बुद्ध गृह की सम्पूर्ण सारगर्भित व्याख्या
बुध
सौम्योदडग्मुख पीतवर्ण मगधश्चात्रेय गोत्रोदभवो। बाणेशानदिशः सुहच्छनिभगुः शत्रु सदा शीतगु:॥ कन्या युग्मपतिर्दशाष्ट चतुरः षड्नेत्रकः शोभनो। विष्णु: पोरुषदेवते शशिसुतः कुर्यात् सदा मंगलम्॥ बुध की उत्पत्ति अत्रि गोत्र में मानी जाती है। बुध चेतना, इच्छा, सदाचार, मानव जीवन में तरक्की ओर चेतना शक्ति का मुख्य रूप से प्रतिनिधित्व करता है। ऐश्वर्य, प्रेम, उदारता, आकांक्षा, आत्मविश्वास आदि का यह संतुलनकर्ता है। यह पुरातत्ववेत्ता, आविष्कर्ता, राजा, मंत्री आदि का भी प्रतिनिधित्व करता है। हृदय, रक्त का संचालन, आंख, कान, हड्डी आदि पर भी बुध अपना अधिक-से-अधिक प्रभाव डालता है।
अच्छी देह, तोतली बोली वाला, अत्यधिक हंसने वाला, वात-पित्त-कफ (त्रिदोष) से युक्त प्रकृति वाला ग्रह बुध है।
ग्रह परिषद में बुध को युवराज का स्थान मिला है, यह छोटा ग्रह है और सदा सूर्य के साथ-साथ नभोमण्डल में अपनी धुरी पर गतिमान रहता है। सूर्य से 30* से अधिक दूर कभी नहीं रहता। सोम्य, नाथपुत्र, तुंग, रोहिणीपति, कुमार, श्यामगात्र, प्रभासुत, तारातनय, बोधन, एकांग, तारेय, तनुज, शान्त, शशधर, तनय, इन्दुपुत्र, यामिनी आदि बुध के पर्याय नाम हैं। बुध का हरा-सांवला रंग है, प्रकृति-त्रिदोष, वर्ण-वेश्य, तत्त्व-पृथ्वी, लिंग-नपुंसक, शुभ ग्रह, गुण-रजोगुण, दिशा-उत्तर, ऋतु-शरद, रस-सर्वरस, धातु-कांसा, उपधातु-सीप, पारा, भाव-सुख एवं कर्म-वाणी का स्वामी, अवस्था-कुमार, निवास स्थान-दिद्वानों के घर, वस्त्र-नए वस्त्र, लोक-मृत्युलोक, देवता-विष्णु हैं।
मिथुन और कन्या राशियों का अधिपति बुध है। कन्या में उच्च और मूल त्रिकोण तथा मीन राशि में नीच का हो जाता है। सूर्य-शुक्र इसके मित्र ग्रह, मंगल, बृहस्पति एवं शनि समग्रह तथा चंद्र शत्रु ग्रह है। यह अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है। मिथुन, कन्या, तुला, मकर, सिंह लग्नों के लिए बुध शुभकारक हे।
आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र पर बुध का अधिकार हे। जन्म समय में चंद्रमा इन नक्षत्रों में से किसी में हो तो बुध की महादशा रहती है। साहित्य, गणित, ज्योतिष, व्यापार, लेखन, शिल्पकार, कवि, वक्ता, मुद्रक, राजदूत, मित्र, पड़ोसी, पुस्तक-विक्रेता, दलाल, ज्ञानतन्तु , फेफड़े, मज्जा, हाथ, जिह्वा, त्वचा, मंदाग्नि शूलरोग, बैंक, डाक-तार विभाग आदि का कारक भी बुध है।
अच्छी देह, तोतली बोलीवाला, अत्यधिक हंसनेवाला, वात-पित्त-कफ(त्रिदोष्) से युक्त प्रकृतिवाला बुध ग्रह है।
ग्रह परिषद में बुध को युवराज का स्थान मिला है, यह छोटायह है और सदर सूर्थ के साथ-साथ नभोमण्डल में अपनी घुरी परगतिमान रहता है। सूर्य से 30° से अधिक दूर कभी नहीं रहता।सौम्य, नायपुत्र, ढुंग, रोहिणीपति, कुमार, श्यामगत्र, प्रभासुत,ताररतनय, बोधन, एकांग, तारेय, तनुज, शान्त, शशधर, तनय,इन्दुपुत्र, यामिनी आदि बुध के पर्याय नाम है। बुध का हरा-सांवलारंग है, प्रकृति-त्रिदोष, वर्ण-वैश्य, तत्त्व-पूथ्वी, लिंग-नपुंसक, शुभग्रह, गुण-रजोगुण, दिशा-उत्तर, ऋतु-शरद, रस-सर्वरस, घातु-कांसा,उपधातु-सीप, पारा, भाव-सुख एवं कर्म-राणी का स्वामी,अवस्था-कुमार, निवास स्थान-विद्वानों के घर, वस्त्र-नये वस्त्र,लोक-मूत्युलोक, देवता-विष्णु है।
बुध- संसर्ग दोष (युति) के कारण पापत्व या शुभत्व प्राप्त करता है। यदि स्वक्षेत्री, मूलत्रिकोण या उच्च राशि में हो, तो यह अपनी स्थिति के अनुरूप फल देता है। यह वाणिज्य, गिरिजाघर, विद्यालय, क्रीड़ा-क्षेत्र, उद्यान जुआघर, हरे चने, पन्ना, सीसा, तिलहन, खाद्य तेल, धात्विक, मुद्रा,यात्रिंक (मैकेनिक), क्र्लक, काव्य, शिक्षा, लेखन शक्ति, चिकित्सक, व्यापारी आदि बनाता है। हानि को हँसकर झेलना और व्यवसायिक या व्यापारिक गतिविधियों पर आधिपत्य रखता है।
मिथुन और कन्या राशियों का अधिपति बुध है। कन्या में उच्चऔर मूल त्रिकोण तथा मीन राशि में नीच कर हो जाता है। सूर्य-शुक्रइसके मित्र ग्रह, मंगल, बूहस्पति एवं शनि समग्रह तथा चन्द्र शत्रुग्रह है। यह अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दूष्टि से देखताहै। मिथुन, कन्या, वृष्, तुला, मकर, सिंह लग्नों के लिए बुधशुभकारक है।
आश्लेषा-ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र पर बुध का अधिकार है। जन्मसमय में चन्द्रमा इन नक्षत्रों में से किसी में हो तो बुध की महादशारहती है। साहित्य, गणित, ज्योतिष, व्यापार, लेखन, शिल्पकृर,कवि, बक्ता, मुद्रक, राजदूत, मित्र, पडोसी, पुस्तक-विक्रेता,दलाल, ज्ञानतन्तु, फेफड़े, मज्जा, हाथ, जिह्ना त्वचा, मंदाग्नि,शूलरोग, बैंक, डाक-तार विभाग आदि का कारक भी बुध है।
बुध की चार अवस्थाएँ
किसी चित्र में मनुष्य के जीवन की दस अवस्थाएँ बतलाई गई है।१) जन्म। २) पहले दस वर्षों में बचपन, खेलकूद की अवस्था। ३)तदनंतर २० वे वर्ष तक विद्याभ्यास की अवस्था-इसमेंमनुष्य के स्वमावका निर्माण होता है, आनंदी, बेफिक्र, आग्रही और हठी स्वमाब होता है,खा-पीकर चैन करने की प्रवृत्ती होती है, दूसरों के साथ मित्रता या झगड़ेकरने की इच्छा होती है। ४) इसके बाद ३० वें वर्ष तक उद्योग कीप्रारंभावस्था-इस में ब्याह होकर एकाध संतान भी होती है, व्यवसाय मेंस्वार्थी तथा अहंकारी प्रवृत्ती होती है, आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा होतीहै, सार्वजनिक क्षेत्र में नेता बनने की इच्छा होती है। ५) तदनंतर ४० वेंवर्ष तक दो चार लड़के लड़कियाँ होती हैं, व्यवसाय कर के कुछ थकजाते हैं, नाना प्रयत्नों में कभी यश तो कभी अपयश मिलता है, कोर्ट-कचचहरियों के बहुत से व्यवहार करने पड़ते है, किन्तु आयुष्य के बारे मेंसमाधान नहीं होता, इतना सब प्रयास व्यर्थ हुआ, ऐेसी भावना होती है।इस प्रकार मृत्यु तक और पांच अवस्थाएँ बतलाई गई है।
शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाये तो मनुष्य के जीवन की सात अवस्थाएँहैं-जन्म, बाल्य, कुमार, तारुण्य, प्रौढ, वृद्ध एवं मृत्यु। इनमें कुमार,तारुण्य, प्रौढ़ तथा वृद्धावस्था का विशेष विचार करना चाहिए। कुमारअवस्था में मनुष्य का स्वभाव बनता है। इस अवस्था में बुरी आदतो सेऔर कुसंगति से बचे को दूर रखना चाहिए। उसका विद्यम्यास ठीकतरह चलता रहना चाहिए। अच्छी आदतें डालनी चाहिए। इस प्रकार शीलसंपन्न होने पर वह तरुण अवस्था में प्रवेश करता है। इस समयशारीरिक वासनाएँ जागृत होती है। अतः योग्य समय में अनुरूप बधू केसाथ उसका ब्याह कर देना चाहिए। इस तरह वासनाओं पर नियंत्रण नरखा गया, तो प्रायः तरुण अवस्था में कुमार्ग की ओर प्रवृत होती है औरपरस्त्रियं में वह आसक्त होता है। इसी अवस्था में व्यवसाय का आरंमकर धनार्जन भी करना पड़ता है। प्रौढ अवस्था में बच्चों का पालनपोषणकरने का भार होता है, व्यवसाय में नाना प्रकार के मौके आते है, जिनमेंकभी यशं, अपयश मिलता है। वृद्धावस्था में बच्चे सयाने होकर अपनाकाम देखने लगते है। यह निवृत्ति की आयु है यद्यपि बहुत से लोग इसमेंभी बहुत विषयासक्त होते हैं।
ग्रहमाला में चौथे स्थान पर बुध ग्रह है। इसकी भी चार अवस्थाएँहोती है। मिथुन, तुला तथा कुंभ में कुमार अवस्था, मेष, सिंह तथा धनुमें तरुण अवस्था, वृषभ, कन्या तथा मकर में प्रौद अवस्था एवं कर्क,वृश्चिक तथा मीन में वृद्ध अवस्था ऐसा इसका विभाजन हमने किया है।बुध कुमार अवस्था में हो तो जीवन भर नया अभ्यास करने की प्रवृतिहोती है। स्वभाव आग्रही, ्रधी, कामुक होता है, बहुत बोलने की प्रवृतिहोती है और बुद्धिशान्त होती है। यह तरुण अवस्था में हो, तो विषयासककप्रवृति होती है, झंगड़ालू, किन्तु विद्वान और बुद्धिमान होता है। अभिमानबहुत होता है, विरोध सहन करने की इसे बिलकुल इच्छा नहीं होती। प्रौदअवस्था में इसकी बुद्धि शान्त और स्थिर होती है। सलाह ठिक तरह देना,बुद्धि का दुरुपयोग न करना यह इसकी विशेषता होती है। ृद्धावस्था मेंबुद्धि विपरीत होती है, उसका दुरुपयोग करते हैं। खुद कर्त्यशत्य होनेपर भी दूसरों की निन्दा करते हैं। ये बुध की चार अवस्थाएँ हैं।
बुध का स्वरूप
इस प्रकरण में बुध के रुपरंग के बारे में कुछ विचार करना है। पहलेप्राचीन ग्रंथकारों के मत देकर फिर उसका विवेचन करेंगे।
आचार्य-दूर्वाश्यामो ज्ञ: इसका रंग दूर्वा के समान साँवला है। हरितः-हरा रंग है। वस्त्र-सड़ा हुआ। स्थान-क्रीडास्थान। धातु-त्वचा। ऋतु-शरद्। रुचि-मित्र। अवस्था-कुमार। धातु-सींप ये इनके अन्य वर्णन हैं।
वैद्यनाथ-शिरसा ज्ञः-इसका उदय सिर की ओर से होता हैं। झौविहगस्वरूपः-रूप पक्षी जैसा है। बुधालयग्रामचरौ गुरुज्ञी-गुरु और बुधये दो ग्रह विद्वानों के घर और गाँव के कारक हैं। शाखाधिपो बोधनः-यहशाखाधिप है। देवता-हरि; रत्न-मरकत तथा गरुत्मत्-गरुड मणि; दिशा-उत्तर; प्रदेश-विंध्य पर्वत से गंगा नदी तक (विंध्यान्तमार्यःसुरनिम्नगान्तंबुधः।) जाति-शूद्र (शूद्र कुलाधिपःशशिसुतः) झ्ञःसरजोगुणः- यहरजोगुणी है। षंढप्रकृतिः पुरुषःशाशिजः-यह नपुंसक है।
पराशर-प्रायः वैद्यनाथ के समान मत है। त्वं क्षोणी (पृथ्वी त्त्व)
तारासुतः त्वग्धातुनाथः-यह त्वचा धातु का स्वामी है। दृष्टिः कटाक्षेणइन्दुसूनोः-बुध की दृष्टि तिर्छी होती है। बलवान होने का समय-बुधःसदाकालजवीर्यशालिनः-नित्य ही बलवान होता है।स्वभाव-चंद्रसुतस्तुमिश्रः-स्वभाव मिश्र है। पराजय-असुरमंत्रिणा बुधः-शुक्र से बुध कापराजय होता है। बलवान होने का समय-कल्यानृयुम्मभवने निजवारवगेंचापे विना रविमहर्निशमिन्दुसूनुः। सौम्यायने च बलवानपि राशिमध्ये लस्नेसदा यदि यशोबलवृद्धिदः स्यात्॥ कन्या और मिधुन राशि में, बुधवारको, द्रेष्काण तथा नवांश कुण्डली में स्वगृह में, धनु राशि में (रवि के साथ न हो तो), रात को तथा दिन को, विषुव के उत्तर में तथा राशि केमध्यभाग में बुध बलवान होता है। यह लझ में हो तो यश और बल कीवृद्धि करता है। राहुदोषं बुधो हन्यात्। राहु के दोष बुध से दूर होते हैं।शशिजश्चतुर्थें विफलो भवति। बुध चतुर्थ स्थान में निर्वल होता है।
कल्याणवर्मा-बुधो नरकाधिवासानाम्। यह नरक लोक का स्वामीहै। शशिजोथववेदराट्-यह अथ्ववेद का स्वामी है। प्रार्बुधः-यह सुबहके समय बलवान होता है। अन्य वर्णन वैद्यनाथ के समान है।
जयदेव-बुधो ग्रामचारी-यह गाँव में घूमनेवाला होता है। बुधातजीवर्चिंता-जीव के विषय में विचार बुध से करें। ब्राह्मणो रोहिणीभवःयह ब्राह्मण वर्ण का है। शिशुः सौम्यः- इसकी अवस्था बाल है।शुद्धधिश्षद्रपत्रः-यह शूद्रों का स्वामी है। वस्त्र-जलार्द-पानी से भीगाहुआ। धातु-युक्तरुप्यं- कांसा, जस्त।
मैदान।गुणाकार-वर्ण-नील; धातु-पीतल, कासा; स्थान-खेलकूद का
मन्त्रेश्वर-वर्ण-सावला; धान्य-हरे रंग के चने; प्रदेश-मगध (दक्षिणबिहार); आयु-नखं २० वर्ष, दाहिने भाग पर कुछ निशान बना होता है।रामदयाल-बुधो वैश्यः-यह वैश्य वर्ण का है।
सर्वार्थचिन्तामणि-विद् वैश्यः) वस्त्रं हरितं श्यामं कषमं-हरे साँबलेरेशमी वस्त्र।
पुंजराज-ज्ञःतमक्ष,तिर्यमन्बुधः। यह तमोगुणी है तथा मध्यलोक कास्वामी है।
कालिदास-वस्त्र-नया तथा गीला; ऋतु-हेमंत; अंग-नाभि; स्थान-उद्यान तथा खेलकूद के मैदान; काष्ठ, गला।
विलियम लिली-इसका रंग धूसर, चमकता हुआ चांदी के समानहै। दक्षिण की ओर अधिकतम शर ३ अंश ३५ मिनिट है तथा उत्तर कीओर ३ अंश ३३ मिनिट है। इसको पुरुष या स्त्री ग्रह कहना ठीक नहींक्यों कि अन्य ग्रहों का जैसा सम्बन्ध हो वैसे दोनों गुणधर्म इसमें मिलतेहैं। पुरुष ग्रह साथ में हो तो यह भी पुरुष प्रवृत्ति का होता है, सत्री ग्रह साथहो तो इसकी भी स्त्री प्रवृत्ति होती है। यह शीतल, रुखा और उदास प्रवृत्तिका ग्रह है। कूट कारस्थान करानेवाला ग्रह है।
बेसीलिओ-पारे पर इसका स्वामित्व है।
उपर्युक्त फलों का विवेचन
रंग-इसे दूर्वा के समान साँवला माना गया है। किन्तु यह ठीक नहींक्योंकि इसका रंग आँखो को कुछ पीला-नीला दिखता है। गुणाकर नेनीला रंग कहा है। पाश्चात्यों ने स्लेट, पिक, ग्रे ऐेसे मिश्र रंग कहे हैं।
त्वचा-यह धातु बुध के अधिकार में देना ठीक नहीं क्योंकि त्वचाके रोग जब होते हैं तब कुण्डली में बुध दूषित नहीं होता। बुध दूषित होनेसे पागलपन, फिट आना, मस्तिष्क के रोग आदि विकार होते हैं। त्वचाका स्वामी मंगल मेष, सिंह, धनु, मकर और कुंभ में हो तो त्वचा रुक्ष औरमोटी होती है। मंगल वृषषभ और वृश्चिक में हो तो त्वचा मोटी किन्तुनाजुक होती है। मिथुन और तुला के मंगल से त्वचा पतली किन्तु मजबुतहोती है। कर्क, कन्या और मीन के मंगल से त्वचा पतली ओर नाजुकहोती है। बुध की स्थिति अच्छी होते हुए भी मंगल दूषित हो तो त्वचारोगहोते हैं। इसब, नायटा, फोड़ेफुन्सी, खुजली, चेचक, कोढ़ आदि रोग ऐेसीस्थिति में होते हैं। अतः त्वचा धातु पर मंगल का और मजजा धातु पर बुधका अधिकार मानना चाहिए।
स्थान-खेलकूद का मैदान। बुध को कुमार अवस्था का मानकर यहवर्णन किया गया है। किन्तु आजकल विज्ञान की बहुत प्रगति हुरई है।तदनुसार बुद्धि काक्षेत्र भी अब बुध के अधिकार में आ सकता है।
वस्त्र-सड़ा तथा गीला चस्त्र बुध के अधिकार में है। इसकी उपपतिस्पष्ट नहीं। कालिदास ने नया चस्त्र कहा, वह योग्य प्रतीत होता है।
धातु-सीप अथवा पारा यह इसकी धातु कही गई है, इसकी भी।उपपत्त स्पष्ट नहीं। हमारे विचार से सीसा धातु योग्य है क्योंकि यहलिखने के लिए उपयोग में आती है।
ऋतु-शरद। कुछ ग्रंथकारों ने हेमंत ऋतु कहा, वह ठीक नहीं है।शरद ऋतु में सृष्ट परफुछित होती है; खेती हरीभरी होती है और बुध कारंग भी हरा माना गया है।
रुचि-मिश्र। बुध के स्वामित्व के व्यक्तियों को मुख्यतः खट्टे पदार्थ।जैसे दही, छाछ, इमली, आचार आदि बहुत प्रिय होते हैं। पाशात्यज्योतिषियों ने शीतल और कषैली रूचि कही है।
अवस्था-कुमार। यह आकार से सब ग्रहों में छोटा है। इसे राजपुत्रमाना गया, यह योग्य ही है।
उदय-इसका उदय सिर की ओर से होता है। ग्रहों के उदय काविवेचन रवि विचार में किया गया है।
स्वरुप-जौविहगस्वरूपौ। से पक्षी माना गया है। अंग्रेजी में इसेबिंग मेसेंजर कह सकते हैं। इस युग में रेडियो, तार आदि द्वारा संदेशभेजने का कार्य होता है, वैसा पहले पक्षियों द्वारा संदेश भेजा जाता था।तदनुसार यह कल्पना की गई है।
निवासस्थान-विद्वानों के घरों तथा गाँवों में इसका निवास मानागया है। यह ठीक ही है।
शाखाधिप-इस वर्णन का उपयोग स्पष्ट नहीं।
देवता-विष्णु। हमारे विचार से बुध ज्ञान का कारक है, अतःज्ञानकी देवता सरस्वती ही इस ग्रह की देवता मानी जानी चाहिए।रत्न-मरकत। हमारे विचार से चित्रविचित्र रंग का ओपल नामकरत्न बुध का माना जाना चाहिए। इसका अनुभव हमने देखा है। एकलड़का बुद्धिमान था किन्तु स्कूल में नहीं जाता था और आवारा जैसाबरताव करता था। इसे गले में ओपल पहनाया गया, तब से इसकी प्रवृत्तिशांत हुई और वह एक अच्छे विद्यार्थी के रुप में प्रसिद्ध हुआ।दिशा और प्रदेश-उत्तर दिशा देवों की और विद्वानों की दिशा मानीगई है, अतः यही बुध की दिशा है। विध्य पर्वत से गंगा नदी तक के प्रदेशपर इसका स्वामित्व माना गया है। मंत्रेश्वर ने मगध प्रदेश कहा, वह योग्यनहीं।
वर्ण-विभिन्न ग्ंथकारों ने इसे शूद्र, वैश्य अथवा ब्राह्मण वर्ण कामाना है। यह ज्ञान का उपासक है, अतः इसे ब्राह्मण मानना ठीक होगा।गुण-इसे रजोगुणी कहा गया है। यह अकेला स्वतंत्र हो, तो यहवर्णन ठीक प्रतीत होता है। अन्य ग्रहों के साथ हो, तो उन ग्रहों केअनुसार गुण प्रकट करता है। पुंजराज ने तमोगुणी माना है।पौरुष-इसे नपुंसक प्रकृति का माना गया है। हमारे विचार से यहवर्णन विलकुल ठीक नहीं। पुत्रोत्पादन के सामर्थ्य पर बुध का अधिकारनहीं होगा किन्तु बुद्धि की सन्तान जो ग्रन्थ या अनुसन्धान कार्य, उनपरबुध का ही अधिकार है। शारीरिक दृष्टिसेपुत्र ही मनुष्य का उत्तराधिकारीहै। किन्तुपुत्र तो उत्पन्न होकर नष्ट भी हो जाता है अथवा पिता की किर्तिको कलंकित करता है। किन्तु साहित्यरूप सन्तान शाश्वत होती है और निर्माता की कीर्ति बढ़ाती है। महाष्ट्र के ्र्गीय आपटे, गोखले, मंडारकर,गोरविंद आगरकर, नाथमाधव, बंगाल के कविश्े् वंद्रनाथ, मैसूर के शे वैज्ञानिक सर रमण आदि महान पुरुष अपनी बुद्धिम्ता और साहित्यचचना से ही जगद्विख्यात हुए हैं। इस बुद्धिम्त पर जिसका अधिकार है उस बुध को नपुसक कहना अनुचित है। तत्त्व पृथ्वी। बुध को पृथ्वीत्व का अधिकारी माना गया है किन्तु यह ठीक प्रतीत नहीं होता । पृश्वत्व पर शनि का और बायुत्व पर बुध का स्वामित्व है।
दृष्टि-तिरछी । इसका स्पष्टीकरण नहीं होता।
बल-यह सर्वदा बलवान होता है।
स्वभाव-मिश्र। यह रजोगुणी है।
पराजय-यह शुक्र के द्वारा पराजित होता है।
विफलता-इसे चौथे स्थान में विफल माना गया। यह लग्न से चौयास्थान है कि चन्द्र से यह स्पष्ट नहीं।
लोक- कल्याणवर्म ने नरकलोक कहा है। कुछ शास्त्रकारों नेपाताल लोक कहा है, किन्तु हमारे विचार से मृत्यु लोक ही बुध का लोक है।
वेद-अथ्ववेद। इसकी उपपत्ति स्पष्ट नहीं।
बलवान-सुबह के समय यह बलबान होता है। सूर्योदय के पहले दो
घंटे यह आँखो से दिखाई देता है। यही इसका बलवान होने का समय है।
प्रश्न विचार-यह जीवचिन्ताकारक है। कन्या लझ्न के समय अथवा लगन में बुध होते हुए जो व्यक्ति प्रश्न पूछता है वह प्रायः अपने बीमार मित्र की प्रकृति के बारे में प्रश्न होता है।
धान्य-हरे चने। इसकी उपपत्ति स्पष्ट नहीं।
हमारे शास्त्रकारों ने और पाश्चात्य जोतिर्विदों ने बुध का स्वरुपबतलाते समय राशियों का विशेष विचार नहीं किया है अतः उनमें कुछपरस्परविरोध दृष्टिगोचर होता है। उदाहरणार्थ- किसी ने शरद तो किसीने हेमंत ऋतु माना है बुध मिथुन राशि में हो तो हेमंत और कल्या में हो तोशशरद ऋतु योग्य होती है। पाश्चात्यों ने रुखा, शीतल, चंचल, शीघ्रकोपीयह वर्णन दिया यह मिधुन के बुध के लिए ठीक है। कन्या के बुध के लिएउर्पोक, उत्तेजक, प्रसवशील, आर्द यह वर्णन ठीक है। कन्या का बुधतमोगुणी है तो मिथुन का सत्वगुणी है। इस प्रकार अन्य ग्रहों के स्वरुप मेंभी राशी का विचार अवश्य करना चाहिए।
कारकत्व विचार
बुध के कारकत्व के बारे मे प्राचीन शास्त्रकारों के विचार देखिये
कल्याणवर्मा-श्रुतिलिखितशिल्पचैत्यनैपुण्यंमंत्रिद्ूत हास्यनाम्।खुगयुम्मख्यातिवनस्पतिस्वर्णमयप्रभुःसौम्यः।। सुना हुआ अथवा लिखाहुआ शास्त्र, शिल्प, बौद्ध गुहामंदिर, निपुणता, मंत्रिपद, दूतं, हास्य,आकाशसंचारी, कीर्ति, वनस्पती तथा सुवर्ण पर बुध का अधिकार हैं।
वैदयनाथ- विद्याबंधुविवेकमातुल सुहदूवाकर्मकृ्द् बोधनः। वद्यम्यास,माईनंद, विवेकशक्ति, मामा, मित्र, वाणी के कार्य इन पर बुध का अधिकार है।पराशर-ज्योतिर्विदागणितकार्यनर्तनवैद्यहासभीकारको बुधः। ज्योतिष,गणित, नृत्य, वैद्यक, हास्य, भीति तथा संपत्ति का कारक बुध है।
सर्वार्थचन्तामण-सन्ततशान्तविनयभक्तमत्ञात गोत्रसमृद्धि्ञ्ञावेदान्तकारको बुधः। सन्तति, शान्ति, विनय, बुध्धि, जाति,सम्बन्धियों की समृद्धता, ज्ञान, वेदान्त-आत्मा के बारे मे विचार-आदिका कारक बुध है।
विद्यारणय-पत करम विजान बधेन तु विचिन्तयेत्। जिनमबुध्धिमिता की जरूरत है ऐसे महान कार्य तथा विज्ञान का विचचार बुध सेकरना चाहिए।
गुणाकार- मातृबन्धु मामा की स्थिति का विचार बुध से होता है।जीवनाथ-प्रवरकाव्यपटुत्वं
विनोदकलादिकप्रवरबोधमनःशुचिमदिशेत। उत्तम कवि, विनोद तथा कलाओं में निपुणता,उत्तम ज्ञान और मन की पवित्रता का विचार बुध से करना चाहिए।मन्त्रेशवराणित् सचःकलात विद्वत्तर्ति मातुल वा्चातुर्यमुपासनादिपटुतं विद्यासु युक्ति मति। यजञं वैष्णवकर्म सत्यकचनं शक्तिविहासस्थलं शिल्पं बान्धवयौवराज्यसुहृदस्तदभागिनेयं बुधात ॥ पाण्डित्य,अच्छे वचन, कलाओं में निपुणता, विद्वानों द्वारा प्रशंसा होना, माता,बोलने मे चतुरता, उपासना मे कुशल होना, ज्ञान, बुध्दि, यज्ञ, विष्णु कीभक्ति, सत्य बोलना, सींप, खेलने के स्थान, शिल्प, भाई, युवराजपद,मित्र और भाँजा इनका कारक बुध है।
कालिदास-विद्याधीशतुरंगकोष ज्ञानानि वाक्याद्विजाःपादातलिपिलेख्य प्रासादकारा तीर्थयात्रासुचवः प्रासंगदेवालयाः वाणिज्य वरमूषणमृदुवनो वेदान्तमातामहाः।।दुःस्वपनं च वैराम्यविचित्रहम्यंभिषजःअभिचाराविनयो ज्ञातिर्भय नर्तनं भक्तिः शमः नाभिर्गोत्रसमृध्दिमिश्रपदार्थने
आंध्रीभाषाधिपः। भाषाचमत्कारता कर्म गोपुरगुह्धौ। सत्पौराणिक शद्दशास्त्र- सुमहारत्लादिसंशोधकः विद्वान मंत्रयंत्रसुमहातंत्रादिकाःसौम्यतः| ज्ञान का स्वामित्व, घोडे, धनसंचय, वाक्य, ब्राह्मण, पैदलचलनेवाले सैनिक, व्यापार, लिपि, लिखना, बडी इमारते, कारागृह,तीर्थयात्रा, अच्छे बचन, देवालय, उत्तम अलंकार, कोमल बचचन, वेदान्त,नाना बुरे स्वाप्न, वैराम्य, सुन्दर घर, वैद्य, मन्त् त्र, विनय, जाति, भय,नृत्य, भक्ति, शान्ति, नाभि, संम्बधियों की समृद्धता, मिश्र पदार्थ, आंध्रप्रदेश और तेलगु भाषा, चमत्कारपूर्ण भाषा, मंदिरो के गोपुर (दक्षिण मेंमदुरा आदि शहरों में मंदिरो के चारों ओर बड़े बड़े गोपुर होते है।) गुप्तरहस्य, अच्छा प्रवचनकार, शद्धशास्त्र, व्युत्पत्ति, व्याकरण, रत्न, संशोधक,वैज्ञानिक, विद्वान, मंत्रतंत्रज्ञ इन विषयो का विचार बुध से करना चाहिए।विलियम लिली - साहित्यिक, तत्वज्ञ, गणितशास्त्रज्ञ, ज्योतिषी,व्यापारी, कार्यवाह, लेखक, शिल्पकार, कवि, वक्ता, वकील, शिक्षक,मणियारी सामान के व्यापारी, मुद्रक, अटरनी, राजदूत, कमिशनर, लिपिक,हिसाब लिखनेवाले, सॉलिसिटर, कभी कभी चोरी करनेवाले, बहुत बोलना,मंत्री, व्याकरणकर्ता, दर्जी, दूत, चपराशी, मुद्रा विनिमय करनेवाले (एकदेश की मुद्रा लेकर दूसरे देश की मुद्रा देनेवाले बैंक) आदि का कारक बुध है।
रोगो का कारकत्व-गुहृयोदरादृश्यसमीरकुष्मंदाग्ि शुलग्रहणीरूगाबैः। बुधादिविष्णुप्रियदासभूतैरतीव दुःख शशिजः करोति ॥ गृह्यरोग, पेट के रोग, बायु रोग, कोढ ॥ मंदाश्नि(भूख न लगना), शूल, संग्रहणीतथा विष्णु के सेवक भूतो द्वारा पीडा, होना इन बाधाओ पर बुध काअधिकार है। इस विषय में विलियम लिली का मत- आलसीपन, सिरचकराना, पागलपन, मस्तिष्क हलका होना, मस्तिष्क के अन्य रोग, जीभके दोष, व्यर्थ अभिमान, अकारण कल्पनाओं में खो जाना, स्मरणशक्ति
दूषित होना, आवाज कर्कश होना, श्वास, दमा,कफ की अधिकता, गलारूंध जाना, संधिवात, गूंगापन, बड़बडापन, बुरी कल्पनाए, ज्ञनेन्द्रयों केविकार, बालग्रह, चक्कर आना इन दोषो का कारक बुध है।
हमारा मत-परीक्षा ( लिखित तथा मौखिक),विद्यार्थ, डाकतारविभाग,रेल्वे, शेयर बाजार, बैंक और बीमा कंपनियों के कर्मचारी, बडी,फर्में, संवाददाता, विज्ञान, रोगविज्ञान, अंकगणित, एविडेन्स ऐेक्ट, स्टम्यएक्ट, रजिस्ट्रेशन एक्ट, निबन्धलेखन, मातृभाषा की शिक्षा, पौर्वात्यभाषाओं के अनुवादक, अंगूठे के निशानों के विशेषज्ञ, बाताखवणशास्त्र,तत्वज्ञान, मानसशास्त्र, शब्दजाल, वादविवाद मंडल, शालाएँमहाविद्यालय, संशोधनसंस्थाएँ, टाइपिस्ट, हस्तरेखाविशेषज्ञ,अंकज्योतिष,मजजातन्तुछे दन, मस्तिष्क ज्योतिष, चलनकलन(Calculus) (गणित की इस शाखा के बारे में प्रख्यात भारतीयज्योतिर्विद सिध्धान्त शिरोमणिकर्ता भास्कराचार्य ने विवरण दिया है।पाश्चिम में डॉ. लेबनीझ इस गणित के प्रारंभिक विद्वान हुए है।),संख्याशास्त्र, कागज के कारखाने आदि का कारक बुध है।
प्राचीन मतों का विवेचन
कल्याणवर्मा ने वर्णन किया है उसमें बहुतसा निरूपयोगी है।शिल्पशास्त्र का कारक शुक्र माना जाना चाहिए । सुवर्ण यह धन काप्रतीक है, अतः बुध भी इसका कारक ग्रह नहीं है। बैद्यनाथ का कारकत्वयोग्य है। विचार, वाणी, विद्या इनका विचार बुध से ही होता है।आतसंबंधियों का तथा भाईबहिनों का कारक बुध कहा गया है, क्यों किनैसर्गिक कुण्डली में तृतीय स्थान का स्वामी बुध ही है। इसी प्रकार नैसर्गिक कुण्डली में ष्ठ स्थान भी बुध के अधिकार में है। अतः मामा,मौसी और शत्रु ये विषय भी बुध के कारकत्व में शामिल होते है। विद्धानलोगों के वादविवाद (जो आजकल बहुधा समाचारपत्रों में चलते है)अर्थात पण्डितवाक्, युद्ध यह कारकत्व भी बुध का है। नैसर्गिक कुण्डलीमें बुध तृतीय स्थान का स्वामी है, अतः वाणी का कारक भी यही है।अकेले पुरूष पर मेष के मंगल का स्वामित्व है, अकेली स्त्री पर वृषम केशुक्र का अधिकार है, किन्तु इन दोनों के संयोग रूप मिधुन पर बुध काअधिकार है।स्त्रीपुरूष संयोग से ही वाणी की प्रवृत्ति होती है। खगोलदृष्टी से बुध रवि का एक टुकडा है अतः इसे युवराज माना गया है।कृतकर्म का विचार बुद्धि से होता है, अतः यह भी बुध का कारकत्व है।
पराशर ने ज्योतिष विद्या यह बुध का कारकत्व कहा किन्तु इसकीअपेक्षा खगोलशास्त्र (Astronomy) अधिक योग्य होगा। स्व. व्यंकटेशशास्त्री केतकर, नवाथेजी, राफेल, वासुदेव शास्त्री खरे आदि अच्छेखगोलशास्त्रज्ञ थे । इनकी कुण्डली में बुध बहुत प्रबल है। अतः केतकर,नवाथे तथा राफेल को इस क्षेत्र में बहुत कीर्ति मिली। जिनका बुध दूषितहै वे इस शास्त्र का अभ्यास करें भी तो कीर्ति नहीं मिलती। बुध पुरूष ग्रहसे युक्त हो तो पुरूष सद्ृश फल देता है तथा स्त्रीग्रह के साथ हो तोस्त्रीसदृश्य फल देता है। ज्योतिषज्ञान के लिए बुध के साथ नेपच्यून केअच्छे योग होना जरूरी है क्यों कि नेपच्यून अंतर्ञनि का कारक ग्रह है।गणित में अंकगणित, त्रिकोणमिति तथा चलनकलन ये विषय बुध केअधिकार में है। नृत्यकला पर बुध का अधिकार माना गया है। इसकीउपपत्ति स्पष्ट नहीं । पुराने समय में तृत्यशिक्षा के लिए नपुंसको कीयोजना होती थी (अर्जुन बृहन्नडा के वेष में एक वर्ष तक राजा विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य सिखाते रहे, यह कथा प्रसिद्ध ही है) और बुध कोनपुंसक ग्रह माना गया है, इस दृष्टी से शायद यह सम्बन्ध जोडा, गयाहोगा। वैद्यों पर बुध का स्वामित्व कहा गया क्यों कि नैसर्गिक कुण्डली मेंछठवें रोगस्थानपर बुध का अधिकार है। हास्य यह भी ष्ठ स्थान काविषय है। संपत्ति इसका विचार तृतीय या ष्ठ स्थान से नहीं होता। षष्ठस्थान से सिर्फ पशुसंपत्ति का विचार किया जा सकता है।
सर्वार्थचिन्तामणि- इसमें सन्तति का कारक बुध माना गया है।यह तृतीय स्थान की दृष्टी से ठीक है, किन्तु इसी ग्रन्थधकर्ता ने बुध कोनपुंसक ग्रह को सन्तति का कारक मानना योग्य नहीं होगा। शान्ति, विनय,भक्ति ये विषय भी तृतीय स्थान के हीं है। तृतीय में बुध हो तो वह पुरुष नप्रऔर शान्त होता है। जाति और आप्तों की समृद्धता यह विषय भी तृतीयस्थान का ही है।
प्रज्ञा-ईश्वरज्ञान की ओर प्रवृत्त होनेवाली बुद्धि को प्रज्ञा कहते है।इसका कारक बुध को मानना योग्य नहीं होगा, क्यों कि यह संसारदक्षऔर व्यावहारिक बुद्धि का कारक है। मिथुन मे तृतीय में बुध हो तोवेदान्त की चर्चा करने का शौक होता है।
विद्यारण्य-प्रज्ञावत-कर्म इसके विषय में ऊपर विवेचन किया गयाहै। विज्ञान इस शब्द का उपयोग पहले ज्ञान तथा उसकी प्रासि कैसी होतीहै, इस का शास्त्र (Epistemology) इस विषय के लिए होता था।वर्तमान समय में तत्वज्ञान की चार शाखाएँ मानी जाती है दर्शन(Philosophy), अर्तीद्रिय वस्तु त्वों का ज्ञान (Metaphysics)तर्कशास्त्र (Logic) तथा मानसशास्त्र (Psychology)(आजकल विज्ञानशब्द का प्रयोग शास्त्रीय (Scientific) ज्ञान के अर्थ में होता है। इसकाआधार चिकित्सक बुद्ध है, अतःबुध को इसका कारक मानना योग्य है।
गुणाकर- इसके मत का विवेचन वैधनाथ केमत के विवेचन में हुआ ही है।जीवनाथ-काव्यपटुत्व, विनोद तथा कला ये तृतीय स्थान केकारकत्व हैं। मन की भावनाएँ सरस रूप से काव्य में व्यक्त होने के लिएशुक्र और नेपच्यून के साथ बुध का शुभ संम्बंध होना जरूरी है। लम्न,पंचम, सस्तम या नवम स्थान में बुध अकेला हो तो विनोदप्रिय स्वभावहोता है। तृतीय में बुध मिथुन में हो तो कलाओं में कुशलता प्रा्त होतीहै। उत्तम ज्ञान यह भी तृतीय स्थान का कारकत्व है।
मंत्रेश्वर- अब तक के शास्त्रकारों के विवेचन में इसका सभी वर्णनआ गया है। इसका बहुतसा वर्णन जातक पारिजातमें से लिया गया है।
कालिदास-ने जो वर्णन किया है उसमें विचार करने योग्य कारकत्वये है, मातामह, दुःस्वप्न, वाणिज्य, विचित्र हम्य, भिषज, अभिचार,भय, मिश्र पदार्थ, आंध्रभाषाधिप, भाषाचमत्कार, सत्पौराणिक, संशोधक,यंत्र मंत्र तंत्र । मातामही (नानी) इस कारकत्व की उपपत्ती स्पष्ट नही।माता का स्थान चतुर्थ है अतः माता की माता का विचार चतुर्थ से चतुर्थअर्थात सप्तम स्थान से करना चाहिए। नैसर्गिक कुण्डली में इस स्थान कास्वामी शुक्र हैं। कुछ शास्त्रकारों ने इसका कारक केतु माना है। दुःस्वप्नइसकी भी उपपत्ति नही मिलती किन्तु छटवे स्थान से इसका सम्बन्ध होसकता है। वाणिज्य नैसर्गिक कुण्डली में कन्या राशि का अधिपति बुध हैअत: व्यापार का कारक उसे मानना योग्य ही है। विचित्र हम्म्य तरह तरहके घर इस कारकत्व की उपपत्ति स्पष्ट नही। चतुर्थ मे बुध हो तो घरों कीप्रात्ती का फल कहा जा सकता है। भिषज वैद्य यह तृतीय स्थान का विषयहै। भारतीय वैद्य प्रायः मिथुन, तुला या कुंभ लग्न में जन्म हुए होते हैं।उसमें भी मिथुन लग्न का प्रमाण अधिक है। अभिचार-जारणमारणादि मंत्रोद्वारा दूसरों को तकलीफ देना यह छठवें स्थान का कारकत्व है। भययह भी छठवें स्थान का विषय है। मिश्रपदार्थ, भाषाचमत्कार, सत्पौराणिक,शद्धशास्त्र, संशोधक ये विषय तृतीय स्थान के है।
विलियम लिली - ने जो कारकत्व कहा है उसमें अधिकतर तृतीयस्थान के विषय है। सिर्फ व्यापारी, चोर, दूत, नौकर ये विषय ष्ठ स्थानके है। अन्न और वस्त्र का कारक बुध को मानना ठीक नहीं होगा क्योंकितृतीय और ष्ठ दोनों स्थानों से इसका संबंध नही है। भारतीय शास्त्रकारोंने रोगो के विषय में बुध का जो कारकत्व कहा, उसका अनुभब नहींआता। इस विषय में विलियम लिली का ही मत योग्य है।
कारकत्व का वर्गीकरण
जन्मकुंडली में उपयोगी कारकत्व - श्रुत, लिखित, नैपुण्य,मंत्रित्व, दूत, हास्य, ख्याति, विद्या, बन्धु, विवेक, मातुल, सुहृत, कृतकर्म,नर्तन, वैद्य, हास, श्री, सन्तति, शान्ति, विनय, भक्ति, प्रज्ञा, वेदान्त,प्रज्ञावत कर्म, विज्ञान, प्रवरकाव्यपटुत्व, विनोद कला, प्रबरबोध,मनःशुचित्व, धृति, पाण्डित्य, सुबच, विद्वत्ता, स्तुति, वाक्चातुर्य, सत्य,बचन, भागिनेय, कोश, ज्ञान, लिपि, लेख्य, तीर्थयात्रा, वाणिज्य, वरभूषण,मृदुवच, मातामह, दुःस्वप्न, वैराम्य, विचित्रहर्म्य, भषज, अभिचार, विनय,भय, भाषाचमत्कार, सत्पौराणिक, शब्दशास्त्र, रत्न, संशोधक, विद्वान,मंत्रयंत्रतंत्र, त्वज्ञान , गणित, अंकज्योतिष, ज्योतिष, व्यापारी, मुख्यनौकर, लेखक, मूर्तिकार, कवि, व्याख्याता, वकील, शिक्षक, व्यापारी,मुद्रक, अटर्नी, कमिशनर, मुद्राविनिमय, लिपिक, हिसाब लिखनेवाले,सॉलिसिटर,सेक्रेटरी,व्याकरणतज्ञ, चोर,दर्जी, कुली, दूत, पैदल चलनेवाले,साहूकार, बुद्धिमत्ता, परिचित लोग, मित्र, पडोसी, दुभाषिये, नौकरचाकर,
जमीन पर का प्रवास, भाईबंद, शिक्षा में सफलता, पुस्तकविक्रेता,बंधुसौख्य, रजिस्ट्रार, दलाल, लोकसंग्रह, मस्तिष्क, ज्ञानतन्तु, फेपडे,अंत्र, मज्जा, हाथ, जीभ, गुहरोग, पेट, वातरोग, कोढ़ भूख कम होना,शूलरोग, संग्रहणी, डाकतार विभाग, बैंक, बीमा कंपनी, रेल्चे, मिल तथाबड़ी बड़ी फर्मों में क्लर्क, अनुवादक।
शिक्षा में उपयोगी कारकत्व- गणित, नृत्य, वैद्यक, त्वज्ञान, शिक्षक,ज्योतिष, सॉलिसिटर, व्याकरण, मौखिक तथा लिखित परीक्षा, शासन कीविभागीय (Departmental) परीक्षाएँ, पदार्थ विज्ञान, अंकगणित,एविडेन्स ऐक्ट, स्टैम्प ऐक्ट, वायुमापनशास्त्र, मानसशास्त्र, शद्धशास्त्र,टाइपिंग, अंगूठें के निशानों का अभ्यास, हस्तरेखाशास्त्र, इंजीनियरिंग मेंउपयुक्त गणित, त्रिकोणमिति चलन कलन (Calculus) ।
मेदिनीय ज्योतिष में उपयोगी कारकत्व- राजदूत, संधि, डाकतारके सेन्सार बोर्ड, मंत्री, धनसंचय, गुप्त पत्र।
व्यवसाय के लिए तथा प्रश्न कुंडली में उपयोगी कारकत्व-शिक्षा में सफलता, लेखक, तत्वज्ञानी, शिक्षक, ज्योतिष में सफलता,हस्तरेखातज्ञ का व्यवसाय, वैद्य, व्यापारी, वकील, मणियारी दुकानदार,मुद्रक, प्रकाशक, मुद्राविनिमय, क्लर्क, शिल्पकार, मूर्तिकार, सॉलिसिटर,दर्जी, नृत्य, बुरे, स्वप्न, हमाल, रजिस्ट्रार, बादविवादमंडल, शालाएँ,महाविद्यालय।
निरूपयोगी कारकत्व - चैत्य, पक्षी युम्म, बनस्पती, ज्ञाति,गोत्रसमृद्धि, सीप, तरंग, पैदल सेना, देवालय, नाभि, मिश्र पदार्थ।
बुध की शुभाशुभ राशियोँ- मेष, सिंह, धनु-शुभ। वृषभ, कल्या,मकर-साधारण। मिथुन, तुला, कुम्भ- उत्तम। कर्क, वृश्चिक, मीन- अशुम।
बुध के स्वरूप का विशेष विचार
आचार्य - श्लिष्टवाक सततहास्यरूविश्: पित्तमारूतकफप्रकृतिश्च।मधुर वाणी, हँसोड प्रवृ्ती तथा बातपित कफ की मिश्न प्रकृति यह इसग्रह का स्वरूप है।
कल्याणवर्मा-रत्कान्तायतलोचनो मधुरबाक दूर्बादलश्यमल:त्वक्सारोतिरजोतिकः स्फुटबचाः स्फीतस्त्रिदोषात्मकः। हृष्टो मध्यमरूपवानसुनिपुणो वृत्तः शिरभिस्ततः सर्वस्यानुकरोति वेषबचनैः पालाशवास बुधः॥आँखें विस्तीर्ण और आरक्त, वाणी मधुर, रंग दूर्बा के समान साँकला,सुदृदढ त्वचा, रजोगुणी प्रवृत्त, स्पष्ट बोलनां, बातपित्तकफ की मिश्र प्रकृती,दृष्ट पुष्ट शरीर, रूपवान, कलाकुशल, दूसरों के बोलने की और पोषाककी नकल करने का स्वभाव तथा शरीर पर शिराएँ स्पष्ट दीखना यह बुधग्रह का स्वरूप है। गुणाकार ने भी लगभग यही वर्णन किया है।
वैद्यनाथ-दूर्वादलघुतितनुःस्फुटवाक कृशांग:स्वामी रजोगुणवतामति-हासलोलः। हानिप्रियो विपुलपित्तकफानिलात्मा सघ्यः प्रतापविभवःशशिजश्चविद्वा् । दर्वा के समान साँवला वर्ण, स्पष्ट वाणी, कृश शरीर, स्जोगुणीमनुष्योंमें प्रमुख, हास्यप्रिय, दूसरों का नुकसान करने में आनंद माननेवाला,वातपित्तकफ की मिश्र प्रकृती, प्रतापी तथा पराक्रमी, विद्वान ऐसा इसकास्वरूप है।
जयदेव-पूर्व के ग्रंथकारों से विशेष इतना कहा है। दृष्टस्तव-क्सारनाडयां स्थूलोर्ध्वजः स्थूलनखौष्दन्तः। त्वचा सुद्दढ, केश मोटे तथानख और दाँत बडे होते है।
पराशर-वपुःश्रेष्ठः क्लिष्टवाक्यो हातिहास्यप्रियः। शरीर इृष्टपुष्ट होताहै। नु पुंश्चलश्च। यह व्यभिचारी होता है।
मन्त्रश्वर-इस में एक ही विशेषण अधिक दिया है। समाङ्गशरीरअवयव सम प्रमाण में होते हैं।
महादेव-इसका मत अब तक के मतों में आ गया है।
विलियम लिली-आम तौर पर कद उंचा, शरीर कृश, मस्तिष्कविशाल, लंबा चेहरा, लंबी नाक, सुंन्दर आँखे जो न तो पूरी तरह कालीहोती है न भूरी, छोटे औठ, मस्तिष्क पर केस बहुत किन्तु चेहरे पर कम,वर्ण कुछ पीलासा किन्तु अधिकतर काला, हाथ तथा उंगलियाँ लंबी, रंगऑलिव या चेटनेस्ट के समान-इस प्रकार बुध ग्रह का स्वरूप होता है।यह कुंडली मेंपूर्व की ओर हो तो रंग शहद के समान, कद बहुत उंचा नहींकिन्तु प्रमाणबद्ध, आँखे छोटी, केश कम,रंग कुछ विशोभनिय कालासापिला और वाणी स्वार्थपर होती है। यह कुण्डली में पश्चिम की ओर होतो पीलासा चेहरा, दुबलापतला शरीर, अवयब छोटे और कोमल, चमकतीहुई लाल किन्तु सुनीसी आँखे और शरीर आम तौर पर कुछ रुखा-यहइसका स्वरूप होता है। यदि यह कुण्डली में शुभयोग में हो तो बुद्धिकुशाग्र होती है, राजनीतिकुशल होता है, वादविवाद और तर्कशस्त्र मेंनिपुण होता है। इसकी बहस विद्व्तापूर्ण ओर प्रमाणयुक्त होती है, वत्कृत्वअच्छा होता है। गुप्त रहस्य, अद्भुत घटनाएँ तथा विविध ज्ञान की खोजमेंमग्न रहता है। शिक्षक के बिना ही बहुतसी बातें सीख लेता है, सर्वशस्त्रज्ञहोने की आकांक्षा होती है। देशविदेश में घूमने की चाह होती है। अपनीप्रतिभा से अदभूत बातें कर दिखाता है, दिव्य तथा अलौकिक ज्ञान कीखोज में सर्वस्व लगा देता हैं। यदि व्यापारी हो तो इसमें अधिक कुशलता, दूसरा कोई नहीं बतला सकता, संपति प्राप्त करने के अद्भूत तरीके खोजनिकालता है। यह कुण्डली में अशुभ योग में हो तों कष्टदायक बुद्धि होतीहैं। यह अपनी वाणी और लेखन का उपयोग हर किसी व्यक्ती कें विरोधमें करता है। स्वभाव विक्षित्त होता है। अपनी संपत्ति और समय व्यर्थगँवाता है। बहुत झुठ बोलता है और अपनी ही व्यर्थ प्रशंसा करता रहताहैं। बहुत बोलता है, जारणमारणादि दुष्ट विद्याओं का शौक होता है। मूर्खहोता है, किसी पर भी विश्वास रखता है। इसके विचार अस्थिर होते है।एक जगह अधिक समय तक नही रहता। हर जगह लोगो को ठगाता हैऔर चोरी करता है। सचमुच ठोस ज्ञान कुछ नहीं होता किन्तु बहानेबहुत बनाता है। झूठ अफवाहें फैलाता है। बहुत जल्दी डरता है। यहसाधुसन्यासी हो तो केवल बोलने में चतुर, दुराचारी, विवेकहीन औरबहुत अस्थिर होता है। यह कुमार्ग की ओर जल्दी आकृष्ट होता है।
मेरे विचार-बुध के स्वामित्व के व्यक्ती दो प्रकार के होते है। एकप्रकार में कद उंचा, चेहरा लम्बासा, मस्तक विशाल होता है। अवयवमध्यम, हाथ लम्बे और प्रमाणबद्ध, पेट पतला, कमर मोटी, रंग साधारणगोरा अथवा लालगोरा होता है। आँखे बडी किन्तु उग्र होती है, ओर भेदकमालुम पडती है। आँखो में लाल रंग की शिलाएँ अधिक होती हैं। भांगखाने पर जैसी स्थिती होंती है वैसी लाल और मादक दृष्टी होती है। दाँतसुन्दर होते है। बहुत जोरसे नही हँसता। कम बोलता है मगर हावभाबबहुत करता है। अपना फायदा होता हो तो ही बोलते है। वाणी मधुर नहींहोती। केस नाजुक और चमकिले होते हैं। आम तौर पर यह लोग मोहकहोते है। पैसे के बारे में इनपर विश्वास रखा जा सकता है। अपना हृदगद्किसी को नहीं बतलाते। मित्र कम होते है। कुछ धुर्त होते है किन्तु अच्छे कार्य में हमेशा मदत करते है। कुछ क्रोधी, झगड़ालू किन्तु विद्वान होते है।
अभिमानी, किसी का अधिकार न माननेवाले होते है। कामुकता अधिक
होती है। खाना थोडा किन्तु अच्छा और दिन में कई बार चाहिए। स्त्रीसौंदर्य
के ज्ञाता, शृंगार कुशल होते है। विविध रूचि के खाद्य पदार्थों की बहुत चाह
होती है। पूर्वार्जित सम्पत्ति मूर्खतासे या व्यसनों में गँवा देते हैं। तब कुछ
उद्योग नहीं करते। रात में बहुत घुमते है। कई धंधे करते है। जीवन में
स्थिरता कम होती हैं किन्तु सम्पति की चाह बहुत होती है। धन हो तो ही
समाधानी रहते है। ज्योतिषी तथा डॉक्टरों से मित्रता होती है।
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दूसरे प्रकार के लोग इनकी उंचाई कम, चेहरा गोल और कन्धे
बड़े होते है। तोंद निकलती है। दाँत बड़े और ठोडी छोटी होती है। आँखे
बड़ी और काली होती है। बाईं आँख कुछ छोटी होती है। मस्तक पर केश
होते है। हाथ छोटे और उंगलियाँ मोटी होती हैं। पैर मोटे, नाक कुछ
चेपटा और मुँह बड़ा होता है। चेहरा सदा हसमुख होता है। जोर जोर से
हँसते है। पैसे के व्यवहार के लिए ये लोग लायक नहीं होते। ये किसी पर
विश्वास नहीं रखते। दूसरों के साथ बोलते हुए अपनी ही बात करते रहते
हैं, दूसरों का कहना ठीक तरह नहीं सुनते। विनोदप्रिय, आनंदी और
उत्साही होते है। ये धुर्त होते है, किसी के द्वारा ठगाये नही जाते। वाहन
और नौकरो का सुख अच्छा मिलता है। चैनी, बुद्विमान, शान्त सौम्य
और क्रोधित न होनेवाला होता हैं। आचारविचार नियमित होते है। परिवार
की चिंता नहीं करते। नई कल्पनाओं का उपयोग कर के उद्योग-व्यवसाय
में प्रगती करते है। मन में सदा व्यवसाय की चिंता होती है किन्तु चेहरे पर
फिक्र के चिन्ह नहीं दिखते। कई उद्योग करते है। उद्योग बड़े पैमाने पर
करने की प्रवृती होती है, छोटे धंधो में मन नहीं लगता। खाते बहुत है किन्तु अन्न कैसा होना चाहिए इसकी विशेष चिंता नहीं करते। इनकी
नींद जल्दी खुलती है, नींद पर संयम होता है। बोलने में पुरानी कहावतें,
संस्कृत वाक्य आदि का उपयोग बहुत करते है। कुछ व्यभिचारी हो
सकते है। स्त्रियों के बारे में विधिनिषेध नहीं मानते। धर्म के बारे में
आस्था रखते है।
शास्त्रकारों के जो वचन उपर दिये गये है उनमें श्लिष्ट, सततहास्य,
पितमारूतकफप्रकृती, दूर्वादलश्यामल, स्फुटवाक्य, हासलोल, हानिप्रिय,
सर्ववेशवचनानुकरण, त्वक्सार, स्थुलोर्ध्वज, स्थूलखौष्टदंन्त, अतिहास्य
ये वर्णन दूसरे विभाग के लोगों के लिए ठीक हैं। पहले विभाग के लिए
रक्तान्तायतलोचन, त्वक्सार, हष्ट, मध्यमरूपवान, सुनिपुण, शिरावृत्त,
कृशांग, सद्यप्रताविभव, विद्वान, वपुः श्रेष्ट, समांग ये विशेषण योग्य है।
पुंश्चल यह वर्णन दोंनो विभागो के लिए ठीक है।
बुध का प्राचिन और अर्वाचीन स्वरूप-बुध विद्यार्थियों का
प्रतिनिधि ग्रह है। अतःभारतीय विद्यार्थी के स्वरूप में युगो युगो में कैसा
परिवर्तन हुआ यह संक्षेप में देखिये। रामायण-महाभारत के युग में (ई.
