी सदा।
पातु
अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्रोऽखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम् ।
यः पठेच्छृणुयाद् वाऽपि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥
॥ इतिश्री चन्द्रकवचम् ॥
चन्द्राऽष्टाविंशतिनामस्तोत्रम्
विनियोग : अस्य श्रीचन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रस्य गौतम ऋषिः, सोमो
देवता, विराट् छन्दः, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ स्तोत्रम्
चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते ।
यानि श्रुत्वा नरो दुःखान् मुच्यते नाऽत्र संशयः ॥
सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरजः कुमुदप्रियः ।
लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥
शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः ।
नक्षत्रनायकः
आत्रेय इन्दुः शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥
जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णव संभवः ।
शम्भुशिरश्चूडामणिर्विभुः ॥
तापहर्त्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् ।
प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥
तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत् सर्वं समीहितम् ।
ग्रहादीनां च सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥
॥ इतिश्री चन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ॥
चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम्
चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेय गोत्रोद्भव-
श्चाग्नेयश्तुरस्त्र वारुणमुखश्चापोऽप्युमाधीश्वरः
1
षट् सप्तानि दशैक शोभनफल शौरिः प्रियोऽकर्को गुरुः
स्वामी यामुनदेशजो हिमकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥
॥ इति श्री चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम् ॥
मेरे मत से चंद्र को शुभ, अशुभ राशी
मेष - अति शुभ, वृषभ -अति अशुभ, मिथुन- साधारण शुभ,कर्क- अशुभ, सिंह - साधारण शुभ, कन्या - अशुभ, तूल - शुभ,वृष्चिक- अति शुभ, धनु - साधारण, मकर - अशुभ, कुंभ - पुरुष राशियह चंद्र के लिए अच्छी नहीं ै। स्त्री राशियों मे मीन यह राशी में फल अच्छेमिलते है। स्त्र राशियों में साधारण से अच्छे फल मिलते है।
चन्द्रमा विवेचन और उसके के रुष्ट होने के संकेत केमद्रुम दोष और उपाय -
मन और मानव जीवन को प्रभावित करता है चन्द्रमा
चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह हैं, उन सभी का व्यक्ति के जीवन पर विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। मानव ने जब से काल के चिंतन का आरंभ किया, उसी समय से चन्द्रमा उसके लिए अपने घटने-बढ़ने की प्रक्रिया के कारण प्रकृति का अखंड और निर्विवाद पंचांग रहा है। संसार के सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में प्रत्येक काल में चन्द्रमा की तिथियों के अनुसार ही धार्मिक विधि रचने का उल्लेख पाया जाता है।
व्यक्ति के चरित्र के सूक्ष्म रूप, विशिष्ट गुण, उसकी प्रतिभा, भावनाओं, प्रवृत्तियों, योग्यताओं तथा भावनात्मक प्रवृत्ति आदि का ज्ञान जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति से मालूम हो जाता है।
समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे का मूल कारण चन्द्रमा की स्थिति है। पूर्णिमा का प्रभाव पशु-पक्षियों और रेंगने वाले कीड़ों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि उन्मादग्रस्त मनुष्यों पर भी पड़ता है। वे सभी अन्य दिनों की अपेक्षा पूर्णिमा के दिन ही अधिक उत्तेजित और अव्यवस्थित दिखाई देते हैं। संसार के जितने की ऊष्ण प्रदेश हैं, वहां को लोगों को पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की चांदनी में सोने पर विचित्र स्वप्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार के विचित्र स्वप्न अन्य किसी दिन में दिखाई नहीं देते। यही नहीं, स्त्रियों के मासिक धर्म और चंद्रमा के 28 दिवस चक्र के बीच सीधा संबंध है।
चंद्रमा के घटने-बढ़ने का व्यक्ति के मस्तिष्क के साथ परंपरागत संबंध होता है। शुक्ल पक्ष में मनुष्य का मस्तिष्क जागरूक होता है। इन दिनों उसे नींद भी अच्छी आती है। हम अपने जीवन में चंद्रमा के प्रभाव का स्पष्ट अनुभव करते हैं। चंद्रमा का सृष्टि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण प्रकृति, भले ही वह जड़ हो या चेतन, उसमें धड़कन होती है, स्पंदन होता है और वह नित्य परिवर्तनशील है।
चन्द्रमा का अपनी तिथियों के अनुसार विश्व के जड़ और चेतन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जो मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने जाते हैं, वे चंद्रमा के इस प्रभाव से भलीभांति परिचित होते हैं।
चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। स्त्रियों में स्थित कामभावना चंद्रमा की कलाओं के उपचय-अपचय के अनुसार विभिन्न अंगों में तिथिक्रम से केंद्रित रहा करती है। कामशास्त्र इस संबंध में सलाह देता है कि तिथि के अनुसार स्त्री के संबंधित अंग को सहलाने से वह जल्दी उत्तेजित हो जाते है
