प्रकरण ६ - विविध कालवाचक संज्ञाएँ तथा विशेष योग
प्रकरण ६ - विविध कालवाचक संज्ञाएँ तथा विशेष योग.
प्रातः संगवादि काल - दिनमान के पांच भाग करनेपर जो कालावधि आता है उसमें सूर्योदय का समय मिलानेपर १) प्रातःकाल २) संगवकाल ३) मध्याह्नकाल ४) अपराह्नकाल एवं ५)सायाह्नकाल एस कुल पाँच काल प्राप्त होते हैं।
श्वाद
प्रदोषकाल - सूर्यास्त के पश्चात् ३ मुहूर्त (६ घटी) की कालावधि को प्रदोषकाल कहते हैं।वह सामान्यतः २ घंटे २४ मिनट का होता हैं।
निशीथकाल - रात्रिमान के ८ वें मुहूर्त को निशीथकाल कहते हैं।
उष:काल - सूर्योदय के पूर्व ५ घटी (सामान्यतः २ घंटे) होता हैं।
अरुणोदय - सूर्योदय के पूर्व ३ घटी (सामान्यतः १ घंटा १२ मि.) का होता हैं।
दिनमान - सूर्योदय से सूर्यास्त तक की कालावधि को दिनमान कहते हैं।
रात्रिमान- सूर्यास्त से दूसरे दिन के सूर्योदय तक की कालावधि को रात्रिमान कहते हैं।
मुहूर्त - दिनमान तथा रात्रिमान के १५ वें भाग को मुहूर्त कहा जाता हैं। यह सामान्यतः ४८मिनटों का होता हैं। (एक मुहूर्त = ४८ मिनट)
घटी - दिनमान तथा रात्रिमान के ३० वें भाग को घटी कहते हैं। यह सामान्यतः २४ मिनट
की कालावधि होती हैं। (एक घटी = २४ मिनट)
प्रहर - दिनमान तथा रात्रिमान के चौथे भाग को प्रहर कहते हैं। यह सामान्यतः ३ घंटे की
कालावधि होती हैं। (एक प्रहर ३ घंटे)
पूर्वार्ध / पूर्वाह्न - दिनमान के दो भाग करनेपर जो कालावधि आता हैं उसे सूर्योदय में मिलानेपर जो कालावधि प्राप्त होती हैं उसे पूर्वार्ध / पूर्वाह्न कहते हैं। (अन्य मतानुसार दिनमान के तीन भाग कर के उसमें से एक भाग सूर्योदय में मिलानेपर जो कालावधि प्राप्त होती हैं उसे कुछ पूर्वार्ध / पूर्वाह्न कहा जाता हैं।)
उत्तरार्ध / उत्तराह्न - पूर्वार्ध / पूर्वाह्न समाप्ति से सूर्यास्त तक की कालावधि को उत्तरार्ध /
उत्तराह्न कहते हैं।
युग्मतिथि - अमावस्या/प्रतिपदा, द्वितीया/तृतीया, चतुर्थी/पंचमी, षष्ठी/सप्तमी, अष्टमी/नवमी, एकादशी/द्वादशी, त्रयोदशी/चतुर्दशी, पूर्णिमा/प्रतिपदा (तथा इसी तरह से कृष्णपक्ष में)
कल्पादि / युगादि / मन्वादि - शुक्ल पक्ष में १३, १४, १५ घटी तथा कृष्णपक्ष में १६, १७,१८ घटी इस कालावधि में उक्त तिथि हो तब कल्पादि / युगादि / मन्वादि का निर्णय करना चाहिए।
पूर्णिमांत और अमांतमास भारत में नर्मदा नदी के दक्षिण की ओर के प्रदेशों में अमांत
मास पद्धति प्रचलित है और उत्तर की ओर के प्रदेशों में पूर्णिमांत मास पद्धति प्रचलित हैं।
अमांत मास पद्धतिनुसार अमावस्या के दिन मास की समाप्ति मानी जाती है एवं पूर्णिमांत
पद्धतिनुसार पूर्णिमा के दिन मास की समाप्ति मानी जाती है।
पूर्णिमांत पद्धति के अनुसार मास का कृष्ण पक्ष पहले आता हैं, पश्चात् शुक्ल पक्ष आरंभ हो कर पूर्णिमा के दिन मास की समाप्ति
होती हैं। अमांत पद्धति के अनुसार मास का प्रारंभ शुक्ल पक्ष से होता हैं, पश्चात् कृष्ण पक्ष में अमावस्या के दिन मास की समाप्ति होती हैं।