सन पूर्व २०००-१४००) विद्यार्थि मृगचर्म पहनते थे। एक वस्त्र, लंगोट
और यज्ञोपवीत यह उनकी वेषभुषा थी। बड़े होने पर जटाएँ रखते थे।
बडी सुबह उठकर व्यायाम तथा स्नान से निवृत्त ही सूर्यपूजन करना,
होमहवन के बाद अभ्यास कर के गुरूपत्नी की आज्ञानुसार काम करना,
संध्या तीन बार करना, भोजन के बाद कुछ विश्रांती और शाम को पुनः
सुबह के अनुसार सब कार्य करना, यह उनकी दिनचर्या थी। राजपुत्रादि
विशिष्ट विद्यार्थियों के लिए अलग गुरूकुल बनवाकर उन्हें शस्त्रास्त्रों की
और राजनिती की शिक्षा दी जाती थी। भगवान बुद्धके समय में (सन पूर्व ५००) भारत में तीन बड़े विश्वविद्यालय थे-उत्तर हिन्दुस्थान में काशी,
पंजाब में तक्षशिला और बिहार में नालंदा। विद्यार्थी आठ-दस साल का
होते ही उसे उस विश्वविद्यालय में भेजते थे। उस समय उपनयन संस्कार
कर के उसे गायत्री मंत्र का उपदेश देते थे। मुंडन कराकर यज्ञोपवीत
पहनाते थे तथा सदाचार का उपदेश देते थे। तदनंतर भिक्षावृत्ति से निर्वाह
करता हुआ वह विद्यार्थी अपने विश्वविद्यालय में पहुँचता था। वहाँ बारह,
चोवीस या छत्तीस वर्ष तक विद्याभ्यास होता था। वेद, वेदान्त, दर्शन काव्य, व्याकरण आदि विषय पढ़ाये जाते थे। अभ्यास पूरा होने पर न्यायरत्न, व्याकरण कौस्तुभ, काव्यतीर्थ आदि पदवियाँ मिलती थी विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक था। (इसी से हमारे ग्रंथकारों ने बुध को नपुंसक माना होगा।) उन्नीसवीं शताद्बी में अंग्रेजी राज्य के कारण भारतीय विद्यार्थी के स्वरूप में आमूलाग्र परिवर्तन हुआ गाँव गाँव में स्कूल और शहरों में कॉलेज स्थापित हुए, अतः काशी को जाने की जरूरत नहीं रही। उपनयन के बाद गाँव के ही स्कुल में विद्यार्थी भरती होने लगा। उसकी वेषभूषा में भी परिवर्तन हुआ। अब केश बढाकर तेल और पोमेट से सुशोभित करने की पद्धति शुरू हुई। मुँछे रखना बंद हुआ। स्नो पाउडर का उपयोग शुरू हुआ। पोषाख में शर्ट, कोट, जाकिट, पॅट, बूट, कॉलर आदि का समावेश होने लगा। आँखे कमजोर होने से कई विद्यार्थी चश्मा लगाने लगे। दीक्षान्त समारोह के समय काले गाउन और सिरपर हूड पहनने की पद्धती शुरू हुई। इस तरह हमारे विद्यार्थी वर्ग के रहनसहन में बहुत ही परिवर्तन हुआ।
पितृ-दोष का कारक है बुध
जिन परिवारों के एक से ज्यादा जातकों की कुंडलियों में पैतृक दोषपाया जाता है, उन परिवारों में इसका प्रभाव केवल उस कुंडली वालेजातक पर ही नहीं, बल्कि परिवार के अन्य जातकों पर भी कई पीढ़ियोंपर पड़ता है। इस वजह से उन परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही प्रकारकी अशुभ घटनाएँ घटने की आशंका रहती है।
इसे लेकर बहुत से लोग इस भ्रम में रहते हैं कि ऐसा परिवार केकिसी बुजुर्ग की भटकती आत्मा की वजह से हो रहा है। इसके उपाय केतौर पर वे पिंड-दान आदि करते हैं, ताकि उस आत्मा को सद्गति प्राप्तहो और परिवार से यह दोष समाप्त हो जाए।
किन्तु लाल किताब में पैतृक दोष का अर्थ यह लिया जाता है कियदि हमारे पूर्वजों ने किसी प्रकार के अशुभ कर्म किए हों, तो उनका फलआने वाली पीढ़ियों में उनके खून के रिश्तेदारों को भोगना पड़ता है। जैसेहम पूर्वजों द्वारा अर्जित धन सम्पत्ति, कीर्ति आदि का भोग करते हैं, उसीप्रकार हम बुजुर्गो के बुरे कर्मों के प्रभावों से वंचित नहींरहसकते।चिकित्सा शास्त्र में भी कई रोग जैसे मधुमेह, हृदय रोग तथा अन्य रोगवंशानुगत होते हैं यानि ये हमें बुजुर्गों से प्राप्त होते हैं। इसी आधार परज्योतिष शास्त्र मेंपूर्वजों के क्मों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ियों परपड़ने वाले अशुभ प्रभावों को पैतृक दोष कहा गया है।
लाल किताब में बुध को पैतृक दोष की सबसे अच्छी पहचान करानेवाला ग्रह बताया गया है। कहा जाता है कि यह न सिर्फ पैतृक दोष केभेद को समझने में सहायक होता है, बल्कि कई बार पैतृक दोष का कारणभी बन जाता है। कुंडली के नवम भाव में जो ग्रह स्थित होता है, बुध यदि उस ग्रह की राशि में बैठ जाए, तो इसे पैतृक दोष की एक महत्वपूर्णनिशानी समझना चाहिए। उदाहरण के लिए नवम भाव में यदि सूर्य स्थितहो और बुध सिंह राशि में बैठ जाए, तो यह पैतृक दोष का एक लक्षणहै। यह नियम सभी ग्रहों पर लागू होता है। लाल किताब ही नहींज्योतिष की अन्य पद्धतियों के अनुसार भी नवम भाव हमारे भूतकाल सेसम्बन्ध रखता है। अतः किसी जातक के पिछले जन्म के बारे में नवमभाव को देखकर ही जाना जा सकता है। नवम भाव का हमारे पूर्वजों सेगहरा सम्बन्ध होता है। अतः हमारे बुजुरगो द्वारा किए गए अशुभ कर्मोंकी परछाई पैतृक दोष के रूप में हमारे ऊपर पड़ती ही है।
कालपुरुष कुंडली के अनुसार नवम भाव में धनु राशि पड़ती है,जिसका स्वामी बृहस्पति होता है। बृहस्पति का हमारे बुजुर्गों से सम्बन्धहोता है। यह किसी से शत्रुता नहीं करता, लेकिन बुध इससे शत्रुता रखताहै। अतः भूतकाल, हमारे बुजुरगों के भाव व हमारे बुजुर्गों के कारक बृहस्पतिकी राशि में जो भी ग्रह बैठा हो, यदि बुध उसकी राशि या राशियों में सेकिसी एक में बैठ जाए, तो वह नवम भाव से सम्बन्धित सभी चीजों कोअशुभ कर देता है और उनके फल को अनिष्टकारक बना देता है। इसस्थिति में बुध के अशुभ फल को ठीक करने के लिए बुध के अलावा नवमभाव में जिस ग्रह की राशि में बैठकर बुध उसके फल को अशुभ बना रहाहै, उसे शक्तिशाली बनाने का उपाय भी करना पड़ता है। पैतृक दोष मेंबुध यदि बृहस्पति की राशियों के अलावा बृहस्पति के पक्के भाव (द्वितीय,पंचम, नवम व द्वादश) में बैठ जाए, तो यह पैतृक दोष की ओर इशाराकरता है। बृहस्पति में बुध के अलावा यदि शत्रु ग्रह राहु या शुक्र भी इनभावों में बैठ जाएँ, तो ये भी पैतृक दोष पैदा करते हैं।
कुंडली में यदि बुध मन्दा हो या नवम भाव में बैठे ग्रह को अशुभकर रहा हो तो उसके अशुभ होने की कुछ विशेष निशानियाँ होती हैं, जिनपर ध्यान देकर पैतृक दोष को समझने में सहायता मिलती है। बृहस्पतिके कारण जातक के सिर की चोटी के बाल समय से पूर्व ही अकारण झड़जाते हैं। उसे हर समय गले में माला पहनने की आदत पड़ जाती है और नींद नहीं आती या बहुत कम आती है। उसकी शिक्षा भी बिना किसीकारण अपने आप बन्द हो जाती है।.ऐसी स्थिति में वृहस्पति और बुधद्वारा पैदा किए गए इस दोष को कम करने के लिए बुध व बृहस्पति दोनोंका उपाय करना चाहिए। ऐसे में बुध के लिए पीले रंग की कौड़ियों कोरात भर आग में तपाकर सुबह बहते पानी में प्रवाहित कर देना चाहिए।इसी प्रकार बृहस्पति के लिए उस खानदान के खून से सम्बन्ध रखने वालेप्रत्येक जातक से एक पैसा या रुपया लेकर एक ही दिन में किसी मन्दिरमें दान देना चाहिए।
पैतृक दोष का उपाय करते वक्त यह ध्यान रखना जरूरी है किखानदान के सभी सदस्य इसमें भाग लें और यह उपाय लगातार 41 हफ्तेतक किया जाए।
इसी प्रकार सूर्य के उपाय के लिए खानदान के प्रत्येक जातक सेधन लेकर यज्ञ कराएँ। चन्द्र के उपाय के लिए खानदान के प्रत्येक जातकसे चाँदी लेकर एक ही दिन बहते जल में प्रवाहित करें। शुक्र के उपाय केलिए सौ गउओं को जो अंगहीन न हों, खानदान के हर व्यक्ति का बराबरहिस्सा डालकर एक ही दिन में भोजन कराएँ। मंगल के उपाय के लिए घरके पास स्थित किसी कारीगर या हकीम को खानदान के सभी सदस्यों सेएक-एक रुपया इकट्ठा करके दान में देना चाहिए और उसे यह कहनाचाहिए कि वह आपको हम इसलिए दे रहे हैं ताकि समय-समय पर कुछलोगों का काम आप बिना पैसे लिए ही कर दिया करें। शनि के उपाय केलिए खानदान के प्रत्येक जातक से धन लेकर सौ अलग-अलग जगह कीमछलियों को चारा डालें। राहु के उपाय के लिए खानदान के प्रत्येकजातक से एक-एक नारियल लेकर एक ही दिन में नदी में प्रवाहित करें।केतु के उपाय के लिए खानदान के सभी जातकों से धन लेकर सौ कुत्तोंको एक ही दिन में भोजन डालें। ध्यान रहे ये उपाय दिन के समय हीकिए जाएँ और एक हफ्ते में केवल बुध का तथा दूसरे हफ्ते में अन्य ग्रहका उपाय हो। बुध का या किसी दूसरे ग्रह का उपाय एक दिन में एकसाथ नहीं करना चाहिए। बुध
बुध ग्रह को समझना बहुत मुश्किल है। सभी ग्रह आदमी कोठीक रास्ते पर ले जाते हैं, सिर्फ बुध और राहु ही वह ग्रह हैं जो गलतरास्ते पर भी ले जाते हैं और आदमी के साथ शरारत भी करते हैं।इसलिए लाल किताब पद्धति के अनुसार बुध ग्रह को बेवफा लौँडीकहकर पुकारा गया है। हमारे बुजुर्गों के किए हुए बुरे क्मों का फलहमें इसी जन्म में भुगतना पड़ता है और उसे भुगतेंगे उसके बच्चे, पुत्रवगैरह ही। और समझने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि बुध अच्छाहै या नहीं यानि कि बुध के स्वभाव के बारे में अच्छी तरह जान लेनाचाहिए। बुध एक शरारती ग्रह है जब बुध-केतु एक साथ बैठे हों तोबुध का फल अच्छा नहीं रहता। इस हालत में केतु का फल भी खराबहो जाता है। मंगल के साथ बुध की दृष्टि से भी मंगल बुध के शुभप्रभाव को खत्म कर देता है।
इसी तरह बुध और शुक्र बन्द मुट्ठी के घर खाली भाव नंबर1,4,7,10 से बाहर कहीं भी आमने-सामने बैठे हों तो दोनों का ही फलखराब हो जाता है। शुक्र 12 में और बुध छठे घर में हो तो बुध पर कोईअसर नहीं पड़ता किन्तु और किसी भी हिसाब से दोनों मिल रहे हों तोबुध का असर अच्छा नहीं रहता।
पहले भाव में बुध हो तो उसका फल राजा या हाकिम मगर खुदगर्जकहा गया है। यहाँ बैठा हुआ बुध शरारती भी होता है और यदि किसीप्रकार से बुध का फल खराब हो रहा हो तो इससे व्यक्ति को जीवन मेंकई बार लाँछन लगते हैंl
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बुध के राशिगत व स्थानगत फल
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक को दूसरों का धनहड़पनेवाला एवं शराबी बनाता है। उसकी पत्नी सुन्दर रहती है। स्वयं जातकचतुर, बुद्धिमान, नास्तिक, अनुशासनहीन होता है। बचपन में नाड़ी विकार याज्वरदोष उत्पन्न होने की संभावना रहती है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक तर्कशास्त्री,प्रसन्नमुख, ज्ञानी, गुरुभक्त, उदार, जिद्दी एवं बहुसंतान से युक्त रहता है।उसके स्त्री मित्र बहुतायत में होते हैं। उसे व्यायाम का शौक रहता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का बुध कुडली में होने पर जातक वाचाल,शास्त्रज्ञ, साहित्यानुरागी, कलाकार, गायन-वादन एवं नृत्यकला में रुचिरखनेवाला, मधुरभाषी, विद्वान, प्रतिष्ठित, चतुर, धूर्त, सुधारक, कानून काजानकार, व्यापारी, मित्रों का सहयोगी, उदार एवं परिवर्तन प्रेमी रहता है।
4. कर्क-कर्क राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक विनोदी, स्त्री केवशीभूत, प्रवास प्रेमी, कामातुर, कलाप्रेमी, तीव्र बुद्धिमान एवं होता है किंतुवह मित्र एवं सहोदरों का अहित करता है। अपने से वयस्क स्त्री से गुप्त संबंधरखता है। स्त्री की जन्म कुंडली में कर्क राशि का बुध हो तो वह अपने सेकम उम्र के प्रेमी से संबंध रखती है। मोती या जल से उत्पन्न वस्तुओं केव्यापार में जातक को लाभ होता है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक स्त्री से घृणाकरनेवाला, मध्यम आर्थिक स्थितिवाला, संतान सुख भोगनेवाला, घमंडी, दंभी,निर्भय, हृदयरोगी, सज्जन, मित्रों से युक्त एवं कलाकार होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध कुंडली में होने पर जातक बुद्धिमान, सत्कर्मी, दानी-धर्मी, गुणवान, धनवान, क्षमावान, वाक्पटु, चतुर, निर्भय,वैज्ञानिक, सुधारक, आदर्शवादी, साहित्यकार एवं प्रतिष्ठित होता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध कुंडली में होने पर जातक न्यायबुद्धि, सज्जन,व्यवहारकुशल, अधिकारी, वकील होता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक स्वार्थी, शंकालुरहता है। जीवन में कई बार धोखे एवं निराशा का सामना करना पड़ता है।9. धनु-धनु राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक राज्य एवं समाज मेंप्रतिष्ठित, विद्वान, व्यवहारकुशल, स्वपरिश्रम से भाग्योदय करनेवाला, विदेशीवस्तुओं का व्यापारी तथा परदेशनिवासी होता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध कुंडली में हो तो जातक दूसरों के कायोंमें सहयोग देनेवाला, शिल्पज्ञ, कर्ज के बोझ से दबा हुआ, एकांतप्रिय, परिश्रमी,साधु स्वभावी एवं कंजूस होता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध कुंडली में होने पर जातक प्रतिष्ठित, विद्वान,मित्र सुखभोगी, टीकाकार, समीक्षक एवं स्वाभिमानी होता है।
12. मीन-मीन राशि का बुध कुंडली में होने पर जातक गप्प हांकनेवाला,गर्ममिजाज, मंदबुद्धि, चरित्रवान, सुखोपभोगी, प्रवास एवं मनोरंजन का शौकीनरहता है। पत्नी को धोखा देता है या पत्नी इसके साथ छल करती है।
===========================द्वादश स्थानों में बुध के राशिगत फल
प्रथम स्थान (लग्न भाव)प्रथम स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-विद्वान ।
।कल्याणवर्मा-अनुपहतदेहबुद्धिर्वेष
कलाज्ञानकाव्यगणितज्ञः । अति-
मधुर रचतुरवाक्यो दीर्घायुः स्याद् बुधे लग्ने ॥ नीरोग, बुद्धिमान, कलाओं
में कुशल, काव्य तथा गणित का ज्ञाता, अच्छी वेषभूषावाला, चतुर और
मीठा बोलनेवाला और दीर्घायु होता है।
वैद्यनाथ-विद्यावित्ततपस्वधर्मनिरतो लग्नस्थिते बोधने || विद्या प्राप्त
करनेवाला, धनवान, तपस्वी, और अपने धर्म के अनुसार बर्ताव करनेवाला
होता है।
गर्ग- समुर्तिर्निपुणःशान्तो मेधावी च प्रियंवदः । विद्वान् दयालुरत्यर्थं
विना क्रूर बुधे तनौ । सुन्दर, निपुण, शान्त, बुद्धिमान, मीठा बोलनेवाला,
विद्वान और बहुत दयालु होता है। बुध के साथ लग्न में कोई क्रूरग्रह न हों
तो ये फल मिलते हैं।
दैवज्ञविलास-तनौ बुधे विलोकिते भिन्नवर्णशरीरकं । स्त्रीसुखं
मध्यभागे च वातपीडा तनौ भवेत । विस्फोटादिभवं दुःख
मशकोऽथतिलोऽथवा । गुल्मोदर विकारो वा स्वल्पाहारोऽपि जायते । शरीर
पर अनेक रंग होते है। मध्य आयु में स्त्रीसुख मिलता है। वात तथा
विस्फोट (फोड़े फुन्सी) रोगों से दुःख होता है। शरीर पर तिल अथवा मस
होते हैं। गुल्म तथा पेट के रोग होते हैं। भूक कम होती है।
बृहद्यवनजातक- शान्तो विनीतः सुतरामुदारो नरःसदाचार-
रतोऽतिधीरः। विद्वान्, कलावान्, विपुलात्मजश्च शीतांशुसूनौ जनने तनुस्थे ॥ शान्त, उदार, नम्र, सदाचारी, धैर्यशाली, विद्वान, कलाओं में
कुशल और बहुत पुत्रों से युक्त होता है। दशं कीर्ति बुधो यच्छति । दसवें
वर्ष कीर्ति प्राप्त होती है ।
जयदेव-उपर्युक्त फलों से दो अधिक हैं। दाता अर्थात स्त्री का सुख
प्राप्त होता है तथा दान करता है।
काशीनाथ - लग्ने बुधे च गीतज्ञो निष्पापो भूपपूजितः ।
रुपज्ञानयशोयुक्तः प्रगल्भो मानवो भवेत् ॥ संगीत में निपुण, निष्पाप,
जनमान्य, रुपवान, ज्ञानी, कीर्तिमान तथा प्रगल्भ बुद्धि का होता है।
वसिष्ठ-हन्ति दोषशतं बुधः । यह सैकड़ों दोषों का नाश करता है।
षष्ठोऽष्टमस्तथा मृतौ जन्मकाले यदा बुधः । चतुर्थवर्षे मृत्युश्च यदि रक्षति
शंकरः॥ लग्न में, षष्ठ में या अष्टम में बुध हो तो चौथे वर्ष मृत्यु होती है।
जागेश्वर-भवेद् वंशछेत्ता-भवेच्छिल्पकारः । बुधेज्यौ विलग्ने स्थितौ
वाधिपौ चेत् बलिष्ठं वदेद वर्तुलं वेदकोणम ॥ वंश नष्ट होता है, शिल्पकार
होता है, शरीर बलवान तथा वर्तुलाकृति या चौकोर होता है।
आर्यग्रन्थकार-तनुगतशशिपुत्रे कान्तिमांश्चातिदृष्टो विमलमति-
विशालः पण्डितस्त्यागशीलः मितमृदुशुचिभाषी सत्यवादी विशाली
बहुतरसुखभागी सर्वकालप्रवासी ॥ तेजस्वी, सुंदर, शुद्ध बुद्धि का, विद्वान,
त्यागी, थोड़ा किन्तु मधुर और पवित्र बोलनेवाला, भव्य शरीर का, सुखी
और हमेशा प्रवास करनेवाला होता है।
नारायणभट्ट-बुधो मूर्तिगो मार्जदन्यरिष्टं वरिष्ठो धियावैखरीवृत्तिभजः ।
जना दिव्यचामीकरीभूतदेहाश्चिकित्साविदो दुश्चिकित्स्या भवन्ति ॥ संकटो
का नाश होता है, बुद्धिमान तथा वाचन और लेखन पर उपजीविका करनेवाला
होता है। शरीर सोने के समान तेजस्वी होता है। वैद्यक का ज्ञान होता है।
इनकी चिकित्सा करना कठिन होता है।
जीवनाथ-इसका मत उपर्युक्त मतों में आ गया है। ॐ पुंजाचार्य-यदा लग्नगते सौम्ये युवा बालायते किलं। चंद्रपुत्रे च
तत्रस्थे स नरस्तुवरप्रियः | यह तरुण होने पर भी बच्चे जैसा दिखता है।
इसे तुवर की दाल बहुत भाती है।
घोलप नीतिमान, हमेशा मंगल कार्य करनेवाला होता है। बंधु सुख
अच्छा मिलता है। मातापिता का सुख भी मिलता है। ऐश्वर्यवान, उद्योगी
तथा शत्रुहीन होता है।
गोपाल रत्नाकर-बहुश्रुत, मांत्रिक, पिशाच बाधा दूर करनेवाला
तथा राजमान्य होता है।
हिल्लाजातक-दशर्मे वत्सरे कान्ति बुधो यच्छति लग्नगः। दसवें
वर्ष शरीर सौंदर्य प्राप्त होता है।
यवनमत-यह बुध अग्नितत्त्व की राशी में हो तो चपल, कुछ क्रोधी,
नाटकों का शौकीन, वक्ता तथा गणित में प्रवीण होता है। धनु राशि में हो
तो साहसी होता है। वृषभ, कन्या या मकर में हो तो हठी और कपटी
होता है। मिथुन, तुला या कुंभ में हो तो बहुत बुद्धिमान, वक्ता, कलाओं
का ज्ञाता तथा विद्याभ्यासी होता है। वृश्चिक में हो तो रसायनशास्त्रज्ञ,
वैद्य, वैज्ञानिक, स्वार्थी और ठगानेवाला होता है। कर्क या मीन में हो तो
चित्त स्थिर नहीं होता। वाचन, लेखन और पण्डिताई में प्रवीण होता है।
शनि के साथ बुध के अशुभ योग हों तो बहुत बुरे फल मिलते है।
अज्ञात-क्षमी, सप्तविंशतिवर्षे तीर्थयात्रायोगः । पापक्षेत्रे युते देहे रोगः
पित्तपाण्डुरोगः । अंगहीनः । सज्जनद्वेषी, नेत्ररोगी, वंचकः । सप्तदशवर्षे
भ्रातॄणामन्योन्यकलहः । श्रेष्ठलोकं गमिष्यति। पापयुते दृष्टे नीचर्क्षे
पापलोकं गमिष्यति । शय्यासुखवर्जितः । क्षुद्रदेवतोपासकः । पापमंदादियुते
वामनेत्रे हानिः । षष्ठेशयुते नीचेशयुते दोषवान् । अपात्रव्ययवान् ।
पापमतिः। शुभयुते निश्चयेन धनधान्यादिमान्, धार्मिकबुद्धि, अस्त्रातित्,
तर्कशास्त्रान्वित, दृढगात्रः । यह क्षमावान होता है। २७ वें वर्ष में तीर्थ यात्रा का योग होता है। पापग्रह की राशि में अथया उसके साथ हो तोपित और पाण्डु रोग होते हैं। कोई अवयव कम होता है। सज्जनों का द्वेषकरता है। आँखों के रोग होते है। ठगाता है। १७ वे वर्ष भाइयों में परस्यरझगड़ा होता है। शख्या सुख नहीं मिलता। क्षद्र देवों की उपासना करताहै। शनि आदि पापग्रहों से युक्त हो तो बाई आँख को हानि होती है।षष्ठेश अथवा नीचेश साथ हो तो दोषयुक्त होता है। अयोग्य कार्य में धनखर्च करता है। बुद्धि पापी होती है। शुभग्रह के साथ हो तो धनधान्यमिलता है, बुद्धि धर्मिक होती है, शस्त्रा्त्रों का ज्ञान मिलता है, सुखी,तर्कशस्त्रज्ञ तथा सुद्ढ शरीखवाला होता है।
जातक सुदर्शन, प्रसन्न, स्पष्ट विचारों वाला, ऊँचे कद का, विद्वान, दानी, सत्यवादी और प्रसन्नतापूर्वक सुखोपभोग करने वाला होगा। सामान्यतया जातक विदेश निवासी होता है।
-मानसागरी
व्यक्ति सभी शास्त्रों का विद्वान्, मृदुभाषी और चिरंजीवी होगा।
-फलदीपिका
जातक गणित और काव्यशास्त्र का ज्ञाता, दक्ष और मृदुभाषी, दीर्घायु, बुद्धिमान, और सुदृढ़ शरीर वाला होगा। वह किसी भी कार्य को करने के समुचित स्थान और समय का ज्ञाता होगा।
-सारावली
जातक शिक्षित, समय पर विवाहित, धार्मिक मंत्रो व उपनिषदों को श्रद्धा से सुनने वाला। अनेकों स्थानों की यात्रा करने वाला, भूत-प्रेतों से मानव की रक्षा करने वाला, कोमल हृदय व मृदुभाषी, विद्वान, क्षमा करने वाला होता है। उसको अधिक धन का लाभ होगा।
- भृगु
जातक प्रसन्नचित, हास्यकार, शिक्षित, चतुर, अनेक शत्रुओं वाला, विद्वान्, खगोलविद्या व अन्य गूढ़ विद्याओं के प्रति आकृष्ट, प्रभावशाली, बुद्धिजीवी, प्रतिष्ठित, चिरंजीवी, साहित्य तथा काव्य-प्रेमी और रसिक होगा।
-डॉ रमन
टिप्पणी
बुध बुद्धि, काव्यशास्त्र, गणित, साहित्य व हसमुख, प्रसन्नचित्त और रसिक स्वभाव का ग्रह है। इसका लग्न पर प्रभाव जातक को मनोरंजन का शौकीन बनाता है। लग्नस्थ बुध का जातक पर पूरा-पूरा प्रभाव रहता है। यदि यह पापाक्रान्त होगा तो त्वचा और पीलिया रोगों का कारण बनेगा। जातक बुरी (काला जादू) ताकतों का उपासक होगा।
मेरे विचार-अब तक शास्त्रकारों के जो मत दिये है बुध अपनेस्थान में अकेला है ऐसा समझकर दिये हुए हैं। परन्तु बुध हमेशा रवि सेआगे या पीछे ३०° अंशो के भीतर ही होता है। इसीसे उसके अस्त औरउदय होते रहते हैं। इसी प्रकार शुक्र भी प्रायः बुध के समीप ही होता है।कभीकभी अन्य ग्रह भी साथ होते हैं। इसलिए इस ग्रह के स्वतन्त्र फर्लोंका वर्णन करना कठिन है। शास्त्रकारों ने जो शुभ फल कहे वे पुरुषराशियों में मिलते है तथा अशुभ फल स्त्री राशियों में मिलते हैं।बृहधवनजातक तथा यवनमत में बहुत पुत्र होना यह फल कहा गया है।यह बुध स्त्री राशि में हो तो मिलता है। जागेश्वर ने वंशक्षय यह फलकहा। इसका अनुभव मिथुन, धनु और कुम्भ में आता है। मेष, सिंह तथातुला में एकाध दूसरा लड़का रहता है। बुध स्त्री राशी में हो तो ३२ वें वर्षतक बहुत खाने की प्रवृत्ति होती है फिर आहार कम होता है। बृहधवनजातकके अनुसार दसवें वर्ष कीर्ति मिलती है। आजकल गायनवादन, वृत्यअथवा सिनेमा के क्षेत्र में बचों को ऐसी प्रसिद्धि मिल सकती है। महाराष्ट्रके प्रसिद्ध गायक बालगन्धर्व तथा मास्टर बर्वे इसके उदाहरण हैं।हिल्लाज़ातककार ने इसी आयु में शरीरकान्ति बढ़ना यह फल कहा है।वसिष्ठ ने चौथे वर्ष मृत्युयोग कहा है किन्तु यह गलत है। बुध से मृत्यु का विचार हो ही नहीं सकता
मेरा अनुभब-
मेष, सिंह, धनु और मिथुन इन राशियों के पहले १५अंशो में बुध हो तो पहले बुध प्रधान व्यक्तियों के जो दो प्रकार कहे गयेउनमें पहले प्रकार का शरीर होता है। यही स्थिती कन्या तथा मीन राशियोंके उत्तरार्ध में बुध हो तो समझनी चाहिए। दूसरे प्रकार का शरीर कन्याऔर मीन के पूर्वार्ध में तथा वृषभ, मकर, मिथुन और धनु के उतरार्थ मेंबुध हो तो मिलता हैं। कर्क या तुला में यह बुध हो तो शरीर बहुत कृशा,ऊंचा तथा आँखें छोटी और रंग बहुत गोरा होता है। यह बुध पुरुष राशिमें हो तो शिक्षा जल्दी पूरी होती है। लेखक, प्रकाशक या संपादक होतेहैं। यह बुध वृषभ, कन्या या मकर में हो तो व्यापारी होते हैं। बड़ी फर्मो में नौकरी मिलती है। कर्क, वृश्चिक या मीन में हो तो कम्पाउन्डर, प्रफरीडर आदि का व्यवसाय मिलता है। यह बुध पुरुष राशि में हो तो ३६ वेंवर्ष लाभ होता है, लेखन में कीर्ति मिलती है। यह वृषभ, कन्या या मकरमें हो तो लोगों में मिलनाजुलना प्रिय नहीं होता, एकान्तप्रिय होता है।स्वभाव नीच, बड़बड़ेपन की प्रवृत्ति, परस्त्रयों में आसक्ति तथा कुत्सितबोलना ये फल मिलते हैं। हमेशा लोगों की बुराई ढूंढते हैं। स्वार्थी, ठगानेवाले,खर्च के बारे में चिकित्सक, किसी का उपकार न करनेवाले होते हैं। कर्क,वृश्चिक तथा मीन में यह बुध हो तो स्वभाव इससे कुछ अच्छा होता है।किन्तु वृश्चिक में हो तो समालोचना में कटु और तीखी भाषा का प्रयोगकरते हैं। धनु राशि में यह बुध हो तो समालोचना निर्भिक, मर्मभेदीकिन्तु सची होती है। मेष, सिंह और धनु में यह बुध हो तो नकल करनेकी प्रवृत्ति होती है।
बुध सौम्य एवं कलाप्रेमी ग्रह है। लग्न में बुध हो तो जातक व्यवहारकुशल,कुशल वक्ता, विद्वान, विद्याप्रेमी, सुंदर, साफ-सफाई का ख्याल रखनेवाला,सौम्य स्वभावी, संगीत-कला संपन्न, गणित, चिकित्सा, ज्योतिष आदिज्ञान-विज्ञानों में रुचि रखनेवाला होता है।
ऐसे जातक का विवाह विलंब से होता है। वैवाहिक जीवन सुखी होता है।जातक ज्ञानी एवं उदारमना रहता है।
महर्षि वशिष्ठ के मतानुसार जातक को चौथे वर्ष में कष्ट रहता है। संतानसुख में न्यूनता या बाधा रहती है। आप्त एवं स्वजनों से मेल नहीं होता। विदेशमें निवास करता है।
अध्यापन, लेखन जैसे बौद्धिक कार्यों के माध्यम से आजीविका चलानीपड़ती है। लग्न में बुध होने पर जातक उम्र से बड़ा होने पर भी हमेशा युवालगता है। बाल्यारिष्ट से मुक्त हो जाए तो दीर्घायु बनता है। अनेक विषयों काविद्वान एवं तंत्रमंत्र जाननेवाला होता है। सरकारी कर्मचारी होता है। उम्र के27वें वर्ष में तीर्थयात्रा का योग बनता है। बुध पापग्रह से युक्त या पापग्रह के स्थान में हो तो पित्तरोग एवं पीलियाहोता है। 17वें वर्ष में भाइयों से मनमुटाव होता है। नेत्रोग भी हो सकता है।
यवन ज्योतिषाचायों के मतानुसार वृश्चिक, वृषभ, मकर या कन्या राशि काबुध लग्न में हो तो जातक दुष्ट एवं छलप्रपंची होता है। मिथुन, तुला या कुंभराशि का बुध लग्न में हो तो जातक बुद्धिमान होता है। कर्क राशि का बुधलग्न में हो तो जातक चंचल स्वभाव का होता है। जातक अच्छा चिकित्सकबन सकता है। लग्न में बुध के साथ शनि हो या शनि की युति की दृष्टिहो तो बुध के फलादेश में न्यूनता आती है। मेष, सिंह या धनु राशि का बुधलग्न में हो तो जातक धैर्यवान, तामसी, विनोदी, गणितज्ञ, उत्तम वक्ता एवंरसिक बनता है। उम्न का छठा वर्ष महत्त्वपूर्ण रहता है।
प्रथम भाव-यदि लग्न/प्रथम भाव में बुध हो तो जातक दीर्घायु, विद्वान,गणितज्ञ, विनोदी, उदार, मिलनसार, धनी, कोमल-वाणीवाला, सुन्दर कांतिवालाप्रशासनिक योग्यता/प्रबन्धन योग्यता से युक्त तथा विपरीत लिंगियों में चर्चित/प्रसिद्धहोता है। उसकी संतान भी प्रायः धर्मात्मा और ज्ञानी होती है। जातक राजा के तुल्यहैसियत वाला भी हो सकता है। बुध शुभ हो तो जातक की पत्नी भी कुलीन वअमीर घर से आती है। आजीविका व आय दोनों की दृष्टि से जातक की स्थितिऔर बेहतर हो जाती है। ऐसी स्थिति में सूर्य जिस-भाव में बैठा हो, उस भाव सेसम्बन्धित जातक का रिश्तेदार भी धनवान हो जाता है। (जैसे यंदि सूर्य छठे घर मेंहै तो मामा या मौसी, तीसरे घर में है तो भाई या बहन आदि) ऐसा लाल किताबका मत है। बुध अशुभ हो तो जातक बदनाम व शरारती हो सकता है।
लाल किताब के अनुसार प्रथम भाव का बुध जातक को स्वरणिम देह कांतिप्रदान करता है तथा लेखक, ज्योतिषी या प्रेस रिपोर्टर बनाता है। बुध यदि वृष,कन्या, मकर राशि में हो तो वह जातक को व्यापारी/बड़ी व्यापारिक फर्म में नौकरीकरने वाला बनाता है। कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का बुध जातक को बैंकिंग केकार्य में ले जाता है। अथवां प्रूफरीडिंग या कम्पोजिंग के काम में ले जाता है। मेषया सिंह राशि का बुध जातक को नकल करने की प्रवृत्ति देता है। किन्तु मकर,कन्या तथा वृष राशि का बुध अनेक दुर्गुण भी देता है।
यदि शुक्र, मंगल तथा ससमेश की स्थिति सुदृढ़ न हो तो लग्नस्थ बुध जातककी SEX POWER में कमी भी पैदा कर सकता है।
बुध पहले घर में
पहले घर में बुध होने से व्यक्ति को राजदरबार से विशेष तौर से लाभ होता है या व्यावसायिक क्षेत्र में उसे इसका शुभ फल ही मिलता है।ऐसा व्यक्ति धर्म पर कोई विशेष विश्वास न रखे, पर उसकी आमदनी केलिए बुध अच्छा फल ही देता है।बुध । के समय राहु यानी ससुराल, केतु यानी औलाद का हाल भीमंदा ही होगा। और विशेषकर यहाँ अशुभ बुध होने से अगर व्यक्तिशराब या मांस-मछली का आदी हो तो बुध का फल और भी खराब होजाता है।
बुध के भावगत फल
प्रथम भाव: बुध प्राय: सूर्य के आस-पास ही गतिमान रहता हे। फलत: बुध के अकेले के फल पूर्णरूप से मिलने सम्भव नहीं हैं। बुध लग्नस्थ हो तो जातक विद्यावान, शीघ्र दाम्पत्य-सूत्र में बंधने वाला, लेखन कला से उपजीविका करने वाला होता है। बुध पुरुष राशि में हो तो शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाती तथा जातक लेखक, सम्पादक, प्रकाशक आदि बनकर जीविकोपार्जन करता हे। पृथ्वी राशि का बुध लग्नस्थ हो तो जातक या तो बड़ा व्यवसायी होता हे अथवा किसी बहुराष्ट्रीय फर्म में उच्च पद प्राप्त करता है। ऐसे जातक प्राय: मिलना-जुलना कम पसन्द करते हैं। एकान्तवास ही उन्हें प्रिय होता है। ऐसे जातकों में स्वार्थपरकता, परस्त्रीगमिता, अनुपकारिता आदि दुर्गुण विशेषतः पाए जाते हैं। अग्नि राशि का बुध हो तो जातक नकलची होता है। जल राशि का बुध हो तो जातक का स्वभाव अच्छा होता है। वृश्चिक राशि का बुध लग्नस्थ हो तथा जातक समालोचक हो तो उसकी भाषा में तीखापन होता है। धनु राशि का बुध हो तो समालोचना पक्षपातरहित, निर्भीक एवं सच्ची होती है। हि राशि का बुध हो तो जातक श्रेष्ठ वक्ता, कलाकार और विद्याभ्यासी होता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध लग्न में हो तो जातक गर्ममिजाज रहता है। वहअपनी मेहनत से जीवन में आगे बढ़ता है। नजदीकी एवं स्वजनों से उसकेमधुर संबंध नहीं रहते। जातक वाद-विवाद में कुशल एवं शत्रुहंता होता है।उसे वाहन सुख अच्छा प्राप्त होता है, किंतु स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।
2. वृषभ वृषभ राशि का बुध लग्न में हो तो जातक कठोर होकर भीपरोपकारी होता है। वह परिवार का पालनकर्ता, संपन्न, कामातुर, सुखी,सरकारी कर्मचारी, कंजूस एवं चुगलखोर होता है, व्यापार में लाभ कमाता है।जातक की पत्नी सुनयनी होती है।
3. मिथुन मिथुन राशि का बुध लग्न में हो तो जातक स्वस्थ, दीर्घायु,संपन्न एवं खूबसूरत और विद्वान होता है लेकिन वाचाल नहीं होता। चाचा आदिसे मनमुटाव रहता है। दो पलियां होती हैं।
4. कर्क कर्क राशि का बुध लग्न में हो तो जातक चंचल स्वभाव काहोता है। मित्रों की मदद करनेवाला, नजदीकी स्वजनों से मनमुटाव रखनेवाला,वाद-विवाद में कुशल, विद्वान, कभी-कभी कटुभाषी, शास्त्रविद्या में प्रवीणहोता है। पैरों में विकार की संभावना रहती है। यवनाचार्य के मतानुसार जातककी कामशक्ति कमजोर रहने से स्त्री सुख में न्यूनता रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध लग्न में हो तो जातक संपन्न, सुखी, विनोदी,श्रेष्ठ वक्ता, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, सरकारी कर्मचारी, जनप्रिय, कलाप्रेमी एवंसुस्वरूप होता है। पत्नी सुंदर रहती है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध लग्न में हो तो जातक स्वस्थ, दीर्घायु, अपनीमेहनत से जीवन में आगे बढ़नेवाला होता है। उसमें काव्य एवं लेखन शक्तिविपुल मात्रा में रहती है। जातक मातृ-पितृभक्त रहता है और उसे माता-पिता का सुख भी पर्याप्त मिलता है। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक को पिता काप्रेम प्राप्त होता है। परंतु माता से मतभिन्नता रहती है। माता का चरित्र संदेहास्पदरहता है। जातक के दो पल्लियां होने की संभावना रहती है।
7. तुला-तुला राशि का बुध लग्न में हो तो जातक अल्पाहारी, धर्मभीरू,सुखी, गणपति-उपासक, पवित्र, अधिकारी, यशस्वी, कंजूस, शास्त्रप्रवीण एवंअच्छी स्मरणशक्ति का धनी होता है। पत्नी-सुख अल्प मिलता है या स्वयंजातक कामशक्ति के अभाव में स्त्रीसुख नहीं भोग पाता। पैरों में जखखम याकोई विकार रहता है। जातक के सभी काम दिक्कतों एवं विलंब से ही पूर्णहोते हैं। सरकारी नौकरी में प्रगति होती है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का बुध लग्न में हो तो जातक गर्ममिजाज होताहै। वह जीवन में सुख बहुत ही कम पाता है, चर्मरोग से ग्रस्त रहता है। जातकके दो विवाह होते हैं या दो पलियां रहती हैं।
9. धनु-धनु राशि का बुध लग्न में हो तो जातक लेखक, कवि, कामातुरएवं कठोर स्वभाव का होता है। उसकें पेट में कोई बात नहीं पचती। मातासे अलगाव और पिता से प्रेम रहता है। महर्षि गर्ग के अनुसार माता का चरित्रअच्छा नहीं रहता। जातक के अनेक स्त्रियों से संबंध रहते हैं। बचपन में उसकास्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता।
10. मकर-मकर राशि का बुध लग्न में हो तो जातक स्वाभिमानी, धैर्यवान,शत्रुहंता, वचन का पक्का, चुगलखोर, अच्छी स्मरणशक्ति का रहता है। उसकेहर काम में विलंब होता है। जातक कंजूस, नास्तिक एवं अल्प आहारी होताहै, पुत्रसुख में बाधा रहती है। सरकारी नौकरी में प्रगति होती है। परिवार केलोगों से मतभिन्नता रहती है।
11. कुंभ-कुभ राशि का बुध लग्न में हो तो जातक विद्वान, गर्ममिजाज,मायावी, झगड़ालू एवं कूटनीतिज्ञ रहता है। एक से अधिक विवाह होते हैं। प्रायःदो पलियां होती हैं। शरीर स्वस्थ रहता है।
12. मीन मीन राशि का बुध लग्न में हो तो जातक उतावले स्वभाव का,शत्रुहंता, विद्वानवक्ता, पुरुषार्थी एवं कामातुर रहता है। अनेक स्त्रियों से सपर्कहोते हुए भी सुख प्राप्त नहीं होता। चाचा आदि स्वगोत्रियों से उसका मनमुटावरहता है। जातक के पेट में कोई बात नहीं पचती।
1) प्रथम भाव -
1. हरे रंग की वस्तु प्रयोग में न लें।
2. मांस व नशे से दूर रहे।
3. नास्तिकसे हानि होगी।
4. संतान अधिक से हानि।
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2 ) द्वितीय भाव -द्वितीय स्थान (धन भाव) धनस्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-धनी।कल्याणवर्मा-बुद्ध्योपार्जितविभवो, धनभवनगतेऽन्नपा नभोगीच।शोभनवाक्यःसुनयःशशितनये मानवो भवति॥ अपनी बुद्धि से धनार्जनकरता है, खानपान का सुख अच्छा मिलता है, बोलना तथा नैतिक प्रवृत्तिअच्छी होती है।
वैद्यनाथ-बुद्धयोपार्जितवत्तिशीलगुणवान् साधुःकुटुवे बुधे।शीलवान,गुणी, सदाचारी तथा अपनी बुद्धि से धनार्जन करनेवाला होता है।
कालचिन्तामणि-बुधे धने विलोकिते वा धनाढ्यो राजपूजितः।पटुभाषी धने नष्टे पुनरन्यच्न लभ्यते॥ धनवान और राजमान्य तथा बोलनेमें कुशल होता हैं। एक बार धन नष्ट हुआ तो भी फिर प्राप्त होता है l
गर्ग-त्य्दोष कुरूते नित्यं सोमपुतर कुगः:। हमेशा त्चारोग होते रहतो है।उदय भास्कर-हरिबुधो यदि वा घटवाक्पति: बपुषि:त पुरुषत्रकरजधनं। समृद्ु चेद्धनभेत्यधिकारद्धहुतदास्यवधूर्धनभृद् भवेत् | सिंह राशि मेंबुध या कुंभ राशि में गुरु धनस्थान में हो तो तीन पीढियों की संपति प्रातहोती है। स्वभाव नम्र होता है। अधिकार मिलता है। दासदासी बहुत होतेहै। स्त्रीधन प्राप्त होता है।
बृहद्यवनजातक-विमलशीलयुतो गुरुवत्सलः कुशलता कलितार्थ-महत्वसुखं। विपुलकांतिसमुन्तिसंयुतो धननिकेतनगे शशिनन्दने ॥शीलवान, गुरुओं पर प्रेम करनेवाला, कुशल, धनसंग्रह कर के सुख प्रात्करनेवाला, कान्तिमान तथा प्रगतिशील होता है। षट््रिंशकैर्धनकृतिम्।३६ वें वर्ष में धनलाभ होता है।
यवनमत-कोटीश्वरःचंद्रसुतः सदैव। करोड़पति होता है।
काशिनाथ-धनभावे चंद्रपुत्रे धनधान्यादिपूरितः। शुभकर्मा सुखीनित्यं राजपूज्यश्च जायते॥ धनधान्य से युक्त, शुभ कर्म करनेवाला,सुखी तथा राजमान्य होता है।
