सूर्य-खण्ड सारगर्भित विवेचन व्याख्या

 

रवि- विचार
सूर्य

रवि- विचार
सूर्य आत्मा जगतस्तथुषश्च ।। ऋग्वेद ११८/७
ज्योतिषां रविरंशुमान् । । गीता १०-२१।।
पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा करने के लिए ३६५ दिन १४ घटि २० पल इतना समय लगता है ऐसा पश्चिम के लोग कहते
हैं। हमारे प्राचीन सिद्धान्तकर्ता तथा करणग्रंथकर्ता ३६५ दिन १५ घटी ३१ पल ३१ विपल इतना समय कहते हैं। आधुनिक सुधारवादी ३६५ दिन १५ घटि २३ पल इतना समय कहते हैं। पृथ्वी सूर्य कीपरिक्रमा करती है उसी समय सूर्य खुद की परिक्रमा करता है। उसके प्रत्येक चक्कर को २३ घंटे ५६ मिनट ४ सेकंड इतना समयलगता है। सूर्य सब ग्रहों से करोड़ों मील दूर है तथापि वही सब ग्रहों का तथा पृथ्वी का पोषक है। वह बीजोत्पादक, बीजरोपक तथा बीजसंवर्धक है इसीलिए सूर्य को ज्योतिषशास्त्र में जगत्पिता ऐसा नाम दिया गया है। हमारे वेदांतशास्त्र में आत्मा को सूर्य ही कहा गया है। स्थावर
जंगमात्मक पूरे चराचर जगत का आत्मा सूर्य है। वैदिक काल में आर्यों ने सूर्य का महत्व समझा था। वे मानते थे कि वही सारे जगत् का निर्माण कर्ता-विधाता है। सूर्य की स्थिति दो प्रकार की है। एक भासमान और दूसरी अदृश्य होकर भासमान न होनेवाली। पहली भासमान होनेवाली स्थिति यह है कि दिन भर वह हमारी आखों से दीखता है। उसकी धूप का ताप जान पड़ता है और उसका प्रकाश भी हम देखते हैं। सुर्थ से अपने को जो ऊण्णता मिलती है वह “निगेटिव” है। 

सूर्थ का दूसरे प्रकार का तेज भासमान न होनेयाला किन्तु सारे स्थावर जंगमात्मक चराचर वस्तुओं मे समाया हुआ सर्वव्याथी है। यही तेज अत्थंत भहत्वपूर्ण है। 

इसी तेज का संशोधन करने के प्रयत्न आर्य लोगों ने वैदिक कात्व से जारी रखे है। आत्मविकास के बल पर इस तेज का दर्शन करने के लिए ज्ञानयोग, राजयोग, भक्तियोग, हठयोग इत्यादि अनेक योगमार्ग खोजकर उनको सिद्ध करने के लिए तपश्यर्या करनी चाहिए ऐसा कड़ा गया है। जिसे हम वेदांत में परत्रम्डह कडते हैं बल्ली यह तेज है। प्रत्यक्ष तेज से अप्रत्यक्ष विश्वशक्ति को प्रेरणा मिलती है। 

आकाश से एक प्रकार की किरणें पृथ्वी पर आंती हैं। ऐसा ग्रतीत होने पर पश्चिम के शास्त्रज्ञोनो इस विषय का गहराई से संशोधन किया। डॉ. हेस ने १९१० में प्रकाशित किया कि ये किरणें सूर्य की हैं और सीधे सूर्य से ही पृथ्वी पर आती है। किन्तु अमेरिका के ओेच्ठ खगोलवेत्ता नोबल प्राइझ विजेता डॉ. मिलिकन ने डेस के इस विधान का खण्डन करने का प्रयत्न किया। उनका कडना डै कि ये किरणें सूर्य से ही आती हछो तो ये सिर्फ दिन में दी आनी चाहिए। किन्तु वे तो रात को भी आती हैं। इसलिए उनकी उत्पत्ति सूर्य से न खोकर आकाशगंगा से ही होनी चाहिए। मेरे वियार से वेदान्त का लान ग छडोने के कारण ही डॉ. मिलिकन जैसे पाश्चात्य शास्त्रज्ञ इस प्रकार गलत दिशा को जाते हैं। अल व्छिडास नामक शास्त्रज्ञ ने अपने estoric astrology दस ग्रन्थ में सूर्य की इन अदश्य किरणों को साना कर के विशेष ऊहापोह किया है। सारांश रवि का तेज दो प्रकार का है। उत्पत्ति करना यह पहले तेज का कार्य है, और लय करना यह दूसरे तेज का कार्य है। पहले तेज के कारण जीव शरीर रूपं से जन्म लेकर वासना में-मायामोह में-अटकता है और दूसरे तेज के कारण वासना का क्षय होकर शांति-समाधान प्राप्त करके यही जीव आत्म स्वरूप में विलीन होता है। 

अति प्राचीन काल में पांचती सदी तक ऐसी कल्पना थी कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है। बाद में पांचवी सदी में बिहार प्रांत के आर्यभट्ट नामक पंचांगशास्त्रन्ञ ने आर्यसिद्धान्त नामक ग्रन्थ में लिखा कि प्रथ्वी सूर्य की परिक्रमा करता है। 

पश्चिम के देशों में भी १५-१६ वीं सदी तक अर्थात्‌ गैलिलियो के समय तक यही मत था कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है। गेलिलियो ने ही पहले बताया कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है। किन्तु ग्रीस के महान्‌ तत्ववेत्ता अफलातून और अरस्तू इस मत के प्रतिकूल थे इसलिए गेंलिलियो का प्राणघातक विरोध हुआ। लेकिन कालान्तर में उसी का तत्व जगत्‌ को मानना पड़ा। 

हमारे देश में गैलिलियो के एक हजार वर्ष पूर्व ही यह तत्व आर्यसिद्धान्तकर्ता ने प्रस्थापित किया था, यह हम भारतीयों के लिए अभिमान की बात है। 

सूर्य स्थिर होकर भी गतिमान्‌ है। सारी ग्रहमाला को वह एक सूत्र में नियमबद्ध गति से अपने चारों ओर घुमाता है और सारे ग्रहों को एक एक बार अपने तेज से अस्तंगत कर देता है। प्रकरण दुसरा ॥

 रवि का उच्च-नीचत्व है उदय के समय सब को सुख देनेवाला रवि मध्यान्ह में मस्तक पर आया कि अत्यंत असहनीय होने लगता है। वही बाद में अस्त के समय रम्य और सुखद होता है। अपने उदयास्त से प्रातः मध्यान्ह और सायंकाल अवस्थाएं प्रति दिन निर्माण करनेवाला रवि विभिन्न राशियों में प्रवास करते हुए सृष्टि में भी गर्मी, बरसात और सर्दी ऐसी तीन अवस्थाएं निर्माण करता है। वसंत ऋतु के समाप्त होते होते गरमी शुरू होती है। इस समय चैत्र-वैशाख में रवि मीन मे से मेष में आता है। इस समय पृथ्वी सूर्य के निकट जाती है इसीलिए रवि इतना तापदायी होता है। रवि मेष में अपने उच्च से नीचे वृषभ में आते समय उदार व दयाशील बनता है, मानों जगत को ताप देने का अपराध का विचार कर रहा हो। आगे मिथुन में अपने कृत्य का समर्थन करने लगता है। किंतु कर्कराशी में आने पर उसी को उसका पश्चात्ताप होता है उसके आँखों में पानी आता है, वही बरसात है। उसी प्रकार आगे वह अपने गृह सिंह राशी में प्रवेश करता है। उसकी मनोवृत्ति में परिवर्तन होता है। वह शांत और वैराग्यशील होता है। उसकी दृष्टि समता, इन्साफ और वेदान्त इन बातों पर झुकती है। इस समय वह कन्या राशि में होता है। पृथ्वी से दूरदूर जाता है। अब वह अपने नीच राशि में-तुला में आता है और धर्म से-न्याय से-समता वृद्धि से बरताव करने लगता है। इस समय सृष्टि भी वैभवसंपन्न होकर शान से झूलती है। नई शोभा से अलंकृत दीखती है। ऊपर के विवेचन का सारांश यह है कि रवि मेष राशि में तापदायी होता है और तुला राशि में कल्याणकारक और सुखदायी होता है। इसका तात्पर्य यह है कि रवि उच्च राशि में तापदायी और नीच राशि में हितकारक है और यही सिद्धांत अन्य ग्रहों के विषय में भी सत्य है, ऐसा मेरा अनुभव है। उच्च राशि में कोई भी ग्रह सुखदायी, कल्याणकारी नहीं होता। उच्च पद प्राप्त हुआ कि वह स्वभावतः नीचता की ओर झुकने लगता है। अति उच्च पद पर बड़ा आदमी भी बिगड़ जाता है, यही सत्य है। 


सूर्य को समस्त जीवों की आत्मा, सब ग्रहों का महा अधिष्ठाता तथा सर्वशक्तिमान कहा गया है। वह अपनी राशियों द्वारा पृथ्वी, स्वर्ग तथा अन्तरिक्ष सभी को व्याप्त रखता है। इसी कारण इसे समस्त-जगत, का पोषक, आत्मा तथा स्वामी माना गया है। इसे काल-पुरूष की आत्मा कहा गया हैं इसके वर्ण, रूप, दिशा, प्रकृति, सत्वादि के विषय में निम्नानुसार समझना चाहिए।
मधुपिंगलदृकू. सूर्यश्चतुरस्र: . शुचिद्धिज। पित्त प्रकृतिको श्रीमान्पुमानल्पकचो द्विजा सूर्य मधु (शहद) के समान पीले नेत्रों वाला, चोकोर देह वाला, स्वच्छ कान्ति और पित्त प्रकृति वाला, थोडे बालों से युक्त दर्शनीय पुरुष ग्रह है। सूर्य सोरमण्डल का सर्वाधिक बली ग्रह है। इसे ग्रहों का राजा भी कहते 
हैं। रवि, हेली, भास्कर, विकर्तन, अहस्कर, तपन, पूषा, नभेश्वर, मार्तण्ड, दिवाकर, प्रभाकर, अर्क, अरुण, चित्ररथ आदि इसके पर्याय नाम हैं। यह कालपुरुष की आत्मा, पुरुष ग्रह, ग्रीष्म ऋतु का स्वामी, उत्तरायण में बलवान, पूर्व दिशा का स्वामी, तांबे के समान कालिमा लिए रक्‍त-श्याम वर्ण वाला, सत्त्वगुणी, क्षत्रियवर्णी, तैजस्तत्त्वी, पित्तप्रधान प्रकृति वाला क्रूर ग्रह है। इसका स्थान देवग्रह और देवता अग्नि है। 
सूर्य ग्रह शरीर का सुख, पिता का सुख, राजकार्य, बड़े भाई का सुख, वैद्यक विद्या, देव स्थान, स्वभाव, नीरोगता, लक्ष्मी का विचार, लाल वस्त्र, लाल चंदन, मूंगा, माणिक्य, केसर, मुंह, कमल, गाय, नवीन वस्त्र, अधिकारियों से मित्रता, राज विद्या, राज्य से मान-सम्मान की प्राप्ति, लोक मान्यता, प्रसिद्ध नेता, देश का क्रर्णधार, बड़ी संस्था का मुखिया, राजनीतिक शक्ति, वीरता, मन की शुद्धि, योग्यता, आत्मा, व्यर्थ का व्यय, स्वर्ण, वाहन, पदट्मराजमणि, सिंहासन, ताप्र, शौर्य, नेत्र चिकित्सा, बड़प्पन, सामर्थ्य, धेर्य, साहस, होम यज्ञ, कार्य में प्रवृत्त वर्णगाला का स्वर-अ, इ, उ, ए, ओ, ओ; मर्म स्थान, आधारभूत तथ्य, शक्ति, हृदय, हड्डी, राजा, पालक, महापुरुषु मध्यम आकार, भ्रमण वन स्थान, काष्ठ, यश, ऊन, अग्नि, प्रकाश, ज्ञान, खुला स्थान चौड़ाई, नारंगी रंग तथा पूरब दिशा का कारक ग्रह “सूर्य” है। 

सूर्य सब ग्रहों में सबसे बड़ा तो है ही महान्‌ और महत्त्वशाली ग्रह भी है। जिसकी जन्मकूंडली में यह बलवान होकर स्थित होता है, वो व्यक्ति बलवानू उच्च और धनाढ्य होता है। जिस दिशा को भी वो अपने आधिपत्य से दर्शाता है, उस दिशा में उसका फल सूर्य की दशा-मुक्ति में मिलता है। सूर्य जिस संबंधी आदि के भाव में स्थित होता है उसको अपने महान्‌ आकार के प्रताप से पीड़ित करता है और कुंडली वाले व्यक्ति को उस संबंधी से कलह करने पर बाधित कर देता हे। 

यदि सूर्य जन्मकुंडली के सातवें (सप्तम) भाव में स्थित हो तो व्यक्ति का उसकी स्त्री से और यदि स्त्री की कुंडली हुई तो स्त्री का अपने पति से कलह चलता रहता है ओर यदि सूर्य चतुर्थ भाव में स्थित हो तो माता से, पंचम भाव में पुत्र से कलह उत्पन्न करता है। सूर्य की दशा अथवा मुक्ति में व्यक्ति यह कलह अनुभव करता है। 

सूर्य हृदय और जीवनीशक्ति का कारक है। यह व्यक्ति में अहं भाव को उत्पन्न करता है। इससे प्राणीजन को ही नहीं, अन्य सभी ग्रहों को तेज मिलता है। 

पिता, पिता का पराक्रम, रोगों के प्रतिकार की शक्ति, मन की पवित्रता, रुचि, ज्ञान का उद्गम, क्षत्रियों के कर्म, माणिक्य, पर्वत, जंगल, लाल वस्त्र, हड्डी, युद्धस्‍ला आदि का कारक सूर्य हे। मेष राशि में सूर्य उच्च, सिंह राशि में मूल त्रिकोणी और तुला राशि में नीच होता है। चंद्र, मंगल, बृहस्पति इसके मित्र ग्रह, बुध सम ओर शुक्र, शनि शत्रु ग्रह हैं। अशुभ सूर्य के कारण नेत्र रोग, अस्थि रोग, ज्वर, क्षय, अतिसार, कुष्ठ, शरीर में दाह, पित्तजन्य रोग होते हैं तथा राजा, देव, ब्राह्मण और नौकरों से भय रहता हे। 
इसके प्रभाव से व्यक्ति उदार, सत्कर्मों की कामता करने बाला, अधिकार बाला, गरीबों पर दया करने बाला, परोपकारी होता है। इसके प्रभाव के कारण ही व्यक्ति  सर्वोच्च पद, महत्वकाक्षा, अधिकार की भावना, स्वाभिमानी, हुकुमत करने बाला, अपनी सामर्थ्य-शक्ति द्वारा ही उन्नती करने जाता, अपने ऊपर भरेसा रखते बाला, शुरत्रीर, चतुर, बलवान बुद्धिमान, राजकीय ठाठबाट बाला, स्पष्ट बक्ता, गंभीर तैजस्वी, परोपकारी, उदार हृदय, विरोधी को हराने बाला और बढ़िया आचरण वाला होता है। 

इसी प्रकार सूर्य के अशुभ प्रभाव से व्यक्ति घमंडी , अहंकार की भावता से ग्रस्त, अत्यंत अभिमानी, अपनी बढ़ाई स्वयं करते बाला, अधिकारियों की भांति बातें करने वाला, अधिकारों का दुरुपयोग करने वाला, निर्दवी तथा अतेक प्रकार के रोगों से पीड़ित होता है। 

यदि जन्म के समय सूर्य लग्न (प्रथम भाव) में हो तो व्यक्त आलसी, क्रोधी, प्रचंड, लंबा, घमंडी, शूर, क्रर, क्षमा न करने वाला होता है। उसकी आंखों में हर समय एक सूनापन-सा दिखाई देता है। 

सूर्य की धातु-सोना, उपधातु-तांबा, रत्न-माणिक, उपरल-लालडी, सूर्यमणि, धान्य-गेहूं, रस-गुड़, वस्त्र-लाल, पुष्प-रक्तकमल हे। कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरषाद़ा सूर्य के नक्षत्र हैं। जन्म इन नक्षत्रों में हो तो सूर्य की महादशा होती 

वैज्ञानिक परिचय - सूर्य आकाशगंगा का एक तारा है, जो पृथ्वी के अधिकनिकट होने से अन्य तारों की अपेक्षा हमें बड़ा दिखाई देता है। किन्तु कुछ तारों की तुलना में सूर्य बहुत छोटा भी है। उदाहरण के लिए-बीटेलजूज (BETELGEUSE) तारा सूर्य से 800 गुना बड़ा है और सूर्य पृथ्वी से कितना बड़ा है, इसका अनुमान इस वैज्ञानिक परिकल्पना से लगाया जा सकता है कि चार सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ने वाले विमान से यदि पृथ्वी की परिक्रमा करें तो कम से कम 4
दिन लग जाएंगे। पर इसी गति के यान से सूर्य की परिक्रमा करने में 450 दिन या
सवा वर्ष लगेगा।सूर्य का व्यास 1,400,000 कि.मी. है (यानी पृथ्वी के व्यास का 109
गुना) । इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से 28 गुना अधिक है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ कि.मी. है। हमारी आकाशगंगा के केन्द्र से सूर्य
लगभग 32,000 प्रकाशवर्ष दूर है (एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है,
उसे एक प्रकाशवर्ष कहते हैं और प्रकाश की गति प्रति सेकंड 3 लाख 86 हजार
कि.मी. है)। सूर्य 250 कि.मी. प्रति सेकंड की औसत गति से मंदाकिनी/आकाशगंगा
के केन्द्र के चारों ओर चक्कर काटता है। एक चक्कर काटने में सूर्य को 22.5 करोड़
वर्ष लगते हैं (यह अवधि ब्रह्मांड वर्ष कहलाती है)।
• सूर्य पृथ्वी की भांति अपने अक्ष/धुरी (AXIS) पर भी घूमता है। सूर्य क्योंकि
गैस का बना है (जलती हुई वायुओं का विराट पिंड है) । अतः वह विभिन्न
अक्षांशों पर विभिन्न गति से घूम सकता है। ध्रुवों पर उसके घूमने की अवधि प्रायः
24 से 26 दिन मानी गई है और भूमध्य रेखा पर 34 से 37 दिन। सूर्य चमकती
गैसों/धधकती वायुओं का एक महापिंड है। इसे आग का विराट गोला या विशाल
हाइड्रोजन बम भी कह सकते हैं।
क्योंकि इसमें हीलियम और हाइड्रोजन का अकूत/विशाल भंडार है और
नाभिकीय संगलन (NUCLEAR FUSION) द्वारा सतत् अत्यधिक ऊष्मा व प्रकाश
पैदा होता रहता है। सूर्य की बाह्य सतह (PHOTOSPHERE) का तापमान लगभग
6000° सेल्सियस है किन्तु केन्द्र में यह तापमान 15,000,000° सेल्सियस से भी
अधिक हो जाता है। सूर्य की सतह का द्रव्य (लिक्विड गैस) अपनी हवा जितना
पतला है, सूर्य के भीतर जाने पर यही द्रव्य उत्तरोत्तर गाढ़ा होता जाता है। सूर्य-
त्रिज्या के आधे भाग पर आए हुए द्रव्य का घनत्व पानी जितना गाढ़ा होता है और
सूर्य के केन्द्र भाग में इस द्रव्य का घनत्व पानी के घनत्व से 75 गुना, सीसे के
घनत्व से 11 गुना तथा पृथ्वी की सर्वाधिक भारी धातु 'ओसमियम' के घनत्व से
साढ़े तीन गुना होता है।
इस सर्वेक्षण से पाठक इस भ्रम में न पड़ें कि सूर्य का केन्द्र भाग 'ओसमियम'
जैसी भारी धातुओं से बना है। सूर्य तो गैसीय पिंड है। परन्तु सूर्य के केन्द्र भाग में
होनेवाला दबाव अपनी हवा (AIR) के दबाव से 100 गुना है और सरलता से कहा
जाए तो यह दबाव प्रति वर्ग सेंटीमीटर 8 करोड़ टन है। इस दबाव के अतिरिक्त
प्रकाश का दबाव भी सूर्य के गर्भ में कार्य करता है जो प्रति वर्ग सेंटीमीटर 20 लाख
टन होता है। अत: तरल गैस/द्रव्य घनत्व बहुत ही अधिक बढ़ जाता है। सूर्य की सतह पर 'फोटोस्फीयर' से जो लपटें निकलती हैं उन्हें सौर
ज्वालाएं (SOLAR PROMINENCES) कहते हैं। ये लगभग 1,000,000 कि.मी.
ऊंचाई तक उठती हैं (दो लाख किलोमीटर तक उठने वाली ज्वालाएं सामान्य मानी
गई हैं। 1946 में 16 लाख कि.मी. ऊंचाई तक उठने वाली ज्वाला वैज्ञानिकों द्वारा
रिकॉर्ड की गई अब तक की ज्वालाओं में सबसे ऊंची थी)। इनके अलावा प्रति
सेकंड 30 कि.मी. के वेग से लपकने (उठने) वाली छोटी-मोटी ज्वालाएं तो सूर्य
से निरन्तर निकलती ही रहती हैं। इन्हें ज्वालाएं न कहकर जिह्वाएं कहते हैं।
सूर्य की सतह पर काले धब्बे भी हैं। ये अपेक्षाकृत ठंडे होने से प्रकाशहीन
या काले नज़र आते हैं। पर ये 'ठंडे' धब्बे भी 4000 से 5000° सेल्सियस तापमान
वाले होते हैं। इनमें कुछ धब्बे हमारी पृथ्वी से भी बड़े हैं। ये धब्बे सूर्य के
चुम्बकीय क्षेत्र के कारण उत्पन्न होते हैं। यदि ये अधिक समय तक रह जाते हैं तो
सूर्य में सौर-विस्फोट होने लगते हैं, जिससे ज्वालाओं व जिह्वाओं के स्थान पर
अग्नि मशालें लपकने (उठने लगती हैं। इसे सूर्य के क्रोध का प्रतीक माना जाता
है। इससे अयनमंडल में उथल-पुथल हो जाती है और पृथ्वी पर रेडियो संचार में
बाधाएं पड़ती हैं।
सूर्य से आकाश की ओर बह जाने वाली वायु को सूर्य प्रवात कहते हैं। इस
प्रवात के कारण पृथ्वी के चारों ओर जो वातावरण बनता है उसे वानएलन पट
कहा जाता है। पृथ्वी से 10,000 कि.मी. दूर से यह आरम्भ होता है। यह संहारक
शक्ति वाला होता है। मनुष्य की अंतरिक्ष यात्रा के लिए यह अति खतरनाक माना
गया है।
सूर्य के केन्द्रीय भाग का उष्णता मान डेढ़ से दो करोड़ अंश सेन्टीग्रेड है। यह
हम जान ही चुके हैं। इस उष्णता मान का अनुमान पाठक सहजता से कर पाएं
इसके लिए एक वैज्ञानिक परिकल्पना प्रस्तुत है। जैसा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि
यदि ऑलपिन की नोक पर इतना अधिक उष्णता मान धारण करा दें तो ऑलपिन
के चारों ओर के 160 कि.मी. क्षेत्र की सभी वस्तुएं जलकर खाक हो जाएंगी।
परमाणु भंजन (न्यूक्लियर फ्यूजन) की जो प्रक्रिया सूर्य में सतत् चलती है,
उससे प्रचंड शक्ति उत्पन्न होती है। सूर्य से उत्पन्न होकर आकाश में बह जाने
वाली ऊर्जा का मात्र दो अरबवां भाग पृथ्वी के हिस्से में आता है। शक्ति उत्पन्न
करने के लिए सूर्य प्रति सेकंड 5640 लाख टन द्रव्य का 5600 लाख टन हीलियम
में रूपांतरण करता है। सूर्य का शेष 40 लाख टन द्रव्य ही शक्ति के रूप में
परिवर्तित होता है। फिर भी प्रति सेकंड 40 लाख टन द्रव्य खो देने वाले सूर्य में उस
द्रव्य का भंडार कितना होगा या सूर्य की आयु कितनी होगी ? इस संदर्भ में
वैज्ञानिकों का कहना है कि सात अरब वर्षों से निरंतर प्रकाशित सूर्य अब भी 40- 50 अरब वर्षो तक की आयु भोगने वाला है (द्रव्य का इतना अकूत भंडार सूर्य मे मौजूद है) । चन्द्रमा से सूर्य का प्रकाश 4 लाख गुना तेजस्वी है (यद्यपि चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है) और आकाश में नंगी आंखों से दीखने.वाले सबसे चमकीले तारों की तुलना में सूर्य की चमक 120 अरब गुना अधिक है। यह है सूर्य का वैज्ञानिक परिचय। उस पर तुर्रा यह कि सूर्य मंदाकिनी विश्व के तारों में एक अति सामान्य तारा है। क्योंकि सूर्य से लाखों-करोड़ों गुना तेजस्वी तारे मंदाकिनी विश्व में मौजूद हैं। अपने तारा विश्व का सबसे बड़ा तारा सूर्य से 50 करोड़ गुना बड़ा है। | दिमाग को चकरा देने वाले इन वैज्ञानिक तथ्यों में से अधिकांश वेदों में पूर्व वर्णित हैं, यह और भी आश्चर्य कौ बात है। परन्तु यहां हम इस तुलना एवं विवेचन में न पड़ते हुए सूर्य के ज्योतिषीय परिचय की ओर बढ़ेंगे, जिसमें धार्मिक व पौराणिक संदर्भ भी शामिल हैं और आध्यात्मिक महत्त्व भी। सूर्य के आसपास ग्रह ही नहीं अनेक धूमकेतु, ग्रह कणिकाएं तथा उल्काएं भी भ्रमण करती हैं। परन्तु ग्रह उनमें सबसे प्रतिष्ठित हैं अत: सूर्य को ग्रहपति कहा है। सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति से सूर्य 1000 गुना बड़ा है और पृथ्वी से सूर्य 13 लाख गुना बड़ा है। द्रव्य संपत्ति की बात करें तो समग्र सौर मण्डल की जितनी द्रव्य सम्पत्ति है (तरल गैस का भंडार) उसका 99% सूर्य के पास है। एक प्रतिशत ही शेष जगत्‌ के पास है। वजन फी दृष्टि से सूर्य पृथ्वी से 3, 30,000 गुना भारी है (जो कि काफी कम है। कारण यह कि सूर्य की द्रव्य सम्पत्ति वजन में काफी हल्की है)। पृथ्वी घन पदार्थ (ठोस) है और सूर्य वायवीय (गैसीय) है। सूर्य के तेज के कारण ही अन्य ग्रह वक्री, मन्द, अतिचारी आदि हो जाते हैं तथा धूमकेतुओं की पूंछ निकल आती है। यह वैज्ञानिक निष्कर्ष भी वेदों से मेल खाते हैं। बल्कि वेदों में तो पृथ्वी के घूर्णन का कारण भी सूर्य की किरणों के आघात को ही माना गया है। यथा-यज्ञ इन्द्रवर्द्ययद्‌ यद्भूमिं व्यवर्तयत्‌। चक्राण ओपशं दिवि॥ ( ऋग्वे. 8/145 ) अर्थात्‌ यज्ञ इन्द्र को बढ़ाता है। इन्द्र दुलोक को ओपश (श्रृंगघचाप) बनाता हुआ पृथ्वी को विवर्तित (घुमाता) करता है। ह (वेदों में अनेक स्थानों पर सूर्य को इन्द्र भी कहा है। द्वादश आदित्यों में एक म इन्द्र का भी है।) | अतः: यहां इन्द्र से अभिप्राय सूर्य से है। क्योंकि कोई किरण जब किसी गोल 
व मूर्त पदार्थ पर आघात करके लौटती है तो बह चाप बनाती है। उसके गमन व आगमन मार्ग में अन्तर होता है। इसी अन्तर को श्रृंग /ओपश कहा है। यानी सूर्य की किरणों के आघात से पृथ्वी निरंतर घूमती है, ऐसा अर्थ प्राप्त होता है। 

ज्योतिषीय व पौराणिक परिययय--

सूर्य प्रसूति होने के कारण 'सूर्य' व सर्वप्रथम उत्पन्न होने से ' आदित्य' कहलाता है। अदिति का पुत्र होने से भी सूर्य को 'आदित्य' कहा जाता है। सूर्य जगत्‌ गुरु है। क्योंकि बिता प्रकाश के ज्ञान सम्भव नहीं है और सूर्य ही प्रकाश प्रदाता है। सूर्य को 'सुदानी' तथा ' सहम्रदानी भी कहा जाता है। क्योंकि जन्म से ही यह सतत्‌, ऊर्जा, ऊष्मा एवं प्रकाश का निष्पक्ष रूप से दान कर रहा है। ' आदित्य हृदय स्तोत्र" में सूर्य का एक नाम 'सहस्रांशु' भी हजारों रश्मियों के कारण है। सूर्य के पर्यायवाचियों में खग:, पूषा, गभस्तिमानू, दिवाकर, दिनकर, रवि, भानु, भास्कर, प्रभाकर, सब्रिता, अरुण, विवस्वानू, नारायण (सूर्य नारायण), ग्रहपति आदि अनेक नाम उपलब्ध होते हैं। आंग्ल भाषा में इसको 80॥ के नाम से जाना जाता है और प्रचलित भाषा में इसे 'सूरज' कहा जाता है। | 

कश्यप ऋषि के निर्देशन में ही सर्वप्रथम सूर्य को खोजा व उसकी संरचना के विषय में पता लगाया गया था। पौराणिक दृष्टि से सूर्य कश्यप ऋषि का पुत्र है एवं अदिति से उत्पन्न हुआ है। विश्वकर्मा (देवशिल्पी) की पुत्री संध्या से इसका विवाह हुआ। संध्या सूर्य के उग्र तेज को सहन न कर,पाने के कारण अपने छाया रूप को उसके पास छोड़कर चली गई थी, जिससे सूर्य के यम तथा शनि नामक पुत्र और यमी (यमुना) नामक पुत्री हुई। बाद में घोड़ी के रूप में छिषकर रह रही संध्या का पता लग जाने पर सूर्य उसे मनाने गए और तब सूर्य ने संध्या से दो अति रूपवान पुत्र उत्पन्न किए। जो घोड़ी/अश्विनी के रूप में उत्पन्न होने के कारण * अश्विनी कुमार ' के नाम से जाने गए और देवताओं के सर्जन (शल्य चिकित्सक) बने। भगवान नारायण/विष्णु ने कर्मयोग का उपदेश सर्वप्रथम विवस्वान (सूर्य ) को ही दिया था। अत: सूर्य सदैव तटस्थता से कर्मशील रहते हुए जगत-कल्याणार्थ अपनी ऊर्जा एवं प्रकाश का दान करता है। विश्वकर्मा द्वारा सूर्य को सान पर 'चढ़ाकर उसके तेज को संध्या के लिए सहनीय बनाने का प्रसंग भी वेदों तथा पुराणों में मिलता है। सान पर घिसकर कम किए सूर्य के तेज कणों से ही सुदर्शन चक्र एवं अन्य दिव्यास्त्रों का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था (यह एक सांकेतिक प्रयोग है जो वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। परन्तु इसकी चर्चा किसी और पुस्तक में उपयुक्त प्रसंग के अंतर्गत करेंगे) | सूर्य के सारथी का नाम अरुण है। 

कश्यपपुत्र सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार रहता है। जैसा कि ' सूर्याष्टक ' में कहा भी गया है--सप्ताश्य रथमारूढं प्रणण्ड काश्यपात्मजम्‌ (कश्यप के पुत्र प्रचण्ड सात घोड़ों के रथ पर आरूढ़ होते हैं।) बेदों में भी यही तथ्य अधिक विस्तार से उपलब्ध होता है। प्रमाण के रूप में निम्नलिखित मंत्र देखिए-सप्त युद्धन्ति रथमेक चक्रमेको अश्वों बहति सप्तनामा। ब्रिनाभि चक्रमजरमनर्व यत्रेमा विश्वा भुवनाद्तिस्थु:॥ . ( ऋग्वे.--1/164/2 ) अर्थात्‌ सूर्य के एक पहिए के रथ में सात अश्व जुते हैं। वास्तव में एक ही अश्व जिसके सात नाम हैं अथवा जो सात जगह नमन करता है, इस रथ को ' चलाता है। इस रथ की तीन नेमियां हैं। यह पहिया शिथिल नहीं, दृढ़ है और कभी भी जीर्ण नहीं होता। इसी के आधार पर समस्त लोक स्थिर हैं। यह तो इस मन्त्र का शब्दार्थ हुआ, परन्तु इसके वैज्ञानिक अर्थ को क्री देखिए--सूर्य के रथ का एक पहिया वास्तव में समय/काल है (जो कभी शिथिल नहीं होता, दृढ़ है और जीर्ण भी नहीं होता) 1 रथ की तीन नेमियां ही समय के तीन - रूप--भूत, भविष्य तथा वर्तमान हैं (समय इन्हीं तीन धुरियों पर घूमा करता है ) | अथवा इन्हें दिन, रात एवं संध्या कह सकते हैं (जिनमें समय घूमता है ) | सूर्य के ' सात अश्व सप्ताह के सात दिन या वार हैं (जिनके नाम पृथक होते हुए भी वास्तव में वे एक ही हैं क्योंकि मूलतः: वो दिन या वार ही हैं। भले ही उनका नाम सोमवार, शुक्रवार, बुधवार कुछ भी हो )। दूसरे अर्थ में सूर्य के रथ के सात घोड़े ' प्रकाश के सात रंग हैं (जो सात होते हुए भी मूलतः: रंग होने से एक ही हैं। अथवा सातों रंग गतिमान होने पर एक सफेद रंग के ही होते हैं या प्रिज्म में जैसे कोणीय - बनावट के कारण प्रकाश की किरणें नम/मुड़ जाने से सफेद होकर भी सतरंगी हो जाती हैं )। समस्त लोक कालगति पर ही स्थिर हैं (अत: काल व प्रकाश दोनों मापदण्डों पर सूर्यरथ का व॑र्णन सही उतरता है)। ऋग्वेद में ही अन्य स्थान पर सूर्यरथ के पहिए में 24 अरे और छे; धुरियां होना भी स्वीकारा गया है और हम इन्हें दिन के 24 घंटों तथा वर्ष में छ: ऋतुओं - "का प्रतीक मान सकते हैं। क्योंकि ऋग्वेद सूर्यर्थ को अविराम व अबाध (बिना रुके सदा चलने वाला) भी कहता है जो मात्र समय की ही विशेषता/लक्षण है। यही कारण है कि सूर्य को शास्त्रों ने काल नियंता (काल का नियामक) माना है। रात, दिन, ऋतु, वर्ष, संवत्सर, अयन, ब्रह्मांडवर्ष आदि लव, निमेष, काष्ठा, घड़ी, मुहूर्त, प्रहर जैसी छोटी समय मापने की इकाइयों से लेकर युग, परार्ध, महायुग, कल्प, मन्वन्तर आदि बड़ी इकाइयों तक सब समय मापन के घटक या. अवस्थाएं सूर्य ही के आश्रित हैं। सूर्य ब्रह्मा का प्रथम आविष्कार है, ब्रह्मांड की केन्द्रक शक्ति है | जगतु को को ऊष्मा, ऊर्जा, प्रकाश, ज्ञान एवं जीवनी शक्ति प्रदान करने वाला है। इसी कारण [1 सूर्य को आयु, बल, यश, सौभाग्य, आरोग्यब, ज्योति, बुद्धि, विद्या, आत्मबल आदि को बढ़ाने वाला कहः गया है। प्रकृति को गति देने व संतुलित रखने के कार्य से भी सूर्य की विशिष्ट भूमिका रहती है। रोगाणु, कीटाणु, जीवाणु ( भूत, पिशाच आदि) का नाशक सूर्य ही है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (ज्ञान, क्रिया व इच्छा शक्ति) की त्रिमूर्ति के भौतिक स्वरूपों में सूर्य, अग्नि व चन्द्र को गिना जाता है। अत: सूर्य का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। वेदों, शास्त्रों, पुराणों, उपनिषदों ब्र धर्मग्रन्थों ने एकमत होकर सूर्य का महत्त्व स्वीकारा है ब उसकी महिमा का बखान किया है। 

ज्योतिष में सूर्य को कालपुरुष की आत्मा माना गया है। यह उग्र, अग्नि प्रधान व कठोर ग्रह है। इसका लिंग पुरुष है। वर्ण लाल और जाति क्षत्रिय है। प्रकृति पित्त प्रधान, उष्ण व रुक्ष किन्तु सतोगुणी है। तत्त्व अग्नि, स्थान देवालय दिशा पूर्व, रस कटु एवं लवण, अवस्था प्रौढ़, राशि सिंह त# ४८. .नेत्र मधुपिंगल, दृष्टि तीक्ष्ण केश कम किन्तु नक्षत्र कृतिका, उत्तराफाल्गुनी व उत्तर आषाढ़ है। उच्च राशि मेष 10" तथा नीच राशि तुला है। मूलत्रिकोण राशि सिंह 20" है। इसके अधिदेवता शिव/रुद्र तथा प्रत्यधिदेवता अग्नि हैं। धातु स्वर्ण व ताग्र, रत्न माणिक्य, वस्त्र लाल व गुलाबी है। ऋतु ग्रीष्म, दिकूबल दशम भाव, काल बल दिवस (रविवार व मध्याह् विशेष), बार रविवार, काल छ: मास तथा भ्रमण गति एक राशि में एक मास है | यह पिता व आत्मा का स्थिर कारक है। यश, पद, राज्य, दाएं नेत्र, आत्मशक्ति, तेज का प्रतिनिधि है। मकर से मिथुन राशि तक यह चेशबली होता है। चन्द्र, मंगल व गुरु इसके मित्र; शुक्र, शनि तथा राहू शत्रु और बुध सम है। उत्तरायण, रविवार व मध्याह में सूर्य विशेष बली होता है। 

सूर्य का स्वभाव स्थिर तथा पूर्ण दृष्टि सातवीं है। तीन व दस एक पाद टृष्टि, पांच व नौ द्विपाद दृष्टि तथा चार व आठ इसकी त्रिपाद दृष्टियां हैं। जन्मपत्री में 1, 9, 10 इसके कारण भाव हैं। 
यह सब कारकत्व अकेले रवि का और बारहों राशियों का है, ऐस्म मैं नही सानता। वैसा सेरा अनुभव अलग है। ज्योतिषियों ने स्वतंत्रता से अपने अपने अनुभव से यह निश्चित करना चाहिये। 

हमारे प्राचीन ज्योतिर्विदों ने रवि के विषय में बहुतसा शास्त्रीय और तात्विक संशोधन किया है। उसकी अब थोड़ी चर्चा करेंगे। 

आचार्य - कालात्मादिनकूत, राजा नौ रवि:, रक्‍तश्यामो शआास्करो वर्ष्षस्तामत्र देवता वन, प्रागाद्या रवि: ॥ | 

अर्थ - रवि यह कालपुरुष का आत्मा डै। रवि राजा है। तांबे के समान कालिमा लिये हुये लाल रंग का है। रवि की देवता: वन्डि-अग्नि डै। यड़ पूर्व दिशा का स्वामी पापग्रह है। चार वर्णों में इसका वर्ण क्षत्रिय है। यह सत्वगुण से युक्‍त है। पुरुष ग्रह है। आचार्यो ने इसका कोई तत्व नहीं कहा, यह आश्चर्य की बात है। सारे विश्व में पाँच तत्व भरे हैं। 

आकाश, तेज, जल, पृथ्वी और वायु। किंतु इस ग्रह को इनमें से कोई तत्व नहीं कहा है। मेरी समझ में रवि को तेज सत्य देना चाहिये। सत्व, रज और तम इन तीनो गुणों में इसको सत्वगुणी  कह गया है। किंतु यह पाप फल देता है। सात्विक मनुष्य का आचरण पापयुकत कैसे होगा ? पापयुक्त रहा तो यह सात्विक  कैसे माना जाएगा ? मेरी समझ में इसे रजोगुणी मानना चाहिये। 

बधुपियलबृ कू यदुरस्त्रतनु: फित्तप्रकृति: सकिताल्पकच:। स्थान-देवगुह, मोटा वस्त्र, धातु-तांबा, ऋतु-नही रवि अयन दक्षिण में, उत्तरायण में बलवान। 

रवि की दृष्टि - शहद के समान लाल रंग - यह कड़ी धूप को देखकर निश्चित किया होगा। धूप को सूक्ष्म दृष्टी से देखो। वह कुछ पीले रंग की दिखती है। इसलिए जिन मनुष्यों के रवि मुख्य होता है उनकी नजर बहुत तेज होती है तथा आंखों के कोने में लाल रेखाएं अधिक होती है। शरीर की आकृती चौकोर के समान होती है। वास्तव में रवि गोल दिखाई पड़ता है, इसलिए शरीर का आकार गोल होना चाहिये। किंतु अनुभव दूसरा ही आता हैं। फलतः रवि रूखा और ऊष्ण होने से पिक्तप्रकृति है यह स्वाभाविक ही है। शरीर पर बाल बहुत कम होते हैं। स्त्री राशि में हो तो बिलकुल नहीं होते परन्तु पुरुष राशि में हो तो होते हैं। रवि यही पूर्ण परब्रम्ह है। इसलिए उसका निवासस्थान मंदिर या देवगृह कहा गया, यह ठीक ही है। रवि के अमल में मोटा वस्त्र दिया है इसकी उपपत्ति नहीं लगती। धातु-तांबा-रवि के लिये तांबा यह धातु कही गयी है। यह रंग से ही कही गयी होगी। वास्तव में इसके अमल में सोना चाहिये। हमारे शास्त्रकारों ने रवि के लिये कोई भी ऋतु नहीं है। यह एक ध्यान देने लायक बात है। रवि ही सब ऋतुओं को उत्पन्न करता है और उसके लिये एक भी ऋतु नहीं है। मेरी समझ में ग्रीष्म ऋतु पर रवि का अमल होना चाहिये। उसकी यही ऋतु योग्य है। यह उत्तरायण व दक्षिणायन निर्माण करता है। 
उसको उत्तरायण का अधिपती कहना चाहिये। रवि उत्तरायण में बलवान होता है। 

वैद्यानाथ - कालस्यात्मा भास्कर: दिनेशों राजा। भानु: श्यामलोहित:। प्रकाशकी शीतकरक्षपाकरी। रवि: पृष्ठेनोदेति सर्वदा। विहगस्वरूपो वासरेशो भवति। शैलाटविसंचारी। पै॑याशर्क। ताग्रधातुस्वरूप। हुचराँ अरुणौ। देवता वन्ही माणिक्य दिननायकस्य। स्थूलाम्बरम्‌। प्रागदिको भानुः क्रीडास्थान देवगुहम्‌। सत्वप्रधान। नरकारो भानु: अस्थि, कटु, दक्षिणायनबली, स्थिर | 

पिछले पृष्ठ में वर्णन आया है, उससे भिन्न शब्दों का ही विचार करना है। रवि सर्वदा पृष्ठभाग से उदय प्राप्त करता है। किसी का जन्म कैसे हुआ यह निश्चित करने के लिये यह कल्पना होगी। किंतु रवि प्रति दिन सामने से ही उदित होता है। रवि का भ्रमण प्रति दिन आकाश में से होता है। इसलिये उसे पक्षी स्वरूप कहा गया है। वन और पर्वतों में संचार करनेवाला इस कल्पना का आधार समझ में नही आता। पंचार्शका का अर्थ भी स्पष्ट नहीं होता। माणिक नाम का रत्न रवि का कहा गया है क्योंकि उसका रंग लाल होता है। अस्थि हड्डी बहुत काल तक टिकती है और कठिन है इसलिये। कडुआ-रवि रुचि का कारक है। इसमें इसका समावेश करना ठीक होगा। स्थिर इस विषय में पहले कहा गया है यहाँ एक ही कहना है। रविप्रधान कुंडली के दो ही लग्न होते हैं, एक वृश्चिक और दूसरा धनु। इसमें वृश्चिक स्थिर है तो थनु अस्थिर है। इससे प्रगट होता है कि रवि में दोनों गुण हैं। 

अर्केण मन्द - शनि रवि के द्वारा पराजित होता है ऐसा वैद्यनाथ ने कहा है। किंतु रवि शनि के द्वारा पराजित होता है ऐसा मेरा अनुभव है। रवि कब बलवान होता है ? स्वोच्चस्वकीयभवने स्वदृगां च॒ होराव्रारांशकोदयगणेषु दिनस्थ मध्ये। राशिप्रवेशसमये सहदंशकारी मेषे रणे दिन मणिर्बलवानजस्त्राम। रवि अपनी उच्च राशि मेष में बलवान होता है। बलवान होता है किंतु फल उलटे मिलते हैं। स्वकीयभवने याने सिंह राशि में उतने अच्छे फल नहीं मिलते ऐसा मेरा अनुभव है। अपने द्रेष्काण और होरा में वह अति बलवान होता है। रविवार को, इस वर्णन में कोई तथ्य नहीं है। उत्तरायण में बलवान कहा गया है। किंतु मेरा ऐसा अनुभव है कि रवि दक्षिणायन में ही प्रबल होता है, क्योंकि जगत के बड़े राजनीतिन्न नेता, कुटनीतिज्न, डॉक्टर, सर्जन, कानून विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, मिल मालिक, कवि, उपान्यासकार, नाटककार इनका जन्म बहुतायत से दक्षिणायन में ही हुआ है। दिनस्य मध्ये - दोपहर में करीब बारह बजे वह बलवान होता है। राशिप्रवेशसमये-एक राशि से दूसरे राशि में जाते समय, मित्र ग्रह के अंशों में और दशम में होते हुए वह बलवान होता है। सदा शिरोरुग्ज्वखृद्धिदीपन: क्षयातिसारादिकरोगसकुलौ: / नृपालदेवावनिदेवकिकरे: करोति चित्तव्यसनं दिवाकर: ॥/ 

रवि पर इतने रोग कहे गये हैं। ये रोग किस स्थान में और किस लग्न में विशेषता से दिखाई देते हैं यह शास्त्रकारों ने नही कहा है। मेरे अनुभव में मेष, सिंह, धनु इन लग्नों में रवि धन स्थान में हो; मिथुन, तुला, कुंभ इन लग्नो में रवि व्यय स्थान में हो, वृषभ, कन्या, मकर इन लग्नों में रवि अष्टम में हो; कर्क वृश्चिक, मीन इन लग्नों में रवि दशम या छठवें में हो तो ये रोग होते हैं। अन्य स्थानों में रवि हो तो ये अनुभव नहीं आते। दूसरी शंका यह है कि जब रवि स्वयं नीरोगी है तो इन रोगों का आरोप उस पर कैसे किया गया यह समझ में नहीं आता। जयदेव कचि «* प्राध्यादयिशा, रविर्मर:, अकां ब्रुवतेरण्यचारिण:, मध्यान्हम्‌, अर्काँ व्योमदर्शिनी, सविता गूलमू्‌, अर्को चतुष्पदी, अर्कां पूर्ववक्त्री, सूर्य: कषितीश:, अवनीशो दिनमणि: भार्तण्ड; स्थविरो ग्रह, अर्कः प्रकृत्या दुःखदो नृणामृ, विनारी क्षत्रियाणामृ सूर्य दिना 

सूर्य का स्थान - देवस्थान। रत्न-माणिक। इनमें बहुतसा विवेचन पिछले पृष्ठों में आया है। यहां सिर्फ पांच बातों पर विचार करेंगे। 

अर्का ब्रुवतेरण्यचारिण: - रवि अरण्य में संचार करता है ऐसा कहा गया है। रवि आत्मज्ञान का कारक है इसलिये रविप्रधान व्यक्ति परमार्थ योग प्राप्त करने के लिये जंगल में एकांत में रहते हैं। इसीसे यह कल्पना निकली होगी। अर्की व्योमदर्शिनौ-रवि की दृष्टी ऊपर होती हैं, ऐसा कहा गया है। इसका आधार एक ही कल्पना होगी, वह यह कि सुबह उदय होते समय रवि की किरणें पहले ऊपर आकाश में दिखती हैं और संध्या को अस्त होते समय भी वे ऊपर आकाश में दिखती हैं। इससे व्योमदर्शिनों ऐसा निश्चय किया होगा। सविता मूलम्‌ इसकी उपपत्ति नहीं लगती। अकों चतुष्पदौ-रवि चौपाये पशुओं का कारक है। वैद्यनाथ कहते हैं कि रवि पक्षी स्वरूप है और जयदेव कहते हैं कि वह चौपाये के स्वरुप का है। वैद्यनाथ की उपपत्ति ठीक मालूम होती है किंतू जयदेव की नहीं। अनुभव से देखना चाहिये। अर्कों पूर्वक्त्रो-सूर्य का मुख पर्व की और यह कल्पना ठीक नहीं मालूम होती है, क्योंकि उदय हांते ही सूर्य के किरणें पश्चिम की ओर फैलती हैं। इसलिये इसका मुख पश्चिम की ओर मानना चाहिये। सूर्य अस्त होते समय भी उसके संध्या की किरणें पूर्व की ओर नहीं आ सकतीं। इन दोनों कारणों से पश्चिम का ही मानना योग्य मालूम होता है। केवल वह पूर्व ऊदित होता है और पूर्व दिशा का अधिपती है। इसलिये पूर्व मुख की कल्पना की गई है। अर्क प्रकृत्या दुःखदो नृणाम्‌ रवि शरीर को पीड़ा देता है। 

रवि का मूल स्वभाव 
सूर्य-पिता, राजसेवा या सरकारी नौकरी, वृक्ष, लकड़ी, (विशेषतयाचंदन) मंत्रोच्चारण, औषधि, धातु संबधी काम, तांबा, आग्नेयास्त्र, आग,विष, जंगल आदि पर सूर्य का कारकत्व है। इसके अतिरिक्त यह आत्मा,नेत्रों, जीवनशक्ति, स्वाभिमान, राजसी संबंध, पैसे की उधारी का काम(ब्याज बट्टे), इच्छाशक्ति, अधिकार, ऊन, खाल, रेशमी वस्त्र, राजनीतिज्ञ,आत्मा, न्यायाधिकारी, डॉक्टर, राजदूत आदि का भी प्रतिनिधित्व करता है।
If the sun is well dignified the disposition is noble,generous, proud, magnanimous, humane and affable, friendly and generous to enemy, one of few words, and fond of luxury and magnificence.
उदार हृदय का, मानी, एक खास बडप्पन लिये हुये होता है। इन्सानियत से रहता है। आये गये अतिथियों का उचित सम्मान करता है। स्नेहभाव से बर्ताव करता है। शत्रु के साथ भी खुले दिल ले रहता है। कम बोलता है। विलासप्रिय होता है। भव्य, निर्भय, पवित्र, सच्चाई से रहनेवाला, सब की फिकर करनेवाला तथा संकट में आये हुये को योग्य रास्ता दिखलानेवाला होता है। 
If illdignifiedpride, arrogance and want of sympathy. यदी रवि दुषित हो तो गर्वीला, उद्धत, हमदर्दी न करनेवाला, दुष्ट, गप्पें हाकनेवाला,एकाकी, एकांतप्रिय, लोगों से हमेशा झगड़ा करनेवाला होता है।

रवि का मूल स्वरूप

हमारे प्राचीन शास्त्रकारों ने रवि के संबंध में स्वतंत्र अर्थात वह किसी भी राशि में नहीं है ऐसी कल्पना करके रवि का मूलस्वरूप कहा है।
आचार्य
-मधुपिंगलदृक् चतुरस्त्रातनुः पित्तप्रकृतिः
सविताल्पकचः । पित्तप्रकृतिः समगात्राः प्रतापी अल्परोमनवानर्क ||
इन शास्त्रकारों का निम्नलिखित विषयों के संबंध में एकमत है - लाल आंखे, शरीर का आकार चौकोर, पित्त प्रकृति, शरीर पर
बाल कम होना। वैद्यनाथ प्रतापशाली और सत्वगुण प्रधान ये दो गुण अधिक हैं। ढुंढिराज - शूर, गंभीर, चतुर, अवयव सुडौल
होना, ऊंचाई कम। कल्याणवर्मा - बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, चंचल और सुंदर आंखें, प्रचंड, स्थिर पाव, हाथ मोटे। श्रीनिवास
शर्मा - कम बोलना 
सब के मत एक कर के कहें तो - लाल आंखें (यूरोपियन अथवा चित्पावन ब्राह्मणों जैसी) यह अनुभव किस राशि में आता यह कहा नहीं है। मेरे मत से केवल अकेले रवि से ऐसी आंखे हीं हो सकती। उसके लिये मंगल का कोई संबंध होना चाहिये। लग्न में मेष, सिंह अथवा वृश्चिक इन राशियों में रवि हो तो 
यह अनुभव आता है। ऐसा न होकर सिर्फ रवि लग्न में हो तो आंखें बारीक, काली, तेजस्वी, अति चंचल और रुआबदार होती हैं। वृषभ, धनु में रवि हो तो आंखे बड़ी, आकर्षक, हिरनी के समान शांत व निष्पाप होती हैं। मिथुन, तुला व कुंभ में रवि हो तो लोगों पर प्रभाव डालनेवाली तेजस्वी नजर होती है तथा आंखों की पुतली काली और उभरी हुई होती है। कर्क, कन्या, मकर और मीन राशि में रवि हो तो शांत, स्थिर और भेदक नजर तथा पुतली धंसी हुई दिखती है। चौकोर शरीर - सुर्य का बिंब गोल होते हुये शास्त्रकार चौकोर कहें यह बड़ें आश्चर्य की बात है। किंतु अनुभव ऐसा है कि राशि के १५-१५ आंशों के दे विभाग करके रवि किस विभाग में है, यह देखकर निश्चित करना होता है, वह निम्न प्रकार है - 

चौकोर - मेष, सिंह, धनु के उत्तरार्ध में। वृषभ, कन्या, मकर के पूर्वार्थ में। मिथुन, तुला, कुंभ के उत्तरार्थ में। कर्क, वृश्चिक, मीन के पूर्वार्थ में। इन में रवि हो तो वह मनुष्य गिट्ढा और चौकोर आकार का होता है और अन्य भाग में हो तो ऊंचा, पतले कद का, लंबे चेहरे का होता है। लग्न में भी यही अनुभव आता है। इसमें थोड़ा फरक होने की संभावना है। वह यह कि समाज में हमेशा एक अनुभव आता है कि कन्या के उत्तरार्थ में ऊंचा, पतला और नाक उभरी हुई होती है। उस समय लगता है क्रि इसका लग्न तुला होगा। धनु के उत्तरार्थ में जन्म हो तो चौकोर चेहरा और कंधे सुंदर होते है। मकर का पूर्वार्थ भी ऐसा ही होता है। इसलिए कुंडली देखनेवालों को हमेशा धनु या मकर यही संशय होता है। एक ज्योतिषी को कुंडली दिखलाई तो वह धनु बतलाता 
है तो दुसरा ज्योतिषी भकर बतलाता है। किंतु उपर का कारण मालुम न होने से विवाद का मौका आता है। 

पित्तप्रकृतिं - रवि मूल में रूवा और ऊष्ण होने से शरौर रूखा और ऊष्ण होकर पित्त की अधिकता होना स्वाभाविक है। किर भी यह मेष, सिंह और धनु में अधिक होता है। मिथुन, तुला, झुंभ में कम और दूसरी स्त्री राशियों में तो बिलकुल कम होता है। 

कम बाल - रवि को मूल में बाल ही नहीं हैं। किंतु सिंह, धनु, मीन, राशि में वह हो और लग्न में हो तो बाल घने होते हैं। डूसरी राशियों में कम होते हैं। स्त्रियों के कुण्डलियों में रवि पुरूष खशि में हो तो बाल घने, लम्बे, काले और बहुत होते हैं - वेणी नितम्ब तक पहुंचती है। स्त्री राशि में हो तो छोटे, चमकदार, कम लंबे और लहरीले होते हैं। 

सत्त्वगुण प्रधान - रवि को सत्वगुणी माना गया है। परंतु अनुभव से वह रजोगुणी सिद्ध होता है क्‍यों कि कुंडली को बारहों स्थानों में उसके मारक गुणधर्म दिखाई देते हैं। इसलिए इसे स्जोगुणी मानना चाहिये। 

गंभीर - रवि के अमलवाले पुरुष में स्वाभाविक तौर पर बड़प्पन कौ भावना और अभिमान की वृत्ति होने से वे गंभीर होते हैं। 

चतुर - शिक्षा कम हुई तो भी बुद्धिमान और समय पर योग्य जबाब देकर वक्त निभा लेते हैं। 

सुरूप - सुवृत्त गोत्र - सुंदर, सुडौल शरीर होता है। 

मेरे मत से - रवि पुरुष राशि में हो तो वे लोग सुंदर न होकर रूखे, बलवान, सहनशील और मजबूत होते हैं। सुडौल नहीं होते। रवि स्त्री राशि मे हो तो पतले, सुंदर, सुडौल होते हैं। 
श्यामारुणांग - पुरुष राशि में अथगोरे र॑ग के और स्त्री राशि में गोरे और सुंदर होते हैं। 

चल - रवि, मेष, कर्क, तुला, मकर और धनु इन राशियों में हो तो वे पुरुष हमेशा घूमते रहते हैं। उनको घूमते रेहना बहुत प्रिय होता है। घर में भी इधरउधर टहलते रहते हैं। अन्य राशियों में स्थिर होते हैं। रवि उदय होने से लेकर सारे आकाश में घूमकर संध्या के समय अस्त होता है। दुसरे दिन भी उसका यही क्रम होता है। इसी पर से उसे चल माना गया होगा। इसी प्रकार सूर्य स्थिर है और पृथ्वी घूमती है। इसपर से उसको स्थिर मानने की कल्पना थी स्वाभाविक होती है। इसी कल्पना पर से रवि के अमल में मनुष्य स्थिर होते हैं, ऐसा कहा गया है। 