चंद्रमा सुख स्थान का और माता का कारक होता है। यह मन की संकल्प-विकल्पमूलक कल्पनाशक्ति का परिचायक होता है। शारीरिक स्थिति में यह जल ग्रह होने के कारण न्यूमोनिया तथा कफजनित रोग सर्दी-जुकाम आदि का सूचक रहता है। जन्म कुंडली में जिन पर चंद्रमा निर्बल रहता है, वे प्राय: शीतजनित रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त प्रवाह और हृदय इसके अधिकृत क्षेत्र हैं, किंतु अन्य ग्रह के साथ अशुभ युति करने पर ही यह रक्तचाप, हृदय रोग आदि दिया करता है।
चंद्रमा द्विस्वभाव रहता है अर्थात अकेला ही यह पाप और शुभ बन जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण प्रकाशमान रहने के कारण यह बली रहता है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी माना जाता है। चंद्रमा कर्क राशि में उच्च का एवं वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। चंद्रमा उच्च राशि का होने पर मिष्ठान्न भोजी और अलंकार प्रिय बनाता है तथा इनके प्राप्त होने के योग भी बनाता है। मूल त्रिकोणी होने पर यह धनी और सुखी भी करता है। चंद्रमा नीच राशिगत होने पर धर्म, बुद्धि का ह्रास करता है तथा दुरात्मा व दुखी बनाता है। शुक्र ग्रही होने पर यह माता के स्नेह और सुख से वंचित करता है।
ज्योतिष एवं चन्द्रमा का सम्बन्ध,महत्त्व एवं प्रभाव.तथा उपाय
भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हों, उसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है। भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैं, वह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है।
पूर्णिमा का चंद्रमा मन को बहुत आनंद देता है। इसकी तुलना बिजली की सजावट से नहीं हो सकती। चंद्रमा की इसी विशेषता के कारण स्नेह के लिए उसे देखा जाता है। स्नेह के बारे में सोचते ही मां का चेहरा सामने आ जाता है, इसलिए चंद्रमा को मातृकारक कहा गया है, इसीलिए बच्चे उसे मामा कहते हैं। भूखा बच्चा जब मां की गोद में बैठकर स्तनपान करता है तब मां के मन से जो स्नेह भावना उभरती है, उसी स्नेह का कारक ग्रह है चंद्रमा। चंद्रमा सबसे गति वाला ग्रह है और उसकी गति में सर्वदा परिवर्तन होता है, इसलिए जहां गति से जुड़ी बातें आ जायं, वहां चंद्रमा महत्वपूर्ण हो जाता है। धरती पर सबसे अधिक गति होती है मन की। पल भर में गति बदलने वाला मन चंद्रमा से भी गतिशील है, अत: चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। मन को बेहद खुशी या गम हो तो आंखों से आंसू आ जाते हैं, अत: पानी, दूध, शरबत जैसी बहने वाली चीजें चंद्रमा के अधिकार में होती हैं। पानी के साथ पानी से जुड़े पौधे, मछली, कुएं, तालाब, सागर आदि का भी कारक ग्रह चंद्रमा है।
शास्त्रों के अनुसार भी चन्द्रमा मन का कारक है। चन्द्रमा दिल का स्वामी है। चांदी की तरह चमकती रात चन्द्रमा का विस्तार राज्य है। इसका कार्य सोने चांदी का खजाना शिक्षा और समृद्घि व्यापार है। चन्द्रमा के घर शत्रु ग्रह भी बैठे तो अपने फल खराब नहीं करता। प्रकृति की हलचल में चंद्र के प्रभाव विशेष होते हैं।
चन्द्रमा एवं विश्व—–
चन्द्रमा धरती का सबसे निकटतम ग्रह है. इसमें प्रबल चुम्बकीय शक्ति है. यही कारण है क़ि समुद्र के जल को यह बहुत ही ऊपर तक खींच देता है. और जब घूमते हुए धरती से कुछ दूर चला जाता है तो यही जल वापस पुनः समुद्र में बहुत भयानक गति से वापस आता है. जिसके कारण समुद्र में ज्वार भाटा एवं तूफ़ान आदि आते है. जिस तरह एक साधारण चुम्बक के दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति का केंद्र होता है. उसी प्रकार इसके भी दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति बहुत ज्यादा होती है. इसका आकार पूर्णिमा को छोड़ कर शेष दिनों में नाल चुम्बक के आकार का होता है. किन्तु पूर्णिमा के दिन जब इसका आकार पूरा गोल होता है, उस समय में इसमें भयानक आकर्षण शक्ति होती है. किन्तु यह शक्ति इसके चारो और की परिधि पर होने के कारण भयावह नहीं होती है. इसके विपरीत यह द्वितीया के दिन जब बिलकुल ही पतला होता है, बहुत ही हानि कारक होता है. कारण यह है क़ि इस दिन यह धरती से दूर होता है. तथा धरती के पदार्थो को बहुत दूर तक खींच देता है. और जब छोड़ता है तब बहुत ही ऊंचाई से उन पदार्थो के गिरने के कारण धन जन की बहुत हानि होती है. आप लोगो ने ध्यान दिया होगा क़ि अभी भी ग्रामीण इलाको में द्वितीया के चन्द्रमा को देखने की तथा उसे प्रणाम करने की होड़ या उत्सुकता लगी रहती है. और यह मान्यता है क़ि कम से कम हाथ में या शरीर के किसी न किसी हिस्से में सोने का कोई आभूषण हो तो और भी शुभ होता है. सोने की चमक दार सतह चन्द्रमा की किरणों को परावर्तित कर देती है. तथा उसकी परम लाभकारी ऊर्जा को शरीर में अवशोषित कर लेती है. परावर्तित करने की क्षमता तो दर्पण में ज्यादा होती है. किन्तु दर्पण विद्युत् या ऊष्मा का कुचालक होता है. इसलिए उससे केवल प्रकाश का परावर्तन ही हो पाता है. किन्तु चन्द्रमा की किरणों की लाभ कारी ऊर्जा शरीर को नहीं मिल पाती. इसीलिए शरीर के किसी भी अँग में सोने के आभूषण की उपस्थिति अनिवार्य बताई गयी है.