जीवनाथ-विधो: पुत्रेवित्ते प्रवरमतिरज्ोपि कृतिनाम् समाजस्थोबाचस्पतिरिव सदा भासत इति। प्रतापी गीतज्ञो भ्रमर इव भोगी क्षतितलेमहोदार, शश्चत् सुरतरुरिव श्रीपतिसमः॥ अज्ञ होने पर भी विद्वानों कीसभा में बृहस्पति जैसा शोभित होता है। प्रतापी, संगीत का ज्ञाता, भ्रमरके समान भोगी, तथा कल्पवृक्ष के समान उदार होता है।
नारायणभट्ट-धने बुद्धिमान बोधने बाहुतेजाः सभासंगतो भासते व्यासएव। पृथूदारता कल्पवृक्षस्य तद्धत् बुधिर्मण्यते भोगतः षट्पदोयम्| इसकाअर्थ प्राय: जीवनाथ के समान ही है।
द्वितीय स्थान में बुध अधिकतर अच्छे फल देता है। ऐसा जातक मधुरभाषी,खाने-पीने का शौकीन, संपन्न, सुखी, बुद्धिजीवी, शीलवान, गुणवान, विनम्र,उच्चाधिकारी होता है, अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाता है। सिंह राशिका बुध द्वितीय स्थान में हो तो दो-तीन पीढ़ियों की संपत्ति प्राप्त होती है।
शैक्षणिक दृष्टि से 15वां वर्ष जातक के लिए महत्त्वपूर्ण रहता है। वह चर्मरोगसे ग्रस्त रहता है। बाल लंबे किंतु शुष्क रहते हैं। हास्य-व्यंग्य के लेखक एवंव्यंग्य चित्रकारों की जन्मकुंडलियों में द्वितीय स्थान में बुध पाया जाता है। यवनज्योतिषविदों के मतानुसार 36वां वर्ष लाभदायक एवं जीवन का महत्त्वपूर्ण वर्षरहता है। इस काल में जातक करोड़पति बन सकता है। 26वें वर्ष में आर्थिकनुकसान होता है। पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार जातक सौम्य, बुद्धिजीवी या व्यापारी,धनवान एवं आकस्मिक धन प्राप्त करनेवाला होता है।
आर्यग्रन्थकार-भवति च पितृभक्तः सुस्थितः पापभीर्मुदुतनुखररोमादीर्घकेशोऽतिगौरः। धनगतशशिसूनौ सत्यवादी विहारी बहुतखखसुभागीसर्वकालप्रवासी॥ पिता पर श्रद्धा रखनेवाला, अच्छी स्थिति में रहनेवाला,पापभीरु, कोमल शरीर का, बहुत गोरा, सच बोलनेवाला, चैनी, बहुतधनवान तथा सदा प्रवास करनेवाला होता है। इसके केश लंबे किंतु रुखेहोते है। क्षेमसौख्यशुचिवितसुखर्युकसन्क्रियोऽखिलसुहुदधनसंस्थे | सुखी,पवित्र, धनवान, सदाचारी और सब लोगों का मित्र होता है।
जागेश्वर-धने बोधने वक्ति माधुर्यमिश्रं धनं वर्धते बाहुतेजाः सभोगी। भवेत्संसदि सिंहतुल्यःस वक्ता वदान्यस्तदुक्तं न व्यर्थ विरुद्धम्।मधुर बोलता है, धन की वृद्धि होती है, तेजस्वी तथा भोगी होता है। सभामें इसकी बकृता सिंह के समान तेजस्वी होती है। उदार होता है। इसकाबोलना व्यर्थ या विरुद्ध नहीं होता।
पुंजाचार्य-झे वाम्मी स स्यात् पुरुषः सौम्यवकाः स्याद् बुद्द्ोयो-पर्जितस्वः कविरमलवचा वाधिमिष्टानभोक्ता। बोलने में कुशल, सौम्यचेहरे का, अपनी बुद्धि से धनार्जन करनेवाला, मिष्टान्न खानेवाला तथानिर्दोष भाषण करनेवाला होता है।
रामदयाल-पुंजराज के समान ही मत है।वसिष्ठ-धन प्राप्त होता है।
घोलप-मित्रों से युक्त, सब सुखों का भोक्ता, सभा में सुशोभितहोनेवाला, श्रेष्ठ, पराक्रमी, पुरुषों मेंमुख्य, गुरुओं की सेवा करनेवाला,ऐेशवर्यशाली, शूर, काव्य का ज्ञाता, बुद्धिमान तथा चतुर होता है।
गोपालरत्नाकर-पुत्रों से युक्त, वेदशास्त्रों का ज्ञाता, कोमलबोलनेवाला, संकल्पित कार्य पूरे करनेवाला, धनवान, अपने परिश्रम सेप्राप्त धन का उपभोग लेनेवाला, घरदार, धान्य संग्रह करनेवाला होता है।
हिल्लाजातक-षड्विंशें बत्सरे चांद्रिर्धननाशं द्वितीयगः। २६ वेबर्ष धनहानि होती है।
यवनमत-मधुर बोलनेवाला, थोड़़ा दान देनेवाला, बुद्धिमान, नम्र,कुटुंबवत्सल, नीति का अनुसरण करनेवाला तथा धनवान होता है। इसकेमित्र नीच स्वभाव के होते हैं।
पाश्चात्य मत-यह शुभ योग में हो तो बहुत बलवान होता है।लेखन, वाचन, प्रवास, दलाली, लिपिक का काम, हिसाब का काम आदिव्यवसायों में धन प्राप्त करता है। शास्त्रीय ज्ञान, व्यापार और शिक्षाविषयक व्यवहार में यह प्रवीण होता है। नीतिमान, अंतर्जञानी, उद्योगप्रिय,न्याय करने में कुशल होता है। कार्यशक्ति तीव्र होती है। अकस्मातधनलाभ होता है।
अज्ञात-कोटीश्वरः, भोगी, वाचालः, शास्त्रविचक्षण, धनी, गुणाढ्यः,सद्गुणी, पंचदशवर्षे बहुविद्यावान् धनवान् लाभप्रदः । पाप युते पापक्षेत्रेअरिनीचगे विद्याहीनः, क्रत्वं, पवनव्याधिः। शुभयुतिवीक्षणा। दधि-विद्यावान्। गुरुयुते वीक्षिते वा गणितशास्त्राधिकारेण संपन्न। करोड़पति(द्रव्य तथा स्त्रियों का) उपभोक्ता, वाचाल, शास्त्रचर्चा में प्रवीण, गुणवानहोता है। १५ वें वर्ष बहुत ज्ञान प्रा्तहोता है तथा धनवान होता है।पापग्रह साथ हों अथवा पापग्रह की राशि में या शत्रुग्रह की राशि में यानीच राशि में हो तो विद्याभ्यास नहीं होता, स्वभाव क्रूर होता है, वातरोगहोते हैं। शुभग्रह साथ हों या उनकी दृष्टि हो तो बहुत विद्याभ्यास होताहै। गुरु के साथ हो या उसकी दृष्टि हो तो गणितशास्त्र में प्रवीण होता है।
भाव में बुध जातक पिता का आज्ञाकारी, अच्छी प्रतिष्ठावाला, पापकर्मों से डरने वाला, गौरवर्ण, कोमल शरीर, अधिक लम्बे केशों वाला, गोरे रंग वाला, सत्यवक्ता, खिलाड़ी, धनवान लगातार विदेश में वास करने वाला होगा।
-मानसागरी
जातक अपने बुद्धिबल से संपत्ति कमाने वाला, वक्ता, कवि, मिष्ठान्न का शोकीन, श्रेष्ठवक्ता तथा सच्चरित्र व सज्जन होगा।
-फलदीपिका
जातक अपनी बुद्धि से धनार्जन करता है, खाने पीने का शौकीन होगा, शुभ वाणी वाला और अच्छे स्वभाव वाला होगा।
-सारावली
जातक बहुत संततिवाला, बातूनी, शास्त्रज्ञ, संतुष्ट, धनी, गुणवान्, 15 वें वर्ष में शैक्षिक विशिष्टता प्राप्त करने वाला तथा अनेकानेक वित्तीय लाभों को प्राप्त करने वाला होगा।
- भृगु
जातक धर्म व दर्शन का ज्ञाता, मृदुभाषी, श्रेष्ठ वक्ता, धनी, धनार्जन में चतुर, सतर्क, विनोदप्रिय और बहुत बच्चों वाला होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
दूसरा भाव वाणी, धन और परिवार से संबंद्ध है। यहाँ बुध की स्थिति वाक्पटुता, मृदुभाषण, काव्यप्रेम तथा मिष्ठान्न वाले पदार्थ के प्रति रूचि उत्पन्न होती है। जातक की संपत्ति वृध्दि का कारण उसकी सूझबूझ, बुद्धिमत्ता, शिक्षा, काव्यादि तथा चातुर्य ही होता है। परिवार के संबंध में बुध सुखी विवाहित जीवन और भरपूर संतति देने वाला है। वह कल्पवृक्ष के समान बुद्धिमत्ता एवं सभी वरदान देने वाला है। महर्षि नारायण भट्ट ने-ऐसे जातक को वेदव्यास की संज्ञा दी।
मेरे विचार-धनस्थान के बुध के विषय में शास्त्रकारों ने जो फल कहेहैं उनमें शुभ फल पुरुष राशियों के तथा अशुभ फल स्त्री राशि के हैं।
बृहधवनजातक में ३६ वें वर्ष धनलाभ होता है, ऐसा कहा गया है, उसकाअच्छा अनुभब आता है। अज्ञात ने १५ वें वर्ष धन और विद्य प्रस होने काफल कहा उसका अनुभव नहीं आता। इसी तरह हिल्लाजातक का मत भीठीक प्रतीत नहीं होता। वास्तव में बुध सम्पत्ति का कारक नहीं है। भारत मेंलेखकों को द्रव्यलाभ कम ही होता है। गुजराती, मारवाड़ी, कच्छी, जैन,मेमन आदि व्यापारी वर्गों के व्यक्तियों की कुण्डली में धनस्थान में बुध हो तोविपुल धन मिलने का फल कहना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में प्रिन्सिपल,प्रोफेसर, वैज्ञानिक तथा डाइरेक्टर आदि अफसरों को वेतन अच्छा मिलताहै, अतः इस दृष्टि से धनलाभ का फल कह सकेगे।
मेरा अनुभव-वस्तुतः शुक्र और शनि ये दो ग्रह विपुल धनप्राप्ति केकारक हैं। शुक्र से नगदी पैसों का और शनि से स्थावर इस्टेट का विचारकरना चाहिए। किन्तु अन्य कोई भी ग्रह धनस्थान में हो तो उसका भीधनप्राप्ति पर परिणाम होता ही है। मिथुन या कर्क के सिवाय अन्य लग्नकी कुण्डलियों में धनेश बक्री हो तो धन स्थान में बुध होने पर (शुभ ग्रहकी दृष्टि हो तो भी) वह दारिद्रय योग होता है। लग्न में पुरुष राशि हो औरधनस्थान में स्त्री राशि में बुध हो तो (धनेश वक्री न हो तो) अच्छाधनलाभ होता है और जीवन में सफलता मिलती है। शिक्षा रुकावटो केबाद पूरी होती है। बोलना तीव्र, अधिकारपूर्ण होता है। बरताव निर्भीक होताहै। बुद्धिमान और लेखक होते हैं। खाना बहुत रुचिकर चाहिए। मृत्यु के पूर्वज्ञान और बुद्धि से बहुत कीर्ति प्राप्त होती है। धनेश बक्री हो तो धन कममिलता है। सन्तति प्राप्त नहीं होती। यह व्यक्ति बहुत पढ़ालिखा न होने परभी लोग उसे विद्वान मानते हैं। जीवन असफल होता है। मृत्यु के बाद कीर्तिमिलती है। भावी जीवन की चिन्ता ये लोग कभी नहीं करते।
द्वितीय भाव-लग्नकुंडली के दूसरे भाव में बुध हो तो जातक आकर्षकव्यक्तित्व वाला, प्रसन्नचित्त, चतुर, साहसी, धनसंचयी, शुभकर्मा, श्रेठ वक्ता,सफल वकील या सफल दूत होता है। वह विनम्र वाणी वाला होता है। उत्तेजित याक्रुद्ध स्वर में कभी बात नहीं करता (यदि इस भाव में मंगल या सूर्य को युति, दृष्टि,राशि आदि हो तो बात अलग है)। यदि बुध यहां बली व अकेला हो तो व्यक्तियोगी या राजा होता है। ऐसा जातक ब्रह्मज्ञानी हो सकता है। यदि बुध अशुभ हो तोजातक को पुत्र प्राप्त कठिन/असम्भव हो जाती है। पुत्र हो भी तो जातक उससे दुखी रहता है। ऐसे जातक को जुआ, लॉटरी, सट्टा या डुप्लीकेट माल का व्यापारनुकसानदायक होता है। अतः उसे इनसे बचना चाहिए।
लाल किताब के अनुसार शुभ बुध धन व बुद्धि दोनों प्रचुरता से देता है।द्वितीयस्थ बुध जातक को वाचाल या बातूनी, बाहुबल से धनोपार्जन करने वालाबनाता है। ऐसे जातक को आकस्मिक धन प्राप्ति के अवसर प्राप्त होते हैं। लिपिकया कमीशन एजेन्ट के रूप में ऐसा जातक अधिक सफल होता है। नीच राशि मेंबुध पूर्ण विद्या नहीं होने देता। जातक अक्खड़ स्वभाव का होता है तथा उसे चर्मरोग सम्भावित होते हैं। बुध यदि वक्री हो तो दरिद्र योग बनाता है। गुरु की दृष्टि यायुति दूसरे भाव के बुध के साथ हो तो जातक अच्छा गणितज्ञ होता है। शास्त्रों केअनुसार-
धने बुद्धिमान बोधने बाहुतेजाः सभा संगतो भासते व्यास राव।पृथूदारता कल्पवृक्षस्य तद्धद्बुधैरभष्यते भौमतः पट पटीचम्॥अर्थात् द्वितीयस्थ बुध वाला जातक बुद्धिमान, पुरुषार्थी, पण्डितों/विद्वानों केसमाज/सभा में आदर पाने वाला तथा सर्वभोगों को भोगने वाला (सौभाग्य वऐश्वर्य सम्पन्न) होता है।
बुध दूसरे घर में
दूसरे घर के बुध को ‘लड़कों की शिफत की लड़की’ कहा है, यानीबुध के शक्तिशाली होने की निशानी बताया गया है। दूसरे घर में बुधके समय, यदि राहु आठवें घर में हो तो ऐसा व्यक्त बहुत हाजिर-जवाबहोता है। यानी हर बात का बहुत चालाकी से और ठीक ढंग से उत्तर देताहै। यदि दूसरे घर में बुध अकेला हो तो सबको तारने वाला योगी राजामाना गया है, यानी जो भी लोग उसके संपर्क में आएँगे, उनको लाभ हीहोगा। बुध दो के समय केतु आठवें घर में हो तो ऐसा व्यक्ति दूसरों कोबहुत नसीहतें करने के स्वभाव का होता है।
द्वितीय भाव: द्वितीयस्थ बुध के पूर्व महिषियों ने प्राय: शुभ फल बतलाए हैं। भगु सूत्र के अनुसार ऐसा जातक करोड्पति, द्रव्य तथा स्त्रियों का उपभोक्ता, वाचाल, शास्त्र चर्चा में प्रवीण और गुणवान होता है। बुध वास्तव में धन-स्त्री का कारक नहीं है। धन-संपत्ति शुक्र-शनि के कारण मिलती है। मिथुन में घन स्थानगत हो तो धनेश होने के कारण, कन्या राशि का हो तो आयेश-धनेश के कारण धनवान बनाना युक्तिसंगत है। बुध का धनु-मीन राशि में अष्टमेश होकर धन प्राप्ति कराना संगत प्रतीत नहीं होता। मिथुन और कर्क लग्न को छोड़कर बुध अन्य लग्नों की कुण्डली में धनेश वक्री हो तथा बुध धन स्थानगत हो तो दारिद्रथ योग निष्पन्न होता है। इसलिए धन भाव में बुध की स्थिति धनपति बनाती है-कल्पना प्रतीत होती हे। स्त्री राशि का बुध धन स्थान में हो तथा धनेश मार्गी हो तो अच्छे धन लाभ की आशा बंधती है। धन किसी तरह प्राप्त हो भी जाता है परन्तु संतान की चिंता बनी रहती है। धन भावगत बुध अल्प शिक्षित, यहां तक कि मूर्ख को भी प्रखर बुद्धि प्रदान करने में सक्षम होता है। '
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक धनसंपत्तिएवं जमीन-जायदाद से युक्त, सुखी, विद्वान, पितृभक्त एवं कामातुर रहता है।पत्नी अच्छी नहीं होने से अन्य स्त्रियों से संबंध बनते हैं। संतान सुख में बाधारहती है।
2. वृषभ--वृषभ राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक अपने घरानेमें विख्यात रहता है। स्वास्थ्य एवं आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती। सहोदरोंसे स्नेह संबंध नहीं रहते। जीवन एवं स्वास्थ्य के बारे में हमेशा चिंता बनीरहती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक धनसंपत्तिसे युक्त रहता है। पैतृक संपत्ति भी काफी रहती है। उसके मित्र बहुत होतेहैं। परिवार से उसका अलगाव रहता है। वह संगीत एवं काव्य प्रेमी होता है।संतान सुख में बाधा रहती है। वह एक जगह स्थिर नहीं रहता, बार-बार उसेजगह बदलनी पड़ती है।
4. कर्क कर्क राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक विद्वान, दीर्घायु,धर्मात्मा, समाज में अग्रणी, शरीर से हृष्टपुष्ट, धन-दौलत, जमीन-जायदाद सेयुक्त एवं सुखी रहता है। वह पिता का आज्ञाकारी होता है। एक से अधिकपलियां होती हैं।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक अल्पधनी,अल्पायु, मधुरभाषी, सहोदरों से दुखी, गुदा रोगी एवं धार्मिक होता है। कुछआचायों के मतानुसार ऐसे जातक को पिछली तीन पीढ़ियों की दौलत मिलतीहै। लेकिन हमारी राय में ऐसा जातक दरिद्री रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक संपन्न,धार्मिक, अल्पायु किंतु सुखी रहता है। वह पेटू एवं धन उड़ानेवाला होता है।एक से अधिक विवाह होकर भी संतान सुख में बाधा रहती है।
7. तुला-तुला राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक विद्वान, धर्मात्मा,उदार, अधिकारसंपन्न, दीर्घायु, अनेक स्त्रियों से सुख पानेवाला, हृष्टपुष्ट एवंसुखी रहता है। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक का माता से अलगाव रहता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक विद्वान,उद्यमी, जनप्रिय, संपन्न एवं कामातुर रहता है। शरीर में कोई विकार रहता है।तथा जातक पशु एवं वाहन से कष्ट पाता है।
9. धनु-धनु राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक धार्मिक, सुखी, संपन्न, दीर्घायु, विद्वान होकर भी अनैतिक कामों से धन कमाता है। इसी कारणउसे सजा भोगनी पड़ती है। ऐसे उड़ाऊ एवं पेटू जातक को आर्थिक मामलों में बहुत ही सावधान रहना चाहिए। दूसरों को दिया पैसा वापस नहीं मिलता।जातक को प्रवास का बड़ा शौक रहता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक कामातुर रहता है। अनेक स्त्रियों से उसके संबंध बनते हैं। जातक की पत्नी उच्छुंखल, पैसों पर अपना अधिकार जमानेवाली होने के कारण वैवाहिक जीवन दुखी रहता है। संतान सुख में बाधा आती है। मां से मधुर संबंध नहीं रहते।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक उद्यमी, गुणवान, विद्वान, अपने घराने में विख्यात, धैर्यवान एवं मधुरभाषी होता है। उसे जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है। शरीर में कुछ विकार रहता है। जातक के रिश्ते-नाते के लोगों से संबंध मंधुर नहीं रहते, स्वास्थ्य मध्यम रहता है, वाहन एवं पशु से डर रहता है।
12. मीन-मीन राशि का बुध द्वितीय स्थान में हो तो जातक संगीत, काव्यआदि ललित कलाओं का प्रेमी रहता है। उसके मित्र बहुत होते हैं। एक जगह स्थिर रहना उसके लिए कठिन रहता है, बार-बार जगह बदलनी पड़ती है। आर्थिक मामलों में सावधानी बरतनी आवश्यक है। ऐसे जातक से पैसे लेकरलोग वापस नहीं लौटाते। विद्वान होकर भी चोरी, तस्करी, रिश्वत की ओर प्रवृत्ति रहती है। तस्करी करनेवाले व्यापारियों की जन्मकुंडली में यह योग मिलता है। जातक प्रवासप्रिय रहता है।
1.चौपाया जानवर व तोता न पाले।
2. सट्टे न खेले।
3. पीला भोजनखावें।
4. बकरी के बच्चे को गाय का दूध पिलाये।
=========================== 3) तृत्तीय भाव - तृतीय स्थान (सहज भाव)
तृतीय स्थान में बुध के फल
आचार्य-प्रखलः। बहुत दुष्ट होता है।
गुणाकर-दुर्जनः| स्वभाव से दुष्ट।
कल्याणवर्मा-श्रुतिनिरतः परिदीनस्तृतीयराशै बुधे भवति जातः।
निपुणः सहजसमेतो मायाबहुलो नरश्चलितः। वेदाम्यास में म्न, दीन स्यमाबका, निपुण, धनहीन, बन्धुओं से युक्त, बहुत मायावी और अस्थिर होता है।वैद्यनाथ-मायाकर्मपरोडटनोऽतिचपलो दीनोऽनुजस्थेबुधे। मायावी,प्रवासी, बहुत चपल और दीन होता है।
गर्ग-बुधेऽच सहजस्थाने दृष्टिभिर्वा विलोकिते । भ्रातृणं भगिनीनांच सुखं तस्य महद् बदेत्| भ्रातरः पंच विद्यन्ते शत्रुदृष्ट्या मृर्ति बदेत्।चतस्त्रः पंचवाज्ञेयाः स्वसारः शुभलक्षणाः | कुजन शनिना दृष्टे तासांवन्ध्यत्व-मिष्यते । बुधो वा तत्र संस्थितः, स्वसृबाहुल्यतां तस्य कुर्वन्तिन हि संशयः। बुधी त्रितये। बुधश्च शताधिपः॥ भाई और बहनों कोबहुत सुख प्रा्त होता है। इसे पाँच भाई और चार या पाँच बहने होती हैं।इस बुध पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो भाइयों की मृत्यु होती है। शनियामंगल की दृष्टि हो तो बहनें बंध्या होती है। इसे बहुत मित्र होते हैं।
वैष्णवतन्त्र-लम्नात् तृतीयभवने यदि सोमसुतो भवेत्।द्वौ पुत्रौीकन्यकास्तिस्त्रो जायन्ते नात्र संशयः। इसे दो लड़के और तीनलडकियाँ होती हैं।
बृह्द्यवनजातक-साहसी च परिवारजनाढ्यश्चितशुद्धिरहितोहतसौख्यः । मानवः कुशलवान् हितकर्ता शीतभानुतनुजेडनुजसंस्थे। यहसाहसी तथा बड़े परिवार से युक्त होता है। इसका चित्त शुद्ध नहीं होतातथा सुख नष्ट होता है। यह चतुर तथा हितकारी होता है।ज्ञोर्काव्हवित्ताविलयं। १२ वें वर्ष धनहानि होती है।
आर्यग्रन्थकार-बृहद्यवनजातक के समान मत है।
वसिष्ठ-ऋर्धि, अन्यभीतिम्। यह समृद्ध होताहै, दूसरों का डर होता है।काशीनाथ-तृतीयस्थे बुधे जातः प्रशस्तो बन्धुमानितः। धर्मध्वजीयशस्वी च गुरुदेवार्चको भवेत् | यह अच्छे शरीर का, बन्धुओं को प्रिय,धार्मिक, यशस्वी तथा देव और गुरुओं का आदर करनेवाला होता है।स्वजनयुक् जडधीबहुसाहसः कुमलता कुमनास्त्रिगते बुधे॥ स्वजनों सेयुक्त, मन्द बुद्धि का, साहसी, अशुभ विचार करनेवाला होता है।
नारायणभट्ट-वणिकमित्रतापण्यकृद्वृत्तिशाली वशित्वं धियोदुर्वशानामुपैति। विनीतोऽतिभोगं भजेत् संन्यसेद् वा तृतीयेऽनुजैराश्रितोजञे लतावत् । व्यापार से तथा व्यापारियों की मित्रता से धन प्राप्त करता है।बुद्धि से दूसरों को वश में लाता है। नम्र होता है। एक तो बहुत उपभोगकरता है या संन्यास लेता है। वृक्ष को लताएँ वेष्टित करती हैं उसी तरहइसे भाइयों को आश्रय देना होता है।
जीवनाथ-नारायणभट्ट के समान मत है।
जागेश्वर-बुधे बुद्धिमान विक्रमे धर्मशीलो भवेल्लीलया रोगभाक्सर्वकालम्। स्वसारो भवन्ति ध्रुवं पंच खेटातस्था साहसी चित्तशुद्धाविहीनः॥ यह बुद्धिमान, धर्मशील, सदा रोगी रहनेवाला तथा साहसी होताहै। इसे पाँच बहने होती हैं। इसका चित्त शुद्ध नहीं होता।
मन्त्रेश्वर-शौये शूरः समायुः सुसहजसहितः सश्रमो दैन्ययुक्तः ।पराक्रमी, मध्यम आयु का, अच्छे भाईयों से युक्त, श्रम करनेवाला तथादीन होता है।
घोलप-धनुर्धारी, देशभक्त, शोभायुक्त, अच्छे पुत्रों से युक्त, कवि,अहंकारी, तेजस्वी, ऐश्वर्यवान, विलासी, अच्छे भाईयों से युक्त होता है।इसकी पत्नी सुन्दर होती है।
गोपाल रत्नाकर-सुखी तथा सम्पतिवान होता है। भाई बहिनें बहुतहोती हैं और उनपर प्रेम भी रहता है।
हिल्लाजातक-तृतीयोद्वादशे वर्षे। १२ वें वर्ष धनलाम होता है।
यवनमत-यह शीलवान, धनवान, दयालु, मित्र तथा स्त्रियों कोप्रिय एवंसर्वदा आनंदी होता है।
पाशचात्य भत-यह बुध बायुत्व की राशि में हो तो अभ्यास कीओर प्रवृत्ति होती है। शास्त्रकार, ज्योतिष तथा गुप्त विद्याओं में प्रवीणहोता है। यह कर्क या मीन राशि में हो और इस पर शनि की दृष्टि न होतो चित्त अस्थिर और डरपोक होता है। लेखन, वाचन और भाषण मेंकुशल होता है। प्रवास से सुख और लाभ होता है। गुरु की दृष्टि हो तोन्याय करने की प्रवृत्ति होती है। मंगल के साथ इस बुध का शुभयोग हो,तो भूगर्भशास्त्र में प्रवीणता प्राप्त होती है। परोपकारी वृत्ति होती है।पड़ोसियों और परिचितों से प्रेमपर्वक बरताव करते हैं। प्रवास बहुत करनापड़़ता है।
अज्ञात-भ्रातृमान्, बहुसौख्यवान् । पंचदशर्षे क्षे्रपुत्रयुतः।धनलाभवान्, सद्गुणशाली। भावाधिपे बलयुते दीर्घायुः। धैर्यवान् ।भावाधिषये दुर्वले भ्रातृपीडा भीतिमान्। बलयुते भ्राता दीघायुः भमई होतेहैं, सुख बहुत मिलता है। १५ वें वर्ष खेती तथा सन्तति प्राप् होती है।घनवान तथा सद्गुणी होता है। तृतीय स्थान का स्वामी बलवान हो तोदीर्घायु और धैर्यवान होता है। वह दुर्बल हो, तो डरपोक होता है तथाभाइयों को तकलीफ होती है। बलबान हो तो भाई दीर्घायु होता है।
तीसरे भाव में बुध की स्थिति साहस, अपने परिवार की संगति, पारिवारिक सहयोग, पुण्यकर्म और सामाजिक कार्यों के प्रति रूचि प्रदान करती है। वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में दक्ष होगा।
जातक बहादुर व मध्यायु होगा। वह निराश, थका हुआ और अच्छे भाई-बहनों वाला होगा।
-फलदीपिका
वह सगे-संबंधियों से विलग, दक्ष, भाई-बहनों वाला, चालाक, चंचल बुध्दि वाला और कठोर परिश्रमी होगा।
-सारावली
जातक के कई भाई और वह सभी खुशहाल होगें। 15 वें वर्ष में उसे प्राप्ति, भू-स्वामित्व, धनसंपत्ति, उच्चादर्शो के प्रति आकृष्ट, दीर्घायु पुत्र तथा सहनशील होगा।
भृगु
जातक पुत्री का पिता, प्रसन्न व स्वस्थ माँ का सुख प्राप्त, चतुर, क्रूर, समुचित यौनाकृष्ट, जोड़तोड़ करने में दक्ष, कूटनीतिज्ञ, समझदार, बहादुर और निर्णय लेने वाला होगा।
- डॉ रामन
वैश्णव तंत्र के अनुसार- जातक के 2 पुत्र ओर 2 पुत्रियाँ होगी। जोगेश्वर का मत है कि तृतीयस्थ बुध पाँच बहनें देता है। जबकि गर्गाचार्य के अनुसार-5 भाई और 5 बहनें होनी चाहिए।
टिप्पणी
तृतीयस्थ बुध प्रायः अच्छा ही होता है। तृतीय भाव पराक्रम का कहलाता है जो कि बुध (बुद्धि) के स्वामित्व में आता है। अतः बुध की स्थिति अच्छी होने पर जातक साहसी, मानसिक रूप से सतर्क और अच्छे काम करने वाला होगा यदि बुध बलवान है। तीसरा भाव भाई-बहनों का भी द्योतक है अतः जातक के भाई-बहनें अच्छे होगें। बुध भचक्र की तीसरी राशि (मिथुन) का स्वामी है। तृतीयस्थ बुध, चाहे वह किसी भी राशि में हो, स्वराशि (मिथुन) के ही न्यूनाधिक फल देगा।
मेरे विचार-नैसर्गिक कुण्डली में तृतीय स्थान पर बुध का अधिकारहै। तदनुसार शास्त्रकारों ने फल कहे हैं। यह स्थान मिथुन राशि का है अतः स्त्री तथा पुरुष ऐसे दो प्रकार के फल मिलते हैं। वक्ता, कवि,ज्योतिषी, लेखक आदि वर्गों के लोगों के लिए यह स्थान अच्छा होनाआवश्यक है। इन लोगों का जीवन अपने विचार व्यक्त करने पर हीअवलंबित होता है। मेरे विचार से शुभ ग्रहों के लिए तृतीय स्थान अच्छानहीं-दारिद्रियदर्शक है। शास्त्रकारों ने यहाँ जो शुभ फल कहे हैं वे मेष,सिंह, तुला, कुंभ तथा मिथुन और धनु का पूर्वार्ध एवं कन्या और मीन काउत्तरार्ध इन राशियों के हैं। अशुभ फर्लों का अनुभव कन्या और मीन केपूर्वा्ध में, मिथुन और धनु के उत्तरार्ध में तथा अन्य स्त्री राशियों में आताहै। हिल्लाजातककार ने १२ वें वर्ष धनलाभ का फल कहा है औरयवनजातक में इसी वर्ष धनहानि का फल कहा है, इनमें यवनजातक कामत ठीक मालूम होता है क्यों कि बुध तृतीय में हो तो रवि प्रायः धनस्थानमें या चतुर्थस्थान में होता है, इसलिए पैतृक संपत्ति नष्ट होती है औरपिता दरिद्री होता है। अज्ञात ने १५ वें वर्ष पुत्रप्रात्ति का फल कहा वहअसंभव प्रतीत होता है। खेती प्राप्त होने का फल कहा वह पैतृक संपत्तिके रुप में या किसी के उत्तराधिकारी के रुप में मिल सकता है। अन्यथा१२ वें वर्ष स्वयं धन उपार्जन करना स्वाभाविक नहीं है। इसी प्रकारघोलप के मत में भी कुछ असंभवनीय विचार हैं।
मेरा अनुभव-इस स्थान में बुध पुरुष राशि में हो तो शिक्षा पूरीहोती है। बुद्धि शन्त और विचार सुसंगत होते हैं। मन की प्रवृत्ति अभ्यासकी ओर होती है। हस्ताक्षर अच्छा होता है। लेखन जल्दी और सुसंगतहोता है। स्मरणशक्ति अच्छी होती है। यही बुध स्त्री राशी में हो, तो इससेउलटा अनुभब आता है। तृतीय में बुध, धनस्थान में शुक्र और इन दोनोंमें से किसी एक स्थान में रवि ऐसा योग हो और धनु, कर्क या कन्या लग्न हो तो वे व्यक्ति निसर्गतः ज्योतिषशास्त्र में कुशल होते हैं। धनस्थान मेंबुध और तृतीय में शुक्र हो तो भी यह योग होता है। डाक्टर तथा जजलोगों को भी यह अच्छा योग होता है। इन्हें दिमाग शान्त रखकर दूसरोंका कहना सुनना पड़ता है और निर्णय लेना होता है। ऐसे डाक्टरों कीचिकित्सा और न्यायाधीशों के निर्णय उत्तम होते हैं। लेखन, मुद्रण औरप्रकाशन के व्यवसाय इस योग पर होते हैं। रहने का स्थान हमेशा बदलनापड़ता है। यह बुध बलबान हो, तो २४ वें वर्ष से, मध्यम बली हो तो ३०वें वर्ष से तथा अनिष्ट ग्रह से युक्त हो तो ३६ वें वर्ष से भाग्योदय होता है।पापग्रह का संबंध हो, तो भी इसे बहुत अनिष्ट फल नहीं मिलते।
तृतीय स्थान में बुध हो तो जातक कपटी एवं दुर्जन होता है। ज्योतिषियों का मानना है कि ऐसा जातक स्वतंत्र विचारक होता है इसलिए वह अपनीही बात पर अडिग रहता है। ऐसे जातक को वश में करना मुश्किल रहताहै। वह व्यवहार में नम्र होता है किंतु कूटनीतिज्ञ एवं बहुरूपी होता है। उसके अनेक मित्र होते हैं।
जातक विद्वान एवं चतुर रहता है और भाई-बहनों का अच्छा सुख मिलताहै। उनसे संबंधित जिम्मेदारियां जातक पूर्ण रूप से निभाता है। महर्षि गर्ग केमतानुसार उसके पांच भाई एवं चार या पांच बहने होती हैं। तृतीयस्थ बुध पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो भाई-बहनों की हानि हो सकती है। शनि या मंगलकी दृष्टि हो तो बहनें बांझ रह सकती हैं।
वैष्णवतंत्र नामक प्राचीन ग्रंथ में तृतीयस्थ बुध से संतान संबंधी निर्णय दिए हुए हैं। उनके अनुसार जातक के दो लड़के एवं तीन लड़कियां रहती हैं। जातकधार्मिक, सहोदरों में विख्यात, स्वस्थ शरीर का एवं सफल होता है। आर्थिकदृष्टि से विशेष समृद्ध नहीं रहता। 15वां वर्ष भाग्योदयकारक होता है। यवनज्योतिषविदों के मतानुसार जातक का मन और आचरण शुद्ध नहीं होता। वहचतुर होता है।
साहित्य, गुप्तविद्या, न्यायशास्त्र, भूगर्भशास्त्र एवं लेखन में जातक कुशलरहता है। अड़ोस-पड़ोस के लोग तथा भाइयों से बर्ताव अच्छा रहता है। व्यापारमें अच्छी सफलता प्राप्त होती है।
तृतीय भाव-लग्न कुंडली के तीसरे भाव में बुध हो तो जातक अपने कार्यमें चतुर, परिश्रमी, लेखक, सम्पादक, हस्तरेखाविद्, कवि, सन्तानवान, अल्पभाई-बहनों वाला, आरामतलब, डरपोक, अस्थिर स्वभाव का, कुशल व्यापारी,छोटी यात्राओं का शौकोन तथा अच्छे पड़ोसवाला होता है। परन्तु वह स्वयं अच्छापड़ोसी नहीं होता। आयु भी ठीक ही होती है।
लाल किताब के अनुसार तृतीयस्थ बुध वाला जातक अपने लिए लाभकारीतथा औरों के लिए नुकसानदेय होता है। बुध अशुभ हो तो ताऊ, दादा, चाचा आदिनिकट सम्बन्धियों पर भी अशुभ प्रभाव डालता है। ऐसा जातक यदि बोलते समयहकलाता/तुतलाता हो तो बुध का अशुभ प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है(लेखक, कवि, ज्योतिषी, वक्ता आदि बनने के लिए तृतीय भाव तथा बुध कीसबलता आवश्यक मानी गई है)।
पुरुष राशि का बुध पूर्ण शिक्षा, सुन्दर लेख व गजब की स्मरण शक्ति प्रदानकरता है। नीच राशि का बुध जातक को कायर तथा अस्थिर बुद्धि वाला बनाता है(यदि ऐसे बुध पर शनि की दृष्टि हो तब नहीं)। नीच का बुध यदि मंगल से शुभयोग बनाए तो जातक भूगर्भशास्त्री होता है, किन्तु प्रवास में अधिक रहता है।जबकि शनि से शुभ योग करता हो तो जातक अंतिम अवस्था में सब कुछ त्यागकरमोक्ष मार्ग का अवलम्बन कर वैरागी हो जाता है। चिकित्सकों, लेखकों व प्रकाशकोंको तीसरा बुध विशेष लाभकारी होता है।
बुध तीसरे घर में
तीसरे घर में यह बहुत मन्दा माना गया है। बुध को तीसरे घर में‘यूकने वाला कोढ़ी’ कहा गया है। लाल किताब में इसे ‘भूत की शक्तिजिसका साया न हो' कहकर पुकारा गया है और इसे ‘दीमक' भी कहागया है जो व्यक्ति के धन को दीमक लगा दे।बुध 3 के समय यदि सूर्य ग्यारह में हो तो व्यक्ति की औलाद तथामामू परिवार पर उत्तम असर होगा। कई बार ऐसी हालत में व्यक्ति साँससम्बन्धी बीमारियों का हकीम भी हो सकता है। बुध न. 3 के समयखाना न. 4 की चीजें जैसे-तोता, कलई आदि और रिश्तेदार जद्दीजायदाद आमदनी तथा दिल की शान्ति पर बुरा असर होगा और खानान. 4 के रिश्तेदार जिनमें व्यक्ति की मौसी की लड़की भी आती है, अपनीजदूदी जगह छोड़कर उजड़ जाएँगे या उन्हें कहीं और हमेशा के लिए जाना पड़ेगा। बुध 3 के समय यदि शुक्र चार में हो तो ऐसे व्यक्ति की औलादबहुत देर के बाद पैदा होती है। यदि बुध के शत्रु ग्रह, विशेषकर चन्द्रखाना न. 6 और खाना न. 8 में दोस्त ग्रह न हों तो शनि का असर मन्दाहो जाएगा, जिससे व्यक्ति के चाचा पर या शनि के काम लोहा, मशीनरी,मोटरगाड़ी या लकड़ी के काम पर बुरा असर पड़ेगा और शुक यानी पत्लीऔर राहु यानी साला या बिजली आदि के कामों पर भी इसका प्रभावअशुभ ही पड़ेगा।
तृतीय भाव: तृतीय भाव पर बुध का नेसर्गिक अधिकार है। कवि, ज्योतिषी, श्रेष्ठ वक्ता आदि के लिए तृतीय भाव का शुभ ओर बलवान होना अनिवार्य है। मूलत: तृतीय भाव में शुभ ग्रह अच्छे नहीं माने जाते लेकिन बुध अपवाद है। पुरुष राशि का बुध तीसरे स्थान में हो तो जातक की स्मरणशक्ति अच्छी होती है, लेखन तर्कसंगत होता है, शिक्षा पूर्ण हो जाती है। स्त्री राशि का बुध हो तो अशुभ फल ही अनुभव में आते हैं। धन स्थान में शुक्र और सहज स्थान में बुध हो तथा लग्न कन्या, कर्क या धनु राशि का हो तो देखने में आया है कि ऐसे ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी करते हैं। जिन चिकित्सकों और न्यायाधीशों की कुण्डलियों में तीसरे भाव में बुध हो तो रोगियों के असाध्य रोग चिकित्सा से सहज ही दूर हो जाते हैं और न्यायाधीशों के निर्णय तर्कसंगत व उत्तम होते हैं। वायु तत्त्वीय राशि का बुध जातक को गुप्त विद्या, शास्त्र और ज्योतिष ज्ञान में प्रवीणता देता है। कर्क, मीन राशि में शनि से दुष्ट बुध तीसरे भाव में हो तो जातक अस्थिर चित्त, भीरु (डरपोक) होता है। बृहस्पति से दुष्ट हो तो
न्यायप्रिय होता है। मंगल के साथ शुभ योग में हो तो भूगर्भशास्त्र में प्रवीण, अधिक प्रवास करने वाला तथा परिजनों ओर पड़ोसियों से सद्व्यवहार करने वाला होता है। तृतीयस्थ बुध के जातक लेखन-प्रकाशन-सम्पादन को जीविका का साधन बनाएं तो लाभकारी रहता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक मायावी, कंजूस,चुगलखोर, मधुरभाषी, उद्यमी, घराने में चहेता होता है। सहोदरों का सुख मध्यमरहता है। उसका धन अकस्मात खर्च होता है और गया धन लौटकर नहीं आता।शरीर में कोई विकार रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक विख्यात,अपनी मेहनत से जीवन में प्रगति करनेवाला रहता है। मध्यम रूप से स्वस्थहोता है। माता-पिता के सुख में न्यूनता और संतान सुख में बाधा रहती है।पुत्र सुख विलंब से प्राप्त होता है। तृतीय स्थान में वृषभ राशि का बुध एवं सप्तम स्थान में कोई पापग्रह हो तो जातक की पत्नी चरित्र से भ्रष्ट होती है।उसके घर में ही किसी से अनैतिक संबंध होते हैं।
3. मिथुन मिथुन राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक गर्ममिजाज,चुगलखोर, चंचल, नास्तिक, सरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठित, मैत्री करने में कुशलहोता है। स्वकीयों से संबंध मध्यम रहते हैं।
4. कर्क कर्क राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक चतुर, आस्तिक,उद्यमी, टीकाकार, व्यापारी वृत्ति का होता है। उसकी चोरी जैसी दृष्प्रवृत्ति रहती
है, चरित्र कमजोर रहता है। वह मधुरभाषी होता है। आर्थिक स्थिति अस्थिर रहती है। जातक की लड़कियां आज्ञाकारी होती हैं।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक विशेष पराक्रमी, संपन्न, स्वाभिमानी, मित्रों का दुखभोगी, आस्तिक, दानी-धर्मी एवं बलवानहोता है। माता-पिता से अनबन रहती है। जातक के दो पल्लियां होना संभवरहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,अनेक नौकर-चाकरों से युक्त, सरकारी कर्मचारी, व्यवहारकुशल, सुखी,बंधु-बांधवों से युक्त रहता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी, अनेकनौकर-चाकरों से युक्त, सरकारी कर्मचारी, सदाचारी, संपन्न, समीक्षक, व्यापारसे जुड़ा हुआ रहता है। गुप्त रोग से ग्रस्त रहता है। चोरी, रिश्वत एवं दुराचरणमें फस सकता है। सिरदर्द से त्रस्त रहता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक संपन्न,स्वाभिमानी, उद्यमी एवं सुखी और शारीरिक दृष्टि से दुर्बल रहता है।माता-पिता एवं रिश्तेदारों से उसके मधुर संबंध नहीं रहते। कुछ आचायों केमतानुसार जातक का लालन-पालन ननिहाल में होता है, जहां उसे अच्छा सुखप्राप्त होता है। दो विवाह होने की संभावना रहती है।
9. धनु-धनु राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक परिश्रमी, विद्वान,गुणवान, रूपवान, जनप्रिय एवं यशस्वी रहता है। बाल्यारिष्ट का भय रहताहै। जातक सहोदरों का पालनकर्ता रहता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक प्रवासप्रिय,आस्तिक, सच्चरित्र एवं सज्जन रहता है तथा भाई-बहनों के सुख में न्यूनतारहती है। उसके सिरदर्द के रोग से ग्रस्त होने की संभावना रहती है।
11. कुंभ-कुंभ रशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक कापालन-पोषण मामा के घर होता है किंतु जातक की मामा व मौसेरे भाई सेनहीं बनती। माता का सुख कम मिलता है, स्वास्थ्य भी शिथिल रहता है।पुरुषत्व की कमी के कारण पत्नी का चरित्र ठीक नहीं रहता। संतान सुखमें बाधा रहती है। पुत्र संतान अल्पायु होती है या पुत्र सुख विलंब से प्राप्तहोता है।
12. मीनमीन राशि का बुध तृतीय स्थान में हो तो जातक गर्ममिजाज,चुगलखोर, अभिमानी, पैतृक संपत्ति का दुरुपयोग करनेवाला, कुसंगति, सहोदरोंसे शुत्रवत व्यवहार करनेवाला, आप्तजन एवं पड़ोसियों के लिए उपद्रवकारीरहता है। उसकी आंखें लाल रहती हैं। समाज में वह प्रसिद्ध एवं जनप्रिय होताहै, बाल्यारिष्ट का डर रहता है। यौवनावस्था में कुसंगति से दूर रह सका तोजीवन सुधरता है।