चारुनयन - सुबह का सूर्य बहुत तेजस्वी, सुंदर और मनोहर प्रतीत होता है। इसलिए सुंदर आंखों का कहा होगा। किंतु रवि कहां होना चाहिए यह नहीं बताया है। अनुभव से मालूम होता है कि दूसरे, सातवें और बारहवें स्थान में हो तो यह अनुभव अधिक आता है; अन्य स्थानों में नहीं। 

प्रचंड - इसका अर्थ समझ में नहीं आता। प्रचंड शरीर से, ज्ञान से कि पराक्रम से ? तीनों अर्थ लिये तो ऐसे विभाग होते हैं। धन, षष्ठ, सातवें स्थान में रवि हो तो शरीर से प्रचंड; धन, पंचम और भाग्य में हो तो ज्ञान से प्रचंड और तीसरे, दसवे और बाहरवें स्थान में हो तो पराक्रम से प्रचंड होता है। 


जातक की आरोग्यता (विशेषकर हृदय सेग), राज्य, पद, जीवनीशक्ति, कर्म, अधिकार, महत्त्वाकांक्षा, सामर्थ्य, वैभव, यश, स्पष्टता, उग्रता, उत्तेजना, रुचि; सिर, उदर, अस्थि व शरीर रचना, नेत्र (दायां विशेष ), साहस, धन, पिता, आत्मज्ञान, . आत्मशुद्धता, आत्मबली आदि का बिचार सूर्य की स्थिति से ही किया जाता है। यात्रा, प्रभाव तथा उपासना आदि के विचारों में भी सूर्य महत्त्वपूर्ण है। जातक यदि रात्रि में जन्मा हो तो सूर्य द्वारा कुछ ज्योतिर्विद चाचा का विचार भी करते हैं। 

इस ग्रह का भाग्योदय वर्ष 22 है। यह उग्र तथा क्रूर होते हुए भी पापी नहीं है। यद्यपि कुछ ज्योतिर्विद इसे पापी ग्रह मानते हैं। किन्तु काल पुरुष की आत्मा, ग्रह सम्राट और सुदानी होने से ऐसा मानना अनुचित है। 

सूर्य का राशि परिवर्तन संक्रान्ति कहलाता है। यह एक दिन में एक अंश . चलता है, अतः 30 दिन में एक राशि पार करता है। अंग्रेजी महीनो की 13, 14, 15 तारीखों में इसका प्रायः राशि परिवर्तन होता है। 14 अप्रैल को यह मेष (पहली) राशि में आता है, तब म्रेष संक्रांति होती हैं। 181 जनवरी को यह मकर राशि में आता है, तब मकर संक्रांति होती है। इन दोनों संक्रांतियों का विशेष महत्त्थ माना जाता है। 

रोग ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रॉलॉजी) की दृष्टि से सूर्य हृदय, हड़ी, आग, पेट, आंख, सिर दर्द, डायरिया, तीव्र ज्वर, कब्ज, आत्मा तथा पिता का कारक है। 

विज्ञान ब्रह्मांड बहुत से सूर्यों का होना मानता है| धर्मशास्त्रों में भी 57 लाख 64 हजार 108 सूर्य माने गए हैं, जिनमें 12 प्रमुख हैं इन्हें द्वादशादित्य के नाम से जाना जाता है। ये द्वादश आदित्य क्रमश:--धाता (रक्‍्तवर्ण), अर्यमा (पीतवर्ण), मित्र (लाल वर्ण), अरुण/वरुण (श्याम वर्ण), इन्द्र (श्वेतवर्ण), विवस्वान ( भूरा वर्ण), पूृषा (अलक्तक वर्ण), पर्जन्य (अरुण वर्ण), अंशुमान (हरित वर्ण), भग (रक्तवर्ण), त्वष्टा (चित्रवर्ण), विष्णु (अरुण वर्ण/सिंदूरी ) हैं, जो कुल मिलाकर 96000 किरणों से तपते हैं। सूर्य का वैदिक मंत्र--३* ॐ ह्रीं घृणि: सूर्यादित्य 3» है। सूर्य का ज्योतिषीय तांत्रिक मंत्र-3» हूं हीं हौं सः सूर्याव नम: है । पंद्रोहिणी यंत्र सूर्यपीड़ा हरणकर्त्ता यन्त्र है। सूर्य रलल माणिक्य को स्वर्ण धातु में जड़वाकर अनामिका उंगली में धारण करते हैं | गेहूं, नमक आदि सूर्य के दान पदार्थ तथा बेल व बेंत की जड़, लाल चंदन, गुड़ सूर्य की औषधियां हैं । सूरजमुखी, आम, पपीता, खरबूजा, अमरूद, बेल, अनार, आलूबुखारा, दालचीनी, गेंदा, गूलर (लाल फूल) आदि सूर्य की वनस्पतियां, फल व चुष्प हैं। 

वर्ण - गुलाबी, अवस्था वृद्ध (50 वर्ष की आयु) लिंग- पुरूष जाति- क्षत्रिय, नेत्र-मधु, पिंगल-वर्ण, स्वरूप-स्थिर, धातु-स्वर्ण (मतान्तर से तांबा) वस्त्र-मोटा (स्थूलाम्बर) अधिदेवता अग्नि, दिशा- पूर्व, रस-तिक्त (मतान्तर से कटु) स्थान-पशु भूमि, ऋतु-ग्रीष्म, रत्न-माणिक्य, उदय भाग, पृष्ठ (शरीर का पिछला भाग), क्रीड़ा स्थल देवभूमि, काल समय-अयन, बलदायक- काल दिन, वेदाभ्याश- रूचि, विधाध्ययन- रूचि राजनीति, वाहन- अश्व, वार- रविवार, निसर्ग बल सभी ग्रहों से अधिक,प्रभाव- किसी भी ग्रह से नहीं संज्ञा- क्रूर, प्रतिनिधि - पशु लाल रंग की गाय।

आधियत्य -रवि का कारकत्व 

सूर्य किरणों से रोग दूर होते हैं यह अनुभवसिद्ध बात है। इसलिए रवि आरोग्यदाता है। ; चंद्र मन का कारक है और चंद्र को रवि से प्रकाश मिलता है। मन को शुद्ध कर के मार्ग पर लाने का कार्य विवेक रूपी हुदयस्थ परमात्मा करता है। मन चंद्र है और रवि -हृदयस्थ परमात्मा। इसलिए रवि को 'मनःशुचिकारक” कहा गया है। 

,_पितृप्रतापारोग्वगनशुचिरुचिज्ञानोदयकारकः रवि: / 

प्रभाव, खुद का आत्मा, पिता का पराक्रम, रोगों के प्रतिकार की शक्ति, आत्मकल्याण इत्यादि विषयों का विचार रवि पर से करना चाहिए, ऐसा “जातक पारिजात” इस ग्रंथ में कहा गया है। बाघ, सिंह, पर्वत, उनी कपड़े, सोना, शस्त्र, विष से शरीर का दाह, औषधि, राजा, स्लेंच्छ, महासागर, मोती, वन, लकड़ी, मंत्र इत्यादि का कारकत्व  'सारावली” कर्ता ने रवि पर कहा है।इनमें विष का कारक मंगल तथा म्लेच्छों का कारक राहु होना चाहिये। उसी प्रकार मंत्र विषय शुक्र का है, ऐसा मेरा मत है॥ 

राज्य, प्रवाल, लाल वस्त्र, माणिक, आखेट के ज॑गल, पर्वत, क्षत्रियों के कर्म इत्यादि विषयों का कारकत्व “बुहत्पाराशरी” कर्ता ने रवि पर बताया है। 

आत्मप्रभाव, शक्ति, पिता की चिंता इनका कारक रवि ही डै, ऐसा विद्यारण्य का मत है। 

पुत्र की पत्रिका से पिता के सुखदुःखों का विचार रवि शनि के शुभाशुभ योग से डी जाना जा सकता है। दुसरा नियम यह है कि पंचमेश या नवमेश ३-६-८-१२ इन स्थानों में हो तभी यहढ विचार करना चाहिये। 

कालिदास - 9. आत्मा २शक्ति ३. अति दुष्ट ४किला ५. अच्छि ताकत ६ऊष्णता ७. प्रभाव ८. अग्नि ९. शिव की उपासना १० यैर्य 99. कांटेदार वृक्ष १२. राजकृपा १३कडुआ १४. वृद्धता १५ . पशु (गाय भैंस आदि) १६. दुष्टता १७. जमीन १८. पिता १९. रुचि २०. आात्मप्रत्यय २१. ऊरर्थ्व दृष्टि २२जिसकी मां डरपोक डो ((born to a timid woman) २३मृत्युलोक २४. चौकोन (square) २५. हड्डी २६. पराक्रम २७. घास २८, कोख (belly) ४१९. दीर्घ प्रयत्तल ३०. जंगल ३१. अयन ३२. आंख ३३वन में संचरण ३४७. चौपाये पशु ३५राजा ३६. प्रवास ३७. व्यवह्लहार ३८६ पित्त ३९. सपश्चर्या ४०गोलाई ४१. आंख के रोग ४२. शरीर ४३. लकड़ी ४४७. मन की शुद्धता ४ 
५. सर्वाधिकार (dictatorship) ४६. रोगों से मुक्तता ४७. सोौराष्ट्र देश का राजा ४८. अलंकार ४९. मस्तिष्क के रोग ७०. मोती ५१. आकाश का अधिपति ५२. नाटा ५३. पूर्व दिशा का अधिपति ५४. तांबा ५५. रक्त ५६. राज्य ५७. लाल वस्त्र ७५८. अंगूठी में लगाने के नगीने, खनिज के पत्थर ५९. लोकसेवा ६०. नदीतट ६१. प्रआवाल ६२. मध्यान्ह में बलवान ६३. पूर्व ६४. मुंह ६५. दीर्घकोपी ६६. शत्रुओं पर विजय ६७. सच्चाई ६८ केशर ६९. शत्रुता ७०. मोटी रस्सी। 
Manager, Foreman, Boseses, Rulers,School, Masters, Fathers, Husbands, High Constables,
Mayors, Magistrates, Aristocracy, Ruling bodies like town-councils and parliaments, Kings, Royalty, Master of ceremonies, Public officers, Business-managers andDirectors, State officials, Civil servants, Palaces, Town-
halls, Courts, Theaters, Banqueting halls, Dancing halls, Exhibitions, Spectacular displays, Social gatherings and Ceremonies, Magnificent public structures, Big houses with many rooms, Gold ornaments, Emblazonments, Special Occasions.

अज्ञात - पुण्य, बड़े भाई का सुख, वैद्यकशास्त्र, छोटे प्रवास, बिजली का प्रवाह, बिजली पर निर्भर धंधे, जवाहरात, सोना, बढ़ई, गिलट कामा 

मेरा मत - नैत्रवैद्यक, राजनीति, शरीरशास्त्र, X-rays, cosmic rays, प्लेटेनियम, रेडियम, हीलियम, 8०1०, नाविक, विद्या navigation, राज्यसत्ता, राज्य में प्रचलित राजभाषा, सक्रेटरिएट, असेंब्ली, गर्वनर, गर्वनर जनरल, पारसी लोग ये रवि के कारकत्व में हैं। अब तक ये सब कारकत्व कहे गये हैं। प्राचीन ज्योतिष ग्रंथकार यह नहीं बताते कि इन कारकत्वों का उपयोग किस स्थान पर कैसे करना चाहिए। इस विषय में बहुत दिन तक विचार करने के पश्चात आगे दिया हुआ वर्गीकरण करके उसका उपयोग कहां और किस प्रकार करना चाहिए, यह निश्चित किया गया है। वह इस प्रकार है।

पिता, प्रताप, आरोग्य, मन की शुद्धतां, रुचि, ज्ञान, धब्बे, शक्ति, आत्मप्रभाव, पिता की चिंता, अच्छी ताकत॑, हृदय, पीठ, नहीचक्र, कुंडलिनी, प्रभाव (लोगों पर रुआब), क्षेत्रकर्म, शिव की उफसना (यूरोप में god, the holy ghost), राजकृपा, (रावसाहेब, सब्बहादूर आदि उपाधि प्राप्त करना), पिता की भूमि, हड्डियां, आत्मप्रत्यय, उर्ध्व दृष्टि, दाहिनी आँख, व्यवहार, मन, शरीर, नाय, रक्त, लोकहित, पुण्य, पंडितों की बुद्धि-संपन्नता, शत्रुता, बड़े भाई का सुख, प्रवास, बिजली, जौहरी, क्षत्रिय कर्म, श्रेयस, संघटना, व्यवस्थापक, (foreman) (जूरी में मुख्य), रेलवे कारखाने में बॉयलर में इंजीनियर, धंधे में व्यवस्थापक, ,cosmic rays वृद्धता, तप, बड़े सिविल अधिकारी, मेयर, मेंजिस्ट्रेट, स्कूल मास्टर, बिजली द्वारा चलनेवाले बंधे, गिलट काम, जवाहरात, सोना, मोती, तांबा, माणिक, प्लेटिनम, रेडियम, हीलियम, अलंकार, प्रवाल, रेडियो, एक्सरे द्वारा फ्रेटो लेने का उद्योग, औषधि, ऊन, ऊनी कपड़े, कच्चा रेशम, केशर, पशु, घास, लकड़ी, धान्य, पत्थर, नेत्रवैद्यक (eye specialist) सक्‍तचंदन, साधा चंदन, (चंदन का व्यापार पारसी लोग करते हैं तथापि मलबार, म्हैसूर और कुर्ग प्रांत से ठोक पेकबंद माल लाकर बंबई और हिंदुस्थान के विभिन्न बड़े शहरों में पारसी लोगों को माल पहुँचाने के लिए बहुत से गुजराती यह व्यापार करते हैं।) मोटी रस्सी, (मोटी रस्सी तथा उसे बनाने का धंधा हिंदु लोगों में निचले वर्गों में कैकाडी, मांग, रामोशी, कातवडी, भील, कातकरी आदि करते हैं, किंतु हाल में मिलों के काम के लिए तथा नाविकों को जहाज ठहराने के लिए, नीचे से ऊपर, अधिक वजन का सामान ले जाने के लिए लगनेवाला रस्सा तथा अन्य छोटी रस्सी कलकत्ताव जर्मनी में बनाये जाते हैं और बंबई में नागदेवी स्ट्रीट पर इसके व्या पारी हैं।) दूत कर्म (पुराने जमाने में यह धंधा होता था, हाल में पोस्ट व टेलिग्राफ, टेलिफोन चालू होने से यह धंधा बंद हुआ है।)टेलिविजन। ये सब कारकत्व जन्म कुंडली तथा प्रश्न कुण्डली में विचार योग्य समझने चाहिए।

मेदिनीय ज्योतिष में उपयुक्त कारकत्व


हथियार, राजा, राज्य, राजकीय जंगल, किला,सर्वाधिकारी (Dictatorship) म्लेंच्छ, दूर्ग, शत्रु का स्वामित्व। पाश्चात्यज्योतिषियोंने दिया हुआ कारकत्व - नेता, राजकीय सत्ताधिकारी,धर्मगुरु, किसान, श्रीमानों का राज्य, म्युनिसिपालिटी, जिला कौन्सिल,

वगैरेह शासक संस्थाएं, उत्सवों के अध्यक्ष, परदेशों से व्यवहार करनेवाली संस्थाएं, थिएटर (Banqueting Hall), नृत्यमंदिर (वास्तवमें यह कारकत्व शुक्र का समझना चाहिये), प्रदर्शन ( यह राहु के कारकत्व में चाहिये।) कायदे बनानेवाले (एम. एल. ए. वगैरेह) परेदशों के राजदूत, स्नेह सम्मेलन तथा उत्सव (ये विषय भी शुक्र के ही अमल में चाहिये), राजप्रासाद, टाउन हॉल। रवि के प्रभाव से राजा अन्यायी व एकतंत्र होता है।

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शिक्षा में कारकत्व

Politics - देश की राजनीति यह विषय यूनिवर्सिटी में बी.ए.में पढ़ाते हैं।), Opthalmology नेत्र वैद्यक शास्त्र, अंग्रेजी भाषा, राष्ट्रभाषा, राजभाषा जैसे निजाम के राज्य में उर्दू, मैसूर में 

कानडी, कूचबिहार में बंगाली। इनको Court Languages कहते हैं।Anatomy शरीर शास्त्र ।
कहीं भी उपयोग न होनेवाला कारकत्व

व्याल (शेर), शैल (पर्वत), अब्धि (सागर), कांतार (जंगल),कुक्षि (कौरव), सौराष्ट्र का राजा, नदी का तट, मृत्युलोक, अयन,भीरूत्पन्न - डरपोक स्त्री से उत्पन्न हुआ ऐसा (One born to a timid woman) यह अर्थ अनुवादक पंडितभूषण व्ही, सुब्रम्हण्यशास्त्री, बी. ए. (बैंगलूर) देते हैं। किंतु 'भीरूत्पन्न' का अर्थ 'जिसको देखने से इसे किस तरह भाषण करें ऐसा भय उत्पन्नकरनेवाला' ऐसा है। तात्पर्य रवि के अमल में रहनेवाले आदमी चेहरे से और बोलने से रुबाबदार होते हैं। आकाश का अधिपति,कांटेदार वृक्ष ।

स्वभाव का कारकत्व - अति तीक्ष्ण, धैर्य, प्रयत्न, तपश्चर्या,दीर्घकोपी, शत्रुता, नियमितता, सात्त्विक।पाश्चिमात्य ज्योतिषी
Like the sun in the solarsystem, the Sun-leo person likes to be in the centre of every
thing as Supreme administrator.
यह स्वभाव का कारकत्व रवि के स्वभाव में प्राप्त करना होता है। अब राशि के अनुसार विभाग करके कारकत्व कहते हैं। अकेले रवि पर इतने विषयों का कारकत्व दिया गया है। वह एक ही राशि में या एक ही स्थान में देखने को नहीं मिलता। उदाहरण के लिए,पाश्चात्य ज्योतिषी ने रवि का एक कारकत्व स्कूल मास्टर ऐसा दिया है। यह चाहे जिस राशि के और चाहे जिस स्थान के रवि में नही मिलता। मिथुन या धनु राशि में एवं लग्न, तृतीय, पंचम,नवम, सप्तम और ग्यारहवें स्थान में रवि हो तो ही मास्टर होता है। दूसरा उदाहरण - धनु व तुला राशि में रवि हो तो कानून के पंडित होते है किंतु इन राशियों में वह स्थानबली हो तो ही कानून के पंडित होते हैं वृश्चिक में रवि हो तो सर्जन और डॉक्टर होते हैं, इसके लिए भी रवि स्थानबली होना चाहिए। इसलिए आगे विभाग करके लिखते हैं।

सूर्य को आत्मा, नेत्र कलेजा, अस्थि (हड्डी), इड़ा-नाड़ी, शारीरिक गठन, शक्ति, आरोग्य प्रभाव, प्रताप, व्यक्तित्व, निजी आचरण, उच्च बौद्धिक - विकास राज्य, ऐश्वर्य प्रभुत्व, सिद्धि, महत्वाकांक्षा, सत्वगुण, राज-कृपा, आविष्कार अधिकार तथा सत्ता का अधिपति माना गया है। इसे लग्न, धर्म तथा कर्म (1, 9, 10) भाव का कारक भी माना जाता है तथा इनके द्वारा श्री लक्ष्मी एवं विशेष रूप में पिता के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।

यह चिकित्सा तथा पदार्थ विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाला ग्रह है। यह मेरूदण्ड, स्नायु तथा उदर पर प्रभुत्व रखने के अतिरिक्त हृदय, मस्तिष्क, सिर, नेत्र, रक्त, फुफ्फुस तथा जठराग्नि को भी प्रभावित करता है। यह मन्दाग्नि, अजीर्ण, भगन्दर, अर्श, मधुमेह, हैजा, ज्वर, क्षय, अपेण्डिसाइटिस, सिर दर्द, नेत्र, विकार, अतिसार, अग्नि वृद्धि, अपस्मार, उदासीनता, खेद अपमान, कलह, चित विकार एवं मनोमालिन्य का भी प्रतिनिधि है।

यह सूर्य, राजा, रईस, अधिकारी, सैनिक, कुलीन, ब्राहमण, ख्यातिलब्ध- व्यक्ति, नाटयकार, औषध विक्रेता, सुनार तथा जौहरी आदि का भी प्रतिनिधित्व करता है।

सूर्य की धातु-सोना, उपधातु-तांबा, रत्न-माणिक, उपरत्न-लालड़ी, सूर्यमणि, धान्य-गेहूं, रस-गुड़, वस्त्र-लाल, पुष्प-रक्तकमल है। कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा सूर्य के नक्षत्र है। जन्म इन नक्षत्रों में हो तो सूर्य की महादशा होती है।इसकी मुख्य धातु तांबा है, परन्तु यह स्वर्ण पर भी अधिकार रखता है इसके अतिरिक्त यह धान्य, लाल चन्दन, यश्मीने की वस्तुऐं, ऊन, तृण,मूंगफली, सरसों, नारियल, बादाम, लाल रंग, लाल रंग के पुष्प तथा लाल रंग की गौ का भी प्रतिनिधि है। ऊपर जिन व्यक्तियों, अंगो, पदार्थों कार्यों तथा विषयों का उल्लेख किया गया है। उनके सम्बन्ध में सूर्य के द्वारा विशेष विचार किया जाता है।

सूर्य मधु (शहद) के समान पीले नेत्रोंवाला, चौकोर देहवाला, स्वच्छ कान्ति और पित्त प्रकृतिवाला, थोड़े बालों से युक्त दर्शनीय पुरुष ग्रह है।सूर्य सौरमण्डल का सर्वाधिक बली ग्रह है। इसे ग्रहों का राजा भी कहते हैं। रवि, हेली, भास्कर, विकर्तन, अहस्कर, तपन, पूषा, नभेश्वर, मार्तण्ड, दिवाकर, प्रभाकर, अर्क, अरुण, चित्ररथ आदि इसके पर्याय नाम हैं। यह कालपुरुष की आत्मा, पुरुष ग्रह, ग्रीष्म ऋतु का स्वामी, उत्तरायण में बलवान, पूर्व दिशा का स्वामी, तांबे के समान कालिमा लिए रक्त-श्याम वर्णवाला, सत्त्वगुणी, क्षत्रियवर्णी, तैजस्तत्त्वी, पित्तप्रधान प्रकृतिवाला और क्रूर ग्रह है। इसका स्थान देवगृह और देवता अग्नि है।
पिता, पिता का पराक्रम, रोगों के प्रतिकार की शक्ति, मन की पवित्रता, रुचि, ज्ञान का उद्गम, क्षत्रियों के कर्म, माणिक्य, पर्वत, जंगल, लाल वस्त्र, हड्डी, युद्धकला आदि का कारक सूर्य है। मेष राशि में सूर्य उच्च, सिंह राशि में मूल त्रिकोणी और तुला राशि में नीच होता है। चन्द्र, मंगल, बृहस्पति इसके मित्र ग्रह, बुध सम और शुक्र, शनि शत्रु ग्रह हैं। अशुभ सूर्य के कारण नेत्र रोग, अस्थि रोग, ज्वर, क्षय, अतिसार, कुष्ठ, शरीर में दाह, पित्तजन्य रोग होते हैं तथा राजा, देव, ब्राह्मण और नौकरों से भय रहता है।

🌞सूर्य🌞

मैने सूर्य के १०८ नामों से हवन किया। पूर्वकाल में भगवान् कृष्ण ने इन १०८ नामों से सूर्य का स्तवन किया था। सूर्य को नमस्कार करने से ऐहिक एवं स्वर्गीय सभी लाभ निश्चित रूप से प्राप्त होते हैं। अतः हम प्रतिदिन सूर्य को क्यों न नमन करें ?

 आदित्य, भास्कर, भानु, रवि, सूर्य, दिवाकर, प्रभाकर, दिवानाय तपन, वचनानांश्रेष्ठ, वरेण्य, वरद, विष्णु अना, वासवानुज, बल, वीर्य, सहस्रांश सहस्रकिरणद्युति, मयूखमाली, विश्व, मार्तण्ड, चण्डकिरण, सदागति भास्वान्, सप्ताश्व, सुखोदय, देवदेव, अहिर्बुध्य, धामनिधि, अनुत्तम, तप, ब्रह्ममयालोक, लोकपाल, अपाम्पति, जगत्यबोधक, देव, जगद्वीप, जगत्, अर्क, निश्रेयस पर, कारण, श्रेयसापर, इन प्रभावी, पुण्य, पतंग, पतंगेश्वर मनोवाञ्छितदाता दृश्फलप्रद अदृष्टफलमद, मह, महकर, हंस, हरिदश्य, हुताशन, मंगल्य, मंगल, मेध्य, ध्रुव, धर्मप्रबोधन, भव, सम्भावित, भाव, भूतभव्य, भवात्मक, दुर्गम, दुर्गविहार, हरनेत्र, श्यीमय, त्रैलोक्यतिलक तीर्थ, तरणि, सर्वतोमुख, तेजोराशि, सुनिर्वाण, विश्वेश, शाश्वत, धाम, कल्प, कल्पानल, काल, कालचक्र, क्रतुप्रिय, भूषण, मरुत्, सूर्य, मणिरत्न, सुलोचन, त्वष्टा, विष्टर, विष्व, सत्कर्मसाक्षी, असत्कर्मसाक्षी, सविता, सहस्राक्ष, प्रजापाल, अधोक्षज, ब्रह्मा, वासरारम्भ, रक्तवर्ण, महाद्युति, शुक्र, मध्यन्दिन, रुद्र, श्याम, विष्णु दिनान्त को हम नमस्कार करते हैं। इन १०८ नामों से सूर्य को नमन करने के बाद मैं १०८ की श्री से भूषित देवसदनम् के सूर्य श्री महाराज जी को प्रणाम करता हूँ।

अग्नि की सात जिह्राओं को तृप्त करने के लिये सामप्रियाँ भी सात रखी जाती हैं। १. सुगन्ध (अगर तगर चन्दनादि का चूर्ण)। २. गुड़़ (शर्करा)। ३. गोघृत (स्नेह)। ४. समिध् (शुष्क काष्ट)। ५. चावल । ६. यव । ७. काला तिल। ये सामग्रियाँ सात उपलब्धियों की प्रतीक हैं। सुगन्ध =यश ।गुड़:= मिठास, सुख। गोघृत = स्नेह, प्रेम ।समिध्= शुष्कता, दुःख ।चावल = सत्वगुण । यव = रजोगुण । कालातिल= तमोगुण ।हवन में ये सात साममियाँ सुख दुःख स्नेह यश सत् रज एवं तम की द्योतक हैं। इन सातों में सब हैं। अतः इन सातों के माध्यम से अग्नि को सब कुछ अर्पित किया जाता है। सूर्य परम ज्ञान, विशुद्ध बुद्धि, तेज, प्रज्ञा, धन, धान्य, सुख एवं पुत्र का दाता है। भगवान् सूर्य गर्भ के कारक हैं, जन्म के कारक हैं, मृत्यु के कारक हैं। परमदेव सूर्य को मेरा प्रणाम ।

हवन = समर्पण = अपना सर्वस्व न्यौछावर करना। यज्ञ में देना ही देना है, लेना कुछ नहीं, माँगना कुछ नहीं मिलता तो प्रारब्ध से है, मिलता है भगवत्कृपा से देने में आनन्द है। देने से आनन्द न मिले तो देना किस काम का ? देना = त्याग = आनन्द हवन का यही सूत्र है। अतः हवन आनन्द है मोक्ष। गर्भ की अग्नि में हवन किया जाता है। गर्भ = अग्नि का वासस्थान। गृ सेचने + भन्= गर्भ, हवन
जिसे सींचा जाता है, वह गर्भ है। सूर्य को तर्पण देते हैं, जल से सींचते हैं। इसलिये सूर्य गर्भ है। इस गर्भ में दिव्याग्नि रहती है। उदर को जल से सींचते हैं। उदर गर्भ है। इस गर्भ में जठराग्नि रही है। स्त्री के गर्भाशय को पुरुष अपने शुक्र से सींचता है। इसमें गर्भाग्नि रहती है। सेचन यज्ञ है। गर्भ में कामाग्नि रहती है। जठराग्नि, कामाग्नि दिव्याग्नि- ये तीन अग्नियाँ हैं। जठराग्नि अन्न और जल से शान्त होती, कामाग्नि वीर्यदान से तृप्त होती है। दिव्याग्नि अर्घ्य एवं स्तुति से प्रसन्न होती है। इन तीनों अग्नियों को सावधानीपूर्वक तृप्त/तुष्ट करने में आनन्द है। आनन्द ब्रह्म है, मोक्ष है। आनन्दाय नमः । गर्भाधान यज्ञ वेदविहित धर्म है। मन्त्रहीन गर्भाधान निन्द्य यज्ञ है। समन्व गर्भाधान प्रशस्त यज्ञ है। एकादश भाव के सन्दर्भ में मै वैदिक गर्भयश का वर्णन करता हूँ।
(यजुर्वेद ३४/१६)

अन्वय- इडायाः पृथिव्याः नाभा अधि पदे हव्याय वोढवे अग्ने । जातवेदः वयं निधीमहि ।

 इल् (तुदा. पर. इलति जाना सोना लेटना) + अच्. लस्य डत्वम् +टाप् = इडा = लेटी हुई, विस्तर पर पड़ी हुई।

 पृथ् (चुरा० एभ० पर्थयति-ते फैलाना विस्तृत करना) + वन् + ङीष्

 पृथ्वी= फैली हुई विस्तारित विस्तीर्ण।

 नाभा अधि पदे = नाभि के नीचे के स्थान में, उरू क्षेत्र में, उपस्थ / गुह्य स्थान में।

 हव्याय वोढवे = शुक्ररूप हवि को वहन करने के लिये।

 अग्ने= हे अग्नि देव ।

 जातवेदः वयम् = उत्पन्न / अनुभूत ज्ञान से युक्त हम, संज्ञान में स्थित हुआ मैं।

निधीमहि =स्थापित करते हैं, स्थापित करता हूँ। 

  मन्त्रार्थ- लेटी हुई स्त्री की सुविस्तृत जांघों के स्थान में अप्रमत्त हुआ संज्ञानस्य में शुक्ररूप हवि को देते हुए गर्भ की स्थापना करता हूँ। हे गर्भस्थ काम रूप अग्नि आप इसे स्वीकार करें। 

इस मंत्र को बढ़ते हुए, मन में उच्चारते हुए ध्यान करते हुए पुरुष गर्भ क्षेत्र का पेचन करता है। पुनः यह मन्त्र है-

 "सिनीवालि पृथुष्टके या देवानामसि स्वसा । जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिति नः ॥" 
( यजुर्वेद ३४/१० अथर्व. ७ / ४८/१)

 सिनीवालि =हे सिनीवाली । अमावस्या में चन्द्रमा दिखालाई पड़े तो उस अमावस्या वाली रात को सिनीवाली कहते हैं। सिनीवाली का अर्थ हुआ घोर अन्धकार में प्रकाश की किरण को दिखलाती निराशा में आशा का संचार करती- आशा की देवी हे सुख देने वाली सुन्दरी ! 

 पृथुष्टके = हे पृथुष्टुका । वह स्त्री जो अधिक स्तुति/प्रशंसा से प्रसन्न होती है, अत्यधिक प्रेमभावपूर्ण वाणी से वश में होती है। बिखरे हुए फैले हुए, दीर्घातिदीर्घ भने केशों वाली: अन्यकार सदृश काले केशों वाली: प्रफुल्लित मन एवं सुविकसित यौवन वाली देवी ।

या देवानाम् स्वसा असि = जो कि देवताओं की बहन है वा जिसके भाई विद्वान हैं अर्थात् तू भी विदुषी/देवी है, दिव्य गुणों से युक्त एवं सुखदात्री है। 

आहुतम् हव्यम् जुषस्व =अच्छी तरह से हवन की गई आहुतियों का प्रेमपूर्वक सेवन करो। गर्भाधान हेतु गर्भाशय रूप हवन कुण्ड में डाले गये हव्य रूप वीर्य को प्रीतिपूर्वक धारण करो। यह वीर्य गर्भ से बाहर निकलने न पाये। इसके लिये तू उठो न, विस्तर पर पड़ी रहो। 

 देविन: प्रजाम् दिदिड्डि = हे देवी ! हमें हमारे कुल को उत्तम अपत्य / प्रजा/ सन्तान / पुत्र प्रदान करो। प्र = प्रकृष्ट/ उत्तम। जा = अपत्य (निघण्टु २/२ ) । प्रजा का अर्थ यहाँ उत्तम गुणों वाली सन्तान से है। दिश/ दिह धातु का लोट् मध्यम पुरुष एक वचन रूप दिदिट्टि है। दिश देना, पारितोषिक देना। दि सुन्दर करना, संस्कार देना। 

【 सिनीवाली-कुहू= देवपत्न्यौ (निरुक्त ११/३/३१) अतएव देवपत्नी =विद्वान् पुरुष की पत्नी= सिनीवाली 'सिनमन्नं भवति सिनाति भूतानि निरुक्त वाक्य से अन्नदात्री/पर में भोजन बना कर खिलाने वाली गृहस्थ की भार्या ही सिनीवाली है पुनः सिनम् =षिञ् बन्धने से सिनीवाली यह स्त्री है जो पुरुष को अपने प्रेम पाश से बांधती है, प्रेम करती वा चाहती है।】

आगे के चार मन्त्रों में धाता, त्वष्टा, सविता एवं प्रजापति से गर्भाधान को सफल बनाने की प्रार्थना की गई है।

धातः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः । पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे ॥ १० ॥ 
त्वष्टः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः । पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे ॥ ११ ॥
 सवितः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः । पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे ॥ १२ ॥
 प्रजापते श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः ।
 पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे ॥ १३ ॥

मन्त्रार्थ-धातः । त्वष्टः । सवितः । प्रजापते । श्रेष्ठेन रूपेण अस्याः नार्याः गवीन्योः पुमांसम् पुत्रम् आधेहि, दशमे मासि सूतवे । 

हे गर्भ के मूलभूत धारक धातादेव । हे गर्भ को सुन्दर रूपाकृति प्रदान करने वाले त्वष्टा देव । हे गर्भ को उत्पन्न करने वाले सविता देव । हे उत्पन्न गर्भ के रक्षक पालक प्रजापति देव । अच्छी तरह से इस नारी की दोनो डिम्बनलिकाओं में पुमान् पुत्र का आधान करो, जिससे वह दसवें महीने में गर्भ से बाहर निकले।

 इन मन्त्रों में 'गवीन्योः' पद आया है। यह क्या है ? इसे अच्छी तरह से समझना है। स्त्री के गर्भाशय में दो डिम्बवाहिनी नलिकाएं होती हैं। इन्हें गवीनी कहा है। गम् + नीञ्- गवीनी =अण्डाणु लेकर चलने वाली।

 चित्र में इनकी स्थिति यहाँ है-(चित्र नीचे संलग्न है)

गवीनी = गर्भाशय नलिका = डिम्ब वाहिनी फैलोपियन ट्यूब स्त्री के आन्तरिक जननांग (पश्च पक्ष) का चित्र । (काट) गर्भाशय, योनि, अण्डाशय नलिका ।

गवीनी नलिकाएँ एक युग्मी अंग हैं। ये गर्भाशय के पार्श्व में उसके चौड़े स्नायु के ऊपरी भाग में स्थित होते हैं। ये अण्डाणु को अण्डाशय से गर्भाशय तक पहुँचाते हैं। गवोनी नलिका में दो छिद्र होते हैं। इनमें से एक छिद्र गर्भाशयी कोटर और दूसरा छिद्र अंडाशय के समीप पर्युदर्या कोटर में खुलता है। अण्डाशय के साथ सम्बन्धित गर्भाशयी नलिका का सिरा एक कीप की भांति मुड़ा हुआ होता है तथा गर्भाशयी नलिका का अन्तिम छोर तथाकथित झालर के रूप में होता है। अण्डाशय से बाहर निकल कर अण्डाणु इन झालरों में से गुजरते हुए गर्भाशय में आता है। गर्भाशयी नलिका (गवीनी) में अण्डाणु तथा शुक्राणु के मिलन के परिणाम स्वरूप निषेचन होता है। निषेचित अण्डाणु विभाजित होना आरम्भ होता है तथा एक भ्रूण विकसित होता है। विकसित हो रहा यह भ्रूण गर्भाशयी नलिका (गवीनी) में से होते हुए गर्भाशय में आ जाता है। गर्भाशय में इसका पूर्ण विकास होता है। यहाँ से दसवें महीने यह योनिद्वार से होता हुआ बाहर आता जन्म लेता है।

गवीनीनलिका को अंग्रेजी में फैलोपियन ट्यूब कहते हैं। इसमें विकार आने से गर्भ नहीं ठहरता। इसके लिये देवों से प्रार्थना की गई है। आधुनिक युग में सत्यक्रिया से तत्संबन्धी विकार दूर किया जाता है। 

एक अन्य गर्भाधान मन्त्र इस प्रकार है-

"हिरण्ययी अरणी यं निर्मन्थतो अश्विना ।
 तं ते गर्भ हवामहे दशमे मासि सूतवे ॥" 
( ऋग्वेद १०/१८४/३)

अरणी = शमी की लकड़ी का टुकड़ा जिसके घर्षण से यज्ञ के अवसर पर अग्नि जलाई जाती है, आग उत्पन्न करने वाली लकड़ी, यज्ञाग्नि प्रज्ज्वलित करने के लिये लकड़ी की दो समिधाएँ। ऋ (गतौ) + अनि = अरणि = सूर्य, अग्नि । संकोच एवं प्रसार की गति से युक्त होने के कारण तथा परस्पर के घर्षण से अग्नि उत्पन्न करने से स्त्री-पुरुष के यौनांग भी अरणी हुए।

 निर्मन्यतः = मचते हुए, क्षुब्ध करते हुए, रगड़ से आग पैदा करते हुए घुमाते हुए, ऊपर-नीचे/ आगे-पीछे गति करते हुए, चोट पहुँचाते हुए, आहत करते हुए। [निर् + मन्थ् मन्यति ,मध्नाति विडोलने ] । 

अश्विना = वेग पूर्वक, शीघ्रता से।

 हिरण्ययी= चित्ताकर्षक, परमधन रूप। 

 हवामहे= हवन करते हैं. वीर्य की आहुति देते हैं। 

तं से गर्भम् = उस मेरे गर्भ को । 

यं = जो।

 दशमे मासि सूतवे = दसवें महीने में (उसे) उत्पन्न होने के लिये ।

मन्त्रार्थ- स्त्री का भग और पुरुष का शेफ ये दोनों हिरण्ययी अरणियां-पिताकर्षक समिक्षा के दो टुकड़े हैं। वेग से मथते हुए-मैथुन करते हुए इस गर्भ में हम वीर्य का आधान करते हैं, जिससे दसवें मास पुत्र उत्पन्न होवे। गर्भाधान कर्म एक प्राकृतिक यज्ञ है। ऋषियों ने इस यज्ञ को पवित्र भाव से मुक्त होकर करने के लिये कहा है। इस यज्ञ का अधिदेवता काम (अनंग) है; स्त्री यजमान है, होता पुरुष है। इस यज्ञ का फल है-पुत्र प्राप्ति। यदि यह फल नहीं मिला तो यज्ञ व्यर्थ है। हवन कुण्ड से बाहर जो आहुति गिरती है, वह व्यर्थ जाती है। प्रज्ज्वलित अग्नि में आहुति पड़ने से अग्नि प्रदीप्त होती है। स्त्री को गर्भाग्नि में वीर्य की आहुति पड़ने से लाभ होता है। आज कोई इस लाभ के लिये लालायित है तो कोई इससे बचना चाहता है। वह योनि का उपयोग करता है किन्तु उसमें आहुति नहीं डालता। यह काल का खेल है। इसे कौन जान सकता है ? मैं इस महायज्ञ का समर्थक एवं कर्ता हूँ, वौर्य को नष्ट करने, व्यर्थ व्यय करने का विरोधी हूँ। वीर्य स्वयं विष्णु है। विष्णु को अपने में से क्यों बाहर फेंका जाय ? इस विष्णु वीर्य से विष्णु का यजन करना ही उचित है। यह आर्ष धारा है। इस धारा में स्नान करने वालों को मेरा नमस्कार ।

प्रकृति हिरण्यगर्भा है। यह समस्त जीवों को अपने अक्षय गर्भ में धारण करती है। इन जीवों का पिता द्युलोक है। भूलोक और लोक हमारे माता पिता हैं। इन्हें हमारा प्रणाम ।
√★★सूर्य को भगवान् कहते हैं ,
   【भ= भाति, ग = गच्छति। 】
       जो चमकता है जो चलता है अथवा जिसके प्रकाश में चमक एवं गति होती है, वह भग है। जो भग से युक्त है, वह भगवान् है। वाक्य है-

 "भग एव भगवाँ २ अस्तु
 देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम ।"
(यजु. ३४ । ३८ ।, - अथर्व. ३ | १६ | ५ | ,- ऋक् ७ । ४१ । ५।)

√★भग = ज्योति। ज्योति सम्मुख मैं प्रार्थना करता हूँ-

"भग प्रणेतर् भग सत्यराधो
भगेमां धियमुदवा ददन्न ।
 भग. प्र जो जनय गोभिरश्वैर्
 भग प्र नृभिर् नृवन्तः स्याम ॥"
( यजु. ३४ । ३६ ।, - अथर्व. ३ । १६ । ३ ।, - ऋक्. ७ । ४१ । ३ ।)

√★भग प्र. नेतः = हे भग । तू मार्ग दर्शक है।

√★ भग सत्य राधः = हे भग! तू शाश्वत धन है।

 √★भग इमाम् वियम् उत् अव =हे ज्योति हमारी इस बुद्धि को तू दीप्त कर कर्म में लगा / बढ़ा। ! 

√★आ ददत् नः (अव) = लक्ष्मी को प्रदान करते हुए तू हमारी रक्षा कर, हमें सन्तुष्ट कर। [आ=लक्ष्मी]

√★भग नः प्रजनय = हे ज्योति । हमें प्रजनन क्षमता प्रदान कर।

√★भग गोभिः अश्वैः प्रनृभिः नृवन्तः स्याम = हे ज्योति । मैं गौओं (दुग्धादि पोषक पदार्थों), अश्वों (चार पहिया वाले वाहनों), सेवकगणों के साथ-साथ (से युक्त होकर) परिवार वाले (पुत्र-पौत्रादि से युक्त) होऊं ।

√★देने वाले अनेक हैं, सब से अधिक देने वाला एक है। यह एक ही सूर्य है इसे इन्द्र कहते हैं। इन्द्र आँख है, इन्द्र ज्योति है, इन्द्र अग्नि है। जो इससे मांगता है, उसे अन्य किसी से माँगने की आवश्यकता नहीं रहती। फिर इसी ज्योति से क्यों न माँगा जाय ? क्योंकि यह भूरिदा है, भूरिधा है। 
     मन्त्र है...

"भूरिदा भूरि देहि नो
 मा दभ्रं भूर्या भर
 भूरि धेदिन्द्रदित्सति ॥" 
(ऋग्वेद ४ । ३२ । २०)

√★भूरि धा इत् इन्द्र दित्सति = हे इन्द्र । तू बहुत रखते हो, देने की इच्छा भी रखते हो। भूरिदा भूरि देहि नः = बहुत देने वाले हो हमें खूब दो। मा दभ्रम् = कमनहीं। भूरि आ भर= अमित दान से तृप्त करो।

[भूः + इव= भूर् इव =भूरिव =भूरि ,वकारस्य लोपः भूरि का अर्थ है, भूमि/पृथिवी जैसा  । विस्तृत मात्रा में अधिक अर्थात् बहुत । भूरि= पृथिवी सदृश विपुल दाता, सर्वदाता, अमित अतिशय ॥]

√★मार्गशीर्ष अस्या की रात में मैंने भूरिदा भूरिया अग्नि को हविष्यान्न की आहुति दी। उन्होंने इसे हँसते हुए स्वीकार किया। इसलिये इन्द्राय नमः ।

√★ ब्राह्मण मुख अग्नि है। अग्नि का उपासक ब्राह्मण है। अग्नि =ब्राह्मण। पार्थिव अग्नि में वा ब्राह्मण के मुख में हवन करने का फल एक ही है। यह तृप्तिदाता है। यह तृप्त करने वाले को तुष्ट करता है। यह सब प्रकार के धनों को देता है। मन्त्रोऽयम्- 

"सं समिद् युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ।
 इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर ।"
( अथर्व ६ । ६३ । ४, यजु. १५ । ३० ऋ. १० | १९१ । १ ।)

√★समिद् (सम्+इ गती)= सर्वत्रगतिशील, सर्वव्यापी। 

√★सम्-युवसे (सम्+ यु मिश्रणे अमिश्रणे वा) = सबको अपने में मिलाने वाले जलाकर भस्म बना देने वाले, अग्निमय करने वाले, द्रव्य के अवयवों को उनसे पृथक् करने वाले अर्थात् अति सामर्थ्यवान् ।

√★वृषन् (वृष् वर्षणे) = प्रकाश एवं ताप की वर्षा करते हुए ज्ञान एवं तेज प्रदान करने वाले।

√★विश्वानि अर्यः आ = सम्पूर्ण श्रेष्ठ लक्ष्मी स्वरूप, सर्वशुभ धन ।
 [अव् + ड + टाप् = आ = लक्ष्मी, चञ्चला, अव् गतौ ! ]

√★इङः पदे = वाणी की गति में, जिह्वा में स्थित अमोद्य वाक् रूप ।

 √★समिधि-असे = ईधन समिधादि में विद्यमान । 

√★सः = वह तू सूर्यरूप ।

√★ अग्ने = हे अग्नि !

√★वसूनि नः आ भर = सब प्रकार के धनों से हमें परिपूर्ण कर।

√●●मन्त्रार्थ = हे सर्वव्यापी, सबको परस्पर मिलाने एवं पृथक् करने वाले, प्रकाश और ताप को देने वाले, वाणी में निवास करने वाले, समिधादि में गुप्त रूप से रहने वाले, सम्पूर्ण श्रेष्ठैश्वर्यो के विग्रह, सूर्य रूप अग्नि देव ! आप हमें सब धनों (लौकिक अलौकिक सम्पत्तियों) से तृप्त करें। 

√●अग्नि से बड़ा जैसे कोई दाता नहीं है, वैसे ही उससे बढ़कर कोई रक्षक नहीं है। अपनी रक्षा के लिए मैं अग्नि की गुहार लगाता हूँ। 

"पाहि नो अग्ने रक्षसः 
पाहि धूर्तेरराव्णः |
 पाहि रीषत उत वा जिघांसतो
 बृहद्भानो यविष्ट्य ॥"
( ऋग्वेद १ । ३६ । १५ ।)

√◆हे अग्ने । आप दुष्टविचार वालों (राक्षसों से हमारी रक्षा करें। आप ठगों (भूतों) से मेरी रक्षा करें। आप न देने वाले उधार दिये हुए धन को न देने/ वापस करने वाले (राव्णों) से हमारी रक्षा करें। आप हिंसकों (रोषतों से हमारी रक्षा करें। आप मारने की इच्छा रखने वाले विद्यांसों से हमारी रक्षा करें। हे बृहद्भानो (महान् चमक वाले) । हे यविष्ठ्य (सब से छोटे, अणुरूप, अन्तर्यामी) । आप मेरी भलीभाँति रक्षा करें।

√●【धूर्ति = हिंसा का स्वभाव, दुष्टता शठता। धूर्ति →धूर्तेः शाष्ठ्यात् = दुष्टतापूर्ण व्यवहार से ।अराव्णः= अदातुः = जो लेता है किन्तु देना नहीं चाहता, ऐसे लोगों से ऋण लेकर उसे वापस न करने वालों से ।नञ् + रा दाने + व निप् = अरावणः। रिष् हिंसायाम्→रिषतः = हिंसकात् हत्यारों से, पापियों से। जिघांसतः = हन्तुमिच्छत मारने की इच्छा वाले से क्षतिकरों से ।रक्ष पालने + असुन् रक्षस् → रक्षसः = रक्षा करने के साधनों से राक्षसात्। रक्षस्= मच्छर, रोग के कीटणु विषैले दाँतों वाले प्राणी पाप प्रवृत्ति के लोग अमर्यादित वाममार्गी, लोलुप लम्पट वलात्कारी, डकैत अपहर्ता, अनाचारी, तामसी प्रवृत्ति वाला। रक्षसः = कुसित लोगों से।】

√●हमारा रक्षक सर्वभक्षक अग्नि बृहद्भानु एवं यविष्ठ्य है। यह बृहत्तम एवं अणुतम होने से सर्वत्र सर्वदा है। इस से अधिक सुलभ रक्षा का साधन क्या हो सकता है ? अग्नये नमः ।

√● जिसमें भग है, वह भगवान् है। जहाँ भग है, वहाँ भगवान् है। जब तक भग है, तब तक भगवान् है। जहाँ तक भग है, वहाँ तक भगवान् है। भग से भगवान् है, भगवान से भग है। आकाश में भग है, आकाश भगवान् है। आकाश में ज्योतिर्मय पिण्ड हैं। इनमें भग है वा ये भगरूप हैं। इसलिये ये सब भगवान् हैं। इन सब भगवानों का आश्रय होने से शून्य को महाभगवान् कहते हैं। भगवान् अनेक हैं, महाभगवान् एक है। अनेक भगवान् ससीम हैं। एक महाभगवान् शून्य ही असीम अपार अनादि अनन्त अजन्मा अरूप अनूप है। 

√●एक-एक तारा (सूर्य) एक-एक भगवान् है। प्रत्येक भगवान् अपने अपने विश्व (सौर परिवार) का स्वामी है। इस दिव्य भगवान् सूर्य से अनेकों पार्थिव भगवान् हुए । पृथ्वी चन्द्रमा भौम बुध गुरु शुक्र शनि_आदि पार्थिव भगवान हैं। इन्हें जो भगवता प्राप्त हुई है, उसका दाता सूर्य है। पृथिवी जीव भगवान् है। इस जीव भगवान् से चर-अचर भगवान् उद्भूत हुए हैं। सभी प्राणी भगवान् । मनुष्य पशु खग सर्प कीट जलचर आदि भगवान् हैं। पर्वत से धूलकण तक तथा हाथी से चींटी तक सब भगवान् हैं। तरु से तृण पर्यन्त सस्य भगवान् है मानव देह लघु ब्रह्माण्ड है। इसमें नेक सृष्टियाँ हैं। इनमें अनेक जीव है, जो कि एक-एक कोशीय से लेकर बहुकोशीय हैं। इनके लिये यहशरीर पृथिवी है। ये सब इससे उत्पन्न होकर इसी में मिलते (मरते) रहते हैं, इसी से पलते हैं। इन सीमित भगवानों की संख्या का पार नहीं पाया जा सकता। जैसे पृथ्वी पर उद्भिज प्राणी हैं, वैसे शरीर पर स्वेदज जीव रहते हैं। इन जीवों में भी जीव रहते हैं। सृष्टि में सृष्टि सृष्टि के बाहर सृष्टि, सृष्टि ही सृष्टि है। ये सभी सृष्टियाँ भगवान् हैं। इन सब में प्राण है। प्राण सूर्य से है। इसलिये सूर्य इन सब सृष्टियों में प्राणरूप से विद्यमान है। सूर्य की इस प्राण रूप भगवत्ता से ये सब भगवान् हैं। भगवान् की संतति भगवान् है। लघु से लघुतर तथा लघुतम सृष्टि का अन्त नहीं है। महत् से महत्तर तथा महत्तम सृष्टि का पार नहीं। इन अगण्य सृष्टियों के भगवान् मिथ्या हैं। मिथ्या भगवानों की सत्यता मैं देखता हूँ।

√●हर एक विश्व में केवल एक सत्य भगवान् है। सूर्य सत्य भगवान् है। भगवान् द्विखण्डात्मक है। इन दो खण्डों को एक दूसरे से पृथक् नहीं समझना / जानना है। भगवान् अखण्ड है। इस अखण्ड तत्व में मृदु-कठोर / चर-अचर/ स्त्री-पुरुष गुण है। इसलिये यह द्वैध है। इस द्वैधता के कारण उसे लक्ष्मी नारायण/ सीताराम / राधाकृष्ण गौरीशंकर कहते हैं। इसे स्पष्टता से यों समझना बहाये। सूर्य एक सत्य भगवान् है। इस भगवान् प्रकाश एवं उष्मा/ दीप्ति एवं ताप अपृथक् होकर दो प्रभाव वाले हैं। प्रकाश से देखा जाता है, ज्ञान होता है। उष्मा से जलन होती है। दीप्ति वा प्रकाश सौम्य भाग है। उष्मा वा ताप कृच्छ्र भाग है। सौम्य भाग स्त्री है। कुछ भाग पुरुष । दीप्ति = लक्ष्मी/सीता/राधा/गौरी ताप = नारायण / राम / कृष्ण / शंकर सूर्य की दीप्ति एवं ताप सर्व अथक हैं इसे हम इस प्रकार कह सकते हैं कि लक्ष्मीनारायण / सीताराम / राधाकृष्ण/ गौरीशंकर (अर्धनारीश्वर) परस्पर अपृथक् हैं। उष्मा प्रकाश है, प्रकाश उष्मा है का अर्थ है- शंकर पार्वती है, पार्वती शंकर है; राम जानकी है, जानकी राम है, कृष्ण रुक्मिणी है, रुक्मिणी कृष्ण है; विष्णु लक्ष्मी है, लक्ष्मी विष्णु है। इस प्रकार भगवान् के द्वैधीभाव की उपासना लोक में न जाने कब से होती चली आ रही है। यह द्वैत वास्तव में अद्वितीय है। भगवान् ने मनुष्य को बनाया है, मनुष्य ने उस भगवान् को बनाया है-लाकर खड़ा किया है। जैसा मनुष्य है, वैसा उसका भगवान् है। सबके अपने अपने भगवान है। आस्था एवं विश्वास की नींव पर ये सब इनके भगवान् टिके हैं।

√●●अपनी ऊहा से लोगों ने भगवान गढ़ा है, मूर्तरूप दिया है, निराकार-साकार, काला गोरा, अकेला स्त्रीवाला, निकट दूर का, भीतर-बाहर का ऐसा-वैसा आदि कहा/ माना है। मनुष्य ने अपनी वासना का आरोप भगवान् में किया है। जातीय प्रभाव, पारिवारिक संस्कार भौगोलिक परिवेश सामाजिक परिस्थिति राष्ट्रीय चेतना भौतिक अवस्था (उन्नति-अवनति) एवं व्यक्तिगत अनुभव से मनुष्य ने भगवान् का निर्माण किया है। ऐसा उसने स्वार्थ में किया है। उसे भगवान् की आवश्यकता है। साहित्य कला शिल्प प्रथा उत्सव, कर्मकाण्ड सब कुछ उनके इन भगवानों से ओतप्रोत है। मनुष्य भगवान् को मानता है, अतएव भगवान् है। मनुष्य भगवान् को अस्वीकारता है, इसलिये भी भगवान् है। मनुष्य को भगवान् से अपेक्षाएँ हैं। इस कारण वह भगवान् को बुलाता है, खोजता है, पकड़ लेने का दावा करता है। मनुष्य भगवान् को ले कर झगड़ता है। वह भगवान् की ओर भागता है, भगवान् उसकी ओर भागता है। यह खेल कब से चल रहा है ? क्या पता ! इस खेल का अन्त नहीं है। स्वार्थी मनुष्य की अनेकों अपेक्षाओं को पूरा करने के भय से भगवान् छिपा हुआ है। मनुष्य भगवान् को मूर्ख बनाना चाहता है, भगवान् ऐसे मनुष्यों को मूर्ख बना देता है। अस्वार्थी निश्छल प्रेमी जनों के पास भगवान् प्रकट रहता है। ऐसे अद्भुत भगवान् को मैं अपने मन बुद्धि से देखता हूँ। भगवते नमः ।
★★★★सूर्य ग्रह ★★★★

√●श्रीमद्भागवत पञ्चमस्कन्ध अध्याय २० का संबंध सूर्य से है। द्युलोक तथा भूलोक के बीच की संधि का नाम अन्तरिक्ष है-'अन्तरिक्षं तदुभयसंधितम् ।' इस संधि के मध्यभाग में स्थित भगवान् सूर्य तीनों लोकों को तपाते और प्रकाशित करते हैं...

 "यन्मध्यगतो भगवांस्तपताम्पतिस्तपन आतपेन त्रिलोकी प्रतपत्यवभासयत्यात्मभासा ।"

√● वे भगवान् सूर्य उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुवत् नाम वाली क्रमशः मन्द, शीघ्र, सम गतियों से चलते हुए मकरादि राशियों में ऊंचे, नीचे, सम स्थानों में क्रमपूर्वक जा कर दिन को बड़ा, छोटा, समान करते रहते ...

"स एष उदगयन दक्षिणायन वैषुवत संज्ञाति मान्द्य शैघ्य समान अभिगतिष्टि आरोहरावरोहण समान स्थानेषु यथासवनमभिपद्यमानो मकरादि राशिष्वहोरात्राणि दीर्घ ह्रस्व समाननानि विद्यते।"

√●उत्तरायण का सूर्य तपन कारक है।

 दक्षिणायन का सूर्य शीतकारक है।

√●जब सूर्य भगवान् मेष या तुला राशि पर आते हैं, तब दिन एवं रात समान होते हैं...

 "यदा मेषतुलयोर्वर्वते तदाहोरात्राणि समानानि भवन्ति।" 

√●जब वृषभादि पांच राशियों में चलते हैं तब प्रतिमास रात्रियों में एक-एक घटी की कमी होती जाती है तथा उसी अनुपात में दिन बढ़ते जाते हैं ...

"यदा वृषभादिषु पञ्चसु च राशिषु चरति सहान्येव वर्धने हसति च मासि मास्येकैका घटिका रात्रिषु।"

√●जब वृश्चिकादि पाँच राशियों भगवान् सूर्य चलते हैं तब दिन और रात्रियों में इसके विपरीत (रात्रियों में एक-एक घटी की वृद्धि तथा दिनों में एक-एक घटी का ह्रास) परिवर्तन होता है...

