मंगल की सारगर्भित सम्पूर्ण व्याख्या

मंगल 
    
    मंगल का स्वरूप

    मंगल को पृथ्वी का पुत्र कहा गया है। ग्रहों के कुटुमब में रविपृथ्वी केपिता के स्थान में है और चन्द्र माता के स्थान में है। इसलिये मंगल में रवि औरचन्द्र दोनों के गुणों का कुछ कुछ मिश्रण पाया जाता है अब इस विषय मेंशास्त्रकारों के मतों का परिचय देते है।मंगल- अस्थिर बुद्धि, युवा/यौवन, स्वतन्त्र, भाई-बहन, रक्त, सड़ी गली चीजें, राजदूत, सैनिक गतिविधियां, वाणिज्य, हवाई यात्रा, बुनाई का काम, प्रवक्ता, सर्जन, युद्धक्षेत्र, सेनापति, अग्नि, मूत्रोत्सर्जन तन्त्र, तार्किकता, अग्निस्थल, रसोई, इंजनकक्ष, बॉयलर, रात्रिकर्मी, हत्याएँ, षड़यन्त्र, हड़ताल, घाव, संगठनशक्ति प्रशासनिक क्षमताएँ, नेतृत्वक्षमता, सोना व तांबा आदि।
हिंसो थुवा पैत्तिक रक्त गौर। पिंगेषछणों वह्ि निभौ प्र्द:। शूरो5प्युदादः सतमास्त्रकोणो प्रण्णाधिको भूतगयः: सगर्व:॥ 

मंगल हिंसक, तरुण, पित्तप्रकृति, लाल गौरवर्णी, रक्त नेत्र वाला, अग्ति जैसा उग्र, शूर, उदार, तामसी स्वभाव वाला और गवींला होता है। इमका आकार त्रिकोण जैसा है। इसमें मज्जा अधिक होती है। इसका वाहन मंदा है। यह मेष व वृश्चिक राशियों का स्वामी है। नभोमण्डल में अनुक्रम से बृहस्पति के पश्चात मंगल का स्थान है। इसका आकार छोटा है तथा अग्नि जैसे चमकीले वर्ण का है। कुज, भौम, लोहितांग, अंगारक, क्रूर नेत्र, भूसुत, धरापुत्र, रक्‍्तांग, आंगिरस, रेत, कोण, स्कन्द, क्रूराक्ष, क्षितनन्दन, मेदिनीज आदि मंगल के पर्याय नाम हैं। यह कालपुरुष का पराक्रम और पुरुष ग्रह है, पित्त प्रकृति, क्षत्रिय वर्ण, अग्नि तत्त्व, तमोगुणी, दक्षिण दिशा का स्वामी, ऋतु ग्रीष्म, रस कट, धातु स्वर्ण, लोहा, स्थान रसोईघर, देवता स्वामी कार्तिकेय, पाप ग्रह, वस्त्र मोटे लाल, लोक-मृत्युलोक, धान्य-मसूर और रल मूंगा है। यह मकर में उच्च तथा कर्क में नीच का होता है। मेष और वृश्चिक इसकी स्वराशि हैं। सूर्य, चंद्र, बृहस्पति मित्र ग्रह; शुक्र, शनि सम ग्रह तथा बुध शत्रु ग्रह है। यह अपने स्थान से चौथे, सातवें और आठवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है। 

पित्त-पित्ताशय, जननेन्द्रिय, मूत्राशय, मस्तक, नाक, मांस, मज्जा, भाई, सैन्यबल, बाहुबल, अस्त्र-शस्त्र, भूमि, पराक्रम, परनिन्दा, परशु, कुठार, अपराध विषयक मल न, सर्वे विभाग, आबकारी, पहलवान, बीडी-सिगरेट आदि का कारक मंगल है। इसकी उपधातु तांबा और नक्षत्र मृगशिर, चित्रा और धनिष्ठा हैं। जन्म समय में चंद्र इन नक्षत्रों में से किसी एक पर हो तो मंगल की महादशा चल रही होती है। 

इसके अशुभ प्रभाव में होने से रक्‍्तविकार, अस्थि-मज्जा, गुदा, दन्त, उदर तथा कोढ़ आदि रोगों से पीड़ा होती हे। 

    आचार्य --शरीरलक्षण -वक्र: नात्युच्यो रक्तगौरः । यह बहुतऊंचा नहीं होता। वर्ण कुछ लाल और गौर होता है। सूर्य का लाल वर्ण औरचन्द्र का गौर वर्ण इन दोंनों का यह मिश्रण हुआ। सत्वं कुजः- सत्व यह इसकागुण है। क्षितिसुतो नेता - यह सेनापति है। अतिरिक्तः - बहुत लाल होता है।समज्जा भौमः - मज्जा धातु पर अर्थात मष्तिष्क पर इसका अधिकार है। स्थान- अमनि, वस्त्र - जला हुआ, धातु - सुवर्ण, ऋ्ृतु- ग्रीष्म, रूचि - कडवी इसप्रकार इसके अन्य विशेष हैं।
    कल्याणवर्मा-चेत: सत्वंधराजः, कुमारः सेनापतिः, दिशा -

    दक्षिण, भौमः - पापा, देवता - अरूण तथा कार्तिकेय, पुरूष, वर्ण - क्षत्रिय,रूचि - कड वी, स्थान - अम्ि, वस्त्र - दृढ, घातु - सोना, दिन, ऋ्ृतु - ग्रीष्म,वेद - सामवेद, लोक - तिर्यक् लोक, इस प्रकार मंगल का स्वरूप है।

    वैद्यनाथ -- सत्वं भौमः, कुजोनेता, संरक्तगौरः, ताराग्रहो धरासुतः।यह ग्रह तारात्मक है। मंगल: पापः - यह पाप फल अधिक देता.है।आरःपृष्टे नोदंति सर्वदा यह नित्य ही पिछ ले भाग से उदय होता है। क्ष्माजोचतुष्पदी - यह चौपाया है। कुजो भवति शैलाट विसंचरन्तः - पर्वत और जंगलोंपर इसका अधिकार है। बालो धराजः - यह बाल है। आरःशाखाधिपः - यहशाखाओं का स्वामी है। वर्ण- आरक्त, द्रव्य-सुवर्ण, देवता -कार्तिकेय,रत्न - प्रवाल, वस्त्र - बला हुआ, दिशा - दक्षिण, ऋ्रृतु - ग्रीष्म, स्थान -अम्ति, प्रदेश -लंका से कृष्णा नदी तक, वर्ण - क्षत्रिय, गुण - तम, पुरूष,तत्व - तेज, धातु - मज्जा, रूचि - कड वी, दिन। अथोर्ध्वृष्टि भौमः - इसकीदृष्टि ऊपर होती है। शनिना महीसुतः - यह शनि के द्वारा पराजित होता है।

    मंगल के बलवान होने के स्थान इस प्रकार है -- आर: स्ववारनवभागद्दगाणवर्गे।मीनालिकुंभमृगलुंबरयामिनीषु। वक्रे च याम्यदिशि राशिमुखेबलाढ्यो। मीने कुलीरभवने च सुखं ददाति॥ मंगलवार को, नवांश तथा ट्रष्काणकुण्ड ली में स्वगृह में हो तब, मीन, वृश्चिक, कुंभ, मकर तथा मेष इन राशियोंमें, रात्रि में, वक्री हो तब, दक्षिण दिशा में तथा राशि के प्रारंभ में मंगल बलवानहोता है। यह मीन तथा कर्क राशियों में सुख देता है।

    मंगल के अधिकार के रोग इस प्रकार है --

    पीनबीजकफशस्त्रपावक ग्रंथि रूग्व्रण दरिद्र जामयैः ।
     वीरशै वगण भैरवादिभिर्भीतिमाशु कुरूते धरासुतः ॥

    अंड वृद्धि, कफ, शस्त्र तथा अम्नि द्वारा पीड़ा, फोडे, फुन्सी आदीगांठो के रोग, व्रण, दारिद्रय के कारण उत्पन्न हुए रोग तथा शिव के गण भैरवआदि देवताओं द्वारा पीड़ा ये फल मंगल से प्राप्त होते है।
    पराशर -- सत्वं कुजः, नेता श्ञेयो धरात्मजः, अत्युच्चांगो रक्तभौमो,भौमः शिखिका देवता। - षडाननः, भौमा नरः, भौमः अमिः, कुजः क्षत्रियः,आरः तमः, भौमः मज्जा, भौमवारः, भौमः तिक्तः, भौमः दक्षिणे, कुजः निशायांबलीनः भौमः कृष्णे च बलीनः, क्रू रः । स्वदिवससमहोरामासपर्वःकालवीर्यक्रमात्ः । शकुबुगुशु-चराद्या वृद्धितो वीर्यवकत्तराः | स्थूलान् जनयतिरक्तचित्रं कुजस्य। कुजः ग्रीष्मः धातु आर विज्ञिया धातु 
सूयो दुर्भगान् नसूर्यपुत्रकः । क्षीरोपेतान् तस्थ चंद्रः कटु काद्यान्धरासुतः | वस्तरम

    गुणाकर -- सत्वं भौमः, नेता भौमः, भौमः शोणः, भौमः दक्षिणः। कुसप्रहः कुजः, भौमः क्षत्रियः, साम्नां महीजः, भौमः नरः, भौमः सहोत्यः,भौमःस्कन्दः, वस्त्रम्-अम्निदग्धम्, भौमः कांचनम्, भौमः अग्निशाला, भौमःतिक्तम्, भौमः दिनम्, भौमः अम्नि, भौमः तमःक्ष्मातनयः ।

    सर्वार्थचिंतामणी -- भौमो नरपालमुख्यः, भौमः अतिरिक्तः भौम- अम्नि, भौम - दक्षिण, भूसूनुः पापः, कुजात् नरेज्या, भौम - मज्जाभेद,देवस्थान अमनि, वस्त्र - कुजस्याम्निहतं क्लिन्नं, हिरण्यं तु धरासुतश्च, रक्तं चित्रंकुजस्य, ऋ्ृतु - ग्रीष्म, भूमिसुतस्य तिक्तं, दिन कुजस्य, भौम - धातु ग्रह, ऊ.ध्र्वृष्टि , सेनापतिः, कुजः, सत्वं कुजः ।

    जयदेव -- आर- दक्षिण, कुज- सत्वं (शौर्य), भौमनरः, क्षितिजं ब्रुवते ऽरण्यचारिणम्। मध्यान्हं भूमिजैः, भौमः व्योमदर्शीनौ, भौम - धातु, भौम- चतुष्पदौ, भौम - शेष, दक्षिणमुखाः, नेताभौमः, मंगलः - स्वामी, स्वर्णकारः क्षितैः पुत्रः, युवा कुजः, भौमः प्रकृत्या दुःखदो नृणाम्, आरः क्षत्राणां, नक्तंकालः, कुजश्च बलीनः, देवस्थान, अम्नि, वस्त्र - वन्हिहत (जलाहुआ), धातु- मणि, भौम - विद्ठुम। (मुँगा)

    मंत्रेश्वर -- चौरम्लैंच्छ कृशानुयुद्ध भूमिदिग्याम्या कुजस्योदित। चोर तथा नीच लोगों के स्थान, अग्नि के स्थान, युद्धभूमि, दक्षिण दिशा, ये मंगल के स्थान है। भौमो महानसगतायुध भृत्सुवर्णकाराज कुक्कुट शिवाक पिगृध्रचौराः । रसोइये, शस्त्रधारी, सुनार, बकरा,मुरगा, सियार, बन्दर, गीध
    तथा चोर इन पर मंगल का अधिकार है। देवता - गुह, अननि, प्रदेश-अवन्ति,रत्न - विद्ठुम, वस्त्र - अन्निदाध कुजस्य, रस - भुमिसुतस्य तिक्तं, चिन्ह -क्षितिभूवां: स्यादद दक्षिणे लांछ नम् - शरीर के दाहिने भाग पर कुछ विशेष चिन्हहोता है। कंट कनगौ भौमार्कजो - कांटे दार वृक्षों पर मंगल का अधिकार है।इसकी आयु सोलह वर्ष की है।

    पुंजराज -- देवता - गुह, सत्वं भौमः, किलसैन्यनेताभौमः वर्ण -रक्ततर, भूमि अधिपति, दिशा - दक्षिण, वेद - सामवेद, स्वभाव - क्रूर, वर्ण- क्षत्रिय, नरः कुजः, कटु कौ कुजारको - कड वी रूचि, काल - वासर (दिन),पुंलोकेशा कुजादित्यौ - यह मृत्युलोक का स्वामी है। (एक अन्य मत -तिर्यग्लोकस्य सुर्यारौ - यह पाताल लोक का स्वामी है।)

    विलियम लिली -- अनुक्रम में मंगल का स्थान गुरू के बाद है।इस का आकार छोटा है और यह अग्नि जैसे चमकीले वर्ण का दिखता है। यह६८६ दिन तथा २२ घंटों में राशिचक्र की परिक्रमा पूरी करता है। इस का उत्तरकी ओर अधिकतम शर ४ - ३१ होता है और दक्षिण की ओर ६-४७ होताहै। यह ८० दिन वक्री होता है। तथा २ या ३ दिन स्थिर होता है। कर्क, वृश्चिकतथा मीन इन तीन जल राशियों पर इस का पूर्ण अधिकार है। यह पुरूष प्रकृतिका, रात्रि के समय का, उष्ण, रूखा, अग्नि जैसा ग्रह है। यह झगडे तथा विरोधका प्रेरक है।

    अब इन शास्त्रकारों के मतों का विवेचन करेंगे।

    सत्त्वं-सामर्थ्य -- इस ग्रह में शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकारका सामर्थ्य है। मल्ल, पुलिस, सैनिक, इंजीनियर, ड्राइवर आदि लोगों में जोशारीरिक सामर्थ्य जरूरी होता है उस पर मंगल का अधिकार है। दूसरा मानसिकसामर्थ्य उन लोगों में होता है जो राष्ट्र के उदयकाल में बड़े बड़े नेता होते है।उनपर भी मंगल का अधिकार होंता है। ये नेता क्रान्ति चाहते है और उसकीसफलता के लिये प्राणों की बाजी लगा देते है। विपत्ति से सामना करनेवाले,हठी तथा आग्रही स्वभाव के इन लोगों का मानसिक सामर्थ्य बहुत अधिक     होता है। भारत में १९०८ से जो क्रान्तिकारी हुए, उनपर प्रायः मंगल का हीअधिकार था।

    नेता -- (सेनापति) - सभी शास्त्रकारों ने इस ग्रह के जो वर्णन दिरहै उनके अनुकूल ही यह सेनापति पद है।

    धातु -- प्रायः सभी शास्त्रकारों ने इस ग्रह के अधिकार में मन्जाधातु कही है। मेरे विचार में मज्जा धातु मस्तिष्क में होने के कारण इस पर बुदका प्रभाव होना चाहिये । चरबी पर गुरू का और मांस पर मंगल का स्वामित्वमानना उचित है। इस मत के अनुकूल वर्णन सिर्फ मंत्ेश्वर ने किया है - इस ग्रहका मांस और अस्थियों पर स्वामित्व है।

    स्थान-- मंगल का स्थान अननि कहा गया है। सिर्फ आंखों से देखाजाय तो यह ग्रह अम्नि के समान ही लाल दिखता है इसी पर आधारित यहकल्पना है। मंगल पर से ही किसी व्यक्ति के रसोईघर का विचार किया जासकता है । चोर और नीच लोगों के स्थान यह जो वर्णन है यह गलत मालूमहोता है । इन लोगों के स्थानों पर शनि का अधिकार होना चाहिये । युद्ध कास्थान यह वर्णन ठीक है। युद्धभूमि पर मंगल का निवास होता है। जिस पक्ष कीओर मंगल प्रबल होगा उसी की युद्ध में विजय होती है।

    वस्त्र -- कल्याणवर्मा ने दृढ तथा पराशर ने लाल रंग के रंगबिरंगेवस्त्र ऐसा वर्णन दिया है । अन्य शास्त्रकारों ने जला हुआ वस्त्र कहा है । लोगोंमें भी कहावत प्रचलित है कि सोमवार का वस्त्र फट ता है, मंगलवार का जलताहै और गुरूवार तथा बुधवार का अच्छ । होता है। इसीलिये मंगलवार को नयावस्त्र नहीं पहनना चाहिये ऐसा माना जाता है । मेरे विचार में जले हुए वस्त्र केबारे में यह मत ठीक नहीं है । यहां कल्याणवर्मा का ही मत योग्य प्रतीत होताहै। पुलिस, सैनिक आदि जिन लोगों पर मंगल का स्वामित्व है उनके वस्त्र मोटेऔर बहुत समय तक टि कनेवाले ही होते है।
धातु -- सुवर्ण - ताम्र मंगल और सोना दोनों का रंग कुछ लाल और गौर

    है यह देख कर इस धातु पर मंगल का अधिकार माना गया है। किन्तु यह मतयोग्य नहीं है। सोने को आजकल के राष्ट्रीय तथा राजकीय व्यवहार में बहुतमहत्व का स्थान प्राप्त हुआ है तथा राजकीय व्यवहारों पर रवि का अधिकारहै। अतः सुवर्ण पर भी रवि का स्वामित्व मानना चाहिए। युद्ध के समय लोहेको महत्व प्राप्त होता है। तोपें आदि सभी शस्त्र लोहे के ही बनते हैं। युद्ध औरशस्त्रों पर मंगल का अधिकार है। अतः मंगल के अधिकार में लोह धातु हीयोग्य है।

    ऋतु -- ग्रीष्म - बरसात के दिनों से पहले इस ऋतु में गरमी की बहुततकलीफ होती है अतः इसपर मंगल का अधिकार मानना ठीक है।

    दिशा -- दक्षिण - पुराणों में यम को दक्षिण दिशा का स्वामी मानाहै। यम के समान ही मंगल भी जीवहानि कराता है इसलिये यह दिशा वर्णनठीक है।

    शुभाशुभ -- इसे पापग्रह माना गया है। यह स्वभावतः दाहकारक हैइसीलिये इसे पाप फल देनेवाला माना गया है। यह एक पक्ष है। इसके शुभ फलभी मिलते हैं इसका अच्छी तरह विचार नहीं किया गया है।

    देवता -- गुह कार्तिकेय, स्कन्द अथवा षड ानन ये शिवजी के पूत्र केनाम हैं। पुराणों में कहा गया है कि ये देवताओं के सेनापति थे तथा इन्होंनेतारकासुर का वध किया था। इनके समान मंगल को भी सेनापति कहा गया हैइसलिये ये इस ग्रहों देवता हुए।

    लिंग -- यह पुरूष ग्रह है।

    वर्ण --क्षत्रिय-यह युद्ध का कारक है अतः इसे क्षत्रिय माना गया।रूचि -- आचार्य और पुंजराज ने इस ग्रह के अधिकार में कड वीरूचि मानी है किन्तु यह ठीक प्रतीत नही होता। अन्य शास्त्रों में तीखी रूचिमानी गयी है वह योग्य है। मिर्च का वर्णन भी मंगल के समान ही लाल होताहै। अतः तीखी रूचि पर ही उसका स्वामित्व मानना उचित होगा।

    काल -- यह दिन का अधिपति है।

    वेद -- चार वेदों में इसे सामवेद का अधिकारी कहा गया है। किन्तुसामवेद गायन का वेद है उससे इस ग्रह का सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता। मंगल कास्वर या ध्वनि पर अधिकार होता है - गायन पर नहीं। वस्तुतः इसे अथर्ववेद काकारक मानना चाहिये।

    लोक -- कुछ शास्त्रकारों ने इसे तिर्यक लोक अर्थात पाताल कास्वामी माना है। इसे यम लोक का स्वामी मानना उचित है। कुछ शास्त्रकारों नेमृत्युलोक कहा है वह साधारणतः ठीक है क्योंकि मृत्युलोक के समान ही मंगलभी भौतिक तत्त्वों का (मटीरियलिस्टि क) ग्रह है।

    उदय -- इसका उदय पृष्ठ अर्थात् पिछ ले भाग से होता है।

    वर्ग -- चंतुष्पाद - यह क्रूर ग्रह है अतः कुत्ता, सियार, भेडि या,बिल्ली, चीता, शेर, लाल मुंह के बंदर आदि क्रूर जानवरों पर इसका अधिकारहै। इसीलिए इसे चतुष्पाद कहा गया है।

    संचारस्थान -- कुछ शास्त्रकारों ने पर्वत, अरण्य यह स्थान कहाहै तो दूसरों ने इसे आकाशगामी माना है। इनमें पहला मत अधिक योग्यहै। क्योंकि मंगल के अधिकार के उक्त क्रूर जानवर पहाडों तथा जंगलों मेंही रहते है।

    अवस्था--इस ग्रह का मानव की बाल्यावस्था पर स्वामित्व है।इसी अवस्था में रक्त दूषित होने की सम्भावना अधिक होती है इसलियेविषमज्वर, खुजली, फोडे फुन्सी, माता आदि रोग होते है। रक्त के इस सम्बन्धसे ही मंगल का बाल्यावस्था पर अधिकार माना गया होगा। २६ से ३२ वें वर्षतक अर्थात तरूण अवस्था में भी इस ग्रह का प्रभाव प्रतीत होता है।

    अधिप -- शाखाधिप इस वर्णन का स्पष्टीकरण नहीं होता।

    रत्न -- प्रवाल - इस रत्न का मंगल से क्या सम्बन्ध है यह स्पष्ट नहींहै। इस विषय में एक अनुभव नोट करने योग्य है। एक छोटा लड का स्वभाव से

    बहुत क्रोधी और अति तामसी था। यह हमेशा कही से गिर पड़ ता जिससे खूनबहकर उसे तकलीफ होती थी। इसे बारबार ज्वर आता था। कई प्रयत्न किएगए किन्तु इसे कोई लाभ नहीं हुआ। एक बार एक ईरानी ने एक उत्तम प्रवालइस लड के के लिये दिया। वह उसके गले में बांधते ही उसकी स्थिति में सुधारहुआ। स्वभाव बदलकर वह अच्छी तरह रहने लगा तथा गिरना, ज्वर आना,खून बहना, जलना आदि प्रकार भी बन्द हुए।

    तत्व -- तेज - इस त्व पर वस्तुतः रवि का स्वामित्व है किन्तुमन्त्रेश्वर ने यह मंगल का त्व माना है। पुंजराज के मत से यह भूमि काअधिपति है तो अन्य शास्त्रकार इस का सम्बन्ध अग्नि से कहते है। इन मेंपुंजराज का मत ठीक है। भूमि के साथ अग्नि का भी इस ग्रह से सम्बन्ध हो

    सकता है।

    दृष्टी -- ऊर्ध्वृष्टि यह वर्णन योग्य है। इसका अनुभव सेना, पुलिसआदि की परेड में देखना चाहिए। इन्हें हमेशा ृष्टि सीधी रखनी पड ती है। पैरोंके नीचे कुछ भी हो उसका विचार करना उन्हें सम्भव नहीं होता। अतः यहवर्णन ठीक है।

    पराजय -- शनि के द्वारा इस ग्रह का पराजय होना कहा गया है।किन्तु अनुभव उल्टा आता है। मंगल द्वारा ही शनि का पराजय देखो गया है।बलवान काल -- मंगल किस समय बलवान होता है यह पहलेकहा ही गया है। पराशर के मत से कृष्ण पक्ष में तथा संध्या समय यह बलवानहोता है। जयदेव ने रात्रि का समय कहा है। जयदेव का मत योग्य है। इसनेमध्यान्ह काल भी कहा है। जीवन में तरूण अवस्था यही मध्यानह है जब मनुष्यपराक्रम करता है, धन तथा कीर्ति प्राप्त करता है और संसार में मग्न होता है।इस काल में मंगल को बलवान मानना योग्य ही है।

    आप्त -- बन्धुओं का विचार मंगल से करना चाहिये ऐसा कहा गयाहै। कारक प्रकरण में इसका विवेचन करेंगे।
    जाति -- सामान्यतः इसे क्षत्रिय माना गया है। जयदेव ने इसकीजाति सुनार कही है। शनि महातनय ग्रन्थ में भी इसे सुनार ही कहा गया है।वास्तव में सुनार जाति पर मंगल का ही अधिकार है क्यों कि सोने के अलंकारबनाते समय इन्हें अग्नि से ही काम लेना पड ता है।

    लांछ न-- यह दो प्रकार का होता है। तिल, व्रण आदि शारीरिकलांछ न है। दुर्वर्तन द्वारा लोगों में अपकीर्ति होना यह दूसरे प्रकार का लांछनहै। इन दोनों पर मंगल का अधिकार है।

    स्पष्ट नहीं है।मुख -- इसका मुख दक्षिण की ओर माना गया है इसकी उपपत्ति

    धान्य -- मसूर की दाल पर मंगल का अधिकार है। मंगल कीशान्ति के लिये इसी के दान का विधान है।

    विलियम लिली का वर्णन -- इसे रात्रि का ग्रह कहा गया है क्योंकि इस के कार्य रात के समय ही जल्दी होते है। यह अग्नि के स्वरूप का हैअत: इसे उष्ण और रूक्ष माना गया है।


    मंगल का मूल स्वरूप

    आचार्य--क्रूरहक तरूणमूर्तिरूदार: पैत्तिक: सुचपलः कृशमध्यःइसकी दृष्टि क्रूर अर्थात् उग्र होती है। आकार युवक जैसा होता है। यह उदार,पित्त प्रकृति का और चपल होता है। इस का मध्य भाग (कमर) पतला होताहै। इस के अतिरिक्त यह ऊंचा नहीं होता और इस का वर्ण गौर होता है। यहपहले कहा जा चुका है।

    कल्याणवर्मा -- न्हस्वः पिंगललोचनो दढ वपूर्दीप्ताप्िकान्तिश्चलो । मज्जावानरूणाम्बरः पटु तरै शूरश्ज निष्पन्नवाक् । हस्वाकुबित     केशदीप्तरूणः पित्तात्मकस्तामसः । श्चंड: साहसिको विघात कुशल: संरक्तगौरःकुजः । यह नाटा, लाल आंखोंवाला, मजबूत शरीर का तथा अग्नि जैसातेजस्वी होता है। यह चंचल, लाल वस्त्र पहननेवाला, कुशल, वीर तथा बोलनेमें प्रवीण होता है। इसकी मज्जा धातु अच्छे परिमाण में होती है, केश छोटे औरलहरीले होते है तथा प्रकृति पित्त की होती है। यह तेजस्वी तरूण क्रूर, तामसीस्वभाव का, साहसी तथा किसी भी कार्य का विघात करने की प्रवृत्ति का होताहै। इसका रंग कुछ लाल और गोरा होता है।

    वैद्यनाथ -- क्रूरेक्षण स्तरूणमूर्तिरूदारशीलाः पित्तात्मकः सुचपलकृशमध्यदेशः। संरक्त गौररूचिरावयवः प्रतापी कामी तमोगुणरतस्तु धराकुमारः।यह क्रूर दृष्टि का, तरूण आकार का, उदार स्वभाव का, पित्त प्रकृति का,चपल, पतली कमरवाला, कुछ लाल गोरे वर्ण का, सुंदर अवयवोंवाला,पराक्रमी, कामुक तथा तामसी होता है।

    पराशर -- क्रूरो रक्तारूणो भौमश्चपलोदारमूर्तिकः । पित्तप्रकृतिकःक्रोधी कृशमध्यतनुर्दिजः । यह क्रूर, लाल वर्ण का, चपल, उदार, पित्त प्रकृतिका, क्रोधी और पतली कमर वाला होता है।

    गुणाकर -- हिंस्त्रो हस्वो दीप्तकायोऽग्निवर्णः शूरस्त्यागीपैत्तिकस्तामसश्च । मज्जासारो रक्तगौरो युवा स्याच्छ शश्चच्चंड: पिंगलाक्षोमहीजः । यह घातक, नाटे कद का, अग्नि जैसा तेजस्वी, शूर, उदार, पित्तप्रकृति का, तामसी, अच्छी मज्जावाला, कुछ लाल गोरा, तरूण, क्रोधी औरलाल आंखोंवाला होता है।

    सर्वार्थचिंतामणी

    कोपग्निनेत्र: सितरक्तगात्र:पित्तात्मकश्चंचलबुद्धियुक्तः । कृशांगयुक्तामसबुद्धियुक्तो भौमः प्रतापीरतिकेलिलोलः ॥ इसकी आंखे अम्नि जैसी लाल, वर्ण कुछ गोरा, प्रकृति पित्तकी, बुद्धि चंचल, अवयव कृश तथा वृत्ती तामसी होती है। यह पराक्रमी औरकामुक होता है।

    जयदेव--आरोऽप्युदारोऽपि च पीतनेत्र: कुरेक्षणोडसौ तरूणा-     त्मकश्च संरक्तगौरश्चपलोडऽतिहिस्त्रः पित्तीष्मवान् मञ्जिकयासुसारः। यह उदार,पीले रंग की आंखोबाला, क्रूर दृष्टि का, तरूण, कुछ लाल गोरा, चपल, बहुतघातक, पित्त और उष्ण प्रकृति का होता है। इसकी मक्जा धातु अच्छी होती है।

    मन्त्रेश्वर -- मध्येकृशः कुंचितदीप्तकेशः क्रेक्षणः पैत्तिकः उग्रबुद्धिः।

    रक्ताम्बरो रक्तनुर्महीजः श्षंडोऽत्युदार स्तरूणोऽतिमन्जः । इसकी कमर पतलीहोती है, केश लहरीले और चमकदार होते है। दृष्टि क्रूर होती है तथा प्रकृति

    पित्त की होती है। इसकी बुद्धि उग्र, वस्त्र लाल, शरीर लाल और मज्जाधातु

    अधिक होती है। यह क्रूर किन्तु उदार और तरूण होता है।

    पुंजराज -- हिस्त्रो युवापैत्तिक रक्तगौर: पिंगेक्षणो वन्हिनिभः प्रचंड:।शूरोष्युदारः सतमास्त्रिकोणो मज्जाधिको भूतनयः सगर्वः| यह हिंसक, तरूण,पित्त प्रकृति का, कुछ लाल गोरे वर्ण का, लाल आंखोवाला अम्नि जैसा, उग्र,शूर, उदार, तामसी स्वभाव का और गर्वीला होता है। इसका आकार त्रिकोणजैसा और मज्जा अधिक होती है।

    महादेव -- दुष्ट हक् तरूणः कृशमध्यो रक्तसितांगः पैत्तिकश्चंचलधीरूदारः प्रताप्यारः । इसकी दृष्टि दूषित होती है। यह तरूण, कुछ लाल गोरेवर्ण का, पित्त प्रकृति का, चंचल बुद्धि का, उदार, शूर और पतली कमरवालाहोता है।

    विलियम लिली -- मंगलप्रधान व्यक्ति मझले कद के होते है।शरीर मजबूत होता है। हड्डीयां बडी होती है। ये स्थूल नहीं होते, कृश हीहोते है। वर्ण कुछ लाल होता है। केश लाल वर्ण के, रेत जैसे और कई बारलहरीले होते है। दृष्टि तीक्ष्ण और भेदक होती है। आकृति आत्मविश्वासयुक्तऔर धैर्यशाली प्रतीत होती है। ये क्रियाशील और निर्भय होते है। यहमंगल पूर्व की ओर हो तो वे व्यक्ति पराकमी और गौर वर्ण के तथा ऊंचे होतेहै। इनके शरीरपर केश बहुत होते है। यह यदि पश्चिम की ओर हो तो वर्णगहरा लाल होता है। कद नाटा होता है। मस्तिष्क छोटा होता है, शरीरचिकना होता है और केश कम होते है। इसके केश पीले होते है औरस्वभाव प्रायः रूखा होता है।
    सिमोनाईट -- प्रमाणबद्ध किन्तु नाटा कद, कृश शरीर, मजबूतस्नायु, लाल वर्ण, तीक्ष्ण दृष्टि, वक्र नाक, लाल और चमकदार केश, अग्निजैसी आकृति, अच्छ। मस्तिष्क, संघर्षप्रिय होना, बडे और नीरोग अवयबतथा स्वभाव उग्र होना थे मंगल के लक्षण है।

    कुण्ड ली में मंगल की स्थिति अच्छी हो तो उसका फल क्या होता है।इस विषय में विलियम लिली कहते है - साहसी और धिर्यशाली, दूसरों कोतुच्छ समझनेवाला, तर्क की ओर ध्यान न देनेवाला, आत्मविश्वासी, दढ,पराक्रमी, युद्धप्रिय, किसी भी संकट में खुद को फंसानेवाला, किसी के आगें नझुकनेवाला अपनी ही प्रशंसा करनेवाला, अपनी विजय के आगे सब कुछतुच्छः माननेवाला किन्तु, अपने व्यवहारों में व्यवस्थित ऐसा यह व्यक्ति होताहै। यदि कुण्ड ली में मंगल दूषित हो तो - वह व्यक्ति बकबक करनेवाला,उद्धत, अप्रामाप्रिक, झगडालू, हिंसक, चोर, खुनी, व्यभिचारी और दुराचारीहोताः है। यह वायु के समान चंचल, देशद्रोही, डाकू, साहसी, अमानुषिकप्रकृति का और ईश्वर से भी न ड रनेवाला होता है। यह किसी की परवाह नहींकरता। यह कृतान, विश्वासघातक, लुटेरा, भयंकर और उग्र होता है।

    मंगल जब अच्छ। फल देता है तब आकाश में उसकी स्थिति कैसीहोती है इसका वर्णन आचार्य ने बृहद्संहिता में इस प्रकार किया है।विपुलविमलमूर्तिः किंशुकाशोकवर्णः स्फुट रूचिर मयूखस्तप्तताम्र प्रभाभः।विचरति यदि मार्गे चोत्तर मेदिनीजः। शुभकृदवनिपानां हार्दिदश्च प्रजञानाम् ॥अर्थात - इसका आकार बडा होता है, वर्ण अशोक अथवा किंशुक के फुलोंजैसा लाल होता है, किरणें स्वच्छ और मनोहर होती है, कान्ति तपे हुए तांबे केसमान होती है और यह उत्तर मार्ग से चलता है तब राजा और प्रजा केलिये कल्याणकारी होता है। ग्रह उत्तर या दक्षिण क्रान्ति में कब चलते है ।इसका वर्णन हमारे पंचागों में नही होता। इसके लिये राफेल के अंग्रेजी पंचांगका ही अवलोकन करना पड ता है जिसमें ग्रह की दैनिक क्रान्ति और शर काविवरण दिया जाता है।
    पूर्वोक्त स्वरूप का विवेचन -- अब तक जो मंगल का स्वरूषकहा गया है वह ऋषियों के अं्तज्ञान पर आधारित वर्णन है क्योंकि उस प्राचीनसमय में दर्बीन आदि द्वारा वेध लेने की पद्धति नही थी। तथापि यह वर्णनप्रत्यक्ष स्थिति से बहुत अधिक मिलता है।

    तरूण -- दूरबीन से देखने पर मंगल अग्नि जैसा तेजस्वी औरकान्तिमान प्रतीत होता है इसीलिए इसे तरूण कहा गया है। मंगल प्रधानव्यक्ति आयु के ४२ वें वर्ष भी २५ वर्ष के समान तरूण प्रतीत होते है ऐसाअनुभव भी आता है।

    क्रूरद्दक -- अग्नि की ओर देखा नहीं जाता उसी प्रकार इस व्यक्तिसे नजर मिलाना मुश्किल होता है। इसकी दृष्टि भेदक और पूरे बदमाश केसमान होती है।

    उदार -- जब से अग्नि का पता चला है संसार के लोगों ने उस सेअनगिनत लाभ उठाए है। दूसरों के लिये खुद को कष्ट देते हैं इसलिये मंगलप्रधान व्यक्तियों को उदार कहा गया है।

    पैत्तिक -- अम्नि के समान ऊष्ण होने से ऊष्णता का विकार जो पित्तवही इस व्यक्ति की प्रकृति होती है।

    चपल -- पित्त प्रकृति के व्यक्ति चपल होते ही है। काम करने काउत्साह इन में बहुत होता है।

    कृशमध्य --कमर पतली होना इस स्वरूप का प्रत्यय सैनिक,पुलिस, ड्राइवर, इंजीनियर इन वर्गोमें आता है।

    ऊंचाई -- सैनिक आदि वर्गों के मंगल प्रधान व्यक्ति बहुत ऊंचे होते

    हैं। किन्तु वैद्य, औषधि विक्रेता, कसाई, दर्ज, सुनार, लुहार, चमार, नाई,रंगारी, रसोईये, बढ ई, राजनीतिज्ञ, शस्त्रास्त्रों के संशोधक, शस्त्रों के निर्माता,मिलमजदूर आदि वर्गों में जो मंगल प्रधान व्यक्ति होते है वे प्रायः नाटे कद केहोते है।
    संरक्तगौर-- खुली आंखों से भी मंगल का स्वरूप लाल दिखता हैइसलिये इसका वर्ण कुछ लाल गोरा कहा गया है।

    पिंगल लोचन -- आंखे पीली लाल होती हैं ऐसा वर्णन है। अनुभवऐसा है आंख की तारका (बीच का भाग) बहुत काली होती है और उसके चारोंओर सफेद भाग में लाल रंग की नसे अधिक मात्रा में होती हैं। दृष्टि बाज जैसीतीक्ष्ण होती है। कुछ उदाहरणों में तारका के चारों ओर का भागबहुत सफेदहोता है और दृष्टि सियार जैसी मालुम होती है। आंखे छोटी और चंचल होतीहै। ये दूसरे प्रकार की आंखे नाटे कद के व्यक्तियों में पाई जाती है।

    प्रचंड रूचिरावयव- दृढ वपु-- ऊपर मंगल के स्वामित्व में दोप्रकार के वर्गों के लोग बतलाए है। इनमें सैनिक आदि पहले वर्गों के लोगों मेंशरीर मजबूत होना दृढ वपु - यह फल मिलता है। दूसरे वर्ग में रूचिरावयवअवयव मनोहर होना - यह फल मिलता है।

    दीप्ताग्निकान्ति -- प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी - यह फलविशेषतः पहलवान, पुलिस आदि लोगों में देखा जाता है। इनका शरीर बहुततेजस्वी होता है।

    मज्जावान -- मज्जाधातु अधिक होना - यहां वास्तव में मस्तिष्कबलवान होना ऐसा फल कहना चाहिये । बुद्धि से काम लेनेवाले लोगों जैसेगणिततज्ञ, कवि, नाट ककार, लेखक, संशोधक के मस्तिष्क बहुत बलवानहोते हैं। इस बल का विचार मंगल की स्थिति से करना चाहिए।

    रक्तांबर -- मंगल का वर्ण लाल है इसलिये वस्त्र भी लाल कहागया। मंगल की शान्ति के लिए लाल वस्त्र दान दिया जाता है।

    शूर -- उपर्युक्त दो वर्गों में पहले वर्ग के लिए ही यह वर्णन ठीकहै। दूसरे वर्ग में यह फल नहीं मिलता।

    हस्वाकुंचितदीप्तकेश -- केश छोटे, लहरीले और चमकदार होनायह फल पुरूषों के लिये ठीक है। किन्तु स्त्रियों के विषय में अनुभव उलटा है।इन के केश लंबे, घने, काले, चमकदार और मोहक होते है।
    तामस -- लाल वर्ण क्रोध और सामर्थ्य का प्रतीक है इसलिये मंगतको तामसी प्रकृति का कहा गया है।(दया और प्रेम का वर्ण सफेद है, लज्जा कगुलाबी है, शर्म का हरा है तथा द्वेष और मत्सर का काला है ऐसा इन वणों काऔर मानव की भावनाओं का सम्बन्ध कहा जाता है।)

    साहसिक -- धै्य से साहसी कृत्य करनेवाला, संकट के स्थान ।भी न ड रते जानेवाला ऐसा यह व्यक्ति होता है।

    विषात कुशल -- किसी भी अच्छे कार्य में विध्न लाकर उसकनाश करने की इसकी प्रवृत्ति होती है। अग्नि जहां भी जाता है जलाने का हैकाम करता है। ऐसी ही इसकी प्रवृत्ति होती है। इसको काबू में रखकर अच्छउपयोग करना मानव पर अवलम्बित है।

    रतिकेलिलोल -- यह कामुक - उष्ण प्रकृति के लोगों में कामवासनाअधिक होती है। ये लोग शृंगारशास्त्रजज्ञ हो सकते हैं।

    हिस्त्र -- हिंसा करनेवाला - इसे लड़ाई में और किसी का खून कसेंमें हिचकिचाहट नहीं होती।

    त्यागी -- उदारता यह गुण भी इस में है यह विशेषता हैं।सकता है।उग्रबुद्धि -- बुद्धि तीक्ष्ण होती है। कोई भी बात बहुत जल्दी समझ

    त्रिकोण -- पुंजराज ने इसका शरीर त्रिकोणाकृति कहा है किन्तु यहमत ठीक नहीं क्यों कि यह कुछ लंबे गोल आकार का दिखाई देता है।

    सगर्व -- गर्वीला होना - यह अनुभव पूरी तरह आता है।

    विलियम लिली - ने इसका चेहरा गोल कहा है। धैर्यशाली,आत्मविश्वासयुक्त होता है। कद मझला होता है। यह पूर्व की ओर हो तो ऊंबेकद का होता है और शरीर पर केश बहुत होते हैं। पश्चिम की ओर हो तो शरीरदुबला पतला, सिर छोटा, नाजुक, किन्तु स्वभाव रूखा होता है।

    सिमोनाईट -- ने इसका नाक कुछ वक्र कहा है। गोल चेहरा- यह     फल दूसरे वर्ग के लोगों में मिलता है। निर्भय और आत्मविश्वासयुक्त मुद्रा यहइन लोगों की विशेषता है। इससे समाज में ये बहुत जल्दी पहचानें जा सकतेहैं। यह पूर्व या पश्चिम की ओर न हो तो कद मझला होता है। पूर्व और पश्चिमकी ओर हो तो विलियम लिली के अनुसार फल समझना चाहिए।

    राशियों की दृष्टि से -- मंगल के फल कर्क राशि में बहुत अच्छेमिलते हैं, वृश्चिक, धनु में साधारण होते हैं, सिंह में कुछ बुरे होते हैं, मेष में बुरेहोते हैं, वृषभ, कन्या, मकर में बहुत बुरे फल मिलते हैं और मिधुन, तुला,कुम्भ में साधारण अच्छे मिलते हैं।

    कारकत्व विचार

    कल्याणवर्मा --रक्तोत्पलताम्रसुवर्णरूधिरपारदमन: शिलाद्यानाम्।क्षितिनृपतिपतनमूच्छ पैत्तिकचौरप्रभुभौमः ॥ लाल कमल, तांबा,सोना, रक्त,पारा, मनःशिला, भूमि, राजा, गिरना, मूच्छ, पित्त तथा चोर इन का कारकमंगल है।

    वैदयनाथ-- सत्वं रोगगुणानुजावनिरिपुज्ञातीन्धरा सूनुनाः ॥| सामर्थ्य,रोग, गुण, छोटे भाईबहिन, शत्रु, जाति व जमीन इनका कारक मंगल है।

    गुणाकर -- सहोत्थ - छोटा भाई।

    पराशर -- सत्त्व-सद्य-भूमि-पुत्र-शील-चौर्य -रोग-ब्रह्मःश्रातृ-पराक्रम-अम्नि- साहस- राजशत्रुकाराः कुजः ॥ सामर्थ्य, घर, जमीन, पुत्र,स्वभाव, चोरी, रोग, ब्राह्मण, भाई, पराक्रम, आग, साहस, राजशत्रु।

    सर्वार्थचिन्तामणि -- पराक्रम - विजय - विख्याति - संग्राम -साहस - सैनापत्य - दण्ड नेतृत्व - खङ्ग - परश्षध - कुन्त - कुठ ार - शतष्ची -     भिन्दिपाल - धनुर्बाण - नैपुण्य - धृति - कान्ति - गाम्भीर्य -काम -क्रोध -शत्रुवृद्धि -आग्रहावग्रह - परापवाद - स्वतंत्र- धातृ - भूकारकः कुजः ॥

    पराक्रम, विजय, कीर्ति, युद्ध, साहस, सेनापतिपद, परशु, कुठ ार,इत्यादिशस्त्रोंमें निपुणता धैर्य, कान्ति, गम्भीरता, कामवासना, क्रोध, शत्रुओंमें वृद्धि, आग्रह, निश्चय, दुसरों की निंदा, स्वतंत्रता, आंवले का वृक्ष, जमीनइन पर मंगल का अधिकार है।

    मन्त्रेश्वर -- सत्त्ंभूफलितं सहोदरगुणं क्रौर्य रणं साहसं विद्वेषं चमहानसाभिकनकज्ञात्यस्त्रचोरान् रिपून् । उत्साहं परकामिनीरतिमसत्योक्तिंमहीजाद्वदे। द्वीर्य चित्तसमुन्नतं च कलुषं सैनाधिपत्यं क्षतम् । पराक्रम, जमीन,भाई, क्रता, युद्ध, साहस, द्वेष, रसोईधर, अगनि, सोना, जाति, अस्त्र, चोर,शत्रु, उत्साह, परस्त्रियों में आसक्ती, झूठ बोलना, वीरता, चित्त का विकास,पाप, सेनापतिपद, जखम, इसका विचार मंगल से करना चाहिये। इस लेखकमे रोगों के विषय में विशेष कारकत्व कहा है -- तृष्णासृक्कोपपित्तज्वरमनलविषास्त्र्तिकुष्ठ क्षिरोगान् ।गुल्मापस्मारमज्जाविहतिपरूषतापामिकादेहभङ्गान ॥भूपारिस्नेहपीडां सहजसुतसुहृद्वैरियुद्ध विधत । रक्षोगंधर्वघोरग्रहभयमवंनीसूनुरूर्ध्वापरोगम् । बहुत प्यास होता, खून गिरना, पित्त ज्वर, अग्नि, विष याशस्त्रों से भय, कोढ़़, आंखों के रोग, गुल्म (अपेंडि सायटि स), अपस्मार,मस्तिष्क के रोग, खुजली, अवयव कम होना, राजा का कोप, शत्रु और चोरोंसे तकलीफ, भाई, पुत्र और मित्रों स झगडा तथा भूतपिशाच, राक्षस औरगंधर्ों से पीड़ा, शरीर के ऊपर के भाग के रोग ये फल मंगल दूषित होने से प्रप्तहोते हैं।

    विद्यारण्य -- भ्रातृसत्वगुणान् भूमि भौमेन तु विचिन्तयेत् । भाई,सामर्थ्य, जमीन इनका विचार मंगल की स्थिति से करना चाहिए।कालिदास -- शौर्य भूर्वलशस्त्रधारणजनाधीशत्वीर्यक्षयाः।श्चोरो

    युद्धविरोधशत्रव उदारा रकतवस्तुप्रियः । आरमधिपतित्वतूर्यरवनन-प्रीतीचतुष्पाननृपाः। मुर्खः कोपविदेशयान धृतयो धात्राग्निवाग्वादताः ॥१॥
    पित्रोष्णव्रणराजसेवनदिनव्योमेक्षणहस्वहग। विख्यातित्रपुखद्नकुन्तसचिवाश्चांगफुटत्वंमणिः।| सुब्रह्मण्यजपे युवा कटु नृपस्थाने कुजोडवग्रहो। मांसाशी परदूषणं रिपुजयस्तिक्तनिशान्ते बलम् ॥२।हेमग्रीष्मपराक्रमा रिपुबलं गम्भीर्यशौर्ये पुमान्। शीलब्रह्मपरश्चधौवनपरो ग्रामाधिनाथत्वता ॥ राजालोक नमूत्रकृच्छ- तुरस्त्रस्वर्णकाराः खलो।मुग्धस्थानसुभोजने कृशधनुर्वदयां प्रवीणत्वते॥|३| रक्त ताम्रविचित्रवस्त्रयमदिग्वकोच तद्दिक्प्रियः । कामक्रोधपरापवादगृहसैन्येशाः शतध्नीकुजः।सामभ्रातृकुठ ारदुष्ट मृगने तृत्वस्वतन्त्रा ग्रहाः । क्षेत्रं दण्ड पतित्वनागभुवनेवाक्चित्तचांचल्यता वाहारोहण-रक्तदर्शनमसृक्संशोषणान्येवंम। न्येचाने कसुसंज्ञकाबुधबरैभौमस्यतूक्ता अलम्।

    कालिदास ने ग्रहयोनिभेदाध्याय और कारक विचार का एक ही जगहमिश्रण कर दिया है। यह किसी अच्छे ज्योतिषी को शोभा नही देता किन्तुमैसूर, मलबार तथा मद्रास प्रदेश में बहुत प्रसिद्ध हुआ है। इसके मत से मंगल केकारकत्व में निम्न विषय आते है - १. पराक्रम, २. जमीन, ३. बल,४.शस्त्रधारणा, ५.लोगों पर अधिकार चलाना, वीर्य का क्षय होना, चोर,युद्ध, विरोध, शत्रु, उदार, लाल वस्तुओं की रूचि, बगिचों का मालिक होनां,वाद्य बजाना, प्रेम, चौपाये पशु, राजा, मूर्ख, क्रोध, विदेश यात्रा, धैर्य, आंवलेका पेड, आग, वादविवाद, पित्त,ऊष्णता, जखम, सरकारी नौकरी, दिन, उपरदृष्टि होना, नाट। कद, रोग, कीर्ति, सीसा, तलवार, भाला, मंत्री, स्पष्ट अवयवहोना, मणि, देवों का सेनापति कातिकेय स्कंद (इसे आंध्र और मद्रास मेंसुब्रह्मण्य बहहते है तथा वहां इस के कई देवालय हैं), तरूण, रूची- कड वी,राजाओं के स्थान, अपमान, मांसाहारी, दूसरों की निंदा, शत्रुओं पर विजय,तीखा स्वाद, रात्रि के अन्त में बलवान होना, सोना (धातु), ऋतु -ग्रीष्म,पराक्रम, शत्रु का बल, गम्भीरता, शौर्य, पुरूष, शील, ब्रह्म, कुल्हाडी, वनचर,गांव का मुखिया होना, राजा का दर्शन, मूत्रकृच्छ रोग, चौकोर आकार, सुनार,दुष्ट, जली हुई जगह, भोजन में अच्छे रूचिकर पदार्थों का शौकीन, कृश -दुबलापतला, धनुष्यबाण के प्रयोग में निपुण, रक्त, तांबा, विचित्र वस्त्र, दक्षिणदिशा, दक्षिण दिशा प्रिय होना, कामवासना, क्रोध, दुसरों की निंदा, घर,     सेनापति, शतघ्नी (यह प्राचीन समय का एक शस्त्र था), सामवेद, भाई,कुल्हाडी, जंगल के क्रूर पशु, नेतृत्व, स्वतंत्रता, खेती, सेनापति पद, सपों केबिल, वाणी और चित्त चंचल होना, घोडों की सवारी, रजोदर्शन, खून सूखना।पश्चिमी ज्योतिषियों के मत से कारकत्व -- उष्ण, रूखा, दाहक,उद्योगी, वंध्या, पुरुषप्रकृति, साहसी, उबलनेवाले पदार्थ, दाहजनक तेल,तीव्र औषधि, आम्ल पदार्थ, उष्ण पदार्थ, दाहकारक रूचि, लोहा, फौलाद,हथियार, चाकू, कैची, झगडे, चोरी, ड कैत, दुर्घट ना, लडाई में सम्मान प्राप्तहोना, महत्वाकांक्षा, पौरूष, काम, क्रोध, मान, आदि मनोविकार, आग,बुखार, उन्माद, भयंकरता, द्रोह, निंदा, पुलिस, थोडे समय के लिये कारावास,मौत, पुरूषसम्बन्धी, डॉक्ट र, सर्जन, रसायनशास्त्र वैज्ञानिक, गोलंदाज, शस्त्रबनानेवाले, लोहे के काम करनेवाले (मेकैनिक, इंजिनियर, टर्नर, फिट र, लेथवर्ककरनेवाले, किर्लोस्कर, टाटा, आदि कारखानों में काम करने वाले) तांबे केबर्तन बनानेवाले, लोहार, कंगन बेचने वाले, दंतवैद्य, बिस्कुट बनानेवाले,चाकू कैची बनानेवाले, कसाई, बेलिफ, जल्लाद, घडीवाले, दर्जी, नाई, रंगारी,चमार, जुंआरी, मस्तक, नाक, जननेंद्रिय, पित्त, पित्ताशय, मूत्राशय, स्नायु,मांसरज्जु, चेचक, गोबर, खून बहना, कट ना, जलना, आग लगी हुई जगह,भट्टी, (सुनार की, लुहार की, होट ल की, कांच कारखाने की, लोहे, तांबे यापीतल के बर्तनों के लिये, चूना बनाने की, शस्त्रों के लिये), रसायनशाला,युद्धभूमि, सेना के कॅम्प, तोपखाना, बारूद के संग्रह, शस्त्रों के कारखाने,दुर्घट ना स्थल, लडाकू प्रदेश, विषैले जंतुओं के स्थान, कसाईखाना, भाईबहिंनें,सुखदुख, चचेरे भाई, सौतेले संबंधी, अद्भुत बुद्धिमत्ता के काम।हमारे मत से मंगल का कारकत्व-- लोककर्म विभाग (P.W.D.)