चन्द्रमा को सुधांशु भी कहा जाता है. पौराणिक मतानुसार चन्द्रमा पर अमृत पाया जाता है. इसके अलावा इसकी सतह पर अनेक अमोघ औषधियों की उपस्थिति भी है. संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए कहा गया है क़ि
“यातीति एकतो अस्त शिखरं पतिरोषधीनाम आविषकृतो अरुण पुरः सरः एकतो अर्कः.
तेजो द्वयस्य युगपद व्यसनोदयाभ्याम लोको नियम्यदिव आत्म दशांतरेषु.”
अर्थात एक तरफ तो औषधियों के एक मात्र स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल पर जा रहे है. तथा दूसरी तरफ उदयाचल पर अरुण को आगे किये हुए सूर्य उदय हो रहे है. इस प्रकार ये दोनों अपनी अपनी इस अस्त एवं उदय की स्थिति से यह समस्त विश्व को बता रहे है क़ि यह संसार का उत्थान एवं पतन चक्र है.
शुक्ल पक्ष की द्वितीया लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा निरंतर धरती के नज़दीक आता चला जाता है. तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावश्या तक चन्द्रमा धरती से दूर चलता जाता है. चन्द्रमा ज्यो ज्यो धरती से दूर चलता जाता है. यह पतला होता चला जाता है. उस समय इसके दोनों नुकीले हिस्से बहुत ही शक्ति शाली चुम्बक की तरह धरती की समस्त वस्तुओ को खींचता चला जाता है. संभवतः इसीलिए कृष्ण पक्ष और उसमें भी रात के समय और उसमें भी पाप राशि एवं लग्न में जन्म लेना थोड़ा अशुभ माना गया है.
चन्द्रमा के घर घर अर्थात कर्क राशि में होते हुए अपने घर अर्थात सिंह राशि में विश्राम करते हुए दुबारा फिर से धरती से दूर जाने लगेगा तो वर्षा शुरू हो जायेगी. क्योकि जो भाप अंतरिक्ष में एकत्र हुआ है, सूर्य के दूर जाते ही ठंडा होकर धरती पर गिरना शुरू हो जाएगा. कहा भी गया है क़ि 14 जनवरी या मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है. दिन बड़ा होगा तो ज्यादा देर तक सूर्य की किरणे धरती के ऱस को अवशोषित करेगी, और ज्यादा भाप आकाश में जाएगा.
यदि किसी की कुंडली में पांचवे भाव में सूर्य हो तथा चौथे भाव में चन्द्रमा हो और ये दोनों मीन से लेकर सिंह राशि के मध्य ही हो तो वह बालक कुशाग्र बुद्धि, उच्च संस्कार से उक्त संतान एवं देश विदेश में ख्याति अर्जित करने वाला होगा. कारण यह है क़ि ऐसी अवस्था में मष्तिष्क के परासवी द्रव्यों का सघनी करण एवं शोधन दोनों ही सूक्षमता एवं गहनता से होता रहेगा. क्योकि जितने द्रव्य चन्द्रमा के द्वारा उद्वेलित होगे, सूर्य के द्वारा उतने का सघनी करण एवं शोधन होता चला जाएगा. इसके विपरीत यदि सूर्य तुला राशि में हो तथा चन्द्रमा मीन में हो तो ऐसी अवस्था में इनकी चौथे भाव की उपस्थिति माता पिता एवं धन संपदा के लिए हानि कारक होगी. कारण यह है क़ि न तो चन्द्रमा का प्रभाव मष्तिष्क पर पडेगा और न तो सूर्य के द्वारा इसका कोई शोधन या सघनीकरण होगा. क्योकि चंद्रामा सूर्य से बहुत ही दूर जा चुका होगा.