"यदा वृश्चिकादिषु पञ्चसु वर्तते तदाहोरात्राणि विपर्याणि भवन्ति।"

√●इस प्रकार दक्षिणायण आरंभ होते तक दिन बढ़ते रहते हैं तथा उत्तरायण लगने तक रात्रियाँ बढ़ती रहती हैं...

 "यावद्दक्षिणायन महानि वर्धन्ते यावदुदगयन रात्रयः ।"

√●सूर्य जिस मार्ग पर चलता हुआ प्रतीत होता है उसे राशि चक्र / नक्षत्र वीथी कहते हैं। इसमें २७ नक्षत्रों की २७ संधियों होती है अथवा, १२ राशियों की १२ संधियों होती है। इसमें नक्षत्रों एवं राशियों की ३ गण्डमूल संधियां होती है। इस संधियों को गाँठ कहते हैं। दो खण्डों का जोड़ गांठ होता है। इसे पर्व कहते हैं (पर्व = ग्रन्थिं)। पर्व युक्त होने से राशिपरिपथ को पर्वत भी कहते हैं। श्री मद् भागवत महापुराण में इस परिपथ को मानसोत्तर पर्वत कहते हैं।

√● मानसोत्तर = मान + सोत्तर सोत्तर उत्तर उत्तर = उत् + तर ।

√●यह पथ ऊपर आकाश में होने से उतू (श्रेष्ठ) है। इस पथ को सूर्यादि पह पार कर करते हैं। अतः यह तर (पार्य) है। श्रेष्ठता एवं पार्यता से युक्त होने के कारण यह पथ सोत्तर है। इस पथ को एक निश्चित माप है। जिससे यह मान युक्त है। इस प्रकार इस का नाम मानसोत्तर पर्वत पड़ा है। सूर्य इस पथ पर एक अहोरात्र में चल लेता है। यह परिक्रमा मार्ग नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन 

 "एवं नव कोटय एक पञ्चाशल्लक्षाणि योजनानां मानसोत्तरगिरि परिवर्तनस्योपदिशन्ति ।"

√●उस मेरु पर्वत के पूर्व की ओर इन्द्र की देवधानी, दक्षिण में यमराज की संयमनी, पश्चिम में वरुण की निम्लोचनी और उत्तर में चन्द्रमा की विभावरी नाम की पुरियों है...

 "तस्मिन्नन्द्री पुरी पूर्वस्मान्मेरोदेवधानी नाम दक्षिणतो याम्यां संयमनी नाम पश्चाद्वारुणी निम्लोचनी नाम उत्तरतः सीम्या विभावरी नाम।" 

√●इन पुरियों में मेरु के चारों ओर समय-समय पर सूर्योदय, मध्याह, सायंकाल एवं अर्धरात्रि होती रहती. है, इन्हीं के कारण सभी जीवों में प्रवृत्ति निवृत्ति है...

 "तापूदयमध्याहास्तमर्यानिशीथानीति भूतानां प्रवृत्तिनिवृत्तिनिमित्तानि समय विशेषेण मेरोश्चतुर्दिशम्।"

√●एक अहोरात्र वा ६० घटी में सूर्य द्वारा तय की गयी दूरी = ९,५१००००० योजन।

√●इसलिये, १५ घटी में सूर्य द्वारा तय की गई दूरी 
=९,५१,००००० X १५/६० = ९,५१,००००० X१/४ = २,३७,७५००० योजन।

√●सूर्य देव जब इन्द्रपुरी से यमपुरी (पूर्वदिशा से दक्षिण दिशा) को चलते हैं, तब १५ घटी में सवा दो करोड़ (२,२५०००००) तथा साढ़े बारह लाख (१२५००००) योजन से अधिक दूरी चलते हैं

''यदा चैन्द्रयाः पुर्याः प्रचलते पञ्चदशघटिकाभिः याम्यां सपाद कोटिद्वयं (२,२५,००,०००) योजनानां सार्घद्वादश लक्षाणि (१२,५०,०००) साधिकानि (००,२५,०००) चोपयाति ।'

 २,२५००००० + १२,५०००० + कुछ अधिक (अर्थात् ००,२५०००) = २३७७५००० योजन।

 √●इस प्रकार इन्द्र पुरी से यमपुरी तक की दूरी = २ करोड़ ३७ लाख ७५ हजार योजन। इतनी ही दूरी यमपुरी से वरुण पुरी तक, वरुणपुरी से चन्द्रमा की पुरी तक तथा चन्द्रपुरी से इन्द्रपुरी तक की है।

 √●सूर्य का रथ (पिण्ड) एक मुहूर्त में ३४ लाख ८ सौ योजन चलता है। इस प्रकार यह वेदमय रथ चारों पुरियों का चक्कर लगाता रहता है...
"एवं मुहूर्तेन चतुखिंशल्लक्ष योजनान्यताधिकानि सौरो रथखपीयोऽसौ चतसृषु परिवर्तते पुरीष पुरीष।'

 【यहाँ १ मुहूर्त का मान २८ घटी से कुछ कम है =२७ .४०९८/४२५१ घटी】

√● सूर्य की गति २ हजार दो सौ योजन प्रति क्षण है। ये ९ करोड़ ५१ लाख योजन के परिपथ को इसी गति से तय करते हैं 

"लक्षोत्तरं सार्धनवकोटि योजन परिमण्डलं भूवलयस्य क्षणेन सगव्यत्युत्तरं द्विसहस्रयोजनानि  स भुड़्क्ते।"

【 यहाँ १ क्षण = ११/१६००४ मुहूर्त अथवा १ मुहूर्त = १५४५. ९/११ क्षण】

 √●सूर्य का देदीप्यमानपिण्ड ३६ लाख योजन की परिधि वाला है ।

 "रथनीडस्तु षट्त्रिंशाल्लक्षयोजनायतः ।"

√● सूर्यपिण्ड अरुणवर्ग का है। इसमें सप्तवर्णात्मक किरणें (हव/ अश्व/छन्द) है...

"यत्र हयाश्छन्दोनामान सप्तारुणयोजिता वहन्ति देवमादित्यम् ।"

√●उदीयमान एवं अस्तमान सूर्य अरुण वर्ण का होता है- पुरस्तात् सवितुररुणः पश्वाच्च नियुक्तः सौत्ये कर्मणि किलास्ते।'

 √●सूर्य के आगे ६० हजार सूक्ष्माकार बालखिल्यादि अषि निरनतर स्वास्तिवाचन करते रहते हैं ..

"तथ बालखिल्या ऋषयोष्ठपर्वमात्राः षष्टिहाणि पुरतः सूर्य सूक्तवाकाय नियुक्ताः संस्तुवन्ति।"

√●यहाँ ६० हजार बालखिल्यादि ऋषि = ६० की संख्या के अनन्त चक्र

यथा,
 ६० वर्ष = १ चक्र।
६० दिन = १ ऋतु।
६० घटि = १ अहोरात्र।
६० अंश = १ अर।
६० कला = १ अंश।
६० विकला = १ कला।
६० प्रतिकला =१ विकला।
६० तत्प्रतिविकला = १ प्रतिविकला।
१ घटि = ६० पल।
१ पल = ६० विपल।
१ विपल =६० अनुपल।
१ घंटा = ६० मिनट।
१ मिनट = ६० सेकेण्ड।
१अंगुल = ६० व्यंगुल।

 √●इस प्रकार प्रयोग में ६० के चक्र का कोई अन्त नहीं है। श्रीमद्भागवत में सूर्य सम्बन्धी जो कुछ ज्ञान है वह अत्यंत गूढ़ है सूक्ष्म है। अधिकारी भेद से यह प्रकट होता है। इसे समझना तथा समझाना दोनों कठिन है। इसके लिये मैं सूर्य से प्रार्थना करता हूँ ...

"हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
 तत् त्वं पूषन् अपावृण सत्यधर्माय दृष्टये ॥"
          -( ईशावास्योपनिषद् १५ )

√●जिस भाव में सूर्य रहता है, वह भाव ऊर्ध्व मुख कहलाता है। जिस भाव में चन्द्रादि मह रहते हैं वह भाव तिर्यङ्मुख होता है। जिस भाव में कोई यह नहीं रहता, वह अधोमुख होता है। इससे स्पष्ट है-सूर्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है यह सुगन्धि (कीर्ति) का विस्तार करता है, यश और प्रतिष्ठा देता है, सम्मान बढ़ाता है, स्वाभिमान का द्योतन करता है।

√●दशमस्थ बलवान् सूर्य जातक को राजसत्ता से जोड़ता है।

 √●यह सूर्य न कभी अस्त होता है, न उदय होता है। उसको, जब छिपता है-ऐसा मानते हैं, तब वह दिन का अन्त करके अपने को दूसरी ओर दिखलाता है। इधर रात्रि करता है दूसरी ओर दिन। और जब उसको प्रातः काल उदय होता है ऐसा मानते हैं, तब वह रात का अन्त करके अपने को विरीत दिखलाता है। इधर दिन करता है और दूसरी ओर रात पर वह कभी छिपता या निकलता नहीं, वह कभी भी छिपता नहीं निकलता नहीं ।

 "स वा एष न कदाचनास्तमेति, नोदेति ।
 तं यदस्तमेतीति मन्यन्तेऽन्हमेव तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते ॥ रात्रीमेवावस्तात् कुरुतेऽहः परस्ताम् ।। 
अथ यदेनं प्रातरुदेतीतिमन्यन्ते ।
 रात्रेरेव तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते ॥ हरेवावस्तात् कुरुते रात्रिं परस्तात् ।
 स वा एष न कदाचन नि-प्रोचति न ह वै कदाचन नि-प्रोचति ॥" 
       ( ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ४।६)

 √●इस महान् सत्य का साक्षात्कार ऋषियों ने किया था। आधुनिक वैज्ञानिक ऐतरेय ब्राह्मण के इस कथन को पढ़ कर हतप्रभ हो जाते हैं। हमें अपने पूर्वजों के इस ज्ञान पर गर्व है। मैं अपनी इस ज्ञान परम्परा के सामने श्रद्धा से सिर झुकाता हूँ।

√●●सूर्य के गुण धर्म-उप स्वभाव, क्षत्रियवर्ग, प्रौढ़वय, चतुरस आकार, ऊर्ध्वदृष्टि, कटु स्वाद, मोटा व रक्तस्याम रंग, देव स्थान, ताम्र खनिज, सत्व गुण, अग्नि तत्व, पुंलिंग, पित्त प्रकृति, मध्यम शरीर, शहद समान नेत्र, अल्पकेश, श्रेष्ठ रूप, शुष्क- स्थिर मति, अस्थि धातु, दक्षिण पार्श्व, आशीर्षमुख प्रभाव, दक्षिण नेत्र, पित्तरोग, मध्याह्नकाल वली, दशमभाववली, पशुभूमि, वनस्थान, पर्वत वास, ग्रीष्म अतु, पूर्वदिशा, अयन (६ मास) समय, काष्ठ चतुष्पद व्रण, पाप ग्रह, शिव-देवता, राजा पदवी, आत्म कारक, पितास्वरूप, गौरिक दीप्ति, वैद्यक शास्त्र, व्याकरण विद्या, कीर्तिविजय-सम्मान-पद-प्रदाता ।
भीतर से दृढ़ एवं ऊंचा वृक्ष वृक्ष-मूल।

√●मित्र ग्रह चन्द्र मंगल गुरु। 

√●सम ग्रह- बुध।

 √●शत्रु ग्रह शुक्र शनि राहु । 

√●एक पाद दृष्टि- ३ । १०, 

√●द्विपाद दृष्टि ५ ९, 

√●त्रिपाद दृष्टि- ४ । ८, 

√●चतुष्पाद (सम्पूर्ण) दृष्टि ७ । 

√●कारक भाव- १, ९, १०।

 √●हर्षस्थान- ९। 

√●भाग्योदय वर्ष २२। 

√●प्रभाव वर्ष ५० ।

 √●राशि चक्र परिभ्रमण वर्ष - १

 √●मध्यम राशि भ्रमण काल- १ मास।

 √●नक्षत्र चार समय- १३ दिन ।

 √●दीप्तांश-१५। 

√●दैनिक मध्यम गति- ५९', ८" ।

 √●शीघ्र गति - ६०, ४"।

 √●परमशीघ्र गति - ६१' । 

√●गोचर से निन्द्य स्थान- ४, ८, १२ । 

√●गोचर से पूज्य स्थान- १, २, ५, ७, ९ ।

√● गोचर से शुद्ध स्थान- ३, ६, १०, ११ ।

 √●बलवत्तम भाव १० ।

√● स्वगृह राशि-५ ।

√●अस्त राशि - ११ ।

 √●उच्च राशि एवं परमोच्चांश मेष १०°।

 √●नीच राशि एवं परमनीचाश- तुला १०°।

 √●मूलत्रिकोण राश्यंश सिंह २०° । 

√●मित्र राशि- १, ४, ८, ९, १२ । 

√●शत्रु राशि- २, ७, १०, ११ ।

 √●सम राशि- ३, ६ । 

√●स्वराशि-५ । 

√●चेष्टावली राशि- १०, ११, १२,९, २, ३ ।

 √●राशिचार फल- प्रवेशारंभ।

√●सूर्य मेष राशि के दशवें अंश में परमोच्च होता है इस कथन के सन्दर्भ में मैं महाभारत के एक उपाख्यान की चर्चा करता हूँ।

√●विश्वकर्मा की पुत्री का नाम संज्ञा संज्ञा का विवाह सूर्य से हुआ। एक बार संज्ञा ने अपने पिता के घर जाने के लिये अपने पति सूर्य से अनुमति माँगी। सूर्य ने संज्ञा को नैहर जाने से मना कर दिया। संज्ञा ने एक युक्ति सोची। उसने अपने ही सदृश एक स्त्री बना कर उसे सूर्य के पास छोड़ कर स्वयं पितृ-गृह चली गई। इस स्त्री का नाम छाया था। छाया से सूर्य के द्वारा शनि की उत्पत्ति हुई। दीर्घ अन्तराल के बाद संज्ञा पुनः सूर्य के पास आई। सूर्य ने उसे अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् वह अश्विनी (घोड़ी) का रूप धारण कर लोक लोकान्तरों में विचरण करने लगी। सूर्य को जब मालूम हुआ कि वह मेरी ही पत्नी है तो उन्हों ने उसे पुनः स्वीकार किया। अश्विनी से सूर्य के द्वारा यमल संताने उत्पन्न हुई। इसे अश्विनीकुमार कहते हैं। एक का नाम नासत्य और दूसरेका दस्र है। ये दोनों साथ-साथ रहते हैं तथा ये देवताओं के वैद्य (चिकित्सक) है।

√●जो अश्विनी नाम की अश्विनीकुमारी की जननी वा सूर्य की पत्नी है, वही है अश्विनी नक्षत्र यह राशि चक्र का प्रथम नक्षत्र है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का होता है। उच्च से तात्पर्य है, उत्साह सम्पन्न, वीर्यवान्। लोक में यह देखा जाता है कि व्यक्ति (पुरुष) स्त्री को प्राप्त कर उत्साहित होता है, उसका वीर्य चलायमान हो जाता है, उसमें बल वृद्धि होती है। अश्विनी नक्षत्र केतु का है। केतु का अर्थ है-किरण। ‘सूर्य केतवः' अथर्व वेद । निष्कर्षतः अश्विनी नक्षत्र में आते ही सूर्य किरणवान् (अधिक उष्णता वाला) हो जाता है। अश्विनी नक्षत्र का मान १३° अंश २०' कला है। सूर्य अश्विनी के १०° अंश में परमोच्च का है। अश्विनी का प्रथमपाद ३° २', द्वितीय पाद ६° ४०' तृतीय पाद १०° तथा चतुर्थपाद १३° २०' तक है। तीसरा पाद प्रौढ़ पाद है। (बाल युवा प्रौढ़ जरा पाद क्रमानुसार) प्रौढ़ता परिपक्वता का प्रतीक है। सूर्य का प्रौढ़ होना, ज्ञान का परिपाक है।

√●सूर्य की पत्नी संज्ञा है। इसका अर्थ है- सम्- ज्ञा अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञान पर सूर्य का आधिपत्य है। सूर्य की पत्नी का नाम छाया है। छाया प्रकाश का अभाव। इसका तात्पर्य है- अज्ञान पर सूर्य का वर्चस्व है।

√●सूर्य की पत्नी है- अश्विनी। अश्व = किरण, गति। अश्विनी किरणायुक्त, गतिशील। इसका = अर्थ हुआ- प्रकाशयुक्त एवं गतिशील जितने भी पिण्ड हैं वे सब सूर्य द्वारा शासित पोषित हैं।

√●सूर्य+ संज्ञा के योग से यम यमी संतानें उत्पन्न हुई। यम अर्थात् यमन करने वा मारने वाला तथा यमी =कालिन्दी (यमुना) गहरा होने से यमुना का जल नीला है। इससे निष्कर्ष निकला सूर्य शासक है।  तथा जल देने वाला है (वर्षा कारक)।

√●सूर्य + छाया के योग से सावर्णि-शनि दो पुत्र एवं तपनी नाम की कन्या हुई। सावर्णि = एकरूपता, आठवें मन्वन्तर का स्वामी शनि शुष्क। तपनी उष्मा, धूप। इससे निष्कर्ष निकलता है-सूर्य सदा सर्वदा एकरूप है, स्थिर है, स्थिर स्वभाव वाला है। सूर्य सबको सुखा कर बलहीन कर देता है। यह इसका शनित्व है। सबको अपनी प्रखर किरणों से तपाता है पीड़ा देता है। सूर्य उष्मावान् है।

√●सूर्य + अश्विनी के योग से दो अश्विनी कुमार पैदा हुए। कथा है, अश्विनी कुमारों ने च्यवन मुनि की आँखें ठीक कर दी। ये देव वैद्य हैं। औषधि शास्त्र के ज्ञाता हैं। इन सबका भाव है- आँखों में जो ज्योति है वह सूर्य से है। सूर्य खोई हुई दृष्टि को पुनः वापस देता है। आयुर्वेद, शल्य शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, औषधि निर्माण का कारक सूर्य है। बलवान् सूर्य वाले जातक वैद्य, शल्यक, चिकित्सक, भिषक् होते हैं। अश्विनी कुमार रूपवान् हैं। इसलिये ऐसे जातक सुन्दर रूप पाते हैं।

√●कुन्ती ने कौमार्यावस्था में सूर्य का आवाहन किया। सूर्य ने उसे रतिदान दिया। उससे कर्ण नामक पैदा हुआ। कर्ण अमित पराक्रमी था। कर्ण दानवीर था। उस काल का वह अप्रतिम दानी था। इस पुत्र आख्यान का सार है-सूर्य प्रभावित कुण्डलियों वाले जातक संभोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं। धर्मानुकूल रति करते हैं। अत्यन्त पराक्रमी शूर वीर होते हैं। दान में इनकी समता करने वाला कोई नहीं होता। दृढ़ प्रतिज्ञ होते हैं। क्रूर कर्मा होते हैं। विश्वसनीय होते हैं। अंतिम साँस तक अपने मित्र का साथ देते हैं। अकृतघ्न होते हैं। स्पष्टवादी होते हैं। कुन्ती पुत्र कर्ण के चरित्र में जो कुछ है, वह सब सूर्य शासित कुण्डली वाले जातक में होता है।

√●सूर्य अध्यात्म विद्या और व्याकरण शास्त्र का कारक है। इस विषय में पौराणिक कथा है। हनुमान् जी के गुरु सूर्य हैं। सूर्य के सामने प्रस्थित होकर सूर्य के रथ की गति से चलते हुए मारुति नन्दन हनुमान् ने वेद-वेदांग, शास्त्र एवं उपनिषदों का अध्ययन किया। व्याकरण शास्त्र में विशेष योग्यता प्राप्त की। बाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान् जी शुद्ध एवं परिमार्जित शास्त्रीय संस्कृत में बोलते थे। हनुमान् जी जैसा संस्कृत वक्ता त्रिलोक में कोई नहीं है।

√●सूर्य पुष्टिवर्धक है। हड्डी का कारक होने से शरीर को दृष्ट पुष्ट बनाता है। लग्न भाव का कारक होने से शरीर का यह प्रतीक है। जैसा सूर्य होगा वैसा शरीर होगा। 

√●सूर्य देवो ज्ञान का दाता है। आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिये सूर्य की उपासना की जाती है। अपनी दशान्तर्दशा वा गोचर में जब सूर्य अशुभ फल दे रहा हो तो उसकी शांति के लिये दान व्रत जप करना चाहिये।

 √●दानद्रव्य- माणिक, सोना, तांबा, गेहूँ, गुड़, घी, लाल कपड़ा, लाल फूल, मूंगा, केशर, लाल गऊ, लाल चन्दन, लाल कम्बल

 √●दान का समय- अरुणोदय सूर्योदय काल । 

√●दान का दिन रविवार वा रवि की होरा।

√● जप मंत्र-सूर्याय नमः । 

√●समिधा-मदार। 

√●धारणा रत्न माणिक्य सोने की अंगूठी में रवि-पुण्ययोग में।

 √●उपरत्न- विद्रुम लाल तामड़ा मध्याह्न में।

√● धारणार्थ जड़ी-बिल्वमूल। जड़ी धारण का फल रत्न के समान होता है। 

√●पुष्यार्क योग में धारण करने से पूर्व तत्संबंधी पूजनादि क्रिया सम्पन्न कर लेनी चाहिये। लालरंग के डोरे में बाँध कर पुरुष अपनी दाहिनी भुजा में पहने तथा स्त्री गले में सविधि धारण करने पर फल तत्काल से ही मिलना प्रारंभ हो जाता है।

एक मंत्र है...

 "तस्याम् सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह ।"
        (अथर्व १३/ १४ /२८ )

√●चन्द्रमा सहित सभी नक्षत्र सूर्य के वश में हैं। 

√●इसका अर्थ है-सूर्य द्युति पति है। सूर्य के अस्त होने पर ही चन्द्रमा एवं नक्षत्रादि पिण्ड दिखायी देते हैं, उदय होने पर अदृश्य हो जाते हैं। मन्त्र का भाव है-जिसकी कुण्डली में बलवान् सूर्य है, वह जातक शासित होना नहीं चाहता, शासक बनना चाहता है और होता भी है। वह जातक स्वानुशासित होता है। सूर्य सबका परोक्ष रक्षक है। सूर्य दैव है। कवि कहता है ...

"अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । 
जीवत्यनाथो विपिनेऽप्यरक्षितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति ॥"

√● जिसका कोई रक्षक नहीं है, उसकी रक्षा सूर्य करता है। जो किसी के द्वारा रक्षित है, उसको सूर्य मार डालता है। जंगल में अनाथ जीवित रहता है, जबकि घर में रक्षा हेतु यत्नवान् मृत्यु को प्राप्त होता है। सूर्य अदृष्ट प्रेरक है। अदृष्ट = भाग्य। अदृष्ट का प्रेरक दैव दैव और भाग्य में यहीं अन्तर है। सूर्य देव बोधक है, शनि भाग्य कारक है। कर में सूर्य रेखा के अभाव में शनि (भाग्य) रेख फलीभूत नहीं होती। अदृष्ट प्रेरक होने से सूर्य को सविता कहते हैं...

 "स एति सविता स्वर्दिवस्पृष्ठेऽव चाकशत् ।"
          (अथर्व १३ ।४ ।१ )

√●सविता = षू प्रेरणे। 

√●स्वः = स्वृ उपताये। 

√●चकाशत् = चकास् दीप्तौ। 

√●अब = नीचे।

 √●दिवस्पृष्ठे = शिर पर ।

√●एति =आता है। 

√●सूर्य आत्मा है। आत्मा कर्माध्यक्ष है, कर्तानहीं। जीव कर्ता भोक्ता है। जीव स्वकर्मवश सुख दुःख पाता है। 'मैं करता हूँ'-ऐसा कहना उचित नहीं। कर्म ही कर्म को करा रहा है। पूर्वजन्मजन्मान्तरों के कर्म संस्कार मुझसे लिखवा रहे हैं।

√●तत्ववेत्ता कहताहै ...

"सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता
      परो ददादीति कुबुद्धिरेषा।।
 अहं करोमीति वृथामिमानः
              स्वकर्मसूत्रप्रथितो हि लोकः ।।"

√● इसी बात को तुलसी दास दुहराते हैं...

 "नहि कोड है सुख दुःख कर दाता ।
 निजकृत कर्म भोग सब भ्राता ॥" 
       (राम चरितमानस )

√●मैंने इसी कर्मसूत्र की प्रेरणा से श्रीमद्भागवत गत सूर्य विज्ञान पर दृषि डाला श्री वेदव्यास की विशाल एवं सूक्ष्म बुद्धि का यह कौतुक है। यह सम्पूर्ण रूप से सब के लिये ग्राह्य नहीं है।

 "एहि सूर्य  सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते । 
अनुकम्पय मां देव पाहि पाहि दिवस्पते ॥"

 ★★★अब मैं द्वादशभाव गत सूर्य के फल का कश्यपोक्त उपकथन करता हूँ★★★

√●●प्रथम भावस्थ सूर्य ...

★१. उच्च राशि में, तीव्री। 
★२. उच्च नवांश में, दृढांग ।
 ★३. शुभग्रह के नवांश में, बहु आशी।
 ★४. नीच राशि में, रोगी ।
 ★५. नीच राशि के नवांश में, लावण्यहीन । 
★६. पाप ग्रह के नवांश में, अन्धा ।
 ★७. मित्र की राशि में दीर्घ । 
★८. मित्र राशि के नवांश में जटिल। 
★९. वर्गोत्तम में अधिकांग । 
★१०. शत्रु राशि में हीनांग । 
★११. शत्रु राशि के नवांश में दीन। 
★१२. स्व राशि में नीतिरहित।

√●●द्वितीय भारवसूर्य ...
★१. उच्च राशि में, राज सम्मान से धन ।
 ★२. उच्च नवांश में, राज सेवा से धन। 
★३. शुभ ग्रह के नवांश में, सुलोक दक्षता से धन ।
★४. नीच राशि में, पाप से धन। 
★५. नीच नवांश में, स्थूलजों से धन।
★६. पाप नवांश में चोरी से धन ।
★७. मित्रराशि में, कामाचार से धन ।
★ ८. मित्र नवांश में, लोभ से धन ।
 ★९. वर्गोत्तम में परनारी से धन।
 ★१०. शत्रु राशि में, स्वल्प धन ।
★ ११. शत्रु नवांश में, नीच सेवा से धन।
★ १२. स्व राशि में, भृत्यकर्म से धन ।

√●●तृतीय भावस्य सूर्य...

 ★१. उच्च राशि में, राजा ।
★२. उच्च नवांश में, राजपुत्र ।
 ★३. शुभग्रह के नवांश में, सार्वभौम । 
★४. नीच राशि में, दुष्ट । 
★५. नीच नवांश में, भिक्षुक ।
★६. पाप नवांश में, अग्रविरोधी । 
★७. मित्रराशि में, चारण ।
★ ८. मित्र नवांश में, ब्राह्मणवृत्ति ।
 ★९. वर्गोत्तम में, कुलीन।
 ★१०. शत्रु राशि में, शास्त्रविद् । 
★११. शत्रु नवांश में, वैरिक्षतांगी। 
★१२. स्व राशि में, निर्गुणी।

√●●चतुर्थ भावस्थ सूर्य ...

★१. उच्च राशि में, कष्ट से । सुख प्राप्ति।
★ २. उच्च नवांश में, अल्प धन से सुखी।
 ★३. शुभ ग्रह के नवांश में, परदारा से सुखी। 
★४. नीच राशि में, नवीन व्यवसाय से दुःखी। 
★५. नीच नवांश में, दुःखादय । 
★६. पाप नवांश में, श्रृण से दुःखी। 
★७. मित्रराशि में, पाप कर्मा। 
★८. मित्र नवांश में, चौर कर्मा। 
★९. वर्गोत्तम में नित्य श्रीयमान।
 ★१०. शत्रु राशि में, बुद्धरत ।
★११. शत्रु नवांश में, पर सेवा से सुखी ।
 ★१२. स्व राशि में, हिंसनकर्मा, बन्धनकर्मा । 

√●●पंचम भावस्थ सूर्य...
★ १. उच्च राशि में, हिंसक पुत्रवान् ।
★२. उच्च नवांश में, अल्पायु पुत्रवाला। 
★३. शुभनवांश में, रोगी, दीन पुत्र । 
★४. नीच राशि में, जाति नष्टकपुत्र ।
★ ५. नीच नवांश में, विकलांग पुत्र ।
★ ६. पाप नवांश में, गर्भनष्ट |
★७. मित्रराशि में, तीक्ष्णभाग्यशाली पुत्र ।
★ ८. मित्र नवांश में, दुःशील पुत्र ।
★ ९. वर्गोत्तम में, व्यसनीपुत्र । 
★१०. शत्रु राशि में, परदारज पुत्र ।
 ★११. शत्रु नवांश में, परस्त्रीज पुत्र ।
 ★१२. स्व राशि में, विगुण एवं चौर पुत्र वाला।

√●●षष्ठ भावस्थ सूर्य...

 ★१. उच्च राशि में, श्रेष्ठमान्य । 
★२. उच्च नवांश में वित्र विद्वान् । 
★३. शुभनवांश में, नृपतितुल्य । 
★४. नीच राशि में, दूषित बुद्धि ।
★ ५. नीच नवांश में स्वोरत । 
★६. पाप नवांश में, दूसरों की चिन्ता करने वाला।
 ★७. मित्रराशि में, अश्ववान् ।
★ ८. मित्र नवांश में गोपालक।
 ★९. वर्गोत्तम में स्वल्पशिल्पी । 
★१०. शत्रु राशि में, कामिनीसुत । 
★११. शत्रु नवांश में कुलटासुत।
 ★१२. स्व राशि में, विलासिनी स्त्री से युक्त ।

√●●सप्तमस्थ सूर्य...

★ १. उच्च राशि में, कलह प्रिया भार्या। 
★२. उच्च नवांश में, नित्य परधर्मतत्पर भार्या . ।
★३. शुभनवांश में दरिद्रा भार्या। 
★४. नीच राशि में, व्यभिचारिणी भार्या।
★ ५. नीच नवांश में, रोगिणी दारा । 
★६. पाप नवांश में, विशीला योषिता ।
 ★७. मित्रराशि में, घाततत्परा जाया ।
 ★८. मित्र नवांश में हीनविता भामिनी। 
★९. वर्गोत्तम में रतिप्रिया नारी।
★१०. शत्रु राशि में, व्यसनी संगिनी ।
★११. शत्रु नवांश में, स्वार्थी रमणी।
 ★१२. स्व राशि में, साहसी पत्नी।

√●●अष्टमस्थ सूर्य ....
★१. उच्च राशि में, भक्तिजाग्नि में प्रवेश से मरण । 
★२. उच्च नवांश में, लोकलज्जा से मरण ।
 ★३. शुभनवांश में, प्रमाद से मृत्यु।
 ★४. नीच राशि में, दावाग्नि से दग्ध।
★ ५. नीच नवांश में पाखण्ड पूर्ण कार्यों से अपमृत्यु । 
★६. पाप नवांश में, उद्दीपन से नष्ट। 
★७. मित्रराशि में, विषखाने से अन्त । 
★८. मित्र नवांश में, बन्धन से मृत्यु । 
★९. वर्गोत्तम में लोहे से घात ।
★१०. शत्रु राशि में, रक्तकोप से अवसान।
★ ११. शत्रु नवांश में, क्षय कास रोग से हानि।
 ★१२. स्व राशि में, स्त्री अपराध से पतन ।

√●●नवमस्थ सूर्य...

 ★१. उच्च राशि में, तामसीधर्मा।
★ २. उच्च नवांश में पाखण्डी ।
★ ३. शुभनवांश में, अल्पधर्मी ।
 ★४. नीच राशि में, धर्महीन ।
 ★५. नीच नवांश में, पराश्रित धर्मा। 
★६. पाप नवांश में, पिशुनाश्रयी संगति । 
★७. मित्रराशि में, पापज धर्मी ।
 ★८. मित्र नवांश में, अल्प अशनी ।
 ★९. वर्गोत्तम में, कृतघ्नी । 
★१०. शत्रु राशि में, वाक् धर्मी ।
★ ११. शत्रु नवांश में, चौरसंश्रित ।
★१२. स्व राशि में, पिशुनाश्रित धर्मा ।

√●●दशमस्थ सूर्य ...

★१. उच्च राशि में, धर्मव्रती । 
★२. उच्च नवांश में, बन्धक एवं वधिक ।
★ ३. शुभनवांश में, कलंकित ।
 ★४. नीच राशि में, दासतायुक्त ।
★५. नीच नवांश में, दुष्टराजा का सेवक ।
★ ६. पाप नवांश में, वध एवं बन्धनयुक्त ।
★७. मित्रराशि में, हिंसक प्रवृत्ति । 
★८. मित्र नवांश में, वाणिज्य कर्मा।
 ★९. वर्गोत्तम में, व्यवसायरत । 
★१०. शत्रु राशि में, अशुभफल ।
 ★११. शत्रु नवांश में, गर्हित निन्द्य । 
★१२. स्व राशि में, अन्य सेवापरायण।

√●●एकादशस्थ सूर्य- ...

★१. उच्च राशि में, गजाश्वोष्ट एवं लतावृक्षादि से लाभ । 
★२. उच्च नवांश में, कुत्ते से लाभ ।
★३. शुभनवांश में, कौड़ी से लाभ । 
★४. नीच राशि में दूषित अन्न से लाभ ।
★५. नीच नवांश में, परस्त्री से लाभ । 
★६. पाप नवांश में, सुहृदों से लाभ।
★ ७. मित्रराशि में कुल की स्त्री से लाभ ।
 ★८. मित्र नवांश में, श्रेष्ठ जनों से लाभ ।
★ ९. वर्गोत्तम में, खल लोगों से लाभ । 
★१०. शत्रु राशि में कम्बलों से लाभ ।
★११. शत्रु नवांश में, दुष्टों से लाभ ।
 ★१२. स्व राशि में, गुणवानों से लाभ।

√●द्वादशस्य सूर्य ...

★१. उच्च राशि में, बड़े कार्यों में व्यय । 
★२. उच्च नवांश में, बड़े लोगों की सेवा पर व्यय । 
★३. शुभनवांश में, ब्राह्मण एवं देवता पर।
 ★४. नीच राशि में, दुर्जनों पर व्यय ।
 ★५. नीच नवांश में, दुष्टा स्त्री पर व्यय ।
★ ६. पाप नवांश में, अन्त्यजों पर व्यय । 
★७. मित्रराशि में, मित्रों पर व्यय । 
★८. मित्र नवांश में, लोगों के अनुरोध करने पर व्यय ।
★९. वर्गोत्तम में, नृपाश्रय हो कर व्यय। 
★१०. शत्रु राशि में, वेश्याओं पर व्यय ।
★ ११. शत्रु नवांश में, कुलटाओं के स्नेहवश व्यय ।
 ★१२. स्व राशि में, भय (ज्ञान) वश व्यय । ग्रहों की युति दृष्टि से कथित फल में अन्तर आ जाता है।
 ओ३म् ।
"सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।"
       (यजुर्वेद ७/४२)
अर्थात् गतिशील प्राणी तथा निष्क्रिय जड़ पदार्थों का भी सूर्य आत्मा है। सूर्य के इस अद्भुत प्रकाश का रहस्य क्या है? यह तथ्य तो बहुत पहले जान लिया गया था कि सूर्य की चमक सामान्य कोयले या लकड़ी की आग से उत्पन्न नहीं है। धरती के उच्चतम श्रेणी के कोयले की शुद्ध ऑक्सीजन से प्राप्त ज्वाला भी सूर्य की तीव्र सन्दीप्ति के सामने क्षुद्रतम है। वेद के शब्दों में यह धरती की अग्नि तो सूर्य का नन्हां शिशु है। वह धरती के पदार्थों में रगड़ से उत्पन्न होने से सहस् का पुत्र है। पर उसमें सूर्य का सामर्थ्य कहाँ हो सकता है। यदि सूर्य में धरती जैसे कोयले, पेट्रोल आदि का प्रयोग होता तो धरती से लाखों गुना विशाल सूर्य भी लाखों वर्ष पूर्व जल कर भस्म हो गया होता। वस्तुतः सूर्य परमाणु ऊर्जा से संचालित है। इसकी भयंकर ऊष्मा में हाइड्रोजन गैस के परमाणु विखण्डित होते हुए निरन्तर हीलियम में बदलते रहते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य के क्रोड का तापमान 380 लाख डिग्री फारेनहाइट है। तुलना के लिये कह दें कि स्वस्थ मनुष्य अपना औसत तापमान 98° F बनाए रखता है। इससे अधिक तापमान में उसे गर्मी लगने लगती है। पानी अपने सामान्य वायुदाब में 212° F में उबलने लगता है, जिसे हमारी त्वचा सहन नहीं कर सकती। इसकी अपेक्षा सूर्य की ऊष्मा की क्या तुलना है ! विश्व की आधुनिकतम प्रयोगशालाओं में हाइड्रोजन बम के द्वारा इतनी भयंकर ऊष्मा को उत्पन्न किया जा सका है। पर वह सेकेण्ड के क्षुद्र अंश तक ही स्थिर रह पाती है। पर यही ऊष्मा सूर्य के कारखाने में करोड़ों वर्षों से निरन्तर प्राप्त की जा रही है। पहले कहा गया है कि मानव का सबसे पहला अचरज सूर्य प्रकाश था। वर्तमान युग में सूर्य के विषय में इतने अकल्पनीय तथ्यों के परिज्ञान के पश्चात् ऐसा लगता है कि मानव जाति का अन्तिम अचरज भी यही सूर्य प्रकाश है!!
√★★जब सूर्य स्थिर है तो फिर ज्योतिष में ये अपनी राशियाँ और नक्षत्र कैसे बदलता है ?
असल में इस पूरे ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है।

√●जिस प्रकार चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है और पृथ्वी सूर्य का ठीक उसी प्रकार से सूर्य और पूरा सौरमंडल आकाश गंगा के केंद्र का चक्कर लगाता है। सौर मंडल के परमेष्ठी मंडल (आकाश गंगा का केंद्र) का एक चक्कर पूर्ण करने में लगभग पृथ्वी के 30,67,20,000 (तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष) लग जाते हैं, इसी समय को एक मन्वंतर कहा गया है।परमेष्ठि मंडल भी स्वयंभू मंडल(अपने ऊपर वाली आकाश गंगा) के चक्कर काटता है और इसमें 4 अरब 32 करोड़ वर्ष(432000000) लग जाते हैं जिसे ज्योतिष में एक कल्प कहा गया है,एक कल्प अर्थात ब्रह्मा का एक दिन। इस से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मांड में सूर्य स्थिर नहीं है।

√★★परमेष्ठी मंडल को अलग अलग राशियों में बांटा गया है इन्ही राशियों के आधार पर किसी क्षण ग्रह एवं नक्षत्रों की स्थिति का पता चलता है ।किसी क्षण पृथ्वी को स्थिर मानकर पृथ्वी के सापेक्ष ग्रहों की स्थिति ही ज्योतिष का मूल आधार है।
★★★सूर्यसिद्धान्तके अधिष्ठाता भगवान् सूर्य और उनका महनीय चरित★★★

" ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । 
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥"
(ऋग्वेद०१।११५।१,शु.यजुर्वेद  ७।४२)

सूर्योपस्थानकी यह ऋचा भुवनभास्कर भगवान् सूर्यकी महिमामें पर्यवसित है। इसका भाव है- जो तेजोमयी किरणोंके पुंज हैं, मित्र, वरुण तथा अग्नि आदि देवताओं एवं समस्त विश्वके प्राणियोंके नेत्र हैं और स्थावर-जंगमात्मक समस्त जीवनिकायके अन्तर्यामी आत्मा हैं, वे भगवान् सूर्य आकाश, पृथिवी और अन्तरिक्षलोकको अपने प्रकाशसे पूर्ण करते हुए आश्चर्यरूपसे उदित हो रहे हैं। 

ऋषि वसिष्ठजी उनकी स्तुति करते हुए कहते हैं- जो ज्ञानियोंके अन्तरात्मा, जगत्‌को प्रकाशित करनेवाले, संसारके हितैषी, स्वयम्भू तथा सहस्र उद्दीप्त नेत्रोंसे सुशोभित हैं, उन अमित तेजस्वी सुरश्रेष्ठ भगवान् सूर्यको नमस्कार है— 

"विवस्वते ज्ञानभृदन्तरात्मने जगत्प्रदीपाय जगद्धितैषिणे ।
 स्वयम्भुवे दीप्तसहस्रचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥"
(महा०आदि० १७२।१८)

भुवनभास्कर भगवान् सूर्यनारायण प्रत्यक्ष देवता हैं, प्रकाशरूप हैं। उपनिषदोंमें भगवान् सूर्यके तीन रूपोंका विवेचन हुआ है- १ - निर्गुण-निराकार, २-सगुण-निराकार और ३- सगुण-साकार । "आदित्यं ब्रह्मेति" (छान्दो० ३ । १९ । १) ।

√●चाक्षुषोपनिषद् में वर्णन आया है कि सांकृतमुनिने आदित्यलोकमें जाकर भगवान् सूर्यसे चाक्षुष्मती विद्या प्राप्त की। ऐसे ही ऋषिप्रवर याज्ञवल्क्यजीने भी आदित्यलोकमें जाकर उनका दर्शन किया और आत्मतत्त्वका उपदेश प्राप्त किया। हनुमान्जीका उनके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करना प्रसिद्ध ही है-'भानुसों पढ़न हनुमान गये'। भगवान् सूर्य स्वयं परमात्मारूप हैं तथा भक्तोंके लिये सगुण-साकाररूप धारण करते हैं। विविध विद्याओंका उपदेश देते हैं और स्वयं ग्रहाधिपतिरूपमें प्रतिष्ठित होकर ज्योतिश्चक्र का प्रवर्तन और नियमन करते हैं।

  जैसे भगवान् विष्णुका स्थान वैकुण्ठ, भूतभावन शंकरका कैलास, चतुर्मुख ब्रह्माका ब्रह्मलोक और भगवती जगन्माताका मणिद्वीप है, वैसे ही आदित्यनारायणका स्थान आदित्यलोक - सूर्यमण्डल है। भगवान् सूर्य ही कालचक्रके प्रणेता हैं। सूर्यसे ही दिन- रात्रि, घटी, पल, मास, पक्ष, ऋतु, अयन तथा संवत्सर आदिका विभाग होता है। ये सम्पूर्ण जगत्के प्रकाशक हैं, इनके बिना सब अन्धकार है। सूर्य ही जीवन, तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, श्रोत्र, आत्मा और मन हैं- 'आदित्यो वै तेज ओजो बलं यशश्चक्षुः श्रोत्रे आत्मा मनः' (नारायणोपनिषद् १५) । 

इनके आविर्भावकी परम्परामें बताया गया है कि भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका जन्म हुआ । ब्रह्माजीके मानसपुत्रका नाम मरीचि है। महर्षि मरीचिसे कश्यपका जन्म हुआ। ये कश्यप ही सूर्यके पिता हैं, इनकी माताका नाम अदिति है, जो दक्षप्रजापतिकी पुत्री हैं, इसलिये ये अदितिनन्दन तथा मरीचिसून भी कहलाते हैं।

भगवान् सूर्य सम्पूर्ण ग्रहोंके राजा हैं, जिस प्रकार घरके मध्य भागमें स्थित प्रज्वलित दीपक ऊपर-नीचे सम्पूर्ण घरको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार अखिल जगत्के अधिपति सूर्य अपनी हजारों रश्मियोंसे लोकोंको प्रकाशित करते रहते हैं। परम दिव्य तेजःपुंज ही सूर्यका स्वरूप है। सूर्यका तेजोमण्डल दो भागों में विभक्त है, सूर्यमण्डलका एक तेज ऊर्ध्वकी ओर उद्दीप्त करता है, उस तेजकी शक्ति संज्ञा है, दूसरा तेज अधोगामी- पृथ्वीसे पातालपर्यन्त उद्दीपन करता है, उस तेजकी शक्तिका नाम छाया है। पुराणोंमें संज्ञा तथा छाया-ये भगवान् सूर्यकी दो पत्नियाँ बतायी गयी हैं। ये दोनों उनकी शक्तिके रूपमें निरन्तर गतिशील रहती हैं।

सूर्यलोकमें भगवान् सूर्यके समक्ष इन्द्रादि सभी देवता - ऋषिगण स्थित रहते हैं तथा गन्धर्व एवं अप्सराएँ नृत्य - गानसे उनकी स्तुति करती हैं। तीनों सन्ध्याएँ मूर्तिमान् रूपमें वहाँ उपस्थित रहती हैं। भगवान् सूर्य सात छन्दोमय अश्वोंसे युक्त हैं, इसलिये वे सप्ताश्वतिलक कहलाते हैं। वे घटी, पल, ऋतु, संवत्सरादि कालके अवयवोंद्वारा निर्मित दिव्य रथपर आरूढ़ होकर सुशोभित रहते हैं। गरुड़के छोटे भाई अरुण उनके सारथिका कार्य करते हैं। उनके दोनों पाश्र्वमें दाहिनी ओर राज्ञी (संज्ञा)* और बायीं ओर निक्षुभा (छाया) नामकी दो पत्नियाँ स्थित रहती हैं। उनके साथमें पिंगल नामके लेखक, दण्डनायक नामके द्वाररक्षक तथा कल्माष नामके दो पक्षी द्वारपर खड़े रहते हैं। दिण्डि उनके मुख्य सेवक हैं, जो उनके सामने खड़े रहते हैं।

★★★ भगवान् सूर्यका परिवार★★★

  भगवान् सूर्यकी दस सन्तानें हैं। विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा (अश्विनी) नामक पत्नीसे वैवस्वत मनु, यम, यमी (यमुना), अश्विनीकुमारद्वय और रेवन्त तथा छायासे शनि, तपती, विष्टि (भद्रा) और सावर्णि मनु हुए।

 भगवान् सूर्यके परिवारकी यह कथा पुराणों आदिमें अनेक प्रकारसे सूक्ष्म एवं विस्तारसे आयी है, उसका सारांश यहाँ प्रस्तुत है-

 √●    विश्वकर्मा (त्वष्टा) - की पुत्री संज्ञा (त्वाष्ट्री ) - से जब सूर्यका विवाह हुआ तब अपनी प्रथम तीन सन्तानों वैवस्वत मनु, यम तथा यमी (यमुना) की उत्पत्तिके बाद उनके तेजको न सह सकनेके कारण संज्ञा अपने ही रूप - आकृति तथा वर्णवाली अपनी छायाको वहाँ स्थापितकर अपने पिताके घर होती हुई 'उत्तरकुरु' में जाकर छिपकर वडवा (अश्वा) का रूप धारणकर अपनी शक्तिवृद्धिके लिये कठोर तप करने लगी। इधर सूर्यने छायाको ही पत्नी समझा तथा उससे उन्हें सावर्णि मनु, शनि, तपती तथा विष्टि (भद्रा) – ये चार सन्तानें हुईं। जिन्हें वह अधिक प्यार करती, किंतु संज्ञाकी सन्तानों वैवस्वत मनु तथा यम एवं यमीका निरन्तर तिरस्कार करती रहती। 

   √●माता छायाके तिरस्कारसे दुःखी होकर एक दिन यमने पिता सूर्यसे कहा- तात ! यह छाया हमलोगोंकी माता नहीं हो सकती; क्योंकि यह हमारी सदा उपेक्षा, ताड़न करती है और सावर्णि मनु आदिको अधिक प्यार करती है । यहाँतक कि उसने मुझे शाप भी दे डाला है। सन्तान माताका कितना ही अनिष्ट करे, किंतु वह अपनी सन्तानको कभी शाप नहीं दे सकती। यमकी बातें सुनकर कुपित हुए सूर्यने छायासे ऐसे व्यवहारका कारण पूछा और कहा-सच-सच बताओ तुम कौन हो ? यह सुनकर छाया भयभीत हो गयी और उसने सारा रहस्य प्रकट कर दिया कि मैं संज्ञा नहीं, बल्कि उसकी छाया हूँ। 

√●सूर्य तत्काल संज्ञाको खोजते हुए विश्वकर्माके घर पहुँचे। उन्होंने बताया कि भगवन्! आपका तेज सहन न कर सकनेके कारण संज्ञा अश्वा (घोड़ी) का रूप धारणकर उत्तरकुरुमें तपस्या कर रही है। तब विश्वकर्माने सूर्यकी इच्छापर उनके तेजको खरादकर कम कर दिया। अब सौम्य शक्तिसे सम्पन्न भगवान् सूर्य अश्वरूपसे वडवा (संज्ञा-अश्विनी) के पास उससे मिले। वडवाने 
परपुरुषके स्पर्शकी आशंकासे सूर्यका तेज अपने नासाछिद्रोंसे बाहर फेंक दिया। उसीसे दोनों अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई, जो देवताओंके वैद्य हुए। तेजके अन्तिम अंशसे रेवन्त नामक पुत्र हुआ, जो गुह्यकों और अश्वोंका अधिपति हुआ। इस प्रकार भगवान् सूर्यका विशाल परिवार यथास्थान प्रतिष्ठित हो गया। यथा- वैवस्वत मनु वर्तमान (सातवें) मन्वन्तरके अधिपति हैं। यम यमराज एवं धर्मराजके रूपमें जीवोंके शुभाशुभ कर्मोके फलोंको देनेवाले हैं। यमी यमुना नदीके रूपमें जीवोंके उद्धारमें लगी हैं। अश्विनीकुमार (नासत्य-दस्त्र) देवताओंके वैद्य हैं ( रेवन्त निरन्तर भगवान् सूर्यकी सेवामें रहते हैं। सूर्यपुत्र शनि ग्रहोंमें प्रतिष्ठित हैं। सूर्यकन्या तपतीका विवाह सोमवंशी अत्यन्त धर्मात्मा राजा संवरणके साथ हुआ, जिनसे कुरुवंशके स्थापक राजर्षि कुरुका जन्म हुआ। इन्हींसे कौरवोंकी उत्पत्ति हुई। विष्टि भद्रा नामसे नक्षत्रलोकमें प्रविष्ट हुई। सावर्णि मनु आठवें मन्वन्तरके अधिपति होंगे। इस प्रकार भगवान् सूर्यका विस्तार अनेक रूपोंमें हुआ है। वे आरोग्यके अधिदेवता हैं- 'आरोग्यं भास्करादिच्छेत्' (मत्स्यपु० ६८ । ४१) । 

★★★ज्योतिषशास्त्र और भगवान् सूर्य★★★

    गणित, होरा एवं संहिता - इन तीन स्कन्धोंसे युक्त ज्योतिषशास्त्र वेदका चक्षुभूत प्रधान अंग है। इस विद्यासे भूत, भविष्य, वर्तमान, अनागत, अव्यवहित, अदृष्ट- अवच्छिन्न सभी वस्तुओं तथा त्रिलोकका प्रत्यक्षवत् ज्ञान हो जाता है। ज्योतिषज्ञानविहीन लोक अन्य ज्ञानोंसे पूर्ण होनेपर भी दृष्टिशून्य अन्धेके तुल्य होता है। इस महनीय ज्योतिषशास्त्रके प्राण तथा आत्मा और ज्योतिश्चक्रके प्रवर्तक भगवान् सूर्य ही हैं। वे स्वर्ग और पृथ्वीके नियामक होते हुए उनके मध्य बिन्दुमें अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके केन्द्र में स्थित होकर ब्रह्माण्डका नियमन और संचालन करते हैं। उनके ही द्वारा दिशाओंका निर्माण, कला, काष्ठा, पल, घटी, प्रहरसे लेकर अब्द, युग, मन्वन्तर तथा कालपर्यन्त कालोंका विभाजन, प्रकाश, ऊष्मा, चैतन्य, प्राणादि वायु, झंझावात, विद्युत्,मेघ, वृष्टि, अन्न तथा प्रजावर्गको ओज एवं प्राणशक्तिका दान एवं नेत्रोंको देखनेकी शक्ति प्राप्त होती है। भगवान् सूर्य ही देवता, तिर्यक्, मनुष्य, सरीसृप तथा लता- वृक्षादि समस्त जीवसमूहोंके आत्मा और नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं-

"देवतिर्यङ्मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम्।
 सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः ॥"
 (श्रीमद्भा० ५। २० । ४६)

   ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य समस्त ग्रह एवं नक्षत्रमण्डलके अधिष्ठाता तथा कालके नियन्ता हैं। ग्रहोंमें कक्षाचक्र के अनुसार सूर्यके ऊपर मंगल तथा फिर क्रमशः गुरु तथा शनि हैं और नीचे क्रमशः शुक्र, बुध तथा चन्द्रकक्षाएँ हैं। सूर्य, चन्द्र एवं गुरुके कारण पाँच प्रकारके संवत्सरों-वत्सर, परिवत्सर, अनुवत्सर, इडावत्सर तथा संवत्सरका निर्माण होता है।

★★★ग्रहोंके रूपमें सूर्यका स्वरूप-निरूपण★★★

   ज्योतिषशास्त्रमें ग्रहोंके रूपमें सूर्यका जो विचार हुआ है, उसका संक्षेपमें सार इस प्रकार है-

    सूर्य सिंह राशिके स्वामी हैं। मेष राशिके दस अंशमें स्थित होकर उच्च तथा कन्याराशिमें नीच कहलाते हैं। इनका आकार ह्रस्व, समवृत्त, वर्ण क्षत्रिय, प्रकृति पुरुष, संज्ञा क्रूर, गुण सत्त्व, रंग लाल, निवासस्थान देवालय, भूलोक एवं अरण्य, उदय-प्रकार पृष्ठोदय, प्रकृति पित्त, दृष्टि आकाशकी ओर तथा मुँह पूर्वकी ओर रहता है। ये कटुरसके विधाता तथा धातुस्वरूप हैं। अग्नि इनके देवता हैं, माणिक्य धारण करने तथा हरिवंशपुराणके श्रवणसे सूर्यकृत अरिष्टकी शान्ति होती है। ये ग्रहोंके राजा हैं। इनकी मंगल, चन्द्रमा और बृहस्पतिसे नैसर्गिक मित्रता, शुक्र तथा शनिसे शत्रुता और बुधसे उदासीनता है। कुण्डलीमें सूर्यसे पिता, आत्मा, प्रताप, आरोग्यता और राज्यलक्ष्मी आदिका विचार किया जाता है। ये अपनी उच्च राशि, द्रेष्काण, होरा, रविवार, नवांश, उत्तरायण, मध्याह्न, राशिके आरम्भ, मित्रके नवमांश तथा लग्नसे दसवें भावमें सदा बलवान् होते हैं। ये सदा मार्गी रहते हैं, वक्री नहीं होते। विंशोत्तरी दशाके अनुसार सूर्यकी महादशा छः वर्ष रहती है। सूर्य मेषादि द्वादश राशियोंमें भ्रमण करते हैं। एक राशिसे दूसरी राशिके संक्रमणको संक्रान्ति कहते हैं। इस प्रकार भ्रमणसे द्वादश राशियोंके बारह सौरमास तथा एक सौरवर्ष होता है। सूर्य एक राशिमें एक मास रहते हैं। मकर तथा कर्कसे अयन संक्रान्तियाँ बनती हैं। मकरसंक्रान्तिसे उत्तरायण तथा कर्कसंक्रान्तिसे दक्षिणायन होता है। मेष तथा तुलाकी संक्रान्ति विषुवसंक्रान्ति कहलाती है। धनु, मिथुन, कन्या, मीनकी संक्रान्तियाँ षडशीतिमुखा और सिंह, वृश्चिक, वृष तथा कुम्भकी संक्रान्तियाँ विष्णुपदा कहलाती हैं।

★★★ज्योतिषसिद्धान्तके उद्भावकके रूपमें भगवान् सूर्य ★★★
  ज्योतिषसिद्धान्तके प्रवर्तक आद्य आचार्योंके रूपमें दैवज्ञ नारद, महर्षि पराशर तथा ऋषिप्रवर कश्यपजीने जिन अठारह (मतान्तरसे उन्नीस) आचार्योंका परिगणन किया है, उनमें भगवान् सूर्यका नाम मुख्यरूपसे उल्लिखित है, किंतु भगवान् सूर्यद्वारा प्रत्यक्ष उपदिष्ट अथवा रचित कोई ग्रन्थ वर्तमानमें उपलब्ध नहीं । सूर्यसिद्धान्तका सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख आचार्य वराहमिहिरने किया है। वराहमिहिर महान् दैवज्ञ हो चुके हैं, उन्होंने ज्योतिषके तीनों स्कन्धों-सिद्धान्त (गणित), संहिता तथा होरा (जातक) - पर ग्रन्थ प्रणयनकर लोकका महान् उपकार किया है। जातकशास्त्रमें उनका फलित- विषयक बृहज्जातक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, संहिताके विषयोंको उन्होंने बृहत्संहिता (वाराहीसंहिता) में संग्रहीत किया है। सिद्धान्त (गणित) के क्षेत्रमें उन्होंने अपने समयमें प्रचलित गणितके प्राचीन पाँच सिद्धान्तोंका वर्णन अपने पंचसिद्धान्तिका नामक ग्रन्थमें किया है, वे (पाँच सिद्धान्त इस प्रकार हैं-
 (१) पैतामह सिद्धान्त, 
(२) वासिष्ठ सिद्धान्त, 
(३) पौलिश सिद्धान्त, 
(४) रोमक सिद्धान्त तथा 
(५) सौर सिद्धान्त- 'पौलिशरोमकवासिष्ठसौर-पैता-महास्तु पञ्चसिद्धान्ताः '।