1. मुंगा धारण करें।
2. पीले रंग की 11 कोडियां ले उसे जलाकर उसीराख को समुद्र या नदी में बहावें। दुर्गा पूजा करें।
3. घर में लाल पत्थररख रोज दूध से धोवे।
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4) चतुर् भाव - चतुर्थ स्थान (सुख भाव)
चतुर्थ स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-पण्डितः| विद्वान होते है।कल्याणवर्मा-पण्डितमाहुः सुभगो बाहनयुक्तो बुधेहिबुकसंस्थे।सुपरिच्छदः सुबंधुर्भवति नरः पाण्डितो नित्यम्॥ विद्वान, सुंदर, वाहनोंका स्वामी तथा अच्छे परिवार से युक्त होता है।
वैद्यनाथ-बन्धुस्थे शशिजे विबन्धुरमलज्ञानी धनी पाण्डितः। इसेआप्त स्वकीय नहीं होते । इसका ज्ञान शुद्ध होता है। यह धनवान औरपण्डित होता है। जातो विद्याविनयचतुरश्चन्द्रसूनौ बलिष्ठः । यह विद्यावान,नम्र, चतुर और बलवान होता है।
गर्ग-बहुमित्रो बहुधनो बन्धौ पापं बिना बुध। नानारसविलासी चसपापे त्वन्यथा फलम्॥ चित्र बुधेच विज्ञेयं बुधे स्वर्ण गृहे तस्य। बुधश्धसर्वकार्येषु मित्रो मिश्रफलप्रदः ।। इस स्थान में बुध पापग्रहों से युक्त अथवादृष्ट न हो तो बहुत धन मिलता है और मित्र बहुत होते हैं। नाना रसों का
उपभोग लेता है। पापग्रह का संबंध हो, तो उलटा फल मिलता है। रहनेका स्थान चित्रविचित्र होता है। इस बुध के फल मिश्र होते हैं।
बादरायण-सौम्ये चाल्पसुत्वं। पुत्र कम होते हैं।
यवनमत-बुधस्तु पल्याहितबन्धुसौख्यं बन्धी परावासकृताधिवासम्। पत्नी और बन्धुओं का सुख अच्छा मिलता है। पापग्रहों कासंबंध हो तो दूसरों के घर रहना पड़ता है।
काशीनाथ-चतुर्थे चन्द्रपुत्रे च बहुमृत्ययशोन्चितः। पहुवाक्योभाम्ययुक्तः सत्यवादी च जायते ॥ बहुत नौकरचाकर होते हैं। कीर्तिमान,बोलने में चतुर, भाग्यवान और सच बोलनेवाला होता है।
बृहद्यवनजातक-पुत्रसौख्यसहितं बहुमित्रंमंत्रवादकुशलं च सुशीलं।मानवं किल करोति सुलीलं शीतदीधितिसुतः सुखसंस्थः ॥ पुत्रो का सुखमिलता है। बहुत मित्र होते हैं। मंत्रतंत्र जानता है॥ शीलवान और सदाचारीहोता है। ज्ञो वित्तहा यमयमैः २२ वें वर्ष धनहानि होती है।
वसिष्ठ-सौख्यान्वितं च धनं। सुखी और धनवान होता है।
जयदेव-सधनवाहनगीतगुणोऽटनो गृहसुखः सुखगः शशिजो वशः।धनवान, बाहनों से युक्त, संगीत में प्रवीण, प्रवासी, घर के बारे में सुखीऔर कीर्तिमान होता है।
नारायणभट्ट-चतुर्थे चरेचन्द्रजश्चारुमित्रो विशेषाधिकृद् भूमिनाथोगणस्य। भवेल्लेखको लिख्यते बा तदुक्ततादाशापरैः पैतृकं नो धनं च॥मित्र उत्तम होते हैं, राजा गण का स्वामी या विशेष अधिकारी होता है।यह लेखक होता है अथवा इसका कहा हुआ दुसरो द्वारा लिखा जाता है।पैतृक धन नहीं मिलता। जीवनाथ-नारायणभट्ट के समान मत है।
जागेश्वर-बुधे तुर्यगे वैभवेदिष्ठिकाधैः पितुर्भम्यिवान् सुन्दरः। पिताके संबंध से भाग्यवान और सुन्दर होता है।
मन्त्रेश्वर-संख्यावान् चाटुवाक्यः। गणितशास्त्र का ज्ञाता तथा मीठाबोलनेवाला होता है।
आर्यग्रन्थकार-बहुतरधनपूर्णो भ्रातृहर्ता च पापे बहुतरबहुपत्नी पूर्णगिहेस्वतुंगे। तरलमतिरलज्जः क्षीणजंघः कुशांगः शिशुवंयसि च रोगी बन्धुसंस्थेकुमारे॥ बहुत धनवान होता है। यह अशुभ हो तो भाईयों का नाश करताहै। बलवान या उच्च हो तो कई पत्नियाँ होती हैं। इसकी बुद्धि तरल औरशरीर दुबलापतला होता है। यह निर्लज्ज होता है और बचपन में इसे रोगहोते हैं।
घोलप-सुन्दर, वाहन सुख से युक्त, राजा का मित्र अपने कुल कोभूषणभूत, उत्तम स्थान में रहनेवाला, अधिकारी, पराक्रमी, धनवान अनेकविद्याओं का अभ्यास करनेवाला तथा उत्तम घर में रहनेवाला होता है।
हिल्लाजातक-द्वर्विशे चतुर्थगः पुत्र च। २२ वें वर्ष पुत्र होता है।गोपालरत्नाकर-हस्तकलाओं में कुशल, खेती में रुचि रखनेवालाऔर कुटिल होता है।
यवनमत-इसका शरीर पुष्ट होता है। पुत्र का दुःख प्राप्त होता है।आरंभ किये हुए कार्य में इसे सफलता मिलती है। यह संगीतप्रिय औरमिष्टभाषी होता है। यह जैसा बोलता है वैसा बरताव नहीं करता। अपनेदिये बचन को तत्काल भूल जाता है। बहुत आलसी होता है।
पाश्चात्य मत-यह बुध मिथुन या कन्या राशि में हो, तो आयु काअन्तिम भाग अच्छा जाता है। इसे संसार के बारे में बहुत चिन्ता होती है।स्मरणशक्ति बहुत तीब्र होती है तथा अन्तज्ञन भी हो सकता है। इसकाशनि के साथ अशुभ योग हो, तो चोरी या विश्वासघात से इसका नुकसानहोता है। माँ-बाप से अच्छा लाभ होता है।
अज्ञात-धिर्यवान् । विशालाक्षः। मावृषितृसुखयुक्तः। विभूषायोषांगंप्रवसतुरगाणाम् । ज्ञानवान् । सुखी। षोडशवर्ष द्रन्यापहारुयेण बहुताभप्रदोभविति । गुरुशुक्रशनियुते अनेकवाहनवान्। भावाधिषे बलयुते आन्दोलिकाप्रासिः राहुकेतुशनियुते वाहनरिष्टवान क्षेत्ेसुखबर्जितः। बन्धुकुलद्रेपीधिर्यवान, सुखी, ज्ञानवान होता है। आँखे बड़ी होती है। मातापिता कासुख मिलता है। स्त्रियों तथा आभूषणों का सुख मिलता है। अच्छे चोड़ेमिलते हैं। १६ वें वर्ष दूसरों के धन का अपहार करने से बहुत लाम होताहै। गुरु, शुक्र, शनि के साथ हो, तो बहुत से वाहन मिलते हैं। रहु, केतु याशनिसाथ हो तो बाहनों से भय होता है। जमीन का सुख नहीं मिलता। बान्धर्वों काद्वेष करता है।
मेरे विचार-विद्वान और ज्ञानी होना यह फल कुछ शास्त्रकारों नेकहा है, किन्तु इसका अनुभव किसी भी राशि में नही आता। यवनमत मेंपुत्रदुःख और बृहधवन में पुत्रसुख ऐसे परस्पर विरुद्ध फल दिये गये हैं।यदि रवि पंचम में हो, तो पुत्रहानि का फल मिलेगा और रवि तृतीय में हो,तो पुत्रसुख का फल मिलेगा। यवनमत में २२ वें वर्ष धनहानि का, फलकहा गया है और हिल्लाजातक में इसी वर्ष पुत्रलाभ कहा गया है। इनदोनों का अनुभव आता है। बुध चतुर्थ स्थान मेंनर्वल होता है, ऐसा एकशास्त्रकार ने कहां है। कुण्डली में यदि वृषषभ,कन्या या मकर लग्न हो, तोही यह मत ठीक होगा। अज्ञात ने कहे हुए फल बिलकुल गलत प्रतीत होतेंहै। १६ वे वर्ष दूसरों के धन का अपहार करके धनलाभ होने की संभावनाबहुत ही कम है। संक्षेप में देखा जाये तो शास्त्रकारों ने जो शुभ फल कहें है,वे पुरूष राशियों के है तथा अशुभ फल स्त्री राशियो के हैं।
बुध चतुर्थ भाव में बुध की स्थिति जातक को चुस्त, चतुर, निर्लज्ज, कृशकाय व पतली जंघाओं वाला, बचपन में रोगी बनाता है। यदि बुध
पापग्रस्त है तो अपने ही भाईयों का नाशक होता है।
-मानसागरी
जातक विद्वान, विनोदी स्वभाव वाला, बहुत मित्रों वाला, सम्पन्न और खुशहाल होगा।
-फलदीपिका
जातक फुर्ती से काम करने वाला, रोगी, विशाल नेत्रों वाला, माता पिता के सुख से संपन्न, विद्वान् व प्रसन्न होगा। आयु के 13 वें वर्ष में वह संदिग्ध माध्यमों से धनार्जन करने वाला तथा अनेकानेक वाहनों का स्वामी होगा।
- भृगु
व्यक्ति धन व संबंधियों से युक्त, भाग्यशाली, वाहनों का स्वामी, सुख-सुविधासंपन्न, और विद्वान होगा।
- सारावली
जातक विद्वान, कृषक, माता से सुखी, कुशल चालबाज, विपन्न, एहसान करने वाला, सभ्य, सुहृदय, लोकप्रिय, शास्त्रीय गतिविधियों व क्रियाकलापों में संलग्न होगा।
-डॉ रामन
यदि चतुर्थस्थ बुध पापाक्रान्त नही है तो जातक अपार धन संपदा और अनेक मित्रों वाला होता है।
-गर्गाचार्य के अनुसार
जातक के अल्प-संतति होगी।
-बादरायण के अनुसार
बुध 22 वें वर्ष की अवस्था में धन-सम्पत्ति का नाश करता है।
-मीनराज के अनुसार
जातक 26 वें वर्ष में दूसरों की सम्पत्ति हथिया कर अर्थलाभ प्राप्त करता है।
_ भृगु के अनुसार
टिप्पणी
चतुर्थस्थ बुध पैतृक सम्पत्ति का लाभ नहीं देता, बहुत इष्ट मित्र देता है, सरकार से सम्मानित पद, बहुत नौकर-चाकरों वाला, उसकी बातों का बहुत सम्मान होगा और जातक को गुणवान् लेखक व संगीतिज्ञ के रूप में मान दिलवाता है। वह एक विद्वान् होगा परन्तु एक संतान नाश से दुखी, शत्रु तथा रोग नहीं होगें। वह वकील, न्यायाधीश या अच्छा सलाहकार हो सकता है।
मेरा अनुभव- इस स्थान में बुध पुरूषराशि में हो तो कुछ विद्याभ्यासहोता है। किन्तु उसमें रूकावटे आती रहती है। यह मेष, सिंह या धनु मेंहो तो क्रोधी, एकान्तप्रिय और लोगों का अनिष्ट चाहनेवाला ऐसा स्वभावहोता है। मां से अच्छे संबंध नहीं होते। बेकार का अभिमान बहुत होताहै। दूसरों को कभी सहायता नहीं करता और कंजूस होता है। मिथुन,तुला या कुंभ में यह बुध हो तो पिता से संबंध अच्छे नहीं होते। अपनेज्ञान का बहुत अभिमान होता है। दूसरों को मूर्ख समझने की प्रवृत्ति होतीहै। पैसा मूर्खता में खर्च करता है। शिक्षा अधूरी रहती है। स्त्रीराशि में यहबुध हो, तो व्यापार में कुछ धन मिलता है। साथी व्यापारियों से झगड़ेकरता है। थोडी सी इस्टेट और घरबार प्राप्त होते है।
चतुर्थ स्थान में बुध के शुभ फल प्राप्त होते हैं। ऐसा जातक, विद्वान,भाग्यवान, मित्रों एवं पारिवारिक सुख से परिपूर्ण होता है। उसे जायदाद एवंवाहन का सुख प्राप्त होता है। जातक लेखन, व्यवसाय के माध्यम सेजीवनयापन करता है, मुनीम, क्लर्क, लेखक, संपादक आदि की कुंडलियों मेंबुध चतुर्थ स्थान में रहता है। जिनके मार्गदर्शन में अनेक लोग लेखन का कार्यकरते हैं। वह संस्था का प्रमुख बनता है। महर्षि गर्ग के मतानुसार चतुर्थस्थबुध पापग्रहों से युक्त न रहने पर अति उत्तम फलदायी होता है। पाषग्रह सेयुक्त होने पर उसका शुभ फल नहीं मिलता।
जातक को पैतृक संपत्ति में हिस्सा कम मिलता है। संतान की संख्या कमरहती है। नौकर-चाकरों का सुख मिलता है। जातक सत्यवादी, मधुरभाषी,गणितज्ञ, ललित कलाओं में रुचि रखनेवाला एवं बचपन में रोगी रहता है।चतुर्थ स्थान में बुधर पापग्रह से युक्त हो तो सहोदरों के लिए अनिष्टकारीरहता है। बुध उच्च का या बलवान होने पर एक से अधिक स्त्रियों का सुखउसे मिलता है।
जातक की आंखें बड़ी होती हैं। 16वें वर्ष में भेंट स्वरूप लाभ प्राप्त होताहै। कुंडली के चतुर्थेश के साथ बुध चतुर्थ स्थान में हो या बुध के साथ गुरु,शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो उत्तम वाहन सुख प्राप्त होता है। चतुर्थ स्थान मेंबुध, राहु या केतु अथवा शनि के साथ हो तो सहोदरों के साथ मतभिन्नतारहती है एवं जायदाद का सुख नहीं मिलता।
पाश्चात्य विद्वानों की राय में ऐसे जातक की स्मरणशक्ति अच्छी रहती है।दिव्यज्ञान प्राप्ति की संभावना रहती है। बुध यदि स्वक्षेत्री हो तो जीवन सुखमयरहता है। शनि के योग में बुध हो या शनि की दृष्टि में बुध हो तो धोखाधड़ीसे नुकसान होता है।
यवन ज्योतिषविदों की राय में जातक सुखी, सौम्यस्वभावी, मित्रों कीबहुतायतवाला, व्यवहारकुशल, तंत्र-मंत्र जाननेवाला, संगीतप्रेमी, मधुरभाषी, बातका पक्का होता है। 42वें वर्ष में आर्थिक नुकसान होता है लेकिन पुत्रलाभ होता है।
चतुर्थ भाव-चौथे भाव का बुध जातक को विद्वान, भाग्यवादी, वाहनसुखी,दानी, नीतिज्ञ, उदार व लेखक बनाता है। जातक संगीतप्रेमी किन्तु स्थूल शरीर वआलसी होता है। उसका मित्र वर्ग उत्तम होता है तथा वह सब प्रकार के सुख प्रासकरता है। जातक उच्च पद प्रास्त करता है।
लाल किताब के अनुसार चौथे भाव में बुध 'राजयोग' बनाता है। जातकस्वयं के लिए शुभ किन्तु माता के लिए अशुभ होता है। यदि बुध इस भाव मेंअकेला हो तो हर प्रकार से जातक व औरों के लिए शुभ होता है। सरकार द्वारालाभ भी सम्भव हो जाता है। उच्च/स्वराशि का बुध जातक को अन्तर्जञनी, विद्वान,धनी, तीव्र स्मरण शक्ति वाला एवं वाहनसुखी बनाता है। पुरुष राशि का बुध उच्चशिक्षा, राजनीतिज्ञता, लेखन, भाषणकला में निपुणता प्रदान करता है। किन्तु अग्निराशिका बुध जातक को दुष्ट, महाक्रोधी, अभिमानी, कंजूस तथा अहसानफरामोशबनाता है। यदि चौथे बुध के साथ सूर्य पांचवें हो तो धनहानि होती है। परन्तु सूर्यतीसरे हो तो प्रत्रलाभ होता है।
बुध चौथे घर में
बुध को चौथे घर में ‘राजयोग’ या ‘हुनरमंद’ माना गया है। चौथेघर में बुध होने के समय यदि खाना न. 3, 5 या 11 में, किसी में भीसूर्य-चन्द्र हो और बृहस्पति खाना न. 9 में हो तो परिवार, दौलत औरव्यक्ति की उम्र, तीनों पर ही शुभ असर रहेगा। चौथे घर के बुध के समययदि बृहस्पति उत्तम हो तो ये राजयोग होता है। इसका तर्क यह है किचौथे घर में कर्क राशि आती है जिसमें बृहस्पति उच्च का है, इसीलिएबृहस्पति शुभ होगा तो राजयोग बन जाता है। ऐसी हालत में सरकारी
कामों से या सरकार से लाभ होता है।
बुध 4 के समय यदि चन्द्र छः में हो या बुध अशुभ हो तो व्यक्ति में आत्महत्या तक करने की इच्छा उत्पन्न होती है। यानी वह व्यक्ति के हौसले को बहुत कम कर देता है।
चतुर्थ भाव: पूर्व मनीषियों ने चतुर्थ भावस्थ बुध के जातक का ज्ञानी और विद्वान होना माना है। कुछ शास्त्रकारों ने पुत्र सुख और पुत्र दुख मिलना माना है। लेकिन ये सभी मत परस्पर विरोधाभास लिए हैं। चतुर्थ स्थान न तो ज्ञान-विद्या का स्थान है और न ही इस भाव से सनन््तति सुख देखा जाता है। अग्नि तत्त्वीय राशि का बुध चतुर्थ भाव में हो तो जातक क्रोधी, एकान्तवासी तथा दूसरों का बुरा चाहने वाला होता है। उसका अपनी माता से वैमनस्य बना रहता है। अहंकारी, दूसरे का उपकार न मानने वाला और कंजूस होता है। वायु राशि का बुध हो तो पिता से वैर रखने वाला, व्यर्थ ही अभिमान करने वाला, अनाप-शनाप खर्च करने वाला होता हे। पुरुष राशि का बुध विद्याभ्यास में अवश्य सहायक होता है लेकिन अत्यधिक विघ्न-बाधाओं के पश्चात। स्त्री राशि का बुध व्यापार में अल्प धन की प्राप्ति कराता है तथा ऐसा जातक सहयोगियों से लड़ता-झगड़॒ता रहता है। राहु-केतु या शनि से युक्त बुध चतुर्थस्थ हो तो भूमि का सुख नहीं मिलता, वाहन से टकराने का भय बना रहता है। यदि बुध बृहस्पति-शुक्र के साथ हो तो उच्च वाहन-मकान की प्राप्ति होती है।
राशिगत फल
1.मेषमेष राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक भाग्यवान, सरकारीकर्मचारी, यशस्वी, धैर्यवान, धार्मिक, विद्वान, प्रखरवक्ता एवं सुखी होता है।सहोदरों से मधुर संबंध नहीं रहते। पिता से मतभिन्नता रहती है। महर्षि गर्गके अनुसार जातक का वर्णसंकर होना भी संभव रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक शारीरिक दष्टि से मध्यम स्वस्थ रहता है। पैतृक संपत्ति जातक को नहीं मिलती या मिल जाएतो वह उसका दुरुपयोग करता है।
3. मिथुनमिथुन राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक शासक यानेता, चतुर, विद्वान, सरकारी कर्मचारी, संपन्न, सुखी एवं स्त्रियों का प्रिय,वातरोगी रहता है। पत्नी सुंदर एवं आज्ञाकारिणी मिलती है। पिता से मतभिन्नतारहती है।
4. कर्क-कर्क राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक धनवान, विद्वानएवं सहोदरों के सुख से युक्त रहता है। पत्नी गर्ममिजाज रहती है। शारीरिकस्वस्थता मध्यम रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक गुणवान, सरकारीकर्मचारी, संपन्न, दीर्घायु, परिश्रमी एवं धार्मिक होता है। महर्षि लोमश केमतानुसार ऐसा जातक बहिर्मुखी एवं लंपट होता है। जातक माता-पिता काआज्ञाकारी रहता है। माता का सुख उसे दीर्घकाल तक मिलता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सरकारी कर्मचारी,उच्चाधिकारी या नेता, चतुर, साम्यवादी, संपन्न, सुखी, दीर्घायु एवं कर्तव्यपरायणरहता है। उसे माता-पिता, सहोदरों एवं आप्तजनों का सुख अच्छा प्राप्त होता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातकविद्वानू, कंजूस,सहोदरों का सुख पानेवाला, स्वास्थ्य की दृष्टि से मध्यम होता है। उसकी पत्नीगर्ममिजाज होती है, दो विवाह होते हैं। जातक को संतान के कारण या संतानद्वारा मृत्यु असती है, ऐसा यवनाचार्य एवं महर्षि गर्ग का मानना है। पिता केसुख में न्यूनता रहती है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक परिश्रमी,दीर्घायु, पिता के सुख से युक्त एवं सत्कर्मी रहता है। उसके पुत्र आज्ञाकारीहोते हैं। जातक बहिर्मुखी हो सकता है। साझेदारी के व्यवसाय में लाभ होता है।9. धनु-धनु राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सुंदर, गुणवान,सरकारी कर्मचारी, संपन्न, दीर्घायु एवं माता-पिता तथा सहोदरों के सुख सेयुक्त रहता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, अधिकारसंपन्न, धार्मिक, धैर्यवान, सौम्य स्वभावी, विद्वान, संपन्नकिंतु कंजूस होता है। पिता के सुख में न्यूनता रहती है। संतान से कष्ट प्राप्तहोते हैं। मृत्यु भी संतान के हाथों ही होती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,दानी-धर्मी, पैतृक संपत्ति का दुरुपयोग करनेवाला, चुगलखोर, मध्यम स्वास्थ्यरखनेवाला तथा माता-पिता के सुख में न्यूनता पानेवाला रहता है।
12. मीन-मीन राशि का बुध चतुर्थ स्थान में हो तो जातक धार्मिक,सरकारी कर्मचारी, सच्चरित्र एवं वातरोगी होता है। जातक की पतंनी आज्ञाकारीएवं सच्चरित्र होती है।
1. चने की दाल दान करें।
2. चांदी के गहने दान करें।
3. पेड़ लगावें।
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5) पंचम् भाव - पंचम स्थान (सुत भाव)
पंचम स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-मन्त्री। सलाह देता है।
कल्याणवर्मा-मन्त्राभिचारकुशलो बहुतनयः पंचमे सौम्ये। विद्या-सुखपभावैः समन्वितो हर्षसंयुक्तः॥ मन्त्रविद्या और जारणमारण में कुशलहोता है। बहुत पुत्र होते है। विद्यावान, सुखी और प्रभावशाली तथाआनन्द्युक्त होता है। चंद्रसुते संजाते रविगेहे दारिका बहुलः स्यात्। यहबुध सिंह राशि में हो तो कन्याएँ बहुत होती हैं।
गर्ग-पंचमस्थश्चद्रपुत्र: संतन प्रकरोत हि। अस्तंगतःशत्रुदष्टश्चो-त्पन्नस्य विनाशकः मातुला नश्यंति॥ सौम्ये चाल्युसुतत्वं ॥ पंचम केबुध केफलस्वरूप सन्तान प्राप्त होती है। किन्तु यह बुध अस्तंगत हो याउसपर शत्रुग्रह की दृष्टी हो तो सन्तान की मृत्यु होती है। मामा का नाशहोता है। पुत्र कम होते हैं।
वैद्यनाथ-मन्त्रामिचारकुशलः सुतदारवत्तसुतदारवित्त विद्यायशेबल-युतः सुतगे सति जो ॥ जारणमारणादि मंत्रो में कुशल तथा पुत्र,सत्री, धन,ज्ञान, किर्ति और बल से सम्पन्न होता है।
बृहद्यवनजातक-चतुर्थस्थान के समानही फल कहा गया है। शराद्वे
मातुःक्षयं। ५ वें वर्ष माता की मृत्यु होती है।
काशीनाथ-पंचमे रोहिणीपुत्र पुत्रपौत्रसमन्चितः सुबुध्दि सत्वसंपन्नः
सुखी भवति मानवः । ुत्रपौतरौं से युक्त, अच्छी बुध्धि का, बलवान और
सुखी होता है।
वसिष्ठ-बुधश्च स्वल्पात्मजं रूजं । सन्तान कम होती है ओर रोग होते है।जयदेव-मित्रुत्रसुखयुक शुभशीलौ मंत्रशास्त्रविदसौ सुतगे के |।मित्र,
पुत्र तथा सुख से युक्त, शीलवान और मंत्रशास्त्र जाननेवाला होता है।
नारायणभट्ट-वयस्यदिमे पुत्रर्भो न तिष्ेत् भवेत् तस्य मेधार्थसंपा-दयित्री। बुधैर्भण्यते पंचमे रौहिणेये कियद विदेते कैतलस्याभिचारम्।करता है। जारणमारण में प्रवीण होता है।
पूर्व आयु में पुत्र नहीं होता, कन्याएँ होती है। अपनी बुध्धि से धन प्राप्त
जीवनाथ तथा जागेश्वर-नारायणभट्ट के समान मत है।आर्यग्रन्थकार-तनयमन्दिरगे शशिनन्दने सुतकलत्रयुक्तः
सुखभाजनं। विकचंपकचचारुमुखः सुखी सुरमुरूद्विजभक्तियुक्तः शुचिः॥स्त्री पुत्रों से युक्त, सुखी, पवित्र तथा देव गुरू और ब्रांम्हरणों का भक्तहोता है। खिले हुए कमल के समान इसका मुख सुंदर होता है।मंत्रेश्वर-वैद्यनाथ के समान ही मत होता है।
पुंजराज-झे समा। कन्यापत्यः। बुध्दि साधारण होती है। कन्याएँ होती है।सूर्यजातक- शुभमतिः। बुध्धि शुभ होती है।
घोलप-सर्कत्र पूज्य होता है। पवित्र, सुंदर और कान्तिमान होता है। यह बुधमकर या कुंभ राशि मं हो तो उसपर पापग्रह की दृष्टिन हो तो कन्याएँ होती है।
गोपालरत्नाकर-मामा की मृत्यु होती है। पिता को तकलीफ होती है। माँ को सुख मिलता है। शारीरिक कष्ट होते हैं। राजदरबार में सन्मानमिलता है। तरहतरह की पोशाख करने की रूचि होती है। विद्यावान,दांभिक और कलहप्रिय होता है।
हिलाजातक-षड्र्विशे मातृहा पंचमो बुधः। २६ वें वर्ष माता कीमृत्यु होती है।
जातकरत्न-विधौ विवाहतो नष्टः । पुत्र का ब्याह होते ही उसकीमृत्यु होती है।
अज्ञात-सौम्ये स्वक्षेत्रगते पंचममेपुत्र भाग्भवति। सिंहस्थिते पि चैवंनवमे वा तृतीयभार्यायाम । हिमसुतो गर्भहार्नि करोंति पुत्रविध्न भावाधियेपापयुते बलहीने पुत्रनाशः। अपुत्रः दत्तपुत्रप्राप्िः। पापकर्मी । यह बुधस्वगृह में हो, तो पुत्रसन्तति होती है। सिंह राशि में, तृतीयस्थान मेंअथवा ससतम स्थान में हो, तो भी पुत्र होते है। पंचमेश निर्वल हो अथवापापग्रह के साथ हो, तो पुत्रो का नाश होता है, गर्भ की हानी होती है। पुत्रन होने से दत्तक पुत्र लेना पडता है। यह पापकृत्य करता है।
यवनमत-सन्तति और धन की प्राप्ती होती है। धैर्यशिल, सन्तोषी,कार्य में कुशल और यशस्वी होता है।
पाश्चात्यमत- सन्तति, विद्या और वैभव की प्राप्त होती है।सट्टा, जुआ, साहस और चैन की ओर प्रवृत्ति होती है। यह बुध बंध्या राशिमें हो तो वंशक्षय होता है। कर्क, वृश्चिक या मीन राशि में हो तो बचेपागल होते हैं। इस बुध के साथ शनि-मंगल के योग हो तो, यह दोष दूररहता है। गुरू और शनि की शुभ दृष्टि इस बुध पर हो, तो सट्टा और लॉटरीमें लाभ होता है। इस पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो लाभदायक फल मिलते है।किन्तु यह एक व्यभिचार योग होता है।
मेरे विचार-कल्याणवर्मा आदि ने यहाँ मंत्र और जारणमारण में कुशलता का फल कहा है। किन्तु यह विषय वस्तुतः शुक्र के अधिकार में है। बुध के प्रभाव से दूसरो के मन्त्रो का प्रभाव दूर करने का सामर्थ्य मिल सकता है। प्रायः सभी शास्त्रकारो ने यहाँ सन्तति होने का फल कहा है। अतः बुध को नपुंसक ग्रह कहना ठीक नही, यह स्पष्ट होगा। कुछ शास्त्रकारों ने मामा की मृत्यु का फल कहा, यह कुछ अजीब ही प्रतीत होता है मामा का विचार षष्ठ स्थान से करतें है। वहाँ से यह बारहवाँ स्थान है। किन्तु बुध जैसे निरूपद्रवी ग्रह से मृत्यु का फल बतलाना ठीक नहीं होगा। माता की मृत्यु के विषय में यवनमत मे ५ वाँ वर्ष और हिल्लाजातक में २६ वा वर्ष दिया है। इसकी सच्चाई अनुभव से ही देखी जा सकती है। वास्तव में पंचम स्थान से माता की मृत्यु का विचार करना योग्य नहीं। रवि चतुर्थ में होते हुए बुध पंचंम में हो, तो माँ की मृत्यु का फल मिलता है। शास्त्रकारों ने इस स्थान में जो शुभ फल कहे वे पुरूष राशियों में मिलते है और अशुभ फल स्त्री राशियों मे मिलते है पुत्र कम होना, पुत्र न होना कन्याएँ होना ये फल मिथुन और तुला राशियों में मिलते है।
पंचम भाव में बुध
जातक पत्नी-पुत्रादि से युक्त, सुविधासंपन्न और प्रसन्न जीवन यापन करने वाला तथा सुदर्शन व्यक्तित्व का स्वामी, सदैव प्रेमानन्द प्रवृति में रहने वाला, भगवान् व ब्राह्मणों का आदर करने वाला तथा पवित्र व धार्मिक हृदय वाला होगा।
-मानसागरी
व्यक्ति विद्वान्, प्रसन्नचित्त, उत्साही, पुत्रादि से युक्त तथा मंत्र-शास्त्र का ज्ञाता होगा।
-फलदीपिका
जातक मंत्र शास्त्र मे दक्ष, और बहुत पुत्रों वाला, विद्वान्, प्रसन्न और सर्वसम्पन्न होगा।
-सारावली
जातक का मामा गले-संबंधी रोग से ग्रस्त, वह स्वयं मातृ-सुख से संपन्न, संतान प्राप्ति में कष्ट, अत्यन्त बुद्धिमान, मृदुभाषी तथा चतुर होगा। यदि पंचमेश निर्बल और पापयुत हो तो उसे संतिति-नाश का दुख होगा । वह पुत्र गोद लेगा।
- भृगु
जातक दिखावा करने वाला, विद्वान्, झगडालू, मामाओ को खतरा, माता-पिता रोगग्रस्त, अच्छी प्रशासनिक क्षमताओं वाला, अच्छे फर्नीचर और कपड़ों का शौकीन, धनी व्यक्तियों से आदर सम्मान प्राप्त, पिता को खतरा, विद्वान, निष्फल, निरर्थक, योद्धा, कल्पनाशील और कार्यवाहक क्षमताओं का धनी होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
भचक्र की पाँचवी राशि का स्वामी सूर्य है। सूर्य व बुध परस्पर मित्र है। अतः बुध मित्रक्षेत्री होकर मुदित होता है। इन दोनों की युति बुधादित्य योग बनता है। जिस के कारण जातक सभी उपरोक्त गुण प्राप्त करता है।
पंचम भाव को पुत्र या संतान का प्रतिनिधि भाव कहते हैं। इस संबंध में विभिन्न आचार्यों का मंत इस प्रकार है-
कल्याण वर्मा (सारावली)-अनेक पुत्रों वाला।
जातक सागर- कोई भी संतान जीवित न रहे।
नारायण भट्ट-आरंभिक जीवन में संतान प्राप्ति न हो।
गर्गाचार्य -संतानलाभ हो, परन्तु बुध यदिपापाक्रान्त या अस्त हो तो संतान की मृत्यु होगी तथा बच्चों की संख्या सीमित रहेगी।
वशिष्ठ -अल्प संतित।
जातक रत्न-विवाह के तुरन्त बाद पुत्र की मृत्युl(पहली संतान)
जीवनाथ -प्रथम संतान की हानि की संभावना।
निष्कर्ष-पंचमस्थ बुध का संतान पर अनिष्ट प्रभाव ही होता है जब तक कि गुरु तथा पंचमेश या नवमेश से बल प्राप्त न हो।
जातक धनी विद्वान मन्त्र तथा शास्त्रों का
ज्ञाता, 5 वर्ष की अवस्था में माता को भयहो l
मेरा अनुभव- इस स्थान में पुरूष राशि में बुध हो तो वाणी अच्छी होती है। बुध्दि अति तीव्र होती है। शिक्षा जल्दी पूरी होती है, आयु के २० से २३ वे वर्ष तक पूरी होती है। यह लेखक, कवि, नाटककार, उपन्यासकार होता है। वैज्ञानिक विषयों पर ग्रन्थ लिखता है। यह मिथुन, तुला या कुंभ राशि में हो, तो सन्तती नहीं होती अथवा एक दो ही बच्चे होते है। लेखक हो तो ग्रन्थो को ही सन्तान मानना पड़ता है। लोग समुदाय में यह प्रभावशाली होता है। नम्र मायावी और एकान्तप्रिय होता
है। मेष, सिंह या धनु में यह बुध हो, तो कुछ क्रोधी किन्तु सूक्ष्म बुध्दि फा होता है। न्याय की ओर से इसकी दृष्टि सदैव होती है। यह उदार और लोगो से मिलजुलकर रहनेबाला होता है। यह बुध वृषभ कन्या या मकर में हो तो बुद्धि टेढी होती है। शिक्षा अधूरी होती है। स्वभाव झगड़ातू होता है। सिर्फ कल्पनाओं पर ही वादविवाद करता है| लोंगो को कुत्सित शब्दों से ताने देता है। सन्तति कम होती है और अच्छी नही होती। यह बड़े बड़े कार्यो में सलाह देता है और उसका प्रभाव भी पडता है| यह व्यवहारकुशल (practicle) होता है। किसी भी काम में दूसरो को आगे कर के स्वयं पीछे रहता है। यह बुध कर्क, वृश्चिक या मीन में हो तो सनतान बहुत होती है। पहले तीन या पाँच लडकियाँ होकर फिर लडका होता है। यह विश्वासपात्र नहीं होता। लोगो की बुराइयो की ओर बारीकी से ध्यान देता है। यह बुध मेष सिंह या धनु में हो तो गणित, सालिसिटर का काम, तत्वज्ञान ज्योतिष्य, नृत्य फ्रेनॉलाजी इन विषयों का अभ्यास होता है | वृषभ कन्या या मकर में हो, तो पदार्थविज्ञान एविडेन्सऐक्ट, हस्तरेखा शास्त्र इनका अभ्यास होता है। मिथुन, तुला या कुंभ में हो तो वायुमापनशास्त्र, रोगचिकित्सा, मातृभाषा की पढ़ाई वैद्यक तत्वज्ञान स्टैंप ऐक्ट, व्याकरण मौखिक परीक्षा आदि मे प्रवीणता मिलती है। कर्क, वृश्चिक या मीन में हो तो टायपिंग अंगूठो के निशानों का अभ्यास, मैक्रालॉजी, शब्दशास्त्र इन विषयों मे कुशलता प्राप्त होती है। अभ्यास अच्छा होने के लिए पंचम मे बुध की स्थिति अच्छी होनी चाहिए।
पंचम स्थान में बुध हो तो जातक अच्छा सलाहकार या मंत्री बनता है।तंत्र-मंत्र, चमत्कार संबंधी ज्ञान उसके पास होता है तथा विद्वान एवं सुखी होताहै। कन्या संतान अधिक रहती है। जातक की जन्मकुंडली में सिंह राशि काबुध पँचम स्थान में हो तो कन्या संतान कम होती है और वह रोगग्रस्त रहतीहै। आचारयों के अनुसार पंचमस्थ बुध कम संतान देता है किंतु बुध अस्त, नीच,शुभग्रह से दृष्ट एवं निर्बल हो तो संतान कम होती है या होकर मर जातीहै। अधिकांश ज्योतिषाचार्यों द्वारा इस विषय के मतों के तुलनात्मक अध्ययनके बाद स्पष्ट होता है कि ऐसे जातकों के संतान कम होती है, पुत्र जन्म विलंबसे होता है। संतान के विवाह के बाद उसकी मृत्यु का भय रहता है।जातक को मित्रों से सुख अच्छा प्राप्त होता है। मामा के सुख में न्यूनतारहती है। जातक धन कमाने में दक्ष होता है। वह अनेक युक्तियों एवं प्रयुक्तियोंका जानकार होता है। सरकारी कर्मचारी, दंभी एवं वस्त्राभूषणों का शौकीनभी होता है।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार 5वें एवं 16वें वर्ष में माता को कष्ट, 22वेंवर्ष में आर्थिक परेशानी उत्पन्न होती है। जातक चरित्रवान, सदाचारी, धैर्यवान,संतोषी, चतुर एवं यशस्वी होता है।
पाश्चात्य विद्वानों की राय में जातक विद्यावान, संतानवान, धनवान एवं गुप्तविद्या का जानकार रहता है। उसे संतान सुख में बाधा रहती है। कर्क, वृश्चिकया मीन राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो संतान विक्षिप्त होती है। पंचमस्थबुध चंद्र की दृष्टि से युक्त हो तो जातक धनवान किंतु चरित्र भ्रष्ट होता है।
पंचर्म भाव-बुध पंचमस्थ हो तो जातक सुखी, परिश्रमी, सम्मानित, विद्वान,कवि तथा वाद्ययंत्र प्रमी हो जाता है। ऐसा जातक सदा प्रसन्न रहता है। उसकीआवाज मासूम बालक के समान होती है। लाल किताब के मत से ऐसे जातक केमुंह से निकले शब्द ब्रह्मवाक्य तथा शुभ होते हैं। यदि पंचमस्थ बुध अशुभ हो तोजातक के पिता पर बुरा असर डाल सकता है, किन्तु जातक की सन्तान पर नहीं।
लाल किताब के अनुसार पांचवां बुध यदि शुभ हो तो जातक को सौभाग्य,सुन्दर व गुणवती पत्नी, आनन्दमय जीवन, प्रसन्नचित्तता, विनोदी स्वभाव तथासन्तान का पूर्ण सुख प्रदान करता है किन्तु कन्याएं अधिक देता है। ऐसा जातक गुरुऔर बुजुर्गों का आदर करने वाला होता है। जलतत्त्व राशि में पंचमस्थ बुधपागल/मंदबुद्धि संतान देता है। पृथ्वी त्त्व राशि का बुध पदार्थ विज्ञान या हस्तरेखाविशेषज्ञ बनाता है। यदि शनि से बुध का शुभ योग हो तो सट्टे, लॉटरी आदि मेंजातक को लाभ होता है। चन्द्रमा के साथ बुध का शुभ योग हो तो जातक धनाद्यबनता है, किन्तु वह व्यभिचारी भी हो जाता है।
षष्ठ भाव-छठे भाव में बुध हो तो जातक झगड़ालू, आलसी, रोगी, अभिमानी,निर्बल/स्त्रैण स्वभाव की, कब्ज पीड़ित तथा अल्प पौरुष वाला होता है तथापिजातक के अवैध सम्बन्धसम्भावित होते हैं।शास्त्रकारों के अनुसार
वरोधोजनानां निरोधोरिपूर्ण प्रबोधी यतीनांचा रोधऽनिलानाम्।बुधे सगयेव्यावहारो निधोनां बलादर्प कृत्सभवेच्छत्रु भावेअर्थात् छठा बुध जातक को कलहप्रिय/कलहकारी, अधिक शत्रुओं वाला,संन्यासियों से ज्ञान प्राप्त करने वाला, धन को शुभ कामों में लगाने वाला तथा अपने बूते पर धन संग्रह करने वाला बनाता है। ऐसे जातक का व्यापार अच्छा होता है।लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक मनमौजी, अपनों से विरोध करनेवाला, कब्ज, संग्रहणी, बवासीर, वातशूल आदि का रोगी, दुर्बल छाती वाला तथाश्वास या क्षय का रोगी होता है। ऐसा जातक लेखक/प्रकाशक या रसायन शास्त्रका ज्ञाता होता है किन्तु स्वतंत्र व्यापार करे तो उसे हानि होती है। माता से उसे लाभमिले न मिले किन्तु चन्द्रमा की कारक वस्तुओं से उसे लाभ मिलता है। ऐसे जातकको बुद्धि के अधिकतम प्रयोग वाला कारोबार करना चाहिए। दस्तकारी/हाथ काकाम उसे अधिक लाभ नहीं देता। मंगल से षषस्थ बुध का अशुभ योग जातक को
पागलपन देता है। यदि लग्नेश होकर बुध षष्ठस्थ हो तो जातक अपना शत्रु स्वयंहोता है। उसके अपने ही फैसले उसे नुकसान पहुंचाने वाले सिद्ध होते हैं।
बुध पाँचवें घर में
बुध को पाँचवें घर में ‘फकीर की आवाज’ या ‘आशीर्वाद’ कहकर
पुकारा गया है। लाल किताब में बुध के पाँचवें घर के बारे में लिखा है।
कि वह खुशहाल होगा, उसके मुँह से निकला हुआ शब्द ब्र्मवाक्य और
उत्तम फल का होगा।
यदि बुध 5 के समय, नौवाँ घर खाली हो यानी न. 5 का सोया हुआ
बुध हो तो इंसान का चरित्र अच्छा और अच्छे गुणों का मालिक होगा।
उसकी जद्दी जायदाद, गृहस्थी व औलाद पर भी शुभ असर पड़ता है।यदि बुध न. 5 के समय सूर्य, बृहस्पति या चन्द्र न. 3 या 9 हो तो व्यक्तिकी 34 साल उम्न के बाद उसका भाग्य अपनी पूरी बुलन्दी पर आजाएगा।
पाँचवें घर में बैठा बुध यानी बृहस्पति के घर में बैठा हुआ बुध,बृहस्पति का ज्ञान और सूर्य की चमक प्राप्त करेगा। ऐसी हालत में सूर्यको यानी उसके लड़के को बुध यानी तगड़ी पहनना शुभ रहेगा।
पाँचवें घर में बैठा हुआ मन्दा बुध पिता के लिए बुरा असर देगा,मगर औलाद पर इसका बुरा प्रभाव नहीं होगा। यहाँ पर बुध के बुरे असरको दूर करने के लिए यदि व्यक्ति गले में ताँबे का पैसा पहने तो बुध काजहर दूर होगा और उसके धन में बरकत होगी। जब चन्द्र या बृहस्पतिनीच या अशुभ हो रहे हों, विशेषकर जब बुध टेवे में चन्द्र से पहले घरोंमें हों तो ऐसे व्यक्ति की खुद की जुबान उसकी बर्बादी का कारण हो।सकती है।
पंचम भाव: पंचम भाव में बुध हो तो संतति-विद्या और वैभव की प्राप्ति होती है। जुआ-सट्टा-रेस आदि की ओर रुझान होता हे। बुध पुरुष राशि का पंचमस्थ हो तो जातक उत्तम वाणी बोलने वाला, तीद्ष्ण बुद्धि का होता हे। ऐसा बुध शिक्षा को शीघ्र समाप्त करने वाला होता है। प्राय: 21-22 वर्ष तक पूर्ण शिक्षा प्राप्त हो जाती है। अग्नि राशि का बुध जातक को क्रोधी, न्यायप्रिय, सूक्ष्ममति, उदार तथा मिलनसार बनाता है। ऐसा जातक ज्योतिष, गणित एवं तत्त्वज्ञान का जानकार होता है। पृथ्वी राशि में हो तो जातक झगड़ालू, अर्धशिक्षित, अनुदार होता है। सन््तति कम और उसके लिए अनुपयोगी रहती है। ऐसा जातक व्यवहारकुशल होता है, किसी भी कार्य में दूसरे को आगे कर स्वयं पीछे रहता है। ऐसा जातक पदार्थ विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान आदि में पारंगत किंतु स्वार्थी होता है। वायु तत्त्वीय राशि में हो तो जातक वैद्यक, चिकित्सक, व्याकरणशास्त्र का ज्ञाता होता है। ऐसा जातक या तो सन््तानहीन होता है अथवा एकाध सन््तान कृशकाय और विकारी उत्पन्न होती है। ऐसा व्यक्ति चूंकि लेखन कला में दक्ष होता है और लेखक की कृतियां ही उसकी सनन््तान शमझें तो उसे निस्संतान कहना न्यायसंगत नहीं। जल राशि का बुध हो तो जातक शब्दशास्त्र, टंकण (टाइपिंग), फिगर प्रिन्ट का जानकार होता है। बहुसन्तान का पिता लेकिन पुत्रियां अधिक और पुत्र कम तथा नालायक होते हैं।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक गुणवान,चरित्रसंपन्न, सरकारी कर्मचारी, संपन्न एवं सुखी रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक जनप्रिय,विद्वान, भाग्यवान एवं सुखी रहता है। जातक को स्वार्थी मित्रों के कारण मित्रसुख से वंचित रहना पड़ता है, आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहती है एवं पिता-पुत्रमें मतभिन्नता रहती है।