    भूमिति, इतिहास, अपराधविषयक कानून, प्राणिशास्त्र, अस्थिशास्त्र, पुलिसइन्स्पेक्ट र, ओवरसियर, उनकी शिक्षासंस्था, जंगल, कृषि विद्यालय, सर्वेविभाग, बायलर ऐक्ट, तंत्रविद्या की (मेकैनिकल) शिक्षा, इंजीनियरिंग कॉलेज,बीडी सिगरेट के कारखाने, मिलमजदूर, शराब की भट्टीयां तथा दूकानें, आबकारीइन्स्पेक्ट र, सिपाही, पहलवान, मोटर और उसके पुर्जे बेचनेवाले, साइकिल या     गंधक, विष पचाने की शक्ति (शनि के कारकत्व में विष प्रयोग करना शामिलहोता है किन्तु उनका विष पचाना मंगल का कारकत्व है, सांपो पर राहू काअधिकार है किन्तु उनका शत्रु न्यौला मंगल के अधिकार में है) मुर्गा, गीध,बाज, चील, बकरा, कबूतर, चिड़िया, बिल्ली, खिश्चन, एंग्लोइंडि यन,यूरोपियन, सिख, मराठा, राजपूत, जैन, लिंगायत, गुजरात और सौराष्ट्र कासामान्य वर्ग।ग्रहों के स्वाभाविक गुणधर्म, रूप, रंग तथा नैसर्गिक कुंड ली में उनकासे अब कुछ विवेचन करेंगे।मोटर रिपेयर करनेवांले, टैंक, युद्धनौका (क्रूझर) पनडु ब्बी (टारपेडो), बाँबर,विमान, पेट्रोल, स्पिरिट, रॉकेल तेल, फास्फरस, आइडि न, बिजली की आर्कके लिये उपयोगी कार्बन (जो सिनेमागृह की मशीन में उपयोग किया जाता है)के कारखाने, माचिस के कारखाने, कपास का सट्टा, रेस, घोडे, जौकी, ट्रेनर,फायरब्रिगेड, बड़े ऑपरेशन, अपेडि सायटि स, मुत्रकृच्छ, गंड माला, टॉन्सिल,मम, खून खराब करनेवाले व्यसन, इंग्लैंड, फ्रान्स, ग्रीस, इट ली, जर्मनी, जापान,पंजाब, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाट क, कच्छ, सौराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान,नाइट्रि क एसिड, एसेटि क एसिड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, आर्सेनिक, सोमल,स्थान एवं भावकारक ग्रहों पर से कारकत्व का निश्चय किया जाता है। इस दृष्टी     हैं इसलिए मंगल के अधिकार में हैं।

    पारा -- इस पर वस्तुतः रवि का अधिकार है।

    मन:शिला -- गेरू भी लाल रंग का है।

    मन -- यह कारकत्व चंद्र ग्रह पर चाहीये।

    शिलात -- शिला (पत्थर) यह कठि न पदार्थ भूमि से निकलता है,

    इसलिए यह ग्रहपर दिया है । वस्तुतः यह शनि पर होना चाहीये।

    यान -- वाहन, जैसे मोट र आदि, इन्हें लोहा और पेट्रोल की जरूरत

    होती है अतः मंगल के स्वामित्व में इनकी गणना की गई।

    क्षिति -- जमीन, मंगल भूमि का पुत्र माना गया है।

    नृपति -- राजा। यह कारकत्व गलत है । इसका विचार रवि कीस्थिति से होता है।

    पतन -- बुरे बर्ताव से मानव की हालत गिरती जाती है यह मुख्यतः अशुभ मंगल का फल है।

    मूछ -- ऊष्णता से उत्पन्न होती है अतः मंगल के कारकत्व मेंशामिल होती है।पित्त -- इसका भी विचार मूछ के समान ही करें।

    चोर -- मंगल के साथ शनि का कुछ अनिष्ट संबंध हो तो यह

    कारकत्व ठीक होगा। मूलतः मंगल संरक्षक ग्रह है अतः चोरी इसका कार्य नहीं है।

    सत्व -- सामर्थ्थ। आज के युग में अग्नि की शक्ति से बडे बडे काररकिये जाते है तथा मंगल अम्िस्वरूप ही है। अतः यह वर्णन ठीक है।

    रोग -- ऊष्णता से बहुत रोग उत्पन्न होते हैं। कौनकौनसे रोग होतेहै इसका विचार सिर्फ मन्त्रेश्वर ने किया है।

    गुण -- कौनसे गुणों का यहां मतलब है यह स्पष्ट नहीं ।
    अनुज-- छोटे भाई। मंगल का अधिकार इन पर कहा गया। किन्तु

    अनुभव में मंगल भाइयों के लिए घातक ही प्रतीत होता है। तृतीय या नवम मेंमंगल हो तो भाई जीवित नहीं रहते ।

    रिपु-- शत्रु। पुलिस विभाग से इसका संबंध है। अतः शत्रुओं सेनित्य ही संबंध आता है।

    जाति--मंगल जाति से क्षत्रिय माना गया है। किन्तु ब्राह्मण या.शूद्रकी कुण्ड ली में मंगल से किस जाति का विचार करना चाहिए, इस पर से प्रतीतहोता है कि अपनी जाति का त्याग कर दूसरी जाति का स्वीकार करने की प्रवृत्तिका विचार मंगल से करना होगा। इस विषय का एक प्राचीन श्लोक ऐसा है--लग्ने चैव यदा भौमः अष्ट में च रविर्बुधः । ब्रह्मपुत्रो यदा जातः सगच्छ नुम्लेंच्छ मंदिरम्॥ अर्थात् लग्न में मंगल हो तथा अष्ट म में रवि या बुध होतो वह ब्राह्मण म्लेच्छों के - मुसलमान, ईसाई आदि के - घरों में जाता हैमंगल के प्रभाव से जाति का बंधन शिथिल होता है।

    सद्म -- घर। यह विषय जमीन से संबंधित ही है।

    पुत्र -- यह कारकत्व सिर्फ पराशर ने कहा है। किन्तु यह ठीक प्रतीत

    नहीं होता। पंचम और एकादश के मंगल से पुत्रों के बारे में विचार होता है।अन्य स्थानों में इसका सम्बन्ध नहीं।

    शील -- यह कारकत्व योग्य है।

    ब्रह्म -- इसका सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता।

    अग्नि--मंगल का वर्ण अग्नि जैसा ही है अत: यह वर्णन ठीक है।साहस --इस गुण का वर्ण भी लाल माना गया है।

    राजशत्रु -- जो पुरूष अधिकारी होता है उसके कनिष्ठ अधिकारीउसका भला नहीं चाहते । अतः अधिकारी के शत्रु यह मंगल का कारकत्वकहा गया है।

    पराक्रम -- इसका विचार साहस के समान करना चाहिए।
    विजय -- यह कारकत्व ठीक नहीं है। विजय प्राप्ति पर शनि काअधिकार है। उदाहरणार्थ - इंग्लैंड के लोग मंगल के स्वामित्व में हैं। किन्तुवहां की परिस्थिति लोहा और कोयले की खानें, व्यापार, मजदूर वर्ग आदि -शनि के स्वामित्व की है अतः उन्हें विजय मिलती है। सतत प्रयत्न यह शनि कीविशेषता है अतः यश भी उसके ही अधिकार में है। मंगल का अधिकार पराक्रमपर है और शनि का विजय पर है।

    विख्याति -- सिपाही जान हथेली पर ले कर लड ते हैं तभी सेनापतिको कीर्ति प्राप्त होती है। अतः कीर्ति पर मंगल का स्वामित्व योग्य है।

    संग्राम -- यह राष्ट्रीय कारकत्व है। किसी देश में युद्ध चल रहा हो तोवह कितने समय तक चलेगा और किसे फायदा या नुकसान होगा इसका विचारमंगल की स्थिति से और उस देश की राशि से करना चाहिए। इसी प्रकार व्यक्तिके जीवन में जो अदालती झगडे होते हैं उनका विचार भी मंगल से होता है।

    दंड - सैन्य-- यह भी राष्ट्रीय कारकत्व है। किसी देश की सेनाकितनी है, उसकी व्यवस्था कैसी है आदि विषयों का विचार मंगल से होता है।

    नेतृत्व -- यह कारकत्व राजकीय नेतृत्व की दृष्टि से ठीक है,आामाजिक नेतृत्व की दृष्टि से नहीं।

    आयुध -- शस्त्र - यह कारकत्व ठीक हैं।

    धृति -- धारणाशक्ति Grasping Power - विषय समझकर स्मरणरखने की शक्ति बुध के अधिकार में है अतः यह कारकत्व गलत है।
    कान्ति, तेज -- दृष्टि से मंगल तेजस्वी प्रतीत होता है इसलिए यहकारकत्व कहा गया।
    गाम्भीर्य -- इस ग्रह में अल्हड पन और गम्भीरता दोनों गुण पायेजाते है ऐसा अनुभव हैं।
    शत्रुवृद्धि -- शत्रु बढ़ ना - मंगल छ टवें, सातवें या बारहवें स्थान में     हो तो इसका अनुभव आता है, अन्यत्र नहीं।

    आग्रहावग्रह -- राजदरबार में मानसन्मान या अपमान होना मंगलपर अवलंबित है। यह शुभ हो तो मानसन्मान होता है। शनि से दूषित हो तोअपमान होता है।

    परापवाद -- दूसरों द्वारा निन्दा होना - पांचवें, सातवें या बारहवेंस्थान में यह ग्रह हो तो फल मिलता है, अन्यत्न नहीं।

    स्वतन्त्र -- मंगल के अधिकार के लोग स्वतन्त्र वृत्ति से उपजीविकाकरते हैं। बहुतसे लोग नौकरी भी करते हैं किन्तु यह उनकी इच्छ। के प्रतिकुलहोता है।

    धातु -- आंवले का पेड - इस कारकत्व का उपयोग समझ में नहीं आमाक्रौर्य -- क्रूरता - निर्दयता- अग्नि की दाहक शक्ति को देखकर यहकारकत्व कहा गया। किन्तु किसी पापग्रह का वेध हो तो ही यह फल अनुभवमें आता है इसलिए इसका उपयोग विचार कर करना चाहिए।

    विद्वेष -- यह गुण मंगल में नहीं पाया जाता।

    महान -- महानता यह कारकत्व ठीक है।

    उत्साह -- मंगल के अधिकार के व्यक्तियों का यह विशेष गुण है।

    परकामिनीरति -- दूसरों की स्त्रियों से सम्बन्ध - इस ग्रह से ऊष्णताअधिक होती है अतः कामवासना भी तीव्र होती है। इसका शारीरिक सामर्थ्यभी अच्छ। होता है अतः परस्त्रियां खुद हो कर इसे चाहती हैं।

    वीर्य -- जननेन्द्रियों पर मंगल का स्वामित्व है अतः यह वर्णन ठीकहै। नैसर्गिक कुण्ड ली में अष्ट म में वृश्चिक राशि है जिसपर मंगल का हीस्वामित्व है।

    असत्य -- झुठ बोलना - मंगल दुषित हो तो ही इस का अनुभवआता है।

    चित्तसमुन्नति -- ऊपरी तौर से देखें तो यह कारकत्व ठीक प्रतीत
    नहीं होता। किन्तु राष्ट्र में महान व्यक्तियों का जन्म होना, बौद्धिक प्रगत होनाऔर इस तरह जगत की स्थिति में सुधार होना यह मंगल का ही कारकतव है।द्वितीय, चतुर्थ, ष्ठ, अष्ट म, द्वादश इन स्थानों में शुभ मंगल हो तो उन व्यक्तियोंका मन और बुद्धि अच्छी तरह विकसित होती है। लग्न, तृतीय, पंचम, सप्तम,नवम, दशम, एकादश इन स्थानोंमें मंगल हो तो युनिवर्सिटी की डिग्रीयां मिलनेपर भी मन की अवस्था अविकसित ही रहती है।

    कलुष -- सुब्रह्मण्य शास्त्री, बंगलोर, ने इसका अर्थ पाप माना है।हमारे मत से दूसरों की निन्दा करना यह कारकत्व का अर्थ है।

    क्षत -- जखम, फोड़ फुन्सी - यह कारकत्व ठीक है।

    विदेशगमन -- विदशों में जाना - इसका अनुभव देखना चाहिए।वाग्वाद -- सभाओं में या व्यक्तियों में होनेवाले वादविवाद - कुंड लीमें मंगल प्रबल हो तो इन वादविवादों में इस व्यक्ति को विजय प्राप्त होती है।अदालतों के वादविवाद यह अर्थ भी ठीक ही हो सकता है।

    मांसाशी -- मंगल रक्त व मांस का स्वामी है अत: यह कारकत्वकहा गया। लिंगायत, जैन, सनातनी ब्राह्मण आदि जातियों में मांसाहार निषिद्धहै। अतः इनके विषय में मिर्च बहुत खानेवाले ऐसा फल कहना चाहिए।आजकल पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से इन जातियों में भी कुछ लोग मांसाहारकरते हैं। अतः धनस्थान या षष्ठ में अग्निराशि में मंगल हो तो उसे मांसाहारऔर मद्यपान का फल बतलाना होगा।

    सुभोजन -- मंगल के अधिकार के व्यक्तियों को भोजन अच्छ।सुस्वादु चाहिए। कंदान्न खाने को वे तैयार नही होते। अच्छा भोजन न मिला तोदूध पर ही रहते है।

    चित्तचंचलता -- मंगल की गति बहुत चंचल है - वह बहुत बारवक्री और मार्गी होता है अतः चित्त चंचल होना यह इसका कारकत्व कहागया। इसका अनुभव लग्न, सप्तम और दशम में ही विशेष आता है।
 
    नागभवन -- सपों का शत्रु न्यौला मंगल के अधिकार में है अतःयह कारकत्व कहा गया है।

    वाहारोहण -- घोडों पर सवारी करना।
    असृक्संशोषण -- खून सूखना।

    चतुरस्त्र -- चौकोर आकार का - यह वर्णन कालिदास के मत सेहै। पुंजराज के मत से त्रिकोण आकृति होती है। ये दोनों मत ठीक प्रतीत नहीहोते। मंगल के अधिकार के सैनिक आदि वर्गों के लोग उंन्े कद के, लंबे चेहरेके और सुदृढ होते है। सुनार आदि वर्गों के लोग गोल चेहरे के, नाटे कद केऔर प्रमाणबद्ध अवयवों के होते है।

    पश्चिमीय, ज्योतिर्विदों ने जो कारकत्व कहा उसका अलग विवेचनकरने की जरूरत नहीं। वह ठीक है।

    कारकत्व का वर्गीकरण

    जन्म कुण्ड ली में उपयोगी कारकत्व -- बडे ऑपरेशन, गंड माला,अपेंडि सायटि स, कैंसर, प्लूरसी, मूत्रकृच्छ, टान्सिल, विषमज्वर, उद्योग,साहस, बंध्या, बैर, झगडे, चोरी, ड कैत, दुर्घट ना, युद्ध में कीर्ति, काम, क्रोध,अभिमान, बुखार, उन्माद, तीव्र वेदना, द्रोह, निंदा, परापवाद, मृत्यु, पुरूषसंबंधी, मस्तक, नाक, जननेन्दिय, पित्त, पित्ताशय, मूत्राशय, स्नायू. मांस,हड्डीयां, शरीर पर लाल धब्बे पड ना, चेचक, खून बहना, कट ना, जलना, छोटोभाईबहिन, अद्भूत बुद्धिमानी के कार्य, सुखदुःख, चचेरे भाई, सौतेला घर,मन, मूच्छ , चोर, सत्व, रोग, जमीन, शत्रु, जाति, पुत्र, शील, राजशत्रु, यश,नेतृत्व, धारणा, कान्ति, गम्भीरता, शत्रुवृद्धि, राजकृपा,तथा अवकृपा,स्वतन्त्रता, क्रूरता, महानता, उत्साह, परस्त्रियों से सम्बन्ध, झूठ बोलना, चित्तका विकास, पाप, व्रण, मूर्खता, विदेशयात्रा, वादविवाद, मांसाहार, दुष्टता,     अच्छ। भोजन, चित्त चंचल होना, छोटी मुदत के कारावास, रूक्ष ऊण,दाहकारक।

    व्यवसाय के कारकत्व -- लोक कर्म विभाग, (P.W.D.), पुलिसइन्स्पेक्ट र, ओवरसियर, रेंजर, पाइलट, (विमानवाहक), कृविशास्त्रज्,इंजीनियर, मेकैनिक, बीडी सिगरेट के कारखाने, मिलमजदूर, पान बेचनेबाले,शराब बेचनेवाले, आबकारी इन्स्पेक्ट र, पहलवान, मोट र या उसके स्पेअर पार्टीके विक्रेता, साइकिल बेचनेवाले तथा रिपेअर करनेवाले, शस्त्रों के निर्माता(जैसे तोप, बंदूक, टैं क, युद्धनौका, पनडु ब्बी, बम गिरानेवाले विमान), पेट्रोल,स्पिरिट और रॉकेल के विक्रेता, सिनेमा में उपयोगी कार्बन स्टि क के निर्माता,ऑपरेशन के साधनों का कारखाना, माचिस का कारखाना, कपास का सट्टा,रेस, घोडे, जॉकी, ट्रे नर, फायरब्रिगेड, तेज दवाइयां, एसिड, लोहा,फौलाद,चाकू, कैची, सर्जन, रसायनशास्त्र, तोप दागनेवाले, टर्नर, फिटर, लेथवर्ककरनेवाले, दंतवैद्य, कसाई, सुनार, लुहार, सब प्रकार की भट्टीयां (सुनार,लुंहार, होट ल, पावबिस्कीट कांच, लोहा, चुना आदि की), लोहे के कारखाने(टाटा, किर्लोस्कर, भद्रावती, कुलटी, कपूर के कारखाने तथा लोहे के पदार्थों-- हलश पाइप, कुर्सी, डिब्बे, आदि के कारखाने), पीतल के कारखाने,रसायनशाला, सेना, तोपखाना, बेलिफ, हंट र मारनेवाला, बिस्कीट बनानेवाला,घडी रिपेअर करनेवाला, दर्ज, चाकू कैची को धार लगानेवाले, तागडीबनानेवाले, निंब के कारखाने, नाई, रंगरेज, बढ़ ई, चमार, जुआरी, तांबा,सोना, पत्थर, दाहक तेल।

    मेदिनीय ज्योतिष का कारकत्व -- युद्ध, अभिप्रलय, सेनापति,तोप दागनेवाले, युद्धभूमि, सेना के स्थान, तोपखाना, बारूद के भंड र, शस्त्रोंके कारखाने, युद्धप्रिय देश, सेना की हालत, इंग्लैंड, फ्रांस, ग्रीस, इट ली,जर्मनी, जापान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, कच्छ, सौराष्ट्र, गुजरात,राजस्थान।
    शिक्षा का कारकत्व -- भूमिति, इतिहास, फोजदारी कानून,पुलिस, ट्रे निंग, ओवरसियर ट्रेनिंग, फॉरेस्ट री सर्वे विभाग, बाइलर ऐक्ट,इंश्ीनियरिंग, वायूयान शिक्षा, सर्जरी, रेजिमेंट ल क्लास, मोटर ड्राइविंग, रेल्चेड्राइविंग, दर्जीकाम, रंगकाम, टे कनालॉजी, मिल एप्रेटि स।

    अनुपयोगी कारकत्व-- उबलते हुए पदार्थ, उग्र गंध के पदार्थ,दाहक रूचि, दुर्पट नास्थान, खून के स्थान, लडाई झगडे के स्थान, पारा, गिरना,गुण, आंवला, बाद्य, सांपों के बिल, फास्फरस, आइडि न, नाइट्रिक एसिड,अन्य एसिड, हींग का अर्क, सोमल, मनःशिला, गंधक, शेर, कुत्ता, भेड़ि या,सियार, बिल्ली, न्यौला, मुर्गा, गीध, चील, बाज, लाल मुंह के बंदर, बकरा,कबूतर, चिड़िया।

    जाति -- खिश्चिन, एंग्लोइंडि यन, युरोपियन, सिख, मराठा, पठान,राजपूत, जैन, और लिंगायत (कर्नाट क में ), गुजरात के हीन जाति के लोग।

    कुण्ड ली में शुभ मंगल के फल-- साहसी, चिड चिडे स्वभावका, हठी, मौके पर न ड रनेवाला, दीर्घोद्योगी, खर्चीला, नाना युक्तियों से कामबनानेवाला, लोगों का अकल्याण न हो इसलिये प्रयतशील, निष्कपट, उदार,प्रेमी, बेफिक्र, सुदढ, धैर्यवान, नवमतवादी, दुसरों के प्रभाव में न आनेवाला,व्यवहार में सरल, सत्यशील तथा प्रामाणिक, भाषण और कृति में नियमों काबारीकीसे पालन करनेवाला, परस्त्रियों से दूर रहनेवाला, अंनाथ दीन स्त्रियोंका रक्षक, लोककल्याण में प्रयलशील, क्रान्तिकार्य करने के लिए उत्सुक,सुखासक्त धर्मश्रद्धा होते हुए भी कर्मठता न होनेवाला, अपनी पत्नी के आधीन,सद्यःस्थिति में मगन, आगे की फिक्र न करनेवाला, वादविवाद में हार माननेवाला,लोगों पर उद्योग के कारण प्रभाव डालनेवाला, लोकमत अच्छी दिशा में प्रेरितकरनेवाला। जिस व्यक्ति की कुण्ड ली में मंगल विकसित हो वही स्त्रियों कीइज्जत की रक्षा के लिए अपनें प्राणों की बाजी लगा सकता है और लोककल्याणके लिए अपनी सारी इस्टेट खर्च कर राजसता के खिलाफ लड़ ते हुए प्राणार्पणभी कर सकता है।
    कुण्ड ली में दूषित मंगल के फल -- कुण्ड ली में चन्द्रया शुकर केसम्बन्ध से मंगल दूषित होता है। इन ग्रहों से मंगल के बूरे गुणधर्म प्रभावी औरस्पष्ट होते है। परस्त्रियों को कुमार्ग पर प्रेरित करनेवाला, किसी भी जाति कीस्त्री से सम्बन्ध रखनेवाला, अति कामुक, कामपूर्ति के लिए चाहे जिस मार्गका स्वीकार करनेवाला, क्रोधी, तामसी, लड़़ाई झगडे तथा खून तक करनेवाला,कृपण, लोगों के पैसे लुटाकर मौजमजा उड़ ानेवाला, स्त्री को कष्ट देनेवाला,दूसरों की निन्दा करनेवाला, दूसरों को बुराभला कहकर खुद कुछ भी नकरनेवाला, आलसी, झगडालू, स्वार्थी, दूसरों को निरूत्साही बनानेवाला,बीभत्स शब्द बोलनेवाला, जंगली, ऊधम मचानेवाला, एकान्तप्रिय, विक्षिष्तमनोवृत्ती, अस्थिरता।
मंगल हिंसक, तरुण, पित्तप्रकृति, लाल, गौरवर्णी, रक्तनेत्रोंबाला, अग्नि जैसा उग्र, शूर, उदार, तामसी स्वभाववाला औरगर्वीला होता है) इसकर आकार त्रिकोण जैसा है। इसमें मज्जाअधिक होती है।

    नभोमण्डल में अनुक्रम से बूहस्पति के पश्चात मंगल का स्थानहै। इसका आकार छोटर है तथा अग्नि जैसें चमकीले वर्ण का है।कुज, भौम, लोहितांग, अंगारक, क्रूरनेत्र, भूसुत, धरापुत्र, रक्तांग,आंगिरस, रेत, कोण, स्कन्द, क्रूराक्ष, क्षतिनन्दन, मेदिनीज आदिमंगल के पर्याय नाम है। यह कलपुरुष का पराक्रम और पुरुषग्रह है, पित्त प्रकृति, क्षत्रिय वर्ण, अग्नि तत्त्व, तमोगुणी, दक्षिणदिशा का स्वामी, ऋतु ग्रीष्म, रस कटु, धातु स्वर्ण, लोहा, स्थानरसोईघर, देवता स्वामी कार्तिकेय, पाप ग्रह, वस्त्र मोटे लाल,लोक-मूत्युलोक, धान्य-मसूर और रत्न मूंगा है। यह मकर में उच्चतथा कर्व् में नीच का होता है। मेष और वूश्चिक इसकी स्वराशिहै। सूर्य, चन्द्र, बूहस्पति मित्र ग्रह, शुक्र, शनि सम ग्रह तथा बुधशत्रु ग्रह है। यह अपने स्थान से चौथे, सातवें और आठवें स्थानको पूर्ण दृष्टि से देखता है।

    पित्त-पित्ताशय, जननेन्द्रिय, मूत्राशय, मस्तक, नाक, मांस,मज्जा, भाई, सैन्यबल, बाहुवल, अस्त्र-शस्त्र, भूमि, पराक्रम,परनिन्दा, परशु, कुठार, अपराध विषयक कालून, सर्वे विभाग,आवकारी, पहलवान, बीड़ी-सिगरेट आदि का कारक मंगल है।इसकी उपधातु तांबा और नक्षत्र मूगशिर, चित्रा और धनिष्ठा हैं।जन्म् समय में चन्द्र इन् नक्षत्रों में से किसी एक पर हो तो मंगलकी महादशा चल रही होती है।

    इसके अशुभ प्रभाव में होने से रक्तविकार, अस्थि-मज्जा केरोग, गुदर रोग, दन्त रोग, उदर रोग तथा कोढ़़ आदि रोगों से पोडाहोती है।

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 मंगल के राशिगत व स्थानगत फल

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातक सत्यवक्ता, धैर्यशील,पराक्रमी, दानी-धर्मी, नेता, जायदाद एवं वाहन का सुख भोगनेवाला होता है।यात्राओं से उसका भाग्योदय होता है। उसे अपघात होता है या अग्नि से कष्टहोता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातक लंपट, अतिकामातुर,परस्त्री आसक्त, धूर्त, कपटी, कुटिल, क्ररस्वभावी, आकर्षक वस्त्रों काशौकीन, परिवार में कलह एवं संतान विषयक चिंता वहन करनेवाला, प्रवासी,दुखी, पापकर्म से लाभ उठानेवाला, जादूगर, सुंदर एवं अमीर पत्नी से युक्त,बलिष्ठ, शत्रुओं से घिरा हुआ होता है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातक शिल्पकार,स्वकार्य में दक्ष एवं तत्पर, परोपकारी, लोभी, मधुरभाषी, तेजस्वी, पुत्रसंतानसे युक्त, मित्र-परिवार से वंचित, युद्धप्रवीण रहता है। मंगल, गुरु के शुभ योगसे होने पर जातक वकील या व्यापारी बनता है।

    4. कर्क कर्क राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातक शत्रुहंता, स्वयंअपनी जायदाद को नुकसान पहुंचानेवाला, दीन-हीन, उपद्रवी, स्त्रियों के विषयमें अत्याचारी, दुर्जन किंतु चतुर, माता को कष्टदायी, पारिवारिक जीवन में दुखी,चंचल बुद्धि का, डींगें हांकनेवाला रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातक गणित एवं गूढ़विद्याका जानकार, स्वतंत्र बुद्धि का, बाल-बच्चों के लिए सुखदायी, पराक्रमी,परोपकारी, सदाचारी, कार्यकुशल, धैर्यवान, उद्यमी, शत्रुओं पर विजय प्राप्तकरनेवाला, अल्पसंतान से युक्त एवं नीति भ्रष्ट रहता है।

   6. कन्या-कन्या राशि का मंगल कुंडली में होने पर जातक मित्रों के लिएधन खर्च करनेवाला, सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त, व्यवहारकुशल, मातृ-पितृ एवंअतिथि पूजक, तेजस्वी, सुपुत्रवान, संगीतप्रेमी, अहंकारी किंतु निराशावादी रहताहै। मंगल शुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो सट्टा, लॉटरी, बीमा, साझेदारीआदि से जातक लाभान्वित होता है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल कुंडली में होने पर जातक दूसरों के धनका उपयोग स्वयं के लिए करनेवाला, प्रवासी, ऐश्वर्यवान, स्वार्थी, समाज मेंमानप्रतिष्ठा प्राप्त, अधूरे कामों को पूर्ण करनेवाला और कामातुर रहता है।जातक की संतान बुद्धिमान होती है। मंगल, शनि से पीड़ित होने पर जातकको पत्नी वियोग सहना पड़ता है। वह डॉक्टर, वकील, कलाकार की हैसियतसे यश प्राप्त करता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातकव्यापार-व्यवसाय में धन कमानेवाला, खेती, पुलिस विभाग, श्ल्याचिकित्सा(सर्जरी), दंतचिकित्सा (डेंटिस्ट), मैकेनिकल इंजीनियर में से एक बनता है।

9. धनु-धनु राशि का मंगल कुंडली में हो तो जातक सभी कायों मेंयशस्वी, निर्भय, अल्प संतानयुक्त, स्पष्टवक्ता, उदार, विनोदी, प्रवासप्रिय,विवाह के कारण या पैतृक रूप से संपत्ति प्राप्त करनेवाला, स्वकष्ट से धनप्राप्त करनेवाला रहता है। शासन में मंत्री बनने का योग रहता है।

10. मकर-मकर राशि का मंगल कुंडली में रहने पर जातक क्रोधी, प्रसिद्ध,वीर, आत्मविश्वासी, धनवान, पुत्रवान, उच्च राजपद भोगनेवाला, महत्त्वाकांक्षी,नीतिवान, परिश्रमी, प्रभावशाली, गुप्त शत्रु से पीड़ित, विवाह के बाद प्रगतिकरनेवाला, समाज से मान्यता प्राप्त, कुशाग्र बुद्धि का रहता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल कुडली में होने पर जातक दृढ़निश्चयी,शीघ्र निर्णय लेनेवाला, शत्रु पर विजय प्राप्त करनेवाला, समाज में तिरस्कृत,बुरी संगत में रहकर धन का अपव्यय करनेवाला, सगे-संबंधियों से हमेशाझगड़नेवाला, अधिक संतान से युक्त, द्वेषी एवं चरित्रहीन रहता है। जातक को
सार्वजनिक कार्यों से अधिक लाभ होता है। प्रेम में वह आस्था रखता है।

    12. मीन-मीन राशि का मंगल कुंडली में होने पर गुप्त शत्रुओं से पीड़ित,  कामातुर, वाचाल, दृढ़निश्चयी, अच्छा सलाहकार, तंत्र-मंत्र जाननेवाला एवं उन पर भरोसा करनेवाला, कंजूस एवं जासूसी करनेवाला होता है।
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द्वादश स्थानों में मंगल के राशिगत फल
प्रथम स्थान (लग्न)प्रथम स्थान के मंगल के फल

    गर्ग -- गुदरोगी श्लथं नाभौ कंडू श्रथन्नाभौकंडू कुष्ठ दिनांकितः।मध्यदेशे भवेत् व्यंगः सवाच्यो लग्नगे कुजे । अन्यच्च तनुस्थानस्थिते भौमेदृष्टि भिर्वा विलोकिते। लोहाश्मादिकृता पीडा क्रोधोऽत्यंत स्तनौ भवेत्। रक्तपीडाशिशुत्वे च वातरक्तं च जायते। मस्तके कण्ठ मध्ये च गुहय वापि व्रण भवेत् ॥ गुदरोग, नाभि में खुजली या कोढ़ ,मध्यभाग में (कमर में) व्यंग (मंगल के साथबुध हो तो), लोहा, पत्थर आदि से तकलीफ, बहुत क्रोध, बचपन में खून केविकार, वातरोग, मस्तक में या गुद्य भाग में व्रण होना, ये प्रथम स्थान के मंगलके फल हैं।

    काशिनाथ-- भौमे लाने कुरूपश्च रोगी बन्धुविवर्जितः। असत्यवादीविईव्यो जायते पारदारिकः॥ कुरूप, रोगी, बन्धुहीन, झूठ बोलनेवाला, धनहीन,परस्त्रियों में आसक्त।

    नारायणभहट -- तपेन्मानसं -- कलत्नादिघातः शिरोनेत्र पीडा।विपाके फलानां सदैवोपसर्गः। मानसिक दुःख, स्त्रीनाश, मस्तक और आंखोंके रोग, अच्छे फल मिलते समय हमेंशा विष्न आना।

    समान पराक्रमी।जीवनाथ -- प्रतापस्तस्यापि प्रभवति मृगेन्द्रेण च समः । सिंह के

    पुंजराज -- स क्रोधी जायते-नूनं व्यसनी कटु कप्रियः। वन्हिना सविद्गधः स्यात्त तथा पित्तेन बाध्यते । क्रोधी, व्यसनी, तीखेपदार्थ प्रिय होना,आग से जलना, पित्त रोग।

    रामदयाल -- सदम्भ: | पाखन्डी।

    मन्त्रेश्वर -- अतिक्रूरोऽल्पायुः । बहुत क्रूर, अल्पायुषी होता है।

    बृहद्यवनजातक -- अतिमतिं भ्रमन्तां गमनागमनानिच । बहुत

    बुद्धिमत्ता, भ्रमण, व्यभिचारी, स्त्रियों के विषय में गम्यागम्य विचार न करनेवाला

    जागेश्वर-- यदा मंगलो लग्नगो मानवानां। वपुःगपुष्टि तुष्ट सरक्तंच कुर्यात् । शरीर हट्टाकट्टा और खून बहुत होता है।

    वैद्यनाथ -- साहसिकोऽट नोडति चपलः । साहसी, भ्रमण करनेवाला,बहुत चपल होता है।

    गुणाकर -- लग्ने क्षतांगः । शरीर व्रणयुक्त होता है।

    आर्यग्रन्थकार -- उदरदशनरोगी शैशवे लग्नभौमे ॥पिशुनमतिकृशांगः पापवित्कृष्णरूपः भवति चपलचित्तो नीचसेवी कुचलो॥सकलसुखविहीन: सर्वदा पापशीलः ॥ बचपन में पेट के तथा दातों के विकार,दुष्ट बुद्धि, कृश शरीर, पापी, कृष्ण वर्ण, चंचल चित्त, नीचों की सेवा, मैलेवस्त्र, सुखहीन।

    कल्याणवर्मा -- स्तब्धः स्वमानशौर्ययुतः सुशरीरः । स्तब्ध, खुदके लिये स्वाभिमानी, पराक्रमी, सुंदर।

    महेश -- उग्रताप -- स्वभाव बहुत उग्र होता है।

    जयदेव -- भ्रान्तधीः । बुद्धि श्रमयुक्त होती है। मेषे वा वृश्चिकवाऽपि मकरे वा धरासुतः। मुर्ती ेन्द्रत्रिकोणेषु तदारिष्ट न जायते ।। मेष, वृश्चिकअथवा मकर राशि का मंगल लम्न में, केन्द्र में अथवा त्रिकोण में हो तो वहव्यक्ति अनिष्ट नहीं भोगेंगा।

    घोलप -- दुष्ट अन्तःकरण, रक्त और पित्त के विकार, गुल्म, प्लीहारोग, गर्वीला, विचारशून्य।

    गोपाल रत्लाकर -- सुदढ शरीर, चोरी करने की प्रवृत्ति, कुछ लालगोरा वर्ण, बचपन में पिता को तकलीफ, उत्तर आयुष्य में राजसन्मान।

    हिल्लाजातक -- पंचमेऽब्दे लग्नगतो भौमेऽरिष्ट करोति वै। पांचवेंवर्ष संकट आता है। (यही मत बुहद्यवनजातक में भी है।)

    यवनमत -- शत्रुओं से और अपने धर्म के लोगों से भी खूब झगड ताहै। क्रोधी और विरोधप्रिय, कृश, स्त्रीहीन, पुत्रहीन, बहुत घूमनेवाला।

    पाश्चात्य मत -- यह धैर्यवान, निरंकुश, साहसी, दुराग्रही, उत्कर्ष,के लिए अति इच्छु क, लोभी, वितन्ड वादी, उदार, क्रोधी, अति अभिमानी।मेष, सिंह तथा धनु में -- बहुत क्रूर, साहसी। मिथुन, तुला तथा कुम्भ में --प्रवासी, भाग्यहीन । वृषभ, कन्या तथा मकर में -- लोभी, स्वार्थ, दीर्घद्रेषी,स्त्री प्रिय, झगडालू, शराबी। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में -- नाविक, पियक्कड,चैनी, व्यभिचारी।

    अज्ञात -- देहे व्रणं भवति । दृढगात्रः चौरः बुभुक्षितः बृहन्नाभिःरक्तपाणिः शूरो बलवान् मूर्खः कोपवान समानशौर्यः धनवान् नेत्ररोगी, दुर्जनः।स्वोच्चे स्वक्षेत्रे आरोग्यम् राजसन्मानकीर्तिः।पापशत्ुयुते अल्पायुः स्वल्पुत्रवान्

    वातशूलादिरोगः दुर्मुखः। स्वोच्चे लम्नक्षे विद्यावान् नेत्रविलासवान्।त्र पापयुते
    पापक्षेत्रेपापृष्टि यतेनेत्रोगः।। बहुचिन्ताउद्देगः शिरोक्षिमुखपीड नम्। बाल्पेऽपिरोगी। मलिनः दरिद्री कामवशः अलसश्च ॥ शरीर पर व्रण होते है। मजबूतअवयव, चोर, भूख बहुत होना, विशाल नाभि, आरक्त हाथ, शूर, बलवान,मूर्ख, क्रोधी, धनवान, दुष्ट, आंखों के रोग, ये लग्न के मंगल के फल है। यहस्वगृह में या उच्च का हो तो आरोग्य, राजसन्मान, कीर्ति ये फल होते है।पापग्रह अथवा शन्ुग्रह उसी स्थान में हो तो पुत्र थोडे होते है, वात तथा शूलरोग होते है, नित्य ही उदासीन मुख होता है। लग्न में मंगल हो तो विद्याप्राप्तीऔर आंखें अच्छी होना ये फल मिलते है। पापग्रह की राशि में, पाप ग्रह सेयुक्त अथवा दुष्ट हो तो आंखों के रोग, अति चिन्ता, उद्देग, सिर तथा मुख मेंपीडा, बचपन में रोग, मलिनता दारिद्रिय, तीव्र कामवासना और आलसीपन येफल मिलते है।

लग्न में मंगलजातक बचपन में पेट और दांतो के रोगों से पीड़ित होगा, कमजोर शरीर वाला, सांवले रंग का, पाप कर्मी, प्रतिशोध लेने की इच्छा वाला, पीछे से बुराई करने वाला, अस्थिर दिमाग वाला, निम्नस्तर के लोगों की सेवा करने वाला, गंदे कपड़ों वाला, बेचैन रहने वाला और पाप कर्म में प्रवृत्त होगा।
-मानसागरी

जातक अल्पायु व आहत शरीर वाला, क्रूर परन्तु विजयी होगा।

-फलदीपिका

जातक साहसी, सम्मानित, अल्पायु, साहसकर्मी, महत्वाकांक्षी, क्रूर.चोटग्रस्त, आकर्षक परन्तु अस्थिर मस्तिष्क वाला होगा।
-सारावली
 जातक के शरीर पर घाव के निशान और छोटा कद होगा। चोरी की आदत, क्रूर, मुर्ख, क्रोधी, चंचल और विशेष रोगों से ग्रस्त रहेगा।
- भृगु


जातक के शरीर पर निशान या धब्बे, चोरी की आदत से ग्रस्त, तोंद वाला, पिता को जातक की अल्पायु में खतरा, लालिमायुक्त वर्ण वाला, चुस्त, महत्वाकांक्षी, शक्तिशाली और नीच मानसिकता वाला होगा। कि 
-डॉ रामन

टिप्पणी

नैसर्गिक रूप से पापग्रह मंगल की लग्न में स्थिति, लग्न को पापाक्रान्त करती है जिससे शस्त्रों, अग्नि व लकड़ी आदि से भय होता है। इससे सप्तम भाव भी पापाक्रान्त होता है जिस कारण पत्नी व अन्य संबंधियों का निधन हो सकता है। जातक शक्तिशाली, शरीर पर घाव के निशान या धब्बों आदि से युक्त होगा। खिन्न, पापी व अनेक रक्तसंबंधी रोगों, गुदारोग, वक्षपीड़ा तथा वातव्याधि आदि से त्रस्त होगा। एक मत के अनुसार जातक विद्या की देवी सरस्वती और धन की देवी लक्ष्मी द्वारा अनुग्रहित होता है। लग्न की राशि के अनुरूप शरीरांगों में लाल चकत्ते या निशान होगें। 