इन पाँचों सिद्धान्तोंमें सूर्यसिद्धान्तका विशेष महत्त्व है; क्योंकि अन्य सिद्धान्तोंकी अपेक्षा यह विस्तृत है तथा इसके विवेचनकी पद्धति अत्यन्त सूक्ष्म है। आचार्य वराहमिहिरने पाँचों सिद्धान्तोंका अनुशीलनकर तुलनात्मक दृष्टिसे सूर्यसिद्धान्तको अधिक स्पष्ट तथा शुद्ध बताया है। अपनी बातको आचार्यने 'स्पष्टतरः सावित्रः ' (पंचसिद्धा० ४) कहकर व्यक्त किया है। इसी कारण परवर्ती आचार्यों आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर आदि सूर्यसिद्धान्तको अधिक महत्त्व दिया। पंचसिद्धान्तिक के ९ वें, १० वें तथा १६वें और १७वें - इस प्रकार चार अध्यायोंमें वराहमिहिराचार्यने प्राचीन सूर्यसिद्धान्तकी व्याख्या की है। अध्याय ९ में सूर्यग्रहणका गणित, अध्याय १० में चन्द्रग्रहण, अध्याय १६ में ग्रहोंके मध्यम मान ज्ञात करनेका गणित तथा १७वें अध्यायमें गणितद्वारा ग्रहोंके स्पष्ट मानको ज्ञात करनेकी विधि वर्णित है। वस्तुतः भारतीय सिद्धान्तज्योतिषमें सूर्यसिद्धान्तके गणितसे ही पूर्ण वैज्ञानिकता आयी और यही कारण था कि सूर्यसिद्धान्तके बाद यद्यपि प्राचीन सिद्धान्तोंके नाम वही रहे, किंतु कुछ परिष्कार, संशोधन एवं परिवर्धनके साथ आगे गणितके सिद्धान्त बने। मूल गणित सिद्धान्त भगवान् सूर्यके नामपर ही आज भी प्रचलित है।

★★★ वर्तमानमें उपलब्ध सूर्यसिद्धान्त★★★

   वर्तमानमें खगोलीय गणितज्ञानका भगवान् सूर्यके नामसे एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ उपलब्ध है, जो 'सूर्यसिद्धान्त' के नामसे प्रसिद्ध है। यह ग्रन्थ चौदह अध्यायों (अधिकारों) में विभक्त है, इसकी श्लोक संख्या ५०० के आसपास है। अध्याय ११ तकका नाम पूर्वखण्ड तथा शेष तीनका नाम उत्तरखण्ड है।

  इस ग्रन्थके प्रादुर्भावके सम्बन्धमें ग्रन्थारम्भमें एक रोचक आख्यान आया है, जिसका सारांश यहाँ उपस्थित है-

प्राचीनकालकी बात है, मयासुर नामक महान् शिल्पीने सत्ययुगके अन्तमें वेदांगोंमें श्रेष्ठ तथा परम पुण्यमय तथा अत्यन्त रहस्यमय नक्षत्र-ज्ञान (ज्योतिष- विद्या) के श्रेष्ठ ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त कठोर तप करके भगवान् सूर्यकी आराधना की। उसके तपसे प्रसन्न हुए भगवान् सविता प्रकट हुए और उसे वरदान देते हुए बोले- हे दानवश्रेष्ठ मय! मैं तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ, मैंने तुम्हारे अभिप्रायको समझ लिया है, मैं तुम्हें अवश्य सम्पूर्ण ज्योतिर्विज्ञानका ज्ञान प्रदान करूँगा और उसका रहस्य भी बताऊँगा, * किंतु हे मय ! मूल बात यह है कि इस त्रिलोकमें ऐसा कोई नहीं है, जो मेरे तेजको सह सके, जो भी मेरे समक्ष रहेगा, वह मेरे तापसे दग्ध हो जायगा और दूसरी बात यह है कि मैं निरन्तर भ्रमण करता रहता हूँ, अतः मेरे पास अवकाश भी नहीं है, इसी कारण मेरा ही अंशभूत पुरुषावतार प्रकट होकर तुम्हें सम्पूर्ण ज्योतिषशास्त्र बतलायेगा- 

"न मे तेजः सहः कश्चिदाख्यातुं नास्ति मे क्षणः ।
 मदंशः पुरुषोऽयं ते निःशेषं कथयिष्यति ॥"
        (सूर्यसिद्धान्त १।६)

    मयासुरसे ऐसा कहकर तथा अपने अंशावतार पुरुषको मयके प्रति सम्पूर्ण ज्योतिषशास्त्र उपदिष्ट करनेकी आज्ञा देकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये, तदनन्तर मयने अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सूर्यांशपुरुषको प्रणाम किया, तब सूर्यावतार पुरुषने कहा- हे मय ! प्रत्येक युगमें भगवान् सूर्य ऋषियोंको ज्योति: शास्त्रका जो उत्तम ज्ञान दिया करते हैं, उन्हींके अनुग्रहसे मैं तुम्हें बताता हूँ, एकाग्र होकर सुनो। तदनन्तर सर्वप्रथम मयसे कालतत्त्व का निरूपण करते हुए कहा-कालके दो रूप हैं एक तो अविभाज्य कालतत्त्व है, जो शास्त्रप्रमाणद्वारा ही सिद्ध है, वह लोकोंका अन्त करनेवाला है, कालका दूसरा स्वरूप है, जो कलनात्मक है, विभाज्य है, ज्ञानका विषय है, उसे जाना जा सकता है। यह कलनात्मक काल भी स्थूल (मूर्त) एवं सूक्ष्म (अमूर्त) - दो प्रकारका है- 

"लोकानामन्तकृत्कालः कालोऽन्यः कलनात्मकः । 
स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्तश्चामूर्त उच्यते ॥"
       (सूर्यसिद्धान्त १।१०) 

इस प्रकार आगे मयासुरको सूर्याशपुरुषने सम्पूर्ण गणितशास्त्रका उपदेश दिया, जो मूलतः भगवान् सूर्यका ही अभिमत था। मयद्वारा सूर्यावतार सूर्याशपुरुषसे प्राप्त ज्योतिषशास्त्र विद्याका उल्लेख इसी ग्रन्थ (सूर्यसिद्धान्त) - में अन्यत्र भी आया है। वहाँ भी निर्दिष्ट है कि मयासुरने परम भक्तिपूर्वक सूर्यांशपुरुषकी पूजाकर उनसे अनेक प्रश्न किये- 

"अथार्कांशसमुद्भूतं प्रणिप्रत्य कृताञ्जलिः ।
 भक्त्या परमयाभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयासुरः ॥"
       (सूर्यसिद्धान्त १२ । १)

सम्पूर्ण विद्या देनेके अनन्तर सूर्यांशपुरुष बोले- हे सूर्यभक्त दैत्यश्रेष्ठ मय! मैंने यह परम अद्भुत रहस्य तुम्हें बतलाया है, यह सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा परम पवित्र और ब्रह्मस्वरूप है। ग्रहों और नक्षत्रोंसे सम्बद्ध यह जो दिव्य ज्ञान तुम्हें प्रदान किया, इसको जान लेनेसे सूर्यादि लोकोंमें सदाके लिये स्थान प्राप्त होता है- 'विज्ञेयार्कादिलोकेषु स्थानं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥' (सूर्यसिद्धान्त १४ । २३) इस प्रकार मयको भलीभाँति उपदेश देनेके अनन्तर सूर्यांशपुरुष उनसे पूजित होकर सूर्यमण्डलमें प्रविष्ट हो गये। मयने भी वह दिव्य ज्ञान प्राप्तकर अपनेको धन्य और कृतार्थ माना। कालान्तरमें ऋषियोंको जब यह जानकारी हुई कि मयने सूर्यभगवान्से वर प्राप्त किया है तो वे भी उस ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये आदरपूर्वक उसके पास गये और प्रसन्न होकर मयासुरने भी ऋषियोंको ग्रहों-नक्षत्रोंकी स्थितिका भलीभाँति ज्ञान कराया-'स तेभ्यः प्रददौ प्रीतौ ग्रहाणां चरितं महत्।' ( सूर्यसिद्धान्त १४ । २७) इस प्रकार भगवान् सूर्यसे प्रकट ज्योतिर्विद्या सूर्यांशपुरुष, मयासुर तथा ऋषियोंको अनुक्रमसे परम्परया प्राप्त होकर लोकमें प्रचलित हुई। 

★★★सूर्यसिद्धान्तका प्रतिपाद्य विषय★★★

    सूर्यसिद्धान्त चौदह अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। यहाँ प्रत्येक अध्यायकी बातें संक्षेपमें प्रस्तुत हैं- 

√●(१) प्रथम अध्याय (मध्यमाधिकार) के प्रारम्भमें सूर्यांशपुरुषद्वारा मयको ज्योतिर्विद्या प्राप्त करनेका आख्यान, कालविभाग, युगमान, दिन- संख्या, अहर्गण, ग्रहोंका मध्य, मन्दोच्च और शीघ्र गतिज्ञान करके वारप्रवृत्ति तथा तात्कालिक ग्रहज्ञानका गणित वर्णित है। 

√●(२) दूसरे स्पष्टाधिकारमें ग्रहगतिका कारण, ग्रहोंकी आठ प्रकारको गतियोंका वर्णन, ज्यानिर्णय, क्रान्ति और केन्द्रसाधन, ग्रहस्पष्ट, भुजान्तरसंस्कार, अहोरात्रमान, तिथि, नक्षत्र, योग तथा करणों आदिके गणितका वर्णन है।

√● (३) तीसरे अध्यायको त्रिप्रश्नाधिकार कहा गया है। दिकू, देश तथा कालसम्बन्धी तीन बातोंका इसमें वर्णन है। इसके लिये पलभा, अयनांश, नत्यानयन निरक्षराशिमान, लग्न तथा दशम लग्नज्ञानकी विधियाँ दी गयी हैं। 

√●(४) चौथा अध्याय चन्द्रग्रहणाधिकार है, इसमें सूर्यचन्द्रबिम्बका ज्ञान, सूर्य तथा चन्द्रग्रहणका स्वरूप तथा ग्रहणके भेद आदिका गणित है। 

√●(५) पाँचवें अध्यायमें विशेषरूपसे सूर्यग्रहणके गणितका विमर्श है।

√● (६) छठे छेद्यकाध्याय नामक अध्यायमें परिलेखाधिकारका वर्णन है। ग्रहणोंके भेदज्ञानको बतानेवाले छेदक गणितका वर्णन है। 

√●(७) सातवें अध्यायमें ग्रहोंकी युति, दृक्कर्म, ग्रहविम्ब तथा ग्रहयुद्ध आदिका वर्णन है। 

√●(८) आठवें अध्यायमें ग्रहों तथा नक्षत्रोंकी युतिज्ञान का वर्णन है।

√● (९) नवें अध्यायमें ग्रहोंके उदय एवं अस्त होनेके गणित तथा काल-निर्णय वर्णित हैं। (१०) दसवें अध्यायमें चन्द्रशृंगोन्नति तथा चन्द्रोदय आदिकी विधि वर्णित है। 

√●(११) ग्यारहवें पाताधिकार नामक अध्यायमें वैधृति, व्यतीपात आदि पातोंका वर्णन, योग तथा उनका फल, गण्डक, भसन्धि आदि निरूपित हैं । यहाँपर ग्रन्थका पूर्वभाग पूर्ण हो जाता है।

√● (१२) बारहवें भूगोलाध्यायके प्रारम्भमें मयासुरद्वारा पुनः सूर्यांशपुरुषसे प्रश्न हुए हैं। मयासुरने भूगोल-ज्ञान ( बतानेके लिये निवेदन किया है और कहा-हे भगवन् ! इस पृथ्वीका परिमाण क्या है, आकार कैसा है, यह किसके आश्रयसे टिकी है ? इसके कितने विभाग हैं और किस प्रकारसे सात पातालों और भूमिकी अवस्थिति है, किस प्रकार सूर्य दिन-रातकी व्यवस्था करते हैं, समस्त भुवनोंमें किस प्रकार प्रकाश करते हैं तथा किस प्रकार वे विचरण करते हैं? देवता और असुरोंके दिन-रात विपरीत क्यों हैं इत्यादि। इन सभी प्रश्नोंका उत्तर सूर्यांशपुरुषने उन्हें दिया और सृष्टिचक्र का वर्णन किया।

√● (१३) तेरहवें अध्यायमें गोलनिरूपण तथा गोलमें मेषादि राशियोंका प्रतिस्थापन करके उससे खगोल- ज्ञानका वर्णन है और अनेक प्रकारके कालज्ञानसम्बन्धी शंकु, यष्टि, चक्र आदि छायायन्त्रोंके निर्माणकी विधि वर्णित है। 

इस विद्याके फलमें सूर्याशपुरुष बताते हैं कि ग्रहनक्षत्रके और गोलके तत्त्वतः ज्ञानसे मनुष्य ग्रहलोकको प्राप्तकर अन्तमें आत्मज्ञानसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है- 

"ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्त्वतः ।
 गृहलोकमवाप्नोति पर्यायेणात्मवान्नरः ॥"
     (सूर्यसिद्धान्त १३ । २५)

√● (१४) अन्तिम चौदहवें अध्यायके आरम्भमें नौ प्रकारके कालमानोंका वर्णन हुआ है- 
(१) ब्राह्म,
 (२) दैव,
 (३) पित्र्य, 
(४) प्राजापत्य, 
(५) बार्हस्पत्य, 
(६) सौर, 
(७) सावन,
 (८) चान्द्र तथा 
(९)नाक्षत्रमान।
इसमेंसे केवल सौर, चान्द्र, नाक्षत्रिक तथा सावन - इन चार मानोंका ही व्यवहार होता है। षष्ट्यब्द जाननेके लिये बार्हस्पत्यमान समझना चाहिये। इन सभी कालमानोंके ज्ञानकी विधि तथा उन मानोंसे क्या-क्या व्यवहार लेना चाहिये-यह बताया गया है, जैसे दिन- रात्रिका परिमाण, उत्तर तथा दक्षिण अयन, संक्रान्ति, संक्रान्तिका पुण्यकाल आदिका व्यवहार सौर माससे जानना चाहिये।

चान्द्रमाससे तिथि, करण, विवाह, क्षौरादिकर्म, व्रत, उपवास, यात्रा आदिका विचार करना चाहिये। आगे भी इसी प्रकार विस्तृत विवेचन है। अन्तमें ग्रन्थकी फलश्रुति है। 

  इस प्रकार सूर्यसिद्धान्त नामक इस ग्रन्थमें खगोल तथा भूगोलज्ञान, अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणितके मूल सिद्धान्त बताये गये हैं। ज्या (Sine), कोटिज्या (Cosine), त्रिज्या (Radus), धनु (Aae) आदि त्रिकोणमितिका पूर्ण गणित वर्णित है तथा दिक्, कालज्ञान और ग्रहों-नक्षत्रोंकी गतियोंका पूर्ण वर्णन है। आज भारतवर्षके अधिकांश पंचांग इसी सूर्यसिद्धान्तके आधारपर बनते हैं। गणेशदैवज्ञका ग्रहलाघव तथा मकरन्दीय सारणियाँ इसी सिद्धान्तकी पोषक हैं। दैवज्ञजगत् में इस ग्रन्थका विशेष समादर है। 

★★★सूर्यसिद्धान्तकी टीकाएँ ★★★

    यह ग्रन्थ अत्यन्त क्लिष्ट है। इसके तत्त्वको समझानेके लिये संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी आदिमें कई टीकाएँ इसपर हुई हैं। प्रसिद्ध संस्कृत टीकाओंमें आचार्य रंगनाथ (शक १५२५)- की गूढार्थप्रकाशिका, नृसिंहदैवज्ञ ( शक १५४२ ) - का सौरभाष्य, विश्वनाथदैवज्ञ (शक १५५०) - की सोदाहरणगहनार्थप्रकाशिका तथा दादाभाई (शक १६४१)- हैं। की किरणावली मुख्य हैं।

★★★ परम सूर्यभक्त शिल्पशास्त्री मयासुरका संक्षिप्त परिचय ★★★

    सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थके प्रारम्भमें सूर्यावतार पुरुषके द्वारा मयको सम्पूर्ण ग्रह-नक्षत्रोंका ज्ञान करानेवाली ज्योतिषविद्याकी चर्चा आयी है, अतः संक्षेपमें दैत्य श्रेष्ठ मयका चरित यहाँ प्रस्तुत है -

   जिस प्रकार देवशिल्पीके रूपमें विश्वकर्मा (त्वष्टा)- की प्रसिद्धि है, वैसे ही असुरशिल्पीके रूपमें असुरश्रेष्ठ मयकी प्रतिष्ठा है। शिल्पकला, वास्तुकला, स्थापत्य, चित्रकला तथा खगोलज्ञानके आचार्य होनेके कारण असुरलोकके प्रासाद, उद्यान तथा असुरोंकी सभाओंके निर्माता मय ही हैं। इनके द्वारा विरचित 'मयशिल्पम्' नामक शिल्पशास्त्रीय ग्रन्थ अत्यन्त प्राचीन कालसे भारतमें समादृत होता चला आ रहा है। महर्षि वाल्मीकिने सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड और उत्तरकाण्डके लगभग पचास अध्यायोंके अन्तर्गत मयद्वारा निर्मित लंकापुरीके वर्णनमें मयके विचित्र शिल्पकौशलका परिचय दिया है। असुरोंकी नगरी भोगावतीके निर्माता मय ही हैं। मय केवल दैत्योंके ही नहीं, प्रत्युत देवताओं, मनुष्यों और यहाँतक कि भगवान् कृष्ण और युधिष्ठिरके कहनेपर इन्द्रप्रस्थ नगरी तथा युधिष्ठिरके दिव्य सभाभवनके निर्माता मय ही हैं, उस सभाभवनका फर्श इतना विलक्षण था कि स्थल जलके समान और जल स्थलके समान प्रतीत होता था, इसी कारण दुर्योधन- जैसा शूर एवं बुद्धिमान् भी उसे देखकर भ्रममें पड़ गया।

   पौराणिक कथानकोंके अनुसार मय कश्यपपली दनुके पुत्र हैं। इनकी पत्नीका नाम हेमा है। मन्दोदरी नामकी इनकी सुलक्षणा कन्याका विवाह रावणके साथ हुआ था। सूर्य-चन्द्रमाकी भाँति आकाशमें विचरण करनेवाले तीन पुरोंके निर्माता मय ही हैं। इनका भेदन करनेकी शक्ति केवल भगवान् शिवमें थी, इसीलिये वे त्रिपुरारि कहलाये । शिल्पशास्त्रोंके ग्रन्थोंमें आद्य आचार्यके रूपमें मयकी वन्दना की गयी है। मत्स्यपुराणमें वास्तुविद्याके अठारह आचार्य परिगणित हैं, उनमें मयका विशिष्ट स्थान है। जैसे मय शिल्पशास्त्रमें निपुण थे, वैसे ही भगवान् सूर्यकी कृपासे ज्योतिषविषयक उनका ग्रहगणितीय ज्ञान भी अपूर्व था।
#सूर्य_तत्व_दर्शनम्०१

सूर्य ज्ञान का कोश है। समस्त ज्ञान सूर्य में अधिष्ठित हैं। इस ज्ञान को पाने का अधिकारी कौन है ? श्रद्धावान् । जिस में श्रद्धा है, वही ज्ञान पाता है वा ज्ञानी होता है। श्रद्धा एक जटिल शब्द है। श्रत् (श्री + इति) = जो पकड़ में न आये, बहता रहे, गिरता रहे, चूता रहे, छितराता रहे, भागता रहे, फैलता रहे। अर्थात् निरन्तर गतिशील अमाद्य। श्रत् + धा धारणे + अङ् + टाप्= श्रद्धा। जिसके द्वारा गतिशील = को पकड़ कर रोका जाय अपने पास रखा जाय, अपने अधिकार में किया जाय। जैसे शिव (शान्तात्मा) ने गतिशील तत्व गंगा = स्वर्गीय ज्ञान को अपने सिर (मस्तिष्क वा बुद्धि) में श्रद्धा के बल पर समाहित किया। श्रद्धा को शिव वा शान्तात्मा की शक्ति कहते हैं। श्रद्धा में प्रेम (भक्ति) एवं विश्वास (निष्ठा) का भाव अनुस्यूत है। जिस से हम ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, उसके पास निर्भान्त ज्ञान है, इस का हमें विश्वास होना चाहिये तथा उस का हमारे प्रति भी यह विश्वास होना चाहिये कि हम ज्ञान पाने के अधिकारी हैं वा सुपात्र हैं। आस्था= निष्ठा = विश्वास प्रेमसमर्पण। ये जब एक स्थान / हृदय में होते हैं तो श्रद्धा का जन्म होता है। जहाँ श्रद्धा है, वहाँ ये सब आस्था / निष्ठा / विश्वास एवं प्रेम / भक्ति / समर्पण भी होते हैं।

 भगवान् कहते हैं- 

"श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
 ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधि गच्छति ॥"
(गीता ४/३७)

इस से स्पष्ट है-ज्ञान पाने के तीन सूत्र हैं। १ श्रद्धायुक्त होना, २-तत्पर रहना, ३-संयतेन्द्रिय होना । जो श्रद्धावान् होता है, तत्पर (अत्यधिक अनुरक्त) होता है या जिज्ञासावान् होता है तथा जो अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखता है वा इन्द्रियजित होता है, उसे ज्ञान मिलता है। इतना ही नहीं, इस ज्ञान से उसे परम शान्ति मिलती है। वास्तव में परम शान्त व्यक्ति ही ज्ञानी वा तज्ज्ञ है। ऐसे ज्ञानी गुरु परमेश्वर सूर्य को मेरा नमस्कार ।

पौराणिक सनातन धर्म में सर्पयुक्त दो देवता है- शिव और विष्णु शिव सर्प को अपने अंगांगों में धारण करता है। विष्णु, सर्प के द्वारा धारण किया जाता है- सर्प के ऊपर विश्राम करता है। सर्प दोनों का आभूषण है। जो, सर्प को धारण करता है, वह संहारकर्ता है। सर्प, जिसे धारण करता है, वह पालन कर्ता है। सर्प क्या है ? पेट के बल चलना, रेंगना, सरकना, झुककर चलना वा दायें-बायें चलना अर्थ वाली सूप धातु से सर्प शब्द है। सर्प का अर्थ है- सरकने वाला, टेढ़ा-मेढ़ा चलने वाला, सरणशील, गतिशील, विचर्यमाण, एक स्थान पर कभी न टिकने वाला। सर्प = समय सूर्य समय से शोभायमान है तथा समय को शोभनीय करता है। चर्यमाण समस्त आकाशीय पिण्ड वा ज्योतियाँ सर्प हैं। इन पिण्डों या ज्योतियों का अधिपति सूर्य महासर्प है। सूर्य धीरे-धीरे चलता है, सरकते हुए आगे बढ़ता है, आकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक सीधा होकर नहीं चलता। प्रत्युत् पहले ऊपर उठता है, उत्कर्ष बिन्दु पर पहुँचता है, फिर नीचे की ओर जाता है। यह उसका गोलाकार पथ है। वह दक्षिण की ओर झुककर चलता है और पश्चिम में अस्त होता है। इस लिये यह सर्प है। यह इसकी स्वयं की गति है। इसकी इस गति से सम्पूर्ण विश्व गति प्राप्त करता है। यह रूप सर्पों को धारण करने से सूर्य को शिव कहते हैं। गति को धारण करने से वा गतिशील रहने से भी सूर्य, शिव है। आकाश शान्त है। समस्त ग्रह नक्षत्रादि इसके सर्प रूप आभूषण (शोभा) हैं। इसलिये सूर्य सदाशिव है। सूर्य अपनी किरणों से आकाश में घुसा हुआ है। प्रविष्ट होने से यह विष्णु है। सूर्य को अपने भीतर प्रवेश कराने से यह आकाश विष्णु वा प्रभविष्णु है। सदाशिव एवं महाविष्णु को ही महाकाश / परम व्योम कहा जाता है। आकाश को देखना, शिव वा विष्णु का साक्षात्कार है।

शिव को त्रिनेत्र / त्रिनयन / त्र्यम्बक कहा गया है तथा विष्णु को त्रिविक्रम / त्रिलोक / त्रिककुव्याम कहा गया है। सूर्य के प्रकाश द्वारा तीन दिशाएँ जगमगाती हैं- पूर्व, दक्षिण, पश्चिम ये तीन दिशाएँ शिव  किरण परस्पर लम्ब तीन तल अन्तरिक्ष में के तीन नेत्र वा विष्णु के तीन पैर है। नेत्र = रश्मि। पाद = किरण।परस्पर लम्ब तीन तल अन्तरिक्ष में हैं इन्हें त्रिककुब्/त्रिनियन कहते हैं ।ये तीन दिशाएँ सूर्य के प्रकाश से सिंचित रहती हैं। 
इसलिये सूर्य को त्रिनयन / त्रिलोक कहते हैं।
 अन्धकार दूर करने से सूर्य को अन्धकान्तक शिव कहा गया है। श्वेत प्रकाश सम्पन्न सूर्य को कर्पूरगौरं शिव जाना जाता है। पीत प्रकाशमय सूर्य को पीताम्बर धारी विष्णु माना गया है। अस्तंगत वा रात्रि के सूर्य को कृष्ण वर्ण होने से भी कृष्णमूर्ति विष्णु कहते हैं। अतुओं / मासों / दिनों के चक्र क्रम को धारण करने से सूर्य को चक्रधारी विष्णु माना जाता है। दैहिक, दैविक एवं भौतिक दुःखों का कारक होने से प्रकाश त्रिशूल है। इसे धारण करने वाला सूर्य, त्रिशूली है।

सूर्यमण्डल में वर्तमान अग्नि अपने उप वा संहारक प्रभाव के कारण रुद्र है। इसके कारण वनस्पतियाँ मुझती है, प्राणी विकलता को प्राप्त होते हैं सूर्यमण्डल में विद्यमान यही अग्नि जब रसों को पुष्ट है, फलों को पकाती है तथा जीवों का पोषण करती है तो इसे विष्णु कहते हैं। इस प्रकार सूर्य की ये करती रश्मियाँ ही पालक होने से विष्णु तथा संहारक होने से शिव हैं। शिव को रुद्र वा रौद्र कहा गया है। विष्णु को ब्रह्म वा ब्रह्मण्य कहते हैं। पृथिवी पर उतरने वाले सूर्य के प्रकाश को वृषभ कहते हैं तथा द्युलोक वा अन्तरिक्ष में फैलने वाले सूर्य के प्रकाश का नाम गरुण है। इन प्रकाशों को वहन करने से सूर्य का नाम वृषभवाहन शिव तथा गरुणवाहन विष्णु है। सूर्य की श्वेत किरणों को गौर वा गौरी कहा गया है। किरणों में गति होने से भी ये गौरी (गति धारिणी) हैं [गम् + डो =गो + रच् = गौर। + ङीष् = गौरी।]इसलिये सूर्य गौरीपति शिव है। प्राणियों का पालन पोषण करने से ये किरणें पार्वती है।【पृ+वतच्= पर्वत + अण् =पार्वत + ङीप् =पार्वती ।】भविष्य पुराणान्तर्गत सूर्य सहस्रनाम में सूर्य का एक नाम है- उमापतिः । उम् गतौ उमति + अच् + टाप्= उमा = गति, किरण, प्रकाश इस प्रकार उमापति = प्रकाशपति सूर्य सूर्य लक्ष्मीपति है। लक्ष् लक्षते + मन् = लक्ष्म + ङीष्= लक्ष्मी =प्रकाश, जिससे = देखा जाता है। लक्ष्यते अनेन स लक्ष्मी प्रकाश रश्मियों का स्वामी होने से सूर्य लक्ष्मीपति विष्णु है।

अब तक के वर्णन से स्पष्ट है-सूर्य ही प्रसिद्ध देवता शिव है और यही विष्णु है। सूर्य की किरणें उमा पार्वती गौरी है। ये ही लक्ष्मी, रमा श्री है। सूर्य में जो दाहकता / प्रतप्तता है, उसे अग्नि पुरुष कहते हैं। यह अग्नि पुरुष शिव वा विष्णु है। सूर्य में जो चमक है, वह उसकी शोभा / प्रकाशता है। इसे गौरी / पार्वती / उमा / गिरिजा तथा लक्ष्मी / रमा / श्री कहते हैं। अग्नि अपने प्रकाश से जाना जाता है, सम्मानीय है, प्रसिद्ध है, यशस्वी है। अग्नि पुरुष है। प्रकाश रश्मियाँ स्त्री है। इसका अर्थ है-पुरुष की शोभा स्त्री है और स्त्री का सम्मान पुरुष है। यह दोनों अपृथक हैं, युग्म है, मिथुन हैं। सूर्य सम्पूर्ण जगत् का कारक है। इसलिये यह विश्व यमल (स्त्री-पुरुष रूप) है तथा शिव वा विष्णु है। प्रत्येक प्राणी संहरण एवं पालन के गुणों से युक्त होने के कारण शिव एवं विष्णु है। इसलिये मैं सब को नमन करता हूँ।

 शिव का निवास स्थान कैलास है। केल् क्रीडायाम् + अच् + टाप्= केला। + सद् + डः = केलासः । क्रीडाक्षेत्र / दीप्तिस्थल + अण् =कैलास =चमक है और जहाँ मह चमकते / खेलते हैं। सूर्य सदैव आकाश में रहता है। इसलिये यह कैलास वासी = आकाश, जहाँ हुआ। विष्णु को बैकुण्ठ मे रहने वाला कहा गया है। वैकुण्ठ = गोलोक, जहाँ पर किसी की गति / पहुँच नहीं है। सूर्य मण्डल ही वैकुण्ठ वा गोलोकधाम है। इसलिये सूर्य ही वैकुण्ठवासी विष्णु है। विष्णु क्षीर सागर=दूध के समुद्र = प्रकाश के आगार = आदित्य मण्डल में विराजता है।

लिंगति गच्छति वा लिंग:। सूर्य सदैव चलता रहता है इसलिये लिंग है। यह अकेला रहता है, इसलिये एकलिंग है। यह क्षितिज से लगा रहता है, इससे भी यह लग्न / लिंग है। यह चमकता हुआ चलता है, इसलिये ज्योतिलिंग है। द्वादश राशियों में गमन करने से अथवा द्वादश लग्नों के उदय के रूप में यह द्वादश ज्योतिर्लिंग है। शान्त आकाश में स्थित होने से यह शिवलिंग है। शांतिपूर्वक आकाश पथ में चलते रहने से भी यह शिवलिंग है। सूर्यमण्डल आग्न्येय होने से परुष वा कठोर है। इसलिये पुरुषलिंग है। सूर्य अपनी आग्न्येयता वा प्रकाशता से सर्वत्र विद्यमान= सर्वव्यापक है। इसलिये यह अग्निलिंग वा विष्णुलिंग है। लोक में शिवलिंग एवं विष्णुलिंग की पूजा होती है। इस प्रकार सूर्य उपासना की दो पद्धतियाँ है- 

१. ज्वालीय- इसमें अग्नि की ज्वालाओं में घृत की आहुति दी जाती है इसे हवन कहते हैं। इससे अग्निलिंग तृप्त होता है।

 २. जलीय - इस में सूर्य की किरणों को जल दिया जाता है। इसे तर्पण कहते हैं। इसका विकृत रूप है शिलाखण्ड पर जल की धारा को गिराना। इसका नाम रुद्राभिषेक है।

यह विश्व अग्निषोमीय है। अग्नि सूर्य है। चन्द्रमा सोम है। शिव के ललाट पर चन्द्रमा है। चन्द्रमा जलीय ग्रह है। इसका अर्थ हुआ शिव (सूर्य) को जल प्रिय है। शिव के मस्तक पर गंगा की धारा प्रवाहित है। गंगा भी जल तत्व है। इस से भी सिद्ध हुआ कि सूर्य (शिव) को जल प्रिय है। सूर्य को अर्घ्य देना हो रुद्राभिषेक है। अग्नि रूद्र है प्रज्ज्वलित अग्नि में घी की आहुति डालना भी रुद्राभिषेक है। इस से अग्नि प्रज्ज्वलित होती है, अर्थात् सूर्य प्रसन्न होता है। हवन और तर्पण से सूर्य की उपासना करना प्रशस्त एवं सत्यमार्ग है।

शिव को मखान्तक (यज्ञ विध्वंसक) कहते हैं। इसलिये शैव यज्ञ हवन नहीं करते । वे जलधारा से सूर्य को तृप्त करते हैं। प्रज्ज्वलित अग्निमें अर्थात् हवन कुण्ड में जल को छीटें मारना भी रुद्राभिषेक है। किन्तु इससे अग्नि नहीं बुझना चाहिये। प्रज्ज्वलित पार्थिव अग्नि साक्षात् सूर्य है। इस की प्रदक्षिणा करना, सूर्य की परिक्रमा के तुल्य है। दक्षिणावर्त परिक्रमा करने से तेज एवं बल मिलता है। सूर्य अपनी पत्नी पृथ्वी की परिक्रमा दक्षिणावर्त होकर सतत करता हुआ तेजस्वी एवं बली बना रहता है। हम सब का भरण पोषण करने से पृथ्वी का नाम पार्वती है। यह सूर्य (शिव) की भार्या है भोजन करना = भूख करना = को शान्त करना= जठराग्नि की सेवा करना भी हवन / यजन / यज्ञ याग है। आचमन करना = जलपान करना = प्यास मिटाना भी अर्घ्य / अभिषेचन है। सभी लोग भोजन एवं पान द्वारा सूर्य की नित्य उपासना करते हैं। सूर्य उपासना में हवन एवं तर्पण के साथ-साथ नवन (नु स्तुतौ नौति + अप्) भी करना चाहिये। नवन =स्तुति, प्रशंसा, स्तवन, नाम जप, नाम संकीर्तन । सूर्य के मण्डल को स्मृति में उतारना ध्यान है। हमें नित्य सूर्य का ध्यान करना चाहिये। कहा है-"ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः।" (भविष्यपुराण। )सूर्य मण्डल के मध्य में स्थित यज्ञ पुरुष नारायण का ध्यान करना चाहिये।

सूर्य अर्धनारीश्वर है आधा नारी (प्रकृति) एवं आधा ईश्वर (पुरुष) मिलकर पूर्ण वा अर्धनारीश्वर हुआ। नारी =सौम्य / मृदु । पुरुष = परुष / कठोर। सूर्य का उत्तर एवं दक्षिण गोल में होना, उसका अर्धनारीश्वर होना है। शीत ताप, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, ज्ञान-अज्ञान, प्रकाश अन्धकार का कारक होने से भी सूर्य अर्धनारीश्वर है। सूर्य के अर्धनारीश्वर होने से विश्व में द्वन्द्व है, पक्ष-विपक्ष हैं, शत्रु-मित्र हैं। शरीर का कारक अर्धनारीश्वर सूर्य है इसलिये शरीर में दायाँ-बायाँ आगा-पीछा, ऊपर-नीचे, मृदुता कठोरता है। जहाँ जिसमें चर-अचर, लाभ-हानि, उत्पत्ति-विनाश, योग-वियोग, प्रवृत्ति-निवत्ति, लघुता गुरुता, तनुता-पृथुता, द्रुतता-मन्दता, लज्जा-घृष्टता, प्रेम-घृणा, काम-क्रोध के भाव हैं, वहाँ वा उसमें अर्धनारीश्वर सूर्य है। अर्धनारीश्वर = अर्धनारी + अर्ध ईश्वर = पूर्ण तत्व ।

एक में दो का होना वा दो का परस्पर एक सूत्र से बँधे रहना ही अर्धनारीश्वरत्व / पूर्णत्व है। जैसे शरीर के सन्दर्भ में -२ बाहु, २ कर्ण, २ भौंह, २ पलक, २ ओष्ठ, २ गाल, २ नासाछिद्र, २ अंस (कंधे), पार्श्व (बगल), २ फुफ्फुस (फेफड़े), २ वृक्क, २ वृक्ष, २ प्रोथ, २ वृषण, २ पृष्ठ (आगा-पीछा हैं। ये दो परस्पर पूरक हैं। शरीर में अस्थियों से दृढ़ता है तो मांसपेशियों से लचक है। इसलिये यह शरीर पूर्ण है। पूर्ण होने से प्रत्येक शरीर अर्धनारीश्वर है। अतएव यह देह पूज्य है और सूर्य का आवास वा रूप है। इस शरीर को मैं नमस्कार करता हूँ।

देवों में सर्वप्रथम गणेश की पूजा होती है। गणेश को एकदन्त कहा गया है। इ गतौ एति + कन् =एक=गतिशील, चर ।दम् दाम्यति + तन् =दन्त= दमन करने वाला, जीतने वाला, जेतनशील, जेता । एकदन्त = जो चलते हुए अन्धकार पर विजय पाता है। सूर्य ही एकदन्त गणेश (ग्रह गणों का ईशनकर्ता वा नियामक है। गणेश को मूषकवाहन कहते हैं। मूषक (अन्धकार) है वाहन जिसका वह सूर्य । मूष् मोषति + कन्= मूषक = अन्धकार, जो विश्व को चुरा (छिपा) लेता है। रात्रि, अन्धकार की धात्री है। सूर्य, रात्रि के गर्भ से बाहर आता है। अर्थात् रात्रि / अन्धकार से प्रकाश का जन्म होता है। सूर्य पश्चिम दिशा में जाकर अन्धकार को अपना वाहन बनाता है, तथा पूर्व दिशा में आकर वह अपने वाहन मूषक (अन्धकार) को त्याग देता है।

गणेश लम्बोदर हैं। लम्ब् लम्बते + अच् = लम्ब = नीचे की ओर लटकता हुआ, दोलायमान, झुकता हुआ। उद् + ऋ गतौ अरति + अप् = उदर = ऊपर की ओर उठता हुआ, गति करता हुआ। लम्ब + उदर= लम्बोदर जो पहले ऊपर की ओर बढ़ता है तथा मध्याकाश में पहुंचकर धीरे धीरे पश्चिम दिशा की ओर लटकता है, नीचे जाता है। लम्बोदर नाम सूर्य का लम्बाई एवं ऊंचाई लिये हुए जो आकाश मार्ग में विचरता है, वह सूर्य ही लम्बोदर है। गणेश, हस्तिमुख / गजवदन / गजानन है। हस् हसति + क्तिच्= हस्ति= हंसता हुआ प्रसन्न प्रकाशित, रश्मियुक्त, आभामय, किरणवान् प्रकाशपूर्ण मुख मण्डल, हवनकुण्ड, पास विचर हस्तिमुख = चमकता हुआ मुख, हँसता हुआ चेहरा, प्रकाशित आदित्य मण्डल । देदीप्यमान सूर्य को हस्तिमुख कहते हैं। गम् + ड=गः । जन् + इ = जः। गः + जः = गजः। चलते हुए जनन कर्म करने वाला वा प्रकाश उत्पन्न करते हुए चलते रहने वाला आ + अन् + ल्युट् = आननम् । सब कुछ खाने वाला, मुख अन्धकार भक्षक सूर्यमण्डल ।

गज + आनन = गजानन चलता है, प्रकाश करता है, अन्धकार खाता है जो, उसका नाम गजानन सूर्य है।

 गणेश वक्रतुण्ड है। तुण्ड् तुण्डति तुण्ड् + अच् =तुण्ड = मुख, जो पास को कुतरता, तोड़ता, खाता है। किरण, जो अन्धकार का कर्तनकरती है। वक्रतुण्ड=वर्तित प्रकाश की किरण, आवर्तित प्रकाश, छितराया हुआ प्रकाश, सूर्य का वह प्रकाश जो ग्रह पिण्डों से टकराकर पृथ्वी पर अपना प्रभाव डालता है। वक्र प्रकाश का स्वामी होने से सूर्य वक्रतुण्ड है। सूर्यमण्डल सोधा नहीं होता। यह दक्षिण दिशा की ओर कुछ झुका होता है। इसलिये भी इसे वक्रतुण्ड कहते हैं। गणेश को दो पलियाँ हैं- वृद्धि (सम्पन्ता) तथा सिद्धि (सफलता) । लक्ष्मी वृद्धि है। गौरीसिद्धि है। लोक में गौरी गणेश के पूजन का अर्थ है, प्रकाश युक्त स्थान वा भाव में रहना। 

🔹कमजोर सुर्य की पहचानः जातक के आत्म-विश्वास और आत्म -सम्मान में तथा इच्छाशक्ति और साहस में कमी और दूसरों का भय इसके संकेत हैं। जातक में प्रेरणा और कुछ करने की इच्छा में कमी और दूसरों (परिवार-जनों/मित्रों) पर भातिक और भावनात्मक खरूप से निर्भर रहने की आदत होती है। ऐसे जातक जीवन में अधिक सफल नहीं होते, न उनको सफलता से खुशी होती है और उनको कार्य-क्षेत्/ बास से हमेशा परेशानी रहती है। जातक के पिता की जल्दी मृत्यु हो जाती है या उसका भी भाग्य अच्छा नहीं होता या उसके जातक से सम्बन्ध प्रतिकूल होते हैं। शारीरिक स्तर पर, जातक में उजों व रक्त की करमी, कमज्जोर पाचन/ भूख, कमजोर नाड़ी / हृदय, आंतरिक रक्त-स्त्राव या रक्त-संचरण में खराबी का भय रहता है। शरीर में सूजन, जल-एकत्रित होना, सूर्य- आधात, नेत्र-सोग, विभिन्न अंगों या स्नायु- प्रणाली का सामान्य से कम कार्य करना संभव है। हड्लियों में कमजोरी या जोड़ों में दर्द भी हो सकता है।

🔹ज्योतिषीय तत्व्व: सूर्ये पिता, आत्मा, अहंकार और पद/ अधिकार की शक्ति का कारक है। यह अशुभ तो नहीं लेकिन क्रूर और अलगाववादी ग्रह है और इसका द्रष्टकोण निर्लिंप्त व अनर्गल बातों से दूर रहने का है। मेष, सिंह, वृश्चिक और धनु लग्न जातकों के लिए यदि सूरय बली हो तो जातक में नेतृत्व, स्वतंत्रता, बुद्धि और गहन जानकारी के गुणों में वृद्धि हो जाती है। सूर्य हृदय, मस्तिष्क, दाहिना नेत्र, हड्धियां, गला, तिल्ली और appendicitis तथा पूर्व दिशा का कारक है।

सूर्य नीचे दी गई स्थिति में कमजोर होता है:

1. तुला राशि में नीचता
2. शत्रु / प्रतिकूल राशि (शुक्र और शनि की)
3. त्रिक भावों में (यदि लग्नेश हैं तो) 
4. शनि, राहू/ केतु के अशुभ प्रभाव में, केतु की निकट युति/ द्रष्टि विशेष रूप से अशुभ होती है।
5. विभिन्न नक्षत्रों में पीड़ित होने पर यह नीचे दिए रोग दे सकता  है;
🔸 अपने नक्षत्र में- ज्वर और चिड़्चिड़ापन।
🔸 च्द्रमा के नक्षत्र में- मूडी और निराशावादी।
🔸 मंगल के नक्षत्र में - रक्त की कमी, नीचा रक्त-चाप या सिर दर्द। 
🔸 बुध के नक्षत्र में- माइग्रेन या स्नायु-संबधित।
🔸 गुरु के नक्षत्र में- पीलिया, यकृत या पित्ताशय के रोग।
🔸 शुक्र के नक्षत्र में- मूत्र में जलन, सिस्ट या नैतिकतापरक।
🔸 शनि के नक्षत्र में- नीचा रक्त-चाप, जोड़ का दर्दे या पक्षाघात।
🔸 राहू के नक्षत्र मे- मानसिक रोग या मंद-बद्धि।
🔸 केतु के नक्षत्र में- नीच रक्त-चाप, हृद्य में दर्द / रोग।

🔹 मनोवैज्ञानिक संकेतः सूर्य अपनी उच्च स्थिति में आत्मा, तेजस्विता, इच्छाशक्ति, चरित्र और सच्चाई का तथा नीच स्थिति में अहंकार, आत्म-तुष्ठी और नैतिक मूल्यों में कमी का संकेतक हैं। सूर्य चेतना की स्थिति और अन्धकार से प्रकाश की ओर बडने की प्रवत्ति बताता है।

🔹 अधिदेवता: सूर्य के नियंत्रक देवता अग्नि है लेकिन सूर्य देव और भगवान शिव भी पूजे जाते हैं।
सूर्य के राशिगत व स्थानगत फल :-

राशिगत फल
मेष - बुरा। वृषम - सामान्य। मिथुन - एक ओर वे अच्छा, दूसरी ओर से बुरा। कर्क - अच्छा। सिंह - बुरा कन्या - सामान्य। तुला - बहुत अच्छा। वृश्चिक - अच्छे बुरे का मिश्रण, फिर भी अच्छा समझ सकते हैं। घनु - अच्छा मकर - साधारण। कुंभ - बुरा। मीन्‌-साधारण 

1. मेष—कुंडली में मेष राशि का सूर्य होने पर जातक गौरवर्ण, पराक्रमी, बलवान, उदार, प्रमाणबद्ध, राजसी ठाटबाट से रहनेवाला, ऐश्वर्यवान, धैर्यवान, स्वाभिमानी, अल्प संतान से युक्त, बुद्धिमान, महत्त्वाकांक्षी, स्त्रियों से प्रभावित न होनेवाला, अपने परिश्रम एवं पुरुषार्थ से अधिकार प्राप्त करनेवाला,क्षात्रकर्म, संघटक, फोरमन, तांबा, माणिक, प्रवाल,ऊन तथा ऊनी कपड़े । ख्याति प्राप्त होता है।Organisers, Leaders, Architects,
Designers, Company - Promotors, Phrenologists, Character-
Readers, Agents, Brokers, Appraisers, Auctioneers,
Surveyors, salesman, Detectives, Guides and courtiers,
Travelling Companies, House and Estate agents, Inspectors,
Foreman, Managers, Lecturers, Novelists, Writers of short
stories, Photographers, Reformers, Electionists.

2. वृषभ - कुंडली में वृषभ राशि का सूर्य होने पर जातक आत्मविश्वासी, सुगंधित वस्तु एवं कपड़े का व्यापार करके निर्वाह करनेवाला, स्त्री का दुश्मन, पारिवारिक वातावरण में अशांति महसूस करनेवाला एवं संगीत-वाद्यों को बजाने में निपुण रहता है।दवाईयाँ, पशु, घास, लकड़ी, किसान, नृत्य एवं नाट्यगृह |
Bankers, Stock-Brokers, Treasurers,
Cashiers, Speculators, Mechanical and laborious pursuits,
Singers, Actors, Magnetic healers, Doctors and Nurses,
Agriculturists, Farmers, Fruit growers, Gardeners, builders,
Billdiscounters, Financial-Agents, Book-Binders,
Manufacturing Chemists, Compositors, Dressmakers,
Florists, French Painters and Decorators, Japanners,
Collectors, Insurance Agents, Taxidermistrs

3. मिथुन- कुंडली में मिथुन राशि का सूर्य होने पर जातक विनम्र, अभ्यासी, अच्छा वक्ता, भाई-बहनों के सहयोग से जीवन में उन्नति करनेवाला होता है। व्याकरण एवं ज्योतिषशास्त्र का ज्ञाता होता है।स्कूल मास्टर, जवाहरात, कोर्ट की भाषा।
Book-keepers, Clerks and
Commerical travellers, Literary persuits, Editors, Reporters,
Newspapermen, Good-accountants, Solicitors, Attendents,
Post office officials clerks, Decorative artists, School
Masters, Guides, Journalists, Lecturers, Milliners,
Photographers, X Rays - (Katwe) Postman, Railway-
employees, Secretaries, Translators

4. कर्क-कुंडली में कर्क राशि का सूर्य होने पर जातक नीतिवान, मितव्ययी, निरुत्साही, क्रोधी स्वभाव का, चंचल एवं जलप्रवास का प्रेमी होता है।बिजली, उस पर चलनेवाले धंधे, नेत्रवैद्यका
Historians, Naval Captions, Nurses,
Caterers, Hotel-keepers, Barmaids, Confectioners, Actors
and Actresses, Companious, Cooks, Laundresses, Dealers
in second-hand Clothing, Second-hand-Book-sellers,
Dressmakers, Matrons, Midwives, Mineral Water
Manufacturers, Researchers, Stewardesses

5. सिंह - कुंडली में सिंह राशि का सूर्य होने पर जातक उद्यमी, बलशाली, क्रोधी, तेजस्वी, स्वाभिमानी, वन-पर्वतवाले प्रदेशों में प्रसन्न रहनेवाला, आध्यात्मिक विषय में प्रवृत्त, आत्मविश्वासी, मित्रों के सहयोग से सम्मान प्राप्त करनेवाला रहता है।जौहरी, केशर, डिक्टेटर, राजा ।
High Posts, Jewellers, Goldsmiths,
writers of love stories of dramatic sketches, Musicians and
Poets, Trusty-Managers.

6. कन्या-कुंडली में कन्या राशि का सूर्य होने पर जातक लेखन, चित्रकला, इतिहास, वैज्ञानिक शोधन, काव्य एवं गणित में रुचि रखनेवाला, कलाप्रिय, तीव्र स्मरणशक्ति से युक्त, तार्किक, अपने कुल या वंश के बारे में गुप्त चिंता रखनेवाला, रोगी पत्नी का पति एवं अनुशासनप्रिय होता है।मैनेजर, गिलट, अनाज, सार्वजनिक कार्यालय ।
Trade, Agents, Food Providers.

7. तुला-कुंडली में तुला राशि का सूर्य होने पर जातक अनुचित काम करनेवाला, संतान की चिंता से युक्त, पैतृक संपत्ति पानेवाला, अधिकार संपन्न, मान-सम्मान एवं सत्ता कायम रखनेवाला, संगीत प्रेमी, मद्य एवं अन्य मादक वस्तु तैयार करनेवाला, उनका सेवन करनेवाला, झगड़ालू, अस्थिर विचारों का, कामासक्त, स्त्रियों के प्रभाव के कारण परेशान रहनेवाला, अस्वस्थ, बेचैन रहता है।
सिविल ऑफिसर, प्लेटिनम, परदेशों के राजदूत ।Overseers, Librarians, Secretarians.Stage Managers and Musical diretors, Decorators,
Arrangers, House-keepers.

8. वृश्चिक-कुंडली में वृश्चिक राशि का सूर्य होने पर जातक क्रोधी, धैर्यवान, कठोर, विषैली वस्तुओं की खरीद-फरोख्त करके निर्वाह करनेवाला, चालाक, गुप्तचर, इंजीनियर, कैमिस्ट, वैद्य, शल्यचिकित्सा आदि में से किसी एक क्षेत्र से धनार्जन करनेवाला होता है।पत्थर, रक्तचंदन, चंदन, कच्चा रेशम, शस्त्र,
शरीरशास्त्र (Anatomy) ।
Dyers, Chemists, Businessers connected with oils, They make good surgeons and Dentists, Detectives, Butchers, Ironsmiths.

9. धनु–कुंडली में मकर राशि का सूर्य होने पर जातक उच्च श्रेणी के रहन-सहनवाला, व्यवहारकुशल, धार्मिक, धनवान, सज्जन, वैद्य, शल्यचिकित्सक, निष्कपटी, उत्साही किंतु पत्नी से वैचारिक मतभिन्नता रखनेवाला होता है।सोना, रेडियम, ज्यूरर्स, फादर्स (धर्मगुरु) Legislators
कानून करनेवाले।Commander, Teaching, The Ministry,
Law Astronomy, Astrology, Photography, Designing,
Inspectors, Equestrians, Horse-Dealers, Sportsmen.

10. मकर-कुंडली में मकर राशि का सूर्य होने पर जातक स्थिर मति, हीन एवं निंदनीय आचरण का, अतिलोभी, विनोदी, दूसरों की संपत्ति से सुख भोगनेवाला होता है। नगराध्यक्ष, कौन्सिलर, असेंब्ली,नगरपालिका, ज़िला या लोकल बोर्ड, सेक्रेटरिएट, कौन्सिल ऑफ स्टेट MayorThe land and Building speculations,
Scientific Reserchers, Writers, Contractors, Builders
Upholsters, Designers, Decorators, Large speculations
Elaborate, Enterprises.