चन्द्रमा से ही मनुष्य का मन और समुद्र से उठने वाली लहरे दोनों का निर्धारण होता है। माता और चंद्र का संबंध भी गहरा होता है। मूत्र संबंधी रोग, दिमागी खराबी, हाईपर टेंशन, हार्ट अटैक ये सभी चन्द्रमा से संबंधित रोग है।
वैसे तो चन्द्रमा को सुख-शांति का कारक माना जाता है…लेकिन यही चन्द्रमा जब उग्र रूप धारण कर ले तो प्रलयंकर स्वरूप दिखता है। तंत्र ज्योतिष में तो ये कहावत है कि चन्द्रमा का पृथ्वी से ऐसा नाता है कि मानो मां-बेटे का संबंध हो, जैसे बच्चे को देख कर मां के दिल में हलचल होने लगती है, वैसे ही चन्द्रमा को देख कर पृथ्वी पर हलचल होने लगती है, चन्द्रमा जिसकी सुन्दरता से मुग्ध हो कवि रसीली कविताओं और गीतों का सृजन करते हैं वहीँ भारतीय तंत्र शास्त्र इसे शक्तियां अर्जित करने का समय मानता है।
आकाश में पूरा चांद निकलते ही कई तांत्रिक सिद्घियां प्राप्त करने में जुट जाते हैं। चन्द्रमा प्राकृतिक तौर पर बहुत सूक्ष्म प्रभाव डालता है जिसे साधारण तौर से नहीं आंका जा सकता लेकिन कई बार ये प्रभाव बहुत बढ जाता है जिसके कई कारण हो सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र इसके संबंध में कहता है कि चन्द्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर भूकंप, समुद्री आंधियां, तूफानी हवाएं, अति वर्षा, भूस्खलन आदि लाता हैं। रात को चमकता पूरा चांद मानव सहित जीव-जंतुओं पर भी गहरा असर डालता है।
चन्द्रमा एक शीत और नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में मुख्य रूप से माता तथा मन के कारक माने जाते हैं और क्योंकि माता तथा मन दोनों ही किसी भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व रखते हैं, इसलिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्त्वपूर्ण होती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियों, जन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों, परा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, होटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों, सागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं।
किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चन्द्रमा की स्थिति अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चन्द्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चन्द्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चन्द्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चन्द्रमा की अपनी राशि है। चन्द्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदु, संवेदनशील, भावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐशवर्य प्राप्त हो जाते हैं।
शरीर के हिस्से——
चंद्रमा का मन पर प्रभाव होता है। सीना, बहती वस्तुओं का कारक ग्रह होने से शरीर में स्थित द्रव्य जैसे रक्त, मूत्र, पाचक रस, पाचन क्रिया पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। रात में प्राकृतिक रोशनी चंद्रमा से ही मिलती है इसलिए दृष्टि व आंख चंद्रमा के अधिकार में है। पुरुषों की बांयी तथा स्त्रियों की दायीं आंख तथा वक्षस्थल पर चंद्रमा का प्रभाव होता है।
गुण——
चंद्रमा की रोशनी शीतल है इसलिए शीतलता, ठंडक, पानी से जुड़ा हुआ, हवा में स्थित भांप, गति में बदलाव, सैर की चाह इत्यादि चंद्रमा का गुण धर्म है। चंद्रमा की कर्क राशि कुण्डली में (कालपुरुष की गणना में) चतुर्थ स्थान पर है। यह चतुर्थ स्थान भवन, भूमि, मातृभूमि को दर्शाता है, इसलिए भूमि, भवन, देशप्रेम की भावना का भी विचार चंद्रमा से किया जाता है।
बीमारियां——
चंद्रमा का मन पर प्रभाव है। इसलिए मन के रोग, अजीब व्यवहार, चिड़चिड़ापन, उन्माद की बीमारियां आदि चंद्रमा से देखी जाती हैं। पाचन की शिकायतें, बहती वस्तुओं पर अधिकार जैसे खांसी, जुकाम, ब्राकायटीस, हाइड्रोशील, कफ से जुड़ी बीमारियां, दृष्टि दोष चंद्रमा से देखे जाते हैं।
कारोबार—–
चंद्रमा जल से जुड़ा है इसलिए सिंचाई, जल विभाग, मछली, नौसेना, मोती आदि का कारोबार इससे देखा जाता है। चूंकि चंद्रमा बहती वस्तुओं से संबंधित है इसलिए कैरोसिन, पेट्रोल के कारोबार पर इसका नियंत्रण है। स्नेह का कारक ग्रह होने से फूल, नर्सरी व रसों से जुड़ा कारोबार इसके अधिकार क्षेत्र में आता है।
उत्पाद—–
चंद्रमा तेज गति वाला ग्रह है इसलिए जल्दी बढ़ने वाली सब्जियां, रसदार फल, गन्ना, शकरकंद, केसर और मक्का इसके उत्पाद हैं। चंद्रमा रंगों का भी कारक ग्रह है इसलिए निकिल, चांदी, मोती, कपूर, मत्स्य निर्माण, सिल्वर प्लेटेड मोती जैसे वस्तुएं बनाने का कारोबार चंद्रमा के अधिकार में है।
स्थान—–
शीतलता का कारक ग्रह होने से हिल स्टेशन, पानी से जुड़े स्थान, टंकियां, कुएं, हरे पेड़ों से सजे जंगल, दूध से जुड़ा स्थान, गाय-भैंसों का तबेला, फ्रिज, पीने का पानी रखने का स्थान, हैंडपंप आदि को चंद्रमा का स्थान माना जाता है।