उपर्युक्त फलों का विवेचन -- मंगल मूलतः रूक्ष, ऊष्ण तथादाहक है। बच्चों को गर्भस्थ अवस्था से ही ऊष्णता सहनी पड ती है। अतः उन्हेंचेचक, फोडे फुन्सी, सूखी, दांत गिरकर दूसरे दांत निकलना आदि की तकलीफहोती है। अतः ऊष्णता के साथ साथ बचपन की अवस्था पर भी मंगल काअधिकार है। जिसकी कुण्ड ली में मंगल प्रबल हो उसे ये रोग बहुत जल्दी होतेहै और जिनका मंगल दुर्बल हो उन्हें इनसे विशेष तकलीफ नहीं होती। लग्न मेंमंगल के होने न होने से इसमें खास हेरफेर नहीं होता। अतः गर्ग ने इस विषय मेंजो कहा उसमें बहुत तथ्य नहीं है। सिर में दर्द और रक्तपीडा ये फल ठीक प्रतीतहोते है। उनका अनुभव मेष, सिंह, धनु में आता है। मिधुन, तुला, कुंभ में यहअनुभव कुछ कम आता है। किन्तु अन्य राशियों में यह फल नहीं मिलता।काशिनाथ के मत का विवेचन भी इसी तरह करना चाहिये। इनके कहे हुए फलभी पुरूष राशि के ही है। नारायणभट्ट ने स्त्री घात फल कहा उस का अनुभवकर्क, सिंह, मीन इन को छोड़ कर अन्य राशियों में आता है। अच्छा फलमिलने के समय विष्न उपस्थित होना यह फल मिथुन, तुला, कुम्भ, इन राशियोंमें मिलता है। जीवनाथ ने सिंह के समान पराक्रम यह फल कहा उसका अनुभवमेष, सिंह तथा धनु कर्क और वृश्चिक में मिलता है। पुंजराज का फल पुरूष     राशियों का है। रामदयाल ने धर्म पर श्रद्धा न होना, सुधारक मतों के पक्षपातीहोना यह फल कहा। उसका अनुभव मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक एवं मीनमें आता है। महेश का मत मेष, सिंह एवंधनु में ठीक प्रतीत होता है। मन्नेश्वर- पुरूष राशि में मंगल के साथ रवि और चन्द्र हो तो इसके मत का अनुभवआता है। बृहद्यवन ने बुद्धिमान किन्तु भ्रमणशील ऐसा फल कहा गया इसकाअनुभव मेष, सिंह, धनु तथा मिथुन, तुला, कुम्भ में आता है। अगम्य गमन यहलग्न के मंगल का विशेष फल नहीं है। व्यभिचारी होने की अथवा रखैल सेसम्बन्धित होने की सम्भावना होती है। जागेश्वर के मत का अनुभव मेव, सिंह,धनु में तथा कुछ कम प्रमाण में वृषभ, कन्या, मकर में आता है। अन्य राशियों ।ेयह अनुभव नहीं आता। वैद्यनाथ और गुणाकर के मत पुरूष राशियों के लिएठीक है। आर्यग्रन्थ के मतों में बचपन में पेट एवं दांत के रोग होना यह फल पुरूराशियों का है। अन्य फल स्त्री राशियों के हैं। कल्याण वर्मा का मत स्त्री राशियोंमें तथा जयदेव का मत भी सभी राशियों में ठीक प्रतीत होता है। घोलप के मतोंमें दुष्ट तथा विचारशून्य होना यह फल वृषभ, कन्या, मकर में गर्वीला एवं रक्तपित्तविकार से युक्त होना यह फल मेष, सिंह, धनु में एवं गुल्म तथा प्लीहा रोगहोना यह फल कर्क, वृश्चिक, मीन में ठीक प्रतीत होते हैं। गोपाल रत्नाकर केमतों में गौर वर्ण, मजबूत शरीर यह फल मेष, सिंह, धनु में तथा राजसन्मान यहफल मेष, कर्क, सिंह, मीन में ठीक प्रतीत होते है। हिल्लाजातक के मत काविचार विद्वान करें। मेरे विचार से यह फल आठ वें वर्ष में मिलता है। यवनमत केशत्रु तथा स्व धर्म से कलह एवं स्त्रीपुत्रवियोग यह फल मेष, धनु, मिथुन, तुला,पाश्चात्य मत का अनुभव सब से अधिक आता है।

    कुंभ में ठीक प्रतीत होते हैं। दुष्ट, विरोधप्रिय, कृश ये फल स्त्री राशियों के हैं।हमारा अनुभव --प्रथम स्थान में मंगल हो तो उस व्यक्ति कोव्यवसायों के प्रति आकर्षण प्रतीत होता है। किन्तु वे किसी एक व्यवसाय कोअच्छी तरह न कर सभी को एक साथ करना चाहते हैं। यह स्थिति ३६ वें वर्षतक रहती है। फिर किसी एक उद्योग में स्थिर होते है। इन्हें ऐसा प्रबल अभिमानहोता है कि व्यवसाय में बहुत कुशल है और दूसरे निरे मूर्ख हैं। योग्यता न होने पर भी ये रोब डालने का प्रयत्न करते हैं। सिनेमा के क्षेत्र में ये खलनायक होसकते हैं। डाक्ट रों की कुण्ड ली में लग्नस्थ मंगल हो तो शिक्षके समय सर्जरीकी प्रधानता मिलती है किन्तु व्यवसाय शुरू होने पर ऑपरेशन के मौके बहुतकम आते हैं। यह योग इनके लिए अच्छ। नहीं होता। वकीलों के लिए भी यहबहुत अच्छ। योग नहीं हैं। इस में इन्हें फौजदारी मामलों में कुछ काम मिलता है।किन्तु धनप्राप्ती विशेष नहीं होती। अदालत में प्रभाव जरूर बढ़ ता है। मोटर,वायुयान, रेल्वे इंजन के ड्राइवरों के लिए यह योग अच्छा होता है। इनकी  दृष्टी बहुत अच्छी होती है। लुहार, बढई, सुनार, मेकैनिक, इंजीनियर, टर्नर, फिटरइन लोगों के लिए यह योग बहुत अच्छ। होता है। वृषभ, कन्या या मकर मेंमंगल लग्नस्थ हो तो उत्तम फल मिलते हैं। इस योग में जमीन सर्वे करने का काममिलता है। मकर के मंगल से पिता को बहुत तकलीफ होती है और शारीरिकव्याधीयों से पीडा होती है। इस योग के किसानों को जमीन का ज्ञान अच्छ।होता है। मेष, सिंह, कर्क, वृश्चिक, धनु इन राशियों का लग्नस्थ मंगल पुलिसइन्स्पेक्ट रों के लिये अच्छ। होता है। इस योग के अफसर रिश्वत खाते हैं किन्तुपकडे नहीं जाते (इसके लिये शनि के साथ शुभ योग होना जरूरी है)। बरताव मेंकिसी की परवाह नहीं करते।

    लग्नस्थ मंगल के प्रधानत: दो प्रकार है। कर्क राशि में हो तो उस व्यक्तिको अपने परिश्रम से धन और उन्नति प्राप्त होते है। सिंह राशि में हो तो वह दैवयोगसे ही उन्नति और धन प्राप्त करता है। इन दोनों योगों के व्यक्ति उदार होते हैं।अतिथियों का सत्कार अच्छी तरह करते हैं। घर में कितने लोग भोजन कर केजाते है इसका इन्हें पता भी नहीं होता। यही मंगल वृषभ, कन्या या मकर में हो तोवे लोग बहुत कंजूस होते है। एक भी व्यक्ति को अधिक भोजन देना पडे तो इन्हेंदुख होता है। ये लोगों को ठगाते है। मिथुन और तुला में मिलनसार स्वभाव होताहै, मित्रों के लिये थोडा बहुत खर्च करते हैं किन्तु लोगों को ठगाते नहीं। कर्क,वृश्चिक, कुम्भ तथा मीन में यह मंगल हो तो वे लोग किसी से जल्दी मित्रता नहींकरते किन्तु एक बार करने पर उसे कभी भूलते नही ये पैसे के लोभी और स्वार्थीहोते है, अच्छे बुरे उपायों का विचार नहीं करते ।

मंगल के सामान्य फल इस प्रकार हैं। व्यभिचारी, कामलोलुप, लोगों की बुराइयां दूंढ ना, ताने केर बोलना. गालियां देना, झगडा लगने में कुशलत।स्त्री राशियों में - दूसरों को किसी भी काम में आगे करके खूद पीछे रहना। इनकीदृष्टि बहुत उग्र तथा क्रूर होती है अतः बच्चों को इनकी दृष्टीबाधक होती है।बचपन में तालू न भरना आदि रोग होते हैं। वृपभ, कन्या, मकर, कुम्भ में - कुछ कुछ चोरी करने की प्रवृत्ति होती है।

प्रथम स्थान में स्थित मंगल प्रायः साधारण फल प्रदान करता है। उग्र ग्रह     होने के कारण जातक उग्र स्वभाव का एवं क्रोधी रहता है। वह, किसी कीआज्ञा या अनुशासन में नहीं रहता।

    मंगल की आठवीं दृष्टि है। इसी कारण जातक को नाभिरोग, गुप्तरोग उत्पन्नहोते हैं। चर्मरोग एवं रक्तविकारों से भी कष्ट प्राप्त होते हैं। जातक अगिन आदिसे सावधान रहे। वह सिरदर्द एवं नेत्र विकार से पीड़ित रहता है।

    लग्न में मंगल होने पर जातक 'मंगलीक' कहलाता है। मंगल की दृष्टिसप्तम स्थान पर होने से वैवाहिक जीवन में कटुता उत्पन्न होकर सुख कीहानि होती है। यदि पति या पत्नी की कुंडली में लग्नस्थ मंगल को शह देनेवालेग्रह न हों तो यह फलित अनुभव में आता है। ऐसा जातक धैर्यवान, कठिनएवं मुश्किल काम पूर्ण करता है।

    शारीरिक दृष्टि से ऐसा जातक हृष्टपुष्ट रहता है। वह तीखे, नमकीन पदार्थोंका शौकीन रहता है। शरीर में रक्त पर्याप्त मात्रा में रहता है। बचपन में कर्णविकार से पीड़ित रहता है। पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार 5वां वर्षकष्टदायी गुजरता है।
प्रथम भाव-मंगल यदि लग्न व प्रथम भाव में हो तो जातक निर्दयी,साहसी, शीष्र क्रोधित हो जाने वाला, तुनकमिजाज, अप्रसन्न, निर्धन तथा महत्वाकांक्षीहोता है। ऐसे जातक के शरीर पर (विशेषकर मस्तक या चेहरे पर वृत्त (CUT) कानिशान रह जाता है। उसके साथ दुर्घटनाएं बार-बार घटती हैं तथा (यदि अन्ययोगों से कट न रहा हो तो) जातक मांगलीक दोष से युक्त होता है। जीवनसाथी केसाथ भी इसका गृहस्थ जीवन शांतिपूर्ण अथवा सफल नहीं कहा जा सकता।बाल्यकाल में उदर व दांतों के रोग सम्भव होते हैं।
    लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक के भाई अवश्य होते हैं। वह वीर,हिम्मती, किन्तु क्रोधी होता है। जातक अपने भाइयों व ससुराल पक्ष के लिए शुभहोता है। मंगल अशुभ स्थिति में हो तो जातक व उसका परिवार अत्यंत गरीबी मेंदिन काटते हैं। ऐसा जातक पतित कार्यों से दूर रहे, यही उसके लिए शुभ होता है।
    प्रथम भाव में मंगल यदि उच्च राशि या स्वराशि में हो तो शरीर पुष्ट व निरोगहोता है। जातक को यश तथा सरकार द्वारा सत्कार मिलता है। शत्रु राशि में हो औरपापदृष्ट हो या पापग्रह से युति हो तो नेत्र रोगी होता है। मिथुन या तुला राशि कामंगल हो तो जातक को मिलनसार बनाता है। सिंह राशि का हो तो देवयोग से धनव उन्नति प्राप्त कराता है। किन्तु वृष, कन्या या मकर राशि का मंगल हो तो जातकभोजन देने में भी कंजूस होता है (विशेषकर मकर में)। कर्क, वृश्चिक, कुम्भ यामीन राशि का मंगल लग्नस्थ हो तो जातक को ‘पैसे का पीर' बनाता है।
    प्रायः लग्नस्थ मंगल वाला जातक कई व्यवसायों में रचि लेता है, पर ढंग सेसफल एक में भी नहीं होता। यदि डॉक्टर बनने का योग हो तो ऐसा जातक सर्जनबनता है, फिजीशियन नहीं।

प्रथम भाव: लग्नस्थ मंगल व्यक्ति को किसी भी व्यवसाय अथवा कार्य के लिए प्रेरित करता है। लेकिन ऐसा जातक किसी भी कार्य में सफल नहीं हो पाता क्योंकि वह एक साथ कई कार्य प्रारम्भ कर देता है। अग्नि राशि का मंगल लग्न में हो तो आयु के 36वें वर्ष तक यह स्थिति बनी रहती है। इसके पश्चात कार्य-व्यवसाय में स्थिरता आती है। ऐसा व्यक्ति योग्य न होकर भी दूसरों पर धोंस जमाने की चेष्टा करता है, शिरोरोग ओर पीड़ा का अनुभव होता है। व्यक्ति सिंह के समान पराक्रमी होता है तथा स्वभाव में उम्रता रहती है। मेष, सिंह, धनु, कर्क एवं वृश्चिक राशि का मंगल लग्न में हो तो पुलिस अथवा सेना में कार्यरत लोगों को विशेष लाभ मिलता है। उच्च का मंगल पिता क लिए नेष्ट फलदाता है। पृथ्वी तत्त्तीय राशि का मंगल व्यक्ति को कंजूस बना देता है। ऐसा जातक किसी भूखे को भोजन का ग्रास तक नहीं दे सकता। वायु तत्त्वीय राशि का मंगल हो तो व्यक्ति मिलनसार होता है। जल तत्त्वीय शशि का मंगल हो तो जातक सोच-बिचार कर ही मित्रता करता है। लग्नस्थ मंगल चिकित्सकों के लिए अच्छा होता है, वकीलों के लिए शुभ नहीं। 
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक उद्यमी, पराक्रमी, दीर्घायु,प्रतिष्ठा संपन्न एवं शत्रुनाशक रहता है। कर्णरोग से पीड़ित रहता है। कामुकताअधिक रहती है। कन्या जातक के विवाह में दिक्कतें खड़ी होती हैं। विवाहके बाद वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता। पुरुष जातक के एक से अधिकविवाह होते हैं।

    2. वृषभवृषभ राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक निष्टुर, शत्रुहताएवं शास्त्रास्त्र विद्या में पारंगत रहता है। पैरों में कोई विकार रहता है। उसकेपेट में कोई बात नहीं पचती। उसे महत्त्व की कोई बात बताना श्रेयस्कर नहींहोता। जातक कामातुर होता है और एक से अधिक स्त्रियों से शारीरिक संबंधबनाता है।

    3. मिथुनमिथुन राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक संपन्न, वाचाल,कौतुकप्रिय, अनेक कलाओं में प्रवीण, सरकारी कर्मचारी एवं समाज मेंप्रतिष्ठित रहता है। उसके शत्रु काफी होते हैं। किंतु इन सब शत्रुओं को जातकपराजित करने में समर्थ रहता है। सुख अच्छा प्राप्त होता है। जीवनकारक ग्रहबलवान न हो तो उम्र कम रहती है। जातक की प्यास से व्याकुल होकर मृत्युसंभव रहती है।

    4. कर्क कर्क राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक प्रतिभावान, अनेककलाओं का जानकार, चतुर, किंतु कंजूस एवं चुगलखोर रहता है। बचपन में
    स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता किंतु उत्तरोत्तर स्वास्थ्य में सुधार आता है। जातकमें काव्य-प्रतिभा निहित रहती है। पितृभक्त होने पर भी जातक का माता सेअलगाव रहता है। मां का चरित्र भ्रष्ट होना संभव रहता है। स्त्री की कुंडलीमें कर्क राशि का मंगल लग्न में हो तो उसे गर्भपात होने का डर रहता है।5. सिंह-सिंह राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक गुणवान, आचारशील,कृपण, अल्प आहारी, पराक्रमी, बुद्धिमान रहता है। बोलने की शक्ति कम रहतीहै। जातक स्वकर्म से प्रगति करता है, पैतृक संपत्ति का त्याग करता है। जन्म अच्छेघराने में होता है। पिता भी सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होता है। चाचा एवं भाई-बहनोंसे मधुर संबंध नहीं रहते। काफी संघर्ष के बाद ही जीवन सुखी बनता है।6. कन्या-कन्या राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक धैर्यवान, पुरुषार्थी,क्रोधी, कटुभाषी, विद्वान, कामातुर, वाद-विवाद पटु, नास्तिक एवं झगड़ालूहोता है और खाने-पीने का शौकीन रहता है। एक से अधिक विवाह याशारीरिक संबंध रहते हैं। स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। रक्त एवं चर्म विकारउत्पन्न होते हैं।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक की कामुकता कीकोई सीमा नहीं रहती। इससे मौका मिलने पर चरित्र भ्रष्ट होने की संभावनारहती है। कन्या जातक का विवाह जितना जल्द संभव हो कर देना चाहिए।जातक निष्टुर, उतावला, शत्रुकारक, सुखी एवं संपन्न होता है। उसके पेट मेंकोई बात नहीं पचती। आर्थिक दृष्टि से जातक का जीवन संपन्न होता है।8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक जिद्दी,धैर्यवान, निष्टुर, निरोगी, दीर्घायु, सशक्त एवं कामातुर रहता है। जातक के एकसे अधिक विवाह या यौन संबंध रहते हैं। उसके शत्रु अधिक होते हैं, किंतुउनको पराजित करने की क्षमता जातक में होती है। वह बात का पक्का होता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक बहुत ही चतुर, कंजूसएवं चुगलखोर होता है। वह विद्वान, अनेक विद्याओं में पारंगत, आचारसंपन्न,समय का पाबंद, संपन्न एवं निशानेबाज रहता है। वैवाहिक जीवन मध्यम सुखीरहता है। उसके पैरों में कोई विकार होना भी संभव रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल लग्न में होने पर जातक को इस मंगलके शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। ऐसा जातक अनेक विधाओं का ज्ञाता, स्वपरिश्रमसे उन्नति करनेवाला, सुखी, संपन्न, स्वस्थ एवं समाज में प्रतिष्ठित रहता है।जन्म अच्छे घराने में होता है। चाचा एवं भाइयों से अनबन रहती है। पैतृकसंपत्ति का त्याग करना पड़ता है। जातक की उम्र कम रहती है तथा प्यासकी व्याकुलता से मृत्यु संभव होती है।

    11. कुंभ कुंभ राशि का मंगल लग्न में हो तो जातक स्वपरिश्रम से उन्नति करनेवाला, क्रोधी, कटुभाषी, कामातुर, झगडालू, अपने ही लोगों में फूटडालनेवाला, कुसंगतियुक्त, काब्य प्रेमी, सुखी एवं संपन्न रहता है। मां का चरित्रसंदिग्ध हो सकता है।

    12. मीन-मीन राशि का मंगल लान में हो तो जातक शीलसंपन्न, सुखी,प्रतिष्ठित एवं परोपकारी एवं अल्पाहारी रहता है। वह पशुपालन का शौकीनएवं बुद्धिमान तथा सरकारी कर्मचारी भी होता है।

1) प्रथम भाव -
1. बहते पानी में घी डालें। 
2. लाल वस्त्र पहने। 
3. पीले वस्त्र दान करें।
4. किसी से मुफ्त की वस्तु ने लेवे।
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2) द्वितीय भाव -    द्वितीय स्थान (धन भाव) द्वितीय स्थान के मंगल के फल

    आचार्य --धनगे कदन्नः। अन्न निकृष्ट मिलता है।

    गुणाकर -- इसने उपर्युक्त फल ही कहा है।

    वैद्यनाथ -- धातुर्वादकृषिक्रियाट नपरः कोपी कुजे वित्तगे॥ धातु,वादविवाद, खेती, नित्य प्रवास, क्रोधी ये द्वितीय स्थान के मंगल के फल हैं।

    धन के विषय में इस मंगल से कोई लाभ नहीं होता।

    कल्याणवर्मा -- अधन: कदशनतुष्ट : पुरूषो विकृताननो धनस्थानेकुजनाश्रयश्च रूधिरे भवति नरो विद्यया रहितः ॥ निर्धन, निकृष्ट अन्न पर सन्तुष्ठरहना, चेहरा विकृत होना, दुष्ट लोगों को आश्रय देना तथा अशिक्षित होना येइस मंगल के फल हैं।

    बृहद्यवनजातक--अधनतां कु जनाश्रयतां तथा विमतितांकृपयाऽतिविहीनतां। तनुभृतां विदधांति विरोधतां धननिके तनगोऽवनिनन्दनः॥निर्धन, दुर्जनों का आश्रय, बुद्धिहीन, निर्दय, बहुत विरोध ये इस मंगल केफल हैं।

    गर्ग -- कृषिको विक्रयी भोगी प्रवास्यरूणवित्तवान् । धातुवादीमतेर्नाशो घयूतकारः कुजे धने ॥ धने भौमे धनहानिः प्रजायते। पीड़। देहे च नेत्रे चभार्याबन्धुजनै: कलिः॥ खेती, विक्रय में कुशल, प्रवासी, अरूण वर्ण, धनवान,धातु का काम, बुद्धिहीन, जुआरी, शरीर को पीडा, आंखों के रोग, स्त्री तथासम्बन्धियों से विरोध ये इस मंगल के फल हैं।
    नारायणभट्ट -- पुनः संमुखं को भवेत् वादभानः । इसके साथ वाद

    करने पर हार कर कोई इसके सन्मुख फिर नहीं आता।ट्ट

    मन्त्रेश्वर -- व्चसि विमुखः । इसे बोलना पसन्द नहीं होता।

    आर्यग्रन्थ --विक्रमे मग्नचित्तः कृशतनुसुखभागी। नित्य ही पराक्रम

    में रूचि होना, कृश शरीर, सुखी।

    जयदेव -- निर्दय ।

    जीवनाथ -- प्रलब्धे वित्तेपि स्वजनजनतः किं फलमलम् । धन कासंरक्षण होता है। (इसका ठीक अर्थ स्पष्ट नहीं होता - अ)काशिनाथ - क्रियाहीनश्ष जायते। दीर्घसूत्री,सत्यवादी पुत्रवानपि॥क्रियाकाण्ड में रूचि नहीं होती, दीर्घसूत्री, सच बोलनेवाला, ुत्रों से युक्त ।जागेश्वर -- धने क्रूरखेटा मुखे वाथ नेत्रे तथा दक्षिणांसे तथा कर्णकेवा। भवेद्वा घातपातोऽथवा वै व्रणं स्याद्यदा सौम्यदृष्ट न युक्तं धनं चेत्। धनस्थानमेंक्रूर ग्रह हो तथा सौम्य ग्रह की उस पर दृष्टि न हो तो उसे मुख, आंख, दाहिनाकंधा अथवा कान इन भागों को जख्म होती है।पराशर -- स्वे धननाशनम्। धनहानि होती है।हिल्लाजातक -- धनहानिर्वादशेऽब्दे धनस्थश्ष महीसुतः । इस मंगलसे बारहवें वर्ष धनहानि होती है।

    बृहदवनजातक -- प्रपीडि तमसृग् नवाब्दे स्वनाशं । नौवे वर्ष मेंरक्तविकार से मृत्यु के समान पीडा होती है।गोपालरलाकर -- कठोर वाणी, अकारण खर्च, बहुत क्रोध, पैतृकइस्टेट होना (अन्तिम फल कर्क तथा सिंह लग्न के लिये समझना चाहिसे)यवनमत -- पुत्र, स्त्री, धन इन से रहित, युद्ध में शूर, चिन्तातुर,कुरुप, निर्दय, नित्य ही ऋणग्रस्त ।
    घोलप -- गाय, घोडे, भेड़, गाडियां आदि के व्यापार में धनहानि,पुत्रहीन, विकल अवयव, बहुत रोग होना ये इस मंगल के फल है।

    पाशचात्य मत -- बिल्ंडि ग के काम, मशीनों की सामग्री, पशुओंका व्यापार, खेती, लकडी तथा कोयले का व्यापार, आरोग्यविषयक काम(वैद्यक), नाविक, इन व्यवसायों में धनप्राप्ति होती है। इसपर शुभ ग्रह कीदृष्टि हो अथवा यह बलवान हो तो अच्छ। धनलाभ होता है। नीच गृह में,अथवा अशुभ सम्बन्ध में हो तो भंयकर धनहानि, मन को दुःख और रोगों सेपीडा ये फल मिलते हैं।

    अज्ञात -- विद्याहीनः लाभवान् । षष्ठ।धिपेन युतः तिंष्ठ ति चेत् नेत्रवैपरीत्यं भवति। शुभट्ृष्टे परिहारः। स्वोच्चे स्वक्षेत्रे विद्यावान् नेत्रविलासी। तत्रपापयुतक्षेत्रे पापदृष्टे नेत्ने रोगः । कुदन्तः । नृपवन्हिचोरात् भयम् । विभवक्षयःकामिनीकष्ट भवति। तत्र पापयुते पापक्षेत्रे पापदृष्टे कामिनीहीनः।। इसे विद्याप्राप्तिनहीं होती, धन मिलता है। इसके साथ ष्ठ स्थान का स्वामी हो तो दृष्टी सदोशहोती है। किन्तु इस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो यह फल नहीं मिलता। यहमकर या वृश्चिक में हो तो विद्या प्राप्त होती है तथा आंखे अच्छी होती है।पापग्रह से युक्त, अथवा दृष्ट हो तो आंखो के रोग, दांतो के रोग, राजा, अमितथा चोरों से भय, धनहानि, स्त्री को कष्ट ये फल मिलते है। इसी योग मेंद्वितीय स्थान का स्वामी भी यदि पापग्रह हो तो स्त्री प्राप्त नही होती।

द्वितीय भाव में मंगलजातक धातु का व्यापारी, विदेश निवासी, ऋणी, जुआरी, सहनशील, विजयी, कठोर परिश्रमी, शिथिल शरीर वाला, सदा प्रसन्न और जीवन में सुख-सुविधाओं का उपभोग करने वाला होगा।
-मानसागरी

जातक वाक्यपटु, असुन्दर, विपन्न, धनहीन और निम्न जाति के लोगों की सेवा करने वाला होगा।
-फलदीपिका

जातक गरीब, निर्दयी, अशिक्षित, संपत्ति और परिवार का दुरूपयोग करने वाला होगा।
-सारावली

जातक निरक्षर तथा संपत्तिशाली होगा। यदि मंगल षष्ठेश हो, तो वह नेत्र रोगों से पीड़ित होगा। यदि मंगल स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक की दृष्टि अच्छी होगी और वह शिक्षित होगा।
-भृगु

जातक झगड़ालू, अपव्ययी, कटुवक्ता, परस्त्री/परपुरूषगामी, जल्दी क्रोध करने वाला, गंभीर, अधिक पैतृक संपत्ति वाला, शिक्षा रूक रूक कर प्राप्त करने वाला, कड़वा स्वभाव, उत्तेजित और भद्दे ढ़ंग वाला होगा। 
-डॉ रामन

द्वितीय भाव में मंगल नेत्र कष्ट, कुसंगति, चेहरे, आँखो, कानों, व कंधों आदि पर घाव वाला तथा भ्रान्तीकारी होता है। जातक को रक्त-विषाक्तता या शस्त्रघात के कारण पत्नी वियोग होगा। यदि मंगल उच्चस्थ, स्वग्रही और पाप प्रभाव से रहित या शुभ दृष्ट है तो घटनाओं में कुछ फेरबदल हो सकता है।
    हमारे विचार -- आचार्य, गुणाकार तथा कल्याणवर्मा के अनुसामनिकृष्ट भोजन पर सन्तुष्ट होना यह इस मंगल का फल है। यह पुरुष राशियों केलिए ठीक है। वैद्यनाथ तथा गर्ग का फल भी प्रायः पुरुष राशियों का ही है गर्गने भोगी, प्रवासी, धनवान ये फल कहे हैं वे स्त्री राशियों के हैं। आर्यग्रंथ,जीवनाथ, काशीनाथ, जागेश्वर, हिल्लाजातक, यवनमत, बृहद्यवनजातक,घोलप इनके कहे हुए फल स्त्री राशियों मे मिलते हैं। पुत्रवान यह फल पुरुष राशिका है तथा पुत्रहीन स्त्री राशि का है। पाश्चात मत में खेती, पशु तथा बिलिंडगकें कामों से लाभ ये फल मिथुन, तुला, कुम्भ के हैं। मशीनरी, लकडी, कोयला,     नाविक व्यवसाय इनमें लाभ होना यह फल मेष, सिंह, धनु राशि का है। आरोग्य,वैद्यक से लाभ यह फल कर्क, वृश्चिक, मीन का है।

    हमारा अनुभव -- द्वितीय स्थान में मेष, सिंह, धनु मे मंगल हो तोएकदम धन प्राप्त करने की तीव्र इच्छ। होती है इसलिए सहा, लॉॉट री, रेस,जुआ आदि के मोह में फसे हुए होते है। परस्त्रियों से इन्हे धनलाभ होता है।किन्तु वह धन उसी व्यसन में खर्च भी हो जाता है। इन्हे खर्च करने का मौकापहले आता है - धन प्राप्ति बाद में होती है। मेष, कर्क, सिंह या मीन लगन होऔर यह वक्री हो तो मिली हुई सब जायदाद नष्ट होती है, नई प्राप्तनहीं होती।इतना ही नहीं, प्रपंच के लिए आवश्यक धन भी नहीं मिलता। धन के लिए बहुतकष्ट होता है किसी की सहायता नहीं मिलती। अयोग्य व्यक्तियों के पास भीयाचना करनी पड ती है, हमेशा अपमान सहना होता है। मुंह के पीछे लोग बहुतनिन्दा करते है। इस योग में यह वक्री न हो तो थोड। बहुत धन किसी तरह मिलजाता है। इस ग्रह की यह विशेषता है कि या तो एकदम बहुतधन प्राप्त होता है।या फिर प्राप्त ही नहीं होता। स्वभाव उदार होता है। प्रपंच की फिक्र नहींहोती। थोडे पैसों के लिए तो बहुत विचार करते हैं किन्तु एकदम बहुत धनव्यय करते समय कुछ विचार नहीं करते । यह स्वराशि में या अन्नि राशि में होतो पत्नी की मृत्यु होती हैं। वह भी प्रौढ अवस्था में होती है जब लड कौं कोसौतेली मां अच्छी नहीं लगती। किन्तु घरगृहस्थी चलाने के लिए दूसरा ब्याहकरना पड ता है।  इसविषय में चारुबेल का फलादेश देखिए - इस समय आकाश स्वच्छ नीला तथातारों से भरा होता है ऐसे व्यक्ति कई गुणों और कलाओं से संपन्न होते हैं। येलोग एक जगह अधिक समय नहीं रहते । प्रवासी, संशोधक, ज्योतिषी, वैज्ञानिकहोते हैं।) श्री जोशी के बतलाए फलों में अशुभ फलों का अनुभव जल्दी आताथा तथा शुभ फल बहुत देर से मिलते थे।

    यह मंगल, वृषभ, कन्या या मकर में हो तो स्त्री की मृत्यु नहीं होतीकिन्तु अकारण ही कुछ समय तक विभक्त रहना पड ता है। पति पत्नी में प्रेमहोता है। दोनो कामुक होते हैं। कीर्ति मिलती है किन्तु प्राप्ति से अधिक धनखर्च होता है। यह मिथुन, तुला या कुम्भ में हो तो वे लोग पैसा खर्च नही करते,बैंक में इकठ्ठा करके जायदाद खरीदते रहते हैं। कर्क, वृश्चिक, मीन में धनप्राप्तिहोती है और संचय भी होता है। ये लोग़ संसार में आसक्त नहीं होते और आगेकी फिक्र नहीं करते। इनके परिवार में दुर्घट ना से किसी की मृत्यु होती है। ब्याहदेर से होता है, धन प्राप्ति भी देर से होती है। शॉर्ट साइट के कारण इन्हें ऐनकलगानी पड ती है। मस्तिष्क गरम रहता है। तीखे पदार्थों की रुचि होती है। येबहुत खाते हैं और कामुक होते हैं। स्त्री का सहवास न हो तो इनसे कोई कामठीक तरह नहीं होता। लोगों पर इनका प्रभाव जल्दी पड ता है। व्यवहार साफहोता है। किन्तु दूसरों के पैसे निधि के रुप में रखने से इनपर अनेक आपत्तियांआ सकती हैं। इन्हें बहुत कष्ट और तकलीफ के बाद मुसीबतों का सामना करके ही प्रगति करनी पड ती है। किसी का कर्ज लेकर या उधार माल लाकर निर्वाहकरने की प्रवृति इन लोगों ने बिलकुल नहीं रखनी चाहिए क्योंकि वैसा करने सेइन्हें बहुत अपमान सहना पड ता है। इनका बोलना तीखा होता है। ये किसी काभी वर्चस्व सहन नहीं करते । आवाज भर्रायासा होता है। अपने शब्द से येहमेशा पीछे हट ते है। वकीलों के लिए यह योग अच्छा है। अदालत में इनकाप्रभाव पड ता है। डॉक्ट रों के लिए भी यह योग अच्छा है। इन्हें अच्छा धनमिलता है। इनका निदान जल्दी में किया हुआ हो कर भी सही होता है।    ज्योतिषियों को यह योग बिलकुल अच्छ। नहीं है। इनके कहे हुए बुरे फलों -औैसे मृत्युयोग, दीवालियेपन का योग का अनुभव जल्दी आता है। शुभ फलोंका अनुभव जल्दी नहीं आता। लोग कहते है कि इस व्यक्ति की वाणी हीअशुभ है। ऐसे एक व्यक्ति का मुझे स्वयं परिचय हुआ था। कुछ वर्ष पहले कुछमाल ले कर घूमकर बेचने का काम मै करता था। उस समय मेरा ब्याह हुए कुछही दिन हुए थे। एक जगह एक व्यक्ति को माल दिखला रहा था कि उसी व्यक्तिने मेरा चेहरा देख कर कहा कि चार साल बाद तुम्हारी पत्नी मर जायगी और हंसने लगा।द्वितीय मंगल अशुभ कहे वही सचच्चा होता है। शुभ फल का अनुभव नहीं आता। उसकेकहने के अनुसार चार वर्ष बाद मेरी पत्नी की मृत्यु हुई तथा लखपती की भीसारी इस्टेट नष्ट होकर पत्नी एक जगह, बच्चे दूसरी जगह, खुद तीसरी जगदऐसी दशा हुई। इस व्यक्ति ने मुझे जो एक बहुत शुभ फल कहा था उसका भासतो हुआ किन्तु वह मिला नहीं। इस योग के बिलकुल विपरीत योग स्व. श्रीनवाथेजी की कुण्ड ली में था। उनके धनस्थान में गुरु स्वगृह में था। वे जो भीशुभ फल कहते थे उसका बहुत अच्छ। अनुभव आता था किन्तु मृत्यु या धनहानिके योगों का फल नही मिलता था। अतः ज्योतिषी को अपने धनस्थान में जैसेग्रह हों वैसा शुभ या अशुभ फल कहना चाहिए।

    द्वितीय स्थान में मंगल का होना शूरता का प्रतीक है। भौतिक एवं शारीरिकवाद-विवाद के विषय में ऐसे लोगों से दूर रहना ही श्रेयस्कर रहेगा। ऐसा जातकनिष्दुर, क्रोधी, कटुभाषी, लड़ाकू, झगड़ालू रहता है। बचपन में कुसंगति केकारण विद्या अध्ययन में दिक्कतें खड़ी होती हैं। जन्म स्थान से दूर रहना पड़ताहै। प्रायः कृषिकार्य लाभदायी रहता है। आर्थिक दृष्टि से कंजूस रहता है औरपांस में पैसा रहने पर भी किसी की सहायता नहीं करता। धनसंग्रह अधिकरहता है। घर-बाहर शत्रुओं की भरमार रहती है। चेहरे, आंखों, कान या बाईभुजा पर कोई व्रण रहता है। पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार नवां वर्षशारीरिक दृष्टि से कष्टकारक एवं बारहवां वर्ष नुकसान का रहता है।
    
    द्वितीय भाव-मंगल दूसरे भाव में हो तो जातक कठोर/कर्कश आवाज/वाणीवाला, निर्धन, मंदबुद्धि, उठाईगीर, चोरी की प्रवृत्ति वाला तथा नेत्र रोगी होता है।ऐसा जातक परिवार/कुटुम्ब में झगड़े का कारण बनता है (यदि शुभ योगों से धनप्राप्त हो भी जाए तो जातक कंजूस बनकर न खुद खर्च करता है न किसी और कोकरने देता है-ऐसा शास्त्रीय मत है)। ऐसे जातक को जमीन खरीदने-बेचने याकृषि से लाभ सम्भव होता है। दक्षिण भारतीय ज्योतिषी दूसरे भाव में मंगल वालेजातक को भी मांगलीक मानते हैं।
    लाल किताब के अनुसार दूसरे भाव का मंगल जातक को धर्म-कर्म मेंविश्वास रखने वाला बनाता है। वह अपने भाइयों का पालन करता है। किन्तुअशुभ प्रभाव में वह 'आस्तीन का सांप' सिद्ध होता है। ऐसे जातक की मृत्युअचानक लड़ाई-झगड़े में होनी सम्भव होती है। वह बैंक-बैलेंस होते हुए भीमैले, पुराने वस्त्र पहनने वाला, पराए अन्न से यापन करेने वाला (चोर, उठाईगीर,दलाल, चन्दा खाने वाला, मांगकर खाने वाला आदि) कंजूस होता है। कर्कशध्वनि वाला होता है। शय्या सुख उसे अल्प ही मिलता है, विशेषकर पृथ्वी राशिका मंगल हो तो किसी कारण से पति-पत्नी साथ नहीं रह पाते।

द्वितीय भाव: मेष, सिंह, धनु का मंगल द्वितीय भाव में हो तो जातक की इच्छा एकदम से धनवान बनने की होती है। ऐसे लोग प्राय: सट्टा, लाटरी, जुआ और रेस आदि में धन व्यय करते हैं, उन्हें परायी स्त्रियों से धन लाभ होता है। ऐसे जातक व्यसनों में पड़कर धन का नाश कर डालते हैं। वृष, सिंह, कन्या और मेष का मंगल द्वितीय भाव में हो तथा बक्री भी हो तो मिली संपत्ति शीघ्र नष्ट हो जाती है तथा नई नहीं मिल पाती। यदि मंगल मार्गी हो तो थोड़ी पूंजी बची रहती है। अग्नि राशि और वृश्चिक राशि का मंगल हो तो दाम्पत्य-सुख शीघ्र नष्ट हो जाता हे तथा बच्चों के लालन-पालन के लिए दूसरा विवाह करना पड़ता है। पृथ्वी तत्त्वीय राशि का मंगल हो तो पत्नी की मृत्यु तो नहीं होती परन्तु काफी समय तक पति-पत्नी में मनोमालिन्य बना रहता है। वायु तत्त्वीय राशि का मंगल हो तो धन संग्रह हो जाता है। चिकित्सकों और वकीलों के लिए ऐसा मंगल लाभकारी होता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति ज्योतिष को* जीविका बनाकर पछताता है, क्योंकि उसके द्वारा की गई भविष्यवाणियां असत्य होती हैं। वृष का मंगल हो तो व्यक्ति असत्यभाषी, बहुभक्षी, बन्धुद्रोही और कुल कलंकी होता है। नीचस्थ मंगल से रोगी, सिंह में हो तो पुत्रहीन, धर्महीन तथा दूसरे के धन को हरने वाला होता है। 

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो उत्तम फलदायी होताहै। ऐसा जातक धनवान, धैर्यवान, यशस्वी एवं सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करताहै। वाहन आदि के कारण अपघात भी संभव रहता है। मंगल वक्री हो तो विशेषसावधानी बरतनी चाहिए। स्त्री-पुत्रादिकों से पारिवारिक सुख कम मात्रा में प्राप्तहोता है। एक से अधिक विवाह होते हैं। स्त्री जातक को गर्भपात का डर रहता है।2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातक सुंदर,दीर्घायु, प्रतिष्ठित, अधिकारसंपन्न एवं धनसंपन्न होता है। आकस्मिक रूप सेइसका धन नष्ट होता है। शासन से दंड मिलने की संभावना रहती है। जातकविद्वान तो होता है, पर आचरण शुद्ध नहीं रहता। जातक गुप्त एवं अनैतिकमार्गों से धन कमाता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल धन स्थान में हो तो जातक अतिकामातुररहता है। पत्नी मनपंसद नहीं मिलती। इसी कारण से अन्य स्त्रियों के चंगुलमें पड़कर पैसा बरबाद करता है। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती। सजा एवंचोरी के कारण भी धनक्षय की संभावना रहती है।

    4. कर्क कर्क राशि का मंगल द्वितीय स्थान में होने पर जातक आर्थिक     इृष्टि से संपन्न रहता है। वह चोरी, रिश्वत एवं अन्य अनैतिक मागों से धनकमाता है और शाही ठाट से रहता है। जातक धैर्यवान, चतुर, धनसंप्रह करनेमें माहिर एवं अपने कुल में प्रसिद्ध रहता है। उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता,नेत्रविकार होते हैं।

    5. सिंहसिंह राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातक संपन्न, क्रोधी,पेट के विकार से ग्रस्त, साहित्य, संगीत में रुचि रखनेवाला, पारिवारिक लोगोंसे अलगाव एवं बाहर के लोगों से समन्वय रखनेवाला, सरकारी कर्मचारी एवंअधिकारसंपन्न रहता है। मां का सुख अच्छा तो मिलता है किंतु जातक कामां के साथ व्यवहार अच्छा नहीं रहता।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातक सुखी,संपन्न, धैर्यवान, स्वाभिमानी एवं कंजूस रहता है। भाई-बहनों में मतभिन्नतारहती है। जातक कामातुर रहता है। उसे वाहन या जानवर के कारण अपघातहोता है। मंगल वक्री हो तो निश्चित रूप से अपधात होता है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातक भटकनेवाला,होशियार, बुद्धिमान एवं चतुर रहता है। आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। सजा या गुप्त रोग का भय रहता है। अचानक आर्थिक हानि होती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातकआर्थिक दृष्टि से संपन्न एवं सुखी रहता है लेकिन संतान सुख में बाधा रहतीहै क्योंकि संतान के साथ उसके मतभेद रहते हैं। जातक अतिकामातुर रहताहै, पत्नी मनोनुकूल न मिलने के कारण अन्य स्त्रियों की ओर खिंचाव रहता है। महिलाओं की कुंडली में ऐसा मंगल होने पर वे परपुरुषों की तरफ आकृष्ट होती हैं। गर्भपात का भय भी रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातक धैर्यवान, चतुर,धनवान, अधिकारसंपन्न एवं सुखी रहता है। धनसंग्रह करने में वह कुशल रहता है। उसे जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है।

10. मकर-मकर राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातक क्रोधी,गीत-काव्य आदि कला में प्रवीण रहता है। परिवार के सदस्यों से अनबन रहतीहै। जबकि बाहर के लोगों से स्नेहपूर्ण संबंध रहते हैं और उदर पीड़ा रहतीहै। आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। सजा या चोरी के कारण जातक कोधनहानि होती है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातकअधिकार-संपन्न, धनवान एवं सुखी रहता है। आयु अवधि कम रहती है। वहचोरी, रिश्वत जैसे अनैतिक मार्गों से धन कमाता है, जायदाद काफी रहती हैऔर पिता से अनबन रहती है।

12. मीन मीन राशि का मंगल द्वितीय स्थान में हो तो जातकअधिकार-संपन्न, सरकारी कर्मचारी, अभिमानी एवं स्पष्टवक्ता होता है। उसेमातां का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है लेकिन जातक मां को सुख नहीं दे पाता।सहोदरों से अनबन रहती है। गुदा द्वार के रोग उत्पन्न होते हैं।


 1. बावड़ी, कुआं न.खुदवाये। 
2. चारपाई पर न सोयेl 
3. चावल वचांदी का छत्र मंदिर में दान करें।
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3) तृतीय भाव -तृतीय स्थान (सहज भाव)
    तृतीय स्थान के मंगल के फलआचार्य व गुणाकर - मतिविक्रमवान् तृतियगे । यह बुद्धिमानऔर पराक्रमी होता है।

    पराशर - अग्रजं पृष्ठ जं हन्ति सहजस्थों धरासुतः । बडे और छोटेभाई की मृत्यु होती है।
    कल्याण वर्मा -- शूरोभवत्यधृष्यो मुदान्वितः समस्तगुणभाजनं

    ख्यातः। शूर, निर्भय, आनंदयुक्त, सर्वगुणसंपन्न, कीर्तिमान ।

    आर्यग्रन्थ -- कृशतनुसुखभागी तुंगभौमो विलासी। धनसुखनरहीनोनीचपापारिगेहे वसति सकलपूर्णे मन्दिरे कुत्सितेश्ष। दुबलापतला शरीर,सुखप्राप्ति । यह मंगल उच्च का हो तो विलासी होता है। नीच गृह में, शत्रु गहमें या पापग्रह की राशि में हो तो धन तथा सुख नष्ट होता है। घर अच्छ। मिलताहै किन्तु स्वभाव कुत्सित होता है।

    वैद्यनाथ -- अशठ मतिर्दुश्चिक्ययाते । सरल स्वभाव होता है।

    जयदेव -- नृपकृपः सुखवित्तपराक्रमी भवयुतोऽनुजदुःखयुतः। राजा

    की कृपा, सुख, धन, पराक्रम प्राप्त होते है। छोटे भाई की मृत्यु होती है।

    समान ही है।काशीनाथ, मन्त्रेश्वर तथा जागेश्वर -- इनके फल जयदेव के

    गर्ग -- भगिन्यौसुभगेद्धौ च क्रूरेण निधनं गते । कुमृत्युना भ्रातरौ द्वौमृतौ शस्त्रादिभिस्तथा॥ दो सुंदर बहिनें होती है किन्तु उनकी मृत्यु होती है। दोभाईयों का भी शस्त्रादि के द्वारा घात होता है।

    गोपाल रत्नाकर -- यह दरिद्री होता है। इस मंगल के साथ राहू होतो वह अपनी स्त्री का त्याग कर के परस्त्री से व्यभिचार करता है। साहसी, शूर,शत्रु के लिए निष्ठु र तथा संबंधियों की वृद्धि करनेवाला होता है।

    शौनक -- पुंवीय्यें खचरे तृतीयभवने दृष्टे च पूर्णेडथवा। पश्चात्पुत्रसमुद्धवो निगदितः पूर्व हि कन्योभ्दवः ।। सौरिक्षेत्रविनष्ठ गर्भकरणविष्यातमंत्रीश्वरं भौमे । तृतीय स्थान में पापग्रह हो, मंगल हो अथवा उसकीपूर्ण दृष्टी हो तो पहले कन्या होती हो, फिर पुत्र होता है। यह शनि की राशि में होतो गर्भपात होता है। यह प्रसिद्ध मंत्री होता है।

    बृहद्यवनजातक -- कथारतः त्रयब्देडनुजक्षिनिसुतोनुज-मुच्चविश्वे॥ आयु के १३ वें वर्ष छोटे भाई को तकलीफ होती है।
    पुंजराज -- कुजो वा तदाऽस्थिभंगं विषजं भयं च करोतिदाहज्वलनाच्च चिन्हं हड्डी टूटना, विषबाधा, जलने के दाग रहना

    रामदयाल -- पुंजराज के समान ही मत है।

    नारायणभट्ट -- कुतो बाहुवीर्य कुतो बाहुलक्ष्ी स्तृतीयो ।चेन्ममंगलो भ्रातवानां। सहोत्थव्यथा भण्यते केन तेषां। तपक्चर्यया चोपहास्यकथं स्यात् । बहुत पराक्रम, संपत्ति, तपश्चर्या तथा बन्धुओं से तकलीफ देइस मंगल के फल है।।

    जीवनाथ --नारायणभट्ट के समान मत है।

    घोलप -- श्रेष्ठ कवि, शत्रुओ का नाश करनेवाला।

    यवनमत -- धन, रल, वस्त्र तथा गृह की प्राप्ति होती है।

    पराशर -- विक्रमे भ्रातृमरणं धनलाभः सुखं यशः । भाई की मृत्यु,धन, सुख तथा कीर्ति प्राप्त होना ये फल हैं।

    हिल्लाजातक -- त्रयोदशे बन्धु सौख्यं, तृतीयः कुरुते कुजः। तेरहनेंवर्ष भाई का सुख प्राप्त होता है।

    पाश्चांत्यमत -- गाड़ी, रेल, वाहन इनसे भय होता है। पड़ोसियोंसे तथा सम्बन्धियों से झगेडा होता है। किसी दस्तावेज पर दस्तखत करने सेअथवा गवाही देने से भयंकर आपत्ति आती है। स्वभाव आग्रही और क्रोषीहोता है। बुद्धिमान किन्तु हलके हृदय का होता है। मकर के सिवाय अन्यराशियों में यह मंगल हो तो मस्तकशूल अथवा चितभ्रम हो सकता है। यहमंगल अशुभ योग में हों तो सम्बन्धियों से बहुत तकलीफ, प्रवास में तकलीकतथा दारिद्रय ये फल मिलते हैं।

