गुरु की सारगर्भित सम्पूर्ण व्याख्या

    गुरु
    अकलुषांशुजटिलः पृथुमूर्तिः । कुमुन्दकुन्दकुसुमस्फटिकाभः ।।
ग्रहहतो न यदि सत्पथवर्ती। हितकरोमरगुरुर्मनुजानाम् ।।
(बृहत्संहिता पृ. ४९)
गुरु आकार से बड़ा हो, निर्मल किरणोंसे युक्त हो और कुमुद,कुंद अथवा स्फटिक के समान शुभ्र वर्ण से प्रकाशमान हो, अन्य ग्रह
से बाधित न हो तथा योग्य मार्ग से (उत्तर क्रांति से) जा रहा हो तोमनुष्योंमात्राओं का हित करता है।
    दीर्घाकारश्चारूचामी कराभो मञ्जासारः सुस्बरोदार बुद्धिः।दक्षः पिङ्गाक्षः कफी चातिमांसः प्राज्ञः सुजैः कीर्तिते जीवसजः॥बृहस्पति अंगिरा गोत्रीय है। वाहन हाथी है। बृहस्पति से संबद्ध जातकशांत, सौंदर्यंप्रिय, उदार, तीक्ष्ण बुद्धि का, लम्बे शरीर वाला, सोने के वर्ण वाला,सुंदर वाणी बोलने वाला, उदार, चतुर, पीली आंखों वाला, कफ प्रकृति,अधिक मांस वाला और विद्वान होता है।
    सौरमंडल में बृहस्पति का विशिष्ट स्थान है। इसे देवों का गुरु होने कागौरव प्राप्त है। यह स्थूल रूप से एक राशि में एक साल तक परिश्रमण करता  है। पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। आंगिरस, वाक्पति, जीव, गुरु,प्रशान्त, देवपूज्य, सुराधिप, वचसांपति, चित्रशिखंडिज, वाचस्पति, सुराचार्य,इज्यद्युति आदि बृहस्पति के पर्याय नाम हैं।
    बृहस्पति का रंग पीला, प्रकृति-कफ, वर्ण-ब्राह्मण, त्व-आकाश, लिंग-पुरुषशुभ/क्रर-शुभ, गुण-सत्व, दिशा-ईशान, ऋतु-हेमन्त, रस-मधुर, धातु-पीतल,भावकारक पंचम, दशम, एकादश, राशि अवधि लगभग। वर्ष, अधिष्ठाता-ज्ञानका। अपने स्थान से पंचम, सप्तम और नवम स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है।धनु-मीन इसकी स्वराशियां हैं। कर्क राशि में यह उच्च तथा मकर राशि मेंनीच का होता है।
    मांगल्य कर्म, धर्म, शिक्षा, सोना, धान्य, पुत्र, प्रज्ञा-ज्ञान, शरीर-पुष्टि,शाप, शोक, यजन, गृह, वस्त्र, पात्र-मित्र, आंदोलन, सुख, मंत्र, राजतंत्र,नैष्ठिक, गज-तुरंग, बोधकर्म, जीवन-साधन, कर्मयोग, सिंहासन, वचन पटुता,प्रवचनकार, व्याख्याता, लेखक, प्रकाशक, काव्य, राज्यकृपा, सचिव, आचार्य,शास्त्र, स्मृति, न्यायाधीश, वकील, विद्यार्थी, लोकसंग्रह, देवस्थान, सभी प्रकारका सुख, शिवोपासना, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि अनेक विषय-वस्तुओंका कारक बृहस्पति ही है।
    पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद इसके नक्षत्र हैं। जन्म समय में चंद्रमाजब इन नक्षत्रों में से किसी एक पर होता है तो बृहस्पति की महादशा चलतीहै। जलोदर, यकृत के रोग, फेफड़ों के रोग, मस्तिष्क की रक्तवाहिनी के रोग,आंत्रशोथ, उदर शूल, रीढ़ की हड्डी का दर्द, लम्बा बुखार बृहस्पति कीअशुभ स्थिति के कारण होता है।
    

