चंद्र खंड सारगर्भित विवेचना व्याख्या

    चन्द्रमा 

    बहुवातकफ: प्राज्ञश्चंद्रो बुततनुद्विज। शुभदृक मधु वाक्यश्च चज्चलो मदनातुर:॥ सूर्य के बाद चंद्र का स्थान दूसरा है। देवरूप में चंद्र की पूजा की जाती है। इसका बाहन मृग है। इसे अत्रि गोत्र में उत्पन्न कहा गया है। राशियों में कर्क राशि का यह स्वामी है। इनका वाहन मृग है। चंद्र वायु और कफयुक्‍त प्रकृति वाला, बुद्धिमान, गोल शरीर, सुंदर नेत्र, मीठे बचन बोलने वाला चंचल और कामी है। चंद्र सौम्य एवं शीतल प्रकृति का ग्रह है। ग्रह परिषद में इसे रानी का स्थान  
प्राप्त है। मृगांक, शीत द्युति, शशधर, इन्दु, शशांक, हिमकर, अप्रत अम्बु, जलज, शीतांशु, शशि, शीत रश्मि, कुमुद, तारापति, विधु, राकापति, निशापति, निशाकर, सुधाकर, मयंक, रजनीश आदि इसके पर्याय नाम हैं। यह कालपुरुष का मन ओर स्त्री ग्रह है। गौर जर्ण, दिशा वायव्य, ऋतु वर्षा, क्रीड़ा स्थान , नदी, तालाब, प्रदेश-बनदेश, वर्ण-वैश्य, गुण सत्व, तत्व जल तत्त्व, धातु रक्त, रस लवण , शुक्ल पक्ष रात्रि में बली, दक्षिणायन में बली, इसके देवता वरुण (जल ) है। ; 

मन, माता, माता का दुध, स्त्री का रज, कफ, मिरगी, प्लीहा, कुआं, तालाब, मोती, क्षय, श्वेत रंग, मछली तथा अन्य जलोत्पन्न जीव, मधुकृपा, शरद ऋतु, तपस्वी, यश, लावण्य, मुख कांति, मानसिक भाव, स्फटिक, नरम कपड़ा, विद्युत, ओषधि विक्रेता, लोक कर्म विभाग, होटल, ट्रकसाल, आयात-निर्यात आदि का कारक चंद्रमा है। सूर्य, बुध इसके मित्र ग्रह और मंगल, बृहस्पति, शुक्र, शनि सम ग्रह तथा राहु शा ग्रह है। कुण्डली में छठे, आठवें स्थान में चंद्र हो तो अरिष्टकारक होता है। अशुभ चंद्र के कारण कामला, पीनस, पाण्डु रोग, जलोत्पन्न रोग, स्त्री संबंध से होने वाले रोग, चेचक, अतिसार, प्रतिश्याय (जुकाम) आदि रोग होते हैं। 

चंद्र की धातु चांदी, रत्न-मोती, उपरत्न-ओपल, चंद्रमणि, धान्य-चावल, रस-लवण, बस्त्र-श्वेत, पुष्प-श्वेतकमल, नक्षत्र-रोहिणी, हस्त, श्रवण हैं। इन नक्षत्रों में जन्‍म हो तो चंद्र की महादशा होती है। 

वायु और कफ से युक्त इनकी प्रकृति है। संबद्ध जातक गोल शरीर, सुंदर नेत्र, बुद्धिमान, मधुर वचन बोलने वाला, चंचल ब कामुक होता है। चंद्रमा वायव्य दिशा के स्वामी, श्वेत रंग वाले और वैश्य जाति के ग्रहदेव हैं। चर स्वभाव होना चंद्रमा की अपनी विशेषता है। इनके मित्र सूर्य और बुध हैं, सम में मंगल, बृहस्पति, शुक्र और शनि हैं तथा इनके शत्रुओं में मात्र एक राहु ही है। ये कर्क राशि व धातु के स्वामी हैं। 

चन्द्रमा वायु और कफ्युक्त प्रकृतिवाला, बुद्धिमान, गोल शरीर,सुन्दर नेत्र, मीठे बचन बोलनेवाला चंचल और कामी है।
    
    चन्द्रमा सौम्य एवं शीतल प्रकृति यह है। यरह परिषद में इसे रानीका स्थान प्राप्त है। मूगांक, शीत घुति, सोम, शशाधर, इन्दु, शशांक,हिमकर, अमूत, अम्बु, जलज, शीतांशु, शशि, शीत रश्म, कुमुदद,तारापति, विधु, एकापति, निशापति, निशाकर, सुधाकर, मयंक,रजनीश आदि इसके पर्याय नाम है। यह कालपुरुष का मन औरस्त्री ग्रह है। गौरवर्ण, दिशा- वायव्य, ऋतु-वर्षा, क्रोड़ा स्थान-नदी,तालाव, प्रदेश-वनदेश, वर्ण-वैश्य, गुण-सत्त्व, तत्त्व-जल तत्त्व,धातु-रक्त, रस-लवण, शुक्ल पक्ष रत्रि में बली, दक्षिणायन मेंबली, इसके देवता वरुण (जल) है।

    मन, माता, माता का दुग्ध, स्त्री का रज, कफ, मिरगी, प्लीहा,कुआं, तालाब, मोती, क्षय रोग, श्वेत रंग, मछली तथा अन्यजलोत्पन्न जीव, मधुकृपा, शरद ऋतु, तपस्वी, यश, लावण्य, मुखकान्ति, मानसिक भाव, स्फटिक, नरम कपड़ा, विद्युत, औषधिविक्रेता, लोक कर्म विभाग, होटल, टकसाल, आयात-निर्यात आदिका चन्द्रमा-प्रवाल, मोती, द्रव्य पदार्थ, रसायन, दूध, पानी, तैयार वस्त्र, गायों,शर्करा, आदि से संबंधित व्यवसायों, माँ, मनस् तत्व, सरकार, भोज्यपदार्थ, चाँदी, बुद्धिमत्ता, रक्त का संतृप्तिकरण, युवति, मानसिक स्थिति,हृदय, वाणी की कोमलता आदि का प्रतिनिधित्व करता है,कारक चन्द्र है। सूर्य, बुध इसके मित्र ग्रह और मंगल, बूहस्पति,शुक्र, शनि सम ग्रह तथा राह शत्रु य्रह है। कुण्डली में छठे, आठवेंचन्द्र हो तो अरिष्टकारक होता है। अशुभ चन्द्र के कारण करमलापीनस, परण्डु रोग, जलोत्पन्न रोग, स्त्री संसर्ग से होनेवाले रोग,चेचक, अतिसार, प्रतिश्याय आदि रोग होते है।

    चन्द्र की धातु चांदी, रल्-मोती, उपरल-ओपल, चन्द्रमणि,धान्य-चावल, रस-लवण, वस्त्र-श्वेत, पुष्प-श्वेतकमल, नक्षत्र-रोहिणी,हस्त, श्रवण है। इन नक्षत्रों में जन्म हो तो चन्द्र की महादशा होती है।
माता का सुख, सुन्दरता, यश-प्राप्ति, सुख, दूर का प्रवास, जलयात्रा, मन, बुद्धि, स्वास्थ्य, ऐश्वर्य, संपत्ति, सौंदर्य प्रसाधन, वाहन, धन संचय, धंधे में उन्नति, प्रजापक्ष, जनता, स्त्री, मन, प्रसन्नता, चांदी, शा्गिर्द, दुध, गाय, लज्जा, वस्त्र जल, समुद्र स्तान, चादर, कोमलता, दया, हृदय, चेतनाशर्क्ति, ब्राह्मण, श्वेत वस्त्र श्वेत चंदन श्वेत पुष्प, घी, दही, कपूर, तेल, गेहूँ, लवण, वंशपात्र, वर्णमाला का स्वर-य, र, ल, व, श, व, स, ह; मध्यम आकार, भोजन, राज्य, कुआं, तालाब, बावड़ी, नदी, समुद्र दया, मुदुता, शीघ्रतम गति, भावनाएं, रक्त, जन्मकालीन अवस्था, लग्न, रूप शिशु-अवस्था, फेफड़े, छाती, माता, रानी, अभिलापा, स्मृति, श्वेत रंग स्त्री वर्ग मोती, बायीं आंख, कल्पनाशक्ति, रक्त, आयु भय, धन-दालत, समाचार, व्यापार, पैतृक संपत्ति अनेक प्रकार के शारीरिक रोग तथा उत्तर-पश्चिम दिशा का कारक ग्रह “चंद्र” है। यह कर्क राशि का स्वामी ग्रह है। 

यदि चंद्र जन्मकूंडली में किसी शुभ भाव का स्वामी होकर बलवान हों, तो उस भाव को अपने गुणों में खूब प्रफल्लित तथा परिवर्द्धित करता है। ऐसी कुंडली वाला व्यक्ति अवश्य ही धनादय होता है। बलवान्‌ चंद्र सदेव शुभ फल तथा निर्बल चंद्र दु:ख और दरिद्रता देता है। पृथ्वी के अधिक समीप होने के कारण मनुष्य पर इसका प्रभाव अतिशीघ्र पड़ता हैं 
शुभ चंद्र की दशा में व्याक्त का मन सर्देव प्रसल रहता है। वो दयालु, मधुरभाषी व सत्यवादी होता है। व्यापार में रुचि लेता है और लाभ प्राप्त करता है तथा धर्म में आस्था रखनेवाला होता है। दुधारू पशुओं से लाभ होता है। वो श्वेत वस्त्र श्वेत गहने और श्वेत भोजन से प्रेम करता है। श्वेत गुलाब उसे अत्यधिक प्रिय होता है। सुन्दरता का प्रेमी, चंचल स्वभाव वाला, ऐशो-आराम से जीवन व्यतीत करने वाला, कामुक एवं आश्चर्यजनक कल्पनाशक्ति वाला होता है। 
यदि चंद्र बलवान्‌ न हुआ तो व्यक्ति का स्वभाव बहुत बुरा होता है, वो अति भोगी, स्त्रियों के पीछे दौड़ने वाला, अविश्वासी, धन का गोलमाल करने वाला व अस्थिर चित्त वाला होता है। प्रतिशोध की भावना सदा उसके मन में रहती है। साथ ही वो दंभी, पाखंडी, टूसरों की बुराई ओर चुगली करने वाला होता है। 


 चन्द्र विचार चन्द्र का स्वभाव

    चन्द्रप्रधानतः स्त्री स्वभाव ग्रह है। स्त्री के अच्छे और बुरे दोनोंगुणधर्म चन्द्र मे भी हैं।

    हॅवेलॉक एलिस के अनुसार स्त्री वंशो की जननी (RacialMother) है। श्रीमती बेसी लिओ इन्होने Influence of the planetsयह अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ के अनुसार स्त्री विश्व की माता (UniversalMother) है। हमारे पुराणों में भी आदिशक्ति, आदिमाता, आदिमायाइन शब्दों से स्त्री का वर्णन किया गया है। ज्ञानी पंडितों का कहना है कि स्त्रीएक अजीब पहेली है। विधाता ने इसे क्यों निर्माण किया यह समझनाकठीन है। स्त्री के ही कारण इतिहास काल में पुरे राष्ट्र का विनाश हुआ।आज भी कई व्यक्ति और कुटुम्ब स्त्री के ही कारण नष्ट होते हैं। यह सबहोते हुए भी स्त्री जाति का गुणगान सर्वत्र और सर्वदा होता है। यह ठीक भीहै। विश्व की परम्परा अखंडीत रखने का महान कार्य ईश्वर ने स्त्री जाति कोसाँपा है। विश्व में जो कुछ सुंदर, मंगल और पवित्र है वह सब स्त्री में समायाहै। स्त्री ही राष्ट्र का रक्षण करती है और उसे शिक्षा देती है। वही भावी प्रजाकी निर्मात्री है और उसका पालन पोषण करती है। समाज की प्रगती याअवनति स्त्री पर ही निर्भर है।

    जन्मकुण्डली में चन्द्र जब अकेला होता है अथवा शुभ ग्रहों सेसंम्बधित होता है तब उसमेंस्त्री के स्वाभाविक गुण पाए जाते है। ये गुणमानव जाति की आदिकालीन अवस्था में विशेष रूप से दृष्टीगोचर होते थे।

    उस समय स्त्री और पुरुष नग्न रहते थे। संसार और घर-गृहस्थी की अवस्था नहीं थी। वे लोग समुहों में रहते थे, कंदमुल खाते थे और गुहाओं में रहते थे। बुद्धि और भावना का विकास नही हुआ था। मन में मलिनता या कठिनतानहीं थी। इस समय की स्त्री के स्वाभाविक गुणधर्म इस प्रकार थे -

    १. आनन्द - उस समय संसार की झंझरटें नहीं थी। मृत्यु के सिवाय कोई गंभीर दुख नहीं था। कोई चिन्ता नहीं थी। खा-पीकर पुरुष के साथ आनन्द से रहना यही स्त्री की इच्छा थी। इसलिए उसका स्वभाव आनन्दमय था।

२. निर्व्याज प्रेम -अपना और पराया इस भेद का अभाव था इसलिए स्वार्थ का भी अभाव था। निसर्ग से ही अकृत्रिम के पाठ मिलतें थे।माता का स्वाभाविक (Motherly instinct) पशुपक्षियों में भी पाया जाता है। वही स्त्री के हृदय में प्रधान था। का लोभ नहीं था।

३. निर्लोभ वृत्ति - सगे सम्बधियों की चिन्ता न होने से संपत्ति
स्वभाव है।
४. लज्जा - लज्जा यही स्त्री का अलंकार है। वही उसका स्वाभाव है l

५. स्थिरता - यह भी स्त्री का स्वाभाविक गुण है। घर संसार,
गर्भधारणा, प्रसुति, संतान का संगोपन इन सब कार्यों से स्त्री में स्वभावतःयह गुण निर्माण होता है। इसी के कारण वह बन्धन में रहती है।

    ६. त्याग वृत्ति - उपभोग का त्याग करने की वृत्तिस्त्री मेंविशेषतः होती है। पुरुष में इसकी मात्रा कम होती है।

    ७. सेवा -दुसरों के सुख में ही अपना सुख मानना और सेवा को ही धर्म मानना यही स्त्रीत्व का सार है।    मानवजाति की इस आदिम अवस्था में धीरे धीरे सुधार हुआ।वस्त्र धारण करने की और घर बसाने की पद्धति शुरू हुई। खेती करना औरगांब में रहना प्रारंभ हुआ। समाज की धारणा के लिए नितीनियम बनाए गए।विवाह संस्था स्थापित हुई। अधिकारों की कल्पना निर्माण हुई। सगेसम्बधियों और पड़ोसियों के कारण स्त्री के हृदय में भी परिवर्तन हुआ।उसके नैसर्गिक गुणों की जगह कुछ दुर्गुण भी आए। ‘अनृतं साहस माया'इन शब्दों से उसका वर्णन होने लगा। प्रतिदिन के व्यवहारों से ही ये सब गुणउसमें पैदा हुए। अपने सुख और इज्जत के लिए कोमल स्त्री को भी निष्टुरहोना पड़़ा।चन्द्र यदि अशुभ ग्रहों से सम्बन्धित हो तो उसमें भी स्त्री के येसब दुर्गुण दिखाई देते है। 

चन्द्र का कार्य

    'तूं जीव, तूं हृदय, तूं मजला विसांबातूं चंद्रिकाच अथवा सुखदा सुधा वा'

    काव्य में प्रेमी अपनी प्रियतमा को चन्द्रिका की उपमा देते हैं।भर्तुहरि के अनुसार भी स्त्री की दृष्टी और विलासोंमें पुरुष को आकर्षितकरने का विलक्षण सामर्थ्य होता है। पहले स्त्री को देखने की इच्छा होती है।दर्शन होने पर संभाषण करने की उत्सुकता होती है। वह भी हुआ तोउपभोग की इच्छा होती है। इस कारण पुरुष के विचार और विकारों परअर्थात मन पर स्त्री स्वामित्व सहज ही स्थापित हो सकता है।

    जगत में चन्द्र भी इसी प्रकार अपना स्वभाव प्रभाव बतलाता है।उसी के कारण पौर्णिमा को समुद्र को ज्वार आता है। पागलों का पागलपनभी बढ़ता है। मन पर चन्द्र का स्वामित्व है। इसीलिए शास्त्रों में ‘मनस्तुहिमगु:"ऐसा कहा है।

    चन्द्र में स्री के समान ही लोहचुम्बक जैसी आकर्षण शक्ति(Magnetic force) है। पृथ्वी के चारों ओर कोई दो मील की दुरी परएक चुम्बकीय वलय (Magnetic range) है। इसी की शक्ति से पृथ्वीका संतुलन बना रहता है और वह अपने अक्ष पर घुमती रहती है। चन्द्र कापरिणाम इस वलय पर होता है। चन्द्र के कारण यह वलय पृथ्वी के चारोंओर घुमता है और उसकी आकर्षण शक्ति बनी रहती है। इस वलय कीएक प्रदक्षिणा ११ या ११।। वर्षों में होती है। इस विषय में श्रीमती बेसीलिओ ने कहा है-

    Further we find the moon regulating the tidesand also affecting vegetation, her periodical waxingand waning is a constant Symbol of the Ebb and flowof the great magnetic tides that are ever sweepingthrough the various planes of Nature. She is mostcomplex of all symbols. Luner magnetisim generateslife, preserves it and destroys it, psychically as well asphysically.

    चन्द्र भी ज्वार भाटे का नियमन करता है और वनस्पतियों पर भी उसकापरिणाम होता है। जगत के विभिन्न स्तरों में जो चुम्बकीय शक्तियाँ है उनमेंउतार-चढ़ाव होते रहता है। चन्द्र की वृद्धी और क्षय इसी का प्रतीक है।चन्द्र की चुम्बकीय शक्ति से जीवन का मानसिक और शारीरिक दोनोंदृष्टियों से निर्माण होता है, रक्षण होता है और विनाश भी होता है। सृष्टि केसमान प्राणियों पर भी चन्द्र के अनुकूल व प्रतिकुल परिणाम होते है। इन्हीका अब शास्त्रानुसार विवेचन करेगे।

    चन्द्र का कारकत्व

    बृहत्पाराशरी-माता-मनः-पुष्टि-गन्ध-रस-इक्ष-गोधूम-क्षारक-बीज-शक्तिकार्य-सत्य रजतादिकारकश्चन्द्रः।।

    मातृ- चचन्द्र को पृथ्वी की माता माना गया है। माता के समानचचन्द्र पृथ्वी का पालनपोषण करता है और उसकी जीवनशक्ति का विकासकरता है और इसलिए चन्द्र को माता का कारकत्व दिया गया है। 

मन-

    चन्द्र के समान मन की स्थिति होती है और मानव का सुखदुःख मन पर हीअवलम्बित होता हैं इसलिए मन का कारकत्व भी चन्द्र को दिया है।जाना चाहिए क्यों कि चन्द्र के समान शरीर की भी स्थिति में क्षय और वृद्धिहोती है किन्तु इस विषय का विचार रवि और मंगल की स्थिति से अधिक


    पुष्टि - शरीर की पुष्टि कैसी है इसका विचार चन्द्र की स्थिति से किया सम्बन्धित है।


    गन्ध - सृष्टि में निसर्गतः एक अद्भुत सुगन्ध व्याप्त होती है।फुलों के अथवा इत्न के सुगन्ध से सर्वथा भिन्न ऐसा यह गुप्त सुगन्ध है।योगशास्त्र के अभ्यास से ही इसका ज्ञान हो सकता है। जिन्हें यह ज्ञान होजाता है वे संसार का त्याग कर वन में निवास करने लगते है। स्वामीविवेकानंद ने ‘राजयोग' में इसका कुछ वर्णन किया है। यह सुगन्ध चन्द्र सेही पृथ्वी पर आता है। फुलों का अथवा इत्र का गन्ध भी चन्द्र परअवलम्बित कहा गया है। वस्तुतः इस बाह्य सुगन्ध का विचार शुक्र पर सेकरना चाहिए। रस-द्रव पदार्थ यह कारकत्व चन्द्र पर दिया गया है क्योंकिचन्द्र भी द्रवस्वरूप है। रस शब्द का एक अर्थ पारा यह भी है।इक्षु-गोधुम-ईख तथा गेहूं यह कारकत्व चन्द्र को कैसे दिया गया यह समझ में नहीं आता। क्षारक-क्षार पदार्थों पर चन्द्र का स्वामित्व है यहस्पष्ट है। समुद्र शारों से परिपूर्ण है और इसे पीर्णिमा के दिन चन्द्र के हीकारण ज्वार आता है। यह परिणाम सादे पानी के तालाब पर नहीं होता।इससे स्पष्ट होता है कि क्षारों पर चन्द्र का स्वामित्व है। बीजशक्तिकार्य-स्त्री में गर्भधारणा की शक्ति है या नहीं इसका विचार चन्द्र की स्थिति सेहोता है। स्त्री पर चंद्र का स्वामित्व है। देहातियों में ऐसी एक धारणा है किखेत जोतते बक्त बीज बोने का काम पुरुषों ने ही करना चाहिए। यदि बीजबोने का काम स्व्रियों ने किया तो फसल नही आती। बीज बोये जाने परउसके संवर्धन का काम कुछ काल तक स्त्री को ही करना होता है। किसीग्रन्थकार ने लिखा है कि स्त्रियों की गर्भधारणा करने की शक्ति का तथापुरुषों के वीर्य की गर्भोत्पादन शक्ति का विचार चन्द्र की स्थिति से होता है।किन्तु हमारे मत से इस मत का दुसरा अंश बिलकुल गलत है। पुरुष के वीर्यकी गर्भोत्पादन शक्ति का विचार रवि की स्थिति से करना चाहिए। सस्यपश्चात्धान्यः- मुख्य फसल के बाद उगने वाली फसल (पश्चात धान्य)पर चन्द्र का स्वामित्व होता है। इसलिए चन्द्र पर यह कारकत्व दिया है।रजत-चांदी सफेद होती है इसलिए चन्द्र पर यह कारकत्व दिया गया है।किन्तु मेरे विचार से इस धातु का विचार शुक्र की स्थिती से करना चाहिए।सर्वार्थचिन्तामणि-धवल-चामर-यशो-दया-आमोद-कान्ति मुखला-वण्य-मातृ मनः प्रसादकारकश्चन्द्रधवल-सफेद रंग की योजना चन्द्र के साथ की गयी है यहस्वाभाविक ही है। चामर-राजा अथवा महान साधुसन्तों के सिर पर ढुरनेके लिए चामर का उपयोग किया जाता है। इसका कारकत्व राहु पर देनाचाहिए। यश-कार्य में सफलता प्राप्त होना यह शनि और राहू का     कारकत्व है। इसी ग्रन्थकार ने राहू पर यह कारकत्व दिया भी है। यश प्राप्तकरने के लिए मन में जो स्थिरता और सातत्य की जरूरी होती है उसकाविचार चन्द्र से करना चाहिए। दया-आमोद-दया और आनन्द ये चन्द्र केस्वाभाविक गुण है अतः ये कारकत्व ठीक है। कान्ति-चन्द्र तेजस्वी हैइसलिए कान्ति अर्थात तेज का विचार चन्द्र से होता है।मुखलावण्य-मुख का सौन्दर्य यह कारकत्व भी योग्य है। चन्द्र कास्वामित्व जिन पर होता है वे बहुत मोहक होते है और उनका मुख विशेषरूप से तेजस्वी होता है। हमारे कवियों ने बहुत सुन्दर प्रकारों से चन्द्र कीस्त्रियों के मुखों से तुलना की है। कवि कुलगुरु कालिदास के लघुकाव्यऋतुसंहार में ऐसे वर्णन बहुत अच्छे हैं। इस प्रकार मुख की सुन्दरता यहचन्द्र का कारकत्व कहा गया है वह योग्य ही है।


    वैद्यनाथ-चेतो-बुद्धि नृप-प्रसाद-जननीस पत्करश्चन्द्रमाः॥बुद्धि -बुद्धि का कारक चन्द्र माना है इसका स्पष्टीकरण नहीहोता। चन्द्र मन का कारक है। मन और बुद्धि अलग अलग है। उनको एकही मानना विचार-संगत नही होगा। बुद्धि का कारक बुध को माननाचाहिए।

    नृपप्रसाद -राजा की कृपा का कारक चन्द्र है। किसी संस्थानया देशी रियासत में यदि रानी की कृपा किसी सेवक पर होती है तो राजा भीउस पर प्रसन्न होता था। चन्द्र को रानी का स्थान दिया है। इसलिए उसेराजकृपा का कारक माना गया है। संपत्ति - यह कारकत्व चन्द्र पर कैसेदिया गया इसका स्पष्टीकरण नहीं होता। चन्द्र को संपत्ति का कारक माननागलत है।विदयारण्य -मनोबुद्धिप्रसादंच मातृचिन्तां च चन्द्रमाः॥

    मातृचिन्ता - रविविचार में जिस प्रकार पितृचिन्ता का विचारकिया गया उसी प्रकार यहां मातृचिन्ता का करना चाहिए।

    कल्याणवर्मा-कवि-कुसुम-भोज्य-मणि-रजत-शंख-लवणोदकेशु वस्त्राणम्। भूषण-नारी-धृत-कुज-तैल-निद्रा-प्रभुशचन्द्रः।।कवि - यह कारकत्व अन्य सभी शास्त्रकारों ने शुक्र का कहाहै। कवि यह शुक्र का एक नाम ही है। किन्तु मेरे विचारों से कल्याणवर्मा नेचन्द्र पर यह कारकत्व विचारपूर्वक ही दिया है। संसार में कवि, ज्योतिषी,गायक, योगी और संशोधक ये पांच प्रकार के लोग ऐसे होते है जो अपनेकार्य में मग्न होने पर सारे बाह्य जगत को भूल जाते है। मन इतना एकाग्रऔर तन्मय हो जाता है कि वे अपने शरीर की सुध भी भूल जाते है। किसीकवि के हृदय से जब काव्य की निर्मिती होती है तब उसे बाह्य जगत कीपूरी विस्मृति हो जाती है। ऐसा नहीं हुआ तो नितान्त रमणीय और मनोहरकाव्य ही निर्माण नही होता। इस तरह तल्लीनता की मनोवृत्ति चन्द्र परअवलम्बित है। इसलिए इन पांचों लोगो का कारकत्व मेरे विचार से चन्द्रको ही देना चाहिए। कुसुम-फूल सुंदर और सुगन्धित होता है इसलिए यहकारकत्व चन्द्र का कहा गया है। भोज्य-रसोई बनाना स्त्रियों का कार्य हैऔर चन्द्र को गृहिणी का स्थान दिया गया है इसलिए खाद्य अन्न काकारकत्व चन्द्र पर दिया गया। मणि-स्त्रियों को प्रिय होते हैं इसलिए यहचन्द्र का कारकत्व कहा गया। शंख- लवणोदक- खारा पानी यहकारकत्व चन्द्र का है क्योंकि कि समुद्र पर चन्द्र का स्वामित्व है। शंखमुख्यतः समुद्र में पैदा होते हैं इसलिए उनका भी कारक चन्द्र ही कहागया है।

    वस्त्र - चन्द्रस्त्री सदृश ग्रह हैं। स्त्रियों को विविध वस्त्र बहुत     प्रिय होते है। इसलिए वस्त्रों का कारक चन्द्र माना है। भूषण-अलंकार भीस्त्रियों को बहुत प्रिय होते है इसलिए इनका कारक चन्द्र माना है। घृत औरतैल - ये द्रव पदार्थ है इसलिए इनका कारकत्व चन्द्र पर दिया गया।निद्रा -नींद का कारक वस्तुतः शनि होना चाहिए क्योंकि नींद प्रतिदिनप्राप्त होने वाली मृत्यु ही है। मृत्यु पर शनि का स्वामित्व है। अतः यहकारकत्व गलत है।


    जीवनाथ दैवज्ञ - धवल-चामर-किर्ति-दया-मनो-मुख-कला-जननी-मनसामयि। विधुबलाबलयोग विमर्शतः-कृतिकलानिपुणःसुख-मादिशेत्॥


    किर्ति- यही मानव को प्राप्त होने वाली सच्ची संपत्त है। किन्तुइसका विचार शनि और राहु से करना होता है। चन्द्र पर यह कारकत्व देनागलत है। कृति - यह कारकत्व सही है क्योंकि कृति का आरंभ मन से होताहै। कलानिपुण - कसीदा और झिग का काम, लकडी अथवा धातु कानक्षी काम, चित्रकला इत्यादि के लिए जो मनोवृत्ति और ज्ञान जरूरी होताहै उसका विचार चन्द्र से होता है किन्तु इन कलाओं का साक्षात् विचारशुक्र की स्थिती से होगा।


    कालिदास- बुद्धिःपुष्प-सुगन्ध-दुर्ग-गमन-व्याधि-द्विजा-लस्यक-श्लेश्मापस्मृति-गुल्म-भाव-हृदय-स्त्री-सौम्य-पापाम्लकानिद्रा-सौख्य-जल-स्वरूप-रजत-स्थुलेक्षु-शीतज्वरा। यात्रा-कूप-तटाक मातृ-समद्ृग्-मध्यान्ह-मुक्ता-क्षयाः।१॥ धावल्यकटिसूत्र-कास्य-लवण-एस्वा मनः-शक्यतो वापी-बज्र-शरन्मुहूर्त-मुख-कान्तिश्वेत-चर्णोदराः। गौरिभक्ति-मधु-प्रसाद-परिहासाः पुष्टि -गोधूमकामोहाःकान्तिमुखे मनो-जव-दधि-प्रीतिस्तपस्वी यशः॥२॥

    लावण्यं निशिवीर्य-पश्चिममुखे विट्ट्-क्षार-कार्याप्तयः प्रत्यग्-दिकू-प्रिय-मध्यलोक नवरलानीह मध्य वयः। जीवो भोजन -दूरदेशगमने लग्नंचदो्व्याधियः छन्नाद्यंचित-राजाचिन्ह-सुफले सदूरक्तधातुस्तथा॥३॥मीनाद्या जलजाः सरीसृपपदुकले सदविकासस्फुरत्-शुद्धस्तत्स्फटिकास्ततो मृदुलक वस्त्रत्वमी स्युर्विधोः

    दुर्ग - किला यह मंगल के अधिकार का विषय है अतः यहकारकत्व गलत है। गमन- आना जाना यह कारकत्व सम्भवतः चन्द्र कीसतत गति को देखकर कहा गया है। व्याधि -विकार का विचार करते हुएयह कारकत्व ठीक होता है। किन्तु विशिष्ट रोगों के लिए अन्य ग्रहों का भीविचार आवश्यक होता है। द्विज-ब्राह्मण किन्तु हमारे विचार से यहां वैश्यअर्थात् व्यापारी यह कारकत्व मानना चाहिए। आलस्य - यह गुणधर्मचन्द्र में नहीं, शनि में है। अतः यह कारकत्व गलत है। श्लेष्मा - यह रोगशनि के अधिकार में है। अपस्मृति -इसके दो अर्थ हो सक़ते है-स्मृतिनष्ट होना अथवा अपस्मार होना ये दोनो राहु के अधिकार में है। गुल्म -उदर का वायुरोग यह गुरु के अधिकार में है। हृदय - इस पर चन्द्र कास्वामित्व है। सौम्य-चन्द्र शान्त है अतः यह कारकत्व दिया गया। पाप-चन्द्र की स्थिती कुछ पापमूलक है अतः यह कारकत्व दिया गया। स्थूल -यह कारकत्व योग्य नहीं है क्योंकि चन्द्र के स्वामित्व के लोग पतले कद केहोते है। शीतज्वर-चन्द्र का एक कारकत्व शीत यह कहा गया है उसी परसे यह कारकत्व कहा गया। यात्रा - देवस्थानों का दर्शन यह कारकत्वकैसे दिया यह स्पष्ट नहीं होता। कूपतटाक- कुंए और तालाब यहकारकत्व चन्द्र को दिया गया क्योंकि पानी उसी का स्वामित्व है।समद्ृक-साधी और सम दृष्टि यह कारकत्व चन्द्र का माना गया क्यों कि     चन्द्र के किरण इसी प्रकार पृथ्वी पर आते है। मुक्ता-मोती का रंग चन्द्र केसमान है और आकार भी गोल है अतः यह कारकत्व सही है। क्षय-वद्यप्रतिपदा से अमावस्या तक चन्द्र क्षीण होता है अतः क्षयरोग का वह कारककहा किन्तु अकेले चन्द्र से यह रोग होता है ऐसा नहीं मानना चाहिए।कटिसूत्र -करधनी यह कारकत्व कैसे कहा गया यह स्पष्ट नहीं होता।न्हस्व-छोटा-इसके शरीर की ऊंचाई कम मानी है। मनःशक्तयः-मन की शक्तियां इसका कुछ विवेचन रवि-विचार में किया गया है।वज्न-यह इन्द्र के शस्त्र का नाम है उसका यहां कोई सम्बन्ध नहीं है। किन्तुवज्र यह नाम शुभ्र वर्ण के तेजस्वी हीरे का भी है। उस अर्थ में यह कारकत्वयोग्य है। शरद्-यह ऋतु चन्द्र के अधिकार में कहा गया क्यों कि चन्द्रकाधान्य पर स्वामित्व है और धान्य शरद ऋतु में ही तैयार होता है।


    मुहूर्त - साडेतीन घटिका अथवा किसी कार्य के लिए नियोजितसमया यह कारकत्व सही है। मुखकान्ति-पुरुष के मुख पर जो एकनैसर्गिक तेज होता है उस पर चन्द्र का स्वामित्व है। उदर- यह कारकत्वकैसे दिया गया यह स्पष्ट नहीं होता। गौरिभक्ति -रवि को शंकर का औरचन्द्र को पार्वती का प्रतिनिधी माना गया है अतः पार्वती की भक्ति काकारकत्व चन्द्र को दिया गया।


    मधु-मीठा यह कारकत्व अनुभव में नही आता। परिहास-हंसीमजाक यह चन्द्र का गुणधर्म नहीं है अतः यह कारकत्व गलत है।आमोद-आनन्द यह स्वभाव का कारकत्व सही है। मनोजव-मन कीगति यह कारकत्व किसलिए कहा गया यह स्पष्ट नही होता। मन की गतिकैसी और कितनी है इसका विचार जन्मकाल के चन्द्र की गति से होसकता है। गति अधिक हो तो चंचलता अधिक होगी और कम हो तो     चंचलता भी कम होगी। दधि-दही सफेद रंग का क्षार से होनेवाला औरद्रव पदार्थ है अतः यह कारकत्व योग्य है। प्रेम - यह चन्द्र का गुणधर्म है।तपस्वी- यह कारकत्व गलत है। चन्द्र के स्वामित्व के व्यक्ति तपस्वीकभी नहीं हुए है। निशिवार्य - चन्द्र के स्वामित्व के व्यक्ति रात्रि मेंबलवान होते है। पश्चिममुख- चन्द्र के उदयास्त अच्छी तरह देखने परप्रतीत होगा कि वह पश्चिम से पूर्व की ओर जाता है। शुक्ल पक्ष में पश्चिममें ही उसका उदय होता है और उसी ओर की बाजू अधिक तेजस्वी होतीहै। फिर एक एक कला बढ़ती है। विट - हंसोड और स्त्रियों के विक्रय मेंमदद करने वाला यह कारकत्व बिलकुल गलत है। आप्त-सम्बन्धी लोगसम्बन्धित स्त्रियों के विषय में इस कारकत्व का उपयोग हो सकता है।प्रत्यक् दिकृप्रिय -जिसे पश्चिम दिशा प्रिय है, क्षार, लावण्य, श्वेतवर्ण,वापी - कुंआ, लवण - नमक, धावल्य- शुभ्रता इन कारकत्त्वों कावर्णन पहले हो चुका है। कालिदास ने निरर्थक कारकत्व बहुत कहा है।


    William Lily - "She signifies queens,Countesses, ladies, all manners of women, as also thecommon people, travellers, pilgrims, sailors,Fishermen, Fishmongers, Brewers, Tapstes,Publicans, Letter carriers, Coachmen, Huntsmen,messengers, Mariners, Milkers, Maltsters, Drunkards,Oysterwives, Fisherwomen, Charmwomen,Tripewomen and generally such women as carrycommodities in the streets, as also Midwives, Nurses,etc. Hackneymen, Watermen, Waterbearers."

 विलियम लिलि - रानियाँ, सरदारों की पलियाँ, कुलीन     गृहिणी, स्त्रियँ, सामान्य जनता, प्रवासी, यात्री, खलासी, मछुआरे,प्रकाशक, पत्रवाहक, तांगेवाले, शिकारी, दूत, ग्वाले, पियक्कड, रास्तोंपर चीजें बेचनेवाली स्त्रियाँ, नर्स, पानी ढोनेवाले, मांत्रिक स्त्रियाँ, शराबबनानेवाले और बेचनेवाले इन व्यक्तियों का विचार चन्द्र से होता है। चन्द्रको सूर्य से प्रकाश प्राप्त होता है इसलिए उष्णता के निर्माण में भी उसका कुछ अंश है।


    हमारे मत से चन्द्र का कारकत्व - विद्युत प्रवाह, चुंबकीयप्रवाह, माता का दूध (संतान को किस प्रकार और कितना मिलेगा),स्त्रियों का रजोदर्शन (मासिक धर्म किस प्रकार और प्रमाण में होगा), रेल्वेअधिकारी, जहाजों के कारखाने, दवाई के दूकानदार, लोककर्मविभाग,कांच के कारखाने, वेधशाला, पश्चिमीय द्रव औषध, पेटेंट दवाइयां,अनाज के दूकान, किराना सामान, सिंचाई विभाग, म्युनिसिपालिटी कापानी विभाग, नमक बनाने के कारखाने, आयात निर्यात कर विभाग,जहाज खलासी, टंकसाल, नोट छपाने के स्थान, दूध की डेअरी, वनस्पतिशास्त्र,वैद्यकशास्त्र, जंतुशास्त्र, सूक्ष्म जीवशास्त्र, समता कानून, विमान,चावल, कपास, सफेद वस्त्र।


    जन्मकुण्डली में उपयोगी कारकत्व - माता, मन,बीजशक्ति, यश, पुष्टि, बुद्धि, तृपप्रसाद, संपत्ति, मातृचिन्ता, कवि,भक्ष्य, वस्त्र, नींद, कीर्ति, कलानिपुण, व्याधि, मां का दूध, स्त्री कारजोदर्शन, पश्चिमीय द्रव्य, औषध, पेटेंट दवाइयां अनाज की दुकाने,किराना माल की दुकानें, सिंचाई विभाग, पानी विभाग, नमक केकारखाने, आयात निर्यात कर, समुद्री विभाग, टंकसाल, कांच के     कारखाने, वेध शाला, रेल्वे, जहाज, दवाई की दुकाने, लोककर्म विभाग,डेअरी, रेल्वे, पोस्ट विभाग, जहाजों के कारखानें, नोट छपाने केछापखाने।


    जन्मकुण्डली से शिक्षण के विषय में चन्द्र का कारकत्व -नर्स, मिडवाइफ, लोककर्म विभाग, पानी विभाग, इंजीनियरिंग,वनस्पतिशास्त्र, वैद्यकशास्त्र, समताकानून, जंतुशास्त्र, सूक्ष्म जीवशास्त्रीस्वभाव का कारकत्व - दया, मोह, आलस्य, मजाक, मनकी गति, प्रीति।


    मेदिनीय ज्योतिष में उपयोगी कारकत्व - रानी, सरदार कीपत्नी, उच्चकुलीन स्त्री, सामान्य जनता, प्रकाशक, किले, चांदी, यात्रा,गन्ध, रस, ईख, गेहं, चामर, फुल, रन, शंख, खारा पानी, अलंकार,घीट तेल। विलियम लिली ने जो उपयोग में न आने योग्य कारकत्व दिया हैवह सभी व्यवसायों के लिए है। इस विषय में मेरा अनुभव इस प्रकार है-

    मेष- सार्वजनिक उपकार कार्य, जंगल विभाग। वृषभ-अस्पताल के कर्मचारी, रसोई बनानेवाले, पानी ढोनेवाले, तरकारीबेचनेवाले, अनाज और किराना माल की दुकाने। मिथुन - वैद्य,प्रवचनकार, पुराणवाचका कर्क - सोना चांदी गलाना। सिंह - बडेअधिकार पद की नौकरी। कन्या - रेल्वे, डाक तार विभाग, रेकार्डिंग।तुला - गायन शिक्षक, रेडियो के अधिकारी। वृश्चिक - डॉक्टर,हाफकिन्स इन्स्टिट्युट जैसी वैद्यकीय संस्थाओं के कर्मचारी। धनु -इंजीनियर। मकर - बिल्डिंग कॉॅन्ट्रॅक्टर। कुंभ - शास्त्रीय कार्यों के लिएनौकरी। मीन-लेखक, सन्मानयुक्त सरकारी नौकरी।

    चन्द्र का अधिक वर्णन (ग्रहयोनि भेद)

    वैधनाथ-चिलमिन्दुः। चन्द्र मानव के चित्त का स्वामी ऐसाकहा है। किन्तु चन्द्र का स्वामित्व मन पर है। चित्त और मन एक ही नही है।वेदान्त के अनुसार परब्रम्ह और माया इन दोनों से ही सारी सृष्टि की उत्पत्तिहोती है। इन में माया के कारण ही जीव और उसका मन उत्पज होते हैं। इनसम्बन्ध में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इस चतुष्टय का वेदान्त में वर्णनआता है। मेरे विचार से मन पर चन्द्र का, बुद्धि पर बुध का, चित्त पर गुरुका, शुद्ध सात्विक अहंकार पर शनि का, झूठे अभिमान पर मंगल का,ज्ञान पर शुक्र का और मोक्ष पर राहु का अधिकार है। इसलिए चन्द्र का जीवके मन पर स्वामित्व मानना चाहिए। राजाना - प्राचीन ग्रंथकारों ने चन्द्रको राजा माना है। स्व. गुरुवर्य नवाथेजी के मत से यह प्रजा का कारक है।किन्तु मेरे मत से सूर्य राजा और चन्द्र रानी है यही विभाजन अच्छा है।चन्द्रः सितांगो युवा - यह शुभ्न वर्ण का और युवक है। प्रकाशकशीतकरः -यह प्रकाश देता है।

    शुभःशशी-यह शुभ ग्रह है ऐसा माना गया है। किन्तु यह पापफल भी बहुत देता है और अपने स्थान का फल नष्ट करता है। क्षीण चन्द्र केपाप फल का वर्णन इस श्लोक में मिलता है।

    शुक्लादिकानि दशकेऽहनि मध्यवीर्यशाली द्वितीय दश-केऽतिशुभप्रदौसौ। चन्द्रस्तृतीय दशके बलवर्जितस्तु सौम्येक्षणा-दिसहितो यदिशोभनः स्यात्॥

अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक चन्द्र मध्यम बलवान होता     है। इस के बाद के दस दिन तक अति बलवान होता है इसलिए शुभ फलदेता है। अन्तिम दस दिनों में चन्द्र बलहीन होता है। बलहीन चन्द्र शुभग्रह सेयुक्त अथवा दृष्ट हो तो उसके फल अच्छे मिलते है। पहले दस दिनों मेंकुमार अवस्था होती है इसलिए कोई विशेष कार्य नही हो सकता। बीच केदस दिनों में तारुण्य और प्रौद़ता होती है इस लिए उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यकिए जाते हैं। अन्तिम दस दिनों में वृद्धता और मृत्यु की स्थिति होती है इसलिएकोई कार्य नही हो पाता। इस प्रकार दिनमान से चन्द्र के फल कहेगये हैं।

    शिरसा चन्द्रः व्रजेत् - इस का उदय सिर की ओर से होता है।इस कल्पना का स्पष्टीकरण करना कठिन है। क्यों कि संसार में ९६ फीसदीमानवों का जन्म सिर की ही ओर से होता है इसलिए इस फलनिर्देश में कोईमहत्व नहीं रहता। कुंडली में लग्न में चन्द्र हो और लग्न की राशि का उदयशिरोभाग से हो रहा हो तो शायद इस फलादेश का कोई विशेष अनुभवमिल सकेगा।

    सरीसृपाकारयुतः शशांकः - जिन्हें पांव नही होते जो जमीनपर घसरते हुए ही चलते हैं- ऐसे सांप आदि प्राणियों पर राहु का स्वामित्वहै। इन्हं चन्द्र के अधिकार में मानना गलत है। चन्द्र को द्विपाद ही माननाचाहिए।

    जलाशयः चन्द्रः -चन्द्र जलस्वरुप है इसलिए कुए, तालाब,समुद्र आदि जलाशयों पर इसका स्वामित्व होता है।

    विधुरब्दसप्ततिः - चन्द्र की आयु सत्तर वर्ष की है। यह मतठीक प्रतीत नही होता। ७० वें वर्ष तक वृद्धता के कारण मन की शक्ति नष्टहोती है उस समय कोई विशेष कार्य नही हो सकता। उस वर्ष पर शनि कास्वामित्व मानना योग्य होगा। चन्द्र का अधिकार तारुण्य और प्रौढावस्था     पर है। आचार्य ने २४ से २६ वें वर्ष का काल कहा है।

    चन्द्रः सितः - यह शुभ्र वर्ण का है। प्रश्न कुण्डली में नष्ट हुई

    वस्तुओं के बारे में विचार करते समय इस वर्णन का उपयोग करना चाहिएचन्द्रः मणिः - बच्चो के कंठ में नजर लगने से बचने के लिएएक मणि बांधा जाता है इसे चन्द्रमणि कहते हैं।

    देवता अम्बुः - यह जल स्वरूप है इसलिए चन्द्र की देवता भी

    पानी ही कही गयी है। रत्नों में मोती और नए वस्त्र इनका विचार कारकप्रकरण में किया है।

    दिशा वायव्या - देवताओं को वायव्य दिशा दि है इसलियेदेवताओं के अधिकार में जलाशय होते है इसी कारण प्रश्नविचार में औरनाडीग्रथों में चन्द्र की वायव्य दिशा कही गयी है। चन्द्र यदि जन्मकुण्डली मेंप्रबल हो तो वायव्य दिशा में उस व्यक्ति का भाग्योदय होता है। कोई बच्चाभाग गया हो अथवा कोई जानवर राह भुल गया हो अथवा चोरी हुई हो उससमय यदि लग्न में चन्द्र हो तो वायव्य दिशा में उनका पता चलता है।वास्तव में दिशा के फल की उपपत्ति बतलाना सम्भव नही है। ये फल तोपुरातन आचार्यें ने अर्तींद्रिय दिव्य ज्ञान से ही बतलाए हैं। उपपत्ति की दृष्टिसे पूर्व या पश्चिम ये चन्द्र की दिशाएं हो सकती है क्यों कि उसका उदयइन्हीं दिशाओं में होता है।

    ऋतु - जातकपारिजात में चन्द्र की वर्षा ऋतु कही गयी है यहठीक है। कालिदास ने यहां शरद कतु कहा है वह ठीक प्रतीत नही होता।

    क्रीडास्थान - नदी, तालाब अथवा समुद्र के तीर पर केक्रीडास्थानों पर चन्द्र का स्वामित्व होता है।

    चन्द्र के प्रदेश -कल्याणवर्मा ने वनदेश शब्द से इसका वर्णन     किया है। मेरे मत से बंगाल प्रदेश चन्द्र के स्वामित्व में है। जातकपारिजात मेंकहे हुए प्रदेशों का और ग्रहां का सम्बन्ध ठीक नहीं है। आचार्य नेबृहतूसंहिता में दिया हुआ वर्णन उचित है।

    वर्ण-चन्द्र का वैश्य वर्ण कहा गया है।

    गुण - शीतकिरणः सत्वप्रधानो ग्रहः। इस में सच्व गुण प्रधानहोता है इसका विवरण पहले हो चुका है।

    तत्व - चन्द्र के अधिकार में किसी भी तत्त्व का वर्णन नहीमिलता यह आश्चर्यजनक है। मेरे ख्याल से जल तत्त्व पर चन्द्र काअधिकार है। शास्त्रोंमे यह त्त्व शुक्र के अधीन कहा गया है वह ठीक नहीप्रतीत होता।

    कधिर - खून पर चन्द्र का स्वामित्व है। इसे कुछ विद्वानज्योतिषियों ने गलत माना है। किन्तु मेरे मत से खून से चन्द्र का विशेषसम्बन्ध है। कुण्डली में चन्द्र यदि मंगलद्वारा दुषित हो तो उस व्यक्ति कारक्त नियम से दुषित होता है। कुण्डली में चन्द्र क्षीण हो तो रक्ताभिसरणठीक नही होता। रक्त की निर्मिती पर अवश्य मंगल का स्वामित्व है। किन्तुनिर्माण हो जाने के बाद रक्त की अवस्थाएं चन्द्र की ही स्थिती के अनुसारहोती हैं।

    रस -लवण अर्थात नमकीन (खट्टापन) पर चन्द्र का अधिकारहै। नमक का उत्पतिस्थान जो समुद्र वह भी चन्द्र के ही अधिकार में है।

    काल-चन्द्र बहुत चंचल है। कभी एक जगह स्थिर नही रहताइसलिए क्षण यह इसका काल कहा गया है।

    दृष्टि - समदृष्टि यह चन्द्र का विशेष है। नैसर्गिक कुण्डली मेंचतुर्थस्थान में कर्क राशि होती है जो चन्द्र का स्वगृह है। यहीं यह समदृष्टि     बलवान होती है।

    निशीन्दुः - चन्द्र रात के समय बलवान होता है इसका वर्णनपहले हुआ है।

    गुरुणा निशाकरः - गुरु के द्वारा चन्द्र पराजित होता है। गुरु केसंयोग से चन्द्र के शुभ फल नष्ट होकर अशुभ फल मिलते हैं।

    चन्द्र के बलवान होने का वर्णन अगले श्लोक में मिलता है -चन्द्रःकर्किणि गोपतौ निजजनद्रेष्काणहोरांशके।राश्यंते शुभवीक्षणे निशिसुखे याम्यायने वीर्यवान्॥इन्दु:सर्वकलाधरो यदि बली सर्वत्र सन्धिर्विना।सर्वव्योमचरेक्षितस्तु कुरुते भूपालयोगं नृणाम्॥

    कर्क और वृषभ राशि में, सोमवार को, ट्रेष्क्राण और होराकुण्डली में स्वगृह में हो तो, राशि के अन्तिम भाग में, शुभ ग्रहों की दृष्टिमें, रात में, चतुर्थ स्थान में तथा दक्षिणायन में सांध्य छोड़कर अन्यत्र चन्द्रबलवान होता है। चन्द्र पर यदि सब ग्रहों की दृष्टि हो तो वह राजयोग होता है।

    आचार्य ने बृहत्संहिता में चन्द्र किस समय कल्याणकारी होता हैइसका वर्णन अगले श्लोकों द्वारा किया है।

    प्रालेयकुंदकुमुदस्फटिकावदातो। यतलादिवाद्रिसुतयापरिमृज्य चन्द्रः। उच्चैःकृतो निशि भविष्यति मे शिवाय। यो दृष्यतेसभवत जगत:शवययदकमदमृणलहगौरः तथ-नियमात् क्षयमेति वर्धते वा। अविकृतगरतिमंडलांशुयोगी भवतिनृणां विजयाय शीतरश्मिः॥२॥

    बृहतसंहिता श्लोक ३०-३९ दैवज्ञ कामधेनु पान २७-२

    अर्थात् बर्फ, कुंदपुष्प अथवा कुमुद या स्फटिक के समान शुभ्नचन्द्र जगत को आनंद देता है। तिथियों के नियमानुसार इसकी क्षयवृद्धि होतथा बीच में कोई विकार न हो तो वह सबका कल्याण करता है। पहलेश्लोक में राशि के अन्तिम भाग में चन्द्र बलवान कहा गया है। जैसे लेखककी ही कुण्डली में वृषभ राशि के दूसरे अंश में चन्द्र है अंश का वर्णनचारुबेलने अपने ग्रंथ मे - "8-20 ALarge figure 2 comes beforemy Vision" Denotes that he or she, born under thisdegree will live alone, isolated mentally; not in Sympathy with present state of things.