11. कुंभ-कुंडली में कुंभ राशि का सूर्य होने पर जातक निर्धन, भाग्यहीन, स्वार्थी, गूढ़ विद्याओं का जानकार, ज्योतिषी एवं क्रांतिकारी होता है। मोटी रस्सी बनानेवाले।
Wood Artists, Designers, Musicians,
Electricity, Writers, Railways

12. मीन कुंडली में मीन राशि का सूर्य होने पर जातक जौहरी, धनवान, धार्मिक, स्त्रियों को प्रिय, सिद्धांतवादी एवं कलाप्रेमी होता है।
श्यामारुणांग - पुरुष राशि में अथगोरे र॑ग के और स्त्री राशि में गोरे और सुंदर होते हैं। एक्सरे फोटोग्राफर, मोती, हीलियम, प्रदर्शनी Naval Captain, Travellers, Advance Agents, Novelists, Book-keepers, Accountants, Painters, Mediums.
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सूर्य का द्वादश भाव विवेचन 

प्राचीन ग्रंथकारों ने एक ही ग्रह के स्थान के अलग अलग फल दिये हैं। ये फल परस्पर विरोथी भी हैं जिससे सामान्य वाचक सारे फलज्योतिष को ही झूठ समझने लगता है। और तो और ज्योतिषयों को भी शंका होती है कि प्राचीन लेखकों ने इस विरोध का स्पष्टीकरण नहीं दिया है जिससे संअम पैदा होता है। इसलिए यद्यपि प्राचीन ग्रंथ ज्ञानपूर्ण और उत्तम हैं तथा उनके अभ्यास से निर्दोष फल बताना संभव है, फिर भी सामान्य पाठक इनके अभ्यास को छोड़कर पश्चिमी ग्रंथों की ओर झुकते हैं। इस अंग्रेजी वाडइ्मय में भी जो फल दिये गये हैं, वे उसी प्रकार संदिग्ध और गोल मटोल हैं। पाठकों का यह संशय अंशतः दूर करना मेरा प्रधान उद्देश्य है। 

प्राचीन ग्रंथकारों ने दो बातों का स्पष्टीकरण नहीं किया हडै। एक तो यह कि हरेक ग्रह में तारक और मारक ये दोनों शक्तियाँ हैं। दूसरे, एक ही ग्रह स्त्री और पुरुष राशि के भेद से भिन्न फल देता है। पहली बात के उदाहरण के लिए गुरू ज्ञान से भिन्न दूसरी बातों में बुरे फल देता है। 

यह ज्ञान देता है किंतु संपत्ति का नाश भी कर सकता है। किंतु शास्त्रकारों ने गुरु को संपत्ति का कारक कहा है जिससे गुरु बुरे फल देता ही नहीं ऐसी धारणा हो गई है। इसलिए शास्त्र में इसके शुभ फल कहे हैं फिर भी अनुभव उलटा आता है। दूसरी. बात का खुलासा इस प्रकार है 
रवि, मंगल शनि और राहु ये पापग्रह स्त्री राशियों में अच्छे फल देते हैं और पुरुष राशियों में अशुभ 
गुरु, शुक, चंद्र और बुध ये शुभ ग्रह स्त्री राशियों में अशुभ होते हैं और पुरुष राशियों में अच्छे फल देते हैं। 
रवि, चंद्र, गुरु और शुक्र जिस स्थान में हो उसका नाश करते हैं। गुरु दशम में हो तो पिता का सौख्य नहीं मिलता। वही शनि दशम में हो तो पिता का सुख पूरा देकर माता का सुख नष्ट करता है।
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 सूर्य के प्रथम स्थान (लग्न)भाव एवं राशिगत फल
प्रथम भाव का फल जिस व्यक्ति की कूंडली के प्रथम भाव “लग्न” में सूर्य होता है, वो पारलीकिक सुख की इच्छा रखने वाला, दुलमुल नीति वाला, जीवन में उत्साहित, शासन करने का इच्छुक, स्वतंत्र पर्यटन स्वभाव वाला होता है। उसके जीवन में भ्रमण के योग बनते रहते हैं। उसका मन बड़ा ही चलायमान होता है, कभी एक-सा नहीं रहता। तनिक-सी बात पर भी उसे क्रोध आ जाता है। वैसे वो चंचल मन का, स्वाभिमानी और साहसी होता है। पत्ली, पुत्र तथा माता-पिता की ओर-से उसका मन सदैव व्यथित-सा रहता है। ऐसा व्यक्ति रतोंधी तथा हृदय रोग से ग्रस्त रहता है। किसी दुर्घटना का शिकार भी हो सकता है। उसके सिर पर - चोट लगती है। बाल्यावस्था में वो रोगी अधिक रहता है। वायु-पित्तादि से उसका शरीर कृश तथा क्षीण रहता है। 

वैद्यनाथ - मार्तण्डो यदि लग्नगोऽल्पनयो जातः सुखीनिर्घुणः । स्वल्पाशी विकलेक्षणो रणतलश्लाघी सुशीलो नटः ।।
ज्ञानाचारतः सुलोचनयशः स्वातंत्राको च्वं गते । मीनेस्त्रीजनसेवितो हरिगते राज्यंधको वीर्यवान ।।
जातक बचपन में रोगी, नेत्र रोग से पीड़ित, अस्थिर व अशांत जीवनवाला, भाग्यहीन, निसंतान और घुमक्कड़ प्रकृति का होगा।
    -मानसागरी
    जातक कम बालों वाला, उग्र स्वभाव का, उतावला व ऊँचे कद का,लिचलिची आँखो वाला, पतली व दुबली देह वाला, संतति-वियोग सेग्रस्त और क्रूर होगा।

    -फलदीपिकाजातक के सिर पर बाल कम, काम करने में आलसी, क्रोधी,प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, सम्मानित, कमजोर-दृष्टि व भद्दे शरीरवाला,साहसी, बेसब्र (अधीर) और दयाभाव से रहित होता है। वह कद-काठी मेंकँचा, पत्नी व संतान के कारण पीड़ित और वात-पित्त रोगों से ग्रस्त होगा।
    -सारावली
    जातक नेत्ररोगों से पीड़ित परन्तु अच्छे स्वास्थ्य वाला, चतुर, अच्छेव्यवहार वाला, कुशाग् बुद्धि, कम बोलने वाला, जन्मस्थान से दूर विचरणकरने वाला, न पढ़ने की आदत वाला और प्रतिष्ठित होगा।
    -भृगु

    व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, काम के प्रतिआलसी, साहसपूर्ण काम करने वाला, जल्दी भड़कने वाला, शरीर मेंअधिक गर्मी वाला, मानप्रतिष्ठा की परवाह न करने वाला, दृढ इच्छाशक्ति,चंचल और लड़ाई-झगड़े से बचने वाला, प्रतिष्ठित होगा।
    -डॉ. रामन
    अग्नी त्व प्रधान ग्रह सूर्य लग्न में होने पर अच्छा स्वास्थ्य, साहस,राजसी व्यक्तित्व, कम बाल, नेत्र रोग आदि देता है। शायद लग्न कोकाल-पुरूष की प्रथम राशि में (मेष) माना गया है, परन्तु लग्न का सूर्यहमेशा ऐसे प्रभाव नहीं देता फल का स्वरूप लग्न की राशि पर भी निर्भरकरता है। सूर्य की मेष या वृश्चिक में स्थिति एक जैसे फल नहीं देसकती। क्योंकि मेष अग्नित्व प्रधान, विषम, चर राशि है जबकिवृश्चिक जलतत्व प्रधान, सम, स्थिर राशि है। परिणामस्वरूप शास्त्रीयग्रन्थों द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त की व्याख्या राशि, ग्रह और भाव केगुणधमों के अनुसार ही की जानी चाहिए। भचक्र का पहला भाव मेष है,जिसका स्वामी मंगल, सूर्य का मित्र है। इसी कारण लग्न या प्रथमभावमें सूर्य के अच्छे फल बताये गये।

रवि लग्न में हो तो संतति कम होती है। जन्म से ही सुखी, निर्दय, कम खानेवाला, बार बार अस्वस्थता पैदा होनेवाला, युद्ध आगे रहनेवाला, शीलवान, नट, ज्ञान और आचरण में मग्न, सुहावनी आँखों का, सब कार्यों में यशस्वी और स्वतंत्रता से ऊंची. जगह पानेवाला होता है। मीन में रवि हो तो बहुत सी स्त्रियों से संबंध होता है। सिंह में हो तो रात को दिखता नहीं है। यहाँ लग्न स्थान को संतति दर्शक मानकर कम संतति ऐसा जो फल दिया गया है वह रवि पुरुष राशि में हो तो मिलता है। स्त्री राशि में हो तो संतति अच्छी संख्या में होती है। स्त्री राशी में हो तो सुखी होता है। किंतु पुरुष राशि में हो तो सदा कोई न कोई दुख पीछे लगा रहता है। या तो संतति का अभाव होता है या शारिरीक कष्ट होते है। कम खानेवाला यह फल स्त्री राशि का है। पुरुष राशि में खाने की बहुत इच्छा होती है। विकलेक्षण का यह फल मेष, सिंह
धनु इन राशियों में विशेष कर मिलता है। युद्ध में अग्रसर और सुशील ये फल भी इन्हीं राशियों में विशेष मिलते हैं। मिथुन, कर्क,
सिंह, तुला, धनु, मकर, कुंभ, मीन इन राशियों में नट होना संभव है। ज्ञानाचाररत यह फल कर्क, वृश्चिक, धनु और मीन में देखा ।
जाता है। स्त्री राशि में सुलोचन यह फल देखा गया है। मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु इनमें तो कीर्ति मिलती है, दूसरी राशियों में
नहीं। स्वतंत्रता से उंची जगह पाना यह फल कर्क, वृश्चिक व मीन में अधिकता से, मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ इनमें साधारण
तौर पर और वृषभ, कन्या तथा मकर में बहुत ही कम देखा गया है। पुरुष राशि में हो तो आरंभ से ही स्वतंत्र होता है। स्त्री राशि
में हो तो पहले नौकरी करके बाद में स्वतंत्र होता है। मीन में रवि अकेला हो तो अनेक स्त्रियों का उपभोग नहीं होता, इसके साथ
शुक्र हो तो होता है। सिंह में रवि हो तो रात को नहीं दिखता, यह फल समझ में नहीं आता। वस्तुतः सिंह राशि रात को ही बलवान
होती है और सिंह को भी रात में ही अच्छा दिखाई देता है। मैंने जो दो उदाहरण देखे उनमें एक में व्ययस्थान में कन्या का रवि
शनि से दृष्ट था और दूसरे में मीन का रवि धन स्थान में और अष्टम में चंद्र तथा पंचम में शनि था। यह अनुभव शास्त्रकारों से
भिन्न है। वीर्यवान का मतलब पराक्रमी या स्त्री उपभोग की विशेष इच्छा रखने वाला यह हो सकता है। पहला फल अपने अपने
व्यवसाय के अनुसार होता है, जैसे लड़ाकू आदमी हो तो युद्ध में शौर्य दिखलाता है। मध्यम वर्ग का हो तो निजी उद्योग में फायदा
होता है। निचले वर्ग में नौकरी में तरक्की मिलती है। रवि स्वभावतः ऊष्ण होने से कामवासना अधिक होना स्वाभाविक है।
मेष, सिंह और धनु में रवि हो तो दिन में भी कामेच्छा होती है,

इतनी प्रबल वासना होती है। मिथुन, तुला, कुंभ में साधारण तथा अन्य राशियों में यह फल कम मिलता है।
आर्यग्रन्थकार - सवितरि तनुसंस्थे शैशवे व्याधियुक्तो नयनगदसुदुःखी निचसेवानुरक्तः । न भवति गृहमेधी दैवयुक्तो मनुष्यो भ्रमति विकलमूर्तिः पुत्रापौत्रोविहीनः ।।
बचपन में रोग होते हैं। आंखो के विकार होते हैं। नीच लोगों की नौकरी करता है। दैवयोग से स्त्रीपुत्र नहीं होते। एक जगह घर बसाकर नहीं रहता। हमेशा भटकता रहता है। इनमें शैशव में व्याधि यह फल मेष, सिंह व धनु में ठीक उतरता है। इनमें शीतलता, टाइफाइड इत्यादि रोग होते हैं वृषभ, कन्या और मकर में सर्दी, आँख के रोग ये विकार होते हैं। मिथुन, तुला और कुंभ में मलेरिया, सुखा और भूतबाधा संभव हैं। कर्क, वृश्चिक और मीन में प्रदर, खांसी, संग्रहणी ये विकार होते हैं। १८ वें वर्ष तक प्रकृति मामूली रहती है फिर कुछ सुधार होता है।
नीचों की सेवा यह फल वृषभ, कन्या व मकर में मिलता है। घरगृहस्थी नहीं होना और भटकते रहना ये फल लग्न के रवि में बिलकूल नहीं होते।
हिल्लाजातककार - लग्नजे दिनकरस्नुपीड़ां वत्सरे तिथिमिते च करोति । रवि लग्न में हो तो १५ वे वर्ष में शरीर को कष्ट होते है। इसकी उपपत्ति नहीं बैठती। १५ वा वर्ष तृतीय स्थान का है। यह स्थान संकट दूर करता है। फिर इसीका वर्ष कष्टदायक होगा यह कहना कठिन है। रवि के स्वभावतः वर्ष १ और १३ हैं। उनमें शरीर को कष्ट होते ही हैं। साधारण तौर पर १८ वें वर्ष तक पीड़ा यह लग्नस्थ रवि का फल है।
यवनमत
अशक्त, स्त्रियों से दूषित, बागबगीचों का शौकीन, किंतु तुला में नीच का रवि हो तो मानहानि, अविचारी, ईर्ष्यालु, बचपन में दुर्बल, ये फल होते हैं। मेरे मत से कठोर बर्ताव के कारण स्त्रिया अप्रसन्न होती हैं। खासकर तुला और धनु लग्न में रवि हो तो वह पुरुष स्त्री को अच्छी तरह नहीं सम्हाल सकता। बगीचों के बारे में कोई अनुभव नहीं मिला है। अविचारी और ईर्ष्यालु ये फल तुला राशि में देखे गये हैं अन्य में नहीं।
अज्ञात ग्रन्थकार रवि लग्न में हो तो आत्मविश्वासी, दृढ़निश्चयी, उदार, ऊंचे विचारों का स्वाभिमानी, उदार हृदय का, हलके कामों का तिरस्कार करनेवाला, कठोर, न्यायी और प्रामाणिक होता है। अग्नि राशि में रवि हो तो महत्वाकांक्षी, जल्दी क्रुद्ध होनेवाला, सब पर अधिकार जमाने की इच्छा रखनेवाला, गंभीर और कम बोलनेवाला होता है। रवि पृथ्वी राशि में हो तो घमंडी, दुराग्रही, सनकी होता है। वायु राशि में हो तो न्यायी, अच्छे दिल का, कलाकौशल और शास्त्रीय विषयों में रुचि रखनेवाला होता है। जल राशि में हो तो स्त्रियों में अधिक आसक्त होता है जिससे अपने नाश का भी विचार भूल जाता है। कर्क राशि में अपनी घरगृहस्थी में मग्न, दयालु होता है। वृश्चिक में अच्छा डॉक्टर या दवाई बनानेवाला होता है और जगत में विख्यात होता है। साधारण तौरपर लग्न का रवि प्रगति व भाग्योदय का पोषक होता है।
राफेल - इसने पृथ्वी राशि के जो फल दिये हैं वे मेष, सिंह और धनु में मिलते हैं। अग्नि राशिं के फल मिथुन, तुला कुंभ में मिलते हैं। वायु राशि के फल उन्ही में मिलते हैं। जलराशि में विषयासक्ति ऐसा फल दिया गया है वह पुरुष राशि में ही अनुभव में आता है। अपने से भिन्न लिंग के व्यक्ति के प्रति आकर्षण यह फल मेष, सिंह, धनु इनमें अधिक मिथुन, तुला, कुंभ में साधारण; वृषभ, कन्या, मकर में कम और कर्क, वृश्चिक तथा मीन में सबसे कम मिलता है। स्त्री का स्त्रीलग्न हो तो वह पुरुषसौख्य के बारे में आसक्त होती हैं और पुरुषलग्न का पुरुष स्त्री सौख्य में आसक्त होता है। पुरुष लग्न की स्त्रियां उपभोग का आनंद अच्छी तरह नहीं जानती। स्त्री लग्न के पुरुष सच्ची तौर पर स्त्री का उपभोग नहीं कर पाते हैं। फिर भी जगत में स्त्रि लग्न के ही पुरुषों को स्त्रियां अधिक चाहती हैं और वे सुखी होते हैं। उनमें भी वृषभ, कन्या और मकर लग्न के लोग अधिक होते हैं। कर्क, वृषभ और मीन के बहुत कम या होते ही नहीं हैं यह आश्चर्य की बात है। वृषभ का रवि लग्न में हो तो वह डॉक्टर या केमिस्ट बनता है अथवा विख्यात मेकॅनिकल इंजिनीयर, नाविक या बी. एस. सी., डी. एससी. आदि उपाधिधारी शास्त्रज्ञ होता है। आम तौर पर पश्चिम लोगों ने लग्न के रवि के फल अच्छे ही माने हैं। उनको बुरे फलों का अनुभव नहीं हुआ होगा। किंतु हमारे प्राचीन ग्रंथों में दोनों फल दिये गये हैं, जिससे साबित होता है कि पश्चिम लोगों की अपेक्षा हमारा संशोधन अधिक प्रगत है।
मेरा अनुभव - संक्षेप में कहा जाय तो लग्न में स्त्री राशि का रवि संसार में सुख देता है और पुरुष राशि का थोड़ा दुःखदायक होता है। धनु राशि में विद्वान, कायदेकानून में प्रवीण, अच्छा अभिनेता, बैरिस्टर, हाई कोर्ट जज वगैरह ऊंची जगहों पर रहता है किंतु साथ में स्त्रीसुख नही होना, अनेक स्त्रियाँ होना, संतति नहीं होना, ऐसा कोई दुःख होता ही है। कर्क राशि में सामान्यतः धनवान, स्त्रीसौख्य से संपन्न, संतति भी होती हैं, किंतु जगत में मान कम होता है। अधिकार कम होता है। ऐसे दुःखी भी होते हैं, खास कर दक्षिणायन का याने कर्क से धनु तक का रवि मनुष्य को भाग्यशाली बनाता है। इन राशियों में वह विश्वका विकास करता है। उत्तरायण का रवि लड़ाई झगड़े और अपना हक जमाने की प्रवृत्ति को बढ़ाता है। दक्षिणायन में इसके विपरीत दैवी वृत्तियाँ बढ़ती हैं। सामान्य तौर पर लग्न का रवि मनुष्य की उन्नति करता है क्योंकि वह स्वयं ऊंचे दशम स्थान की ओर बढ़ा हुआ होता है।

और कुंडली में प्रथम भाव यानी लग्न में सूर्य हो तो जातक के बाल कम होतेहैं या फिर वह गंजा होता है। आलसी, स्वाभिमानी, नेत्रविकारी, अपनी हीबात पर अड़िग रहनेवाला, देहयष्टि आमतौर पर ऊंची, नाक व कपाल भीबड़ा होता है। स्वभाव से जिद्दी पर स्वार्थ के लिए विचार बदलनेवाला, घरएवं घर के बाहर के लोगों से मेल नहीं रखनेवाला, जन्म स्थान से दूर रहनेवाला,जीवन में काफी चढाव-उतार एवं पतन-अपयश देखनेवाला, कम बोलनेवाला,कम संतान से युक्त, बुद्धि तीक्ष्ण होने पर भी पूर्ख, अपना हित-अहित नसमझनेवाला होता है। जन्म से पंद्रहवें वर्ष तक शरीर-स्वास्थ्य मध्यम रहता है।

प्रथम भाव-प्रथम भाव में सूर्य हो तो जातक सम्मान के प्रति सचेत, तुनकमिजाज/अधीर, संवेदनशील या भावुक परन्तु क्रोधी/शीघ्र क्रोधित हो जाने वाला, वायु रोगी, विदेश में रहने का इच्छुक (यदि अन्य शुभ लक्षण कुंडली में हो तो विदेश जाने में सफल), इकहरे शरीर वाला, ऊंचे मस्तक वाला, प्रायः तीखी या तनी हुई (उन्नत) नाक वाला, अस्थि प्रधान शारीरिक गठन वाला, साहसी, न्यायप्रिय, अपनी बात ऊंची रखने वाला, राजा के समान जीवन जीने वाला, भेदभाव न करने वाला तथा सिर व शरीर पर कम बालों वाला होता है। ऐसे जातक के पास धन तो होता है परन्तु अस्थिर रहता है। यदि सूर्य की स्थिति शुभ हो तो सरकार की ओर से लाभ मिलता है। ऐसे जातक को चाहिए कि दूसरों से काम लेते समय नम्र व्यवहार करे। दिमाग की गरमी (गुस्से) पर संयम करे। अपनी बात कट जाए तो चिड़चिड़ा न हो जाए।

     प्रथम भाव में सूर्य होने के साथ यदि सातवां भाव खाली हो तो जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है। यदि सूर्य शुक्र के साथ अशुभ योग करता है तो जातक के पिता की मृत्यु जातक की छोटी उम्र में ही हो जाने की पूर्ण सम्भावना होती है। ऐसा लाल किताब का मत है। (क्योंकि सूर्य पिता का कारक है और शुक्र सूर्य का शत्रु है। विशेष-सूर्य की अन्तर्दशा में सूर्य 6 मूलांक (जिनका योग 6 आता हो जैसे-42, 15, 33, 60, 6, 24 आदि) वाले वर्षों में जातक के दसवें तथा सातवें घर को डिस्टर्ब करेगा (विशेषकर दसवें को)। ऐसे में जातक का स्थानांतरण, व्यवसाय परिवर्तन, प्रमोशन आदि हो सकता है। परन्तु पत्नी के साथ तनातनी की स्थिति रहेगी।1) सूर्य लग्न में हो उच्च, स्वग्रही हो तो वह मनुष्य आशावादीलोकप्रिय और देशाटन करने वाला होता है। गेहूआ रंग, पित्त रोगी,कभी-कभी सिरदर्द रहता है। यदि सूर्य नीच हो शत्रु क्षेत्रीय हो तो नेत्रकष्ट होता है घर से दुःखी इसी के साथ यदि सूर्य, गुरु, चन्द्र, बुध से षष्ट हो तो अशुभ योग में कमी आती है।

उपाय - रविवार का व्रत रखना तथा सांड को गुड़ देना।

प्रथम भाव: लग्नस्थ सूर्य हो तो व्यक्ति पित्त प्रकृति का, नेत्र रोगी, बुद्धिमान, सच्चरित्र, तीव्र जठराग्नि वाला एवं अल्पभाषी और अधिक प्रवास करने वाला होता है। यदि सूर्य उच्च राशि अर्थात मेष का हो, कीर्तिवान, शुभ एवं कारक ग्रहों से दृष्ट हो तो व्यक्ति प्रखर बुद्धि का एवं पंडित होता है। नीच राशि (तुला) में हो तो तेजस्वी एवं ज्ञानियों से वैर करने वाला तथा दरिद्र और काणा होता है। लेकिन शुभ ग्रह से दुष्ट हो तो ऐसे अशुभ फल नहीं मिलते। स्वराशिस्थ हो अथवा सिंह के नवांश का हो तो किसी प्रदेश-स्थान-ग्राम का मुखिया होता है। कर्क राशि में हो तो ज्ञानी तथा देह में फोडे-फुंसी, कन्या राशि में हो तो कन्या सनन्‍तान अधिक, स्त्री चिंता तथा किए उपकार का नाश करने वाला होता है, मकर राशि में सूर्य हो तो व्यक्ति हृदय रोगी एवं मीन राशि में हो तो स्त्रियों का सेवक और पापग्रह से युत हो तो ज्वर से पीड्ित होता है। 
प्रथम भाव लग्न में राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य लग्न में हो तो जातक की बुद्धि विलक्षण रहतीहै। पुत्र संतान प्रायः एक ही होती है। जातक क्रोधी, महत्त्वाकांक्षी एवं विद्वान होता है। बचपन में चोट के कारण जख्म होता है। सामर्ध्यवान, प्रभावशाली,अधिकारसंपन्न, सरकारी कर्मचारी रहता है। कूटनीति एवं छलकपट में प्रवीणहोता है। मंत्रशास्त्र एवं गूढविधा में पारंगत, आर्थिक इृष्टि से महाकंजूस,चुगलखोर होता है। संतान सुख अच्छा प्राप्त होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशामें लाभान्वित होता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक गरीब परिवार मेंजन्म लेता है। पैतृक संपत्ति या तो उसे मिलती नहीं है या फिर पैतृक संपत्तिरहती ही नहीं है। ऐसा जातक स्वपरिश्रम से संपत्ति अर्जित करता है। पिता केरिश्तेदारों चाचा वगैरह से संबंध अच्छे नहीं रहते। अनेक शास्त्रों का ज्ञाता होतेहुए भी मितभाषी होने के कारण इसके ज्ञान का लाभ जनता को नहीं मिलता।स्वभाव में क्रूरता नहीं होती। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में लाभ प्राप्त होकर उन्नतिहोती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक को बचपन मेंशारोरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं। यह स्वभाव से अस्थिर और अपने पुरुषार्थसे जीवन में यश प्राप्त करता है। जातक कामातुर, वाद-विवाद में कुशल रहताहै। परिवारजनों से इसका मेल नहीं खाता। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में सूर्य केसाधारण फल मिलते हैं।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक नेत्रविकारी रहताहै, निमोनिया भी होता है। जातक कामातुर, परोपकारी, परिवार का पालनकर्ता,अमीर किंतु कंजूस होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अच्छी व्यतीत होती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक शारीरिक दृष्टि सेस्वस्थ, प्रभावशाली व्यक्तित्व का, पराक्रमी, कामातुर और स्वभाव से जिद्दीहोता है। यह नेत्रविकार से ग्रस्त रहता है। रतौंधी रहती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक दूसरों के उपकारशीघ्र भूलनेवाला, मध्यम नोरोगी, स्त्रियों से दुर्व्यवहार करनेवाला, वैवाहिकजीवन में दुखी, कुछ हद तक सुस्वभाव का होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशामें प्रगति होती है।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक शारीरिक स्वस्थताकी दृष्टि से बहुत ही कमजोर रहता है, रोगी एवं आलसी रहता है, कैन्सरजैसे रोग का शिकार बनता है। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती। संतान-सुखकम रहता है। नेत्रविकार तो रहता ही है। यह सूर्य नीचांश में हो तो पागलपनके दौरे आने की संभावना रहती है। भाई-बहनों के सुख का अभाव रहता है।चोरी एवं अकस्मात हानि का डर बना रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा आर्थिकप्रगति कराती है, किंतु अन्य परेशानियां बढ़ती हैं।

    8.वृश्चिक-वृश्चिक राशि का सूर्य लग्न में होने पर राजयोग बनता है।धन बड़े परिमाण में मिलता है। जातक पिता को सुख देता है। बचपन मेंस्वास्थ्य ठीक नहीं रहता किंतु बाद में नीरोगता रहती है। सूर्य का दशा-अंतर्दशाकाल बहुत ही अच्छा व्यतीत होता है। जीवन की कई अच्छी बातें इस दशाकाल में संपन्न होती हैं।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक प्रतापी एवं अधिकारसंपन्न रहता है। सामाजिक एवं राजकीय दायरे में सफल होता है। व्यापार मेंलाभ होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में सभी प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं।

    10. मकर-मकर राशि का सूर्य लग्न स्थान में होने पर जातक शारीरिकदृष्टि से साधारण रहता है, जिद्दी स्वभाव के कारण स्वयं अपना नुकसानकर लेता है। पारिवारिक एवं मानसिक सुखों में कमी रहती है। एक से अधिकविवाह होते हैं, आत्मघात की प्रवृत्ति रहती है। कैद या सजा भुगतनी पड़तीहै। इसको खाज-खुजली, बवासीर आदि रोगों का शिकार होना पड़़ता है, यहनास्तिक रहता है, सूर्य की दशा-अंतर्दशा में काफी परेशानियों से गुजरता है।इसे काफी कष्ट सहन करने पड़ते हैं।

    11. कुंभकुंभ राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक स्वभाव से क्रूर, जिद्दी,निर्दयी एवं उतावले स्वभाव का रहता है। कोई भी बात इसके पेट में नहीं पचती,मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। जातक के वैवाहिक जीवन में कटुता रहती है किंतुदो विवाह नहीं होते। जातक की कामातुरता के कारण परस्त्री से संबंध बनतेहैं लेकिन कुछ आचायों की राय में परस्त्री संबंध नहीं बनता। यह अपनी पत्नीके ही अधीन रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा काल में जातक पर आर्थिक दृष्टिसे अच्छा लेकिन शारीरिक दृष्टि से बुरा प्रभाव पड़ता है।

    12. मीन मीन राशि का सूर्य लग्न में होने पर जातक रोगी रहता है।शत्रुबाधा के कारण क्लेश सहन करने पड़ते हैं। पूरी जिंदगी कोर्ट-कचहरी एवंलड़ाई-झगड़े में ही व्यतीत होती है। स्वयं शत्रु खड़े करता है किंतु अंत मेंसभी शत्रुओं का विनाश होता है।

1)प्रथम भाव के उपाय 
1. तांबे का सिक्का पानी में बहाये।
2. कोयले जलाकर दूध से बुझावें ।
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द्वितीय स्थान (धन भाव)-धनस्थान का रवि
इस भाव में सूर्य की उपस्थिति के कारण व्यक्ति बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, हठी, जिषय-भोग में तत्पर, भाग्यशाली, दीर्घायु सदैव व्यक्तिगत सुरक्षा की भावना से चिंतित रहने बाला होता है। अपनी पत्नी को लेकर उसकी संबंधियों से रंजिश होती रहती है। चोपाए पशुओं से उसे आर्थिक लाभ होता है, किन्तु उसका धन उत्तम कार्यों में व्यय भी होता रहता है। यह दुर्बल स्मरण-शक्ति वाला होता है तथा निरर्थक भ्रमण-प्रवास से दुःखखी रहता है। ऐसा व्यक्ति मुख ब नेत्ररोगी होता है, साथ ही मुंहासे गले की खराबी, नाक का अधिक बहना तथा गरदन के ऊपर सूजन से पीड़ित रहता है। उसके चेहरे पर समय से पहले ही झाइयां पड़ जाती हैं। 
वैद्यनाथ त्यागी धातुर्दव्यवान् इष्टशत्रुर्वाग्मी वित्तस्थानगे चित्रभानौ । रवि धनस्थान में हो तो वह मनुष्य त्यागी, मूल्यवान धातु और पैसेवाला तथा शत्रुओं को अनुकूल कर लेनेवाला होता है। इनमें त्याग यह फल मेष, सिंह और धनु राशि में ठीक उतरता है। जिनका लग्न मकर, कन्या, वृषभ या वृश्चिक हो उनको रवि यदि धनस्थान का हो तो मूल्यवान धातु और नगदी पैसे प्राप्त होते हैं। स्त्रीलग्न हो तो इष्टशत्रु और वाग्मी यह फल अनुभव में आता है।
आर्य गंथकार धनगतदिननाथे पुत्रदारैविहीनः कृशतनुरतिहीनो रक्तनेत्राः कुकेशः । भवति च धनयुक्तो लोहताम्रेण सत्यं न भवति गृहमेधी मानवो दुःखभागी।।
इनका स्त्रीपुत्रो से हीन यह फल धनस्थान में मिथुन, धनु और मीन राशि का रवि हो तो मिलता है। शरीर कृश होना यह फल नहीं मिलता क्यों कि वह लग्न पर अवलंबित है। रतिहीन यह फल वृषभ, धनु और मिथुन (उत्तरार्ध) इन लग्नों के पुरुषों को ही मिलता है। रवि, मेष, सिंह या धनु में हो तो आँखें लाल होती है। किंतु चित्पावन ब्राम्हणो की आंखें जाति से ही लाल होती हैं इसलिये उन्हें धनस्थान का रवि होना आवश्यक नहीं। मैंने सिर्फ दो आदमी ऐसे देखे हैं जिन्हें सचमुच रक्तनेत्र कहा जा सके। इनकी आंखे अग्नी जैसी लाल और पुतलियां भी लाल थी और इनमें से एक के धनु राशि में रवि मंगल की पूरी योगयुति और क्रान्तियुति थी और साथ में मूल नक्षत्र की भी युति थी तथा लग्न में वृश्चिक राशि में शनि और राहु थे। दुसरे उदहारण में रवि मंगल और रोहिणी तारा की युति थी तथा लग्न में मेष के कृत्तिका नक्षत्र में सहु शनि की पूरी युति थी। इनमे कुछ नियम बनाना कठिन है। बुरे केश यह फल रवि का न हो कर लग्नस्थान का है। तांबे और सोने से संपन्न यह फल पुरुष राशि में मिलता है स्त्री राशि में नहीं। यह सत्य है कि यह फल मेष, सिंह और धनु लग्न हो तो मिलता है। घरगृहस्थी न होकर मनुष्य दुखी होता है यह फल वृश्चिक, धनु, मकर या कुंभ लग्न हो तो ही मिलता है।
हिल्लाजातककार - सप्ददशपरिमितेच वत्सरे यच्छति द्रविणगो धनहानिम् । धनस्थान का रवि आयु के १७ वे वर्ष में संपत्ति का नाश करता है। मेरे मत से धनस्थान का रवि १७ वे वर्ष में धन का नाश करता ही है ऐसा नहीं। २२ वे वर्ष तक पैतृक संपत्ति नष्ट होती है ऐसा अनुभव है, क्योंकि १७ वें वर्ष तक प्रायः खुद की संपत्ति होती ही नहीं।

यवनमत धनस्थान का रवि हो तो वह मनुष्य बुद्धिहीन, क्रोधी, कंजूस, निर्धन, क्रूर, कुरुप, रोगी और गाफिल रहता है। इनमें से मेरे विचार से बुद्धिहीन और कंजूस ये फल मिथुन में मिलते है। मेष और धनु राशि में क्रोधी होता है। वृश्चिक व धनु राशि में निर्धन होता है। क्रूर और कुरुप ये फल किसी भी राशि में नही मिलते। रोगी यह फल हर एक राशि में थोड़ा बहुत मिलता ही है। धनु लग्न हो तो गाफिल रहने का फल मिलता है।

राफेल धनस्थान में रवि हो तो वह मनुष्य उदार, पैसा जल्दी खर्च करने वाला, बेफिक्र और संपत्ती खत्म कर देनेवाला होता है। ये फल मेरे मत से पुरुष राशि में रवि हो तो ही मिलते है अन्यथा नहीं।
जातक को पत्नी व संतान का सुख न हो, शारीरिक रुप से कमजोर,निर्धनता के कारण तनावग्रस्त होगा। वह लोहे या तांबे के व्यापार से धनीबन सकता है। पारिवारिक स्थिति संतोषजनक नहीं होगी।
    -मानसागरी
    जातक विद्वान नही, बेशर्म और बोलते हुए हकलाने वाला होगा।
    -फलदीपिका
    जातक कई चतुष्पदों (पालतू पशुओं) तथा सेवकों का स्वामी होगा,चेहरे के किसी रोग से पीड़ित, खिन्न प्रसन्नता व सुख से वंचित, राजभय(दण्ड) या चोरों से धन नाश के कारण निर्धन होगा।
    -सारावली
    व्यक्ति मुखरोगों से पीड़ित, 25 वर्ष की आयु में सरकार या राजा केकोप का भाजन हो, हकलाकर बोलने वाला और नष्ट संपत्ति वाला होगा।
    व्यक्ति रोगग्रस्त, भद्दे चेहरे वाला, सज़ायाफ्ता (दण्ड प्राप्त) उसकामुकदमें बाजी में धन नाश होगा, अच्छी आयवाला, फिजूलखरची, वाक्पटु,सुशिक्षित, वैज्ञानिक, हकला ओर चिड़चिड़े स्वाभाव का तथा 25 वें वर्षमें खतरों का सामना करने वाला होगा।
    -डॉ. रामन
    टिप्पणी
    सूर्य स्वाभिमान, ईंधन, आग, अस्त्र-शस्त्र, विषादि का प्रतिनिधित्वकरता है और दूसरे भाव (जो कि स्वपरिवार अर्थात् पत्नी-बच्चे या छोटासंयुक्त परिवार, वाणी, मुख व आय का द्योतक है) में स्थित होने परअलगाव कारक ग्रह बन जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप पत्नी व बच्चोंका नाश हो जाता है। यह पारिवारिक जीवन में विषमता, मुखरोग औरहकलाहट आदि प्रदान करता है। भचक्र का दूसरा भाव वृषभ राशि है,जिसका स्वामी शुक्र, सूर्य का शत्रु है। अतः दूसरे भाव में सूर्य की स्थितिधन व सुख के लिए हानिकारक ही होती है। दूसरा भाव संपत्ति का भीहै परन्तु उसका स्वामी सूर्य का शत्रु है, अतः सूर्य की वहाँ स्थिति संपत्तिको नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी या दूसरे शब्दो में कहा जाये तोखर्चे अधिक होने के कारण घनाभाव हो जाएगा। शुक्र के सभी कारकत्वबुरी तरह प्रभावित होंगे।

 अनुभव - धनस्थान का रवि - वृषभ, कन्या या मकर राशि में हो तो आवाज कर्कश होती है और धन का संग्रह नहीं होता। इन्शुअरन्स के रूप में पैसा इकट्टा चाहे तो भी उसके प्रीमियम नहीं भर सकता जिससे पॉलिसी छोड़ देनी पड़ती है। किसी का कर्ज चुकाने के लिये पैसे इकट्टे किये तो कोई तिसरा ह्री जबरन उसे ले जाता है, जब की उनके वापस मिलने की कोई आशा नही होती फिर भी ऐसे समय खुद कर्जदार होकर भी दूसरे को कर्ज देना पड़ता है। पैतृक संपत्ति होती ही नहीं और हुई भी तो मिलती नहीं। भाईबंद या ट्रस्टी ही गड़प कर जाते है। फिर भी रही तो २८ वें वर्ष तक नष्ट होती है। तब तक उद्योग अच्छी तरह नहीं होता और यश नहीं मिलता। धंधे में नुकसान होकर कर्ज लेना पड़ता है। एक कर्ज चुकाने तक दुसरा तैयार हो जाता है। नौकरी सुहाती नहीं और स्वतंत्र धंधा करने की इच्छा होती है। धनेश बलवान हो याने वक्री, अस्तंगत, मंदगामी, अतिचारी या पापग्रह से युक्त न हो तो यह इच्छा पूरी होती है। कुटूंब के व्यक्ति इसके सामने ही मर जाते हैं। इसके जन्म से पिता का भाग्योदय हुआ तो आखिर तक वह पिता पर ही अवलंबित रहता है। स्वतंत्र नौकरी या धंदा नहीं कर पाता। अपनी कमाई पिता को नहीं देता और मन में कुढ़ता रहता है। बाप की मृत्यु के बाद धन मिलता है या २२ वे वर्ष तक बाप की मृत्यु हो जाती है। पितापुत्र में बेबनाव रहता है। युनिवसिर्टी की पढ़ाई पूरी नही हुई तो भी बुद्धि का तेज दिखाई देता है। बोलना निर्भय और तीखा होता है जो ढोंगी 

समाजनेताओं की शल्य जैसा मालूम होता है। हर एक दिन के मामूली बोलचालसे गलतफहमी होती है। यह किसी की नही सुनता लेकिन संकट के वक्त आगे आकर सबको मदत पहुंचाता है।
वकील और डॉक्टर लोगों को यह योग अच्छा होता है। इसमे न थकते हुये श्रम कर सकता है, उकता नहीं जाता। डॉक्टर हो तो समय पर रोगियों को ध्यान से देखता है। काम पड़े तो अपने पैसे से उपचार करता है। ज्योतिषी हो तो उसके बताये हुये अशुभ फल जल्दी अनुभव में आते हैं, शुभ फल देरी से मिलते हैं।
धनस्थान में मिथुन, तुला या कुंभ का रवि हो तो खुद खूब पैसा कमाता है किंतु खर्च करने में कंजूस होता है। लोगों की सहानूभूति प्राप्त नहीं करता। बुद्धि साधारण और पढ़ाई कम होती हैं। दैवयोग से धन मिलता है। खुद उपभोग नहीं करते और न दूसरों को करने देते है विज्ञान की शिक्षा अच्छी होती है, साहित्य की नहीं।
धनस्थान का रवि - कर्क, वृश्चिक और मीन राशि का हो तो अधिकारी और विद्याभ्यासी होता है। किसी फर्म में नौकरी कर अच्छा पैसा कमाता है। इसी स्थान मे मेष, सिंह और धनु राशि का रवि हो तो वह मनुष्य खुद की ही अधिक फिक्र करता है, खुद के लिये चाहे जितना पैसा खर्च करता है, काम से बड़बड़ ही ज्यादा करता है और मुफ्त में बड़प्पन पाना चाहता है। इसे नाम मिलाकर लाभ होने की संभावना हो तो किसी संस्था को दान देने का भी दिखावा करता है। समाचारपत्रों में अपना नाम और चित्र प्रकाशित करने के लिये पैसे देकर या अन्य किसी भी मार्ग से संपादक की खुशामत करता है। किंतु अपना लाभ या कीर्ति न होती हो तो अनाथ और दीनों की ओर नजर भी नहीं डालता।

अब धनस्थान के रवि के सामान्य फल बतायेंगे। इस मनुष्य को हमेशा उष्णता रहती है जिससे आंख, हाथ के तलपवे और पांव हमेशा गरम होते रहते हैं। वृद्धावस्था में आंख कमजोर हो जाती हैं। अन्न के बारे में विशिष्ट रुचि होती है। विशिष्ट पदार्थ ही भाते है। कपड़े लत्ते अधिक होने पर भी रहने की जगह साफसुथरी और अच्छी चाहिये। रात को ३ के बाद कामवासना होती है। धन का संग्रह नहीं होता किंतु अन्नवस्त्र की कमी नहीं होती। वृश्चिक, धनु, मकर या कुंभ लग्न हो और धनस्थान का अधिपति गुरु या शनि वक्री हो और वे दूसरे, चौथे, छठवे, आठवें या बारहवें स्थान में हों और ऐसे योग में रवि धनस्थान में हो तो यह अत्यंत दारिद्र्यसूचक योग होता है। ऐसे लोगों को आठ आठ दिन भूखे रहना पड़ता है। अन्न के लिये तड़फड़ाते हैं। घरगृहस्थी नहीं होती। समय पर अन्न मिला भी तो तबीयत ठीक नहीं रहती। अन्न पचता नहीं। तकलीफ होती है। स्त्री पुत्र भी नहीं होते। जीवन में स्थिरता नहीं होती। किसी दूसरे के घर रहें तो उसे अपना घर समझकर रहते हैं। इनको अपनी इच्छा के विरुद्ध खानपान करना पड़ता है। धन और मकर लग्न के लोगों को यह अनुभव विशेषता से आता है क्यों कि इन का धनेश शनि और गुरु होता है और शनि ही उपजीविका का कारक है। ऐसे लोगों ने पूर्व जन्म में दूसरों को ठग कर हीन स्थिति में पहुंचाया होता है या दूसरों की रोजी छुड़ाकर उनको संकट में डाला जाता है।धनेश गुरु वक्री हो तो ये फल कुछ सौम्य होते है किंतु पूरी तौर पर नष्ट नहीं होते। धनस्थान के स्वामी और धनस्थान ये अन्न के कारक हैं, इसलियें ये फल मिलते हैं। 

    लग्न से दूसरे यानी धन स्थान में सूर्य स्वगृही का सिंह राशि का, उच्चकामेष राशि का या वृश्चिक, कर्क, धनु, मीन आदि मित्र राशियों का होतो जातक भाग्यवान, धनवान, सुख-साधनों से परिपूर्ण, अति बुद्धिमान,सत्कारयों में धन खर्चनेवाला, स्वभाव से नम्र किंतु बोलने में कमजोर होता है।

    मिथुन, कन्या या वृषभ राशि का सूर्य धन स्थान में हो तो शुभ फल प्रदानकरता है किंतु तुला, मकर, कुंभ आदि शत्रु राशियों में सूर्य धन स्थान में हो     तो इस सूर्य के शुभ फल कम मिलते हैं। स्वभाव खर्चीला रहता है। आर्थिकस्थिति ठीक नहीं रहती। जीवन में अनेक बार साधारणतया 17 से 25 वर्षके काल में सजा, नुकसान, चोरी के कारण आर्थिक संकट खड़े होते हैं।नेत्रविकार उत्पन्न होते हैं। जुआखोरी या व्यसन के कारण आर्थिक दिवालानिकलता है। आर्थिक स्थिति खराब होने पर भी जातक स्वाभिमानी होता है।इसे मुंह के रोग या विकासग्रस्तता रहती है।।

    धन स्थान में सूर्य के कारण पारिवारिक सुख कम प्राप्त होता है। मित्रों कीसंख्या कम होती है। करीब के लोगों से सहयोग बहुत ही कम मिलता है।स्वयं की पत्नी ठीक नहीं होती या जातक स्वयं स्त्रीभक्त रहता है। आमतौरपर पत्नी के कारण वाद-विवाद या लड़ाई-झगड़ा होता है।

द्वितीय भाव-यदि लग्नकुंडली में सूर्य दूसरे भाव में हो तो जातक धनाढ्य होता है, परन्तु पैतृक या कौटुम्बिक धन से, अपने परिश्रम से नहीं। भाग्यवान तथा शाही ठाठ-बाट से जीवन जीने वाला होता है। सरकार की ओर से नुकसान की सम्भावना रहती है। जातक अभद्र वाणी वाला तथा स्वार्थी होता है। उसका परिवार उससे प्रसन्न नहीं रहता। (शुभ स्थिति हो तो जातक दूसरों का हमदर्द व उनको जरूरत पड़ने पर सहायता देने वाला होता है और किसी का अमित नहीं रहता।) जातक को नेत्र रोग, मुख रोग, दांतों के रोगों की सम्भावना रहती है। वह दूसरों पर नहीं, स्वयं पर खर्च करता है। लाल किताब के अनुसार दूसरे घर में सूर्य हो तो जातक को दूसरों से दान आदि नहीं लेना चाहिए। शनि/धनेश (द्वितीयश) वक्री होकर-2, 6, 8, 12 या 3 भाव में हो तो लाख प्रयासों के बाद भी जातक दरिद्र रहता है। शरीर में गर्मी सदा रहती है, हाथ-पैरों से पसीना आता है, दृष्टि कमजोर होती है।2) सूर्य द्वितीय स्थान में हो तो वह कुछ विवाद करने वाला अपने पराक्रम से धन कमाने वाला इसी के साथ पाप ग्रह (मं.,शु.) साथ हो तो कुटुम्ब का विरोधी होता है। धन का नाश होता है। आन्तरिक ईर्ष्या रखने वाला होता है। लेकिन इसके साथ कोई उच्च का, स्वग्रही, सोम्य ग्रह बैठा हो तो वह ईर्ष्या नहीं रखता और भलाई करने वाला होता है। उसके गले में टॉनसिल होते है और दूसरे घर में तीन  पाप ग्रह बैठे हो तो स्त्री बीमार या सगाई टूटना अथवा पत्नी की मृत्यु पति से पहले होती है ।

-उपाय - सूर्यास्त के समय जल का अर्ध देवे, एक माला गायत्री की सूर्य के सामने खड़े होकर फेरे। (रविवार के दिन ) लाल मूंगा गोल तरीकोंन धरण 1, 3 मुखी रुद्राक्ष बेल की जड़ या अनंतमूल की जड़ धारण करे

द्वितीय भाव: द्वितीयास्थ सूर्य हो तो व्यक्ति स्वतन्त्र व्यवसाय करना चाहता है। नौकरी अथवा किसी के अधीन कार्य करना उसे अच्छा नहीं लगता। परिजनों की मृत्यु उसी के सामने होती है, पिता-पुत्र में परस्पर सौमनस्य नहीं रहता। देह में सदैव उष्णता बनी रहना, हाथ-पैरों में पसीना आना तथा आंखों में जलन होना, दृष्टि मंद होना, उत्तमोत्तम भोजन खाने की इच्छा होना धन भावस्थ सूर्य के फल हें। मिथुन, तुला या कुम्भ राशिगत सूर्य हो तो व्यक्ति स्वयं बहुत धनार्जन करता है ओर पैसा इसलिए जमा कर लेता है क्योंकि कंजूस होता है। लोगों की सहानुभूति उसे नहीं मिल पाती। कर्क, वृश्चिक या मीन राशिस्थ हो तो जातक उच्च अधिकारी बनता हे। किसी फर्म अथवा स्वैच्छिक संस्था में सेवारत हो तो अच्छा लाभ प्राप्त कर लेता है। धनु राशि में सूर्य हो तो व्यक्ति स्वार्थी होता है तथा स्वयं को बड़ा बनाने की अदम्य इच्छा रखता है। यदि वृश्चिक, धनु, मकर या कुम्भ लग्न हो और सूर्य धन स्थान में हो तथा धनभाव का स्वामी बृहस्पति या शनि वक्री दूसरे, चोथे, छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों तो व्यक्ति भिक्षुकतुल्य जीवन यापन करता है। व्यक्ति इतना दरिद्र हो जाता है कि एक समय यदि भोजन का जुगाड़ हो जाए तो आगे कितने समय तक अन्न के दर्शन नहीं होंगे, पता नहीं रहता। 
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक धैर्यवान, धनीएवं अपने कुल में प्रतिष्ठित रहता है। यह नियमानुसार चलनेवाला,अनुशासनप्रिय और चतुर होता है। आमतौर पर जन्म स्थान से दूर रहकर उन्नतिहोती है। संतान पिता की संपत्ति उड़ानेवाली होती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशाके काल में अच्छे फल प्राप्त नहीं होते।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक विद्वान,मंत्रशास्त्र एवं गूढ़विद्या का जानकार, संतान सुख प्राप्त करनेवाला व कवि होताहै। पशुपालन एवं खेती के व्यवसाय से इसे धन प्राप्त होता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा का काल लाभदायक एवं उन्नतिकारक रहता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक गणित एवंकिसी भी अन्य कला में पारंगत रहता है। उत्तम वक्ता एवं निर्मल चरित्र केकारण लोकप्रिय एवं राजनीतिज्ञ बनता है। अपने पिता को सुख नहीं दे सकता।सूर्य की दशा-अंतर्दशा की कालावधि में धनसंपत्ति एवं मिल्कियत प्राप्त होतीहै। पारिवारिक सुख भी पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक पुरुषार्थहीन,कामातुर एवं लोभी रहता है। यह ठग, चोर या डाकू भी बन सकता है। इसकाजीवन आर्थिक दृष्टि से सुखी रहता है किंतु धन संग्रह कम होता है।भाई-बहनों से संबंध अच्छे नहीं रह पाते। जातक पिता का एकमात्र पुत्र होताहै। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में अच्छी घटनाएं घटती हैं।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक की शारीरिक स्थितिसाधारण रहती है। आर्थिक दृष्टि से जीवन सुखी एवं संपन्न रहता है। संतान सुखप्राप्त न होना या दूसरी या तीसरी पत्नी से संतान होना, ऐसी बातें होती हैं। जातक     कंजूस रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में मिश्रित फल प्राप्त होते हैं। शारीरिककष्ट, नेत्रविकार उत्पन्न होते हैं किंतु आर्थिक संपन्नता भी प्राप्त होती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक व्यवहारकुशल,विद्वान, गुणी एवं नीरोगी रहता है। अपने कुल, गांव या शहर का प्रमुख होताहै। जातक को जीवनभर आर्थिक परेशानी रहती है, सट्टे-जुए में कभी धनप्राप्त नहीं होता। मानसिक विकार या मंदबुद्धि भी हो सकती है। सूर्य केदशा-अंतर्दशा काल में स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। नेत्रविकार उत्पन्न होते हैं,अंधापन आने की भी संभावना रहती है। जीवन कर्ज में डूबा हुआ, संघर्षमयएवं संकटग्रस्त रहता है।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य धन स्थान में अच्छे फल नहीं देता। यह नीचअंशों का हो तो और भी अनिष्टकारक होता है। जातक का स्वास्थ्य अच्छानहीं रहता। जीवनभर जातक कर्ज में डूबा और संकटों से घिरा रहता है। सट्टेया जुर्म में कभी भी धन नहीं मिलता। मानसिक विकार एवं मंदबुद्धि होने काभी योग बनता है।

    8. वृश्चिकवृश्चिक राशि का सूर्य धन स्थान में हो तो लखपति बननेका योग बनता है। जातक काफी धन इकट्ठा करता है। यह कटुभाषी एवंअभिमानी रहता है, पैसे की कमी नहीं रहती, समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होतीहै। अमीर होते हुए भी चोरी या अन्य छलप्रपंच करके पैसा प्राप्त करने कीप्रवृत्ति रहती है, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। आयु अधिक नहीं होती।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य धन स्थान में हो तो जातक को उच्च राजसम्मानएवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जातक धनवान, गुणवान, प्रभावी वक्ता, प्रभावशालीएवं सत्ता का कृपापात्र होता है। मां की ममता सदैव प्राप्त होती है किंतु जातकमाता को सुख देने में असमर्थ रहता है। पारिवारिक सुख अच्छा रहता है। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा प्रगति की ओर ले जाती है।

    10. मकर-ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मकर राशि का सूर्य धन स्थान मेंहोने से राजयोग बनता है। इस योग का लाभ नौकरी करनेवालों को विशेषनहीं मिलता। सार्वजनिक जीवन, व्यवसाय एवं राजकार्य में कार्यरत जातकों कोयह योग लाभान्वित करता है। इसे प्रसिद्धि एवं धन प्राप्त होता है किंतुधनसंग्रहनहीं होता। जातक को शारीरिक विकृति रहती है या अपघात होता है। संतानसुखी रहती है। जातक की पत्नी उससे बड़ी होती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशाअच्छे नतीजे लाती है।

    11. कुभ-कुभ राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक रोगी औरअशक्त रहता है। इसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती। किसी को दियाधन वापस नहीं मिलता, जातक को जन्म स्थान से दूर रहकर काफी परिश्रम  से जीवनयापन करना पड़ता है। कुछ विद्वानों की राय में ऐसे जातक को रिश्वत,सट्टे, लॉटरी, वसीयत से या गड़ा धन प्राप्त होता है। जातक बुद्धिमान एवंधैर्यवान होता है। शासन से दंड या सजा मिलने का डर बना रहता है।
12. मीन-मीन राशि का सूर्य धन स्थान में होने पर जातक कामातुर रहताहै। इसकी पत्नी दुष्ट एवं स्वतंत्र आचरणवाली, पैसा अपने पास रखनेवालीएवं स्थूलकाय रहती है। संतान सुख साधारण रहता है। पत्नी बांझ भी हो सकतीहै। घर में स्त्रीसुख न मिलने से जातक परस्त्री के साथ संबंध रखता है। ससुरालअच्छी मिलती है। आर्थिक दृष्टि से जीवन साधारण रहता है।
2 ) दूसरे भाव में
1. जातक को दान नहीं लेना चाहिए।
2. मंदिर में नारियल चढ़ावें ।
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तृतीय स्थान (सहज भाव)तृत्तीय स्थान का रवि
इस भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति संगीत व काव्यकला में रुचि लेने वाला, ईर्ष्यालु दुरदर्शी, वाणी का जादूगर, अपनी बातों पर अटल रहने वाला, अत्यंत पराक्रमी, प्रतापी, - श्रवीर, अपने ही भाई-बहनों से पीड़ित, विचारवान्‌ तथा विद्वान्‌ होता है। अवसर मिलने पर तीर्थ यात्राएं अवश्य करता है। बाद-विवाद, लड़ाई-झगड़ा और मुकदमे आदि में उसे विजयश्री मिलती है। शासन द्वारा उसे लाभ पहुंचता है। मित्रों के हित की सोचता है, क्षमाशील और थधैर्यवान होता है, स्त्री और पुत्र से युक्त होता है। बाहरी स्त्रियों में भी उसकी रुचि बनी रहती है। वाहनादि का उसे सुख मिलता है। नियमित शिक्षा-दीक्षा में बाधाओं का योग रहता है। इस भाव में सूर्य के अशुभ होने पर विष तथा अग्नि से भय, हड्डी. टूटने अथवा चर्मरोग होने की संभावना रहती है। साइटिका, गठिया तथा अंगों का ढीलापन का रोग ऐसे व्यक्तियों को वृद्धावस्था में अत्यधिक पीड़ित करता है। 

 बैधनाथ-शूरो दुर्जनसेवितोतिधनवान् त्यागी तृतीये सयौ। पराक्रमी, दुर्जनों से सेवा ग्रहण करनेवाला, धनवान औरत्यगी होता है।

    आर्यग्रंथकार - सहजभुवनसंस्थे भास्करे म्रातृनाशःप्रियजनहितकारी पुत्रदारभियुक्तः भवतिच धनयुक्तो धैर्ययुक्तःसहिष्णुः विपुलधनविहारी नागरी प्रीतिकारी।। बंधुओं का नाशक,प्रियजनों का हित करनेवाला, स्त्रीपुत्रों से संपत्र, धनवान, धैर्यवान,दुसरों का उत्कर्ष सहनेवाला, बहुत पैसा खर्च करनेवाला होता है।

    हिल्लाजातककार - वस्तरे नखमिते तृतीयकः स्थानगोदिनकरोर्य लाभदः। यह रवि आयु के २० वें वर्ष में धनलाभकरता है।

    बृहत्पाराशरीकार - अग्ने जातं रविहन्ति। यह रवि बड़ेभाई का नाश करता है।

    यवनमत - यह पदवीधर, ख्यातनाम, नीरोग, मीठा बोलनेवाला,सुंदर, स्त्रयों का भोक्ता, विलासी, चैनी, घोड़े की सवारी में कुशल,निश्चयी, धनवान और शांत होता है। वृत्ति बहुत गंभीर होती है।भाई-बंधुओं का सौख्य इसको नहीं मिलता किंतु यह सब को सुखदेने का प्रयत्न करता है।
    राफेल-स्थर और निश्चयी, विज्ञान और कला का प्रेमी,निवास-स्थान क्वचित ही बदलनेवाला। जल या चर राशि में बहुतसे छोटे प्रवास हो सकते हैं।

    सब शास्त्रकारों के मत से यह रवि शुभ फल ही देता है।बुद्धिवान, धनवान, धैर्यवान, पराक्रमी, वाहनसंपत्र, पुत्रों से युक्त,ख्यातिप्राप्त, राज-सन्मानित, युद्ध में शत्रु का नाशक, भाईबहिन कोसुख न देनेवाला, भाई भाई एक जगह रहतें हो तो कष्ट देनेवाला,ऐसे फल सब ने एक मत से बताये हैं। इनमें संतति, संपत्ति, वाहनऔर त्याग ये फल स्त्री राशियों में मिलते हैं। शेष फल पुरूषसाशियों में (मेष छोड़कर) मिलते हैं।

    हिल्लाजातककार का २० वें वर्ष में धनलाभ का फल स्त्रीसशि में और निचले वर्ग के लोगों में देखा जाता है, उच्च वर्ग मेंनहीं, क्योंकि हाल में ३६ वें वर्ष तक धनलाभ नहीं होता।

    बृहत्पाराशरीकार का फल पुरूष राशि का है।यवनमत में धनवान और शांत वृत्ति ये फल स्त्री राशि के हैं,शेष पुरूष राशि के हैं।

    राफेल द्वारा दिये हुये फल पुरूष राशि के ही हैं।
जातक के भाई नहीं होंगे, पुत्र व संपत्ति होगी, सहनशील व साहसीहोगा व स्त्रियों के प्रति आकर्षित होने की प्रवृत्ति होगी।

    -मानसागरी

    जातक शक्तिशाली, सम्पन्न, दयालु और सगे-संबन्धियों से शत्रुता काभाव रखने वाला होता है।

    -फलदीपिका
    जातक पराक्रमी, सुदढ, सहोदरों का वियोग प्राप्त, सुदर्शन, विंद्वानऔर शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाला होता है।

    -सारावलीऐसा व्यक्ति साहसी, उदार, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, सफल और बेचैनप्रकृति का होता है।

    -डॉ. रामन

    टिप्पणी

    तृतीय भाव में पापग्रहों की स्थिति जातक को साहसी बनाती है।उसमें कठिनाई का सामना करने की क्षमता होती है तथा परिश्रमी होताहै। तीसरे भाव में पाप ग्रह का होना छोटे भाई-बहनों के लिए अच्छानहीं है। अन्य ग्रहों के प्रभावों के कारण भी परिणामों में भिन्नता होसकती है।

    मेरा अनुभव - तृतीय स्थान में मेष राशि का रवि हो तोदुर्बल विचारों का, आलसी, शरीर को कष्ट न देनेवाला, बातें बनानेवाला,बड़े भाई को मारक, निरूद्योगी और उपद्रवकारी होता है। अन्यपुरूष राशियों में हो तो शांत, विचारशील, बुद्धिमान, सामाजिकऔर शिक्षासंबंधी तथा राजकिय कार्य में भाग लेनेवाला, नेता, स्थानिकस्वराज्य संस्था जैसे लोकल बोर्ड, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड, म्युनिसिपालिटीतथा असेब्ली, कौन्सिल आदि में चुनाव, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का     पद, बड़़ी कंपनियों के डाइरेक्टर इस प्रकार किसी भी जगह अपनी सत्ता रखनेवाले होते हैं। जबान में अधिकार होता है। नीचे के लोग प्रेम से काम करते हैं। मिधुन, तुला या धनु में रवि हो तो लेखक, प्रकाशक, प्रोफेसर, वकील इन व्यवसायों में आगे आते हैं।

    पंजाब के लाला गंगाराम ने अपनी सब इस्टेट विधवा स्त्रियोंकी उन्नति के लिये दे दी। इनकी कुंडली में कन्या का रवि था।नागपुर विश्वविद्यालय को जिन्होंने एकमुश्त चालीस लाख का दानदिया उन रावबहादुर डी. लक्ष्मीनारायण की कुंडली में मकर कारवि तृतीय स्थान में था। अत्नमलाई यूनिवर्सिटी के संस्थापक औरलाखों रूपयों के दाता मद्रास के राजा अन्नमलाई की पत्रिका मेंवृषभ का रवि था। इस प्रकार स्त्री राशि के रवि के फल संपत्ति कीदृष्टि से अच्छे मिलते हैं, धन, वाहन से संपत्र होता है।

    पुरूष राशि का रवि बड़े भाई को मारक होता है। या तो २२वे वर्ष तक उसकी मृत्यु होती है या वह विभक्त होता है। विभाजनके समय झगड़ा फसाद नहीं करता। एक जगह ही रहें तो बड़े भाईका धंधा ठीक नहीं चलता। बच्चे ज्यादा दिन नहीं जीते, और भीतकलीफ होती है। स्त्रराशि का रवि हो तो विभाजन के समय कोर्टमें झगड़े चलते हैं। अलग नहीं हुये तो घर का काम खुद चलानापड़ता है। कर्ता का मान मिलता हैं। जिसके तृतीय में रवि हो उसनेमाई के पास नहीं रहना चाहिये क्योंकि इससे एक दूसरे केभाग्योदय में विष्न उपस्थित होता है। तृत्तीयस्थान में पुरूष राशि कारवि हो तो पिता को वह अकेला ही बच्चा होता है। भाई रहें भीतो उनसे मदत नहीं होती। सब से छोटा हो तो भाई बहिनों सेअच्छा बर्ताव नहीं रखता। या तो यह सब से बड़ा होता है या सबसे छोटा। स्त्री राशि का रवि हो तो भाई बहन हो सकते हैं।