जानवर व पंक्षी—–
छोटे पालतू जानवर, कुत्ता, बिल्ली, सफेद चूहे, बत्तख, कछुआ, केकड़ा, मछली के शरीर पर चंद्रमा का अधिकार होता है। चंद्रमा रस निर्माण का कारक ग्रह है इसलिए रसदार फल, गन्ना, फूल-गोभी, ककड़ी, खीरा, व जल में पनपने वाली सब्जियों पर चंद्रमा का अधिकार है।
चन्द्रमा मनुष्य के शरीर में कफ प्रवृति तथा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शरीर के अंदर द्रव्यों की मात्रा, बल तथा बहाव को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्य से अधिक वजनी हो सकते हैं जिसका कारण मुख्य तौर पर चन्द्रमा का जल तत्व पर नियंत्रण होना ही होता है जिसके कारण ऐसे जातकों में सामान्य से अधिक निद्रा लेने की प्रवृति बन जाती है तथा कुछेक जातकों को काम कम करने की आदत होने से या अवसर ही कम मिलने के कारण भी उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे जातकों को आम तौर पर कफ तथा शरीर के द्रव्यों से संबंधित रोग या मानसिक परेशानियों से संबंधित रोग ही लगते हैं।
कुंडली में चन्द्रमा के बलहीन होने पर अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर दूषित होने पर जातक की मानसिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उसे मिलने वाली सुख-सुविधाओं में भी कमी आ जाती है। चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होकर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष और अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण भी चन्द्रमा बलहीन हो जाते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु तथा केतु का प्रबल प्रभाव चन्द्रमा को बुरी तरह से दूषित कर सकता है तथा कुंडली धारक को मानसिक रोगों से पीड़ित भी कर सकता है। चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को अनिद्रा तथा बेचैनी जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है जिसके कारण जातक को नींद आने में बहुत कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की बलहीनता अथवा चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार के जातकों को उनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों से संबंधित समस्याएं आ सकती हैं।
गोचर और चन्द्रमा—
व्यक्ति के जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में होते हैं, लग्न निकालकर कुंडली में उस राशि में लिखे जाते हैं। ग्रहों की गति के आकार पर राशि परिवर्तन की अवधि होती है। सूर्य की गति स्थिर अर्थात् एक अंश प्रतिदिन के हिसाब से 30 दिवस में राशि परिवर्तन कर लेता है। चंद्रमा की गति काफी तीव्र होने से राशि परिवर्तन सवा दो दिन में कर लेता है।समाचार पत्रों में जो दैनिक भविष्यफल दिया जाता है, उसके अंत में आमतौर पर लिखा होता है, गोचर देखें। आम व्यक्ति गोचर समझता नहीं है। ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण को गोचर कहते हैं। पाश्चात्य देशों में लग्न एवं सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर गोचर फलादेश तैयार करते हैं, लेकिन हमारे यहां चंद्रमा जिस राशि में होता है, उसे लग्न मानकर गोचर फलकिया जाता है।
कल्याण शकट योग—
वैद्यनाथ दीक्षित के अनुसार कल्याण शकट योग का निर्माण तभी होता है जब गुरू से चन्द्रमा 6 या आठ भाव में हो। इस योग का केवल एक ही अपवाद है कि यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो यह योग भंग हो जाता है।
शषष्टमा गताश्चन्द्र सूर्य राज पुरोहित: केन्द्र दान्य गतो लग्नाद्योग: शकट समग्नित:।। परिणामों पर विचार करते हैं तो—
अपि राजा कुले जातो निश्व शकट योगज:। क्लेश यशवस नित्यम संतोप्त निरूप विप्रय:।।
अर्थ—चाहे कोई व्यक्ति राज परिवार में क्यों नहीं जन्मे, इस योग वाले को निर्धनता, दिन-प्रतिदिन दु:ख-कष्ट और अन्य राजाओं के क्रोध का भाजन बनना प़डता है।
मंत्रेश्वर, फलदीपिकाकार के अनुसार, जीवन्त्यश्तरी समष्टे शशिनितु शकट:, केन्द्रगे नास्ते लग्नथ:।।
जब बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में चन्द्र हो तो शकट योग बनता है परन्तु यदि चन्द्र केन्द्र में हो तो शकट योग भंग हो जाता है।
क्वचित क्वचित भाग्य परिचयत: सन् पुन: सर्वा मुपैते भाग्य:,
लोके प्रस्तीधो परिहर्य मन्त: सल्यम प्रपन्न: शकटे ति दु:खी:।।
इस शकट योग में जन्मा जातक प्राय: भाग्यहीन होता है अथवा भाग्यहीन हो जाता है और जीवन में खोए हुए को पुन: पा भी सकता है और प्रतिष्ठा आदि में एक सामान्य व्यक्ति होता है और इस दुनिया में उसका कोई महत्व नहीं होता है। वह नि:स्संदेह भारी मानसिक वेदना सहता है और जीवन में दु:खी ही रह जाता है। दूसरे विद्वानों के विचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो यह देखते हैं कि—