3. मिथुन मिथुन राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातकव्यवहारकुशल, कुशल वक्ता, चंचल स्वभावी, यशस्वी एवं प्रतिष्ठित होता है। उसकी आर्थिक स्थिति अस्थिर रहती है। संतान अल्पायु होने पर भी संतानका सुख प्राप्त होता है।
4. कर्क-कर्क राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्न,गुणवान, पुरुषार्थी, विद्वान, सरकारी कर्मचारी एवं लेखक होता है। बुध पापग्रहसे युक्त हो तो पुत्र हानि होती है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक विद्वान, चतुर,परोपकारी, दीर्घायु, क्षमाशील किंतु नास्तिक होता है। पिता से उसके मतभेदरहते हैं। कन्या संतान अधिक होती है, आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहती है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक परिश्रमी,व्यवहारकुशल, आस्तिक, कुशल वक्ता एवं अस्थिर विचारों का होता है।जातक का चरित्र अच्छा नहीं रहता, आंखें मादक होती हैं। महर्षि लोमश केमतानुसार संतान सुख में बाधा आती है। संतान का अल्पायु होना संभव रहता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक परिश्रमी, विद्वान,आस्तिक, सरकारी कर्मचारी, संगीतज्ञ या संगीतप्रेमी, चरित्रवान, उदार एवंयशस्वी रहता है। यवनाचार्य की राय से जातक लेखक बनता है। प्रथम संतानअल्पायु होने की संभावना रहती है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,
उदार, परोपकारी, आस्तिक एवं विद्वान होता है। जातक को पारिवारिक जीवनमें पूर्ण सुख और पैतृक संपत्ति का सुख नहीं मिलता।
9. धनु-धनु राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक मेहनती, संपन्नएवं विख्यात होता है। आंखें मदमस्त होती हैं। पिता का सुख प्राप्त होता है।पिता समान स्वभाव निहित रहता है। अन्य ग्रह अनुकूल न होने पर वह अल्पायुरहता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक चरित्रवान,सरकारी कर्मचारी, संगीतज्ञ एवं दीर्घायु होता है। जीवन में सुख की कमी रहतीहै। महर्षि लोमश के मतानुसार संतान सुख में न्यूनता रहती है। प्रथम संतानका नुकसान होता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान,यशस्वी, प्रतिष्ठित, धैर्यवान एवं दानी-धर्मी रहता है। पारिवारिक सुख में न्यूनतारहती है।
12. मीनमीन राशि का बुध पंचम स्थान में हो तो जातक अपने पिताके समान गुणवान होता है, जठराग्नि मंद रहती है, अल्पायु होने की संभावनारहती है। जातक की आर्थिक स्थिति स्थिर होती है। माता-पिता का उत्तम सुखप्राप्त रहता है।
1. घर में हवन करें।
2. पीली गाय की सेवा करें।
3. भद्रकाली का पूजनकरें।
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6) षष्टम् भाव - षष्ठ स्थान (शत्रु भाव)
घष्ठ स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-अशत्रु: | इसे शत्रु नही होते। कल्याणवर्मा-बादबिवादे कलहे नित्यजितो ब्याधित: षष्टे बुधे। आतलसो बिनष्टकोपो निधुरबाक्यो5ति परिभूत:4॥ यह हमेशा बादविवाद और झगड़ों में पराजीत होता है। रोगी, आलसी और क्रोधरहित होता है। यह कठोर बोलता हैं और सदा अपमानित होता है | बैद्यनाथ -विद्याविनोदकलहप्रियकृद् विशीलो बन्धुपकाररहीत: शशिजेएरियाते। यह विद्वान, विनोदी, झगड़ालु, शीलहीन और आप्तों पर उपकार न करनेवाला होता है। पराशर-बुधःषष्टेउरिवृद्धिच। ज्ञेन नाभिषु। शत्रु बढते है। नामि के पास व्रण होता है। वसिष्ठ-स्थानलाभम् इन्दुजी मतिविहीनमनल्परोगम्। जमीन मिलती है। बुद्धि हिन होती है। बहुत रोग होते है। गर्ग-नरपालस्य शत्रु:। नीचारीभवने संन्यासम्। रिपुन विजयते सौम्य:। नीचश्चास्तवक्रश्च षष्ठक्षे रिपुरिष्टककृत। कन्यापत्यो5थ मातुल:। यह राजा का विरोधी होता है। यह बुध नीच अथवा शत्रु ग्रह की राशी में हो, तो संन्यासी होता है। शत्रुओं पर विजय मिलती है। यह अस्तंगत, वक्री या नीच राशी में हो, तो शत्रुओं से कष्ट होता है। मामा को सिर्फ कन्याएँ ही होती है। बृह्यवनजातक-सन्तप्तचित्त:। सप्तत्रिके सौम्यःशत्रुभयम्। इसका चित्त सदा सन्तप्त होता है। ३७ वें वर्ष शत्रुओं का भय निर्माण होता है। काशीनाथ-षष्टे बुधे नृशंसश्च विरोधी सर्वबन्धुषु। ईर्ष्याधीनः कामपरो विद्वानापि भवेनारः॥ क्रूर, आप्तो का बिरोध करनेवाला, ईर्षालु, कामुक किन्तु विद्वान होता है।
आर्यग्रन्थकार-यह बक्री हो तो शत्रुओं की बृद्धि होती है। मार्गी हो अथवा इसपर शुभ ग्रह की दृष्टी हो या शुभ ग्रह साथ हो, तो शत्रुओं का नाश होता है। जयदेव-बादवित् गुणशाली। बादविवाद में कुशल तथा गुणवान ह्लेता है। नारायणभट्ट-विरोधी जनानां रिपुणां प्रवोधी यतीनां चर रोधो5निलानाम्॥ बुधे सद्व्यये व्यावहारो निधीनां बलादर्थकृत् संभवेच्छत्रुभावे॥ यह लोगों से विरोध करता है। शत्रुओं को जितता है, संन्यासियों को ज्ञान देता है, प्राणायाम करता है, अच्छे कार्मों में धन खर्च करता है और अपने समर्थ से धन प्राप्त करता है। जीवनाथ-वायुनां प्रभवति विकारोडपि जठरे। वराणा। रत्नानां ब्यवहृति -रतीवार्थ जननी।| पेट में वातरोग होते है। रत्नों के व्यापार में धन मिलता है। यह राजा का शत्रु होता है। यह बुध निच अथवा शत्रुग्रह की राशी में हो, तो सन््यास लेना पडता है। शत्रुओं को पराजीत करता है। यह नीच अस्तंगत या वक्री हो, तो शत्रुओं से तकलीफ होती है। मन्त्रेश्वर-जागेश्वर के समान मत होता है। घोलप-मुर्खो की सेवा करनेवाला, जड शरीर का, अपस्मार रोग से दुःखी, दुराचारी, पापी, दुखी, निर्धन, अन्यायी और शोकग्रस्त होता है। इसे बुरे लोगो से और चोरों से बहुत तकलीफ होती है। पुंजराज-शत्रुस्थो ज्ञः पुंसां नुनं स्वपमृत्युं। असमय में मृत्यु होती है या प्राणान्तिक संकट आता है। गोपालरत्नाकर माँ कि मृत्यु होती है। बुद्धि वृष्ट होती है।
हिल्लाजातक- शस्त्रसकाशान्मृतिमरिगज्ञे द्वित्रिबत्सरे। दुसरे या तिसरे वर्ष २३ वर्ष यह अर्थ भी हो सकता है। शस्त्र से मृत्यु होती है।
यवनमत-संसार से उकताया हुआ, दुष्ट स्वभाव का और झगड़ा बढ़ाने में कुशल होता है।
पाश्चात्यमतल- इसे बदमाश मौकरों से तकलीफ होती है। क्षय या श्यास के रोग होते है। छाती दुर्बल होती है। मानसिक दु:ख से पीडा होती है। मन पर आघात होने से मृत्यु होती है। नौकर से फायदा होता है। स्वतंत्र व्यापार में लाभ नही होता। रसायन शास्त्रञ्ञ या लेखक होता है| प्रिन्टिग प्रेस से संबंध आता है। इस चुध के साथ मंगल का अशुभ योग हो, तो पागल होने की संभावना होती है। आत्महत्या कर सकता है।
अज्ञात-राजपुज्य:विद्याविघ्नं। दांभिक:। त्रिशद्वर्ष बहुराजस्नेहो भवति॥ बहुश्रुतः-लेखक:॥ कुजर्क्ष नीलकुछादिरोगी। शनिराहुकेतुयुते बातशुलादिरोगी। ज्ञातिशत्रुकलह:। भावाधिपे बलयुते ज्ञातिप्रबलः | अरिनीचर्क्षे॥ ज्ञातिक्षय: ॥ यदड राजमान्य, दांभिक, बहुश्रुत लेखक होता है। शिक्षा में विध्न आता है। ३० वें वर्ष राजा से अच्छी मित्रता होती है। यह बुघ मंगल की राशी में हो, तो काला कोढ़ आदि रोग होते है। इसके साथ शनी, राहु या केतू हो तो वात शूल आदि रोग होते है। अपनी जाती के लोगो से झगडे डोते है, षष्ठ स्थान का स्वामी बलवान हो, तो जाती अच्छी होती है। नीच अथवा शत्रु ग्रह की राशी में हो तो जाती कि हानी डोती है।
छठे भाव में बुध
छठे भाव में बुध शत्रुनाश करता है, प्रसन्नता बढ़ाता है और शुभ फलों को देने वाला होता है। यदि बुध वक्री है, तो जातक को शत्रुओं से भय हो।
-मानसागरी
जातक कटुभाषी, शत्रुदमन में सक्षम और आलसी होगा। वह तर्क करने वाला और अड़ियल स्वभाव का होगा।
-फलदीपिका
व्यक्ति झगड़ों व मुकदमों में सफल, संक्रामक रोगों से ग्रस्त, आलसी, क्रोध न करने वाला, अपमानित और कठोर वाणी वाला होगा।
-सारावली
जातक की शिक्षा में बाधाएँ, धन हानि, पैरो व अंगूठों में कष्ट, झगड़ालू, चिड़चिड़ा, सम्मानित और अधीनस्थ अधिकरी होगा।
-डॉ रामन
जातक राजा से सम्मान प्राप्त, शिक्षार्जन में बाधाएँ, प्रदर्शन करने वाला, घमण्डी और भ्रान्तियाँ फैलाने में दक्ष होगा। वह 30 वें वर्ष की आयु में राज्य द्वारा सम्मानित होगा। वह अच्छा लेखक होगा।
टिप्पणी
बुध वाणी, शिक्षा, व्यापार, चालाकी, गंभीरता आदि का द्योतक है। छठा भाव शत्रु, व्रण तथा घाव, विपत्तियों दुखों, रोगों आदि का प्रतिनिधि भाव है। अतः बुध की यहाँ स्थिति रोग, अपमान, कटुवचन कारक और शिक्षा में बाधक होती है। यदि बुध स्वगृही व शुभदृष्ट हो, तो फलों में भी अन्तर पाया जाता है। यदि षष्ठस्थ बुध निर्बल, नीच व शनि मंगल से युत है, तो वह शारीरिक दुर्बलता व अपंगता का कारक होता है।
सूझबूझ तथा तर्क का द्योतक ग्रह बुध जातक की सटीक तर्क करने वाला, विद्वान्, ज्योतिषी, भाई बहन की कुशल क्षेम का ध्यान रखने वाला बनाता है। बुध पंचमेश होकर गुरु के साथ छठे, आठवें या बारहवें (त्रिक) भाव में हो तो जातक अशिक्षित या निरक्षर ही होगा।
भचक्र के छठे भाव में बुध उच्चस्थ होता है। अतः किसी भी कुण्डली में षष्ठस्थ बुध मुकदमें में जीत, शत्रुओं पर विजय, मान सम्मान, अच्छी शिक्षा दीक्षा आदि प्रदान करता है। भाव छठा होने के कारण शिक्षा में रूकावट, धनहानि और रोगों की प्राप्ति हो सकती है।
मंगल की राशि में बुध कोढ़ और त्वचा रोगकारक होता है. यदि शानि तथा राहु या शनि व केतु साथ हो तो (गठिया का रोग) रयूमैटिज्म का कारण बनता है।
मेरे विच्चार-इस स्थान के शुभ फल पुरूष राशियों के और अशुभ कल स्त्री राशियों के ढै। मामा को सिर्फ कन्याएँ होना यह फल विचारनिय है। कई कुण्डलीयों में पुत्र होने का फल भी हमने देखा है। घोलप में अपस्मार डोने का फल कहा, वढ़ बुध के अनुरूप ही है। गोपाल रत्नाकर ने माता की मृत्यु का फल कैसे कहा यह स्पष्ट नही होता। छठवा स्थान माता का मारक स्थान नडी है। और बुध भी मृत्युकारक ग्रह नहीं हैं।
अतःयह फल गलत प्रतीत होता है। पष्ठ में बुध और सप्तम में रवी होने कै
माता की मृत्यु का फल देखने से ऐसा कहा होगा। हिल्लाजातक में दख
या तीसरे वर्ष शरस्त्र से मृत्यु का फल कहा गया है। बचपन में घर में खे
चक्त चाकु-कैची, छुरी आदि लगकर जखम होना संभव होता हैं। किल्ल
हमारे विचार से यहाँ २३ बैं या ३२ बें बर्ष लढ्ाई आदि शस्त्के आघात
से मृत्यु होने का फल अधिक ठिक होगा। ३० वैं वर्ष राजाओं का मि्र
होना यह फल अज्ञान ने कहा है, किन्तु अकेले षष्ठ के बुध का यह फल
बतलाना उचित नहीं होगा।
मेरे अनुभव-मेरे देखने में षष्ठ के बुध की कुण्डलियों देखने में कम
आई है। स्त्री राशी में यह बुध हो, तो लेखकों को दिमाग की तकलीफ़
होती है। लिखते समय या बोलते समय असावधान न रहने से कमज्यादा
लिखने में या बोलने में आ जाता है। इसका लेखन लोकप्रिय होता है और
उसपर खुप चर्चो होती है। मध्यम आयु तक इसका आहार अच्छा होता
है। फिर अपचन और बद्धकोष्ठ का विकार होता है। खाने में रूचि नही
रहती। महत्त्पर्ण कार्य में एकदम अपयश मिलता है।
षष्ठ स्थान में बुध हो तो जातक परोपकारी एवं दयालु होता है, जिसकेकारण उसके शत्रु नहीं होते। कुछ आचायों के मतानुसार शत्रु बहुत होते हैं।किंतु अंत में वे मित्र बन जाते हैं। बुध वक्री या नीच का होने पर जातकको शत्रु से नुकसान पहुंचता है। जातक कठोर वचनी रहता है किंतु क्रोधी नहींहोता। कुछ आचारयों के मतानुसार ऐसे जातक के बाहर के लोगों से संबंध अच्छेरहते हैं। लेकिन भाई-बहनों से मधुर संबंध नहीं रहते। सरल स्वभावी होने केकारण ऐसे जांतक वाद-विवाद में हिस्सा न ले तो उनके लिए श्रेयस्कर रहताहै। ग्रहयोग अच्छे न होने पर बुद्धि-विवेक मंद रहता है, बचपन में कष्ट होताहै, स्नायु की दुर्बलता एवं वातरोग उत्पन्न होते हैं। महर्षि पाराशर के मतानुसारपेट के पास या नाभि के आसपास व्रण रहता है। मेष राशि का बुध षष्ठ स्थानमें हो तो वातरोग एवं शूलरोग रहता है। बुध नीच या शत्रुक्षेत्र का हो तो जातकको संन्यासी होना पड़ता है। परमार्थ एवं अध्यात्म में उसकी स्वाभाविक रुचिरहती है।
महर्षि गर्ग के अनुसार जातक के मामा को पुत्र नहीं होता, केवल कन्याएंहोती हैं। जातक सरकारी कर्मचारी, संपन्न एवं सुखी होता है। जायदाद काफीरहती है। जातक प्रसिद्ध लेखक बनता है।
यवन ज्योतिषाचार्यों की राय में 37वें वर्ष में शत्रुभय एवं दूसरे, छठे एवंबत्तीसवें वर्ष में शस्त्र-अस्त्र का भय रहता है।
पाश्चात्य ज्योतिषियों के अनुसार जातक को तपेदिक, श्वास, हृदयरोग काडर रहता है। बुध के साथ मंगल हो या बुध मंगल को देखता हुआ हो तो जातकविक्षिप्त रहता है। शिक्षा, साहित्य एवं रसायनशास्त्र से जातक जुड़ा रहता है।
षष्ठ भाव—छठे भाव में बुध हो तो जातक झगड़ालू, आलसी, रोगी, अभिमानी,निर्बल/स्त्रैण स्वभाव की, कब्ज पीड़ित तथा अल्प पौरुष वाला होता है तथापिजातक के अवैध सम्बन्ध सम्भावित होते हैं। शास्त्रकारों के अनुसार-
वरोधोजनानां निरोधोरिपूर्ण प्रबोधी यतीनांचा रोधऽनिलानाम्।बुधे सगयेव्यावहारो निधोनां बलादर्य कृत्सभवेच्छत्रु भावे।।अर्थात् छठा बुध जातक को कलहप्रिय/कलहकारी, अधिक शत्रुओं वाला,संन्यासियों से ज्ञान प्राप्त करने वाला, धन को शुभ कामों में लगाने वाला तथा अपनेबूते पर धन संग्रह करने वाला बनाता है। ऐसे जातक का व्यापार अच्छा होता है।लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक मनमौजी, अपनों से विरोध करनेवाला, कब्ज, संग्रहणी, बवासीर, वातशूल आदि का रोगी, दुर्बल छाती वाला तथाश्वास या क्षय का रोगी होता है। ऐसा जातक लेखक/प्रकाशक या रसायन शास्त्रका ज्ञाता होता है किन्तु स्वतंत्र व्यापार करे तो उसे हानि होती है। माता से उसे लाभमिले न मिले किन्तु चन्द्रमा की कारक वस्तुओं से उसे लाभ मिलता है। ऐसे जातकको बुद्धि के अधिकतम प्रयोग वाला कारोबार करना चाहिए। दस्तकारी/हाथ काकाम उसे अधिक लाभ नहीं देता। मंगल से षषस्थ बुध का अशुभ योग जातक कोपागलपन देता है। यदि लग्नेश होकर बुध ष्ठस्थ हो तो जातक अपना शत्रु स्वयंहोता है। उसके अपने ही फैसले उसे नुकसान पहुंचाने वाले सिद्ध होते हैं।
बुध छठे घर में
बुध छठे घर का मालिक है। बुध का यहाँ गुमनाम योगी और दिलका राजा कहा गया है। बुध अब वफादार लौंडे की तरह शुभ फल देगा।ऐसे व्यक्ति की जुबान से निकला अच्छा या बुरा, हर लफ्ज पूरा होगा औरवह अपनी मेहनत से अमीर बनकर अच्छी जिन्दगी बिताएगा।
बुध न. 6 के वक्त हर ग्रह का फल दो गुणा शुभ हो जाएगा।लेकिन बुध छः के समय यदि व्यक्ति की लड़की जदूदी मकान से उत्तरकी तरफ ब्याही जाए तो वह कभी सुखी न होगी। यदि बुध, केतु यामंगल से मन्दा हो रहा हो तो व्यक्ति की 34 साल उम्र में इसका बुराअसर माता पर पड़़ेगा।
छठे घर में यदि बुध अकेला हो और उसकी दृष्टि में कोई ग्रह नहो तो छपाई यानी प्रंटिंग के काम उसके लिए उत्तम फल देंगे। बुध न.6 के समय शनि 8 या 11वें घर में हो तो औरत अमीर घराने से होगी।बुध 6 के समय यदि शुक्र न. 4 हो और केतु भी शुभ न हो तो ऐसेव्यक्ति की औलाद 34 साल उम्र के बाद ही जिन्दा रहेगी। इसके बुरे असरको दूर करने के लिए पत्नी के बाएँ हाथ पर चाँदी का छल्ला पहननामददगार उपाय होगा। यदि चन्द्र-बृहस्पति दूसरे घर में हो या बृहस्पतिग्यारह या चन्द्र दूसरे हो तो व्यक्ति की आँखों की नजर कमजोर हो सकतीहै और बुढ़ापे में भी उसके स्वास्थ्य पर अशुभ असर पड़ सकता है।
षष्ठ भाव: बुध छठे भाव में हो तो अशुभ फल ही अनुभव में आते हैं। षष्ठस्थ बुध के कारण जातक झगड़ालू, रोगी, आलसी होता है। शिक्षा प्राप्त में विध्न-बाधाएं आती हैं। मेष या वृश्चिक राशि का बुध पाप ग्रह से दृष्ट हो तो जातक कुष्ठादि रोग से पीड़ित होता है। राहु व शनि के साथ हो तो वातशूलादि से पीड़ा मिलती है। स्वबान्धवों से झगड़े होते हैं। दूसरों से सदा अपमानित होता है, वाद-विवाद और झगडे में पराजित होता है। क्षय व श्वास रोग होने की सम्भावना रहती है। वक्ष:स्थल दुर्बल तथा मानसिक आघात से मृत्यु तक सम्भव है। मंगल-बुध दोनों साथ-साथ हों तो उपांत्रशोथ (अपेण्डिसाइटिस) रोग होता है। क्योंकि ऐसा जातक गरिष्ठ भोजन या मांसाहार अधिक करता है। अशुभ मंगल से योग करे तो व्यक्ति पागल हो जाता है या आत्महत्या कर लेता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध षष्ठ स्थान में हो तो जातक बचपन में रोगग्रस्तरहता है। उसे सर्प भय रहता है। चोर-डाकुओं के हाथों उसकी मृत्यु संभवहोती है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध षष्ठ स्थान में हो तो जातक को बड़े पैमानेपर शत्रुओं का भय रहता है। शासन एवं उच्चाधिकारियों से उसके मधुर संबंधनहीं रहते। जातक अल्पायु होता है किंतु जीवित रहने पर काफी प्रगति करताहै। महर्षि गर्ग की राय में इसकी माता का चरित्र संदेहास्पद रहता है। वैवाहिकजीवन मध्यम स्तर का रहता है। पति-पत्नी में वैचारिक संघर्ष रहता है। स्त्रीसंसर्ग के कारण तपेदिक रोग उत्पन्न होता है।
3.मिधुन-मिथुन राशि का बुध षष्ठ स्थान में हो तो जातक ऊंघनेवाला, कुरूप एवं बदनाम होता है। वह स्वेच्छा से विवाह करता है और नास्तिक होताहै। आप्तजनों की अपेक्षा अन्यों से उसके संबंध मधुर रहते हैं। जमीन-जायदादकाफी होने पर भी जातक कंजूस रहता है, वह प्रायः एक ही जगह रहता है।मामा एवं ज्येष्ठ भ्राता के सुख में कमी रहती है।
4. कर्क कर्क राशि का बुध पण्ठ स्थान में हो तो जातक को सर्प एवविषभय रहता है, स्वास्थ्य मध्यम रहता है, संतान का सुख कम रहता है।जातक को या तो संतान होती नहीं या फिर हो भी गई तो वह आज्ञाकारीनहीं होती।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध पष्ठ स्थान में हो तो पत्नी के साथ मतभिन्नतारहती है। पत्नी गर्ममिजाज होती है। स्त्री संपर्क के कारण जातक को घातकरोग उत्पन्न हो सकता है। पिता का सुख-सहयोग उसे कम प्राप्त होता है।सौतेली मां हो सकती है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध पष्ठ स्थान में हो तो जातक के स्वजातीयया समाज के लोगों से मतभेद रहते हैं। दूसरे लोगों से अच्छी बनती है। जातकसंपन्न होता है। मामा के सुख में न्यूनता रहती है। मामी से अनुचित संबंधहो सकता है। नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं। जातक एक ही जगह रहकर आजीविकाचलाता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध षष्ठ स्थान में हो तो जातक संपन्न किंतु कंजूसहोता है। उसके शत्रु बहुत होते हैं। संतान या तो होती नहीं या फिर वहआज्ञाकारी नहीं होती।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध षष्ठ स्थान में हो तो जातक आर्थिकदृष्टि से संपन्न होता है। ननिहाल के लोगों से उसे सुख मिलता है। जातककी मां सौतेली होती है।
9. धनु-धनु राशि का बुध षष्ठ स्थान में हो तो जातक नेत्ररोगी एवंव्यभिचारी रहता है। संतान सुख में कमी रहती है। मामी से अनुचित संबंधरह सकता है।
10, मकर-मकर राशि का बुध पष्ठ स्थान में हो तो जातक धनवान होताहै, विदेश में रहता है और अपमृत्यु का डर रहता है। चोर-डाकुओं के हाथोंमृत्यु होने की संभावना रहती है।
11. कुभ कुंभ राशि का बुध पष्ठ स्थान में हो तो जातक कामातुर एवंकंजूस होता है। शासन एवं उच्चाधिकारियों के साथ मतभिन्नता रहती है। मामाएवं पुत्र का सुख प्राप्त होता है। जातक की मां दुराचारिणी होने की संभावनारहती है।
12. मीन-मीन राशि का बुध पष्ठ स्थान में हो तो जातक कुरूप, बदनाम, नेत्ररोगी, कंजूस एवं स्त्रीलंपट रहता है। उसका प्रेम विवाह या अंतरजातीयविवाह होता है। मां से अलगाव रहता है, माता तथा श्रेष्ठ भ्राता का सुख उसेकम मिलता है।
1. पीले कपड़़े दान करें।
2. जरमन, सिल्वर के प्याले में दूध भर करखेत में गाढ़े।
3. कनिष्का अंगुली में चांदी का छल्ला पहने 4. गुलाख वमोगरा घर में लगावें।
===========================7) सप्तम् भाव -
सप्तम स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-धर्मज्ः धर्म जानता है।
कल्याणवर्मा-प्राज्ञां सुचारूवेषं नातिकृलीनां च कलह्शीलां च।
भार्यामनेकवित यूते लभते महत्त्व चे॥ इसकी पत्नी बुद्धिमान, अच्छी
पोशाक करनेवाली, साधारण खानदान की, झगड़ालू होती है। नाना मारगी
से धन प्राप्त करता है और ऊंचे पद पर पहुंचता है।
वैद्यनाथ-व्यंग शिल्पकला विनोदचत्रस्तारासुतेऽस्तंगते। यह बुध
अस्तंगत हो तो शरीर में कुछ न्युनता रहती है । यह शिल्पकला में कुशत
और विनोदी होता है।
बसिष्ठ-बुधो बहुपुत्रयुक्तां रूपन्वितां जनमनोहररूपशीलां। पीडाम् | इसकी पत्नी सुंदर और शीलवान होती है। उसे बहुत पुत्र होते है। शारीरीक पीडा होती है।
पराशर-युद्धे सति पराजयम्। लढ़ाई में और वादविवाद में पराजय ह्लेती है। वेश्यागमन करता है।
गर्ग-तंरगभावगते हरिणांकजे भवति चंचलमध्य नरीक्षि: विपुलवंशभव # प्रमदापतिः स च भवति शुभगे शशिवंशजे।। इसकी दृष्टी चंचल होती है। इसकि पत्नी के पिता को बहुत सन्तती होती है।
आर्यग्रन्थकार-गर्ग के समान ही मत है।
बृहयवनजातक-चारूशीलविभवैरलंकृता सत्यवाक्सु निरतो नरो भवेत्। कामिनीकनकसुनूसंयुक्त: कामिनीभवनगामिनीन्दुजे ।। यह . शीलवान, धनवान, सच बोलनेवाला, स्त्रीपुत्रो से युक्त होता है। शशिजः कतत्रे स्व्याप्ति। सातवें वर्ष स्त्री प्राप्ती होती है।
' काशीनाथ-सप्तमस्थे सोमपुत्रे रूपविद्याधिको नर:। सुशीलः कामशास्त्रेज्े नारीमानश्च जायते।। यह रूपवान, विद्यावान, शीलवान, कामशास्त्रज्ञ तथा स्त्रियों को प्रिय होता है।
मन्त्रेश्वर-प्राज्ञो5स्ते चारूवेष: ससकलमाहिमा याति भार्या सवित्तां। यह बुद्धिमान, ऊंचा पद प्राप्त करनेवाला, अच्छी पोशाक करनेवाला तभं धनवान स्त्री से ब्याह करनेवाला होता है।
नारायणभटट-सुत: शीतगो: सप्तमेशं युवत्या विधत्ते तथा तुच्छवीर्य च भोगे। अनंस्तगते हेमवत् देहशोभा न शवनोति तत्संपदो वानुकर्तूम्॥ यह
बुध अस्तंगत न हो तो पत्नी का सुख मिलता है, किंतु वीर्य अल्प मिलता है| शरीर सुवर्ण के समान सुंदर होता है। और संपत्ति भी अतुल होती है।
जीवनाथ-नारायणभइ्ट के समान मत होता है। जयदेव-धर्मवित्सुवचन: शुभशील: कामिनीकनकसौख्ययुतोउस्ते। धर्म जाननेवाला अच्छा बोलनेवाला, शीलवान, धनवान तथा स्त्री सुख से
युक्त होता है। पुंजराज-ईषच्छयामा नीलवर्णा बुधे बाला। पत्नी अल्प आयु की और साँवले-निले रंग की होती है।
जागेश्वर-भवेत्कामिनीनां सुख सुंदर: स्यात् अनंगोत्सवे कामिनीनां कुवीर्य: । क्रये विक्रये लाभतो लुब्धचित्तो यदा चंद्रिदाचंद्रा ननागेहगामी॥ स्त्रीसुख मिलता है, कितु वीर्य बलवान नही होता। खरेदीविक्री के व्यवहार में लाभ होता है। सुंदर होता है।
घोलप-लेखन में कुशल, भाग्यवान गोरे रंग का, अपने पराक्रम ब्रे धनार्जन करनेवाला, विद्वानों में सन्न्माननीय, राजनीतिक नेता, अच्छी वस्तुओं का संग्रह करनेवाला, धार्मिक, धनवान और अपने काम में कुशब होता है। इसे स्त्री और पुत्रों का सुख कम मिलता है।
हिल्लाजातक-तथा सप्तदशे वर्ष स्त्री सौख्यं कुरूते बुध:। १७ बें वर्ष स्त्रीसुख मिलता है।
यवनमत-धनवान, सच बोलनेवाला, मांत्रिक, चतुर, परोपकारी, सुंदर, पंडित, बुद्धिमान और शिलवान होता है।
गोपालरत्नाकर-इसे माता का सुख अच्छा मिलता है। शरीर सुदृढ़ होता है। स्त्री और धन प्राप्त होता है। इसके पास अच्छे घोड़े होते है।
पाश्चात्यमत-इसके विवाह के समय झगड़े होते है। यह साथीदार पर विश्वास नही करता। प्रवास में लाभ होता है। लेखन के कुछ समय बडे संकट आते है। इस बुध पर अशुम दृष्टि हो, तो बहुत तकलीफ होती है।
अज्ञात-उदारमतीः। दिगन्तीबिश्रुतकी्ती:। तत्र शुभयुते चतु पिंशतिषर्ष आन्दोलिकाप्राप्तीस्। कलत्रमिति:| अभक्ष्यमक्षक:। भावेशे बतयुते एफदार-बान्। दारेशे पापे पापक्ष कुजादियुते बहुमार्यातर: ॥ यह उदार और फिर्तीमान होता है। इसके साथ शुभ ग्रह हो तो २४ वें वर्ष पावकी में बैठने का सन्मान मिलता है। यह पत्नी के कहे अनुसार चलता है। अभक्ष्य खाता है। सपमेश बलबान हो तो एक ही पत्नी होती है। सप्तमेश दुर्बल हो तो पापग्रह की राशी में हो या मंगल आदि के साथ हो, तो बहुभार्या योग होता है।
सप्तम भाव में बुध की स्थिति शुभफलदायी है। जातक की पत्नी उच्चस्तरीय परिवार से सम्बन्धित होती है। वह चुस्त और मध्यम दृष्टि वाला होगा।
-मानसागरी
जातक विद्वान, अच्छे कपड़े पहनने का शौकीन, गुणवान और सभी प्रकार से महान होगा। उसका विवाह संपन्न महिला से होगा।
-फलदीपिका
जातक की स्त्री विदुषी, सुदर्शना परन्तु उच्च कुल से उद्भव नहीं व झगड़ालू होगी। वह स्वयं महान् होगा।
-सारावली
जातक माता से सुख, अश्वादि के सुख से युक्त, धार्मिक, उदारमना, प्रसिद्ध और सरकार की और से सम्मानित होगा। वह माँस भक्षी होगा। सप्तमेश बली हो तो एक पत्नी, यदि पापाक्रान्त हो, तो दम्पत्ति में से एक की मृत्यु।
- भृगु
जातक राजनीतिज्ञ, छोटी आयु से ही साहित्य के प्रति रूचि रखने वाला, सदैव सफलता प्राप्त करने वाला, छोटी उम्र में विवाह, सुदर्शना पत्नी वाला, कर्तव्यनिष्ठ परन्तु तुनकमिजाज, शिक्षा में बाधा, व्यापार में सफलता, प्रभावशाली, प्रसन्नचित्त, दक्ष, धार्मिक, माँ खुशहाल और उसकी शीघ्र मृत्यु, चालाक, परस्त्री या परपुरूषगामी, दानी व बलिष्ठ शरीर वाला होगा।
-डॉ रामन
सप्तम भाव दाम्पत्य या जातक के पति या पत्नी का प्रतिनिधित्व करता है। जीवन साथी में बुध के गुणधर्म पाये जाएँगे। जातक की पत्नी सुंदर, विदुषी और आर्कषक होगी। बुध की सप्तमस्थ स्थिति जातक को यौनरूप से कमजोर, गुप्त रोगों से ग्रस्त और पत्नी को संतुष्ट कर पाने में अक्षम बनाएगी।
मेरे विचार-आचार्य और गुणाकर ने धर्मझ यह फल कहा है, किन्तु धर्म का विचार नवम स्थान से करना चाहिये। वैद्यनाथ ने शरीर में व्यंग होने का फल कहा, किन्तु सप्तम में पापग्रह होने पर भी यह फल नही मिलता। बुध के अस्तंगत होने से यह फल कैसे मिलेगा यह स्पष्ट नहीं। बृह्यवनजातक में ७ वें वर्ष और हिललाजातक में १७ वे वर्ष स्त्री प्राप्ती का फल कहा गया हैं यह पुराने जमाने के अनुरूप है, जब बालविवाह कि रूढी थी। इस समय इन फलों का अनुभव नही आ सकता। इसी प्रकार २३४ वें वर्ष पालकी का सन्मान मिलने के बारे में समझना चाहिए। पहले श्रीमान या विद्वान लोग पालकी में घुमते थे। अब यह प्रथा बंद हो गई है। कल्याणवर्मा ने स्त्री का कुल अच्छा नहीं होता ऐसा फल कहा है। इससे प्रतीत होता है, की उस समय भी मिश्र विवाह होते थे। नारायणभटट और जागेश्वर ने वीर्य अल्प होना यह फल कहा है। बीर्य अल्प होने पर स्त्रीयों को प्रिय होना कैसे संभव है, यह स्पष्ट नद्दी होता। गर्ग ने विपुलवंशभब प्रमदापती ऐसा वर्णन किया है। इसके दो अर्थ किये हैं। एक तो इसकी स्त्री को बहुत संतती होती है और दुसरी इसके स्त्री के पिता को बहुत सन्तती होती है। इन
स्थान में शास्त्रकारों मे जो शुभ फल कहे है, थे पुरूण राशियों के हैं और अशुभ फल स्त्री राशीयों के है।
मेरा अनुभव -इस स्थान में बुध पुरूण राशी में हो लो परनी सुंदर, अच्छी डोती है। उसका चेहरा रूबायदार और कुद्छ लंबा सा दोता है। केश काले, लम्बे, घने, अमर्त्रेले कितु रूक्ष होते है। शरीर प्रमाणबद्ध और देखने में कुछ पुरूण जैसा डोता है। स्वर भर्रायासा होता है। यह धैर्यवान, बुद्धिमान , पढ़ीलीखी, चादविवाद करनेवाली, पति के बारे में कुछ अनादर बतलानेवाली और झनगड़ालु होती है। यह बुध स्त्री राशी में हो तो पत्नी का चेहरा गोल होता है। केश लहरीले, लम्बे, रेशम जेसे कोमल होते दै। चोलना तिखा किंतु स्वर मृदु होता है। पती के बारे में आदर रखनेवाली और उसपर प्रेम करनेवाली होती है। पती से अधीक पढ़ी डो तो भी मर्यादा से रहती है। व्यवहारी, आकर्षक और संसारदक्ष होती है। यह बुध, मिथुन, तुला या धनु में हो तो शिक्षक, प्राध्यापक, वकील, सुस्तकविक्रेता, प्रकाशक आदी के व्यवसाय होते है। वृषभ या कन्या या मकर में हो तो व्यापारी, क्लर्क, टाईपीस्ट आदि के व्यवसाय होते है। कर्क, वृश्चिक यम मीन में हो लो कम्पाउंडर, सरकारी आफिस में क्लर्क आदि के व्यवसाय होते डै। मेष या कन्या राशी में हो तो विवाह के बाद भाग्योदय और स्थिरता प्राप्त डोती है। इसे प्रवास बहुत करना पडता है।
सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)
सप्तम स्थान में बुध हो तो वैवाहिक जीवन की दृष्टि से वह शुभ फलप्रदान करता है। पत्नी सुंदर, संपन्न घराने की एवं सुशील स्वभाव की मिलती है।
जातक के शरीर में कोई विकार रह सकता है। वह शिल्पकला एवंहास्य-व्यंग्य में कुशल, सुन्दर, विद्यावान, सौम्यस्वभावी, डरपोक, चंचल, पत्नीसुख से परिपूर्ण रहता है। जातक में कामशक्ति कम रहती है। पत्नी कम उम्रकी रहती है या पति-पत्नी की उम्र में अधिक अंतर रहता है। पत्नीकाली-सांवली होती है। माता-पिता का सुख अच्छा मिलता है। व्यापार में लाभहोता है। देश-देशान्तर में यश प्राप्त होता है। 24वें वर्ष में भाग्योदय होकरवाहन सुख प्राप्त होता है।
ऐसा जातक पत्नी का आज्ञाकारी होता है। भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार नहींकरता। सप्तमेश एवं लग्नेश बलवान होने पर एक ही पत्नी होती है। इसकेविपरीत सप्तमेश निर्बली होकर उसके साथ मंगल हो तो एक से अधिक विवाहहोते हैं या संबंध रहते हैं।
कुछ आचारयों के मतानुसार पत्नी गुणी एवं संपन्न परंतु कलहप्रिय होती है।महर्षि पाराशर की राय में जातक वेश्यागामी भी बन सकता है। यवनज्योतिषविदों के मतानुसार जातक संपन्न, सत्यवादी एवं चरित्रवान होता है।पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मत भिन्न हैं। उनके मतानुसार जातक के विवाह केसमय काफी अड़चनें एवं विध्न पैदा होते हैं। विवाद एवं झगड़े भी होते हैं।जातक का अपने साझेदारों एवं सहयोगियों पर भरोसा नहीं रहता। लेखनके विषय में जातक सावधान रहे अन्यथा लेखन के कारण ही दिक्कतें आसकती हैं। जन्म स्थान से दूर रहकर ही उसे जीवनयापन चलाना पड़ता है।
सप्तम भाव-जन्मकुंडली में बुध सातवें भाव में हो तो जातक सुन्दर,
विद्वान, चतुर व्यापारी, धनी, लेखक, सम्पादक, सुखी, धर्मभीरू, दीर्घायु किन्तु
अल्प पौरुष वाला होता है (यदि ससमेश की स्थिति सुदृढ़ न हो तो) जातक को
शीघ्र रखलन की शिकायत हो सकती है।
लाल किताब के अनुसार सातवां बुध विवाह में झगड़े, शीघ्र स्खलन किन्तु
धनसंचय करने वाली सहयोगिनी प्रत्नी देता है। यद्यपि पत्नी कर्कश बोलने वाली
तथा प्रायः पुरुषोचित आकृति वाली होती है। ऐसा जातक यदि लेखक हो तोजीवन अधिक संकटों में गुजरता है, किन्तु दुनिया के लिए ऐसा आदमी बहुत कामका होता है। स्त्री जातकों में सातवां बुध स्वयं उनके लिए खराब नहीं होता। भले
ही बुद्धि तीब्र न हो परन्तु उनकी शान तथा सुख अच्छे रहते हैं। मेरे सुयोग्य आचार्य
कौशिकजी के अनुसार स्त्री जातक की कुंडली में सातवां बुध यदि पाप प्रभाव में
हो तथा सप्मेश बली न हो तो तलाक भी करवा सकता है।
बुध सातवें घर में
सातवें घर के बुध को 'दुनिया के लिए पारस' कहा गया है। लड़केके टेवे में, ऐसा लड़का दूसरों को तारे। लड़की के टेवे में भी, बुध काअसर कभी बुरा न होगा।
सातवें घर के बुध के समय हुनरमंदी यानी वो काम जिसको सीखागया हो या हाथों के काम, जैसे लकड़ी का काम, का फल उत्तम ही रहेगा।
सातवें घर में बुध के समय झगड़ा-फसाद या मुकदमेबाजी न होगी।सातवें घर में बैठा हुआ बुध यदि जागता हो यानी पहले घर में कोईग्रह हो तो अपने कुल-परिवार-खानदान को तारेगा।
सातवें घर में बुध के समय यदि शनि तीसरे घर में हो तो उसव्यक्ति की औरत का मायका अमीर होगा। सातवें घर में बुध अपने पक्केघर में है और इस घर पर शुक्र का भी अधिकार है, इसलिए ऐसा व्यक्तिकिसी औरत के प्रेम में पड़ सकता है जिससे उसे सुख ही मिलेगा, कोईझंझट पैदा नहीं होता।
बुध 7 के समय यदि केतु पहले या आठवें घर में हो तो ऐसे व्यक्तिकी साली और उस व्यक्ति का भाई, उसकी औरत के लिए मन्दे फल केहोंगे या औरत के लिए वे उलझनें पैदा करेंगे।
यहाँ बैठे मन्दे बुध की हालत में जब बृहस्पति नौवें घर में हो तोऐसे व्यक्ति का गृहस्थ-जीवन अच्छा नहीं रहेगा। मगर कारोबार के लिएइसका असर बुरा नहीं होगा।
सप्तम भावः बुध सप्तम भावस्थ हो तो जातक के विवाह में अड॒चनें आती हैं। पहले किया गया संबंध अथवा बातचीत टूट जाती है और दूसरी जगह विवाह होता है। ऐसा जातक भागीदार को विश्वासपात्र नहीं मानता। अधिक प्रवास करता है तथा प्रवास से लाभ भी मिलता है। वह अच्छा लेखक होता है, लेकिन ख्याति नहीं मिलती। कामवासना प्रबल होती है लेकिन शीघ्रपतन का रोगी होता हे। पुरुष राशि का बुध सप्तमस्थ हो तो जातक की पत्नी का चेहरा प्रभावशाली, केशावली भ्रमर के समान काली, डील-डौल पुरुष के समान दृढ़ होता है। उसकी झगड़ने की आदत होती है। स्त्री राशि का बुध हो तो पत्नी गोल चेहरे, घुंघराले बालों वाली, कोमल प्रकृति की तथा व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग करने वाली होती है। पृथ्वी राशि का बुध हो तो जातक व्यापारी, लिपिक होता है। जल राशि में बुध हो तो वैद्य या डॉक्टर का सहायक (कम्पाउंडर) अथवा लिपिक होता है। मिथुन, तुला और धनु राशि का बुध हो तो जातक पुस्तक प्रकाशन, शिक्षण, लेखन, वकालत को जीविका का पाता है ता है। मेष या कन्या राशि में हो तो विवाहोपरान्त ही भाग्योदय हो पाता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो वैवाहिक जीवन सुखीरहता है। पत्नी आज्ञाकारिणी, सुशील एवं संपन्न रहती है। किंतु जातक स्वयंवेश्यागामी एवं कपटी हो सकता है।
2. वृषभवृषभ राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न, दीर्घायुएवं चरित्रवान होता है। पत्नी अच्छी मिलती है। नैसर्गिक रूप से जातक काचेहरा भयानक किंतु स्वभाव सौम्य रहता है। वह गुप्तरोग एवं गुदारोग से त्रस्तरहता है।
3. मिथुनमिथुन राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक मधुरभाषी,दीर्घायु, स्वस्थ, तेजस्वी, कीर्तिवान किंतु बहिर्मुखी रहता है। पत्नी खूबसूरत,अच्छे स्वभाव की एवं सास की सेवा करनेवाली मिलती है।