    अज्ञात -- स्वस्त्री व्यभिचारिणी। शुभट्ृष्टे न दोषः अनुजहीनःद्रव्यलाभः। राहुके तुयुते वेश्यासंगमः। भ्रातृद्देषी क्लेशयुक्तः सुभगः अल्पसहोदःपापयुते पापवीक्षणेन भ्रातृनाशः उत्पाद्य सद्योनिहतः । उच्चे स्वक्षेत्रे शुभयुते वाभ्राता दीर्घायुः मतिधैर्यविक्रमवान् युध्दे शूरः। पापयुते मित्रक्षेत्े धृतमान्। नृपमानः
    रिपुनाशः निरंकुशः नित्यं महोत्सवः। पत्नी व्यभिचारिणी होती है। शुभग्रह कीदृष्टि हो तो यह फल नहीं मिलता। छोटे भाई नहीं होसेधन लाभ होता है। साथमें राहु हो तो वेश्यागमन करता है। भाइयों का द्वेष, तकलीफ, सुंदरता, भाई कमहोना ये फल मिलते है। पापग्रह साथ में हो या उसकी दृष्टि हो तो भाइयों कानाश होता है, जन्मते ही मर जाते है। मकर, मेष या वृश्चिक में हो अथवा शुभग्रह से युक्त हो तो भाई दीर्घायुषी होते है तथा बुद्धिमान, धैर्यशाली एवं पराक्रमीहोते है, युद्ध में विशेष शौर्य दिखलाते है। यह पाप ग्रह से युक्त होकर किसीमित्र ग्रह की राशि में हो तो वह व्यक्ति सोचविचार करनेवाला, प्रबलधारणाशक्ति से युक्त होता है। राजमान्यता प्राप्त हो कर शत्रुओं का नाश होताहै। किसी का वर्चस्व सहन नहीं होता। अपनी ही इच्छा से कार्य करता है।इसके घर नित्य ही आनंदकारक घट नाएँ होती रहती है।
तृतीय भाव में मंगल जातक के छोटे भाईयों का नाश, सुख उपभोग करने वाला, निर्बल होगा। यदि मंगल नीचस्थ, शत्रुक्षेत्री या अशुभ राशि में हो तो धन वैभव और प्रसन्नता से रहित होता है तथा गंदे लेकिन सुख-सुविधा संपन्न घर में रहता है।

-मानसागरी

जातक शक्तिशाली, प्रसन्न, बहादुर और गुणवान होगा। वह दूसरों के वश में रहने वाला और छोटे भाईयों के सुख से वंचित रहेगा।

-फलदीपिका
तृतीय भाव में मंगल होने से जातक साहसी, अपराजेय, एकमात्र संतान, धार्मिक, प्रसिद्ध और प्रसन्न होगा।

-सारावली

उसके कोई छोटा भाई-बहन न होगा। कोई शुभ दृष्टि न होने पर जातक की पत्नी/पति का चरित्र संदिग्ध होगा। पत्नी के जननांग सुगठित होगे। भाई-बहनों से शत्रुता के कारण उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़े। यदि मंगल स्वक्षेत्री, उच्चस्थ हो तो उसके भाई चिरंजीवी और वह स्वयं सहनशील और साहसी होगा।

- भृगु

जातक साहसी, कुशाग्र बुद्धिवाला, अन्वेषक, धृष्ट, महत्वाकांक्षी, जल्दी क्रोध करने वाला, सिद्धान्तहीन, सहज आदर्श वाला, अप्रसिद्ध, कम भाई-बहनों वाला होगा।

टिप्पणी

-डॉ -डॉ रामन

तृतीय भाव पराक्रम और छोटे भाई-बहनों का है। यहाँ मंगल की स्थिति जातक को साहसी, गुणवान, धार्मिक आदि बनाता है और भाई-बहनों के लिए अनिष्टकारक होता है। जातक धार्मिक, धनी, संतुष्टि रहित होगा। तृतीय भाव में मंगल के कारण जातक की हड्डी टूटना, से भय, जलने व कान में वेदना होगी।

विष

जातक के केवल दो सुंदर बहनें होंगी और 2 भाई जो शास्त्राघात के कारण मृत्यु को प्राप्त होगें। महिलाओं के विषय में तृतीय भाव में मंगल उन्हे भाग्यशाली, हृष्टपुष्ट और समर्थ बनाता है।

-गर्गाचार्य के अनुसार

श्री एम. एन. केदार और श्री एस. एन. कपूर ने तृतीयस्थ शनि और मंगल पर शोध किया। जो कि जुलाई 84 में एस्ट्रालॉजिकल मैगज़ीन में छपा। इस शोध में शास्त्रीय आधारों के कुछ अपवादों का भी प्रतिपादन व विवेचन किया गया-
(क) तृतीयस्थ मंगल का अर्थ है-जातक परिवार में भाइयों में सबसे बड़ा था सबसे छोटा होगा।

(ख) तृतीयस्थ शनि का अर्थ है-जातक. लड़का होने पर उसके छोटी बहन और जातक के लड़की होने पर उसका छोटा भाई होगा।

    मेरे विचार -- तृतीय स्थान पराक्रम स्थान है। इस में शास्त्रकारों नेसब शुभ फलों की योजना की है। किन्तु सभी शास्त्रकारों ने बन्धु का घात होनायह अशुभ फल भी कहा है। आचार्य, गुणाकर आदि ने जो यह फल कहा हैइसका अनुभव स्त्री राशियों में आता है। सुख न मिलना यह फल पुरुष राशियोंका है। हिल्लाजातक, बृहधयवनजातक, पुंजराज, गर्ग शौनक, रादयाल, वैद्यनाथतथा पाश्यात्य इनके फलादेश भी पुरुष राशियों के हैं। 
इसविषय का एक श्लोक इस प्रकार है - भ्रातृदी सत्रीग्र्षस्थी भ्रातृदी पुंग्रार्षगी।सोदरेशकुजौ स्याता भ्रातृस्वसृसुखप्रदौ। मंगल स्त्रीग्रह की राशी में हो तोबन्धुओं का सुख मिलता है। पुरुष ग्रह की राशि में हो तो बहनो का सुख

    मिलता है।

    मेरे अनुभव -- यह मंगल पुरूष राशि में हो तो माता की मृत्यु होकरसौतली मां आती है। मकर के सिवाय अन्य स्त्री राशि में हो तो बडे और छोटेभाई जीवित रहते है। पुरुष राशि में हो तो छोट। भाई बिल्कुल नहीं होता। बहिनहोती है या फिर गर्भपात ही होता है। छोटी बहिन के बाद छोट। भाई हो तोजीवित रह सकता है। भाई के साथ इसके सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते । बंट वारा हो।जाता है। किन्तु अदालत में जाकर नही होता यह मंगल पुरूष राशी में हो तोअदालत में झगड कर विभक्त होना पड ता है। यह मेष, मकर या वृश्चिक में होतो जीवन में स्थिरता नहीं होती। अति सत्यप्रिय होने से लोगों को अप्रिय होताहै। स्त्री राशि में साधारणतः स्वार्थी और धूर्त स्वभाव होता है। इस्टेट छोडमीपड ती है। घरबार की चिन्ता नहीं होती।

    मंगल तृतीय स्थान में हो तो वह आमतौर पर अनिष्टनिवारक रहता है। ऐसाजातक धैर्यवान, उद्यमी, स्वपरिश्रम से प्रगति करनेवाला रहता है। सहोदरों सेउसकी बनती नहीं। जातक का उनके साथ बर्ताव अच्छा रहता है किंतु उनसेपर्याप्त सहयोग प्राप्त नहीं होता। जातक के दो या चार भाई और बहनरहती हैं।

    जातक सरकारी कर्मचारी, समाज में प्रतिष्ठित, निर्भय, सुखी एवं संपन्नरहता है। जातक के प्रथम कन्याएं होती हैं, पुत्र विलंब से होता है। मकर याकुंभ राशि का मंगल तृतीयस्थ हो तो गर्भपात होता है।

    तृतीयस्थ मंगल जातक को अतुलनीय साहस देता है। जातक अनेकसाहसिक कार्य करने में समर्थ होता है। इसी कारण अग्निभय, विषभय एवंहड्ियां टूटने का डर रहता है। तृतीयस्थ मंगल वक्री होने पर इन फलों में तीव्रताआती है।

    सगे-संबंधी, अड़ोस-पड़ोस के लोगों के कारण उसे अनेक समस्याओं सेजूझना पड़ता है। जातक का जीवन संघर्षमय किंतु संपन्न एवं सुखी रहता है।
तृतीय भाव-तृतीय भाव में मंगल हो तो जातक प्रसिद्ध, क्रोधी, साहसी,पराक्रमी, धैर्यवान तथा कर्कश वाणी वाला होता है। वह यह कई कलाओं मेंपारंगत हो सकता है, परन्तु छोटे-बड़े भाइयों के लिए घातक/मारक होता है। संघर्षक्षमता, आत्मबल तथा शक्ति से सम्पन्न होता है। योद्धा भी हो सकता है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक शूरवीर, आत्मबली, भुजबल सेपरिस्थितियों को अनुकूले बना लेने वाला, जीवन में अत्यधिक कठिनाइयों कासामना करने वाला, बुद्धिमान किन्तु गुस्सैल होता है। भाइयों से उसके सम्बन्धअच्छे नहीं रहते, कोर्ट-कचहरी की नौबत आ जाती है। स्त्री राशि में जातक धूर्तहोता है। स्व या उच्च राशि में हो तो जीवन अस्थिर होता है। राहू के साथ अशुभयोग हो रहा हो तो जातक वैश्यागामी हो जाता है (मकर राशि भी तीसरे भाव में होतब नहीं)। तृतीयस्थ मंगल से जातक को गवाही या महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों परहस्ताक्षर के मामले में राजदण्ड का भय रहता है। ऐसे जातक को चालबाजी/धोखेबाजीनहीं करनी चाहिए तथा उसके साथ धोखेबाजी न हो इस बारे में सतर्क रहनाचाहिए। वैसे ऐसा जातक यदि नम्र स्वभाव अपना ले तो उसके लिए शुभ होता है।
तृतीय भाव: तृतीय भाव में मंगल हो तो वाहन, रेल इत्यादि से भय रहता है। संबंधियों तथा पड़ोसियों से झगड़े होते हैं। किसी की गवाही देने या किसी दस्तावेज पर बिना विचारे हस्ताक्षर करने से विपत्ति आती है। उच्च का मंगल हो तो थोड़े शुभ फल अनुभव में आते हैं। अशुभ योग में मंगल तृतीय भाव में स्थित हो तो भाई की मृत्यु तथा धनाभाव अनुभव में आता हे। राहु के साथ हो तो कपटी तथा वेश्यागामी होता हे, दुखी रहता है। स्त्री राशि का मंगल भाइयों क॑ लिए नेष्ट फलप्रद रहता है। पुरुष राशि में मंगल हो तो माता की मृत्यु होती है, माता को गर्भस्राव होता है अर्थात अपने से छोटा भाई नहीं होता, बहन होती है। इसके पश्चात भाई हो तो जीवित रहता है। भाइयों में झगड़ा होता है तथा नौबत अदालत तक पहुंचने की आ जाती है। मेष, वृश्चिक एवं मकर का मंगल हो तो जीवन में स्थिरता नहीं रहती। इनके अतिरिक्त अन्य राशियों में मंगल हो तो जातक धनहीन, सुखहीन, भातृहीन, उत्तम गृह से हीन होता है। 

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो जातक नौकर-चाकरोंसे युक्त, सुखी एवं संपन्न जीवन जीता है। जातक गुणी एवं सदाचारी, सरकारीकर्मचारी, पराक्रमी, अधिकारसंपन्न एवं प्रतिष्ठित रहता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो जातक उद्यमी,पराक्रमी, संपन्न, विद्वान, सुंदर, सुखी एवं सदाचारी एवं कर्तव्यपरायण रहताहै। मृत्यु के बाद भी उसका नाम रहता है। कुसंगति या चोरी के कारण अन्यदुर्गुण जातक में आने की संभावना रहती है। बाल्यारिष्ट का भय भी रहता है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का मंगल तृतीयस्थ हो तो उसके शुभ फल कमप्राप्त होते हैं। विशेष रूप से सहोदर एवं मित्रों के कारण जातक को हानिहोती है। कोई-न-कोई विकार होने पर भी स्वास्थ्य अच्छा रहता है। आर्थिकस्थिति साधारण रहती है। जातक धैर्यवान और जासूसी करने में माहिर होताहै। उसके दो विवाहों की संभावना रहती है।
    4. कर्ककर्क राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो वह संतान के बारेमें अनिष्ट फल देता है। ऐसे जातक को संतान होती है परंतु वह जीवित नहींरहती। पुनः संतान सुख विलंब से प्राप्त होता है। यवनाचार्य एवं महर्षि गर्गके अनुसार जातक पति-पत्नी का चरित्र संशयास्पद रहता है। पति का सालीसे या पत्नी का देवर के साथ अनुचित संबंध रहता है। जातक स्वयं व्यसनी,कंजूस, नास्तिक एवं चरित्रहीन रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का मंगल तृत्तीय स्थान में होने पर मिश्रित फल प्राप्तहोते हैं। जातक स्वयं सदाचारी, सत्कर्मी होने पर भी कुसंगति के कारणआचारहीन एवं क्रूर बन सकता है। जातक की आर्थिक स्थिति अच्छी रहतीहै। किंतु कर्तव्यहीनता के कारण पैतृक संपत्ति पर मौज-मस्ती करता है।सहोदरों तथा अड़ोस-पड़ोस के व्यक्तियों से जातक के संबंध स्नेहपूर्ण नहींरहते, फलस्वरूप दुख झेलने पड़ते हैं। शूल रोग भी संभव रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल तृतीयस्थ होने से राजयोग बनता है। ऐसाजातक गुणवान, ज्ञानवान, विद्वान, सदाचारी, धैर्यवान, सरकारी कर्मचारी,मधुरभाषी, संपन्न किंतु कंजूस रहता है। जातक समाज में प्रतिष्ठा प्राप्तकरता है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,धैर्यवान, अपनी मेहनत से आगे बढ़नेवाला, उद्यमी, प्रतिष्ठित पिता का पुत्र रहताहै। मृत्यु के बाद भी अपनी यशोगाथा पीछे छोड़ जाता है। बाल्यावस्था मेंरोगभय और स्वास्थ्य कमजोर रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो जातकधैर्यवान, नौकर-चाकरों का सुख भोगनेवाला, संपन्न, सुखी, सरकारी कर्मचारी,मित्र जुटाने में माहिर एवं स्वभाव से क्रूर रहता है। जन्म से या बाद में अपघातके कारण शरीर में कोई विकार रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल तृतीयस्थ हो तो जातक गुणी, विद्वान, पराक्रमीएवं आस्तिक होता है। संतान सुख अल्पमात्रा में और विलंब से प्राप्त होताहै। पति व पत्नी का चरित्र अच्छा नहीं रहता। जातक में रिश्वत, चोरी जैसेअनैतिक मा्गों से धन कमाने की वृत्ति रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो जातक स्वार्थी,कंजूस, विद्वान, अभिमानी, चुगलखोर, लाल आंखोंवाला, धैर्यवान, सुखी,निरर्थक धन खर्च करनेवाला एवं परिवार-समाज को दुख देनेवाला रहता है।

11. कुंभ-कुभ राशि का मंगल तृतीय स्थान में हो तो जातक स्वार्थी,कंजूस, कुसंगति से युक्त, बहुरूपी, चुगलखोर, मधुरभाषी रहता है। इसकीसंतान, विशेषकर कन्याएं आज्ञाकारी होती हैं।

12. मीनमीन राशि का मंगल तृत्तीय स्थान में हो तो जातक गुणवान,दानी-धर्मी, संपन्न एवं समाज में प्रतिष्ठित रहता है। उसका पिता भी समाजमें प्रतिष्ठित रहता है। माता-पिता से अनबन रहती है। स्वास्थ्य के बारे में यहमंगल अच्छे फल नहीं देता। स्वास्थ्य के बारे में हमेशा कोई-न-कोई शिकायतबनी रहती है। शूलरोग उत्पन्न होता है।

    1. चावल पकाकर उसमें फिनी मिलाकर चिड़िओों को खिलावें। 
2.चांदी का कड़़ा पहनें।
=========================== 4) चतुर्थ भाव -    चतुर्थ स्यान (सुख भाव) चतुर्थ स्थान के मंगल के फल

    आचार्य तथा गुणाकर -- विसुखः पीडि तमानसञ्चतुर्थे। सुख नहींमिलता, मन को पीडा होती है।

    कल्याणवर्मा -- बन्धुपरिच्छे दरहितो भवति चतुर्थेऽर्थवाहन-विहीन।अतिदुखैःसंतप्तः परगृहवासी कुजे पुरुषः॥ आप्त परिवार नहीं होता, धन या वाहननहीं मिलता, दूसरों के घर रहना पड़ता है और बहुत दुख होता है।

    गर्ग -- कुजे बंधौ भूम्याजीवो नरः सदा। भूमि पर आजीविका(खेती) करता है। प्रवासी होता है।
    काशीनाथ -- चतुर्थ भूसुते कृष्णः पित्ताधिक्योऽरिनिर्जितः। वृथाट नोहीनपुत्रो महाकामी च जायते। काले वर्ण का, पित प्रकृति का तथा शत्रुओं द्वारापराजित होता है। अकारण प्रवास करना, पुत्र न होना तथा अति कामुकता येफल मिलते है।

    जागेश्वर -- सभौमे विदग्धं विभग्नं, यदा मंगलो तुर्यभावं परपन्ने सुखंकि नराणां तथा मित्रसौख्यम् । कथं तत्र चिन्त्यं धिया धीमता वा परं भूमितोलाभभाव प्रयाति ॥ टुटाफुटा घर होता है तथा वह भी जलता है। मित्रों का तथाअन्य किसी प्रकार का सुख नहीं मिलता। बुद्ध नहीं होती किन्तु जमीन से कुछलाभ होता है।

    वैद्यनाथ -- स्त्रीनिर्जितः शौर्यवान् । नीचेऽरातौ कुजे सुखे स्यादगृ होस।स्त्री के अधीन, शूर होता है। खुद का घर नहीं होता।

    बृहद्यवनजातक --दुःखं सुहृद्वाहनतः प्रवासात्क लेवरे रम्बलता-बलित्वं। प्रसूतिकाले किल मंगलेऽस्मिन् रसातलस्थे फलमुक्तमाधैः॥ मित्र,वाहन, प्रवास इनसे दुख होता है। शरीर में बहुत रोग तथा दुर्बलता एवं प्रसूति केसमय कष्ट होता है। असृगष्ट सहोदरार्तिम् आठ वें वर्ष भाई को कष्ट होता है।आर्यग्रन्थकार -- जड मतिरतिदीनो बंधुसंस्थे च भौमे नभवति कुलआर्यर्बधुहीनोतिदुखी। भ्रमति सकलदेशे नीचसेवानुरक्तः परवशपरदारे लुब्धचितःसदैव॥ मंदबुद्धि, हीन, अपने कुल में या बडे बूढ़ों के साथ न रहनेवाला बंधुहीन,दुखी, सब प्रदेशों में घुमनेवाला, नीच लोगों की सेवा करनेवाला, दूसरों केअधीन रहनेवाला, परस्त्रियों में आसक्त होता है।

    मन्त्रेश्वर -- विमातृ-माता का वियोग होता है।

    पराशर -- चतुर्थ बन्धुमरणं शत्रुृद्धर्धनव्यः। भाई की मृत्यु, शत्रुओंमेंवृद्धि तथा धन की हानि ये इस मंगल के फल हैं।

    जयदेव -- असुखवाहनधान्यधनो जनो विकलधी: सुखगे सतिभूसुते। वाहन, धनधान्य, बुद्धि, सुख इनमें से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।वसिष्ठ -- भौमः सुचिरं चतुर्थे । वस्त्र अच्छे होते हैं।

    पुंजराज - आरः सबलश्षतुर्थें पितज्वरो वा व्रणरु्जनन्याः । भवेत्रितान्तमनुजो वृणार्तः पार्वेड्थवारे दहनेन दगंधः। यह बलवान हो तो माता को पि्तज्वर अथवाव्रणरोग होता है। शरीर में ब्रण होते हैं। खास कर पीठ में या जलने से व्रण होते हैं।मातामहस्य पक्षेडपि विषशस्त्रकृता व्यथा। इसकी माता के पिता के घर के लोगोंको विष या शस्त्रों से कष्ट होता है।

    रामदयाल - पुंजराज के समान ही मत है।

    नारायण भटट - कृपावस्त्रभूमिर्लभेत् भूमिपालात् । राजा की कृपा सेवस्त्र तथा जमीन प्राप्त होती है।

    घोलप - विदेश में बहुत कष्ट होता है।

    गोपाल रत्नाकर - मां-बाप को शारीरिक तथा आर्थिक कष्ट होते

    हैं। यह मंगल सौम्य हो तो नरवाहन (मनुष्यों द्वारा चलाये जानेवाले रिक्षा,पालकी आदि वाहन) का सुख मिलता है। घर के रहस्य बाहर ज्ञात नहीं होते।यह पराधीन होता है तथा स्त्री का घात करता है।

    हिल्लाजातक - चतुर्थो बंधुहानिश्च हायने चाष्ट मे ध्रुवं। आठवें वर्षभाई की मृत्यु होती है।

    यवनमत - यह मंगल बलवान न हो तो वृद्धावस्था में बहुत तकलीफहोती है। मातापिता के साथ विरोध होता है। घर की झंझटों में व्यस्त रहता हैघर गिरना या आग लगने का भय होता है। स्वभाव उद्धत होता है। हाथपैर लंबेहोते है। यह युद्ध में विजयी किन्तु निर्दय तथा ऋणग्रस्त होता है।

    पाश्चात्य मत - बहुत घूमनेवाला, झगडालू, मां-बाप का घातकरनेवाला तथा सुखहीन होता है। यह शुभ सम्बन्ध में हो तो जीवन में कभी दुखीनहीं होता। इसके व्यवहार में झंझटे और झगडे बहुत होते हैं। यह पागल जैसा होताहै और बहुत गलतियां करता है। साहसी और दुरग्रही होता है। इसपर पापप्रह कीदृष्टि हो या पापग्रह से युक्त हो तो दुर्घट नाओं का भय होता है।

    अज्ञात - गृहच्छि द्रम् । अष्ट मे वर्षे पितृरिष्टं मातृरोगी। सौम्ययुलेपरगृहवासः । शरीरकष्ट क्षेत्रहीनः । धनधान्यहीनः जीर्णगृहवासः। उच्च्चे स्वक्षेत्रे     शुभयुते मि्त्रक्षेत्रे वाहन क्षेत्रवान मातृ दिरघायु। नीचक्षे पामृत्युयुते मातनाशःबंधुजनद्वेपी स्वदेशपरित्यागी वस्त्रहीनः बंधुरहितः शौर्यवान् स्त्रीभिर्जितः॥ घरमें अयोग्य घट नाएं बहुत होती हैं। आठ वें वर्ष पिता की मृत्यु तथा माता को रोगहोना ये फल होते हैं। बुध के साथ हो तो दूसरों के घर रहना पड ता है। शरीर कोकष्ट होते हैं। धनधान्य, घरबार नहीं होता। टूटेफूटे घर में रहना पड ता है। मेषवृश्चिक या मकर में शुभ ग्रह से युक्त हो अथवा मित्र ग्रह की राशि में हो तोवाहन तथा खेतीबाडी का सुख मिलता है तथा माता दीर्घायुषी होती है। कर्कराशि में तथा अष्ट मेश से युक्त हो तो माता कीं मृत्यु होती है। भाईबंदों का द्वेषकरता है, स्वदेश का त्याग करता है। शूर किन्तु स्त्रियों के अधीन होता है।
चतुर्थ भाव में मंगल जातक मूर्ख, कंजूस, दयनीय, भाईयों के कष्ट से दुखी, विदेश यात्रा करने वाला, निम्नश्रेणी के लोगों की सेवा करने वाला और अन्य पुरूषों की स्त्रियों को भगा ले जाने वाला होता है।

-मानसागरी

जातक माँ के सुख और मित्रों व प्रसन्नता से विलग, विपन्न, भूमि और वाहन से रहित होगा।

-फलदीपिका

जातक वाहन और संबंधियों से वंचित, दयनीय स्थिति वाला और दूसरो के घरों में रहने वाला और अस्वस्थ व चिंतित होगा।

-सारावली

परिवार में गरीबी के कारण प्रतिकुलताएँ (विपत्तियाँ) होंगी। जातक की 8 वर्ष की आयु में उसके पिता का निधन, और माँ का स्वास्थ्य खराब रहेगा। उसकी अपनी कोई भूमि नहीं होगी, जीर्ण क्षीर्ण मकान में रहे, दरिद्र, संबंधियों से शत्रुता के भाव वाला, जन्म भूमि से दूर रहने वाला होगा। यदि मंगल स्वक्षेत्री, उच्चस्थ या शुभ ग्रह युत है, तो जातक को वाहनों, भूमि और माँ का सुख लंबे समय तक प्राप्त होगा।

- भृगु

जातक की माँ रोगी, खिन्न पारिवारिक जीवन, झगड़े, पिता को खतरा, घरेलू लड़ाई-झगड़े परन्तु वाहनादि होगे। जातक का जीवन कठिन/कठोर व्यवहार करने वाला बनाता है।

-डॉ रामन

यदि मंगल चतुर्थ भाव में है तो अन्य ग्रह भी प्रतिकूल हो जाते है।

-नारायण भट्ट

चतुर्थस्थ मंगल दयनीयता, दुख व कठिनाइयाँ और माँ तथा मित्रों से मन-मुटाव करवाता है लेकिन भूमि से लाभ प्राप्त कराता है।

- जीवन नाथ

टिप्पणी
चतुर्थस्थ मंगल परिवार में अनवन, अस्वस्थ पत्नी, धन हानि, पैतृक संपत्ति, घाव, कारागार, भूत प्रेत बाधा आदि देता है। चतुर्थ भाव में पाप ग्रह होने पर भी ऐसी गड़बड़ियाँ हो सकती हैं। यह माँ के लिये भी अच्छा नहीं है। चतुर्थस्थ मंगल 'कुज दोषकारक' होता है। जो कि पिता के लिए, अनिष्टकारक और माँ को स्वास्थ्य समस्याएँ प्रदान करता है या माँ की अल्पायु होगी। साधारणतया यह स्थिति पिता के लिए अशुभ है। कुण्डली में सभी योगों और ग्रहस्थितियों के सम्यक् विश्लेषण से ही फलों में प्रधानता या गौणता सिद्ध होती है। कोई भी सिद्धान्त एकांकी रूप में फलदायी नहीं हो सकता
    मेरे विचार-जमीन, घरबार, खेतीबाडी इनका कारक मंगल मानागया है किन्तु यह ठीक प्रतीत नहीं होता क्योंकि इस इस्टेट का मंगल द्वारा नाशही होता है। इस ग्रह का स्वभाव नाशकारी ही है। अपनी बुद्धिमत्ता विशेष नहींहोती। अग्नि जिस तरह सभी को जलाता है. - यह आदमी, यह जानवर ऐसाभेद नही करता - उसी तरह मंगल नाश करता हैं। आचार्य, गुणाकर, काशीनाथ,कल्याणवर्मा, जागेश्वर (भूमि लाभ का फल छोड कर) बृहद्यवनजातक,आर्यग्रंथकार, मंत्रेश्वर, जयदेव, पुंजराज, रामदयाल, घोलप, गोपाल रत्लाकर,हिल्लाजातक, पराशर, यवन तथा पाश्यात्य इन सभी ने चतुर्थ के मंगल के फलनाशरुप बतलाये हैं। ये फल पुरुश राशियों के है। अन्य आचार्यों के शुभ फलहैं वे स्त्री राशियों के हैं।

    मेरा अनुभव - इसे संपत्ति का सुख तो मिलता है किन्तु संतति नहींहोती। हुई तो कष्ट दायक होती है। इसका उत्कर्ष २८ वें वर्ष से ३६ वें वर्ष तकहोता है। बाद में खा-पीकर सुख से रहता है। व्यवसाय अनेक होते हैं। मेष,कर्क, सिंह या मीन लग्न हो और चतुर्थ में मंगल हो तो माता की मृत्यु तथाद्विार्या योग नही होता। क्योंकि ऐसी स्थिति में मंगल कर्क, तुला, वृश्चिक यामिथुन में होता है। अन्य राशियों में मातापिता की मृत्यु तथा द्विभार्य योग केफल मिलते हैं। सौतेली मां आ सकती है। आठ वें, १८वें, २८वें, ३८वें तथा४८वें वर्ष शारीरिक आपत्ति आती है। इसका उत्कर्ष जन्मभूमि में नही होता,    वहां बहुत कष्ट होते है। जन्मभूमि छोड कर दूर रहने से उत्कर्ष होता है। इसकीपैतृक इस्टेट नहीं होती। हुई भी तो उसका उपयोग जीवन भर नहीं होता। अपनेकष्ट से ही घरबार प्राप्त करना पड ता है। यह मंगल अग्नि राशि में हो तो घर कोआग लगती है। अपना घर बनवाकर आखिरी दिन वहीं बिताने की प्रबल इच्छ।होती है। मंगल कर्क, तुला, वृश्चिक, मिथुन में हो तो ही यह इच्छ। सफल होतीहै। किन्तु मृत्यु अपने घर में नहीं होती । (इसके उदाहरणस्वरुप लोकमान्यतिलक की कुण्ड ली देखना चाहिए।) इस स्थान के मंगल से पहले पुत्र की मृत्युहोती है। अदालत में यश मिलता है। मित्र बहुत होते हैं और उनसे लाभ भीहोता है। स्त्रियों से लाभ होता है। मृत्यु के समय कारोबार अच्छी स्थिति मेंहोता है तथा मृत्यु के समय विशेष तकलीफ नहीं होती। इसके पूर्वजों ने किसीगरीब की जायदाद का अपहरण किया होता है या देवी या गणपति की उपासनाबंद कराई होती है जिसके फलस्वरुप इसके घर में सदा ही असमाधान बनारहता है। स्त्री की मृत्यु, माता की मृत्यु, जायदाद न मिलना ये फल मिलते हैं।

    चतुर्थ स्थान में मंगल बहुत ही कम शुभ फल देता है। ऐसा जातक संपन्न एवं सरकारी कर्मचारी हो सकता है किंतु उसे परिवार एवं जायदाद का सुखअल्प मात्रा में प्राप्त होता है। मानसिक सुख-शांति का अभाव बना रहता है।

 खेती या जमीन विषयक कामकाज में जातक को सफलता मिलती है, शात्रु अधिक रहते हैं। जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है। जायदाद को अग्निभय रहता है। जातक स्वयं चर्म रोग एवं अग्निभय से पीड़ित रहता है।

    ऐसे स्त्री-पुरुष जातक कामातुर रहते हैं। स्त्रियां इनसे असीम प्रेम करती हैं।जातक पत्नी का आज्ञाकारी रहता है। माता का सुख पर्याप्त नहीं मिलता।सौतेली मां हो सकती है।

    जातक को अच्छे वस्त्र पहनने का शौक रहता है। हाथ-पैर लंबे होते हैं। स्वभाव निर्दयी रहता है। पुत्र सुख में न्यूनता रहती है।
चतुर्थ भाव—मंगल यदि चौथे भाव में हो तो जातक वाहनसुखी, संतानवान,अप्रसन्नचित्त व जन्मस्थान से दूर रहने वाला होता है। चौथा मंगल जातक की माताकी आयु क्षीण करता है। परन्तु कृषि, खेती-बाड़ी या प्रॉपर्टी डीलिंग के काम मेंजातक को लाभ की सम्भावना बढ़ाता है। यदि अन्य योगों से कट न रहा हो तोचौथा मंगल भी जातक को ‘मांगलीक दोष' देता है (मांगलीक दोष के विषय मेंआगे विस्तार से पढेंगे)।
    मंगल स्वग्रही या उच्च राशि में हो तो उच्च स्तरीय वाहन का सुख, सुखमयजीवन तथा संतान की ओर से दुख प्रास्त होता है। ऐसे जातक को द्विभार्या योग (दोपत्नी) होता है। मेषे, सिंह, धनु (अग्नि राशियां) में मंगल हो तो घर में आग लगनेका भय होता है। मेष, कर्क, सिंह, मीन को छोड़कर अन्य राशियों में चौथा मंगल
    हो तो जातक का अभ्युदय जन्मभूमि/जन्मस्थान से अलग/दूर स्थान पर होता है।
    लाल किताब के अनुसार मंगल अशुभ प्रभाव में चौथे घर में हो तो जातक
    झगड़ालू, स्वार्थी, दुराग्रही, साहसी तथा माता-पिता के सुख से हीन या माता-पितासे वैमनस्य रखने वाला होता है। समाज में आदर नहीं पाता। सख्त व कटु भाषी,अकडू होता है। किन्तु शुभ प्रभाव में चौथा मंगल जातक को दूसरों की शरारतों का
    उचित उत्तर देने वाला, साफ व सच्चे दिल का, बड़े परिवार का पालन करने वाला
    माता के प्रति अपार श्रद्धा वाला बनाता है (मातां का स्वभाव अड़ियल हो तो शुभ
    प्रभाव के बाद भी जातक का माता से मनोमालिन्य तो होता है परन्तु वैमनस्य
    नहीं)। ऐसे जातक को पैतृक सम्पत्ति की प्राति होती है।


    मेष, मकर, वृश्चिक, सिंह, धनु या मीन राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो उसके अशुभ फल बड़े परिमाण में मिलते हैं। माता का सुख पर्याप्त मात्रा में मिलता है। कर्क राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में अच्छे फल नहीं देता।
चतुर्थ भाव: चतुर्थ भाव में मंगल स्थित हो तो व्यक्ति व्यर्थ में झगड़ा करने वाला माता-पिता को कष्टकारी, दुराग्रही, अनेक त्रुटियां करने वाला होता है। प्राय: अशुभ फल पुरुष राशि में मंगल हो तो अनुभव में आते हैं, स्त्री राशि में हो तो शुभ फल मिलते हैं। संपत्ति का सुख मिलता है तो संतान सुख से वंचित रहना पड़ता है। संतान सुख मिलता है तो धनाभाव बना रहता है। कर्क , तुला, वृश्चिक या मिथुन का मंगल हो तो न तो माता का सुख नष्ट होता है और न ही पत्नी का। अन्य राशियों में मंगल हो तो द्विभार्या योग बनता है, माता का सुख नष्ट होता हे। जातक जन्मभूमि में उन्नति नहीं कर पाता, परदेस में उत्थान करता है। स्वार्जित आय से ही घर-बार प्राप्त हो पाता है। अग्नि राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो घर में आग लग जाती है। कर्क, तुला, मिथुन, वृश्चिक राशि में हो तो स्वनिर्मित गृह में ही मरने की इच्छा रहती है लेकिन मृत्यु घर में न होकर बाहर होती है।

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में अच्छे फल प्रदान करता है।ऐसा जातक सुखी, संपन्न, प्रतिष्ठित एवं माता-पिता के सुख से युक्त रहता है।

2. वृषभवृषभ राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में अच्छे फल प्रदान करताहै। ऐसा जातक संपन्न, सुखी, सदाचारी, सत्कर्मी, प्रतिष्ठित, कर्तव्यसंपन्न रहताहै। माता की अपेक्षा पिता से उसे अधिक सुख मिलता है। जातक के जन्मके बाद उसके पिता का भाग्योदय होता है। पत्नी स्वभाव से क्रूर रहती है।

3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक संपन्न,सुखी, धैर्यवान, सत्कर्मी, विद्वान, सरकारी कर्मचारी एवं अग्रणी नेता रहता है।अतिकामातुर रहने से उसका चरित्र कमजोर रहता है। साझेदारी के व्यवसायमें लाभ प्राप्त होता है।

    4. कर्ककर्क राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो उसके अशुभ फल अधिक प्राप्त होते हैं। ऐसा जातक चुगलखोर, जायदाद संबंधी समस्याओं से     घिरा हुआ रहता है। पैतृक संपत्ति का दुरुपयोग करता है। पिता से उसकाअलगाव रहता है। स्वास्थ्य ठीक नहीं रह पाता।

    5. सिंहसिंह राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक परिश्रमी, उद्यमी,परोषकारी एवं दानी-धर्मी होता है। ज्येष्ठ भ्राता एवं पुत्र के सुख में न्यूनता रहतीहै। जातक की पत्नी आज्ञाकारी होती है, दो विवाहाँ की संभावना रहती है।

6. कन्या-कन्या राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में होने पर जातक संपन्नसुखी, दीर्घायु एवं सत्कर्मी रहता है। वह घर्मडी, क्रोधी, चुगलखखोर भी होसकता है। उसके शत्रु बहुत होते हैं। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक वर्णसंकारहता है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान,सदाचारी, सरकारी कर्मचारी, संपन्न, सुखी एवं माता-पिता के सुख से युक्नरहता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो शुभ फलप्राप्त होते हैं। जातक प्रतिष्ठित, अभिमानी एवं संपन्न रहता है। जातक की सेवामें नौकर-चाकर बड़ी संख्या में रहते हैं।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में होने पर जातक पराक्रमी,कर्मकुशल, सुखी एवं समृद्ध रहता है। माता की अपेक्षा पिता से अधिक सुखमिलता है। जातक के जन्मोपरांत पिता का भाग्योदय होता है। वैवाहिक जीवनदुखी रहता है। जातक की पत्नी का स्वभाव तेज होता है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक कर्मकुशल,विद्वान, समृद्ध परंतु वातरोगी रहता है। पत्नी सदाचारिणी एवं आज्ञाकारिणी रहतोहै। पिता से कम बनती है। साझेदारी के व्यवसाय में लाभ प्राप्त होता है।

11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक क्रोधी,घमंडी, चुगलखोर किंतु समृद्ध रहता है। पिता एवं सहोदरों से अनबन रहतोहै। पैतृक संपत्ति एवं मां का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है।

12. मीन-मीन राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक परिश्रमी एवंपरोपकारी रहता है। पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है। जातक के दो विवाहहोते हैं, माता का सुख अच्छा रहता है और पैतृक व्यवसाय रहता है।
1. केले का दान करें। 
2. पीपल में दूध चढ़ावे। 
3. मृग छाल का टुकड़ापास रखें। 
4. शहद में दूध मिलाकर जमीन में पकाये।
===========================5) पंचम् भाव -पंचम स्थान (सुत भाव)
पांचवें स्थान के मंगल के फल

    आचार्य व गुणाकर - असुतो धनवर्जितः। पुत्रहीन, दरिद्धी होता है।

    कल्याण वर्मा -सौम्यार्थपुत्रमित्नं चपलमतिरपिःपंचमे कुजे भवति।पिशुनोऽनर्थप्रायः खलश्च विकलो नरो नीचः ॥ थोडा धनलाभ तथा पुत्र औरमित्रों का सुख मिलता है। बुद्धि चंचल होती है। दुष्ट, अनर्थ करनेवाला किसीअवयव से विकल और नीच होता है।

    वैद्यनाथ - क्रूरोट नश्चपलसाहसिको विधर्मा भोगी धनी च यदि पंचमगेधराजे ॥ यह क्रूर, प्रवासी, साहसी, चपल धर्महीन, भोगी और धनवान होताहै। पुत्रस्थानगतश्च पुत्रमरण पुत्रोवनर्यच्छ ति। पुत्र की मृत्यु होती है।

    गर्ग - रिपुहष्टो रिपुक्षेत्रे नीचो वा पापसंयुतः । भूमिजः पुत्रशोकार्तिकरोति नियतं नृणाम् । यह शत्रुग्रह की राशि में नीच राशि में, पापग्रह से युक्तया दृष्ट हो तो पुत्र की मृत्यु नियम से होती है।

    जागेश्वर-महीजे सुते चेत्तदासौ क्षुधावान्कफैर्वातगुल्मै: स्वयंपीड चतेऽसौ। परं वै कलत्रात्त तथा मित्रतोऽपि भवेद् दुःखितोऽमित्रतश्चापि नूनम्।यदा मंगलः पंचमे वै नराणां तदा सन्ततिर्जायते नश्यते वा। इसे भूख बहुत होती है।कफ तथा वातगुल्म रोग से पीडा होती है। स्त्री, मित्र तथा शत्रुओं से कष्ट होता है।सन्तान होती है किन्तु मर जाती है।

    बृहद्यवनजातक - कफानिलव्याकुलता कलत्रान्मित्राच्च पुत्रादपिसौख्यहानिः । मतिविंलोमा विपुलो जयश्च प्रसूतिकाले तनयालयस्थे | इसमेंजागेश्वर जैसा ही वर्णन है। सिर्फ दो बातें अधिक है - बुद्धि विपरीत होना तथाबहुत जय प्राप्त होना। षष्ठेऽग्निभीतिर्धरणीजः । छ ठ वें वर्ष आग का भय होता है।

    काशीनाथ -पंचमस्थे धरासुनौ कुसन्तानः सदारुजः। बंधुवरगैर्विरक्तश्चनरो बुद्धिविवर्जितः ॥ सन्तान दुराचारणी होती है। रोग बहुत होते हैं। भाईबंदोंका सम्बन्ध नहीं चाहता। बुद्धिहीन होता है।

    मन्त्रेश्वर - विसुखोतनयोऽनर्थप्रायः सुते पिशुनोऽल्पधीः । पुत्रसुख     नहीं होता, अनर्थ करता है, दुष्ट तथा बुद्धिहीन होता है।

    आर्यग्रंथकार -तनयभवनसंस्थे भूमिपुत्ने मनुष्यो भवति तनयहीनःपापशीलोऽतिदुखी यदि निजगृहतुंगे वर्तते भूमिपुत्रः कृशकमलनिकेत पुत्रमेकं ददातिं॥ पत्रहीन, पापी और दुःखी होता है। यदि यह मंगल मेष, वृश्चिक यामकर का हो तो एक दुबलापतला लड का होता है।

    पुंजराज - भौमेऽग्निशस्त्रव्यथा प्रोक्ताद्रेषु मृतप्रजास्तु नितरांस्यान्मानवो दुःखितः। अग्नि से या शस्त्र से दाहिने पैर को जखम होती है।सन्तति जन्मते ही मरती है। बहुत दुःखी होता है।

    जयदेव- जागेश्वर के समान ही मत है।

    जीवनाथ - अपत्ये क्ष्मापुत्ने भवति जठ राम्निःप्रबलता। न सन्तानोजीवत्यपि यदि च जीवत्यपि गदी। सदान्तः सन्तापः खलुमतिरनल्पाघनिचये। कृतेऽपि स्वर्गाप्तिर्न हि जनिवतामर्थनिवहः ॥ भूख बहुत तेज होती है। सन्तानजीवित नहीं होती, रही तो रोगी होती है। मन में बहुत सन्ताप होता है। बुद्धिपापयुक्त होती है। शुभ कर्म हो भी तो स्वर्ग नहीं मिलता।

    नारायणभट्ट - जीवनाथ के समान ही मत है।

    घोलप - काले वर्ण का, सजा भोगनेवाला, व्यभिचारी, राजनीतिकझगडों के कारण परिवारवालों के साथ विदेश में रहनेवाला, लाल आंखों का,मूर्ख, मूर्खों की संगति में रहनेवाला, वातपित्तरोगों से युक्त, वंध्या स्त्री का पतिऐसा यह व्यक्ति होता है।

    गोपाल रत्लाकर - अभागी, राजकोप से दुखी होनेवाला। बच्चेमरे हुए पैदा होते है।

    हिल्लाजातक - पंचमः पंचमे वर्षें, बंधुनाशकरः कुजः । पांचवें वर्षबन्धु की मृत्यु होती है।

    यवनमत - कम बोलता है। पुत्र, संपत्ति, नौकरी इनसे इसे दुख होता     है। इज्जत नहीं रहती। क्रोधी तथा पेट के विकारों से एवं कफ तथा वायुरोग से

    बीमार रहता है।

    पाश्चात्य मत - इस पर अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो सट्टे के व्यापार मेंबहुत नुकसान होता है। पुत्र उद्धत होते है। उनके अकस्मात मरने का डर होताहै। धन और स्त्री का सुख मिलता है। शराब का व्यसन होता है। परिवार मेंशान्ति नहीं रहती। स्वभाव खर्चीला होता है। उच्च या स्वगृह में यह मंगल होअथवा शुभ ग्रह की इसपर दृष्टि हो तो सट्टा, लाट री, रेस आदि में बहुत यशमिलता है। कफ, वायु तथा पित्त विकार होते है। बहुत प्रवास करता है।

    पराशर - पंचमे पितृहानि च धनायतिसुतौ यशः । पिता की मृत्यु होती है किन्तु धन, संतति तथा कीर्ति प्राप्त होती है।

    लोमेश संहिता - अर्को राहुः कुज सौरिर्लंग्ने तिष्ठ ति पंचमे पितरंका, राहू से माता का, मंगल से भाई का एवं शनि से बच्चों की मृत्यु होती है। मातरे हन्ति भ्रातरं च शिशून् क्रमात्ः । लग्न में या पंचम में हो तो रवि से पिता

    अज्ञात - निर्धनः पुत्राभावः दुर्मार्गी राजकोपः षष्ठ वर्षे आयुधेनकिंचिद्ण्ड कालः दुर्वासनज्ञानवान् मायावादी तीक्ष्णधीः। उच्चे स्वक्षेत्ेपुत्रसमृद्धिः

    अन्नदानप्रियः राज्याधिकारयोगः शत्रुपीडा । पापयुते पापक्षेत्रे पुत्रनाश।बुद्धिभ्रंशादिरोगः । रन्ध्रेशे पापयुते पापी वीरः । दत्तपुत्रयोगः । पुत्रार्तिः दुर्मतिः । स्वजनैर्वादिः उदरे व्याधिः। पत्नीकष्ट म्। दरिद्री, पुत्रहीन, दुराचरणी, राजकोप को पात्र होता है। छठ वे वर्ष शस्त्र से पीडा होती है। बुरी वासनाएं होती है। ज्ञानी, किन्तु प्रत्यक्षवादी संसारवादी (मटीरिअलिस्ट), तीक्ष्ण बुद्धि का होताहै। मकर, मेष या वृश्चिक में हो तो पुत्र बहुत होते है, अञ्नदान करता है,अधिकारी होता है। शत्रुओं से कष्ट होता है। पाप ग्रह की राशि में या उससेयुक्त हो तो पुत्रनाश होता है। बुद्धिधंश आदि रोग होते है। पष्ठ स्थान के स्वामीसे युक्त हो तो पापी किन्तु शूर होता है। पुत्रशोक होता है। दत्तक पुत्र लेनारोग और पत्नी को कष्ट होता है। पडता है। बुद्धि पापयुक्त होती है। अपने लोगों के साथ झगडा करता है। पेट में रोग और पत्नी को कष्ट होता हैl

    पंचम भाव में मंगल जातक पुत्रहीन, दुखी तथा पाप प्रवृति में लिप्त होगा। यदि मंगल स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक पुत्र प्राप्त तो करता है, परन्तु स्वयं शिथिल व मलिन शरीर वाला होगा।

-मानसागरी

पंचमस्थ मंगल पुत्रहीनता और घोर विपत्तियों से घिरा होता है। जातक मंदबुद्धि और ख्याली पुलाव पकाने वाला होता है।

-फलदीपिका

जातक विपन्न, संपत्तिहीन तथा पुत्रहीन, कल्पना लोक में विचरण करने वाला, बुरे कर्म करने वाला, अस्थिर मस्तिष्क वाला, नीच, दुष्टात्मा और दुखी होगा।

-सारावली

जातक दरिद्र, कम संतान वाला, चरित्रहीन, तथा सरकार या राजा की नजरों में गिरा हुआ होगा। छठे वर्ष की अवस्था में कटने-फलने से उसके जख्म होंगे। वह झूठा और चालाक होगा। यदि उस पर पाप प्रभाव होगा तो संतति हानि, मानसिक असंतुलन या अन्य बीमारियों का शिकार हो सकता है।