यदि चन्द्र अपनी उच्चा राशि में हो, स्वग्रही हो अथवा बृहस्पति के भावों में हो और चन्द्रमा बृहस्पति से छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो यह शकट योग का अपवाद बन जाता है। ऎसी स्थिति में शकट योग ही भंग नहीं होता अपितु उसके दुष्परिणाम भी आते हैं परन्तु यही योग जातक को मुकुट योग देकर ऊंचाइयों पर भी पहुंचा देता है।
यदि चन्द्रमा बृहस्पति से छठे-आठवें भाव में हो परन्तु वह मंगल से दृष्ट हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
यदि राहु-चन्द्र की युति हो अथवा राहु उन्हें देखें तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पूर्ण चन्द्र स्थित हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
यदि षड्बल में बृहस्पति चन्द्र से बली हों तो भी शकट योग भंग हो जाता है।
यदि चन्द्र बृहस्पति से छठे आठवें भाव में स्थित होकर द्वितीय भाव में बैठे तो शकट योग भंग हो जाता है और व्यक्ति धनी होता है। ऎसी ग्रह स्थिति मिथुन लग्न वाले जातकों की ही होती है। चन्द्र से छठे भाव में स्थित बृहस्पति से हंस योग का निर्माण होता है क्योंकि वे निज भाव में होंगे जो सप्तमेश और दशमेश का लग्न से केन्द्र स्थान होगा, चन्द्रमा से अष्टम भाव में स्थित होने पर जातक धनवान नहीं बन सकता है। सूर्य नवम भाव में स्थित होकर गुरू से युति करें और द्वितीय भाव में चन्द्रमा पर उनकी पूर्ण रश्मियां प़डें तो जातक प्रचुर धन का स्वामी हो सकता है परन्तु ऎसी स्थिति में गुरू अस्तंगत दोष से मुक्त हों अथवा दुष्प्रभाव में नहीं हों।
द्वितीय भाव में स्थित उच्चा के गुरू से अष्टम भाव में चन्द्र की स्थिति शुभ नहीं होती है और ऎसे जातक संभवत: 40 वर्ष की आयु होते-होते सब कुछ गंवा देते हैं परन्तु यह बाद में आने वाली दशाओं पर निर्भर करता है कि वह अपना खोया धन और सम्मान पुन: प्राप्त कर लें। माना कोई जातक शनि महादशा में हो और 40 वर्ष की आयु का हो चुका है तो वह बृहस्पति की दशा में सब कुछ गंवा देगा और शनि की अंतर्दशा में पुन: प्राप्त कर लेगा। यदि शनि उनकी कुंडली में शुभ स्थिति में हो। तुला और मीन लग्न के जातकों का शनि शुभ स्थिति में होता है। वृश्चिक में भी शनि की स्थिति ठीक होती है। बृहस्पति से द्वादश भाव में स्थित चन्द्रमा अनफा योग का सृजन करते हैं। द्वितीय भाव के स्वामी लग्नस्थ होकर चन्द्र या बृहस्पति की अन्तर्दशा में किसी जातक को बर्बाद नहीं करते। बहुत सी कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद अब मुझे यह विश्वास हो गया है कि शकट योग के कुछ भी परिणाम होते हों परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि जीवन में बुरे दिन सदा नहीं रहते। जीवन परिवर्तनशील है। बुरा समय जीवन में परीक्षा लेता है और इस परीक्षा एवं कसौटी के लिए शकट योग एक महत्वपूर्ण स्थिति है। योग जीवन में बहुत लंबे समय तक फलीभूत नहीं होते हैं। कुछ समय बाद ये योग स्वत: विलीन होने लगते हैं। यहां मंत्रेश्वर महाराज हमें आशा दिलाते हैं कि रूठा हुआ भाग्य पुन: मनाया जा सकता है, खोई हुई प्रतिष्ठा और धन पुन: अर्जित किए जा सकते हैं। एक साधारण एवं गरीब व्यक्ति भी मानसिक रूप से बहुत प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो सकता है अथवा वही व्यक्ति बहुत अधिक दु:खी, पीç़डत और कष्ट से भरा जीवन व्यतीत करता है। ये सभी परिस्थितियां विभिन्न प्रकार के योगायोग, शकट योगादि के कारण बनती हैं और कई बार इनके अपवाद भी पाए जाते हैं।
चन्द्र ग्रह शांति के उपाय—–
क्या दान करें..???
चन्द्रमा के नीच अथवा मंद होने पर शंख का दान करना उत्तम होता है. इसके अलावा सफेद वस्त्र, चांदी, चावल, भात एवं दूध का दान भी पीड़ित चन्द्रमा वाले व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है. जल दान अर्थात प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना से भी चन्द्रमा की विपरीत दशा में सुधार होता है. अगर आपका चन्द्रमा पीड़ित है तो आपको चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न दान करना चाहिए. चन्दमा से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करते समय ध्यान रखें कि दिन सोमवार हो और संध्या काल हो. ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा से सम्बन्धित वस्तुओं के दान के लिए महिलाओं को सुपात्र बताया गया है अत: दान किसी महिला को दें. आपका चन्द्रमा कमज़ोर है तो आपको सोमवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गूंथा हुआ आटा खिलाना चाहिए तथा कौए को भात और चीनी मिलाकर देना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को दूध में बना हुआ खीर खिलाना चाहिए. सेवा धर्म से भी चन्द्रमा की दशा में सुधार संभव है. सेवा धर्म से आप चन्द्रमा की दशा में सुधार करना चाहते है तो इसके लिए आपको माता और माता समान महिला एवं वृद्ध महिलाओं की सेवा करनी चाहिए.