    लग्न से तीसरे यानी सहज स्थान में सूर्य हो तो जातक उत्साही, पराक्रमीएवं प्रतिभावान रहता है। जातक के भाई कम होते हैं एवं उनसे उसकी बनतीनहीं। जातक जीवन में भटकता रहता है, विरोधियों एवं शत्रुओं पर धाक रहतीहै। राजदरबार में भी जातक का दबदबा रहता है, नौकर-चाकरों से युक्त संपन्नजीवन रहता है। स्वभाव मृदु एवं राजसी होता है। 20वें वर्ष में या उसके बादधनलाभ होता है। जातक दान-पुण्य करनेवाला रहता है। जीवन में 4, 5, 8,12 वर्ष की आयु में पानी से भय रहता है।

तृतीय भाव-तीसरे भाव में सूर्य हो तो जातक अदम्य साहसी और वीर होता है। उसका आत्मबल बढ़ा रहता है। सरकार से सम्मानित व प्रसिद्ध होता है। संघर्ष करने वाला (जुझारू), धनवान होता है। काव्य में रुचि सम्भव होती है। परन्तु उसको अपने रिश्तेदारों व भाइयों से खुशी व सम्मान प्राप्त नहीं होता। न ही रिश्तेदारों को उससे खुशी मिलती है। ऐसे व्यक्ति के प्रायः बड़ा भाई नहीं होता। होता है तो मर जाता है। अन्य शुभ योगों से जीवित रह जाए तो जातक की उससे पटती नहीं है, वैर-विरोध रहता है। ऐसा जातक ैम्स्थ् ड।क्म् या स्वयं कमाकर खाने वाला होता है। परन्तु यदि अन्य कारणों से जातक अपना चाल-चलन बिगाड़ ले तो सूर्य के शुभत्व में कमी आ जाती है । जिसका प्रभाव आर्थिक रूप से व अन्य सम्बन्धों में पड़ता है। ऐसा लाल किताब का मत है। 3) तृतीय स्थान में सूर्य होने से जातक पराक्रमी, हठी (ज़िद्दी) राज्य कर्मचारी होता है। यदि पाप ग्रहों से दृष्ट हो मंगल साथ बैठे तो छोटे भाई से विचार नहीं मिलते या छोटे भाई की मृत्यु होती है या होता ही नहीं है। स्वभाव झगड़ालु होता है। कंधे में चोट आती है या दर्द रहता उपाय- रविवार को सूर्य भगवान को अर्ध देवे तथा आदित्य हृदय सत्रोत का पाठ करें।
तृतीय भाव: तृतीयस्थ सूर्य हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है। उसे छोटे भाई का सुख नहीं मिलता अथवा छोटा भाई या तो होता नहीं, अगर हो तो उससे मनोमालिन्य बना रहता है। बड़े भाई की मृत्यु की सम्भावना रहती है। तृतीयस्थ सूर्य के साथ पाप ग्रह हो तो व्यक्ति हिंसक स्वभाव का होता है। उच्च का सूर्य हो तो व्यक्ति आलसोी , बातूनी और दुर्बल विचारों वाला होता है। शेष पुरुष राशियों (मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ) में सूर्य हो तो व्यक्ति शांत चित्त वाला, विवेकशील, नेता, बुद्धिमान, सामाजिक कार्यों में भाग लेने वाला, प्रत्येक स्थान पर अपनी सत्ता जमाने वाला होता है। भाइयों में बंटवारा शांतिपूर्वक हो जाता है। स्त्री राशि (वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) का सूर्य हो तो विभाजन के समय झगड़े होते हैं और नौबत कोर्ट-कचहरी तक जाने की आ जाती है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में सूर्य तृतीयस्थ हो तो उसे भाई के साथ नहीं रहना चाहिए। अन्यथा दोनों का भाग्योदय नहीं होगा। 

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक काफी कर्मशीलहोता है लेकिन संतान सुख में कमी रहती है। आमतौर पर कन्या संतान अधिकहोकर मर जाती है। मित्रों का यह प्रिय होता है। जातक की कुंडली में सप्तमस्थान में कोई ग्रह हो तो उसकी पत्नी कामासक्त एवं व्यभिचारिणी होती है।अपने देवर से उसके अनैतिक संबंध रहने की संभावना रहती है। सूर्य कीमहादशा एवं अंतर्दशा परेशानी उत्पन्न करती है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक सुखी,संपन्न, अभिमानी एवं कुछ सीमा तक क्रोधी भी रहता है। उसका आचरणशुद्ध नहीं रहता और स्वभाव से यह चुगलखोर होता है। जातक धनी होताहै, पुरखों की दौलत पर ऐश करता है। अड़ोस-पड़ोस एवं गली-गांव के लोगोंके लिए उपद्रवकारक होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल विपरीत प्राप्तहोते हैं। पारिवारिक कॅलह, शत्रु वृद्धि, कोर्ट-कचहरी आदि हानिकारक बातेंदशा काल में घटती हैं।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक ज्योतिषविज्ञान, तंत्रमंत्र, गूढ़विद्या एवं कलाओं में पारंगत होता है। यह विनम्र एवं सौम्यस्वभावी होते हुए भी दूसरों की परवाह नहीं करता। मौके-बेमौके छल-प्रपंच से अपने काम निकालने की प्रवृत्ति रहती है। रिश्तेदारों में सम्मान प्राप्त करताहै। पुत्री एक ही एवं नाम कमानेवाली होती है। दशा-अंतर्दशा का समयभाग्योदयकारक रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक की मां-बाप,भाई-बहन आदि परिवारजनों से कम बनती है। जातक योग्यता-अयोग्यता काविचार न करते हुए समय की गति पहचानकर चलनेवाला, संपन्न, सुखी, संपत्तिएवं वाहन सुख भोगनेवाले होता है। इसके पिता समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्तिरहते हैं। जातक का स्वास्थ्य कुछ नरम ही रहता है, सूर्य की दशा-महादशामें साधारण फल प्राप्त होते हैं।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक स्थिर बुद्धिका, धैर्यवान, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, मैत्री करने में चतुर, अनुशासनप्रिय रहताहै। स्वास्थ्य की दृष्टि से सूर्य की दशा-अंतर्दशा सामान्य फलीभूत होती है।

6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य तृतीय स्थान में हो तो जातक स्थिर बुद्धिका, आस्तिक, पराक्रमी, बुद्धिमान, व्यापार में धन कमानेवाला, परिवार काभरण-पोषण करनेवाला, संगीत में रुचि रखनेवाला रहता है। यह शत्रु कासंहारकर्ता एवं परस्त्री से संबंध रखनेवाला भी होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशामें आर्थिक दृष्टि से शुभ एवं शारीरिक दृष्टि से अशुभ फल प्राप्त होते हैं।

7. तुला-तुला राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक का स्वास्थ्यठीक नहीं रहता, फिर भी वह धैर्यवान एवं झगड़ालू होता है। इसकी आर्थिकस्थिति मध्यम रहती है, परस्त्री के साथ संबंध रहता है, दो विवाह होते हैं,आचरण शुद्ध नहीं रहता। शासकीय कामों के लिए यह सूर्य अच्छे फल देताहै। सूर्य की दशा-अंतर्दशा सामान्य परिणाम देती है।

 8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक स्वा्थी,

    कठोर, अपनी ही बात पर अड़िग रहनेवाला, परिवारजनों के प्रति उदासीन रहकरकेवल अपना ही विचार करनेवाला रहता है। रिश्तेदारों से मेल रखता है। आर्थिकस्थिति मध्यम रहती है। जातक कंजूस रहता है। कुछ विद्वानों की राय में इसेअपने भाई-बहनों के लिए खर्च करना पड़ता है, कुमार्ग से धन कमाने की वृत्तिरहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा शुभ फल प्रदान नहीं करती।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर पर जातक बुद्धिमानसंपन्न एवं सिरदर्द का रोगी रहता है। यात्नाएं काफी करनी पड़ती हैं। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा शुभ नहीं होती।

    10. मकर-मकर राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जातक प्रवासी,अभिमानी, माता-पिता से मतभिन्नता रखनेवाला होता है। इसका भरण-पोषणमामा के यहां होता है या जीवनयापन के लिए मामा का सहयोग मिलता है।नौकरी अच्छी नहीं मिलती किंतु स्वतंत्र व्यवसाय में सफलता प्राप्त करता है।सूर्य की दशा-अंतर्दशा भाग्योदयकारक एवं प्रगतिकारक फल देती है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का सूर्य तृतीय स्थान में होने पर जाતक धनवान,गुणवान, विद्वान एवं सदाचारी होता है। मरणोपरांत इसका नाम जीवित रहताहै। बाल्यारिष्ट का डर रहता है। संतान प्राप्ति के लिए निरंतर चिंतित रहताहै। समाज में इसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, नेता बनता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशालाभ एवं प्रतिष्ठा देनेवाली तथा भाग्योदयकारक रहती है।

    12. मीन-मीन राशि का सूर्य तृतीय स्थान में हो तो जातक किसी-न-किसीरोग से ग्रस्त और भाई-बहनों का अहित करनेवाला होता है। दूसरों को दियारुपया-पैसा वापस नहीं मिलता। जातक की आर्थिक स्थिति साधारण रहती है।सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल भी साधारण ही प्राप्त होते हैं।चतुर्थ स्थान (सुख भाव)

3) तृतीय भाव -
1. भैंस का दूध न पिये
2. पांच वर्ष की कन्याओं को मेवा खिलावें ।
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 चतुर्थ स्थान ( सुखभाव)चतुर्थ स्थान का रवि

जिसकी कुंडली के चोथे भाव में सूर्य होता है, वो कोमल हृदय, मिलनसार, विदेशों में जाकर रहने वाला, राज्य की ओर से सम्मान प्राप्त करने वाला होता है। उसके जीवन में अनेक स्त्रियां आती हैं। भाइयों से उसका बैर रहता है। उसका अंत:करण सदा व्यथित रहता है। वाद-विवाद, युद्ध व मुकदमे आदि में शत्रु की उस पर जीत होती है। ऐसा व्यक्ति सुन्दर, गुप्तविद्याओं में रुचि रखनेवाला, बाहनादि के सुख से वंचित, अग्नि-विद्युत से कष्ट पाने वाला, स्वकीय ऐश्वर्य से सुखी होता है। उसे व्यापार में हानि का सामना करना पड़ता है। जाने-अनजाने किसी को भी हानि न पहुंचाने का उसका स्वभाव होगा। यदि चोथे भाव में सूर्य का अशुभ प्रभाव हो, तो व्यक्ति अंगहीन अथवा बिकलांगता का शिकार हो जाता है। उसे ज़ीवन में अनेक दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। 

    बैद्यनाथ - हद्रोगी धनधान्यवृद्धिरहित क्रूरः सुखस्थे रौ।हृदय का विकार होता है, धनधान्य और बुद्धि नहीं होती,क्रुर होता हैं।

    आर्यग्रन्थकार - विविधजनविहारी बन्धुसंस्थो दिनेशोभवति च मृदुवेत्ता गीतवाद्यानुरक्तः। समशिरसि युद्धे नास्तिभंगः कदाचित् प्रचुरधन कलत्री पार्थिवानां प्रियश्च।।

    हिल्लाजातककार- तुर्यग कलहो दिननाथो वत्सरेपि चतुर्दशेस्वात्। यह रवि आयु के 9४ वें वर्ष में घर में झगड़ा उत्पन्न करता है।

    यवनमत - यह सुख नहीं देता। संशयी, मुरझाये चेहरे का,वेश्या सेवी और शत्रयुक्त होता है। पागल जैसी मंद बुद्धि होती है।

    राफल - रवि बलवान या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो अच्छीस्थिति प्राप्त होती है। आयु के अंतिम भाग में यश की प्राप्ति होतीहै। पिता को भी सुख देता है।
    (io) चतुर्ध भाव में सूर्व

    जातक पयालु और बहुत लोगों से संपर्क रखने वाला होता है।गीत-संगीत में रुच वाला, युद्ध में विजयी, सम्पन्न, राजकुपा का पात्रऔर पतली-युक्त होगा।

    -मानसागरी

    व्यक्ति खिन्न मनवाला और विपन्न (प्रसन्नता व सुख-सुविधारहित), सम्बंधियों तथा भूमि-भवन के अभाव वाला होगा। वह सरकारीनौकरी में होगा। उसे पैतृक संपत्ति से हाथ धोना होगा।

    -फलदीपिका

    जातक को सम्बन्धियों व वाहनों का अभाव, हृदयरोग से ग्रस्त, पैतृकसंपत्ति व धन का नाश करने वाला और सम्पन्नता को गँवाने वाला तथाराजसेवा या सरकारी नौकरी वाला होगा।

    -सारावली

    व्यक्ति मानसिक तनाव से ग्रस्त, अपने देश में उन्नति न पा सकेगाऔर विदेश जाकर सफल हो पायेगा। उसके अपने सम्बंधियों से मधुरसम्बंध नहीं होंगे, भावुक, सम्मानित, मध्यायु के बाद सफल, अकारणझगड़ने वाला और कमजोर शारीरिक स्थिति वाला, खिन्न और पैतृक-संपत्तिको नष्ट करने वाला होगा।

    -डॉ.रामन

    टिप्पणी

    विभिन्न दैवज्ञों की इस विषय में सहमति

    (i) जातक को राजसेवा या सरकारी नौकरी या प्रभु कुपा प्राप्तहोगी।
   (ii) वह पैतृक संपत्ति का उपभोग नहीं कर पायेगा या प्राप्त हो जानेपर उसे गवाँ देगा।

    मेरे विचार - आर्यग्रंथकार के सिवा अन्य सब प्राचीनग्रंथकारों ने इसके फल बुरे बताये हैं। सुख नहीं, हृदय को पीड़ा,वाहनों का सुख नहीं, भाईबंदो का सुख नहीं, पिता का, घर काऔर धन का नाश, बुद्धिहीन, क्रूर, युद्ध से भागनेवाला, बहुतपलियां होनेवाला, पिता का वैरी, घर में झगड़ा करनेवाला, दुष्टों केकारण मानसिक चिंता का शिकार होनेवाला, चंचल विचारों का,लोगों पर प्रभाव न ड़ालनेवाला ये सब फल यदि रवि वृषभ, सिंह,वृश्चिक या कुंभ में हो तो ही मिलते हैं। मेष और कर्क में हो तोसंशयी, म्लान चेहरे का और वेश्यासेवी ये फल मिलते हैं।
    हिल्लाजातककार का मत - बच्चे की पत्रिका में चौथेस्थान में रवि हो तो वह १४वें वर्ष घर में कलह पैदा करता है यहफल समझ में नहीं आता। इस छोटी आयु में वह खुद इस्टेट केलिये झगड़े यह संभव मालूम नहीं होता। इसके पिता और चाचा मेंझगड़ा हो सकता है किन्तु इसको चाचा ही नहीं हो तो वह फलकैसे मिलेगा ? इसलिये इस फल का विचार नहीं कर सकते।आर्यग्रंथकार के फल मिथुन, कन्या, तुला, धनु, मकर और मीन मेंसवि हो तो मिलते हैं। यहां एक बात ध्यान में रखनी चाहिये किसवि के ये सब फल एक ही व्यक्ति को एक ही जगह मिलें ऐसानियम नहीं है। उदाहरण के लिये, किसी का चतुर्थ का रवि मेष मेंहै। इसका पिता ५ वें वर्ष में ही मरा। आगे कुछ दुःख नहीं रहा।ब्चपन में दूसरों के यहां में रहा। २३ वें वर्ष स्तानक हुआ। २४वे वर्ष में मा मर गई। उसके बाद उद्योग में लगा। अब संतति,संपत्ति, स्त्री, नोकर चाकर आदि से संपत्र है। इसकी पैतृक संपत्तिपहले ही नष्ट हो चुकी थी। इसके पैसे का उपभोग मां बाप नहींकर सके।

    मेरा अनुभव - पीछे एक जगह कहा गया है कि रवि जिसस्थान में होता है उसका फल नष्ट करता है। इसके अनुसार चौथेस्थान में रवि हो तो बचपन में माता या पिता की मृत्यु होती है।दरगृहस्थी उजड़ जाती है। बचपन बहुत तकलीफ का होता है।किंतु २८वे वर्ष से ५० वें वर्ष तक बहुत अच्छी स्थिती रहती है।इस समय खुद के पैसों से घर और इस्टेट होती है। स्त्री एक हीऔर संति भी अधिक नहीं होती। नौकरी करता है। आयु केमझले भाग में वाहन सौख्य अच्छा मिलता है। किंतु उत्तरार्थ में फिरदुख होता है। घर में कोई मानता नहीं। सब विरोध में हो जाते हैं।
यह लोगों की झंझटों से बिलकुल दूर रहता है। मरण शांति से औरजल्दी होता है। यह अत्यंत व्यावहारीक होता है। वेदान्त इसको प्रियनहीं होता। व्यापारी वर्ग जैसे गुजराती, मारवाड़ी, वैश्य जैन आदिके लोग २२ वें वर्ष से धंदा शुरू करते हैं। उसमें अच्छी प्रगतिकरते हैं। आयु के ४८ से ५२ वें वर्ष तक स्त्री की मृत्यु होती है।प्राचीन शास्त्रकारों ने जो फल दिये हैं वे अकेले रवि के नहीं हैं।उसके साथ मंगल शनि, राहु इन पाप ग्रहों का संबंध हो तो वेमिलते हैं। ऐसा नहीं हो तो कम मिलते हैं।

    राफेल का मत - सिर्फ तुला के रवि में अनुभव में आताहैं। सामान्य तौर पर यह रवि पूर्व आयुष्य में दुखःदायक,मध्यभाग में सुखकारी और वृद्धावस्था में दुःखदायक होता है, ऐसा प्रतीत होता है।

 चतुर्थ स्थान में सूर्य होने पर जातक सुदृढ़, प्रभावशाली एवं आकर्षक रहताहै। कठोर स्वभाव के कारण परिवारजनों से नहीं बनती। हृदयविकार एवं रक्तचापकी संभावना रहती है। जातक विदेश यात्रा से धन कमाता है। बुद्धि मध्यम होनेपर भी साहसी होने से सभी विरोधी इससे घबराते हैं। राज्यशासन से भी सहयोगमिलता है। संगीत जैसी ललित कलाओं में जातक रुचि रखता है। विशेष संपन्नतान होते हुए हुए भी जीवन सुखी किंतु मानसिक सुखशांति में कमी रहती है।जातक की उम्र के 13 से 15 साल के बीच घर में काफी अशांति रहती है।32वें वर्ष में भाग्योदय होता है।

चतुर्थ भाव-चैथे भाव में सूर्य हो तो जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है। वह धनी, पराविद्या का जानकार तथा प्रायः समुद्री यात्राओं से अपार धन अर्जित करने वाला होता है। धनी होते हुए भी निजी वाहन का सुख नहीं होता, रिश्तेदारों से अप्रसन्न व दुखी रहता है। ऐसा जातक निर्दयी तथा कुछ कंजूस किस्म का होता है। (वह धन बच्चों के लिए जोड़कर जाता है, स्वयं अपने ऊपर खर्च नहीं करता।) प्रायः माता-पिता की सेवा का मौका उसे कम ही मिलता है। लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक को अंधों को भोजन कराने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यदि इस भाव में वृष राशि हो तो बहुपत्नी योग या अन्य स्त्रियों से शारीरिक सम्बन्ध सम्भावित होते हैं। वृश्चिक या कुम्भ राशि हो तो हृदयशूल होता है।

चतुर्थ भाव: चतुर्थस्थ सूर्य के प्राय: अशुभ फल ही मिलते हैं। भृगुसूत्र के अनुसार ऐसा व्यक्ति हीनांग होता है अर्थात उस व्यक्ति की देह में कोई अंग कम होता है। वह अहंकारी होता है तथा लागों से प्राय: लड़ाई-झगडे करता रहता है। उसकी देह में उष्णता बनी रहती है। मन में आकुलता रहती है, धनधान्य से हीन होता है। पिता, घर और धन का नाश होता है, मंदबुद्धि, क़्रता, परकीयों से संबंध, पिता से विरोध, अस्थिर विचार तथा लोगों में अप्रिय होना आदि फल सूर्य के वृष, कुम्भ, सिंह, वृश्चिक राशि में होने से मिलते हैं। यदि चतुर्थेश बलवान हो, स्वराशिस्थ, त्रिकोण अथवा केंद्र में स्थित हो तो वर्णित फल नहीं मिलते बल्कि उसे उच्च बाहन की प्राप्ति होती है। चतुर्थ भावस्थ सूर्य के साथ शुभ ग्रह हो तो व्यक्ति लोकप्रिय होता है। वह युद्धकला में प्रवीण होता है तथा युद्ध में पीठ नहीं दिखलाता, मृत्यु शांतिपूर्वक होती है। चतुर्थ भावस्थ सूर्य से जातक बाल्यावस्था में दुख, यौवनावस्था में सुख एवं वृद्धावस्था में पुनः दुख पाता है। 

  राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक के अपनेपरिवारजनों से मधुर संबंध नहीं रहते तथा उनका सहयोग भी प्राप्त नहीं होता।माता-पिता से भी अपेक्षाकृत कम सुख मिलता है। पैतृक संपत्ति नहीं मिलती,मिल भी जाए तो वह टिकती नहीं। जातक अन्याय या जोर-जबरदस्ती से पितासे धन प्राप्त करने की कोशिश करता है। कुछ ज्योतिष विद्वानों की राय मेंऐसे जातक को दूसरों की संपत्ति या जमीन में गड़ा धन मिलता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा के सामान्य फल प्राप्त होते हैं।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने से जातक वातरोगीहोता है। इसका आचार-विचार एवं चरित्र अच्छा नहीं रहता, भाई-बहनों कासुख कम मिलता है। पत्नी सद्गुणी, सौम्य, चरित्रवान एवं आज्ञाकारिणी मिलतीहै। जातक की उम्र लंबी होती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल कष्टदायकएवं क्लेशकारक प्राप्त होते हैं।
    3. मिथुन-मिथुन राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक विवेकशीलहोते हुए भी गुस्सैल एवं अभिमानी रहता है। इसके पेट में कोई बात नहीं पचती,स्वास्थ्य अस्थिर रहता है। आचार-विचार, न्याय-अन्याय के बारे में सूझ अच्छीनहीं होती। संपन्न होने पर भी सुख नहीं मिलता तथा पारिवारिक जीवन अशांतरहता है और वाद-विवाद, मुकदमेबाजी होती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा केअच्छे फल प्राप्त नहीं होते।

    4. कर्कर्क राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक दयालु, उदार,मातृ-पितृभक्त, संपन्न एवं समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त रहता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा में चौगुनी प्रगति होती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य स्वगृही माना जाता है। यह सूर्य चतुर्थ स्थानमें होने पर जातक धनवान, संपन्न, प्रतिष्ठित, सदाचारी, कर्तव्यतत्पर एवं सुखीरहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा का समय लाभकारक, उन्नतिसूचक एवंभाग्योदयकारी व्यतीत होता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक विवेकशील,धैर्यवान एवं उद्यमी रहता है। वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होता तथामाता-पिता से वैचारिक मतभिन्नता रहती है। ऐसे जातक के जन्म के बादपरिवार में धन-धान्य की वृद्धि होती है, पारिवारिक जीवन में सुख प्राप्त होताहै। हो सकता है कि जातक अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र हो। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा का फलित साधारण प्राप्त होता है।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक स्वास्थ्य कीदृष्टि से मध्यम, उदासीन एवं नेत्ररोगी होता है। इसे पारिवारिक सुख पर्याप्त मात्रामें प्राप्त नहीं होता। जातक के एक से अधिक विवाह होते हैं। आर्थिक स्थितिअच्छी न होने पर भी जीवन निर्वाह ठीक से हो जाता है, धनसंचय नहीं रहता।बुरे व्यसनों में फंसने की संभावना रहती है। जातक को साझे में व्यापार करनेसे घाटा होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातकसरकारी कर्मचारी, प्रतिष्ठित, धनसंपत्ति से युक्त, नीरोगी, दीर्घायु, कामातुररहता है। पारिवारिक सुख पर्याप्त प्राप्त होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा काफलित अच्छा प्राप्त होता है।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक परोपकारी एवंकार्यकुशल होता है। इसके दो विवाह होने की संभावना रहती है, फिर भीपुत्र सुख में न्यूनता रहती है। विशेष परिश्रम से ही जीवन में प्रगति संभव होतीहै। पिता के न रहने की स्थिति में परिवार के भरण-पोषण का भार जातकके कंधों पर रहता है, फिर भी पारिवारिक जीवन में सुख-शांति प्राप्त नहींहोती। सूर्य की दशा-अंतर्दशा का समय साधारण व्यतीत होता है।

10, मकर-..-मकर राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक संपन्न, दीर्घायु एवं सत्कर्मी होता है। संतान अच्छी रहती है। सिरदर्द का रोगी रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा का फल साधारण ही प्राप्त होता है। 

11. कऋुंभ--कुंभ शशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक समाज में प्रतिष्ठित एवं अधिकारसंपन्न रहता है। जन्म से 22वां वर्ष महत्त्वपूर्ण रहता है। पारिवारिक एवं मानसिक सुख शांति में न्यूतता रहती है। सूर्य की दशाअंतर्दशा भाग्योदयकारक सिद्ध होती है। 

12. सीन-भीन राशि का सूर्य चतुर्थ स्थान में होने पर जातक थैर्यवान, उद्यमी, धर्मात्मा, बुद्धिमान, मेता बनता है और संपन्न जीवन जीता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा भाग्योदयकारक व्यतीत होती है। 

4) चतुर्थ भाव -उपाय
1. लाल वस्तु न खरीदे ( कपड़ा ) ।
2. तुलसी पर घी का दीपक करें।
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5) पंचम भाव -पंचम स्थान (सुत भाव) 
    पंचम स्थान का रवि
इस भाव में सूर्य होने पर व्यक्ति क्रूर, चंचल, बुद्धिमान, शीघ्र कोधित हो जाने वाला, वंचक, स्थूल शरीर वाला होता है। वो तीब्र दृष्टि वाला, रतिक्रीड़ा का जिज्ञासु, पित्त-प्रकृति वाला, नोकरी अथवा नौकरों से सुखी, महत्त्वकांक्षी, जिददी, नेतृत्व शक्ति वाला, अविश्वसनीय स्वजनों के प्रति अधिक उदार, नीच कर्म करने वाला, बाल्यावस्था में कष्ट भोगने वाला, नाट्यप्रेमी, अधिक कन्याओं वाला, बड़े पुत्र की मृत्यु का दुःख झेलने वाला होता है। स्त्री को गर्भपात का कष्ट सहना पड़ता है। व्यक्ति को हृदय तथा फेफड़ों से संबंधित रोग होते हैं। शारीरिक रूप-से भी वो रोगी बना रहता है तथा अर्जीण व वायुविकार से अधिक पीड़ित रहता है। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु उदर-व्याधि से होना संभव है। 

    वैद्यनाथ - राजप्रियश्चंचलबुद्धियुक्त प्रवासशीलः सुतगेदिनेशे। चंचल बुद्धि का, अधिकारियों को प्रिय और प्रवासकरनेवाला होता है।
    हिल्लाजातककार - पंचमो दिनपतिः पितृमृत्यर्वत्सरे नवमकेयह रवि ९ वें वर्ष में पिता की मृत्यु कराता हैं।

    आर्यग्रंथकार - तनयगतदिनेशे शैशवे दुःखभागे नभवति धनभागी यौवने व्याधियुक्तः जनयति सुतमेक चान्यगेहश्चसुरश्चपलमति विलासी क्रूरकर्मा कुचेता।। बचपन में दुःख देताहैं। पैतृक संपत्ति का नाश करता हैं। जवानी में रोग होते हैं। एकही पुत्र होता है। दुसरे के घर में रहना पड़ता है। शूर, तीक्ष्ण बुद्धिका, विलासी होता है। बुरे कर्म करता है और बुरी सलाह देता हैं।
    यवनमत - मानहीन, संतति कम, मूर्ख, क्रोथी, नास्तिकऔर धार्मिक कार्यों में विष्न करनेवाला होता है।

    राफेल-जलराशि में भिन्न राशियों में हो तो संतति नहींहोती। जलराशि में हो तो बच्चे कमजोर और बीमार होते हैं। चंद्र,गुरू या शुक्र वहां साथ में न हों या रवि पर उनकी दृष्टि न होतो मर भी जाते हैं। विलास और स्त्रीसंग में खुश रहता है। पैसेबहुत खर्च करता हैं।
  
 जातक बचपन में कठिनाईयों से गुजरे, सुख-सुविधा, प्रसन्नता तथासंपत्ति नष्ट हो जाए। उसके एक पुत्र हो। वह किसी और के घर में रहनेवाला, साहसी, पराक्रमी, तालमेल बैठाने में कुशल और महत्वाकांक्षीहोगा।
    -मानसागरी
    संबद्ध व्यक्ति जल्दी क्रोधित होने वाला, खिन्न, धन-संपत्ति, सुखऔर बच्चों से वियोग प्राप्त करने वाला, बुद्धिमान और वन-प्रदेशों कीयात्रा करने वाला होगा।

    -फलदीपिका

    जातक धन संपदा और संतान से विहीन, अस्थिर बुद्धि, कम आयु,शिथिल शरीर और पहाड़ियों व किलों में रहने वाला परन्तु विद्वान होगा।

    -सारावली

    जातक स्थूल देहधारी, दरिद्र और 17 वर्ष की आयु में पिता कीमृत्यु, गंभीर प्रकृति, रोगी व दुर्भाग्य ग्रस्त होगा। वह कुशाग्रबुद्धि, चतुर,कम संतान वाला होगा। सूर्य की राहु या केतु से युति होने पर संतान गवाँदेगा। मंगल से युँते होने पर शत्रु के कारण संतति का नाश होगा।

    -भृगु

    जातक बुद्धिमान, गरींब, कम संतान वाला और मांसल देह वालाहोगा। छोटी अवस्था में ही उसके पिता को खतरा होगा। वह खिन्न औरअस्थिर बुद्धिवाला, फाइन आर्ट के प्रति रूचि रखने वाला और निर्णय लेनेमें सक्षम होगा।

    -डॉ रामन

    टिप्पणी

    पंचमभाव बच्चों, मानसिक स्थिति, मानसिकता, शिक्षा, बचपन,दादा-दादी/नाना-नानी आदि का प्रतिनिधि भाव है। यहाँ पाप ग्रहों कीस्थिति अच्छे फलों को कम करती है। भचक्र में सूर्य पंचमेश होता है।अतः पंचम में सूर्य की स्थिति मात्र एक पुत्र या कम संतान, साहस,बुद्धिमत्ता, कुशाग्रता, आदि देती है। उपरोक्त सभी आचार्य पंचमभाव मेंसूर्य को अच्छा नही मानते। यदि पंचमेश सूर्य के साथ बुध और गुरु अस्तहों, तो जातक मंदबुद्धि होगा।

    मेरे विचार - बहुत से शास्त्रकारों ने अल्प संतति, संततिन होना या होकर मरना ये फल बताये हैं। ये फल रवि पुरूषराशिमें हो तो मिलते हैं। संपत्ति का फल भी कुछ पुरुष राशियों में हीमिलता है। शारिरीक कष्ट और दुःख यह फल कर्क, वृश्चिक औरमीन इन राशियों में मिलता है। बुरी बुद्धि, बुरे कर्म, क्रोधी, कुरूप,कुशल, कुसंगति इत्यादि फल वृषभ, कन्या, मकर इन राशियों मेंमिलते हैं। हिल्लाजातककार का मत कैसा है इसका अनुभव पाठकदेख सकते हैं। यवनमत-मिधुन, तुला और कुंभ राशि के रवि मेंठीक उतरता है।

    मेरा अनुभव - पंचम स्थान में मेष, सिंह, धनु इन राशियोंमें रवि हो तो शिक्षण सामान्यतया पूर्ण होता है। मेष में हो तोसंतति बिलकुल नहीं होती। सिंह में हो तो संतति होती है लेकिनजल्दी मर जाती है। रही भी तो उसका फायदा मां बाप को नहींमिलता। मां बाप के बाद भाग्योदय होता है। शिक्षा कम किंतुव्यवहार में कुशल और ज्ञानवान होता है। रवि धनु में हो तो शिक्षाहोती है। वकौल, या सलाहकार, विलासी, चैनी, सुखी होता है। इनतीन राशियों में मुख्य फल तानाशाही है। वृषभ, कन्या, मकर, कर्क,वृश्चिक और मीन इनमें स्वार्थी, बहुत कंजुस, दूसरों के सुखदुख
 की ओर न देखनेवाला होता है। व्यापार में आगे बढ़ते है। संततीहोती है और रहती भी है। पैसा भी मिलता है। मिधुन, तुला औरकुंभ में विद्याप्रेमी, लेखक, प्रकाशक, जज, बैरिस्टर, वकील ऐसेव्यवसाय होते है। इस स्थान का रवि किसी भी राशि में हो तोप्रसिद्धी देता है। शायद ही दो पल्ियां होती है। अधिकार की वृत्तिहोती है। दुसरों के लिये कष्ट करता है। इसको संतति नहीं होती।पत्नी को संतति प्रतिबंधक रोग जैसे मासिक धर्म बंद होना या उसकक्त वेदना होना आदि होता है। पूर्वजों के शाप से संतति नष्टहोती है या होती ही नहीं। इसलिये ऐसे लोगों ने रवि की उपासनाकरनी चाहिये। तीन साल कठोर साधना से संतति होकर बढ़ती भीहै। रवि पंचम में किसी भी राशि का हो तो पुत्र कम और कन्या ज्यादा यह फल मिलता है।

पंचचम स्थान में स्थित सूर्य जातक के पिता को मध्यम फल देता है। पिता का सुस्त जातक को कम प्राप्त होता है। जातक की उम्र क॑ सातवें या आठवें साल में पिता को शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है एवं मुसीबतों से जुझना पड़ता है। 

जातक को संतान सुख सामान्य प्राप्त होता है। बचपन जन्म स्थान से अन्य जगह बोतता है ओर बुद्धि अच्छी रहती है। गूढ़ रहस्य, गूढ़ विद्या, गणित एवं यांत्रिक विषयों में जातक की रुचि रहती है। चतुरता से सच को झूठ और झूठ को सच करने में यह माहिर रहता है। ऐसा जातक नेता या वकोल की हैसियत से सफल होता है। पंचम स्थान में चर राशि यानी मेष, कर्क, मकर, तुला में से किसी राशि में स्थित सूर्य पंचम स्थान में होने पर जातक जिद्दी एवं दुराग्रही होता है। धनु, वृश्चिक या मेष लग्न में जन्मे जातक का 22वें वर्ष में भाग्योदय होता है। 
पंचम भाव-लग्न कुंडली के पांचवें भाव में सूर्य हो तो जातक चरित्रवान और मेधावी होता है। परन्तु प्रायः उदर रोगी होता है । सन्तान होने से कठिनाई आती है। हृदय की सम्भावना (यदि पाप प्रभाव हो तो) होती है। जातक अपने परिवार की उन्नति करने वाला और भरे-पूरे परिवार वाला होता है। पुत्र जन्म से ऐसे जातक का भाग्य और चमकता है। लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक अपनी संतान पर जो धन व्यय करता है, उसके शुभ फल प्राप्त होते हैं। ऐसे जातक की पत्नी को गर्भपात या संतति अवरोध अवश्य होता है। सन्तान कम होती है तथा दुर्बल व रोगी होती है या शीघ्र नष्ट हो जाती है। प्रायः ऐसे जातक के कन्याएं अधिक होती हैं। (यदि गुरु की दृष्टि पांचवें भाव पर हो तो पत्र प्राप्त हो जाता है) अग्नितत्त्व की राशि हो तो सन्तानाभाव या संतान से सुख का अभाव रहता है। वाय तत्त्व राशि हो तो जातक के दो विवाह साव होते हैं। स्वराशि में हो तथा पाप प्रभाव में हो तो. उदर रोगी और हदय रोगी बनाकर मृत्यु भय देता है।पंचम स्थान (सुत भाव) पंचम स्थान में स्थित सूर्य जातक के पिता को मध्यम फल देता है। पिता का सुख जातक को कम प्राप्त होता है। जातक की उम्र के सातवें या आठवें साल में पिता को शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है एवं मुसीबतों से जूझना पड़ता है। जातक को संतान सुख सामान्य प्राप्त होता है। बचपन जन्म स्थान से अन्य जगह बीतता है और बुद्धि अच्छी रहती है। गूढ रहस्य, गूढ विद्या, गणित एवं यांत्रिक विषयों में जातक की रुचि रहती है। चतुरता से सच को झूठ और झूठ को सच करने में यह माहिर रहता है। ऐसा जातक नेता या वकील की हैसियत से सफल होता है। पंचम स्थान में चर राशि यानी मेष, कर्क, मकर, तुला में से किसी राशि में स्थित सूर्य पंचम स्थान में होने पर जातक जिद्दी एवं दुराग्रही होता है। धनु, वृश्चिक या मेष लग्न में जन्मे जातक का 22वें वर्ष में भाग्योदय होता है।
पंचम भाव: सूर्य पंचमस्थ में हो तो व्यक्ति स्थूल, निर्धन, अल्प संपत्तिवान अथवा सन्तानहीन होता है। ऐसे फल प्राय: सूर्य के मेष, सिंह, मिथुन, धनु, तुला ओर कुम्भ राशि में होने पर मिलते हैं। जलचर राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) में सूर्य के रहने से रोगी संतान उत्पन्न होती है। यदि पंचम भावस्थ सूर्य की चंद्र, बृहस्पति या शुक्र से युति अथवा दृष्टिगत संबंध न हो तो संतान जीवित नहीं रहती। सूर्य के पृथ्वी तत्त्वीय राशि (वृष, कन्या, मकर) में रहने पर व्यक्त दुष्टबुद्धि, दुराचारी, क्रोधी, कुरूप एवं कुसंगी होता है। सूर्य वायु राशि (मिथुन, तुला, कुम्भ) में हो तो व्यक्ति मान-सम्मानहीन, क्रोधी, मूर्ख, नास्तिक एवं धार्मिक कार्यों में विध्न डालने वाला होता है। अग्नि तत्त्वीय राशि (मेष, सिंह, धनु) में हो तो शिक्षा पूरी हो जाती है और यदि उच्च का हो तो संतान जीवित नहीं रहती। सिंह का हो तो संतान या तो मृत्यु का ग्रास बन जाती है या माता-पिता के लिए अनिष्टप्रद होती है। स्त्री राशि का सूर्य व्यक्ति को स्वार्थी एवं कंजूस बनाता है। पंचमस्थ सूर्य किसी भी राशि का हो तो पुत्र कम, पुत्रियां अधिक देता है। 

राशिगत  फल 

1. मेष-...मेष राशि का सूर्य पंचम स्थान में श्रेष्ठ फलदायी होता हे। जातक विलक्षण बुद्धिमान, समाज का नेतृत्व करनेवाला, राजकीय सम्मान प्राप्त करनेवाला तथा स्वभाव का क्रूर होता है। अपने जीवन में समाजसेवा, लेखन, संशोधन या प्रशासन के कारण इसे प्रसिद्धि मिलती है ओर मरणोपरांत भी नाम रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा सामान्य व्यतीत होती है। 

2. वृषभ-.-वृषभ राशि का सूर्य पंचम स्थान में होने पर जातक की बुद्धि एवं विद्या मध्यम श्रेणी की रहती है। यह कूटनीति, गृह्विद्या, मंत्रशास्त्र आदि विद्याओं में पारंगत रहतु है। इसे रुपया-पैसा तो प्राप्त होता है पर धन ठहरता नहीं। ऐसे जातक को संतान नहीं होती और यदि हो भी गई तो वह दुःश्चरित्र एवं आवारा रहती है। जातक स्वयं कुष्यसनी एवं धूर्त होता है। इसे सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल साधारण प्राप्त होते हैं। 

    3. मिथुन-मिथुन राशि का सूर्य पंचम स्थान में होने पर आमतौर पर अच्छेफल प्राप्त होते हैं। विद्याध्ययन की दृष्टि से यह सूर्य शुभ फल प्रदान करताहै। व्यापार, न्यायशास्त्र, चिकित्सा एवं ललित कलाओं में जातक की रुचिरहती है एवं इन क्षेत्रों में यह प्रगति करता है। पत्नी से विशेष लगाव रहताहै किंतु संतान आज्ञाकारी नहीं होती। जातक को सूर्य की दशा-अंतर्दशा केसाधारण फल मिलते हैं।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य पंचम स्थान में होने पर जातक को कभी

    मानसिक शांति नहीं मिलती तथा आर्थिक दृष्टिकोण से कई उतार-चढ़ाव

    जीवन में देखने पड़ते हैं। विश्वासपात्र मित्रों की संख्या नगण्य रहती है। बुद्धि

    अच्छी होने पर भी मन चंचल रहता है, संतान सुख मध्यम प्राप्त होता है।

    सूर्य की दशा-अंतर्दशा के अशुभ फल मिलते हैं। कोर्ट-कचहरी के झंझट एवं

    पारिवारिक अड़चनों से क्लेश सहने पड़ते हैं।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य पंचम स्थान में होने पर राजयोग बनता है।

    ऐसा जातक उच्च राजसम्मान प्राप्त, प्रतिष्ठा, विलक्षण बुद्धिमत्ता का धनी, उच्चशिक्षा प्राप्त, लेखक, सुधारक रहता है। जातक को संतान सुख में बाधा रहतीहै, एक ही पुत्र होता है जो पिता के नाम को आगे बढ़ाता है। प्रथम संतानअल्पायु रहती है। स्वभाव क्रोधी रहता है। अपने वैभव पर गर्व रहता है। गायनकला में प्रवीण रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में प्रगति होती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य पंचम स्थान में होने पर जातक सुखी एवंसंपन्न रहता है। पैतृक संपत्ति बड़े पैमाने पर मिलती है लेकिन जातक स्वयंभी अपने पुरुषार्थ से धनसंग्रह करता है। बुद्धि उत्तम रहती है, पारिवारिक जीवनसुखी रहता है। साहित्य एवं ललित कलाओं में जातक की रुचि रहती है। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य पंचम स्थान में अशुभ फल देता है। जातकमंदबुद्धि, बचपन में रोगी एवं आलसी रहता है। विद्याध्ययन में बाधा आती है।स्वपराक्रम से जातक कुछ भी नहीं कर सकता बल्कि जो कुछ भी पैतृक मिलताहै उस पर ही संतोष करता है। जातक के भाई-बहन नहीं रहते। यदि रहें भीतो उनसे मधुर संबंध नहीं रहते। पत्नी अनुकूल स्वभाव की मिलती है, संतानसुख अच्छा मिलता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में रोग उत्पन्न होते हैं।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का सूर्य पंचम स्थान में होने पर उसके आमतौरपर शुभ फल प्राप्त होते हैं। जातक की बुद्धि अच्छी रहती है किंतु वह स्वभावसे क्रूर और बदला लेने की भावना रखता है। बदला लिए बगैर नहीं रहता।आर्थिक दृष्टि से जीवन संपन्न एवं सुखी रहता है। इसके स्वभाव के कारणपरिवार में विरोध रहता है, पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है, आंखें बड़ी
होती हैं। जातक कोई भी कार्य पूर्ण लगन एवं परिश्रम से करता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा के फल शारीरिक दृष्टि से अच्छे नहीं मिलते।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य पंचम स्थान में हो तो जातक विलक्षण बुद्धिमान,उच्च शिक्षा प्राप्त, नीरोगी एवं दीर्घायु रहता है। जातक शिकार खेलने में प्रवीण,कुशल तीरंदाज, शोध में विशेष रुचि रखता है एवं उसमें यश व सम्मान प्राप्तकरता है। संगीत में भी इसकी रुचि होती है, गला सुरीला रहता है और गायककी हैसियत से यश प्राप्त करता है। राजसम्मान भी प्राप्त होता है। संतान सुखमें न्यूनता रहती है। प्रथम संतान का नुकसान होता है किंतु संतान आज्ञाकारीरहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में प्रगति होती है।

    10. मकर-मकर राशि का सूर्य पंचम स्थान में रहने पर जातक की आर्थिकस्थिति साधारण रहती है। संतान सुख में न्यूनता रहती है लेकिन संतानआज्ञाकारी रहती है। उच्च शिक्षा के अध्ययन में अड़चनें आती हैं। लॉटरी एवंकुव्यसनों में पैसा बरबाद होता है। जातक उतावला, छलकपट एवं कूटनीतिमें चतुर रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के अशुभ फल मिलते हैं।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का सूर्य पंचम स्थान में हो तो बहुत अच्छे फल प्राप्तहोते हैं। आर्थिक समृद्धि, सामाजिक यश एवं राजसम्मान प्राप्त होता है। संतानसुख सामान्य रहता है। पत्नी के साथ मतभिन्नता रहती है।

    12. मीनमीन राशि का सूर्य पंचम स्थान में हो तो शुभ फलदायक होताहै। ऐसा जातक संगीतप्रेमी, बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, अनुशासनप्रिय, उच्चप्रशासक, बड़ा उद्योगपति, धैर्यवान, उत्साही, तत्पर, आत्मविश्वास से कार्यरतरहता है। जातक को पत्नी सुख में न्यूनता रहती है, संतान सुख एवं मान सम्मानप्राप्त होता है, जीवन संपन्न एवं सुखी रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा काकाल महत्त्वपूर्ण एवं अच्छा रहता है।
1. बंदरों को खिलावें ।
2. अनाथ आश्रम के बच्चों को भोजन करावें 
3. बंदर को जव की रोटी खिलावें ।
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6) छठा भाव -षष्ठ स्थान (शत्रु भाव)
    पष्ठ स्थान का रवि
जिसकी कुंडली के छठे भाव में सूर्य हो, वो रोगी, शत्रुनाशक, वीर्यवान, न्यायप्रिय, स्वप्नदर्शी, परिजनों का पोषक, शत्रु पर विजय पाने वाला, मातृपक्ष से धन पाने वाला, माता के कुल से कष्ट पाने वाला; मित्रों पर धन व्यय करने वाला तथा नौकरी से लाभ अर्जित करने वाला होता है। परिजनों का पोषक, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, स्पष्टवादी, कशदेह, प्रौ़ावस्था में अधिक' भाग्यशाली होता है। पैतृक मकान से अलगाव, हर छोटी-बड़ी बात पर शीघ्र चिड़ जाने वाला होता है। यदि षष्ठ भाव में वृश्चिक अथवा कुंभ राशि हो, तो व्यक्ति को श्वासरोग (दमा), हृदय-संबंधी रोग होते हैं। यदि राशि मिथुन, कन्या या मीन हो तो व्यक्ति क्षयरोग अथवा अम्लविकार से पीड़ित रहता है। उदरविकार तथा संधिवात से ग्रस्त होने की भी संभावना है। 

    आर्यग्रंथकार -अरिगृहतभानौ योगशीलो मतिस्थोनिजजनहितकारी ज्ञातिवर्गप्रमोदी। कृशतनुगृहमेधीचारूमूर्तिर्विलासी भवति च रिपुजेता कर्मपूज्यो दृढङगः।।यह योगाभ्यास करता है। अपने लोगों का कल्याण करता है। जातिके लोगों को सुख देता है। पतले कद का और घरगृहस्थी सम्हालनेवालाहोता है। दिखने में सुंदर, विलासी, शत्रुओं पर विजय पानेवाला,कार्य में मग्न और शरीर से मजबूत होता है।

    कल्याणवर्मा - प्रबलमदनोदराग्नर्बलवान् षष्ठं समाश्रयिणिभानी। श्रीमान् विख्यातगुणो नृपतिर्वा दण्डनेता वा। कामवासनाऔर भूख बहुत अधिक होती है। बलवान, श्रीमान और प्रसिद्धराजा या सेना का अधिकारी होता है।
    हिल्लाजातककार - आयु के ९वें वर्ष में पिता की मृत्युहोती है। २३ वें वर्ष में खुद मरने का भय होता है।

    यवनमत - यह धनवान, सुंदर, निरोगी, शत्रुओं पर विजयपानेवाला और मामा का सुख पानेवाला होता है।

    राफेल - तबियत अच्छी नहीं रहती। रवि दूषित हो तोबहुत और लंबी बीमारियां होती हैं। स्थिर राशियों में हो तो गलरोगजैसे क्विन्सी, डिफ्थेरिया, ब्रांकाइटिस, अस्थमा होते हैं। हृदय केसोग, पीठ और कोख निर्बल होना, मूत्ररोग ये फल भी होते है।साधारण राशियों में और खास कर कन्या और मीन में क्षय का ड़रहोता है। फेफड़ों में बाधा पहुंचती है। चर राशियों में यकृत के रोग,निरूत्साह, छाती दुर्बल होना, पेट के रोग, संधिवात, कोई बड़ीजख्म, इनकी संभावना रहती है।

जातक यौगिक क्रियाओं का अभ्यासी, चतुर, सुदर्शन, परिवार के लिए भाग्यशाली, संबंधियों की मदद करने वाला, शारीरिक रूप से शिथिल, सुखी वातावरण में रहने वाला, प्रसन्नचित्त और शत्रुजित् होगा।
-मानसागरी
जातक राजा बने, प्रसिद्धि प्राप्त करे, प्रशंसनीय गुणों वाला, धनाड़य, सम्पन्न और शत्रुओं को परास्त करने वाला होगा।
-फलदीपिका
जातक स्वस्थ, सुदृढ, सद्गुणों के कारण प्रसिद्ध, समृद्ध, राजा या सेनापति और अच्छी पाचनशक्ति वाला होगा।
सारावली
जातक के अनेक शत्रु हो, आर्थिक संपन्नता वाला 20 वें वर्ष में नेत्र रोग से पीड़ित, मंत्र प्रयोग में रूचि रखने वाला होगा। सूर्य यदि शुभ ग्रहयुत हो, तो अच्छा स्वास्थ्य, व अनेक संबंधियों वाला, साथ ही कई शत्रुओं वाला होता है।
- भृगु
जातक जाति परम्परा को तोड़ने वाला, अच्छी प्रशासनिक क्षमता वाला, कम शत्रुओं व सगे-संबंधियों वाला, साहसी, सफल, शत्रु पर आतंक रखने वाला, उदर रोगी और कार्यपालक क्षमताओं से युक्त होता
है।
-डॉ रामन
चमत्कार चिंतामणि में बताया गया है कि जातक अपने शत्रुओं को नष्ट कर देगा। परन्तु महर्षि भृगु का कहना है कि उसके शत्रुओं की संख्या बढ़ेगी।
टिप्पणी
आर्थिक सफलता, बीसवें वर्ष में नेत्ररोग, सम्मानित, प्रसन्नचित आदि शेष सभी समान रुप से कहे गये। छठे भाव में पाप ग्रहों का होना अच्छा कहा गया है। परन्तु इससे जातक के नाना के परिवार को कष्ट-अनिष्ट हो सकता है। इससे रोग, चोरी आदि हो, लेकिन जातक कठिनाइयों पर पार पाने और शत्रुओं को परास्त करने में समर्थ, बुद्धिमान, संबंधियों और भाईयों से अच्छे संबंधो वाला तथा राजा का कृपा पात्र होगा।
शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार-छठे भाव में पाप ग्रह होना अच्छा है। इसका कारण-छठे भाव (प्राण शक्ति को दर्शाता है) में पाप ग्रहों के होने से साहस, प्रतिरोध क्षमता, संर्घषशीलता ओर प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। आज की तेज रफ्तार व प्रतियोगी जिन्दगी में छठे भाव में सूर्य का होना, बहुत अच्छे फल दे सकता है।

    मेरे विचार - इन शास्त्रकारों ने बलवान, श्रीमान, अपनेलोगों को हितकर, जाति को हितकर, हमेशा सुख देनेवाला, उद्यमी,वाहनसंपत्र रोगयुक्त और प्रवास में क्लेश सहनेवाला ये फल बतायेहैं। हरिवंश के श्लोक के अनुसार - सुखी, पवित्र और प्रेमी ये फलरवि यदि इस स्थान में स्त्रीराशि में हो तो मिलते हैं। शत्रुओं कानाशक, शूर, मामा का सौख्य कम मिलनेवाला, सरकार द्वारासम्मानित - (पुराने समय में) रावबहादुर आदि उपाधियाँ प्रप्तकरनेवाला, स्त्रियों को अप्रिय, कामी, तेज भूखवाला, अधिकारी,योगाभ्यासी ये सब फल पुरूष राशियों में मिलते हैं। राफेल के दियेहुये रोगफल स्त्री राशियों में मिलते हैं।

    मेरा अनुभव - यह रवि पुरूष राशि में हो तो कामी,अभिमानी, क्रोधी, अत्याधिक खानेवॉला, पूर्व आयुष्य में उपदंश,  प्रमेह आदि रोग होकर उत्तर आयुष्य में तकलीफ पानेवाला होताहै। मामा का पक्ष नाश को प्राप्त होता है। मौसी विधवा होती है याउसको पुत्रसंतति नहीं होती। शत्रु का नाश करता है। शिक्षा मेंस्मृति की शक्ति कम होती है। स्मरण नहीं रहता। दूसरों की बुरीबातों का स्मरण रखता है, उनका अपमान करता है। इसके नौकरभी मिजासखोर और बेपरवाह होते हैं। यह नौकरी करे तोअधिकारियों से झगड़े कर बैठता है। यही रवि स्त्री राशि में हो तोकिसी से तोड़़कर नहीं बोलता। मीठा बोलकर काम बना लेता है।इन राशियों में सब शुभ फल मिलते हैं। ये लोग रसोई अच्छीबनाते हैं। घर की व्यवस्था, रोगी की सेवा अच्छी करते हैं।अत्याधिक खाने से बद्धकोष्ठ और कृमि विकार होते हैं। ये लोगस्त्रियों को प्रिय होते हैं। पत्नी की मर्जी के अनुरूप रहकर उसेखुश करते है। मामा, मौसी बहुत होते हैं।


 षष्ठ स्थान में सूर्य हो तो जातक शत्रुनाशक, योगाभ्यासी, भाई-बहनों कोसुख देनेवाला रहता है। इस पर परिवार की जिम्मेदारियां रहती हैं। ननिहालसे सुख कम मिलता है। जठराग्नि एवं कामवासना दोनों तीव्र रहती हैं। जानवरोंसे कष्ट पहुंचता है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है। जातक को राज्यशासन से सम्मानएवं अधिकार प्राप्त होता है किंतु यदाकदा शासन से दंड एवं सजा भी प्राप्तहोती है। ऐसे जातक को प्रवास कम करना चाहिए क्योंकि प्रवास में या प्रवासके कारण हानि की संभावना रहती है। जन्म से 9वें वर्ष में पिता को कष्टपहुंचता है और 22वें वर्ष में स्वयं को शारीरिक क्लेश रहते हैं। सिरदर्द,नेत्रपीड़ा, रक्तविकार, सर्पभय, अस्थि रोग, हृदय रोग का कष्ट उत्पन्न होताहै। 27वें वर्ष में नेत्रविकार होता है।

षष्ठ भाव- छठे भाव में सूर्य लग्न कुंडली में हो तो जातक शत्रुजित, अपने सम्मान के लिए चिंतित, कठोर हृदय, स्वार्थी, धन के सम्बन्ध में लापरवाह तथा अपने भाग्य से संतुष्ट रहने वाला होता है। ऐसे जातक को सरकार की ओर से दण्ड (जुर्माना आदि) सम्भावित होता है। जीवनसाथी के साथ उसकी पटती नहीं है। (विशेषकर तब जब सूर्य छठे घर में व शनि बारहवें घर में स्थित हो--तब पत्नी के लिए और भी अशुभ फल प्राप्त होते हैं।) लाल किताब के अनुसार यदि छठे घर में सूर्य हो और दूसरा भाव खाली हो तो जातक के पिता के लिए अशुभ होता है। अशुभ सूर्य का प्रभाव जातक की संतान पर भी पड़ सकता है-इसके लिए बन्दरों को गुड़ खिलाना लाभकारी होता है। सूर्य अष्टमेश होकर छठे भाव में हो तो राज्यपक्ष से वैर रहता है।

     ऐसा जातक यंत्र तंत्र मंत्र में रुचि लेता है। शत्रु अधिक होते हैं (किन्तु शत्रुहंता होता है)। यदि सूर्य पाप प्रभाव में हो तो जातक लम्बे रोग से ग्रस्त रहता है। कन्या या मीन राशि में छठे घर का सूर्य हो तो क्षय रोग की सम्भावना बनती है। यदि वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशि में हो तो दमा, ब्रोंकाइटिस, डिफ्थीरिया आदि सम्भव होते हैं। पुरुष राशि हो तो युवावस्था में ही प्रमेह का रोग सम्भव होता है।

षष्ठ भाव: षष्ठस्थ सूर्य हो तो व्यक्ति के शत्रु अधिक होते हैं। उसे विष, शस्त्र, छूत रोग तथा व्यसनों से पीड़ा होती है। सूर्य पाप प्रभाव में हो तो स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता ओर लम्बी बीमारियां होती हैं। स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ) में हो तो गले के रोग, फोडे-फुंसी, डिप्थीरिया, दमा, कूकर खांसी जैसे रोग होते हैं। सूर्य कन्या या मीन राशि में हो तो क्षयरोग होने की प्रबल सम्भावना होती है। फेफड़ों में कफ या अन्य कारणों से बाधा उत्पन्न होती है। चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) में हो तो यकृत, सन्धिवात अथवा उदर रोग की सम्भावना रहती है। अन्य राशियों में हृदय रोग, पीठ एवं कृक्षि के रोग तथा मूत्र विकार से व्यक्ति पीडित होता है। यदि षष्ठस्थ सूर्य के साथ कोई शुभ ग्रह हो या उसे देख रहा हो तो व्यक्ति तंत्र-मंत्र का जानकार, सर्प-विष को झाड़ने वाला तथा सम्माननीय होता है। मातुल पक्ष अर्थात मामा-मामी से लाभ लेने वाला, सर्वदा निरोगी तथा धन-संपत्तिवान होता हे। 