4. कर्क-कर्क राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक धार्मिक,सदाधारी, गप्प हांकनेवाला, जहरीली वस्तुओं का सेवन करनेवाला रहता है।पत्नी कामातुर, आज्ञाकारिणी एवं संपन्न परिवार से होती है। वैवाहिक जीवनसुखी रहता है। पत्नी का गर्भपात होना या बांझ रहना संभव है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी,ऊंचे कद का, अधिकारसंपन्न एवं तेजस्वी रहता है। उसे पत्नी एवं बाल-बच्चोंका सुख कम मिलता है। पत्नी सुंदर व छोटे कद की, प्रियभाषिणी होती है।कुसंगति के कारण जातक दुराचारी हो सकता है। महर्षि गर्ग एवं अन्यज्योतिषविदों के मतानुसार ऐसे जातक का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता।स्त्री के कारण ही उसकी मृत्यु होती है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक स्वस्थ,मधुरभाषी, दीर्घायु, यशस्वी, तेजस्वी एवं परस्त्रीगामी हो सकता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध संप्तम स्थान में हो तो जातक बचपन मेंलगातार बीमार रहता है। ऐसा जातक चोर, जहरीली वस्तुओं का सेवनकरनेवाला एवं दुष्कृत्यों को करनेवाला हो सकता है। सजा के कारण मृत्यु होतीहै। स्वयं के प्रभाव से विवाह करता है। पत्नी सुंदर एवं कामातुर रहती है।उसके गर्भपात होते हैं या वह बांझ रहती है।
8. वृश्चिकवृश्चिक राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक लंबेकद का एवं पत्नी छोटे कद की रहती है। जातक स्वाभिमानी, तेजस्वी एवंअधिकारसंपन्न होता है। उसकी पत्नी मधुरभाषिणी, सुशील किंतु अल्पायु होतीहै। संतान सुख में न्यूनता रहती है। जातक चिकित्सा शास्त्र का जानकार एवंसंपन्न होता है। महर्षि लोमश के मतानुसार जातक, उसकी मां एवं पत्नी तीनोंव्यभिचारी रहते हैं।
9. धनु-धनु राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक एवं उसकी पत्नीदोनों ही सुशील, सुंदर, कलाविद् एवं सदाचारी रहते हैं। महर्षि लोमश केअनुसार पत्नी अल्पायु रहती है। जातक को जीवन में आर्थिक चढ़ाव-उतारदेखने पड़ते हैं।
10. मकर-मकर राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक का बचपनरुग्ण एवं कष्टमय रहता है। जातक शस्त्रविद्या में पारंगत रहता है। पत्नी सुखकम रहता है। जातक अन्य स्त्रियों के पीछे लगकर धन व्यय करता है। जातकचोर एवं वेश्यागामी भी बन सकता है। युद्ध में या सजा के कारण मृत्यु होती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक धनवान,दीर्घायु, स्वभाव से कोमल किंतु दिखने में कठोर होता है। महर्षि गर्ग केमतानुसार जातक पत्नी के प्रति वफादार होता है। महर्षि लोमश के मतानुसारजातक, उसकी मां एवं पत्नी तीनों ही व्यभिचारी होते हैं। पत्नी सुंदर रहती है।
12. मीन-मीन राशि का बुध सप्तम स्थान में हो तो जातक को आर्थिकचढ़ाव-उतार बहुत देखते पड़ते हैं। जीवन दरिद्री की तरह या राजा की तरह बीतता है। पत्नी अच्छी किंतु अल्पायु रहती है।
1. रोगडे व रोगड़ी की सेवा करे।
2. ससुराल से दूरी रखें।
3. हीराकनिष्टका अंगुली में धारण करें।
===========================8)अष्टम् भाव - अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
अष्टम स्थान में बुद्ध के फल आचार्य न गुणाकर-विश्रुतगुणख्यात: | गुर्णों के कारण प्रसिद्ध दोता है। कल्याणवर्मा-विख्यातनामसारश्चिरंजीबी कुलधरो निधनसंस्थे।
शशितनये भवती नरी नृपतिसमो दण्डनायको बा5पि ॥ ॥ कीर्तीमान, दिर्घायु, कुलवान, राजा के समान अथबा सेनापती के समान प्रभावी दोता है।
वैद्यनाथ-विनीतिनाहुल्यगुणप्रसिद्धों धनी सुधराश्मिसुतेठष्टमस्थे।। नप्नता आदि गुणों से प्रसिद्ध और धनबान ड्ोता है। खसिष्ठ-सर्वे ग्रहा दिनकरप्रमुखा नितान््तं मृत्युस्थिता बितनुते किल दुष्टबुद्धिम्। शस्त्रभिघातपरिपीडीतगात्रयष्टि सौख्यवैर्विहीनमतिरोगगणैरूपेतम्॥ अष्टम् स्थान में कोई भी ग्रह हो, उसका एक ही फल होता हैंबह दुष्ट बुद्धि का, बहुत रोगी, सुखहिन होता है। शास्त्रों से उसके शरीर को पीड़ा होती है। इस ग्रन्थकार ने अर्थ ;धनलाभ यह और एक फल कहा है। पराशर-मृतौ बन्धुविहिनत्वं बन्धनम्। बन्धु नही होते। कारावास सहना पडता है। गर्ग-करोति मृत्युं निधस्थितो बुध: सुखेन तीर्थे सुखदे निराविले। ह शुलघ्रजंघोदररोगपीडा पाप: पिधायांतकरो नराणाम्। | इसकी मृत्यु कीसी अच्छे तीर्थस्थान में सुखपुर्बक होती है। यह बुध अशुभ हो तो शुल, जांघ या पेट के रोग होते है। बृह्द्ययनजातक-भूपप्रसादाससमस्तसिद्धिर्नरो विरोधी सुतरां स्ववर्गे। सर्वप्रयत्नै: परतापरहंन्ता रन्धे भवेचन्द्रसुत: प्रसुतो ।। राजा की कृपा से वैभव मिलता है। यह अपने लोगो से विरोध करता है। दुसरों के कष्ट दुर करता है। मन्वद्धकेहि धन धान्याविनाशकारी। १४ वें वर्ष धनधान्य का नाश होता है। नारायण भट्ट-शतंजीविनो रन्ध्रगे राजपुत्र॑ भवन्तीह देशांतरे बिश्रुतास्ते निधानं नृपाद् विक्रयाद वा लभन्ते युवत्युभ्दबं क्रिडनं, प्रतिमन्त: । यह सौ वर्ष जीनेवाला, देशविदेश में प्राख्यात, राजाश्रय के व्यापार से धनवान होता है। इसे स्त्री-सुख अच्छा मिलता है।
जीवनाथ-नारायणभट्ट के समान मत है। जयदेब-ख्यातिमाश्नपकृप: सविरोधोडन्योपकारसह्ठितो विदी रन्ध्रे। किर्तीमान, राजा का कृपापात्र, लोगो से विरोध करनेवाला किन्तु परोपकारी होता है। काशीनाथ--बुधे5ष्टमे कृतध्नश्व कुबुद्धिः पारदारीक: | कामातुरो5सत्यबादी रोगोयुक्तो भवे्ञार:॥ यह कृतघ्नश्च, दुष्ट बुद्धि का, व्यभीचारी, कामुक, झुठ बोलनेवाला और रोगी होता ढै। जागेश्वर-जयदेव के समान मत होता है। आर्यग्रन्थकार-निधनवेश्मनि सत्ययुतः शुभो निधनदो5तिथिमंडन एब च। यदि च पापयुते रिपुगेहगे मदनकाम्यजबेन पतत्यध:॥ सच बोलनेवाला तथा अतिथियों का सत्कार करनेवाला होता है। इसकी मृत्यु अच्छी स्थिती में होती है। यह बुध पापग्रह के साथ या शत्रुग्रह की राशि में हो तो अति कामुक होने से अधःपात होता है। मन्त्रेश्वर-विख्याताश्रिरायु: कुलभूदधिपतिक्षेष्टमे दण्डनेता। किर्तीमान, दिर्घायु, कुलवान, अधिकारी या सेनापती होता है। काश्यप-(जातकोत्तम) - १. ज्वरात्, २. कफविकारोत्वथं, ३.वातरोगाद, ४. ब्रणेन च। ५. महाभयात्, &. प्रियजनवियोगात् ७. वैदनाभयात् ॥, ८. नेत्ररोगात्, ९. वायुरोगात, १०. बंधनेन, ११,उदरामयातू।, १२. प्राणब्रणाद् बुधे मृत्युर्मृत्युभावे भवेत् क्रमात॥ अष्टम का बुध मेष में हो तो ज्वर से, वृषभ में हो तो कफविकार से, मिथुन में हो तो वातरोग से, कर्क में हो तो ब्रण से, सिह में हो तो किसी बड़े रोग से, कन्या में हो तो प्रिय व्यक्ती के बियोग से, तुला में अति बेदना से, वृश्चिक में आँख के रोग से, धनु में बायुरोग से, मकर में बंधन से, कुंभ में पेट के रोग से, तथा मीन में हो तो पाँव में जखम होने से मृत्यु होती है।
घोलप-यह प्रकाशमान, धनी, दीप्तिमान, शत्रुहीन, पराक्रमी, शुध्द चित्त तर, श्रेष्ठ पण्डित, कबि, शुभ आचरण से जगत में पूज्य होनेवाला होता है । गोपाल रत्नाकर-दीर्घायु, कीर्तिमान होता है। इसे जमीन का लाभ शैता है। पुत्र कम होते है। हिलाजातक-बृहद्यवनजातक के समान मत है। यवनमत-दीर्घायु, रूपवान, अभिमानी, राजा केसमान रहनेवाला, झगड़े लगाकर अपना स्वार्थ साधनेवाला होता है। पाश्चात्य मत-मस्तिष्क और नसों के रोग होते है। स्मरणशक्ति अच्छी होती है। मृत्यु के समय सावधान अवस्था में मृत्यु होती है। गुप्त विद्या और अध्यात्मशास्त्र का ज्ञान अच्छा होता है। साझीदारी मे नुकसान होता है। यह बुध उच्च या शुभयोग में हो, तो अकस्मात लाभ होता है। अज्ञात-लाभ: आयु : कारक: | सौख्यवान बहुक्षेत्रवान्। सप्तपुत्रवान[ प्रमाद:। पंचविशति वर्षे अनेक प्रतिष्ठसिध्दि: | नृपराजकृपा: रिपुक्षय:। किर्तिप्रसिध्द:। भावधिपे बलयुते पूर्णायु:। अरिनीचपापयुते अल्पायु:। अथवा उच्चे स्वक्षेत्रे वा शुभयुते पूर्णायु:॥ यह बुध लाभकारक होता है। सुख और बहुत जमीन प्राप्त होती है। सात पुत्र होते है। २५ वे वर्ष नाना प्रकारों से ऊंचा पद मिलता है। राजा की कृपा होती है। शत्रुओं का नाश होता है। किर्ति मिलती है। अष्टमेश बलवान होता हो, तो दिर्घायु होता है। यह बुध उच्च, शुप्र ग्रहों से युक्त या स्वगृह में हो, तो दीर्घायु होता है। यह शत्रु ग्रह की राशि में, नीच या पापग्रह के साथ हो , तो अल्पायु होता है। मेरे विचार-यबन जातक और हिल्लाजातक में १४ वे वर्ष संपत्ति नष्ट होने का फल कहा गया है। इस आयु मे खुद की संपत्ति नहीं होती। अतः इसकी पैतृक संपत्ति का नाश होता है, ऐसा फल समझना चाहिए। गोपाल रत्नाकर ने अल्पसन्तति यह फल कहा तो अज्ञात के अनुसार इसे सात पुत्र होते है। इनमे पहला फल स्त्री राशियों में और दूसरा पुरूष राशियो मे मिलता है । शुभ फल पुरूष राशियों के और अशुभ फल स्त्री राशियों के है।
जातक सत्य प्रेमी, सुदर्शन, शत्रुहन्ता, आतिथ्य करने में तत्पर, और आकर्षक व्यक्तित्व वाला होगा। यदि बुध पापाक्रान्त या शत्रुक्षेत्री हो तो जातक में नैतिक मूल्यों का ह्रास होकर वह नीच स्तर अर्थात कामदेव के वेग से अधोगति को प्राप्त करता है।
-मानसागरी
अष्टमस्थ बुध दीर्घायु तथा प्रसिद्धिदायक होता है। जातक अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। राजा की तरह प्रभुता सम्पन्न और सेनापति जैसा होगा।
-फलदीपिका
जातक अनेक उपाधिधारक, प्रसिद्ध, सुदृढ, दीर्घायु, परिवार का भरण-पोषण करने वाला और राजा या न्यायधीश होगा।
-सारावली
जातक दीर्घायु, बड़े भूखंडों का स्वामी, सात संतान वाला, प्रसिद्ध, 35 वें वर्ष की उम्र में नाम यश कमाने वाला। यदि अष्टमेश बली है तो सूर्णायु अन्यथा अल्पायु होगा।
भृगु
वह भूसंपत्ति का स्वामी, चिरंजीवी आसानी से इच्छापूर्ति करने वाला, घरेलू मामलों में खिन्न, उपकारक, अल्पसंतिति वाला, प्रसिद्ध सम्मानित परन्तु रोगी शरीर वाला होगा।
-डॉ रामन
चमत्कार चिंतामणि के अनुसार जातक विदेशों में भी प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। राजा से सम्पत्ति प्राप्त करेगा और स्त्री संसर्ग से युक्त होकर प्रसन्न होगा।
बृहत्नातक के अनुसार व्यक्ति गुणावान् होने के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध होगा।
टिप्पणी
अष्टम में बुध की स्थिति अनेक दोषों को जन्म देती है। कफ तथा बात संबंधी कष्ट, कैद की सजा व वह झूठा होगा। अष्टम में बुध के पापयुक्त होने पर जातक का यौननृशंसता के कारण पतन हो। जातक मित्रतापूर्ण भावों वाला, आठों दिशाओं में नाम यश फैलाने वाला, स्त्री संग में प्रसन्न रहने वाला, कई प्रकार के लाभ प्राप्तकर्ता और चिरंजीवी होगा। बलवान् बुध जातक को नाम यश, प्रतिष्ठा तथा लोकप्रियता से अनुगृहीत करता है। गुप्त भाव अष्टम में बुध की अवस्थिति यौननृशंसता की प्रवत्ति या स्त्रियों से गुप्त संबंध तथा अनेकानेक मार्गों से लाभ तथा दीर्घायु देता है।
मेरा अनुभव-बुध मृत्युकारक ग्रह नहीं है। अतः यह अशुम हो तो भी भयंकर शारीरिक आपत्ति इतना ही फल मिलेगा। अत: काश्यप ने जो बारह प्रकार का मृत्यु का वर्गीकरण दिया है, वह निरर्थक प्रतीत होता है । मस्तिष्क के विकार होना यह फल पाश्चात्य मत में दिया है, वह ठीक है। इसकी प्रवृत्ति शास्त्रीय ज्ञान की ओर होती है। ज्योतिषी हो सकता है। इसकी पत्नी अच्छी होती है। वह बहुत बोलती है। पति के साथ आनंदपुर्वक रहती है। घर के रहस्य बाहर के लोग नही जान पाते। यह कुछ खर्चीली होती है। ये फल पुरूष राशियों के हैं। स्त्री राशियों में पत्नी अच्छी नहीं होती। घर के रहस्य सब लोंगो को मालूम हो जाते है। पत्नी झगड़ातू होती है। इसका शास्त्रीय ज्ञान अधूरा होता है। मस्तिष्क के विकारों से मृत्यु होती है। कुछ शास्त्रकारों ने राजकृपा, किर्ती, सुख आदि फल दिये है, वे अकेले बुध के नही हैं। बुध अष्टम मे हो तो रवि सप्तम, अष्टम या नवम मरे होता है, अत: उसके फलों का भी इन में मिश्रण हुआ है।
अष्टम स्थान में बुध अच्छा फलदायक होता है। वह जातक को दीर्घायु बनाता है। जातक विद्वान, गुणवान, धनवान, सरकारी कर्मचारी, अधिकारसंपन्न,परोपकारी एवं कामातुर तथा प्रसिद्ध होता है। व्यापार में उसे अच्छा लाभ होता
है, विरोधी भी बहुत होते हैं। मृत्यु अच्छी स्थिति में आती है। यदि बुध पापग्रहके साथ हो तो जातक व्यभिचारी बनता है। एक आचार्य के अनुसार जातकके सात पुत्र होते हैं, किंतु कुछ आचायों के मत में संतान कम होती है तथा25वें वर्ष में भाग्योदय होता है। महर्षि पाराशर के अनुसार सहोदरों के सुखमें कमी रहती है और जातक के जेल जाने का योग बनता है। महर्षि गर्गके अनुसार बुध पापग्रह से युक्त या शत्रु क्षेत्र में हो तो जातक शूलरोग, जांघएवं पेट के रोगों से ग्रस्त रहता है।
यवनाचार्य के मतानुसार जातक सरकारी कर्मचारी एवं परोपकारी रहता है।नजदीकी लोग विरोधी बनते हैं। चौदहवें वर्ष में धनहानि होती है।
पाश्चात्य विद्वानों की राय में जातक आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण होता है।एवं वह गूढ़ विद्याओं का भी जानकार रहता है। मृत्यु अच्छी स्थिति में आतीहै किंतु जातक स्नायु दौर्बल्य, मस्तिष्क एवं नसों की बीमारी से ग्रस्त रहता है।
अष्टम भाव--बुध यदि जन्मकुंडली में आठवें भाव में हो तो जातक दीर्घायु,अभिमानी, समाज व सरकार से सम्मान पाने वाला, वक्ता, विरासत के धन को पानेवाला या पैतृक सम्पत्ति से धनी किन्तु मानसिक रूप से दुखी होता है। क्योंकि उसेरोग, परेशानियां, गुप्त नुकसान, धन की बर्बादी आदि झेलते रहना पड़ता है। यदिइसके साथ इस भाव में पुरुष ग्रहों की युति हो या बारहवें भाव में मंगल हो तो बादमें कही गई परेशानियों से काफी हद तक बचाव हो जाता है।
लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक अतिथि सेवक, राज्य कृपा व ख्यातिप्राप्त करने वाला, राज्य में उच्च पदाधिकारी, गुप्तविद्या/अध्यात्म में दखल रखनेवाला होता है। परन्तु साझे में व्यापार करे तो उसके साथ धोखा हो सकता है। उच्चका बुध हो या शुभ प्रभाव में हो तो अकस्मात धन लाभ के संयोग प्रास्त होते हैं।किन्तु पाप प्रभाव का बुध अति सम्भोग के कारण/वीर्याल्पता व शक्तिहीनता केकारण जातक की मृत्यु भी कर सकता है।स्त्री राशि का बुध हो तो जातक दिमागीखराबी के कारण मरता है (विशेषकर तब जब बुध पर पापदूष्टि भी हो)।
शास्त्रकारों के अनुसार आठवें बुध के जातक छिद्रान्वेषी, कुलघाती, कफवायु रोगों से पीड़ित भी होते हैं। परन्तु देश-विदेश में विख्यात भी होते हैं।
बुध आठवें घर में
आठवें घर में बुध 'बीमारी और जहमत' कहलाता है। ऐसा बुध खुफियातबाही का फन्दा होगा, जिसके कारण व्यक्ति को आर्थिक तौर पर नुकसानही होगा। आठवें घर के बुध को 'कोढ़ी' कहकर भी पुकारा गया है।
लाल किताब में ऐसे बुध को 'मुर्दा' या ‘मुर्दे पर चढ़ाया हुआ फूल'कहा गया है या ऐसी दीमक जो व्यक्ति के सुख को खा जाए।
आठवें घर में बैठे बुध से व्यक्ति को दाँतों तथा नाड़ियों कीतकलीफ होगी। कई बार ऐसे व्यक्ति के अपने कामकाज में या नौकरीमें अचानक ही खराबियाँ पैदा होंगी।
असल में, आठवें घर का बुध सबसे ज्यादा अशुभ होता है। इसकोठीक करने के लिए लड़़की के नाक में चाँदी का छल्ला डालना उसके जहरको समाप्त कर सकता है।
आठवें घर में बैठा हुआ अकेला बुध व्यक्ति के लिए कभी भी अच्छाअसर नहीं देता। इसका असर उसकी बहन, बुआ या बेटी पर पड़ सकताहै और यदि वह बुध के काम करे, तो वह उसे तबाह कर सकते हैं। जबखाना न. 2 खाली हो तो बुध का जहरीला असर व्यक्ति की आयु के 34साल तक रह सकता है।
बुध 8 के समय यदि जन्मकुंडली में दूसरा घर खाली हो तो वर्षफलके मुताबिक दूसरे घर में आए ग्रह की बर्बादी के वक्त भी ऐसे ही उपायकरें जिनका पहले जिक्र किया है।
आठवें घर में मन्दे बुध के होते हुए, यदि खाना न. 6 खराब हो तोबृहस्पति को छोड़कर सभी ग्रहों के असर में बुध का बुरा असर, उनकोचक्कर में डाल देगा।
बुध 8 के समय जब खाना न. 12 खाली हो तो व्यक्ति को पट्ठोंकी बीमारियाँ भी हो सकती हैं।
अष्टम भाव: अष्टम भाव में बुध हो तो जातक की स्मरणशक्ति अच्छी होती है लेकिन मस्तिष्क एवं स्नायु रोग भी होते हैं। गुह्य विद्या एवं अध्यात्म ज्ञान उसे अच्छा होता है। यदि बुध कन्या राशि का शुभ दृष्ट हो तो आकस्मिक रूप से धन की प्राप्ति होती है। स्वगृही अष्टमेश के साथ स्थित हो तो लम्बी आयु प्राप्त होती हे। ऐसे जातक को साझेदारी में कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे हानि उठानी पडेगी। पुरुष राशि का बुध हो तो पत्नी रहस्यों को गुप्त रखने वाली, प्रेम करने वाली तथा पति के साथ सानन्द रहने वाली होती है। स्त्री राशि में बुध हो तो पत्नी अच्छे स्वभाव की नहीं होती। घर के गुप्त रहस्य उसके कारण जगजाहिर हो जाते हैं। मस्तिष्क विकार मृत्यु का बहाना हो सकता है। उच्च अर्थात कन्या राशि का बुध हो तो लॉटरी आदि से धन मिलता हे, राज्य कृपा प्राप्त होती है। अशुभ प्रभाव में बुध हो तो जातक मधुमेह, अण्डकोष के शोथ, पक्षाघात आदि से पीडित होता है।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक शिल्पविद्या मेंप्रवीण, धनसंग्रह करनेवाला, कंजूस, अल्पायु, जुआरी एवं चोर रहता है। तापज्वर के कारण जातक की मृत्यु होती है।
2. वृषभवृषभ राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक क्रूर, दुराचारी, नास्तिक, सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करनेवाला, धनसंग्रह करने मेंकुशल परंतु नपुंसक होता है। मृत्यु कफ रोग से होती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक समाज मेंविख्यात, कपटी, परनिंदक, चोर, जुआरी एवं चरित्र से भ्रष्ट होता है। व्यापारमें मुनाफा कमाता है। कफ रोग से मृत्यु होती है।
4. कर्क-कर्क राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक कपटी, चोर,जुआरी, दुराचारी, वेश्यागामी एवं अल्पायु होता है। पति-पत्नी में मतभेद रहतेहैं। जातक गर्ममिजाज होता है। कुछ आचार्यों के मतानुसार जातक का विवाहनहीं होता, हो भी जाए तो पत्नी से वांछित सुख प्राप्त नहीं होता।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक कपटी,नास्तिक, रोगी, शत्रुओं से घिरा हुआ, परस्त्रीगामी, हिंसाचारी होता है। कुछआचार्यों की राय में जातक पुरुषत्वहीन रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक कटुभाषी,कपटी, चोर, मूर्ख, परनिंदक, झूठा एवं परस्त्रीगामी होता है। सहोदर एवं संतानअल्पायु रहती है। पत्नी का चरित्र संशयास्पद हो सकता है। शरीर में कोईविकार रहता है। प्रियजनों के वियोग के कारण जातक की मृत्यु होती है।7. तुला-तुला राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु रहताहै, विवाह नहीं होता। विवाह हो भी जाए तो पत्नी अच्छी नहीं मिलती।वैवाहिक जीवन दुखी रहता है फलस्वरूप जातक वेश्यागामी रहता है। पिताके सुख में न्यूनता रहती है। शूलरोग होता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक संपन्न,
रोगी, दुराचारी, नेत्ररोगी, लोभी एवं हिंसाचारी होता है। उसके शत्रु बहुत रहतेहैं। बचपन में जातक बीमार रहता है। संग्रहणी रोग एवं विषभय रहता है।9. धनु-धनु राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक आत्मघाती,कटुभाषी, धूर्त किंतु संपन्न होता है और बड़े भाई के सुख से वंचित रहताहै। जातक के वैवाहिक जीवन में सुख की न्यूनता रहती है। उसे जमीन मेंगड़ा हुआ धन या अन्य गुप्त धन का लाभ होता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,शिल्प विद्या में पारंगत, कंजूस, धोखेबाज, चोर, जुआरी, परस्त्रीगामी किंतुसंपन्न होता है और उसे कारावास भुगतना पड़ता है। जातक की आत्मघात कीओर प्रवृत्ति रहती है और पितृ सुख में कमी रहती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक बाल्यावस्थामें रोगी रहता है। ऐसा जातक रोगी, जुआरी, दुराचारी, पेट के रोग से ग्रस्तएवं संतप्त रहता है।
12. मीन-मीन राशि का बुध अष्टम स्थान में हो तो जातक आत्मघाती,घमंडी, पाखंडी एवं हिंसक होता है। उसके शत्रु बहुत होते हैं, स्वास्थ्य मध्यमरहता है। जातक को जमीन में गड़े धन से या अन्य तरह से धन लाभ होताहै। आर्थिक स्थिति सुदृढ़ एवं पत्नी सुंदर रहती है। पैरों में फोड़े-फुसियां होतीहैं और इसी कारण मृत्यु होती है।
1. पूजा स्थान बार-बार न बदले।
2. अंगुठी में चांदी का छल्ला पहने।
3. घी व शक्कर के पतासे की (कली की हुई ) कटोरी में लेकर जमीनमें गाड़ देवे।
4. चांदी व तांबे का चौकोर टुकड़ा शमशान में गाडे। 5.गाय को मीठी रोटी खिलावे।
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9) नवम् भाव - नवम स्थान (भाग्य भाव)
नवम स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-धर्में सुतार्थ सुखभाकु। संतति, संपत्ति तथा सुख मिलता है।
कल्याणवर्मा-नवमगते भवति पुमानतिधनविद्यायुतः शुभाचार:। बाशीश्वरो5तिनिपुर्णों धर्मिष्ठो सोमपुत्रे हि ॥ बहुत धनवान, विद्वान, सदाचारी, वक्ता, निपुण और धर्मनिष्ठ होता है।
बसिष्ठ-बुधो धर्मक्रेयासु निरंत कुरूजं। धार्मिक कार्यो में रूचि रखता है। रोगपीड़ित होता है।
गर्ग-मन्दभाग्यो बुधे पापे नरो बुध्दिमदानुग:। भाग्यवान् धार्मिको वापि शुभे सौम्ये तु धर्मगे ॥ यह बुध अशुम हो, तो भाग्य कम होता है और अपनी बुध्दि का गर्व होता है। यह शुभ हो, तो भाग्यवान और धार्मिक होता है।
वैद्यनाथ-सौम्ये धर्मगते तु धर्मधनिकः शास्त्री शुभाचारवान् | धार्मिक, धनी, शास्त्रों का ज्ञाता और सदाचारी होता है।
बृहद्यवनजातक-बुध उपकृतिधाता चारू जातादरोयो5नुचर धनसुपुत्रैर्हर्षयुक्तो विशेषात् । विकृतियु तमनस्को धर्मपुण्यैकनिष्ठो। हामृतकिरणजन्मा पुण्यभावे यदा स्यात्॥ परोपकारी, जानी सुन्दर, सेवकों से युक्त, धनवान, अच्छे पुत्रों से युक्त, आनंदी, धर्मनिष्ठ, सदा पुण्यकार्य करनेवाला होता है। कभीकभी इस के मन में कुछ विकृति उत्पन्न होती है। गोश्ष्यद्वे मातृ-मृतिर्मिन्दुसुत: | दंताश्च सौम्ये स्मृत: | २९ वे वर्ष माता की मृत्यु होती है। ३२ बे वर्ष भाग्योदय होता है |
जयदेव-बृहद्ववनजातक के समान ही मत है।
नारायणभट्ट-बुधे धर्मगे धर्मशीलो5तिधीमान्। भवेद् दीक्षित: स्वर्धुनीस्नानको वा । कुलोद्योतकृद् भानुवद् भूमिपालात् प्रतापाधिको बाधको दुर्मुखा नाम्॥ धर्मनिष्ठ, बुध्दीमान,दीक्षा लेनेवाला, गंगा मे स्नान करनेवाला, कुल को उज्वल करनेवाला, राजा से भी अधिक प्रतापी तथा दुर्जनों का पराभव करनेबाला होता है।
जीवनाथ-नारायणभट्ट के समान ही मत है।
आर्यग्रन्थकार-नवमसौम्यगृहे शशिनन्दने धनकलत्रयुतेन समन्वित: भवति पापयुते विषयस्थित: श्रुतिविमन्दकर: शशिजोद्यमी ॥ स्त्री तथा धन से संपन्न होता है। यह पापग्रहों के साथ हो, तो कुमार्ग की ओर जानेवाला, वेदों के प्रतिकूल तथा उद्यमी होता है। काशीनाथ -धर्मे बुधे धार्मिकश्च कूपारामादिकारक: | सत्यवादी च दान्तश्च जायते पितृवत्सरू:॥ धार्मिक, कुएँ ,बगीचे आदि बनानेवाला, सच बोलनेवाला, जितेन्द्रिय और पिता पर श्रध्दा रखनेवाला होता है। जागेश्वर-भवेद्धर्मशीलो घिया योगलील:श्रुतस्मार्तकंकर्म कर्ता धनादब:। भवेत्तीर्थ कृत्सुष्ठवक्ता यदा स्यात् बुध: पुण्याभावे नराणां विशेघात्॥धार्मिक, बुध्दिमान, योगाम्यास करनेवाला, वेद और स्मृतियों मे कहें हुए कार्य करनेवाला, धनवान, वक्ता और तीर्थयात्रा करनेवाला होता है। मन्त्रेश्बर-विद्यार्थाचारधर्म: सह तपसि बुधे स्यात् प्रवीणो८तिवाग्मी ॥ विद्यावान, धनवान, धर्माचार का पालन करनेवाला, प्रवीण तथा अच्छा वक्ता होता है। घोलप-धनलाभ विशेष होता है । स्त्री, पुत्र, घर आदि का सुख अच्छा मिलता है। शोभायुक्त, शूर, मित्रों से युक्त, श्रेष्ठ कवि, द्वेषरहित, सजमनों से अपना हित करनेवाला, साधुपुरूषों की कृपा से पुत्रपौत्र और धन आदि प्राप्त करनेवाला, कांतिमान, दाता और प्रख्यात होता है। गोपाल रत्नाकर-पुत्र बहुत होते हैं। संगीत प्रिय होता है। नृत्य, गीत,वाद्य मे रूचि होती है | दक्षिण्य अच्छा होता है। व्यभिचार करता है। हिललाजातकएकोनर्विशर्ति नवमो मातृरिष्ट करोति च। १९ वें वर्ष माता की मृत्यु होती है। यवनमत-दानशील, शुध्द सत्वगुणी, धर्मप्रेमी, राजा के समान शुभ कार्य करनेवाला और धनवान होता है।
पाश्चात्य मत-चपल, बुध्दिमान, भाषाशास्त्र में प्रवीण, शोधक बुद्धि का, नई चिजों की रूचि रखनेबाला होता है | इस बुध पर अशुभ दृष्टि हो , तो पागल के समान भटकना पड़ता है| शुभ योग में हो, तो भाषाशास्त्र, कलाओं का ज्ञान या रसायनशास्त्र में प्राविण्य मिलता है।
अज्ञात-बहुप्रजासिध्द:। बेदशास्त्रविशारद: | संगीतपाठक:। द्क्षिण्य-बान् धार्मिक: प्रतापवान् बहुलाभवान्। पितृदीर्घायु: | पापयुते पापक्षेत्रे पापवीक्षणात् पितृनाश: पितृक्लेशकरः | गुरूद्वेषी मन्दभाग्य:। बुध्दमतानुग:। भावधिपे बलयुते पितृदीर्घायु:। तपोध्यानशीलवान्। भाग्यवान्। धार्मिक:। सन््तति बहुत होती है। बेदशास्त्रो का पाण्डित होता है। संगीत पढाता है। विनयी, धार्मिक, पराक्रमी, भाग्यवान होता है। यह बुध पापग्रहों के साथ, पापग्रहों की राशि में या पापगृहों से दृष्ट में ह्ले, तो पिता को कष्ट होता है या मृत्यु होती है। वह गुरू का द्वेष करता है, भाग्य मंद होता है, बौध्द मत का स्वीकार करता है। नवमेश बलवान हो तो पिता दीर्घायु होता है। तपस्वी, ध्यानी, शीलवान होता है।
मेरे विचारइस स्थान के शुभ फल पुरूष राशियों के और अशुभ फल स्त्री राशियों के है। यवनजातक और हिलाजातक में माता की मृत्यु का फल कहा गया है और अज्ञात ने पिता की मृत्यु का फल कहा गया है। इनमें पहला मत ही योग्य हो सकता है | नवमस्थान से शनि का भ्रमण होते समय माता की मृत्यु का योग होता है । यवनजातक में ३२ बे वर्ष भाग्योदय का फल विशेष कहा गया है। इन सब फलों का वर्णन करते समय रवि के सम्बन्ध का विचार अवश्य करना चाहिए।
नवम भाव में बुधजातक पत्नी, पुत्र व धन संपत्ति के बारे में भाग्यशाली होगा। यदि बुध पापाक्रान्त है तो जातक की वेदों के प्रति अश्रद्धा, कुमार्गगामी दुराचारी, नीच व कठोर प्रवृत्ति वाला और परिश्रमी होगा।
-मानसागरी
वह विद्वान्, सम्पन्न, धार्मिक और धर्माचारी होगा। वह हरफनमौला तथा खुलकर बोलने वाला होगा।
फलदीपिका
जातक अत्यन्त समृद्ध, विद्वान्, सदाचारी, महान् परम्पराओं का उपासक, गुणवान् तथा प्रभावशाली ढंग से बातचीत करने वाला होगा।
- सारावली
जातक के बहुत संतान, वेद शास्त्र में निष्णांत, संगीत प्रेमी, धार्मिक, धनी, भाग्यवान् तथा यशस्वी, तार्किक-प्रवृत्ति का होगा। उसके पिता चिरंजीवी होगें।
- भृगु
जातक उच्च शिक्षा प्राप्त, संगीतज्ञ, बहु-संतति वाला, परोपकारी, व्यभिचारी, दार्शनिक, साहित्य प्रेमी, कल्पना-शक्ति का धनी, जिज्ञासु, तार्किक बुद्धिवाला, लोकप्रिय तथा प्रसिद्ध होगा।
-डॉ रामन
जातक गंगा-स्नान का पुण्य प्राप्त करने वाला, परिवार का मान सम्मान बढ़ाने वाला और पापियों का संहार करने वाला होगा।
-चमत्कार चिंतामणि
टिप्पणी
बलवान् और अच्छी स्थिति वाला। बुध जातक को वेदों, योगभ्यास, संगीत, साहित्य, धर्म आदि के प्रति रूचि रखने वाला, गणितज्ञ, किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित करने में सक्षम, भाग्यशाली तथा बहुत संतान वाला बनाता है। नवमस्थ बुध की स्थिति अच्छी कही गई है। यदि बुध पाप राशि में पापाक्रान्त हो और पापदृष्ट हो तो वह बुरे फल, पिता के प्रति अनिष्ट फल या शीघ्र मृत्यु हो और उसका भाग्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। यदि नवमेश बली और नवम भाव का कारक भी बलवान् हो तो जातक का पिता चिरंजीवी होगा। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ज्योतिषियों को अन्य ग्रहों की स्थिति भी ध्यान में रखनी पड़ेगी। भचक्र का नवम भाव स्वामी गुरू है। यहाँ बुध की स्थिति होने से वह बुध-गुरु की युति वाले फल देगा। नवमभाव धर्मभाव भी कहलाता है। बुध, मेघा और सीखने की प्रवृति का प्रतिनिधित्व करता है। यदि यह नवम भाव में हो तो जातक को शास्त्रज्ञ और वैदिक विद्वान बनाता है। वह शिक्षण के क्षेत्रों में रूचि रखने वाला और अनेक कार्यों में दक्ष होगा।
बुध व्यापार का ग्रह, शिक्षा का कारक, विद्या के विभिन्न क्षेत्रों में कुशल, वाक्पटुता, यात्राओं, साहित्य, गणित, संदेशवाहक, डाक विभाग, बुद्धिमत्ता, लेखन, उत्तरदायित्व को पूरा करने में सक्षम, प्रगति आदि का द्योतक है।
जातक बहुत बुद्धिमान, साहसी और शक्तिशाली होगा। उसके पास विभिन्न दर्शनीय वस्त्राभूषणादि होगें, प्रसिद्धि, समृद्धि, हँसमुख स्वभाव वाला होगा। वह सुदृढ़ और बुद्धिमान, प्रसन्नचित्त और साहित्य में रूचि रखने वाला होगा।
बुधग्रह स्व वर्ग, मूलत्रिकोण या उच्चराशियों में, यदि यह केन्द्र में स्थित हो 'भद्र योग' बनाता है और तो वह जातक को महान् व्यक्तित्व वाला बनाता है तथा महान् लेखक, सम्मानित और जीवन में सफलता प्रदान करेगा।
मेरा अनुभव-इस स्थान में बुध, मिथुन, तुला या कुंभ राशि में हो तो विवाह के बाद भाग्योदय होकर स्थिरता प्राप्त होती है। नौकरी या ब्यवसाय में प्रगति होती है , भाईबहिनों से मदद मिलती है। समाचार पत्रों के संपादक, प्रकाशक, लेखक, स्कूल के शिक्षक आदि ब्यवसायों मे जिन में जीवनभर विद्याव्यासंग करना पड़ता है, ये लोग प्रगति करते है। यह बुध मेष, सिंह या धनु मे हो, तो गणितज्ञ, ज्योतिषी, शिक्षक, क्लर्क आदि का ब्यवसाय करना पड़ता है। वृषभ, कन्या या मकर में हो, तो ब्यापार या व्यापारी के यहाँ नौकरी करनी पड़ती है। कर्क, वृश्चिक एवं मीन में हो, तो टेलीफोन, पोस्ट ऑफिस या अन्य सरकारी ऑफिसों में क्लर्क आदि की नौकरी करते है। पदार्थविज्ञान में प्रवीण होते है।
नवम स्थान में बुध शुभ होता है। ऐसा जातक बुद्धिमान, विद्वान, प्रखखर वक्ता,सदाचारी, धार्मिक, लेखक एवं संपन्न रहता है। यदि बुध निर्बल एवं पीड़ितहो तो जातक को अपनी बुद्धि का अभिमान रहता है। वह नास्तिक होता है।नवम स्थान स्थित बुध संतान की दृष्टि से शुभ फल प्रदान करता है।जातक समाज में विख्यात, सरकारी कर्मचारी एवं यशस्वी होता है। सत्कारयों के कारण उसका नाम मरणेपरांत भी रहता है। नवम स्थान का बुध आरोग्य
की दृष्टि से साधारण फलदायी होता है। वह रोगभयकारक होता है, ऐसा महर्षिवशिष्ठ का मानना है। कुछ आचायों के मतानुसार ऐसे जातक में चरित्र दोषएवं व्यभिचारवृत्ति पाई जाती है। पिता का सुख कम मिलता है या पिता केलिए जातक कष्टकारक रहता है। हमारी राय में बुध पापग्रह से युक्त या निर्वलहो तभी ऐसा होता है। संगीत जैसी ललित कला में जातक दक्ष एवं कलाप्रेमीरहता है।
यवन ज्योतिषियों के मतानुसार नवमस्थ बुध शुभ फल देता है परंतु जातकके मन में विकार होता है। 19वें एवं 29वें वर्ष में माता को कष्ट होते हैं।32वें वर्ष में भाग्योदय होता है।
कुछ आचारयों के मतानुसार जातक अति ईश्वरवादी, कर्मवादी, बौद्धमतावलंबी रहता है।
नवम भाव-नवमस्थ बुध जातक को लेखक, कवि, गायक, ज्योतिषाचार्य,विद्वान, भाग्यवादी, यशस्वी तथा व्यवसाय में रुचि लेने वाला बनाता है। जातकसद्चरित्र होता है। किन्तु संदेही स्वभाव का भी होता है। यश, मान, कीति, धन,स्त्री, पुत्र, विद्वानों का संग उसे मिलता है, परन्तु भाग्य की स्थिति डांवाडोल होतीहै। जातक कुल रीतियों का पोषक होता है। प्रायः देखा गया है कि कुंडली में चन्द्र,गुरु व केतु की स्थिति शुभ हो तो नवमस्थ बुध पूर्ण शुभ प्रभाव देता है। अन्यथाजातक शक्की, वहमी या मनहूस भी हो सकता है।
लाल किताब के अनुसार बुध पाप प्रभाव में (राशि/दृष्ट/युति द्वारा) हो तोजातक के पिता के लिए कष्टकारी होता है। पिता की मृत्यु भी सम्भव होती है।भाग्य साथ नहीं देता और जातक ब्राह्मण तथा गुरु व देवता से द्वेष रखता है। वायुतत्त्व राशि का बुध विवाहोपरांत भाग्योदय करता है। नौकरी या व्यवसाय में प्रगतिदेता है। जल तत्त्व राशि में जातक को सरकारी नौकरी में क्लर्क बनाता है। पृथ्वीतत्त्व राशि में प्राइवेट नौकरी कराता है। अग्नि तत्त्व राशियों में बुध, बैंककर्मी,C.A., शिक्षक या ज्योतिषी बनाता है अथवा सम्पादन, लेखन या प्रकाशन कार्य सेजोड़ता है।
बुध नौवें घर में
बुध नौवें घर में बृहस्पति के असर को खराब कर देता है। बुध को यहाँ ‘जादू का भूत’ कहा गया है जिसका साया दूसरों को नजर नआए।
नौवें घर में बुध को ‘कोढ़ी व राजा’ कहकर पुकारा गया है यानीअकेला हो तो इतना बुरा फल नहीं देता किन्तु यदि और ग्रहों के साथहो तो इसका असर बहुत हद तक मनहूस ही होगा। नौवें घर के बुध कीहालत को स्पष्ट तौर पर समझने के लिए न. 11 के ग्रहों को देखनाहोगा। अगर ग्याहरवाँ घर खाली हो तो बुध ‘बेतुखम-बेहया लौंडी' जैसाअसर देगा, जो अपने बाप को ही बदनाम कर दे।
बुध 9 के समय यदि न. 11 में चन्द्र-केतु न हो तो ये बुध बहुतधोखेबाज होगा, जो जीवन के हर कदम पर धोखा देता जाएगा।
बुध 9 के समय यदि बृहस्पति अकेला 8, 6, 10 या 11वें घर में होतो ऐसे व्यक्ति की आयु भी कम हो सकती है या उसकी औलाद या स्त्रीका फल भी मन्दा ही होगा।
बुध 9 के समय जब खाना न. 5, 6, 7 में चन्द्र या बृहस्पति यादोनों हों तो व्यक्ति की उम्र लम्बी होगी, मगर उसके गृहस्थ-जीवन में औरऔलाद के सम्बन्ध में खराबियाँ पैदा होंगी।
नवम भाव: बुध नवम भाव में हो तो जातक चपल, भाषाविद् ओर बुद्धिमान होता है। नए-नए विषयों पर शोध करने की प्रवृत्ति होती है। अशुभ प्रभाव में हो तो अर्धविक्षिप्तों जैसी हालत में यहां-वहां भटकता है। स्त्री राशि का शनि नवमस्थ हो तथा गोचर का शनि जब उस पर से भ्रमण करे तो माता की मृत्यु होती है। वायु तत्त्वीय राशि का बुध नवमस्थ हो तो विवाहोपरान्त ही भाग्योदय हो पाता हे। जातक नोकरी या व्यवसाय कुछ भी करे, प्रगति होती है। विशेष रूप से बौद्धिक कार्य करने वाले जैसे शिक्षक, लेखक, प्रकाशकादि उन्नति को प्राप्त होते हैं। अग्नि राशि का बुध होने से जातक की रुचि गणित में विशेष होती है, ज्योतिष भी गणित से संबंधित है। फलत: जातक ज्योतिषी, मुनीम (एकाउंट क्लर्क), गणित का शिक्षक हो तो प्रगति करता हे। जल तत्त्वीय राशि का बुध नवमस्थ हो तो जातक प्राय: सरकारी अथवा अर्धसरकारी विभाग में लिपिक होता है। पृथ्वी तत्त्वीय राशि का बुध हो तो जातक या तो व्यवसायी होता है अथवा किसी प्राइवेट फर्म में मुनीम होता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, चतुर,विद्वान, धार्मिक, दानी-धर्मी एवं समाज में प्रख्यात रहता है। बचपन में स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, बढ़ती उम्र के साथ उसमें सुधार आता है!