जन्म कुंडली में चंद्र ग्रह यदि अशुभ कारक हो तो निम्न लिखित मन्त्रों का जप करने से चंद्र ग्रह की शांति हो जाती है।
वैदिक मंत्र– ॐइमं देवा असपत्न℧ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना ℧ राजा।
पुराणोक्त मंत्र- ॐ दधिशंख, तुषाराम्भं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।नमामि शशिनं सोमं शंभोः मुकुट भूषणम्।।
स्नान तथा दान काल में यह मंत्र का उच्चारण लाभप्रद होता है।
तंत्रोक्त मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।
चन्द्रमा के जप की संख्या 11000 है।
चन्द्र गायत्री मंत्र- ॐ अमृतांगाय विद्महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्।
अर्घ्य मंत्र- ॐ सों सोमाय नमः।
चन्द्र रत्न- चन्द्र ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु मोती रत्न धारण किया जाता है।
औषधि स्नान – चन्द्र ग्रह की शांति के लिए पंचगव्य, बेल गिरी, गजमद, शंख, सिप्पी, श्वेत चंदन, स्फटिक से स्नान करना चंद्रमा जनित अनिष्ट प्रभावों को कम करता है। भगवान शिव का पूजन सोमवार के दिन करना तथा पूर्ण चन्द्र के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करने से चन्द्र ग्रह की शांति हो जाती है।
चन्द्र यंत्र- चन्द्रमा ग्रह की शान्ति हेतु चन्द्र होरा में चांदी के पत्र में चन्द्र यंत्र खुदवाकर या अष्टगन्ध से भोजपत्र पर लिखकर उसकी विधिवत, पूजन कर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए। अन्य उपाय- सोमवार का व्रत रखकर चावल सफेद वस्त्र, आदि सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए। सोमवार को प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शंकर की मूर्ति पर जल तथा दूध चढाना चाहिए।
कुछ मुख्य अन्य उपाय/टोटके निम्न है-
व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए। रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।
सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पीना चाहिए।
सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
क्या न करें..???
ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को प्रतिदिन दूध नहीं पीना चाहिए. श्वेत वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए. सुगंध नहीं लगाना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिएल
वैसे तो चन्द्र देव का स्वभाव स्वभाव बहुत शांत और ठंडा होता है और यही वजह है कि वो हम सभी को शीतलता प्रदान करते है किन्तु जब वे गुस्से में आते है तो उसके परिणाम बहुत भयंकर और विनाशकारी हो सकते है. इसलिए कभी भी चन्द्र देव को कुपित ना होने दें और अगर वे कभी आपसे रुष्ट हो भी जाएँ तो आप तुरंत कुछ उपायों को अपनाकर उन्हें जल्दी से प्रसन्न कर लें. आज हम चन्द्र देव से जुडी कुछ ऐसी बातें बताने वाले है जिन्हें जानकार आप पता लगा सकते हो कि चन्द्र देव आपसे रुष्ट है या नहीं और अगर है तो उन्हें किस तरह मनाया जा सकता है.
कुपित चन्द्रमा के संकेत
1. मानसिक परेशानी : चंद्रमा के रुष्ट होते ही जो पहला संकेत सामने आता है वो है मानसिक चिंता व परेशानी, ऐसे में जातक खुद को फंसा फंसा महसूस करता है, उसे समझ नहीं आता कि वो अपनी समस्याओं से कैसे बाहर निकलें.
2. माता से दूर होना : जातक की माता भी उससे रुष्ट हो जाती है और वो अपनी माँ के सुख की कमी महसूस करता है. कहने का अर्थ ये है कि उसके और उसकी माता के बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहता.
3. बायीं आँख में कमजोरी : अगर किसी व्यक्ति की बायीं आँख अचानक कमजोर हो जाती है तो उन्हें समझ जाना चाहियें कि उनकी कुंडली में चन्द्रमा रुष्ट हो चुके है.
4. आँखों के पास कालापन : यहीं नहीं जातक की आँखों के पास कालापन भी दिखने लगता है जो उसके बुरे समय और थकान को दर्शाता है.
5. छाती में मलगम जमना : सुनने में तो ये आपको सामान्य सा लक्षण लगता है किन्तु जब अगर आप बाकी संकेतों के साथ इसे देखा जाए तो ये पुष्टि करता है कि हाँ सच में चन्द्रमा कुपित हो चुके है. यहीं नहीं उन्हें अन्य वात रोग भी अपना शिकार बना लेते है.
6. पुराने दिनों का स्मरण : क्योकि चन्द्रमा के गुस्सा होने पर जातक का बुरा समय आरम्भ हो जाता है इसलिए उसे बार बार अपने पुराने दिन स्मरण होते रहते है.
7. अधिक नींद आना : ऐसे में जातक खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से इतना थका लेता है कि उसे नींद आने लग जाती है और वो बिस्तर पर पड़ा रहता है.
8. मासिक धर्म में अनियमितता : अगर किसी महिला पर चन्द्र रुष्ट होते है तो उनके माहवारी चक्र में अनियमितता होनी शुरू हो जाती है.
9. बालों का सफ़ेद होना : कहा जाता है कि चिंता करने से बाल सफ़ेद होते है जबकि बालों के सफ़ेद होने के पीछे भी चन्द्र देव का ही हाथ होता है.
10. सिर दर्द : जातक को धीरे धीरे अन्य बीमारियाँ अपना शिकार बना लेती है और उनमे सबसे पहले आता है साइनस.