    फिर भी चारुबेल का फलादेश पूरी तरह मिला है - इस अंश में उत्पन्न हुआ व्यक्ति एकाकी, असंतुष्ट और एकान्त प्रिय होता है।

    रोग -पांडुदोषजलदोष कामिला-पीनसादिरमणीकृतामयैः।

    कालिकासुरसुवासिनीगणैराकुलंच कुरुते तु चन्द्रमा।

    पाण्डुरोग, पानी से उत्पन्न हुए रोग, कामिला, पीनस, स्त्रियों केसम्बन्ध से होनेवाले रोग तथा कालिका आदि देवियों से होनेवाली पीड़ा येबाधाएं चन्द्र के कारण होती हैं। इस फलादेश में चन्द्र को स्वतन्त्र मानकरवर्णन किया गया है। इसमें अन्य ग्रहों के योग भी देखने चाहिए।

    जयदेव कवि-ने प्रायः बृहज्जातक का ही अनुकरण किया है।

    इस में वैद्यनाथ के कहे हुए फलों का वर्णन पहले ही हो चुका है। अधिक इतना ही है की यहा चन्द्र अपरान्ह समय बलवान कहा गया है। यह ठीक भी है क्यों कि सायंकाल का समय रात के निकट ही होता है।

 तपस्वी - इस विषय में पहले वर्णन हो चुका है।

    मध्यमो वयः -वैद्यनाथ ने चन्द्र की आयु ७० वर्ष कही हैकिन्तु जयदेव के मत से यह मध्यम आयु का है। मेरे मत से २९ से ४८ वें वर्षतक की आयु पर चन्द्र का अधिकार होता है।

    William Lily कहता है - She is a femine nocturnalplanet, cold, moist and phlegmatic. यह एक स्त्रीस्वभाव ग्रहहै। यह शीत, आई और श्लेश्मयुक्त है।

    चन्द्र का मूल स्वरूप

    कल्याणवर्मा - सौम्यः कान्तविलोचनो मधुरवागू गौरकृशांगो-युवा प्रांशुःसूक्ष्मनिकुंचितः सितकचः प्राज्ञो मृदुःसाल्विका। चारुर्वातक-फात्मकः प्रियसखो रक्तीकसारो घृणीवृद्धस्त्रीशु रतश्चलोऽतिसुभगः शुभ्राम्बरश्चन्द्रमाः।। यह शान्त होताहै। आंखे सुंदर होती हैं। वाणी मधुर होती है। वर्ण गोरा होता है। शरीर कृशतथा सदा तरुण प्रतीत होता है। उंचा होता है। इसके केश बारीक, घुंघरालेतथा काले होते हैं। यह ज्ञानी, कोमल तथा सात्विक होता है। वात अधवाकफ प्रकृति होती है। इसे प्रिय मित्र प्राप्त होते है। इसके शरीर में रक्त अच्छाहोता है। दूसरों के विषय में कुछ तिरस्कार होता है। वृद्ध स्त्रियों के साथरममाण होता है। चंचल, सुन्दर तथा शुभ्र वस्त्र पहननेवाला होता है।


    इसका स्वभाव शान्त कहा है किन्तु यह दूसरों को उत्तेजित करताहै। आंखे सुन्दर, निष्याप, बडीं और हिरन जैसी तेजस्वी होती है। यह फलपुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में विशेष दिखाई देता है। इसकी वाणी मधुर स्त्रियोंके समान होती है। इसका शरीर कृश कहा है। किन्तु अनुभव से चन्द्र केस्वामित्व के व्यक्ति कृश और स्थूल दोनों प्रकार के होते हैं ऐसा प्रतीतहोता है। वर्ण गौर है - कभी कभी लम्न में चन्द्र होकर भी वर्ण बहुत कालादेखनें में आया है। किन्तु साधारण तौर पर ये व्यक्ति गोरे होते हैं। ये लोगसदा तरुण दिखाई देते हैं ४० वर्ष का प्रौढ भी २५ वर्षीय युवक जैसा प्रतीतहोता है। ये ज्ञानी होते हैं। मेरे विचार से इनमें व्यवहारज्ञान कम ही होता हैकिन्तु किसी एक विषय में इन्हें कुशलता प्राप्त होती है। इनका शरीरकोमल होता है यह फल देखने योग्य है। वात अथवा कफ प्रकृति के होते हैं।

    चन्द्र स्वभावतः शीत है इसलिए कफ के रोग होना स्वाभाविक है किन्तुवात रोगों का विचार मेरे मत से गुरु की स्थिति से करना चाहिए क्योंकिउष्णता गुरुपर ही अवलम्बित है। यह सुन्दर, सात्विक और प्रिय मित्रों सेयुक्त होता है।

    वैधयनाथ-संचारशीलों मृदुवाग् विवेकी शुभेक्षण शचा-रुतरः स्थिरांगः सदैव धीमांस्तनुवृत्तकायः कफिलात्माच सुधा-करःकृस्यात्।

    यह प्रवासी, मधुरवाणी से युक्त, विवेकशील, सुंदर आंखों सेयुक्त, सुन्दर और सुदृढ़ शरीर का, बुद्धिमान, कुछ गोल आकार का तथावात अथवा कफ प्रकृति का होता है।

    जयदेव-निशापतिर्वृत्तनु : सुनेत्र : कफानिलात्मा किलगौरवर्णः। प्राज्ञोऽतिलोलो मृदुवाग् घृणीच प्रियाप्रियोऽसौ खलुशोणितौजाः।

    इसका शरीर वर्तुलाकार होता है, आंखें सुन्दर होती हैं, प्रकृतिकफ अथवा वात की होती है और वर्ण गोरा होता है। यह बुद्धिमान, बहुतचंचल, मित्रों को प्रिय, कुछ अहंकारी और बोलनेवाला होता है। इसकारक्त अच्छा होता है।

    सर्वार्थचिन्तामणि-चन्द्र: सितांग :समगात्रयष्टिरवाग्मीपरिगविवेकयुक्तः। क्वचित् कृशः शीतलवाक्ययुक्तः सत्त्वाश्रयोवातकफानिलात्मा॥

    पूर्वोक्त विवरण से इस में एक ही विशेषण अधिक है-इसकाशरीर सम होता है। अवयवों में विषमता नही होती। यह फल विशेषतःदेखने में आया है।

    अन्य वर्णन-सोमश्च विद् वैश्यकुलप्रमुती। चन्द्र वैश्यवर्ण का है। चन्द्रस्य रक्तम्। रक्त पर चन्द्रका अधिकार है।वस्त्रकाठित्यम्। यह मोटे वस्त्र पहिनता है। नरपालमुख्यी। यह राजाके समान मुख्य होता है। धातु -धातुओं पर इसका स्वामित्व होता है।इसमें पहले दो वर्णन ठीक हैं। वस्त्र मोटे होना यह फल योग्य नही है- चन्द्रके स्वामित्व में महीन वस्त्र ही योग्य है। राजा के समान मुख्य-यह फल भीयोग्य नहीं क्योंकि चन्द्र को ग्रहमाला में रानी का स्थान दिया जाता है।धातुओं का स्वामित्व चन्द्र को कैसे मिला यह स्पष्ट नही होता।


    कापोरेचर-Carporature - She generally presentsa fair stature. Whitely coloured, round face, grey eyes,and a little lowering; much hair both on the head, andface, and other parts, usually one eye a little larger thanthe other, short hands and fleshy; the whole bodyinclining to be fleshy, plump, Corpulent, andphlegmatic. इसका कद अच्छा और वर्ण गौर होता है। मुख वर्तुलाकारऔर आंखे काली होती है। सिर पर, मुख पर तथा शरीर के अन्य भागों परभी केश विपुल होते है। सामान्यतः एक आंख दुसरी से कुछ बडी होती है।हाथ छोटे किन्तु मांसल होते है। शरीर भी स्थूल और चौकोर आकार काहोता है। इस फल वर्णन में केश विपुल कहे है किन्तु चन्द्र का केशों से कोईसम्बन्ध नहीं है। एक आंख बड़ी होना यह फल यदि चन्द्र मिथुन राशि में होतो ही मिलता है-अन्य राशियों में नही मिलता।

    विलियम लिली - यह चौकोर आकार का होता है। यह फलयोग्य नही है। इसका शरीर कृश किन्तु गठीला होता है।

    डॉ. सिमोनाइट-Luna when well dginified, thenative has manners, a lover of sciences, a searcher anddelighter in novelties, naturally inclined to remove hishabitation, unsteadfast, caring for the present times,temorous, prodigal, and easily frightened, lovingpeace and to live free from the cares of life. When illdignified, the native is a vagabond, idle person, hatinglabour a drunkard, of no forecast, delighting to livebeggarly, carelessly, and discontented. कुंडली में चन्द्र यदिशुभ हो तो वह व्यक्ति व्यवहार में कुशल, शास्त्रीय विषयों में रुचिरखनेवाला होता है। नई नई चीजों में आनन्द लेने की तथा उनका संशोधनकरने की प्रवृत्ति होती है। निवासस्थान बदलने की स्वाभाविक इच्छा होतीहै। चंचल और सिर्फ वर्तमान कि ही चिन्ता करनेवाला होता है। डरपोकऔर खर्चीला होता है। शान्तिप्रिय और संसार की चिन्ताओं से मुक्त होनाचाहता है। चन्द्र यदि अशुभ हो तो वह व्यक्ति बदमाश, आलसी तथाशारीरिक काम करने का द्वेष करनेवाला, मदिरापान में रत, भिखारी जैसीरहनसहन में आनन्दित होनेवाला, असंतुष्ट और भविष्य की कोई चिंता नकरनेवाला होता है।


    मेरे विचार-भारतीय आचार्यो ने जो स्वभाव वर्णन किया हैवह प्रायः ठीक है। सिर्फ वृद्ध स्त्री के साथ रममाण होना यह एक फलअनुभव में नही आता। चन्द्र का पूरा स्वभाव चौथे प्रकरण में विस्तार सेस्पष्ट किया है। विशेष इतना है कि चन्द्र के स्वामित्व के लोग घरबार में मग्नहोते हैं। पैसे के बारे में बहुत चिकित्सा करते है। आगे पैसो के कारण कोईबडी विपत्ति आयेगी इस विचार से सदा ही पैसे का संग्रह करने की प्रवृत्ति

    होती है। इस विषय में ये सदा ही चिन्ता करते रहते है। कम मेहनता करके ज्यादा धन प्राप्त करने की विशेष इच्छा होती है। ये स्वभाव से आनन्दी,ललित साहित्य की रुचि होनेवाले, लोगों से कम मिलते जुलते, बहुतबोलने वाले होते है। इन्ही में काव्य, नाटक, उपन्यासों के लेखक भी होसकते है। कुछ स्वार्थी और दूसरों के सुखदुख के बारे में उदासीन होते हैं।

 ज्‍योतिष : कुण्‍डली में चंद्रमा राशि भाव नक्षत्र सकारात्मक  नकारात्‍म विवेचन 



चंद्र प्रभावित जातक उन्‍हें कहेंगे जिनकी कुण्‍डली में चंद्रमा बहुत ही बलशाली स्थिति में बैठा हो। कर्क अथवा वृषभ लग्‍न में बैठा चंद्रमा जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है। कुण्‍डली में अन्‍य स्‍थानों पर भी अगर चंद्रमा दूसरे ग्रहों से बल प्राप्‍त कर पावरफुल स्थिति में हो तो वह जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है।


सामान्‍य तौर पर चंद्र प्रभावित जातक मानसिक रूप से दृढ़ किंतु संवेदनशील होते हैं। चंद्रमा पानी की तरह होता है, जिस प्रकार के ग्रह का उसे प्रभाव मिल रहा हो, वह वैसा ही होने लगता है। चंद्रमा के मूल स्‍वभाव में रचनात्‍मकता और उत्‍पादकता शामिल होती है। अब अगर चंद्रमा मंगल के प्रभाव में हो तो इस रचनात्‍मकता में एक सहज तेजी आ जाती है वहीं शुक्र के साथ हो तो एक लग्‍जरी का सेंस आता है, शनि के साथ हो तो नकारात्‍मकता आएगी और बुध के साथ हो तो गणनाओं में चतुर बना देगी। हालांकि बुध और चंद्र नैसर्गिक रूप से शत्रु हैं, ऐसे में गणनाओं की चतुरता अधिकांशत: नकारात्‍मक पक्ष लिए हुए होगी। कुल मिलाकर अकेला चंद्रमा केवल संवेदनशीलता और भावनाओं की प्रबलता ही दिखा सकता है, किसी दूसरे ग्रह का साथ मिलने पर स्‍वच्‍छ निर्मल जल में उस तत्‍व के गुण समाहित हो जाते हैं। यही कुण्‍डली में भावों में विचरण करते चंद्रमा के साथ भी होता है। बजाय चंद्रमा अपने स्‍वतंत्र फल देने के, भाव से संबंधित फल अधिक तीव्रता से देने लगता है।


अगर कुण्‍डली में चंद्रमा नकारात्‍मक परिणाम दे तो सामान्‍य तौर पर यह मति को भ्रष्‍ट कर देता है। इससे जातक अनिर्णय की स्थिति में फंस जाता है, मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है, झूठ बोलने की प्रवृत्ति बनने लगती है और अफवाहें उड़ाने लगता है। बहुधा ऐसे जातक एंजाइटी के शिकार भी हो जाते हैं।


चंद्रमा लग्‍न में

नकारात्‍मक हो तो जातक चिंता युक्त, स्त्री से अपमानित, स्त्री को पूर्ण तृप्ति न करने वाला, संतान की प्राप्ति विलंब से होती है, रोगी, मानसिक बीमारियों का रोगी, पागल होता है, जातक को डूबकर मरने का भय रहता है।


चंद्रमा द्वितीय में

नकारात्मक हो तो जातक के विद्या अध्ययन में बताती है, पैतृक धन का लाभ नहीं होता, धन का अधिक व्यय करता है, स्त्री की अल्पायु होती है, जातक मदिरापान नशीली वस्तुओं का व्यसनी होता है, पिता के लिए रोगकारक होता है।


चंद्रमा तृतीय में

नकारात्मक हो तो जातक मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है, भरम रोग से पीड़ित होता है, कई बार निद्रा में चलने की बीमारी भी होती है, यात्रा में हानि होती है, पिता की आयु होती है, भाई बहनों द्वारा अपमानित होता है, पड़ोसी तथा रिश्तेदारों से विरोध होता है।


चन्द्रमा चतुर्थ भाव में

नकारात्मक हो तो जातक पैतृक धन का नाश करता है, गृहस्थ जीवन दुखी होता है, स्त्री द्वारा विरोध झेलना पड़ता है, स्वयं माता का विरोधी होता है, वाहन से दुर्घटना का भय होता है, गृहस्थ जीवन के संबंध में चिंतित रहता है।


चन्द्रमा पंचम भाव में

नकारात्मक हो तो जातक अस्थिर मन वाला, दुखी, माता से अपमानित होता है, जातक की संतान उसकी विरोधी होती है, विद्या में विघ्न पड़ता है, व्यापार में हानि होती है।


चंद्रमा छठे भाव में

नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, जातक को लकवा, गुर्दे का रोग, मूत्र रोग आदी होने की आशंका रहती है, कई बार आंत के रोग भी हो जाते हैं, जातक को पालतू पशु रखने तथा मुर्गीखाना खोलने पर हानि होती है, अधिकांश जीवन में कर्जदार बना रहता है, धन का व्यय अधिक करता है, माता से झगड़ा करते हैं, मानसिक रूप से विक्षिप्त रहता है, गैस तथा अतिसार रोगों की आशंका सर्वाधिक होती है। यहाँ चन्द्रमा शनि से दृष्ट अथवा शनि के साथ हो तो विवाह विलम्ब से होता है अथवा विवाह नहीं होता।


चन्द्रमा सप्तम भाव में

नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, स्त्री का मन अस्थिर होता है, दूसरों से ईर्ष्या रखने वाला होता है, माता से कलह करने वाला होता है, नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाला होता है, यहाँ चन्द्रमा पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो स्त्री की मृत्यु होती है और दूसरा विवाह करना पड़ता है।


चन्द्रमा अष्टम भाव में

नकारात्मक हो तो जातक अल्पायु और माता के लिए अशुभ होता है, जातक परस्त्रीरत तथा गुप्त रोगों से ग्रस्त होता है, पर स्त्री पर धन नाश करने वाला होता है, अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।


चन्द्रमा नवम भाव में

नकारात्मक हो तो पिता की अल्पायु का योग होता है तथा माता के लिए रोगकारक होता है, विदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती।


चन्द्रमा दशम भाव में

नकारात्मक हो तो जातक का मन अस्थिर रहता है, नौकरी तथा व्यापार बदलने में हानि उठाता है, पैतृक धन प्राप्त करने में अड़चनें आती है, स्त्री से कलह रहती है, माता की अल्पायु होती है, अगर चुनाव लड़े तो पराजय होती है, स्त्री पक्ष से धन का लाभ नहीं होता, जातक रोगी होता है।


चन्द्रमा एकादश भाव में

नकारात्मक परिणाम दे रहा हूँ तो सन्तान का सुख अल्प होता है, पुत्र संतति कम होती है, माता से कलह रहती है, नपुंसकता के रोग का भय होता है।


चन्द्रमा द्वादश भाव में

नकारात्मक हो तो जातक आंख का रोगी होता है, ससुराल का धन नाश करने वाला होता है, परस्त्रीरत होता है, गुप्त रोग का रोगी होता है, अपनी स्त्री के लिए रोगकारक और दुष्चरित्र होता है। विदेश भ्रमण में असफलता मिलती है तथा धन का नाश होता है।

चन्द्रमा विवेचन और उसके के रुष्ट होने के संकेत केमद्रुम दोष और उपाय -


मन और मानव जीवन को प्रभावित करता है चन्द्रमा


चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह हैं, उन सभी का व्यक्ति के ‍जीवन पर विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। मानव ने जब से काल के चिंतन का आरंभ किया, उसी समय से चन्द्रमा उसके लिए अपने घटने-बढ़ने की प्रक्रिया के कारण प्रकृति का अखंड और निर्विवाद पंचांग रहा है। संसार के सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में प्रत्येक काल में चन्द्रमा की ति‍थियों के अनुसार ही धार्मिक विधि रचने का उल्लेख पाया जाता है।


व्यक्ति के चरित्र के सूक्ष्म रूप, विशिष्ट गुण, उसकी प्रतिभा, भावनाओं, प्रवृत्तियों, योग्यताओं तथा भावनात्मक प्रवृत्ति आदि का ज्ञान जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति से मालूम हो जाता है।


समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे का मूल कारण चन्द्रमा की स्थिति है। पूर्णिमा का प्रभाव पशु-पक्षियों और रेंगने वाले कीड़ों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि उन्मादग्रस्त मनुष्यों पर भी पड़ता है। वे सभी अन्य दिनों की अपेक्षा पूर्णिमा के दिन ही अधिक उत्तेजित और अव्यवस्थित दिखाई देते हैं। संसार के जितने की ऊष्ण प्रदेश हैं, वहां को लोगों को पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की चांदनी में सोने पर विचित्र स्वप्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार के विचित्र स्वप्न अन्य किसी दिन में दिखाई नहीं देते। यही नहीं, स्त्रियों के मासिक धर्म और चंद्रमा के 28 दिवस चक्र के बीच सीधा संबंध है।


चंद्रमा के घटने-बढ़ने का व्यक्ति के मस्तिष्क के साथ परंपरागत संबंध होता है। शुक्ल पक्ष में मनुष्य का मस्तिष्क जागरूक होता है। इन दिनों उसे नींद भी अच्‍छी आती है। हम अपने जीवन में चंद्रमा के प्रभाव का स्पष्ट अनुभव करते हैं। चंद्रमा का सृष्टि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण प्रकृति, भले ही वह जड़ हो या चेतन, उसमें धड़कन होती है, स्पंदन होता है और वह नित्य परिवर्तनशील है।


चन्द्रमा का अपनी तिथियों के अनुसार विश्व के जड़ और चेतन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जो मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने जाते हैं, वे चंद्रमा के इस प्रभाव से भलीभांति परिचित होते हैं।


चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। स्त्रियों में स्थित कामभावना चंद्रमा की कलाओं के उपचय-अपचय के अनुसार विभिन्न अंगों में तिथिक्रम से केंद्रित रहा करती है। कामशास्त्र इस संबंध में सलाह देता है कि तिथि के अनुसार स्त्री के संबंधित अंग को सहलाने से वह जल्दी उत्तेजित हो जाते है


चंद्रमा सुख स्थान का और माता का कारक होता है। यह मन की संकल्प-विकल्पमूलक कल्पनाशक्ति का ‍परिचायक होता है। शारीरिक स्थित‍ि में यह जल ग्रह होने के कारण न्यूमोनिया तथा कफजनित रोग सर्दी-जुकाम आदि का सूचक रहता है। जन्म कुंडली में जिन पर चंद्रमा निर्बल रहता है, वे प्राय: शीतजनित रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त प्रवाह और हृदय इसके अधिकृत क्षेत्र हैं, किंतु अन्य ग्रह के साथ अशुभ य‍ुति करने पर ही यह रक्तचाप, हृदय रोग आदि दिया करता है।


चंद्रमा द्विस्वभाव रहता है अर्थात अकेला ही यह पाप और शुभ बन जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण प्रकाशमान रहने के कारण यह बली रहता है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी माना जाता है। चंद्रमा कर्क राशि में उच्च का एवं वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। चंद्रमा उच्च राशि का होने पर मिष्ठान्न भोजी और अलंकार प्रिय बनाता है तथा इनके प्राप्त होने के योग भी बनाता है। मूल त्रिकोणी होने पर यह धनी और सुखी भी करता है। चंद्रमा नीच राशिगत होने पर धर्म, बुद्धि का ह्रास करता है तथा दुरात्मा व दुखी बनाता है। शुक्र ग्रही होने पर यह माता के स्नेह और सुख से वंचित करता है।


ज्योतिष एवं चन्द्रमा का सम्बन्ध,महत्त्व एवं प्रभाव.तथा उपाय


भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हों, उसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है। भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैं, वह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है।


पूर्णिमा का चंद्रमा मन को बहुत आनंद देता है। इसकी तुलना बिजली की सजावट से नहीं हो सकती। चंद्रमा की इसी विशेषता के कारण स्नेह के लिए उसे देखा जाता है। स्नेह के बारे में सोचते ही मां का चेहरा सामने आ जाता है, इसलिए चंद्रमा को मातृकारक कहा गया है, इसीलिए बच्चे उसे मामा कहते हैं। भूखा बच्चा जब मां की गोद में बैठकर स्तनपान करता है तब मां के मन से जो स्नेह भावना उभरती है, उसी स्नेह का कारक ग्रह है चंद्रमा। चंद्रमा सबसे गति वाला ग्रह है और उसकी गति में सर्वदा परिवर्तन होता है, इसलिए जहां गति से जुड़ी बातें आ जायं, वहां चंद्रमा महत्वपूर्ण हो जाता है। धरती पर सबसे अधिक गति होती है मन की। पल भर में गति बदलने वाला मन चंद्रमा से भी गतिशील है, अत: चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। मन को बेहद खुशी या गम हो तो आंखों से आंसू आ जाते हैं, अत: पानी, दूध, शरबत जैसी बहने वाली चीजें चंद्रमा के अधिकार में होती हैं। पानी के साथ पानी से जुड़े पौधे, मछली, कुएं, तालाब, सागर आदि का भी कारक ग्रह चंद्रमा है।


शास्त्रों के अनुसार भी चन्द्रमा मन का कारक है। चन्द्रमा दिल का स्वामी है। चांदी की तरह चमकती रात चन्द्रमा का विस्तार राज्य है। इसका कार्य सोने चांदी का खजाना शिक्षा और समृद्घि व्यापार है। चन्द्रमा के घर शत्रु ग्रह भी बैठे तो अपने फल खराब नहीं करता। प्रकृति की हलचल में चंद्र के प्रभाव विशेष होते हैं।


चन्द्रमा एवं विश्व—–


चन्द्रमा धरती का सबसे निकटतम ग्रह है. इसमें प्रबल चुम्बकीय शक्ति है. यही कारण है क़ि समुद्र के जल को यह बहुत ही ऊपर तक खींच देता है. और जब घूमते हुए धरती से कुछ दूर चला जाता है तो यही जल वापस पुनः समुद्र में बहुत भयानक गति से वापस आता है. जिसके कारण समुद्र में ज्वार भाटा एवं तूफ़ान आदि आते है. जिस तरह एक साधारण चुम्बक के दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति का केंद्र होता है. उसी प्रकार इसके भी दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति बहुत ज्यादा होती है. इसका आकार पूर्णिमा को छोड़ कर शेष दिनों में नाल चुम्बक के आकार का होता है. किन्तु पूर्णिमा के दिन जब इसका आकार पूरा गोल होता है, उस समय में इसमें भयानक आकर्षण शक्ति होती है. किन्तु यह शक्ति इसके चारो और की परिधि पर होने के कारण भयावह नहीं होती है. इसके विपरीत यह द्वितीया के दिन जब बिलकुल ही पतला होता है, बहुत ही हानि कारक होता है. कारण यह है क़ि इस दिन यह धरती से दूर होता है. तथा धरती के पदार्थो को बहुत दूर तक खींच देता है. और जब छोड़ता है तब बहुत ही ऊंचाई से उन पदार्थो के गिरने के कारण धन जन की बहुत हानि होती है. आप लोगो ने ध्यान दिया होगा क़ि अभी भी ग्रामीण इलाको में द्वितीया के चन्द्रमा को देखने की तथा उसे प्रणाम करने की होड़ या उत्सुकता लगी रहती है. और यह मान्यता है क़ि कम से कम हाथ में या शरीर के किसी न किसी हिस्से में सोने का कोई आभूषण हो तो और भी शुभ होता है. सोने की चमक दार सतह चन्द्रमा की किरणों को परावर्तित कर देती है. तथा उसकी परम लाभकारी ऊर्जा को शरीर में अवशोषित कर लेती है. परावर्तित करने की क्षमता तो दर्पण में ज्यादा होती है. किन्तु दर्पण विद्युत् या ऊष्मा का कुचालक होता है. इसलिए उससे केवल प्रकाश का परावर्तन ही हो पाता है. किन्तु चन्द्रमा की किरणों की लाभ कारी ऊर्जा शरीर को नहीं मिल पाती. इसीलिए शरीर के किसी भी अँग में सोने के आभूषण की उपस्थिति अनिवार्य बताई गयी है.


चन्द्रमा को सुधांशु भी कहा जाता है. पौराणिक मतानुसार चन्द्रमा पर अमृत पाया जाता है. इसके अलावा इसकी सतह पर अनेक अमोघ औषधियों की उपस्थिति भी है. संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए कहा गया है क़ि


“यातीति एकतो अस्त शिखरं पतिरोषधीनाम आविषकृतो अरुण पुरः सरः एकतो अर्कः.


तेजो द्वयस्य युगपद व्यसनोदयाभ्याम लोको नियम्यदिव आत्म दशांतरेषु.”


अर्थात एक तरफ तो औषधियों के एक मात्र स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल पर जा रहे है. तथा दूसरी तरफ उदयाचल पर अरुण को आगे किये हुए सूर्य उदय हो रहे है. इस प्रकार ये दोनों अपनी अपनी इस अस्त एवं उदय की स्थिति से यह समस्त विश्व को बता रहे है क़ि यह संसार का उत्थान एवं पतन चक्र है.


शुक्ल पक्ष की द्वितीया लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा निरंतर धरती के नज़दीक आता चला जाता है. तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावश्या तक चन्द्रमा धरती से दूर चलता जाता है. चन्द्रमा ज्यो ज्यो धरती से दूर चलता जाता है. यह पतला होता चला जाता है. उस समय इसके दोनों नुकीले हिस्से बहुत ही शक्ति शाली चुम्बक की तरह धरती की समस्त वस्तुओ को खींचता चला जाता है. संभवतः इसीलिए कृष्ण पक्ष और उसमें भी रात के समय और उसमें भी पाप राशि एवं लग्न में जन्म लेना थोड़ा अशुभ माना गया है.


चन्द्रमा के घर घर अर्थात कर्क राशि में होते हुए अपने घर अर्थात सिंह राशि में विश्राम करते हुए दुबारा फिर से धरती से दूर जाने लगेगा तो वर्षा शुरू हो जायेगी. क्योकि जो भाप अंतरिक्ष में एकत्र हुआ है, सूर्य के दूर जाते ही ठंडा होकर धरती पर गिरना शुरू हो जाएगा. कहा भी गया है क़ि 14 जनवरी या मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है. दिन बड़ा होगा तो ज्यादा देर तक सूर्य की किरणे धरती के ऱस को अवशोषित करेगी, और ज्यादा भाप आकाश में जाएगा.


यदि किसी की कुंडली में पांचवे भाव में सूर्य हो तथा चौथे भाव में चन्द्रमा हो और ये दोनों मीन से लेकर सिंह राशि के मध्य ही हो तो वह बालक कुशाग्र बुद्धि, उच्च संस्कार से उक्त संतान एवं देश विदेश में ख्याति अर्जित करने वाला होगा. कारण यह है क़ि ऐसी अवस्था में मष्तिष्क के परासवी द्रव्यों का सघनी करण एवं शोधन दोनों ही सूक्षमता एवं गहनता से होता रहेगा. क्योकि जितने द्रव्य चन्द्रमा के द्वारा उद्वेलित होगे, सूर्य के द्वारा उतने का सघनी करण एवं शोधन होता चला जाएगा. इसके विपरीत यदि सूर्य तुला राशि में हो तथा चन्द्रमा मीन में हो तो ऐसी अवस्था में इनकी चौथे भाव की उपस्थिति माता पिता एवं धन संपदा के लिए हानि कारक होगी. कारण यह है क़ि न तो चन्द्रमा का प्रभाव मष्तिष्क पर पडेगा और न तो सूर्य के द्वारा इसका कोई शोधन या सघनीकरण होगा. क्योकि चंद्रामा सूर्य से बहुत ही दूर जा चुका होगा.


चन्द्रमा से ही मनुष्य का मन और समुद्र से उठने वाली लहरे दोनों का निर्धारण होता है। माता और चंद्र का संबंध भी गहरा होता है। मूत्र संबंधी रोग, दिमागी खराबी, हाईपर टेंशन, हार्ट अटैक ये सभी चन्द्रमा से संबंधित रोग है।


वैसे तो चन्द्रमा को सुख-शांति का कारक माना जाता है…लेकिन यही चन्द्रमा जब उग्र रूप धारण कर ले तो प्रलयंकर स्वरूप दिखता है। तंत्र ज्योतिष में तो ये कहावत है कि चन्द्रमा का पृथ्वी से ऐसा नाता है कि मानो मां-बेटे का संबंध हो, जैसे बच्चे को देख कर मां के दिल में हलचल होने लगती है, वैसे ही चन्द्रमा को देख कर पृथ्वी पर हलचल होने लगती है, चन्द्रमा जिसकी सुन्दरता से मुग्ध हो कवि रसीली कविताओं और गीतों का सृजन करते हैं वहीँ भारतीय तंत्र शास्त्र इसे शक्तियां अर्जित करने का समय मानता है।


आकाश में पूरा चांद निकलते ही कई तांत्रिक सिद्घियां प्राप्त करने में जुट जाते हैं। चन्द्रमा प्राकृतिक तौर पर बहुत सूक्ष्म प्रभाव डालता है जिसे साधारण तौर से नहीं आंका जा सकता लेकिन कई बार ये प्रभाव बहुत बढ जाता है जिसके कई कारण हो सकते हैं।


ज्योतिष शास्त्र इसके संबंध में कहता है कि चन्द्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर भूकंप, समुद्री आंधियां, तूफानी हवाएं, अति वर्षा, भूस्खलन आदि लाता हैं। रात को चमकता पूरा चांद मानव सहित जीव-जंतुओं पर भी गहरा असर डालता है।


चन्द्रमा एक शीत और नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में मुख्य रूप से माता तथा मन के कारक माने जाते हैं और क्योंकि माता तथा मन दोनों ही किसी भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व रखते हैं, इसलिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्त्वपूर्ण होती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियों, जन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों, परा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, होटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों, सागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं।


किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चन्द्रमा की स्थिति अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चन्द्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चन्द्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चन्द्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चन्द्रमा की अपनी राशि है। चन्द्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदु, संवेदनशील, भावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐशवर्य प्राप्त हो जाते हैं।


शरीर के हिस्से——


चंद्रमा का मन पर प्रभाव होता है। सीना, बहती वस्तुओं का कारक ग्रह होने से शरीर में स्थित द्रव्य जैसे रक्त, मूत्र, पाचक रस, पाचन क्रिया पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। रात में प्राकृतिक रोशनी चंद्रमा से ही मिलती है इसलिए दृष्टि व आंख चंद्रमा के अधिकार में है। पुरुषों की बांयी तथा स्त्रियों की दायीं आंख तथा वक्षस्थल पर चंद्रमा का प्रभाव होता है।


गुण——


चंद्रमा की रोशनी शीतल है इसलिए शीतलता, ठंडक, पानी से जुड़ा हुआ, हवा में स्थित भांप, गति में बदलाव, सैर की चाह इत्यादि चंद्रमा का गुण धर्म है। चंद्रमा की कर्क राशि कुण्डली में (कालपुरुष की गणना में) चतुर्थ स्थान पर है। यह चतुर्थ स्थान भवन, भूमि, मातृभूमि को दर्शाता है, इसलिए भूमि, भवन, देशप्रेम की भावना का भी विचार चंद्रमा से किया जाता है।


बीमारियां——


चंद्रमा का मन पर प्रभाव है। इसलिए मन के रोग, अजीब व्यवहार, चिड़चिड़ापन, उन्माद की बीमारियां आदि चंद्रमा से देखी जाती हैं। पाचन की शिकायतें, बहती वस्तुओं पर अधिकार जैसे खांसी, जुकाम, ब्राकायटीस, हाइड्रोशील, कफ से जुड़ी बीमारियां, दृष्टि दोष चंद्रमा से देखे जाते हैं।


कारोबार—–


चंद्रमा जल से जुड़ा है इसलिए सिंचाई, जल विभाग, मछली, नौसेना, मोती आदि का कारोबार इससे देखा जाता है। चूंकि चंद्रमा बहती वस्तुओं से संबंधित है इसलिए कैरोसिन, पेट्रोल के कारोबार पर इसका नियंत्रण है। स्नेह का कारक ग्रह होने से फूल, नर्सरी व रसों से जुड़ा कारोबार इसके अधिकार क्षेत्र में आता है।


उत्पाद—–


चंद्रमा तेज गति वाला ग्रह है इसलिए जल्दी बढ़ने वाली सब्जियां, रसदार फल, गन्ना, शकरकंद, केसर और मक्का इसके उत्पाद हैं। चंद्रमा रंगों का भी कारक ग्रह है इसलिए निकिल, चांदी, मोती, कपूर, मत्स्य निर्माण, सिल्वर प्लेटेड मोती जैसे वस्तुएं बनाने का कारोबार चंद्रमा के अधिकार में है।


स्थान—–


शीतलता का कारक ग्रह होने से हिल स्टेशन, पानी से जुड़े स्थान, टंकियां, कुएं, हरे पेड़ों से सजे जंगल, दूध से जुड़ा स्थान, गाय-भैंसों का तबेला, फ्रिज, पीने का पानी रखने का स्थान, हैंडपंप आदि को चंद्रमा का स्थान माना जाता है।


जानवर व पंक्षी—–


छोटे पालतू जानवर, कुत्ता, बिल्ली, सफेद चूहे, बत्तख, कछुआ, केकड़ा, मछली के शरीर पर चंद्रमा का अधिकार होता है। चंद्रमा रस निर्माण का कारक ग्रह है इसलिए रसदार फल, गन्ना, फूल-गोभी, ककड़ी, खीरा, व जल में पनपने वाली सब्जियों पर चंद्रमा का अधिकार है।


चन्द्रमा मनुष्य के शरीर में कफ प्रवृति तथा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शरीर के अंदर द्रव्यों की मात्रा, बल तथा बहाव को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्य से अधिक वजनी हो सकते हैं जिसका कारण मुख्य तौर पर चन्द्रमा का जल तत्व पर नियंत्रण होना ही होता है जिसके कारण ऐसे जातकों में सामान्य से अधिक निद्रा लेने की प्रवृति बन जाती है तथा कुछेक जातकों को काम कम करने की आदत होने से या अवसर ही कम मिलने के कारण भी उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे जातकों को आम तौर पर कफ तथा शरीर के द्रव्यों से संबंधित रोग या मानसिक परेशानियों से संबंधित रोग ही लगते हैं।


कुंडली में चन्द्रमा के बलहीन होने पर अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर दूषित होने पर जातक की मानसिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उसे मिलने वाली सुख-सुविधाओं में भी कमी आ जाती है। चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होकर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष और अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण भी चन्द्रमा बलहीन हो जाते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु तथा केतु का प्रबल प्रभाव चन्द्रमा को बुरी तरह से दूषित कर सकता है तथा कुंडली धारक को मानसिक रोगों से पीड़ित भी कर सकता है। चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को अनिद्रा तथा बेचैनी जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है जिसके कारण जातक को नींद आने में बहुत कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की बलहीनता अथवा चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार के जातकों को उनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों से संबंधित समस्याएं आ सकती हैं।


गोचर और चन्द्रमा—


व्यक्ति के जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में होते हैं, लग्न निकालकर कुंडली में उस राशि में लिखे जाते हैं। ग्रहों की गति के आकार पर राशि परिवर्तन की अवधि होती है। सूर्य की गति स्थिर अर्थात् एक अंश प्रतिदिन के हिसाब से 30 दिवस में राशि परिवर्तन कर लेता है। चंद्रमा की गति काफी तीव्र होने से राशि परिवर्तन सवा दो दिन में कर लेता है।समाचार पत्रों में जो दैनिक भविष्यफल दिया जाता है, उसके अंत में आमतौर पर लिखा होता है, गोचर देखें। आम व्यक्ति गोचर समझता नहीं है। ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण को गोचर कहते हैं। पाश्चात्य देशों में लग्न एवं सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर गोचर फलादेश तैयार करते हैं, लेकिन हमारे यहां चंद्रमा जिस राशि में होता है, उसे लग्न मानकर गोचर फलकिया जाता है।


कल्याण शकट योग—


वैद्यनाथ दीक्षित के अनुसार कल्याण शकट योग का निर्माण तभी होता है जब गुरू से चन्द्रमा 6 या आठ भाव में हो। इस योग का केवल एक ही अपवाद है कि यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो यह योग भंग हो जाता है।


शषष्टमा गताश्चन्द्र सूर्य राज पुरोहित: केन्द्र दान्य गतो लग्नाद्योग: शकट समग्नित:।। परिणामों पर विचार करते हैं तो—


अपि राजा कुले जातो निश्व शकट योगज:। क्लेश यशवस नित्यम संतोप्त निरूप विप्रय:।।


अर्थ—चाहे कोई व्यक्ति राज परिवार में क्यों नहीं जन्मे, इस योग वाले को निर्धनता, दिन-प्रतिदिन दु:ख-कष्ट और अन्य राजाओं के क्रोध का भाजन बनना प़डता है।


मंत्रेश्वर, फलदीपिकाकार के अनुसार, जीवन्त्यश्तरी समष्टे शशिनितु शकट:, केन्द्रगे नास्ते लग्नथ:।।


जब बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में चन्द्र हो तो शकट योग बनता है परन्तु यदि चन्द्र केन्द्र में हो तो शकट योग भंग हो जाता है।


क्वचित क्वचित भाग्य परिचयत: सन् पुन: सर्वा मुपैते भाग्य:,


लोके प्रस्तीधो परिहर्य मन्त: सल्यम प्रपन्न: शकटे ति दु:खी:।।


इस शकट योग में जन्मा जातक प्राय: भाग्यहीन होता है अथवा भाग्यहीन हो जाता है और जीवन में खोए हुए को पुन: पा भी सकता है और प्रतिष्ठा आदि में एक सामान्य व्यक्ति होता है और इस दुनिया में उसका कोई महत्व नहीं होता है। वह नि:स्संदेह भारी मानसिक वेदना सहता है और जीवन में दु:खी ही रह जाता है। दूसरे विद्वानों के विचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो यह देखते हैं कि—


यदि चन्द्र अपनी उच्चा राशि में हो, स्वग्रही हो अथवा बृहस्पति के भावों में हो और चन्द्रमा बृहस्पति से छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो यह शकट योग का अपवाद बन जाता है। ऎसी स्थिति में शकट योग ही भंग नहीं होता अपितु उसके दुष्परिणाम भी आते हैं परन्तु यही योग जातक को मुकुट योग देकर ऊंचाइयों पर भी पहुंचा देता है।


यदि चन्द्रमा बृहस्पति से छठे-आठवें भाव में हो परन्तु वह मंगल से दृष्ट हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।


यदि राहु-चन्द्र की युति हो अथवा राहु उन्हें देखें तो भी शकट योग भंग हो जाता है।


बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पूर्ण चन्द्र स्थित हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।


यदि षड्बल में बृहस्पति चन्द्र से बली हों तो भी शकट योग भंग हो जाता है।


यदि चन्द्र बृहस्पति से छठे आठवें भाव में स्थित होकर द्वितीय भाव में बैठे तो शकट योग भंग हो जाता है और व्यक्ति धनी होता है। ऎसी ग्रह स्थिति मिथुन लग्न वाले जातकों की ही होती है। चन्द्र से छठे भाव में स्थित बृहस्पति से हंस योग का निर्माण होता है क्योंकि वे निज भाव में होंगे जो सप्तमेश और दशमेश का लग्न से केन्द्र स्थान होगा, चन्द्रमा से अष्टम भाव में स्थित होने पर जातक धनवान नहीं बन सकता है। सूर्य नवम भाव में स्थित होकर गुरू से युति करें और द्वितीय भाव में चन्द्रमा पर उनकी पूर्ण रश्मियां प़डें तो जातक प्रचुर धन का स्वामी हो सकता है परन्तु ऎसी स्थिति में गुरू अस्तंगत दोष से मुक्त हों अथवा दुष्प्रभाव में नहीं हों।


द्वितीय भाव में स्थित उच्चा के गुरू से अष्टम भाव में चन्द्र की स्थिति शुभ नहीं होती है और ऎसे जातक संभवत: 40 वर्ष की आयु होते-होते सब कुछ गंवा देते हैं परन्तु यह बाद में आने वाली दशाओं पर निर्भर करता है कि वह अपना खोया धन और सम्मान पुन: प्राप्त कर लें। माना कोई जातक शनि महादशा में हो और 40 वर्ष की आयु का हो चुका है तो वह बृहस्पति की दशा में सब कुछ गंवा देगा और शनि की अंतर्दशा में पुन: प्राप्त कर लेगा। यदि शनि उनकी कुंडली में शुभ स्थिति में हो। तुला और मीन लग्न के जातकों का शनि शुभ स्थिति में होता है। वृश्चिक में भी शनि की स्थिति ठीक होती है। बृहस्पति से द्वादश भाव में स्थित चन्द्रमा अनफा योग का सृजन करते हैं। द्वितीय भाव के स्वामी लग्नस्थ होकर चन्द्र या बृहस्पति की अन्तर्दशा में किसी जातक को बर्बाद नहीं करते। बहुत सी कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद अब मुझे यह विश्वास हो गया है कि शकट योग के कुछ भी परिणाम होते हों परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि जीवन में बुरे दिन सदा नहीं रहते। जीवन परिवर्तनशील है। बुरा समय जीवन में परीक्षा लेता है और इस परीक्षा एवं कसौटी के लिए शकट योग एक महत्वपूर्ण स्थिति है। योग जीवन में बहुत लंबे समय तक फलीभूत नहीं होते हैं। कुछ समय बाद ये योग स्वत: विलीन होने लगते हैं। यहां मंत्रेश्वर महाराज हमें आशा दिलाते हैं कि रूठा हुआ भाग्य पुन: मनाया जा सकता है, खोई हुई प्रतिष्ठा और धन पुन: अर्जित किए जा सकते हैं। एक साधारण एवं गरीब व्यक्ति भी मानसिक रूप से बहुत प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो सकता है अथवा वही व्यक्ति बहुत अधिक दु:खी, पीç़डत और कष्ट से भरा जीवन व्यतीत करता है। ये सभी परिस्थितियां विभिन्न प्रकार के योगायोग, शकट योगादि के कारण बनती हैं और कई बार इनके अपवाद भी पाए जाते हैं।


चन्द्र ग्रह शांति के उपाय—–


क्या दान करें..???


चन्द्रमा के नीच अथवा मंद होने पर शंख का दान करना उत्तम होता है. इसके अलावा सफेद वस्त्र, चांदी, चावल, भात एवं दूध का दान भी पीड़ित चन्द्रमा वाले व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है. जल दान अर्थात प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना से भी चन्द्रमा की विपरीत दशा में सुधार होता है. अगर आपका चन्द्रमा पीड़ित है तो आपको चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न दान करना चाहिए. चन्दमा से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करते समय ध्यान रखें कि दिन सोमवार हो और संध्या काल हो. ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा से सम्बन्धित वस्तुओं के दान के लिए महिलाओं को सुपात्र बताया गया है अत: दान किसी महिला को दें. आपका चन्द्रमा कमज़ोर है तो आपको सोमवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गूंथा हुआ आटा खिलाना चाहिए तथा कौए को भात और चीनी मिलाकर देना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को दूध में बना हुआ खीर खिलाना चाहिए. सेवा धर्म से भी चन्द्रमा की दशा में सुधार संभव है. सेवा धर्म से आप चन्द्रमा की दशा में सुधार करना चाहते है तो इसके लिए आपको माता और माता समान महिला एवं वृद्ध महिलाओं की सेवा करनी चाहिए.


जन्म कुंडली में चंद्र ग्रह यदि अशुभ कारक हो तो निम्न लिखित मन्त्रों का जप करने से चंद्र ग्रह की शांति हो जाती है।


वैदिक मंत्र– ॐइमं देवा असपत्न℧ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना ℧ राजा।


पुराणोक्त मंत्र- ॐ दधिशंख, तुषाराम्भं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।नमामि शशिनं सोमं शंभोः मुकुट भूषणम्।।


स्नान तथा दान काल में यह मंत्र का उच्चारण लाभप्रद होता है।


तंत्रोक्त मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।


चन्द्रमा के जप की संख्या 11000 है।


चन्द्र गायत्री मंत्र- ॐ अमृतांगाय विद्महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्।


अर्घ्य मंत्र- ॐ सों सोमाय नमः।


चन्द्र रत्न- चन्द्र ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु मोती रत्न धारण किया जाता है।


औषधि स्नान – चन्द्र ग्रह की शांति के लिए पंचगव्य, बेल गिरी, गजमद, शंख, सिप्पी, श्वेत चंदन, स्फटिक से स्नान करना चंद्रमा जनित अनिष्ट प्रभावों को कम करता है। भगवान शिव का पूजन सोमवार के दिन करना तथा पूर्ण चन्द्र के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करने से चन्द्र ग्रह की शांति हो जाती है।


चन्द्र यंत्र- चन्द्रमा ग्रह की शान्ति हेतु चन्द्र होरा में चांदी के पत्र में चन्द्र यंत्र खुदवाकर या अष्टगन्ध से भोजपत्र पर लिखकर उसकी विधिवत, पूजन कर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए। अन्य उपाय- सोमवार का व्रत रखकर चावल सफेद वस्त्र, आदि सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए। सोमवार को प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शंकर की मूर्ति पर जल तथा दूध चढाना चाहिए।


कुछ मुख्य अन्य उपाय/टोटके निम्न है-


व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए। रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।


ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।


वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।


वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।


सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पीना चाहिए।


सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।


क्या न करें..???


ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को प्रतिदिन दूध नहीं पीना चाहिए. श्वेत वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए. सुगंध नहीं लगाना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिएल


वैसे तो चन्द्र देव का स्वभाव स्वभाव बहुत शांत और ठंडा होता है और यही वजह है कि वो हम सभी को शीतलता प्रदान करते है किन्तु जब वे गुस्से में आते है तो उसके परिणाम बहुत भयंकर और विनाशकारी हो सकते है. इसलिए कभी भी चन्द्र देव को कुपित ना होने दें और अगर वे कभी आपसे रुष्ट हो भी जाएँ तो आप तुरंत कुछ उपायों को अपनाकर उन्हें जल्दी से प्रसन्न कर लें. आज हम चन्द्र देव से जुडी कुछ ऐसी बातें बताने वाले है जिन्हें जानकार आप पता लगा सकते हो कि चन्द्र देव आपसे रुष्ट है या नहीं और अगर है तो उन्हें किस तरह मनाया जा सकता है.


कुपित चन्द्रमा के संकेत


1. मानसिक परेशानी  : चंद्रमा के रुष्ट होते ही जो पहला संकेत सामने आता है वो है मानसिक चिंता व परेशानी, ऐसे में जातक खुद को फंसा फंसा महसूस करता है, उसे समझ नहीं आता कि वो अपनी समस्याओं से कैसे बाहर निकलें.


2. माता से दूर होना : जातक की माता भी उससे रुष्ट हो जाती है और वो अपनी माँ के सुख की कमी महसूस करता है. कहने का अर्थ ये है कि उसके और उसकी माता के बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहता.


3. बायीं आँख में कमजोरी :  अगर किसी व्यक्ति की बायीं आँख अचानक कमजोर हो जाती है तो उन्हें समझ जाना चाहियें कि उनकी कुंडली में चन्द्रमा रुष्ट हो चुके है.


4. आँखों के पास कालापन  : यहीं नहीं जातक की आँखों के पास कालापन भी दिखने लगता है जो उसके बुरे समय और थकान को दर्शाता है.


5. छाती में मलगम जमना  : सुनने में तो ये आपको सामान्य सा लक्षण लगता है किन्तु जब अगर आप बाकी संकेतों के साथ इसे देखा जाए तो ये पुष्टि करता है कि हाँ सच में चन्द्रमा कुपित हो चुके है. यहीं नहीं उन्हें अन्य वात रोग भी अपना शिकार बना लेते है.


6. पुराने दिनों का स्मरण : क्योकि चन्द्रमा के गुस्सा होने पर जातक का बुरा समय आरम्भ हो जाता है इसलिए उसे बार बार अपने पुराने दिन स्मरण होते रहते है.


7. अधिक नींद आना  : ऐसे में जातक खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से इतना थका लेता है कि उसे नींद आने लग जाती है और वो बिस्तर पर पड़ा रहता है.


8. मासिक धर्म में अनियमितता : अगर किसी महिला पर चन्द्र रुष्ट होते है तो उनके माहवारी चक्र में अनियमितता होनी शुरू हो जाती है.


9. बालों का सफ़ेद होना  : कहा जाता है कि चिंता करने से बाल सफ़ेद होते है जबकि बालों के सफ़ेद होने के पीछे भी चन्द्र देव का ही हाथ होता है.


10. सिर दर्द : जातक को धीरे धीरे अन्य बीमारियाँ अपना शिकार बना लेती है और उनमे सबसे पहले आता है साइनस.


11. जल का असंतुलन  : इसके अलावा जातक के अंदर जल का अभाव व असंतुलन बना रहता है, उसकी त्वचा शुष्क हो जाती है, वो खुद को कमजोर महसूस करने इस स्थिति में कुछ लोग तो जल्दी जल्दी पानी पीना आरम्भ कर देते है.


12. शरीर में कैल्शियम की कमी : पानी के साथ साथ पीड़ित के शरीर का कैल्शी लगातार कम होता जाता है और उसके शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगती है.


तत्व अनुसार रुष्ट चंद्रमा को मनाएं -


अग्नि तत्व : अगर चन्द्अग्नि तत्व में होने पर कुपित होता है तो जातक को सोमवार के व्रत रखने के साथ साथ चंद्रा की हवन सामग्री से हवन अवश्य कराना चाहियें.


वायु तत्व : वहीँ उनके वायु तत्व में नाराज होने पर आपको चन्द्रमा के सामान को जमीन में दबा देना चाहियें. अगर आप ये ना कर सकें तो आप चन्द्रमा की अंगूठी को अवश्य पहनें.


जल तत्व : लेकिन अगर चन्द्र जल तत्व में रुष्ट है तो आपको सोमवार के दिन कच्चे चावल लेने है और उन्हें बहते पानी में प्रवाहित करना है. इसके अलावा आप किसी महिला को चन्द्रमा का सामान भी अवश्य दें.


पृथ्वी तत्व  : पृथ्वी तत्व में चन्द्र के गुस्सा होने पर आपको “ ॐ श्राम् श्रीं श्रोम् सः चंद्रमसे नमः ” मंत्र का जाप करना है, ध्यान रहें कि मंत्र जाप रात को या शिवजी की पूजा के वक़्त ही करें.


चंद्रमाँ के लिए शिव, कृष्ण, भगवती पार्वती, की उपासना और संकस्टी चतुर्थी और पूर्णिमा को सत्यनारायण का व्रत श्रेष्ठ 


कस्टप्रद नीच या बल हीन चंद्र के दान करे


चावल, पानी, दूध , चाँदी, सफ़ेद वस्त्र , का दान करे l पीने के पानी की व्यवस्था करे


पुष्य नक्षत्र में शिव अभिषेक जल और दूध से श्रेष्ठ, पितरो को प्रसन्न करे, माता को सम्मान करे और उन्हें खुश रखे ल


 चन्द्र


चांदी, शंख, सीपी, गौदुग्ध, गोदही, मोती, सफेद कमल/सफेद गुलाब,


गौमूत्र, गौघृत, गाय का मट्ठा आदि जल में डालकर प्रथम उससे स्नान करें, फिर


शुद्ध जल से।


कपूर, मोती, चांदी, चावल, चीनी, खीर, दूध, मिश्री, खांड़, दही, मट्ठा,


बताशे, सफेद गाय/बैल, सफेद वस्त्र, पेठा आदि का सोमवार को दान करें तथा


सफेद वस्त्र पहनें। यह पूर्णमासी की शाम को भी कर सकते हैं।


→ अश्विनी पूर्णिमा से वर्षभर पूर्णमासी का व्रत करें अथवा शुक्ल पक्ष के


प्रथम सोमवार से दस सोमवार का व्रत करें तथा रात को चन्द्र पूजन करके सफेद

फूल, सफेद चन्दन मिले जल से चन्द्र को अर्घ्य दें। चन्द्र मन्त्र का जाप करें। सफेद

वस्त्र व सफेद चंदन धारण करें। प्रदोष व्रत या सावन के सोमवार के शिव के व्रत

करें। शिवलिंग पर जल व दूध का नित्य अभिषेक करें। शिव चालीसा का पाठ करेतथा रुद्राक्ष पूजन करें।

→ चन्द्र के 11000 मंत्रों का जाप करें अथवा 'ॐ हिम् नमः शिवाय' यंत्र




का सवा लाख जाप का अनुष्ठान करे और बाद में किसी सुन्दर स्त्री को भोजन




कराकर चन्द्र सम्बन्धी वस्तुएं दान दें

चांदी के आभूषण तथा मोतियों की माला पहनें, सोमवार को नमक न

खाएं व भोजन एक बार ही करें। ब्राह्मण/सुंदर स्त्री को खीर/दूध खिलाएं/पिलाएं

सफेद शंख को घर में रखें तथा उसका पूजन नित्य करें।

शिवपुराण से चन्द्रमा के शापग्रस्त होकर क्षय रोगी हो जाने तथा फिऱ

शिवोपासना से स्वस्थ हो जाने वाले प्रसंग का नित्य पाठ करें अथवा चन्द्र स्तोत्र क

पाठ करें। सफेद गाय को सफेद खाद्य पदार्थ नित्य खिलाएं व उसकी सेवा करें।

पूर्णमासी (विशेषकर शरद पूर्णिमा) की रात को खीर छलनी से ढकक

रात भर खुली छत पर चांदनी में रखें और प्रात: उसका सेवन बिना गरम किए ही

करें। माता, मौसी का आशीर्वाद लें व सेवा करें।

चंद्र माता योगिनी मङ्गला स्तोत्र (सिद्ध साबर तन्त्र)

श्री पार्वत्युवाच

सृष्टिस्थित्यन्तकारक |

मंगलायाश्चन्द्रमातुः स्तवनं ब्रूहि शंकर । '

देवदेव महादेव श्री शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।

ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||

मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।

चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥

चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।

शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥

वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।

त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥

दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।

सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥

एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।

चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।

मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥

(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)


श्री शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।

ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||

मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।

चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥

चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।

शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥

वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।

त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥

दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।

सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥

एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।

चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।

मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥

(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)

अथ चंद्र कवच 

विनियोग : अस्य

छन्द, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

चन्द्रकवचम्

श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य

गौतम-ऋषिः, अनुष्टुप्-

अथ कवचम्

केयूरमुकुटोज्वलम् ।

समं चतुर्भुजं वन्दे

वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥

एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।

शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥

चक्षुषी चन्द्रमा पातु श्रुती पातु निशापतिः ।

प्राणं छपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥

पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा।

करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः

हृदयं पातु मे चंद्रौ नाभि शंकरभूषणः ।

मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ।।

ऊरू तारापतिः मृगाको जानुनी सदा।

पातु

अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥

सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्रोऽखिलं वपुः ।

एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम् ।

यः पठेच्छृणुयाद् वाऽपि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥

॥ इतिश्री चन्द्रकवचम् ॥

चन्द्राऽष्टाविंशतिनामस्तोत्रम्

विनियोग : अस्य श्रीचन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रस्य गौतम ऋषिः, सोमो

देवता, विराट् छन्दः, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

अथ स्तोत्रम्

चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते ।

यानि श्रुत्वा नरो दुःखान् मुच्यते नाऽत्र संशयः ॥

सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरजः कुमुदप्रियः ।

लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥

शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः ।

नक्षत्रनायकः

आत्रेय इन्दुः शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥

जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णव संभवः ।

शम्भुशिरश्चूडामणिर्विभुः ॥

तापहर्त्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् ।

प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥

तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत् सर्वं समीहितम् ।

ग्रहादीनां च सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥

॥ इतिश्री चन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ॥

चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम्

चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेय गोत्रोद्भव-

श्चाग्नेयश्तुरस्त्र वारुणमुखश्चापोऽप्युमाधीश्वरः

1

षट् सप्तानि दशैक शोभनफल शौरिः प्रियोऽकर्को गुरुः

स्वामी यामुनदेशजो हिमकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥

॥ इति श्री चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम् ॥


    मेरे मत से चंद्र को शुभ, अशुभ राशी

    मेष - अति शुभ, वृषभ -अति अशुभ, मिथुन- साधारण शुभ,कर्क- अशुभ, सिंह - साधारण शुभ, कन्या - अशुभ, तूल - शुभ,वृष्चिक- अति शुभ, धनु - साधारण, मकर - अशुभ, कुंभ - पुरुष राशियह चंद्र के लिए अच्छी नहीं ै। स्त्री राशियों मे मीन यह राशी में फल अच्छेमिलते है। स्त्र राशियों में साधारण से अच्छे फल मिलते है।

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 चंद्र के राशिगत व स्थानगत फल

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का चंद्र कुंडली में हो तो जातक की आंखें सुंदर, किंतुदांत खराब होते हैं। जातक बुद्धिमान व कमजोर रहता है। वह अल्पाहारी किंतुगरम व जल्दी-जल्दी भोजन करनेवाला, निरर्थक भटकने का आदी,विषयासक्त, स्त्रियों का प्रिय होता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का चंद्र कुंडली में हो तो जातक कलाकारकाव्यप्रेमी, क्षमाशील, न्यायप्रिय, निग्रही, सुखी पारिवारिक जीवन भोगनेवाला,कामुक, स्वरूपवान, बहुकन्या संततीयुक्त, अनेक मित्रों से घिरा हुआ,सम्माननीय एवं प्रख्यात होता है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक नेता,मातृ-पितृभक्त, कुशलवक्ता, शास्त्रपारंगत, ऐश्वर्यवान, बारंबार परेदशगमनकरनेवाला, सत्कर्मी, सट्टे एवं जुएं का शौकीन, दूसरों के मन की थाहलेनेवाला, विनोदी, शांतस्वभावी, संपादन, विज्ञापन, कला, लेखन कार्य,हास्य-व्यंग्य, नाटक-अभिनय कला में अधिक रुचि रखनेवाला होता है। ऐसेही व्यवसाय भी करता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक दीर्घायु, कुमार्गी,स्त्रियों के अधीन रहनेवाला, अच्छा दोस्त, ज्योतिषशास्त्र में रुचि रखनेवाला,बाग-बगीचों का शौकीन, अनेक बिल्डिंगों का मालिक, सुगंधित द्रव्यों काशौकीन, आचरणशील, मित्रों और भाइयों से लगाव रखनेवाला, आदर्शवादी,निष्ठावान, परिवार, गांव, प्रांत एवं देश के लिए त्याग करनेवाला और क्रोधी स्वभाव का रहता है। ऐसे जातक को कठिनाई में स्त्रयों की मदद मिलती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र कुंडली में हो तो जातक क्रोधी, जिद्दी, स्त्रियों से नफरत करनेवाला, छोटी-छोटी बातों पर झल्लानेवाला, माता-पिता का दुलारा, सुदृढ़ आर्थिक स्थितिवाला, अल्प पुत्र संतान से युक्त, पराक्रमी,अभिमानी एवं बदला लेने की भावना से ओत-प्रोत रहता है। राज्यसत्ता मेंसहभागी होने की जातक की स्वाभाविक इच्छा रहती है और वह अच्छेप्रशासक के रूप में विख्यात होता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक मधुरभाषी,बुद्धिमान, धार्मिक, कलानिपुण, शास्त्र संपन्न, भाग्यवान, अधिक कन्या संतानसे युक्त, रहन-सहन और बर्ताव में आकर्षक होने से स्त्रियों का प्रिय, बौद्धिकक्षेत्र में काम करके निर्वाह करनेवाला एवं व्यवहारकुशल रहता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक दूसरों पर निर्भररहनेवाला, उनके सहयोग से उदर निर्वाह करनेवाला, जानवरों कीखरीद-फरोख्त करनेवाला, ब्राह्मण और देवताओं को माननेवाला, अनेक स्त्रियोंसे युक्त, सभी प्रकार की सुख-संपत्ति भोगनेवाला, विख्यात वकील, शिल्पी,नाटक-नृत्य में हिस्सा लेनेवाला और प्रसिद्ध होता है, किंतु शीघ्र निर्णय लेनेकी क्षमता जातक में नहीं होती।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक बचपनमें ही पिता.से अलग रहता है। भाई-बहनों का सुख-सहयोग भोगनेवाला,नास्तिक, झूठा, धोखेबाज, क्रोधी, कलहप्रिय, व्यभिचारी, परस्त्रीगामी, कृतष्न,पापी, असंतुष्ट, जीवनभर संकटों से जूझनेवाला रहता है। वृश्चिक राशि काचंद्र संतानोत्पत्ति एवं गर्भस्नाव का कारक रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक कुशल वक्ता, अनेककलाओं में पारंगत, धनसंग्रह करनेवाला, कंजूस, धार्मिक, पिता सेव्यापार-उद्योग एवं धन-दौलत प्राप्त करनेवाला, कुलदीपक, अतिभाग्यवान,ऐश्वर्य संपन्न एवं स्पष्टवक्ता होता है। जातक विद्वान, लेखक, उपदेशक,ज्योतिषी शास्त्राधिकारी की हैसियत से विख्यात होता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक गायन-वादनादिकला में माहिर, क्रोधी, विद्वानों से मैत्री करनेवाला, अनेकों के विचार सुनकरपंडित बननेवाला, सत्यवक्ता, दानी-धर्मी, आलसी, घमंडी, उत्तम स्मरणशक्तिका धनी, भाग्यवान रहता है। जातक अपने से बड़ी एवं निम्न श्रेणी की स्त्रियोंसे प्रेम संबंध रखता है।

    11. कुंभ-कुभ रशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक दानी-धर्मी,मिष्ठानप्रेमी, धर्मकार्य में आसक्त, विषयलोलुप, स्त्री में आसक्त, स्त्रियों केकारण संकट में फंसनेवाला, अपराजित, दूसरों की संपत्ति का उपभोगी होता है।

    12. मीन मीन राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक ऐश्वर्य संपन्न,आकर्षक वस्त्र पहननेवाला, मातृ-पितृभक्त, ईश्वरभक्त, प्रामाणिक, उदार, निष्कपटी, स्त्री के अधीन, ऐशवर्यसंपन्न, शत्रुओं को मात देनेवाला, लेखनकार्य, रत्नों का व्यापारी, आकस्मिक धनलाभ प्राप्त करनेवाला, स्त्री संग कीकामनावाला और वस्त्रालंकारों में मगन रहनेवाला तथा कीर्तिवान रहता है।
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 प्रथम भाव (लग्न)द्वादशा स्थानों में राशिगत फल प्रथम स्थान का चन्द्र

    गर्गाचार्य-पूर्णे शीतकरे लगने सुरूपो धनवान मृद्धः। असंपूर्ण तुमलिनो मंदवीर्यो भवेत् सदा॥ गोमेशकर्कटे लगने चन्द्रस्थे रूपवान धनी।जडता व्याधिदारिद्रयं शेषर्कषे कुरुते शशी। श्वासः कासो हि जातस्य तनौवातभ्रमो भवेत्। अश्वादिपशुघातश्च हृदय राजचौरतः॥

    लग्न में पूर्ण (पौर्णिमा का) चन्द्र हो तो वह पुरुष सुन्दर, धनवान्तथा कोमल होता है। वही चन्द्र कृष्ण पक्ष का अथवा शुक्ल पक्ष में प्रतिपदासे अष्टमी तक का हो तो वह पुरुष मलिन और दुर्बल होता है। लमन में मेष,वृषभ और कर्क राशि में चन्द्र हो तो वह पुरुष धनवान और सुन्दर होता है।अन्य राशियों में वही चन्द्र हो तो आलसी, रोगी और दरिद्री होता है। उसेखांसी, श्वास वात और भ्रम ये रोग होते है। अश्व आदि पशुओंसे दुर्घटनाकी संभावना होती है। राजा और चोरों से घात होता है।

    काशीनाथ - लग्ने चन्द्रे जडः शुद्ध प्रसजो धनपूरितः।स्त्रीवल्लभो धार्मिकश्च कृतघ्नश्च नरो भवेत्। लमन में चन्द्र हो तो वहपुरुष आलसी, पवित्र, आनन्दी, धनवान, धार्मिक और कृतष्न होता है।उसे स्त्रियं बहुत प्रिय होती है।

    कल्याणवर्मा - दाक्षिण्यरूपधनभोगगुणैः प्रधानः चन्द्रेकुलीरवृष-भाजगते विलग्ने। उन्मत्तनीचबधिरो विकलश्च मूक शेषे नरोभवति कृष्णतनुर्विशेषात।

    मेष, वृषभ और कर्क इन राशियों में लग्न में चन्द्र हो तो वह पुरुषचतुर, सुन्दर, धनवान, गुणवान और भाग्यशाली-राजसत्ताधारी होता है।अन्य राशियों में वही चन्द्र हो तो गर्वीला, नीच, बहरा, गूंगा, विकल औरविशेषत: काला होता है।

    हिल्लाजातक - लग्नगश्च विधू रोगं सप्तविंशतिवत्सरे। चन्द्र

    लग्न में हो तो सत्ताईसवें वर्ष में रोग होते हैं।

    यवनमत - लग्न में बलवान चन्द्र हो तो वह पुरुष बहुत चतुरऔर धूर्त होता है। इसे स्त्रीवियोग सहना होता है। स्त्रियों द्वारा सन्मान प्राप्त

    होता है। यह पराक्रमी और राजवैभव पानेवाला होता है।

    पाश्चात्य मत - चन्द्र लग्न में हो तो वह पुरुष घूमने फिरने काशौकीन होता है। चन्द्र चर राशि में अथवा द्विस्वभाव राशि में हो तो यहफल विशेष रूप से मिलता है। ऐसे लोग प्रवासी, अस्थिर बुद्धि के,विलासी, शान्त, दयालु, मिलनसार स्वभाव के, मोहक, डरपोक, उदारऔर सज्जन होते हैं। ये स्त्री के वश में और मित्रों के प्रिय होते हैं। इन लोगोंको सामाजिक कार्य की रुचि होती है और बहुजन समाज में, खासकर नीचजाति के लोगों में, इन्हें सन्मान भी अच्छा प्राप्त होता है। लग्न का चन्द्र यदिअम्नि राशि में हो तो उस पुरुष का स्वभाव साहसी महत्त्वाकांक्षी होता है।यही चन्द्र मेष राशि का हो तो स्वभाव उतावला और अस्थिर होता है। यदिइसका हर्शल से दृष्टियोग हो तब तो ये लोग कभी एक स्थान में स्थिर नहींरह सकते। सर्वदा किसी न किसी झंझट में फंसे रहते है। चन्द्र यदि मकरअथवा वृश्चिक राशि में हो तो फल अच्छे नहीं मिलते। ये लोग व्यसनी,नीच लोगों के संगति में रहनेवाले, बदमाश, गन्दे, बीभत्स शब्दबोलनेवाले और पियक्कड होते है, इस चन्द्र के साथ अन्य अशुभ ग्रहों का
    योग हो तो ये फल विशेष रूप से मिलते हैं। किन्तु शुभ ग्रहों का सम्बन्ध होतो इन फलों की तीव्रता बहुत कुछ कम होती है। मिथुन, कल्या, तुला,कुम्भ इन राशियों में चन्द्र हो तो वह व्यक्ति अभ्यासशील, विद्वान शास्त्रीयविषयों में रचि रखनेवाला, वाचन प्रिय, फल ज्योतिष का ज्ञाता, भाषाओंका ज्ञान अच्छा होनेवाला, लेखक और वक्ता होता है। यह चन्द्र मीनअथवा कर्क राशि का हो तो उस पुरुष का स्वभाव वात्सल्ययुक्त,सात्विक, धार्मिक, लोकप्रिय और पूज्य होता है। इसे घर, कुटुंब,खेतीबाड़ी इनमें रचि होती है। यह चन्द्र वृषभ राशि में हो तो वह पुरुषस्थिर, गंभीर, प्रत्येक कार्य लगन से पूरा करनेवाला, उद्यमी, धीरोदात्त,भाग्यशाली और वैभवयुक्त होता है। लग्न के चन्द्र का सामान्य फल, प्रेम,शान्ति, सत्यप्रियता, सत्त्वशीलता, कलह की रुचि न होना इस प्रकार प्राप्तहोता है। जो लोग नींद में चलते है, बोलते है, अथवा ऐसे ही कार्य करते हैउनकी कुण्डली में प्रायः लग्न में चन्द्र का उदय पाया जाता है।

    ॲलन लिओ-लग्न में चन्द्र हो तो ग्रहणशक्ति अच्छी होती है।समझदारी और दुसरों पर प्रभाव डालने की शक्ति होती है। मित्र औरपरिचितों से सावधान रहना होता है नहीं तो उन्ही के कहने में आने का डरहोता है। किसी भीघटना का मन पर बहुत जल्दी परिणाम होता है।

    मेरे विचार-गर्गाचार्य के मत में पौर्णिमा का चन्द्र लग्न में हो तोरवि सप्तम में होता है इसलिए प्रथम चन्द्र और सप्तम स्थान के रवि इनदोनों का इकट्टा फल मिलता है। पाश्वात्य ज्योतिषियों ने प्रतियोग अशुभमाना है। सिर्फ अलन लिओ इसे शुभ मानता है। पुरुष राशि में पूर्ण स्थिति मेंहो तो वह व्यक्ति रूपवान और मृदु होती है। किन्तु धनवान होना यह फलयोग्य नहीं है। क्योंकि चन्द्र धन का कारक नहीं है। यह फल सिर्फ बैद्यनाथ ने
    ही कहा है। गंदा और मंदवीर्य ये फल मेरे ख्याल से शनि के है, चन्द्र के नहीहै। अन्य अशुभ फल कहे हैंवे स्त्री राशियों के है। घोडे से भय यह फल कुछअजीब ही है। राजा केघर चोरी करना इस फल का भी कुछ अनुभव नही आता।

    काशीनाथ -ने जो फल कहे हैं उनमें आलसी और कृतनहोना ये स्त्री राशि के और अन्य पुरुष राशि के है।

    कल्याणवर्मा -ने मेष, वृषभ और कर्क इन राशियों में चन्द्र केफल अच्छे कहे हैं। अन्य राशियों में जो बुरे फल बताए है उनमें बहरा, गूंगा,अंगहीन इन फलों का अनुभव नहीं आता। वर्ण काला होना इस फल काअनुभव मेष, मकर और कुंभ राशियों में आता है।

    हिल्लाजातक-में २७ वे वर्ष में रोग होना यह फल कहा है। यहस्त्री राशि में योग्य है। इस वर्ष की उपपत्ति अच्छी मिलती है। क्योंकिमहाभ्रमण पद्धति से चन्द्र को फिर लग्न में आने के लिए २७ वर्ष लगते है।इसका अनुभव देखना चाहिए।

    यवनमत - के अनुसार स्त्री का वियोग सहना पडता है। यहफल विचार करने योग्य है। वृषभ लग्न में इसका अनुभव अधिक आता है।अन्य लगनों में कम आता है।

    पाश्चात्य मत - में वृश्चिक लगन के चन्द्र के फल बहुत अशुभकहे गये हैं किन्तु वे वैसे नहीं मिलते। अकेले चन्द्र से निद्राश्रम भी नहींहोता। 

    जातक सम्पन्न, प्रसन्नचित्त, साहसी बहादुर, सुंदर शरीर वाला,धनवैभवशाली होगा। चन्द्रमा, यदि क्षीण या नीचस्थ या पापक्रान्त होगा तोजातक मूर्ख, दरिद्र और तनावयुक्त होगा।
    -मानसागरी
    व्यक्ति सुदृढ़ शरीर वाला, सिद्धान्तवादी, चिरंजीवी, शक्तिशाली,धनाद्य, सम्पन्न व निडर होगा। यदि चन्द्रमा क्षीण है तो जातक कोउपरोक्त फल न मिलकर विपरीत ही फल मिलेंगें।
    -फलदीपिका
    यदि चन्द्रमा (मेष, कक, वृष, राशि में) अच्छी स्थिति में औरबलवान है, तो जातक उदार, सम्पन्न, सुन्दर व समृद्धिशाली होगा। अन्यभावों में चन्द्रमा की स्थिति जातक को अधिक कामुक, बहरा, तनावग्रस्त,गूँगा, नीच अधम और सम्पन्नता को खोने वाला होता है।
    -सारावली
    जातक सुदर्शन परन्तु और बुद्धिवाला, शरीरिक कष्टों से पीडित,जलीय स्थानों पर प्रसन्नता अनुभव करने वाला, 15 वें वर्ष की आयु मेंदेशाटन (सैर) करने वाला, शास्त्रों का ज्ञाता, सम्पन्न, प्रसन्न, मृदुभाषी,कोमल त्वचा वाला परन्तु बुद्धिहीन होता है।

    -भृगु

    जातक भावुक, वायु प्रकृत्ति, अस्थिर मानसिकता व संतुलित भोजनकरने वाला, गुप्तांगो व कानों के रोग से पीड़ित, विरूद्ध लिंग वालों कोप्रिय, सुशिक्षित, व्यभिचारी, सहजभाव वाला (आरामपसंद), सामाजिक,चंचल मति, उत्केन्द्रीय, अन्तर्मुखी, हठधर्मी और घमंडी होता है।
    -डॉ रामन
    जातक गूँगा, पागल, मूर्ख अंधा, बहरा, नीच होगा। यदि चन्द्रमाबलवान है तो जातक धनी होगा।
    -वृहत् जातक

    मेरा अनुभव - मेरे अनुभव का विशेष भाग पाश्चात्य मत केफलवर्णन में आ ही गया है। यह चन्द्र मेष, सिंह और धनु में हो तो वे व्यक्तिस्थिर, कम बोलनेवाले और कार्यकर्ता होते है। इन्हे कामेच्छा तीव्र होती है।इन्हे अधिक हलचल पसंद नहीं होती। प्रकृति क्षीण होती है। क्रोधी औरपैसे के विषय में बेफिक्र होते है। धनु राशि में यह चन्द्र हो तो संसार सुख कममिलता है। यह चन्द्रवृषभ, कन्या अथवा मकर में हो तो वे लोग खुद कोबहुत विद्वान और होशियार समझते और बतलाते है किन्तु इन्हें समय परचार लोगों के बीच आगे आने का साहस नहीं होता। वृषभ लग्न के चन्द्र के     फलस्वरूप संसार सुख कम मिलता है। विचाह नहीं होता और हुआ तो भीसंसार सुख बहुत समय तक नहीं मिलता। मध्यम आयु में पत्नी की मृत्युहोती है। ये स्वभाव से दुष्ह और परस्त्रियं में आसक्त होते हैं किन्तु ये गुणप्रगह नहीं होते। यह चन्द्र मिधुन, तुला अथवा कुम्भ में हो तो बे नेता होने केलिए कोशिश करते है। किसी भी कार्य में आमंत्रण मिलना चाहिए ऐसीइच्छा होती है। अपना फायदा न होते हुए भी ये दुसरों का नुकसान करनाचाहते है और स्वार्थी होते है। यह चन्द्र कर्क, वृश्चिक अथवा मीन में हो तोवे अपने ही व्यबहार में संतुष्ट होते हैं। दूसरों के व्यवहार में हाथ नहींडालते। ये स्वार्थी और दूसरों में कलह लगानेवाले होते है। सामान्यतः लगनके चन्द्र के फलस्वरुप कुछ झुठ बोलने की इच्छा होती है। व्यवहारज्ञाननही होता। It tends to uncertain and unreliable behaviour,so that it is unwise to depend too much upon personswho have it, for their conduct at one moment may bequite different from what it will be an hour later.अनिश्चित और अविश्वसनीय बर्ताव होता है। इनपर अधिक अवलन्बितरहना अच्छा नहीं होता क्यों कि इनके वर्तन में समय समय पर बहुतपरिवर्तन होता है। एक को वे कहेंगे कि वे पूर्व की ओर जा रहे हैं। दुसरे कोपश्चिम व तीसरे को दक्षिण दिशा बताएंगे और खुद उत्तर की ओर जाएगे।इस प्रकार अनिश्चित वर्तन होता है। यह अनिश्चितता किसी आन्तरिकहेतु के कारण नहीं होती, स्वाभाविक ही होती है। लम्न के चन्द्र से स्वभावसनकी होता है।

    कभी पूर्णता प्राप्त करनेवाला, तो कभी क्षय पानेवाला चंद्र प्रह है। इसक्षय-वृद्धि के कारण चंद्र के फलित में अंतर आता है। किसी एक भाव मेंपूर्ण चंद्र हो तो उसका फलित अलग और किसी भाव में क्षीण चंद्र (कृष्णपक्ष की अष्टमी के बाद से शुक्ल पक्ष की अष्टमी तक का) हो तो फलितअलग आता है। केवल लग्न में ही नहीं अपितु सभी भावों के चंद्र फलादेशमें यह अनुभव में आता है। इसलिए चंद्र का फलित देखते समय विषेकपूर्णफलित कहना चाहिए। मेष, वृषभ या कर्क राशि का पूर्ण चंद्र लग्न में होतो उत्तम रहता है। ऐसा जातक सुन्दर, संपन्न, सरल स्वभावी एवं सुखी रहताहै। किंतु अन्य राशि का क्षीण चंद्र लग्न में होने पर जातक दुर्बल, आलसी,हृदयरोगी, राजभय, पशुभय, चोरभय से युक्त रहता है।
प्रथम भाव-चन्द्रमा लग्न में हो तो जातक का रंग गोरा तथा व्यक्तित्वआकर्षक एवं मुखाकृति सुन्दर होती है। परन्तु जातक प्रसन्नचित्त, शीतञ्वर सेपीड़ित तथा कफ, नज़ला, साईनस आदि का रोगी हो सकता है। जातक कोमलांगीव घुमकड़ होता है। परन्तु उसे जल से भय रहता है।
    विशेष-(चन्द्रमा का विचार करते समय पुनः स्मरण दिला दें कि कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष आदि के जन्म का विचार अवश्य करें। पूर्ण चन्द्र यदि गोरा, सुन्दर व कोमलांगी बनाता है तो कृष्णपक्ष का चन्द्र मलिन व दुर्बल बनाता है।)
    लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक को माता के जीवित रहते कभी धन- सम्पत्ति की कमी नहीं होती। उसे सदैव माता की आज्ञा का पालन व उसकी सेवा
    करनी चाहिए, इससे शुभ प्रभाव बढ़ते हैं। ऐसे जातक को मुफ्तखोरी तथा घटिया कायों से बचना चाहिए तथा घर में पानी से भरा घड़ा सदैव रखना चाहिए। ऐसेजातक का शिक्षा पर खर्च किया गया धन कभी व्यर्थ नहीं जाता। शिक्षा उसेअर्थोपार्जन में सहायक होती है।
    यदि प्रथम भाव में चन्द्रमा कर्क या वृष राशि का हो तो जातक सुन्दर होने केसाथ धनी होता है तथा जीवनसाथी का प्रिय एवं सुन्दर वस्तुओं को प्रसंद करनेवाला होता है। (विशेषकर स्त्री जातक पति की प्राणवल्लभा होती है।) अन्यराशियों का चन्द्र मूर्ख, निर्धन व रोगी बनाता है। खांसी, श्वास जातक एवं वायुरोगदेता है। शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो जातक बली, बुद्धिमान, निरोगी किन्तु वाचाल एवंकपटी होता है। शनि की दृष्टि हो तो रंग सांवला तथा दिमाग अस्थिर/वहमी होजाता है। शास्त्रकारों के अनुसार-विधुर्गोकुर्ली राजगः सनवातृः स्था धनाध्यक्षलावशय मानन्दपूर्णम्। विधते धनं क्षीणदेह दरिद्रं, जड़ श्रोत्रहीनं नर शेषलग्ने॥ (वृष, मेष, कर्क लग्न हो तो चन्द्रमा जातक को धनवान, प्रसन्नचित्त,सुन्दर शरीर वाला बनाता है। अन्य राशियों में लग्नस्थ चन्द्र जातक को निर्धन,दुर्बल, मूर्ख तथा. बहरा बनाता है।)

    लग्न में किसी भी राशि का चंद्र होने पर जातक आलसी, आचार-विचारोंसे पवित्र, स्त्रियों का प्रिय किंतु कृतष्न रहता है। उम्र के 27वें वर्ष में शारीरिककष्ट की संभावना रहती है। जातक को राजसम्मान प्राप्त होता है। जातक स्त्रियोंका प्रिय तो रहता है लेकिन उसे स्त्री वियोग भी सहन करना पड़ता है। वहघूमने-फिरने का शौक रखता है, व्यवहार चतुर रहता है। क्षीण चंद्र होने परजातक का मस्तिष्क कमजोर रहता है। उसे नींद में बड़बड़ाने, चलने या कामकरने की आदत होती है।
प्रथम भाव: लग्नस्थ चंद्र हो तो व्यक्ति अत्यधिक घूमने-फिरने वाला होता है। वह स्वभाव से दयालु, मिलनसार, डरपोक, उदार, सज्जन, अस्थिरमति, विलासी तथा प्रवास अधिक करता है। समाज में उसे विशेष सम्मान मिलता है। मेष राशि का चंद्र लग्न में हो तो व्यक्ति उतावले स्वभाव और अस्थिरमति होने के कारण कष्ट पाता है। सिंह एवं धनु लग्न का चंद्र व्यक्ति को मितभाषी, स्थिरमति बनाता है। ऐसे लोग प्राय: निरालस होते हैं, काम-वासना की भी 
उनमें कमी रहती है। ऐसे लोग अधिक हाय-तौबा नहीं मचाते, धन के विषय में भी लालची नहीं होते। विशेषतः धनु राशि का चंद्र व्यक्ति के सांसारिक सुख में अल्पता अवश्य लाता है। पृथ्वी तत््वीय राशि (वृष, कन्या, मकर) का चंद्र व्यक्ति को अभिमानी बना देता है। ऐसा व्यक्ति अपने को सभी क्षेत्रों में निष्णात समझता है लेकिन वह सभा में भाषण करने का साहस नहीं जुय पाता। उच्च का चंद्र व्यक्ति को कामी बना देता है। परकीया सेवन के कारण दाम्पत्य-सुख नष्ट हो जाता है, मध्यमायु में विधुर जीवन जीना पड॒ता है। वायु तत्वीय  राशि (मिथुन, तुला, कुम्भ) का चंद्र व्यक्ति में नेता बनने की इच्छा जाग्रत करता है, उसका प्रयत्न ही यह रहता है कि वह येन-केन प्रकारेण राजनीति में प्रवेश कर कोई पद हथिया ले। स्वभावत: ऐसा व्यक्ति दुष्ट प्रकृति का और स्वार्थी होता है। जल तत्त्वीय राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) का चंद्र होने से व्यक्ति निरपेक्ष होता है। जहां वह अपने कार्यों में किसी का भी हस्तक्षेप सहन नहीं करता, वहीं दूसरों के कार्यों में भी वह हस्तक्षेप नहीं करता। ऐसा व्यक्ति मिथ्याभाषी होता है और समाज में अलोकप्रिय रहकर निंदा का पात्र बनता हे। 
प्रथम भाव का फल जिसको कुंडली के प्रथम भाव में चंद्र हो, .वो व्यक्ति शालीन प्रकृति का, अलंत चालाक, गौत-संगीत एवं वाद्य का प्रेमी, मेघावी, नाटयक्षेत्र में सक्रिय रहने वाला आकर्षक व्यक्तित्व का, विभिन खेलों में रुचि लेने वाला, बलवान ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसायी तथा स्थूलशरीर का होता है। आठ वर्ष की आयु से ही उसकी योग्यता झलकने लगती है। यदि प्रथम भाव में मौन राशि का चंद्र अवस्थित हो ते व्यक्ति लोकप्रिय तथा समाज का गौरव बढ़ाने वाला होता है। वो धनवान्‌ कांतिमान तथा पूर्ण आनंद का भागी होता है। यदि चंद्र प्रथम भाव में वृश्चिक राशि का हे, तो व्यक्ति शरौरस्थ गेग से ग्रसित होता है। प्रथम भाव में ही चंद्र वृष तथा कर्क ग़शि का हो, तो व्यक्ति सौभायशाली तथा कुलदीपक होता है। मिथुन कन्य| धनु कुंभ अथवा तुला राशि में चंद्र प्रथम भाव में पढ़े तो व्यक्ति विद्वान तथा अनेक शा्तों का ज्ञाता होता है। 

कंडली के प्रथम भाव में क्षीण चंद्र हो तो व्यक्ति नेतरोगी, गूंगा, बहर| उन्माद गेगी तथा अय व्याधिग्रस्त रोगों से पीड़ित रहता है। इसी प्रकार जब चंद्र प्रथम भाव में नीच राशि का होता है अथवा शत्रुक्षेत्री होता है, तो व्यक्ति को उपर्युक्त रोगों में से किसी प्रकार का रोग अवश्य होता है। चंद्र के अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति शरीर से रोगी और किसी-१-किसी हु:ख से व्यधित अवश्य रहता है। 

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र लग्न में होने पर जातक सुन्दर, दीर्घायु, विद्वानकिंतु कम बोलनेवाला रहता है। जातक की प्रतिभा का पूर्ण विकास नहीं होपाता, पिता की संपत्ति को त्यागकर स्वपरिश्रम से संपत्ति कमाता है। किसीअन्य कारण से भी पैतृक संपत्ति का त्याग करना पड़ता है। पिता के साथस्नेहपूर्ण संबंध रहते हैं। जीवन में पूर्ण सफल होने से जातक को फायदा मिलताहै। पिता के रिश्तेदारों ताऊ-चाचा से अनबन रहती है।

    2. वृषभवृषभ राशि का चंद्र लग्न में रहने पर जातक परोपकारी, धैर्यवान,मृदुभाषी, खाने-पीने का शौकीन, कामातुर एवं स्वपरिश्रम से प्रगति करता है।स्वास्थ अच्छा रहता है। अपने लोगों में फूट डालने की उसकी आदत होतीहै। जातक प्रायः नौकरी करके निर्वाह करता है।
    3. मिथुनमिथुन राशि का चंद्र लग्न में होने पर जातक कंजूस, कामातुर,भोगविलास में निमग्न एवं परोपकारी होता है। अपना काम छोड़कर दूसरों केकाम करता है। पत्नी सुंदर मिलती है। प्रायः व्यापार करके धन जोड़ता है।4. कर्ककर्क राशि का चंद्र लग्न में हो तो जातक सुन्दर, नीरोगी,स्वपरिश्रम से उन्नति करनेवाला, संपन्न एवं सुव्यवस्थित जीवन जीनेवाला किंतुचंचल स्वभावी रहता है। दो पलियां होने की संभावना रहती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र लग्न में हो तो जातक सुस्वरूप, शस्त्रविद्यामें पारंगत, बोलने में चतुर एवं भ्रमणप्रिय होता है। वैवाहिक जीवन में न्यूनतारहती है। कुछ आचायों के मत से जातक स्वयं नपुंसक होने से वैवाहिक सुखप्राप्त नहीं कर पाता।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र लग्न में होने पर जातक वाचाल, सात्विक,कौतुकप्रेमी, स्वरूपवान होता है। आयु कम रहती है। प्यास से मृत्यु होनी संभवरहती है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र लग्न में रहने पर जातक बचपन में रोगी लेकिनबाद में स्वस्थ रहता है, संपन्न और कविहृदय होता है। जातक का मां कीअपेक्षा पिता से अधिक लगाव रहता है। मां का चरित्र अच्छा नहीं होना संभवहोता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र लग्न में होने पर जातक पर चंद्र कादुष्प्रभाव रहता है। वह अस्थिर विचारवाला, चिंताग्रस्त, शक्की, रोगी, मन सेदुर्बल रहता है। काम बड़ी मुश्किल से होते हैं। पशुपालन के व्यवसाय में धनप्राप्त होता है। जातक धर्मात्मा होता है, विशेष रूप से गणपति उपासक होताहै। वह अल्पआहारी तथा कंजूस होता है। निर्वाह के लिए उसे नौकरी करनीपड़़ती है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र लग्न में हो तो जातक को जीवन में अल्प सुखमिलता है। वह नास्तिक होता है, दो पलियों का योग बनता है। धनु राशिका चंद्र अरिष्टसूचक होता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र लग्न में हो तो जातक निष्टुर, चंचल,कामातुर, अनेक स्त्रियों से संबंध रखनेवाला, विलासी एवं संपन्न जीवनजीनेवाला होता है। इसके पेट में कोई बात नहीं पचती।

    11. कुंभकुंभ राशि का चंद्र लग्न में हो तो बाल्यारिष्ट सूचक होता है।एवं स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। कफ, शीतजन्य विकार होते हैं।पशुपालन में रुचि होती है और उसी से धन कमाता है। जातक शत्रुनाशकएवं स्वकीयों से अलगाव रखनेवाला होता है। संतान सुख अल्प रहता है।

    12. मीन मीन राशि का चंद्र लग्न स्थान में होने पर जातक बहुरूपी चुगलखोर, बुद्धिमान, गुप्त विद्याओं का जानकार, तंत्र-मंत्र एवं चमत्कारपूर्णबातों को जाननेवाला होता है। किसी की परवाह नहीं करता।
   
1) प्रथम भाव में-उपाय
1. दूध न बेचे। 2. चांदी की कटोरी में दही खावें। 3. बारिश का पानीकिसी बरतन में शामिल कर घर में छिड़के।
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 द्वितीय स्थान (धन भाव)धनस्थान में चन्द्र

    जयदेव-सुतसौख्यजसुकुटुम्बयुतः शशिनि प्रवपूर्णवपूषिद्रविणे। लघुजठराम्निधबुद्धियुतो विकले कलावति वदति बुधाः। इस     स्थान में चन्द्र पूर्ण हो तो पुत्रसुख, अजसुख और कुटुम्ब अच्छा मिलता है।यही चन्द्र क्षीण हो तो अग्निमांद्य होता है तथा बुद्धि और धन भी कमहोता है।

    विदयारण्य - चन्द्रोंपि धनस्थाने क्षीणोऽपि शुभवीक्षितः सदाकुरुतो। पूर्णार्जितथिनाशं निरोधमपिचान्य वित्तस्य। इस स्थान में चन्द्रक्षीण हो ओर उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो भी पैतृक सम्पत्ति का नाशहोता है और नई सम्पत्तिप्राप्त होने में रुकावट आती है।

    जातकरल - धने चन्द्रे धनी लोके दृष्टिभिर्वा विलोकिते।भगिन्यास्तस्य कन्याया द्रव्यनाशोऽपि जायते। इस स्थान में चन्द्र होअथवा उसकी दृष्टि हो तो वह व्यक्ति धनी होता है। उसकी बहन अथवाकन्या से धन का नाश होता है।

    हिल्लाजातक - तस्मिन्नेव करोतीन्दुः द्वितीय श्च न संशयः।धनस्थान के चन्द्र से २७ वें वर्ष में धनलाभ होता है।

    यवनमत - इस चन्द्र के फलस्वरूप वह व्यक्ति धनवान,मिष्टभाषी, लोकप्रिय, विजयी और बलवान होता है यह मित्रगृह में, उच्चअथवा स्व क्षेत्र में हो तो इसका फल बहुत ही उत्तम मिलता है।

    पाश्चात्य मत -यह चन्द्र बलवान और शुभ सम्बन्धित हो तोसम्पत्ति सुख अच्छा मिलता है। ऐसे व्यक्ति को विविध वस्तुओं के संग्रहका बहुत शौक होता है। यह विजयी और धन संग्रह करनेवाला होता है।यहां उच्च का चन्द्र हो तो विपुल धन मिलता है। स्त्रियों से अच्छी मददमिलती है। सार्वजनिक कार्यों में भाग लेकर विजयी होता है। यह चन्द्रवृश्चिक या मकर में हो तो बहुत बुरे फल मिलते है। इस से सम्पत्तिसुख मेंव्यत्यय आता है। निस्तेज होते है। स्वभाव खर्चीला होता है। हानि के मौके बार बार आते है। रिश्तेदारों से बहुत तकलीफ उठानी पडती है। प्रवास मेंअपयश मिलता है। वृश्चिक के चन्द्र से अपने ही हाथ से अपना नुकसानहोता है। यह चन्द्र यदि अमावस्या का हो तो कितनी भी सम्पत्ति हो, आयुमें किसी न किसी समय धन के विषय में तकलीफ अवश्य होती है। विदेशमें प्रवास करने से भाग्योदय हो सकता है। सार्वजनिक संस्थाओं के सम्बन्धसे भाग्योदय होता है। साम्पत्तिक स्थिति में समुद्र के ज्वारभाटे के समानबहुत स्थित्यन्तर होते रहते हैं। इसीलिए सार्वजनिक हित के कार्यों मेंअथवा जनसमाज को उपयोगी ऐसी वस्तुओं के व्यवहार में लाभ होता है।धनस्थान के चन्द्र से विशेषत: विवाहित स्त्रियों से होनेवाले लाभ औरहानि का बोध होता है।

    मेरे विचार - धनस्थान से धन अर्थात सम्पत्ति के विषय मेंविचार किया जाता है। धन शब्द से नगद रुपये, जेवर, शेअर आदि का हीबोध होता है कि उसमें स्थावर इस्टेट भी शामिल करनी चाहिए यह एकप्रश्न है। विलियम लिलि ने इस विषय में अपना मत इन शब्दों में दिया है।William Lily - The second House - From this house isrequired judgement concerning the estate of fortune ofhim, of his wealth, of property, of all movable goods,money lent, ofprofitor gain, loss ordamage, insuits ofLaw.
इस स्थान में व्यक्ति की इस्टेट अथवा धन का विचार होता है।उसकी सम्पत्ति, मालमिलकियत, जंगम इस्टेट, लोगों को दिया हुआकर्ज, कानुनी व्यवहार में फायदा, नफा, नुकसान अथवा खराबी इन सबबातों का द्वितीय स्थान से विचार होता है। इसलिए स्थावर इस्टेट का औरपैतृक सम्पत्ति का विचार मेरे मत से द्वितीय स्थान से ही करना चाहिए। इसका विचार कोई लाभ चतुर्थ स्थान से भी करते है l
    जयदेव - ने इस स्थान में पुतसौख्य का फल किस प्रकार कहा है। यहसमझ में नहीं आता। शायद पंचम स्थान से यह स्थान दसवां है। इस विचार    से ये फल कहे हो। अजसौख्य और कुटुम्ब सौख्य का विचार ठीक है।किन्तुकुम्ब में यहां पत्नी और सन्तान को छोड़कर अन्य कुटुम्बियों काविचार करना चाहिए। क्षीण चन्द्र के फल में अग्निमांध होना, धन औरबुद्धि कम होना ये फल कहे है। उपर लिखे फल क्षीण चन्द्र के फल स्त्री राशि में तथा पूर्ण चन्द्र के फल पुरुष राशि में मिलते हैं।