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक शत्रुहंता होता हैकिंतु शत्रुओं की संख्या निरंतर बढ़ती ही रहती है। शत्रु जातक को चैन सेजीने नहीं देते। इसका चरित्र शिथिल रहता है। माता का चरित्र भी ठीक नहींरहता। पिता का सुख कम मिलता है। बचपन मुश्किलों से घिरा रहता है। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा के प्रारंभ में नुकसान होता है किंतु उत्तरार्थ में अच्छे फलप्राप्त होते हैं किंतु राजभय रहता है।

    2.वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में होने पर जातक का बड़ाभाई नहीं होता। यदि हो भी तो उसका सुख नहीं मिलता। मामा से भी सुखकम ही मिलता है। जातक नास्तिक होता है, जीवन बाधाओं से घिरा रहताहै। जातक स्वेच्छा से अन्य समाज की लड़की से विवाह करता है। इसे नींदबहुत आती है। ऐसा जातक आलसी होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अच्छीबीतती है।

    3. मिथुनमिथुन राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्यठीक नहीं रहता और कोई-न-कोई शारीरिक शिकायत बनी रहती है। सर्पभय,आघात, बाल्यारिष्ट का भय रहता है। लोगों से इसके संबंध मधुर नहीं रहते,मित्र कम रहते हैं। नौकरी में अपने से वरिष्ठों से हमेशा अनबन रहती है। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा का समय अच्छा बीतता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक की पत्नी क्रोधी,स्वाभिमानी और रोगी रहती है। जातक पत्नी का गुलाम रहता है। स्त्रीसंग केकारण तपेदिक या हृदय रोग होते हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा कष्टकारक बीतती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक को उसकी जातिके लोगों से सहयोग नहीं मिलता, संबंध मधुर नहीं रहते। जातक अभिमानीतो होता है पर विश्वासपात्र नहीं। अपने स्वार्थ के लिए धोखा खाकर उनसेहाथ मिलाने की वृत्ति रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा मारक रहती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक गूढविद्या में पारंगतरहता है किंतु उच्च शिक्षा में बाधा उत्पन्न होती है। स्वभाव का क्रोधी और खुदशस्त्रप्रेमी होता है। संतान सुख में न्यूनता रहती है, संतान होना ही संभव नहीं रहताऔर हो भी जाए तो उससे बनती नहीं। सूर्य की द्रशा-अंतर्दशा मारक रहती है।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में रहने पर जातक बचपन मेंबहुत ही दुखी एवं सभी अभावों से पीड़ित रहता है, यहां तक कि उसेमाता-पिता का सुख भी कम मिलता है। सौतेली मां होने की संभावना रहतीहै। रिश्तेदारों से सुख-सहयोग नहीं मिलता। मामा का चरित्र कलंकित रहताहै। पैतृक संपत्ति नहीं के बराबर रहती है, उसे भी जातक उड़ा डालता है।

  पिता से मधुर संबंध नहीं रहते। स्वयं क्रोधी एवं चरित्र भ्रष्ट रहता है। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा मारक रहती है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का सूर्य पष्ठ स्थान में होने पर जातक शत्रुओंका काल होता है। पिता का एक मात्र पुत्र होने की संभावना रहती है। अन्यभाई हों तो उनसे संबंध मधुर नहीं रहते। आर्थिक दृष्टि से जीवन संपन्न रहताहै। धन कमाता है, व्यापार में लाभ होता है। मामी के साथ इसके अनैतिक संबंधहोने की संभावना रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा कष्टकारक बीतती है।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में होने पर जातक में धनसंग्रह कीवृत्ति रहती है। जातक कंजूस रहता है फिर भी धनसंग्रह नहीं होता। बीमारीएवं कोर्ट-कचहरियों में पैसा खर्च होता है। बवासीर जैसे रोगों का कष्ट रहताहै। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    10. मकर-मकर राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्य अच्छानहीं रहता। बाल्यारिष्ट का भय रहता है। विशेषतया नेत्रविकार होते हैं। जातकपराक्रमी और कार्यकुशल रहता है, दो विवाह होने की संभावना रहती है। जातकसंपन्न किंतु कंजूस रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल अच्छे मिलते हैं।

    11. कुंभ-कुभ राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक को संतान सेदुख मिलता है तथा वह कंजूस एवं नेत्रोगी होता है। मां से सुख कम मिलताहै। व्यभिचार, दुर्व्यसन एवं कोर्ट-कचहरी में पैसा खर्च होता है। अलग रहनेकी संभावना रहती है। परस्त्री से संपर्क की संभावना रहती है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा के फल मध्यम मिलते हैं।

    12. मीन-मीन राशि का सूर्य षष्ठ स्थान में हो तो जातक को जन्म स्थानसे दूर रहना पड़ता है, स्वास्थ्य मध्यम रहता है। इसे दूसरों के साथ रहकर याउनके अधीन रहकर निर्वाह करना पड़ता है, चोरी का डर रहता है और विदेशमें मृत्यु होती है। जातक की आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। व्यवहारचतुरएवं कूटनीतिज्ञ रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के अशुभ फल प्राप्त होते हैं।
1. किड़िनागरा चुगावें।
2. कुत्ते को जवार की रोटी खिलावें।
3. देवी देवता में विश्वास रखने से प्रगति होगी।
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7) सातवें भाव - सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)सप्तम स्थान का रवि
जिसकी कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो, उस व्यक्ति को उन्‍नत्ति-अवनति की विविध चिंताएं रहेंगी, धेर्य-पराक्रम का अभाव, स्वकीय मकान का सुख होगा, मंदबुद्धि, सुन्दर स्वरूप, चंचल, स्त्री क्लेशकारक, स्त्री के साथ विलास करने वाला, व्यर्थ की बात करने वाला, स्वभाव से कठोर, राज्य की ओर-से अपमानित, स्त्री * बियोगी, शरीर पीड़ित तथा मन सदैव चिंतित रहता है। उसे स्त्री का सदैव कष्ट रहता है। व्यापार करने से हानि होती है। साझेदारी से लाभ मिलता है। घमंडी लोगों के बीच उसका उठना-बैठना होता है। ऐसे व्यक्ति के सिर के बाल बहुत जल्दी झड़ जाते हैं। उसे नेत्र रोग तथा अनिद्रा की सदा शिकायत रहती है। आलस्य तथ्! चिंताग्रस्त-संबंधी रोग उसे पीड़ित करते हैं। गुप्तरोग के कारण, मानसिक चिंताएं उसे घेरे रहती हैं। 

    बैद्यनाथ -स्रीद्वेषी मदनस्थिती दिनकरेतीव प्रकोपीखलः। स्त्रियों का तिरस्कार करनेवाला, बहुत क्रोधी, दुष्ट होता है।

    आर्यग्रन्थकार - युवतिभुवनसंस्थे भास्करे स्त्रीविलासी नभवति सुखभागी चंचलः पापशीलः। उदरसमशरीरो नातिदीर्घों न्हस्वः कपिलनयनरूपः पिङगकेश कुमूर्तिः।। स्त्रीभोक्ता, सुख नपानेवाला, एक जगह न रहनेवाला, पापी, सम शरीर का, न बहुतलंबा न बहुत छोटा, आंखो की पुतलियां काली, केश ललाई कोलिये हुये, बेढंगा शरीर, ऐसा होता है।

    हिल्लाजातककार - रामदोरपरिपिते च वत्सरेसर्वसंपदमदाच्च सप्तमः। सप्तम का रवि २४वे वर्ष में सबप्रकार की संपत्ति का लाभ कराता हैं।

यवनमत - चिन्ता से ग्रस्त, कामासक्त, दुर्बल, बहुत बोलनेवाला और संग्राम में जय पानेवाला होता है। इसकी स्त्री दुर्बल होती है। राफेल अभिमानी, पति या पत्नी, उच्च और भव्य आचरण के साथ उदारता, उद्योग और साझेदारी में यश प्राप्ति ये हैं। किन्तु बहुतसा रवि की राशि पर और अन्य ग्रहों की दृष्टि पर निर्भर है।
फल
मेरे विचार - हमारे प्राचीन शास्त्रकारों ने इस स्थान के रवि के सब फल बुरे ही कहे हैं। इनका विचार करते हुये मेष, सिंह, मकर इन राशियों में ही वे मिलते हैं। अस्त के समय रवि निस्तेज और प्रकाशहीन होता है उस पर से बुरे फल की कल्पना की गई होगी। हमारे ग्रन्थकारों ने एक भी अच्छा फल नहीं दिखाया। पाश्चात्य ग्रन्थकारो को सब अच्छे ही फल नजर आये हैं।
सप्तम भाव में सूर्य
जातक स्त्रीं संग में खुश, अशांति एवं दुर्गति से दुखी, मध्यम कद -काठी वाला व भद्दे बालों वाला।
-मानसागरी
जातक को राजकोप भोगना पड़े, पत्नी का न होना, विकलांग शरीर वाला, दूसरों से अपमानित किया गया होगा।
फलदीपिका
जातक दरिद्र, रोगग्रस्त, अपमानित, राजा को खुश न रख पाने वाला, कैद की सजा प्राप्त और पत्नी से असंतुष्ट होगा।
F
-सारावली
पत्नी बाँझ होगी। सप्तम भाव का सूर्य निःसंतान बनाता है।
- पराशर
विलंब से विवाह और विवाहित जीवन कठिनाईयों भरा, अधार्मिक व अनैतिक, स्त्रियों से घृणित, घुम्मकड़, पत्नी के प्रति समर्पित, स्त्री के माध्यम से धन प्राप्त करने वाला, विदेशी वस्तुओं का उपभोगी, असंतुष्ट, पत्नी का चरित्र संदेहास्पद, स्त्रियों के अधीन और उनके कारण बदनामी का भय होगा।
टिप्पणी
-डॉ रामन
सभी ज्योतिषियों के अनुसार सप्तम भाव में सूर्य दाम्पत्य के लिए अच्छा नहीं होता। जातक पापवृत्ति में लिप्त, अत्यधिक यौनचार के कारण बीमार और स्वास्थ्य-संबंधी परेशानियों से ग्रस्त होता है।

मेरे अनुभव यह रवि मिथुन, तुला और कुंभ में हो तो विषयी, शिक्षा विभाग में प्रगति करता है। पोस्ट या तार विभाग में जाता है। अधिकारी या कानून विशेषज्ञ होता है। संगीत, नाट्य, रेडियो इनमें भी प्रगति कर सकता है। संतति एक दो या बिल्कुल ही नहीं होती। मेष, सिंह और धनु इन राशियों में यह रवि हो तो दो विवाह होते हैं। एक ही विवाह हो तो अधिक आयु में होता है। स्वतंत्र उद्योग करता है। नौकरी नहीं चाहता। इन छः राशियों में साधारण फल ऐसे होते हैं। व्यवहार का ज्ञान नहीं होता। उदार और लोगों पर भरोसा रखनेवाला होता है। इससे लोग इसको ठगते हैं। अधिकार की भावना तीव्र होने से अपने मातहत लोगों पर ख्याल कम रहता है। बेफिकर होता है। बहुत पैसा मिलता है और खर्च भी हो जाता है। बड़ेबड़े कामे करता है। मान-सन्मान प्राप्त होता है। पौरूषपूर्ण बर्ताव होता है। दयालु वृत्ति रहती है। स्त्री राशियों में खासकर वृषभ, कन्या और मकर इनमें यह रवि हो तो व्यापार अच्छा करता है। म्युनिसिपालिटी, जनपद या विधान सभा में चुनकर आता है। सीधा बर्ताव करता है। कर्क, वृश्चिक और मीन में यह रवि हो तो डॉक्टर या विज्ञान का स्नातक होता है। नहर या नल के अधिकारी होते हैं। सोडावाटर या औषधों के कारखाने चलाता है। सप्तम के रवि का सब राशियों में सामान्य फल इस प्रकार है। स्त्री अधिक प्रभावी होती है। वृत्ति और बर्ताव से वह अच्छी शीलवान होती है। वह श्रीमान घराने की किन्तु आपत्ति के समय पति को ही साथ देनेवाली होती है। संसार में कुशल और उदार होती है। अतिथियों से उकताती नहीं उनका उचित सत्कार करती है और उसी में सात्विक गौरव अनुभव करती हैं। गरीबों के लिये दयालु और नौकरों पर रोब जमाकर काम करा लेनेवाली होती है। इन सब गुणों के बावजूद वह पति पर प्रभुत्व जमाने का अथक प्रयास करती है। तिजोरी की चाभी उसके पास हो तो संतुष्ट रहती है। बरताव में प्रौढ़, देखने में सुंदर, केश लम्बे और घने, वर्ण कुछ ललाई लिये हुये गौरवर्ण ऐसा उसका रूप होता है। अभी पिछले पचास वर्षो से परिस्थिती के बदलने से लड़के लड़कियां विवाह के समय अधिक आयु के और सुशिक्षित होते हैं और स्वयं ही प्रीतीविवाह करते हैं। इस परिस्थितीं में इस रवि के फलादेश में नयी वृद्धि करनी पड़ेगी। इसका स्वरूप यों है : दोनों
चिकित्सा बुद्धि होती है। मनचाही स्त्री मिले तो ही शादी करूंगा ऐसे विचारों से ३६ वें वर्ष तक कुआंरा ही रहता है। प्रीति नष्ट होने से कानून की इजाजत हो तो तलाक भी लेता है। मेरा अनुभव ऐसा है कि मेष, सिंह, धनु और मीन का रवि प्रीति का नाश करवाकर किसी दूसरी लड़की से शादी कराता है और पश्चात् झगड़ा कराकर तलाक दिलाता है। इस रवि का एक बुरा फल और है वह यह कि आपत्ति के समय ससुर का वास्तविक प्रेम कम होता है। वृषभ, कन्या, मकर, कर्क, वृश्चिक और मीन इनके रवि में के ५० वें वर्ष तक धंदा या नौकरी अच्छी लगती है पश्चात् आयु एकदम बंद हो जाती है। पुरूष राशि के रवि में परिस्थिती में हमेशा उतारचढ़ाव होते रहते है। स्त्री की मृत्यु ५०-५२ में होती है। इस समय घर में अड़चन होते हुये भी दूसरी शादी करना संभव नहीं होता। पुरूष राशि में संतति कम और स्त्री राशि में अधिक होती है। ५० वें वर्ष के बाद प्रगती कम होती है।


 सप्तम स्थान यानी पति-पत्नी के स्थान में सूर्य हो तो जातक कुटिल,करामाती, क्रोधी एवं कामासक्त रहता है और वैवाहिक जीवन में न्यूनता रहतीहै। यह स्त्रियों को तिरस्कार की भावना से देखता है। ऐसे जातक की आंखेंलाल एवं बाल भूरे रंग के होते हैं। ऐसा जातक अधिक बोलनेवाला, चतुर,वाद-विवाद में विजय प्राप्त करनेवाला होता है। पत्नी अच्छे कुल की एवंअभिमानी मिलती है। पति व पत्नी दोनों ही अभिमानी होने से दांपत्य जीवनमें सुख प्राप्त नहीं होता।महिलाओं की कुंडली में सप्तम स्थान में सूर्य हो तो उनका पति स्वाभिमानीरहता है। नौकरी एवं राजकीय क्षेत्र की दृष्टि से सप्तमस्थ सूर्य अच्छे फलदेता है। व्यवसाय में विशेष रूप से साझे के व्यवसाय में घाटा होता है। जीवनमें कई उतार-चढ़ाव आते हैं। 24वें वर्ष में भाग्योदय होता है।

सप्तम भाव-सातवें भाव में सूर्य हो तो जातक सदा अप्रसन्न रहने वाला, कठोर हृदय व स्वार्थी होता है। प्रायः जीवनसाथी (पत्नी) की मृत्यु का कारण बनता है। अपने सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकता है। सरकार की ओर से दण्ड सम्भावित होता है तथा जीवनसाथी से वियोग सम्भावित होता है। प्रायरू पत्नी की मृत्यु शीघ्र होकर जातक विधुर हो सकता है। (यदि गुरु आदि शुभ ग्रहों से सातवां भाव   दृष्ट न हो तो)।

     लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक 34 वर्ष की आयु तक अशुभ समय भोगता है। जीवन में डरा-डरा रहता है तथा तपेदिक जैसे रोगों से ग्रस्त हो सकता है। यदि सूर्य अशुभ स्थिति में हो तो जातक बहुत अधिक क्रोधी व स्वार्थी होता है। वह स्वयं तो कलपता किलसता रहता ही है, दूसरों को भी किलसाता है। ऐसे जातक की मृत्यु उसके घर पर ही होती है, भले ही वह रोजगार के लिए बाहर रहता हो। जातक का विवाह विलम्ब से होता है। दाम्पत्य का पूर्वार्ध कलहपूर्ण होता है। (खासकर तब जब सूर्य अग्नि राशि में हो, विलम्ब से विवाह या दो विवाह का योग बनता है।) पुरुष राशि में सूर्य हो तो जातक संतान कम होती है।

सप्तम भाव: सप्तमस्थ सूर्य यदि अग्नि राशि में हो तो दो विवाह होने की सम्भावना रहती है। प्रथम विवाह विलम्ब से होता है। व्यक्ति किसी के अधीन कार्य करने का इच्छुक नहीं होता बल्कि स्वतन्त्र कार्य करना पसंद करता है। वायु राशि का सूर्य शिक्षा विभाग में उच्च पदासीन करता है। ऐसा जातक अधिकारी, कानूनविद या संगीतज्ञ बनता है अथवा आमोद-प्रमोद के संसाधनों से प्रगति करता है। वृष, कन्या, मकर राशि का सूर्य व्यक्ति को सफल व्यवसायी बनाता हे, चुनाव लड़वाता है तथा जनपद अथवा विधानसभा में पीठासीन करता हे। जल राशि का सूर्य व्यक्ति को चिकित्सक अथवा विज्ञानवेत्ता बनाता है। सामान्य तथा सप्तमस्थ सूर्य के होने से जातक की पत्नी प्रभावशालिनी, व्यवहारकुशल, आपत्तिकाल में साथ देनेवाली, धनप्रिया और दयालु होती है। मेष, सिंह, धनु ओर मीन का सूर्य हो तो व्यक्ति को अपमान सहन करना होता है। वृष, कन्या, मकर, कर्क ओर वृश्चिक का सूर्य आयु के पचास वर्ष तक सुखी तथा बाद में दुखी रखता है।
राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य सप्तम स्थान में हो तो जातक उग्र स्वभाव कारहता है। पत्नी सुंदर और अच्छी मिलती है। आर्थिक दृष्टि से जीवन समृद्धरहता है। सामाजिक जीवन में यश प्राप्त होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा केफल अल्प मिलते हैं।

    2. वृषभ वृषभ राशि का सूर्य सप्तम स्थान में हो तो जातक धनवान,संपन्न, सुखी, चरित्रसंपन्न रहता है। उसकी पत्नी सुंदर एवं सास का सम्मानकरनेवाली होती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के अच्छे फल प्राप्त होते हैं।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का सूर्य सप्तम स्थान में हो तो जातक का स्वभावदुराग्रही या जिद्दी एवं वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। धन-संपत्ति काफी रहतीहै। नौकरी की अपेक्षा व्यवसाय में अधिक प्रगति होती है। जातक को पशुपालनया डेयरी के व्यवसाय में अच्छा धन मिलता है। परंतु कोई भी कार्य बिना अड़चनके संपन्न नहीं होता। सूर्य की दशा-अंतर्दशा जातक की प्रगति करती है।

    4. कर्क कर्क राशि का सूर्य सप्तम स्थान में अच्छे फल नहीं देता। जातकका चरित्र अच्छा नहीं रहता, वैवाहिक जीवन खासतौर पर सुखी नहीं रहता। दोया अधिक विवाह की संभावना रहती है। जवानी में कुसंगति में फंसने का भयरहता है एवं जातक की मृत्यु परस्त्रीगमन के कारण या सांसर्गिक रोग के कारणअथवा किसी स्त्री के कारण या किसी स्त्री के हाथों होती है। जनता के लिएऐसा जातक दुखदायी रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अशुभ फल प्रदान करती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य सप्तम स्थान में होने पर जातक क्रोधी एवंउतावले स्वभाव का रहता है। कोई भी बात इसके पेट में नहीं पचती। सद्भावनहीं रहता, निष्ठुर रहता है। वैवाहिक जीवन कलहपूर्ण रहता है। पत्नी के साथप्रेम का बर्ताव नहीं रहता परंतु अन्य स्त्रियों पर जातक आसक्त रहता है। सूर्यदशा-अंतर्दशा कष्टकारक रहती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य सप्तम स्थान में हो तो जातक बातूनी, धैर्यवानएवं संपन्न रहता है। पशु एवं वाहन आदि का सुख भोगता है। संतान सुख मेंन्यूनता, पुत्र न होने की संभावना अधिक रहती है। पत्नी बहुत ही कामासक्तरहती है। जहरीले पदार्थ खाने की ओर जातक की वृत्ति होती है। वैवाहिक जीवनविशेष सुखी नहीं रहता। सूर्य की दशा-अंतर्दशा सामान्य फल देती है।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य सप्तम स्थान में हो तो जातक का विवाहनहीं होता या विलंब से होता है अथवा पत्नी की असमय मृत्यु होती है। संतानसुख में बाधा रहती है। यदि संतान हो तो वह आज्ञाकारी होती है। पत्नीशील-स्वभाववाली मिलती है। काफी संघर्ष के बाद प्रगति होती है। जातककुछ हद तक आलसी रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा का समय लाभदायकएवं सुखकारक व्यतीत होता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक रशि का सूर्य सप्तम स्थान में होने पर जातकबुद्धिमान एवं विद्या संपन्न रहता है किंतु कम बोलनेवाला, क्रोधी एवं ई्ष्यालुभी रहता है। पैतृक संपत्ति जातक के पास नहीं रहती है। यदि रहती है तोउस संपत्ति का वारान्यारा जातक द्वारा ही होता है। यह स्वपरिश्रम से धन कमाताहै। ससुराल पक्ष से सुख कम प्राप्त होता है या उनसे मधुर संबंध नहीं रहते।स्त्री की कुंडली में सप्तम स्थान में सूर्य होने पर सास-श्वसुर से उसकी अनबनरहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारण फल देती है।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य सप्तम स्थान में हो तो जातक रोगी रहता है।बचपन में बड़े कष्ट उठाने पड़ते हैं। आर्थिक दृष्टि से जीवन संपन्न लेकिनसंतान सुख का अभाव रहता है। पत्नी के बांझ होने की संभावना अधिक तथावैवाहिक जीवन दुखी रहता है। जातक का स्वयं का चरित्र अच्छा नहीं रहता,साथ ही मां का चरित्र भी संशयास्पद रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारणफल देती है।

    10. मकर-मकर राशि का सूर्य सप्तम स्थान में होने पर जातक उत्तमचिकित्सक बनता है, आर्थिक दृष्टि से जीवन संपन्न होता है लेकिन संतान सुखका अभाव रहता है। पत्नी के बांझ होने की संभावना रहती है जिससे वैवाहिकजीवन सुखी नहीं रहता। जातक का चरित्र अच्छा नहीं रहता। इसकी मां काचरित्र भी संशयास्पद रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारण फल देती है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का सूर्य सप्तम स्थान में रहने पर जातक को अपनेजीवन में कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। कई चढ़ाव-उतार देखने पड़ते हैं। जातकसंपन्न या संन्यासी रहता है। दांपत्य जीवन सुखी नहीं रहता। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा में सुख-लाभ प्राप्त होता है।।

    12. मीन मीन राशि का सूर्य सप्तम स्थान में होने पर जातक तीरंदाज,युद्धकला एवं शिकार में चतुर रहता है। वैवाहिक जीवन विशेष सुखी नहींरहता। पत्नी तो खर्चीली रहती ही है, स्वयं जातक भी दुर्व्यसन में खर्च करताहै और वेश्यालय, जुआघरों में ही समय बिताता है।

1. धरती के ईशान कोण में तांबा दबायें।
2. काले रंग की गाय की सेवा करें।
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8) अष्टम् भाव -     अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
अष्टम स्थान का रवि
इस भाव में सूर्य की उपस्थिति से व्यक्ति धैर्यवान, श्रैष्ठवक्ता, स्वाभिमानी, सुंदर, आकृति, कार्यतत्पर, चिंतायुक्त, क्रोधी, धनी, धैर्यहीन, च॑चल, विद्वानों का आदर करने वाला, व्यर्थ बोलने वाला, भाग्यहीन, शीलरहित, नीचसेवी, परदेशवासी, दीर्घायु अधीर तथा त्यागी स्वभाव का होता है। नशादि के अत्यधिक सेवन से उसका स्वास्थ्य चौपट हो जाता है, फिर भी गोरी स्त्रियों से रति करने को सदैव लालायित रहता है, उनका सामीप्य पाने को अधीर हो उठता है। सुरक्षित न रख पाने के कारण अपने धन से हाथ धोना पड़ता है। उसे बंधुवर्ग से अपमान तथा धोखा खाना पड़ता है। गंभीर विषयों में दक्ष होता है, पुत्रसुख की प्राप्ति होती है। उसे पित्तरोग, नेत्ररोग और क्षयरोग पीड़ित किए रहते हैं। उसके सिर में चोट भी लगती है। अनाप-शनाप खाने की वजह से उसे अजीर्ण तथा उदररोग रहते हैं। उसकी पत्नी भी प्राय: रेगग्रसित रहती है। उसे जननेंद्रिय-संबंधी रोग पीड़ित करते हैं। 
बैद्यनाथ - मनोभिरामः कलहप्रवीणः पराभवस्थे च रवौ न तृप्तः । सुंदर, झगड़े करने में प्रवीण, सदा असंतुष्ट होता है।
आर्यग्रंथकार - निधनगतदिनेश चंचलस्त्यागशीलः किल बुधगणसेवी सर्वदा रोगयुक्तः । विकलबहुलभाषी भाग्यहीनो विशालो रतिविहितकुलचैलो नीचसेवी प्रवासी ।। चंचल, त्यागी विद्वानों का सेवक, सदारोगी, विकल, बकबक करनेवाला, अभागा, बड़े शरीर का, व्यभिचारी, नीचों का सेवक, मैले कुचैल वस्त्र पहननेवाला, प्रवास करनेवाला होता है।
हिल्लाजातककार - चतुस्त्रिंशनमिते वर्षे स्त्रीनाशमष्टमो के ३४ वें वर्ष स्त्री की मृत्यु करता है। रविः। आयु
है।
यवनमत - परदेश में भूखाप्यासा से मारे मारे फिरना पड़ता बहुत भटकता है और दुखी होता है। -
राफेल पति या पत्नी बहुत खर्चीले होते हैं। मंगल की युती या पूरी दृष्टि हो तो आकस्मिक मृत्यु की संभावना होती है। मेरे विचार अष्टम स्थान को मूलतः नाश स्थान माना गया है, इसलिये इसके फल बुरे ही मिलते हैं ऐसी प्राचीन शास्त्रकारों ने कल्पना की है। ये फल मेष, सिंह और धनु में ही मिलते हैं। मिथुन, तुला और कुंभ मे कम मिलते हैं। स्त्री राशियों में साधारणतः अच्छे फल मिलते है। हिल्लाजातककार का मत अनुभव में नहीं आता। कुछ काल वियोग अवश्य होता रहता है।
जातक सक्रिय, त्यागी वृत्ति वाला, पंडितो का सम्मान करने वाला, रोगी, बहुत बातचीत करने वाला, काम वासना ग्रस्त, विदेश में बसनेवाला और नीच जाति वालों की सेवा करने वाला होगा।
-मानसागरी
ऐसा व्यक्ति धन व मित्रों से वंचित होता है। वह दृष्टि-दोष से पीड़ित, अल्पायु वाला और कभी-कभी अंधा भी हो सकता
फलदीपिका
जातक के नेत्रों में दोष, दरिद्र, खिन्न, अल्पायु और संबंधियों से अलग थलग होता है।
- सारावली
जातक अल्प संतति, 10 वर्ष की आयु में नेत्र दोष से पीड़ित, सिर में चोट (यदि कोई शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तब), कम संपत्ति वाला, गाय-भैंसों की हानि, दीर्घ रोगों से पीड़ित और प्रसिद्ध होगा। यदि सूर्य स्वगृही या उच्चस्थ हो, तो वह चिंरजीवी होता है।
- भृगु
जातक दीर्घायु, उदारता रहित, रोगी शरीर, नेत्ररोग से पीड़ित, ज्योतिषी, अचानक लाभ, सिर में फोड़ें, दरिद्र और साधारण जीवन जीने वाला होगा।
टिप्पणी
-डॉ रमन
अष्टम भाव में पाप ग्रहों की स्थिति अपेक्षित नहीं होती। सूर्य भचक्र के पंचम भाव का स्वामी और नेत्र का प्रतिनिधि है। सूर्य से राजसी खुशियों या लाभ का भी पता चलता है। अष्टम भाव (जो कि हानि पीड़ा बाधाओं का द्योतक है) में सूर्य की स्थिति अच्छी नहीं होती। इससे दीर्घकालीन रोगों से कष्ट होना भी बताया जाता है।जातक का विदेशी महिला से संबंध, चोरी के कारण धनहानि, सुदर्शन व्यक्तित्व, बवासीर से पीड़ित, मंद नेत्र ज्योति और शारीरिक दबावों से ग्रस्त हो सकता है। डॉ रमन के अतिरिक्त सभी के मतानुसार जातक अल्पायु होगा।

मेरा अनुभव - मिथुन, कर्क, धनु और मीन इन राशियों में सावधान अवस्था में मृत्यु होती है। मेष, सिंह में झटके से मृत्यु हो जाती है। अन्य राशियों में दीर्घकालीन बीमारी से तकलीफ होकर मृत्यु होती है। पुरूष राशि में रवि हो तो घर की गुप्त बातें जो दूसरे न जानें ऐसी इच्छा होती है, परन्तु नौकर या स्त्री के द्वारा दूसरे जान लेते हैं। स्त्री खर्चीली होती है। उसके सिर और शरीर में तकलीफ होती है। पुरुष राशि के रवि में स्त्री पैसे के लिये, पति को बढ़ती दिलाने के लिये या अपना काम बनाने के लिये परपुरुषगमन करती है ऐसा मेरा मत है। अष्टम का रवि स्त्री के पहले मृत्यु कराता है जब कि धनस्थान का रवि स्त्री के बाद मृत्यु कराता है। इस रवि से वृद्धावस्था में दरिद्रता होती हैं। रवि स्त्री के बाद मृत्यु करता है। इस रवि से वृद्धावस्था में दरिद्रता होती है। रवि के ही समान इसके भाग्य का भी अस्त होता है। यह स्थिति ५० वें वर्ष के पश्चात की है। स्त्री राशि के रवि में संतति बहुत होती है। पुरुश राशि में बिलकुल कम होती है। पूर्व आयु शारीरिक कष्ट अधिक होते है। पैतृक संपत्ति नष्ट होती है। ससुर गरीब होता है। इस रवि के कारण खुद पाप नहीं करता, दूसरों का पाप सहन नहीं करता और व्यसन में नहीं डूबता ।

    अष्टम स्थान में स्थित सूर्य जातक को परिश्रमी बनाता है। जिस काम में मेहनत अधिक करनी पड़ती है, ऐसा काम करके जातक जीवन निर्वाह करता है।शारीरिक दृष्टि से अष्टम स्थान का सूर्य कष्टदायक रहता है। बवासीर एवंयौन-संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं। ऐसा जातक झगड़ालू, असंतुष्ट एवं नशोड़ीहोता है। धनसंग्रह विशेष नहीं हो पाता। चोरी आदि के कारण आर्थिक नुकसानहोता है। अन्य देश, अन्य स्त्रियों के साथ गुप्त संबंध रहते हैं। जातक का तस्करीसे संबंध रहता है। वह परदेश में रहकर जीवनयापन करता है। पत्नी भी खर्चीलीरहती है। 24वें वर्ष में जीवन में साझीदार को कष्ट होते हैं। आंखें कमजोररहती हैं। संतान कम रहती है। दुनिया में प्रसिद्धि होती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशामें कोई-न-कोई समस्या खड़ी होती है।

अष्टम भाव-आठवें भाव का सूर्य जातक को तुनकमिजाज (शीघ्र क्रोधित हो जाने वाला/चिड़चिड़ा) बनाता है। जातक धनवान तो होता है परन्तु अधीर व स्थूल बुद्धि होता है। यदि सूर्य षष्ठेश होकर अष्टमस्थ है तो जातक न्यायप्रिय किन्तु हिंसक व नेत्रविकारी होता है। यदि आठवां सूर्य स्वराशि या उच्च का हो तो असावधानी से जातक की मृत्यु की सम्भावना भी बनती है। प्रायः ऐसे जातक के पिता की मृत्यु जल्दी हो जाती है। यदि किसी शुभ योग से बचाव न होता हो तो (क्योंकि आठवां भाव नौवें से बारहवां है यानी स्व्ैैम्ै का है और सूर्य तथा नौवां भाव पिता का कारक होता है।)

     लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक एक तपस्वी राजा की भांति होता है। ऐसा जातक यदि दुश्चरित्र हो जाए तो उसे और उसके उत्तराधिकारियों को भी अशुभ फल भोगने पड़ते हैं। ऐसा जातक यदि अपने भाई-बहनों या खून के सम्बन्धियों का बुरा सोचे या उनके साथ बुरा करे तो परिणाम स्वयं जातक को बुरा भोगना पड़ता है। अष्टम स्थान (मत्यु, भाव)

अष्टम स्थान में स्थित सूर्य जातक को परिश्रमी बनाता है। जियअधिक करनी पड़ती है, ऐसा काम करके जातक जीवन निर्वाह शारीरिक दृष्टि से अष्टम स्थान का सूर्य कष्टदायक रहता है। यौन-संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं। ऐसा जातक झगड़ालू, असंतर होता है। धनसंग्रह विशेष नहीं हो पाता। चोरी आदि के कारण आदि होता है। अन्य देश, अन्य स्त्रियों के साथ गुप्त संबंध रहते हैं। जात से संबंध रहता है। वह परदेश में रहकर जीवनयापन करता है। पत्नी, रहती है। 24वें वर्ष में जीवन में साझीदार को कष्ट होते हैं। आंखें रहती है। संतान कम रहती है। दुनिया में प्रसिद्धि होती है। सूर्य की दर में कोई-न-कोई समस्या खड़ी होती है। जिस कामम मेहनत निर्वाह करता है। जाता है। बवासीर एवं असंतष्ट एवं नशेडी कारण आर्थिक नुकसान करते हैं। जातक का तस्करी । पली भी खचीली-है। आंखें कमजोर सर्य की दशा-अंतर्दशा

     यदि वृश्चिक, मकर, कुम्भ या तुला राशि का सूर्य आठवें घर में हो तो जातक लम्बे रोग भोगकर मरता है। पुरुष राशि का सूर्य हो तो दृष्टिमंद, गुप्तरोग व सन्तान सुख अल्प रहता है।

अष्टम भाव: अष्टम भावस्थ सूर्य के मूलतः अशुभ फल ही मिलते हें। इसका यह भी कारण हो सकता है कि अष्टम स्थान को नाश-स्थान माना गया है। अष्टमस्थ सूर्य पुत्र-सुख में कमी, पति या पत्नी अर्थात जीवन-साथी का व्ययशील होना, नेत्र रोग से पीड़ा या सिरदर्द जेसे फल देता है। अनुभव में बुरे फल अग्नि राशि में अधिक मिलते हैं जबकि वायु राशि में कुछ कम मिलते हैं। मिथुन-कर्क, मीन-धनु राशि में सूर्य हो तो जातक की मृत्यु असावधानी से होती है। मेष और सिंह राशि में होने पर आकस्मिक मृत्यु एवं अन्य राशियों में हो तो दीर्घकालीन रोग के कारण मृत्यु होती है। स्त्री राशि में सूर्य हो तो प्राय: अच्छे फल मिलते हैं। पुरुष राशि का सूर्य हो तो घरेलू भेद नौकरों के द्वारा दूसरे लोग जान लेते हैं, स्वयं के जीवनसाथी के द्वारा भी घर की बातें बाहर चली जाती हैं। इसमें मुख्य कारण जीवनसाथी का पथश्रष्ट होना होता है। जीवनसाथी से पूर्व मृत्यु होती है। अष्टमस्थ सूर्य जातक को वृद्धावस्था में विपन्न बना देता है। जैसे प्रात:काल सूर्योदय होकर सायंकाल में अस्त होता है, वैसे ही जातक का भाग्य भी सो जाता है।

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक ईश्वरभक्तहोता है। आर्थिक स्थिति साधारण रहती है। जुएं या अन्य व्यसनों में पैसा खर्चकरता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारण फलदायी होती है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक समाजमें प्रतिष्ठित होता है, किंतु उसके दुश्मन बहुत होते हैं। बिना श्रम के इसे दूसरों की संपत्ति प्राप्त होती है, आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है और कोर्ट-कचहरीमें समय व्यतीत होता है। पत्नी सुंदर प्राप्त होती है, स्वयं कामातुर रहता है।सूर्य की दशा-अंतर्दशा अशुभ रहती है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक कुटिलस्वभाव का, अविश्वसनीय, कपटी, तस्करी, व्यापार, चोरी आदि घृणित कर्मकरनेवाला और हमेशा चिंतित रहता है। इसकी आर्थिक स्थिति मध्यम रहतीहै, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता एवं माता से अनबन रहती है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक झूठा,अविश्वसनीय, क्रूर, हिंसक, नास्तिक, परधर्म में आसक्त एवं नपुसक रहता है।उन्नति में कई बाधाएं आती हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा शुभ फल प्रदान करती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य अष्टम स्थान में हो तो जातक मृदुभाषी परंतुहृदय से अशुद्ध होता है। कपट एवं धूर्तता से काम करनेवाला किंतु समाज मेंप्रतिष्ठित रहता है। जातक की पत्नी का चरित्र अच्छा नहीं होता। नौकरी कीअपेक्षा व्यवसाय फायदेमंद रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अच्छे फल नहीं देती।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक क्रोधी होता     है। उसकी पत्नी गुस्सैल और अल्पायु होती है। वैवाहिक सुख प्राप्त नहीं होता।परस्त्रियों से संबंध बनते हैं। कई बार ऐसे जातक विवाह ही नहीं करते। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा मारक फल देती है।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक क्रूर, हिंसाप्रियएवं निर्दयी रहता है, दुश्मन बहुत रहते हैं। जातक को संग्रहणी रोग होता है,सर्प एवं जहर का भय रहता है और पत्नी रोगी होती है और जातक से पहलेइसकी मृत्यु होती है। जातक कामुक एवं परस्त्री में आसक्त रहता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा कष्टकारक होती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातकअविश्वसनीय, क्रोधी किंतु संपन्न रहता है। इसके मित्र बहुत रहते हैं और पेटकी बीमारी होती है। जातक कटुभाषी, कपटी एवं दुर्व्यसनी रहता है। संतानएवं भाई-बहन अपंग होते हैं। स्त्री सुख में कमी रहती है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक दीर्घायु रहताहै लेकिन इसका जीवन सुखी नहीं रहता। पिता का सुख एवं पैतृक संपत्तिअल्प मात्रा में मिलती है। उसे अपने जीवन में परिवार के कई लोगों की मृत्युदेखनी पड़ती है, बाद में स्वयं की भी मृत्यु हो जाती है। ऐसे जातक मेंआत्मघात करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। यह स्वयं अपने हाथों अपना हीनुकसान कर बैठता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।

10. मकर-मकर राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक को राज्यशासन से गंभीर कष्ट सहन करने पड़ते हैं। चोरी, दुराचार, व्यभिचार जैसे कृत्योंके कारण जातक दंडित होता है। यहां तक कि मृत्युदंड की सजा भी हो सकतीहै। बचपन कष्टदायक होता है। आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है, स्वभाव क्रोधीरहता है। जातक को भाई-बहनों का सुख प्राप्त नहीं होता, साथ ही पत्नी केसुख से भी वंचित रहना पड़ता है। जन्म से आठ वर्ष तक का समय खराबरहता है। हाथ में कोई विकार उत्पन्न होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अशुभफलदायी रहती है।

    11. कुभ-कुंभ राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक निष्दुर एवंझगड़ालू होता है। इसे सहज ही में गुप्त धन प्राप्त होता है। भाई-बहनों के सुख से वंचित रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा मध्यम फलदायी होती है।

    12. मीन मीन राशि का सूर्य अष्टम स्थान में होने पर जातक कंजूस, चोर,गुस्सैल, जुआखोर एवं व्यभिचारी रहता है। बचपन में काफी कष्ट झेलने पड़ते हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल अच्छे मिलते हैं।

1. सूर्य अर्थ देवे।
2. तांबे का लौटा शक्कर भरकर दान करें।
3. नया कार्य या यात्रा से पहले मुंह मिठा करें।
4. बिमार व्यक्ति से दूर रहे।
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 9) नवम् भाव -     नवम स्थान (भाग्य भाव)
नवम स्थान का रवि
इस भाव में सूर्य के स्थित होने से व्यक्ति तपस्वी, योगी, नेता, राजनेता, ज्योतिषी, सत्यवक्ता, सुंदर केशों वाला, परिजनों का हित करने वाला, देव और ब्राह्मणों का भक्त होता है। ऐसा व्यक्ति दुष्ट प्रकृति का होता है। उसके पिता की आयु अधिक होती है, साथ ही पिता से उसके वैचारिक मतभेद रहते हैं। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य-चिंता, साहसी, उत्तम, पोत्र-सुख, अत्यंत महत्त्वाकांक्षी, प्राय: सभी से सुंदर व्यवहार पाने का इच्छुक, ज्ञानार्जन-क्षमता श्रेष्ठ, स्वार्थों के प्रति सदैव सावधान रहने वाला होता है। ५० और ५५ वर्ष के बीच हिस्सेदारों से झगड़े-झंझट का योग है। बाल्यावस्था में उसका रोगी रहने का कारण, इस भाव में सूर्य का अशुभ प्रभाव होता है। पिता के रोगी रहने का कारण भी यही है। 

बैद्यनाथ - आदित्ये नवमस्थिते पितृगुरुद्वेषी विधर्माश्रितः । पिता और गुरूजनों का द्वेष करनेवाला और धर्मान्तर करनेवाला होता है।
आर्यग्रन्थकार
ग्रहगतदिननाथे सत्यवादी सुकेशी कुलजनहितकारी देवविप्रानुरक्तः । प्रथमवयसि रोगी यौवने स्थैर्ययुक्तो बहुतरधनयुक्तो दीर्घजीवी सुमूर्तिः ।। सत्य बोलनेवाला, केश अच्छे, कुल और संबंधियों का हित करनेवाला, ईश्वर और साधुओं का भक्त, बचपन में रोगी, जवानी में मजबूत, बहुत धनी, दीर्घायु वाला और सुंदर होता है।
हिल्लाजातककार - आयु के १० वें वर्ष में तीर्थयात्रा और धर्म कृत्य कराता है।
यवनमत - विख्यात, सुखी, देवभक्त, मामा का सुख पानेवाला होता है।
राफेल - स्थीर, सन्माननीय, न्यायी, ईश्वरभक्त, बर्ताव में अच्छा, जलराशि में हो तो सागर पर्यटन (परदेशगमन) करनेवाला होता है।
जातक सत्यवक्ता, सुंदर केशों वाला, परिवार की देख रेख करने वाला, देवताओं व ब्राह्मणों का सम्मान करने वाला, बचपन में रोग ग्रस्त,
युवावस्था में गंभीर, समृद्ध व सुदर्शन होगा।
-मानसागरी
जातक को पिता का वियोग परन्तु संतानकष्ट नहीं, भगवान और ब्राह्मणों का आदर सत्कार करने वाला और मित्रो के प्रति सहृदयता रखने वाला होगा।
-फलदीपिका
जातक समृद्ध और बहुत संतान व मित्रों वाला, देवताओं व ब्राह्मणों का सम्मान करने वाला, पिता व पत्नी के साथ कटु संबंध वाला और असंतुष्ट होगा।
-सारावली
जातक सूर्यादि देवताओं की पूजा करने वाला लेकिन भाग्यशाली नहीं, पिता के प्रति शत्रुता रखने वाला, सूर्य के स्वगृही या उच्चस्थ होने पर पत्नी व बच्चों वाला और चिरंजीवी पिता की संतान होगा
- भृगु
जातक ज्योतिर्विज्ञान का जानकार, धार्मिक, पुण्यकर्ता, भाग्यवान, महान आदर्शों के प्रति आकर्षक, सफल, समर्पित, कर्तव्यनिष्ठ पुत्रों का पिता, साधारण स्वास्थ्य वाला, स्वार्जित संपत्ति वाला, दार्शनिक मनोवृत्ति काव्य-संगीत का प्रेमी, प्राच्य व गूढ़ विधाओं का ज्ञाता, महत्वाकांक्षी ओर उद्यमशील होगा।
वाला,
टिप्पणी
- डॉ रामन
सूर्य (आत्मा) नवम में लग्नेश का फल दर्शाता है, दशमेश नवम में होने से जातक अपने कर्म से भाग्य बनाने वाला, स्वतंत्र विचार वाला तथा उच्चपदाभिलाषी होगा।

जातक चतुर, पुण्यकर्म करने में रूचि वाला, अल्पायु में पितृ-स्नेह से वंचित और सदाचारी संतान वाला हो सकता है।
कारको भावनाशयः विद्वानों ने नवम भाव में सूर्य की स्थिति को पिता के लिए अशुभ माना। मानसागरी और डॉ रामन का इस विषय में कोई कथन उपलब्ध नही परन्तु भृगु नवमस्थ सूर्य को प्रशंसनीय कहते है। अतः कोई भी ज्योतिषी केवल एक ही सिद्धांत के आधार पर कोई निणर्य नही ले सकता। (भाव, स्थिर व चर कारक) भावात् भावम् (अर्थात् अभीष्ट भाव से उतना ही आगे वाले भाव तक), कारक से भाव और वर्गों में भावों की स्थिति की जाँच, स्थिति, दृष्टि व युति का विचार किसी भी तरह के निर्णय पर पहुँचने से पहले आवश्यक है। तात्कालिक दशा तथा गोचर घटना के घटित होने के 'समय निर्धारण' में प्रभावी भूमिका निभाते है।

मेरा अनुभव - यह रवि मिथुन, तुला और कुंभ का हो तो छोटा भाई नहीं रहता। २२ वे वर्ष तक उसकी मृत्यु हो जाती है। शायद सभी राशियों में यह होगा। मृत्यु नहीं हुई तो दोनों में पटता नहीं। समझौता करके अलग हो जाते हैं। एक जगह रहे तो दोनों में किसी एक का ही उदय होता है। संसार का भार जल्दी उठाना पड़ता है। पिता को अकेला ही पुत्र होता है। इसको पुत्र संतति कम होती है। ग्रंथकार की तो ग्रंथ ही संतति होती है। धर्म याने क्रियाकांड में रूचि नहीं होती। संस्कृति के बारे में प्रेम रहता है। स्वभावतः इस स्थान से स्त्री के धर्म या जाति का पता चल सकता है। आजकल विवाह में जाति और धर्म के बंधन बहुत कम हो रहे हैं। इसलिये इस रवि पर से स्त्री दूसरी जाति की या आयु में अधिक होने से रजिस्टर विवाह होगा। इस बारे में ज्योतिषी लोगों को सोचना चाहिये, इसकी पितासे बनती नहीं। लोगों में मिलनसार स्वभाव नहीं होता। अभिमानी किंतु समय पर दुसरों को खुद मदद करनेवाला होता है। अधिक शिक्षा न होने पर भी सुशिक्षित जैसा मालूम पड़ता है। आयु के ४२ से ५४ तक भाग्योदय होता है। बाद में हानि होती है। पूर्व आयु में तकलीफ, बीच में सुख, उत्तर आयु दुख ऐसा इस रवि का फल है। मिथुन, तुला, व कुंभ में यदि रवि हो तो प्रोफेसर, लेखक या प्रकाशक होता है। कर्क, वृश्चिक और मीन में हो तो रसायन विद्या का संशोधन, कवि या नाटककार होता है। वृषभ, कन्या और मकर में हो तो खेती, व्यापार या किसी लॉज का चालक बनता है। मेष, सिंह और धनु में हो तो सेना में या इंजीनियर होकर काम करता है। इस स्थान का रवि कुछ न कुछ ख्याति देता है।


    कुंडली में नवम स्थान में सूर्य हो तो जातक स्वतंत्र विचारों का, उद्यमीएवं परिश्रमी होता है और समाज में नाम कमाता है। इसे ननिहाल में अच्छासुख मिलता है। भाई-बहनों के साथ इसके संबंध मधुर नहीं रहते। बचपनमें स्वास्थ्य कुछ कमजोर रहता है। उम्र के दसवें वर्ष में तीर्थयात्रा का योगबनता है या कोई धार्मिक कार्य संपन्न होता है। पिता से अनबन रहती है। बचपनसुख-शांति से व्यतीत होता है। जातक स्वपुरुषार्थ से उन्नति करता है और धर्ममें इसकी रुचि कम रहती है यहां तक कि धर्मातरण करने की नौबत भी आतीहै। आचरण शुद्ध रहता है, किंतु स्वभाव बड़ा जिदूदी होता है। हटीलेपन केकारण यह बड़े-बड़े काम करता है किंतु मानसिक शांति बहुत ही कम प्राप्तहोती है।

नवम भाव-लग्नकुंडली में सूर्य नौवें भाव में हो तो जातक चरित्रवान, व्यवहारकुशल, साहसी, वाहनसुखी (भले ही अपना वाहन न हो) तथा बहुत से सेवकों वाला होता है। ऐसा जातक योगी, नेता या ज्योतिषी भी हो सकता है। परन्तु अपने पिता के लिए जातक विशेष कष्टकारी होता है। जातक प्रायः दीर्घायु होता है। भाइयों से संतप्त रहता है।

     लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक अपने खानदान के लिए अपना सब कुछ खर्च कर देता है और बदले में कोई आशा नहीं रखता। ऐसे जातक के जन्म के बाद परिवार में खुशहाली आ जाती है। उसके जन्म से पूर्व प्रायः परिवार बदहाल होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जातक का भाग्य अच्छा होता है।

नवम भाव: नवम भावस्थ सूर्य के मिश्रित फल अनुभव में आते हैं। कुछ प्राचीन दैवज्ञों ने नवम भावस्थ सूर्य के शुभ फल बतलाए हैं। इसके पीछे शायद उन्होंने नवम भाव का शुभ होना माना है। नवमस्थ सूर्य व्यक्ति को धार्मिक प्रवृत्ति का तो बनाता है लेकिन भाग्यशाली नहीं बनता। पिता से उसका 

बैमनस्य रहता है। सूर्य उच्चस्थ अथवा स्वराशिस्थ हो तो पिता दीर्घायु होता 

है। 

मिथुन, तुला अथवा कुम्भ राशि का सूर्य नवमस्थ हो तो व्यक्ति लेखन, प्रकाशन, मुद्रण अथवा अध्यापन के क्षेत्र में प्रगति करता है। जल राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) का सूर्य हो तो व्यक्ति कविता कहने वाला, नाट्यकला में प्रवीण अथवा रसायन विद्या का जानकार होता है। पृथ्वी तत्त्वीय राशि में हो तो कृषि या कृषि संबंधी व्यवसाय करता है। अग्नि राशि का सूर्य व्यक्ति को सैनिक अथवा इन्जीनियर (अभियंता) बना देता है। नवमस्थ सूर्य किसी भी राशि का हो तो व्यक्ति को अपने बलानुसार ख्याति अवश्य देता है। 


    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर जातक भाग्यवान, समाजमें प्रतिष्ठित, तीव्र बुद्धि का एवं विचारक होता है। मरणोपरांत भी इसका नामरहता है। धार्मिक नेता, राजनीतिज्ञ, लेखक या सुधारक बनता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा का काल राजसम्मान देनेवाला, विदेश यात्रा करानेवाला एवंजीवन में संपन्नता प्रदान करनेवाला होता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर जातक स्वार्थी होताहै। भाई एवं पिता से इसका बैर रहता है। आर्थिक स्थिति साधारण रहती है क्योंकिवह खर्चीला होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारण फलदायी होती है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर जातक चतुर,विद्वान, विवेकी, नास्तिक, भाइयों के सुख से वंचित रहता है। अचानक लाभमिलते रहते हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा धन देती है।

    4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर जातक सच्चरित्र,विवेकी, संपन्न, सुखी एवं धर्म-श्रद्धालु रहता है। भाइयों से मधुर संबंध रहतेहैं। नौकरी की अपेक्षा व्यवसाय में अच्छा धन कमाता है। सूर्य कीदशा-अंतर्दशा के फल अच्छे प्राप्त होते हैं। नवम स्थान में सूर्य के साथ चंद्र हो तो सूर्य के दशाकाल में श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं।

    5. सिंह-सिंह राशि का सूर्य नवम स्थान में होने से महत्त्वपूर्ण राजयोगबनता है। यश, उच्च सम्मान एवं संपन्नता का योग देता है। सिंह राशि केसूर्य के साथ बुध भी हो तो यह ‘बुधादित्य योग' बनता है। मानो यह कपिलाषष्टी का ही योग हो। सूर्य की दशा-अंतर्दशा जीवन में सर्वोत्तम फलदायी होतीहै।

    6. कन्या-कन्या राशि का सूर्य नवम स्थान में हो तो जातक ईर्ष्यालु,चरित्रहीन, आचरणहीन, कुसंगति, विवेकहीन, नास्तिक एवं निष्दुर होता है।मुख पर प्राकृतिक विकार होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में दिक्कतें एवं संकटखड़़े होते हैं।

    7. तुला-तुला राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर जातक आलसी रहताहै। एक ही समय में यह अनेक काम शुरू कर देता है और वे कार्य अधूरेही छोड़ देता है। जातक कामातुर रहता है और जवानी में कुसंगति में पड़करअपना पुरुषत्व गंवा बैठता है। एक से अधिक स्त्रियों से इसके संबंध रहतेहैं। नास्तिक होता है, शिल्पशास्त्र में प्रवीण रहता है। बार-बार यात्राएं करनीपड़ती हैं। विवाह के बाद हालात सुधरते हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा कष्टकारकरहती है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर जातक निष्टुर एवंआचरणहीन रहता है। समाज में उसे स्थान नहीं मिलता। संतान एवं भाइयों के सुखमें न्यूनता रहती है। आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहती है। कोर्ट-कचहरी एवंवाद-विवाद अधिक होते हैं। जन्म से ही पैरों में विकार रहता है या बाद में जख्मके कारण विकार पैदा होता है। ईटें, लकड़ी, कोयले की खरीद-फरोख्त से जीवननिर्वाह चलता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल अशुभ प्राप्त होते हैं।

    9. धनु-धनु राशि का सूर्य नवम स्थान में होने पर निश्चित रूप से अच्छेफल प्राप्त होते हैं। ऐसा जातक तीव्र बुद्धि का, समाज एवं सरकारी कर्मचारी,यशस्वी, संपन्न, लेखक, सुधारक एवं नेता बनता है। यह अपने घराने का प्रमुखरहता है। संतान भाग्यवान होती है। जातक तर्कशास्त्र, न्यायशास्त्र, गणित, नाटकमें रुचि रखता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा फलदायक रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का सूर्य नवम स्थान में हो तो जातक सुखी,अधिकारसंपन्न एवं भ्रमणप्रिय होता है। जन्म स्थान से दूर रहता है। उत्तराधिकारमें पैतृक संपत्ति बड़े परिमाण में मिलती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अच्छीफलदायी नहीं होती है।

    11. कुभ-कुंभ राशि का सूर्य नवम स्थान में हो तो जातक के पिता कासामाजिक स्थान एवं आचरण निम्न श्रेणी का ही रहता है, किंतु जातकस्वपराक्रम से उन्नति करता है। परिवार एवं भाइयों के सुख में न्यूनता रहतीहै। जातक को स्त्रियों से संबंधित वस्तुओं के व्यापार में मुनाफा होता है। सूर्यकी दशा-अंतर्दशा का सामान्य फल प्राप्त होता है।

    12. मीनमीन राशि का सूर्य नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, विद्वान,गुणवान, समाज में प्रतिष्ठित एवं विदेशों में रहनेवाला होता है। बचपन मेंस्वास्थ्य ठीक नहीं रहता परंतु आगे चलकर ठीक हो जाता है। जातककी दिखावा करने की आदत रहती है लेकिन कंजूस होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं। 

 1. हल्दी की सब्जी न खावें।
 2. चावल अंधेरे में न रखें।
 3. तांबे का सिक्का पानी में बहावें।
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10) दशम् भाव -दशम स्थाम (कर्म भाव ) 
दशम स्थान का रवि
जिसकी कुंडली के दसवें भाव में सूर्य विद्यमान है, वो ठिगने कद का होता है और संगीत में उसकी विशेष रुचि होती है; माता को कष्ट पहुंचाने वाला, स्वजनों से बिछुड़ा रहने वाला, व्यवहार-कुशल, राज्यमान्यता प्राप्त, राज्यमंत्री, उदार, ऐश्वर्यवान्‌, सर्वाधिक प्रचलित सिद्धांतों पर चलने की आदत वाला, तेजस्वी, साफ-सुथरे घर का प्रेमी, नौकर-चाकरों पर आश्रित तथा कभी-कभी एकांतवास कौ चाहता करने वाला होता है। साथ ही प्रतापी, व्यवसायकुशल, साहसी, शूरवीर तथा पितृसुख व घन का लाभ पाने वाला होता है। वृद्धावस्था में प्राय: रोगी रहता है। अर्थात्‌ नेत्र तथा उदर-संबंधी रोग से ग्रस्त रहता है। उसे हृदय-संबंधी रोग भी होते हैं। 