11. जल का असंतुलन : इसके अलावा जातक के अंदर जल का अभाव व असंतुलन बना रहता है, उसकी त्वचा शुष्क हो जाती है, वो खुद को कमजोर महसूस करने इस स्थिति में कुछ लोग तो जल्दी जल्दी पानी पीना आरम्भ कर देते है.
12. शरीर में कैल्शियम की कमी : पानी के साथ साथ पीड़ित के शरीर का कैल्शी लगातार कम होता जाता है और उसके शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगती है.
तत्व अनुसार रुष्ट चंद्रमा को मनाएं -
अग्नि तत्व : अगर चन्द्अग्नि तत्व में होने पर कुपित होता है तो जातक को सोमवार के व्रत रखने के साथ साथ चंद्रा की हवन सामग्री से हवन अवश्य कराना चाहियें.
वायु तत्व : वहीँ उनके वायु तत्व में नाराज होने पर आपको चन्द्रमा के सामान को जमीन में दबा देना चाहियें. अगर आप ये ना कर सकें तो आप चन्द्रमा की अंगूठी को अवश्य पहनें.
जल तत्व : लेकिन अगर चन्द्र जल तत्व में रुष्ट है तो आपको सोमवार के दिन कच्चे चावल लेने है और उन्हें बहते पानी में प्रवाहित करना है. इसके अलावा आप किसी महिला को चन्द्रमा का सामान भी अवश्य दें.
पृथ्वी तत्व : पृथ्वी तत्व में चन्द्र के गुस्सा होने पर आपको “ ॐ श्राम् श्रीं श्रोम् सः चंद्रमसे नमः ” मंत्र का जाप करना है, ध्यान रहें कि मंत्र जाप रात को या शिवजी की पूजा के वक़्त ही करें.
चंद्रमाँ के लिए शिव, कृष्ण, भगवती पार्वती, की उपासना और संकस्टी चतुर्थी और पूर्णिमा को सत्यनारायण का व्रत श्रेष्ठ
कस्टप्रद नीच या बल हीन चंद्र के दान करे
चावल, पानी, दूध , चाँदी, सफ़ेद वस्त्र , का दान करे l पीने के पानी की व्यवस्था करे
पुष्य नक्षत्र में शिव अभिषेक जल और दूध से श्रेष्ठ, पितरो को प्रसन्न करे, माता को सम्मान करे और उन्हें खुश रखे ल
चन्द्र
चांदी, शंख, सीपी, गौदुग्ध, गोदही, मोती, सफेद कमल/सफेद गुलाब,
गौमूत्र, गौघृत, गाय का मट्ठा आदि जल में डालकर प्रथम उससे स्नान करें, फिर
शुद्ध जल से।
कपूर, मोती, चांदी, चावल, चीनी, खीर, दूध, मिश्री, खांड़, दही, मट्ठा,
बताशे, सफेद गाय/बैल, सफेद वस्त्र, पेठा आदि का सोमवार को दान करें तथा
सफेद वस्त्र पहनें। यह पूर्णमासी की शाम को भी कर सकते हैं।
→ अश्विनी पूर्णिमा से वर्षभर पूर्णमासी का व्रत करें अथवा शुक्ल पक्ष के
प्रथम सोमवार से दस सोमवार का व्रत करें तथा रात को चन्द्र पूजन करके सफेद
फूल, सफेद चन्दन मिले जल से चन्द्र को अर्घ्य दें। चन्द्र मन्त्र का जाप करें। सफेद
वस्त्र व सफेद चंदन धारण करें। प्रदोष व्रत या सावन के सोमवार के शिव के व्रत
करें। शिवलिंग पर जल व दूध का नित्य अभिषेक करें। शिव चालीसा का पाठ करें
तथा रुद्राक्ष पूजन करें।
→ चन्द्र के 11000 मंत्रों का जाप करें अथवा 'ॐ हिम् नमः शिवाय' यंत्र
का सवा लाख जाप का अनुष्ठान करे और बाद में किसी सुन्दर स्त्री को भोजन
कराकर चन्द्र सम्बन्धी वस्तुएं दान दें।
चांदी के आभूषण तथा मोतियों की माला पहनें, सोमवार को नमक न
खाएं व भोजन एक बार ही करें। ब्राह्मण/सुंदर स्त्री को खीर/दूध खिलाएं/पिलाएं।
सफेद शंख को घर में रखें तथा उसका पूजन नित्य करें।
शिवपुराण से चन्द्रमा के शापग्रस्त होकर क्षय रोगी हो जाने तथा फिर
शिवोपासना से स्वस्थ हो जाने वाले प्रसंग का नित्य पाठ करें अथवा चन्द्र स्तोत्र का
पाठ करें। सफेद गाय को सफेद खाद्य पदार्थ नित्य खिलाएं व उसकी सेवा करें।
पूर्णमासी (विशेषकर शरद पूर्णिमा) की रात को खीर छलनी से ढककर
रात भर खुली छत पर चांदनी में रखें और प्रात: उसका सेवन बिना गरम किए ही
करें। माता, मौसी का आशीर्वाद लें व सेवा करें।
चंद्र माता योगिनी मङ्गला स्तोत्र (सिद्ध साबर तन्त्र)