गुरु ग्रह विद्वानों का प्रतीक है। समाज में आर्थिक दृष्टि से विद्वानों की मान्यता नहीं है। उनकी अवहेलना होती है। कभी कभी खाने को मिलने की भी मुश्किल होती है। वह आजन्म परिश्रम करता है। रातदिन के कष्ट के कारण स्त्री-पुत्रों की ओर भी ध्यान नहीं देता। किंतु उसकी कीर्ति मृत्यु के बाद ही फैलती है। 'स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते' ऐसी कहावत है किन्तु यह सन्मान विद्वानों में ही मिलता है, अन्य लोगों में नही ।
विद्वान्नेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम्।
नहि वन्ध्या विजानाति गुवी प्रसववेदनाम्।।
ऐसे विद्वान को यूनिवर्सिटी की एकाध पदवी प्राप्त होगी, अन्य आर्थिक लाभ बहुत कम मिलता है। इसीलिए समाज में शिक्षक,प्राध्यापक, दार्शनिक, प्रवचनकार, साधु इनकी स्थिति दयनीय दिखाई देती है। तथापि विद्वान दुरवस्था में होते हुए भी लोगों की परवाह न करते हुये अपने ध्येय की प्राप्ति के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहता है। इसके पास धन नहीं होता किंतु शास्त्रज्ञान होता है। वह शत्रुओं पर जय प्राप्त नहीं करता किंतु विद्वान वादियों को जीतता है। इसके नौकरचाकर नहीं होते किन्तु शिष्य उसकी सेवा करते है। अत: विद्वान पुरुष सांसरिक दृष्टि से सुखी न हो कर भी किसी श्रीमान या अधिकारी पुरुष से कम महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसे विद्वानों का प्रतिनिधि ग्रह गुरु है। | पुराणों में गुरुके अशुभ फलों के बारे में भी वर्णन मिलते हैं। कहा है कि लग्न में गुरु होने से राम को वनवास हुआ। तृतीय के गुरु से बलि पाताल में गया। चतुर्थ के गुरु से हरिश्चन्द्र की सत्त्व परीक्षा हुई। षष्ठ के गुरु से द्रौपदी का वस्त्रहरण हुआ। आठवे गुरु से रावण का नाश हुआ। दसवें गुरु से दुर्योधन का और बारहतवें से पाण्डु का मृत्यु हुआ। ह ह जन्मलग्ने गुरुश्खवैज रामचन्द्रो खने गत:ः। तृतीये बलिः पाताले चतुर्थे हरिश्चन्द्रयोः।। पषष्ठे द्रोषपदीहरणं च हन्ति राजणअष्टमे। दशमे दर्योधन हन्ति ढादशे पाण्डु बनागतम्‌।। इसके अतिरिक्त भीष्म का राज्याधिकार से वंचित होना दशरथ का पुत्रशोक, अजराज का पत्नीवियोग, विश्वामित्र का अभक्ष्य भक्षण, नलराजा का वनवास-इन सबका कारण गुरु की अशुभ स्थिति मानो गयी है। भीष्म के द्वितीय में मकर का, दशरथ के पंचम में, अज के सप्तम में, विश्वामित्र के नवम में और नर के सवाभस्थान में गुरु अशुभ स्थिति में था। (इन सभी के पत्रिन्कामे कर्क का गुरु था।) 
सभी काल, बल, महिने, बैडूर्य रत्न, अग्निष्टोम यज्ञ का फल, मीठी रूचि, सत्त्व, सुख-दुख, ऊंचाई, सोने के अलंकार, तन्त्र, वात, श्लेष्मरोग, पुष्पराग रत्न, असत्य शास्त्र, मृदु पत्थर, शिव की उपासना, नैष्ठिकता, चतुरता, प्रयाण। 

विलिमय लिली - दीखने में यह ग्रह सब से बड़ा है। इस का रंग भो सबसे अधिक उजला है। यह प्रकाश कुछ पीला सा स्वच्छ होता है। इसकी गति शनि से अधिक है। राशिचक्र की परिक्रमा यह १४ वर्ष ३१४ दिन १२ घंटों में पूरी करता है। इसकी मध्यम गति ४ मिनिट ५२ सेकिंड है। इसका अधिकतम उत्तरी शर १ अंश ३८ मिनिट है और दक्षिणी शर १ अंश ४० मिनिट है। यह कोई १२० दिन वक्री रहता है। इस काल में पहले पांच दिन और अन्त में चार दिन इसकी गति स्तंभित होती है। यह पुरुष ग्रह है। स्वभाव से कुछ गरम, आर्द्र है। यह संयम, नम्नता, गंभीरता, न्याय और उत्तम भाग्य का कारक है। 