 विद्यारण्य - का कहा हुआ फल धनस्थान में चन्द्र क्षीण होऔर वह स्त्री राशि में हो तो मिलता है। 
    जातकरल - के मत का अनुभव देखना चाहिए मुझे ऐसा कोईअनुभव देखने को नहीं मिला।

    हिल्लाजातक-का फल पुरुष राशि में मिलता है। वह भी उच्चवर्गों में नहीं मिलेगा। क्यों कि इन दिनो में उच्च वर्ग के लोगों में धनार्जन काआरम्भ कम आयु में नहीं होता। हीन वर्गों में यह फल मिलता है।यवनजातक-के सब फल पुरुष राशियों के हैं।

    पाश्चात्य मत - में बहुतसा भाग योग्य प्रतीत नहीं होताअनुभव देखना चाहिए।

    जातक दानी, बुद्धिमान, अपार संपत्तिशाली, अस्थिर चित्तवाला,अनियमित, अधर्मी, सुख-वैभव का उपभोग करने वाला, प्रसिद्ध/विख्यात,कमल के समान मुख वाला और चन्द्रमा के समान कांतियुक्त होगा।

    -मानसागरी

    जातक विद्वान, मृदुभाषी, सम्पन्न, परन्तु विकलांग हाथ-पैर वालाऔर एंद्रियासक्त होता है

    -फलदीपिका

    जातक अपार धन-संपत्ति वाला और अत्यंत प्रसन्नता प्राप्त करता है।उसके अनेक मित्र होते हैं। यदि चन्द्रमा पूर्णिमा का हो तो जातक धाराप्रवाह बोलने वाला तथा मितभाषी प्रकृति का होगा।

    -सारावली

    जातक सुदर्शन, कांतियुक्त, धनी, संतुष्ट, 18 वें वर्ष में सेना नायकबनने वाला होगा। यदि चन्द्रमा पापक्रान्त या अशुभ प्रभावों से ग्रस्त है तोजातक अशिक्षित होता है।,

    -भृगु

    जातक सम्पन्न, सुदर्शन आकर्षक, उदार, कुशाग्रबुद्धि, शिक्षा मेंबाधाओं से हानि, कवित्वशक्ति वाला, सम्मानित, अनुसरण कर्ता, प्रियऔर भैंगी दृष्टि वाला परन्तु मधुर भाषी होगा।

    -डॉ रामन

    बहन-बेटियों के कारण जातक का धन व्यय होगा।-जातक रत्न

    टिप्पणी

    द्वितीय भाव में चन्द्रमा प्रचुर अन्न-धन प्रदाता, शारीरिक दृढ़ता,स्त्रियों के साथ के आन्नद लेने वाला, उसके यश और आकर्षण परपरियाँ भी मोहित हों, जातक चतुर, लक्ष्मी देवी का अनुग्रह प्राप्त करनेवाला होता है। वह सभी शारीरिक सुख, स्त्रीसुख और परिवार मेंप्रेम-बनाये रखने वाला होता है।

    मेरा अनुभव -इस विषय में एक प्रधान त्त्व पहले ही स्पष्टकरना जरूरी है कि चन्द्र स्थान फल का नाश करता है। इसलिए धनस्थान मेंकिसी भी राशि का चन्द्र हो, पूर्वाजित सम्पत्ति का नाश अवश्य होता है।और खुद के श्रम से प्राप्त सम्पत्ति से ही निर्वाह करना पडता है। सरकारीऑफिस अथवा प्राइवेट कंपनियों के नौकर, रेल्वे, म्युनिसिपलिटी आदिके कर्मचारी इत्यादि मामुली दर्जे के लोगों की कुण्डलियों में धनस्थान काचन्द्र देखा है। इसके कोई दुष्परिणाम नही हुए। इन्हे सुख से पेनेशन मिलतीहै, अन्नवस्त्र की कमी नही होती। किसी दुसरे के कुदुम्ब की व्यवस्था कीजिम्मेदारी निभानी पड़ती है। धनस्थान के चन्द्र से दुसरे लोगों के कार्यअच्छे होते हैं। यह चन्द्र वृषभ अथवा कर्क में हो तो धनप्राप्त में बहुतकठिनाई होती है। स्थिरता जल्दी प्राप्त नहीं होती। मकर और कुम्भ में यहचन्द्र हो तो तकलीफ कम होती है। कन्या एवं वृश्चिक में उससे भी कमतकलीफ होती, अन्य राशियों में शुभ फल मिलते है। इस चन्द्र से बड़ेउद्योगों की ओर प्रवृत्ति होती है। बुद्धि का प्रभाव अच्छा पडता है। जैसे किकल्याण वर्मा ने कहा है-यह मधुर किन्तु कम बोलता है। (नरोडल्प-
प्रलापकारः।) इस गुण का वकीलों को बहुत उपयोग होता है। न्यायधीशको मधुर किन्तु अधिकारयुक्त वाणी से अपना मत समझा देने की कुशलताइससे प्राप्त होती है। इस चन्द्र का फल डॉक्टरों को भी अच्छा मिलता है।चन्द्र जिन रोगों का कारक है उनका इलाज ये अच्छी तरह कर सकते है।इससे अच्छी कीर्ति मिलती है। चन्द्र को क्षयवृद्धि होती है किन्तु नियमितरूप से होती है। इसी प्रकार रहनसहन और खानपान नियमित होता है,व्यवसाय अच्छा चलता है और यश प्राप्त होता है।

 द्वितीय स्थान यानी धन स्थान में स्थित चंद्र के प्रायः शुभ फल मिलते हैं।यदि चंद्र बलवान हो तो उसके उत्तम फल प्राप्त होंगे और यदि वह क्षीण होतो फल देने में असमर्थ रहेगा। धन स्थान में चंद्र हो तो जातक आर्थिक दृष्टिसे संपन्न एवं सुखी रहता है। उसके जीवन में कभी अर्थ संकट उत्पन्न नहींहोता। पारिवारिक एवं वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। ऐसे जातक पर अपनीबहनों और लड़कियों की जिम्मेदारी आती है एवं उनके लिए उसे खर्च भीकरना पड़ता है। जातक मिष्ठान्नप्रेमी, सुन्दर, आकर्षक व्यक्तित्व का एवंलोकप्रिय रहता है। 29वें वर्ष में जातक का भाग्योदय होता है।
 द्वितीय भाव-दूसरे भाव में चन्द्रमा हो तो जातक ठंडे व पेय पदार्थों काशौकीन, कांतिपूर्ण चेहरे वाला, योग्य, बुद्धिमान व प्रसन्नवित होता है। उसकीवाणी मधुर होती है तथा वह प्रिय भाषी होता है। यदि शनि, राहू का सम्बन्ध भीदूसरे भाव से दृष्टि, युति, राशि आदि द्वारा हो रहा हो तो जातक शराब का शौकीनतथा मांस खाने वाला होता है एवं उसे नेत्र रोग सम्भव होता है। यदि चन्द्रमा उच्चका हो तो जातक स्त्रियों के माध्यम से धन लाभ/सहायतादाता है परन्तु बात करनेमें अटकता या हकलाता है। (वाणी दोष की सम्भावना बनती है। यदि उच्च या
    स्वराशि का चन्द्र द्वितीयस्थ है) चन्द्रमा पर पाप प्रभाव हो तो पाचनतंत्र गड़बड़(भूख व पाचन की समस्या) तथा बुद्धि व शरीर दुर्बल होता है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक स्वयं अपनी दौलत कमाने वाला होताहै। उसकी विद्या/पढ़ाई ही उसके भाग्य का आधार बनती है। चन्द्रमा से सम्बन्धितव्यापार उसे लाभप्रद होता है। ऐसे जातक को घर में मन्दिर नहीं बनाना चाहिए। नही घर में घंटे/घड़ियाल रखने चाहिए। इनका जातक पर प्रभाव अशुभ होता है।(यदि पूर्ण चन्द्र बिना पाप प्रभाव के बलिष्ट होकर द्वितीय भाव में बैठे तो जातकइतना सुन्दर होता है कि अप्सरा भी उसे देखकर मोहित हो सकती है।)
द्वितीय भाव: यदि द्वितीयस्थ चंद्र बलवान ओर शुभ ग्रहयुक्त एवं दृष्ट हो . तो व्यक्ति को संपत्ति सुख मिलता हे। ऐसा व्यक्ति विविध वस्तुओं का संग्रह करता है। चंद्र उच्च राशि (वृष) अथवा स्वराशि (कर्क) का हो तो घन प्राप्ति तो होती ही है, धन का संग्रह भी हो जाता है। स्वस्त्री या स्त्री वर्ग के कार्यों में सहायक होता है। ऐसा जातक सार्वजनिक कार्यों में बढ-चढ़कर भाग लेता है। वृश्चिक या मकर राशि का चंद्र हो तो कठिनाई से धन प्राप्ति होती है। ऐसे व्यक्ति प्राय: हतोत्साही एवं तेजहीन पाए गए हैं। उनका स्वभाव व्ययशील होता है, बार-बार व्यवसाय में हानि उठानी पड़ती है, रिश्ते-नाते वाले भी हानि का कारण बनते हैं। यदि जन्म अमावस्या का हो तो व्यक्ति आयु के किसी-न-किसी खण्ड में धनाभाव से पीड़ित रहता है। ऐसे जातक विदेश प्रवास से लाभ उठा सकते हैं। कन्या और कुम्भ राशि का चंद्र हो तो धन संग्रह करने में अधिक कठिनाई नहीं आती। मेष, मिथुन, सिंह, धनु, तुला, मीन का चंद्र प्रायः शुभ फल देता है। धन भावस्थ चंद्र बकीलों और चोर-डाकुओं के लिए शुभ रहता है। डॉक्टर भी चंद्र के कारकत्व के रोगों का उपचार कर अच्छा लाभ उठा सकते हैं। 
इस भाव मे चंद्रमा की उपस्थिति से व्यक्ति मधुरभाषी, परदेश में आकर बस जागे जाला, सहनशील, शांतिप्रिय, उदार, विद्याप्रेमी, स्त्री विलासी, शरीर से सुखी, भाग्यवान्‌ तथा कूट्बियों से प्रेम रखने वाला होता है। मित्रों का उसे सहयोग मिलता है। कम आयु में ही उसे धन का विशेष लाभ होता है। वो अतेक यात्राओं का आयोजन करता है। बड़ी शालीन प्रवृत्ति का होता है, अस्थिर चित्त बाला होता है। पैशाचिक बाधाओं से उसे कष्ट उठाना पड़ सकता है। उसका रूप-स्वरूप बड़ा आकर्षक होता है। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न होता है। गुरुजनों के महत्व कौ उसे परख होती है। उसकी मुस्कान बड़ी मनमोहक होती है तथा चेहरे से भोलापन टपकता है। उसमें ओर अंधेरे से उसे घबराहट होती है। चलते-चलते यकायक कदम रोक लेने की उसमें एक बुरी आदत भी होती है। 
द्वितीय भाव में जब क्षीण चंद्र विद्यमान होता है, तो व्यक्ति तुतलाकर बोलने वाला होता है। उसकी जुबान तालु से लगती है तथा वो अटक-अटक कर बोलता है। उसकी बुद्धि अल्प होती है। इसी प्रकार जब द्वितीय भाव में नीचस्थ चंद्र उपस्थित रहता है, तब व्यक्ति बहुत दुःखी दुर्बुद्धि तथा दुर्बल स्मरणशक्ति वाला होता है। यटि चंद्र मंगल के साथ वृश्चिक अथवा मकर राशि में हो, तो व्यक्ति रक्त की खराबी या चर्मरोग से पीड़ित रहता है। 

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र द्वितीय स्थान में हो तो जातक सुखी एवं संपन्नरहता है। संतान आज्ञाकारी होती है और उससे पर्याप्त सुख भी मिलता है। वस्तुएंसंग्रह करने का उसे शौक होता है। गुप्त विषयों में जातक की रुचि रहती है।मित्रों की संख्या अधिक रहती है। जातक समाज में प्रसिद्ध व पेट का रोगी होताहै। चंद्र की दशा-अंतर्दशा में भाग्योदयकारक घटनाएं घटती हैं।

    2. वृषभवृषभ राशि का चंद्र धन स्थान में अच्छे फल प्रदान करता है।ऐसा जातक रुपये-पैसे एवं जायदाद से सुखी रहता है। जीवन सुखदायक एवंआनंदमय व्यतीत होता है। विवाह में धनलाभ अच्छा होता है और पत्नी भीसुंदर मिलती है। चंद्र की दशा-अंतर्दशा शुभ सिद्ध होती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का चंद्र धन स्थान में होने पर जातक के बहनेंएवं लड़कियां अधिक रहती हैं। उनके लिए धन क्षय होता है। जातक कामातुरएवं सुखी रहता है। संपत्ति का विशेष संग्रह नहीं हो पाता। गुदा द्वार के विकारउत्पन्न होते हैं।

    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र धन स्थान में होने पर जातक सुखी, संपन्नपरंतु कंजूस रहता है। विवाह एक से अधिक होते हैं। अन्य स्त्री से गुप्त संबंधभी रहने की संभावना रहती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र धन स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्न एवंदीर्घायु रहता है। जातक शारीरिक दृष्टि से कमजोर होता है। पारिवारिक सुखअच्छा रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र धन स्थान में हो तो जातक की आर्थिकस्थिति साधारण रहती है। उसे नेत्र विकार रहता है। पारिवारिक जिम्मेदारियां     काफी होने से आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। चंद्र की दशा-अंतर्दशा मेंआर्थिक संकट उत्पन्न होता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र धन स्थान में हो तो जातक सुखी एवं संपन्नरहता है। उसके पास पर्याप्त संपत्ति रहती है। धन-संपत्ति भी बड़े परिमाण मेंपास में रहती है। स्वभाव से वह कंजूस रहता है, संतान आज्ञाकारी रहती है।किंतु आयु कम रहती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र धन स्थान में होने पर जातक कीआर्थिक स्थिति मजबूत रहती है। जातक कार्यकुशल रहता है। उसे प्राय: नौकरी  करके जीवनयापन करना पड़ता है। माता का सुख पर्याप्त मिलता है किंतु बर्ताव अच्छा नहीं रहता। जातक सरकारी कर्मचारी एवं नौकरी में उच्च पद पर कार्यरत रहता है। वैवाहिक सुख में न्यूनता रहती है।

    9. धनु-धनु राशि के चंद्र के धन स्थान में होने पर उसके अच्छे फल प्राप्तहोते हैं। ऐसा जातक सुखी, संपन्न, समाज में प्रतिष्ठित, धर्मात्मा, परोपकारी, अपने कुल में प्रमुख रहता है। शारीरिक दोष रहता है। छोटे भाई का विवाहपहले और स्वयं का विवाह बाद में होता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र धन स्थान में होने पर चंद्र के शुभ फल कम प्राप्त होते हैं। उसकी संपत्ति कर्ज चुकाने, पारिवारिक जिम्मेदारियां निभानेया चोरी में खर्च होती है। पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है। शरीर दुर्बलरहता है। चोरी करने की दुष्प्वृत्ति रहती है। राजभय रहता है, कदाचित सजासे मृत्यु होती है।

    11. कुंभ कुंभ राशि का चंद्रधन स्थान में होने पर उसका साधारण फलप्राप्त होता है। ऐसा जातक कामातुर, अनेक स्त्रियों से गुप्त संबंध रखनेवालाएवं स्त्रियों के लिए धन खर्च करनेवाला होता है। अपना अधिकार अधिक समझनेवाली पत्नी पति की उपेक्षा करती है। इसलिए जातक बहिर्मुखी होता
 है। संतान सुख का अभाव रहता है।

    12. मीन मीन राशि का चंद्र धन स्थान में होने पर जातक की आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। कोर्ट-कचहरी में धन का दुरुपयोग होता है। पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है। परिवार में फूट पड़ती है। स्वास्थ्य कमजोर रहता है।

    2) द्वितीय भाव-
    1. कौओं को मिठे चावल खिलावे।
     2. ब्राह्मण को भोजन करावें।
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    तृतीय स्थान (सहज भाव)तीसरे स्थान में चन्द्र

    जातकरल - भातृस्थानगते चन्द्र भ्रातृसौख्य समादिशेत्॥निरोगी भ्रातरी द्वौच भगिनीत्रमेव च। तीसरे स्थान में चन्द्र हो तो भाई बहनोंका सुख अच्छा मिलता है। दोभाईऔर तीन बहने होती है। सब निरोग होते हैं।जागेश्वर- यदा विक्रमे चन्द्रमा विक्रमेशः सुशीलः सुलीलोभवेत् तुच्छलब्ध्या। तपस्वी समो धर्मधीरो दयालुस्तथा स्त्री सुधर्मा ध्रुवंपूर्णविम्बे। तृतीय में पूर्णचन्द्र हो तो बह पुरुष पराक्रमी शीलवान, थोडे हीलाभ से प्रसन्न होनेवाला, तपस्वी, समदृष्टि, धार्मिक धैर्यवान, दयालु औरधार्मिक स्त्री का पति होता है।
हिल्लाजातक - तृतीयः पंचमे वर्षं बंधुलाभकरः शशी। तृतीयस्थानमेंचन्द्रहो तो पांचवे वरष में बन्धु प्राप्त होता है।

    यवनमत -यह पुरुष बलवान, संतोषी और सदाचारी होता है।महेश-हिस्त्रः सगर्वः कृपाणोउल्पबुद्धि्भवेजजनो बन्धुजना-श्रयश्चा दयाभयाभ्यां परिवर्जितश्च द्विजाधिराजे सहजे प्रसूती॥ तृतीयस्थान में चंद्र हो तो वह पुरुष हिंसक, गर्वीला, कंजूस, बुद्धिहीन,आप्तसम्बन्धियों के आश्रय से रहनेवाला, निर्दय और निर्भय होता है।
    पाश्चवात्य मत-प्रवास की रुचि होती है। छोटे प्रवास बहुत होतेहै। शास्त्रीय और गहन विषयों की रुचि होती है। व्यवसाय में बारबारपरिवर्तन होता है। अजीब तरह की रुचि होती है। अनिश्चयी स्वभाव होताहै। यह चन्द्र बलवान हो तो भाईबहनोंका सुख अच्छा मिलता है। पडोसियोंसे सम्बन्ध अच्छे रहते हैं और उन से लाभ होता है। २८ वें वर्ष के करीबबहुत प्रवास करना होता है। कीर्ति और प्रसिद्धि का आरम्भ होता है औरसत्कृत्य किये जाते है।

    मेरे विचार-उपर्युक्त मतों में जातकरल का मत पुरुष राशि केलिए उपर्युक्त है। महेश का मत स्त्री राशि के लिए ठीक है। हिल्लाजातकका मत योग्य है। चन्द्र महाभ्रमण में पांचवें स्थान से गुजरता है उस समयअर्थात पांचवें वर्ष भाई या बहन का जन्म होना स्वाभाविक ही है।पाश्चात्य मत - में व्यवसाय बदलना, अजीब रुचि और अनिश्चयीस्वभाव यह फल कहा गया वह कुम्भ राशि में उपयुक्त है। अन्य फल स्त्रीराशि के है।
जातक धीरे-धीरे या कम बोलने वाला, छोटे भाई को नुकसानपहुँचाने वाला, प्रतिकूल अर्विभाव (दर्शन) वाला (कुरूप) होता है। यदिचन्द्रमा शुभ राशि में हो तो जातक प्रसन्नचित, सुख संपत्तिवान और काव्यतथा शास्त्रों के प्रति रूचि रखने वाला होगा।

    -मानसागरीजातक कई भाईयों वाला, भोगी (विलासी), शक्तिशाली, सुद्ूढ औरकंजूस होगा।

    -फलदीपिका

    जातक छोटे भाई-बहनों की देख रेख करने वाला, हमेशा प्रसन्न रहनेवाला और साहसी होगा। उसके पास अच्छे भोजन व कपड़े होंगे औरसदैव विद्या अध्ययन में रत होगा।

    -सारावली

    उसके कई बहनें होंगी और सधिवात रोग से पीड़ित होगा। उसका नके बराबर कृषि उत्पादन होगा, वह भाग्यहीन होगा, 24 वें वर्ष में सरकारीदण्ड भोगने वाला और संपत्ति नष्ट होने के कारण निर्धन, वात व्याधियोंसे त्रस्त, अपर्याप्त भोजन प्राप्त करने वाला होगा।
-भृगु
वह धनी नहीं होगा।
-वैद्यनाथ
जातक के 2 भाई व 3 बहनें होगें और वह सभी स्वस्थ होगें।
    -जातक रत्न
    जातक रोगी होगा, पहले मन्दाग्नि और फिर बवासीर से ग्रस्त, मृदु,दुकले-पतले शरीर वाला, निराश, भ्रष्ट, कई भाईयों वाला, क्रूर, शिक्षित,क्षष रोग (यश्ष्मा) का शिकार, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, चरित्रहीन, निरूदेश्य,कंजूस, घुम्मकड़ और चुस्त दिमाग वाला होगा।
    -डॉ रामन

    मेरा अनुभव - तृतीय स्थान के चन्द्र का विशेष अनुभव मेरेदेखने में नही आया। एक ही विशेष अनुभव है कि इस चन्द्र के फल स्वरूपभाई नही होते। हुए भी तो बचपन में ही उनकी मृत्यु होती है और मृत्यु नहीहुई तो उनसे अच्छे सम्बन्ध नही रहते। मिलनसार स्वभाव नही होता। दुसरोंकी झंझट में पड़ना नही चाहते। प्रवास और माता का सुख कम मिलता है।स्त्री सुख में नित्य ही बाधा आती है। इस तृतीय स्थान में रवि हो तो बहनेविधवा होती हैं अथवा उन्हें संसार सुख नही मिलता अथवा मृत्यु होती है।अथवा वंध्यापन होता है इस के फल से भाई अथवा बहन की संतति कीमृत्यु होती है।

    तृतीय स्थान में चंद्र प्रायः अच्छे फल प्रदान करता है। भाई-बहनों का सुखअच्छा रहता है। यदि चंद्र सम राशि में हो तो जातक के बहनें अधिक होतीहैं। ‘जातकरल' के अनुसार जातक के दो भाई एवं तीन दीर्घायु बहनें रहतीहैं। स्वयं जातक संतुष्ट, दयालु एवं परोपकारी होता है। पत्नी भी धर्मात्मा रहती
    है। जातक भ्रमणशील होता है। उम्र के 28वें वर्ष में या उसके बाद प्रवासका अच्छा योग बनता है और उसके कारण लाभ होता है। स्वभाव कुछ हदतक चंचल रहता है। 5वें वर्ष में भाई का सुख प्राप्त होता है।
    
    तृतीय भाव-लग्नकुंडली के तीसरे भाव में चन्द्रमा हो तो जातक अपनेभाई-बहनों का पोषण करने वाला, दबंग तथा विशेष ज्ञानी होता है। परन्तु स्वभावसे कृपण/मितव्ययी होता है और बार-बार व्यवसाय बदल सकता है। ऐसा जातक धुन का पक्का (कार्य/तप में लगा रहने वाला) होता है। दीर्घायु होता है उसे भातृसुख व स्त्री सुख प्राप्त होते हैं। परन्तु प्रायः वह स्त्रियों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेता/ले पाता।
    लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक को चोरी न होने पर भी धन-दौलत की हानि होती है तथा जीवन में किसी स्त्री की अचल सम्पत्ति मिलने की भी सम्भावना रहती है। ऐसे जातक के भाई-बहन जब तक उसके घर अपनी खुशी से आते-जाते या दूध आदि पीते रहते हैं तब तक जातक के पास धन की कमी नहीं होने पाती।परन्तु ऐसा जातक स्त्रियों के मामले में साधु होता है। स्त्रियों के निमंत्रण से भी विचलित नहीं होता। शास्त्रकार भी ऐसा ही मानते हैं-
    विधिविक्रमे विक्रमेणैननि वित्तंतपस्वी भवेदभामिनी रञ्जिताऽपि।क्रियाञ्चिन्त्येत्साहजै तस्पशमं प्रतापाज्वलो धर्मिणेवजैयन्त्यां॥
    तृतीयस्थ चन्द्र से जातक अपने बलबूते पर धन कमाता है (SELFMADEतथा SELFDEPEND होता है) । चाहे उसको स्त्रियां रिझाएं तो भी वह जपतप मेंही लगा रहता है। भाई-बहनों से अधिक सुख पाता है। प्रतापी, धर्मात्मा व यशस्वीहोता है।
    विशेष-मेरा अपना अनुभव है कि कुण्डली में शुक्र व मंगल की स्थितिविपरीत हो तो जातक तृतीय भाव में चन्द्र होते हुए भी साधु नहीं होता। तथा पिअन्य रसिकों की अपेक्षा संयमित रहता है।
तृतीय भाव: प्राचीन आचार्यों में से एक-दो को छोड़कर प्राय: सभी ने तृतीयस्थ चंद्र के अशुभ फल कहे हैं। महर्षि भूगु ने तो यहां तक अशुभ फल लिखा है कि तीसरे भाव में चंद्र हो तो व्यक्ति को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता, उस अभागे को यौवनावस्था में राजदण्ड भोगना पड़ता है। लेकिन अनुभव में ऐसा आता नहीं। वृश्चिक या कुम्भ का चंद्र पाप मध्यत्व में हो तथा किसी शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो राजदण्ड की सम्भावना होती है। लेकिन भूखों मरने की नौबत नहीं आती। तीसरे भाव में चंद्र मंगल से दृष्ट या युत हो तो बहन-भाइयों से सुख नहीं मिलता, बल्कि जातक स्वयं बहन भाइयों के लिए सुख के साधन जुटाता है। लेकिन समय आने पर उसके लिए कोई भी सहायक नहीं होता। शनि की दृष्टि हो तो गम्भीर, सत्याचरण वाला, भावुक, दूसरे के दुख से दुखी होने वाला होता हे। तृतीयस्थ चंद्र अधिक प्रवास की रुचि देता है। व्यवसाय में बार-बार परिवर्तन आते हैं, पड़ोसियों से संबंध अच्छे रहते हैं। स्त्री सुख सामान्य मिलता है। तृतीय स्थान में चंद्र, सूर्य एकसाथ हों तो बहनों के लिए अशुभ फलप्रद रहता है। उनके दाम्पत्य सुख में कमी रहती है, वैधव्य की संभावना रहती है या गृहकलह के कारण सांसारिक सुख में कमी आती है। एक आचार्य का मत हे कि तृतीयस्थ चंद्र रमणियों के मोहजाल में नहीं फंसाता, लेकिन पौराणिक गाथाएं इसे झुठलाती हैं। अनेक तपस्वी जिन्होंने तपोनिष्ठ रहकर अपनी देह कृश कर ली वे भी रमणियों के मोहजाल में फंसे। 
तीसरे भाव में चंद्र की उपस्थिति से जातक धार्मिक प्रधृत्ति का, वशस्वो, प्रसलचित्त. आस्तिक, मधुरभाषी, शत्रु से बदला लेने का इच्छुक, सहानुभूति पाने का अभिलाषी, सुशिक्षित, लग्न और कलात्मकता को सही भायनों में सार्थक करने वाला वा सर्वाधिक प्रचलित शैली को महत्त्व देने जाला होता है। पराक्रम से उसे धन की प्राप्ति होती है। अनेक स्त्रियों से शारोरिक संपर्क के बाद भी जो संपमशोल और समाज में सच्चरित्र माना जाता है। सहोदर भ्राताओं से इसे सुख मिलता है। स्वभाव से मनमौजी और बंधुप्रेमी होता है। शयनसुख में बाधा आती है। 
शरीर से वो दुबला-पतला होता है तथा कफ रोग तथा कण्ठ-संबंधी रोगों से सदा पीड़ित रहता है। याँद चंद्र तृतीय भाव में शुक्र के साथ हो, तो जातक को कर्ण रोग से पीड़ित होना पड़ता है, किन्तु ऐसा तभी होता है, जब चंद्र अपनी नीच राशि वृश्चिक में हो। जातक को श्वास तथा उदर संबंधी रोग तब होते हैं, जबकि चंद्र लग्नेश अथवा षष्ठेश से योग करता हो। चंद्र तथा लग्नेश व षष्ठेश का योग होने के कारण अनेक व्यक्ति श्वास रोग से पीड़ित होते हैं। 


    तृतीयस्थ चंद्र के राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक उग्र स्वभावका होता है। भाई-बहनों से मतभेद होते हुए भी उनसे सुख प्राप्त होता है।जातक धनवान होता है। उसे पैतृक संपत्ति का भी लाभ होता है। इस संपत्तिके कारण जातक मौज-मस्ती करता है। आप्तजन एवं अड़ोस-पड़ोस के लोगोंके लिए उपद्रवकारक रहता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक चतुर,आर्थिक दृष्टि से सुखी किंतु कंजूस होता है और समाज में प्रसिद्ध होता है।उसके कन्याएं अधिक रहती हैं। पुत्र विलंब से होता है। जातक को कन्या सेपरिवार पोषण में सहयोग मिलता है। बुद्धि विलक्षण होती है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक स्वपुरुषार्थसे अपनी प्रगति करता है। उसके पास जमीन-जायदाद बड़े परिमाण में रहतीहै। पिता के समान जातक भी समाज में प्रतिष्ठित रहता है। किंतु माता-पितासे उसकी नहीं बनती।

    4. कर्ककर्क राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक धैर्यवान,संपन्न, नौकरों-चाकरों से युक्त सुखी जीवन जीता है। मैत्री करने में चतुर होने

    से मित्र अधिक रहते हैं। जातक को राजकीय सम्मान प्राप्त होता है।5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र तृतीय स्थान में हो तो जातक गुणवान,बुद्धिमान, धैर्यवान एवं धर्मात्मा होता है साथ ही कामातुर भी रहता है। शासनके विरुद्ध आवाज उठाने में आगे रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक बुद्धिमान,उद्यमी, परोपकारी, वाचाल एवं संपन्न रहता है। भाई-बहनों से उसे सुख प्राप्तहोता है, मित्र अधिक होते हैं। प्रायः जातक के दो पलियां होती हैं।7. तुला-तुला राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक के मित्र कमऔर शत्रु अधिक रहते हैं। जातक स्वार्थी, कुसंगति में पैसा बरबाद करनेवालाकिंतु कंजूस रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने से जातकपारिवारिक सुख से परिपूर्ण, सुखी, धर्मात्मा एवं शूल रोगी रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक दयालु, धार्मिक,कामातुर एवं अभिमानी रहता है। पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है। दूसरोंसे सुख पर्याप्त मात्रा में मिलता है।
10. मकर-मकर राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक धनवान,विद्वान, गुणवान एवं लोकप्रिय रहता है। मरणोपरांत भी उसका नाम रहता है।आयु कम रहती है। चंद्र की दशा-अंतर्दशा भाग्योदयकारक रहती है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का चंद्र तृतीय स्थान होने पर जातक शारीरिक एवंआर्थिक दृष्टि से मध्यम रहता है। किसी को दिया रुपया-पैसा वापस नहींमिलता। शरीर में विकार रहता है। पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है।

    12. मीन मीन राशि का चंद्र तृतीय स्थान में होने पर जातक की संतानअल्पायु होती है। उत्तरार्ध में संतान सुख प्राप्त होता है। तृतीय स्थान में चंद्रएवं सप्तम स्थान में कोई पापग्रह रहने से जातक की पत्नी का चरित्र भ्रष्टरहता है। जातक के भाई के साथ उसके संबंध रहते हैं।
    3) तृत्तीय भाव -
    1. वृद्ध स्त्री को सफेद वस्तु का पान।2. मंदिर में दूध की मिठाई चढ़ावें।
    3. पूर्णिमा पर सिर को दूध से धोवें
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 चतुर्थ स्थान (सुख भाव) चतुर्थ स्थान में चन्द्र

    महेश - जलाश्रयोत्पन्नधनोपलब्धि कृश्यंगनः वाहनसनु-सौख्यम्। प्रसूतिकाले कुरुते कलावान् पातालसंस्थो द्विजदेवभक्तिम्॥चतुर्थ स्थान में चन्द्र हो तो पानी से सम्बन्धित पदार्थो से धनप्राप्ति होती है।तथा खेती, स्त्री, वाहन, संतान इनका सुख अच्छा मिलता है। देव औरब्राम्हणों की भक्ति भी होती है।

    वैद्यनाथ - विद्याशीलसुखन्वितः परवधुलोलश्चतुर्थे विधी॥ज्ञानी, शीलवान, सुखी किन्तु परस्त्रीलोलुप होता है।

    नारायणभट्ट - वयस्यादिमे तादृशं नैव सौख्यम्। प्रारम्भिकआयु में बहुत सुख नही मिलता।

    सारावली - बन्धुपरिच्छेदबान्धवविरोधी। बन्धुओं से वियोगअथवा विरोध होता है।

    जागेश्वर-संपूर्ण घर प्राप्त होता है।

    यवनमत-नये घर की प्राप्ति होती है।

    हिल्लाजातक-चतुर्थगः पुत्रलाभ द्वाविंशे वत्सरे ध्रुवम्। चतुर्थके चन्द्र के फलस्वरूप बाईसवें वर्ष पुत्रलाभ होता है।

    यवनमत - यह पुण्यवान, उदार, सत्ताधीश, मलिनचित्त,विद्वान, पंडित और भाग्यवान होता है।

    पाश्चात्य मत - इस चन्द्र से घर, जमीन, खेती इन विषयों मेंसुख प्राप्त होता है। यह चर राशि में हो तो बारबार घर बदलना पडता है। इसव्यक्ति के जीवन में परिवर्तन बहुत होते है। माता से विरासत में सम्पत्तिमिलने का योग होता है। माता के कारण भाग्योदय होता है। और उस पर    भक्ति भी होती है। इस व्यक्ति के जीवन का उत्तार्ध बहुत सुख पूर्ण होताहै। इसे चौपाये वाहनों का सौख्य अच्छा मिलता है। इसे सुख कीअभिलाशा बहुत होती है और वह अपने शरीर को धष्टपुष्ट करना चाहताहै। खाणों के व्यवसाय से इसे अच्छी आय होती है। यह चन्द्र बलवान हो तोविवाह से धन प्राप्ति, भाग्योदय और इस्टेट मिलने का योग होता है।मेरे विचार - महेश ने पानी से धनप्राप्ति होना यह फल कहा हैवह कर्क, वृश्चिक और मीन राशि में मिलता है। अन्य फल पुरुष राशि के है।

    सारावली - के अनुसार बन्धु का वियोग होना यह फल है वहवृषभ और मकर राशि में मिलता है। वैद्यनाथ ने शीलवान होना औरपरस्त्रीलोलुप होना ऐसे परस्पर विरोधी फल बतलाये ये दोनों एक ही राशिमें नही मिल सकते।

    नारायण भट्ट- का फलवर्णन योग्य है। जीवन के पूर्वारध में कष्टऔर उत्तरार्ध में सुख यह फल खास कर मेष, धनु और वृषभ, कन्या,मकर, इन राशियों में मिलता है 

    इन्हें बचपन से ही मातापिता का सुख नही मिला। जन्मभूमि मेंघरबार और कुछ खेतीबाड़ी थी। पहला विवाह बचपन में ही हुआ।चौवीसवे वर्ष एमू.ए. की उपाधि प्राप्त की और कुछ समय तक शिक्षकरहे। पहली पत्नी की मृत्यु २८ वें वर्ष हुई उसे एक दो सन्तान भी हुई थी।दूसरे विवाह के बाद जीवन में एकदम परिवर्तन हुआ। शिक्षा क्षेत्र कासम्बन्ध छूटकर अधिकार पद प्राप्त हुआ। कुछ काल उसका अनुभव लेनेके बाद वह पद छोड़ना पडा। फिर शहर में अभ्यास कर के वकील हुए इसव्यवसाय में काफी धन मिला किन्तु अब तक जीवन में स्थिरता नहीं थी।फिर कुछ समय के बाद एकदम बड़ा अधिकार प्राप्त हुआ किन्तु इस काभी थोडी ही देर से त्याग करना पड़ा। अब स्वस्थ हैं। वृषभ के चन्द्र केफलस्वरुप इन्हें जीवन के पूर्वर्ध में बहुत मानसिक कष्ट हुए और उत्तारधथ मेंस्वस्थता मिली।

    जागेश्वर-के मत में ‘सम्पूर्ण घर' का क्या अर्थ है यह स्पष्टनही होता। यवनमत में नया घर प्राप्त होना यह फल कहा गया है। इस के दोअर्थ हो सकते हैं। एक तो नए नए घरों में रहने का योग और दूसरे नए थरबनवाने का योग होना। मेरे विचार से नए घर बनवाना यही फल यहा योग्यहोगा। यह योग पुरुष राशि में अधिक मिलता है।

    हिल्लाजातक-के मत का अनुभव नही आता।

    यवनमत - चतुर्थ के चन्द्र के इतने अच्छे फल बतलाए हैं वेयोग्य प्रतीत नही होते। इस में उदार चित्त और मलिनचित्त दोनों विशेषणदिए हैं वे एक ही राशि में मिलना सम्भव नही है। इन में जो अच्छे फल हैं वे पुरुष राशि के है।
    पाश्चात्य मत -के कई फलों का अनुभव नही आता। खानों केव्यवहार में फायदा यह फल चतुर्थ में चन्द्र किसी भी राशि में हो तो भी नहीमिलता। मध्यप्रदेश, बिहार मैसुर, गोवा, हैदराबाद इन प्रदेशों में खानों काव्यवसाय होता है। किन्तु बहां के लोगों के चतुर्थ में चन्द्र हो भी तो उन काइस व्यवसाय की ओर ध्यान नही जाता। चतुर्थ में शनि बलवान हो तोअवश्य खानों से फायदा होता है। खेती से फायदा होना यह फल वृषभ,कन्या, मकर इन राशियों में मिलता है। माता के कारण भाग्योदय होना इसफल का अनुभव वर्तमान परिस्थिती में आ सकता है क्योंकि इन दिनोंस्त्रियां भी सुशिक्षित होकर धर्नाजन करने लगी है। माता से अच्छे सम्बन्धरहना तथा विवाह के बाद भाग्योदय होना वह फल पुरुष राशियों में मिलता है।

    चतुर्थ भाव में स्थित चन्द्रमा सभी प्रकार की सुख संपत्त प्रदान करताहै। यह जातक दूसरों के लिए लाभकारी और रमणीय युवतियों के प्रतिआकृष्ट होता है। सदा रोग ग्रस्त, मांसाहारी, बड़़े भवन वाला, कई हाथी,घोड़ों बाला होगा।

    -मानसागरीजातक प्रसन्न, ऐन्द्रिक सुख के प्रति आसक्त, उपहार देने में उदारमना,और अनेक मित्रों वाला, सुख सुविधा सम्पन्न, वाहन सुख और अच्छीमान प्रतिष्ठा वाला होता है।

    -फलदीपिकाजातक संबंधियों सहित सम्पन्न, सभी सुख सुविधा युत, दानशील औरजलयात्रा का शौकीन होगा। वह संतुलित जीवन जीने वाला, न तो बहुतदयनीय और ना ही अधिक प्रसन्न होता है।

    -सारावली

    जातक उच्च सरकारी पद व प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वह अनेक घोडों(पशु) वाला, आर्थिक रूप से सम्पन्न परन्तु रोगी माँ का पुत्र होता है।तथा धाय द्वारा पाला जाता है।
    -भृगु
 जातक आराम पसंद, सुन्दर स्वाद वाला अर्थात अच्छे खान-पान काशौकीन, सुर्गंधि व अच्छे वस्त्रों का शौकीन, मृदु और मिलनसार स्वभाव     वाला, उच्च शिक्षित, दुराचारी, सभी से मदद प्राप्त, धनी, सम्पन्न,लोकप्रिय व सफल, अच्छी माता का पुत्र होता है। यदि चन्द्रमा पर पापप्रभाव हो तो माँ की जल्दी मृत्यु होती है।

    -डॉ रामन

    टिप्पणी

    यदि चतुर्थ भाव में कर्क, वृश्चिक या मकर का पूर्वाद्ध या मीन राशिहो तो जातक मछली उत्पादन, मोती, शंखादि का और जल संबंधितव्यापार करने वाला होगा। वह जीविकोपार्जन के लिये किसी मंदिर मेंपॉड़ित का कार्य करने वाला, या मंत्री भी हो सकता है। महिलाओं कीकुण्डली में चतुर्थ भाव में बली चन्द्रमा अच्छा होता है। इससे जातिकाप्रसन्नचित, सफल व खुशहाल दाम्पत्य जीवनवाली संतान युक्त होती है।हाँलाकि बचपन में कम प्रसन्न रहेगी।

    सभी विद्वानो ने विविध प्रकार से चर्तुथ चन्द्रमा को अच्छा फलदायकबताया है। भृगु के अनुसार-जातक माता के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्रीके दूध पर पलता है। डॉ रामन के अनुसार-जातक की माता अच्छी होगी।चन्द्रमा पर पड़ने वाला पाप प्रभाव माता के लिए खराब होगा। यदि‘कारको भाव नाशाय’ के सिद्धान्त से देखें तो चतुर्थ भाव में चन्द्रमा कीस्थिति माँ के लिए अभीष्ट नहीं है, क्योंकि सिद्धान्तानुसार चतुर्थस्थचन्द्रमा माँ के लिए शुभ संकेत नहीं देता। परन्तु पाप प्रभाव से मुक्तचन्द्रमा और चतुर्थेश की अच्छी स्थिति, चन्द्रमा की राशि और चतुर्थ भावपर शुभ दृष्टि भाव में स्थित कारक के पाप प्रभाव को कम करते हैं।

    मेरा अनुभव - यह चन्द्र मेष, सिंह अथवा धनु में हो तोपूर्वार्जित इस्टेट का त्याग करना पडता है। माता जीवित रहती है। किन्तुउसके प्रति मन साफ नही रहता। वृषभ, कन्या मकर, वृश्चिक इन राशियोंमें यह चन्द्र हो तो पूर्वार्जित इस्टेट नही मिलती है, न खुद की हो सकती है।मिथुन अथवा कुम्भ में यह चन्द्र हो तो अपने कष्ट से इस्टेट मिलती है किन्तुकायम नही रहती। कर्क, तुला, मीन इन राशियों में यह चन्द्र हो तो इस्टेटमिलती है और उसकी वृद्धि भी होती है। इस स्थान के चन्द्र का सर्वसाधारण फल यह हैं कि बचपन में ही माता अथवा पिता की मृत्यु होती हैऔर उन से सुख नही मिलता। वे जीवित रहे तो उन से मनमुटाब होता है। इनव्यक्तियों को ३२ वें वर्ष तक स्थैर्य प्राप्त नही होता उसके बाद भाग्योदयहोता है। विवाह क्े बाद कुछ स्थिरता प्राप्त होती है। इन्हे पेटेंट दवाइयां,इत्र, तेल, पाउडर आदि वस्तुओं के निर्माण अथवा व्यापार में अच्छाफायदा होता है।

 चतुर्थ स्थान में चंद्र के शुभ फल प्राप्त होते हैं। बचपन में पर्याप्त सुख नहींमिलता किंतु आगे चलकर जातक सुखी एवं संपन्न जीवन जीता है। जातक काअपना मकान होता है या जन्म के बाद उसके पिता नया मकान बनवाते हैं। जातकविद्वान एवं सुखी होता है। पत्नी, संतान एवं पारिवारिक दृष्टि से सुखी रहता है।भाइयों में मधुर संबंध नहीं रहते। जातक कामातुर रहता है और उसका विवाहकम उम्र में होता है। इसी कारण 22वें वर्ष में पुत्रलाभ होता है। पानी से संबंधितव्यवसाय से वह धन कमाता है। कृषि, भूमि,वाहन आदि स्थान संपत्ति का उपयोगप्राप्त करता है।

चतुर्थ भीव-चन्द्रमा चतुर्थ भाव में हो तो जातक खुशहाल, धनवान,वाहनसुखी व सब प्रकार के ऐश्वर्य प्रा्त करने वाला होता है (यह पूर्ण चन्द्रयाशुक्ल पक्ष के चन्द्र के फल हैं)। उच्च का चन्द्र हो तो ससुराल सेधन प्रास्ि एवंविवाहोपरांत भाग्योदय होता है। प्रायः देखा गया है कि ऐसे जातक की अपने पिता से अधिक पटती है अथवा माता के सुख में न्यूनता रहती है। चन्द्रमा पाप प्रभाव में हो तो माता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता तथा जातक भयाक्रांत या अनजाने भय से भयभीत रहता है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक जितना अधिक खर्च करता है, उतनाही अधिक उसका धन बढ़ता है। ऐसे जातक को दूध बेचने का काम करने पर नुकसान होता है। चौथा चन्द्रमा जातक को शिक्षा पूर्ण करने में हर तरफ से सहायता
    दिलाता है और प्रास की गई शिक्षा जातक को जीवन में उपयोगी तथा अर्थ प्राप्त कराने वाली सिद्ध होती है (बशर्ते कि चन्द्रमा कृष्णपक्ष का न हो)।
चतुर्थ भाव: पृथ्वी राशि (वृष, मकर) का चंद्र चतुर्थ भावस्थ हो तो बंधु-बांधवों से वियोग सहन करना पड़ता है। अग्नि. राशि (मेष, सिंह, धनु) और पृथ्वी राशि (वृष, कन्या, मकर) का चंद्र हो तो जातक जीवन के पूर्वार्द् में दुखी एवं उत्तरार्द्ध में सुखी रहता है। चंद्रमा पुरुष राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला धनु, कुम्भ) में हो तो माता से संपत्ति की प्राप्ति होती है। विवाहोपरान्त स्त्री के कारण भाग्योदय होता है, नया घर बनता है। प्राय: चतुर्थस्थ चंद्र के कारण माता-पिता का सुख शीघ्र नष्ट हो जाता है। इसमें दो हेतु हैं-माता-पिता की मृत्यु हो जाना अथवा उनके जीवित होते हुए भी उनसे लाभ न मिलना। माता-पिता से मनोमालिन्य बना रहता है। जीविका के साधन भी स्थायी नहीं होते, विवाह के पश्चात स्थिरता आती है। कन्या, वृश्चिक, मकर राशि का चंद्र हो तो व्यक्ति के पास न तो स्वार्जित संपत्ति होती है, न ही पूर्वार्जित अथवा पैतृक संपत्ति मिलती है। कुम्भ राशि का चंद्र हो तो व्यक्ति कठिन परिश्रम कर संपत्ति अर्जित कर लेता है। कर्क, मीन और तुला राशि में चंद्र हो तो स्वार्जित एवं पूर्वार्जित दोनों प्रकार से संपत्ति की प्राप्ति होती है। 
जिसकी कुंडली के चतुर्थ भाव में चंद्र होता है, वो वाहनसुख प्राप्त करता है। भाइयों में श्रेष्ठ, समाज में यज्ञ तथा कीर्ति अर्जित करने वाला, दानवीर, सुखी, उदार, जलक्रीड़ा करने वाला, उच्च पद का अभिलाषी, कृष्रि से धनालाभ प्राप्त करने वाला, बुद्धिमान तथा प्रेमी स्वभाव का होता है। ऐसे व्यक्ति की जिंदगी आर्थिक अभाव तथा ' शारीरिक कष्ट में बीतती है। उसका कोई भी बात देर से समझने का स्वभाव होता है। 

मुखर, अनुकूल परिवार में विवाह, जोखिम भरे खेल खेलने की आदत, किसी भाव की अभिव्यक्ति के बिना सफल अभिनय करने में चतुर तथा मन में अजीब-सी बेचेनी लिए हुए उसका जीवन होगा। पुत्रों तथा पत्नी का उसे विशेष सुख मिलता है। विवाह के पश्चात्‌ ही उसका भाग्योद्य होता है। 

चतुर्थ भाव में चंद्र अपनी स्वराशि अथवा उच्चराशि पर अथवा मित्रराशि पर हो तो व्यक्ति का शरीर नीरोग रहता है, किन्तु व्यक्ति का बाल्यकाल सुखद नहीं रहता। उसे शारीरिक पीड़ा तथा रोग परेशान करते रहते हैं। युवावस्था में पहुंचने के उपरांत उसका स्वास्थ्य ठीक होता है। यदि चंद्र शुक्र से युति रखता हुआ चतुर्थ भाव में विद्यमान हो, तो व्यक्ति अत्यधिक व्यसनी होता है तथा उसे मद्यपान करने की लत होती है। व्यक्ति क्षयरोग, लीवर वृद्धि, अजीर्ण तथा अपच का रोगी होता है। 

    राशिगत फल

    1. मेष मेष राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक सौम्य स्वभावी,सच्चरित्र एवं दयालु होता है। उसकी पत्नी उसके जैसी एवं शीलवान होतीहै। पिता का सुख अल्प मिलता है व पिता से अनबन रहती है। श्वसुर सेविरासत में संपत्ति प्राप्त होती है।