- भृगु

जातक अलोकप्रिय, संतानहीन, महत्वाकांक्षी, बुद्धिमान, खिन्न, बहादुर, सिद्धान्तहीन ओर निर्णय लेने में सक्षम होगा।

-डॉ रामन

पराशर व वैद्यनाथ के अनुसार जातक धनी लेकिन भृगु के अनुसार गरीबी से त्रस्त होगा। महिला जातक की कुण्डली में पंचमस्थ मंगल जातक को लज्जाहीन, पाप प्रवृत्त और कुसंगति में रहने वाला और शिक्षा पाने में अक्षम बनाता है।

टिप्पणी

पंचम अर्थात् संतति के भाव में मंगल की स्थिति अच्छी नहीं होती, जिसके कारण गर्भपात आदि होते हैं। जातक अनेकों गरीबों का भरण पोषण करने, अपने भविष्य निर्माण के लिए अनेक बाधाओं का सामना करने व मृत्यु तक कष्टमय जीवन वाला और कामवासना से ग्रस्त होगा।

 मेरे विचार - शास्त्रकारों ने प्रायः बुरे फल कहे है वे पुरुष राशियों केहै। जो कुछ अच्छे फल कहे वे मकर को छोड कर अन्य स्त्री राशियों केा हैंपराशर के सिवाय अन्य सभी ने अशुभ फल कहे हैं। व्यवसाय में नुकसान, पुत्रउद्धत होना, अकस्मात पुत्रमृत्यु, व्यसनाधीन होना, परिवार में अशान्ति, भाईऔर पिता की मृत्यु, पुत्र न होना या हो कर मरना, गर्भपात, बुद्धिहीनता,दुष्ट ता, दारिद्य, आग तथा शस्त्रों से भय, क्रूरता, प्रवास, साहस, चपलता,वात, कफ तथा गुल्मरोग, स्त्रीपुत्रों से तकलीफ, विपरीत बुद्धि, तीव्र भूख,पापकमों में रचि, सजा, मूर्खता, मूरखों की संगति, कम बोलना, नौकरी में सुखन होना, धनलाभ न होना, इज्जत न होना, क्रोधी स्वभाव, अनर्थप्रियता, येसब पापफल पुरूष राशियों के तथा मकर राशि के हैं। विपुल जय यहबृहद्यवनजातक का फल तथा पाश्चात्य मत का वैभव एवं स्त्रीसुख का फल,सट्टे में लाभ ये शुभ फल स्त्री राशियों के है। पराशर ने पिता को मारक यह फलकहा। किन्तु पंचम स्थान पिता का स्थान नहीं है तथा मंगल पिता का कारकनहीं है। अतः इसकी उपपत्ति नहीं बैठ ती। शायद दशमस्थान से यह आठवांस्थान है इसलिए यह फल कहा होगा।


    मेरा अनुभव - मकर को छोड अन्य स्त्री राशियों में तथा मिथुनराशि में इस मंगल से पुत्र सन्तति होती है और जीवित भी रहती है। किन्तु पहलापुत्र मरता है। अन्य राशियों में गर्भपात, मरा हुआ बच्चा पैदा होना या पांच वर्षके पहले ही मर जाना ये प्रकार होते है। माता के पूर्वजन्म के दोषों के कारण ऐसाहोता है। इस विषय में दो शलोक इस प्रकार है - आधे चतुष्के जननीकृताधौर्मंध्येंतु पित्रार्जितपापसंघैः|| बालस्दन्त्यासुचतुःशरत्सु स्वकीयर्दोवैः समुपैति नाशम्॥आद्वादशाब्दान्तरयोनिजन्मनामायुष्कला निश्चयितुं न शक्यते । मातृचपितृकृतपापकर्म बालग्रहैर्नाशमुपैति बालकः। ऐसे समय माता की कुण्ड ली देखकरया उसे स्वप्न दीखते है उनसे फल का ज्ञान कर लेना चालिए (इसके सम्बन्ध मेंपरिशिष्ट देखियेो) सन्तति होती ही न हो तो स्त्री को सन्तति प्रतिबंधक रोग भीहो सकते है। मासिक धर्म ठीक न होना, उस समय पेट में तकलीफ होना,     संधियों में दर्द होना, संभोग के समय बहुत कष्ट होना, प्रदर होना, ये रोग होसकते हैं। स्त्री राशि में यह मंगल हो तो तीन लड के होते है। वे दुराचारी होते हैपहली कन्या हुई तो जीवित रहती है। पराशर के कहे हुए पितृनाश के फल केबारे में मेरा अनुभव इस प्रकार है - लग्न, धन, चतुर्थ पंचम तथा षष्ठ इन स्थानोंमें पाप ग्रह हो तो पिता का मृत्युयोग होता है। तृतीय स्थान में पापग्रह हो तोमाता का मृत्युयोग होता है। इसी प्रकार सप्तम, नवम, अष्ट म, दशम तथा व्ययस्थान के पापग्रह भी माता की मृत्यु को कारण होते हैं। पराशर का एक औरश्लोक इस प्रकार है - सूर्येर्ण वेश्मस्थानेन पितुर्मूतिपदं वदेत् । चंद्रेण पंचमेनैवमातुर्मुतिपदं वदेत् । सूर्य से चौथे स्थान का विचार कर पिता की मृत्यु कहनीचाहिए तथा चंद्र से पांचवें स्थान का विचार कर माता की मृत्यु कहनी चाहिएइसी प्रकार ग्यारहवें स्थान से बन्धु की मृत्यु का विचार योग्य बतलाया गया है।इस स्थान में स्त्री राशि में मंगल हो तो धन ज्यादा नहीं मिलता किन्तु कीर्ति प्राप्तहोती है। मेष, सिंह या धनु राशि में हो तो सेना, पुलिस, फॉरेस्ट री, इंजीनियरिंग,विमानविद्या, मोट र डाइविंग, टेक्नालाजी इन विभागों में शिक्षा प्राप्त होती है।वृषभ, कन्या या मकर राशि में हो तो सर्वे, भूमिति, ओवरसियर, टेलरिंग येशिक्षाएं प्राप्त होती है। मिथुन, तुला, कुम्भ में हो तो वैद्यक, डॉक्टरी, फौजदारीकानून ये शिक्षाएं मिलती है। कर्क, वृश्चिक, मीन में हो तो सर्जरी, इतिहास,रंग काम आदि की शिक्षा मिलती है। यहां मंगल बलवान हो तो वे विद्यार्थीसन्पानपूर्वक (ऑनर्स कक्षा में) उत्तीर्ण हो सकते है। पंचम में मंगल होना यह कीर्तियोग है। इस योग पर जो अधिकारी रिश्वत लेते है वे बहुत जल्दी पकडे जातेहै। ये लोग श्रृंगरकुशल, कामशास्त्रज्ञ होते है। स्त्रियां इनपर प्रसन्न रहती है।सदा अग्रणी रहने की और सन्मान पाने की इच्छा तीव्र होती है। खर्च बहुत करते     है और वह भी ऐश के लिए। व्यभिचारी भी हो सकते है। मधुर आवाजा के साथ प्रसिद्द गायक होते है

पंचम का मंगल किसीभी राशि में हो यह ख्यातियोग होता है। विदेशयात्रा होती है। डॉक्ट रों के लिएयह योग अच्छा है। इन्हें पेट के रोग (अपेडि साइटि स, लिवर, सप्लीन), टॉन्सिल,ज्वर तथा गुप्त रोगों की चिकित्सा अधिक करनी पड ती है और वे उसमें यशस्वी भी होते हैं। वकीलों की कुण्ड ली में यह योग हो तो उन्हें झगडे,गालीगलौज, ठगना आदि व्यवहारों में काम करना पड ता है। यह पुरुष राशि मेंहो तो पुरुषों से और स्त्री राशि में हो तो स्त्रियों से सम्बन्ध अधिक रहता है। इसस्थान के मंगल से द्विभार्या योग होता है तथा कामुकता अधिक होती है। इसयोग के डॉक्ट र गरीब लोगों से प्रेम, दया तथा सहानुभूति का बरताव करते हैं।ये डॉक्ट र तथा वकील अपने विषय को जल्दी तथा अच्छी तरह समझ लेते हैं।लोगों पर इनका प्रभाव अच्छा पड ता है। ये मधुर भाषी, मिलनसार किन्तुअभिमानी भी होते हैं। इस विषय में पाश्चात्य ज्योतिर्विद का मत इस प्रकार हैं- इसका स्वभाव उत्साही, क्रियाशील, विधायक तथा प्रेरक होता है। यह ग्रह शक्ति, विस्तार तथा ओज का प्रतिनिधि है। स्वतन्त्रता इसे प्रिय होती है।बन्धन, कैद या देरी इसे सहन नहीं होती। यह उदार, खुले दिल का, शूर तथाचेर्यशाली होता है। आत्मविश्वास के साथ नियमित कार्य करके यह यश प्राप्तकरता है। किन्तु इन्हें साहस तथा गरम मिजाज से सावधान रहना चाहीए क्योंकि इनकी प्रवृति ही आक्रमक तथा अपनी इच्छ ।नुसार चलने की होती है। अतःसाहस से विपत्ति की सम्भावना है। ये बहुत अभिमानी होते है। बात बात परबिगड ते हैं और उत्तेजित होने पर संयम और शान्ति को भूल जाते है। थोडे समयमें बहुत कार्य कर सकते हैं। ये यदि थोडा आत्मसंयम करें तो समर्थ तथा योग्यकार्यकर्ता बन सकते हैं।

    पंचम स्थान में मंगल हो तो जातक की जठराग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। उसेभूख अच्छी लगती है। मंगल स्वगृही हो तो संतान सुख में न्यूनता रहती है।या संतान नहीं रहती। स्त्री-कुंडली में पंचम स्थान में मंगल हो तो उसे गर्भपातका डर रहता है। जातक को प्रवास का शौक रहता है। शरीर का कोई अंग
    विकारयुक्त रहता है या बाएं पैर पर अग्नि या शस्त्र के कारण हुए प्रहार काचिह्न मौजूद रहता है। क्रूर स्वभाव एवं बदला लेने की भावना रहती है। जातकधैर्यवान होता है। पंचम स्थान में वृश्चिक या धनु राशि का मंगल हो तो उसकेफल अच्छे मिलते हैं। अन्य राशियों में या पापग्रहयुक्त या दृष्ट मंगल शत्रुक्षेत्र में या नीच का होने पर उसके अशुभ फल प्राप्त होते हैं।

    जातक कम बोलनेवाला एवं मानसिक दृष्टि से अशांत रहता है। उम्न केपांचवें वर्ष में पिता या चाचा को कष्ट होता है। यदि मंगल पापग्रह से दृष्टहो या नीच का हो तो जातक व्यसनों में फंसता है एवं जुए तथा सट्टे केकारण उसका नुकसान होता है। इसके विपरीत वृश्चिक या धनु राशि का मंगलपंचम स्थान में हो तो जातक चरित्रसंपन्न रहता है एवं लॉटरी, सट्टे में धनकमाता है।महर्षि पाराशर के अनुसार पंचमस्थ मंगल बंधुओं के सुख में कमी रखता है।
पंचम भाव-पांचवें घर में मंगल हो तो जातक तुनकमिजाज (SHORT-
    TEMPERED), धोखेबाज, बुरी आदतों वाला तथा आवेगी और रोगी (विशेषकर
    उदर सम्बन्धी) होता है। जातक की सन्तान के लिए पांचवां मंगल अशुभ रहता है
    (संतान कष्ट व अवरोधों से ही प्रास होती है) । मंगल बली हो तथा पंचमेश की
    स्थिति सुदढ़ हो तो जातक की पाचनशक्ति तीव्र रहती है।
    लाल किताब के अनुसार पांचवें मंगल वाले जातक की पत्नी गर्भस्राव रोग
    से पीड़ित रहती है। सन्तान के लिए पांचवां मंगल शुभ नहीं होता। मंगल निर्बल हो
    तो जातक के पिता के भाग्य की हानि होती है। पुत्रों से दुख, पाप क्मों में रुचि तथा
    मांस-मदिरा का शौक रहता है। जातक साहसी, संघर्षपूर्ण जीवनवाला तथा पत्नी
    से वैचारिक मतभेदों के कारण कलह झेलने वाला होता है। मंगल उच्च या पुरुष
    राशि में हो तो संतान प्रास्ि में बाधा, पत्नी को योनि रोग या मासिक धर्म सम्बन्धी
    रोग, धन की प्रात्ति अल्प किन्तु ख्याति के फल मिलते हैं। जातक कामुक एवं
    विदेश में वास करने वाला होता है।
    वैद्यों या डॉक्टरों को पांचवां मंगल शुभ माना गया है। शुभ ग्रहों से देखाजाता हुआ बली एवं शुभ मंगल जातक को धनवान बनाता है। जैसे-जैसे आयुबढ़ती है, जातक की अमीरी भी बढ़ती है। परन्तु ऐसा जातक यदि अपने पुश्तैनीमकान से लगातार बाहर रहे तो उसकी संतान के लिए शुभ नहीं होता। अशुभमंगल घर में अग्निकांड करा सकता है अथवा करंट लगने या 'शॉर्टसर्किट' कीहोती है)।
    दुर्घटनाएं घटा सकता है। ऐसे में जातूक बेकार की यात्राएं बहुत करता है (स्त्री
    जातकों में पांचवां मंगल यदि संतान दिलाता है तो वह सिजेरियन या ऑपरेशन से
पंचम भाव: पंचम भावस्थ मंगल के फल अशुभ होते हैं। यह मत प्राय: सभी प्राचीन ग्रंथकारों के हैं। लेकिन अशुभ फलों का अनुभव पुरुष और मकर राशि में आता है अन्य स्त्री राशियों में शुभ फल मिलते हैं। स्त्री राशि (मकर को छोड़कर) तथा मिथुन राशि का मंगल हो तो संतान होकर जीवित रहती है। प्रथम संतान पुत्र हो तो उसकी मृत्यु होती है। अन्य राशियों का मंगल पंचमस्थ हो तो गर्भस्नाव, गर्भस्थ शिशु की मृत्यु अथवा उत्पन्न होकर पांच साल तक कभो भी मृत्यु हो जाना जैसे फल मिलते हैं। पत्नी की कुण्डली से यह ज्ञात हो सकता है कि संतति-कष्ट किस कारण से हे। पत्नी के पूर्वार्जित कर्म से, कुण्डली में संतान प्रतिबंधक योग के कारण, मासिक धर्म में खराबी अथवा योनि रोग आदि कई कारण हो सकते हैं। पंचमस्थ मंगल जहां अल्प धन की प्राप्ति कराता है, वही कीर्ति की बढोत्तरी भी करता है। अग्नि तत्त्वीय राशि का मंगल हो तो सेना, पुलिस विभाग, मोटर चालक, विमान चालक, इंजीनियरिंग अर्थात तकनीकी शिक्षा की ओर रुझान होता हे। वायु तत्त्वीय राशि का मंगल हो तो सिविल इंजीनियरिंग, ओवरसियर, भूमि सर्वेयर आदि की शिक्षा मिलती है। पंचमस्थ मंगल वाले जातक अधिकारी हों तो रिश्वत लेते हैं तथा शीघ्र ही पकड़े जाते हैं। चिकित्सकों एवं वकीलों के लिए पंचमस्थ मंगल शुभ होता है, सफलता और कीर्ति भी देता है।
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक धैर्यवान, प्रभावी,कुशल वक्ता, विद्वान, अधिकारसंपन्न, मान-सम्मान प्राप्त करनेवाला एवंस्वाभिमानी रहता है। संतान के साथ अच्छी बनती है। उसे पैतृक संपत्ति काभोग कम मात्रा में प्राप्त होता है।

    2. वृषभवृषभ राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक स्वकर्म सेआगे बढ़ता है एवं स्वाभिमानी, जनप्रिय, विद्वान, लेखक, धनवान, आस्तिकएवं सरकारी कर्मचारी रहता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो सच्चरित्र, आस्तिक,प्रसन्न, परोपकारी, दीर्घायु, सरकारी कर्मचारी, सुखी एवं गाने-बजाने में कुशलरहता है। पत्नी का स्वभाव क्रोधी होता है। सहोदरों का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक कंजूस, संपन्न,परोपकारी, जनप्रिय एवं कामातुर रहता है। संतान सुख में न्यूनता रहती है।

5. सिंह-सिंह राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक के केवलएक ही पुत्र होता है। वह पुत्र भी दत्तक लेना पड़ता है। जातक धैर्यवान रहताहै। चोरी जैसे अनैतिक कार्यों में रुचि रखता है। पत्नी सुख में न्यूनता रहतीहै। दूसरा कोई पापग्रह इस मंगल के साथ हो तो जातक धूर्त होता है। बचपनमें ही जातक पर ध्यान देने से वह कुसंगति से बचकर अच्छा गायक एवंसरकारी कर्मचारी हो सकता है। स्वभाव से वह क्रोधी होता है। धूर्त एवं कपटीहोने पर भी शासन में अपना प्रभाव रखता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो उसके सामान्य फल
प्राप्त होते हैं। जातक की संतान उसके बश में नहीं रहती, पत्नी से भी उसकोचहीं बनती तथा पैतक संपत्ति के सुख में न्यूनता रहती है।

    7. तुला तुला राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो प्रबल शत्रुबाधा एवंअशातिकारक रहता है। जातक अपने कार्य में चतुर रहता है। पिता से मतभिनता रहती है। आर्धिक हृष्टि से संपन्न होने पर भी धन स्थिर नहीं रहता।8. वृश्विक वृश्चिक राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो शुभ फलप्राप्त होते हैं। जातक धार्मिक, सदाचारी, स्वाभिमानी, यशस्वी, सरकारीकर्मचारी, संपन्न, कुशल राजनीतिज्ञ, संगीतज्ञ किंतु कटुभाषी होता है

9, बनु-धनु राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान,यशस्वी, जनप्रिय, सच्चरित्र, विद्वान, संपन्न, कर्मकुशल, दीर्घायु एवंलेखक-गायक होता है। पैतृक संपत्ति रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो मिश्चित फल प्राप्तहोते हैं। बचपन से उचित सावधानी न बरतने पर जातक कुसंगति में फंस जाताहै। अन्यथा जातक विद्वान, युक्तिसंगत, चतुर, असाधारण धैर्यवान, संपन्न एवंसरकारी कर्मचारी होता है। पत्नी कर्कशा होती है। सहोदरों का सुख प्राप्त होता है।

11, कुंभ-कुंभ राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक संपन्न,परोपकारी, कठोर, कामातुर एवं कंजूस रहता है।

    12. मीन-मीन राशि का मंगल पंचम स्थान में हो तो जातक अभिमानी,दीर्षायु, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, संगीतज्ञ, चरित्रसंपन्न एवं यशस्वी होता है।प्रथम संतान की हानि होती है। जातक के शत्रु बहुत होते हैं। वह अपने कार्य में दक्ष रहता है। मानसिक शांति का अभाव रहता है।


1. माता, पिता, दादा, दादी का श्राद्ध करें। 
2. दूध के पेड़े बच्चों कोखिलावे।
3. पानी से भर कर लौटा सोते समय सर के पास रखें।
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6) षष्ठम् भाव -  षष्ठ स्थान (रात्रु भाव)
षष्ठ स्थान में मंगल के फल

    पराशर -- प्रष्ठे रिपुसमृद्धिं च जयं बन्धुसमागमम् अर्थवृद्धिं ।शत्रुबहुत होते है। जय प्राप्त होती है। सम्बन्धियों से मेलमिलाप होता है। धन की

    वृद्धि होती है।

    आचार्य -- बलवान शत्रुजितश्च शत्रुयाते । बलवान, शत्रुओं कोजीतनेवाला होता है।

    गुणाकर -- आचार्य के समान मत है। यह स्वामी होता है - सेवकोंसे काम कराता है। खुद नौकरी नहीं कर सकता।

    वैद्यनाथ -- स्वामी रिपुक्षयकरः प्रबलोदराग्निः । श्रीमान्यशोबलयुतोऽवनिजे रिपुस्थे । स्वामीं, शत्रुओं का नाश करनेवाला, धनवान,कीर्तिमान तथा बलवान होता हैं। भूख तेज होती है।

    कल्याणवर्मा -- प्रबलमदनोदराम्निः सुशरीरो जायते बली षष्ठे।

    रधिरे सम्भवति नरःस्वबन्धुविजयी प्रधानश्च। कामुक, तीब्न भूखवाला, सुन्दर,अपने सम्बन्धियों पर विजय पानेवाला तथा मुख्य होता है।

    आर्यग्रंथकाररिपुगृहगतभौमे संगरे मृत्युभागी, सुतधनपरिपूर्णस्तुंगगे सौख्यभागी रिपुगणपरिदुष्टे नीचगे क्षोणिपुत्ने भवति
    विकलमूर्तिः कुत्सितः क्रूरकर्मा | यहां मृत्युभागी शब्द का अर्थ युद्ध में मु्युपानेवाला ऐसा है किन्तु इस विषय में हमें सन्देह है। पुत्र तथाधन से युक्त होताहै। उच्च का हो तो सुख मिलता है। नीच अथवा पापग्रह से युक्त अथवा शन्ुग्रह की राशि में हो तो दुर्बल, निन्दनीय तथा क्रूर होता है।

    जागेश्वर -- महीजो यदा शत्ुगो वै नराणां तदा जाठ राम्निर्भवेददीप्ततेजाः सदा मातुले दुःखदायी प्रतापी सतां संगकारी भवेत् कामयुक्त।भूख तेज होती है। मामा को दुख देता है। पराक्रमी, सत्संगति में रहनेवाला औरकामुक होता है।

    बृहद्यवनजातक -- प्राबल्यं स्याज्जाठ राम्नेर्विशेषाद्रो रोषावेशःशत्रुव्गेऽपि शान्ति । संम्दिः संगो धर्मभीः स्यात्रराणां गोत्रै: पुण्यस्योदयोभूमिसूनौ! विशेषात् रोषावेषः बहुत क्रोधी होता है शत्रु शान्त होते है। सत्संगतितथा धार्मिक बुद्धि होती है। अपने परिवारवालों की उन्नति कराता है। भौमो वैजिनसंमिते प्रददते पुत्र च - २४ वें वर्ष पुत्र होता है।

    काशीनाथ -षष्ठे भौमे शत्रुहीनो नानाथै: परिपूरितः। स्त्रीलालसःपुष्ट देहः शुभचित्तक्ष जायते ॥ शत्रु नहीं होते । धनधान्यसंपत्न, स्री में आसक्त,पुष्ट शरीर का तथा शुभ अन्तःकरण का होता है।

    गर्ग - बहुदाराम्निपुंस्कः स्यात् सुकार्यो बलवान् कुजे॥ बहुत स्त्रियों काउपभोग लेनेवाला, अच्छे काम करनेवाला तथा बलवान होता है।

    जयदेव - कल्याणवर्मा के समान मत है।

    पुंजराज - रूधिरो यदा पशुमयं वजाविकं चोष्ट् जं। वष्ठ में मंगलबलवान हो तो पशु, भेड़ बकरियां अथवा उंट चराने का धंदा करना पड ता है।आरो रिपुभावसंस्थःशस्त्राम्िधातस्त्वथवाग्निदग्धं। करोति मर्त्यस्य च मावुलस्यविषोत्थदोषेण विदूषितं वा।। इसे तथा इसके मामा को विष, अग्नि तथा शस्त्रोका भय होता है।

    मंत्रेश्वर -प्रबलमदनः श्रीमान् ख्यातो रिपौ विजयी नृपः । कामुक,धनवान, कीर्तिमान, विजयी, राजा होता है।
    जीवनाथ तथा नारायण भट्ट -मन्त्रेश्वर के समान मत है।

    गोपाल र्लाकर -धनधान्यवृद्धि, शत्रुओं का क्षय, राजसेवा, ज्ञानी,लोगों के साथ शत्रुता, बडे व्यवसाय करना किन्तु बड प्पन के मोह में व्यवसायकी ओर दुर्लक्ष होना ये इस मंगल के फल हैं।

    घोलप - घर में बेफिक्र वृत्ति से रहनवाला, बुद्धिमान, धन से पंडि तोंको वश कर के कीर्ति प्राप्त करनेवाला, कामुक तथा तेज भूखवाला ऐसा यहव्यक्ति होता है।

    पुत्र होता है।हिल्लाजातक - पुत्रलाभकरःपष्ठशचवतुर्विशें च वत्सरे। चौवीसवें वर्ष

    यवनमत - शत्रुओं को मारनेवाला, सुन्दर, आनन्दी धनवान कृतज्ञ,उदार तथा कुल में अग्रेसर होता है।

    पाश्चात्य मत - इसे हलके दर्जे के नौकरों से तकलीफ होती हैं। यहस्थिर राशि में हो तो मूत्रकृच्छ, गंड माला, हृद्रोग आदि रोग होते हैं। द्विस्वभावराशि में हो तो छाती और फेफडों के रोग होते हैं। चर राशि में हो तो आग काभय होता है, गंजापन, यकृत, रोग तथा सन्धिवात ये रोग होते है। इसके नौकरअच्छ नहीं होते । इसपर अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो दुर्घट ना का भय होता है।कार्य करने की शक्ति बहुत होती हैं।

    अज्ञात -प्रसिद्धः कार्यसमर्थः शत्रुहन्ता पुत्रवान् । सप्तविंशतिवर्षेंकन्यकाश्चादियुत उष्टूवान् । पापरक्षे पापयुते पापदृष्ट पूर्णफलानि।वातशुलादिरोगः बुधक्षेत्रे कुष्ठ रोगः । शुभद्ृष्टे परिहारः । किर्ति प्राप्त होतीहै। कार्य करने का सामर्थ्य होता है। शत्रुओं का नाश करता है। पुत्रप्राप्तिहोती है। २७ वें वर्ष कन्या प्राप्त होती है, उंट, घोड़े आदि प्राप्त होते हैं। यहमंगल पापग्रह के साथ उसकी राशि में अथवा दृष्टि में हो तो पूरा फल अशुभहोता है। वात तथा शूल रोग होते हैं। यह मिधुन या कन्या में हो तो कुष्ठ रोगहोता है, शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह दूर होता है।

छठे भाव में मंगल षष्ठस्थ होने से जातक को युद्धक्षेत्र में वीरगति मिलती है। यदि मंगल उच्चस्थ है तो जातक अपार संपत्तिशाली और पुत्रवान होता है। वह खुशहाल जीवन व्यतीत करता है। यदि मंगल शत्रुदृष्ट या नीचस्थ है तो जातक विकलांग, बदसूरत और नीच कर्मों में प्रवृत्त होता है।

-मानसागरी
जातक उदार, शत्रुजित्, धनी, राजा के समान तथा कामुक होता है।

-फलदीपिका

जातक अच्छी पाचन शक्ति वाला, सुदर्शन, सुदृढ़, ऊचाँ कद वाला, कामुक और संबंधियों में मुखिया की तरह होता हैं।

-सारावली

जातक प्रसिद्ध, अपने कार्य में सफल, शत्रुजित्, संतानवान् पत्नी सुख से युक्त और 27 वें वर्ष की अवस्था में वाहन खरीदने वाला, और शत्रुओं का अस्तित्व समाप्त करने वाला होगा।

- भृगु

जातक सफल, भूमि संपन्न, धनी, शत्रुजित्, बुद्धिमान्, राजनीति में सफल, शक्तिशाली और निकट संबंधियों के प्रति चिंतित होगा।

-डॉ रामन
टिप्पणी

मंगल जननांगो, पित्ताशय, मांसपेशियों, क्षमता, तालमेल, शीघ्र समझने वाला, प्रतिद्वन्द्वी, अग्रसर होने का स्वभाव वाला, आत्मिक उन्नति, नेतृत्व और शासन के गुण, समर्पण न करने वाला, समर्पण न करने वाला, अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी कार्यपद्धति एकाएक, धमाकेदार और विच्छिन्नताकारक होती है। मंगल पर पाप ग्रह का गोचर होने पर जातक निरर्थक झमेलों के कारण उद्विग्न और हड़बड़ाया हुआ-सा रहता है। घर में अशांति होती है। वह अपनी उलझनो में स्फूर्ति पूर्वक मानसिक व शारीरिक क्रियाएँ प्रतिफल का विचार न करते हुए करता है। मंगल का स्वभाव प्रेरक व क्रोधी है। अतः इसके साथ किसी भी दृष्टि-युत्यादि पाप संबंध का होना अच्छा नहीं है। सप्तमस्थ और अष्टमस्थ मंगल 'कुजदोष' प्रदान करता है। यह दोष मंगल के, लग्न, शुक्र व चन्द्रमा से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में स्थित होने पर होता है। इस दोष की योगस्थिति और भंग आदि पर विद्वान एकमत नहीं है। यह तो विस्तृत चर्चा का विषय है। प्रस्तुत प्रसंग में पाठक देखेंगे कि मंगल का स्वक्षेत्री, उच्चस्थ, मूलत्रिकोणस्थ या मित्रक्षेत्री या शुभयुत न होने पर जातक का संबंद्ध भाव पापाक्रान्त हो जाता है। सप्तम या अष्टम भाव में पाप ग्रह होने से भाव के फल गड़बड़ा जाते है व न्यूनाधिक हो जाते है।

    मेरे विचार - इस स्थान में आचार्य, गुणाकर, कल्याणवर्मा, वैदयनाथ,पराशर, यवनमत, गोपाल रत्लाकर, हिल्लाजातक, गर्ग काशीनाथ, जयदिव,सन्त्रेश्वर, नारायणभट्ट, जीवनाथ इन्होने जो फल कहे वे स्त्री राशियों कें हैं।आर्यग्रंथ, जागेश्वर, बृवद्यवनजातक, पुंजराज, घोलप, पाश्चात्य इनके फेल-कामुकता, भुख तेज होना, ज्ञानी लोगों के साथ शत्रुता - ये पुरुष राशियों के हैं।आर्यग्रंथ के पहले चरण का फल स्त्रि राशी का तथा दुसरे चरण का फल पुरुषराशि का है। बृहद्यवनजातक में तेज भूख तथा क्रोध ये फल कहे गये, वे पुरुषराशि के है। जागेश्वर ने मामा को दुःख यह फल कहा वह पुरुष राशि का है।पुंजराज का फल - भेड़ बकरी तथा उंट चराना-स्त्री राशि का है शस्त्र, अग्नि अथवा विष से भय यह फल मेष, सिंह तथा धनु राशियों का है।

    मेरे अनुभव - इस स्थान के मंगल के फलों का वर्णन उपर किया हीगया है। विशेष यह की मामा और मौसी मरती है तथा सन्तान भी मरती है।मौसी विधवा होती है अथवा यें दोनों निपुत्रिक होते है। इस योग पर अधिकारीरिश्वत लेने पर भी पकडा नहीं जाता। द्विभार्या योग हो सकता है

 चारुबेल ने लिखा हैं - काले मेघों के उपरबैलून में उड नेवाले व्यक्ति के समान यह होता है। वैज्ञानिक प्रयोग कर केअ सम्भव बातों का पता लगाने की कोशिश करता है। बहुत प्रयोग के बाद इसे यश निश्चित रुप से मिलता है।)  षष्ठ स्थान में मंगल पुरुषराशि में हो तो कामुकता बहुत होती है और सम्भोग के समय कठोर बर्तावकरता है। एखाद दुसरा पुत्र होता है किन्तु पुत्र मरते है। पहला या दुसरा पुत्रसयाना होकर धनार्जन प्रारंभ करने की उम्र में मरता है जिससे बहुत शोक होताहै। स्त्री को गर्भाशय के विकार होने से सन्तति बिलकुल न होने की सम्भावनाहोती है। हिल्लाजातक में २४ वें वर्ष पुत्रप्ाप्ति यह फल कहा है। कुछ प्रतिष्ठि तसमाजों में २५ या ३० वर्ष के बाद ही आजकल विवाह होते हैं। अतः इस फलका उपयोग विचारपूर्वक ही करना चाहिये। भूख तेज होती है। खासकर तीखेया नमकीन पदार्थो पर रुचि होती है। इसके कामवासना भी तीद्र होती है।दोपहर के समय विशेष जागृत होती है। बहुत खाने से उष्णता उत्पन्न होकर नानारोग होते है। बहुत खाना और शराब पीना शरीर को हानिकारक ही है। इन्हेंकीर्ति प्राप्त करने के पहले संघर्षमय परिस्थिति में से गुजरना पड ता है औरनिराश हो जाने पर कहीं मार्ग मिलता है।

    कुंडली में षष्ठ स्थान रोग एवं शत्रु का स्थान होता है। यह त्रिक स्थानोंमें से एक है। इस स्थान में मंगल शत्रुनाशक एवं रोगनाशक फल प्रदान करताहै। जिसके षष्ठ स्थान में मंगल हो उसका वर्चस्व मानना ही पड़ता है। शत्रुबहुत रहते हैं पर उनका नाश हो जाता है। जातक प्रभावशाली एवंअधिकारसंपन्न रहता है। उसके अधीन अनेक लोग काम करते हैं।

    जातक के खर्चीला होने पर भी उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है।वह संपन्न एवं सुखी जीवन जीता है। मित्रों से स्नेहपूर्ण संबंध रहते हैं। जठराग्निएवं कामवासना प्रबल रहती है। मामा का सुख अल्प मिलता है। युद्ध में मृत्युप्राप्त होती है।

    स्वास्थ्य अच्छा रहता है। बकरियां, ऊंट जैसे पशुओं की खरीद-फरोख्त सेफायदा होता है। यवनाचार्य के अनुसार 24वें वर्ष में पुत्र लाभ होता है।

षष्ठ भाव-छठे भाव में बैठा मंगल जातक को साहसी, शत्रुजित्, शक्तिशाली,धैर्यवान, किन्तु ऋणी, चर्मरोगी, रक्तविकारी व गुप्त शत्रुओं वाला बनाता है। ऐसा जातक देशाटन करने वाला व घुमकड़ होता है, परन्तु उसे विषषात का भय रहता
    है। जातक माता के पक्ष (ननिहाल/मामा/मौसी आदि) के लिए शुभ नहीं होता।लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक को काफी मिन्नतें मांगने पर संतान प्राप्तहोती है। छठा मंगल शुभ हो तो जातक को साधु स्वभाव का या संन्यासी भी बनादेता है। अशुभ मंगल जातक को झगड़ालू और फसादी बनाता है। ऐसा जातक जबअपनी सन्तान का जन्मोत्सव या जन्मदिन मना रहा होता है तब दुखद घटना घटनीछठे भाव के मंगल से जातक के सामने शक्तिशाली शत्रु भी टिक नहीं पाता।उसकी जठराग्नि और कामबेग दोनों तीव्र होते हैं। चरराशि में मंगल हो तो यकृतरोग व बालों के झड़ने की समस्या देता है। स्थिर राशि में हृदय रोग तथा द्विस्वभावराशि में क्षयरोग सम्भावित होता है। अग्नि राशि में हो तो शत्रु द्वारा शस्त्र, विष याअग्निषात का भय होता है। मिथुन या कन्या राशि में कुष्ठ रोग या चर्मरोग सम्भावितहोता है। मंगल षर शुभ प्रभाव हो तो जातक कठिन संघर्षों से जूझकर कीर्ति प्राप्त करता है  करता है। ऐसा जातक यदि अधिकारी हो और रिश्वत ले तो पकड़ा नहीं जाता।

    मिधुन या कन्या राशि का मंगल पष्ठ स्थान में हो तो चर्मरोग एवं कुष्ठरोग की संभावना रहती है। स्वयं जातक को और उसके मामा, मौसी को अग्निसे भय रहता है।
षष्ठ भाव: षष्ठभाव में मंगल हो तो जातक में कार्य करने की क्षमता अधिक होती है। वह पेटू होता है क्योंकि उसकी जठराग्नि तीक्र होती है। मिथुन और कन्या का मंगल षष्ठस्थ हो तो कुष्ठ रोग से पीड़ा, शुभ ग्रह की दृष्टि में हो तो पीड़ा का निवारण हो जाता है। स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) का मंगल हो तो गंडमाला, हृदयशूल, मूत्राशय के रोग होने की सम्भावना रहती है। चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) का मंगल हो तो यकृत, संधिवात, गर्मी, गंजापन आदि रोग होते हैं। द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) का मंगल हो तो वक्षस्थल के रोग, फेफड़ों में खराबी, कास, श्वास, क्षय रोग होने की संभावना रहती है। पुरुष राशि का मंगल मामा,मौसी के लिए अनिष्ट फलप्रद रहता है। जातक में काम-वासना बढ जाती है, एक-दो पुत्र होते तो हैं लेकिन कालकवलित हो जाते हैं। युवा पुत्र की मृत्यु का शोक सहन करना पड़ता है। स्त्री राशि का मंगल हो तो जातक के अनेक शत्रु होते हैं लेकिन उसके समक्ष टिक नहीं पाते। पूर्वार्जित धन का नाश होता है तो शीघ्र ही अन्य स्रोत से धन की प्राप्ति हो जाती है। षष्ठस्थ मंगल के जातक अधिकारी हों तथा रिश्वत लें तो पकडे नहीं जाते। छठे भाव का मंगल कीर्ति तो देता है परन्तु बहुत संघर्ष के पश्चात। 

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक अभिमानी रहताहै। प्रायः एक ही जगह रहकर उदर निर्वाह करता है। परिवार एवं आप्तजनोंसे संबंध ठीक नहीं रहते। अन्यों से संबंध अच्छे रहते हैं।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक कामातुर,माता एवं संतान सुख प्राप्त करनेवाला रहता है। स्त्रियों की कुंडली में यह मंगलगर्भ की हानि करता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक प्राय: परदेशमें रहता है। उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती, दूसरों के अधीन रहनापड़ता है। उसे दीर्घकालीन रोग एवं चोरों का डर रहता है, यहां तक कि चोरोंके हाथों मृत्यु भी संभव है। माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। सौतेलीमां हो सकती है। मामा का चरित्र शंकास्पद रहता है।

4. कर्ककर्क राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक को बचपनमें क्लेश सहन करने पड़ते हैं। शासन से कष्ट सहन करना पड़ता है। नौकरीमें उचित उन्नति नहीं होती। सहोदरों से स्नेहपूर्ण संबंध नहीं रहते। जातक काअपना एवं उसकी माता का चरित्र संशयास्पद रहता है। ननिहाल के घराने कीकिसी स्त्री से अनुचित संबंध रह सकता है। व्यापार में अच्छा मुनाफा होताहै। नीच मंगल के कारण शत्रु-बाधा रहती है।

 5. सिंह-सिंह राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक को बवासीर,भगंदर जैसे गुदा रोग होते हैं। ज्येष्ठ भ्राता के सुख का अभाव रहता है। कोईभी काम आसानी से नहीं हो पाता। सामाजिक परंपरा तोड़ने की जातक कीप्रवृत्ति रहती है। वह स्वेच्छा से गैर जातीय कन्या से विवाह करता है औरनास्तिक होता है।

6. कन्या-कन्या राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक अतिक्रोधीहोता है। उसके दो विवाह होते हैं, स्वास्थ्य मध्यम रहता है, दीर्घकालीन रोगरहते हैं। अग्नि, विष, सर्प में से किसी एक के कारण मृत्यु होती है।

7. तुला-तुला राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक क्रोधी, कामातुर,माता एवं संतान सुख से वंचित रहता है। पत्नी भी तेज स्वभाव की मिलतीहै। वह क्षयरोग, प्रमेह आदि रोगों से ग्रस्त रहता है। आचार्य गर्ग के अनुसारजातक की पत्नी रोगी रहती है एवं उसके साथ जातक का अलगाव रहता है।
    स्त्री के कारण ही जातक की मृत्यु होती है। पल्ली रोगी होने से उसके संसर्गसे रोग उत्पन्न हो सकता है या परस्त्री समागम के कारण सांसर्गिक रोग उत्पन्नहोने से या चारिश्र्य शिधिलता के कारण अकाल मृत्यु हो सकती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का मंगल पष्ठ स्थान में हो तो जातकअभिमानी एवं शत्रुहंता रहता है। सगे-संबंधी, आप्तजनों से उसका बैर रहताहै। कन्या से संबंध स्नेहपूर्ण रहते हैं। एक ही जगह रहकर जीवनयापन करतेकी इच्छा रहती है, स्वास्थ्य मध्यम रहता है। चौरों, से डर रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल पष्ठ स्थान में हो तो जातक को बचपन मेंबहुत कष्ट सहने पड़ते हैं। ये कष्ट सहन करने के बाद यदि वह जीवित रहातो उसका भविष्य अच्छा व्यतीत होता है। नौकरी में प्रगति एवं राज्यकृषा केअवसर प्राप्त नहीं होते। जातक को स्वतंत्र व्यापार में धन प्राप्त होता है। शत्रुअधिक रहते हैं। माता का चरित्र संशय से घिरा तथा संतान सुख में न्यूनतारहती है। स्त्री की कुंडली में धनु राशि का मंगल पष्ठ स्थान में होने पर गर्भपातका डर रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल, षष्ठ स्थान में हो तो ऐसे जातक केविकार क्रांतिकारी होते हैं। वह धैर्यवान, क्रूर, क्रोधी, हिंसाप्रिय और अपनेबलबूते पर अपने कार्य सिद्ध करता है। सामाजिक रीति-रिवाजों को तिलांजलिदेता है। अच्छे कामों में यश प्राप्त नहीं होता। चरित्र अच्छा नहीं रहता। माताएवं भाइयों के सुख में न्यूनता रहती है। सौतेली मां हो सकती है। मामा बदनामहोता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक को स्वास्थ्यकी दृष्टि से अच्छे फल प्राप्त नहीं होते। स्त्री के कारण मृत्यु होती है। मामीसे अनुचित संबंध रह सकते हैं।

    12. मीन-मीन राशि का मंगल षष्ठ स्थान में हो तो जातक का वैवाहिकजीवन दुखी रहता है। पत्नी तेज स्वभाव की एवं रोगी रहती है। स्वास्थ्य अच्छानहीं रहता। स्त्री के कारण मृत्यु संभव होती है।।
1. सोमवार को बुंदी के लड्डू पक्षियों को खिलावे।
 2. काली वस्तु कादान करें। 
3. कन्याओं को हरि वस्तु (चुड़िया) दान करें।
===========================7) सप्तम् भाव - सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)
    सप्तम स्थान के मंगल के फल

    आचार्य तथा गुणाकर - स्त्री अनादर करती है।

    कल्याण वर्मा-मृतदारो रोगा्तोऽमार्गरतो भवति दुःखितः पापः।श्रीरहितः सन्तप्तः शुष्कतनुर्भवति सप्तमे भौमे ॥ स्त्री की मृत्यु होती है। रोगी,दुराचारी, दुःखी, पापी निर्धन तथा दुबला होता है।

    वैद्यनाथ - स्त्रीमूलप्रविलापको रणरुचिः कामस्थिते भूमिजे। स्त्री केलिए विलाप करना पड ता है। युद्धप्रिय होता है।

    पराशर -स्त्रियां दारमरणं नीचसेवन नीच स्त्रीसंगमः। कुजोक्ते सुस्तनाकठिनोर्ध्वकुचा। पत्ली की मृत्यु होती है। नीच स्त्रियों से कामसेवन करता है।स्त्री के स्तन उन्नत तथा कठिन होते हैं।
    सारावली - स्त्री की योनि सूखी, चरपरी तथा छोटी होती है।

    गर्ग - मुनिगृहगतभौमे नीचसंस्थेऽरिगेहे युवतिमरणदुखं जायतेमानवानां। मकरगृहनिजस्थे नान्यपतनीश्चधते चपलमतिविशाला दुष्ट चित्तांविरुपाम्। यह मंगल नीच राशिं में अथवा शत्रु ग्रह की राशि में हो तो पत्नी कीमृत्यु होती है। यह मकर में अथवा स्वगृह में हो तो एक ही स्त्री होती है और वह

    चंचल, बुद्धिमान किन्तु दुष्ट और कुरुप होती है।

    मन्त्रेश्वर - अनुचितकरो रोगार्तोऽस्तेऽध्वगो मृतदारवान् । दुराचारी,

    रोगी, प्रवासी होता है। पत्नी की मृत्यु होती हैं।

    काशीनाथ - भूमिपुत्रे सप्तमगे रुधिराक्तोऽपि कोपवान् । नीचसेवीवंचकश्च निर्गुणोऽपि भवेन्नरः । रक्त के रोगों से युक्त, क्रोधी, हलके लोगों कानौकर, ठगानेवाला तथा गुणरहित होता है।

    बृहद्यवनजातक - नानानर्थव्यर्थचित्तोपसगैबैरिव्रातैर्मानवं हीनदेहं।

    दारापत्यानन्तदुःखप्रतप्तं दारागारेंगारक्रोडयं करोति । अनेक अनर्थों से मन कोव्यर्थ ही तकलीफ होती है। शत्रुओं से पीडा होती है। शरीर दुबला होता है। स्त्रीपुत्रों के बारे में तथा और भी कई दुखों से पीडि त होता है। तिथ्यसृगथामिभयंमुनींद्रौ। १७ वें वर्ष अग्निभय होता है।

    जागेश्वर - यदा मंगलः सप्तमे स्यात्तदानीं प्रिया मृत्युमाप्नो त्यवश्यंव्रणैर्वा। पर जाठ रे रोगक्ररैक्ष रक्ताद्विचार्य त्विंद जन्मकालेडथ प्रशने । सुखं नोनराणां तथा नो क्रयाणां तथा पादमुष्टि प्रहारैईतःस्यात्। परस्पर्धया क्षीयते शत्रुवर्गातयदां मंगलो मंगलाया मृहे स्यात् ।। स्त्री की मृत्यु होती है। व्रण तथा पेट के रोगहोते हैं। रकत दूषित होता है। इन फलों का विचार जन्मकुण्ड ली तथा प्रश्नकुण्ड लीदोनों में किया जा सकता है। इस व्यक्ति को सुख नहीं मिलता, व्यापार में यशनहीं मिलता, घूमोलातों से अपमानित होना पड ता है। शत्रुओं के साथ स्पर्धाकरने से हानि होती है।

    जयदेव - अबलागतगेहसंचयों रुगनर्थोऽरिभयोधुने कुजे । स्त्री सेपराजित होता है। घरबार प्राप्त होता है। रोगी, अनर्थकारी, शत्रुओं से भयभीतहोता है।
    पुंजाचार्थ --यौवनारेडप्यतीता॥ क्षितिजे नरस्य रमणी पितब्रणेनान्विता

    दथा वा विषवन्हिना यदि तदा वा बस्तिरोगान्विता। भूमिपुत्रेधूनभावोपयातेकान्ताहीनः सन्ततं मानवः स्यात्। स्त्री तरुण नहीं होती। वह पित्त या व्रणरोगसे पीडि त होती है अथवा विष से या आग से जलकर मरती है अथवा येनिरोग सेयुक्त होती है। इस से पत्नी की मृत्यु अवश्य होती है।

    जीवनाथ --कुजे कान्तागारं गतवति जनोडतीव लघुतां। समाधतेयुद्धे प्रबलरिपुणा स क्षततनुः । तथा कान्ताघाती परविषयवासी खलमतिविवृतोवाणिज्यादपि परवधूरंगविरतः। हीन, युद्ध मैदान में बली,युद्ध में शतुके द्वारा आघात होता है। स्त्री की मृत्यु होती है। विदेश में रहना पड़ता है। दुष्टबुद्धि होती है। व्यापार नहीं करता तथा परस्त्री से विलास करता है।