भारतीय सौर मास- ग्रेगरियन (अंग्रेजी) कॅलेंडर की तरह ३६५ दिनों के सौर वर्षमान जैसा भारतीय कॅलेंडर हो इस उद्देश्य से भारत सरकार की वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद ने इ.स. १९५२ में कॅलेंडर रिफॉर्म कमिटी स्थापन कर, वसंत संपात दिन से अर्थात् २२ मार्च से वर्षारंभ करने निर्णय लिया। लीपवर्ष होनेपर २१ मार्च के दिन वर्षारंभ करने का निर्णय लिया। भारतीय वर्षारंभ तथा उनके निश्चित किए गए अंग्रेजी दिनांक इस प्रकार - चैत्र मासारंभ - २२ मार्च (लीप वर्ष के समय २१ मार्च), वैशाख २१ अप्रैल, ज्येष्ठ - २२ मई, आषाढ़ - २२ जून, श्रावण - २३ जुलाई, भाद्र २३ अगस्त, आश्विन २३ सितंबर, कार्तिक - २३ अक्तूबर, अग्रहायण- २२ नवंबर, पौष - २२ दिसंबर, माघ- २१ जनवरी, फाल्गुन २० फरवरी। वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्र
तथा लीप वर्ष के समय चैत्र यह मास ३१ दिनों के तथा उर्वरित मास ३० दिनों के होते हैं।
साठ संवत्सरों का चक्र - पंचांग के मुखपृष्ठपर शक अथवा संवत् वर्ष की संख्या तथा संवत्सर (संवत्सर अर्थात् वर्ष) का नाम लिखा हुआ होता हैं। शक १५६४ में सोमदैवज्ञ नामक ज्योतिषी हुए। उन्होंने मेदिनीय ज्योतिषपर कल्पलता नामक ग्रंथ लिखा हैं। उसमें उन्हों ने ६० वर्षों का एक चक्र मानकर प्रत्येक संवत्सर को एक विशेष तथा सार्थक नाम दिया हैं। उस वर्ष
का सामान्य भविष्य उस नाम के अनुसार होता हैं। शालिवाहन शक, विक्रम संवत्, गुजराती संवत्, मारवाड़ीय संवत् इन सभी कालमापन पद्धतियों में संवत्सरों के लिए इन्ही ६० नामों को क्रमशः लिया जाता है। किसी भी शक-संवत्सर का नाम निश्चित करने की सुलभ पद्धति इस प्रकार है. - शक की संख्या में १२ मिलाकर उसे ६० से भाग देना चाहिए, जो संख्या शेष रहे उस
क्रमांक का नाम उस संवत्सर को दिया जाता हैं। शेष ० रहनेपर ६०वें संवत्सर का नाम दिया। जाता हैं। उदाहरण- १९०८ में १२ मिलानेपर १९२० संख्या प्राप्त हुई, इसे ६० से भाग पर शेष ० रहता है। अतः ६० वें संवत्सर का नाम शक १९०८ के लिए क्षय नाम सार्थक हुआ। उसी प्रकार विक्रम संवत् वर्ष में ९ मिलाकर ६० से भाग देनेपर जो रहता हैं वह नाम संवत् को दिया जाता हैं। यह ६० वर्षों का चक्र पृथ्वीपर होनेवाली अनेक घटनाओं के आवर्तन से संबंधित
हैं। कुछ लोग गलती से यह समझते है कि ६० वर्षों पश्चात् वही पंचांग फिर से आता हैं। लेकिन वास्तव में साठ वर्ष पश्चात् फिर से संवत्सर का नाम वही आता हैं, पंचांग नहीं। प्रत्येक वर्ष के लिए पंचांग का गणित स्वतंत्र रूप से करना पड़ता हैं।
साठ संवत्सरों के नाम - १) प्रभव २) विभव ३) शुक्ल ४) प्रमोद ५) प्रजापति ६) अंगिरा
७) श्रीमुख ८) भाव ९) युव १०) धातृ ११) ईश्वर १२) बहुधान्य १३) प्रमाथी १४) विक्रम
१५) वृष १६) चित्रभानु १७) सुभानु १८) तारण १९) पार्थिव २०) व्यय २१) सर्वजित् २२) सर्वधारी २३) विरोधी २४) विकृति २५) खर २६) नंदन २७) विजय २८) जय २९) मन्मथ ३०) दुर्मुख ३१) हेमलंबी ३२) विलंबी ३३) विकारी ३४) शार्वरी ३५) प्लव ३६) शुभकृत् ३७) शोभन ३८) क्रोधी ३९) विश्वावसु ४०) पराभव ४१) प्लवंग ४२) कीलक ४३) सौम्य ४४) साधारण ४५) विरोधकृत् ४६) परिधावी ४७) प्रमादी ४८) आनंद ४९) राक्षस ५०) अनल ५१)
पिंगल ५२) कालयुक्त ५३) सिद्धार्थी ५४) रौद्र ५५) दुर्मति ५६) दुंदुभि ५७) रुधिरोद्गारी ५८) रक्ताक्षि ५९) क्रोधन ६०) क्षय
रवि (सूर्य) संक्रमण
रवि (सूर्य) संक्रमण पुण्यकाल के नियम निम्नलिखित हैं- सूर्यास्त के पश्चात् संक्रमण
पुण्यकाल नहीं लिया जाता है।
मेष संक्रमण