    2. वृषभ वृषभ राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक संपन्न किंतुचंचल रहता है। पैतृक संपत्ति मिलती है किंतु पिता से अनबन रहती है। पैतृकसंपत्ति के विषय में वाद-विवाद उत्पन्न होते हैं। आचार्य गर्ग के अनुसार जातकवर्णसंकर रहता है। चंद्र की दशा-अंतर्दशा कष्टकारक रहती है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर वहभाग्योदयकारक फल देता है। जातक सुखी, संपन्न, समाज में प्रतिष्ठित, अच्छेस्वभाव का एवं माता-पिता के लिए सुखदायी होता है। चंद्र की दशा-अंतर्दशाजीवन में महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है।
    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक सुखी, संपन्नएवं सौम्य स्वभावी रहता है। समाज में उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। वहमाता-पिता के लिए सुखदायी रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक सुखी, संपन्नएवं खुशमिजाज होता है। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। माता-पिता के लिएसुखदायी रहता है। जातक के जन्म के बाद पिता का भाग्योदय होता है। उसकीपत्नी का स्वभाव उग्र रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक कामातुर,विलासी, सुखी एवं संपन्न रहता है। साझेदारी में किए गए व्यापार में लाभ पाता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक सुन्दर, सौम्य,संपन्न एवं सुखी रहता है। उसका जीवन सफल होता है, समाज में प्रतिष्ठाप्राप्त होती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में साधारण फल देताहै। जातक के दो विवाह होते हैं लेकिन संतान नहीं होती या फिर उसका सुखनहीं मिलता। कुछ आचार्यों के मतानुसार स्वयं मृत्यु का कारण बनता है।स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में होने पर जातक सौम्य स्वभावीपुरुषार्थी, विद्वान एवं सुखी रहता है। वह माता-पिता को सुख देनेवाला, समाजमें प्रतिष्ठित, धर्मात्मा एवं संपन्न रहता है। उदरशूल का कष्ट रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सौम्यस्वभावी, पुरुषार्थी, विद्वान एवं सुखी रहता है। दुख सहन करके भी जातकदूसरों का हित करता है और माता-पिता के लिए सुखदायी एवं समाज मेंप्रतिष्ठित रहता है। वह धर्मात्मा एवं संपन्न रहता है। पत्रकार या जासूस केरूप में कार्यरत रहता है।

    11. कुंभ कुंभ रशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,सरकारी कर्मचारी, भ्रमणशील, प्रतिष्ठित एवं पारिवारिक सुख से परिपूर्ण औरसंपन्न एवं सुखी रहता है।

    12. मीन.मीन राशि का चंद्र चतुर्थ स्थान में रहने पर जातक शारीरिकदृष्टि से अस्वस्थ रहता है। जीवन संघर्ष से भरा रहता है। माता-पिता का सुखअपेक्षाकृत कम मिलता है क्योंकि उनके साथ वाद-विवाद होते हैं। पैतृक संपत्तिसे हाथ धोना पड़ता है।
4) चतुर्थ भाव -उपाय
 1. शिव पर नित्य जल चढ़ावे। 
2. पैतृक सम्पत्ति न बेचे। 
3. रात्री में दूधन पीये।.
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पंचम स्थान (सुत भाव)    पंचम स्थान में चन्द्र

    गर्ग - पंचमे रजनीनाथः कल्यापत्यमपुत्रकम्। क्षीणः पापयुतोवापि जनयेच्चंचलां सुताम्। पंचम में चन्द्र हो तो कन्याएं होती हैं, पुत्र नहीहोते है। यह चन्द्रक्षीण अथवा पापग्रह से युक्त हो तो यह कन्या चंचलहोती है।

    काशीनाथाचार्य - सुते चन्द्रे सुताढ्यशच रोगी कामीभयानकः। कृत्रिमैः पौरुषैर्युक्तो विनयीच भवेत्नरः| पंचम में चन्द्र हो तो पुत्रप्राप्त होते हैं, रोग होते हैं, कामेच्छा अधिक होती है और वह व्यक्तिभयानक होता है। यह कृत्रिम पौरुष से युक्त और विनयशील होता है।

    हरिवंश - सुधीरः सुशीलः सुविलः सुचित्रः सुदेहः सुगेहःसुनीतिः सुगीतिः। सुबुद्धिः सुवृद्धिः सुपुत्रो नरः पुत्रगेहेऽत्रिपुत्रे पंचम मेंचन्द्र हो तो धैर्य, शील, धन, चित्र, शरीर, घरबार, नीति, संगीतादिकला,बुद्ध,वृद्धि और पुत्र ये सब अच्छे होते हैं।

    हिल्लाजातक - पंचमे शत्रुवर्शे च वन्हिना पीडितो भवेत्।पंचम में चन्द्र हो तो छठवें वर्ष अग्नि की बाधा होती है।

    यवनमत - यह व्यक्ति रूपवान, तेजस्वी, वाहनयुक्त,सावधान, और सुशील होता है। इसे राजनैतिक कार्यों में अच्छी सफलताप्राप्त होती है।

    पाश्चात्य मत - इस चन्द्र से व्यक्ति चैनबाज और खुशदिलहोता है। इसे स्त्री और बच्चे बहुत प्यारे होते है। इस के बच्चे सुंदर होते हैं।यह वैभव और आनंद से युक्त होता है। यह चन्द्र बलवान हो तो सट्टा औरजुंआ इन में बहुत लाभ होता है। यह द्विस्वभाव राशि में हो तो जुड़वी संतानेंहोती है। पंचम स्थान यह स्त्री स्थान का लाभस्थान है इसलिए यहां चन्द्र हो     तो विवाहित स्त्री से लाभ और भाग्योदय होता है। यह चन्द्र दूषित हो तोअनिष्ट फल देता है। ऐसा व्यक्ति मलिन चित्त का और कष्टयुक्त होता है।इसी से असफलता, निराशा और मन की अस्थिरता ये फल मिलते हैं। इसचन्द्र पर शनि की दृष्टि हो तो वह व्यक्ति हंसमुख किन्तु ठगानेवाला होताहै। बोलने की चतुरता से आप्तों को ठगकर वह धन प्राप्त करता हैं। यहचन्द्र प्रसव राशि में हो तो काफी सन्तति होती है। यह मंगल से युक्त हो तोसाहस की ओर प्रवृत्ति होती है। यह बलवान हो तो सन्तान भाम्यशालीहोती है।

    मेरे विचार - गर्गाचार्य के मत से कन्याए अधिक होना यह जोफल है वह वृषभ, कन्या, मकर इन राशियों में मिलता है। पुत्रसंतति नहीहोती ऐसा कहा गया है वह ठीक नही है। ऐसे योग में एक तो भी पुत्र अवश्यहोता है किन्तु बहुत देरी से होता है। ४२ वें वर्ष के आगे पुत्र होने का योगहोता है। यह चन्द्र मिथुन, तुला अथवा कुम्भ में हो तो पुत्र सन्तति होनामुश्किल ही होता है। प्रायः कन्याएं ही होती हैं, पुत्र नही होता। कर्क,वृश्चिक, मीन तथा मेष, सिंह, धनु इन राशियों में यह चन्द्र हो तो पहलेपुत्र, फिर कन्याएं, बाद में फिर पुत्र इस प्रकार सन्तति होती है। काशीनाथके मत में कृत्रिम पौरुष यह फल कहा उसका अर्थ स्पष्ट नही होता। यहचन्द्र मिथुन, तुला या कुम्भ में हो तो नपुंसकत्व की सम्भावना होती है। यहीकर्क, वृश्चिक, मीन में हो तो (No activity, No stuff) क्रियाशीलताअथवा सामर्थ्य न होते हुए ही सिर्फ डींग हांकने का स्वभाव होता है।

    हरिवंश - में सब अच्छे फल बतलाए हैं ये पुरुष राशि में मिलतेहैं। तीन पुत्र होना यह फल कर्क, वृश्चिक और मीन राशि में मिल सकता है।
    हिल्लाजातक - में अग्नि बाधा का फल बतलाया वह प्राप्त
होने के लिए चन्द्रमेष, सिंह और धनु में से कोई राशि में होना चाहिए और उस पर मंगल की दृष्टि चाहिए।

    यवनमत- का अनुभव पुरुष राशियों में आता है।

    पाश्चात्य मत - में जो शुभ फल कहे गये है वे पुरुष राशि के हैं।और जो अशुभ फल कहे गये हैं वे स्त्री राशि के हैं।
जातक पर्याप्त सुख-सुविधा संम्पन्न, अनेक पुत्रों वाला, निष्कपट,गंभीर व धार्मिक पत्नी वाला होगा। यदि चन्द्रमा क्षीण, बलहीन, याशत्रक्षेत्री हो तो पत्नी, संतान व संपत्ति का वियोग व नाश ही होगा।
    -मानसागरी
    जातक धीमी गति वाला, कुशाग्र बुद्धि, सुपुत्रों वाला और राजमंत्री होगा।
    -फलदीपिका
    जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त, अच्छे भोजन व वस्त्रों का शौकीन, बहुतमित्रों व पुत्रों वाला, विद्वान तथा कामुक होगा।
    -सारावली
    जातक की पत्नी सुर्दशना परन्तु शीध्र क्रोध करने वाली तथा जन्म सेही वक्ष में भद्दे चिन्ह वाली होगी। वह देवियों को प्रसन्न करने में सफलरहेगा, वह धनवान तथा दो पलियों वाला, संपन्न मेहनती, सात्विक तथाअनेक कन्याओं के बाद एक पुत्र वाला होगा।
    -भृगु
    जातक की पत्नी सुदर्शना, सूक्ष्म बुद्धि, चतुर सुलझे हुए विचारोंवाली, वह प्रदर्शन की भावना का शिकार, बुद्धिमान, अनेक पुत्रियों वाला,चतुष्पदों से लाभ प्राप्त करने वाला, अध्ययन में बाधाएं और उच्चराजनीतिक पद वाला होगा।
    -डॉ रामन
    पराशर के अनुसार-पंचम में क्षीण या बलहीन चन्द्रमा होने परजातक पत्नी का अनुगामी और परिजनों का विरोधी होगा।टिप्पणी

    डॉ रामन के अतिरिक्त सभी के अनुसार जातक के कई पुत्र होगें।वराहमिहिर, जयदेव, और काशीनाथ के अनुसार-जातक को सुत-लाभअर्थात् पुत्र प्राप्ति होगी। गर्गाचार्य के अनुसार-पंचमस्थ चन्द्रमा अनेकपुत्रियों और एकमात्र पुत्रदायक होता है। निश्चय के लिए पाठक परिणामोंका अवलोकन करें। वास्तविक प्रयोग में भी यह देखा गया है कि जातकके पुत्रियाँ ही अधिक होती हैं।(अध्याय- 18, श्लोक-18)

    पंचमस्थ चन्द्रमा से उपासना के द्वारा जातक को देवकृपा प्राप्त होतीहै और पत्नी के माध्यम से लाभ प्राप्त होता है। जातक मेधावी,भाग्यशाली, रोगी, भयानक चहरे वाला, धार्मिक पत्नी का पति होता है।जातक की दो पतनीयाँ होती हैं।

निष्कर्ष-प्रतिपादित सिद्धान्त फलप्रद है: परन्तु फिर भी ग्रह्हों कीअन्यान्य स्थिति संबंधादि भी फलों के परिष्कार करने में पर्याप्त प्रभावशालीहैं।
    मेरा अनुभव - यह चन्द्र मेष, सिंह अथवा धनु में हो तो शिक्षाकम होती है। इनमें एकाध ही ग्रेजुएट अथवा वकील होता है। वृषभ, कन्या,अथवा मकर में चन्द्र हो तो भी शिक्षा अच्छी नहीं होती। इंटरमीजिएट केबाद रुकावट होती है। कदाचित यह रुकावट दूर हुई तो बी.एसूसी अथवाएम.एसूसी. तक शिक्षा प्राप्त होती है। ये लोग म्युनिसिपालिटी, बैंक, रेल्वेऔर डाकतार विभाग में बहुतायत से होते हैं। पंचम के चन्द्र से जनता मेंआगे आना सम्भव नही होता। अपनी नौकरी और घरबार में ही सन्तोषहोता है। कर्क, वृश्चिक, मीन इन में यह चन्द्र हो तो वकील, डॉक्टर जैसाअच्छा पदप्रप्त होता है। इन्हें लोकप्रिय होने की बहुत इच्छा होती है किन्तुवह सफल नही होती। डॉक्टरो को इस में अच्छा यश मिलता है। यह चन्द्रमिथुन, तुला, कुम्भ में हो तो कम बोलकर काम अधिक करना, धन कालोभ, यह फल मिलता है। इन व्यक्तियों को धन के लिए स्त्री सौख्य कानाश हुआ तो भी उस की परवाह नही होती। इस स्थान से सन्तति काविचार करते समय पति की कुण्डली के साथ साथ पत्नी की कुण्डली भीदेखना जरूरी है। सिर्फ पति की कुण्डली से कहे हुए सन्तान विषयक फलका अनुभव कई बार नही आता। पंचम का चन्द्र उच्च, नीच अथवा दूषितहो तो एक कन्या के संसार सुख का नाश होता है। या तो वह विधवा होती हैअथवा व्यभिचारिणी होती है। उसमें कोई शारीरिक ब्यंग भी हो सकता है। जिस से उस का विवाह ही नही होता।

    चंद्र पंचम स्थान में स्थित हो तो जातक प्रतिभावान, चंचल, संतान सुख     पानेवाला रहता है। कामेच्छा प्रबल रहती है। चंद्र स्त्री राशि का होकर पंचमस्थान में हो या कर्क, वृश्चिक एवं मीन जैसी बहुप्रसव राशियों में से किसीएक राशि में हो तो जातक के कन्या संतान अधिक रहती है। जातक स्वभावसे सौम्य एवं डरपोक रहता है। राजनैतिक एवं बैंकिंग विषयक कार्यों में उसेअच्छी सफलता मिलती है और परिवारजनों का पर्याप्त प्रेम प्राप्त होता है। चंद्रबलवान हो तो सट्टे लॉटरी में लाभ होता है। मिथुन, कन्या, धनु या मीन मेंसे किसी राशि का चंद्र पंचम स्थान में हो तो जुड़वां संतान होती है। विवाहअच्छे परिवार में होता है। विवाहोपरांत भाग्योदय होता है। उम्र के पांचवें याछठे वर्ष में अग्नि भय रहता है।
पंचम भाव-पांचवें भाव का चन्द्रमा जातक को विद्वान, बुद्धिमान तथा बहुत सन्तानों वाला बनाता है। किन्तु जातक को डरपोक भी बना देता है। यदिचन्द्रमा बलवान स्थिति में हो तो जातक को जुए, सट्टे आदि से लाभ होता है। वायु तत्त्व की राशियों में चन्द्रमा पुत्राभाव देता है। तब जातक को कन्याएं अधिक होती हैं (प्रायः जुड़वां)। साथ में पापी ग्रह भी बैठ जाए तो ‘बालारिष्ट योग’ बनता है,जिससे जातक को बाल्यावस्था में मृत्यु/मृत्युं तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है। (शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो मृत्यु टल जाती है, मात्र कष्ट भोगना पड़ता है। अन्यथा मृत्यु तीव्रता से सम्भावित होती है)। चन्द्रमा पाप प्रभाव में हो तो जलोदर आदि का रोग देता है।
    लाल किताब के अनुसार जिस व्यक्ति का चन्द्रमा पांचवें भाव में हो उसकी शिक्षा उसके जीवन में पूरी तरह काम नहीं आती। ऐसा जातक सन्मार्ग पर चले तो उसकी स्थिति व भाग्य उत्तम रहते हैं। उसे औरों के साथ विनम्रता, आदर व शिष्टतासे पेश आना चाहिए। घटिया या कटु भाषा का प्रयोग औरों के लिए करेगा तो स्वयं उसके लिए मुसीबतें पैदा होंगी। ऐसे जातकों को घर में पेड़-पौधे नहीं रखने चाहिए तथा गोल मोती/मनकों वाली माला नहीं धारण करनी चाहिए। यह उसके लिए शुभ नहीं होते (क्योंकि माला बुध की कारक मानी गई है और बुध चन्द्रमा
    से शत्रुता रखता है)।
पंचम भाव: जल तत्त्वीय राशियों (कर्क, वृश्चिक, मीन) का चंद्र पंचम भावस्थ में हो तो जातक कई पुत्रों का पिता बनता है। प्राय: क्रम से पुत्र-पुत्री होते हैं। अग्नि तत्त्वीय राशि (मेष, सिंह, धनु) में चंद्र हो तो शिक्षा में व्यवधान आते हैं। फलत: व्यक्ति अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाता, जल तत्त्वीय राशियों में शिक्षा पूर्ण हो जाती है तथा वह बकालत अथवा चिकित्सा के व्यवसाय से अच्छा धन अर्जित कर सकता है। पृथ्वी तत्त्वीय राशियों (वृष, कन्या, मकर) में चंद्र होने से भी व्यक्ति उच्च शिक्षित नहीं हो पाता। वायु तत्त्वीय राशियों (मिथुन, तुला, कुम्भ) में चंद्र हो तो व्यक्ति बातें कम और काम अधिक करता है। पंचम भावस्थ चंद्र नीच राशिस्थ अथवा पाप प्रभाव में हो तो किसी एक पुत्री को सांसारिक सुख प्राप्त नहीं हो पाता। उसे गृहकलह, संबंध-विच्छेद, वैधव्य में से कोई एक दुख मिलता है। देह की अपंगता के कारण विवाह न होना भी संभव हो सकता है। पंचम भावस्थ चंद्र द्विस्वभाव राशियों (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) में हो तो जुड़वां संतान होने की संभावना रहती है। स्त्री कमाऊ होती है अथवा उसके मायके से धन मिलता है। अशुभ प्रभाव में हो तो अशुभ फल मिलते हैं।
पांचवें भाव में चंद्र की उपस्थिति से व्यक्ति निर्बल बुद्धि का, चंचल स्वभाव वाला, कन्या संतति प्रधान, सदाचारी, सदगुणी, क्षमाशील, शर्मीला, गुप्तविद्याओं में रुचि लेने वाला होता है। उसकी उन्नति व्यवसायिक होती है। उसकी ससुराल धनवान्‌ तथा पत्नी बहुत सुंदर होती है, साथ ही शिक्षित, पतिब्रता तथा आज्ञाकारिणी होती है। वो स्वयं दूसरों की बातों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाने वाला होता है तथा सभी से भरपूर स्नेह रखने का आकांक्षी होता है। वाद-विवाद प्रतियोगिता में सफल, उत्तम व्स्त्रों का शौकीन तथा माता-पिता के सख की कामना करने वाला होता है। 
यदि पंचम भाव में चंद्र पापग्रह से युक्त हो, तो व्यक्ति को वीर्य-संबंधी रोग रहता है। उसका वीर्य शीघ्र स्खलित हो जाता है। अर्थात्‌ वो शीघ्रपतन का रोगी होता है तथा उसे संतान का दुःख हमेशा रहता है। स्त्रियां गर्भस्थ संबंधी रोग से पीड़ित रहती हैं। चंद्र की अशुभ स्थिति होने पर मृत्रकच्छ का रोग भी व्यक्ति को ' पीड़ित करता है। 
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र पंचम स्थान में होने पर जातक धूर्त एवं ठगहोता है। संतान की उन्नति नहीं होती। धनलाभ होकर भी लक्ष्मी स्थिर नहींहोती। विद्याध्ययन में दिक्कतें आती हैं। संतान की हानि होती है।

    2. वृषभवृषभ राशि का चंद्र पंचम स्थान में होने पर जातक समाज मेंप्रतिष्ठित, सुखी एवं संपन्न रहता है। इसकी संतान धूर्त और धैर्यवान होती है।3. मिथुन-मिथुन राशि का चंद्र पंचम स्थान में होने पर जातक सुखी एवंसंपन्न रहता है। संतान आज्ञाकारी रहती है। स्वभाव अस्थिर एवं चंचल रहता है।विद्याभ्यास में रुकावटें आती हैं। सर्दी, जुकाम, खांसी की तकलीफ बराबर रहती है।4. कर्क कर्क राशि का चंद्र पंचम स्थान में रहने पर जातक सुखी, संपन्नएवं कामातुर रहता है। संतान अधिक होती है। चंद्र की दशा-अंतर्दशा मेंभाग्योदय होता है।

    5. सिंहसिंह राशि का चंद्र पंचम स्थान में हो तो जातक सुखी एवं संपन्नरहता है। जीवन में स्वपुरुषार्थ से प्रगति करता है। धन-संपत्ति पर्याप्त रहतीहै। पिता की आर्थिक हालत अच्छी रहती है। जातक विद्वान, लेखक,पारिवारिक सुख से परिपूर्ण एवं दीर्घायु रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र पंचमस्थ होने पर जातक बुद्धिमान, परोपकारी,

    सुखी एवं संपन्न रहता है। जातक की पत्नी का स्वभाव तेज रहता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र पंचम स्थान में हो तो जातक कामातुर, सुखी,संपन्न एवं परोपकारी रहता है। वह आर्थिक दृष्टि से कंजूस लेकिन परिश्रमशीलरहता है। बड़ी संपत्ति छोड़ जाता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र पंचम स्थान में होने पर जातकस्वाभिमानी, संगीतप्रिय, समाज में प्रतिष्ठित, सुखी, संपन्न एवं दीर्घायु रहताहै। स्वभाव अस्थिर रहता है।

9. धनु-धनु राशि का चंद्र पंचम स्थान में हो तो जातक के विद्याभ्यासमें रुकावटें आती हैं। परिवारिक सुख में कमी रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र पंचम स्थान में होने पर जातक संपन्न,प्रसन्न एवं सुखी रहता है। घूमने-फिरने का शौकीन रहता है और शूल रोगसे ग्रस्त रहता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का चंद्र पंचम स्थान में हो तो जातक संपन्न, प्रसन्न,आचारशील, संगीतप्रेमी, सरकारी कर्मचारी एवं सुखी रहता है।

    12. मीन-मीन राशि का चंद्र पंचम स्थान में हो तो जातक प्रतिष्ठित,प्रसिद्ध, परोपकारी, बुद्धिमान, सौम्य स्वभावी, भाग्यवान एवं सुखी रहता है।चंद्र की दशा-अंतर्दशा भाग्योदयकारक रहती है।
    5) पंचम् भाव -
    1. 1% गज कपड़े में चावल व शक्कर तथा दो सफेद पुष्य बाँध करगंगा में बहा देवे।
    2. नया कार्य करने से पहले मीठा दही जरूर खावे। (सेवन करें)
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 षष्ठ स्थान (शात्रु भाव) छठवें स्थान में चन्द्र

    गर्गाचार्य - लमनात् पष्ठस्थिते चन्द्रे मृदुकायः स्मरानलः।

    अनेकारिर्भवेत् तीक्ष्णरिष्टः स्यात्मृत्युरेव च। लम्न से छठवें स्थान में चन्द्र

    हो तो शरीर बहुत कोमल होता है, कामेच्छा तीब्र होती है, शत्रु बहुत होते
हैं और मृत्यु के समान घोर पीड़ा होती है।

    काशीनाथ - षष्ठे चन्द्रे वि्तेहीनो मृदुकायोऽतिलालसः।मन्दाम्निस्तीक्ष्णदृष्टिच पापबुद्धर्भवेन्ेरः। यह निर्धन और लोभी होता है।इस की भूख मन्द, दृष्टि तीक्षण और बुद्धि पापी होती है।

    आचार्य-रिपुगेऽरियुक्तरतीक्ष्मोऽलसो मृदुरतिर्मृदुरिद्धवहिनः।
आलसी तथा स्त्री उपभोग के समय यह मृदु होता है और इस की भूख प्रदीप्त होती है।

जीवनाथ - सुखं मातुः स्वल्पं प्रभवतिगदानामतिरतिः॥ माता  का सुख बहुत कम मिलता है।

जयदेव-अल्पात्मजवान् रिपुस्थ।। इसे पुत्र कम होतेहै।

वसिष्ठ - चन्द्रः करोति विकलं विफलं प्रयलम्। इस के सारे प्रयल अधूरे होते हैं और विफल होते हैं।
जातकमुक्तावली-यदा सोमे करदृष्टौ न सुखं मातुलस्यचा तस्य वंशोब्द्धवः कोपि गतो देशान्तरे मृतः।। इस चन्द्र पर पापग्रह की दृष्टिहो तो मामा का सुख प्राप्त नही होता। उस के वंश का कोई पुरुष विदेश में मरता है।
    शम्भुहोराप्रकाश - पण्ठे चन्द्र पापवीक्षिते कन्या-पत्योड्य मातुलः।मातृपत्या रंडा देशान्तरे गता। इस पर पापग्रह की दृष्टि हो तो मामा कोकन्याएं ही होती हैं। इसके मामा के मां को अथवा उसे के बहु कोमृतबालक (मृतप्रजा) होते हैं। अथवा वह विधवा होती है अथवा उसेविदेश में जाना पडता है।

    नारायण भट्ट-मातृशीलो न तदूवत्। यह मातृभक्त नही होत।वैद्यनाथ-अल्पायुः स्यात् क्षीणचन्द्रेउरिसस्थे। पूर्णे जातोऽतीवभोगी चिरायुः॥ यह चन्द्र क्षीण हो तो वह अल्पायुषी होता है। यह पूर्ण चन्द्रहो तो दीर्घायुषी और भोगवान होता है।

    हिल्लाजातक - पष्ठे च प्रमिते वर्शे चांगपीडा च मृत्युवत्।।छठवें वर्ष में मृत्यु के समान पीड़ा होती है।

    ज्योतिषकल्पतरु - वातश्लेश्मादिके चन्द्रे विद्वेषो बान्धवैःसहा नृपचौरोद्रवाः पीडाः षष्ठं रोगभयंकरम्॥ इस चन्द्रसे बन्धुओं के साथझगड़ा होता है। राजा और चोरों से तकलीफ होती है। भयंकर रोग होते हैं।

    यवनमत - यह हमेशा परेशान, रोगी, कुरूप, अशक्त किन्तुकामातुर होता है। इस चन्द्र के फल निर्दयता, वेध और निष्ठुरता प्राप्तहोती है।

    पाश्चात्य मत - इस चन्द्र से शरीर सौख्य अच्छा नहीं मिलता।इससे रोग बढ़ते है। स्त्रीयोंसे दुख पहुंचता है। यह चन्द्र यदि शुभ हो तो छोटेमोटे फाये होते हैं। यह वृश्चिक में हो तो वह पियक्कड होता है। इसका धनबेकार खर्च होता है। व्यवसाय में मुश्किले बहुत आती है। शन्रु बहुत होते है।कानूनी मामलों में हर बार अपयश आता है। इस स्थान के शुभ चन्द्र के फलबहुत कम मिलते हैं। इसे नौकरी में सफलता मिलती है। कुछ अधिकारपद     मिलने का भी योग होता है। यह चन्द्र वृषभ राशि में हो तो यह योग होता है।यह चन्द्र द्विस्वभाव राशि में हो तो फेफड़ो के रोग, कफ, क्षय आदि होते हैं।यह स्थिर राशि में हो तो अर्श, भगंदर और मूत्रकृच्छ इन में से कोई विकारहोता है। वृषभ का चन्द्र यहां हो तो कण्ठ का रोग, खांसी, श्वास नलिका मेंदाह होना ये विकार होते हैं। यह चन्द्र चर राशि में-खासकर कर्क में हो तोपेट के और जठर के रोग-पचनक्रिया में गड़बड़ी होना आदि-पैदा होते हैं।खास कर बचपन में प्रकृति बहुत अस्वस्थ होती है। इस चन्द्र के फलस्वरूपनौकरों से बहुत तकलीफ होती है-वे कायम नही रह सकते।

    मेरे विचार - इन शोस्त्रकारों के फल प्रायः समानही हैं। इन मेंजो अशुभ फल हैं वे स्त्री राशि में प्राप्त होते हैं और अच्छे फल पुरुष राशिमें मिलते हैं।
जातक खिन्नमन वाला, रोगग्रस्त और विपत्तिग्रस्त होता है। यदिचन्द्रमा पूर्णिमा का, स्वगृही या उच्चस्थ हो तो जातक को अनेको सुखसुविधाएँ प्रदान करता है।

    -मानसागरीहोगा।जातक अल्पायु, मूर्ख, उदार रोगों से पीड़ित और मानभंग का शिकार

    -फलदीपिकायदि चन्द्रमा क्षीण हो तो जातक पेट की बीमारियों से पीड़ित औरअल्पायु होता है।

    -सारावलीजातक दरिद्रि, रूगण शरीर वाला, 36 वें वर्ष की आयु में विधवा सेअवैध संबंध बनाने वाला एवं पाप प्रवृत्ति में लिप्त होता है। यदि पीड़ितचन्द्रमा राहु व केतु के साथ हो तो जातक विपन्न, खतरनाक शत्रुओं सेघिरा और उदर रोगी होगा।

    -भृगुजातक विषमलिंगियों के प्रति समर्पित, आलसी, निरकुश, जल्दीक्रोध करने वाला, बुद्धिमान, सुस्त, छरहरे बदन वाला, कमजोर यौनसंबंधों वाला, विधवा के प्रति आसक्त, विपन्न, पियक्कड़, सुलझा हुआ,कोमल, चोरी करने वाला, उदर रोगी, अनेक शत्रुओं वाला और चचेरे-ममेरेभाई-बहनों के लिए चिंतित रहने वाला होगा।-डॉ रामनजातक कम यौनेच्छा वाला होगा।
-वारहमिहिर

    क्षीण चन्द्रमा से आयु का हास और पूर्ण/बली चन्द्रमा से वृद्धि होती

    हैं।

    -वैद्यनाथ

    टिप्पणी

    प्रयोग के समय भी उपरोक्त फलों में से अधिकांश सही पाये गये।षष्डस्थ चन्द्रमा जातक को शत्रुओं पर विजयी बनाता है। जिससे शत्रुदोबारा सिर नहीं उठा पाते।

    जातक के माँ के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं होते या माँ प्रसन्न नहींरहती। जातक पेट की गड़बडियों, नेत्र कष्ट और मस्तिष्क संबंधीसमस्याओं से ग्रस्त रहता है। जातक समाज सेवा में संलग्न रहता है औरहमेशा परोपकार करता है व दूसरो की समस्याएँ सुलझाने का प्रयत्नकरता है। षष्ठस्थ चन्द्रमा जातकों को दीनबन्धु या दीनदयाल बनाता है।उसे अपने तन-धन व प्रतिष्ठा की कीमत पर भी बिना माँगे दूसरों कीसहायता करने का स्वभाव होता है। महिलाओं की जन्म कुण्डलही मेंषष्ठस्थ चन्द्रमा अच्छा नहीं होता। इससे जातिका अस्थिर मस्तिष्क वाली,शिथिल शरीर वाली, नीच व्यवहार करने वाली और व्यभिचारिणी होगी।

    मेरा अनुभव - इस स्थान का चन्द्र स्त्री राशि का हो तो कफ,सांस के रोग होते हैं और रक्त दूषित होता है। यह वृषभ, कन्या या मकरराशि में हो तो रक्त दुषित होकर गरमी, परमा जैसे रोग होते हैं। इसे दिन मेंएक ही नथुनी से सांस लेनी पडती है। रांत के भोजन के बाद सांस बंद होजाती है। नथुनी भर आती हैं। इसे किसी भी कार्य में प्रयत्न कर के थक जानेपर जब वह निराश हो जाता है तब कहीं सफलता मिलती है। इस योग कीस्त्रियां दाइनी का काम अच्छा करती हैं और रोगी की सेवाशूश्रुषा भी सहजरूप से करती हैं। यह चन्द्र मेष, सिंह या धनु में हो तो ये गुणधर्म मिलते हैं।डॉक्टरों की कुण्डली में यह योग बहुत उत्तम होता है। ये गरीब रोगियों केलिए बहुत दयालु होते हैं। अपने पैसे खर्च कर के भी रोगियों के प्राण बचानाचाहते हैं। रोगियों के प्राण बचाना यही अपना कर्तव्य समझते हैं और इस मेंपैसे न भी मिलें तो उन्हें उसका खेद नही होता। इस चन्द्र से रसोई में प्रवीणता प्राप्त होती है। हरेक की अलग रचि होती है। इस चन्द्र का एकगुणण कुछ विलक्षण है। कोई इस व्यक्ति का अकारणही नुकसान करे तो थीबे उसे दणड करने के लिए प्रयतन नही करते। किन्तु इन के आत्मा की शद्ितइतनी अधिक होती है कि ये जिस का बुरा चाहें उसे तुरंत वैसा फकल मिलनाहै। इस चन्द्र से शरीट में किससी भी रोग का प्रवेश होने पर बह बहुत देर तकरहता है। मेष, सिंह, धनु इस राशियों में यह चन्द्र हो तो प्रकृति कुछ मुट्दहोती है। वृषभ, कन्या अथवा मकर में हो तो तापदायक होती है क्योकिवृषभ में हो तो यह अष्टमेश होता है, कन्या में हो तो चतुरबेश होता है औरमकर में हो तो व्ययेश होता है। यह वृश्चिक में हो तो धनेश होता है औरमीन में हो तो दशमेश होता है इसलिए यह योग भी अनिष्ट ही होता है ऐसेबोग से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्ट होते हैं, अपमान, शतुत्त्रऔर बेइजजत होती है। आम तौर पर पष्ठ के चन्द्र के फल अच्छे नहीं होते।पुरुष राशियों में सिफ कुछ अच्छे फल होते हैं।

    षष्ठ स्थान का चंद्र बाल्यारिष्टकारक रहता है। षष्ठ स्थान में चंद्र हो तो जातकका स्वास्थ्य मध्यम रहता है। कफ-शीत विकारों से ग्रस्त रहता है। कामेच्छाअधिक रहती है। शत्रु काफी रहते हैं। लेकिन शत्रु जैसे उत्पन्न होते हैं वैसे हीवे समाप्त भी हो जाते हैं। माता का सुख कम प्राप्त होता है या उससे कम बनतीहै। पुत्र संतान कम रहती है। छठे वर्ष में शारीरिक क्लेश होता है। जातक केमामा-मौसी को भी संतान विषयक चिंता रहती है। मामा के लड़कियां अधिकहोती हैं तो मौसी के संतान जीवित नहीं रहती या वह विधवा हो जाती है। चंद्रक्षीण या पापग्रह दृष्ट होने पर यह फलित विशेष रूप से अनुभव में आता है।जातक को चोरों का भय रहता है। भाई-बहनों से विशेष स्नेह नहीं रहता। चंद्रकी दशा-अंतर्दशा साधारण फलदायी होती है।
षष्ठ भाव-षष्ठ भाव का चन्द्रमा अशुभ होता है। ऐसा जातक उदर रोगी,निर्धन व खराब सेहत वाला होता है। प्रायः किसी न किसी रोग से ग्रस्त रहता है।शत्रुओं से पराजित होता है। प्रायः बचपन रोगों तथा कष्टों में ही बीतता है। (चन्द्रमाअकेला और बलिष्ट हो तो जवानी का समय ठीक गुजरता है।) शिक्षा का उपयोग बहुत कषटं के बाद होकर पाना मुमकिन होता है। परन्तु जातक का स्नेह नानी/मॉँसीसे विशेष रहता है।
    लाल किताब के अनुसार छठा चन्द्रमा अनिष्टप्रद तथा देहसुख में बाधाउत्पन्न करने वाला होता है। ऐसे जातक को व्यवसाय में कठिनाइयां तथा शत्रुओंद्वारा व्यर्थ की परेशानियां उठानी पड़ती हैं। यदि कर्क राशि का चन्द्र छटे भाव मेंहो तो जातक का पाचनतंत्र खराब रहता है तथा पेट के रोग लगे रहते हैं (विशेषकरबचपन में) । पृथ्वी तत्त्व प्रधान राशि हो तो दूषित रक्त, देह में गर्मी, नजले-जुकामसे सांस में कठिनाई आदि रहते हैं तथा जातक को विशेष कष्टप्रद होता है।अग्नराशि हो तो जातक दृढ़निश्चयी होता है। यदि द्विस्वभाव राशि हो तो कफ,क्षय, फेफड़ों के रोग आदि की सम्भावना अधिक होती है। किन्तु रोगों का आना-जाना लगा रहता है। स्थिर राशि हो तो अर्श, भगंदर आदि रोग होते हैं, जो लम्बेचलते हैं। चर राशि में उदररोग। उच्चराशि में हो तो गले व श्वास के रोग तीव्रता सेसम्भावित होते हैं।
षष्ठ भाव: षष्ठस्थ चंद्र अरिष्टकारक होता है। ऐसा व्यक्ति अपने शैशवकाल में प्राय: रोगी बना रहता है। पृथ्वी तत्त्वीय राशियों में चंद्र हो तो देह में रक्त दोष के कारण रोग होते हैं। वृष, कर्क, कन्या, मकर, वृश्चिक एवं मीन राशि का चंद्र हो तो कफ दोष के कारण खांसी, श्वास, निमोनिया, जुकाम ( प्रतिश्याय) आदि रोगों के कारण पीड़ा पहुंचती है, नासिका अवरुद्ध रहती है। रात्रिकाल में लेटने के पश्चात व्यथा और बढ़ जाती है। अग्नि तत्त्वीय राशि का चंद्र चिकित्सकों के लिए शुभ होता है। ऐसे चिकित्सक स्वभाव से दयालु होते हैं तथा रोगी पर विशेष ध्यान देते हैं। यदि ऐसा व्यक्ति किसी रोग से पीडित हो जाए तो शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ नहीं कर पाता। छठे स्थान में पृथ्वी तत्त्वीय राशियों का चंद्र विशेष कष्टकारक होता है। क्योंकि वृष में हो तो अष्टमेश, कन्या में हो तो चतुर्थेश तथा मकर में हो तो व्ययेश बनता है। शत्रुपक्ष प्रबल रहता है। स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) का चंद्र हो तो वात रोग होते हैं। स्वराशिस्थ चंद्र हो तो पाचन-क्रिया में विकार उत्पन्न होकर बार-बार दस्त होते हैं। छठे भाव में चंद्र शुभ फल प्राय: नहीं देता, जातक की देह निर्बल बनी रहती है। 
जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चंद्र षष्ठ भाव में होता है, वो दीर्घायु बलिष्ठ, शंत्रहंता, अल्पायु, कफ प्रकृति प्रधान, खर्चीले स्वभाव बाला होता है। उसे उचित संस्कार का अभाव होता है, ससुराल-पक्ष से असंतुष्ट असफलताओं से जुड़ा महत्त्वकह्ठी| चिड़चिड़े स्वभाव वालों से परेशानी तथा उसे किसी के घर आते-जाने की कोई आदत नहीं होती है। ५५ से ५८ वर्ष की आयु से उसे भौतिक सुख का अहसास होता है। ऐसा व्यक्ति वात, कफ, नेत्र, मंदाग्नि एवं वीर्य व मृत्र-संबंधी रोगों का शिकार बनता है। उसका बाल्यकाल उदरविकार तथा अस्वस्थता में बीतता है। यदि घष्ठ भाव में चंद्र वृष राशि में विद्यमान हो, तो व्यक्ति को कुष्ठ रोग होता है। उसके गले में खराश बनी रहती है। इसी प्रकार यदि षष्ठ भाव में वृश्चिक राशि में चंद्र हो, तो व्यक्ति निश्चय ही बवासीर, भगंदर जैसे गुप्त रोग से ग्रस्त रहता है। यदि चंद्र षष्ठ भाव में राहु अथवा केतु से युक्ति करते हुए विद्यमान है, तो व्यक्ति जलोदर, गलगण्ड तथा पेट के रोग से ग्रसित रहता है। 
    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक कामातुर रहता है।उसका परस्त्री से संबंध होना संभव रहता है। जातक का प्रायः प्रेम विवाह होताहै। वह सुन्दर एवं नास्तिक रहता है। उसके प्रत्येक काम में विलंब होता है।2. वृषभ वृषभ राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्यअच्छा नहीं रहता। जलभय रहता है। शत्रु अधिक रहते हैं।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने पर जातक के वैवाहिकजीवन में मतभिन्नता रहती है। चंद्र पापग्रहयुक्त या क्षीण हो तो संक्रामक रोगउत्पन्न होते हैं। स्त्री संपर्क के कारण ही संक्रामक रोग उत्पन्न होते हैं।4. कर्क-कर्क राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने पर जातक का परिवारके लोगों से बैर एवं बाहरवालों से मैत्री रहती है। जातक अभिमानी एवं कंजूस     रहता है। धनसंग्रह अच्छा रहता है। वह जमीन-जायदाद का पर्याप्त सुखभोगता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र ष्ठ स्थान में होने पर जातक को संतान सुखकम मिलता है। संतान वश में नहीं रहती। विद्याध्ययन में दिक्कतें आती हैं।जातक शस्त्र-अस्त्र प्रवीण होता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने से जातक के सौतेलीमां हो सकती है। जातक का बर्ताव मां-बाप के विरुद्ध रहता है।जमीन-जायदाद एवं पशुओं का सुख प्राप्त नहीं होता।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक नेत्रविकारग्रस्तरहता है। व्यापार में मुनाफा कमाता है और भाइयों से बैर रखता है। मामा सेपर्याप्त सुख नहीं मिलता। भाभी से अनुचित संबंध रखने की कोशिश करता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में हो तो जातक गप्त रोगसे ग्रस्त रहता है। स्वास्थ्य कमजोर रहता है। बीमारी में पैसों का अपव्यय होताहै। जमीन-जायदाद बड़ी मात्रा में होते हुए भी जातक कंजूस रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने पर जातक के लिएबाल्यारिष्ट योग रहता है। जातक नेत्रविकार, मनोविकार से त्रस्त रहता है। वहधनवान किंतु कंजूस होता है। वाहनादि का पर्याप्त सुख रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने पर जातक आचारवहीनएवं क्रोधी होता है। उसे नेत्रविकार रहता है। संतान सुख में न्यूनता रहती है।जातक अपने माता-पिता को सुख नहीं दे सकता।

    11. कुंभकुंभ राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने पर जातक प्रायः विदेशमें रहता है और वहीं उसकी मृत्यु होती है। वह बुद्धिमान एवं चतुर होता हैलेकिन आर्थिक स्थिति मध्यम रहती है। चोरों का भय रहता है।

    12. मीनमीन राशि का चंद्र षष्ठ स्थान में होने पर जातक जीवन मेंसुखोपभोग नहीं कर पाता। इसके शत्रु बहुत होते हैं। आजीविका चलाने में भीउसे दिक्कतें आती हैं। नौकरी बार-बार बदलनी पड़ती है। स्वतंत्र व्यापार मेंफायदा हो सकता है। जातक विद्वान एवं गुणवान होता है। आचार्य गर्ग केअनुसार जातक की मां का चरित्र संशयास्पद रहता है।
6) षष्ठम् भाव -
    1. सफेद वस्तु का व्यापार न करें (दूध)।2. लाल पत्थर मंदिर में भेंटकरें। 3. कबूतर को पाले। 4. चांदी के बर्तन में भोजन करें। 5. रात्री में दूध न पीये।
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सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)सातवें स्थान में चन्द्र

    काशीनाथ - चन्द्रे च सप्तमे जातो दुःखी कष्टी च बचकः।कृपणो बहुवैरी च जायते पारदारिकः॥ चन्द्र सातवें स्थान में हो तो वहदुशबी, कष्टी, ठग कंब्रुस, परस्त्रियों में आसक्त और बहुत शत्रु ओं से युकतहोता है।

    जयदेव - ई्ष्यु: सदम्भो मदनातुरोऽस्वोनयांगहीनोऽस्तगतेसुधाशी। यह ई्याल्ु, दाम्भिक, कामातुर, निर्धन, अधर्मी और किसीअवयव से हीन होता है।

    बृह्धवन जातक - नरो भवेत् क्षीणकलेवरश्च धनेन हीनोविनयेन चन्द्र।। इसका शरीर क्षीण होता है। यह निर्धन और उद्धत होता है।

    नारायणभह्ट - धनित्वं भवेदष्ववाणिज्यतोऽपि मिष्टभुक्लुब्धचेताः। इसे रास्तों में व्यापार करने से धन प्राप्त होता है। यह मीठेपकवान खानेवाला और लोभी होता है।

    जागेश्वर-क्रये विक्रये वर्धतेऽसी विशेषात्। यह खरीदना औरबेचना इस व्यवहार में अर्थात व्यापार में समृद्ध होता है।

    जीवनाथ - यदा कान्तागारं गतवति मृगांके जनिवताम्।कारक्रोन्तेडकस्मादू धनमपि निजस्त्रीजनकुलात्॥ अनंगप्राबल्य वरनगरनारीरतिकला। प्रवीणत्वं धीरध्वनि मतिरतीर प्रभवति॥ इसे अपनी पत्नी केसम्बन्धियों से अकस्मात धन प्राप्त होता है। वेश्याओं को प्रसन्न करने कीकला होती है। धैर्य और प्रवीणता प्राप्त होती है।

    शुक्रजातक - जामित्नेचन्द्रशुक्री च बहुपल्यो भवन्ति हि॥सप्तम में चन्द्र और शुक्र हों तो बहुपल्ि योग होता है।

    हिल्लाजातक - सप्तमें मातृनाशं च वर्षे तिथिमते ध्रुवम्॥पन्द्रहवे वर्ष माता की मृत्यु होती है।

    यवनमत - यह नीरोग, धनवान, रूपवान, कीर्तिमान, यशस्वीऔर विख्यात होता है।

    बृहदयवनजातक - स्त्री नाशकृद् युगगुणै रविरिन्दुरेवमृत्युं च॥इसे पन्द्रहवे वर्ष मृत्यु के समान पीड़़ा होती है।

    पाश्चात्य मत - इस व्यक्ति को विवाह से और वारस कीहैसियत से अच्छा धनलाभ होता है। इस चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि होअथवा यह मित्रगृह में, स्वगृह में या उच्च का हो तो अच्छा लाभ होता है।जलपर्यटन, व्यापार, सट्टा, पानी से उत्पज होनेवाले पदार्थ-इनसे इसेफायदा होता है। इस व्यक्ति का विवाह २४ से २८ वें वर्ष तक होता है।
    इसका प्रेम अस्थिर होता है। इसे साझीदारी के व्यवहार में बहुत फायदाहोता है। इस चन्द्रपर अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो स्त्री के सम्बन्ध से काटहोते हैं।

    मेरे विचार - उपर्युक्त मतों में काशीनाथ, जयदेव,बृहधयवनजातक, शुक्रजातक और हिल्लाजातक इनका वर्णन स्त्री राशि मेंतथा नारायणभट्ट, जागेश्वर, जीवनाथ, यवन और पाश्चात्य इनका वर्णनपुरुष राशि में ठिक मालूम होता है।
यदि चन्द्रमा पूर्ण बली हो तो जातक की पत्नी सुंदर और वह स्वर्णादिसे युक्त व सुदर्शन व्यक्तित्व वाला होगा। बलहीन, पापक्रान्त या अशुभराशि में हो तो स्वयं खिन्न मन वाला और रोगी होगी।
    -मानसागरी
    जातक सुदर्शन व्यक्तित्व वाला, विश्वसनीय एवं प्रख्यात तथा पत्नीका प्रिय होता है।-फलदीपिका

    जातक मित्र स्वभाव वाला, प्रसन्न चित्त, स्वस्थ शरीर वाला, औरयौन क्रियाओं में लिप्त होगा। यदि चन्द्रमा निर्बल है तो जातक की स्थितिदयनीय और वह रोग ग्रस्त होगा।

    -सारावली

    जातक कामुक, महिलाओं के प्रति आसक्त, सुन्दर पत्नी वाला,उसकी माँ की आयु कम, संर्कीण मानसिकता वाला, अच्छे परिवार वाला,कमर में दर्द से पीड़ित, सामाजिक, सफल, ई्ष्यालु, शक्तिवान याऊर्जावान होगा।

    -डॉ रामन

    जातक मृदुभाषी, 32 वें वर्ष की आयु में विवाह, नेत्र दोष वाला,महिलाओं के प्रति आकृष्ट, स्त्री-संसर्ग के कारण शल्य चिकित्सा(ऑपरेशन) का भय, राजकृपा का पात्र होगा। यदि सप्तमेश बली हो तोजातक के दो पत्लियाँ और चन्द्रमा निर्बल होने पर स्त्री की हानि होगी।-भृगु

    टिप्पणी

    जातक अपनी पत्नी से संतुष्ट, विदेशों में व्यापार से धनर्जन करनेवाला, अनेक स्त्रियों से यौन संबंध रखने वाला, कामुक/विलासी व उदारहोगा। शुक्रजातक के अनुसार-जातक के कई पत्नियाँ होगी। जातकसागरके अनुसार-सप्तमस्थ चन्द्रमा से उत्तम परन्तु रोगिणी पत्नी होगी। जातकसंगीत का शौकीन और विख्यात होगा।

    महिलाओं की कुण्डली में सप्तमस्थ चन्द्रमा जातिका को समृद्ध,पतिव्रता, तेजस्विनी और वाक्पटु बनाता है।