    नारायणभट्ट -- जीवनाथ के समान ही मत है।

    गोपाल रलाकर -- स्त्री को शारीरिक कष्ट होते है। यह पापग्रह सेयुक्त हो तो स्त्री की मृत्यु होती है। शुभग्रहों से युक्त हो तो मृत्यु नहीं होती।पेट तथा हाथ में रोग होते है। भाई, मामा तथा मौसियां बहुत होती है।बुद्धिमान होता है।

    वसिष्ठ -- भौमः किल सप्तमस्थो जायां कुकर्मनिरतां तनुसन्ततिंच। सन्तती के लिये पत्नी दुराचारिणी होती है।

    घोलप -- इसने सप्तम स्थान का फल ठीक तरह नहीं कहा है।

    रामदयाल -- यौवनाढ्या कुजेऽपिः। (टीकाकार-अपि शब्दात् क्रूराकुटि ला नातिसुन्दरी च।) यह मंगल बलवान हो तो स्त्री तरूण, क्रर, कुटिलस्वभाव की और साधारण रूप की होती है-बहुत सुन्दर नहीं होती।

    हिल्लाजातक -- सप्तत्रिंशन्मिते वर्षे जायानाशं च सप्तमः । ३७ वेंवर्ष स्त्री की मृत्यु होती है।

    यवनमत -- स्त्री का उपभोग कम प्राप्त होता है। अत्याचारी कामकरता है। झगडा पसन्द नहीं होता। स्त्री की मृत्यु होती है।
    पाश्चात्य मत -- स्त्री कठोर स्वभाव की तथा झगडालू होती है।

    विवाह सुख अच्छा नहीं मिलता। विभक्त रहना पड ता है तथा हमेशा झगड़ेहोते है। स्त्री के लिए झगड़े या अदालती व्यवहार करने पड ते है। व्यापार में शन्ुकी स्पर्धा प्रबल और खुले रूप से होती है। साझीदारी में यश नहीं मिलता।छोटी बातों पर चिढ़ता है। यह मंगल, कर्क या मीन राशि में हो तब तो स्त्री कास्वभाव बहुत ही तापदायी होता है। बहुत बार अपने मन के विरूद्ध बरतावकरना पड ता है। अदालती झगड़ों में पराजय होने से नुकसान होता है। स्थावरजायदाद नष्ट होती है।

    अज्ञात- स्वदारपीडा पापरक्षे पापयुते स्वरक्षे स्वदारहानिः। शुभयुतेजीवति अपत्यैनाशः विदेशवासः । विगततनुः मद्यपानप्रियः रणरूचिः ।चोखव्यभिचारमुलेन कलत्रान्तरं दुष्ट स्त्रीसंगः । भगचुम्बकः । मन्दयुते ृष्टेशिश्नचुम्बकः । वन्ध्यारजस्वलास्त्रीसम्भोगी । तत्र शत्रुयुते बहुकलत्रनाशः।अहंकारी॥ पापग्रह की राशि में अथवा पापग्रह से युक्त मंगल सप्तम में हो तोपत्नी को शारीरिक पीडा होती है। यह वृश्चिक में हो तो पत्नी की मृत्यु होतीहै। यह शुभ ग्रह युक्त हो तो पत्नी की मृत्यु नहीं होती किन्तु सन्तति जीवितनहीं रहती। विदेश में रहना पड ता है। शरीर दुबला होता है। शराबी तथाझगड़ालु होता है। चोरी या व्यभिचार के लिए स्वस्त्री को छोड़ कर दुष्ट स्त्रयोंका सेवन करता है। यह शनि के साथ अथवा उस के द्वारा दुष्ट हो तो सममैधुनकरता है। वंध्या अथवा रजस्वला स्त्री से भी कामसेवन करता है। शत्ुग्रह सेयुक्त हो तो अनेक पलियों की मृत्यु होती है। अहंकारी होता है।

सप्तम भाव में मंगल यदि सप्तम भाव मेष या वृश्चिक या मकर राशि है तो जातक की पत्नी कठोर स्वभाव वाली, स्थूल देही, बदसूरत और कलुषित-हृदय
होगी। यदि मंगल शत्रुक्षेत्री या नीचस्थ है तो जातक की पत्नी की मृत्यु होगी।

-मानसागरी

जातक अशोभनीय कृत्य करने वाला, रोग ग्रस्त और उसकी पत्नी की अकाल मृत्यु होगी।पुरूषों की कुण्डली मे सप्तमस्थ मंगल पत्नी के लिए, और महिलाओं के प्रसंग में पति के लिए अशुभ होता है।

-फलदीपिका

सप्तमस्थ मंगल रोगकारक, पत्नी का मृत्युकारक, पापमार्ग का प्रेरक, पापप्रवृत्ति और दयनीय व चिंतित दशा वाला होता है। जातक तनावग्रस्त, विपन्न तथा दुर्बल होगा। है

-सारावली

जातक का स्वास्थ्य खराब, मंगल के अशुभ भाव में स्थित या अशुभ ग्रह युत या स्वक्षेत्री होने पर भी पत्नी का मृत्युकारक होता है। यदि मंगल शुभयुत है तो पत्नी की मृत्यु पति के सामने होती है। यदि मंगल स्वक्षेत्री, उच्च राशि मित्र क्षेत्री या शुभयुत है तो अनिष्टकारक नहीं होता। अशुभ राशि में होने पर जातक को पत्नी वियोग होता है। यदि ऐसा नही होता तो जातक के चरित्रहीन या चारित्रिक दोष वाली स्त्री से यौन संबंध, पशुओं के साथ अप्राकृतिक मैथुन करने वाला तथा नशे का व्यसनी होता है।
- भृगु
जातक की पत्नी के स्तन सख्त व ऊचें होंगे।
- पराशर
जातक की पत्नी चारित्रिक रूप से दूषित होगी।
- वशिष्ठ

जातक के दो पत्नियाँ या पत्नी से मनमुटाव, थका-थका होना, अविवेकी अनुमान लगाने (सट्टा खेलने वाला), असफल, बुद्धिमान, अनुचित व्यवहार वाला, मूर्ख विशिष्ट प्रकृति वाला (व्यवहार कुशल न होना), चिड़चिड़ा, कामी, तनावग्रस्त दाम्पत्य जीवन वाला होगा।

-डॉ रामन


    मेरे विचार -- सभी शास्त्रकारों ने इस मंगल के फल अशुभ कहे है।- स्त्री की मृत्यु, द्विभार्यायोग, स्त्री का स्वभाव क्रूर तथा झगडालू होना, सुन्दन होना, शत्रुओं द्वारा पराजय, व्यापार में अपयश, रोग, दुःख, पाप, दाखिियआदि सभी अशुभ फल है। इनका अनुभव वृषभ, कर्क, कन्या, धनु तथा मीनइन्ही राशियों में आता है। अन्य राशियों में शुभ फल मिलते है।

    मेरा अनुभव- इस स्थान में किसी भी राशि में मंगल हो, उस व्यक्तिको, जो देखे वही उद्योग करने की इच्छ। होती हैJack of all trades, but Master of None किन्तु ठीक तरह से एक भी उद्योग नहीं होता। १८ वें वर्षसे ३६ वें वर्ष तक कुछ स्थिरता प्राप्त होती है और मंगल के कारकत्व का कोईएक उद्योग करता है। इस योग में पत्नी अच्छी होती है किन्तु झगडालू और पतिको वश में रखनेवाली होती है। मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर, कुंभ इन राशियों मेंद्विभार्यायोग होता है। वृषभ या तुला में यह मंगल हो तो वह अपनी पत्नी परबहुत प्रेम करता है। कन्या या कुंभ में हो तो विवाह के बाद भाग्योदय होकरस्थिरता प्राप्त होती है। उद्योग ठीक तरह से चलता है और धन मिलता है। दूसरेविवाह के बाद अधिक उत्कर्ष होता है। कर्क या मकर में हो तो ३६ वें वर्ष तकउद्योग में खूब मेहनत करनी पड ती है। फिर जीवन भर किसी बात की भी कमीनहीं रहती। अन्य राशियों में अस्थिरता रहती है।

    सप्तम के मंगल के व्यवसाय-मेष, सिंह तथा धनु लग्न में - प्रिंटिंगप्रेस, जिनिंग प्रेस। वृषभ, कन्या तथा मकर लग्न में- बिल्डिंग कॉन्ट्रॅक्टर, इमारतीलकडी के विक्रेता, खेतीबाडी। मिथुन, तुला तथा कुम्भ में साइकिल तथा मोटरके विक्रेता तथा रिपेरर, विमान वाहक। कर्क, वृश्चिक तथा मीन लग्न में-सर्जरी,इंजीनियरिंग।
मिथुन, कन्या, धनु, मकर, वृश्चिक तथा सिंह इन राशियों में पतिकी कुण्ड ली मे मंगल हो तो उसकी स्त्री सन्तति प्राप्त करने के लिए व्यभिचारिणीहोती है। इस में पति की सम्मति भी हो सकती है। (इस विषय में चन्द्र कीस्थिति का भी ठीक विचार करना चाहिए।) इस मंगल के फलस्वरूप अपनीबुद्धित्ता के बारे में बहुत अभिमान होता है। हठी और दुराग्रही स्वभाव होताहै। यह स्त्री राशि में हो तो संकट के समय घबरा जाते है। यही पुरूष राशि में होतो धैर्य और विचारपूर्वक आपत्ति सहन करते है। इन्हे मित्र बहुत कम होते है।स्त्री सुख कम मिलता है। (पूर्व जन्म में किसी अच्छे दंपति में झगडा लगाने कापाप करने के फलस्वरूप इस जन्म में यह दुख मिलता है।) पत्नी के मां बाप मेंसे एक किसी की मृत्यु जल्दी होती है। पत्ली को भाई कम होते है अथवाबिलकुल नही होते। सप्तम में मंगल हो तो डॉक्ट रों को दुर्घट ना में मृत व्यक्तियोंकी चीरफाड करने का मौका आता है। बडे ऑपरेशन बहुत करने पड ते है तथाउनमें यश भी मिलता है। विदेश यात्रा होती है। वकीलों को फौजदारी अदालतोंमें खासकर अपीलों में अच्छ। यश मिलता है। अतः अदालत में पराजय हो तोऐसे वकीलों को घबराना नहीं चाहिए। मेकैनिक, इंजीनियर, टर्नर, फिट र,ड्राइवरआदि लोगों के लिए भी यह योग अच्छा है। पुलिस तथा आबकारी इन्स्पेक्ट रोंका यह योग हो तो उन्हों ने अपने साथ काम करने के लिए स्त्री अफसर काचुनाव करना चाहिए। इस से यश जल्दी मिलता है। बडे ऑफ़िसों तथा फ़र्मो मेंकाम करनेवाले लोगों के सप्तम में मंगल हो तो बडे अफसरों से हमेशा झगडेहोते रहते है। मेष, सिंह तथा धनु में नौकर इमानदार होते है। इस योग में नौकरहोना ही संभव है, मालिक नहीं होते ।

    सप्तम स्थान में स्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए मारक होता है। विवाहविलंब से होना, विवाह न होना, वैवाहिक जीवन सुखपूर्ण न होना, तलाक होना,एक से अधिक विवाह होना आदि फल सप्तम स्थान में मंगल होने पर प्राप्तहोते हैं। ये फल स्वाभाविक ही मंगल के बलाबल पर निर्भर होते हैं।
अनेक कुंडलियों का अवलोकन करने के बाद एक विशेष तथ्य सामने आताहै। वह हैसप्तम स्थान में मंगल हो एवं नवम स्थान में शुभ ग्रह हो तो जातक     विवाह ही नहीं करता। सप्तम स्थान में मंगल एवं नवम स्थान में शनि होनेपर भी विवाह होने में संदिग्धता रहती है। ऐसे जातक के शत्रु बहुत होते हैं।इसी कारण वाद-विवाद के प्रसंग बार-बार आते हैं, शत्रु प्रबल होते हैं। जातकको जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है। वैवाहिक जीवन दुखी रहता है औरचरित्र संशयास्पद रहता है।

    आचार्य गर्ग के अनुसार मेष, वृश्चिक या मकर राशि का मंगल सप्तम स्थानमें होने पर जातक का एक ही विवाह होता है एवं वैवाहिक-जीवन सुखों सेपरिपूर्ण रहता है किंतु पत्नी बुद्धिमान, चंचल एवं सुंदर नहीं रहती है। कर्क, मिथुनया कन्या राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो एक से अधिक विवाह कीसंभावना बनती है। महर्षि वशिष्ठ के मतानुसार पत्नी का आचरण अच्छा नहींरहता, संतान कम होती है। एक अन्य आचार्य के अनुसार पत्नी को जहर, अग्निया अपघात का डर रहता है एवं यौन रोग होने की भी संभावना रहती है। जातकका स्वभाव तीखा होता है एवं उसे रक्त एवं चर्म संबंधी विकार होते हैं। ऐसाजातक व्यापार में प्रतिस्पर्धा न करे तो ही अच्छा है।

    यवन ज्योतिषविदों के अनुसार 17वें वर्ष में जातक को अग्निभय रहता हैएवं 37वें वर्ष में पति-पत्नी को कष्ट सहन करने पड़ते हैं।

    पाश्चात्य विद्वानों के मतानुसार पति या पत्नी तेज स्वभाव की या झगड़ालूहोती है, पत्नी के कारण कई मुसीबतें खड़ी होती हैं। एक अन्य ज्योतिषाचार्यके अनुसार सप्तम स्थान में मंगल हो तो जातक कामातुर रहता है। सप्तम स्थानमंगल पर शनि की दृष्टि हो या मंगल के साथ शनि भी सप्तम स्थान में होतो जातक अनैसर्गिक या समलैंगिक संभोग करता है। हमारी राय में मंगल केशुभ-अशुभ परिणाम निश्चित करने के लिए वह किस राशि में किस ग्रह केसाथ है और उस पर किस ग्रह की दृष्टि है आदि बातों का तुलनात्मक अध्ययनजरूरी है।
प्रायः सर्वमान्य ज्योतिषशास्त्रज्ञों के अनुसार मेष, वृश्चिक या मकर राशिका मंगल सप्तम स्थान में होने पर राजयोगकारक बनता है। अशुभ फल अन्यराशियों में अधिक मिलेंगे।
 वैवाहिक-जीवन की दृष्टि से जातक की पत्नी की कुंडली में भी जातक सदृश कुंडली के ग्रह योग होने पर ‘भौमतुल्ये यदा भौम' जैसे सूत्रों के अनुसारवैवाहिक जीवन के लिए मंगल अशुभ सिद्ध नहीं होता।
भाव-सातवें भाव का मंगल जातक को मांगलीक दोष वाला बनाता है (यदि अन्य योगों से यह दोष कट न रहा हो तो)। ऐसा जातक अपने जीवनई्ष्यालु होता है तथा अपने जीवनसाथी की मृत्यु का कारण बनता है। जातक कीपत्नी भी उग्र स्वभाव की तथा झगड़ालू होती है। दाम्पत्य कलहपूर्ण रहता है। प्रायः
    साथी से अप्रसन्न/असंतुष्ट, तुनकमिजाज, कठोर वाणी वाला, मककार, धूर्त, निर्धन व
    यह कलह अलग होने की नौबत पैदा कर देता है। कार्य-व्यवसाय में भी प्रतिपक्षी
    के साथ स्पर्धा बनी रहती है। यदि अग्निराशि भी हो तो जातक को प्रेस/छापाखाने
    का धंधा लाभकारी होता है। परन्तु अग्निकांड का भय भी रहता है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक प्रायः बीच की स्थिति में नहीं रहता।
    या तो बहुत अमीर होता है, या फिर बहुत गरीब। किन्तु ऐसे जातक की प्रबलइच्छा जीवन में एक बार पूर्ण अवश्य होती है। यदि मंगल अशुभ हो तो जातकभी बर्बाद हो जाती है।
    मनहूस होता है। उसकी साली, बहन, बुआ आदि यदि उसके साथ रहें तो वे स्वयं भी बर्बाद हो जाती  है 
सप्तम भाव: सप्तम भावस्थ मंगल हो तो मंगली योग बनाता है। पाप ग्रह से युक्त अथवा पाप ग्रह की राशि में सप्तमस्थ मंगल पत्नी/पति को पीडित रखता है। दाम्पत्य सुख में कमी आती है। वायु राशि का मंगल सप्तम भाव में हो तो छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) का व्यवसाय लाभ देता है। जल राशि का मंगल हो तो कृषि कार्य, भवन निर्माण तथा गृहकार्य में प्रयुक्त होने वाली लकड़ी के व्यवसाय में सफलता मिलती है। अग्नि राशि का मंगल हो तो ऑटोमोबाइल (मोटर, स्कूटर, मोटर साइकिल) का क्रय-विक्रय लाभप्रद होता है। पृथ्वी राशि का मंगल हो तो चिकित्सा उपकरण, इंजीनियरिंग में काम आने वाले सामान के व्यवसाय से लाभ मिलता है। मेष, सिंह, मकर, कुम्भ और वृश्चिक राशि का मंगल द्विभार्या योग बनाता है। शुक्र अधिष्ठित राशि (वृष-तुला) का मंगल हो तो जातक पत्नी से अत्यधिक प्रेम करता है। कुम्भ और कन्या में मंगल हो तो जातक का भाग्योदय विवाहोपरांत होता है। कर्क, मकर का मंगल बहुत संघर्ष के पश्चात ग्रौढ़ावस्था में उत्थान होने देता है। अन्य राशियों में मंगल हो तो जीविकोपार्जन में स्थिरता नहीं रहती। चिकित्सकों को सर्जरी में भारी सफलता मिलती है तो वकीलों को फोजदारी के मुकदमों में, यदि उनकी कुण्डली में मंगल सप्तमस्थ होकर शुभ प्रभाव में हो। इनके अलावा पुलिस तथा सैन्य बल में कार्यरत लोगों, तकनीशियंन इंजीनियर आदि के लिए भी शुभ फल देता है। 

राशिगत फल

1. मेषमेष राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न, प्रतिष्ठित एवं अधिकारसंपन्न रहता है। जातक के संतान कम होती है। वैद्यकशास्त्र या     ज्योतिषशास्त्र का जानकार रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार जातक, ठसकीमां एवं पत्नी तीनों का चरित्र संदिग्ध रहता है।

2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न,अतिवाचाल एवं मादक वस्तुओं का सेवन करनेवाला रहता है। उसकी पत्लीगर्ममिजाज एवं अतिकामुक होती है।

 3. मिथुनमिथुन राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो जातक शस्त्र-अस्त्रविद्या में प्रवीण रहता है। पत्नी खूबसूरत, सुशील एवं आज्ञाकारिणी रहती है।जातक को स्त्रियों से हमेशा लाभ मिलता है, पत्नी सुख पर्याप्त नहीं मिलता।

4. कर्क-कर्क राशि का मंगल संप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखखी,कम बोलनेवाला, स्वकर्म से आगे बढ़नेवाला एवं विद्वान होता है। महर्षि गर्गके अनुसार ऐसा जातक सदाचारी होता है।

 5. सिंह-सिंह राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्नहोता है लेकिन उसका बचपन कष्टमय रहता है। पत्नी सुंदर मिलती है। महर्षिलोमश के अनुसार जातक का आचरण ठीक नहीं रहता। वह अपनी पुल्ली कीउपेक्षा करता है। परिणामस्वरूप पत्नी का लगाव अपने देवर के प्रति रहता है।

6. कन्या-कन्या राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक सुखी,संपन्न, धनसंग्रही, वैद्यकशास्त्र का ज्ञाता एवं संतान सुख कम मात्रा में पानेवालाहोता है। महर्षि लोमश के अनुसार जातक स्वयं, उसकी मां एवं पत्नी तीनोंआचरणहीन होते हैं।

 7. तुला-तुला राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक प्राय: नास्तिक,अतिकामातुर होता है। रक्त विकार, चर्मरोग तथा गुप्तरोग उत्पन्न होते हैं औरवैवाहिक जीवन में कमी रहती है। स्त्रियों से संसर्गजन्य रोग होने से या अतिलंपटता के कारण जातक की मृत्यु होती है। ऐसा जातक ऐश्वर्य भोगी, संन्यासीअथवा ऐश्वर्य भोगने के बाद विरक्त बनता है।

 8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातकनिष्दुर, दीर्घायु, ऐश्वर्यशाली, कीर्तिवान होता है। उसके पेट में कोई बात नहींपचती। स्त्रियों के माध्यम से वह धन प्राप्त करता है। महर्षि लोमश के अनुसारवह स्त्रियों के लिए पैसा उड़ाता है।,

 9. धनु-धनु राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक वाचाल, दीर्घायु,ऐश्वर्यवान, मादक वस्तुओं का सेवन करनेवाला, परोपकारी, दिखने में कठोरकिंतु दिल से कोमल एवं सदाचारी होता है। जातक की पत्नी सुंदर, कामुकतथा फुर्तीली होती है। स्वास्थ्य मध्यम रहता है।

  10. मकर-मकर राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक सदाचारी,स्वाभिमानी, धनवान, अधिकारसंपन्न एवं प्रतिष्ठित रहता है। जातक के एक  अधिक विवाह हो सकते हैं। उसे पत्नी सुंदर, मधुरभाषी एवं सुशीलमिलती है।

 11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक विद्वान, कमबोलनेवाला, प्रभावी व्यक्तित्व का धनी, सुंदर स्त्रियों का चहेता एवं कामुकरहता है। अपनी मेहनत से आगे बढ़ता है। पत्नी अच्छी मिलती है।

    12. मीन मीन राशि का मंगल सप्तम स्थान में हो तो जातक गुप्तरोगी,चर्मरोगी, अतिकामातुर एवं चरित्रहीन रहता है। पत्नी से उसकी अनबन रहतीहै। इसमें लंपटता अधिक पाई जाती है। चरित्रहीनता एवं लंपटता के कारणपत्नी का दूसरों से संबंध रह सकता है। कुसंगति के कारण जातक गुंडा यादुराचारी बन सकता है। उसे सजा भी मिल सकती है।

1. लाल वस्तु का दान करे।
2. पक्षी न पाले। 
3. नाली में दूध न गिरावे।
4. घर में ठोस चांदी रखें।
========================== 8) अष्टम् भाव - अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
    
    अष्टम स्थान के मंगल के फ्ल

    आचार्य तथा गुणाकर- निधनगेडल्पसुतो विकलेक्षणः । पुत्र कमहोते है तथा आँखें अच्छी नहीं होतीं ।

    पराशर- मृत्यौ धननाशं पराभवं। धनहानि तथा पराभव होता है।

    कल्याणवर्मा- व्याधिप्रायोऽल्पायुः कुशरीरो नीच कर्म कर्ता च।
    निधनस्थे क्षितितनये भवति पुमान् नित्यसन्तप्तः ।। रोगग्रस्त, अल्पायुधी,शरीर अच्छ। न होना, दुराचारी, दुःखित।

    वैद्यनाथ- विनीतवेषो धनवान् गणेशो महीसुते रनध्रगते तु जातः ।कपडे सादे होते है, धनवान, लोगों में प्रमुख होता है (पुढ़ारी)।

    गर्ग- मृत्युं गतो मृत्युकरो महीजः शस्त्रादिलूतादिभिरमनितो वा। कुष्ठ प्रणाशो गृहिणीप्रपीडा नयत्यधो नाशकमानयेच्च ।। शस्त्रों से, कोढ़ से, शरीरके अवयव सड ने से अथवा जलकर मृत्यु होती है। पत्नी को कष्ट होता है।अधोगति होती है।

    काश्यप - १ संग्रामात् २ गोग्रहणात् ३ स्वहस्तात् ४ निजशञ्रुतः ५द्विजपार्श्वात् ६ अश्मपातात् ७ काष्ठात् ८कूपप्रपाततः ।। ९ भित्तिपातात्१०गुप्तरोगात् ११ विषभक्षणतस्ततः १२ चौरप्रहरणाद् द्धौमे मृत्युःस्थान्मृत्युभावगे। यह मंगल क्रमशः मेषादि राशियों में हो तो आगे कहे हुएप्रकारों से मृत्यु होती है-- १ युद्ध में, २ गायों की चोरी का प्रतिकार करते हुए ।अपने ही हाथ से, ४ शत्रुओं से, ५ सांप से, ६ पत्थर गिरने से, ७ लकडी केआघात से, ८ कुएं में गिरने से, ९ दीवार गिरने से, १० गुष्त रोग से, ११ विषखाने से तथा १२ चोरों के प्रहार से ।

    बृहद्यवनजातक- वैकल्यं स्याक्नेत्रयोर्दुर्भगत्वं रक्तात पीडा नीचकर्मप्रवृत्तिः। बुद्धेरान्ध्य सज्जनानां च निन्दा रन्ध्रस्थाने मेदिनीनन्दनक्षेत्।। आंखेअच्छी नहीं होती, कुरूप होता है। खून के रोग होते है। बुरे कामों की ओरप्रवृत्ति होती है। बुद्धि अन्ध होती है। सज्जनों की निन्दा करता है। कुजस्तुविपदाक्षयं। ३२ वें वर्ष विपत्ति आती है।

    काशीनाथ-अष्ट में मंगले कुष्ठी स्वल्पायुः शत्रुपीडि तः । अपद्रव्यःसरोगक्ष निर्गुणोऽपि हि जायते । कोढ़ होता है। अल्पायुषी, शत्रुओं द्वारापीडि त, निर्धन, रोगी तथा गुणरहित होता है।

    जयदेव-रूधिरतो गतनिश्चयः कुधीर्विदयो निन्धतमः कुजेडष्ट मे। खून     के रोग (संग्रहणी Dysentary आदि) होते है। बुद्धि के द्वारा निश्चय नहीं करसकता। बुरे विचारों का, निर्दय तथा बहुत ही निन्दनीय होता है।

    जागेश्वर- शरीरं कृशं किं शुभ तस्यं कोशे परं स्वस्य वर्गोंभवेच्छ त्रुतुल्यः। प्रयासे कृते नाशमायाति कामो यदा मुत्युगो भूमिजो वैविलग्नेः॥शरीर दुबला होता है। धन नहीं होता। अपने ही लोग शत्रु के समान होते है।बहुत प्रयास करने पर भी इच्छ। पूरी नहीं होती। अविवाहित रहना पड ता है।

    मन्त्रेश्वर- कृतनुरधनोऽल्पायुः च्छि ट्रे कुजे जननिन्दितः। बुरे शरीरका, निर्धन, अल्पायुषी तथा निन्दनीय होता है।

    पुंजराज तथा रामदयाल- इन्होंने इस स्थान का फल ठीक तरह नहींकहा है।

    आर्यग्रंथ-प्रलयभुवनसंस्थे मंगले क्षीणनीचे वृजति निधनभावंनीरमध्ये मनुष्यः। धनकनकचरार्कः सर्वदा चैव भोगी करपदगसुनीलो मुत्युलोकप्रयाति ॥ सोनाचांदी आदिधन प्राप्त होता है। हाथपांव काले होकर (कोढ़से)मृत्यु होती है। यह मंगल क्षीण अथवा नीच राशि में हो तो पानी में डू बने सेमृत्यु होती है।

    वसिष्ठ - सर्वे ग्रहा दिनकरप्रमुखा नितान्तं मुत्युस्थिता विदधते किलदुष्ट बुद्धि्। शस्त्राभिघातपरिपीडि तगात्रभागं॥ सौख्यैर्विहीनमतिरोगगर्ण रूपेत्माबुद्धि दुष्ट होती है। शस्त्रों के प्रहार से अवयवों को पीडा होती है। सुख प्राप्तनहीं होता। बहुत रोग होते है।

    नारायणभट्ट - शुभास्तस्य किं खेचरा: कुर्यरन्ये विधानेऽपि चेदष्ट मेंभूमिसूनः । सखा किं न शत्रूयते सत्कृतोऽपि प्रयत्ने कृते भूयते चोपसर्गेः॥ अकेलामंगल अष्ट म स्थान में हो तो अन्य शुभ ग्रहों का कुछ भी उपयोग नहीं होता।मित्र भी शत्रु जैसा बरताव करते है। प्रयलन करने पर भी इसे आपत्ति ही प्राप्तहोती है।

    गोपाल रत्लाकर-पुत्र थोडे होते है। नेत्ररोग होता है। आयु मध्यमहोती है। पिता और दादा को कष्ट होते है। मामा की मृत्यु होती है। वेश्यागमनकरता है।
    घोलप -- अपूज्य, निंदणीय, उन्मत्त, वातपीडा से युक्त, मूर्ख,डरपोक, दुराचारी, स्त्री पुत्रों का भरणपोषण करने में असमर्थ, पापी, दुबला,खर्चीला, रक्तपित्त रोगों से युक्त, नेत्ररोग से युक्त शत्रु से भयभीत ऐसा यहव्यक्ति होता है।

    मृत्यु होती है।हिल्लाजातक- पंचविशे तथा वर्षे मृत्युकर्ताष्ट मः कुजः । २५ वें वर्ष

    यवनमत-इसे गुह्ारोग होते है। स्त्री से दुःख प्राप्त होता है। चिन्ताग्रस्तहोता है। अच्छ। परीक्षक होता है। शस्त्रों के प्रहार से जखमी होता है। यहमंगल नीच का हो तो रक्तपित्त होता है।

    पाश्चात्य मत- इसे विवाह से लाभ नहीं होता। रवि और चंद्र सेअशुभ योग हो तो अकस्मात मृत्यु होती है। यह मंगल अकेला हो तो मृत्युजल्दी नहीं होती। बन्दूक की बारूद से मृत्यु होती है। यह जलराशि में हो तोपानी में डूबकर, अम्नि में हो तो आग में जलकर तथा वायु राशि में हो तोमानसिक व्यथा से मृत्यु होती है। पृथ्वीत्त्व में यह मंगल हो तो शुभ फलमिलता है।

    अज्ञात-नेत्ररोगी। मध्यमायुः । पित्ररिष्ट । मूत्रकृच्छ रोगः ।अल्पपुत्रवान् । वातशूलादिरोगः। दारसुखयुतः । करवालात् मृत्युः । शुभयुतेदेहारोग्यवान् । दीर्घायुः। मनुष्यादिवृद्धिः । पापक्षेत्रे पापयुते ईक्षणवशात्वातक्षयादिरोगः मूत्रकृच्छ ाधिक्यं वा। भावधिषे बलयुते पूर्णायुः । आंखों केरोग, मध्यम आयु, पिता की मृत्यु, मुत्रकृच्छ रोग, पुत्र थोडे होना, वातशूलइत्यादि रोग, स्त्रीसौख्य, तलवार से मृत्यु ये मंगल के फल है। यह शुभग्रहों सेयुक्त हो तो नीरोग शरीर, दीर्घ आयु तथा घर में समृद्धि होती है। पापग्रह कीराशि में अथवा पापग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो वातक्षयादिक रोग होते है यामूत्रकृच्छ से बहुत पीडा होती है। अष्ट म स्थान का अधिपति बलवान हो तो पूर्ण आयु मिलती है।
अष्टम भाव में मंगल की नीचस्थिति होने पर जातक की मृत्यु डूबने से होती है। धनु/मीन राशि में मंगल जातक को पूर्ण जीवन सुख से व्यतीत कराता है। जातक के हाथ-पाँव नीले से रंग वाले होगें। वह अपनी मृत्यु तक स्वस्थ और सुखी होगा।
-मानसागरी

जातक रोगी, अल्पायु, निर्धन और विपन्न होगा।
-फलदीपिका

जातक रोग से त्रसित, अल्पायु, भद्दा रूप एवं अपंग शरीर वाला, नीचे कर्म करने वाला एवं शोकग्रस्त रहता है।

- सारावली

व्यक्ति नेत्र रोग से ग्रस्त, अल्पायु, पिता की जल्दी मृत्यु, गुर्दे के रोगों से ग्रस्त, कम संतित वाला, गठिया के रोग से ग्रस्त और दर्द की लहरों से पीड़ित होगा परन्तु दाम्पत्य जीवन में सुखी होगा। यदि मंगल शुभ ग्रह युत है तो वह दीर्घायु अन्यथा अल्पायु होगा।

जातक अल्पायु, कम संतान वाला, मामाओं के अनिष्ट का द्योतक, विधुर, संबंधियों से वितृष्णा करने वाला, कमज़ोर दृष्टि वाला तथा विवाहेतर संबंधों वाला होगा।
-डॉ रमन
टिप्पणी 
अष्टम भाव में मंगल की स्थिति आयु तथा दाम्पत्य सुख के लिए अच्छी नहीं बताई जाती। जातक रक्त, जननांग, नेत्र, कुष्ठ, गुर्दे आदि के रोगों से ग्रस्त और अल्पायु होगा। योगभंग की स्थिति व अन्य ग्रहों से उसके दृष्टि-मुत्यादि संबंधों और विभिन्न राशियों में होने कारण उसके फल में संशोधन अपेक्षित होता है। ऐसा कहा जाता है कि मंगल, गुरु व शुक्र के अच्छी स्थिति में होने पर भी, उनके शुभ प्रभावों को निष्फल कर देता है। महर्षि भृगु के अनुसार मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अच्छा है। परन्तु इस विषय पर सैद्धान्तिक शोध-अध्ययन अपेक्षित है। शुभयुत, स्वक्षेत्री या उच्चस्थ होने पर ऐसी संभावना भी हो सकती है कि परिणाम शुभ हों।

    मेरे विचार- इस स्थान के फल सभी शास्त्रकारों ने अशुभ ही कहे है।सिर्फ वैधनाथ का अपवाद है। थे अशुभ फल पुरूष राशियों के है। वैदनाथ केफल स्त्री राशि के है। काश्यप ने बारह प्रकार से मृत्यु का वर्णन किया है उसमेंविशेष तथ्य प्रतीत नहीं होता। मृत्यु के विषय में हमारे शनिविचार पुस्तकमें विशेष विवेचन किया गया है।

    मेरा अनुभव- यह मंगल पुरूष राशि में हो तो घर के रहस्य स्त्री यानौकरोंदवरा बाहर के लोगों को मालूम हो जाते है। विवाह के बाद ससुर दरिद्रीहोता है और स्त्री खर्चिली होती है। यह व्यभिचारी हो सकता है। चेचक आदिके दाग मुंह पर रहते है। कई शास्त्रकारों ने यहां सन्तति का भी फल बतलायाहै। शायद यह पितृस्थान से नौवा और मातृस्थान से पांचवा स्थान होने से ऐसाफल बतलाया होगा। वैसे अष्ट मस्थान सन्ततिस्थान नही है। यह मंगल पुरूषराशि में हो तो संतति बहुत कम होती है। स्त्री राशि में कर्क, वृश्चिक तथा मीनमें अधिक सन्तति होती है, वृषभ और कन्या में कम होती है, मकर में बिकुलनहीं होती। स्त्री राशि में घर के रहस्य घर में रहते है। यह स्थान पत्नी काधनस्थान है अतः वह दरिद्धी होती है। इससे पति को बहुत कष्ट होता है। स्त्रीराशि के मंगल से लाभ होता है। पत्नी बोलने मे चतुर तथा प्रेम करनेवाली होतीहै किन्तुस्त्री सुख अधिक काल नहीं मिलता। इस योग में अफसर बहुत रिश्वतलेने परभी पकडे नहीं जाते। इस व्यक्ति की पूर्व वय में ३० वें वर्ष तक बहुतखाने की आदत होती है। इस से उत्तर आयु में अपचन के कारण मलेरिया,एनिमिया, एनेस्थेशिया, अर्धागवायु, ब्लड प्रेशर आदि रोग होते है। इस कीमृत्यु शांत रीतीसे होती है। मृत्यु के समय कष्ट नहीं होता। कर्क, वृश्चिक, धनुया मीन लग्न हो और इन राशियों में अष्ट म का मंगल हो तो हठ योग काअभ्यास पूरा होता है। मेष,सिंह,धनु लग्न हो तो राजनीतिज्ञ होता है। अल्पायुहोना यह फल ठि क नहीं है। रवि, चंद्र, शनि के सम्बन्ध से दूषित हो तो ही यहफल मिलता है। अष्ट म का मंगल स्त्री राशि में हो तो दोपहर ४ बजे से ही स्त्रीभोग की उत्सुकता उत्पन्न होती है।

    अष्टम स्थान कुंडली के त्रिक स्थानों में अपना खास महत्त्व रखता है।अष्टम स्थान मृत्यु का स्थान होता है। जीवन की अवधि की दृष्टि से इसस्थान में पापग्रह कभी शुभ फल प्रदान नहीं करता। ‘अष्टम पति सौभाग्य'इस सूक्त के अनुसार अष्टम स्थान स्त्रियों के पतिसुख, सौभाग्य एवं समृद्धिका स्थान है। इसी तरह पुरुषों के पत्नी सुख व समृद्धि का भी यह स्थानहै। इसीलिए गुण मिलान के समय अष्टम स्थान स्थित मंगल अशुभ माना जाताहै। ऐसे जातक के शत्रु अधिक रहते हैं और जीवन संघर्षों से भरा रहता है।अन्य ग्रहों की सुरक्षा न हो तो अष्टमस्थ मंगल स्वास्थ्य एवं जीवन के विषयमें शुभ फल प्रदान नहीं करता। जातक को नेत्रविकार, मानसिक अशांति वसंतान कम रहती है। स्त्रियों की कुंडली में अष्टम में मंगल हो तो गर्भपातका भय रहता है। चर्मविकार, रक्तविकार, अग्नि, शस्त्र एवं विषभय जातकको रहता है। सांसर्गिक रोग एवं कुष्ठरोग की पीड़ा भी हो सकती है।ऐसा जातक अविवाहित रहता है, उसे पत्नी का पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता।पत्नी वियोग होता है। मंगल नीच का, बलहीन होने पर जलभय रहता है।यवनाचार्य के मतानुसार 25 एवं 32वां वर्ष जातक के लिए दिक्कतों एवंपरेशानियों से गुजरता है।

    विवाह साधारण परिवार में होता है। पिता, दादा या मामा का सुख कममिलता है। जन्मकुडली में अन्य ग्रह स्थिति ठीक न हो तो जातक दुराचारीबनता है।
    


    अष्टम भाव-आठवें भाव का मंगल भी जातक को मांगलीक दोषी बनाताहै (यदि अन्य योगों से यह दोष कट न रहा हो तो)। ऐसा जातक पतित (श्रष्ट),रोगी, चरित्रहीन, महासेवी/नशेडी, कठोरवाणी युक्त, नेत्ररोंगी, चोर तथा निर्धनहोता है। यदि मंगल शुभ प्रभाव में हो तो जातक अपनी बात का पक्का होता है। जोकहता है, वह करता है। परिश्रमी तथा शत्रुओं को दबा देने वाला, न्यायप्रिय होताहै। परन्तु मंगल अशुभ हो तो जातक के छोटा भाई नहीं होता। होता भी है तो सबकेदुख का कारण बनता है, अशुभ मंगल के साथ शनि, सूर्य व चन्द्र भी हों तो जातक अल्यायु होता है। किन्तु मंगल अकेला हो तो शीघ्र मरने नहीं देता।
    लाल किताब के अनुसार आठवां मंगल जातक को दरिद्र, रोगी व देह सुखसे न्यून बनाता है। विवाह के बाद परेशानियां और बढ़ जाती हैं। शुभ स्थान में बैठाग्रह भी कुछ विशेष लाभ नहीं दे पाता मित्र भी शत्रुवत् हो जाते हैं। नीच राशि कामंगल हो तो रक्तपित्त सम्बन्धी रोग होते हैं। अग्नि त्त्व राशि हो तो आग या गोलीद्वारा जातक की मृत्यु होती है। अथवा बिजली के झटके से मृत्यु होती है। वायुतत्त्व राशि का मंगल मनोविकृति/मस्तिष्क विकृति (वायुरोग) द्वारा मृत्यु होने कीसूचना देता है। मकर राशि का मंगल सन्तानाभाव देता है तथा जातक को पेटू वअजीर्ण का रोगी बनाता है। ऐसा जातक यदि सरकारी नौकरी में हो तो खूब रिश्वतलेता है। बवासीर का रोगी हो सकता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन (जल राशि) राशिमें हो तो जातक को जल में डूबक्र मरने का भय होता है। वृष, कन्या और मकर में अशुभ प्रभाव स्वतः कम होजाता है 
अष्टम भाव: अष्टमस्थ मंगल भी मंगली योग बनाता है। स्त्री राशि में विशेषत: कर्क, वृश्चिक मीन का मंगल अष्टमस्थ हो तो अधिक संतान होती है जबकि वृष और कन्या में कम। मकर में हो तो संतानाभाव रहता है। अष्टम भावस्थ मंगल वाले जातक यदि अधिकारी हों तो बड़े रिश्वतखोर होते हैं, पकड में भी नहीं आते। जातक पेटू (अधिक खाना खाने वाला) होता है तथा उसकी यह प्रवृत्ति प्रौद़्ावस्था तक बनी रहती है जिसके फलस्वरूप उसे अजीर्ण, हृदय रोग, रक्तचाप, वायु विकार आदि रोग हो जाते हैं। पाप ग्रह की राशि में अथवा पाप ग्रह से युक्त या दुष्ट मंगल अष्टमस्थ हो तो मूत्रकृच्छ, वात रोग, क्षय आदि से अधिक पीड़ा होती है। सूर्य, चंद्र, शनि से युक्त दूषित - मंगल हो तो अल्पायु योग बनाता है। मिथुन, तुला, कुम्भ का मंगल अष्टमस्थ हो तो जातक हठयोगी होता है। कर्क, वृश्चिक, मीन का मंगल हो तो राजनीतिज्ञ बनाता है। जल राशि का मंगल आठवें भाव में हो तो जल में डूबकर मृत्यु, अग्नि राशि में हो तो आग में जलकर अथवा गोला-बारूद से मृत्यु होती है। वायु राशि का हो तो मानसिक व्यथा के कारण मृत्यु और पृथ्वी राशि में हो तो साधारण रूप में समय पर कालकवलित होता है। 

  राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक को शस्त्रभयरहता है। युद्ध में मृत्यु होने की संभावना रहती है। जातक नास्तिक, आचारहीन, चोरी करने का आदी, भाई एवं बहनों का सुख कम पानेवाला, एक से अधिकविवाह करनेवाला तथा बचपन में रोगी रहता है। वह फोड़े-फुसियों के रोग से पीड़ित रहता है। हाथ में कोई विकार रहता है।

2. वृषभवृषभ राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो पति-पत्नी दोनोंगर्ममिजाज रहते हैं। वैवाहिक जीवन में पर्याप्त सुख प्राप्त नहीं होता। इसी कारण जातक दुराचारी बन सकता है। ज्येष्ठ भ्राता के सुख का अभाव, जानवरों से भय रहता है। जमीन में गड़ा हुआ धन या अन्य गुप्तधन प्राप्त होता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक स्वयंअपना अहित करता है एवं मृत्यु का कारण बनता है। जातक निष्दुर, हिंसक,जुआरी, सदाचारी, चोर एवं व्यभिचारी बन सकता है। शिल्पविद्या में प्रवीणरहता है। शत्रु अधिक रहते हैं। सर्पभय एवं संग्रहणी से पीड़ित रहता है।

4. कर्क-कर्क राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक मूर्ख, क्रोधी,कटुभाषी, चोर एवं ठग होता है। उसके शत्रु बहुत रहते हैं और शत्रुओं केहाथों से ही उसकी मौत होती है। शरीर में विकार रहता है। भाई-बहन एवंसंतान अल्पायु रहती है। स्त्री की कुंडली में कर्क राशि का मंगल अष्टम स्थानमें होने पर गर्भपात होता है। प्रसव के समय उसे काफी कष्ट होता है एवंपेट का रोग रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक को रोगभय,शत्रुभय, सर्पभय रहता है और पशु या वाहन के कारण नुकसान पहुंचता है।माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता। पतिया पत्नी अल्पायु होती है। महर्षि लोमश के मतानुसार ऐसे जातक को सुंदरपत्नी मिलती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक चिंताग्रस्तआर्थिक दिक्कतों से परेशान, रोगी, दुष्ट, लुच्चा, चोर, अल्पायु, माता के लिएदुखदायी, भाई-बहनों के सुख से वंचित, हाथ के किसी विकार से ग्रस्त होताहै। कारावास में या शरीर पर पहाड़ या पत्थर गिरने से मृत्यु होती है।

7. तुला-तुला राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक धोखेबाज,नास्तिक, कुसंगतियुक्त, कभी-कभी नपुंसक भी रहता है। सदैव मुसीबतों सेजूझता रहता है। पत्नी एवं ज्येष्ठ भ्राता के सुख में न्यूनता रहती है। गुप्त धनलाभ होता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक क्रोधी,कंजूस, झूठा, चुगलखोर, व्यभिचारी, अल्पायु किंतु शिल्पशास्त्र में प्रवीण एवंअपने घराने में नाम कमानेवाला होता है। वह कुएं या गड्ढे में गिरकर मरता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक अति कामातुर होता है। कामवासना शांत न होने से वह व्यभिचारी बनता है। पत्नी गर्ममिजाजहोती है। वैवाहिक जीवन दुखी रहता है। शरीर पर दीवार गिरने से मृत्यु होती है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक समाजका दुश्मन, रोगी, निष्टुर एवं हिंसक होता है। उसे सर्प या विष भय रहताहै, संग्रहणी या गुप्त रोग से पीड़ित रहता है। पत्नी सुंदर होते हुए भी वह पत्नीके सुख से वॉचित रहता है। जातक का एक से अधिक स्त्रियों से प्रत्यक्ष याअप्रत्यक्ष संबंध रहता है।

    11. कुभ-कुभ राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक क्रोधी, ठग,चोर, कटुभाषी होता है। खान-पान के मामले में ऐसे जातक को विशेषसावधानी बरतनी चाहिए। स्त्री-कुंडली में अष्टम स्थान में कुंभ राशि का मंगलहो तो गर्भपात होता है एवं प्रसव के समय पीड़ा होती है। संतान या सहोदरअल्पायु या अंगविहोन, विकृत होता है। जातक को पत्नी का पूर्णसुख प्राप्तनहीं होता।

    12. मीन-मीन राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो जातक नास्तिक,ठग, हिंसक, कुसंगतियुक्त होता है। वह नपुसक भी हो सकता है, आप्त औरस्वजनों से संबंध मधुर नहीं होते और वैवाहिक जीवन दुखी रहता है।माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। स्वास्थ्य मध्यम होते हुए भी दीर्घजीवीहोता है। जातक को पशु एवं वाहन की हानि होती है, चोरों से मृत्यु का भयरहता है।

1. नीम की डाली छत पर लगावे। 
2. चांदी की चेन गले में रखें। 
3. मीठीरोट बनाकर 1 सप्ताह जमीन में दबाये।
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9) नवम भाव -  नवम स्थान (भाग्य भाव)
    नवम् स्थान के मंगल के फल

    आचार्य-धर्मेडधवान्। पापी होता है।
    गुणाकर- धर्मेंर्ेंसंपत्तिवान् । धनवान होता है।
    कल्याणवर्मा-अकुशलकर्मा द्वेष्यः:प्राणिवधपरो भवेन्नवमसस्थे।धर्मरहितोऽतिपापो नरेन्द्रकृ तगौरवो रूधिरे । कुशलता से कार्य नहीं।करता। लोग इसका द्वेष करते है। हिंसक, धर्महीन, बहुत पापी किन्तुराजमान्य होता है।

    पराशर- पराभवमनर्थ च धर्मे पापरूचिक्रिया। लोगों से पराभवपानेवाला, अनर्थ तथा पाप कर्मों में रूचि होती है।

    वैद्यनाथ -- भुसूनौ यदि पित्रानिष्ट संहितः ख्यातः शुभस्थानगे। पिताको अनिष्ट होता है। कीर्ति मिलती है।

    गर्ग -- कुजे रक्तपट ानां हि भवेत्पाशुपजी वृत्तिः। भाग्यहीनश्च सततंनरः पुण्यगृहं- गते ॥ यह बौद्ध हो तो भी शरवों के समान प्राणिवध में रूचि रखताहै। अभागा होता है।