बैद्यनाथ-मानस्थिते दिनकर पितृवित्तशीलविद्यायशोबल-
युतोवनि पालतुल्यः । पैतृक संपत्ति का उपभोक्ता, विद्यासंपन्न, कीर्तिमान, बलवान, राजा जैसा ऐश्वर्यशाली होता है।
आर्य ग्रंथकार दशमभुवनसंस्थे तीव्रभानौ मनुष्यो गुणगणसुखभागी दानशीलोभिमानी। मृदुलद्युशुचियुक्तो नृत्यगीतानुरागी नरपतिरतिपूज्यः । शेषकले च रोगी ।। गुणवान, सुखी, दानी, अभिमानी, कोमल, पवित्र, नाचगानों का शौकीन, राजा जैसा संपन्न, पूज्य और उत्तर आयु में रोगी होता है।
हिल्लाजातककार - एकोनविंशद्दशमें वियोगः । दशम के रवि से १९ वें वर्ष में वियोग होता है।
यवनमत- धनवान, शीलवान, मानी, खुशमिज़ाज, वाहनसंपन्न, विख्यात और धूर्त होता है।
जातक पुण्यवान व गुणी, सदाचारी, प्रसन्नचित्त, दानशील, गर्वीला, दयालु, नृत्य-संगीत का शौकीन, राजा की तरह आदेश देने वाला तथा
वृद्धवस्था में रोग ग्रस्त होगा।
-मानसागरी
व्यक्ति समृद्ध, सुदृढ़, प्रसिद्ध, सदाचारी, बुद्धिमान, अनेक पुत्रों वाला, वाहन सुख पाने वाला व अपने शुभ आचरण के कारण प्रशंसा का पात्र होगा।
-फलदीपिका
जातक के बहुत संबंधी व पुत्र होगें। काम को सफलता पूर्वक निपटाने वाला, वीर, महान और योद्धा, अजेय, बुद्धिमान, सम्पन्न, सुदृढ़ तथा वाहनों से युक्त होगा।
-सारावली
जातक 18 वर्ष की आयु तक शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि पाने वाला, प्रसिद्ध और योग्य विद्वान होगा।
- भृगु
व्यक्ति साहसी, लोकप्रसिद्ध, धनार्जन में चालाक, साहसी, स्वस्थ, विद्धान, सुशिक्षित, शीध्र निर्णय लेने वाला, संगीत प्रेमी और संस्थाओं की स्थापना करने वाला, कतर्व्यनिष्ठ पुत्रों का पिता, अधिक व्यक्तिगत प्रभाव वाला और सफल सैनिक या राजनीतिक जीवन (कैरियर) वाला होगा। -डॉ रामन
टिप्पणी
दशम भाव में सूर्य दिग्बली होता है। दशमस्थ सूर्य गंगास्नान का अवसर प्रदान करता है। जातक अनुशासित, कर्तव्यनिष्ठ, अपने मान-सम्मान के प्रति जागरूक तथा शासक या आदेशात्मक प्रवृत्ति वाला हो जाता है। भचक्र का पंचमेश सूर्य जातक की कुण्डली में दशमभाव में होने पर राजयोग बनाता है। जिस कारण उसे नाम, प्रसिद्धि, सफलता आदि मिलती हैं। परन्तु इस प्रकार के फल के लिए सूर्य किस राशि में है और उस पर अन्य ग्रहों के प्रभावों आदि का भी ध्यान करना होगा। किसी-किसी को उच्चपदस्थ या प्रतिष्ठित अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त होता है। यह जीवन में सरकारी कामकाज और दूतावासों में सफलता पाता है। वह राजा की तरह प्रशंसा व सम्मान प्राप्त करता है। वह साहसी, स्वस्थ और रोगमुक्त जीवन-यापन करता है।

मेरा अनुभव - इस स्थान का रवि मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु इन राशियों में हो तो रेव्हेन्यु, पुलिस, सेना या आबकारी विभाग में या खुफिया पुलिस में काम करता है। किंतु शस्त्र के स्थान पर कलम से काम लेना पड़ता है, मतलब यह कि ऑफिस का ही काम करना होता है। वृषभ, कन्या, मकर, मीन, मिथुन इन राशियों में रवि हो तो राज्यपाल या राष्ट्रपति के मंत्रियों में और संसद या विध नसभा में स्थान मिलता है। व्यापारी भी हो सकता है। तुला में हो तो जज, सॉलिसिटर, बैरिस्टर आदि सम्मान के पद मिलते हैं। वृश्चिक में हो तो डॉक्टर भी हो सकता है। खुद के श्रम से ही तरक्की होती है। अपने विभाग में तो प्रसिद्ध होता ही है। पिता का सुख कम होता है। उसकी मृत्यु नहीं हुई तो झगड़े होते हैं। स्वभाव से उदार किंतु घमंड़ी, झगड़ालू और विषयासक्त होता है। मैं दशम में रवि को दुर्भाग्य दर्शक मानता हूं, क्योंकि इससे अंतिम समय अच्छा नहीं जाता। ये लोग जिस तरह जल्दी तरक्की पाते हैं उसी तरह भाग्य शिखर से नीचे भी गिरते हैं। जिस तरह सिरपर का रवि खूब तेजस्वी किंतु नीचे की ओर जाता है उसी तरह इनका भी भाग्य अवनति को प्राप्त होकर नष्ट होता है और वृद्धावस्था में भयानक शरीर कष्ट, दरिद्रता, झगड़े ये फल मिलते हैं। तुला के रवि से पेन्शन सुख से मिलती है। वही मेष के रवि से गैर कानूनी होता है। इससे बचपन में तकलीफ, मझली आयु में सुख और लोकप्रियता प्राप्त होती है। लोगों को हितकर किंतु धन की दृष्टि से हालत नीची ऊंची होती रहती है। आयु के २२ वे वर्ष से उद्योग करता है। हिल्लाजातककार ने १९ वे वर्ष में वियोग ऐसा संदिग्ध फल कहा है। किसी ग्रंथकर्ता ने इसका अर्थ परदेश की सैर किया है जो गलत है। इस वर्ष में पिता की मृत्यु देखने में आई है। इससे मालूम होता है कि इसकी कमाई और दौलत का उपभोग पिता नहीं कर सकता। २८ वे वर्ष तक माता का वियोग होता है। ३२ से ४८ वे वर्ष तक धंधे में मजबूती किंतु बाद में वह नहीं रहती। आयु के अंतिम भाग में पत्नी मर जाती है।

दशम स्थान में स्थित सूर्य आमतौर पर अच्छे फल प्रदान करता है। जातक के पिता की आर्थिक स्थिति उत्तम रहती है। पैत॒क संपत्ति बडे पैमाने पर मिलती है। स्वास्थ्य अच्छा रहता है, शिक्षा पूर्ण होती है, खुद्धि प्रर्थवर रहती है और सम्राज में प्रतिष्ठा मिलती है। जातक अधिकार संपन्न होता है। माता के सुख में न्यूनता  रहती है। उम्र के 19वें वर्ष में घर में कोई दुखद घटना घटती है। नृत्य-गायन कला आदि में रुचि रहती है। जातक गुणयान रहता है, पर उतना ही धूर्त भी होता है। मानसिक शांति का अभाव रहता है। 

दशम भाव-सूर्य यदि दसवें भाव में हो तो जातक सम्मानित, धनाढ्य, कीर्तिवान, प्रशासनिक गुणों से युक्त तथा यशस्वी होता है। सरकार से बार-बार सम्मान प्राप्त करता है। उच्च पद (मंत्री आदि) प्राप्त करता है। बुध भी अच्छी स्थिति में हो तो सफल तथा उच्च व्यापारी बन सकता है। स्वास्थ्य उत्तम तथा समाज में सम्मान प्राप्त करता है। यद्यपि स्वभाव से कुछ वहमी भी हो सकता है। जातक के पिता के सुख के लिए दसवां सूर्य बाधक होता है। प्रायः जातक पिता के साथ रहकर प्रगति नहीं कर पाता। या उसे पिता से दूर होना पड़ सकता है।

     लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक को अपनी ससुराल में रहना या राहू से सम्बन्धित काम करना और अपनी कमियों का स्वयं प्रचार करना नुकसानदायक होता है। ऐसे जातक को सिर पर सफेद या शरबती रंग की पगड़ी या टोपी पहनना लाभकारी होता है। यूं तो दसवें भाव में सूर्य नीच राशि का हो तो भी सम्मानित पद दिलाता है। परन्तु उच्च का सूर्य दसवें भाव में हो तो चक्रवर्ती की भांति पद व सम्मान दिलाता है। वायु राशियों में दशमस्थ सूर्य-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल या विधान/संसद सभा का सदस्य बनाता है। पृथ्वी राशियों में-प्।ै ऑफिसर जैसे उच्च पदों पर ले जाता है। जल राशियों में-आबकारी व आयकर विभाग से लाभ प्राप्त करता है। अग्नि राशियों में-पुलिस या सेना के उच्च पद पर ले जाता है। वृश्चिक राशि का दशमस्थ सूर्य चिकित्सा क्षेत्र में भेज सकता है (शनि तथा राहू की स्थिति भी विचारनी होगी) परन्तु जातक वृद्धावस्था में रोगी हो जाता है। यह दशम सूर्य का एक और दुष्परिणाम है।

दशम भाव: दशम भावस्थ सूर्य व्यक्ति को शिक्षित बनाकर प्रसिद्धि देता है। दशमस्थ सूर्य वृष, मिथुन, कन्या, मकर या मीन राशि का हो तो जातक कार्यक्षेत्र में उच्चाधिकार प्राप्त कर लेता है। दूसरी ग्रह स्थिति बलवान हो तो व्यक्ति राज्यपाल, मन्त्री अथवा किसी सदन का सदस्य बन जाता है। वृश्चिक राशि का सूर्य चिकित्साधिकारी बनाता है जबकि तुला राशि में सूर्य हो तो व्यक्ति को न्यायाधीश जैसा सम्माननीय पद मिलता है। 

दशमस्थ सूर्य यदि मेष, कर्क, सिंह या धनु राशि का हो तो व्यक्ति सेना, पुलिस, आबकारी, कस्टम आदि विभागों में अधिकारी होता है। दशमस्थ सूर्य ऐसा फल सभी राशियों में देता है कि सूर्योदय से मध्याह्न तक जिस प्रकार सूर्य प्रखर तेजयुक्त होता रहता है और मध्याह् के पश्चात तेजहीन होने लगता है और अन्तत: अस्त हो जाता है, उसी प्रकार व्यक्ति का पूर्वकाल उत्थान का और मध्यकाल पतन का होता है। अन्त में ऐसा व्यक्ति धनसुख, देहसुख एवं पुत्रसुख से हीन हो जाता है। 

राछिगत फल 

4. मेष-मेष राशि का सूर्य दशम स्थान में हो तो जातक गुणवान, धनवान, सरकारी कर्मचारी, उच्चाधिकार संपन्‍न या बड़ा उद्योगपति होता है। संतान सुस्य विलंब से प्राप्त होता है, पत्नी विद्वान मिलती है। माता-पिता का सुस्त भरपूर मिलता है। सूर्य की दशा-आअंतर्दशा महत्त्वपूर्ण एवं ग्रगतिकारक फल देती है। 

2. वृषभ---वृषभ राशि का सूर्य दशम स्थान में हो तो जातक धनवान, गुणवान, ऊदार, सरकार में मान्य एवं प्रतिष्ठित होता है। साता-पिता का सुख उत्तम प्राप्त होता है। सूर्य की दशा-आंतर्दशा में भाग्योदयकारक फल प्राप्त होते हैं। 

3. मिथुन--मिथ्रुन राशि का सूर्य दशम स्थान में होने पर जातक आर्थिक दृष्टि से संपन्न, चरित्रवान, आदर्शवादी एवं ललित कलाओओं में प्रवीण रहता है। संतान सुख विलंब से प्राप्त होता है या उसमें बाधा आ सकती है। जातक का स्वभाव सोौम्य, परोपकारी रहता है। किंतु उसकी मां दुष्टा होती है। ऐसा जातक कभी स्वतंत्र व्यवसाय न करे अन्यथा नुकसान की संभावना रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा का फलित अच्छा नहीं होता। 

4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य दशम स्थान में हो तो जातक का स्वभाव उसके पिता जैसा होता है। जातक चरित्रवान, गुपण्णवान, धनवान, अधिकारसंपन्‍न और दीर्घायु होता है। ऐसे जातक को स्वतंत्र ख्यवसाय करना चाहिए, उससमें लाभ होगा। सूर्य की दशा-अआअंतर्दशा में आर्थिक लाभ होता हे। साथ हो कुछ समस्याएं स्डी होती हैं। 

5. सिंह--सिंह राशि का सूर्य दशम स्थान में होने पर जातक निश्चित रूप से संपन्न, कूुलमश्रेष्ठ, सरकारी कर्मचारी, आदर्शवादी, पुण्यात्मा, विद्याप्रेमी, ज्ञानी एवं उपासक होता है। माता-पिता एवं अन्‍य रिश्तेदारों से सुख प्राप्त होता है। मां से अच्छी बनती है, मां का सुख उत्तम मिलता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा लाभदायक रहती है। 

6. कन्या--कन्या राशि का सूर्य दशम स्थान में होने पर जातक असाधारण प्रगति करता है। वह धार्मिक रहता है, देवी कृपा होती है। जातक मातृभक्त, सदाचारी, समाज में तथा शासन में प्रतिष्ठा प्राप्त होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा शुभ फलदायी होती है। 

7. तुला--तुला राशि का सूर्य दशम स्थान में होने पर जातक बचपन में रोगी रहता है, माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। आपस के लोगों से इसकी मैत्री नहीं रहती। वह चुगलखोर, अस्थिर विचारों का एवं आदर्शहीन रहता है। ऐसा जातक तथाकथित पिता की संतान न हो ऐसा भी संभव रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में शारीरिक एवं अन्य कष्ट सहन करने होते हैं। 

8. वृश्चिक--वृश्चिक राशि का सूर्य दशम स्थान में होने पर जातक कपटी, कठोर, दुराचारी, शासन पर टिका रहनेवाला होता है। पत्नी सुंदर, सुशील एवं सदाचारी रहती हे, किंतु विवाह विलंब से होता है। विवाह के बाद श्वसुर के साथ रहकर उसके मार्गदर्शन में कार्यरत रहता है। लेकिन श्वसुर पक्ष के लोगों को संतोष देने में जातक असमर्थ रहता है। ससुराल के स्त्री पक्ष या साले से दुखी होता है या उससे झगड़ा होता है। सूर्य के दशा-अंतर्दशा काल में मध्यम फल प्राप्त होता है। | 
9. धनु--धनु राशि का सूर्य दशम स्थान में होने पर जातक के शत्रु शक्तिशाली और अधिक रहते हैं। उसे जन्म स्थान से दूर रहकर निर्वाह करना पड़ता है। जातक धेर्यवान, उद्यमी, कुलश्रेष्ठ, सदाचारी एवं दृढ़निश्चयी होता है। जमीन या जमीन से संबंधित कारोबार में वह धन कमाता है। उच्चाधिकारियों से अनबन रहने से नोकरी में प्रगति नहीं होती। मां के स्वभाव के विरुद्ध जातक का स्वभाव रहता है। ननिहाल से लाभ मिलता है। सूर्य को दशा-अंतर्दशा में काफी कष्ट सहने पड़ते हं। 

10, मकर--मकर राशि का सूर्य दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सरकारी कर्मचारी, समाज में प्रतिष्ठित, मरणोत्तर भी नाम रखनेवाला, आदर्शवादी एवं कामातुर रहता है। संतान आज्ञाकारी रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में सुख-लाभ प्राप्त होता है। 

11. ऋंभ--कुंभ राशि का सूर्य दशम स्थान में हो तो जातक सुखी एवं संपन्न रहता है। जमीन-जायदाद बड़े पैमाने पर रहती है। जातक को कन्या संतान अधिक होती है। मां, पत्नी एवं संतान से उसकी अनबन रहती है। पहली पत्नी से तलाक होने की संभावना रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल सामान्य ही मिलते हैं। 

12. मीन-मीन राशि का सूर्य दशम स्थान में हो तो जातक अपने परिवार का भरण-पोषण करनेवाला, सरकारी कर्मचारी, संपन्न, उद्यमी, धैर्यवान, सदाचारी रहता है। जातक की पत्नी का स्वभाव क्रर रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल सामान्य प्राप्त होते हैं। 

1. मां के पैर छुये।
2. काली गाय को रोटी देवें।
3. नीलम घाटम व नीला वस्त्र न पहने।
4. लाल बकरी का दूध बरगद के पेड़ में डाले।
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11)एकादश भाव - एकादश स्थान (लाभ भाव) एकादश स्थान का रवि
सूर्य कुंडली के ग्यारहवें भाव में हो, तो ऐसो कुंडली वाला व्यक्ति बाद-विवाद से दु:खी, भाई-बहन से सुखी, चित्रकला में रुचि रखने वाला नोकरों के उद्यम से संतुष्ट, चतुष्पदों से प्रेम करने वाला, घनी, बलवान सुखी, स्वाभिमानी, सदाचारी, राजा का सेवक, भोगहीन, गुणग्रही, स्त्रियों का प्रिय, बुद्धिमान, चंचल, मितभाषी तथा अल्पसंततिवान होता है। धन की उसे अनायास ही प्राप्ति होती है। शत्रु उससे घबराते हैं। उस पर उच्चाधिकारियों धनिकों और सज्जन लोगों, सभी का अत्यधिक स्नेह रहता है। उसकी पत्ली भी बहुत सुन्दर होती है तथा उसे अनेक माध्यमों से आर्थिक लाभ होते हैं, बाहतादि का उसे पूर्ण सुख मिलता है, जबकि संतानपक्ष से पीड़ा पहुंचती है। एकादश भाव में सूर्य के अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति उदर रोग से पीड़ित रहता है। निर्बल, अस्त अथवा नीच राशिगत सूर्य के अशुभ प्रभाव से वातरोग तथा नेजरोग से व्यक्ति प्रसित होता है। 
बैद्यनाथ - भानौ लगभाते तु वित्तविपुलस्त्री पुत्र दासान्वितः । धनवान, स्त्री, पुत्रों से संपन्न और नौकरों से सेवा लेनेवाला होता है।
कल्याण वर्मा - संचयनिरतो बलवान् द्वेष्यः प्रेष्यो विध य भृत्यश्च । एकादशे 'विधेयः प्रियरहित सिद्धकर्मा च ।। धन संचय करनेवाला, बलवान, द्वेषी, नौकरी करनेवाला, लोगों को अप्रिय, अपने काम बनानेवाला होता है।
हिल्लाजातककार - एकादशस्थः खलु पुत्रलाभं कुर्याच्चतुर्विंशति संमितेच। यह रवि २४ वें वर्ष में पुत्र लाभ कराता है।
यवनमत
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धनवान, नौंकरों से संपन्न, सुंदर स्त्री का पति, अच्छी इमारत का मालिक, अच्छे पदार्थ खानेवाला, गाने बजाने का शौकीन, गुप्त विचार करनेवाला, अच्छी आँखोंवाला होता है।
राफेल स्थिर और विश्वासयोग्य मित्र होते हैं। रवि बलवान हो तो वे इसको मदद करते हैं किंतु वह दूषित या निर्बल हो तो मदद के स्थान पर बोझ बन जाते हैं।मेरे विचार - प्राचीन शास्त्रकारों ने इस रवि के फल अच्छे दिये हैं किंतु वे किस राशी में मिलते हैं यह नहीं बताया। मेरा अनुभव ऐसा हैं कि इस रवि से कोई एक दुःख पीछे लगा रहता है। संपत्ति हो तो संतति नहीं होती। संतति हो तो संपत्ति नहीं होती। हां इसके साथ अन्य पाप ग्रह शुभ योग करते हों तो दोनो सुख मिलते हैं। यह स्थान जनपद, कौन्सिल, सभा, क्लब, बड़ा भाई इत्यादि का विचारक है इसलिए इनके भी फल इस रवि में देखने चाहिये। पश्चिमी ज्योतिषी इस स्थान में भिन्न-भिन्न परिवार के सुख और मित्रों की मदद ये फल बताते हैं। हमारे ग्रन्थकारों ने मित्र का विचार चौथे स्थान से किया है। इस स्थान का रवि बड़े भाई को मारक होता है। इच्छाएं उदार और लोगों का हित करने की होती हैं। चौथी संतति नष्ट होती है। पिता का स्वभाव खर्चिला होता है।
जातक राजसेवा में संलग्न, खजांची, गुणवान, कला प्रवीण, समृद्ध, सुविधाओं का उपभोग करने में असमर्थ, अस्थिर, स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र और दूसरों का मनोरंजन करने वाला होगा।
-मानसागरी
जातक सम्पन्न, चिरंजीवी, दयालु व सदैव प्रसन्नचित्त व सुखी होगा। -फलदीपिका
जातक आर्थिक दृष्टिकोण वाला, धन लोभी धनार्जन के प्रति रूचि रखने वाला, सुदृढ़ और सफलतापूर्वक काम निपटाने वाला होगा। वह अन्य लोगों के प्रति घृणा के भाव रखने वाला, सेवकों से रहित, स्नेहहीन, परसेवारत और विनम्र होगा।
-सारावली
जातक को कृषि कर्म से पर्याप्त आय हो, 25 वें वर्ष की आयु में वाहन खरीदे/रखे, अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से पैसा कमाऐ, ज्वर बाधा से पीड़ित होगा।

जातक विद्वान, सम्पन्न, राजसी और रक्षक प्रवृत्ति का, अल्प प्रयास से ही सफल, प्रसिद्ध, बहुत शत्रुओं वाला, अच्छी मान-प्रतिष्ठा वाला, उचित साधनों से संपत्ति अर्जित करने वाला, अन्तर्दृष्टा, मित्रता करने की क्षमता रखने वाला, अनेकों राजनीतिक शत्रुओं वाला, सिद्धान्तवादी, सूक्ष्मविश्लेषक, महान सफलता व पद प्राप्त करने वाला होगा।
-डॉ रामन
एकादश भाव में सूर्य की स्थिति को पद, अधिकार, सम्पन्नता, साहस तथा बुद्धिमत्ता से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की क्षमता के लिए अच्छा व संतति पक्ष से पीड़ित परन्तु पुत्र की प्राप्ति वाला बताया गया है। वह अन्य ग्रहों की परिस्थितियों के कारण सम्पन्न, सुंदर पत्नी वाला तथा राजनीतिक प्रभाव वाला भी हो सकता है।


मेरा अनुभव - यह रवि मेष में हो तो संतति नहीं होती। हुई तो रहती नहीं। सिर्फ पैसा मिलता है। शिक्षा कठिनाई से पूरी होती है। बड़ी आकांक्षाएं होती हैं किंतु सफल नहीं होती। विद्वानों में अपमान होता है। मिथुन में हो तो दो तीन पुत्र मर जाते हैं। पैसा खूब और बिना कष्ट से मिलता है। दुष्ट स्वभाव होता है। लोगों के झगड़ो में नहीं पड़ता। बेकार ही घमंड होता है। मिलनसार स्वभाव नहीं होता। अपने लिये विलासी होता है। यह सिंह का हो तो दारिद्रता होती है। लड़कियां अधिक होती है। तुला में हो तो पैसा, सन्मान, कीर्ति मिलती है। कानुन का विद्वान होता है। संतति नहीं होती या रहती नहीं। सार्वजनिक कामों में पड़ते हैं। जनपद आदि के कार्यकर्ता होते हैं। नेता लोगों का रवि अक्सर तूला में होता है। धनु का रवि कानून विशेषज्ञ बनाता है। पैसा हो तो संतति नहीं होती। संतति हो तो पैसा नहीं होता। कुंभ के रवि में दरिद्री होता है। किसी भी धंधे में लाभ नहीं होता। सभी पुरूष राशियों के रवि में बड़ा भाई नहीं रहता। रहा भी तो २२ वें वर्ष तक मर जाता है। नहीं मरा तो झगड़े हो कर अलग होता है। स्त्री राशि के रवि से संतति, संपत्ति मिलती है। शिक्षा नहीं होती। ये लोग बड़े बड़े काम दूसरों से करवाते है। अपने कष्ट से दूसरों का काम करवा देते हैं। पुरूष राशि के रवि में संपत्ति मेहनत से मिलती है। स्त्री सशि के रवि में अचानक मिल जाती है। हिल्लाजातककार का मत उच्च वर्ग के लोगों में नही मिलता क्योंकि विवाह की आयु बढ़ती जा रही है। नीचे के वर्ग में अनुभव आता है।


कुंडली का एकादश स्थान एक ऐसा स्थान है कि जिसमें प्राय: सभी ग्रह शुभ फल प्रदान करते हैं। एकादश स्थान में सूर्य होने पर जातक संपन्न, परिवार में नौकर-चाकरों से युक्त आनंदपूर्ण जीवन जीता है, भरपूर मात्रा में धनसंग्रह भी करता है। प्रायः नौकरी ही उदर निर्वाह साधन रहता है। शासन में अच्छा सम्मान प्राप्त होता है। महत्त्वपूर्ण पद की प्राप्ति भी होती है। जातक की आंखें सुंदर रहती हैं। खाने-पीने-गाने-बजाने का शौक रहता है। श्रेष्ठ पद पर रहते हुए भी जातक को इसी प्रकार पदासीन दूसरों की तुलना में कम मान प्राप्त होता है। बड़े भाई नहीं होते, हों भी तो उनसे मेल नहीं खाता। पिता अपव्ययी रहते हैं। 24वें वर्ष में विवाह हो जाए तो उसी वर्ष में पुत्र सुख प्राप्त होता है। चौथी संतान से जातक को दुख प्राप्त होता है, संतान के विषय को लेकर कोई चिंता रहती है। एकादश स्थान में स्थित सूर्य स्वगृही, उच्च, स्वक्षेत्री, बलवान होने पर जातक गजटेड ऑफिसर बनता है। उसके पास राज्यशासन के कुछ अधिकार रहते हैं। जातक शत्रुनाशक होता है। 

एकादश भाव-लग्नकुंडली में ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो जातक शक्तिवान, धनवान, अल्प संततिवाला, योगी के समान किन्तु उदर रोगी व अभिमानी होता है। भले ही लालची हो परन्तु राजा के समान हैसियत व सम्मान वाला तथा धार्मिक होता है।

     लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक ऐशपसंद होता है। मनमोहक नेत्रों वाला, गायन-वादन में रुचि लेने वाला तथा परोपकारी होता है। किन्तु वह स्त्रियों का रसिया होता है। (ऐसे जातक को शाकाहारी ही रहना चाहिए। यदि वह मांस मदिरा का सेवन करे तो उसे अशुभ फल भोगने पड़ते हैं।) सन्तान कष्ट या चिंता भी बनी रहती है। परन्तु शत्रुओं पर भारी पड़ता है। राज्यकृपा प्राप्त होने की प्रबल सम्भावना होती है। जैसा कि शास्त्रकार भी स्वीकारते हैं

     खौ संसभेत्स्वंच लाभोपायते नृपद्वारतो राजमुद्राधिकारत्।

     प्रतापानलेशत्रवः सम्पतन्ति श्रियोऽनेकदुःखादिभंगद्भवानाम्॥

     अर्थात् सूर्य एकादशस्थ हो तो जातक राजकृपा से धन कमाता है। राजा की मुद्राओं द्वारा नाना सम्पदा प्राप्त करता है। उसके प्रताप की अग्नि में शत्रु जल मरते हैं। पर संतानादि का कष्ट उसे रहता है।

एकादश भाव: एकादश भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को कोई-न-कोई दुःख लगा ही रहता है। संपत्ति अथवा सन्‍्तति दोनों में से एक का सुख मिलता , दोनों सुख तभी मिलते हैं जब सूर्य शुभ प्रभाव में व बलवान स्थिति में हो। 

एकादश भाव का सूर्य बड़े भाई के सुख में बाधक बनता है। नीचस्थ (तुला राशि) सूर्य धन, मान-सम्मान एवं संतान सभी सुख देता है। धनु राशि का सूर्य व्यक्ति को न्‍्यायविद्‌ तथा कानूनविद्‌ बनाता है। 

कुम्भ राशि में सूर्य हो तो व्यक्ति निर्धन होता है। उच्चस्थ (मेष राशि) सूर्य सन्‍्तानाभाव देता है, मिथुन का हो तो सन्‍्तान उत्पन्न होकर कालकवलित हो जाती है। स्वराशिस्थ (सिंह राशि) हो तो कन्या सन्‍्तान अधिक होती है तथा धनाभाव बना रहता है। पुरुष राशि के सूर्य के अशुभ तथा स्त्री राशि के शुभ फल मिलते हैं। 

राशिगत फल 

1. मेष--एकादश स्थान में मेष राशि का सूर्य हो तो जातक स्वपुरुषार्थ से अपनी प्रगति करता है। सुखी, धैर्यवान, पराक्रमी होने पर भी गुस्सैल रहता है। संतानविषयक शुभ फल प्राप्त करता है। व्यापार-उद्योग में धन कमाता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा विशेष लाभप्रद नहीं रहती। 

2. वृषभ--वृषभ राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न, धार्मिक, व्यवहारकुशल, परोपकारी, जनप्रिय, यशस्वी एवं सरकारी कर्मचारी रहता है। बचपन में स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, किंतु आगे जाकर सुधर जाता है। व्यापार में अच्छा-खासा धन कमाता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा लाभप्रद रहती है। 

3. मिथुन--मिथुन राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो जातक सुशील, विद्वान, श्रद्धालु, गुणवान, यशस्वी, विवेकी एवं दीर्घायु होता है। स्वभाव राजसी एवं अभिमानी रहता है। सरकारी नौकरी मिलती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा अच्छी फलीभूत होती है। 

4. कर्क-कर्क राशि का सूर्य एकादश स्थान में होने पर जातक बहुत धनवान, आचारशील, उदार, प्रसन्‍नचित्त, परोपकारी, सत्यवक्ता, मधुरभाषी रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के साधारण फल प्राप्त होते हैं। 
5. सिंह--सिंह राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो खिशेष फल प्राप्त होते हैं। जातक र्यातिप्राप्त एवं अश्विकारसंपनन होता है। पुत्र पौत्र अधिक रहते हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में काफी परेशानियां रहती हैं। 
6. कन्‍या--_कन्या राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो जातक संपन्न, संतानसुर्ष से युक्‍त, प्रसन्‍नचित्त, आचारशील, सुरत्री एवं दीर्घायु रहता है। दुश्मनों से उसे फायदा होता है, मां का सुख अच्छा मिलता है। पिता भी संपन्‍न एवं प्रतिष्ठित रहता है। वकालत के व्यवस्ताय में अच्छा धन प्राप्त होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा विशेष प्रगति करती है। 

7. तुला---तुला राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो जातक जनप्रिय, संपन्‍न, थैर्यवान, उदार, गुणी, आस्तिक, नेता, दान-पुण्य करनेवाला, सरकारी कर्मचारी एवं दीर्घायु होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में विशेष लाभ प्राप्त होता है एवं उन्‍नति होती है। 

8. वृश्चिक-.-_वृश्चिक राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो जातक को आर्थिक लाभ होता है कितु धनसंग्रह नहीं हो पाता। घर से अधिक बाहर के एवं निम्न श्रेणी के लोगों से मैत्री रहती है। जीवनरेखा कमजोर रहती है, बचपन कठिनाइयों में बीतता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा कष्टमय रहती है। 

9. धनु--धनु राशि का सूर्य एकादश स्थान में होने पर जातक संपन्न एवं सुखी रहता है। संतान होती तो है पर वह जीवित नहीं रहती या लड॒कियां ही होती हैं। जातक को सुस्वरूप, सदाचारी, आज्ञाकारी, स्नेहानुरक्‍त पत्नी प्राप्त होती है। कुछ आचार्यों के विचार से पत्नी के पिता के बारे में शक रहता है। पत्नी को प्रसव के समय मृत्युसम पीड़ा होती है। इस विषय में अन्य योग भी देखने चाहिए। मेरी राय में प्रसव के जबक्‍त मृत्यु का डर रहता है। सूर्य की दशाअंतर्दशा कष्टकारक रहती है। 

10. मकर--मकर राशि का सूर्य एकादश स्थान में हो तो जातक घथेर्यवान, गुणवान, वाहनसुख् से परिपूर्ण एवं स्वाभिमानी रहता है। कुसंगति एवं शत्रुबाधा के कारण दिक्‍कतें आती हैं। सजा या चोरी के कारण धनक्षय होता है। पशुपालन विषयक व्यवसाय में रुपया-पैसा अच्छा मिलता है। संतान सुख्त्र में न्‍्यूनता रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के शुभ फल अवश्य मिलते हैं। साथ ही शत्रु भय भी रहता है। 

11. काुस-_कुभ राशि का सूर्य एकादश स्थान में होने पर जातक विद्वान, जनप्रिय, संपन्न, सुख्यी, तीत्रबुद्धि का, लेखक या सुधारक, ललित कलाओं का प्रेमी होता है। सरकारी कर्मचारी होता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं। 

12, मीन--.मीन राशि का सूर्य एकाद्श स्थान में होने पर जातक दयालु, गुणवान, धैर्यवान, दानवीर एवं अपने श्रम से आगे बढ़ने वाला होता है। स्वास्थ्य उत्तम रहता है। जातक मातृ-पितृभक्त होता है तथा उम्र लंबी होती है। आचार्य गर्ग के अनुसार जातक जारज माता से उत्पन्न रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारण फलदायक रहती है।
1. फकीर को काले चने देवें।बांट देवे।
2. काजू व बादाम रात में सर के नीचे रखे बाद में मंदिर जाकर
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12) बारहवा भाव - द्वादश स्थान (व्यय भाव) द्वादश स्थान का रवि
इस भाव में सूर्य के उपस्थित रहते से व्यक्ति युद्ध, वाद-विवाद व मुकदमे में विजय प्राप्त करने वाल्शु उदासोत्‌ मानसिक रोगी, बेहद आलसी, अधिकतर विदेश भें रहने बाला, कुश शरीर का होता है। ऐसे व्यक्ति को कभी भी पिता का सुख नहीं मिलता तथा वो अपव्ययो, धनहोन, पर-स्त्रीगामी एवं व्यर्थ का बकवादी होता है। पहले तो उसे छल-कपट और जुआ आदि से लगाव होता है, किन्तु फिर अलगाव उत्पन्न हो जाता है। भाई-बहन का उसे मध्यम सुख मिलता है, माता के स्वास्थ्य में बाधा उत्पन्त होती रहती है। किसी प्रिय वस्तु के खो जाने पर अधिक चिंतित हो उठने का उसका स्वभाव होगा। ५३-५४ वर्ष में रिश्तेदारों से विवाद संभव है। सूर्य के अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति नेत्ररोग से पीड़ित अवश्य रहता है। आलस्य तथा कामुकता के कारण उसे ग्राकः गुप्तरोग सताते हैं। द्वादश भाव में सूर्य बष्ठेश से बुद्ध हो तो व्यक्ति को कुष्ठरोग का भय रहता है। किन्तु यदि शुभ ग्रह से था टूष्ट हो तो ऐसा भव नहों होता। यद्यपि स्त्रो को गर्भाशव-संयंधी रोग होता है 



बैद्यनाथ - व्ययस्थिते, पूषणि पुत्रशाली व्यंगः सुधीरः पतितोष्टनः स्यात् । पुत्रयुक्त, व्यंगयक्त, धैर्यशाली, धर्मभ्रष्ट, भड़कनेवाला होता है।
आर्यग्रंथकार नरपति धनयुक्तो द्वादशस्थे दिनेशे कथकजन विरोधी जंघरोगी कृशांगः । राजा, धनी लोगों का विरोध करनेवाला, जंघाओं में रोगी, पतले कद का होता है।
हिल्लाजातककार – व्ययस्थिते दृक्त्रिामितेच हानिम्। इससे
३२ वें वर्ष में हानि होती है।
यवनमत
यह रवि चंद्र से युक्त न हो तो अंतिम आयु विजयी और भाग्यवान होता है। ये लोग अजब ही होते है। बड़े मेहनती और धूर्त होते हैं किंतु सफलता कम मिलती है।

राफेल - जीवन में सफलता किंतु यदि यह रवि दूषित होतो कारावास होता है।
जातक मूर्ख, कामोत्तेजक, परस्त्रीगामी, धुम्मकड़ शिकारी,भद्दा ,कथावाचक, कमजोर शरीर वाला, ऊरूरोग से पीड़ित, राजा से धन संपत्ति पाने वाला और कपटी होगा।
-मानसागरी
जातक के पिता के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध होगें। वह धन संपत्ति और संतानहीन होगा। उसे दृष्टि-दोष भी रहेगा।
-फलदीपिका
वह नैतिक रूप से नीच, पिता के प्रति शत्रुता का भाव रखने वाला, कमजोर, विकलांग शरीर वाला, काणा व बेचैन होगा।
-सारावली
जातक 36 वें वर्ष की आयु में (अपेंडिसाइटिस) उण्डुकपुच्छशोथ से पीड़ित होगा। वह अवाँछनीय लक्ष्यों पर व्यय करेगा, पाप प्रवृत्ति वाला, संपत्ति की हानि उठाने वाला तथा विदेश में रहने वाला होगा। यदि सूर्य षष्ठेश के साथ हो, तो कोदग्रस्त बनाये।
- भृगु
जातक पापी, दरिद्र, असफल, चोर, व्यभिचारी, अपेक्षित, लंबे हाथ पैर वाला, औपचारिक (दिखावे का शौकीन), प्राच्य व गूढ़ विधाओं के प्रति रूचि रखने वाला परन्तु संतान से न सुखी रहने वाला होगा।
टिप्पणी
-डॉ रामन
विद्वान आचार्यों के उपरोक्त मतों का कुण्डलियों पर प्रयोग, उसमें अन्य ग्रह स्थितियों व उनके संबंधादि देखने के बाद ही किया जाना चाहिए। कुण्डली के सम्यक विश्लेषण और अध्ययन के द्वारा ही सही-सटीक निष्कर्षो पर पहुँचा जा सकता
है।
अन्य कई आचार्यों ने भी द्वादशभाव में सूर्य की स्थिति को बुरा बताया है। उनके अनुसार- जातक वैश्यागमन करने वाला, पक्षी व पशुओं (गायों) का शिकार करने वाला, विदेश-प्रवास करने वाला और अधर्म पर खर्चा करने वाला होगा। यदि कुण्डली किसी स्त्री की हो, तो वह ईष्यालु, अपवित्र, पियक्कड़ और निर्लज्ज होगी।

मेरे विचार
आर्यग्रंथकार को छोड़कर अन्य प्राचीन
शास्त्राकारों ने इसके फल सब बुरे बताये हैं।
व्ययस्थान बुरे ही फल का है ऐसी ही कल्पना से अच्छे फल दिख ही कैसे सकते हैं। आर्यग्रंथकार ने जरूर अच्छे फल बताये हैं। इस स्थान में बाल अवस्था को छोड़कर कुमार में प्रवेश होता है। कुमार अवस्था में उद्धत वृत्ति, किसी की न सुनना, बढ़ता जोश, जवानी में अपने मन की करना ये बाते होती हैं। अपने हित की जानकारी न होने से लड़ाई झगड़े करना, लड़कियों के पीछे लगना ये बातें भी होती हैं। कभी जोश में अच्छे भी काम हो जाते हैं। इसलिये इसके फल बुरे ही मिलते हैं ऐसा नहीं। अच्छे भी फल मिलते हैं।
मेरा अनुभव - इस स्थान का रवि कर्क, वृश्चिक, मीन, इन राशियों में हो तो खर्चीला, बेफिकर, राजनैतिक कारावास पानेवाला, लोगों को उपकारी, युद्ध में पराक्रमी होता है। वृषभ, कन्या, मकर इन में ध्येयवादी, उसमें आनेवाले सब संकट शांत वृत्ति से सहनेवाला, अच्छे कामों में ख्याति पानेवाला, स्वतंत्र, धनप्राप्ति का इच्छुक और मन में कुढ़नेवाला, कोई भी कार्य विचारपूर्वक करनेवाला होता है। मेष, सिंह, धनु इसमें कंजूस, अविचारी, घमंडी, खुद को ही विद्वान समझनेवाला, बुरे कामों में दंड पानेवाला होता है। मिथुन, तुला, कुंभ इनमें खर्चीला और विख्यात, कम से कम अपने समाज में विख्यात होता ही है। नागपुर के डॉ. हरिसिंग गौर ग्रंथकार और कीर्तिमान थे। इनके व्ययस्थान
में रवि था ।

द्वादश यानी व्यय स्थान में स्थित सूर्य प्रायः अच्छे फल प्रदान नहीं करता ऐसे जातक को संतान सुख अच्छा मिलता है और कोई-न-कोई शारीरिक दोष रहता है। जातक समाज में घुल-मिलकर नहीं रहता, उसकी समाज पर भड़कने की प्रवृत्ति रहती है। जांघों में कष्ट होता है। नेत्रविकार निश्चित होता है। शरीर दुबला रहता है। 32वें वर्ष में नुकसान उठाना पड़ता है। चाचा या ताऊ के साथ मधुर संबंध नहीं रहते। प्रवास में चोरी या अन्य कारणों से दिक्कतें आती हैं। 

उदर निर्वाह के लिए जातक को एक ही जगह रहना होता है। धीरज रखनेवाला होने से कार्यों में यश प्राप्त होता है। चतुर्दशी या अमावस्या का जन्म हो तो बुढ़ापा सुख से व्यतीत होता है। स्वभाव बड़ा अजीबोगरीब रहता है। 

सूर्य यदि बारहवें भाव में हो तो जातक आलसी तथा छरहरे शरीर वाला होता है। उसे मित्रों का अभाव होता है। बाएं नेत्र में रोग अवश्य हो जाता है। विदेश गमन से लाभ होता है। विदेश यात्रा सम्भव होती है। जीवन में सुखी होता है। अच्छी नींद लेता है। दूसरों की विपत्ति अपने सिर लेने की प्रवृत्ति होती है। गृहस्थ सुख नहीं होता (अल्प होता है)।

     लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक का जीवनसाथी दुश्चरित्र होता है। (निर्णय के लिए सप्तम भाव व सप्तमेश की स्थिति के नवमांश का विचार भी अवश्य करें)। गृहस्थ सुख नहीं मिलता। अग्नि राशि भी बारहवें भाव में हो तो जातक कृपण, अभिमानी, पिता से द्वेष करने वाला तथा नेत्र रोगी होता है। ऐसी स्थिति में निद्रानाश/विघ्न सम्भव होता है। यात्राओं में हानि सम्भावित होती है।

     ऐसे जातक को दस्तकारी या हाथ का काम करना अशुभ होता है तथा व्यापार करना शुभ रहता है।यदि दशम नवम भाव सुदृढ़ न हो तथा दशमेश-नवमेश पाप प्रभाव में हों और द्वादश भाव पर गुरु की दृष्टि न हो तो बारहवें भाव का सूर्य जातक को पिता के सुख से वंचित कर सकता है। क्योंकि सूर्य पिता का कारक है तथा बारहवां भाव जातक के व्यय तथा हानि का भाव है। साथ ही सरकार की ओर से जुर्माना या दण्ड (आर्थिक) सम्भव होता है। क्योंकि सूर्य सरकार का भी प्रतिनिधित्व करता है और बारहवां भाव व्यय या हानि का।

व्यय स्थान में स्थित सूर्य प्राय: अच्छे फल प्रदान नहीं करता।ऐसे जातक को संतान सुख अच्छा मिलता है और कोई-न-कोई शारीरिक दोषरहता है। जातक समाज में घुल-मिलकर नहीं रहता, उसकी समाज पर भड़कने

की प्रवृत्ति रहती है। जांघों में कष्ट होता है। नेत्रविकार निश्चित होता है। शरीरदुबला रहता है। 32वें वर्ष में नुकसान उठाना पड़ता है। चाचा या ताऊ के साथमधुर संबंध नहीं रहते। प्रवास में चोरी या अन्य कारणों से दिक्कतें आती हैं।उदर निर्वाह के लिए जातक को एक ही जगह रहना होता है। धीरजरखनेवाला होने से कार्यों में यश प्राप्त होता है। चतुर्दशी या अमावस्या का जन्म हो तो बुढ़ापा सुख से व्यतीत होता है। स्वभाव बड़ा अजीबोगरीब रहता है।

 द्वादश भाव: सभी प्राचीन आचार्यों ने द्वादश भावस्थ सूर्य के अशुभ फल कहे हैं। इसके पीछे शायद यह धारणा रही हो कि द्वादश भाव दु:स्थान है। आचार्य मन्त्रेश्वर ने अपने ग्रंथ फलदीपिका में उल्लेख किया है कि द्वादश भाव में सूर्य हो तो जातक अपने पिता से शत्रुवत व्यवहार करता है, नेत्र ज्योति मंद हो जाती है, शय्यासुख में कमी आती है। ऐसे जातक को धन तथा पुत्र सुख नहीं मिलता। शय्यासुख में कमी के कई कारण हो सकते हैं-जैसे पत्नी का पथशभ्रष्ट या परपुरुषगामिनी होना, पत्नी का रोगी होना अथवा स्त्री का पति संग की इच्छा न रखना या दोनों में वेमनस्य रहना। यही कारण पुत्रसुख में कमी के भी हो सकते हैं। ' 


जल राशि का सूर्य व्यक्ति को व्ययशील बनाता है, फलत: धनाभाव बना रहता है। ऐसा व्यक्ति लोकोपकारी, पराक्रमी तथा राजनेतिक दण्ड पाने वाला होता है। वायु राशि का सूर्य जहां व्ययशील बनाता है, वहीं समाज में ख्याति पाने वाला भी बनाता हेै। पृथ्वी राशि का सूर्य हो तो आदर्शवादी, संकयों को प्रसन्‍नता से झेलने वाला तथा धन की इच्छा करने वाला बनाता है। अग्नि राशि का सूर्य व्यक्ति को अभिमानी, दुराचारी, कंजूस एवं अपराधी बनाता हे। 


राशिगत फल 

1. मेष--मेष राशि का सूर्य व्यव स्थान में साधारण फल प्रदान करता है। जातक को पिता का सुख प्राप्त नहीं होता। जीवन में भी सुख की न्यूनता रहती है। उम्र लंबी रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल साधारण प्राप्त होते हैं। 

2, वुषभ--वृषभ राशि का सूर्य व्यव स्थान में होने पर जातक का बचपन दुविधा से भरा रहता है। जातक का चरित्र अच्छा नहीं रहता। वह परस्त्रीगामी या चोर रहता है। इसी कारण उसे सजा भी भोगनी पड़ती है। उत्साह कम रहता है। खर्चीला होता है। व्यापार में नुकसान होता है। रिश्तेदारों से मधुर संबंध नहीं रहते। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल उतने अच्छे प्राप्त नहीं होते। 

 मिथुन--मिथुन राशि का सूर्य व्यय स्थान में होने पर जातक स्वाभिमानी, उद्यमी, पराक्रमी, धूर्त एवं झगड़ालू रहता है। उसमें चोरी करने की वृत्ति पाई जाती है। प्रथम संतान से सुख प्राप्त नहीं होता। शिक्षित होकर भी वह अज्ञानी रहता है और भूतप्रेतों में विश्वास करता है। संगति अच्छी नहीं रहती है, विदेशों में रहता है। सूर्य को दशा-अंतर्दशा के शुभ फल प्राप्त होते हैं। 

4. कर्क--कर्क राशि के व्यय स्थान में होने पर मध्यम फल प्राप्त होते । जातक जुआखोर, चोर, क्रोधी रहता है। परस्त्री में उसकी आसक्ति रहती है कुशल वक्ता एवं मधुरभाषी होता है। दत्तक पुत्र की हैसियत से या 
उत्तराधिकार से दूसरों की संपत्ति का मालिक बनता है। शिल्पशास्त्र के अध्ययन में प्रगति करता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के साधारण फल प्राप्त होते हैं। 

5, सिंह--सिंह राशि का सूर्य व्यय स्थान में होने पर जातक परस्त्री में आसक्त, दुष्ट चरित्र का एवं क्रोधी रहता है। मां से बनती नहीं, संतान सुख का अभाव रहता है और जठराग्नि तीव्र रहती है। पशुपालन में रुचि रहती है, देहाती वातावरण में रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के साधारण फल प्राप्त होते हैं। 

6. कन्या--कन्या राशि का सूर्य व्यय स्थान में होने पर जातक के जीवन में सुख-शांति का अभाव रहता है। जातक कामातुर, कुसंगतिप्रिय एवं एकांतप्रिय रहता है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के अशुभ फल मिलते हैं। 

7. तुला--तुला राशि का सूर्य व्यय स्थान में रहने पर जातक के जीवन में सुख-शांति का अभाव, शत्रुओं के कारण हानि, बुद्धि कुटिल रहती है। माता के सुख में न्‍्यूनता रहती है। उदर निर्वाह के लिए राज्य-शासन की नौकरी अच्छी रहती है। सूर्य की दशा-अंतर्दशा साधारण फल देती है। 

8. वृश्चिक--वृश्चिक राशि का सूर्य व्यय स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी, विदेशवासी, बुद्धिमान, सुस्वरूप किंतु धूर्त रहता है। मामा एवं भाइयों से सुख प्राप्त नहीं होता। सूर्य की दशा-अंतर्दशा उत्तम फल देती है। 

9. धनु--धनु राशि का सूर्य व्यय स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्य साधारण रहता है। वह निष्ठुर एवं कठोरभाषी होता है। चोरी करने की प्रवृत्ति रहती है। अभक्ष्य भक्षण करने से उसकी मृत्यु होती है। जीवन में निराशा होने से आत्मघात की प्रवृत्ति होती है। कुछ आचार्यों के मत से ऐसे जातक की मृत्यु के बाद भी दुर्गति होती है। उसके शव को कुत्ते और कौए खाते हें। सूर्य की दशा-अंतर्दशा के फल अच्छे प्राप्त नहीं होते। 

10, मकर--मकर राशि का सूर्य व्यय स्थान में हो तो जातक दरिद्री एवं कंजूस रहता है। जीवन में चोरी इत्यादि के कारण धनक्षय होता है। कपडे के व्यापार में लाभ होता है। पत्नी लोभी, क्रोधी एवं कंजूस रहती है, रिश्तेदार अच्छे नहीं रहते। कुछ आचार्यों के मत से पत्नी से तलाक होता हे। 

11. कुंभ---कुंभ राशि का सूर्य व्यय स्थान में होने पर जातक हिंसाप्रिय, कामातुर एवं परस्त्रीगामी होता है। स्वास्थ्य साधारण रहता है। लोगों से बनती नहीं। रातदिन परिश्रम करके भी आर्थिक स्थिति साधारण ही रहती है। जातक प्रवासप्रिय रहता है, धार्मिक श्रद्धावाला, अनेक दिक्कतों से घिरा रहने पर भी मदांध एवं मस्ती में रहता है। माता-पिता एवं बंधुओं से सुख प्राप्त नहीं होता। पैतृक संपत्ति होते हुए भी उसका उपयोग नहीं कर पाता। सूर्य की दशा-अंतर्दशा में परेशानियां उसे घेरे रहती हैं। 

12, मीन-मीन राशि का सूर्य व्यय स्थान में हो तो जातक भ्रमणप्रिय रहता है। संतान का सुख कम रहता है। संतान न होना, होकर मरना या संतान होकर भी उनसे सुख नहीं मिलना, ऐसे फल प्राप्त होते हैं। सूर्य की दशा-अंतर्दशा शुभ फल देती है। 

 1. जहां सोवे वहां सूर्य का प्रकाश जरूरी है।
 2. घर में तुलसी का पौधा अवश्य रखें।
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सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में 1 अंक सांड,रोटी,अनार, कमल, गुलाबी रंग, चौरस आकर के आसान  सोने की 1ग्राम  गिंनी, कमल का फूल, आम, चुकुंदर, गाजर, रानी रंग के वस्त्र, अनार, आम, नारंगी, बन्दर के खिलोने, कुमकुम, बिस्कुट, गुलाल, आटा, तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है। पीला बल्ब  रौशनी की वस्तुवे टोर्च, टेबल लैंप  यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रांति के दिन किया जा सकता है। सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है।
सूर्य का राशिगत फल 

मानवीय जीवन में ग्रहों के गोचर भ्रमण का विशेष महत्व ज्योतिष शास्त्र में है। ग्रह गोचर से ही सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भविष्य कथन किया जा सकता है। जिन ज्योतिषियों को ग्रह गोचर का ज्ञान नहीं रहता, उनकी भविष्यवाणियां गलत सिद्ध होती हैं तथा वे उपहास के पात्र बनकर रह जाते हैं। जन्म राशि से सूर्य का गोचर फल यहां दिया जा रहा है। गोचर फल जन्मराशि से देखा जाए, ऐसा नियम है। 

जन्मराशि में: गोचर से सूर्य जुब्ब जन्मराशि में भ्रमण करता है तब क्रोध, रोग, दुखद प्रवास, स्थान परिवर्तन, पेट की बीमारियां, हृदय रोग, थकावट, रक्तचाप, आंखों का कष्ट, अपमान के प्रसंग, स्वकीयों एवं मित्रों से वाद-विवाद तथा झगड़े होते हैं। 

जन्मराशि से दूसरा: सूर्य जब दूसरे स्थान में भ्रमण करता है तब दुख, धननाश, धोखाधडी, भय, निरर्थक चिंता, आर्थिक खींचतान, पारिवारिक कलह, व्यापार में घाटा, दुष्ट एवं कुकर्मी लोगों से मेलजोल, सिरदर्द, गले के विकार, नेत्रविकार, सुख का अभाव रहता है। 

जन्मराशि से तीसरा: सूर्य जब तीसरे स्थान में भ्रमण करता है तब लाभ, सुख-शांति, रोगनाश, शत्रुनाश, पदोन्नति, सुखकारक प्रवास, पराक्रम, प्रतिष्ठा प्राप्ति आदि घटनाएं घटती हैं। 
जन्मराशि से चौथा: सूर्य जब चौथे स्थान में भ्रमण करता है तब रोग, समस्याएं, पारिवारिक सुख में न्‍्यूनता, सुख के सभी साधन होते हुए भी सुखोपभोग में विघ्न, हर काम में विलम्ब, जमीन-जायदाद की समस्या, सामाजिक क्षेत्र में अपमान, माता-पिता के लिए अशुभ, घर, वाहन से कष्ट, व्यवसाय में घाटा, प्रवास में कष्ट, वैवाहिक जीवन में विघ्न-बाधाएं आती हैं। जन्मराशि से पांचवां: जब सूर्य पांचवें स्थान में भ्रमण करता है तब रोग, दीनता, चित्तक्षोभ, संतान को कष्ट, विद्या अध्ययन में विघ्न, मानप्रतिष्ठा में कमी, स्वयं एवं संतान को रोग, राजकीय कर्मचारियों से वाद-विवाद एवं अनबन, प्रवास में दुर्घटना तथा लाभ में कमी आती है। 
जन्मराशि से छठा: जब सूर्य छठे स्थान में भ्रमण करता है तब रोगनाश, शत्रु पराजय, आरोग्य लाभ, उत्साह, आनंद, कार्यसिद्धि, अन्न-वस्त्र का लाभ, कोर्ट-कचहरी एवं सत्ता संबंधी कार्यों में यश, स्वकर्तत्व में बढ़ोत्तरी, मन व शरीर का प्रफुल्लित रहना, नौकरों का सहयोग एवं उनसे लाभ होता हे। 
जन्मराशि से सातवां: जब सूर्य सातवें स्थान में भ्रमण करता है तब सिरदर्द, पेटदर्द, अधिक परिश्रम, सुखोपभोग में बाधा, अनारोग्य, पारिवारिक एवं वैवाहिक जीवन में बैमनस्यता, पत्नी एवं पुत्र को रोग-कष्ट, व्यापारव्यवसाय में समस्याएं, प्रवास में कष्ट, धनहानि, मानहानि, मन की अस्वस्थता, साझेदारी एवं कोर्ट-कचहरी के कामों में कष्ट, पत्नी से झगड़ा तथा संतान को कष्ट होता है। 
जन्मराशि से आठवां: जब सूर्य आठवें स्थान में भ्रमण करता है तब रोग, कलह, पत्ली एवं संतान को कष्ट, नुकसान, अपयश, बवासीर एवं रक्‍्तस्राव से कष्ट, राजभय, मुकदमा, दंड, बंधन आदि होता है। 
जन्मराशि से नौवां: जब सूर्य नोवें स्थान में भ्रमण करता है तब कार्यनाश, दीनता, प्रत्येक काम में अपयश, झूठे लांछन, मित्र एवं बंधुओं से मतभिन्नता, वाद-विवाद, प्रवास, धार्मिक कार्य, बडे लोगों से सम्पर्क होते हैं। 
जन्मराशि से दसवां: जब सूर्य दसवें स्थान में भ्रमण करता है तब महान कार्यसिद्धि, लाभ, आर्थिक स्थिति में सुधार, सामाजिक एवं राजकीय प्रतिष्ठा प्राप्ति, रुचिकर भोजन, नए पद की प्राप्ति, बड़े-बूढ़ों के आशीर्वाद, मांगलिक कार्य, पिता से लाभ, शासन की कृपा एवं मित्रों से सहायता मिलती है। जन्मराशि से 
ग्यारहवां: जब सूर्य ग्यारहवें स्थान में भ्रमण करता है तब रोगनाश, सम्मान प्राप्ति, लाभ, आर्थिक स्थिति में सुधार, रुचिकर भोजन, नए चद की प्राप्ति, कोर्ट-कचहरी एवं राजदरबार से संबंधित कार्यों में यश प्राप्ति, 
वृद्धजनों के आशीर्वाद, मांगलिक कार्य, पिता से लाभ एवं मित्रों से सहयोग प्राप्त होता है। 

जनमराशि से बारहवां: जब सूर्य गोचर से बारहवें स्थान में भ्रमण करता है तब धननाश, ज्वरपीड़ा, सिरदर्द, पेटदर्द, कार्य एवं पदावनति, मित्रों का शत्रुवत व्यवहार, कुसंगति, परदेस भ्रमण, अनावश्यक व्यय आदि फल होते हैं। 



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