    मेरा अनुभव-यह चन्द्र वृषभ राशि में हो तो दो विवाह होने कीविशेष सम्भावना होती है। ऐसी स्थिति में चन्द्र भाग्येश होता है इसलिएविवाह होते ही भाग्योदय शुरू होता है और पत्नी जीवित रहती है तबतकउन्नति होती है। उसकी मृत्यु होते ही एकदम अवनति होती है। व्यवसाय मेंस्थिरता नही रहती। नौकरी भी स्थिरता से नही होती। कई व्यवसाय औरकई नौकरियां करनी पड़ती हैं। अन्य स्त्री राशियों में यह चन्द्र हो तो पत्लीकुछ सांवले रंग की, अशक्त, दुबली पतली किन्तु प्रभावी होती है। उसकेकेश महीन, लहरीले और छोटे होते हैं। वह स्वभाव से हठीली किन्तु संसारमें दक्ष होती है। वह मेहमानों का आदरातिथ्य अच्छी तरह करती है। उसेसंसार में कष्ट बहुत होते है। सन्तान नही होती, हुई तो उसकी मृत्यु होती है,गर्भपात होता है अथवा कन्याएं ही होती हैं। सन्तान विषयक कोई कष्टनही हुआ तो शारीरिक पीड़ा होती है। पति की कुण्डली में भीस्त्री राशि मेंलान में अथवा सप्तम में चन्द्र हो तो वह स्त्री अपने किसी महत्त्पूर्ण कार्यके लिए व्यभिचार को प्रवृत्त होती है। यह चन्द्र पुरुष राशि में हो तो ३६ वेंवर्ष तक स्थिरता प्राप्त नही होती। कई व्यवसाय करने पड़ते हैं और घूमनाफिरना बहुत होता है। लोगों में मिलना जुलना और सार्वजनिक कार्यों में
भाग लेना इसे प्रिय होता है। पत्नी गौर वर्ण की होती है और उसके केशविपुल और लम्बे होते हैं। चंद्र यहाँ मेष, मिथुन अथवा तुला राशि में हो तोउस का चेहरा कुछ लम्बाई लिए हुए और प्रभावी होता है। सिंह और धनु मेंचेहरा गोल, हंसमुख और बहुत सुन्दर न होने पर भी प्रभावी होता है। कुम्भमें चेहरा साधारण होता है, आकर्षक नही होता। इसका स्वभाव खिलाड़ीजैसा आनन्दमय होता है। पति के अनुकूल, लोगों में मिलजुल कररहनेवाली, उदार, खर्चीली, विलासी और अच्छे वस्त्रों को चाहनेवालीहोती है। इस स्थान के चन्द्र से किराना, दूध, दवाइयाँ, मसाले, अनाज, इनचीजों का व्यापार सफल होता है। होटल, बेकरी, कमीशन एजन्ट,इन्शुरन्स एजन्ट, म्युनिसिपालिटी की नौकरी, बाजारों में चिल्लर सामान(फुटपाथपर) बेचना-ये भी व्यवसाय अच्छे चल सकते हैं। यह चन्द्र स्त्रीराशि में हो तो व्यभिचार की प्रवृत्ति होती है और पुरुष राशि में हो तो पत्नी के विषय में ही अत्याधिक आसक्ति होती है। शास्त्रकारों ने सभी राशियों में व्यभिचार यह फल कहा है। अनुभव देखना चाहिए।

    सप्तम स्थान में चंद्र मिश्रित फल देता है। चंद्र शुभ एवं बलवान हो तोशुभ फल अधिक मात्रा में और अशुभ, निर्बल, क्षीण चंद्र होने पर अशुभ फलअधिक में मिलते हैं। सप्तम स्थान में स्थित चंद्र व्यापार में लाभ देता है। दैनिकउपयोग की वस्तुओं का व्यापार, ट्रांसपोर्ट के उद्योग में जातक की प्रगति होती
    है। वह अधिक कामातुर रहता है। पत्नी सुख अच्छा प्राप्त होता है। जातकअभिमानी एवं ईर्ष्यालु रहता है। उसे श्वसुर से या पत्नी के रिश्तेदारों से धनप्राप्त होता है। कुछ आचायों के अनुसार सप्तमस्थ चंद्र होने पर जातकअतिकामातुर रहता है एवं एक से अधिक स्त्रियों से उसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षसंबंध हो सकते हैं। इसके लिए अन्य योग भी देखने आवश्यक हैं। चंद्र केसाथ शुक्र सप्तम स्थान में हो तो जातक के एक से अधिक पलियां होतीहैं। ऐसा शुक्राचार्य का मानना है।
सप्तम भाव-सातवें भाव का चन्द्रमा जातक को आकर्षक व्यक्तित्व देताहै। ऐसा जातक कामी, पत्नीभक्त तथा सुन्दर पत्नीवाला होता है। (स्त्री जातकों कोसातवां चन्द्र पतिब्रता बनाता है। अथवा ऐसी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकतीहै।) किन्तु दाम्पत्य का सुख जातक को पूर्णतया प्राप्त नहीं हो पाता। पापप्रभाव मेंयाक्षीण (कृष्णपक्ष) चन्द्रमा हो तो जातक निर्धन भी होता है। किन्तु शुक्ल पक्ष काचन्द्रमा हो तो जातक को धनवान बनाता है।
    लाल किताब के अनुसार सातवें भाव का चन्द्र 'लक्ष्मी का अवतार' कहागया है। च्रमा शुभ स्थिति में हो तो जातक कवि या ज्योतिषी हो सकता है।(चाल चलन ठीक रहा तो सिद्ध पुरुष भी बन सकता है)। जातक की बुद्धि तीव्रऔर मन साफ होता है। पुरुष राशि का चन्द्र पत्नी के प्रति आसक्ति देता है। स्त्रीराशि का चन्द्र व्यभिचार में आकर्षण देता है। उच्च का चन्द्र द्विभार्या योग बनाताहै। ऐसा जातक पत्नी के जीवन में उन्नति करता है। विवाहोपरांत भाग्योदयो होताहै। किन्तु पत्नी की मृत्यु के बाद स्थिति विपरीत हो जाती है। शनि की युति भी होरहीं हो तो जातक को पुनर्भू (सेकंड हैंड) पत्नी मिलती है तथा जातक को गुदा याप्रमेह रोग सम्भव होते हैं।
    देखा गया है कि सातवें भाव में चन्द्रमा हो तो प्रायः जातक मुसाफिरी केव्यापार में रहता है। (ट्रेवल एजेन्ट आदि जिन्हें यात्राएं व्यापार के लिए अधिककरनी पड़ती हैं।) यह सम्भावना तब और प्रबल बनती है, जब सातवें भाव में आनेवाली राशि भी चर (4, 7, '10) राशि हो।

सप्तम भाव: सप्तमस्थ चंद्र हो तो प्राय: शुभ फल ही अनुभव में आते हैं। उच्च का चंद्र हो तो विवाह के पश्चात शीघ्र ही व्यक्ति उन्‍नति की ओर अग्रसर हो जाता है। ससुराल धनी मिलती है, फलत: श्वसुर पक्ष से अच्छा दहेज मिल जाता है। इसमें एक हेतु यह है कि चंद्र भाग्येश होकर उच्च राशि में स्थित होता है। इसका एक अशुभ फल भी अनुभव में आता है कि जातक के दो विवाह हों, परंतु पत्नी के जीवित रहते भाग्य साथ देता रहता है। पत्नी की मृत्यु के पश्चात आजीविका के साधन स्थिर नहीं रह पाते, बार-बार बदलने पड़ते हैं। मेष, मिथुन या तुला राशि का चंद्र सप्तम स्थान में हो तो पत्नी प्रभावशाली मिलती है जिसके कारण जातक को मान-सम्मान मिलता है। कुम्भ राशि का चंद्र हो तो पत्नी सामान्य नयन-नक्श वाली और साधारण परिवार की होती है। जिस जातक के सप्तम भाव में चंद्र हो उसे होटल, रेस्तरां, दूध, दवाइयां, किराने (मसाले, अनाज आदि) का व्यवसाय अधिक लाभदायक रहता है। शुक्र से युत उच्च का चंद्र हो तो वह कामी और स्त्रीलोलुप होता है तथा ग्रन्थि रोग से पीडित रहता है। 
इस भाव में चंद्र की उपस्थिति से व्यक्ति सम्य, विचारक, नेता वक्ता, प्रधान व्यापारी वर्ग का होता है, वो स्फूर्तिवान होता है तथा उसे जलयात्रा करने का अवसर प्राप्त होता है। अहंकारी, धैर्यवान तथा स्फूर्तिवान होता है। स्थानीय व्यापार से उसे धन का अधिक लाभ होता है। उसकी पत्नी भी बहुत सुशील होती है। शत्रुओं से सदा पराजित होता है। दूरस्थ लोगों से उसकी गहरी मित्रता होती है और उनसे संपर्क भी बना रहता है। ऐसा व्यक्ति छल-प्रपंच से दूर रहने बाला होगा। धुन और टृढ़ता का अनोखा संगम उसके व्यक्तित्व में कायम होगा। ऐसे व्यक्ति को शिक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा। अवांछनीय जिज्ञासा की उड़ान से भी उसे बचाना होगा। उसका शरीर दुबला-पतला होता है। 

यदि सप्तम भाव में वृष राशि का चंद्र हो तो व्यक्ति का शरीर स्थल होता है। यहां यह ध्यान रखने वाली बात है कि सप्तम भाव में चंद्र शुभ तथा प्रभावकारी तभी होता है, जब वह उच्चराशि अथवा पापग्रह से दृष्ट न हो। इसी भाव में यदि राशि वृष है तथा निर्बल चंद्र विद्यमान है तो ऐसी दशा में व्यक्ति गुप्त अथवा मृत्र-संबंधी रोग से ग्रस्त अवश्थ॑ होगा। इसी प्रकार यदि चंद्र के साथ शनि की युति सप्तम भाव में हो, तो ऐसी अवस्था में व्यक्ति का विवाह बहुत देरी से होता है, तथा स्त्री से संबंधित कष्ट भी उसे भोगने पड़ते हैं। 

राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र सप्तमस्थ हो तो जातक गुणवान, विद्वान तथा समाज तथा शासन में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वह आचारशील एवं कामातुर रहता है। पत्नी सुंदर एवं अच्छी मिलती है। जातक को यात्रा करने का शौक रहता है।

    2. वृषभवृषभ राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने पर जातक भाग्यवान होता है। विवाह अच्छे और बड़े परिवार में होता है। पत्नी सुंदर मिलती है। विवाह के बाद भाग्योदय होता है। सट्टे व लॉटरी से अकस्मात धन लाभ होताहै। व्यापार में प्रगति होती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने पर जातक नास्तिक होता है। वह व्यापार में साधारण मुनाफा कमाता है और कुसंगति के कारण धन का अपव्यय करता है। पत्नी के सुख में न्यूनता रहती है। गुप्त रोगों सेग्रस्त रहता है।

    4. कर्ककर्क राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने से जातक को यात्राओंका शौक होता है। देश-विदेश में घूमने के मौके प्राप्त होते हैं। व्यापार में लाभहोता है। जातक कामातुर होता है। पत्नी मनोनुकूल मिलती है। जीवन सुखी रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने से जातक शत्रुबाधाओंसे ग्रस्त रहता है। पत्नी से बनती नहीं या फिर उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।संतान सुख में भी न्यूनता रहती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र सप्तम स्थान में हो तो जातक विद्वान, सुखीएवं संपन्न रहता है। कन्या संतान अधिक रहती है। पत्नी अनुकूल प्राप्त होतीहै। आचार्य मंत्रेश्वर के अनुसार दो विवाहों की संभावना रहती है। संतान सुखमें न्यूनता रहती है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र सप्तम स्थान में हो तो जातक सुखी एवं संपन्नहोता है। खेती-बाड़ी, घरबार जैसी जायदाद उसके पास होती है।

    8. वृश्चिकवृश्चिक राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने पर जातक कावैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता। पत्नी सुंदर होते हुए भी उससे सुख प्राप्तनहीं होता। बचपन कठिनाइयों में गुजरता है।

 9. धनु-धनु राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने पर जातक पति-पत्नी दोनों कंजूसी से रहकर धन इकट्ठा करते हैं। जीवन संपन्न एवं सुखी रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने पर जातक सुखी एवं संपन्न रहता है। पत्नी अच्छी मिलती है। जातक को मस्तिष्क संबंधी रोग कष्ट देते हैं तो पत्नी को हिस्टीरिया का कष्ट रहता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का चंद्र सप्तम स्थान में होने पर जातक व्यसनी,कामातुर एवं कपटी रहता है। वैवाहिक जीवन में न्यूनता रहती है। पत्नी खर्चीली रहती है। सेवा में अच्छा पद प्राप्त होता है।

    12. मीन-मीन राशि का चंद्र सप्तम स्थान में हो तो जातक सच्चरित्र,गुणवान, परोपकारी, संपन्न एवं सुखी रहता है। पत्नी अच्छी मिलती है।
    7) सप्तम् भाव-
    1. गंगाजल अपने घर में रखें।
 2. मिट्टी के बर्तन में दही लेवे फिरपूर्णिमा को छत पर रखें, बाद में दूसरे दिन पक्षियों को खिलावें।=========================================================================
अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
    

    आठवें स्थान में चन्द्र

    काशीनाथ - अष्टमे तारकानार्थों दीनोऽल्पायुः सकष्टकः।
प्रगल्भ श्च कृशांगश्च पापबबुद्धिर्भवेत्नरः। चन्द्र अष्टम स्थान में हो तो वह पुरुष दीन, दरिद्री, अल्पायुषी, कष्टी, बुद्धिमान, कृश और पापी होता है।

    जयदेव - सोद्धिग्नचिन्तामयकार्श्यनिः स्वोभूपाल चौराप्तभयोऽष्टमेऽब्जे। यह उद्विग्न, चिन्तातुर, दरिद्री कृश तथा राजा और चोरों से भय होनेवाला होता है।

उदयभास्कर - ध्रुवं नेत्ररोगी तथा शीतपीडा तथा वायुरोगाःशरीरे भवेयुः। क्षण नीयते तस्य मूच्छा क्षण स्याद्यदा मृत्युगचन्द्रमा वै
    जनानाम् नेत्रोग, शीत की पीडा, वायुरोग और क्षणक्षण में मूर्छा येअष्टम के चन्द्र के फल हैं।

    आर्यग्रन्थकर्ताकार - कृष्णपक्षे दिवा जातः शुक्लपक्षे यदा

    निशि। तदा षष्ठाष्टम चन्द्रो मातृवत् परिपालकः। कृष्णपक्ष में दिन को जन्पहुआ हो अथवा शुक्ल पक्ष में रात को जन्म हुआ हो और चन्द्र छठवें याआठवें स्थान में हो तो वह माता के समान परिपालन करता है।

    वैद्यनाथ - रणोत्सुकस्त्यागविनोदविद्याशीलः शशांके सतिसन्ध्रयाते॥ यह कलह के लिए उत्सुक, उदार, विनोदी तथा विद्याव्यासंगीहोता है।

    हिल्लाजातक - अष्टमो दिवसे वर्षे तन्मिते हायने मृतिः।अष्टम में चन्द्र हो तो आठवें दिन, आठवें मास में अथवा आठवें वर्ष मेंमृत्यु होता है।

    वर्ष में नाश होता है।बृहध्यवनजातक - हिमगुः षडब्दे नाशम्। इस चन्द्र से छठवें

    यवनजातक - यह सदा रोगी, दुःखी, वेधी, दुराग्रह, निर्दयीऔर दुर्जनों द्वरा पीडित होता है। इसे देश त्याग करना पडता है। यह चन्द्रपापगृह में अथवा पापग्रह से युक्त हो तब तो ये अशुभ फल निश्चय सेमिलते हैं।

    पाश्चात्य मत - इस चन्द्र के फल स्वरूप मृत्युपत्र द्वारा अथवावारिस के अधिकार से अथवा विवाह के द्वारा विशेष लाभ होता है। चन्द्रउच्च का अथवा स्वगृह में हो तो ये लाभ होते हैं। वह पापग्रह से युक्त हो तोये लाभ नही मिलते।
    मेरे विचार -काशीनाथ और जयदेव इन ने प्रगल्भ बुद्धि यहएक ही अच्छा फल कहा है-बाकी सब अशुभ फल दिए है। प्रगल्भ बुद्धिऔर पापबुद्धि ये दोनों फल एक राशि में नही मिल सकते। इसलिए प्रगल्भबुद्धि यह फल पुरुष राशि में और बाकी अशुभ फल स्त्री राशि में मिलते हैंऐसा मानना चाहिए। जयदेव के कहे हुए सब फल स्त्री राशि के ही है।जयदेव ने और बृहद्यवनजातककर्ता ने राजा से अथवा चोरों से भय ऐसाफल दिया है। दरिद्री पुरुष को चोरों का भय नहीं हो सकता। इसलिएअनुमान होता है कि अष्टम के चन्द्र के फल स्वरूप धनलाभ अवश्य होताहै। तभी राजा अथवा चोरों का भय हो सकेगा। अथवा किसी रियासत मेंदरिद्धी पुरुष की पत्नी सुंदर हो तो उसे भी राजा का भय हो सकता है।उदयभास्करकर्ता के कहे हुए फल स्त्री राशि में मिलते हैं। अबआर्यग्रन्थकार का मत देखिए। अष्टम में चन्द्र होते हुए कृष्ण पक्ष में दिन कोजन्म हुआ हो तो सूर्य नवम से लेकर लग्न तक के किसी भी स्थान में होसकता है। यदी जन्म शुक्ल पक्ष में रात को हुआ हो तो रवि धनस्थान सेसप्तमस्थान तक किसी भी स्थान में होगा। यह योग दीर्घायु देता है,अल्पायु नही। वैद्यनाथ के दिए हुए फल पुरुष राशि के हैं। हिल्लाजातकऔर बृहद्यवनजातक के फल-अर्थात अल्पायु होना-चन्द्र अमावास्या मेंहो अथवा रवि के निकट हो तो मिलते हैं।
अष्टम भाव में चन्त्रमायदि चन्द्रमा अशुभ राशि में है तो वह शीत्र मृत्यु या अल्पायु देगा।यदि चन्द्रमा पूर्ण बली, स्वगृही, शुक्र या गुरु या बुध की राश में हैतो मृत्यु का कारण श्वास या कफ (कास) होगा।
    -मानसागरी
    जातक रोगी और अल्पायु होगा।
    -फलदीपिका
    जातक बुद्धिमान तेजस्वी या प्रतापी तथा रोगप्रस्त होगा। चन्द्रमानिर्बल होने पर जातक अल्पायु होगा।

    -सारावली

    जातक को वाहन सुख, जलीय स्थानों से खतरा, पत्नी के कारणअपने संबंधियों से अलग होगा। यदि चन्द्रमा, स्वगृही, या उच्चस्थ है तोजातक चिरंजीवी होगा।
    -भृगु
जातक गंभीर से गंभीर बीमारियों का शिकार होकर अनेक डॉक्टरों सेइलाज करायेगा।
   -नारायण भट्ट और जीवनाथ
    टिप्पणी
    चन्द्रमा की यह स्थिति अच्छी नहीं बताई गई है। जातक कोदाम्पत्यसुख नहीं मिलता। महिला जातकों में यह स्थिति नेत्र कष्ट, वक्षरोगया योनि के रोग आदि प्रदान करती है।

    मेरा अनुभव - इस स्थान में मेष, सिंह, धनु इन राशियों में चन्द्रहो तो किसी न किसी मार्ग से धन मिलता है। उद्योग में स्थिरता और यशमिलता है। अपना फायदा होता हो तो यह उदारता भी बतलाता है। स्वास्थ्यसाधारण होता है। वृद्ध होने पर पुत्रों से कष्ट होता है। यह चन्द्र मिथुन,तुला, या कुंभ में हो तो पत्नी अच्छी मिलती है। इन छहों राशियों में एक
اफल विशेष रूप से मिलता है। पत्नी कुछ कलहशील होती है। आपतियों में वह स्थिर रहती है, गुप्त बातें गुप्त ही रखती है, बेकार बोलना उसे प्रिय नहीहोता, पति को योग्य सलाह देती है और बहुत अभिमानी होती है। पति केसिवाय दूसरे किसी पर उसका विश्वास नही होता। कर्क, वृश्चिक, धनु यामीन लगन होकर अष्टम में चन्द्र हो तो वे लोग योग्याभ्यासी, उपासक,वेदान्ती होते हैं। आपत्ति आने पर भी ये कर्ज नही लेते। यह चन्द्र स्री राशिमें हो तो नौकरों द्वारा घर की सारी बातें दूसरों को मालूम हो जाती हैं।स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। आयु के ४४ वें वर्ष इस्टेट का नाश होता है। इसस्थान में चन्द्र किसी भी राशि में हो, वह व्यक्ति पापकर्म से डरता है औरदीर्घायु होता है।


    ज्योतिषशास्त्र में कुंडली के अष्टम स्थान में स्थित चंद्र को अधिक निषिद्ध एवं अशुभ फलसूचक माना गया है। स्वास्थ्यरक्षक एवं मारकजन्य योग कुंडली में न हों तो अष्टमस्थ चंद्र विशेष रूप से बाल्यारिष्टकारक सिद्ध होता है।अष्टमस्थ चंद्र कुछ-न-कुछ शारीरिक कष्ट देता ही है। लग्न के द्वितीय ट्रेष्काण
में जन्म हो तो अंडवृद्धि जैसे गुप्तांग के रोग उत्पन्न होते हैं। अन्यथा टाइफाइड,न्यूमोनिया, खांसी, मूच्छा आदि कफज रोग उत्पन्न होते हैं।कुछ आचायों के अनुसार यदि जातक का जन्म दिन में हो या शुक्ल पक्षकी रात्रि में हो तो अष्टमस्थ चंद्र के अशुभ फलों की तीव्रता कम होती है।

    जातक विवेकी, उदार, विनोदी, बुद्धिमान होता है। यूनानी ज्योतिषविदों के अनुसार अष्टमस्थ चंद्र जातक को जन्म से आठवें दिन, आठवें माह, आठवें  वर्ष में अनिष्ट फलदायी होता है। पाश्चात्य ज्योतिषविदों की राय में अष्टमस्थचंद्र स्वगृही, उच्च, वर्गोत्तम आदि हो तो वसीयत, विवाह या अन्य किसी भी स्रोत से दूसरों की संपत्ति का लाभ जातक को प्राप्त होता है।

अष्टम भाव-आठवें भाव का चन्द्रमा भी कष्टंकारी व अनिष्टप्रद माना गया  है। यद्यपि जातक की बुद्धि तीव्र होती है। परन्तु स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। जातकसदा रोगी रहता है तथा उसकी आयु कम होती है। जलोदर द्वारा या जल में डूबकरमरने का भय होता है (विशेषकर जब इस भाव में जल तत्त्व की राशि हो)।बावजूद इलाज के बीमारियां साथ नहीं छोड़तीं (खासकर बचपन में) अष्टमेश भीनिर्बल हो तो जातक की मृत्यु बचपन में ही हो जाती है। शास्त्रकारों ने तो यहां तककहा है-
    सभा विद्यते भेषजा तस्य गृहे पकेत्करहिविरकायमुद्गोपकानि।महाव्यथवो भीतयोवारिभूता राशोक्लेशकृत्यं कटान्यष्टमख्यः॥अर्थात् (अष्टमस्थ चन्द्र हो तो जातक के घर में सदा वैद्यों की सभाएं लगीरहती हैं और मूंग की दाल का पानी ही पकता रहता है। जल से चिकित्सा होनेवाले पाण्डु आदि रोग घर में रहते हैं। अनेक कष्ट, संकट तथा दुर्जनों से आपदाएँपड़ती हैं। आठवां चन्द्रमा सदैव कष्टदायक ही होता है)।
    इसीलिए आठवां चन्द्र बालारिष्ट योग भी बनाता है। लाल किताब के अनुसारभी आठवें चन्द्र वाले जातक का रोग कभी पीछा नहीं छोड़ते। बचपन विशेष कष्टमें बीतता है। जातक की माता आदि भी दुख पाती है। ऐसे जातक को विरासत मेंमिली सम्पत्ति का उपयोग व खेती बाड़ी के काम अशुभ होते हैं। माता, मौसी,दादी, नानी सबके हाल खराब होते हैं। केवल मामा की स्थिति अच्छी हो सकतीहै। या ससुराल के हाल अच्छे होते हैं। आठवें चन्द्र का एक ही लाभ है कि कैसाभी अशुभ चन्द्रमा इस भाव में हो तो जातक को निःसंतान मरने नहीं देता।

अष्टम भाव: अष्टम भावस्थ चंद्र भी अरिष्टकारक होता है। ऐसा जातक रोगों से पीड़ित रहता है। यदि चंद्र से छठे, आठबें-अथवा बारहवें भाव में सूर्य, शनि, मंगल हों तो व्यक्ति शैशवकाल में अधिक कष्ट पाता है तथा माता-पिता के लिए भी कष्टकारक होता है। भयंकर व्याधियां उसे प्रताड़ित करती हैं। जल में डूबकर मृत्यु, जलोदर रोग अथवा अल्पायु की सम्भावना रहती हे। उच्च राशि अथवा स्वराशि का चंद्र हो तो विवाहोपरान्त लाभ मिलता है। वायु तत्त्वीय राशियों में चंद्र हो तो विरासत में धन मिलता है। पत्नी धनी कुल की होती है लेकिन यदा-कदा कलहकारक बनती है। ऐसा व्यक्ति देव उपासक, वेदान्त के रहस्य का ज्ञाता अथवा योगाभ्यासी होता है।
अष्टम भाष में चंद्र कौ उपस्थिति से व्यक्ति ईर्ष्यलु स्वभाव का, व्यवसाय से घनालाभ करने वाला, वाचाल, स्वाभिमानी, व्यसनी, कटुभाषी, अभिमानी, क्रोधी, अधिकारी, भ्रात्‌-विरोधी, संकोची, दुर्बल शरीर का तथा मित्रों द्वारा बहिष्कृत होता है। शत्रुओं द्वारा उसे हानि पहुंचने की पूरी संभावना रहती है। विद्या तथा संतान-सुख होते हुए भी वो रिपुभय से चिंतित रहता है। शिक्षा ग्रहणकर आत्मनिर्भर बनना उसके लिए बहुत आवश्यक होगा। वो पारिवारिक आचार-व्यवहार में अनुकूल बरिवर्तन का आकांक्षी होता है। इस भाव में चंद्र की उपस्थिति अनेक प्रकार की शारीरिक व्याधियां भी उत्पन्न करती है। उसका बाल्यकाल अनेक प्रकार के रोगों से कष्टकारी रहता है। उसे नेत्र, पित्त तथा प्रमेह-संबंधी रोग होते हैं। यदि अष्टम भाव में चंद्र स्वक्षेत्री अथवा मित्रराशि में हो तो व्यक्ति को श्वास की तकलीफ होती है। इसी प्रकार यदि-चंद्र इसी भाव में गुरु के साथ युति कर रहा हो तो जातक को क्षयरोग होता है। यदि चंद्र अकेला हो अथवा किसी ग्रह के साथ युति करते हुए विद्यमान हो तो व्यक्ति के लिए अशुभ फलदायी सिद्ध होता है। ऐसा व्यक्ति सदा किसी-न-किसी रोग से ग्रस्त रहता है। 

    राशिगत फल

    1. मेष मेष राशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक के शत्रु अधिकरहते हैं। पत्ली सुंदर मिलती है लेकिन पत्नी की खूबसूरती ही दुख का कारणबन सकती हैं।

    2. वृषभ वृषभ राशि का चंद्र अष्टमस्थ होने पर जातक की आर्थिकहालत साधारण रहती है। जातक असत्यभाषी, कपटी, माता के लिए कष्टकारकरहता है। उसमें चोरी करना एवं अन्य दुर्गुण भी होते हैं।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का चंद्र अष्टम स्थान में होने पर जातक में पुरुषत्व की कमी रहती है। उसके प्रत्येक कार्य में बाधा रहती है। जातक कुलपरंपरा एवं सामाजिक रूढ़ियों को तोड़नेवाला होता है। वह दुर्गुणों से युक्त, अविश्वसनीय एवं दुखी रहता है। चंद्र की दशा-अंतर्दशा शुभ फलदायी होती है।

    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र अष्टम में हो तो जातक कुलश्रेष्ठ, मधुरभाषी परंतु मन से कटु एवं दुर्व्यसनी होता है। नौकरी की अपेक्षा व्यापार में अधिक लाभ कमाता है। उसकी पत्नी का चरित्र संशयास्पद रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक अतिकामातुर रहता है। उसकी वासनापूर्ति पत्नी से पूर्ण नहीं होती। वैवाहिक जीवन मे सुख-संतोष नहीं रहता। पति-पत्नी के विचारों में मतभिन्नता होती है। इसी कारण पत्नी का परपुरुष से या पति का परस्त्री से लगाव रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक हिंसक, विद्वानों का विरोधी एवं कामातुर रहता है। उसके शत्रु बहुत होते हैं। सजा भोगनी पड़ती है। संग्रहणी विकार से ग्रस्त रहता है। परस्त्री से संबंध रह सकता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक के शरीर में कोई दोष अवश्य रहता है। जातक कठोरभाषी, क्रोधी और पेट की बीमारी से ग्रस्त रहता है। भाइयों तथा पुत्रों के सुख में न्यूनता रहती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक अपने कर्मकौशल एवं स्वपरिश्रम से जीवन में प्रगति करता है। जीवन संघर्षमय रहता है। उसे माता-पिता, वाहन, पशु एवं पैतृक संपत्ति का सुख कम प्राप्त होता है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र अष्टम स्थान में होने पर जातक बाल्यारिष्टकारक रहता है। हाथ में कोई विकार होता है। बंधु सुख कम रहता है। ऐसा जातक योग्य मार्गदर्शन के अभाव में चोरी, व्यभिचारी आदि दुष्प्वृत्तियों का शिकार होकर सजा भोगता है।

    10. मकरमकर राशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक अपने पिता का बड़ा पुत्र होता है। कदाचित उसका बड़ा भाई हो तो उसका सुख उसे प्राप्त नहीं होता। वैवाहिक जीवन दुख भरा रहता है। वह पुरुषार्थी एवं संपन्न अवश्य रहता है। जातक को भूमि में गड़ा धन आकस्मिक रूप से प्राप्त होता है। झगड़ालू स्वभाव का होता है। आत्मघात की प्रवृत्ति रहती है।

    11. कुंभ-कुंभ रशि का चंद्र अष्टम स्थान में हो तो जातक को बाल्यारिष्ट होने का डर रहता है। जातक कंजूस रहता है, धन अच्छा कमाता है, मानसिक एवं गुप्तांग के विकारों से ग्रस्त रहता है। वह शिल्पशास्त्र में निपुण रहता है। जुआ, चोरी. एवं व्यभिचार की ओर प्रवृत्त रहता है। आर्थिक बातों के लिए
विश्वसनीयता इसके पास नहीं होती।

12. मीन मीन राशि का चंद्र अष्टम स्थान में होने पर जातक कृपण होताहै। अष्टमस्थ चंद्र के विशेष फल उसे प्राप्त नहीं होते।
8) अष्ठम् भाव -
  1. मदिरा का सेवन न करें। 
2. माता के पैर छुये। 
3. मोती की अंगुठीधारण करें। 
4. शमशान से जल बोतल में लाये फिर सोने के स्थार पररखें।
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नवम स्थान (भाग्य भाव)     नवम स्थान में चन्द्र

    गर्ग-मध्यभाग्यं भवेद् धर्मे पितृपक्षपरायणः। धर्मे पूर्णनिशानाथेक्षीणे सर्व विनाशयेत्। नवम स्थान में पूर्ण चन्द्र हो तो मध्यम आयु मेंभाग्योदय होता है। किन्तु यह चन्द्र क्षीण हो तो सर्वनाश होता है।होराप्रदीपकार-कान्ताभोगी शशांकेन। यह अनेक स्त्रियों कापति होता है।

    जयदेव कवि - जनप्रियः। सात्मजबन्धुधीरः सुधर्म धड्रिव्य-सुतत्रिकोणे॥ यह लोकप्रिय होता है। पुत्रों और बन्धुओं से युक्त,धर्मशाली, धार्मिक, बुद्धिमान और धनवान होता है।

    हिल्लाजातक - नवमस्तीर्थयात्रां च विशद्ूर्षे च निश्चितम्।नवम के चन्द्र से २० वें वर्ष में तीर्थयात्रा होती है।

    बृहधवनजातक-चन्द्रे चतुर्विशतिः फलमिद लाभोदये संस्मृ-तम्। इस चन्द्र के फलस्वरूप २४वें वर्ष में लाभ होता है।
    यबनमत - यह व्यक्ति तेजस्वी, धनवान, ईश्वरभक्त और

    प्रवासी होता है।

    पाश्चात्यमत - यह जलमार्ग से प्रवास करता है। धर्म औरशास्त्रों का प्रेमी, अध्यात्मज्ञानी, योगी, कल्पना शक्ति से युक्त,स्थिरचित्त और अभिमानी होता है।

    पत्नी के सम्बन्धियों से और अपने आप्तजनों से इसे अच्छासाहाय मिलता है। किन्तु यह चन्द्र बलवान और शुभ संस्कारों से युक्तहोना चाहिए। इस पुरुष को कानून, हिस्सेदारी, शास्त्रीय ज्ञान औरजलपर्यटन से अच्छा लाभ होता है।

    उपर जो मत दिए हैं इनमें गर्ग और जयदेव के मत पुरुष राशियों मेंखास कर मेष, सिह और धनु में अच्छे मिलते हैं। मिथुन, तुला और कुंभ मेंअनुभव कुछ कम आता है। होरादीप और हिल्लाजातक के मत स्त्रीराशियों में अनुभव में आते हैं। बृहद्यवनजातक और पाश्चात्य मतों काअनुभव पुरुष राशियों में आता हैं।
नवम भाव में चन्द्रमा

    जातक प्रसन्न और उन्नतिगामी, स्त्रियों को प्रसन्न करने में सक्षमहोगा। यदि चन्द्रमा बलहीन या नीचस्थ है तो जातक दरिद्र, धर्मद्रोही,अदक्ष (अकुशल) तथा कुटिल हृदय वाला होगा।
    -मानसागरी
    नवम भाव में चन्द्रमा वाला जातक धनाड्य, गुणी और संतानवानहोगा।

    -फलदीपिका
    जातक दिव्य और पैतृक कमों के प्रति निष्ठावान, प्रसन्नता, युक्त,धनी, बुद्धिमान, पुत्रवान और स्त्रियों के प्रति आसक्त होगा।

    -सारावली
    जातक अत्यन्त विद्वान व दानशील होगा। वह धर्माथ काम करनेवाला, तालाब, बावड़ी और रैन बसेरे, पशुओं आदि के आश्रय बनवानेवाला होगा। संतान से संतुष्ट होगा। यदि चन्द्रमा पाप प्रभाव में है तोजातक भाग्यहीन या जल्दी ही माता-पिता की छाया से वंचित हो जाता है।
जातक विख्यात, सुशिक्षित, विद्वान और संपन्न होगा। वह धर्मार्थसंस्थाओं की स्थापना करने वाला, कल्पनाओं में विचरने वाला, अध्ययनशील,चेतन, आस्तिक, धार्मिक, समर्पित, सफल और प्रसिद्ध होगा। जातकयात्राओं का शौकीन और अचल संपत्ति वाला होगा।

    -डॉ रामन

    टिप्पणी

    यदि चन्द्रमा बलवान है तो जातक मध्याधु में भाग्यशाली और पितृभक्त होगा। यदि चन्द्रमा बलहीन है तो जातक को कठिन स्थितियों कासामना करना पड़ता है। महिला जातकों के लिए नवमभाव का चन्द्रमाजातक को धन स्वर्णादि प्रचुर मात्रा में प्रदान करता है और वह गुणवतीतथा सत्यनिष्ठ होती है। वह तीन भाषाओं में दक्ष होती है।

    चन्द्रमा भचक्र का चतुर्थेश है और भचक्र का नवमभाव गुरु केआधिपत्य में है। अतः वहाँ चन्द्रमा की स्थिति चन्द्र-गुरु का संबंधदर्शाती है। माता कारक चन्द्रमा माँ के आशीर्वाद और देवी पार्वती केअनुग्रह को दर्शाता है। बलवान चन्द्रमा भाग्य, प्रसिद्धी, सफलता,सम्पन्नतादायक होती है।

    हमारा अनुभव - इस स्थान में पुरुष राशि में चन्द्र हो तो उसव्यक्ति को एक, दो या बहुत छोटे भाई होते हैं किन्तु बड़ा भाई नही होता।नही होते। छोटे बहिनें होती हैं। इस स्थान का चचन्द्र दुषित हो अथवा स्त्रीहुआ तो वह पृथक रहता है। इसे छोटी बहिन नही होती। स्त्री राशि के चन्द्रका फल इसके विपरीत होता है। इसे बडी बहिन नही होती और छोटे भाईराशि में हो तो पुत्र संतान बहुत देर से-४८ वें वर्ष के करीब होती है।कदाचित पुत्र होते ही नही। इस स्थान में सिंह राशि का चन्द्र हो तो मृत्यु केसमय भाग्योदय की स्थिती होती है। धनु राशि का चन्द्र हो तो कुल की

    किर्ती बढ़ती है। मेष राशि का चन्द्र हो तो भाग्योदय होने में मुष्किलें आती हैं। ये लोग सार्वजनिक कार्य में भाग लेते है और लोकप्रिय भी होते है।किन्तु इन्हे अधिकारपद प्राप्त नही होता। अधिकार प्राप्त करने की इच्छाबहुत तीव्र होती है। कर्क, वृश्चिक, मीन और मेष, सिंह तथा धनु का चन्द्रहो तो वे लोग लेखक, प्रकाशक अथवा मुद्रक होते हैं। इन्हें पुरी शिक्षाप्राप्त होती है। समाजशास्त्र और तत्त्वज्ञान इन विषयों के अध्यापक का पदमिल सकता हैं। वृषभ, कन्या और मकर का चन्द्र हो तो शिक्षा अधुरी रहतीहै। मिथुन, तुला और कुम्भ के चन्द्र से शिक्षा काफी रुकावटों के बाद पूरी होती है।


    नवम स्थान में स्थित चंद्र प्रायः अच्छे फल देता है। ऐसा जातक सामाजिक कार्यकर्ता, व्यवहारकुशल, जनप्रिय, समाज में प्रतिष्ठित, भ्रमणप्रिय एवं कामातुर रहता है। देश-विदेश में भ्रमण के मौके आते रहते हैं।  ऐसे जातक का भाग्योदय 24वें वर्ष में होता है। किंतु अच्छी प्रगति विलंब से यानी मध्यम आयु में होती है। ऐसा जातक प्रायः विचारवान एवं सदाचारीरहता है। 20वें वर्ष में तीर्थयात्रा का योग बनता है।
नवम भाव--लग्नकुंडली में नौवें भाव में चन्द्र हो तो जातक बहुत बुद्धिमान,प्रसन्न, सन्तानसुख पाने वाला तथा विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण रग्खने वालाहोता है। (चन्द्रमा शुक्ल पक्षीय हो तो जातक का भाग्य भी उत्तम होता है। किन्तुमेष राशि का चन्द्र हो तो भाग्योन्नति में बाधा डालता है।) तथापि जातक विश्वासपात्रनहीं माना जा सकता (विशेषकर SEX के मामले में)। ऐसा हमारे सुयोग्य आचार्यश्री मदनमोहन कौशिक का मानना है। स्त्री राशि का हो तो पुत्र देर से/बड़ी आयु मेंही प्राप्त होता है। (नवमेश दूषित व निर्बल हो तो पुत्राभाव भी सम्भव है।)
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक समाज में विशेष स्थान प्राप्त करता है।धन-दौलत, संतान आदि सब सुखों से भरा-पूरा होता है। जातक स्वयं विद्वान नभी हो तो भी उसकी शिक्षा का लाभ सभी को मिलता है तथा स्वयं वह भी लाभान्वितहोता है। जातक प्रायः दुखियों की सहायता करने का स्वभाव भी रखता है।
नवम भाव: नवमस्थ चंद्र के शुभाशुभ दोनों प्रकार के फल मिलते हैं। नवम भाव का चंद्र पाप प्रभाव में अथवा क्षीण हो तो प्रोढावस्था में संतान होने की सम्भावना रहती है। स्त्री राशि का चंद्र हो तो पुत्र संतान की प्राप्ति प्रौढ़्ावस्था में होती है। पुत्रहीन होने की सम्भावना अधिक होती हे। पृथ्वी तत्त्वीय राशि का चंद्र जातक को पूर्ण शिक्षित नहीं होने देता। वायु राशि का चंद्र हो तो शिक्षा पूर्ण तो हो जाती है परन्तु अनेक विघ्न-बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है। पुरुष राशियों में चंद्र हो तो बडे भाई ओर छोटी बहन का सुख नहीं मिलता। स्त्री राशि में इसके विपरीत फल मिलते हैं। धनु राशि का चंद्र नवमस्थ हो तो जातक कुलदीपक होता है। मेष राशि का चंद्र हो तो भाग्योदय बड़ी कठिनाई से हो पाता है। सिंह राशि में हो तो अंतिम समय में (मृत्यु से कुछ पहले) भाग्योदय होता है। जल अथवा अग्नि राशि का चंद्र हो तो व्यक्ति लेखन, मुद्रण अथवा प्रकाशन के कार्य से जीविकोपार्जन करता है।
नवम भाव का फल | इस भाव में चंद्र होने पर.व्यक्ति सुंदर स्वरूप का तथा उत्तम संतान से युक्त 

होता है। उसका वैवाहिक जीवन सुखद होता है। उसे जीवन में अनेक बार तीर्थ यात्राएं करने का सुअवसर मिलता है। उसका व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली होता है। उसका संपूर्ण जीवन भोग-विलास, सुख-ऐश्वर्य तथा समृद्धिपूर्वक बीतता है। उसे जीवन के सभी सुख प्राप्त होते हैं। वो धर्मात्मा, प्रवासप्रिय, विद्वान, साहसी, संपत्तिवान तथा उद्यमी होता है, किन्तु वो जितना परिश्रम करता है, उतना फल उसे नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त वो स्त्री के लिए चिंतित, संतान से अत्यधिक मोह, उच्च सोसाईटी में अच्छा दखल, बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न होता है और कम आयु में ही अधिक आयु का दिखता है। नीरोग, दीर्घायु, सौभाग्यशाली तथा धार्मिक प्रवृत्ति का होता है, किन्तु यदि चंद्र नवम भाव में नीच राशि का होकर विद्यमान है, तो व्यक्ति पापी स्वभाव का तथा दुर्बल शरीर वाला होगा। वो धनहीन, ऐश्वर्यहीन, कुटिल पत्नी युक्त, मूर्ख तथा उद्योगहीन होता है। उसे माता-पिता का सुख भी नहीं मिलता है। 

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का चंद्र नवम स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी, स्वारथी,सम्माननीय किंतु समाज के लिए आदर की भावना न रखनेवाला, अपने नामके लिए काफी धन खर्च करनेवाला होता है। नाम के लिए ही दानधर्म भीकरता है। भाई-बहनों के साथ जातक के मध्यम संबंध रहते हैं।

    2. वृषभ वृषभ राशि का चंद्र नवम स्थान में होने पर जातक विद्वान,सदाचारी, संपन्न एवं यशस्वी रहता है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का चंद्र नवम स्थान होने पर जातक आस्तिक, दानी,यशस्वी, भाग्यवान, सदाचारी, पारिवारिक सुख-संतोष से परिपूर्ण रहता है।

    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र नवम स्थान में होने पर जातक स्वच्छ विचारोंका, यशस्वी, भाग्यवान एवं पारिवारिक सुख भोगनेवाला रहता है।

5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र नवम स्थान में होने से जातक कोअस्वाभाविक फल प्राप्त होते हैं। ऐसा जातक लोभी, स्वार्थी एवं सदाचारहीनरहता है। शरीर में कोई विकार रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र नवम स्थान में हो तो जातक आलसी एवंअधिक कामातुर रहता है, व्यापार में धन कमाता है। शिल्पशास्त्र में उसकोरुचि रहती है।

    7. तुला तुला राशि का चंद्र नवम स्थान में हो तो जातक की आर्थिक स्थितिअस्थिर रहती है। व्यापार में हानि-लाभ के अनेक अवसर आते हैं। जातक कोलोकप्रियता कम प्राप्त होती है, शत्रु अधिक होते हैं, झूठे लांछन लगते हैं। उसेकोर्ट-कचहरी में जाना पड़ता है, पैरों में कोई दोष रहता है। लकड़ी, पत्थर याउससे संबंधित वस्तुओं के व्यापार में जातक को लाभ होता है।

    8. वृश्चिकवृश्चिक राशि का चंद्र नवम स्थान में हो तो जातक विद्वान,प्रतिष्ठित, संपन्न एवं सुखी रहता है। उसकी लेखन, संगीत, नाट्यकला में रुचि     रहती है। जातक तर्क-वितर्क में चतुर तथा सुधारक होता है तथा साहित्यक्षेत्रमें अच्छा यश कमाता है। मरणोपरांत भी जातक का नाम रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र नवम स्थान में हो तो जातक की आंखें सुंदरहोती हैं। वह प्रायः परदेश में उन्नति करता है और प्रतिष्ठित एवं संपन्न घरानेमें जन्म लेता है। जातक सदाचारी, भाग्यवान, उद्यमी, जनप्रिय एवं सुखी रहताहै। स्वपरिश्रम से प्रगति करता है।

    10. मकर मकर राशि का चंद्र नवम स्थान में होने पर जातक काभाग्योदय स्त्रियों के कारण होता है। पत्नी के साथ मतभिन्नता रहती है। पिताका चरित्र संशयास्पद रहता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का चंद्र नवम स्थान में हो तो जातक बचपन में बीमारतदोपरांत स्वस्थ, सुखी, विद्वान, शीलवान, उदार, दानी-धर्मी बनता है।

    12. मीन-मीन राशि का चंद्र नवम स्थान में होने पर जातक सुंदर, निरोगी,संपन्न, सुखी, विद्वान, धर्मात्मा एवं जनप्रिय रहता है।

9) नवम् भाव -उपाय
1. चांदी ब्राहमण को भेंट स्वरूप देवे। 
2. पूर्णिमा को स्नान करे तब गायका दूध पानी में डाले।
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दशम स्थान (कर्म भाव)दशम स्थान में चन्द्र

    जीवनाथ-पूर्वापत्ये प्रभवति सुखं नैव सततं। प्रथम संतान कासुख कायम नही रहता।
 क-मिहास्त्रि खैन्दौ॥ लक्ष्मी, किर्ति, अंगीकृत कार्य में सफलता, राजमान्यताऔर शौर्य प्राप्त होता है।

    जागेश्वर -सचन्द्रे च वैश्यस्य वृत्तिः प्रकल्प्या। इस स्थान मेंचनद्र हो तो वैशय वृत्तसे वयापार में धन प्राप्त होता है।

    नारायणभट्ट - पुराजातके सौख्यमल्पं करोति। पहली सन्तानका सौख्य कम मिलता है।

    बृहद्यवनजातक - चंचललक्ष्मीः। इससे सम्पत्ति में चढ़ावउतार होते हैं। स्थिरता नही रहती।

    हिल्लाजातक-दशमो लाभद चन्द्रो वर्षे रामाधिकेऽपिच। इसचन्द्र से २४ वे वर्ष में लाभ होता है।
    प्राप्त होता है।बृहयौवन- चन्द्रस्त्रिवेदधनकृत। इस चन्द्र से ४३ वें वर्ष में धन

    यवनमत - यह पितृभक्त और कुटुंबवत्सल होता है। यहधनवान, विद्वान, चतुर, संतोषी और शान्त होता है।

    पाश्चात्य मत - इसे विजय और संपत्त प्राप्त होती है। ऊंचेस्त्रियों से लाभ होता है। लोकोपयोगी वस्तुओं के व्यापार से लाभ होता है।लोकप्रियता मिलती है। किन्तु यदि यह चन्द्र नीच राशि में हो तो अपमानऔर अपकीर्ति होती है। यह चन्द्र स्थिर राशि में हो तो दृढ स्वभाव होता है।वही द्विस्वभाव राशि में हों तो अल्प भाग्य का होता है। चर राशि में यहचन्द्रहो तो व्यापार में अस्थिरता होती है। इसके साथ मंगल हो तो बड़ा नुकसानहोता है और शनि हो तो व्यवसाय में कठिनाइयां आती है।

    मेरे विचार - जीवनाथ ने जो फल कहा है वह संभव नही।क्योंकि दशमस्थान संतति का स्थान नही है। पंचम स्थान से यह छठवांस्थान है अतः पिता और पुत्र के संबंध अच्छे नही होते यह फल कहा जासकेगा। पंचम से आठवां स्थान व्ययस्थान होता है। चंद्र यदि इस व्ययस्थानका अधिपति हो और दशम में हो तो प्रथम पुत्र की मृत्यु होती है ऐसा फलकहना होगा। जयदेव-का मत पुरुष राशियों के लिए योग्य है।चन्द्रवैश्यमाना गया है। अनुभव से भी यही प्रतीत होता है। इस स्थान में चन्द्र हो तोव्यापारी वृत्ति होती है। नारयणभट्ट का मत योग्य नही है। हिल्लाजातक कामत योग्य है क्योंकि २४ वां वर्ष चन्द्र का स्वाभाविक वर्ष है।बृहद्यवनजातक के वर्षों का अनुभव देखना चाहिए। यवनमत का अनुभवपुरुष राशियों में आता है। स्त्री राशियों में कम अनुभव आता हैं।पाश्चात्यमत में नीच राशि के चन्द्र का फल अपमान और अपकीर्ति कहा गया है यह योग्य प्रतीत नही होता। दशम में वृश्चिक राशि मेंचन्द्र हते हुाएकुछ लोग उत्तम डॉक्टर हुए हैं। डॉक्टर के व्यवसाय को छोड़कर अन्यव्यवसायों में अवश्य मुष्किले आई हैं। यह चंद्र चर राशि में हो तो व्यापार मेंअस्थिरता होती है यह फल योग्य है। पाश्चिमात्यों के अन्य फल पुरुष राशियों के हैं।
जातक के पास प्रचुर संपन्नता, बहुत पुत्र और अच्छी पत्नी होगी।यदि चन्द्रमा शत्रक्षेत्री या अशुभ राशि में है तो जातक कफ (कास) रोग,कमजोर देह, माता से संपत्ति प्राप्त करने वाला, प्रयासरहित, निष्क्रिय,आवारा और सुस्त होगा।

    -मानसागरी
    व्यक्ति शत्रुओं पर विजयी होगा, अपने कार्य में सफल, पुण्य कर्म करने वाला और सदा अच्छे लोगो की सहायता करने वाला होगा।

    -फलदीपिका

    जातक क्लेश से मुक्त, पवित्र, धनाद्य, बलवान, योद्धा ओर दानीहोगा। वह कर्तव्यनिष्ठ ओर सुसंपन्न भी होगा।