१) यह संक्रमण यदि दिन में हो तो, पहले के एवं बाद के ४/४ घंटे पुण्यकाल
२) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, पूर्वदिन (उसी दिन) का उत्तरार्ध पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन के पूर्वार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
वृषभ संक्रमण
१) यह संक्रमण यदि दिन में हो तो, संक्रमण के पूर्व ६ घंटे २४ मिनट
पुण्यकाल
२) सूर्योदय के पश्चात् ४८ मिनट के भीतर संक्रमण हो तो संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व यदि संक्रमण हो गया तो, उस दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद यदि संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, पूर्वदिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
मिथुन संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
२) सूर्यास्त के पहले ४८ मिनट में संक्रमण हो तो, संक्रमण के पूर्व ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पहले संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, पूर्वदिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
कर्क संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के पूर्व के १२ घंटे पुण्यकाल
२) मध्यरात्रि के पूर्व में हो तो, उसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के बाद हो तो, उसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पुण्यकाल
४) सूर्योदय के पश्चात् ४८ मिनट में संक्रमण हो तो, संक्रमण से सूर्यास्त तक पुण्यकाल
५) सूर्योदय के पूर्व ७२ मिनट में संक्रमण हो तो, दूसरे दिन के सूर्योदय से सूर्यास्त तक
पुण्यकाल
सिंह संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के पूर्व के ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
२) सूर्योदय के बाद ४८ मिनट में हो तो, संक्रमण के पश्चात् ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, पूर्व दिन का उत्तरार्ध औरपर दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
कन्या संक्रमण
१) यह संक्रमण यदि दिन में हो तो, संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
२) सूर्यास्त के पूर्व ४८ मिनटों में संक्रमण हो तो, संक्रमण के पूर्व ६ घंटे २४ मिनट पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, पहले के दिन का उत्तरार्ध औरपर दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
तुला संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, पूर्व के और बाद के ४/४ घंटे पुण्यकाल
२) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
वृश्चिक संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के पूर्व के ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
२) सूर्योदय के बाद ४८ मिनट के भीतर संक्रमण हो तो, संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हुआ तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, पूर्वदिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
धनु संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
२) सूर्यास्त के पूर्व ४८ मि. के भीतर संक्रमण हो तो, संक्रमण के पूर्व ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, उसी दिन उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