    आर्यग्रन्थ --नवमभवनसंस्थे क्षोणिपुत्रेउतिरोगी नयनकरशरीरै:पिंगल: सर्वदैव । बहुजनपरिपूर्णो भग्यहीनः कुचैलो विकलजनसुवेशीशीलविद्यानुखक्तः ॥ बहुत रोगी, आंखें हाथ तथा शरीर लाल-पीले वर्ण केहोते। अनेक लोगों से घिरा हुआ, भाग्यहीन होता है। वस्त्र अच्छे नहीं होतोशीलवान तथा विद्यानुरागी होता है।

    जयदेव- सीमायुतो भूपतिमानयुक्तः सस्वो विधर्मो नवमे धराजे ॥मर्यादित शक्ति का, राजमान्य, धनवान किन्तु धर्महीन होता है।

    जागेश्वर- सभौमे विषाद्यम्निपीड।॥ कुशीलः कुलीलः परं भाग्यहीनःपदे रक्तरोगी कृशः क्रूरकर्मा । प्रतापी तपेज्जन्मकाले यदि स्यान्महीजेयदाम्पुण्यभावं प्रयातः ॥ विष तथा आग से पीडा होती है। व्यभिचारी, दुराचारी,भाग्यहीन, पांव में रक्तरोग से युक्त, दुबला, क्रूर तथा पराक्रमी होता है।
    बृहधयवनजातक- हिंसाविधाने मनसः प्रवृत्ति्धरापतेगौरवतोऽपिलब्धिः । क्षीणं च पुण्य द्रविण नराणां पुण्यस्थितः क्षोणिसुतः करोति ॥ हिंसककामों की ओर रूचि होती है। राजमान्य, पुण्यहीन और धनहीन होता है।अष्ट।विंशतिभूमिनन्दनसमालाभोदये संस्मृतम्। २८ वें वर्ष भाम्योदय होता है।

    काशीनाथ-धर्मस्थे धरणीपुत्ने कुकर्मा गतपौरूषः।नीचानुरागीक्रूरश्चसंकष्ट श्च प्रजायते ॥ दुराचारी, पौरूषहीन, नीच लोगों के साथ रहनेवाला, कुरतथा कष्ट झेलनेवाला होता है।

    मन्त्रेश्वर-नृपसुहृद्रपि द्वेष्योऽतातः शुभे जनघातकः । राजा का मित्रकिन्तु लोग इसका द्वेष करते है। पिता का सुख नहीं मिलता। लोगों का घातकरता है।

    मृत्यु होती है।पुंजराज- आरौ भ्रातृनाशप्रदी स्तः । द्वाभ्यां हीनः ॥ दो भाइयों की

    रामदयाल- आरेउन्यादिविषार्दित: ससहजः । विष तथा अम्नि सेपीडा होती है। बन्धुओं से युक्त होता है।

    वसिष्ठ - धर्मस्थिता-भूमिपुत्राः कुर्वन्ति धर्मरहित विमतिं कुशीलं ।धर्महीन, दुर्बुद्धि और दुराचारी होता है।

    गोपाल र्लाकर- पिता का सुख नष्ट होता है। नौकरी करनेवाला,क्रूर, व्यापार के लिए नाव में घूमनेवाला होता है।

    घोलप- अधिकारी, कवि, शत्रुहीन होता है।

    हिल्लाजातक -- भूसुतो नवमगश्चतुर्दशे वत्सरे दिशातितातनाशनम्॥ चौदहवें वर्ष पिता की मृत्यु होती है।

    यवनमत -- राजमान्य, विख्यात, परस्त्रियों का उपभोग करनेवाला,भायवान तथा अपने गांव में सुखी होता है।

    पाश्चात्य मत -- कठोर स्वभाव का, ईष्यालु, झुठ बोलनेवाला, प्रवासी, शंकाशील, दुराग्रही होता है। पत्नी के सम्बन्धितों से हानि होती है।धर्मपर थोडी श्रद्धा होती है। अध्यात्म के बारे में दुराग्रही विचार होते है। अशुभग्रहों की दृष्टि हो तो उद्धत और दुराभिमानी होता है। मन पर संयम नहीं होता,चाहे जैसा बरताव करता है। अग्नि राशि में हो तो उद्धत होता है। पृथ्वी तथाजलतत्व की राशियों में हो तो कुछ अच्छ। स्वभाव होता है। वायुराशि में होतो कानून और नीतित्वों का उल्लंघन सहज ही करता है।

    अज्ञात --पित्र्यरिष्ट । भाग्यहीनः । उच्चे स्वक्षेत्रे गुरूदारगः देशान्तरेभाग्ययोगः । शुभे शुभयुते शुभक्षेत्रे पुण्यशाली धराधिपः। पिता की मृत्यु होतीहै। भाग्यहीन होता है। यह उच्च अथवा स्वगृह में हो तो गुरूपत्नी से व्यभिचारकरता है। विदेश में इसका भाग्योदय होता है। यह शुभ ग्रहों से युक्त अथवाउनकी राशियों में हो तो पुण्यवान होता है। यह राजयोग होता है। विदेश मेंभाग्योदय के पूर्ण योग 
नवम भाव में मंगल जातक का शरीर रोगी, हाथ-पैर का रंग पीला, बड़ा परिवार भाग्यहीन, मैले कपड़े पहनने वाला तथा अव्यवस्थित से व्यक्तित्व वाला होगा। उसकी रूचि शिक्षा की ओर तथा मन उदार होगा।

-मानसागरी

नवमस्थ मंगल जातक पिता के लिए अच्छा नहीं होता। पिता की जल्दी मृत्यु के कारण वह पितृच्छायाहीन होता है। इसके अलावा दूसरों से शत्रुता रखने वाला, राजा का कृपा-पात्र, दूसरों को वश में करने वाला होता है।

-फलदीपिका

वह अपने कर्मों में दक्ष नही होता, उदासीन, जीव हत्या करने वाला, पाप-प्रवृत्ति वाला और अधार्मिक होगा। राजा से सम्मान प्राप्त करेगा। - सारावली

व्यक्ति को छोटी उम्र में ही पिता की हानि होगी, वह भाग्यहीन होगा। यदि मंगल स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक अपनी गुरु-माता या गुरु तुल्य व्यक्ति की पत्नी से अवैध संबंध रखने वाला होगा।

- भृगु

जातक निष्ठुर, सामाजिक, सफल व्यापारी, नौसैनिक, कृषि से हानि उठाने वाला, रोगी पिता, केवल अपना हितचिंतक, हठी, कर्कश, परआश्रित सा जीवन बिताने व जल्दी गुस्सा करने वाला और तार्किक होगा।

-डॉ रमन

टिप्पणी

नवम भाव में मंगल जातक को बुद्धिमान, अधर्मी, भाग्यहीन, अप्रतिष्ठित, शारीरिक कष्टों से ग्रस्त, किसी दूसरे के द्वारा बर्बाद होता है। अंतिम निष्कर्श कुण्डली की अन्य ग्रहस्थिति आदि पर निर्भर करता है।
मेरे विचार -- इस स्थान के फल आचार्यो ने मिश्र स्वरूप के कहेहै। आचार्य, कल्याणवर्मा, पराशर, आर्यग्रंथकार, जागेश्वर, बृहद्यवनजातक,काशीनाथ, वसिष्ठ तथा गोपाल रत्नाकर ने पापी, क्रूर, दुराचारी, हिंसक,व्यभिचारी होना ऐसा फल कहा। यह मकर और मीन राशि के लिए ही ठीक है।

    राजमान्य, धनवान गांव में प्रसिद्ध होना ये शुभ फल मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिकतथा मीन राशि में मिलते है। भाई की मृत्यु यह पुरूष राशि का फल है।विद्यमान किन्तु धर्महीन यह विशेषता मेष, सिंह,तथा मकर को छोड अन्यराशियों में मिलती है। कानून और नीतिनियमों का उल्लंघन करना यह फलमिथुन, तुला और कुम्भ में ठीक प्रतीत होता है। आंखे नष्ट होना, गुप्त रोगहोना, मुँह टे ढामेढ़ा होना, त्वचा रोग होना, नपुंसकता निर्माण होना, हाथपांवटूटना आदि शारीरिक अशुभ फल इस स्थान में मिलते है। दूसरों का नुकसानकर के भी ये लोग अपना फायदा करना चाहते है। ये पीछे निन्दा करने में चतुरहोते है किन्तु आगे जा कर कुछ कहने का धैर्य इन में नहीं होता ये क्रोधी होतेंहै किन्तु वैसा लोगों को बतलाते नहीं हैं। ये राजनितिक मनोवृत्ति के षड्यंत्रकरने में कुशल होते है। किसी को उंचानीचा दिखाना इन्हें बहुत पसन्द होता है।अपमान होने पर उस वक्त तो हंसकर बात टाल देते है किन्तु मन में दंश रख करप्रतिशोध लेते है। इन्हें अपने कार्य में यश भी मिलता है। इन पर विश्वास रखनाउचित नहीं। ये खुद को अति विद्वान समझते है। गुरू को भी अपना शिष्यबतलाने में नहीं हिचकिचाते । दुराभिमानी, दुराग्रही और गायें हांकनेवाले होतेहै। विदेशयात्रा हो सकती है। सन्तान भाग्यवान नहीं होती। मांबाप को तकलीफदेनेवाले होते है। कभी मारपीट करते है अथवा उन से विभक्त होते है। मेष,सिंह, धनु, कर्क तथा वृश्चिक राशियों में अधिकारी, फुर्तिले, उदार, प्रेमी,मिलनसार होते है। कुंभ, वृश्चिक और मीन में कुछ स्वार्थी होते है। कर्क में फल अच्छा मिलता है।


    मेरा अनुभव- इस स्थान में मिथुन, तुला, कुंभ, वृषभ, कन्या तथामकर में मंगल हो तो मां का सुख कम मिलता है। इस योग में पत्नी विजातीयहोती है अथवा उसमें पति से बहुत भिन्नता और नवीनता होती है। मंगल प्रधानयुवक नवमतवादी और सुधारक प्रवृत्ति का होता है। विवाह संस्था पर विश्वासन होना तथा चाहे जिस स्त्री से सम्बन्ध रखना ऐसी इसकी प्रवृत्ति होती है।विवाह न होना भी संभवनीय है। किन्तु विवाह के बाद पत्नी से प्रेमपर्वक रहतेहै। द्विभार्या योग भी हो सकता है। ऐसे समय पत्नी की मृत्यु होती है जब किबच्चों को देखभाल करने के लिए तथा घरगृहस्थी के लिए उसकी बहुत हीजरूरत होती है। ये लोग व्यभिचारी हो सकते है। प्रसिद्धि पाते है किन्तुभाग्यवान नहीं होते। डॉक्ट रों के लिए यह योग अच्छा है। कीर्ति मिलती हैतथा नैतिक आचरण भी अच्छ। रहता है। इन्हें आयुभर किसी चीज की कमीनहीं रहती। वकीलों के लिए यह योग मामूली होता है। सिर्फ फौजदारी मामलोंमे कुछ सफलता मिलती है। इंजीनियर, टर्नर, फिट र, बढ़ ई, सुनार, लुहार आदिलोगों के लिए यह अच्छ। योग है। इनके काम की प्रशंसा होती है और नौकरीमें उन्नति होती है। पुलिस और अबकारी इन्स्पेक्ट रों को अफसरों से लड झगड़कर उन्नति करनी पड ती है। इनके विभाग के कर्मचारी ही इनके विरूद्धरिपोर्ट करते रहते है। इस स्थान का मंगल स्त्री राशि में हो तो भाइयों को मारकनहीं होता, बहनों को मारक होता है। पुरूष राशि में हो तो बहनों को तारकऔर भाइयों को मारक होता है। इनका भाग्योदय २७-२८ वें वर्ष से होता है।नीचे के वर्गों में १८ वें वर्ष से भी होता है। ये लोगम्युनिसिपालिटी, लोकलबोर्ड, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड, असेंब्ली आदि में चुनकर आते है। लोगों पर प्रभावपड़ता है। लोग विरोध में हो तो भी इनके विरूद्ध मुंह पर कुछ नहीं बोल पाते।कर्क, वृश्चिक, मकर, मीन में यह मंगल हो तो विवाह के बाद स्थिरता प्राप्त होकर भाग्योदय होता है। डॉक्टर, किसान या रसायनशात्रज्ञ होते है। कर्क मेंस्वभाव बहुत विचित्र होता है। वृश्चिक में धूर्त होता है। अपने फायदे के लिएदुसरों का नुकसान भी करते है। मकर और मीन में स्वभाव नींच होता है। झुठेबोलनेवाले, निर्लज्ज और अपनी ही डींग हांकनेवाले होते है।

    नवम स्थान में प्रायः मंगल शुभ फलदायी होता है किंतु ऐसे जातक मेंदयालुपन या आस्तिकता कम पाई जाती है। वह समाज द्वारा तिरस्कृत रहताहै। जातक प्रतिष्ठित, सरकारी कर्मचारी एवं संपन्न होता है। उसे परिश्रम एवंमेहनत के अनुपात में लाभ कम मिलता है, विष और अग्निभय रहता है औरपैरों में रक्त संबंधी रोग पैदा होते हैं। यवन ज्योतिषाचार्यों के मतानुसार 14वेंवर्ष में जातक के पिता को कष्ट एवं 26वें वर्ष में स्वयं का भाग्योदय होताहै। जातक अति कामातुर रहता है। अपने जन्म स्थान में ही उसकी उन्नति होतीहै। जातक के दो भाई अल्पायु रहते हैं। पत्नी के बड़े भाई के लिए यह मंगलअशुभ रहता है।
    

नौवें भाव में मंगल हो तो जातक अभिमानी, ई्ष्यालु, पापीतथा शीष्र क्ोधित हो जाने वाला होता है। ऐसा जातक यद्यपि अच्छे पद पर पहुंचताहै, परन्तु पिता के लिए अशुभ तथा नास्तिक होता है। मेरे सुयोग्य आचार्य श्री मदन
    राशि में आठवां मंगल हो तो जातक के अशुभ प्रभाव स्वतः ही कम हो जाते हैं।
    मोहन कौशिक के अनुसार ऐसे जातक की अपने भाइयों से अनबन रहती है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक न्यायप्रिय तथा बड़े भाई की सेवा से
    सुख प्राप्त करने वाला होता है। यदि मंगल अशुभ प्रभाव में हो तो जातक नास्तिक
    व बदनाम होता है। ऐसे जातक के मां-बाप दुखी रहते हैं। यदि मकर या मीन राशि
    का मंगल हो तो विशेष अशुभ होता है। ऐसा जातक कुकर्मी, नीच, झूठा, डींग
    मारने वाला तथा गुरु पत्नी से भी व्यभिचार का इच्छुक होता है।
    अग्नि या जल तत्त्व की राशियों में मंगल यद्यपि जातक को मिलनसार वउदार बना देता है, परन्तु स्वार्थी वह फिर भी रहता है। नौवें भाव का मंगल जातकको नई मान्यताएं स्थापित करने का प्रयास करने वाला बनाता है, ऐसा जातकपुरानी रूढ़ियों का पोषक नहीं होता। स्त्री राशि में मंगल जातक की बहनों के लिएतथा पुरुष राशि का मंगल जातक के भाइयों के लिए घातक/मारक होता है।
    वृश्चिक राशि का मंगल दुष्ट व लालची बनाता है। ऐसा जातक अपने एक पैसे के
    लिए दूसरे का लाखों का नुकसान करने से भी नहीं चूकता।
    नौवां मंगल यदि कुंडली में शुक्र से बारहवें भाव में हो (शुक् दसवें भाव में
    हो) तो द्विभार्या योग भी बनाता है।
    दशम भाव-लग्न कुंडली के दसवें भाव में मंगल हो तो जातक धनवान,
    प्रसिद्ध, सम्मानित, वाहन-सुखी तथा व्यापारकुशल होता है। परन्तु संतान अल्प
होती है। दसवें भाव की स्थिति सुदृढ़ न हो तो निःसंतान भी हो सकता है। माता के
    लिए ऐसा जातक कष्टकारी होता है। शास्त्रकारों के अनुसार ऐसा जातक सरकार
    द्वारा लाभ/धन पाता है, पर अभिमानी होता है।
    लाल किताब के अनुसार यदि मंगल शुभ प्रभाव में हो तो जातक गरीब घर
    में पैदा होकर भी घर को धनी व अमीर बनाता है। वह निःसन्तान कभी नहीं रहता,
    गृहस्थ सुख भी उत्तम प्राप्त करता है। अशुभ प्रभाव का मंगल जातक को घर का
    सामान बेचकर निर्धन हो जाने को विवश करता है। मंगल के साथ गुरु बैठा हो तो
    जातक को धन, पद तथा अधिकार प्रास्त होते हैं। पापग्रह के साथ हो तो विध्न बाधाएं
    जातक का पीछा नहीं छोड़़तीं।
    स्त्रीराशि में मंगल हो तो जातक अपने भुजबल व संघर्ष द्वारा उन्नति करता
    है। पुरुष राशि में हो तो जातक को सहज ही उन्नति प्रास्स होती है। वृश्चिक राशि
    का मंगल डॉक्टरी तथा वकालत के पेशे में लाभप्रद होता है। किन्तु नौकरी करने
    वालों को अधिकारी से डांट पड़वाता रहता है। सामान्यतः दशमस्थ मंगल जातक
    को व्यापारकुशल, स्वयं व्यापारी या व्यापारिक संस्था में उच्च पद पर पहुंचने वालाबनाता है। लेकिन उसके एक पुत्र की मृत्यु होती है। स्वयं उसे भी अपने माता-
    पिता से अलग/दूर होना पड़ता है। (माता-पिता की मृत्यु द्वारा/दत्तक पुत्र बनकर
    अथवा अन्य कारणों से।)
नवम भाव: नवम भावस्थ मंगल के शुभाशुभ दोनों प्रकार के फल मिलते हैं। मीन ओर मकर राशि का मंगल नवमस्थ हो तो जातक दुराचारी, हिंसक, पापी तथा व्यभिचारी होता है। वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुम्भ, मीन में मंगल हो तो व्यक्ति विद्वान तो होता है परन्तु धर्म को नहीं मानता अर्थात धर्महीन होता है। वायु राशि का मंगल हो तो जातक सहज ही कानून और नीति-नियमों का उल्लंघन करता रहता है। स्त्री राशि का मंगल हो तो भाई जीवित रहते हैं, बहनों की मृत्यु होती है। पुरुष राशि में इसके विपरीत फल मिलते हैं। कर्क, वृश्चिक, मीन, मकर में मंगल हो तो विवाह के पश्चात भाग्योदय होता है। ऐसे जातक नीच प्रवृत्ति के होते हैं ओर अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए दूसरों का बड़े-से-बड़ा नुकसान भी कर डालते हैं। असत्यवादी, निर्लज्ज और डींग हांकने वाला उन्हें कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। पुरुष राशि का मंगल शुभ प्रभाव में हो तो राजनीति में छोटे पद मिल जाते हैं। वुश्चिक, कुम्भ और मीन में मंगल जिन अधिकारियों के नवम भाव में होता है बे स्वार्थी होते हैं। मेष, सिंह, कर्क, धनु राशि का मंगल हो तो उदार-मिलनसार होते हैं। वायु राशि और पृथ्वी राशि का मंगल नवमस्थ हो तो जातक की पत्नी या तो भिन्‍न जाति की होती हे अथवा उसके विचारों में मूलभूत भिन्‍नता होती है। नवम भावस्थ मंगल के जातक विवाह को पवित्र एवं स्थायी बंधन नहीं मानते, चाहे कैसी भी स्त्री हो उससे संबंध बनाने को लालायित रहते हैं। 
राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का मंगल नवम स्थान में उत्तम राजयोग बनाता है। ऐसाजातक सुखी, संपन्न, यशस्वी एवं प्रतिष्ठित रहता है। आंखें खूबसूरत होतीहैं। प्रायः परदेश में निवास करता है।
    2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक कामातुर, लंपट, हिंसक एवं नास्तिक होता है। स्त्रियों के कारण जातक का भाग्योदय होता है या उसे अधिक लाभ की प्राप्ति होती है। चेहरे पर कोई विकार रहता है।

    3. मिथुनमिथुन राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक कामातुर रहता है। उसके एक से अधिक स्त्रियों से संबंध रहते हैं। पति-पत्नी दोनों का स्वभाव गर्म होने से एक-दूसरे से नहीं बनती। बचपन में स्वास्थ्य कमजोर रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक के पैरों मेंविकार रहता है। वह हिंसक, आस्तिक एवं लंगड़ा होता है तथा उसके शत्रुअधिक होते हैं। जातक की आर्थिक स्थिति अस्थिर रहती है। जीवन में कईचढ़ाव-उतार देखने पड़ते हैं। लकड़ी, पत्थर आदि से संबंधित व्यापार में वहलाभ पाता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक विद्वान,प्रतिष्ठित, यशस्वी, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, तर्कशास्त्री एवं समाजसेवी होताहै। नाट्यकला एवं संगीत में रुचि रखता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक विद्वान,संपन्न, सरकारी कर्मचारी, अपनी मेहनत से आगे बढ़नेवाला होता है। जातककी आंखें सुंदर होती हैं, परदेश में उन्नति होती है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,उद्यमी, सरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठित एवं सुखी जीवन जीनेवाला होता है। उसकेभाग्योदय में स्त्रियों का बड़ा हाथ रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक समाजमें प्रतिष्ठित, सरकारी कर्मचारी, यशस्वी, अधिकारसंपन्न होता है। बचपन मेंस्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे स्वास्थ्यमें सुधार आता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक में दयालुता एवंआस्तिकता का अभाव रहता है। जातक यशस्वी, संपन्न व सुखी रहता है। चेहरेपर कुछ विकृति रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो राजयोगकारक रहताहै। जातक संपन्न एवं सुखी रहता है किंतु स्वभाव से कठोर होता है। विवाहके बाद ही भाग्योदय होता है तथा पति-पत्नी में अनबन रहती है। जातककामातुर रहने से परस्त्री संबंध रखता है। कुछ आचायों के अनुसार जातक कागुरु की पत्नी से संबंध आता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक क्रूर एवंनास्तिक रहता है। समाज में उसका विरोध रहता है। शत्रु बहुत होते हैं। आर्थिक दृष्टि से जीवन सुखी रहता है। अन्याय से धन कमाने की ओर प्रवृत्ति रहती है। पैरों में कोई विकार रहता है या जातक लंगड़ा होता है।

12. मीनमीन राशि का मंगल नवम स्थान में हो तो जातक ख्यातिप्राप्त,कुल में प्रसिद्ध, विद्वान, संपन्न, सुखी एवं अधिकारसंपन्न होता है। उसकीसंतान भी कार्यकुशल रहती है। मीन राशि का मंगल नवम स्थान में होना उत्तमराजयोग है।

 1. बहन से झगड़े। 
2. संगमरमर मंदिर में दान करें। 
3. दान न लेवे।
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10) दशम भाव -     दशम स्थान  (कर्म भाव) दशम स्थान के मंगल के फल

    आचार्य तथा गुणाकर-- सुखशौर्यभाक् । सुखी तथा शूर होता है।

    कल्याणवर्मा--कर्मोदुक्तो दशमे शूरोधृष्यः प्रधानजनसेवी। सुत-सौख्ययुतो रूधिरे प्रतापबहुबलः पुमान् भवति।। क्रियाशील, पराक्रमी, अजेय,महान पुरूषों की सेवा करनेवाला, पुत्रसुख से युक्त तथा बहुत प्रतापी होता है।

    वैद्यनाथ- मेषूरणस्थेऽवानिजे तु जाताः प्रतापवित्तप्रबलप्रसिद्धाः।प्रतापी, धनवान, बलवान तथा प्रसिद्ध होता है। माने कुलीरभवने च सुखंददाति। यह कर्क राशि में हो तो सुख देता है।

    गर्ग-वैद्यनाथ के समान मत है।

    जयदेव- तोषावतंसोपकृतार्थयुक्तः । संतुष्ट, भूषणभूत, परोपकारीतथा धनवान होता है।
    जागेश्वर -- यदालगनचंद्रातखमध्ये महीजस्तदा साहसं क्रौर्यर-भिल्लस्यवृत्तिः। भवेद्दूरवासः कदाचिन्नराणां तथा दुःए संगःपरं नीचसंगः।।दशमस्थो यदा भौमः शत्रुक्षेत्रे स्थितस्तदा। भ्रियते तस्य बालस्य पिता शीघ्र नसंशयः। लग्न से अथवा चंद्र से दसवें स्थान में मंगल हो तो साहसी, भील केसमान क्रूर प्रवृत्ति का, जन्मभूमि से दूर रहनेवाला, दुष्ट तथा नीचों के साथरहनेवाला होता है। यह शत्रु ग्रह की राशि में हो तो पिता की मृत्यु होती है।

    काशीनाथ -- शुभकर्माः सुपुत्री गर्विष्ठोऽपि भवेत्नरः । अच्छे कामकरनेवाला किन्तु गर्विष्ठ होता है। पुत्र अच्छे होते है।

    बृहध्यवनजातक -- विश्वंभराप्राप्तिमथो। क्षितिजो भवर्षे शस्त्राद भयम्। जमीन मिलती है। २७ वें वर्ष शस्त्रों से भय होता है। इसके अन्य वर्णन

    आचार्य, कल्याणवर्मा, वैद्यनाथ, गर्ग और जयदेव के समान है।

    मन्त्रेश्वर -- उपर्युक्त शास्त्रकारों कें समान ही मत है।

    पुंजराज तथा रामदयाल -- इसके मत जागेश्वर के समान है।विषयासक्त अधिक होना इतना फल अधिक कहा है।

    आर्यग्रंथकार -- दशमगत महीजेदान्तिक:कोशहीनो निजकुल-जयकारी कामिनीचित्तहारी। जरठ समशरीरो भूमीजीवोपकोमा द्विजगुरू-जनभक्तो नातिनीचो न न्हस्वः ।। संयमी, निर्धन, कुल का उद्धार करनेवाला, स्त्रियों को प्रिय, वृद्ध के समान शरीर से युक्त, जमीन पर उपजीविका करनेवाला, ब्राम्हणों का तथा बड़ेबुढ़ों का भक्त, एवं मंझले कद का होता है

    पराशर - धनव्यं च दशमे धनलाभ कुकर्म च। धन प्राप्त होता हैकिन्तु खर्च हो जाता है। बुरे कर्म करता है।

    वसिष्ठ - भौमः किल कर्मसंस्थो कुर्यान्नर बहुकुकर्मरतं कुपुत्रम् ।दुराचारी होता है। इसके पुत्र अच्छे नहीं होते।

    गोपाल स्लाकर-कुल का उद्धार करनेवाला, नगर का प्रमुख, अपना कमाया हुआ धन उपभोगनेवाला, किसी देवालय का अधिकारी होता है।
    घोलप -- वाहनसुख मिलता है। घर अच्छ। तथा बुद्धि तीक्ण होतीहै। शत्रुहीन, काव्य तथा कलाओं में कुशल होता है।

    हिल्लाजातक -- वत्सरे षड़ धिके वि शतिभिः शस्त्रभीतिमकुदशमस्थः । २६ वें वर्ष शस्त्रों से भय होता है।

    महेश -- बृहद्यवनजातक के समान मत है।

    यवनमत -- धनवान, गुणवान,पूज्य, दयालु और उदार होता है।अच्छ। धनवान जमीनदार हो सकता है।

    पाश्चात्य मत -- धैर्यशाली, अभिमानी, उतावले स्वभाव का,लोभी होता है। किसी बैंक या. संस्था का चालक हो सकता है। व्यापार मेंप्रवीण होता है। किन्तु कभी फायदा तो कभी नुकसान भी होता है। वृत्ति पाशवीहोती है। टीकाकार होता है। यह मंगल शुभ सम्बन्ध मे हो तो धैर्यशाली औरबहादुर होता है। सुख और दुःख दोनों मिलते है -स्थिरता नहीं होती।

    अज्ञात-जनवल्लभः। भावधिपे बलंयुते भ्राता दीर्घायुः।विशेषभाग्यवान्ध्यानशीलवान्। गुरूभक्तियुतः। पापयुते कर्मविध्नवान्। शुभयुतेशुभक्षेत्रे कर्मसिद्धिः।कीर्तिप्रतिष्ठ ावान्। अष्टादशे वर्षे द्रव्यार्जनसमर्थः। व्यापारात्भूमिपालतः प्रसादात् साहसात् वन्हिशस्त्रात् । सर्वसमर्थः । तेजवान् । आरोग्यं।दृढ गात्रः। चौरबुद्धिः। दुष्कृतिः। भाग्येशकर्मेशयुते महाराज- यौवराज्येभिषेकवानगुरूयुते गजान्तैश्वर्यवान् । भूसमृद्धिमान्। लोकप्रिय होता है। दशमस्थान कास्वामी बलवान हो तो भाई दीघार्यु होता है। विशेष भाग्यवान होता है।ध्यानधारणा करता है तथा शीलवान, गुरू का भक्त होता है। पापग्रह के साथहो तो किसी भी कार्य में विध्न उपस्थित करता है। शुभ ग्रह के साथ या उसकीराशि में हो तो काम सफल होते है, कीर्ति तथा प्रतिष्ठ। प्राप्त होती है। १८ वें वर्षव्यापार में, या राजा की कृपा से अथवा साहस से धन प्राप्त करता है। सामर्थ्यवान,तेजस्वी, नीरोगी, मजबूत शरीर का होता है। बुद्धि चोर जैसी और आचरणबुरा होता है। भाग्य और कर्मस्थान के अधिपति भी मंगल के साथ दशम में हीहो तो वह राजयोग होता है। गुरू के साथ हो तो गजान्त ऐश्वर्य प्राप्त होता है।जमीन बहुत मिलती है।

जन्म कुण्डली में दशम भाव अत्यन्त महत्वपूर्ण भाव है। यह जातक के व्यवसाय, जीविका जीवनचर्या, राजा या सरकार, प्रभुसत्ता, प्रशासन, प्रसन्नता, कार्य, पिता, दोनों घुटने, मेरूदण्ड आदि का प्रतिनिधित्व करता है। दशमस्थ मंगल से जातक के चोट ग्रस्त, अल्सर से पीड़ित, शस्त्र या अग्नि से घाव, पितृहानि का पता चलता है। दूसरी ओर ऐसी स्थिति में मंगल जातक को व्यवसाय के प्रति समर्पित, साहसी, पुत्रवान, प्रसन्न, महत्वपूर्ण व्यक्ति, विजेता, शक्तिशाली, क्रूर, उदार व प्रशंसनीय आदि गुणों से युक्त भी करता है। दशमस्थ मंगल स्वक्षेत्री, मूलत्रिकोण राशि या उच्च राशि में होने पर रूचक महायोग बनाता है और इस भाव में दिग्बली भी होता है। शनि से संबंध होने पर यह सेना या पुलिस के व्यवसाय में सफलता, शल्यचिकित्सा, लोहे-स्टील के व्यापार में लाभकारी होता है।

आशा है पाठक इस पुस्तक के माध्यम से ग्रहों के गुण धर्मों व उनकी विभिन्न भावों व राशियों में स्थिति के प्रभावों (इष्टानिष्ट) तथा फलो को भली भांति समझ पायेंगे। आइए अब दशमस्थ मंगल के फलों का शस्त्रों में वर्णित अध्ययन पर ध्यान दें। (अधिक विस्तारपूर्ण विवरण के लिए देखें श्री एम. एन. केदार द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'फलित ज्योतिष'।)

जातक इन्द्रियों को वश में रखने वाला, परिवार की मान-प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला, स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र, स्थूल देही, भूमि से जीविकार्जन करने वाला, गर्म बुद्धि वाला, मध्यम कद-काठी वाला और धन से वंचित रहेगा।
_मानसागरी
व्यक्ति क्रूर, परन्तु दानी, राजसी, महान विभूतियों द्वारा प्रशंसित तथा पराक्रमी होगा।

- फलदीपिका

'जातक अपने व्यवसाय' में दक्ष, साहसी, अविजेय, महत्वपूर्ण (विशिष्ट) व्यक्तियों की सेवा करने वाला, पुत्रवान, उत्साही और प्रसन्न होगा। - सारावली

जातक संस्थाओं व नगरों का संस्थापक, ऊर्जावान् वैभवशाली, स्वस्थ, चुस्त, प्रसिद्ध, अपने प्रयासों से स्थान पाने वाला, अच्छा कृषक, लाभ पाने वाला, चतुर, सफल संबंधियों का प्रिय और निर्णयात्मक क्षमता वाला होगा। 

-डॉ रामन

मंगल पापक्रान्त होने पर जीवन वृत्ति में बाधाकारक अन्यथा सफलता-दायक होगा। जातक लोकप्रिय, चिरंजीवी भाइयों वाला, भाग्यशाली, उन्नतिशील, ध्यान-पूजा के प्रति रूचि रखने वाला और गुरु के प्रति समर्पित होगा।
- भृगु
टिप्पणी
दशमस्थ मंगल को उत्तम कहा गया, क्योंकि यहाँ वह दिग्बली होता है। जातक अपने परिवार के सदस्यों में मुखिया, राजा से मित्रता रखने वाला, स्वावलंबी, दूसरों की सहायता करने का इच्छुक, भू-संपत्तिशाली आभूषण व धन वैभव आदि से युक्त होगा।

    मेरे विचार -- इस स्थान में जागेश्वर, पुंजराज, रामदयाल, पराशरतथा आर्यग्रंथकार ने कुछ शुभ और कुछ अशुभ ऐसे मिश्र फल कहे है। वसिष्ठहिल्लाजातक तथा पाश्चात्य ग्रंथकार ने अशुभ फल कहे है अन्य शास्त्रकारों नेशुभ फल कहे है। इनमें जो अशुभ फल कहे है उनका अनुभव वृषभ, मिधुन,तुला तथा कुम्भ में आता है। शुभ फलों का अनुभव मेष, सिंह,धनु, कर्क,वृश्चिक तथा मीन में आता है। आर्यग्रंथकार ने कामिनीचित्तहारी तथाजरठ समशरीर ये दो परस्परविरूद्ध फल बतलाए है। इनकी संगति लगानासम्भव नही। स्त्रिया एक तो सुंदरता पर मोहित होती है अथवा संपत्ति याविद्वत्ता पर भी मोहित होती है।

    मेरा अनुभव -- इस स्थान में मंगल हो तो माता या पिता की मृत्युबचपन में ही होती है। व्यक्ति दत्तक लिया जा सकता है। यह योग वृषभ, कन्याऔर मकर में होता है। पुत्रों की मृत्यु होती है। समाज में कीर्ति प्राप्त नहीं होती।नवमेश और दशमेश के साथ यह मंगल हो तो राजयोग होता है। गुरू के साथहो तो गजान्त संपत्ति होती है ऐसा कहा गया है 

में स्त्री राशि हो तो अपने प्रयल से बडे कष्ट के बाद उन्नति होती है। पुरूष राशिलम्न में हो तो प्रयलन न करते हुए भी उन्नति हो कर कीर्ति प्रप्त होती है। कुछशास्त्रकारों ने इस स्थान में पूर्वजन्मों के कर्मों का विचार करना चाहिए ऐसा कहाहै। दशम में पापग्रह हो तो पूर्वजन्म के पाप के फलस्वरूप इस जन्म में दुःख भोगनापड़ ता है। संतति होती है तो संपत्ति नहीं होती और संपत्ति हो तो संतति.नहीं होतीया मानसन्मान प्राप्त नहीं होता। इस स्थान के मंगल से वंशक्षय होता है ऐसाभीअनुभव मिलता है। इस का फल कई अंशो में लग्न के मंगल के समान होता है।बहुत धंधे करने की रूचि होती है किन्तु ठीक तरह से एक भी नहीं होता। २६ वें वर्षसे कुछ भाग्योदय होता है और ३६ वें वर्ष स्थिरता प्राप्त होती है। इन लोगों कोमृत्यु के पूर्व अपना घर देखने की बहुत इच्छ। होती है।
वैद्यनाथ ने कहा है.कि दशम स्थान में कर्क राशि का मंगल बहुतसुख देता है। किन्तु ऐसे समय लग्न में तुला राशि होती है और लघुपाराशरी के अनुसार लग्न के लिए जीवार्कमहिजा: पापाः -- गुरू, रवि और मंगल केग्रह अशुभ है। इन दोने मतों में विरोध है किन्तु वह दूर किया जा सकता है।लघुपाराशरी का मत लग्नकुण्ड ली के विचार के लिए ठोक है। इस मंगल केफलस्वरूप बचपन में माता या पिता की मृत्यु होकर पूर्वार्जित जायदाद नष्टहोती है। वैद्यनाथ का मत महादशा के विचार के लिए ठोक है। इस मंगल कीमहादशा में स्थिरता प्राप्त होती है। मानसन्मान होता है, जायदाद मिलती है,कीर्ति प्राप्त होती है। महत्वाकांक्षा बहुत होती है। प्रयत्नपूर्वक अति करठेहै। सब लोगों के साथ झगड़कर प्रगति करने की प्रवृत्ति होती है।

दशम का मंगल कर्क, वृश्चिक, मीन तथा मेष, सिंह, धनु में साधारणअच्छे फल देता है। वृषभ, कन्या, मकर तथा मिथुन, तुला, कुंभ में साधारणअशुभ फल देता है।

डॉक्टरों की कुंडली में वृश्चिक राशि में दशम मंगल होतो वो सर्जन   के रूप में प्रसिद्ध होते है। मिरज के डक्ट र वालनेस की कुण्ड ली में यह योगदेखा है। वकीलों के लिए यह योग अच्छ। है। फौजदारी मामलों में इन्हें अच्छ।यश मिलता है तथा अदालत में अपील के वक्त अच्छ। प्रभाव पडता है।नौकरी में इस मंगल के फलस्वरूप बड़े अफसरों से झगडें होते है। वैद्यनाथ नेइस मंगल के बारे में एक श्लोक कहा है -- माने वा यदि पंचमे कुजरविच्छ याकुमारेन्दवः। सद्यो मातुलतातबालजननी नाशं प्रकृर्वन्ति ते। दशम या पंचम मेंमंगल हो तो मामा का तत्काल नाश होता है, रवि हो तो पुत्र का तथा चन्द्र होतो माता का नाश होता है। किन्तु दशम में मंगल हो तो मामा की मृत्यु से कुछसम्बन्ध प्रतीत नहीं होता। 
   
ज्योतिषशास्त्र में दशमस्थ मंगल को शुभ माना गया है। 'दशमअंगारकायस्य जातः कुल दिपकः' अर्थात ऐसा जातक ख्याति प्राप्त करताहै एवं कुल का नाम उज्ज्वल करता है। ऐसा जातक धैर्यवान, पराक्रमी, संपन्नएवं सुखी रहता है। वह छोटी अवस्था से प्रगति के शिखर पर पहुंचता है।इसके हाथ में विशेष सत्ता रहती है।

    आचार्य वैद्यनाथ के मतानुसार दशम स्थान में नीच का मंगल हो तब भीवह उत्तम फलदायी होता है। जातक को जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है।उसके सहयोगी अशिक्षित, गंवार एवं क्रूर हो सकते हैं। मिथुन या कन्या राशिका मंगल दशम स्थान में हो तो पिता के लिए शुभ नहीं होता। जातक समाजको प्रगति की दिशा दिखानेवाला होता है। उसे धन प्राप्त होता है पर वह स्थिरनहीं रहता। महर्षि पाराशर के मतानुसार ऐसा जातक अवैध मार्गों से भी धनप्राप्त करता है। महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जातक का आचरण ठीक नहीं होता।दशमस्थ मंगल के साथ भाग्येश या कर्मेश अथवा गुरु हो तो उसके उत्तमफल प्राप्त होते हैं। दशमस्थ राहु-केतु या शनि-शुक्र हो तो जातक के कार्यमें दिक्कतें खड़ी होती हैं। 16वें वर्ष में जातक को धन प्राप्ति होती है।यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार 26 या 27वें वर्ष में शत्रुभय रहता है।जायदाद का सुख जातक को प्राप्त होता है। पाशचात्य विद्वानों के अनुसार जातकके जीवन में अनेक चढ़ाव-उतार, हानि-लाभ एवं सुख-दुख के मौके आनेपर भी जातक का जीवन सुखी रहता है। जातक धैर्यवान, स्वाभिमानी,उतावला, लोभी एवं क्रूर स्वभाव का होता है। साथ ही अच्छा समीक्षक भीरहता है।
दशम भाव: मंगल दशम भाव में हो तो जातक धैर्यशाली, अभिमानी और उतावले स्वभाव वाला होता है। व्यवसाय में प्रवीण होकर भी लाभ-हानि होती रहती है। स्वभाव से पशु समान, किसी वित्तीय संस्था का प्रबंधक, सुख--दुख समान रूप में पाने वाला होता है, कार्य-व्यवसाय में स्थिरता नहीं रहती। पृथ्वी राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो शेशवकाल में पिता-माता की मृत्यु होती है, दत्तक पुत्र बनता है, समाज में अपयश मिलता है, पुत्र की मृत्यु का शोक वहन करना पड़ता है। मेष, वृष, धनु राशि का मंगल, बृहस्पति के साथ दशम स्थान में हो तो बड़ी संपत्ति मिलती है। कुम्भ, मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु का मंगल दशमस्थ हो तो भारी पुरुषार्थ और कष्ट उठाने के पश्चात भाग्योदय होता है। अन्य राशियों में हो तो सहज ही भाग्योदय होता है तथा यश-मान भी मिलता है। नवमाधिपति अथवा दशम भावाधिपति या दोनों के साथ मंगल दशमस्थ हो तो राजयोग कारक होता है। चिकित्सकों अथवा वकीलों की कुण्डली में वुश्चिक राशि का मंगल दशम भाव में अति शुभ फल देता है। डॉक्टरों को सर्जरी में मान-सम्मान और धन की प्राप्ति होती है तो बकौलों को फोजदारी के मुकदमों में। अग्नि राशि और जल राशि के मंगल का दशमस्थ होना प्राय: शुभ फल तथा वायु ओर पृथ्वी राशि का मंगल साधारणतया अशुभ फल देता हे। 


 राशिगत फल
 1. मेषमेष राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो विशेष शुभ फल प्राप्तहोते हैं। यह मंगल राजयोगकारक होता है। जातक संपन्न एवं सुखी रहता हैऔर उसे नाना से लाभ प्राप्त होता है। जातक माता को अच्छा सुख देता है।

    2. वृषभवृषभ राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, संपन्न एवं सुखी रहता है। वह स्त्री-पुत्र आदि का सुख मध्यम पाताहै। जातक को केवल कन्या संतान होने की संभावना रहती है।

    3. मिधुन मिधुन राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो उसके शुभ फलकम मात्रा में प्राप्त होते हैं। जातक के जीवन में चढ़ाव-उतार व उन्नति मेंकई बाधाएं आती हैं, वरिष्ठों से मतभिन्नता रहती है। उसका स्वास्थ्य अच्छानहीं रहता और मातृ सुख में कमी रहती है। महर्षि गर्ग के अनुसार ऐसा जातकवर्णसंकर रहता है।

    4. कर्क कर्क राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक सुखी एवंसंपन्न होता है। वह टीकाकार या समीक्षक होता है, व्यापार में लाभ कमाताहै, पत्नी विद्वान होती है। श्वसुर ख्याति प्राप्त एवं प्रतिष्ठित रहता है। जातकका लगाव ससुराल के लोगों से अधिक रहता है। संतान सुख में बाधा रहती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का मंगल राजयोगकारक होता है। जातक प्रतिष्ठितएवं अधिकारसंपन्न होता है। किंतु स्वभाव से कठोर एवं अनुशासनप्रिय होनेसे इसके शत्रु अधिक रहते हैं। माता-पिता से मतभिन्नता रहने के कारण उनकेसुख में न्यूनता रहती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक अपने घरमें चहेता, कवि, गायक, लेखक होता है। मरणोपरांत भी उसका नाम रहताहै। जातक के कन्या संतान अधिक रहती है। संतान सुख में बाधा रहती है।पुत्र हो तो वह भी प्रसिद्ध, कर्मकुशल, कर्तव्य संपन्न, संगीतप्रिय, संपन्न,सरकारी कर्मचारी, तर्कशास्त्र में पारंगत एवं नाटकप्रिय होता है। महाराष्ट्र केसंगीत-गायक बालगंधर्व की कुंडली में ऐसा ही योग है। महर्षि गर्ग के अनुसारजातक की मां कठोर होती है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, सुखी, संपन्न, दीर्घायु तथा जीवन में सफल रहता है। पिता से उसकोकम बनती है किंतु मातृभक्त रहता है पत्नी-पुत्रादिकों का सुख कम मिलता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो उत्तम राजयोगबनता है। ऐसा जातक स्वभाव से क्रूर किंतु अधिकारसंपन्न, यशस्वी, धनवानएवं सुखी रहता है, ननिहाल से लाभ होता है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक को इसके शुभफल प्राप्त होते हैं। जातक सुखी, संपन्न, सदाचारी, सरकारी कर्मचारी, समाजमें प्रतिष्ठित रहता है। पत्नी विद्वान रहती है लेकिन संतान सुख में बाधा रहती है।10. मकर-मकर राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक प्रतिष्ठाएवं अधिकार प्राप्त रहता है। साथ ही वह दुराग्रही, क्रूर, कूटनीतिक एवं चुगलखोर भी रहता है। उच्च पदस्थों से मतभिन्नता के कारण पदावनति याअन्य दुर्घटना संभव रहती है। जातक माता-पिता के सुख से वंचित रहता है।महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक वर्णसंकर हो सकता है।

    11. कुंभ-कुभ राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक क्रूर स्वभावका, कुसंगति, परबुद्धि से चलनेवाला, श्वसुर के मार्गदर्शन में जीवनबितानेवाला, व्यापार में लाभ कमानेवाला, संतानहीन रहता है। उसकी आर्थिकस्थिति मध्यम रहती है।

    12. मीनमीन राशि का मंगल दशम स्थान में हो तो जातक सच्चरित्र,संपन्न, अधिकारयुक्त, दीर्घायु, धैर्यवान, पिता से अनबन रखनेवाला किंतु मांसे स्नेह रखनेवाला होता है। जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलतेहैं। नौकरी में ऊंच-नीच होती है और पदोन्नति में बाधा आती है।

 1. पुराना सोना न बेचे। 
2. अपंग व्यक्तियों की सेवा व दान करें। 3.फलदार पौधा घर न लगावे।
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11) ग्यारहवा भाव-   एकादश स्थान (लाभ भाव) एकादश स्थान के मंगल के फल

 आचार्य -- लाभे प्रभूतधनवान् । विपुल धन प्राप्त होता है।
गुणाकर -- ने भी यही फल कहा है।
पराशर -- लाभे धनं सुखं वस्त्रं स्वर्णक्षेत्रादिसंग्रहम् । धन, सुख,वस्त्र, सोना, खेती आदि लाभ होता है।

    वैद्यनाथ -- आयस्थे धरणीसुते चतुरवाकू कामी धनी शौर्यवान् ।बोलने में चतुर, कामी, धनवान और शूर होता है।

    कल्याणवर्मा -- एकादशगे धनवान् प्रियसुखभागी तथा भवेत्शूरः।

    धनधान्यसुतैः संहितः क्षितितनये विगतशोकश्च ॥ यह धनवान, सुखी, शुर,पुत्रों से युक्त तथा शोकरहित होता है।

    वसिष्ठ --क्षितिजश्च नारीम्। स्त्रियों का लाभ होता है।

    गर्ग -- प्रभूतधनवान् मानी सत्यवादी दढ व्रत। अश्वाढ्योः गीतसंयुक्तोलाभस्थे भूमिनन्दने | विधेयः प्रियवाक् शूरो धनधान्यसमन्वितः । लाभे कुजे     मृतो मानी हतचित्तोम्नितस्करैः । धनवान, मानी, सत्य बोलनेवाला, ब्रत का