    -सारावली

    जातक उच्च शैक्षिक योग्यता प्राप्त, कुशाग्रबुद्ध, पुण्यकर्ता, प्रसिद्ध,और दयालु होगा। यदि चन्द्रमा पापाक्रान्त है तो जातक 27 वें वर्ष कीआयु में विधवा से अवैध संबंधो वाला होगा।

    -भृगु

    जातक चिरंजीवी, संपन्न, आरामपसंद, सफल, लोकप्रिय और बहादुरहोगा। वह धर्मार्थ संस्था का ट्रस्टी धार्मिक कार्यरत, कामुक, सुलझे हुएविचारो वाला, परस्त्री गामी और युक्ति सम्पन्न होगा।

    -डॉ रामन

    दशम भाव मे बलवान चन्द्रमा बहुत अच्छा होता है। ‘जातक सागर'के अनुसार-पापाक्रान्त या निर्बल चन्द्रमा दशमस्थ होने के कारण माताकी हानि होती हैं और ‘जागेश्वर' के अनुसार-जातक को वेश्यालयों सेलाभ होता है।टिप्पणी

    महिला जातको के बारे में दशमस्थ चन्द्रमा को भाग्यशाली औरप्रसन्नतादायक बताया जाता है। यह चन्द्रमा जातक को पवित्र गंगा स्नानका सुअवसर प्रदान करता है। दशमस्थ चन्द्रमा शुरु किए हुए काम कोसफलता पूर्वक सम्पन्न करना दिखता है। यह स्थिति जातक में दूसरों केलिए अच्छा काम करने की प्रवृत्ति दिखाता है, दयाभावना और माँ से धनवैभव प्राप्त करने वाली स्थिति होती है। यह स्थिति व्यवसाय में अनेकबदलाव और विदेश यात्रा की दयोतक है। जातक संपन्न, पवित्र, बलवान,क्रूर, उदार, दानी होगी। वह धन वैभव अच्छे वस्त्राभूषण, दाम्पत्य सुख,विलासी व कला के प्रति समर्पित होगी। उसे मान प्रतिष्ठा अच्छी मिलेगी।

    मेरा अनुभव - इस स्थान में मेष, कर्क, तुला अथवा मकरराशि का चन्द्र हो तो बचपन में ही माता अथवा पिता का वियोग होता है।ग्रामपंचायत, म्युनिसिपालिटी आदिसार्वजनिक संस्थाओं का कारक यहींस्थान है। अतः इसमेंचन्द्र हो तो चुनाव में यश मिलता है और नेतृत्व प्रप्तहोता है। चन्द्र से सम्बन्ध व्यवसाय सप्तम स्थान के विवरण में दिए गये हैं।उन्हीं का यहां भी विचार करना चाहिए। इस स्थान में वृषभ, कन्या अथवावृश्चिक में चन्द्र हो तो पिता का किया हुआ कर्ज चुकाना होता है। आयु के२८वें वर्ष से कुछ स्थिसता प्राप्त होती है। यही चंद्र मेष, कर्क अथवा मकरमें हो तो आयुभर स्थिरता बहुत कम रहती है। कई व्यवसाय में कोई कारणन होते हुए अपयश प्राप्त होता है। नौकरी में हमेशा परिवर्तन होते रहता है।इस स्थान में वृश्चिक को छोड़कर अन्य किसी भी राशि में चन्द्र ो तो माताअथवा पिता का सुख नष्ट होता है और इन दोनो में जो भी रहते हैं उनसे भीअच्छे सम्बन्ध नही रह सकते।
दशम भाव-हमारे सुयोग्य आचार्य कौशिक (मदन मोहन) जी के अनुसारदशम भाव का चन्द्र जातक को पवित्र विचारों वाला, साहसी, विशेष धनी तथापरमार्थ में धन लगाने वाला बनाता है।शास्त्रीय मत से दसवें चन्द्र का जातक धर्म-कर्म करने वाला, बन्धुओ द्वारा सुख पाने घाला, राजा द्वार धन प्रास करने बालायुवा स्त्ियों के साध हास्यालाप करने घाला होता है। किन्तु उसे प्रथम पुत्र कीअल्पसुख ही प्रास होता है (प्रायः प्रधम पुत्र शीष्र मर जाता है अधवा उससे बिधोगहो जाता है)।
    लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक का धर्मस्थली (मन्दिर, गुरुद्धारे,मस्जिद, चर्च आदि) पर जाना उसको शुभ फल प्रदान करता है, परन्तु रात्रि केसमय ऐसे जातक को दूध पीना अशुभ फल देता है। (पीना ही पड़़े तो केसर आदिडालकर उसका रंग बददल लेना चाहिए।) दशमस्थ चन्द्र जातक की शिक्षा मेंअड़़चनें भी पैदा करता है।
    दशमस्थ चंद्र यदि चर राशि का हो तो जातक को व्यापार में अस्थिरता प्रदानकरता है। यदि नौकरी हो तो विभाग बदलते रहना/स्थानांतरण कराता है। स्थिरराशि हो तो जातक का सम्पूर्ण जीवन पूर्वजों का ऋण चुकाने में ही बीत जाता है।द्विस्वभाव राशि में भाग्य की दृष्टि से ठीक नहीं होता (चन्द्रमा शुक्ल पक्ष का है याकृष्ण पक्ष का है-यह भी अवश्य विचारना चाहिए। 

दशम स्थान में स्थित चंद्र जीवनयापन के विषय में अच्छे फल देता है। ऐसाजातक सदाचारी, धार्मिक, सुखी तथा संपन्न जीवन जीता है। उसे शासन में भीसम्मान प्राप्त होता है। व्यापार में अच्छी तरक्की होती है। नौकरी या व्यवसायबारबार बदलने की आदत होती है। जातक को प्रथम संतान से सुख प्राप्त नहींहोता। उसके बाद की संतान से सुख मिलता है। पारिवारिक एवं वैवाहिक जीवनसुखी रहता है। जातक का भाग्योदय 24वें वर्ष में होता है और 43वां वर्ष महत्त्वपूर्णरहता है। आर्थिक स्थिति में काफी उतार-चढ़ाव होते हैं।

    जातक माता-पिता का भक्त एवं परिवार का आधार रहता है। चंद्र के साथमंगल या शनि दशम स्थान में हो तो फल अच्छे नहीं मिलते।

    मेष, कर्क, तुला या मकर राशि में से किसी भी राशि में चंद्र दशमस्थ होतो नौकरी या व्यवसाय में परिवर्तन होते हैं। अस्थिरता के कारण प्रगति रुकजाती है लेकिन सार्वजनिक जीवन सफल रहता है।
दशम भाव: नीचस्थ चंद्र को छोड़कर चंद्र अन्य किसी भी राशि के दशम भाव में स्थित हो तो शीघ्र ही जातक को माता-पिता के सुख से हीन कर देता है। इसमें दो हेतु हैं-माता-पिता की मृत्यु हो जाना अथवा जीवित रहे तो जातक के साथ मनोमालिन्य बने रहना। चर राशि का चंद्र दशम भाव में हो तो कार्य-व्यवसाय में परिबर्तन होते रहते हैं। वृष, कन्या अथवा वृश्चिक का चंद्र दशमस्थ हो तो जातक पिता के द्वारा लिए ऋण को चुकाता है। फलत: प्रौढावस्था तक धनाभाव बना रहता है। मेष, कर्क, मकर, तुला का चंद्र हो तो शैशवकाल में ही जातक मातृ-पितृविहीन हो जाता है। लेकिन बड़े होकर ऐसे जातक राजनीति में प्रवेश कर नेता बन जाते हैं। मंगल या शनि से युक्त चंद्र दशमस्थ हो तो व्यवसाय में सफलता नहीं मिलती। नीच राशि का चंद्र हो तो समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता, शुभ प्रभाव में बली चंद्र दशमस्थ हो तो धनी कुल की महिलाओं से लाभ मिलता है। यदि ऐसा व्यक्ति नित्य कार्य में आने वाली वस्तुओं का व्यापार करे तो लाभ उठा सकता है। स्थिर राशि का चंद्र हो तो जातक दृढ़निश्चयी होता है। 
जिसकी जन्मकूंडली के दशम स्थान पर चंद्र रहता है, उस व्यक्ति को अपने बच्चों, पत्नी तथा कूटुंब से विशेष प्रेष ज लगाव रहता है। धर्म-कार्यों में उसका विशेष रुझान होता है। कुलदीपक, प्रसन्‍नचित्त, दीर्घायु, दयालु व्यवसाय करने वाला, सुखी तथा जीवन में यश कमाने वाला होता है। पहली संतान से उसे कष्ट पहुंचता है। मक्कार लोगों के रवैये से वो दु:खी होता है, यद्यपि स्वर्य बहुत चतुर होता है। समाजसेवी संगठनों से उसका संपर्क रहता हैं पारिवारिक जीवन बचपन से हो उसके अनुकूल होता है। उसका व्यक्तित्व बहुत आकर्षक होता है तथा अकेलापन उसे प्रिय होता है। 

दशम स्थान में पूर्ण चंद्र अथवा उच्च राशिस्थ चंद्र होने पर व्यक्ति नीरोग, स्वस्थ तथा प्रसन्‍नचित्त स्वभाव का होता है। बाल्यावस्था में उसे कुछ शारीरिक कष्ट होते हैं, किन्तु युवावस्था पूर्ण सुख से, ऐश्वर्य तथा नीरोगमय रहती है। यदि दशम स्थान में (भाव में) चंद्र पापग्रह अथवा शत्ुक्षेत्री अथवा नीच राशिस्थ होकर विद्यमान है, तो व्यक्ति टुर्बल शरीर वाला तथा पापी स्वभाव का होता है। उसे अनेक : प्रकार के विकार सताते रहते हैं।


    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्न,आस्तिक, साहित्य एवं काव्य प्रेमी, विद्वान एवं सुशील रहता है। माता-पिताएवं भाई-बहनों से अच्छा सुख मिलता है।

    2. वृषभ वृषभ राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो चंद्र के शुभ फलकम मिलते हैं। संतान सुख में न्यूनता रहती है। माता से अनबन रहती है। जातकदूसरों के पैसों से कार्य करता है लेकिन स्वतंत्र बुद्धि के अभाव में प्रगति नहींहोती।. नौकरी करनी पड़ती है, कंजूस रहता हैl

    3. मिथुन मिथुन राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सदाचारी, धार्मिक प्रवृत्ति का, चतुर एवं सुखी रहता है। पिता की अपेक्षा माता से अधिक लगाव रहता है। जातक दीर्घायु रहता है।

    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र दशम स्थान में होने पर जातक उद्यमी, संपन्न,सदाचारी, धार्मिक, विद्वान एवं सुखी होता है। माता के लिए सुखदायी रहताहै। ननिहाल के लोगों से मधुर संबंध रहते हैं। उनसे उसे लाभ भी होता है।सरकारी कर्मचारी होता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक समाज मेंप्रतिष्ठित रहता है। वह मंत्री बनता है या अधिकार संपन्न रहता है। जातकधैर्यवान, धर्मात्मा, मातृभक्त एवं शांत स्वभावी होता है। अपने सत्कारयों केकारण मरणोत्तर भी उसका नाम रहता है।

    6. कन्याकन्या राशि का चंद्र दशम स्थान में होने पर जातक डरपोक,चुगलखोर, दुष्ट, कुसंगति में रहनेवाला, आचारहीन, नीच कृत्य करनेवाला होताहै। माता-पिता एवं भाई-बहनों का उसे पर्याप्त सुख नहीं मिलता। आचार्यगर्ग के अनुसार माता का चरित्र संशयास्पद रहता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र दशम स्थान में होने पर जातक धार्मिक,सदाचारी किंतु व्यवहारशून्य रहता है। कटुभाषी एवं टीका-टिप्पणी करता रहता है। जीवनयापन का मार्ग निर्बाध नहीं रहता।, व्यापार में लाभ होता है, फिरभी उसमें चढ़ाव-उतार रहते हैं। पत्नी पतिब्रता रहती है। श्वसुर पक्ष के लोगोंसे अधिक प्रेम रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक धैर्यवान,कर्तव्यनिष्ठ एवं वाचाल होता है। उसके शत्रु बहुत होते हैं। इसी कारण जीवनयापन में मुश्किलें खड़ी होती हैं। माता-पिता के सुख में कमी रहती है। पिता से मतभिन्नता रहती है। संतान सुख सामान्य प्राप्त होता है। दत्तक पुत्रकी संभावना रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक कुलश्रेष्ठ होता है। साथ ही सुखी, संपन्न एवं सरकारी कर्मचारी रहता है।है। जातक संपन्न, धार्मिक एवं सरकारी कर्मचारी रहता है। पत्नी का स्वभावतेज रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र दशम स्थान में होने पर जातक की आंखें सुंदर रहती हैं। कन्या संतान अधिक रहती है। पारिवारिक सुख सामान्य रहता

    11. कुंभ-कुंभ राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक माता-पिता की देखभाल करनेवाला, सदाचारी, संपन्न एवं सरकारी कर्मचारी रहता है। पत्नीका स्वभाव तेज रहता है।

12. मीन-मीन राशि का चंद्र दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,सरकारी कर्मचारी एवं यशस्वी रहता है। पारिवारिक सुख उत्तम रहता है। जातकको पत्नी भी विद्वान एवं अनुकूल मिलती है।
10) दशम् भाव -उपाय
    1. पत्नी को विशेष प्रेम से रखें।
 2. पैतृक सम्पत्ति न बेचे।
 3. शिंव परगाय के दूध से बनी मिठाई भोग लगावें।
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 एकादशा स्थान (लाभ भाव)  एकादश स्थान में चन्द्र

    काशीनाथाचार्य - लाभे चन्द्रे लाभयुतः।। इस स्थान के चन्द्रसे बहुत लाभ होता है। बुद्धि का विकास होता है। ऐश्वर्य, सन्मार्ग परचलना, विनय, प्रताप और भाग्य प्राप्त होता है।
जागेश्वर-भवेन्मायुक्तो धनैर्वाहनैर्वा तथा वस्त्रूप्यादि कन्या

    प्रजा स्यात। दृढा तस्य कीर्तिभवेदू रोगयोगो यदा चन्द्रमा लाभभावंप्रयातः॥| इसे धन, वाहन और मान, उसी प्रकार वस्त्र और चांदी ये प्राप्तहोते हैं। इसे कन्याएं अधिक होती हैं, कीर्ति स्थिर रहती है और कोई रोगहोता है।

    गर्ग - विख्यात गुणवान् प्राज्ञो भोगलक्ष्मीसमविन्तः। लाभस्थानगते चन्द्रे गौरो मानववत्सलः॥ यह विख्यात, गुणवान, बुद्धिमान,लक्ष्मी और भोगोपभोगों से सम्पन्न, गौर वर्ण का और वत्सल स्वभाव काहोता है।

    जयदेवकवि - मित्रार्थयुक् कीर्तिगुणरूपेतो भोगी सुयानोभवभवान्दौ। यह मित्र, धन, कीर्ति, अच्छे गुणो से युक्त और सुंदर वाहनोंका भोग लेता है।

    हिल्लाजातक - एकादशे सप्तविशे राजमान्य चतुष्पदे॥ इसेसत्ताईसवे वर्ष में राजमान्यता प्राप्त होती है तथा जानवरों से लाभ होता है।नारायणभट्ट - प्रतिष्ठाधिकाराम्बराणि। इसे लोगों में मान,

    ऊंचे वस्त्र और अधिकारपद प्राप्त होता है।

    बृहधवनजातक - अमितलाभमिन्दी भूपात्। आयु के १६ वेंवर्ष में राजा से बहुत धन प्राप्त होता है।

    यवनमत - यह धनवान, रूपवान, उदारचित्त, निर्दोष औरमधुर बोलनेवाला होता है।

    पाश्चिमात्य - इसे मित्र बहुत प्राप्र होते हैं। लोकप्रिय होता है।संसार सुख अच्छा मिलता है। सार्वजनिक संस्था में यह नेता होता है।

    मेरे विचार-सभी शास्त्रकारों ने लाभस्थान के चन्द्र के फलअच्छे ही कहे हैं। किन्तु ये सब फल प्रायः पुरूष राशियों में मिलते हैं। सिर्फ जागेश्वर ने रोगबाधा का यह फल दिया है वह स्त्री राशि का है 

मेरा अनुभव - चंद्र एकादश में होते हुवे दिन को जन्म हुवा होतो वह व्यक्ति धनवान, कीर्तिमान, लोकप्रिय, सार्वजनिक कार्य में कुशलहोता है। स्त्री राशि में यह चन्द्र हो तो सार्वजनकि कार्य करते हुए भी पहलाव्यवसाय बना रहता है। पुरूष राशि में यह चन्द्र हो तो व्यकसाय छोड़करसार्वजनिक कार्य होता है। इस चंद्र का विशेष यही है कि ये व्यक्ति कितनेभी श्रीमान हुए तो भी जरूरत के समय सारे ऐश्वर्य का त्याग करने कीइनकी प्रबल इच्छाशक्ति होती है। इन्हें असेब्ली आदि में स्थान प्राप्तहोकर लोकोपयोगी कार्य करने का मौका मिलता है। इस स्थान के चन्द्र केफल स्वरूप पुत्र, भाई अथवा बहिन इनमें से कोई एक त्रासदायी, दुराच्चरणीअथवा निरूपयोगी होता है अथवा उसे शारीरिक व्यंग के कारण साराजीवन घर में ही बिताना पडता है। इस चन्द्र से सन्तति अथवा भाई बहिनेंअधिक नही होती। बहुत हुआ तो चार पांच तक ही उनकी संख्या होती है।
जातक के पास अपार धन दौलत, सुख-सुविधाएँ, नौकर-चाकरऔर अच्छी पत्नी होगी। निर्बल चन्द्रमा नीच या अशुभ राशि या शत्रकषत्रीहोने पर तनाव, रोग और बुरे विचारों वाला बनता है।
    -मानसागरी
    संबद्ध जातक उच्चविचारों व मानसिकता वाला, चिंरजीवी, धनाड्यऔर संपन्न होगा। उसके अनेक बच्चे और नौकर-चाकर होगें।

    -फलदीपिका
    जातक धनी, अनेक पुत्रों वाला, चिंरंजीवी और तेज़ बुद्धि वाला होगा।वह बहुत से नौकरों का स्वामी होगा।
    -सारावली
वह अत्यन्त विद्वान, अनेक पुत्रों का पिता, अन्य लोगों के लिएसहायक और प्रशंसनीय गुणों वाला होगा।
    -भृगु

    जातक की अधिक संतान, शक्तिशाली, लोक-कल्याणकारक, मृदु,उदार, कला-प्रेमी होगा। वह दूसरों के लिए सहायक, प्रभावशालीसुसंस्कृत, धार्मिक, अनेक मित्रों वाला, सम्मानित, उच्च पदासीन औरभूमि का स्वामी होगा। वह स्त्रियों द्वारा सहायता प्राप्त व उद्यत होगा। वहदानी, सिद्धान्तवादी और आसानी से सफल होगा।
-डॉ रामन

    टिप्पणी
    उपरोक्त विद्वानों ने एकादश भाव में चन्द्रमा को बहुत शुभ बताया है।    एकादश भाव में भी चन्द्रमा, चतुर्थ ओर अष्टम की तरह माँ के लिएअच्छा नही होगा। क्योंकि चतुर्थ से अष्टम भाव हैं यह भाव प्रसिद्धि काघोतक है। पंचम से सप्तम होने के कारण यहाँ से चन्द्रमा की शुभ दृष्टिपंचम के शुभ फल बढ़ाने वाली होती है जैसे-अच्छी शिक्षा, संतान,नम्रता आदि। इस भाव में स्थित चन्द्रमा से जातक अपने गुणों के लिएप्रसिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में जातक से पहले एक बड़ी बहन होती है।और पुरूष-संतान के रूप में वह परिवार में वरिष्ठ होगा।अधिक्तरफलित अन्य ग्रहों के आधार पर ही विचार करने के बाद सही होता है।

    एकादश स्थान में स्थित चंद्र काफी अच्छे फल देता है। ऐसा जातक संपन्न,सुखी, समाज में एवं राजदरबार में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उसे उच्च सम्मानप्राप्त होता है।

 शारीरिक दृष्टि से यह चंद्र मध्यम फलदायी होता है। जातक उदार, सदाचारीएवं परोपकारी रहता है। मित्रों से अच्छा सहयोग प्राप्त होता है। कन्या संतानअधिक रहती है। दृढ़प्रतिज्ञ न होने से उसका कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होता।हर काम में दिक्कतें खड़़ी होती हैं।

    पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार ऐसा जातक पशु, गाय, भैंस, घोड़े,मोटरकार से लाभान्वित होता है। जन्म से 11, 16 एवं 17वें वर्ष में राजसम्मानप्राप्त होता है एवं लाभ मिलता है।
    

    एकादश भाव-चन्द्रमा जब ग्यारहबें भाब में हो तो जातक अधिक सन्तानोंवाला (प्रायः कन्याएं अधिक), धनी, दीर्षायु, पर्यास सेवकों से युक्त, साहसी,प्रसिद्ध तथा अच्छे मित्रों वाला होता है। इसी भाव में चन्द्रमा के साथ गुरु भी हो तोउन्नति व सफलतादायक 'गजकेसरी योग' बनता है-जिससे जातक के जीवनएवं व्यापार के साथ-साथ आर्थिक स्तर का भी उत्कर्ष होता है।
    चन्द्रमा यदि अशुभ स्थिति में हो तो जातक की नरसंतान व जातक की मातासाथ-साथ नहीं रहते। रहते हैं तो झगड़ते रहते हैं। चन्द्र शुभ हो तो जातक को धन,प्रतिष्ठा, अधिकार व आमदनी खूब होती है। देखने में आया है कि ऐंसे जातक यातो बहुत शिक्षित होते हैं, या नहीं के बराबर (शुक्ल पक्ष व चन्द्र पक्ष के अलावासही स्थिति को जानने के लिए पंचम भाव व पंचमेश की स्थिति भी बुध एवं गुरुके साथ विचार लेनी चाहिए)।
    लाल किताब के अनुसार यदि ग्यारहवें घर में पुरुष राशि का चन्द्रमा हो तो
    जातक पुश्तैनी काम छोड़ कर नया काम करता है। स्त्री राशि का हो तो नए व
    पुश्तैनी दोनों कार्यों को करता व लाभ पाता है। उच्च का चन्द्रमा जातक कोउच्चाधिकारी, विपुल धन वाला बनाता है परन्तु पुत्रों की अपेक्षा पुत्रियां अधिक देता
    है। शुभ प्रभाव का चन्द्र जातक को युवावस्था में ही यश दिलाता है। ऐसा जातक
    अद्भुत नेतृत्व क्षमता वाला तथा शत्रुओं के लिए साक्षात् काल होता है। परन्तु नीच
    राशि, शत्रुक्षेत्री या निर्बल चन्द्र हो तो जातक मूर्ख, अज्ञानी, रोगी तथा घर में ही
    रहना पसंद करने वाला होता है। सन्तान अधिक होती हैं।
एकादश भाव: चंद्र एकादश भावस्थ हो तो एकाध अशुभ फलों को छोड़कर श्रेष्ठ फल ही मिलते हैं। स्त्री राशि में चंद्र हो तो कन्या संतान अधिक जन्म लेती है, प्रौढावस्था में पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। यदि एकादश भाव निर्बल हो तो आय की अपेक्षा व्यय अधिक होता है। भावेश बलवान हो तो अच्छा धन लाभ होता है। भूमि की खुदाई में हीरे इत्यादि बहुमूल्य रत्न एवं धन की प्राप्ति होती है। शुक्र के साथ एकादश भाव में चंद्र हो तो जातक को समस्त सुख वैभव मिल जाता है। ऐसा जातक समाज में मान-सम्मान पाता है, क्योंकि सामाजिक कार्यों में बढ-चढ़कर भागीदारी करता है। सांसारिक सुख अच्छा मिलता है, यशस्वी और लोकरंजक भी वह होता है। मकर राशि का चंद्र बुध से दुष्ट एकादश भाव में हो तो व्यक्ति मूर्ख, प्रवासी, स्त्री, धन, सुख से हीन होता है। कर्क का चंद्र शनि से दृष्ट हो तो मिथ्या भाव, निर्धन, तुला राशि में मंगल से दुष्ट हो तो तीक्ष्ण स्वभाव वाला, चोर ओर परस्त्रीगमन करने वाला होता है। 


इस भाव में चंद्र की उपस्थिति से व्यक्ति धोखेबाजों से पीड़ित, सुखी लोकप्रिय, दीर्घायु, यशस्वी और चंचल स्वभाव का होता है। उसका जीवन परदेश में अधिक बीतता है। राज्य द्वारा उसे विशेष सम्मान मिलता है। गुप्तविद्याओं में उसकी विशेष रुचि होती है। उसकी पत्ली सुंदर, सुशील तथा गृहकार्य में दक्ष होती है। उसे जीवन में सभी प्रकार का भौतिक सुख प्राप्त होता है। यो स्पष्टवादी, पूर्व नियोजित कार्यक्रमों में चतुर, बुद्धिमानू अपनी सफलताओं के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है। उसका कानून बनाने और तोड़ने का स्वभाव होगा। 

यदि चंद्र एकादश भाव में शत्रु राशिस्थ या नीचराशि का अथवा क्षीण रहता है, तो व्यक्ति के लिए हानिप्रद है। उसे निश्चित रूप-से शारीरिक कष्ट व रोगों का सामना करना पड़ता है। उसका जीवन बड़ा संघर्षमय होता है। एकादश भाव में चंद्र और शुक्र की युति व्यक्ति को वाहन आदि का सुख प्रदान करती है। 

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक अतिचतुर,व्यवहारकुशल, सरकारी कर्मचारी, यशस्वी, सदाचारी एवं संपन्न होता है।व्यापार करने पर खूब प्रगति होती है। बचपन में स्वास्थ्य मध्यम रहता है।

    2. वृषभवृषभ राशि का चंद्र एकादश स्थानमें तो जातक प्रतिष्ठित,विद्वान, सदाचारी, विवेकशील, संपन्न एवं दीर्घायु रहता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का चंद्र एकादश स्थान में रहने से जातक संपन्न,सदाचारी, परोपकारी, उदार एवं सुखी रहता है। शुभ कार्य में खर्च करता है।संतान सुख में न्यूनता, कन्या संतान अधिक होती है। अपनी संपत्ति का दानअस्पताल एवं धार्मिक संस्थाओं को करनेवाले व्यक्तियों की कुंडलियों मेंअक्सर यह योग पाया जाता है।

    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान किंतु वाचाल, कुशल वक्ता एवं दीर्घायु रहता है। उसे सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।5. सिंह-सिंह राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न घराने  में जन्म लेता है और सुखी, सदाचारी एवं दीर्घायु होता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक दानी-धर्मी,सरकारी कर्मचारी, समाज में प्रतिष्ठित एवं जनता का मार्गदर्शक नेता बनता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक सुखी किंतु आर्थिक दृष्टि से कमजोर रहता है। तुला राशि का चंद्र एकादश स्थान मेंसाधारण फल ही देता है। ऐसा जातक रेस, सट्टे, लॉटरी के फंदे में न फंसे।स्वास्थ्य एवं उम्र के लिए यह चंद्र अनिष्टकारी होता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्नएवं सुखी रहता है। पत्नी को गर्भपात अथवा प्रसव के समय कष्ट होता है।स्त्री की कुंडली में एकादश स्थान में वृश्चिक राशि का चंद्र होने पर संतानहानि एवं प्रसव के समय में स्वयं को कष्ट रहता है। जातक की पत्नी सुंदर,सुशील एवं आज्ञाकारी रहती है। जातक के श्वसुर के संबंध में शंका रहतीहै। उसके नाराज होने की संभावना भी रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो उसके शुभ फल कममिलते हैं। जातक के शत्रु अधिक होते हैं। संगत अच्छी नहीं होती। जातकधैर्यवान, प्रतिष्ठित एवं अभिमानी रहता है। आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रहती है। मित्रएवं संतान सुख में न्यूनता रहती है। वाहन से फायदा होता है। शत्रुभय के कारणअपमृत्यु का होना संभव रहता है। उसे सजा भोगनी पड़ती है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न,विद्वान, उदार एवं ललित कला में रुचि रखनेवाला और सुखी होता है।

    11. कुंभ कुंभ राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक स्वस्थ,दीर्घायु एवं संपन्न होता है। वह प्रायः परदेश में धन कमाता है। क्षीण चंद्र होतो जातक के जारज होने की संभावना रहती है। ऐसा महर्षि गर्ग का मानना है।

    12. मीन मीन राशि का चंद्र एकादश स्थान में हो तो जातक पराक्रमी, क्रोधी,सुखी, धनवान, समाज में प्रतिष्ठित एवं सरकारी कर्मचारी होता है। वह.स्वपरिश्रमसे उन्नति करता है और मित्र व संतान का पर्याप्त सुख प्राप्त करता है।

 11) एकादश भाव -
1. भैरूजी के जोत करें। 
2. सूर्य अर्ध देवें। 
3. चांदी का सिक्का पासरखे व सन्दूक में भी रखें।
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द्वादश स्थान (व्यय भाव)    

    बारहवें स्थान में चन्द्र

    कल्याण वर्मा - द्वेष्यः पतितं: क्षुद्रो नयनरुगारतोऽलसो भवेद्विकलः। चन्द्रे तथान्यजातो द्वादशगे नित्यपरिभूतः॥ लोग इस का द्वेष करतेहैं। यह पतित,क्षुद्र, आलसी, दुर्बल और पर पुरूष से उत्पज हुआ होता है।इसे नेत्र रोग होते हैं। इसका सर्वदा अपमान होता है।

    जागेश्वर-वियोगी सदा चारुशीलो न मित्रेर्भवेद् वैकलो नेत्ररोगी कृशांगः। स्वयंक्षीणवीर्यः सदाक्षीणचन्द्रे भवेदू रिष्फगे पूर्णता चेत्सुशीलः।। इस स्थान में चन्द्र हो तो पति पत्नी में अकारण ही कई बारवियोग होता है। इसका शील अच्छा होता है। बहुत मित्र नही होते। शरीरदुर्बल होता है और नेत्र रोग होते हैं। यहां चन्द्रक्षीण हो तो उस व्यक्ति कावीर्य कमजोर होता है।चन्द्रपूर्ण हो तो आचरण अच्छा होता है।
    नारायण भट्ट - सदा सदूव्ययो मंगले ना पितृव्यादि-मात्रादितोउन्तर्विशादो न चाप्नोति कामं प्रियालपं प्रियत्वम्॥ यह सत्कायोंमें द्व्य खर्च करता है। माता, पिता और सम्बन्धियों से मनमुटाव होता है।कामोपभोग कम प्राप्त होता है। स्वजनों पर प्रेम कम होता है।

    गर्ग - व्यये शशिनि कार्पण्यमविश्वासः पदे पदे॥ इस चन्द्र केफल स्वरूप वह व्यक्ति कृपण और अविश्वासी होता है।

    काशीनाथ - व्यये चन्द्रे पापबुद्धिबहुभक्षी पराजितः। कुलाध्मो मद्यपो च विकारी जातको भवेत्। यह पापी बहुत खानेवाला पराजयपानेवाला, कुल कलंकित करनेवाला, पियक्कड और रोगी होता है।कानी होती है।बादरायण - काणं शशी। इस चन्द्र के फलस्वरूप एक आंख

    वैद्यनाथ-चन्द्रे विदेशवासी। परदेश में निवास होता है।जयदेव - हिस्त्रोडगहीनः सरिपुः सुहत्सु वैषम्यकृत्स्वल्यकृगिन्दुरिःफे। हिंसक, किसी अवयव की कमी होनेवाला, बहुतशत्रुओं से युक्त, मित्रों से बुरा बर्ताव करनेवाला और आंखों की शक्तिमन्द होनेवाला होता है।

    ज्योतिषकल्पतरुकार - द्रव्यक्षय क्षुधाल्पत्व नेत्रुकू-कलहोगउहे। इस चन्द्रसे द्रव्य की हानि, भूख कम होना, नेत्ररोग और घर के झगड़ेये फल प्राप्त होते हैं।

    हिल्लाजातक-द्वादशे हानिपीड़ा च तृतीये वत्सरे ध्रुवम्। आयुके तीसरे वर्ष में नुकसान और दुख होता है।
    बृहधयवनजातक-चन्द्रो जलपीडनं पंचवेदम्। इससे ४५ वें वर्षमें पानी से दुरघटना होती है।

    यवनजातक - इसे नेत्रोग होते हैं। यह विरोधप्रिय, बहुतखर्चीला, दुष्ट स्वभाव का और कीर्तिहीन होता है।

    पाश्चिमात्य मत - यह चन्द्र वृश्चिक अथवा मकर राशि में होतो वह व्यक्ति बदमाश होता है। दूसरी राशियों में हो तो विजयी, सुखी औरधनवान होता है। इस चन्द्र के सम्बन्ध अच्छे हो तो प्रवास से लाभ होता है।दवाइयों की दूकानों और जेल में काम करना होता है। यह चन्द्र मेष में हो तोचचंल वृत्ति का, घुमक्कड, रूपवान व बुद्धिमान होता है। वही वृश्चिकऔर मकर में हो तो धनहीन होता है। अन्य राशियों में धनवान और विद्वानहोता है इस स्थान में चन्द्र बलवान हो तो जमीन और खेती से लाभ होता हैतथा आयु के अन्त तक सुख प्राप्त होता है। कर्क और मीन राशि में यहचन्द्रहो तो बहुत पुत्र होते हैं और उन पर प्रेम भी होता है। सट्टा और साहस मेंरुचि होती है। राजयोगी, ज्ञानी, मान्त्रिक या शास्त्रज्ञ हो सकता है। स्त्रियोंका उपभोग अच्छा मिलता है।

    मेरे विचार -जागेश्वर को छोडकर अन्य सभी शास्त्रकारों नेइस स्थान के चन्द्र के फल प्रायः अशुभ ही कहे हैं। ये फल स्त्री राशियों केहैं। पुरुष राशियों में शुभ फल प्राप्त होते हैं। पाश्चात्य मत में वृश्चिक राशिके चन्द्र का फल बदमाश होना कहा है। इसका बिलकुल अनुभव नही आता।
    जातक का शरीर कमजोर, हमेशा सर्दी-कफ से ग्रस्त, दरिद्र औरगर्म-दिमाग वाला होगा। यदि चन्द्रमा स्वक्षेत्री या बुध या गुरु, की राशिमें हो तो जातक इन्द्रियों पर संयम रखने वाला, प्रसन्न, सुविधासंपन्न,परन्तु कमजोर व नीच संगति वाला होगा।

    -मानसागरीजातक आलसी, दीन और खिन्नमना होगा। दूसरे उससे शत्रुता काभाव रखते है।

    -फलदीपिका

    जातक घिनौना, नैतिकता रहित, नीच, नेत्ररोगी, आलसी, चिन्ताग्रस्त,अपमानित व विकलांग होगा।

    -सारावली

    जातक अच्छे भोजन से वंचित, मिथ्याव्ययी, क्रोधी, संदिग्ध साधनोंसे धनार्जन करने वाला, रोग से त्रस्त, विद्वान व दयालु होगा।

    -भृगु

    वह विकलांग, संर्कीण मानसिकता वाला, खिन्न, शक्तिहीन, विध्नबाधाओं का सामना करने वाला, भ्रमित, एकांकी व खिन्नमना होगा।-डॉ रामन

    टिप्पणी

    बारहवें भाव में चन्द्रमा नेत्र कष्ट, अपच, मानसिक चिंता और एवंअप्रसन्नता द्रेता हैं। जातक धार्मिक एवं पवित्र उद्देश्यों के लिए धन खर्चकरने वाला होता है। उसे धन हानि, 45 वर्ष की आयु में जल से भय,जीवन के उत्तरार्थ में समृद्धि मिलेगी। कुछ विद्वानों का कहना है किजातक पेटू होगा जबकि अन्यों के अनुसार उसे अपच की शिकायत होगी।

    चन्द्रमा माता व मन आदि का कारक होता है। यदि वह बारहवें भावमें हो, तो उपरोक्त सभी अशुभ फल हो सकते हैं। चन्द्रमा को लग्न मानाजा सकता है जातक के स्वास्थ्य के विषय में भी पता चलता है।
    द्वादशस्थ चन्द्रमा स्वास्थ्य के लिये भी अच्छा नही है। यह भाव शैग्यासुख या यौन तृप्ति का है, यहाँ चन्द्रमा की स्थिति से जातक फिजूलखर्च,आलसी, चिन्तापूर्ण व मानहानि का सामना करता है। यह भाव मोक्षस्थानभी कहलाता है। अतः यहाँ चन्द्रमा की स्थिति धार्मिक गतिविधियों मेंरूचि, पवित्र/पुण्य कमों पर व्यय आदि करवाता है। अतः ग्रहों की समग्रस्थिति और कुण्डली का समुचित विश्लेषण भविष्यवाणी करने में बहुतसहायक होते हैं।

    मेरा अनुभव - इस स्थान के चन्द्र के कोई विशेष फल मेरे देखनेमें नही आए। इससे पत्नी सांवले रंग की होती है। पत्नी के ही अनुसार पतिको रहना पडता है। किन्तु पत्नी का स्वभाव अच्छा होता है और दोनों बड़ेसुख से रहते है। इनका खर्च कम ही होता है। पत्नी आकर्षक और प्रभावी    होती है। यह चन्द्र वृषभ राशि में हो तो किसी चाचा का निरवंश होकरउसकी इस्टेट मिलने की संभावना होती है। द्विभार्यायोग होता है अथवापत्नी से सम्बन्ध अच्छे नही रहते अथवा यह स्वयं प्रपंच नही कर सकता।इसके फल स्वरूप किसी फूफा का संसार नष्ट होता है। वह बंध्या, विधवाअथवा दरिद्री होती है। स्त्री राशि में और षष्ठ स्थान में चन्द्र हो तो मृत्यु केसमय कर्ज का भार रहता है। षष्ठ के चन्द्र में चोरी की कला अच्छी तरहज्ञात होती है। इसलिए ये लोग अच्छे जासूस हो सकते हैं। द्वादश का चन्द्रकन्या राशि में हो तो पिता का किया हुआ कर्ज चुकाया जाता है। यह चन्द्रमकर में हो तो धन बहुत मिलता है किन्तु बहुत कंजूसी होती है। कर्क,वृश्चिक और मीन में यह चन्द्र हो और उस व्यक्ति को सरकारी नौकरीमिली हो तो उसे पेन्शन बहुत दिन तक नही मिलती। यह चन्द्र मिथुन, तुलाऔर कुम्भ में हो तो बर्ताव व्यवस्थित होता है। ये पैसों का उपयोगसमझबूझकर करते हैं। ये विद्वान होते है किन्तु लोगों पर इनकी विद्वत्ता का प्रभाव नहीं पडता।

    व्यय स्थान में स्थित चंद्र के फल प्रायः शुभ नहीं मिलते। जातक खर्चीलाहोता है। वह सत्कार्य में भी दिल खोलकर खर्च करता है। आर्थिक विषयमें अन्य ग्रहों का योग अच्छा न होने पर जातक ऋणग्रस्त रहता है। आंखोंमें कोई-न-कोई विकार रहता है। दूसरों से ई्ष्यों के कारण उसके शत्रु अधिकहोते हैं। इसलिए उसे सामाजिक क्षेत्र में उचित मान नहीं मिलता। शरीर कमजोरएवं आलसी रहता है। चंद्र क्षीण या निर्बल हो तो संतान सुख में न्यूनता रहतीहै या कन्या संतान अधिक रहती है।

    जातक सदाचारी, सौम्य स्वभावी रहता है। विवाह के समय सावधानी बरतनी चाहिए। अपने से अधिक हृष्टपुष्ट लड़की से जातक विवाह न करे क्योंकि शारीरिक संबंध संतोषजनक न होने से वैवाहिक जीवन दुखमय रहता है। फलस्वरूप
    पारिवारिक सुख प्राप्त नहीं होता। माता-पिता, चाचा-ताक के साथ उसकी नहींबनती। किसी पर भी विश्वास नहीं होता। उसे जन्म स्थान से दूर रहकर जीवनयापनकरना पड़ता है। जठराग्न दुर्बल रहने से जातक अल्प आहारी रहता है।

    पाशचात्य ज्यातिर्विदों के अनुसार तीसवें वर्ष में हानि एवं 45वें वर्ष में पानीसे भय रहता है। विद्वान होने पर भी विद्वता का प्रभाव समाज पर नहींँ पड़ता।ज्योतिर्विंद काशीनाथ एवं जयदेव के अनुसार व्यय स्थान में चंद्र होने परजातक पेटू, दुराचारी, कुल के लिए घातक, शरीर में दोष रहनेवाला, हिंसकप्रवृत्ति का रहता है। हमारे देखने में ऐसे जातक नगण्य है। वृश्चिक, मकर याकुभ राशि का चंद्र व्यय स्थान में होने पर ये फल होते हैं, अन्य राशियों मेंचंद्र होने पर ये फल दृष्टिगोचर नहीं होते।
    द्वादश भाव-बारहवें भाव में चन्द्रमा हो तो जातक कुटिल, ईष्ष्यालु,कमजोर दृष्टि वाला, आलसी, अप्रसन्नचित्त वाला होता है। ऐसे जातक को अपयश,अपमान या कलंक झेलना पड़ता है। भूतकाल को याद करके आहें भरना उसकास्वभाव बन जाता है। अपना थोड़ा भी दुख उसे बड़ा मालूम होता है। ऐसे जातकके जीवन में खुशी के तुरन्त बाद दुख की स्थितियां प्ायः बनती रहती हैं। चन्द्रमाअशुभ हो तो जातक पैतृक सम्पत्ति को उजाड़कर रख देता है।
    लाल किताब के अनुसार बारहवां चन्द्र यदि निर्बल या शत्रक्षेत्रीय हो तोजातक दुर्बल, कफ रोग से पीड़ित, शीघ्र क्रुद्ध हो जाने वाला, धनहीन, कलहपूर्णदाम्पत्य वाला तथा संदेहास्पद चरित्र का होता है। कृष्णपक्ष का चन्द्र हो तो जातककंजूस होता है। उसे राज्यपक्ष की ओर से दण्ड या जुर्माने का भय रहता है तथाकोई उसका यकीन नहीं करता। उच्च का चन्द्रमा हो तो जातक को उसके किसीसम्बन्धी की सम्पत्ति मरणोपरांत मिल जाती है। खेती से लाभ होता है, परन्तु पत्नीसे सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते। पुनर्विवाह की सम्भावना बनती है। कन्या राशि मेंचन्द्र हो तो जातक को पिता का थोड़़ा कर्ज चुकाना पड़़ता है। जलराशि का चन्द्रपुत्र अधिक देता है। जातक का संतान से अगाध प्रेम होता है। किन्तु रेस, सट्टे आदिमें जातक की रुचि रहती है।
द्वादश भाव: व्यय भावस्थ चंद्र के शुभाशुभ दोनों प्रकार के फल अनुभव में आते हैं। प्रायः अशुभ फल स्त्री राशियों में ओर शुभ फल पुरुष राशियों में मिलते हैं। कन्या राशि में चंद्र हो तो जातक पिता द्वारा लिए ऋण का भुगतान करता है। जल राशिस्थ चंद्र व्यय स्थान में हो और जातक राजकीय कर्मचारी हो तो सेवानिवृत्ति के पश्चात अधिक समय तक॑ पेन्शन (सेवा राशि) का उपभोग नहीं कर पाता। वायु राशि में चंद्र हो तो व्यक्ति विद्वान होते हुए भी प्रभावशाली नहीं होता। ऐसा व्यक्ति लोकाचार का निर्वाह करते हुए धन का सद्व्यय करता है। मकर का चंद्र हो तो व्यक्ति कृपण होता है। उच्च राशि का चंद्र हो तो द्विभार्या योग बनाता है। मेष का चंद्र हो तो व्यक्ति भ्रमणशील एवं “चंचल प्रवृत्ति का होता है। चंद्र पापाक्रांत हो तो नेत्र रोग होते हैं, दृष्टि मंद पड़ जाती हे। मरणोपरांत जातक नरकगामी होता है। मित्र राशिस्थ, शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो देहावसान के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 
इस भाव में चंद्र की उपस्थिति से व्यक्ति एकांतप्रिय, मधुर वाणी बोलने खाला, विषम शरीर का स्वामी, मध्यम कद का तथा आक्रोश एवं सदिहपूर्ण विचारशक्ति बाला होता है। खुशहाल जीवन जीने की इच्छा रखने वाला होगा। शत्रु का भव उसे सताता रहता है। माता की ओर-से उसे कष्ट मिलता है। उसका घन मांगलिक कार्यों में व्यय होता है। उसकी बहुत-सी अभिलाषाएं उसके मन में हो रह जाती हैं। अपने स्वास्थ्य के कारण वो सदा चिंतित रहता है। कफविकार, शीतविकार और नेत्र रोग से वो पीड़ित रहता है। यदि द्वादश भाव में चंद्र शुभ ग्रहों से युक्त हो अथवा बली हो तो व्यक्ति के लिए लाभ का कारक होता है। यदि चंद्रमा मंगल की युति हो तो व्यक्ति नेत्ररोग से पीड़ित रहता है तथा उसका दाम्पत्य जीवन कलहपूर्ण होता है।  

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक शरीर से दुर्बल,खर्चीला, सदाचारी, विदेशनिवासी रहता है। माता-पिता से संबंध मधुर नहींरहते। उसके मित्र नहीं होते। सरकार से भी संबंध खराब होते हैं।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी,

    धैर्यवान, पराक्रमी, चतुर, बुद्धिमान, विदेश में रहनेवाला, युद्धकला, वादविवादमें प्रवीण एवं यशस्वी रहता है। आर्थिक स्थिति कमजोर रहती है। संतान सुखमें न्यूनता रहती है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक मधुरभाषी,कुशल वक्ता, विदेश में रहनेवाला, परिवार या रिश्तेदारों के साथ संबंध अच्छेन रखनेवाला होता है। वसीयत से धन मिलने की संभावना रहती है।

    4. कर्क कर्क राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान एवंविद्वान रहता है और ग्रामीण माहौल में रहता है। माता व संतान सुख में न्यूनतारहती है।

    5. सिंहसिंह राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक अभिमानी,कुसंगति में रहनेवाला, लोगों को पीड़ा देनेवाला, लोगों में निरर्थक रुचिरखनेवाला एवं सुखी रहता है। स्वपरिश्रम से धनार्जन करता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक चतुर, गुणवान,सरकारी कर्मचारी, खर्चीला एवं विदेश में रहनेवाला, माता का सुख कमपानेवाला होता है। विरोधी बहुत होते हैं। जातक अल्पसुखी रहता है।

    7. तुला-तुला राशि का चंद्र व्यय स्थान में होने पर जातक स्वाभिमानी,बुद्धिमान, आर्थिक दृष्टि से कमजोर किंतु यशस्वी रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का चंद्र व्यय स्थान में होने पर जातक कठोर,
    धूर्त, होशियार किंतु आचरणहीन एवं कर्ज में डूबा रहता है। निराशा के कारणआत्महत्या करने की ओर प्रवृत्ति रहती है। बाल्यावस्था में सर्प-विष भय रहताहै। मृत्यु के बाद शरीर की दुर्गति होती है।

    9.बनु-धनु राशि का चंद्र व्यय स्थान में रहने पर जातक कंजूस एवं दरिदीरहता है। उसे कपड़े के व्यापार में लाभ होता है। चोरी के कारण नुकसान होताहै। इष्टमित्रों एवं आप्तजनों से सुख प्राप्त नहीं होता। कुछ आचायों के अनुसारजातक की पत्नी के किसी के साथ भाग जाने की संभावना भी रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का चंद्र व्यय स्थान में होने पर अथक परिश्रमकरके भी जातक को पर्याप्त संपन्नता प्राप्त नहीं होती। शत्रु बहुत होते हैं। एकजगह स्थिर होकर बैठना उसके लिए मुश्किल रहता है। जातक कामातुर एवंचरित्रहीन रहता है। महर्षि गर्ग के अनुसार ऐसा जातक धन-धान्य एवं पशुसुख से परिपूर्ण रहता है।

 11. कुंभ कुंभ राशि का चंद्र व्यय स्थान में हो तो जातक देश-विदेशमें प्रवास करता है। बुद्धि कुटिल रहती है। संतान सुख में न्यूनता रहती है।

12. मीन मीन राशि का चंद्र व्यय स्थान में होने पर जातक का पिताजीवित नहीं रहता। यदि रह भी गया तो जातक को पिता का सुख प्राप्त नहींहोता। जातक स्वयं दीर्घायु रहता है।

12 )बारहवा भाव -उपाय
    1. पीला फल का सेवन न करें। 2. बारिश का पानी का कुण्ड घर मेंबनावे व उसे रखें।


 ज्‍योतिष : कुण्‍डली में चंद्रमा राशि भाव नक्षत्र सकारात्मक  नकारात्‍म विवेचन 

चंद्र का राशिगत फल 

जन्मराशि से चंद्र का गोचर फल निम्नवत है; 

जन्मराशि में: जन्मराशि में चंद्र आने पर आरोग्य, सुख, जायकेदार भोजन की प्राप्ति, आर्थिक लाभ एवं भाग्योदयकारी घटनाएं घटती हैं। 

जन्मराशि से दूसराः दूसरे स्थान में चंद्र आने पर खर्च में बढ़ोतरी, घाटे की संभावना, अपयश, मानहानि एवं प्रत्येक कार्य में व्यय होता है। 

जन्मराशि से तीसरा: तीसरे स्थान में जब चंद्र आता है तब सुख, दांपत्य जीवन में आनंद, वस्त्र एवं भोजन प्राप्ति, कार्य में रुकावट एवं विलंब होता है। 