मकर संक्रमण
१) दिन में संक्रमण हो तो, संक्रमण के बाद ८ घंटे पुण्यकाल
२) मध्यरात्रि के पूर्व या बाद में संक्रमण हो तो, दूसरे दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पुण्यकाल
३) सूर्यास्त के पूर्व ४८ मिनट में संक्रमण हो तो, दिनार्ध से संक्रमण तक पुण्यकाल
कुंभ संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के पूर्व ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
२) सूर्योदय के बाद ४८ मि. के भीतर संक्रमण हो तो, संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, पूर्व दिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
मीन संक्रमण
१) यह संक्रमण दिन में हो तो, संक्रमण के बाद ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
२) सूर्यास्त के पूर्व ४८ मि. के भीतर संक्रमण हो तो, संक्रमण के पूर्व ६ घंटे २४ मि. पुण्यकाल
३) मध्यरात्रि के पूर्व संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध पुण्यकाल
४) मध्यरात्रि के बाद संक्रमण हो तो, दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
५) मध्यरात्रि में संक्रमण हो तो, उसी दिन का उत्तरार्ध और दूसरे दिन का पूर्वार्ध पुण्यकाल
===============
विशेष योग
गुरुपुष्यामृत गुरुवार के दिन पुष्य नक्षत्र होनेपर यह योग होता है। यह शुभयोग होकर इस दिनसुवर्ण खरीदी का विशेष महत्त्व है। सभी प्रकार के व्यावहारिक कार्य हेतु यह योग शुभ माना जाता है। यह योग वर्ष में ३ - ४ बार आता है। यह योग विवाह के लिए वर्ज्य है।
कार्तिक स्वामी दर्शन - कार्तिक पूर्णिमा और कृत्तिका नक्षत्र साथ होनेपर कार्तिकस्वामी दर्शन का योग होता है। सामान्यतः जिस वर्ष अधिक मास आता है, उस वर्ष कार्तिक मास में यह योग आता है।
अर्धोंदय - महोदय - माघ कृष्ण अमावस्या (अमांत पीष अमावस्या), रविवार, व्यतीपात तथाश्रवण नक्षत्र साथ होनेपर अर्धोदय योग बनता है। अमावस्या तथा उपरोक्त योगों में से एक योग कमहोनेपर महोदय योग बनता है। इस योगपर दान का विशेष फल प्राप्त होता है।
वारूणी योग - चैत्र कृष्ण त्रयोदशी (अमांत फाल्गुन कृष्ण प्रयोदशी) और शततारका नक्षत्र केसंयोग से वारूणी योग बनता है। कृष्ण त्रयोदशी, शततारका और शनिवार के संयोग से महावारूणीयोग बनता है। इनके साथ शुभ योग होनेपर महामहावारूणी योग बनता है। इस योगपर स्नान, वरुणदेवता का पूजन और दान देना पुण्यकारक है।
कपिलाषषठी योग - आश्विन कृ. षष्ठी (अमांत भाद्रपद कृ. षषी), हस्त नक्षत्र में सूर्य, रोहिणीनक्षत्र में चंद्र, मंगलवार और व्यतीपात योग का संयोग होनेपर कपिलाषष्ठी योग बनता है। यह योगसूर्यपर्व होने से दिन में होता है। इस योगपर सूर्य पूजन, हवन, दान करना महापुण्यकारक है।
गजच्छाया योग - आश्विन अमावस्या (अमांत भाद्रपद अमावस्या) और हस्त नक्षत्र में सूर्य औरचंद्र दोनों होनेपर गजच्छाया योग होता है। इस योगपर स्नान करना, दान देना पुण्यकारक है।
सोमवति अमावस्या - अमावस्या और सोमवार के संयोग से सोमवति अमावस्या योग होता हैl इस योगपर तीर्थस्नान, अश्वत्थ पूजन तथा विष्णु पूजन करते हैं।