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न,पराक्रमी, सच्चरित्र, जनप्रिय, चतुर, वाचाल एवं सुखी होता है। जातक की मांचरित्रवान एवं सुस्वभावी होती है। माता के गुण पुत्र में आते हैं। विदेश यात्राका मौका मिलता है। जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है। जातक सरकारीकर्मचारी होता है। इसके मित्र एवं शत्रु बहुत होते हैं।
3. मिथुन-मिथुन राशि का बुध नवम स्थान में हो तो राजयोग बनता है।ऐसा जातक संपन्न, सुखी एवं यशस्वी होता है। संपत्ति लोककल्याण में एवंपरोपकार में खर्च होती है।
4. कर्क कर्क राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक सुशिक्षित,विद्वान, नास्तिक, आचरणहीन, लंपट, चोर एवं व्यभिचारी होता है। आर्थिकदृष्टि से जीवन संपन्न रहता है। शरीर में विकार रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक यशस्वी, सरकारीकर्मचारी, सच्चरित्र, सुखी, ललितकला एवं शिल्प शास्त्र में पारंगत होता है।ये गुण जातक को मां से विरासत में मिलते हैं। पत्नी अच्छी मिलती है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध नवम स्थान में हो तो राजयोग बनता है।जातक वाद-विवाद करनेवाला, सुखी, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, यशस्वी किंतुकठोर स्वभावी होता है। आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। खनिज पदार्थएवं वनस्पति विषयक व्यापार में जातक को धन मिलता है। बुध पाषग्रह केसाथ हो या अन्य कारणों से दुर्बल बना हो तो जातक को दुर्घटना का डररहता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक अपने कुल काचहेता, प्रभावी, यशस्वी, वाद-विवादपटु, उत्तम वक्ता, तार्किक, बुद्धिमान,संगीत-नाट्यादि कलाओं में प्रवीण या कला में रुचि रखनेवाला होता है। जन्मसे ही या बाद में दुर्घटना के कारण शरीर में विकार रहता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न,सुखी एवं आस्तिक होता है। वह ललितकला एवं नाट्यशास्त्र में प्रवीण रहताहै। पत्नी अच्छी मिलती है। बुध पापग्रह से युक्त हो तो पत्नी से झगड़ा होतारहता है।
9. धनु-धनु राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक सहोदरों कापालनकर्ता रहता है। किंतु उसे पिता, पत्नी इत्यादि परिवारजनों से सुख-सहयोगकम मिलता है। पिता में कुछ दुर्गुण होते हैं। जातक को आर्थिक दृष्टि से बहुतसे उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं, स्त्रियों के माध्यम से भाग्योदय होता है लेकिनशत्रु अधिक होते हैं। लकड़ी, वनस्पति एवं खनिज पदार्थों के व्यापार में जातकको लाभ होता है। बुध पापग्रहों से युक्त हो तो पैरों में विकार उत्पन्न होता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध नवम स्थान में हो तो उत्तम एवं श्रेष्ठफलदायी होता है। जातक महापराक्रमी, यशस्वी, प्रख्यात, संपन्न, उत्तम वक्ता,वादविवाद में दक्ष, विद्वान एवं संगीत व नाटक कला का रसिक होता है।
11, कुंभ-कुंभ राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान,सरकारी कर्मचारी, जनप्रिय, चतुर, श्रेष्ठ वक्ता एवं सुखी तथा संपन्न रहता है।जातक का जन्म स्थान से अन्यत्र भाग्योदय होता है, विदेश यात्रा करनी पड़तीहै। जातक की आंखें सुंदर होती हैं और वह पिता का आज्ञाकारी रहता है।
12. मीन-मीन राशि का बुध नवम स्थान में हो तो जातक उदार, दानशील,सहोदरों का भरण-पोषण करनेवाला होता है। पिता के सुख में न्यूनता रहतीहै। स्त्री के माध्यम से भाग्योदय होता है। परोपकार एवं जनहित के कायों मेंपैसा खर्च होता हैl
1. माथे पर हल्दी का टीका लगावे।
2. बरगद के पेड़ के नीचे घी कादीपक जलावे।
3. मिट्टी के बरतन में शहद व घी घर के कोने में जहाँअंधेरा हो वहां दबा रखे।
4. हरा रंग काम में न लेवे।
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10) दशम् भाव - दशाम स्थान (कर्म भाव)
दशम स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-सुखशौर्यभाक् खे । सुखी तथा शूर होता है।
कल्याणवर्मा-प्रवरमतिकर्मचेष्ट: सकलारंभो विशारदो दशमे। धीर: सत्वसमेतो विविधाकलंकार सत्वभाक् सौम्ये। श्रेष्ठ बुध्दिमत्ता के काम करनेवाला, कार्य का आरंभ करने में कुशल, घैर्यशाली, बलवान, विविध आभृषणों से युक्त और सुखी होता है।
वसिष्ठ-रूपान्वितत्वं बुध: | रूपवान और सुखी होता है।
गर्ग-धीमान् धीरो धर्मचेष्टो धर्मवृत्तियुत: सदा | सात्विक:कर्मगे सौम्ये नानालंकारवान्। श्रेष्ठ बुध्दिवाला, पैर्यशाली, धार्मिक,सात्विक बुध्दिवाला, विविध आभूषणोंसे युक्त होता है।
बैद्यनाथ-व्यापारगे चंद्रसुते समस्तविद्यायशोवित्तविनोदशील: | सर्व विद्यावान, किर्तीमान, धनवान एवं विनोदी होता है। ु
नारायणभट्ट-मितं संबदन् नो मितं संलभेत प्रसादादिवैकारि सौराजवृत्ति:बुधे कर्मी पूजनीयोविशेषात्। पितु:संपदो नीतिदंडाधिकारातू | यह कम बोलता है किंतु इसे लाभ अच्छा होता है। राजकीय अधिकारी होता है। पिता की संपत्ति के कारण इसे अच्छा सन््मान मिलता है।
काशीनाथाचार्य-दशमस्थे बुधे जातो धनधान्ययशोन्वित:। बहुभ्ाम्यश्च विजयी कान्तियुक्तश्च मानव: ॥ धनधान्य और किर्ती से युक्त, भाग्यवान, विजयी और का न्तिमान होता है।
' घृहद्यवनजातक-ल्लाताउत्यन्तश्रेष्टकर्मा मनुष्यों मानासंपत्संयुतो शजमान्य: | चंचललीलाबाग्विलासाधिशाली मानस्थाने बोधने बर्तमाने॥ प्लानी, श्रेष्ठ कार्य करनेवाला, विविध बैभव से संपन्न, राजमान्य, चंचल लीला करनेवाला, बोलने मे कुशल होता है। विदेही गोकुशंरध्दनं च। १६ दे वर्ष धनप्राप्ति होती है।
जागेश्वर-बुधे काव्यविद्या तथा शिल्पकैंर्वा सदा वाहनेर्मातृसौख्यो नरः। काव्य करने मे कुशल होता है। शिल्पकला से उपजीविका करता है। बाहनों का सुख तथा माता का सुख अच्छा मिलता है।
आर्यग्रन्थकार-गुरूजनेन हिते निरतो जनो बहुधनो दशमे शशिनन्दने। निजभुजार्जितवित्तुरंगमो बहुधनैर्नियतो5मितभाषण: ॥ बड़े.बूढो का हित कलनेवाला, धनवान, अपने परिश्रम से धन प्राप्त करनेवाला, घोड़े रखनेवाला और बहुत बोलनेवाला होता है। . ह
जयदेव-इसका मत अब तक के वर्णनो मे आ गया है।
पुंजराज-सौम्ये काव्यकलापविधिना शिल्पेन लिप्या बणिक्लोकैः क्ली-बजनैर्धनर्धनचयं यत्साहसैरूधमै:॥ कविता करने से, शिल्पकला हे, लेखन से, व्यापार से, क्लीबों की सहायता से और साहस से धनप्राप्ति होती है।
घोलप-मिन्र, माता, राजा,धन और कुट्रंब का सुख मिलता है। वेदों का अध्ययन करता है। धर्म और नीति का अनुसरण करता है। पुण्य कार्य करनेवाला, ज्ञानी, पूज्य, कवि, राजमान्य और सत्संग करनेवाला होता है।
गोपाल रत्नाकर-मंगल॑, प्रिय और शुभकार्य करता है। किसी भी ते को सिध्द करता है। व्यवहार में अति आसक्त द्वोता है, आँखो के रोग हैं। हिलाजातक-दिगीशस्थः सप्तदशे। १७ वें वर्ष धनलाभ होता है। यवनमत-कीर्तिमान, धनवान, राजा के समान वैभव से संपन्न होता है। पाश्चात्य मत-यह भाषा तथा व्यापार में यशस्वी होता है। स्मरणशक्ति अच्छी होती है। प्रसंग के अनुकुल बोलने का करीशल्य होता है । गणित और भाषाशास्त्र में प्रवीण होता है। दलाली, लेखन और साहकारों में अच्छा यश मिलता हैं। ये शुभ फल तभी मिलते है , जब यह बुध स्वगृह में उच्च का ह्वेता है। अज्ञात-अ्टविंशतिवर्ष नेत्ररोगवान्। अरिमूढपापयुते कर्मविध्नवान्। दुष्कृति: अनाचार:। २८ वें वर्ष आँख के रोग होते है। शत्रु ग्रह की राशि मे या पापग्रह के साथ हो, तो कार्य मे विघ्न होता है। अशुभ कर्म करता है। दुराचारी होता है। मेरे बिचार-प्राय: सभी शास्त्रकारों ने इस स्थान में बुध के फत * बहुत अच्छे कहे है | यवनजातक में १९ बे वर्ष और हिलाजातक मे १७ वें वर्ष धनलाभ का फल कहा गया है। इस आयु मे अपने परिश्रम से धनलाभ होना मुश्किल है , किन्तु वारिस की हैसियत से या अकस्मात् लाभ होने से धन मिल सकता है। जागेश्वर ने उत्तम मातृसौख्य का फल कहा, वह ध्यान मे रखने योग्य है। अज्ञात मे २८ बे बर्ष नेत्रोग का फल कहा है। अति वाचन या अध्ययन से ऐसा हो सकता है। २८ बे वर्ष से मंगल विशेष प्रभावी होता है, अतः सिर मे उष्णता अधिक होने से भी नेत्ररोग हो सकते है, किंतु दशमस्थान का और आँखो का संबंध क्या हो सकता है। शास्त्रकारों ने जो शुभ फल दिये है, बे पुरूष राशि के है और जो अशुभ पल है वे स्त्री राशी के है।
(x) दशम भाव में बुध
जातक गुरुजनों, संतो तथा सज्जनों के संग के प्रति रूचि रखने वाला, धनार्जन में सक्षम और लोकोपकारक, धार्मिक व सद्कार्यों में व्यय करने वाला तथा मितभाषी होगा।
-मानसागरी
जातक विद्वान् सशक्त, प्रसन्नचित्त, अपने शब्दों के प्रति महत्व को जानने वाला, गुणवान्, चतुर तथा सभी कामों में सफलता अर्जित करने वाला होगा।
-फलदीपिका
दशम भाव में बुध की स्थिति विलक्षण प्रतिभा और सम्मानजनक कार्य करने वाला हाथ में लिए गए कामों का आनन्द लेने वाला, बुद्धिमत्ता, साहस शक्ति और गुणगान्, विभिन्न आभूषणों को धारण करने वाला होगा।
-सारावली
जातक साहसिक कार्यों को करने में सफल, धैर्यवान, महान् चिंतक, चतुर्दिक्, मान-प्रतिष्ठा वाला और 28वें वर्ष में नेत्र से पीड़ित होगा।
-भृगु
जातक दृढ़-निश्चयी, भाग्यशाली, जीवन का आनन्द लेने वाला, बुद्धिमान, दृष्टि-विकारग्रस्त, चुस्त, प्रसन्नचित्त, धर्मार्थ कार्य करने वाला और सर्वजन हितैषी होगा।
-डॉ रामन
वह पैतृक संपत्ति प्राप्त करता है।
-चमत्कारचिंतामणी
बुध व्यापार, शिक्षा तथा कलादि के प्रतिनिधित्व के कारण व्यक्ति को आर्कषक व्यक्तित्व, प्रसन्नता, प्रसिद्ध, संपत्ति, भाग्य, आय के विविध स्रोतों, न्यायकारिता, संतान से प्रसन्नता आदि प्रदान करता है। फल के विषय में पुनः अन्य ग्रहों के अतिरिक्त बुध की स्थिति, युति-दृष्ट्यादि पर भी ध्यान देने को कहा जाता है।
ग्यारहवें भाव में बुध जातक की शास्त्रों के प्रति रूचि बढ़ाता है। वह सदा अपने परिवार के कल्याण की चिंता करता है। वह समृद्ध, शारीरिक रूप से कमजोर, समुचित यौनाकर्षण वाला, स्त्रियों में लोकप्रिय, आकर्षक, गेंहुआ रंग, बुद्धिमान, शीघ्र निर्णय लेने वाला होगा।
-मानसागरी
जातक दीर्घायु, अपने शब्दों पर दृढ़ रहने वाला, समृद्ध तथा प्रसन्नचित्त, सुख सुविधाओं तथा सेवकों से युक्त होगा।
-फलदीपिका
जातक धनी, मैत्री भाव से काम करने वाला, विद्वान, प्रसन्न, विविध प्रकार की खुशियों से युक्त, प्रसिद्ध व दीर्घजीवी होगा।
-सारावली
जातक पवित्र कार्य करने वाला, अनेक स्रोतों से धनार्जन करने वाला, 21 वर्ष की उम्र में संतति लाभ प्राप्त करने वाला और सहृदय होगा।
- भृगु
जातक समृद्ध, प्रसन्न, सफल ज्योतिषी, गणितीय क्षमताओं से सम्पन्न, प्रसिद्ध व्यक्तियों से मित्र भाव रखने वाला, कई भूखंडों का स्वामी, तार्किक और वैज्ञानिक मनोवृत्ति वाला व सफल व्यापारी होगा।
-डॉ रामन
बुध की एकादश भाव में स्थिति होने के अलावा संपत्ति के कोई लक्षण नही।
-चमत्कार चिंतामणि
टिप्पणी
जातक का स्वभाव सहृदयतापूर्ण तथा मित्रवत् होगा। वह सभी तरह के लोगों के साथ घुलने मिलने वाला होगा। बुध ग्यारहवे भाव से पंचमभाव पर दृष्टि डालता है। जो कि शिक्षा, मेधा और चिंतनशीलता का भाव है। इस पर बुध की दृष्टि जातक को प्रसन्नचित्त, शिक्षित, बुद्धिमान और गुणों के कारण प्रसिद्ध करती है। वह आकर्षक व्यक्तित्व वाला, पर्याप्त धनवाला, पुत्री संतान का आधिक्य और लड़कियों के विवाहादि में पर्याप्त धन खर्च करने वाला होगा। वह रोगमुक्त, कला वेदादि में पारंगत और चिरंजीवी होगा। उसके वैवाहिक जीवन में बहुत कम शारीरिक आनन्द व भोग होंगे।
मेरा अनुभव-हस स्थान में अकेला बुध है, ऐसी कल्पना कर, फल कहता हूँ। मेष, सिह, धनु इन मे गणितज्ञ, टंकलेखक,अध्यापक, इंजीनियर विभाग मे क्लर्कस् ये व्यवसाय होते है | मिथुन, तूल, कुंभ-सर्बे डिपार्टमेन्ट, PWD., पोस्टल डिपार्टमेन्ट में फ्लर्कस। वृषभ, कन्या मकर“ भाषाशास्त्रज्ञ, व्यापारी,commision agents, travelling agents ( कर्क, वृश्चिक, मीन-समाचारपत्र के संचालक, संपादक, मुद्रक, प्रकाशक स्टेशनरी दुकान, कोर्ट फी स्टेंप ब्हेन्डर्स आदि होते है। पिता भी कही क्लर्क रहते है। वे सुख से पेन्शन का उपभोग लेते रहते है| यदि बुध यहां प्रबल होगा, तो मातृसौख्य प्रचुर मात्रा में मिलता है।
दशम स्थानस्थ बुध निश्चित रूप से अच्छे फल प्रदान करता है। ऐसा जातकसुखी, संपन्न, बुद्धिमान, धैर्यवान, विनोदी एवं चंचल, कम बोलनेवाला,आस्तिक, समाज में प्रतिष्ठित रहता है। पैतृक परंपरा से वह सम्मान पाता है।दशम स्थान में स्थित बुध का संबंध न्याय एवं दंड विधान से जुड़ा हुआहै। ऐसा जातक न्यायशास्त्री (जज) या वकील बनता है। जातक को दंड देनेका या क्षमा करने का अधिकार होता है। सुधारक, लेखक, अध्यापक,मैकेनिकल इंजीनियर एवं व्यापारी भी ऐसे ही जातक होते हैं।28वें वर्ष में जातक को नेत्ररोग होने की संभावना रहती है। यवनज्योतिषविदों के मतानुसार ऐसा जातक वाचाल, सरकारी कर्मचारी एवं संपन्नरहता है। 17वें एवं 18वें साल में धनलाभ होता है।
पाश्चात्य ज्योतिषियों के मतानुसार जातक गणित, भाषाशास्त्र एवंव्यापारशास्त्र में पारंगत होता है, स्मरणशक्ति अच्छी होती है। वह समय देखकरबोलने में चतुर रहता है। इसी कारण से ऐसे जातक दलाली एवं बैंकिंग केकामों में सफल होते हैं। उनका जीवन संपन्न एवं सुखी होता है।
बुध पापाक्रांत होकर दशम स्थान में बैठा हो तो बुध के शुभ फलों में न्यूनताआती है। ऐसा भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों ही आचायों का मत है।
दशम भाव-दसवें भाव में बुध हो तो जातक वाक्पटु, चतुर, भाग्यवादी,लोकप्रिय, सम्मानित, पढ़ने का शौकीन, विद्वान, न्यायप्रिय, जमींदार व माता-पिताका आज्ञाकारी बनाता है। ऐसा जातक प्रसन्नचित्त रहता है। पैतृक सम्पत्ति प्रासकरता है। नौकरी करे तो नम्र स्वभाव का कुशल प्रशासक होता है। निम्न स्तर सेसंघर्ष करके उच्च पद पर आता है। सत्यवादी या छल-कपट से दूर रहने वालाहोता है।
लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक यदि शराब तथा मांस का सेवन करे तोउसे शनि से सम्बन्धित वस्तुओं (जैसे मकान आदि) के सम्बन्ध में अशुभ फलप्राप्त होते हैं। अग्नित्त्व राशि में बुध हो तो जातक एकाउन्टेंट/C.A., गणितज्ञ यागणित का अध्यापक या गणक (कैशियर) आदि होता है। पृथ्वी तत्त्व राशियों मेंजातक सेल्समैन, सेल्स एजेन्ट, कमीशन एजेन्ट, व्यापारी आदि होता है। जलराशिमें जातक लेखक, प्रकाशक या पत्रकार होता है।
बुध दसवें घर में
दसवें घर के बुध को ‘नास्तिक’ या ‘भूत की खुराक’ कहकर भीपुकारा गया है। इसे ‘जी-हजूरिया’ यानी दूसरों की जी-हजूरी करने वालाभी कहा गया है।
दसवें घर में बुध के समय आदमी शरारती और मतलबपरस्त होताहै और उसमें दूसरों के साथ चालबाजी करने की आदत भी होती है।लेकिन वह दूसरों की हाँ में हाँ मिलाने में या दूसरों की खुशामद करने मेंमाहिर होता है। उसकी जुबान का शब्द या उसका राग ऐसा मीठा होताहै कि कानकटे फिर भी छोड़ा न जा सके।
बुध न. 10 के समय जब चन्द्र खाना न. 1, 3, 4 और 5 में हो तोतिजारती कामों और घर के व्यक्तियों की बरकत होगी। मगर परिवार की औरतें और बच्चों के लिए इसका फल इतना शुभ नहीं होगा।
बुध न. 10 के समय जब दूसरा घर खाली हो तो ऐसा व्यक्तिसमुद्री यात्राओं से बहुत लाभ कमाएगा, हुनरमन्द होगा और वह वेशर्मस्वभाव का कभी नहीं होगा।
बुध 10 के समय जब शनि की हालत शुभ हो तो दोनों का ही फलअच्छा हो जाएगा।
बुध 10 के समय यदि शनि मन्दा हो या शराब पीने से मन्दा करलिया जाए, तो बुध अब साँप का फन होगा, यानी जैसा मन्दा शनि होगावैसा ही बुध हो जाएगा। पिता के जीवन का कोई भरोसा न होगा औरव्यक्ति की खुद अपनी नजर का भी कोई एतबार न होगा।
दसवें घर में बुध के समय जब खाना न. 8. अशुभ हो रहा हो तोबुध का फल दो गुना अशुभ हो जाएगा और उसकी हालत बहुत दुखियाही होगी।
दशम भाव: दशम भाव में बुध की स्थिति जातक को व्यवसाय की ओर प्रेरित करती है। बुध बलवान हो तो जातक व्यापार से, अल्प बली हो तो बैंक आदि में नौकरी करके जीविका चलाता है। स्मरणशक्ति प्रबल होती हे, भाषा कला में प्रवीण होता है, गणित और साहित्य दोनों विषयों का विशेषज्ञ होता है। लेखन, कमीशन के कार्य अथवा ब्याज से अच्छा धनार्जन होता है। वर्जित फल उच्चस्थ बुध के होने से मिलते हैं। पृथ्वी राशि का बुध हो तो बड़ा व्यवसायी, प्रसिद्ध दलाल (कमीशन एजेंट ) , वायु राशि का बुध दशमस्थ होने से जातक डाक-तार विभाग, सर्वे या पी.डब्ल्यू डी. आदि में नौकरी कर लेता है। अग्नि राशि में हो तो जातक गणितत्ञ, इंजीनियरिंग का व्याख्याता अथक क्लर्क होता है। जल राशि का हो तो जातक प्रकाशक, मुद्रक, सम्पादक अथवा स्टेशनरी का व्यापारी होता है। इस स्थान में प्रबल बुध मातृसुख में वृद्धि करता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक चर्त्रवान,परोपकारी एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न होता है। महर्षि लोमश के मतानुसारजातक के पुत्र-सुख में बाधा रहती है। यवनाचार्य एवं महर्षि गर्ग के मतानुसारजातक का अपनी मां से बर्ताव अच्छा नहीं रहता। मां का स्वभाव कुटिल रहताहै। जातक सहोदरों का पालनकर्ता एवं समाज में प्रतिष्ठित रहता है।
2. वृषभवृषभ राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, सरकारीकर्मचारी, सुस्वभावी एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न होता है। महर्षि लोमश केअनुसार जातक पुत्रसुख में बाधा महसूस करता है। यवनाचार्य एवं महर्षि गर्गके अनुसार जातक मातृभक्त रहता है किंतु पिता से अलगाव रहता है।
3. मिथुनवृषभ राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान,सरकारी कर्मचारी, कवि, संपन्न एवं मातृभक्त होता है। उसे माता-पिता एवंननिहाल का सुख पर्याप्त मिलता है। यह बुध उच्च राजयोगकारक रहता है।
4. कर्क-कर्क राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, परोपकारी, संपन्न, यशस्वी एवं सुखी होता है। महर्षि लोमश केमतानुसार जातक को पुत्र सुख में बाधा रहती है जबकि यवनाचार्य एवं महर्षिगर्ग के मतानुसार मां के साथ उसकी मतभिन्नता रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक नौकरी करताहै, संगत अच्छी नहीं रहती। माता का सुख अल्पकालीन रहता है और पितासे मतभिन्नता रहती है। जातक धनवान एवं जीवन में सफल रहता है। महर्षिगर्ग के अनुसार उसकी संतान वर्णसंकर रहती है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक कपटी,कटुभाषी, कामातुर, यशस्वी एवं सुखी होता है। दशमस्थ बुध राजयोगकारकहोते हुए भी जातक शासन पर टीका-टिप्पणी करता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक सरकारी नौकर,सरकारी कर्मचारी, संपन्न, सत्कर्मी एवं मातृभक्त होता है। पिता के सुख मेंन्यूनता रहती है। संतान की दृष्टि से यह बुध अशुभ फलदायी रहता है।अधिकांश ज्योतिषविदों के मतानुसार ऐसे जातक को पुत्र दत्तक लेना पड़ता है।8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक अपनेभाई-बहनों में श्रेष्ठ रहता है, सरकारी नौकरी करता है। सुखी, संपन्न एवंयशस्वी होता है किंतु संतान अच्छी नहीं होती। माता के सुख में कमी रहतीहै। महर्षि गर्ग के मतानुसार संतान वर्णसंकर होती है।
9. धनु-धनु राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक कुटिल, कामातुर,अस्थिर विचारों का एवं कटुभाषी होता है। मां का सुख पर्याप्त प्राप्त होताहै और जातक की आंखें सुंदर रहती हैं।
10. मकर-मकर राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक अपने परिवारका भरण पोषण उत्तम रीति से करता है। किंतु माता-पिता का सुख उसे कममिलता है। जातक सुखी, संपन्न, सरकारी कर्मचारी रहता है। संतान सुख मेंबाधा रहती है। उसे पुत्र दत्तक लेना पड़ता है।
11. कुंभ-कुंभ रशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक स्त्रियों काप्रिय रहता है। वह अपने सभी सहोदरों में योग्य एवं प्रसिद्ध होता है, सूरकारीनौकरी करके जीवनयापन करता है। जातक संपन्न, सुखी, यशस्वी एवं मोतुसुखसे युक्त होता है। संतान सुख में बाधा रहती है।
12. मीन-मीन राशि का बुध दशम स्थान में हो तो जातक विद्वान, सरकारीकर्मचारी, धनवान, परोपकारी एवं कवि होता है। माता-पिता का सुख उसेपर्याप्त मात्रा में मिलता है
1. शराब व मांस काम में लिया तो बर्बाद होंगे।
2. मनी प्लांट लगावे।
3. नास्तिक व्यक्ति की मित्रता न रखें।
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11)एकादशभाव -एकादश स्थान (लाभ भाव)ग्यारह बे स्थान में बुध के फल
आचार्य व गुणाकार-लाभे प्रभूतधनवान्-अति संपत्ति प्राप्त होती है।
कल्याणवर्मा-धनवान् विद्येयभृत्य: प्राज्न: सीख्यान्वित:। एकादशे बुधे स्थाने बब्हायु: ख्यातिमान् पुरूष:॥ धनवान, दासदासियों से युक्त, ज्ञानी, विविध सुखोंसे युक्त, दीर्घायु और प्रख्यात पुरूष होता है। वशिष्ठ-सौम्यो विवेकसुभंग:। ज्ञानी और भाग्यवान् सौख्यम् सौख्यवान। वैद्यनाथ-सौम्ये लाभगृहगते निपुणधीर्विद्यायशस्वी धनी ॥ गर्गस्त्रीवलभोतिगुणवान, मतिमान्, स्वजन प्रिय:। लाभगे सोमतनये मंदाओ्नि समपद्यते॥ स्त्रियो को प्रिय, अति गुणवान, बुध्दिमान, अपने लोगों को प्रिय होता है, भूख कम होती है।
बृहद्यवनजातक-भोगासक्तो 5त्यन्तवित्तो बिनीतो नित्यानंदश्चारूशीलो बतिष्ठ:। नानाविद्याभ्यासकृन्मानव: स्यालाभस्थाने नन््दने शीतभानो: | विविध तरह के भोगों में आसक्त, अति धनवान, नग्र, नित्य आनंद मैं रहनेवाला, सुशील, बलवान, विभिन्न प्रकार की विद्याओ का और विषर्यों का जिज्ञासु होता है | ज्ञ:पंचवेदे-धनम्-यह आयु के ४५ वें वर्ष मे धनप्राप्ती कराता है|
नारायणमट्ट व जीवनाथ-विना लाभभाबे स्थिते मेबजातं न लाभो म लाकण्यमानृण्यमस्ति॥ कृत:कन्यकोद्वाहदानं च देयं कथ भूसुरास्त्यवततुष्ण भवन्ति | जिसके लाभस्थान में बुध नहीं, उसे द्रव्यलाभ, सौंदर्य और ऋामुक्तता ये बातें सिध्द नही हो सकती। उसकी कन्या के विवाह में दहेज देने के तिए संपत्ति कहा से प्राप्त झेगी? उसके घर ग्रम्हण कैसे संतुष्ट हो सकेंगे ? अर्थात् उपरोक्त स्थान में यदि बुध होगा, तो ये सभी बाते प्राप्त होंगी।
आर्यग्रंथकार-श्रुतमतिर्निजवंशहित: कृशो बहुधन: प्रमदा जनवलभ: | रूचिरनीलवपुर्गुणतोचनो भवति चायगते शशिजे नर:। उत्तम बुध्दि का, अपने वंश का हितकर्ता, शरीर से कृश, अति धनबान, स्त्रियों को प्रिय, काले बर्ण का और सुंदर आँखोवाला होता है। जयदेव ने सभी फलादेश अन्य शास्त्रकारो जैसे कहे है।
काशीनाथाचार्य-लाभे बुधे नित्यलाभों नीरोगश्च सदासुखी
जनानुराग-वृत्तिश्च कीर्तिमानपि जायते। नित्य लाभ होते है। रोगरहित, सदा ही सुखी, लोंगो से प्रेमबर्ताव करनेवाला, कीर्तिमान होता है। मंत्रेश्वर-बव्हायु: सत्यसन्धो-दीर्घायु और सत्यवादी होता है | जागेश्वर-अन्य शास्त्रकारों के समान ही शुभ फल कहे हैं। पुंजराज-शशिजे कन्याप्रज: स्यात् तथा। इसे लडकियाँ ही होती हैं। दशमस्थान में इस ग्रंथकार ने जो व्यवसाय का फल दिया है , वही इस प्थ्ान में भी दिया है। घोलप-राजा की कृपा से अपने बांछित कार्य पूर्ण करनेवाला, शुर, जस्वी, सह्वुणी, पंडित, श्रेष्ठ, आमरण स्त्रीसुख प्राप्त करनेवाला और ग्रितप्रिय होता है ॥& गोपालरत्नाकर -खेती बढ़ानेवाला, व्यवहार में आसक्त, गणितज्ञ, आँखो के रोग होते है ।
हिलाजातक-यवनजातक के समान मत है। यवनमतं-धनवान,अच्छे पुत्रो से युक्त, समझदार और राजा को प्रिय होता है। | पाश्चात्यमत-यह बुध बलवान ही तो सब तरह से लाभ होता है और निर्बत हो, तो नुकसान होता है। राशियों के अनुसार इसके फल इस प्रकार हैमेष-झगडालू । वृषभ-दुराग्रही। मिथुन-चपल। कर्क-नीच॑ लोगो का मित्र। सिंहअच्छे लोगों का मित्र | कन्या-विद्वान और शीलवान | तुलाकलाकुशल लोंगों का मित्र। वृश्चिक-झगड़ालू और ठग। धनुदांभिक, अभिमानी | मकर-कपटी, अविश्वासी | कुंभ-विश्वासयोग्य मित्र | मीन-गप्पे हौकनेवाला, जिज्ञासू। अज्ञात-बहुमंगलप्रद: । शिल्पलेखनव्यापारयोगे अनेकप्रकारेण धनवान्। एकोनविशतिवर्षादुपरि क्षेत्रपुत्रधनवान् दयावान् । पापक्षे पापयुते हीनमूलेन धनलोप: । उच्चे स्वक्षेत्रे शुभयुते शुभमूलेन धनवान्। यह बुध कल्याणकारी होता है , शिल्पकला, लेखन या व्यापार में अनेक प्रकारों से धन मिलता है। १९ वे वर्ष के बाद जमीन, सन््तति और धन की प्राप्ति होती है। यह बुध पापग्रह की राशि में या पापग्रह के साथ हो, तो बुरे मार्गो से धन का नाश होता है। यह उच्च, स्वगृह में या शुभ ग्रहों के साथ हो, तो अच्छे मार्गों से धनवान होता है। मेरे विचार-इस स्थान में सभी शास्त्रकारों ने बहुत शुभ फल कहे हैं। किन्तु बुध अन्य ग्रहों के शुभ योग मे हो और उच्च का हो, तो भी ये सभी फल नहीं मिलते, ऐसा अनुभव है, क्यों कि इस बुध के समीप प्रायः रवि और शुक्र होते है, अत: उनके फलो का परिणाम भी देखना आवश्यक
है। कुछ शास्त्रकारो ने प्रथम से एकादश तक सभी स्थानो में बुध का फल धनवान होना ऐसा कहा है, वह भी ठीक प्रतीत नही होता, क्यों कि ऐसा हो, तो जगत में धनवान पुरूषों की ही संख्या अधिक हो जायेगी। अतः प्रत्येक प्रह का फल बतलाते समय उसके कारकत्म का भी बिचार करना अआाहिए। सभी बिषयो का फल बुध से बतलाना योग्य नही है। उदाहरणार्थलाभ-स्थान में तुला राशि में बुध हो, दशम में रबि, नवम में शुक्र, तृतीय में बक्री शनि और धनस्थान में मंगल हो, तो ऐसी कुण्डली में बुध के शुभ कत मिलना संभव नही है। अतः ग्रह के फल देने के सामर्थ्य का भी बिचार करना चाहिए।
ग्यारहवें भाव में बुध जातक की शास्त्रों के प्रति रूचि बढ़ाता है। वह सदा अपने परिवार के कल्याण की चिंता करता है। वह समृद्ध, शारीरिक रूप से कमजोर, समुचित यौनाकर्षण वाला, स्त्रियों में लोकप्रिय, आकर्षक, गेंहुआ रंग, बुद्धिमान, शीघ्र निर्णय लेने वाला होगा।
-मानसागरी
जातक दीर्घायु, अपने शब्दों पर दृढ़ रहने वाला, समृद्ध तथा प्रसन्नचित्त, सुख सुविधाओं तथा सेवकों से युक्त होगा।
-फलदीपिका
जातक धनी, मैत्री भाव से काम करने वाला, विद्वान, प्रसन्न, विविध प्रकार की खुशियों से युक्त, प्रसिद्ध व दीर्घजीवी होगा।
-सारावली
जातक पवित्र कार्य करने वाला, अनेक स्रोतों से धनार्जन करने वाला, 21 वर्ष की उम्र में संतति लाभ प्राप्त करने वाला और सहृदय होगा।
- भृगु
जातक समृद्ध, प्रसन्न, सफल ज्योतिषी, गणितीय क्षमताओं से सम्पन्न, प्रसिद्ध व्यक्तियों से मित्र भाव रखने वाला, कई भूखंडों का स्वामी, तार्किक और वैज्ञानिक मनोवृत्ति वाला व सफल व्यापारी होगा।
-डॉ रामन
बुध की एकादश भाव में स्थिति होने के अलावा संपत्ति के कोई लक्षण नही।
-चमत्कार चिंतामणि
टिप्पणी
जातक का स्वभाव सहृदयतापूर्ण तथा मित्रवत् होगा। वह सभी तरह के लोगों के साथ घुलने मिलने वाला होगा। बुध ग्यारहवे भाव से पंचमभाव पर दृष्टि डालता है। जो कि शिक्षा, मेधा और चिंतनशीलता का भाव है। इस पर बुध की दृष्टि जातक को प्रसन्नचित्त, शिक्षित, बुद्धिमान और गुणों के कारण प्रसिद्ध करती है। वह आकर्षक व्यक्तित्व वाला, पर्याप्त धनवाला, पुत्री संतान का आधिक्य और लड़कियों के विवाहादि में पर्याप्त धन खर्च करने वाला होगा। वह रोगमुक्त, कला वेदादि में पारंगत और चिरंजीवी होगा। उसके वैवाहिक जीवन में बहुत कम शारीरिक आनन्द व भोग होंगे।
, मीन-समाचारपत्र के संचालक, संपादक, मुद्रक, प्रकाशक स्टेशनरी दुकान, कोर्ट फी स्टेंप ब्हेन्डर्स आदि होते है। पिता भी कही क्लर्क रहते है। वे सुख से पेन्शन का उपभोग लेते रहते है| यदि बुध यहां प्रबल होगा, तो मातृसौख्य प्रचुर मात्रा में मिलता है।
मेरा अनुभव -इस स्थान में बुध मेष, सिंह या धनु राशि मे हो तो एक या दो पुत्र होते है। बड़े भाई की स्थिती अच्छी नहीं रहती | लेखक या क्लर्क होता है। वृषभ, कन्या या मकर में हो, तो चित्रकार, शिल्पकार, टायपिस्ट या कंपाउंडर आदि होता है। कर्क, वृश्चिक या मीन मे हो, तो स्वतंत्र व्यापार करता है। मिथुन, तुला या कुंभ में हो, तो शिक्षक, डेमॉन्स्ट्रेटर आदि होता है। इन लोगो को शेयर व्यापार मे अच्छा लाभ होता है।
एकादश स्थान में बुध हो तो जातक बुद्धिमान, सुखी, दीर्घायु, विवेकी,ज्ञानी, भाग्यवान, नौकर-चाकरों से युक्त एवं लोकप्रिय होता है। जातक की आंखें सुंदर होती हैं। शरीर कमजोर रहता है। ज्योतिषविद् गोपाल रत्नाकर के अनुसार नेत्र रोग रहते हैं, कन्या संतान अधिक होती है। शिल्प,लेखन या अन्य साहित्य संबंधी कार्य का व्यापार करके वह आजीविका चलाताहै। जातक संगोतज्ञ एवं गणितज्ञ रहता है, राजसम्मान प्राप्त करता है, पत्नी सेपूर्व उसको मृत्यु होती है। खेती के व्यवसाय से फायदा होता है।
बुध पापग्रह से युक्त या पापग्रह क्षेत्र में हो तो शुभ फलों में न्यूनता आतीहै। 18वें वर्ष में जातक का भाग्योदय होता है।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार जातक संपन्न और भोगविलास में मग्न रहताहै तथा अनेक विषयों का जानकार एवं विद्वान होता है। संतान आज्ञाकारी होतीहै। 45वां वर्ष महत्त्वपूर्ण एवं लाभदायक होता है।
पाशचात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार एकादशस्थ बुध बलवान होने पर उसकेफल अच्छे प्राप्त होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, वृश्चिक, धनु या मकररशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक अभिमानी, कुसंगति, वाद-विवादकरनेवाला होता है। सिंह, कन्या, तुला या कुंभ राशि का बुध एकादश स्थानमें हो तो बुध के अच्छे फल प्राप्त होते हैं। मीन राशि का बुध एकादश स्थानमें हो तो जातक विद्वान परंतु वाचाल होता है।
एकादश भाव-ग्यारहवें भाव में बुध हो तो जातक दीर्घायु, धनाद्य,दानी, ईमानदार, चरित्रवान, योगी, नेतृत्व क्षमता से युक्त, सुन्दर तथा सन्तानवान होता है। परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में वह सक्षम होता है। प्रायःऐसा जातक धनी परिवार में ही जन्मता है। यदि बुध अशुभ न हो तो 34 वर्ष कीआयु के बाद जातक हर प्रकार से सुखी, धनी व सुविधाएं भोगने वाला बन जाता है।बुध अशुभ हो तो मूर्खतापूर्ण निर्णयो/मूर्खतापूर्ण कार्यों में धन बर्बाद भी कर देता है।लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक चतुर, चालाक, परिस्थितियों को भाप
लेने में सक्षम तथा धनी होता है। यदि वह नौकरी करे तो योग्यतानुसार सफलतानहीं मिलती। पृथ्वी राशि का बुध हो तो शिल्पकला, चित्रकारी या स्वतंत्र कार्य
(FREELANCING) में अच्छा लाभ मिलता है। वायु तत्त्व राशि का बुध गणितज्ञव शिक्षक बनाता है। जल तत्त्व राशि में स्वतंत्र व्यापार की प्रवृत्ति देता है। जातक
को स्वतंत्र व्यापार में लाभ भी होता है। लेखन/प्रकाशन/सम्पादन कार्यों में भी
सफल होने की सम्भावनाएं रहती हैं।
शास्त्रकारों ने ग्यारहवें बुध को प्रशंसनीय माना है-
बिनलाभभवसथतभेषजातनलभेनलावण्यमाृष्यमसत
कुतः कन्ययोर्विवाहदानं च देयं कथं भू सुरास्त्यक्त तृष्णा भवन्ति॥
अर्थात् ग्यारहवें भाव में बुध न हो तो धन कहां से आए? सुन्दरता कैसे हो?
मनुष्य ऋण रहित कैसे रहे? कन्या के विवाह योग्य धन कहां से आए? ब्राह्मणों
को दान देने के लिए धन कहां से आए? यानी इन सब कार्यों में जातक को
ग्यारहवां बुध समर्थ बनाता है (जातक धनाद्य, सुन्दर, ऋणरहित, अच्छा दहेज
देकर धूमधाम से विवाह करने वाला तथा दानी होता है)।
बुध ग्यारहवें घर में
ग्यारहवें घर में बैठे बुध को ‘दौलतमन्द’ और साथ ही ‘उल्लू कापट्ठा’ और ‘कोढ़ी’ कहकर पुकारा है। लेकिन 34 साल के बाद इसेहीरा कहा गया है। बुध न. 11 के समय यदि दूसरा घर खाली हो तोऐसा व्यक्ति हुनरमन्द तथा शर्मसार यानी दूसरों की शर्म रखने वालाव्यक्ति होगा।
बुध न. 11 के समय यदि तीसरा घर खाली हो तो जिस साल खानान. 11 ग्यारह का बुध खाना न. 1 में आएगा, तब व्यक्ति के भाग्य कोपूरी तरह उदय कर देगा जैसे सीप में हीरे और मोती पैदा होंगे।
ग्यारहवें घर में बैठे हुए बुध के बुरे फल को दूर करने के लिए गलेमें ताँबे का पैसा डालना मददगार उपाय होगा। वर्षफल के अनुसार यदिखाना न. 9 का बुध खाना न. 11 ग्यारह में आया हो और टेवे वाला किसीफकीर या साधु से कोई ताबीज ले ले तो बुध उसे जड़़ से उखाड़़ देगा,यानी हद से ज्यादा मन्दा असर देगा।
एकादश भाव: आय भाव का बुध बलवान हो तो सभी तरह से लाभ देता है। पूर्व मनीषियों ने बुध के शुभ फल ही कहे हैं लेकिन ऐसा सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि प्राय: बुध सूर्य और शुक्र के साथ होता है। मित्र राशि, स्वराशि-उच्चराशि में जो फल दे सकता है, वह शत्रु या नीच राशि में कैसे दे सकता है? अग्नि राशि में बुध हो तो एक-दो पुत्र होते हैं, जातक दम्भी होता है, दूसरों से व्यर्थ का झगड़ा मोल ले लेता है। इन राशियों का बुध बडे भाई के लिए भी अनिष्ट फलप्रद रहता है। पृथ्वी राशि में बुध आय स्थानगत होने से जातक कलाकार, चित्रकार, किसी चिकित्सक का सहायक या टाइपिस्ट बनकर जीविका चलाता है। जल राशि का बुध होने से जातक स्वतन्त्र व्यवसायी होता है। वायु राशि में हो वो जातक शिक्षक बनता है। ऐसा व्यक्ति कलाकुशल व्यक्तियों के सम्पर्क में रहता है, श्रेष्ठ मित्र होता है और मित्र के लिए सर्वस्व बारने को तत्पर रहता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष रशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,विद्वान, दीर्धायु, सरकारी कर्मचारी, सत्कर्मी, यशस्वी, सत्संगति से युक्त,मात-पितृभक्त एवं स्वस्थ रहता है। जन्म स्थान से दूर रहकर आजीविकाचलाता है और उसे विदेश यात्रा का मौका मिलता है।
2वृषभ वृषभ राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,उद्ार, मधुरभाषी, प्रतिष्ठित, सुखी, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, परोपकारी एवंपारिवारिक सुख से परिपूर्ण रहता है।
3. मिधुन मिधुन राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,विद्वान, कवि, भोगी, व्यवहारकुशल, अनेकों का पालनहार किंतु वाचाल रहताहै। वह प्रतिष्ठित एवं बड़ा व्यापारी होता है।
4. कर्क कर्क राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक वकालतका व्यवसाय करके धनी बनता है। परिवार सुख पर्याप्त प्राप्त होता है। जातकदीर्घायु, समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त एवं नौकर-चाकरों से युक्त तथा माता-पिताका सुख पर्याप्त मात्रा में भोगता है। संतान आज्ञाकारी होती है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक दानी, दीर्घायु,सरकारी कर्मचारी, यशस्तरी, मधुरभाषी एवं हमेशा प्रसन्नचित्त रहता है। पुत्रकर्तव्यपरायण होकर समाज में नाम कमाता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,स्वस्थ, विद्वान, कवि, सुस्वरूप एवं वाचाल होता है। आर्थिक आय अच्छी होने पर भी वह धनसंग्रह नहीं कर पाता।
7. तुला-तुला राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, सुखीएवं नौकर-चाकरों से युक्त होता है और वकालत का व्यवसाय करके धन कमाता है। पत्नी अच्छी मिलती है पर वह वर्णसंकर हो सकती है। संतान अल्पायु रहती है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातकभाग्यवान, जनप्रिय, कर्मठ, दानपुण्य करनेवाला, दयालु, दीर्घायु, सरकारी कर्मचारी एवं यशस्वी होता है। उसके शत्रु बहुत रहते हैं। पुत्र सुख में बाधारहती है। निर्बल बुध होने पर शत्रु के हाथों मौत होती है।
9. धनु-धनु राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक स्वस्थ, दीर्घायु,विद्वान, सरकारी कर्मचारी, संगीतप्रेमी, संगीत का जानकार एवं अधिकारसंपन्न होता है। जातक धनसंग्रह नहीं कर पाता किंतु कम श्रम से धन प्राप्त होता है।
10. मकर-मकर राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक मातृपितृभक्त, दीर्घायु, संपन्न एवं सुखी होता है। विदेश यात्रा का मौका मिलता है। पत्नी सुंदर, सदाचारी एवं आज्ञाकारिणी रहती है किंतु वह वर्णसंकर होसकती है। संतान अल्पायु रहती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न एवं सुखी होता है किंतु शत्रु अधिक रहते हैं। वाहन सुख पर्याप्त मिलता है।
12. मीन-मीन राशि का बुध एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान, चतुर, धार्मिक, व्यवहारकुशल, सरकारी कर्मचारी, यशस्वी एवं भोगी होता है। वह संगीतादि ललितकलाओं में प्रवीण एवं लेखक होता है, व्यापार में धन कमाता है। उसे पारिवारिक सुख पर्याप्त मात्रा में मिलता है।
1. चौड़े पत्ते का पेड़ न लगावे।
2. बर्तन उल्टा करके रखें।
3. गले में छेदवाला पैसा बांधे।
===========================12) बारहवां भाव -द्वादशा स्थान (व्यय भाव) बारह वे स्थान में बुध के फल
आचार्य तथा गुणाकर-पतितस्तु रि:फे।अपने धर्म कर्म से प्रष्ट होता है।
कल्याणवर्मा-सुगृहीतवाक्यमलसं परिभूंत वाम्मितं बाम्मिनं तथा प्राज्ष। व्ययग: करोति सौम्यः पुरूष दीन नृशंसं च॥ यह बुध्दिमान, बोलने मे कुशल होता है। इसके वाक्य लोग आदर से सुनते है। यह दीन, क्रूर, आलसी और सदा अपमानित होता है।
वशिष्ठ-चन्द्रांगजो गतधनम। अर्थक्षति; धनहानि होती है।
गर्ग-नृपपीडनंसन्तप्तं परवादेन पीडित॑ । नृशंसं पुरूष चांद्रि:कुरूते व्ययराशिग: । राजा के क्रोध से इसे तकलीफ द्वोती है, लोग निन्दा करते हैं, क्रुर होता है।
बृह्यवनजातक-दयाविहीन:ः स्वजनैर्विभकत: सत्कार्यदक्षोबिजितारिपक्ष: सत्कार्यदक्षोविजितारिपक्ष:। धूर्तो नितान्तं मलिनो नरः स्यादू व्ययोपपन्ने द्विजराजसूनौ। निर्दय, अपने लोगों से दूर रहनेवाला, शत्रुओं पर जय पानेवाला, अच्छे कार्य करनेवाला, धूर्त और मतिन होता है।
नारायणभट्ट-न चेद् द्वादशे यस्य शीताशुजातः कथ॑ तद्गृह भूमिदेवा भजंति। रणे वैरिणो भीतिमायान्ति कस्माद् हिरण्यादिकोशं शठः काउनभूयात॥ यह सदा व्राम्हणो को दान देता है युध्द में शत्रुओ को भयभीत करता है| इसकी सम्पत्ति अक्षुण्ण रहती है।
आर्यग्रंथकार-भवति च व्ययेग शशिनन्दने विकलमूर्तिधरो' धनवर्जित: | परकलत्रधने धनचित्तवान् व्यसनदूररत: कृतकः सदा ॥ इसका शरीर बिकल होता है। यह निर्धन और बहुत व्यसनी होता है। परस्त्री और पर धन मे आसक्त होता है।
जयदेब-सत्संगकर्मापगतो5दयश्च धूर्त:सपापो मलिनो व्ययस्थे | सत्संग और अच्छे कार्यो से दूर रहता है | निर्दय, धूर्त, पापी और मलिन होता है।
काशीनाथ -बुधे व्यये व्ययी लोके रोगी बन्धुसमन्वित:। पापसक्त:पराधीनं: परंपक्षी च जायते | खर्चीला, रोगी, पाप करने में आसक्त दूसरो के अधीन, विरूध्द पक्ष की ओर जल्दी झुकनेवाला होता है। क्
मन्त्रेश्वर-दीनो विद्याविहीन: परिभवसहितो5न््त्ये नृशंसोडलसश्च। दीन, विद्याहीन, अपमानित, क्रूर और आलसी होता है।
जीवनाथ-बडे.यज्ञ करनेवाला और तीर्थयात्रा करनेवाला होता है। अन्य फल नारायणभट्ट के समान है।
जागेश्वर-बुधे वारमुख्या धन वै भजन्ति दया तस्य बुध्दौ कुतस्तातवर्ग: स्वकीये च वर्गे भवेद्दत्तहीन: परं शत्रुंबर्ग जयेत्तत्र लीनो भवेद्धूर्तधामा यदा चान्द्रिस्त्ये॥ वेश्याब्यसन मै धन खर्च करता है। अपने लोगो पर कुछ उपकार नही करता | शत्रुओं पर जय पाता है। निर्दय, धूर्त किन्तु नम्नता बतलानेवाला होता है। इसके पिता आदि आप्त नहीं होते।
पुंजराज-लझ्ले व्ययभावसंस्थे पितु:सहोत्था: सुखिन: तदा स्युः। बुधेन विपुला धरित्री | इसके पिता के भाई सुख से रहते है। जमीन बहुत मिलती है|
घोलप-दुर्बुध्दि, कर्कशं, द्वेषी, अशक्त, पराक्रमहीन, प्रवासी होता है। बिच्छू, सॉप और जानवरों से कष्ट होता है। को ग्रीया अंधा हो सकता है।
गोपाल रत्नाकर-ज्ञानी, कामुक, दूसरो के घर रहनेवाला । पुत्र कम होते है | माता की मृत्यु होती है । इसके साथ रवि हो, तो विश्वासी स्वभाव होता है।
हिल्लाजातक-चतुश्चतु:द्वादशो हानिद:स्त्रियः | ४४ वें वर्ष स्त्री की मृत्यु होती है। '
यवनजातक-व्ययचन्द्रजः द्वाविशत्। २२ वें वर्ष धनहानि होती है।
यवनमत-नीच पुरूषों की संगति से नुकसान होता है | यह निर्दय, धनहीन और बेफिक्र होता है।
पाश्चात्यमत-यह स्पष्टवक्ता और विजयी होता है । मकर या वृश्चिक मे हो तो इसे कपटी शत्रु बहुत होते है। साहसी कार्य करता है। शुभ सम्बन्ध में हो तो इसे अध्यात्मज्ञान, गूढशास्त्र और असाध्य सिध्दियां की प्राप्ति होती है। यह अधिकार योग भी होता है।