जन्मराशि से चौथा: जब चंद्र चोथे स्थान में आता है तब जातक आत्मविश्वास खो बैठता है, निरर्थक चिंता एवं बेचेनी रहती है। शारीरिक अस्वस्थता महसूस होती है, वक्ष संबंधी कोई रोग होता है। 

जन्मराशि से पांचवां: चंद्र जब पांचवें स्थान में आता है तब जातक विघ्न-बाधा, स्वास्थ्य में गिरावट, मानसिक खिनन्‍नता, अपयश एवं दुख पाता है। 

जन्मराशि से छठा: जब चंद्र छठे स्थान पर आता है तब जातक को आर्थिक लाभ, शारीरिक नीरोगता, सुख, शत्रु की पराजय होती हे। 

जन्मराशि से सातवां: जब चंद्र सातवें स्थान पर आता है तब लाभकारक एवं सुखदायी प्रवास होता है। मान-सम्मान, जायकेदार भोजन, दांपत्य सुख, आर्थिक लाभ, आरोग्य प्राप्ति, भोग-विलास के साधन जुरते हैं। 

जन्मराशि से आठवां: जब चंद्र आठवें स्थान पर आता है तब शारीरिक अस्वस्थता, निरर्थक भय, प्रतिकूल घटनाएं, दुख एवं धन का दुरुपयोग होता है। 

जन्मराशि से नौवां: जब चंद्र नौवें स्थान पर आता हे तब श्रम के परिमाण में कम लाभ, कोर्ट-कचहरी एवं सरकार से संबंधित कामों में भयप्रद प्रतिकूल परिस्थितियां बनती हैं। शारीरिक अस्वस्थता, पेट क॑ विकार, मानसिक अशांति रहती है एवं जातक परिस्थिति के बंधनों में जकड़ जाता है। 

जन्मराशि से दसवां: जब चंद्र दसवें स्थान में आता हे तब रुके कामों में प्रगति, सम्मान, प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती है एवं शत्रु परास्त होते हैं। 
... जन्मराशि से ग्यारहवां: जब चंद्र ग्यारहवें स्थान पर आता है तब जातक को आर्थिक लाभ, मित्र एवं भाई-बहनों से सहयोग प्राप्त होता है और जीवन सुखद होता है। सभी कार्यों में यश प्राप्त होता है, मन प्रसन्‍न रहता है। 

जन्मराशि से बारहवां: जब चंद्र बारहवें स्थान पर आता है तब अशांति, खर्च में बढ़ोतरी, नुकसान की संभावना, हर कार्य में असफलता एवं मानसिक अस्वस्थता रहती हे। 


चंद्र प्रभावित जातक उन्‍हें कहेंगे जिनकी कुण्‍डली में चंद्रमा बहुत ही बलशाली स्थिति में बैठा हो। कर्क अथवा वृषभ लग्‍न में बैठा चंद्रमा जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है। कुण्‍डली में अन्‍य स्‍थानों पर भी अगर चंद्रमा दूसरे ग्रहों से बल प्राप्‍त कर पावरफुल स्थिति में हो तो वह जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है।

सामान्‍य तौर पर चंद्र प्रभावित जातक मानसिक रूप से दृढ़ किंतु संवेदनशील होते हैं। चंद्रमा पानी की तरह होता है, जिस प्रकार के ग्रह का उसे प्रभाव मिल रहा हो, वह वैसा ही होने लगता है। चंद्रमा के मूल स्‍वभाव में रचनात्‍मकता और उत्‍पादकता शामिल होती है। अब अगर चंद्रमा मंगल के प्रभाव में हो तो इस रचनात्‍मकता में एक सहज तेजी आ जाती है वहीं शुक्र के साथ हो तो एक लग्‍जरी का सेंस आता है, शनि के साथ हो तो नकारात्‍मकता आएगी और बुध के साथ हो तो गणनाओं में चतुर बना देगी। हालांकि बुध और चंद्र नैसर्गिक रूप से शत्रु हैं, ऐसे में गणनाओं की चतुरता अधिकांशत: नकारात्‍मक पक्ष लिए हुए होगी। कुल मिलाकर अकेला चंद्रमा केवल संवेदनशीलता और भावनाओं की प्रबलता ही दिखा सकता है, किसी दूसरे ग्रह का साथ मिलने पर स्‍वच्‍छ निर्मल जल में उस तत्‍व के गुण समाहित हो जाते हैं। यही कुण्‍डली में भावों में विचरण करते चंद्रमा के साथ भी होता है। बजाय चंद्रमा अपने स्‍वतंत्र फल देने के, भाव से संबंधित फल अधिक तीव्रता से देने लगता है।

अगर कुण्‍डली में चंद्रमा नकारात्‍मक परिणाम दे तो सामान्‍य तौर पर यह मति को भ्रष्‍ट कर देता है। इससे जातक अनिर्णय की स्थिति में फंस जाता है, मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है, झूठ बोलने की प्रवृत्ति बनने लगती है और अफवाहें उड़ाने लगता है। बहुधा ऐसे जातक एंजाइटी के शिकार भी हो जाते हैं।

चंद्रमा लग्‍न में
नकारात्‍मक हो तो जातक चिंता युक्त, स्त्री से अपमानित, स्त्री को पूर्ण तृप्ति न करने वाला, संतान की प्राप्ति विलंब से होती है, रोगी, मानसिक बीमारियों का रोगी, पागल होता है, जातक को डूबकर मरने का भय रहता है।

चंद्रमा द्वितीय में
नकारात्मक हो तो जातक के विद्या अध्ययन में बताती है, पैतृक धन का लाभ नहीं होता, धन का अधिक व्यय करता है, स्त्री की अल्पायु होती है, जातक मदिरापान नशीली वस्तुओं का व्यसनी होता है, पिता के लिए रोगकारक होता है।

चंद्रमा तृतीय में
नकारात्मक हो तो जातक मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है, भरम रोग से पीड़ित होता है, कई बार निद्रा में चलने की बीमारी भी होती है, यात्रा में हानि होती है, पिता की आयु होती है, भाई बहनों द्वारा अपमानित होता है, पड़ोसी तथा रिश्तेदारों से विरोध होता है।

चन्द्रमा चतुर्थ भाव में
नकारात्मक हो तो जातक पैतृक धन का नाश करता है, गृहस्थ जीवन दुखी होता है, स्त्री द्वारा विरोध झेलना पड़ता है, स्वयं माता का विरोधी होता है, वाहन से दुर्घटना का भय होता है, गृहस्थ जीवन के संबंध में चिंतित रहता है।

चन्द्रमा पंचम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक अस्थिर मन वाला, दुखी, माता से अपमानित होता है, जातक की संतान उसकी विरोधी होती है, विद्या में विघ्न पड़ता है, व्यापार में हानि होती है।

चंद्रमा छठे भाव में
नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, जातक को लकवा, गुर्दे का रोग, मूत्र रोग आदी होने की आशंका रहती है, कई बार आंत के रोग भी हो जाते हैं, जातक को पालतू पशु रखने तथा मुर्गीखाना खोलने पर हानि होती है, अधिकांश जीवन में कर्जदार बना रहता है, धन का व्यय अधिक करता है, माता से झगड़ा करते हैं, मानसिक रूप से विक्षिप्त रहता है, गैस तथा अतिसार रोगों की आशंका सर्वाधिक होती है। यहाँ चन्द्रमा शनि से दृष्ट अथवा शनि के साथ हो तो विवाह विलम्ब से होता है अथवा विवाह नहीं होता।

चन्द्रमा सप्तम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, स्त्री का मन अस्थिर होता है, दूसरों से ईर्ष्या रखने वाला होता है, माता से कलह करने वाला होता है, नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाला होता है, यहाँ चन्द्रमा पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो स्त्री की मृत्यु होती है और दूसरा विवाह करना पड़ता है।

चन्द्रमा अष्टम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक अल्पायु और माता के लिए अशुभ होता है, जातक परस्त्रीरत तथा गुप्त रोगों से ग्रस्त होता है, पर स्त्री पर धन नाश करने वाला होता है, अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।

चन्द्रमा नवम भाव में
नकारात्मक हो तो पिता की अल्पायु का योग होता है तथा माता के लिए रोगकारक होता है, विदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती।

चन्द्रमा दशम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक का मन अस्थिर रहता है, नौकरी तथा व्यापार बदलने में हानि उठाता है, पैतृक धन प्राप्त करने में अड़चनें आती है, स्त्री से कलह रहती है, माता की अल्पायु होती है, अगर चुनाव लड़े तो पराजय होती है, स्त्री पक्ष से धन का लाभ नहीं होता, जातक रोगी होता है।

चन्द्रमा एकादश भाव में
नकारात्मक परिणाम दे रहा हूँ तो सन्तान का सुख अल्प होता है, पुत्र संतति कम होती है, माता से कलह रहती है, नपुंसकता के रोग का भय होता है।

चन्द्रमा द्वादश भाव में
नकारात्मक हो तो जातक आंख का रोगी होता है, ससुराल का धन नाश करने वाला होता है, परस्त्रीरत होता है, गुप्त रोग का रोगी होता है, अपनी स्त्री के लिए रोगकारक और दुष्चरित्र होता है। विदेश भ्रमण में असफलता मिलती है तथा धन का नाश होता है।

चन्द्रमा विवेचन और उसके के रुष्ट होने के संकेत केमद्रुम दोष और उपाय -

मन और मानव जीवन को प्रभावित करता है चन्द्रमा

चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह हैंउन सभी का व्यक्ति के ‍जीवन पर विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। मानव ने जब से काल के चिंतन का आरंभ कियाउसी समय से चन्द्रमा उसके लिए अपने घटने-बढ़ने की प्रक्रिया के कारण प्रकृति का अखंड और निर्विवाद पंचांग रहा है। संसार के सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में प्रत्येक काल में चन्द्रमा की ति‍थियों के अनुसार ही धार्मिक विधि रचने का उल्लेख पाया जाता है।

व्यक्ति के चरित्र के सूक्ष्म रूपविशिष्ट गुणउसकी प्रतिभाभावनाओंप्रवृत्तियोंयोग्यताओं तथा भावनात्मक प्रवृत्ति आदि का ज्ञान जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति से मालूम हो जाता है।

समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे का मूल कारण चन्द्रमा की स्थिति है। पूर्णिमा का प्रभाव पशु-पक्षियों और रेंगने वाले कीड़ों पर ही नहीं पड़ताबल्कि उन्मादग्रस्त मनुष्यों पर भी पड़ता है। वे सभी अन्य दिनों की अपेक्षा पूर्णिमा के दिन ही अधिक उत्तेजित और अव्यवस्थित दिखाई देते हैं। संसार के जितने की ऊष्ण प्रदेश हैंवहां को लोगों को पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की चांदनी में सोने पर विचित्र स्वप्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार के विचित्र स्वप्न अन्य किसी दिन में दिखाई नहीं देते। यही नहींस्त्रियों के मासिक धर्म और चंद्रमा के 28 दिवस चक्र के बीच सीधा संबंध है।

चंद्रमा के घटने-बढ़ने का व्यक्ति के मस्तिष्क के साथ परंपरागत संबंध होता है। शुक्ल पक्ष में मनुष्य का मस्तिष्क जागरूक होता है। इन दिनों उसे नींद भी अच्‍छी आती है। हम अपने जीवन में चंद्रमा के प्रभाव का स्पष्ट अनुभव करते हैं। चंद्रमा का सृष्टि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण प्रकृतिभले ही वह जड़ हो या चेतनउसमें धड़कन होती हैस्पंदन होता है और वह नित्य परिवर्तनशील है।

चन्द्रमा का अपनी तिथियों के अनुसार विश्व के जड़ और चेतन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जो मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने जाते हैंवे चंद्रमा के इस प्रभाव से भलीभांति परिचित होते हैं।

चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। स्त्रियों में स्थित कामभावना चंद्रमा की कलाओं के उपचय-अपचय के अनुसार विभिन्न अंगों में तिथिक्रम से केंद्रित रहा करती है। कामशास्त्र इस संबंध में सलाह देता है कि तिथि के अनुसार स्त्री के संबंधित अंग को सहलाने से वह जल्दी उत्तेजित हो जाते है

चंद्रमा सुख स्थान का और माता का कारक होता है। यह मन की संकल्प-विकल्पमूलक कल्पनाशक्ति का ‍परिचायक होता है। शारीरिक स्थित‍ि में यह जल ग्रह होने के कारण न्यूमोनिया तथा कफजनित रोग सर्दी-जुकाम आदि का सूचक रहता है। जन्म कुंडली में जिन पर चंद्रमा निर्बल रहता हैवे प्राय: शीतजनित रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त प्रवाह और हृदय इसके अधिकृत क्षेत्र हैंकिंतु अन्य ग्रह के साथ अशुभ य‍ुति करने पर ही यह रक्तचापहृदय रोग आदि दिया करता है।

चंद्रमा द्विस्वभाव रहता है अर्थात अकेला ही यह पाप और शुभ बन जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण प्रकाशमान रहने के कारण यह बली रहता है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी माना जाता है। चंद्रमा कर्क राशि में उच्च का एवं वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। चंद्रमा उच्च राशि का होने पर मिष्ठान्न भोजी और अलंकार प्रिय बनाता है तथा इनके प्राप्त होने के योग भी बनाता है। मूल त्रिकोणी होने पर यह धनी और सुखी भी करता है। चंद्रमा नीच राशिगत होने पर धर्मबुद्धि का ह्रास करता है तथा दुरात्मा व दुखी बनाता है। शुक्र ग्रही होने पर यह माता के स्नेह और सुख से वंचित करता है।

ज्योतिष एवं चन्द्रमा का सम्बन्ध,महत्त्व एवं प्रभाव.तथा उपाय

भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होंउसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है। भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिकसाप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैंवह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है।

पूर्णिमा का चंद्रमा मन को बहुत आनंद देता है। इसकी तुलना बिजली की सजावट से नहीं हो सकती। चंद्रमा की इसी विशेषता के कारण स्नेह के लिए उसे देखा जाता है। स्नेह के बारे में सोचते ही मां का चेहरा सामने आ जाता हैइसलिए चंद्रमा को मातृकारक कहा गया हैइसीलिए बच्चे उसे मामा कहते हैं। भूखा बच्चा जब मां की गोद में बैठकर स्तनपान करता है तब मां के मन से जो स्नेह भावना उभरती हैउसी स्नेह का कारक ग्रह है चंद्रमा। चंद्रमा सबसे गति वाला ग्रह है और उसकी गति में सर्वदा परिवर्तन होता हैइसलिए जहां गति से जुड़ी बातें आ जायंवहां चंद्रमा महत्वपूर्ण हो जाता है। धरती पर सबसे अधिक गति होती है मन की। पल भर में गति बदलने वाला मन चंद्रमा से भी गतिशील हैअत: चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। मन को बेहद खुशी या गम हो तो आंखों से आंसू आ जाते हैंअत: पानीदूधशरबत जैसी बहने वाली चीजें चंद्रमा के अधिकार में होती हैं। पानी के साथ पानी से जुड़े पौधेमछलीकुएंतालाबसागर आदि का भी कारक ग्रह चंद्रमा है।

शास्त्रों के अनुसार भी चन्द्रमा मन का कारक है। चन्द्रमा दिल का स्वामी है। चांदी की तरह चमकती रात चन्द्रमा का विस्तार राज्य है। इसका कार्य सोने चांदी का खजाना शिक्षा और समृद्घि व्यापार है। चन्द्रमा के घर शत्रु ग्रह भी बैठे तो अपने फल खराब नहीं करता। प्रकृति की हलचल में चंद्र के प्रभाव विशेष होते हैं।

चन्द्रमा एवं विश्व—–

चन्द्रमा धरती का सबसे निकटतम ग्रह है. इसमें प्रबल चुम्बकीय शक्ति है. यही कारण है क़ि समुद्र के जल को यह बहुत ही ऊपर तक खींच देता है. और जब घूमते हुए धरती से कुछ दूर चला जाता है तो यही जल वापस पुनः समुद्र में बहुत भयानक गति से वापस आता है. जिसके कारण समुद्र में ज्वार भाटा एवं तूफ़ान आदि आते है. जिस तरह एक साधारण चुम्बक के दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति का केंद्र होता है. उसी प्रकार इसके भी दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति बहुत ज्यादा होती है. इसका आकार पूर्णिमा को छोड़ कर शेष दिनों में नाल चुम्बक के आकार का होता है. किन्तु पूर्णिमा के दिन जब इसका आकार पूरा गोल होता हैउस समय में इसमें भयानक आकर्षण शक्ति होती है. किन्तु यह शक्ति इसके चारो और की परिधि पर होने के कारण भयावह नहीं होती है. इसके विपरीत यह द्वितीया के दिन जब बिलकुल ही पतला होता हैबहुत ही हानि कारक होता है. कारण यह है क़ि इस दिन यह धरती से दूर होता है. तथा धरती के पदार्थो को बहुत दूर तक खींच देता है. और जब छोड़ता है तब बहुत ही ऊंचाई से उन पदार्थो के गिरने के कारण धन जन की बहुत हानि होती है. आप लोगो ने ध्यान दिया होगा क़ि अभी भी ग्रामीण इलाको में द्वितीया के चन्द्रमा को देखने की तथा उसे प्रणाम करने की होड़ या उत्सुकता लगी रहती है. और यह मान्यता है क़ि कम से कम हाथ में या शरीर के किसी न किसी हिस्से में सोने का कोई आभूषण हो तो और भी शुभ होता है. सोने की चमक दार सतह चन्द्रमा की किरणों को परावर्तित कर देती है. तथा उसकी परम लाभकारी ऊर्जा को शरीर में अवशोषित कर लेती है. परावर्तित करने की क्षमता तो दर्पण में ज्यादा होती है. किन्तु दर्पण विद्युत् या ऊष्मा का कुचालक होता है. इसलिए उससे केवल प्रकाश का परावर्तन ही हो पाता है. किन्तु चन्द्रमा की किरणों की लाभ कारी ऊर्जा शरीर को नहीं मिल पाती. इसीलिए शरीर के किसी भी अँग में सोने के आभूषण की उपस्थिति अनिवार्य बताई गयी है.

चन्द्रमा को सुधांशु भी कहा जाता है. पौराणिक मतानुसार चन्द्रमा पर अमृत पाया जाता है. इसके अलावा इसकी सतह पर अनेक अमोघ औषधियों की उपस्थिति भी है. संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए कहा गया है क़ि

यातीति एकतो अस्त शिखरं पतिरोषधीनाम आविषकृतो अरुण पुरः सरः एकतो अर्कः.

तेजो द्वयस्य युगपद व्यसनोदयाभ्याम लोको नियम्यदिव आत्म दशांतरेषु.

अर्थात एक तरफ तो औषधियों के एक मात्र स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल पर जा रहे है. तथा दूसरी तरफ उदयाचल पर अरुण को आगे किये हुए सूर्य उदय हो रहे है. इस प्रकार ये दोनों अपनी अपनी इस अस्त एवं उदय की स्थिति से यह समस्त विश्व को बता रहे है क़ि यह संसार का उत्थान एवं पतन चक्र है.

शुक्ल पक्ष की द्वितीया लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा निरंतर धरती के नज़दीक आता चला जाता है. तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावश्या तक चन्द्रमा धरती से दूर चलता जाता है. चन्द्रमा ज्यो ज्यो धरती से दूर चलता जाता है. यह पतला होता चला जाता है. उस समय इसके दोनों नुकीले हिस्से बहुत ही शक्ति शाली चुम्बक की तरह धरती की समस्त वस्तुओ को खींचता चला जाता है. संभवतः इसीलिए कृष्ण पक्ष और उसमें भी रात के समय और उसमें भी पाप राशि एवं लग्न में जन्म लेना थोड़ा अशुभ माना गया है.

चन्द्रमा के घर घर अर्थात कर्क राशि में होते हुए अपने घर अर्थात सिंह राशि में विश्राम करते हुए दुबारा फिर से धरती से दूर जाने लगेगा तो वर्षा शुरू हो जायेगी. क्योकि जो भाप अंतरिक्ष में एकत्र हुआ हैसूर्य के दूर जाते ही ठंडा होकर धरती पर गिरना शुरू हो जाएगा. कहा भी गया है क़ि 14 जनवरी या मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है. दिन बड़ा होगा तो ज्यादा देर तक सूर्य की किरणे धरती के ऱस को अवशोषित करेगीऔर ज्यादा भाप आकाश में जाएगा.

यदि किसी की कुंडली में पांचवे भाव में सूर्य हो तथा चौथे भाव में चन्द्रमा हो और ये दोनों मीन से लेकर सिंह राशि के मध्य ही हो तो वह बालक कुशाग्र बुद्धिउच्च संस्कार से उक्त संतान एवं देश विदेश में ख्याति अर्जित करने वाला होगा. कारण यह है क़ि ऐसी अवस्था में मष्तिष्क के परासवी द्रव्यों का सघनी करण एवं शोधन दोनों ही सूक्षमता एवं गहनता से होता रहेगा. क्योकि जितने द्रव्य चन्द्रमा के द्वारा उद्वेलित होगेसूर्य के द्वारा उतने का सघनी करण एवं शोधन होता चला जाएगा. इसके विपरीत यदि सूर्य तुला राशि में हो तथा चन्द्रमा मीन में हो तो ऐसी अवस्था में इनकी चौथे भाव की उपस्थिति माता पिता एवं धन संपदा के लिए हानि कारक होगी. कारण यह है क़ि न तो चन्द्रमा का प्रभाव मष्तिष्क पर पडेगा और न तो सूर्य के द्वारा इसका कोई शोधन या सघनीकरण होगा. क्योकि चंद्रामा सूर्य से बहुत ही दूर जा चुका होगा.

चन्द्रमा से ही मनुष्य का मन और समुद्र से उठने वाली लहरे दोनों का निर्धारण होता है। माता और चंद्र का संबंध भी गहरा होता है। मूत्र संबंधी रोगदिमागी खराबीहाईपर टेंशनहार्ट अटैक ये सभी चन्द्रमा से संबंधित रोग है।

वैसे तो चन्द्रमा को सुख-शांति का कारक माना जाता हैलेकिन यही चन्द्रमा जब उग्र रूप धारण कर ले तो प्रलयंकर स्वरूप दिखता है। तंत्र ज्योतिष में तो ये कहावत है कि चन्द्रमा का पृथ्वी से ऐसा नाता है कि मानो मां-बेटे का संबंध होजैसे बच्चे को देख कर मां के दिल में हलचल होने लगती हैवैसे ही चन्द्रमा को देख कर पृथ्वी पर हलचल होने लगती हैचन्द्रमा जिसकी सुन्दरता से मुग्ध हो कवि रसीली कविताओं और गीतों का सृजन करते हैं वहीँ भारतीय तंत्र शास्त्र इसे शक्तियां अर्जित करने का समय मानता है।

आकाश में पूरा चांद निकलते ही कई तांत्रिक सिद्घियां प्राप्त करने में जुट जाते हैं। चन्द्रमा प्राकृतिक तौर पर बहुत सूक्ष्म प्रभाव डालता है जिसे साधारण तौर से नहीं आंका जा सकता लेकिन कई बार ये प्रभाव बहुत बढ जाता है जिसके कई कारण हो सकते हैं।

ज्योतिष शास्त्र इसके संबंध में कहता है कि चन्द्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर भूकंपसमुद्री आंधियांतूफानी हवाएंअति वर्षाभूस्खलन आदि लाता हैं। रात को चमकता पूरा चांद मानव सहित जीव-जंतुओं पर भी गहरा असर डालता है।

चन्द्रमा एक शीत और नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में मुख्य रूप से माता तथा मन के कारक माने जाते हैं और क्योंकि माता तथा मन दोनों ही किसी भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व रखते हैंइसलिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्त्वपूर्ण होती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियोंजन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियोंपरा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियोंचिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियोंहोटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियोंसागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं।

किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चन्द्रमा की स्थिति अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चन्द्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चन्द्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चन्द्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चन्द्रमा की अपनी राशि है। चन्द्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदुसंवेदनशीलभावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐशवर्य प्राप्त हो जाते हैं।

शरीर के हिस्से——

चंद्रमा का मन पर प्रभाव होता है। सीनाबहती वस्तुओं का कारक ग्रह होने से शरीर में स्थित द्रव्य जैसे रक्तमूत्रपाचक रसपाचन क्रिया पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। रात में प्राकृतिक रोशनी चंद्रमा से ही मिलती है इसलिए दृष्टि व आंख चंद्रमा के अधिकार में है। पुरुषों की बांयी तथा स्त्रियों की दायीं आंख तथा वक्षस्थल पर चंद्रमा का प्रभाव होता है।

गुण——

चंद्रमा की रोशनी शीतल है इसलिए शीतलताठंडकपानी से जुड़ा हुआहवा में स्थित भांपगति में बदलावसैर की चाह इत्यादि चंद्रमा का गुण धर्म है। चंद्रमा की कर्क राशि कुण्डली में (कालपुरुष की गणना में) चतुर्थ स्थान पर है। यह चतुर्थ स्थान भवनभूमिमातृभूमि को दर्शाता हैइसलिए भूमिभवनदेशप्रेम की भावना का भी विचार चंद्रमा से किया जाता है।

बीमारियां——

चंद्रमा का मन पर प्रभाव है। इसलिए मन के रोगअजीब व्यवहारचिड़चिड़ापनउन्माद की बीमारियां आदि चंद्रमा से देखी जाती हैं। पाचन की शिकायतेंबहती वस्तुओं पर अधिकार जैसे खांसीजुकामब्राकायटीसहाइड्रोशीलकफ से जुड़ी बीमारियांदृष्टि दोष चंद्रमा से देखे जाते हैं।

कारोबार—–

चंद्रमा जल से जुड़ा है इसलिए सिंचाईजल विभागमछलीनौसेनामोती आदि का कारोबार इससे देखा जाता है। चूंकि चंद्रमा बहती वस्तुओं से संबंधित है इसलिए कैरोसिनपेट्रोल के कारोबार पर इसका नियंत्रण है। स्नेह का कारक ग्रह होने से फूलनर्सरी व रसों से जुड़ा कारोबार इसके अधिकार क्षेत्र में आता है।

उत्पाद—–

चंद्रमा तेज गति वाला ग्रह है इसलिए जल्दी बढ़ने वाली सब्जियांरसदार फलगन्नाशकरकंदकेसर और मक्का इसके उत्पाद हैं। चंद्रमा रंगों का भी कारक ग्रह है इसलिए निकिलचांदीमोतीकपूरमत्स्य निर्माणसिल्वर प्लेटेड मोती जैसे वस्तुएं बनाने का कारोबार चंद्रमा के अधिकार में है।

स्थान—–

शीतलता का कारक ग्रह होने से हिल स्टेशनपानी से जुड़े स्थानटंकियांकुएंहरे पेड़ों से सजे जंगलदूध से जुड़ा स्थानगाय-भैंसों का तबेलाफ्रिजपीने का पानी रखने का स्थानहैंडपंप आदि को चंद्रमा का स्थान माना जाता है।

जानवर व पंक्षी—–

छोटे पालतू जानवरकुत्ताबिल्लीसफेद चूहेबत्तखकछुआकेकड़ामछली के शरीर पर चंद्रमा का अधिकार होता है। चंद्रमा रस निर्माण का कारक ग्रह है इसलिए रसदार फलगन्नाफूल-गोभीककड़ीखीराव जल में पनपने वाली सब्जियों पर चंद्रमा का अधिकार है।

चन्द्रमा मनुष्य के शरीर में कफ प्रवृति तथा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शरीर के अंदर द्रव्यों की मात्राबल तथा बहाव को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्य से अधिक वजनी हो सकते हैं जिसका कारण मुख्य तौर पर चन्द्रमा का जल तत्व पर नियंत्रण होना ही होता है जिसके कारण ऐसे जातकों में सामान्य से अधिक निद्रा लेने की प्रवृति बन जाती है तथा कुछेक जातकों को काम कम करने की आदत होने से या अवसर ही कम मिलने के कारण भी उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे जातकों को आम तौर पर कफ तथा शरीर के द्रव्यों से संबंधित रोग या मानसिक परेशानियों से संबंधित रोग ही लगते हैं।

कुंडली में चन्द्रमा के बलहीन होने पर अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर दूषित होने पर जातक की मानसिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उसे मिलने वाली सुख-सुविधाओं में भी कमी आ जाती है। चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होकर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष और अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण भी चन्द्रमा बलहीन हो जाते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु तथा केतु का प्रबल प्रभाव चन्द्रमा को बुरी तरह से दूषित कर सकता है तथा कुंडली धारक को मानसिक रोगों से पीड़ित भी कर सकता है। चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को अनिद्रा तथा बेचैनी जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है जिसके कारण जातक को नींद आने में बहुत कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की बलहीनता अथवा चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार के जातकों को उनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों से संबंधित समस्याएं आ सकती हैं।

गोचर और चन्द्रमा

व्यक्ति के जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में होते हैंलग्न निकालकर कुंडली में उस राशि में लिखे जाते हैं। ग्रहों की गति के आकार पर राशि परिवर्तन की अवधि होती है। सूर्य की गति स्थिर अर्थात् एक अंश प्रतिदिन के हिसाब से 30 दिवस में राशि परिवर्तन कर लेता है। चंद्रमा की गति काफी तीव्र होने से राशि परिवर्तन सवा दो दिन में कर लेता है।समाचार पत्रों में जो दैनिक भविष्यफल दिया जाता हैउसके अंत में आमतौर पर लिखा होता हैगोचर देखें। आम व्यक्ति गोचर समझता नहीं है। ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण को गोचर कहते हैं। पाश्चात्य देशों में लग्न एवं सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर गोचर फलादेश तैयार करते हैंलेकिन हमारे यहां चंद्रमा जिस राशि में होता हैउसे लग्न मानकर गोचर फलकिया जाता है।

कल्याण शकट योग

वैद्यनाथ दीक्षित के अनुसार कल्याण शकट योग का निर्माण तभी होता है जब गुरू से चन्द्रमा 6 या आठ भाव में हो। इस योग का केवल एक ही अपवाद है कि यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो यह योग भंग हो जाता है।

शषष्टमा गताश्चन्द्र सूर्य राज पुरोहित: केन्द्र दान्य गतो लग्नाद्योग: शकट समग्नित:।। परिणामों पर विचार करते हैं तो

अपि राजा कुले जातो निश्व शकट योगज:। क्लेश यशवस नित्यम संतोप्त निरूप विप्रय:।।

अर्थचाहे कोई व्यक्ति राज परिवार में क्यों नहीं जन्मेइस योग वाले को निर्धनतादिन-प्रतिदिन दु:ख-कष्ट और अन्य राजाओं के क्रोध का भाजन बनना प़डता है।

मंत्रेश्वरफलदीपिकाकार के अनुसारजीवन्त्यश्तरी समष्टे शशिनितु शकट:केन्द्रगे नास्ते लग्नथ:।।

जब बृहस्पति से छठेआठवें या बारहवें भाव में चन्द्र हो तो शकट योग बनता है परन्तु यदि चन्द्र केन्द्र में हो तो शकट योग भंग हो जाता है।

क्वचित क्वचित भाग्य परिचयत: सन् पुन: सर्वा मुपैते भाग्य:,

लोके प्रस्तीधो परिहर्य मन्त: सल्यम प्रपन्न: शकटे ति दु:खी:।।

इस शकट योग में जन्मा जातक प्राय: भाग्यहीन होता है अथवा भाग्यहीन हो जाता है और जीवन में खोए हुए को पुन: पा भी सकता है और प्रतिष्ठा आदि में एक सामान्य व्यक्ति होता है और इस दुनिया में उसका कोई महत्व नहीं होता है। वह नि:स्संदेह भारी मानसिक वेदना सहता है और जीवन में दु:खी ही रह जाता है। दूसरे विद्वानों के विचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो यह देखते हैं कि

यदि चन्द्र अपनी उच्चा राशि में होस्वग्रही हो अथवा बृहस्पति के भावों में हो और चन्द्रमा बृहस्पति से छठेआठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो यह शकट योग का अपवाद बन जाता है। ऎसी स्थिति में शकट योग ही भंग नहीं होता अपितु उसके दुष्परिणाम भी आते हैं परन्तु यही योग जातक को मुकुट योग देकर ऊंचाइयों पर भी पहुंचा देता है।

यदि चन्द्रमा बृहस्पति से छठे-आठवें भाव में हो परन्तु वह मंगल से दृष्ट हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

यदि राहु-चन्द्र की युति हो अथवा राहु उन्हें देखें तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

बृहस्पति से छठेआठवें या बारहवें भाव में पूर्ण चन्द्र स्थित हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

यदि षड्बल में बृहस्पति चन्द्र से बली हों तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

यदि चन्द्र बृहस्पति से छठे आठवें भाव में स्थित होकर द्वितीय भाव में बैठे तो शकट योग भंग हो जाता है और व्यक्ति धनी होता है। ऎसी ग्रह स्थिति मिथुन लग्न वाले जातकों की ही होती है। चन्द्र से छठे भाव में स्थित बृहस्पति से हंस योग का निर्माण होता है क्योंकि वे निज भाव में होंगे जो सप्तमेश और दशमेश का लग्न से केन्द्र स्थान होगाचन्द्रमा से अष्टम भाव में स्थित होने पर जातक धनवान नहीं बन सकता है। सूर्य नवम भाव में स्थित होकर गुरू से युति करें और द्वितीय भाव में चन्द्रमा पर उनकी पूर्ण रश्मियां प़डें तो जातक प्रचुर धन का स्वामी हो सकता है परन्तु ऎसी स्थिति में गुरू अस्तंगत दोष से मुक्त हों अथवा दुष्प्रभाव में नहीं हों।

द्वितीय भाव में स्थित उच्चा के गुरू से अष्टम भाव में चन्द्र की स्थिति शुभ नहीं होती है और ऎसे जातक संभवत: 40 वर्ष की आयु होते-होते सब कुछ गंवा देते हैं परन्तु यह बाद में आने वाली दशाओं पर निर्भर करता है कि वह अपना खोया धन और सम्मान पुन: प्राप्त कर लें। माना कोई जातक शनि महादशा में हो और 40 वर्ष की आयु का हो चुका है तो वह बृहस्पति की दशा में सब कुछ गंवा देगा और शनि की अंतर्दशा में पुन: प्राप्त कर लेगा। यदि शनि उनकी कुंडली में शुभ स्थिति में हो। तुला और मीन लग्न के जातकों का शनि शुभ स्थिति में होता है। वृश्चिक में भी शनि की स्थिति ठीक होती है। बृहस्पति से द्वादश भाव में स्थित चन्द्रमा अनफा योग का सृजन करते हैं। द्वितीय भाव के स्वामी लग्नस्थ होकर चन्द्र या बृहस्पति की अन्तर्दशा में किसी जातक को बर्बाद नहीं करते। बहुत सी कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद अब मुझे यह विश्वास हो गया है कि शकट योग के कुछ भी परिणाम होते हों परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि जीवन में बुरे दिन सदा नहीं रहते। जीवन परिवर्तनशील है। बुरा समय जीवन में परीक्षा लेता है और इस परीक्षा एवं कसौटी के लिए शकट योग एक महत्वपूर्ण स्थिति है। योग जीवन में बहुत लंबे समय तक फलीभूत नहीं होते हैं। कुछ समय बाद ये योग स्वत: विलीन होने लगते हैं। यहां मंत्रेश्वर महाराज हमें आशा दिलाते हैं कि रूठा हुआ भाग्य पुन: मनाया जा सकता हैखोई हुई प्रतिष्ठा और धन पुन: अर्जित किए जा सकते हैं। एक साधारण एवं गरीब व्यक्ति भी मानसिक रूप से बहुत प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो सकता है अथवा वही व्यक्ति बहुत अधिक दु:खीपीç़डत और कष्ट से भरा जीवन व्यतीत करता है। ये सभी परिस्थितियां विभिन्न प्रकार के योगायोगशकट योगादि के कारण बनती हैं और कई बार इनके अपवाद भी पाए जाते हैं।

चन्द्र ग्रह शांति के उपाय—–

क्या दान करें..???

चन्द्रमा के नीच अथवा मंद होने पर शंख का दान करना उत्तम होता है. इसके अलावा सफेद वस्त्रचांदीचावलभात एवं दूध का दान भी पीड़ित चन्द्रमा वाले व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है. जल दान अर्थात प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना से भी चन्द्रमा की विपरीत दशा में सुधार होता है. अगर आपका चन्द्रमा पीड़ित है तो आपको चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न दान करना चाहिए. चन्दमा से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करते समय ध्यान रखें कि दिन सोमवार हो और संध्या काल हो. ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा से सम्बन्धित वस्तुओं के दान के लिए महिलाओं को सुपात्र बताया गया है अत: दान किसी महिला को दें. आपका चन्द्रमा कमज़ोर है तो आपको सोमवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गूंथा हुआ आटा खिलाना चाहिए तथा कौए को भात और चीनी मिलाकर देना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को दूध में बना हुआ खीर खिलाना चाहिए. सेवा धर्म से भी चन्द्रमा की दशा में सुधार संभव है. सेवा धर्म से आप चन्द्रमा की दशा में सुधार करना चाहते है तो इसके लिए आपको माता और माता समान महिला एवं वृद्ध महिलाओं की सेवा करनी चाहिए.

जन्म कुंडली में चंद्र ग्रह यदि अशुभ कारक हो तो निम्न लिखित मन्त्रों का जप करने से चंद्र ग्रह की शांति हो जाती है।

वैदिक मंत्र– ॐइमं देवा असपत्न सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना  राजा।

पुराणोक्त मंत्र- ॐ दधिशंखतुषाराम्भं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।नमामि शशिनं सोमं शंभोः मुकुट भूषणम्।।

स्नान तथा दान काल में यह मंत्र का उच्चारण लाभप्रद होता है।

तंत्रोक्त मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।

चन्द्रमा के जप की संख्या 11000 है।

चन्द्र गायत्री मंत्र- ॐ अमृतांगाय विद्महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्।

अर्घ्य मंत्र- ॐ सों सोमाय नमः।

चन्द्र रत्न- चन्द्र ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु मोती रत्न धारण किया जाता है।

औषधि स्नान – चन्द्र ग्रह की शांति के लिए पंचगव्यबेल गिरीगजमदशंखसिप्पीश्वेत चंदनस्फटिक से स्नान करना चंद्रमा जनित अनिष्ट प्रभावों को कम करता है। भगवान शिव का पूजन सोमवार के दिन करना तथा पूर्ण चन्द्र के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करने से चन्द्र ग्रह की शांति हो जाती है।

चन्द्र यंत्र- चन्द्रमा ग्रह की शान्ति हेतु चन्द्र होरा में चांदी के पत्र में चन्द्र यंत्र खुदवाकर या अष्टगन्ध से भोजपत्र पर लिखकर उसकी विधिवतपूजन कर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए। अन्य उपाय- सोमवार का व्रत रखकर चावल सफेद वस्त्रआदि सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए। सोमवार को प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शंकर की मूर्ति पर जल तथा दूध चढाना चाहिए।

कुछ मुख्य अन्य उपाय/टोटके निम्न है-

व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए। रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।

ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।

वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।

वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।

सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पीना चाहिए।

सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।

क्या न करें..???

ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को प्रतिदिन दूध नहीं पीना चाहिए. श्वेत वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए. सुगंध नहीं लगाना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिएल

वैसे तो चन्द्र देव का स्वभाव स्वभाव बहुत शांत और ठंडा होता है और यही वजह है कि वो हम सभी को शीतलता प्रदान करते है किन्तु जब वे गुस्से में आते है तो उसके परिणाम बहुत भयंकर और विनाशकारी हो सकते है. इसलिए कभी भी चन्द्र देव को कुपित ना होने दें और अगर वे कभी आपसे रुष्ट हो भी जाएँ तो आप तुरंत कुछ उपायों को अपनाकर उन्हें जल्दी से प्रसन्न कर लें. आज हम चन्द्र देव से जुडी कुछ ऐसी बातें बताने वाले है जिन्हें जानकार आप पता लगा सकते हो कि चन्द्र देव आपसे रुष्ट है या नहीं और अगर है तो उन्हें किस तरह मनाया जा सकता है.

कुपित चन्द्रमा के संकेत

1. मानसिक परेशानी  : चंद्रमा के रुष्ट होते ही जो पहला संकेत सामने आता है वो है मानसिक चिंता व परेशानीऐसे में जातक खुद को फंसा फंसा महसूस करता हैउसे समझ नहीं आता कि वो अपनी समस्याओं से कैसे बाहर निकलें.

2. माता से दूर होना : जातक की माता भी उससे रुष्ट हो जाती है और वो अपनी माँ के सुख की कमी महसूस करता है. कहने का अर्थ ये है कि उसके और उसकी माता के बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहता.

3. बायीं आँख में कमजोरी :  अगर किसी व्यक्ति की बायीं आँख अचानक कमजोर हो जाती है तो उन्हें समझ जाना चाहियें कि उनकी कुंडली में चन्द्रमा रुष्ट हो चुके है.

4. आँखों के पास कालापन  : यहीं नहीं जातक की आँखों के पास कालापन भी दिखने लगता है जो उसके बुरे समय और थकान को दर्शाता है.

5. छाती में मलगम जमना  : सुनने में तो ये आपको सामान्य सा लक्षण लगता है किन्तु जब अगर आप बाकी संकेतों के साथ इसे देखा जाए तो ये पुष्टि करता है कि हाँ सच में चन्द्रमा कुपित हो चुके है. यहीं नहीं उन्हें अन्य वात रोग भी अपना शिकार बना लेते है.

6. पुराने दिनों का स्मरण : क्योकि चन्द्रमा के गुस्सा होने पर जातक का बुरा समय आरम्भ हो जाता है इसलिए उसे बार बार अपने पुराने दिन स्मरण होते रहते है.

7. अधिक नींद आना  : ऐसे में जातक खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से इतना थका लेता है कि उसे नींद आने लग जाती है और वो बिस्तर पर पड़ा रहता है.

8. मासिक धर्म में अनियमितता : अगर किसी महिला पर चन्द्र रुष्ट होते है तो उनके माहवारी चक्र में अनियमितता होनी शुरू हो जाती है.

9. बालों का सफ़ेद होना  : कहा जाता है कि चिंता करने से बाल सफ़ेद होते है जबकि बालों के सफ़ेद होने के पीछे भी चन्द्र देव का ही हाथ होता है.

10. सिर दर्द : जातक को धीरे धीरे अन्य बीमारियाँ अपना शिकार बना लेती है और उनमे सबसे पहले आता है साइनस.

11. जल का असंतुलन  : इसके अलावा जातक के अंदर जल का अभाव व असंतुलन बना रहता हैउसकी त्वचा शुष्क हो जाती हैवो खुद को कमजोर महसूस करने इस स्थिति में कुछ लोग तो जल्दी जल्दी पानी पीना आरम्भ कर देते है.

12. शरीर में कैल्शियम की कमी : पानी के साथ साथ पीड़ित के शरीर का कैल्शी लगातार कम होता जाता है और उसके शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगती है.

तत्व अनुसार रुष्ट चंद्रमा को मनाएं -

अग्नि तत्व : अगर चन्द्अग्नि तत्व में होने पर कुपित होता है तो जातक को सोमवार के व्रत रखने के साथ साथ चंद्रा की हवन सामग्री से हवन अवश्य कराना चाहियें.

वायु तत्व : वहीँ उनके वायु तत्व में नाराज होने पर आपको चन्द्रमा के सामान को जमीन में दबा देना चाहियें. अगर आप ये ना कर सकें तो आप चन्द्रमा की अंगूठी को अवश्य पहनें.

जल तत्व : लेकिन अगर चन्द्र जल तत्व में रुष्ट है तो आपको सोमवार के दिन कच्चे चावल लेने है और उन्हें बहते पानी में प्रवाहित करना है. इसके अलावा आप किसी महिला को चन्द्रमा का सामान भी अवश्य दें.

पृथ्वी तत्व  : पृथ्वी तत्व में चन्द्र के गुस्सा होने पर आपको “ ॐ श्राम् श्रीं श्रोम् सः चंद्रमसे नमः ” मंत्र का जाप करना हैध्यान रहें कि मंत्र जाप रात को या शिवजी की पूजा के वक़्त ही करें.

चंद्रमाँ के लिए शिवकृष्णभगवती पार्वतीकी उपासना और संकस्टी चतुर्थी और पूर्णिमा को सत्यनारायण का व्रत श्रेष्ठ 

कस्टप्रद नीच या बल हीन चंद्र के दान करे

चावलपानीदूध चाँदीसफ़ेद वस्त्र का दान करे पीने के पानी की व्यवस्था करे

पुष्य नक्षत्र में शिव अभिषेक जल और दूध से श्रेष्ठपितरो को प्रसन्न करेमाता को सम्मान करे और उन्हें खुश रखे ल

 चन्द्र

चांदी, शंख, सीपी, गौदुग्ध, गोदही, मोती, सफेद कमल/सफेद गुलाब,

गौमूत्र, गौघृत, गाय का मट्ठा आदि जल में डालकर प्रथम उससे स्नान करें, फिर

शुद्ध जल से।

कपूर, मोती, चांदी, चावल, चीनी, खीर, दूध, मिश्री, खांड़, दही, मट्ठा,

बताशे, सफेद गाय/बैल, सफेद वस्त्र, पेठा आदि का सोमवार को दान करें तथा

सफेद वस्त्र पहनें। यह पूर्णमासी की शाम को भी कर सकते हैं।

→ अश्विनी पूर्णिमा से वर्षभर पूर्णमासी का व्रत करें अथवा शुक्ल पक्ष के

प्रथम सोमवार से दस सोमवार का व्रत करें तथा रात को चन्द्र पूजन करके सफेद

फूल, सफेद चन्दन मिले जल से चन्द्र को अर्घ्य दें। चन्द्र मन्त्र का जाप करें। सफेद


वस्त्र व सफेद चंदन धारण करें। प्रदोष व्रत या सावन के सोमवार के शिव के व्रत


करें। शिवलिंग पर जल व दूध का नित्य अभिषेक करें। शिव चालीसा का पाठ करें


तथा रुद्राक्ष पूजन करें।


→ चन्द्र के 11000 मंत्रों का जाप करें अथवा 'ॐ हिम् नमः शिवाय' यंत्र


का सवा लाख जाप का अनुष्ठान करे और बाद में किसी सुन्दर स्त्री को भोजन


कराकर चन्द्र सम्बन्धी वस्तुएं दान दें।


चांदी के आभूषण तथा मोतियों की माला पहनें, सोमवार को नमक न


खाएं व भोजन एक बार ही करें। ब्राह्मण/सुंदर स्त्री को खीर/दूध खिलाएं/पिलाएं।


सफेद शंख को घर में रखें तथा उसका पूजन नित्य करें।


शिवपुराण से चन्द्रमा के शापग्रस्त होकर क्षय रोगी हो जाने तथा फिर


शिवोपासना से स्वस्थ हो जाने वाले प्रसंग का नित्य पाठ करें अथवा चन्द्र स्तोत्र का


पाठ करें। सफेद गाय को सफेद खाद्य पदार्थ नित्य खिलाएं व उसकी सेवा करें।


पूर्णमासी (विशेषकर शरद पूर्णिमा) की रात को खीर छलनी से ढककर


रात भर खुली छत पर चांदनी में रखें और प्रात: उसका सेवन बिना गरम किए ही


करें। माता, मौसी का आशीर्वाद लें व सेवा करें।


चंद्र माता योगिनी मङ्गला स्तोत्र (सिद्ध साबर तन्त्र)

श्री पार्वत्युवाच
सृष्टिस्थित्यन्तकारक |
मंगलायाश्चन्द्रमातुः स्तवनं ब्रूहि शंकर । '
देवदेव महादेव श्री शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।
ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||
मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।
चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥
चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।
शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥
वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।
त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥
दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।
सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥
एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।
चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।
मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥
(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)

श्री शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।
ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||
मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।
चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥
चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।
शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥
वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।
त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥
दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।
सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥
एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।
चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।
मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥
(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)
अथ चंद्र कवच 
विनियोग : अस्य
छन्द, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
चन्द्रकवचम्
श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य
गौतम-ऋषिः, अनुष्टुप्-
अथ कवचम्
केयूरमुकुटोज्वलम् ।
समं चतुर्भुजं वन्दे
वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।
शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥
चक्षुषी चन्द्रमा पातु श्रुती पातु निशापतिः ।
प्राणं छपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥
पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा।
करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः
हृदयं पातु मे चंद्रौ नाभि शंकरभूषणः ।
मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ।।
ऊरू तारापतिः मृगाको जानुनी सदा।
पातु
अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्रोऽखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम् ।
यः पठेच्छृणुयाद् वाऽपि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥
॥ इतिश्री चन्द्रकवचम् ॥
चन्द्राऽष्टाविंशतिनामस्तोत्रम्
विनियोग : अस्य श्रीचन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रस्य गौतम ऋषिः, सोमो
देवता, विराट् छन्दः, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ स्तोत्रम्
चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते ।
यानि श्रुत्वा नरो दुःखान् मुच्यते नाऽत्र संशयः ॥
सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरजः कुमुदप्रियः ।
लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥
शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः ।
नक्षत्रनायकः
आत्रेय इन्दुः शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥
जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णव संभवः ।
शम्भुशिरश्चूडामणिर्विभुः ॥
तापहर्त्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् ।
प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥
तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत् सर्वं समीहितम् ।
ग्रहादीनां च सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥
॥ इतिश्री चन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ॥
चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम्
चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेय गोत्रोद्भव-
श्चाग्नेयश्तुरस्त्र वारुणमुखश्चापोऽप्युमाधीश्वरः
1
षट् सप्तानि दशैक शोभनफल शौरिः प्रियोऽकर्को गुरुः
स्वामी यामुनदेशजो हिमकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥
॥ इति श्री चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम् ॥


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