कन्यागत-कन्या राशि में गुरु हो तो कृष्णा नदी में स्नान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस कालावधि में कृष्णा नदी तट के तीर्थक्षे्ों मं स्नान, दान, श्राद्धादि कर्म किये जाते हैं।
कुंभ मेला - देव - दानवों ने समुद्र मंथन किया तब समुद्र से अन्य रत्नों के साथ अमृतकुंभ भी प्रकट हुआ। अमृतकुंभ को स्वर्ग पहुँचाने का दायित्व इंद्र के पुत्र जयंत को सींपा गया। सूर्य, चंद्र व गुरु उसकी सहायता कर रहे थे। अमृतकुंभ को स्वर्ग ले जाते समय दैत्यों ने उसे पाने के लिए चार बार युद्ध किया। इन चारों समय देवों ने अमृतकुंभ को पृथ्वीपर रखकर दैत्यों का प्रतिकार किया। पृथ्वीपर जिन - जिन स्थानोंपर देवों ने अमृतकुंभ रखा, उन चारों स्थानोंपर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार, प्रयाग, त्यंबकेश्वर (नासिक) और उज्जैन ये वे चार पवित्र स्थान हैं। इनस्थानोंपर कुंभ रखते समय जिन राशियों में गुरु का भ्रमण था, उन राशियों में जब गुरु का भ्रमणसमय आता है तब उस स्थान में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। १) हरिद्वार -कुंभ राशि में गुरु २) प्रयागराज - वृषभ राशि में गुरु ३) त्र्यंबकेश्वर (नासिक) - सिंह राशि में गुरु ४) उज्जैन - गुरु सिंह राशि में रहते हुए मेष राशि में सूर्य, तुला राशि में चंद्र तथा वैशाख पूर्णिमा के संयोगपर उज्जैनमें कुंभ मेले का आयोजन किया जाता हैं।
धनुर्मास - सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के पश्चात् धनुर्मास का आरंभ होता है। भोगी के दिन अर्थात्म कर संक्रांति के एक दिन पूर्व धनुर्मास की समाप्ति होती है। इसे धुंधरमास भी कहा जाता है।
दशावतार जयंती :- मस्त्य जयंती चैत्र शु. ३ (अपराह्कालव्यापिनी तिथि के दिन), कूर्म जयंतीदैशाख शु. १५ (सायंकालव्यापिनी तिथि के दिन), वराह जयंती भाद्रपद शु. ३ (अपराह्कालव्यापिनीतिथि के दिन), नृसिंह जयंती वैशाख शु. १४ (सायंकालव्यापिनी तिथि के दिन), वामन ज्यंती भाद्रपदशु. १२ (मध्याह्कालव्यापिनी तिथि के दिन), श्रीराम नवमी चैत्र शु. ९(अपराह्वकालव्यापिनी तिथिके दिन), परशुराम जयंती वैशाख शु. ३(प्रदोषकालव्यापिनी तिथि के दिन), श्रीकृष्ण जर्यती श्रावणशु.८(निशीथकालव्यापिनी तिथि के दिन), कल्कि जयंती श्रावण शु. ६ (सायाह्कालव्यापिनी तिथिके दिन), बौद्ध जयंती आश्विन शु. १० (सायाह्कालव्यापिनी तिथि के दिन)
कल्पादि, युगादि, मन्वादि-कल्पादि, युगादि, मन्वादि के दिन किये जानेवाले श्राद्ध का विशेषफल मिलता है। संपूर्ण वर्ष में आनेवाले कल्पादि, युगादि, मन्वादि योग तथा उनके नाम इस प्रकार-कल्पादि - चैत्र शु.१ (श्वेतवाराह), चैत्र शु.५ (उदान), वैशाख शु.३ (नील लोहित), कार्तिक शु.७(कंदपो), मार्गशीर्ष शु.९ (सद्योजात), माघ शु.९३ (व्यान), फाल्गुन कृ.३ (वैराज) युगादि - वैशाखशु.३(कृत), भाद्रपद कृ.१३ (कलि), कार्तिक शु.९ (त्रेता), माघ कृ.३० (द्वापर) मन्वादि - चैत्र शु.३(उत्तम), चैत्र शु.१५ (रौच सावर्णि), ज्येष्ठ शु.१५ (भौच्च सावर्णि), आषाढ़ शु.१० (चाक्षुष), आषाढ़शु.१५ (दक्ष सावर्णि), श्रावण कृ.८ (सूर्य सावर्णि), भाद्रपद शु.३ (तामस), आश्विन शु.९ (स्वारोचिष),कार्तिक शु.१२ (स्वायंभुव), कार्तिक शु.१५ (धर्म सावर्णि), पौष शु.१९ (रैवत), माघ शु.७ (वैवस्वत),फाल्गुन शु.१५ (ब्रह्म सावर्णि), फाल्गुन कृ.३० (रुद्र सावर्णि)