    दृढ ता से पालन करनेवाला, अश्वों का स्वामी, गायक मधुर बोलनेवाला, सेवक,शूर, मृत जैसा निष्क्रिय तथा निराश अन्तःकरण का होता है। अग्नि और चोरोंसे इस की हानि होती है।

    जीवनाथ -- यदाये माहेयः प्रभवति बलादेव समरे। जयत्यद्धा शत्रूनपिसुतविष दिन विकलः ॥ धनग्रामक्षोणीचपलतुरगानंदकृदसै । परार्थव्यापारात्क्षतिमतितरामेब लभते ॥ संग्राम में शत्रुओं पर विजय पानेवाला तथा पुत्र केदुःख से पीडि त होता है। इस मंगल के फलस्वरूप जमीन, धन, वाहन आदि सेसुख प्राप्त होता है। किन्तु दूसरों की दी हुई पूंजी से व्यापार किया तो उसमेंबहुत नुकसान होता है।

    नारायणभट्ट -- का मत भी प्रायः इसी प्रकार है।

    बृहद्यवनजातक -- ताम्राप्रवालविलसत्कलधौतरूप्यवस्त्रागमंसुललितानि च वाहनानि। भूपप्रसादसुकृतूहलमंगलानि दद्यादवाप्तिभवने हिसदाऽवनेयः | सभी प्रकार की संपत्ति - जैसे तांबा, प्रवाल, चांदी, सोना, वस्त्रतथा वाहन - का सुख प्राप्त होता है तथा राजा की कृपा प्राप्त होकर मंगल होताहै। लाभे सृज़ेत् जिनवर्षलक्ष्मीम्। २४ वे वर्ष में धन प्राप्त होता है।

    जागेश्वर -- कुजैकादशेपुत्रचिन्ता नराणाम् भवेज्जाठ रगुल्मरो-गादियुक्तम्। प्रतापो भवेत् सूर्यवतस्य नून नृपस्तुल्यता वा भ्रमस्त देहे॥ पुत्रचिंताहोती है। पेट में गुल्म आदि रोग होते है। इस का प्रताप सूर्य जैसा और वैभवराजा जैसा होता है। किन्तु इसे भ्रम भी हो सकता है।

    काशीनाथ -- लाभे भौमे भूरिलाभो नानापापत्नभक्षकः । नेत्रोगीभूपमान्यो देवद्विजरतो नरः ।। इसे बहुत लाभ होता है। यह गन्दा अन्न खाता है।आंखों के रोग होते है। राजा द्वारा सन्मान होता है। देव और ब्राम्हणों का भक्तहोता है।

    मंत्रेश्वर- धनसुख्युतोऽशोकः शूरो भवेतसुशीलः कुजेः । धनवान,सुखी, शोकरहित, शूर तथा सदाचारी होता है।
    जयदेव --इसका मत बृहद्यवनजातक के समान है।

    आर्यग्रन्थ -- सुरजनहितकारी चायसंस्थे च भौमे नृप इव गृहमेधी

    पीडि तः कोपपूर्णः । भवति च यदि तुंगो लोमसौभाग्युक्तो। धनकिरणनियुक्तःपुण्यकामार्थलोभी॥ देवों का भक्त, राजा के समान घर के काम करनेवाला,दुःखी तथा क्रोधी होता है। उच्च राशि में हो तो लोकप्रिय होता है। बहुतकिरणों से युक्त हो तो पुण्य कार्य करनेवाला और धन का लोभी होता है।

    पुंजराज -- एवं भूमिसुतेऽमिशस्त्रजनितो यात्राधनैः साहसै: स्वर्णैवामणिभूषणैसु नितरां द्रव्यागमः संवदेत् । यात्रा से, साहस से, अग्नि या शस्त्रों सेअथवा सोने जवाहरात के व्यापार में बहुत धन प्राप्त होता है।

    रामदयाल -- पुंजराज के समान ही मत है।

    दुष्ट होता है।नारायणभट्ट -- सत्कृच्छू न्यतार्थे च पैशून्यभावात् । धनहीन तथा

    घोलप -- स्वामी की संगति से सुख होता है। शत्रु से द्रव्य प्राप्तिहोती है। अच्छे घर में रहता है। श्रेष्ठ कवि, वाहनों से युक्त, धनवान, मित्रोंद्वाराघिरा हुआ और प्रतापी होता है।

    गोपाल र्लाकर --बहुत जमीन मिलती है। खेतीबाडी करता है।भाईबन्द बहुत होते है। बहुश्रुत किन्तु उ गानेवाला होता है।

    धनलाथ होता है।हिल्लाजातक -- एकादशे भूमिसुतो धनलाभकरः सदा । सदा

    यवनमत -- इसके वस्त्र रेशमी या जरी के होते है। घर मेंनौकरचाकर होते है। घोड़े, गाडी आदि वाहन होते है। कामुक, पंडि त तथासत्यभाषी होता है।

    पाशचात्य मत -- इस व्यक्ति के मित्र विश्वासु नहीं होते । मित्रोंद्वारा ठगाया जाता है। किन्तु इस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो मित्रों से अच्छ।लाभ होता है। जलतत्व की राशि में यह मंगल हो तो मित्रों के सम्बन्ध से
    आपत्ति आती है। उनकी जमानत भरनी पड ती है। यह अम्नि त्त्व की राशि मेंहो तो सट्टा, लॉट री, रेस और जुए में अच्छ। लाभ होता है। इस स्थान में मंगलकी आत्मसंयमन की शक्ति प्रबल होती है।

    अज्ञात -- बहुकृत्यवान्। धनी। स्वगुणैः अमितलाभवान्। सिंहस्थेवा क्षेत्ेशयुते राज्याधिपत्यवान् । शुभद्वययुते महाराज्यधिपत्ययोगः।भ्रातृवितवान् । द्रव्यार्थमानःभोगी । सन्ततिपीडाः । विचित्रयानम् ।हर्मूभूस्वर्णलाभो भवति । बहुत काम करता है। धनवान तथा अपने गुणों सेबहुत लाभ प्राप्त करनेवाला होता है। यह सिंह राशि में अथवा लाभेश के साथहो तो बडा अफसर होता है। दो शुभग्रहों के साथ हो तो बड़े राज्य का अधिकारीहोता है। भाई का द्रव्य प्राप्त होता है, धन तथा मान प्राप्त होता है। सन्तान केबारे में कष्ट होता है। तरह तरह के वाहनों में घूमता है। बड़ी बिल्डिंग, जमीनतथा सोने-जवाहरात की प्राप्ति होती है।
एकादश भाव में मंगल जातक देवोपासक, रानी-सी पत्नी वाला, गर्म-मिजाज़ और हमेशा तनावग्रस्त होता है। यदि मंगल उच्चस्थ है तो जातक सांसारिक, चतुर, भाग्यवान्, वैभवशाली, पुण्य कर्म करने वाला और कंजूस भी होगा।

-मानसागरी

जातक शक्तिशाली, वैभवशाली, वीर, सज्जन और प्रसन्न रहने वाला होगा। -फलदीपिका

जातक, गुणवान, धार्मिक, प्रसन्न, साहसी एवं अन्न, धन, लाभ, पुत्रादि से युक्त और दुखों से दूर होगा।

-सारावली

जातक प्रगतिशील, विविध गतिविधियों में रत और वह राजा होगा।

-भृगु

जातक विद्वान, सुशिक्षित, वैभवशाली, संपत्तिवान्, कलाकार, प्रसन्न और नेतृत्व करने वाला होगा।

-डॉ रामन

टिप्पणी 
ग्यारहवें भाव में मंगल संतति-हानि, भूमि से लाभ, वैभवशाली, उत्साह वर्धक आदि होता है। जातक विद्वान, अनेक स्त्रियों से संगति करने वाला, निर्भीक, शत्रुजित् और अपूर्ण इच्छाओं वाला होगा।

    मेरे विचार -- ऊपर के फलवर्णन में गर्ग, जीवनाथ, जागेश्वर,नारायणभट्ट इनके मत पुरूषराशियों में ठीक प्रतीत होते है। अन्य शास्त्रकारों नेकुछ शुभ फल कहे है उनका अनुभव स्त्री राशियों में आता है।

    मेरा अनुभव -- इस स्थान में मंगल पुरूष राशि में - मेव, सिंह,घनु, मिशुन, तुला या कुंभ में हो तो पुत्र नही होते हुए भी तो जीवित नहीं होतेअथवा गर्भपात होते है अथवा बडे होने पर मांबाप से झगड़ ते है। महत्वाकांक्षाबहुत होती है किन्तु साध्य नहीं हो पाती। मंगल स्त्रीराशि में हो तो तीन पुत्र होतेहै। कीर्ति मिलती है। अफसर रिश्वत ले तो पकडे जाते है। (लम्न, तृतीय,पंचम, सप्तम, नवम और लाभ स्थान गुप्त बातें प्रकट करने के स्थान है। धन,चतुर्थ, ष्ठ, अष्ट म, दशम ये स्थान गुप्त ही रखते है। व्यय स्थान के बारे मेंसन्देह है।) इस स्थान में स्त्री राशि के मंगल से द्रव्यलाभ तथा अधिकार प्राप्तिके लिए चाहे जो करने की प्रवृत्ति होती है। अपनी पत्ली का शील तक बेचसकते है (इस फल का अनुभव मेष, तुला और वृश्चिक में शायद नहीं मिलता),
पुरूष राशि में यह मंगल हो तों स्त्रियों को मासिक धर्म के समय तकलिफ होती  है, बहुत रक्तस्त्राव होना, गर्भाशय फिसल जाना इत्यादि बातें होती है। सन्ततिप्रतिबन्धक रोग होते है।

    डॉक्टरों के लिए यह योग अच्छ। है। उत्तम सर्जन तथा स्त्री रोगों के विशेषज्ञ होते हैं।
वकीलों की कुण्ड ली में यह योग अच्छ। होता है। अदालत में प्रभावपड ता है और धन भी मिलता है। किन्तु एकाध बार सनद रदद होने की नौबत आजाती है। वादी और प्रतिवादी दोनों से रिश्वत लेने की इन्हें आदत होती हैकिन्तु उसी से कठि नाई होती है। इंजीनियर, टर्नर फिटर, डाइवर, सुनार, लुहार,बढ़ई आदि लोगों को यह मंगल अच्छ। होता है।

    एकादश स्थान में स्थित मंगल के फल प्रायः आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छेप्राप्त होते हैं। ऐसा जातक धैर्यवान, कुशल वक्ता, कामातुर, पत्नी सुख से युक्त,बात का पक्का, सत्य वचनी एवं प्रतिष्ठित होता है। महर्षि गर्ग के अनुसारउसका गला मधुर एवं सुरीला रहता है, वह गायक भी होता है। उसे आर्थिकलाभ होते रहते हैं किंतु चोर एवं अग्नि का भय भी रहता है।

    जातक शत्रुभंजक, अपनी मेहनत से आगे बढ़नेवाला, गर्ममिजाज का, क्रोधी,स्पष्टवक्ता, कटु सत्यभाषी रहता है। जातक साझेदारी में कोई भी व्यवसाय करेतो उसमें घाटा ही होता है। परिवहन (ट्रांसपोर्ट) संबंधी कार्य, सेना, पुलिस,अग्निशस्त्र, सोना, रत्न आदि व्यवसायों में अच्छा मुनाफा कमाता है।

    यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार ऐसे जातक को संतान सुख अल्प मिलताहै, जीवन में निरंतर धनलाभ होता रहता है। जातक की आयु का 24वां वर्षमहत्त्वपूर्ण एवं भाग्योदयकारक रहता है। इस काल में जातक विद्वान, सुखी एवंधनी बनता है।

    कुंडली में अन्य ग्रहों की स्थिति अनुकूल न रहने पर पेट में गुल्म विकारएवं नेत्र विकार भी उत्पन्न होते हैं।  पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार ऐसे जातक के मित्र कम रहते हैं। मित्रबनकर धोखा देनेवाले अधिक रहते हैं।
एकादश भाव--यदि. मंगल ग्यारहवें भाव में हो तो जातक कठोर वाणी
    वाला, दम्भी, तुनकमिजाज और धनी होता है (किन्तु प्रायः वह असामाजिक/अवैध
    ढंग से धन प्रास्त करने वाला होता है)। प्रदर्शन/दिखावा करने वाला होता है।
    (गरीब भी हो तो राजा की भांति पहनावे आदि से स्वयं को प्रदर्शित करेगा)।
    अशुभ मंगल हो तो जातक ऋणी होता है। पैतृक सम्पत्ति बेचकर खा जाता है (वैसे
    तो पैतृक सम्पत्ति उसे कम ही मिलती है। मिलती है तो न के बराबर मिलती है)।
    लाल किताब के अनुसार यदि ग्यारहवां मंगल पुरुष राशि में हो तो सन्तान
    का अभाव देता है। ऐसे जातक को संतान नहीं होती। होती भी है तो होकर मर
    जाती है। शुभ योगों के कारण न भी मरे तो बड़ी होकर झगड़े करती है। क्योंकि ऐसे
    जातक को सन्तान से सुख नहीं होता। प्रायः उसकी पत्नी गर्भस्नाव के रोग से ग्रस्तरहती है। किन्तु स्त्री राशि का मंगल हो तो जातक को आज्ञाकारी पुत्र प्राप्त होते हैं।उनके द्वारा जातक को यश मिलता है। परन्तु ऐसा जातक सरकारी नौकरी में हो और
    रिश्वत लेते पकड़ा जाता है। द्रव्य प्रास्ति के लिए वह अनैतिक हथकंडे भी अपनाता
    है। ऐसा मंगल डॉक्टरी के पेशे में शुभ रहता है। तब जातक किसी रोग का विशेषज्ञ
    या सर्जन बनकर धन व मान प्राप् करता है। अग्नि राशि में मंगल हो तो जातक की
    जुए, सट्टे, रेस, लॉटरी आदि में रुचि होती है और इनसे लाभ भी होता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान, कुशलवक्ता एवं धनवान होता है। उसके शत्रु अधिक होते हैं। कोर्ट-कचहरी,मुकदमेबाजी में पैसा खर्च होता है। उसे राजभय एवं चोरों का भय रहता है।

 2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान, उदार, धनी, लेखक, संगीतकार, जनप्रिय एवं दीर्घायु रहता है। उसके भाग्योदयमें मां का बड़ा हाथ रहता है।

 3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक धनवान,दानी-धर्मी, सुखी, दीर्घायु, सरकारी कर्मचारी एवं मातृ-पितृभक्त होता है। विदेशयात्रा का योग बनता है। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक वर्णसंकर रहता है।

4. कर्क-कर्क राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक बाल्यारिष्टयुक्त एवं अल्पायु होता है। जीवित रहने पर सुखी, संपन्न एवं सरकारी कर्मचारीहोता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो आर्थिक दृष्टि सेश्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं। जातक धनवान, सरकारी कर्मचारी, व्यवहारचतुर,परोपकारी एवं सुखी होता है। उसकी पत्नी सुंदर, पतिव्रता, सुशील,आज्ञाकारिणी होती है। यवनाचार्य के मतानुसार पत्नी वर्णसंकर रहती है। महर्षिगर्ग के अनुसार पत्नी को प्रसव के समय मृत्यु भय रहता है। संतान अल्पायुरहती है। गर्भ में ही मृत्यु संभव रहती है।।

    6. कन्या-कन्या राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्यठीक नहीं रहता। गुल्म, कैन्सर जैसे रोगों का डर रहता है। वाद-विवाद एवंमुकदमेबाजी में पैसा खर्च होता है। शत्रु की ओर से जातक पर प्राणघातक हमलाहो सकता है। वह आर्थिक दृष्टि से संपन्न एवं समाज में प्रतिष्ठित रहता है।

7. तुला-तुला राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक धनवान,विद्वान, लेखक, संगीतकार, सरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठित एवं सुखी रहता है।

8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातकआर्थिक दृष्टि से संपन्न, भरपूर जायदाद से युक्त, कर्मकुशल, विद्वान, कुशलवक्ता, पुत्र-पौत्रों सहित दीर्घायु, सुखी एवं मातृभक्त होता है। विदेश यात्रा केयोग बनते हैं। महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक तथाकथित पिता का पुत्र नहींहोता।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक आदर्शवादीएवं सच्चरित्र माता का पुत्र होता है। उसके भाग्योदय में माता का बड़ा हाथरहता है। जातक सरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठित, सुखी, अति धनवान एवंकर्मकुशल होता है। वह व्यापार में बहुत धन कमाता है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो इस मंगल केअच्छे फल प्राप्त होते हैं। जातक सभी सुखों से संपन्न होता है। साथ ही वहसमाज में अगुआ, पुण्यात्मा, दानी-धर्मी, सरकारी कर्मचारी, व्यवहारकुशल,होशियार एवं प्रतिष्ठित होता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक कोबाल्यारिष्ट का भय रहता है। जातक अल्पायु होता है। यदि जीवित रहा तोसुखी, संपन्न एवं यशस्वी बनता है।

    12. मीन-मीन राशि का मंगल एकादश स्थान में हो तो जातक उदार,दानी-धर्मीं एवं परोपकारी रहता है। यवनाचारयों के मतानुसार उसकी पत्नीपरजातीय किंतु सुंदर, सुस्वभावी एवं आज्ञाकारिणी होती है। महर्षि गर्ग केमतानुसार प्रसव के समय पत्नी को अरिष्ट का भय रहता है। मृत संतान जन्मतीहै या वह अल्पायु होती है। संतान का जीवित रहना मुश्किल रहता है।

 1. पैतृक सम्पत्ति न बेचे। 
2. कुत्ता पाले। 
3. शहद व सिन्दूर अपनेबनाकर अपने बंद कमरे या औरे में रखें।
===========================12) बारहवा स्थान - द्वादश स्थान (व्यय भाव)व्यय स्थान के मंगल के फल

स्त्री हीन होता है।वैद्यनाथ -- भौमे विरोधी धनदारहीनः । विरोधक, धनहीन तथा     आर्यग्रन्थ --परधनहरणेंचछु : सर्वदा चंचलाक्षक्षपलमतिहारीहास्युक्तः प्रचण्डः। भवति च सुखभागी द्वादशस्थे च भौमे परयुवतिविलासीसाक्षिकः कर्मपुरः । इसे दूसरों का धन अपहरण करने की इच्छ। होती है। आंखेचंचल, बुद्धि चपल और इच्छ। घूमने फिरने की होती है। हंसमुख, तगडे शरीरका, सुखी और परस्त्री से सम्बन्ध रखनेवाला होता है। गवाही देने का कामबहुत करंना पड ता है।

    जदव-- बधत्यययुतोलपहगबलो त्रनत्कुमतमन कुज-उन्त्यगे। कैद, मृत्यु के समान आपत्ति आदि से युक्त होता है। नेत्रोगी औरदुर्वल होता है। मित्रों को कष्ट देनेवाला, दुरबुद्धि होता है।

    मन्त्रेश्वर -- नयनविकृतः क्रुरोऽदारो व्यये पिशुनोऽधमः । नेत्ररोगी,क्र, स्त्रीहीन, दुष्ट और अधम होता है।

    जज--ससस्तत्। घातः कट यां दक्षवामे च पादे वामे कर्णे लोचने तत्त्रया वा ।पुण्याधिक्यादल्पक तञ्रनार्योः पापाधिक्याच्चाधिकं वा तदंगे। दग्धं वाच्यंवनहन त यद सवर दकालम कज वययसथत-शषेन्मनुजस्य नून । तदा पितृव्यो निधनं प्रयाति पितृष्वसादष्ट युतो न सद्धिः ॥चकसन तहसतरक रक स कआँख, कान, पैर या हाथ को दुर्घट ना होती है। यह मंगल शुभ सम्बन्ध में हो तोजखम थोडे समय तक रहती है। अशुभ सम्बन्ध में हो तो अधिक काल तकरहती है। चाचा की और फुफा की मृत्यु होती है।

    आचार्य --पतितस्तुरिःफेः। पतित होता है।

    गुणाकर -- आचार्य के समान ही मत है।

    कल्याणवर्मा -- नयनविकारी पतितो जायाष्नः सूचकक्ष। द्वादशगेपरिभूतो बन्धनभाक भवति भूपुत्रे ।नत्ररोगी, पतित, अपमानित होता है। पलीका घात करनेवाला तथा कारागृह में जानेवाला होता है।
    गर्ग -- कोपनो बहुकामाढ्यो व्यंगो धर्मस्य दूषकः। क्रोधी, कामुककिसी अवयव से हीन, धर्म भ्रष्ट होता है। भूमिजे द्वादशस्थे तु विद्वेपोंमित्रबनधुणुमित्रों का और बंधुओं का द्वेष करता है।

    बृहद्यवनजातक -- स्वमित्रवैर नयनातिबाधां क्रोधाभिभूंति विकलत्वमंगे। धनव्ययं बन्धनमल्पतेजो व्यवस्थभौमो विद्धति नूनम् । मित्रों से बैर,आंखो को बहुत पीड़़ा, बहुत क्रोध, अवयवों में हीनता, धनहानि, कारागृहवास,तेज कम होना ये इस मंगल के फल है। पंचवेदमिते कुजो धनहरः । ४५ वें र्षधनहानि होती है।

    जागेश्वर -- तथा कर्णकण्ठे परा रक्तपीडा जने नैव मान्यः। कानऔर गले में तथा खून बिगडने से बहुत पीडा होती है। लोगों में मान्यता नहींमिलती।

    काशीनाथ -- असद्व्ययी व्यये भौमे नास्तिको निषुरः शठ :। बहुवैरीविदेशे च सदा गच्छ ति मानवः ॥ अयोग्य कामों में खर्च करनेवाला, नास्तिक,निष्ठु र, दुष्ट, बहुतों का शत्रु और सदा विदेश जानेवाला होता है।

    नारायण भट्ट -- शाताक्षोऽपि तत्सक्षतो लोहघातै: कुजोद्वादशोऽर्थस्य नाशं करोति। मुषां किंवदन्तो भय दस्युतो वा कलिः पारधीहेतुदुःखंविचिन्त्यम् । इसका शस्त्र का आघात भयंकर होता है। धनहानि होती है।झुठी अफवाहे उठ ती है। चोरों से तथा झगड़ों से और पराधीनता से भय होता है।वसिष्ठ -- क्षितिसुतो बहुपापभाजम् । बहुत पाप करता है।

    जीवनाथ --कुजोऽपाये यस्य प्रभवति यदा जन्मसमये तदा वित्तापापं

    सपदि कुरूते तस्य सततं । कलंकप्रख्यातिं पिशुनजनतश्चौरकुलतो । भयं वाशस्त्रा देरपि रिपुकृतं दुःखमधिकं॥ तत्काल धनहानि होती है। दुष्टों के द्वाराझुठा कलंक लगाया जाता है। चोरों से, शस्त्रों से बहुत भय होता है।

पराशर -- व्यये नेत्रूजं भ्रातृनाशं च कुरूते। नेत्रोग होते है। भाई की मृत्यु होती है।
    वर्ष हानि होती है।हिल्लाजातक -- पंचवेदेमिते वर्षे हानिदो द्वादशः कुजः ।४५ वें

    घोलप -- दण्ड और कैद होती है। खर्चीला, कुर, झगड़ालू होताहै। द्रव्यलाभ के समय दुष्ट लोग विष्न उपस्थित करते है। यंत्र, सांप तथा आगसे भय होता है। कारागृह में मृत्यु होती है।

    गोपाल रत्लाकर -- निर्धन, वातरोग से पीड़ित, ठ गानेवाला, बहुतशज्ुओं से युक्त होता है। घर आग से जलता है। स्त्री की मृत्यु होती है। यहमंगल शुभ सम्बन्ध में हो तो सब दुःख दूर होते है।

    यवनमत -- वाणी कड वी होती है। क्रोधी, दुःखी, बहुत प्रवास सेव्रस्त, ऊष्णता से आंखों का नाश होना, मोतियाबिन्दु होना आदि इस मंगलके फल है।

    पाश्चात्य मत- गुप्त शत्रुओं से भय होता है। शनि के साथ अशुभयोग हो तो चोर डाकुओं से भय होता है। कारागृहवास होता है। साहसी किन्तुकभी पागल होता है। नीच राशि में अथवा अशुभ ग्रहों के साथ यह मंगल हो तोयह फल मिलता है। जुंआ, अस्वस्थता, साहस, हिंसक वृत्ति,अनैतिकता औरराजडोही प्रवृत्ति के कारण अपराध करने की प्रवृत्ति होती है।

    अज्ञात- द्रव्याभावः वातपित्त देहः । पापयुते दाम्भिक : शजुयुतेराजबन्धनम्। द्रव्यनाशादियोगकर : । दुर्बुद्धिमान् । मातृनाशस्तथा च भ्रातृकष्ट ःअष्ट विंशतिवर्षे। निर्धनता वातपित देह, और दुर्बुद्धि होती है। यह पापग्रह केसाथ हो तो दांभिक होता है। शत्ुग्रह के साथ हो तो कैद होती है। द्रव्यनाशहोता है। २८ वें वर्ष माता की मृत्यु होती है तथा भाई को कष्ट होता है।

जातक दूसरों के माल को हड़पने वाला, नेत्रो से सुलझे हुए विचारों वाला प्रतीत होने वाला, खेलकूद में अग्रणी, कुशाग्र बुद्धिमान् हमेशा कार्य
पूरा करने वाला, गवाही देने वाला होगा। वह दूसरों का उपहास करने वाला, जीवन और दूसरों की पत्नियों से मनोरंजन करने वाला होगा।

-मानसागरी

जातक गठिया (वात रोग) और पित्त रोग से ग्रस्त और धनाभाव से त्रस्त होगा।

-भृगु

जातक कहानीकार, क्रूर, पत्नि वियोगी, नीचस्वभाव वाला और नेत्ररोगी होगा।

-फलदीपिका

जातक नेत्ररोगी, अनैतिक, कहानीकार, खूंखार, पत्नी हन्ता और जेल की सजा प्राप्त करता है।

-सारावली

जातक असफल, दरिद्र, दुर्बल शरीर वाला, लोकप्रिय नहीं, दाहक (उत्तेजक) रोगों का शिकार, अनेक कष्टों से ग्रस्त, ठोकरें खाने वाला, चुस्त, फलहीन, गर्वोन्नत, बेइमान, अप्रत्याशित बाधाओं व विकृत नेत्रों वाला होगा।

-डॉ रामन

टिप्पणी

कुछ विद्वानों के मतानुसार जातक 27 वें वर्ष में माता को खोने वाला और उसे 45 वें वर्ष में भारी आर्थिक हानी होगी। उसे शस्त्राघात से घाव, चोर व शत्रु से भय, अपमानित, चोरी के आरोप लगे, स्वयं चोर हो, चंचल बुद्धिवाला, कर्कश वाणी से परिजनों को आहत करने वाला, पत्नी को हानि पहुँचाने वाला, नेत्र, प्लीहा (तिल्ली), रक्त, कान व गले आदि के रोगों से ग्रस्त होगा।

    मेरे विचार- इस स्थान में आर्यग्रन्थकार छोड कर अन्य सभी ने अशुभफल बतलाए है। ये फल सभी राशियो में मिश्र रूप से अनुभव में आते हैं।तथापि मेष, सिंह, धनु, कर्क तथा मीन में अशुभ फल मिलते है। मिथुन, तुला,कुम्भ में अशुभ फल कम मिलते हैं। वृश्चिक और मकर में बहुत अशुभ फल     मिलते है। हिल्लाजातक तथा यवनजातक ने ४५ वें वर्ष धनहानि बतलाई उसका अनुभव नही आता। अज्ञात ने २८ वे वर्ष माता की मृत्यु, भाईको कटबतलाया यह अनुभव ठीक प्रतीत होता है। आर्यग्रन्थकार ने जो अच्छे फलकहे वे मेष, सिंह, मिथुन, कर्क तथा तुला राशि के है। पराशर ने इसास्थान मेंभाई की मृत्यु का फल कैसे कहा यह स्पष्ट नहीं। शायद यह पितृस्थान से तीसरास्थान है। इसलिए कहा होगा।

    मेरा अनुभव- यह व्यक्ति बहुत खाता है। कामुक होता है किन्तुस्त्रीसुख कम मिलता है। एक पत्नी की मृत्यु हो कर दूसरी से ब्याह करना पड़ ताहै। गणित की शिक्षा पूरी नहीं होतीं। मार्फोलाजी (वनस्पति तथा प्राणियों केआकार तथा गठन का शास्त्र) का अध्ययन होता है। प्रामाणिक, सत्यवादी,उदार, क्रोधी, त्यागी होता है। ये लोग बहुत दान देनेवाले, संस्था स्थापनकरनेवाले होते है। नेता हों तो क्रान्तिवादी होते है। भाई और सन्तति को यहयोग मारक है। वंशक्षय हो सकता है। नागपुर के दानवीर रायबहादुर डी.लक्ष्मीनारायण की कुंण्ड ली में व्ययस्थान में तुला राशि में मंगल था। स्वर्गीयदेशबन्धु दास की कुंण्ड ली में व्यय में सिंह का मंगल था। लाहोर के लालागंगाराम की कुण्ड ली में व्यय स्थान में वृश्चिक का मंगल था। इन तीनों कावंशक्षय हुआ। (आम तौर पर नवम स्थान में वंश का विचार किया जाता है।किन्तु मातृस्थान से नौवा व्यय स्थान होता है। अतः माता के पूर्वकर्म के दोष सेइस व्यक्ति का वंशक्षय होता है।)सन्तति कम होती है। अधिक हुई तो पुत्रसन्ततिनहीं होती। तीखे, तले हुए पदार्थ खाने की रूचि होती है। विदेशयात्रा करनीपड ती है। परस्त्री गमन करते है। सुधारक, नवमतवादी होते है। पतिपत्लीं मेंदिन में अच्छे संबंध रहते है किन्तु रात में झगडे होते है। मन की इच्छ। आकांक्षाएंपूरी नहीं होतीं तथापि २६ वें वर्ष से प्रसिद्धि मिलती है। महाराष्ट्र के प्रसिद्धसाहित्यिक श्री. खांडे कर की कुंण्ड ली में व्यय स्थान में धनु राशि में मंगल है।दयालु, सब के लिए कष्ट करनेवाला होता है। यह अपना, यह पराया ऐसाभेदभाव नहीं रखते । क्रोधी, स्पष्ट वक्ता होते है। सुख प्राप्त करने की हमेशा     चिन्ता करते है। कर्ज हो तो मृत्यु के पहले सब कर्ज चुकाया जाता है। गिरना,विषबाधा होना, दुर्घट ना होना आदि का डर होता है। सिरदर्द, आधा सिरदुखना, खून बिघड ना, गुद्य रोग, बुढ़ ापे में अपचन आदि विकार होते है। एकशास्त्रकारं ने माता की मृत्यु की इच्छ। करना ऐसा फल कहा है किन्तु मुझे इसयोग में पिता की मृत्यु की इच्छ। करनेवाले मिले हैं। धनसंग्रह कभी नहीं होताकोई पैसे उठा ले जाता है, उधार ले जाता है अथवा गुम जाते है। इस मंगल केअशुभ फलों का वर्णन सब शास्त्रकारों ने किया ही है।

    मंगल द्वादश स्थान में हो तो जातक भ्रमणशील, प्रवास का शौकीन रहताहै। बुद्धि चंचल, कामातुर, स्त्रीलंपट, निशानेबाज, शस्त्रविद्या में प्रवीण, कोर्टमें गवाह देने में चतुर होता है।

    जातक का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। वह प्रसन्नचित्त रहता है। उसे शस्त्रएवं अग्निभय रहता है। धर्म-अधर्म, कर्तव्यता का विचार कम रखता है। अपनेस्वार्थ के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है। लोग अपने कामों केलिए इसका उपयोग करते हैं। परिणामस्वरूप दूसरों के लिए उसे कष्ट सहनेपड़ते हैं।

    जातक का धन स्थिर नहीं रहता। चोरभय एवं राजभय के कारण धन कीक्षति होती है। अन्य ग्रहों का सहयोग न होने पर वह कर्ज में डूबा रहता है।

    स्वयं जातक को या उसकी पत्नी को फोड़े-फुसियों जैसे चर्मरोग होते हैं।कमर, पैर, कान या आंखों पर अग्नि से जलने के कारण जख्म होते हैं एवं उनमें फोड़े बने रहते हैं। चाचा या बुआ से सुख कम प्राप्त होता है।

    यवन ज्योतिषविदों की राय में जातक गर्ममिजाज होता है। उसके मित्र बहुतकम होते हैं, नेत्रविकार रहता है। 45वें वर्ष में आर्थिक नुकसान होता है। जेलजाने का भी योग बनता है।

    जीवन में मतभिन्नता, वाद-विवाद के मौके बारबार आते हैं। जातक पर झूठाकलंक या आक्षेप लगता है, शत्रु बहुत होते हैं। 28वें वर्ष में माता तथा भाईको कष्ट पहुंचता है।
    संतान एवं पत्नी सुख में न्यूनता रहती है। कुछ ज्योतिषविदों के मतानुसारअन्य ग्रहों का सहयोग न होने पर वंशक्षय होता है।
        द्वादूरश भाव-बारहवें भाव का मंगल जातक को मंगली दोष वाला बनाताहै (येदि अन्य योगों से यह दोष कट नं रहा हो तो)। ऐसा जातक नेत्रविकारी,चिड़चिड़ा/जल्दी गुस्सा हो जाने वाला, झगड़ालू, आवारागर्द, कुटिल तथा गुप्तकार्य करने वाला होता है। गुप्त शत्रु का भय रहता है। जीवनसाथी के लिए बारहवांमंगल घातक/मारक होता है। ऐसे जातक को राज्य दण्ड मिलना सम्भावित होताहै। चोर, लुटेरों से धनहानि सम्भव होती है। वह बहुभोजी, कामुक तथा स्त्री सुखसे न्यून होता है। विशेष स्थितियों (प्रभावों) में ऐसा जातक राजद्रोही, अपराधी,अनैतिक कार्य करने वाला तथा हिंसक होता है। मंगल बलवान हो तो युवावस्था मेंप्रसिद्धि दिलाता है।
    लाल किताब के अनुसार बारहवां मंगल यदि शुभ स्थिति में हो तो जातकगर्ममिजाज, स्वतंत्रता पसंद करने वाला/उच्छूंखल, गुरुजनों का आदर करने वालातथा सुखद नींद लेने वाला होता है। मंगल अशुभ हो तो मूर्खतापूर्ण कार्यों मेंधननाश तथा भाई-बहनों से जातक के सम्बन्ध खराब कराता है। ऐसा जातकशत्रुओं द्वारा पराजित होता है। शत्रु उस पर हावी रहते हैं। मंगल यदि अत्यधिकपाप प्रभाव में हो तो भाई-बहनों के लिए अशुभ तथा जातक की संतान के लिए भीअशुभ होता है (वंश क्षय सम्भव होता है। यानी कोई नाम लेवा नहीं बचता)। ऐसेजातक को विदेश में वास करना पड़़ सकता है। जातक को उपदंश, प्रमेह, रक्तविकार,अपच आदि रोग होते हैं। जातक व्यभिचारी होता है। धन का संग्रह नहीं कर पाता।ऐसा जातक किसी को उधार दे तो उधार डूबता है।
    शास्त्रकारों के अनुसार बारहवां मंगल जातक को दुर्व्यसनी, अतिलोभी,अधर्मी व पापी भी बनाता है। उसे सिंह, सर्प या दुर्जनों द्वारा भय रहता है।
    विशेष-मंगल के साथ यदि शुक्र की युति भी बारहवें भाव में हो रही होतो जातक कामोन्मादी होता है। ऐसा जातक सहवास के समय पाशविक आचरणकरता है तथा जीवनसाथी को दांत व नाखूनों द्वारा काटता-झंझोड़ता है। अशुभप्रभाव में हो तो जातक बलात्कारी होता है। वह रास्ते चलते किसी को भीपकड़़कर बलात्कार कर सकता है।
एकादश भाव: वायु राशि ओर अग्नि राशि का मंगल आय भाव में हो तो सतति नष्ट होती है, पुत्र गर्भस्थ हों तो गर्भस्नाव, उत्पन्न हों तो काल के ग्रास बनते हैं, अपवाद रूप में जीवित रह जाएं तो झगडालू होते हैं, बड़े होकर माता-पिता का अपमान करते हें। किसी भी रूप में इन राशियों का मंगल पुत्र * सुख नहीं देता। जल राशि ओर पृथ्वी राशि का मंगल ग्यारहवें भाव में हो तो कई पुत्र होते हैं, यश प्राप्ति होती है। ऐसे अधिकारी रिश्वत लें तो शीघ्र पकड़े जाते हैं। ऐसे जातकों का एकमात्र ध्येय होता हे धनार्जन और अधिकार प्राप्ति, भले ही वह किसी भी प्रकार मिले। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ऐसे लोग पत्नी और पुत्री तक को दांव पर लगा देते हैं। डॉक्टरों और वकीलों के लिए एकादश भाव का मंगल शुभ फल देता है। डॉक्टरों को सर्जरी में तथा स्त्री रोगों में निषुणता प्राप्त होती है तो वकीलों को मुकदमों में जीत के कारण मान और धन मिलता है। अपवाद रूप में ऐसे वकीलों की सनद रह होने की संभावना होती है। क्योंकि उनमें अहँ भावना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त स्वर्णकारों, लोहारों, फिटरों के लिए भी आय भाव का मंगल शुभ रहता है। जिस जातक की कुण्डली में एकादश भाव में मंगल हो उसके मित्र विश्वासघाती होते हैं, उनके द्वारा जातक ठगा जाता है। जल तत्त्वीय राशि में हो तो मित्रों की जमानत देने के कारण परेशानी होती है। अग्नि तत्त्वीय राशि में हो तो सट्टा, जुआ, लॉटरी आदि से जातक लाभ उठाता है। 
द्वादश भाव: बारहवें भाव में मंगल हो तो भी मंगली योग बनता है। ऐसा जातक बहुभक्षी होता है तथा कामावेग से पीडित रहता है। उसे स्त्री सुख अल्प मिलता है। द्विभार्या योग बनता है। ऐसा जातक उदार, त्यागी, सत्यभाषी तथा क्रोधी होता हे। द्वादश भाव का मंगल संतति और भाई के लिए अनिष्ट फलप्रद रहता है, उनकी मृत्यु की संभावना रहती है। अपवाद रूप में वंश ध्षयकारकता भी अनुभव में आती है। ऐसे जातक को गिरने से चोट लगने की आशंका , विषयाधा, दुर्घटना का भय रहता है। वृद्धावस्था में अजीर्ण, सिरदर्द, गुहा रोग, रक्‍्तजविकार आदि होते हैं। उधार दिया धन वापस नहीं मिलता, चोरी से धन हानि होती है अथवा जेब से रुपया गिर जाने से हानि होती है। इस ' अ्रकार थन संग्रह नहीं हो पाता। अग्नि राशि और कर्क तथा मीन का मंगल हो तो अशुभ फल ही अनुभव में आते हैं। वृश्चिक और मकर में अत्यधिक तथा जायु राशि में होने पर कुछ कम। अशुभ ग्रह के साथ हो तो कारावास का भय रहता है। मीन में शुक्र के साथ हो तो जातक बलात्कार तक कर डालता है। 

राशिगत फल
    1. मेषमेष राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक शस्त्रविद्या मेंप्रवीण एवं सुंदर होता है। वह जन्म स्थान में ही रहता है, संगत अच्छी नहीं     रहती। पैर विकारयुक्त होते हैं या लंगड़ा रहता है। वस्त्रोद्योग एवं पशुपालनके व्यवसाय में धन कमाता है। जातक का श्वसुर चोर होता है। पत्नी लोभी,खर्चीली एवं गर्ममिजाज होती है। परिणामस्वरूप वैवाहिक जीवन खंडित होताहै। पत्नी का चरित्र भी संशयास्पद रहता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक कामातुर,परस्त्रीलंपट, कुसंगति, उत्पात करनेवाला एवं अभिमानी रहता है। आर्थिकस्थिति डांवाडोल रहती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक शत्रुओं से ग्रस्त, मानसिक शांति से वंचित, मातृसुख एवं संतानसुख विहीन, राजभययुक्तहोता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक धूर्त, अभिमानी,प्रवासी एवं नास्तिक होता है। लोकापवाद का डर बना रहता है।

5. सिंह-सिंह राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक कठोर, हिंसक,चोर एवं व्यसनी रहता है, शरीर में विकार रहता है। मृत्यु के बाद जातक कीदुर्गति होती है, मृत्यु आत्महत्या या विष खाने से होती है। मातृसुख में कमीहोती है। स्वजनों से बर्ताव अच्छा नहीं रहता। जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है।

6. कन्या-कन्या राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक चतुर,धैर्यवान, पराक्रमी, अभिमानी, प्रवासी, पाखंडी, निर्दयी, कंगाल एवं कुसंगतिहोता है। स्त्री-पुत्रादिकों के सुख में कमी रहती है। विशेषतः प्रथम संतान कोकष्ट रहता है। पत्नी गर्ममिजाज, परिवार में कटुता पैदा करनेवाली, खर्चीलीएवं लोभी रहती है। उसका चरित्र भी ठीक नहीं रहता। वस्त्रोद्योग में जातकधन कमाता है।

    7. तुला-तुला राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक कड़े परिश्रमके बावजूद भी लाभान्वित नहीं होता। वह पशु एवं वाहन आदि का शौकीनरहता है, भाग्यवादी होता है, प्रवास में उसे नुकसान होता है। उसके दूसरों केधन का वारिस बनने की संभावना रहती है। जातक कुशल वक्ता एवंव्यवहारकुशल रहता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक प्रवास  का शौकीन, ग्रामीण माहौल में रहना पसंद करनेवाला होता है। पशुपालन में उसकी रुचि रहती है, संतान सुख में बाधा रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक कामातुर,स्त्रीलंपट, उन्मादी, अभिमानी एवं दानी-धर्मी रहता है, माता-पिता के सुख मेंन्यूनता रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक को माता     का सुख कम प्राप्त होता है। आप्तजनों से संबंध मधुर नहीं होते। जन्म स्थानसे दूर रहना पड़ता है तथा राजभय रहता है। सरकारी नौकरी में जातक परभ्रष्टाचार का आरोप लगता है।

    11. कुंभ-कुंभ रशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक प्रवासी,नास्तिक, पाखंडी, धूर्त, अभिमानी, बुद्धिमान एवं सुंदर होता है। वह धैर्यवान,पराक्रमी भी रहता है, संतान सुख में बाधा रहती है। ज्येष्ठ पुत्र का अनिष्टहोता है। चोरी जैसी बुरी प्रवृत्ति में उसकी रुचि रहती है।

    12. मीनमीन राशि का मंगल व्यय स्थान में हो तो जातक कटुभाषी,अनैतिक कार्यों में हिस्सा लेनेवाला एवं कुशल वक्ता रहता है। वह प्रायः विदेशमें रहता है। जातक को जीवन में सुख प्राप्त नहीं होता है, वसीयत में संपत्तिमिलती है। हत्या या आत्महत्या के कारण उसकी मृत्यु होती है।

1. सुबह शहद व गुड़ से मुंह मीठा करें। 
2. चाबल पानी में बहावे।
3.सूर्य भगवान को दूध से अर्ध देवें।
मंगल का राशिगत फल 

जनन्‍मराशि में: शत्रुभय, रोगभय, रक्‍तविकार, उष्णता के विकार, क्रोध वुच्छचि, अग्नि, शस्त्र एजं लिषभय , जख्म , विघध्न-बा धाएं, निराशा। 

ज्न्सराशि में दूसरा: धन हानि, व्यय वृद्धि, राजदरबार या कोर्ट-कचहरी को कामों के लिए प्रतिकूल, भयकारक, पित्तविकार से कष्ट, अग्निभय, द्वेष, झगड़े, अपयश। 

जनन्‍मसराशि से तीसरा: आर्थिक लाभ, मान, अधिकार प्राप्ति, यश, समाधान, जिजय, उत्साह प्राप्ति, सहकारी एवं संबंधित लोगों का सहयोग प्राप्त होना, नौकर-चाकरों का सहयोग। 

जन्सराशि से चआचौोथा: शत्रु वृद्धि, शत्रुभय, ज्जर, उदर रोग, गुह्य रोग, रक्‍्तस््राव, स्वास्थ्य शिथिलता , पथ भ्रष्ट होना, दुष्ट एवं अनचाहे व्यक्तियों की कसंगति से नुकसान एवं विध्न-बाधाएं। 

जन्मसराशि से पांचयां: संतति विषयक समस्या, बीमारी, कष्ट, शारीरिक क्लेश, शत्रुभय , व्यय वृद्धि, आर्थिक परेशानी। 

जन्मराशि से स्छठा: निड्रता, शत्रु पराजय, आर्थिक लाभ, आर्थिक स्थिति में सुधार, सुख-समाधान, सभी कार्यों में सफलता, मान-प्रतिष्ठा में व॒द्धि। 

जन्मराशि स्ते सातयां: लैजवाहिक जीवन में मतभिननता, लड़ाई-झंगड़े, वाद-विवाद, वैवाहिक सुरब में विघध्न-बाध्वा, पत्नी से मनमुटाव, नेत्र एवं उदर रोग से कष्ट। 

ज्न्मराशि से आउठयां: मसानहानि, सानस्सिक कष्ट, धननाश, अपच, शस्त्राघात, 'रक्‍्तज्िकार , ज्ञवर एवं जिष भय , व्यय लृच्धि, नुकस्तान। * 
जन्मराशि से नौवां: शारीरिक कष्ट, मानसिक अस्वस्थता, अपयश, बड़े लोगों से परेशानी। 

जन्मराशि से दसवां: शत्रु से कष्ट, नौकरी में तबादला, गहन प्रयासों से यश आदि फल कई पूर्वाचार्यों ने बताए हैं। किंतु कई अन्य महर्षियों की राय में दशम स्थान के गोचर मंगल भ्रमण के फल अच्छे भी प्राप्त होते हैं। अधूरे काम पूरे होते हैं। 

जन्मराशि से ग्यारहवां: विजय प्राप्ति, अनेक मार्गों से धन प्राप्ति, आकस्मिक लाभ, आर्थिक स्थिति में सुधार, आनंद-विलास, सुखोपभोग, शारीरिक, मानसिक एवं पारिवारिक सुख-समाधान, भूमि लाभ, आवास की समस्या का हल, मानप्रतिष्ठा में वृद्धि। 

जन्मराशि से बारहवां: स्वयं को बीमारी का कष्ट, पत्नी की बीमारी, आकस्मिक समस्याएं एवं खर्च, झूठे आरोप लगना, नेत्र पीड़ा, पत्नी एवं अन्य स्त्रियों से परेशानी, वैवाहिक जीवन में कटुता एवं वैवाहिक सुख न मिलना। 

मंगल के दान  9 का अंक के हिसाब से देवे 

ताम्बा, गुलाब जामुन, सिकी हुई मिठाई, गुलाल,लाल रंग के पुष्प, टमाटर, सिन्दूर, मूंगा, त्रिकोण वस्तुवे, आतिश बाज़ी , अग्नि की वस्तुवे, क़ुमकुम, शहद , मसूर दाल , खजूर , मिठाई सिका हुवा मावा रबड़ी बेसन के लड्डू पकोड़े ,समोसे, तिकोण पुरिया बिंगो, पेटीज़, सैंडविच, मालपुवे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए। इसके अलावा योग्य ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को गेहूं, गुड़, माचिस,लाइटर, गैस, चूल्हा, ताम्बा, स्वर्ण, दुधारू गौ, मसूर की दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्ठान्न एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है। 

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