अज्ञात-ज्ञानवान् स्वतुंगगे वित्तवान् | विद्यावान बहुव्ययः । नृपात् भयम् | पापयुते चंचलचित्त: नृपजनद्वेषी | विद्याहीन: शुभयुते धर्ममूलेन धनव्यय:। उच्चे स्वक्षेत्रे लोकधुरीण: कार्यकर्ता च ॥ यह ज्ञानी, विद्याबान होता है। उच्च का हो तो धनवान् होता है | बहुत खर्च करता है। राजा का भय होता है। पापग्रहों के साथ हो, तो चित्त चंचल होता है राजा और
अधिकारी बर्ग से द्वेष करता है। विद्याहीन होता है। शुभ ग्रहों के साथ हो, तो धर्मकार्य मे धन खर्च करता है। स्थगृह में या उच्च का हो , तो नेता और अच्छा कार्यकर्ता होता है।
बारहवें भाव में बुध जातक विकलांग, निर्धन, परस्त्रीगामी होगा। दूसरे की संपत्ति पर नजर रखने वाला, दूसरों की मदद करने में प्रसन्नता अनुभव करने वाला या व्यसनी होगा।
-मानसालासरी
व्यक्ति असहाय, निर्धन, उत्साहहीन, क्रूर तथा अशिक्षित होगा और अपनी जिंदगी में पीड़ित रहेगा।
- फलदीपिका
बारहवें भाव में बुध की स्थिति जातक को निरुत्साही, कुशल वक्ता, विद्वान्, दयनीय, क्रूर तथा अपने वचन का पालन करने वाला बनाती है। -सारावली
वह दूसरों को वस्तु बाँटने में प्रसन्न होगा। यदि बुध पापाक्रान्त है तो वह अनुपयोगी तथा राजद्रोही होगा। यदि बुध बली है तो उसका धन धार्मिक व परोपकार के कार्यों में ही व्यय होगा।
- भृगु
जातक बुद्धिमान, चिंतित, व्यभिचारी, दार्शनिक, परोपकारी, चंचल स्वेच्छाचारी, संकीर्ण मानसिकता वाला, उपहार प्राप्त करने वाला, उदासीन कामुक, अल्प संतति वाला, अवसर का लाभ न उठा पाने वाला और उसकी माता को खतरों का सामना करना पड़े।
-डॉ रामन
टिप्पणी
बुध शिक्षा का कारक है। व्ययभाव में बुध की स्थिति शिक्षा के लिए अच्छी नहीं होती। इससे शिक्षा में बाधाएँ आएँगी। बुध विवेक का प्रतिनिधि ग्रह बारहवें भाव में नैतिक मूल्यों में ह्रास तथा पाप मार्ग में प्रवृत्त करता है। बुध की ऐसी स्थिति से वात रोगों या त्वचा रोगों से पीड़ा होगी। जातक को आर्थिक हानियों का सामना करना पड़े। बारहवाँ भाव व्यय या हानि का भाव है, अतः बुध के कारण यहाँ धार्मिक कारणों पर व्यय हो और गरीबों व लाचारों को आवश्यक वस्तुओं का वितरण करे।
मेरे विचार-शास्त्रकारों ने प्रायः जो शुभ फल दिये है। बे पुरूष राशियो में मिलते है और अशुभ फलों का अनुभव स्त्री राशियों में आता | शास्त्रकारों का अन्य फलवर्णन प्रायः ठीक हैं।
मेरा अनुभव-इस स्थान में बुध पुरूष राशि मे हो, तो शिक्षा पूरी होती है। वृत्ति संतोषी होती है। दानधर्म करना चाहता है। ये लोग जो व्यवसाय करते है, उसमें यशस्वी होते है। कीर्ति मिलती है। लोग इनसे खुद होकर प्रेम करते है। लोगो पर प्रभाव पड़ता है। बुध्दि सूक्ष्म होती है और उसका दुरूपयोग नहीं करते। कभी किसी महत्वपूर्ण कार्य मे नीचो की सलाह मानने से इनका नुकसान होता है। राजनीति मे कुशल होते है। यह बुध स्त्रीराशि में हे, तो स्वभाव एकान्तप्रिय, लोगो के ब्यवहार में ध्यान न देनेवाला, आलसी, अपने ही घर मे सन्तुष्ट रहनेबाला होता है। कष्ट सहन नही होते। शिक्षा पुरी नही होती। इन्टरमीजिएट या बी.ए. फेल होकर शिक्षा छोड देते है। ये लोग किसी की बात पर विश्वास नही रखते | संशयी प्रवृत्ति होती है। यह बुध चन्द्र के साथ प्रतियोग या युति करता हो (फिर वह स्त्रीराशि में हो या पुरूष राशी में), तो झुठा अभिमान होता है| दिखाबे के लिए दानधर्म करते है, अपनेको बहुत बडा समझते है। गप्पें हॉकते है। ये निर्दय, दुष्ट, क्षमा और ममता से दूर होते है। ये लोग खाने के लिए जीते है, जीने के लिए खाने की प्रवृत्ति नही होती। खाना, पीना, मजा करना और दो चार लड़कों को जन्म देकर एक दिन चल बसना यही इनका जीवनक्रम होता है।
द्वादश यानी बारहवें स्थान में बुध हो तो जातक खर्चीला होता है। अकेला बुध इस स्थान में हो या वह शुभक्षेत्र या शुभग्रहों से युक्त हो तो जातक का धन परोपकार एवं शुभकार्य के लिए खर्च होता है। इसके विपरीत बुध पापग्रह से युक्त या पापक्षेत्र में हो तो जातक व्यसनी एवं दुराचारी बन सकता है। प्राचीन आचार्यों ने बुध के यही फल बताए हैं और ये सच भी होते हैं।
सामाजिक दृष्टि से जातक का जीवन असफल रहता है। बोलने में चतुरपरंतु स्वभाव से उतावला होने के कारण उसकी धूर्तता प्रकट हो जाती है।फलस्वरूप शत्रुओं की संख्या बढ़ती है। समाज में यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त नहींहोती। जातक कोर्ट-कचहरी एवं राजकीय विवादों में फंसता है। अपनेवाक्चातुर्य से शत्रुओं को मात देने में सफल होता है।
यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार 22वें वर्ष में आर्थिक नुकसान तो 44वें वर्षमें पत्नी को कष्ट होते हैं।
पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार भी उपरोक्त फल व्ययस्थ बुध के प्राप्तहोते हैं। व्ययस्थ बुध शत्रक्षेत्र में शुभग्रहों से युक्त हो तो जातक धार्मिक,परोपकारी एवं यशस्वी होता है। किंतु पापग्रहयुक्त या पापग्रह से पीड़ित होतो अपव्यय, शत्रुभय, राजभय रहता है। मकर या वृश्चिक राशि का बुध व्ययभाव में हो तो शत्रुभय अत्यधिक रहता है।
द्वादश भाव-यदि लग्नकुंडली में बुध बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक
आलसी, मितभाषी किन्तु शास्त्रज्ञ, विद्वान, वेदांती, लेखक तथा दानी होता है। ऐसा
जातक प्रायः बाल्यावस्था में कष्ट भोगता है, कई रोगों से पीड़ित रहता है। जीवनके आरम्भिक वर्षों में जीविका के लिए जातक को कड़ी मेहनत करने पर भी
योग्यतानुसार प्रतिफल नहीं मिलता। साझे में व्यापार करे तो धोखा होता है।'गुप्त
शत्रु अधिक होते हैं। तथापि अध्यात्म आदि में विशेष रुचि लेता है।
लाल किताब के अनुसार ग्यारहवें बुध का जातक या तो बहुत नेक, लम्बाऔर अच्छा जीवन जीता है। या ऐसी बुरी हालत में कि देखने वाले भी रो पड़ें।
दरअसल, बुध यदि बारहवें भाव में पुरुष राशि में होता है तो शुभ फल मिलते हैं।किन्तुस्त्री राशि का बुध अशुभ फल देता है। यदि दूसरे भाव में शनि हो या बुध से
शनि की युति हो रही हो तो भी बुध के अशुभ प्रभाव कम हो जाते हैं लेकिन जातक
मंदबुद्धि का हो सकता है। बुध जब शुभ प्रभाव में हो तो जातक अध्यात्म, दर्शनआदि में विशेष रुचि लेता है तथा धर्म-कर्म में भी बढ़-चढ़कर भाग लेता है। यदि
शुक्र की स्थिति तथा ससमेश व द्वादशेश की स्थिति सुदृढ़ न हो अथवा बारहवें भाव
में बुध के साथ शुक् की युति हो जाए तो जातक की SEX POWER में कमी होसकती है। अथवा शीष्रपतन आदि रोग हो सकते हैं। यदि बारहवें भाव में बुध केसाथ शनि हो तो जातक नपुंसकत्व का शिकार हो सकता है अथवा नीच मैथुन मेंप्रवृत्त हो सकता है। बुध जन्मकुंडली में अकेला बहुत कम होता है। प्रायः सूर्य केसाथ होता है। यह वक्री, मार्गी, उदय, अस्त भी बहुत ज्यादा होता है। अतः इसकास्वतंत्र विवेचन कठिन होता है। पाठकों को बुध का फलादेश करते समय स्थितियोंपर विशेष ध्यान देना चाहिए।
विशेष-लग्नेश के साथ बुध (लग्न को छोड़कर) किसी भी भाव मेंबैठे--जातक को नपुंसकत्व की ओर ले जाता है।
बुध बारहवें घर में
बारहवें घर के बुध को ‘नेक तबीयत का मालिक मगर किस्मत केफेर से रात की नींद उजाड़ने वाला, जिसे दुखिया देखकर आसमान भी रोदे' ऐसा कहकर पुकारा गया है।
बुध न. 12 के समय व्यक्त की बहन, बुआ, लड़की या मौसी आदियदि ऐसे व्यक्ति के घर आकर रहे तो दुखिया रहेगी, मगर जब वह अपनीससुराल में रहे, तब उस पर किसी प्रकार की कोई मुसीबत नहीं आएगी।
बुध न. 12 के समय ऐसा व्यक्ति अपने मतलब के लिए झूठ भीबोलता है और कई दफा अपने किए हुए वादे से भी मुकर जाता है।
बारहवें घर में बैठे बुध के बुरा होने की निशानी व्यक्ति के शराबका आदी होने से शुरू होगी या दूसरों से झूठ बोलने लगे, फरेब करने लगेतो ये बुध के मन्दे होने की निशानी होगी।
यदि बुध खाना न. 12 वाले व्यक्ति के साथ उसकी औरत का बुधभी खाना न. 12 में हो तो ऐसे व्यक्ति के पास धन होते हुए भी उसकीहालत मुर्दे से कम न होगी।
बुध 12 के समय यदि व्यक्ति 25 साल की उम्र में शादी करे तोउसकी पत्नी व पिता दोनों पर ही बहुत मन्दा असर पड़ेगा। घर के लोगया धन सब बर्बाद हो जाएँगे और ऐसे व्यक्ति की उम्र का हर तीसरासाल अशुभ होगा।
बुध 12 के समय जिस्म पर बुध की चीजें यानी सिर का ढाँचा,जुबान, नाड़ी आदि में से किसी न किसी में कोई नुक्स जरूर होता है।
बारहवें घर में बुध के समय यदि मन्दे राहु का भी सम्बन्ध हो जाएतो जेलखाना, पागलखाना तक पहुँचने की हालत हो सकती है। चोरीआदि के वाकयात, गबन, बेईमानी, धोखा-फरेब-इन चीजों से व्यक्तिकी बहुत धन हानि और बेइज्जती होगी और ये उसके लिए कोई-न-कोईमुसीबत खड़ी ही रखेगा।
बुध 12 के समय सूर्य या मंगल छठे घर में हो तो माता, मामूदुखिया और माता बचपन में ही गुजर सकती है। यदि ऐसा न हो तो बेटा
और माता दोनों ही दुखिया रहेंगे।
बुध 12 के समय यदि बृहस्पति छठे घर में हो तो पिता की उम्रशक्की ही होगी और पिता का धन भी बर्बाद ही होगा।बुध 12 के समय यदि राहु-केतु छठे घर में हो तो ससुराल औरऔलाद पर जलती हुई रेत जैसा बड़ा ही दुख भरा प्रभाव होगा। औलादकी मौतें भी हो सकती हैं।
बुध 12 के समय यदि खाना न. 2 खाली हो तो ऐसा व्यक्ति कमअक्ल, जल्दबाज होता है और यदि वह मन्दिर जाता रहे तो यहाँ बुध काबुध 12 के समय यदि राहु आठ में या बारहवें घर में बुध केसाथ हो तो जेलखाना नहीं तो पागलखाना जरूर नसीब होगा। ऐसीहालत में भी व्यक्ति के लिए मन्दिर जाकर सिर झुकाना उसकोमुसीबतों से बचा लेगा। फल कुछ हद तक ठीक हो जाता है।
द्वादश भाव : व्यय भाव का बुध जातक को धार्मिक प्रवृत्ति का बनाता है। उसका व्यय सदकार्यों पर होल है। शत्रुओं को पराजित करता है, इस पर भी धन का उ्यय होता है। इसके संधित धन से दूसरे लोग सेवित नहीं हो सकते। स्पष्ट वक्ता होता है, संग्राम में विजयी रहता है, साहसिक कार्य करने में रुचि होती है, शत्रु कपटी और गिनती में अधिक होते हैं। बुध उच्चस्थ हो, शुभ संबंध में हो तो जातक गृढ़ शास्त्रों में प्रवोण, असाध्य सिद्धियों का स्वामी और आध्यात्मिक ज्ञानयुक्त होता है। अशुभ प्रभाव में हो तो स्वकर्म भ्रष्ट, स्वात्मीयों से परित्यक्त, धूर्त तथा मलिन होता है। ऐसा जातक पाप कर्म में लीन, रोगी, पराधीन ओर विरोधी पक्ष का समर्थक होता है।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक पाखंडी होता हैऔर जन्म स्थान से दूर रहता है, शत्रु अधिक होते हैं। उसे राजकीय दंड मिलनासंभव रहता है। संतान सुख में बाधा आती है। बौद्धिक स्तर निम्न रहता है।विशेष शिक्षा प्राप्त नहीं होती। घूमने-फिरने का शौक रहता है। नजदीकीरिश्तेदार एवं सहोदरों से संबंध मधुर नहीं रहते।
2. वृषभ-वृषभ राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक विदेश निवासी,बोलने में चतुर, आलसी, लोगों का शत्रु, शिल्पकला में पारंगत, वैभवशाली,विलासी, कुव्यसनी एवं दीर्घायु होता है। पत्नी एवं पिता के सुख में कमी रहती है।3. मिथुन-मिथुन राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक को बचपनमें कष्ट सहने पड़ते हैं। जातक खर्चीला एवं विदेशनिवासी होता है। यवनाचार्यएवं महर्षि गर्ग के मतानुसार ऐसा जातक कंजूस होता है। उसे पशुपालन काशौक रहता है और पशु से ही सुख प्राप्त होता है। ऐसा जातक शहरी माहौलकी अपेक्षा ग्रामीण माहौल में रहना अधिक पसंद करता है।
4. कर्क कर्क राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक कामातुर एवंविषयभोग में लीन रहता है। वह क्रूर स्वभावी, अभिमानी, उत्पाती होता हैऔर उसका बर्ताव जनता के लिये क्लेशकारक रहता है। जातक स्वयं भी इसकारण दुखी रहता है। उसे पैसा काफी प्राप्त होता है किंतुधनसंग्रह नहीं करपाता। महर्षि लोमश के अनुसार ज्येष्ठपुत्र सुख में बाधा रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक शिल्पविद्या मेंपारंगत, बोलने में चतुर, जड़बुद्धि का, स्वपरिश्रम से आगे बढ़नेवाला, माताएवं संतान सुख से वंचित रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार ऐसा जातकक्रोधी अभिमानी एवं दुर्व्यसनी होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक सुंदर, विद्वान,बुद्धिमान, प्रतिष्ठित एवं विदेशनिवासी रहता है। ऐसा जातक ग्रामीण माहौलमें रहता है। पशु से लाभान्वित होता है। यवनाचार्य एवं महर्षि गर्ग के अनुसार जातक कंजूस रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार जातक को मात्सुख एवंसंतान सुख में न्यूनता रहती है। वह चरित्रहीन होता है।
7. तुला-तुला राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक विलासी,अभिमानी एवं उत्पाती और जनता के लिए क्लेशकारक बनता है। उसकीआत्मघाती वृत्ति होती है। शारीरिक स्वस्थता की दृष्टि से यह बुध अनिष्टकररहता है। पानी एवं सर्प से भय रहता है। यवनाचार्य के मतानुसार जातक कास्वभाव कठोर होता है। चोरी जैसे दुष्टकर्म में उसकी रुचि रहती है। अभक्ष्यभक्षण करने से उसकी मृत्यु होती है। महर्षि गर्ग के अनुसार मरणोत्तर जातककी दुर्गति होती है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातकविदेशनिवासी, स्वपरिश्रम से आगे बढ़नेवाला, चतुर किंतु टेढी बुद्धि का रहताहै। यवनाचार्य के अनुसार जातक सरकारी नौकरी करता है जबकि महर्षिलोमश के अनुसार कपड़े का व्यापार करता है। उसका श्वसुर रिश्वतखोर याचोरी के व्यवसाय से जुड़ा रहता है। जातक स्वयं कंजूस होता है। पत्नी लोभी,खर्चीली एवं चंचल रहती है। जातक के मातृसुख में कमी रहती है।9. धनु-धनु राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान, सुंदर,प्रतिष्ठित, प्रवासप्रिय एवं हिंसक होता है, स्वास्थ्य मध्यम रहता है। माता एवंज्येष्ठ भ्राता के सुख में कमी रहती है। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक वाहनादिपशु धन से धनवान होता है तो यवनाचार्य के अनुसार ऐसा जातक धनवाननहीं होता।
10. मकर-मकर राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक चोर, डाकू,दुर्व्यसनी, कुमार्गी, प्रवासप्रिय, विदेशनिवासी, रोगी एवं अल्पायु होता है। जल,सर्प, विष से उसे डर रहता है, संतान सुख में बाधा रहती है। संतान के साथउसकी मतभिन्नता रहती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक दीर्घायु रहताहै। पिता से उसका अलगाव रहता है, चोरों से भय रहता है। जातक कपड़ेके व्यवसाय में धन कमाता है। पत्नी लोभी, कटुभाषी, विलासप्रिय एवं चंचलहोती है। जीवन में सुख-शांति का अभाव रहता है। जातक का श्वसुरकालाबाजारी एवं गुप्त व्यवसाय करनेवाला होता है।
12. मीन मीन राशि का बुध व्यय स्थान में हो तो जातक विदेश निवासीएवं प्रवासप्रिय होता है। प्रवास में धनहानि होती है। भाई-बहनों से विवाद रहतेहैं। शत्रुओं से घिरा रहता है, स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। यवनाचार्य के मतानुसारजातक धनवान नहीं रहता। महर्षि लोमश के मतानुसार जातक समाज के लिएदुष्ट, हिंसाप्रिय, चोर एवं परस्त्रीगामी रहता है।
1. गणपति की पूजा करें।
2. कुत्ता पाले।
3. गले में पीला धागा पहने।
4. केसर का टीका लगावें।
★★★★★★★★★★★★
बुध का राशिगत फल :
जन्म राशि में जन्मराशि में बुध हो तो जातक को अपशब्द एवं कठोर वचन सुनने पड़ते हैं। चुगलखोरी की वजह से संबंधों में कटुता आती है। खाद-विवाद के प्रसंग आते हैं। किसी से धोखा मिलता है।
जन्मराशि से दूसरा: जन्मराशि से दूसरा बुध हो तो जातक को धन तो भिलता है लेकिन अनादर या पराजय का भय भी होता है।
जन्मराशि से तीसरा: जन्मराशि से तीसरा बुध हो तो जातक को भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होता है। सरकारी कामों में अड्चनें नहीं आतीं। शत्रु सक्रिय होकर कष्ट पहुंचाते हैं।
जन्मराशि से चौथा: जन्मराशि से चौथा बुध होने पर व्यापार-उद्योग में प्रगति होती है। पारिवारिक एवं मित्रों का सुख प्राप्त होता है। हर दृष्टि से शुभ फल मिलते हैं।
जन्मराशि से पांचवां: जन्मराशि से पांचवां बुध हो तो पली-पुत्र से मतभेद होते हैं। परिवार में कलह और अशांति रहती है।
जन्मराशि से छठा: जन्मराशि से छठा बुध होने पर सभी प्रकार के लाभ मिलते हैं। व्यवसाय में प्रगति होती है। नया स्थान या नया पद प्राप्त होता है। सुख-शांति प्राप्त होती है।
जन्मराशि से सातवां: जन्मराशि से सातवां बुध होने पर अशुभ घटनाएं घटती हें। कूटुंब में कलह-अशांति, शारीरिक अस्वस्थता रहती है।
जन्मराशि से आठवां: जन्मराशि से आठवां बुध होने पर आरोग्य प्राप्ति, व्यापार-उद्योग में प्रगति, सुख-शांति, यश व शुभ फल मिलता हे।
जन्मराशि से नौवां: जन्मराशि से नोवां बुध होने पर आर्थिक तंगी रहती है। मिलने वाला पैसा समय पर नहीं मिलता। हर कार्य में विलम्ब होता है और विघ्न-बाधाएं आती हैं।
जन्मराशि से दसवां: जन्मराशि से दसवां बुध होने पर रुके काम पूरे होते हैं। यश, लाभ मिलता है। वेवाहिक एवं पारिवारिक सुख प्राप्त होता है।
जन्मराशि से ग्यारहवां: जन्मराशि से ग्यारहवां बुध होने पर जातक की व्यवसाय में प्रगति, पत्नी-पुत्र, पारिवारिक सुख एवं मित्र का सुख प्राप्त होता है। बाह्य सहायता मिलती है। आकस्मिक लाभ होता है।
जन्मराशि से बारहवां: जन्मराशि से बारहवां बुध होने पर शत्रु बढ़ते हैं। पराजय, अपमान, व्यय, आर्थिक हानि होती है।
★★★बुध ग्रह★★■
√● आज मैं बुध ग्रह संबंधी आर्ष जानकारी प्रकट कर रहा हूँ। जैसे मंगल भूमिपुत्र है। वैसे बुध चन्द्रपुत्र है। इस विषय में श्रीमद्भागवत के नवमस्कन्ध चतुर्दश अध्याय का प्रमाण मान्य है। सहस्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि सरोवर के कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र अत्रि हुए। वे अपने गुणों के कारण ब्रह्मा जी के समान थे उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि तथा नक्षत्रों का अधिपति बना दिया।
"सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रदसरोरुहात् । जातस्यासीत् सुतो धातुरत्रिः पितृसमो गुणैः ॥
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ।।"
( भागवत ९ । १४ । २,३)
√●चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ किया, तीनों लोकों को जीत लिया, बृहस्पति की पत्नी तारा का बलपूर्वक हरण कर लिया।
“सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् ।
पत्नी बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात् ॥"
(भागवत ९ । १४।४)
√● तारा गर्भवती हुई। चन्द्रमा के वीर्य से उसने एक बालक को जन्म दिया। ब्रह्मा जी ने उस बालक का नाम 'बुध' रखा, क्योंकि उसको बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमा को बहुत आनन्द हुआ।
" तस्यात्मयोनिरकृत बुध इत्यभिधां नृप ।
बुद्ध्या गम्भीरया येन पुत्रेणापोडुराण मुदम् ॥"
(भागवत ९ । १४ । १४)
√●यह है, बुध के जन्म की कथा। इस प्रकार बुध के दो नाम विशेष है-चन्द्रज एवं तारेय। इसके अतिरिक्त वित्त, ज्ञ, सौम्य, बोधन, चन्द्रपुत्र, चांद्रि, शांत, श्यामगात्र, अतिदीर्घ, विद्य। इसे हेमन (स्वर्णाभसदृश) भी कहते हैं।
"तत्याज वीडित तारा कुमारं कनक प्रथम्।"
(भागवत ९ । १४ । १०)
√● बुध, चन्द्रमा का परक्षेत्री सुत है। चन्द्रमा का नाम तारापति है। इसलिये यह वैध सन्तान है। चन्द्रमा है, मन। मन है, विष्णु/कृष्ण ।
"दुर्जयानामहं मनः ।"
(भागवत ११ । १६ । ११)
√●चन्द्रमा से पैदा हुआ बुध भी विष्णु है।
विष्णुः =बुधः [विष्णुसहस्रनाम】
√●चन्द्रमा की उत्पत्ति अत्रि के नेत्रों से हुई है।
अत्रि = अ + त्रि में न समास है।
त्रि= तीन गुण = सत् रज तम।
जो तीन गुणों से परे है, वह अत्रि है ।
जो तीन नहीं है अर्थात् न सत् है, न रज है, न तम है, ऐसे को अत्रि कहते हैं।
इस प्रकार, अत्रि"= निस्त्रैगुण्य / निर्गुण/ अगुण/विगुण। अत्रयात्मज होने से चन्द्रमा भी अगुण हुआ। किन्तु 'तारा' अगुण नहीं है।
चन्द्रमा+ तारा से बुध । अगुण चन्द्रमा का पुत्र होने पर भी सगुण तारा के गर्भ में पलने से बुध अगुण न हो कर त्रिगुणात्मक है। चन्द्रमा =मन ।बुध =बुद्धि। मन अतर्क्य है, बुद्धि तर्क्स। मन भाव प्रधान है, बुद्धि तर्क प्रधान। चन्द्र (मन) निर्गुण ब्रह्म = बुध (बुद्धि) सगुण ब्रह्म । चन्द्रमा, बुध का पिता है। यह बुध को अपना मित्र मानता है। बुध, चन्द्रमा को अपना शत्रु मानता है। मन, बुद्धि का सहयोग चाहता है। बुद्धि मन को अपना सहयोग नहीं देना चाहती है। तर्क से भावना का खण्डन होता है।
√●पहले चन्द्रमा आकाश में नहीं था। निर्गुण होने से अदृश्य था । दृश्य होने के लिये चन्द्रमा का सागर के गर्भ से आविर्भाव हुआ। समुद्र मंथन से जिन १४ रत्नों की उत्पत्ति हुई, उनमें से चन्द्रमा एक था। तब से चन्द्रमा दृश्य हुआ/ सगुण हुआ। यह चन्द्रमा शिव (आकाश) के ललाट पर सतत विद्यमान् है। यह दृश्य चन्द्रमा, बुध का जन्मदाता नहीं है। बुध का जनक अदृश्य निस्त्रैगुण्य चन्द्र ही है। बुध जब आकाश में उदय को प्राप्त होता है तो उत्पात करता है।
"बुध इत्यकरोन्नाम तस्य पुत्रस्य धीमतः ।
प्रतिकूलं च गगने समभ्युत्तिष्ठते बुधः ॥"
(महाभारत, हरिवंशपर्व २५ । ४५ )
√●मनु ने पुत्र की कामना से पुत्र यज्ञ किया। मित्रावरुण के अंश से यज्ञ कुण्ड से 'इला' नाम की कन्या प्रकट हुई। इला का अर्थ है ...
पृथ्वी, गाय, वक्तृता । चन्द्रपुत्र बुध ने मनुपुत्री इला से सहवास कर पुरुरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया।
"तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरण भूषिता । दिव्य संहनना चैव इला जज्ञे इतिश्रुतिः ॥ ७ ॥
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्विता ॥ १६ ॥
जनयित्वा संतु सा तमिला सुयुम्नतांगता ।। १७ ।"
( हरिवंशपर्व अध्याय १० )
√●पुरुरवा का अर्थ है, लोक वाणी। पुरु प्रचुर, अति, बहुत, प्रभूत रव = शब्द, ध्वनि। रवा = शब्द युक्त, ध्वनि करने वाला पुरुरवा प्रभूत शब्द वाला वक्ता, अधिवक्ता, प्रवक्ता, व्याख्याता, भाषणकर्ता ।
√● इन सब पौराणिक कथानकों का अभिप्राय है-बुध पृथ्वी तत्व ग्रह है (इला = पृथ्वी) तथा वाणी वा वक्तृता का कारक है (इला = वक्तृता)। बुध का पुत्र पुरुरवा होने का अर्थ है- बुध हर प्रकार की वाणी (लोक एवं वेद) का संकर्ता एवं आख्यापक है।
√●●बुध शब्द, भ्वादि, उभय बोधति ते तथा दिवा. आत्मने. बुध्यते धातु से निष्पन्न होता है। जानना, प्रत्यक्ष करना, समझना, विचार करना, ध्यान देना, चित्त लगाना, विमर्श करना, सचेत होना, चेतन होना, पहचानना अर्थों में यह धातु प्रयुक्त होती है।
√● बुध + क = बुध बुद्धिमान, चतुर, विद्वान, धीमान्, सचेत, सन्नद्ध, सावधान, ज्ञाता को बुध कहते हैं।
√●इसके अतिरिक्त, बुध शब्द बुक्कू + था तथा बुद + धा धातुओं के योग से भी बनता है।
★ (१) बुक्क् भ्वादि परस्मै. बुक्कति चुरादि उभय बुक्कयति ते बोलना, बातें करना।
★ (२) बुट् भ्वादि, उभय. बोदति-ते प्रत्यक्ष करना देखना समझना पहचानना, जानलेना ।
★ (३) धा जुहोत्यादि, उभय दधाति धत्ते रखना, धारण करना, देना, लेना, वहनकरना, सम्पन्न करना, सम्हालना, स्थापित करना, रचना करना, पोषण करना।
★बुक्क् + धा= बुध। 【धा + ड = ध। क्क् का लोपन 】
★ बुद्+धा=बुध।【 द् का विलोपन, धा>>>ध 】
√● इस प्रकार जो बोलता है वार्ता करता है बकबकाता है शब्दयुक्त है, समझता है, संज्ञायुक्त है, जानकारी रखता है, प्रत्यक्ष करता है, रचयिता है वह बुध है।
बुध =वक्ता, द्रष्टा, सष्टा। बुधाय नम इति ।
√●सम्प्रति तीव्र हवा चल रही है। आकाश बादलों से भरा है। आँधी के साथ वर्षा की बौछारें पड़ रही हैं। इसका कारण है-बुध द्वारा सूर्य की गति का उल्लंघन। सूर्य सिंह में है। बुध कन्या में है। बुध, सूर्य से आगे चल रहा है। इस स्थिति में ऐसा होता ही है। व्यास जी कहते हैं ..
"उशनसा बुधो व्याख्यातः ।
तत उपरिष्टाद् द्विलक्षयोजनतो बुधः । सोमसुत उपलभ्यमानः प्रायेण शुभकृयदाकद व्यतिरिच्येत तदातिवाताभ्रप्रायानावृष्ट्यादि भयमाशंसते ।"
(भागवत ५ । २२ । १३)
√●●शुक्र से दो लाख योजन ऊपर बुध है। चन्द्रमा का पुत्र (बुध) जब सूर्य की गतिका उल्लंघन कर चलता है तो बहुत अधिक आँधी, पानी और सूखे के भय की सूचना देता है।
√● बुध अधिक से अधिक एक राशि आगे या पीछे, सूर्य के पास रहता है। इसकी गति शुक्र के सदृश होती है। शुक्र से भी इसकी निकटता रहती है। बुध, जैसा कि इसका नाम है, यह बुद्धि स्वरूप है। जिस प्रकार बालक अपने पिता के निकट रहता है, उसी प्रकार यह बालरूप हो कर अपने पिता सूर्य के आसपास ही विचरण करता है।
√●●●बुध के गुण धर्म....
- शुभ पापयुत् होने पर अशुभ। नपुंसक। वाणी। शूद्रवर्ण वृत्ताकार मिश्रस्वभाव। विद्वन्मण्डल स्थान। समय अतु। उत्तर दिशा। युवराज कुमार वय। दूर्वासम श्याम रंग हस्व । शिल्प, गणित विद्या। पृथ्वी तत्व रजोगुण मिश्रधातु मिश्ररस (चरपरा)। आर्द्र वस्त्र। प्रातः बली । द्विपद । द्विस्वभाव। श्मशान भूमि। ग्राम चर त्वचा कारक । तिर्यक् दृष्टि। शरद ऋतु। त्रिदोष। मामा। बुद्धि। विद्वत्ता। देवता विष्णु। बालक कृष्ण क्रीडा भूमि हास्यप्रिय विनोदी शास्त्री। शीर्षोदय। फलहीनवृक्ष, बहुपर्णी । दाहिनी ओर कांख में चिह्न करता है। हाथ और पांव में पीड़ा करता है। घ्राणेन्द्रिय राहु के दोष को हरता है। चन्द्रमा का बल बढ़ाता है। राशि में हर समय फल देता है। दूसरी राशि में जाने के ७ दिन पहले प्रभावकारी। मनुष्यकृत दन्तघात से चिन्ह करता है, पत्थर से भी। मामा का कारक । वाणिज्य । बन्धु ।
√●कारक भाव ४, १० ।
√●हर्ष स्थान - १ ।
√● एकपाद दृष्टि ३,१०।
√● द्विपाद दृष्टि-४, ८।
√●सम्पूर्ण दृष्टि-७ ।
√●मित्रग्रह - रवि, शुक्र, राहु ।
√●सम ग्रह- मंगल, गुरु, शनि ।
√●शत्रु ग्रह चन्द्रमा ।
√●बलवत्तम भाव- प्रथम ।
√● उच्च राशि एवं परमोच्चांश- कंन्या १५° ।
√●नीच राशि एवं परम नीचांश-मीन १५° ।
√●मूल त्रिकोण राशि अंश- कंन्या १६° से २०° तक ।
√● स्वगृह राशि- ३, ६ ।
√●अस्तराशि - ९, १२ ।
√●राशि चक्र परिभ्रमण काल-८८ दिन ।
√●मध्यम राशि परिभ्रमण काल - २५ दिन ।
√●नक्षत्र चार -१० दिन।
√● नक्षत्रपाद चार-२.१/२दिन।
√●मध्य दैनिक गति- ५९' ८” ।
√●शीघ्र गति - १०४' ४६” ।
√●परमशीघ्र गति - ११३' ३२” ।
√●दीप्तांश- ७° ।
√●कलांश - १२° ।
√●गोचर से निन्द्य- ४, ८, १२ ।
√● गोचर से पूज्य- १, ३, ५, ७, ९ ।
√● गोचर से शुद्ध २, ६, १०, ११ ।
√●कुत्ता मृग साँड़ आदि से भय, विष्णु भगवान का कोप, चेचक, चर्मरोग, सन्निपात- बुध करता है।
√●यह नपुंसक ग्रह है, इससे जिस ग्रह साथ इसका योग होता है, वह उसके फल का सहारा लेता है । । बुध मंगल के साथ अच्छा नहीं है। झूठ बोलने की प्रवृत्ति और व्यर्थ की बातों में उलझाता है। गुरु के साथ इसके योग से विद्वत्ता, काव्य रचना, अध्यात्म ज्ञान का उदय होता है। शुक्र के साथ ललित कला एवं शिल्प कौशल प्राप्त होता है। शनि के साथ वक्तृत्व शक्ति क्षीण करता है। सूर्य के साथ इसका योग होने पर विद्युत्वत् बुद्धि देता है, गणित में प्रवीण बनाता है। अस्त होने पर भी यह फल देता है। चन्द्रमा के साथ बुध का योग पाण्डित्य दाता है। बुद्धि और मन का योग वाणिज्य में सफलता देता है। चन्द्र = मन, बुध = बुद्धि ।
√● भाव २ से वाणी और विद्या का विचार किया जाता है। यहाँ पर बुध हो तो जातक अति वाचाल एवं विद्वान् होता है। बुध का महत्व जितना २, ५, १, ९, १० भावों में है उतना अन्यत्र नहीं। पंचम भाव का बुध उत्तम बुद्धि देता है, नवम का धर्मात्मा बनाता है, लग्न का बुध उर्वर मस्तिष्क देता है।
√● मिथुन तुला कुंभ बौद्धिक राशियाँ हैं। बुध बुद्धिदाता ग्रह है। इन राशियों में बुध का होना विशेष फलदायक है। यह मिथुन राशि में बहुबली होता है। स्मरण शक्ति, शास्त्रज्ञान, वक्तृता, ग्रन्थ रचना की योग्यता जातक में सहज होती है। कुंभ राशि में वक्तृत्वशक्ति में यह कमी करता है, किन्तु वेदान्तादि गूढ़ विषयों में सफलता देता है। तुला में बहु आयामी मति देता है। कन्या का बुध उच्च का होने से हस्तकौशल, राज वैभव, वैद्यकी, क्रीडाव्यापार में लगाता है।
√●जिह्वा एवं वर्णोच्चारण के अवयवों पर बुध का अधिकार माना गया है। बलवान् बुध व्याकरण का पंडित बनाता है। बुध पृथ्वी तत्व है। इसका तन्मात्र गंध है। गंध का संबंध नासिका से है। अतः बुध का नासिका पर विशेष अधिकार है। शुभ बुध सुन्दर नासिका देता है। त्वचा में चमक बुध से होती है।
√●बुध का देवता कृष्ण है। बालक कृष्ण, किशोर कृष्ण, योगेश्वर कृष्ण की सम्पूर्ण विशेषताएँ बुध में होती है। कृष्ण, विष्णु के अवतार है। भागवतान्तर्गत कृष्ण का सारा चरित्र बुधाप्लावित है।
√●दुःस्थानी तथा निर्बल बुध, गले तथा नाक से होने वाले रोग, चर्म रोग, त्रिदोष जन्य रोग, भ्रान्ति (मानसिक विकार) दुःस्वप्न उतावलापन का जनक है। यह तीर्थस्थान में मृत्यु देता है।
√●बुध के अनिष्ट प्रभाव से बचने के लिये तथा इसके शुभ फल को पाने के लिये भगवान् विष्णु की उपासना करनी चाहिये।
√●बुध का गोत्र अत्रि, रंगधानी, वाणाकार मण्डल, अंगुल ४, वाहनसिंह,
√●समिधा अपामार्ग है।
√●दानद्रव्य-मूँग, खाँड़, घी, हरित वस्त्र, हाथी दांत, शस्त्र, कर्पूर, सब फूल, फल, सोना कांसा, पन्ना तथा मरकतमणि धार्य है। वृद्धदारुमूल / अश्वत्थमूल भी धार्य है।
√●दान का समय - प्रातः ५ घटी तक है।
★★★नमस्कार मंत्र★★★
"प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥"
√●बुध भाग्येश होने पर ३२ वें वर्ष में भाग्योदय करता है।
√●विंशोत्तरी मान से बुध की महादशा १७ वर्ष की होती है।
√●बुद्ध के नक्षत्र हैं- अश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती। ये नक्षत्र क्रमशः कर्क, वृश्चिक, मीन के राश्यन्त नक्षत्र हैं। बुध युवराज है अर्थात्, सूर्य-चन्द्र का प्रिय है। सूर्य के उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के अंतिम तीन चरणों एवं चन्द्र के हस्त नक्षत्र के प्रथम तथा द्वितीयादूर्द्ध चरणों में बुध अति प्रगल्भ होता है। यही कन्या का १५° अंश है। इसमें बुध को उच्च का कहा गया है। इससे स्पष्ट है, चन्द्र की अपेक्षा सूर्य के प्रति बुध का दुगुना झुकाव है। चन्द्र सूर्य इसके मातापिता हैं। चन्द्रनक्षत्र हस्त में डेढ़ चरण तथा सूर्य नक्षत्र उ. फा. में तीन चरण पाने से ऐसा है।
√●विभिन्न भावों में विभिन्न अवस्थागत बुध का जो फल होता है, उसी को मैं कश्यय ऋषि के मत से प्रस्तुत कर रहा हूँ। कश्यपोक्त बुध फलम्....
√●●१. लग्न में बुध...
★१. उच्च राशि में वक्र नासायुक्त ।
★२. उच्च नवांश में, सुलम्ब ओष्ठयुक्त ।
★ ३. शुभ वर्ग में कान्तियुक्त तेजस्वी ।
★४. नीच राशि में, मुखदुर्गन्धयुक्त।
★५. नीच नवांश में, दीर्घ जिह्वायुक्त ।
★६. पाप वर्ग में दीर्घ वर्णयुक्त ।
★७. मित्र राशि में, तलवार सदृश तलवा।
★८. मित्रां में शुण्डी।
★९. वर्गोत्तम में, अतिभाग्यशाली।
★१०. शत्रु राशि में, दीर्घदन्ता (कराल)।
★११. शत्रु नवांश में, चपलता युक्त।
★१२. स्व राशि में, मांसाधिक्य पुष्टागी।
√●●२. धन में बुध ...
★१. उच्च राशि में, भू धन स्थायी सम्पत्ति ।
★ २. उच्च नवांश में, सस्य पशुज धन ।
★३. शुभ वर्ग में, बहुपाप समुद्भव धन ।
★४. नीच राशि में, निकृष्टतासमुद्भूत धनः ।
★५. नीच नवांश में, दैन्यार्जित रिपुद्भव धन।
★६. पाप वर्ग में ठगी से धन।
★७. मित्र राशि में, वाजिभव धन ।
★८. मित्र नवांश में, कृषिज धन ।
★९. वर्गोत्तम में कृषि संभव धन।
★१०. शत्रु राशि में, शत्रुसेवाभव धन।
★११. शत्रु नवांश में, अल्पधन ।
★१२. स्व राशि में श्रेष्ठलोक से धन।
√●●३. सहज में बुध ...
★१. उच्च राशि में, खण्डोऽथ [ खांड़ सम वाक्/ खण्डन कर्ता]
★२. उच्च नवांश में, कम्बुकी । हाथी सम वली/ शंख सम वाक्]
★३. शुभ वर्ग में, कृतघ्न ।
★४. नीच राशि में, पापतत्पर ।
★५. नीच नवांश में, गोपालक।
★६. पाप वर्ग में, गतसौहार्द | अमित्र ]
★७. मित्र राशि में, बहुत कामनाओं वाला ।
★८. मित्र नवांश में, कुम्भकार | शिल्पी |
★९. वर्गोत्तम में नित्य कर्मा।
★१०. शत्रु राशि में, लोकदिष्ट ।
★११. शत्रु नवांश में, चरित्रवान् ।
★१२. स्व राशि में, चोर ।
√●●४. सुख में बुध...
★१. उच्च राशि में, महाजनों से सुख ।
★२. उच्च नवांश में, राजा से सुख ।
★३. शुभ वर्ग में, अक्षय सुख।
★४. नीच राशि में, क्लेश से सुख ।
★५. नीच नवांश में, परसेवासमुद्भूत सुख ।
★६. पाप वर्ग में, अन्त्यसंग सुख।
★७. मित्र राशि में, सुपुत्र से सुख ।
★८. मित्र नवांश में, कलत्र से सुख ।
★९. वर्गोत्तम में कन्या से मुख ।
★१०. शत्रु राशि में क्रयविक्रय से सुख ।
★११. शत्रु नवांश में, पशुपालन से सुख।
★१२. स्व राशि में, स्वबान्धवों से सुख
√●●५. सुत में बुध ....
★१. उच्च राशि में, श्रेष्ठ भाग्य वाला पुत्र ।
★२. उच्च नवांश में, विनय सम्पन्न पुत्र ।
★३. शुभ वर्ग में, वीर्यवन्त पुत्र ।
★४. नीच राशि में, अधिक दुःखी पुत्र ।
★५. नीच नवांश में, अतिविकृत पुत्र ।
★६. पाप वर्ग में, निन्दनीया कन्या ।
★७. मित्र राशि में, निरोग पुत्र ।
★८. मित्र नवांश में, शौचनिपुण पुत्र ।
★९. वर्गोत्तम में, नीतिज्ञ पुत्र ।
★१०. शत्रु राशि में, नष्ट बान्धवों वाला पुत्र ।
★११. शत्रु नवांश में, चुगलखोर पुत्र ।
★१२. स्व राशि में, गुरुदेवता भक्तियुत् पुत्र ।
√●●६. रिपु में बुध ...
★१. उच्च राशि में, दूषित प्रकृति ।
★२. उच्च नवांश में, विरूपाढ्य ।
★३. शुभ वर्ग में, अनुकूल ।
★४. नीच राशि में, विकलेक्षणः ।
★५. नीच नवांश में, हाथ पैर कान से हीन, विपादकरकर्ण ।
★६. पाप वर्ग में, द्वन्द्वहीन ।
★७. मित्र राशि में, सचिव ।
★८. मित्र नवांश में, मंत्रिपुत्र ।
★९. वर्गोत्तम में, परवधूरत ।
★१०. शत्रु राशि में, परधनापहः ।
★११. शत्रु नवांश में, नृशंसचौर ।
★१२. स्व राशि में, व्यसनी ।
√●●७. कलत्र में बुध....
★१. उच्च राशि में, सुरूपा स्त्री ।
★२. उच्च नवांश में, रोगनिर्मुक्ता स्त्री ।
★३. शुभ वर्ग में, मण्डनैकपरायणा स्त्री ।
★४. नीच राशि में, कुपुरुषासक्त स्त्री।
★ ५. नीच नवांश में, व्यसनाढ्या स्त्री ।
★ ६. पाप वर्ग में, गुणोज्झिता स्त्री।।
★७. मित्र राशि में, बहुपुत्रा पत्नी ।
★८. मित्र नवांश में, बहंगयानासक्ता स्त्री
★९. वर्गोत्तम में, सुप्रभावती नारी ।
★ १०. शत्रु राशि में, अर्थहीना भार्या ।
★११. शत्रु नवांश में, अजना भार्या ।
★१२. स्व राशि में, इष्टा (प्रिया) भार्या।
√●●८. मृत्यु मे बुध ....
★१. उच्च राशि में, ज्वर से मृत्यु ।
★२. उच्च नवांश में, कफजन्य व्याधि से मृत्यु ।
★३. शुभ वर्ग में, वायुरोग से मृत्यु ।
★४. नीच राशि में, घाव होने पर मृत्यु ।
★५. नीच नवांश में, महाभय से मृत्यु ।
★६. पाप वर्ग में, प्रियजन वियोग से मृत्यु ।
★७. मित्र राशि में, मुख के रोग से मृत्यु ।
★८. मित्र नवांश में, आँख के रोग से मृत्यु ।
★९. वर्गोत्तम में, गुदा के रोग से मृत्यु ।
★१०. शत्रु राशि में, बन्धन से मृत्यु ।
★११. शत्रु नवांश में, पेट रोग से मृत्यु [त्रास से मृत्यु ।
★१२. स्व राशि में, पादव्रण से मृत्यु ।
√●●९. भाग्य में बुध ....
★१. उच्च राशि में, सात्विकता से उत्कर्ष ।
★२. उच्च नवांश में, देवस्थान से उत्कर्ष ।
★३. शुभ वर्ग में, पूजा से उत्कर्ष ।
★४. नीच राशि में, दान से उत्कर्ष ।
नीच नवांश में, व्रत पावित्र्य से उत्कर्ष ।
★६. पाप वर्ग में, कपटाचार से उत्कर्ष ।
★७. मित्र राशि में, ऐन्द्रजालिकता से उत्कर्ष ।
★८. मित्र नवांश में, चलकार्यों से उत्कर्ष ।
★९. वर्गोत्तम में, गार्हस्थ्य कृत्यों से उत्कर्ष ।
★१०. शत्रु राशि में, वस्त्रदान से उत्कर्ष ।
★११. शत्रु नवांश में, अप्रियजनों से उत्कर्ष ।
★१२. स्व राशि में, अग्रजानुज के साध्वाचार से उत्कर्ष ।
√●●१०. दश में बुध....
★ १. उच्च राशि में, धनधान्यसमृद्भूत कर्मा ।
★२. उच्च नवांश में, चतुष्पदसमुद्भव कर्मा ।
★३. शुभ वर्ग में, शुभकर्मा ।
★४. नीच राशि में, वाजिक्रिया ( वाहन चालक ) ।
★५. नीच नवांश में, द्यूतकर्मा ।
★६. पाप वर्ग में, परदेशीकर्मक।
★७. मित्र राशि में, खलजकर्मा (खल =
★८. मित्र नवांश में, खरज कर्मा (खर भूमि)। कठोर)।
★९. वर्गोत्तम में, यज्ञ कर्मा ।
★१०. शत्रु राशि में, कष्टज कर्मा (कष्ट (अनिष्ट)।
★११. शत्रु नवांश में, निर्गुणकर्मा (निर्गुण व्यर्थ)।
★१२. स्व राशि में, कीर्तिप्रदकार्य करने वाला।
√●●११. एकादश में बुध...
★१.उच्च राशि में, शास्त्र ज्ञान से लाभ ।
★२. उच्च नवांश में, विविधोपायों से लाभ।
★३. शुभ वर्ग में सर्वविद्याभूत लाभ।
★४. नीच राशि में, नीच संगति से लाभ।
★५. नीच नवांश में, धूर्त संग से लाभ ।
★६. पाप वर्ग में, अन्त्यजों से लाभ ।
★७. मित्र राशि में, मित्र संग से लाभ ।
★८. मित्र नवांश में, विव्यय (उत्कोच) से लाभ ।
★९. वर्गोत्तम में, सुव्यवहार से लाभ ।
★१०. शत्रु राशि में, कृपाचार से लाभ (कूप = रन्ध्र / छिद्र) | कृपाचार - दोषदर्शन/ चुगली |
★११. शत्रु नवांश में, दम्भ (पाखण्ड) से लाभ ।
★१२. स्व राशि में क्रयविक्रय से लाभ ।
√●●१२. द्वादश में बुध...
★१. उच्च राशि में, गीत वाद्य में व्यय ।
★ २. उच्च नवांश में, गुणीजनों पर व्यय ।
★३. शुभ वर्ग में, प्रसंगों पर व्यय ।
★४. नीच राशि में, निग्रह ( दमन) पर व्यय ।
★५. नीच नवांश में, नीच संग से व्यय ।
★६. पाप वर्ग में, नीच लोक में तृप्त्यर्थ व्यय ।
★७. मित्र राशि में, मित्राश्रय से व्यय ।
★८. मित्र नवांश में बान्धवों पर व्यय ।
★९. वर्गोत्तम में, व्रत उपवासादि पर व्यय । ★१०. शत्रु राशि में, सुतज व्यय (सुत - शत्रु) ।
★११. शत्रु नवांश में, अन्य बहूभव व्यय ।
★१२. स्व राशि में, भोग सामग्री पर व्यय ।
√●बुध ग्रह के गुण प्रभाव को परिकल्पना हेतु महाभारत की एक कथा का यहाँ पर उल्लेख करता हूँ। अवतार रूप में, द्वापर के अन्त में, देवता अपने-अपने अंश भूमि पर भेजे। विष्णु कृष्ण के रूप में, इन्द्र अर्जुन के रूप में, वायु भीम के रूप में, धर्म युधिष्ठिर के रूप में, दोनों अश्विनी कुमार नकुल सहदेव के रूप में, सूर्य कर्ण के रूप में। किन्तु चन्द्रमा स्वयं अपना अंश न भेज कर अपने पुत्र बुध को मात्र १६ वर्ष के लिये अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के रूप में पृथ्वी पर भेजा। १६ वर्ष पूर्ण होते ही अभिमन्यु देह त्याग कर दिव्य शरीर से अपने पिता चन्द्रमा के पास बुध का अंशभूत होकर लौट आया। अर्जुन को अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु से बड़ा दुःख हुआ। उस दुःख निवृत्ति हेतु भगवान् कृष्ण उन्हें चन्द्र लोक ले गये। वहाँ अर्जुन ने अभिमन्यु को तथावत देखा और पुत्र शब्द से संबंधित किया। उसने कहा, मैं तुम्हारा पुत्र नहीं है।
√●अर्जुन को ज्ञान हुआ कोई किसी का पुत्र नहीं, पिता नहीं। विष्णु की माया के प्रभाव से इस लोक में विविध सम्बन्ध देखे जाते हैं।
√●'अभि' अव्यय उपसर्ग है। इसका अर्थ है 'की ओर 'की दिशा में।' मन्यु= मन् + युच्। क्रोध, रोष, यज्ञ, अग्नि, शिव, विष्णु क्रोध से शरीर तपता है। यज्ञ में आहुतियाँ भस्म होती हैं। अग्नि सब को जलाता है। शिव की ललाटाग्नि में काम नष्ट होता है। विष्णु अपनी जठराग्नि में काल मूल तक पचा लेते हैं। इसी मन्यु/यज्ञ/ विष्णु की ओर सब की बुद्धि जाती है। इसलिये १६ वर्ष की वय तक हर व्यक्ति अभिमन्यु है। अभिमन्यु १६ वर्ष की वय में एक बच्चे का बाप बना। 'परीक्षित्' उसका पुत्र था। इतनी ही अवस्था में उसने अमित साहस शौर्य एवं बुद्धि कौशल का परिचय दिया। इससे निष्कर्ष निकला १६ वर्ष की अवस्था तक बुध का विशेष प्रभाव रहता है। उत्साह, ओज, वीर्य, कामुकता, बुद्धिचातुर्य, बलिदान का प्राचुर्य बुध में रहता ही है।
अंक 5 बुध के लिए,हरा रंग हरा पत्थर पन्ना, हरी घास, किन्नर को दान, हरी साडीया, मटकी, कुल्लड़, कटोरी, भरनी, हांंड़ी, हरे कपडे ,इलैची,पान, हरी पत्तेदार सब्ज़िया,धनिया,पालक, मेथी, खड्डे वाली वस्तुवे, मुंग दाल ढोकली, पास्ता, पाइप, गले कक चैन, नाक की नथ, अंगूठी, हरा बल्ब, निरोध, हाथ पांव के दस्ताने, बच्चियों के कपडे, चमड़े के सामान, वाद्ययन्त्र, माइक, स्पीकर, रेडियो, ढोलक, तबला, हारमोनियम, मजीरा, सितार, गिटार, बांसुरी, ताम्बे के खड्डेवाले सिक्के, सांभर वडा, 5₹सिक्का, फिटकरी मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे के बर्तन, हाथी दाँत और कपूर का दान किया जाता है। ध्वनि यन्त्र माइक, स्पीकर, हैडफ़ोन,