उपर्युक्त मतों का विवेचन -

नैसर्गिक कुंडली में गुरु नवम्‌ और व्ययस्थान का स्वामी है। नवम स्थान से ज्ञान, बुद्धि का विकास, आध्यात्मिक गुरु, ज्ञानदान इनका विचार होता है। बारहवें स्थान मे मोक्ष, विश्वबन्धुता, परोपकार आदि का बोध होता है। गुरु शब्द का व्युत्पत्ति की दृष्टि से अर्थ होता है अज्ञान का नाशक (गु 5 अज्ञान, रु * नाशक)। हृदयस्थित अज्ञानरूप अन्धकार गुरु के उपदेश से प्राप्त ज्ञानरूप प्रकाश से विलीन हो जाता है। भारतीय परमार्थसाधना में अत्युज्ब ज्ञान प्राप्त करने के लिए संसार और शरीर के प्रति आसक्ति छोडना पडता है। इसी के प्रतीक स्वरूप गुरु ग्रह के अधिकार के व्यक्ति ज्ञानी, विद्वान किन्तु सांसारिक सुख से दूर ही पाये जाते हैं। ज्ञान के स्वामित्व के कारण ही गुरु को देवों का मन्त्री कहा गया है। 

सप्ए्य परिचय (ग्रहयोनिभेदाध्यय) 

आचार्य - जीवो ज्ञानं, सूरि: पूजितश्च सचिवौ:, गुरुगौरगात्र:। पीतं, गुरु, मेद., कोश:, मध्यं, रौप्यं, हेमनत:, मधुरम्‌।। ज्ञानी, आचार्य, देवों का मन्‍त्री, कुछ पीला गोरा वर्ण-यह गुरु का स्वरूप है। मेद, खजाना, मध्यम आयु, चांदी, हेमन्‍त ऋतु और मधुर रुचि पर गुरु का अधिकार है। ह 

कल्याणवर्मा - आचार्य के समान वर्णन है - सिर्फ ऋग्वेदाधिपति: (ऋग्वेद का स्वामी) यह विशेषण अधिक है। 

वैद्यनाथ - देवाचार्य: सौख्यविज्ञानसागर:, शुभदौ देवेज्यौ: जीवस्तुभयतो ब्रजेत्‌, पुरन्दराचार्य:, द्विपात्‌, बुधालयग्रामचरौ गुरु:, त्रिंशत्‌ वर्षाणि गुरु, शाखाधिपो जीव:, देवता इन्द्र:, देवेज्यस्य च पुष्पराग:, ईशान्यदिशा, विन्ध्यान्तमार्य:, विप्रो जीव:, अमरमन्त्री सत्त्व-प्रधानग्रह:, नराकारो, गुरु:, वियत्‌ सुराचार्य:, वसा, गुरू मास, विलग्न:, अमरेज्य:, मृदु:, सुरेज्यो: कुजेन जीवो: - यह सुख और ज्ञान का सागर है शुभ है, दोनों ओर से चलता है। द्विपाद, विद्वानों के निवासस्थान, तीस वर्ष की आयु, पुष्पराग रत्न, ईशान्य दिशा, गोदावरी श्ले विन्ध्यपर्वत तक का प्रदेश, ब्राह्मण, सत्त्वगुण, मनुष्याकृति, आकाश, वसाधातु, मृदुता इनपर गुरु का अधिकार है। इसकी देवता इन्द्र है। यह मंगल के द्वारा पराजित होता है। 

पराशर - धर्म, गुरु: सफल:, पीताम्बर: - सफलता, पीला वस्त्र, धर्म इन पर गुरु का अधिकार है। 

सवर्थिचिन्तामणि - गुरोः समभागदृष्टि:, दिनबली। गुरु की . दृष्टि समभाग होती है, यह दिन में बलवान होता है। 

जयदेव कवि - प्रभातं गुरु., उदड्समुखः, वाणिक् गुरुः, देवेज्य: सुखकरः सदा, जीवश्च जीवं प्राहूर्महाधिपाः गुरु
स्थविरो ग्रह:, गुरुः प्रात:काल का स्वामी है, उत्तर की और मुख है। वृद्ध, व्यापारी पर इसका अधिकार है। यह सुखदायक है।
कालिदास -
भूदेवस्वगुरुस्वकर्मरथ गोपादांतनिक्षे षका:
मीमांसोनिधिवाजिमाहिषबृ हृद्गात्रप्रतापा यशः । तर्कज्यौतिष- पुत्रपौत्रजठरव्याधिद्विपात्संपदोः वेदान्तं प्रतितामहादिपुरुषप्रासाद- गोमेधिका:।॥ जेष्ठ भ्रात्पितामहेन्द्रशिशिरतग्राणि रत्नं वाणिक
देहारोग्यविचित्र हम्प्नृपसन्मानोरुदेवास्तपः दानं धर्मपरोपकारसमदूकचोदडमुखो बर्तुलं पीतं ग्रामचरोत्तरप्रियसखान्दोलादिवाग्धोरणी: । मेदो
मध्यपटौ नवीनगृहसौख्यंवृद्वमन्त्रद्विजाः तीर्थाजानुसुवर्गलोकसरण
सौख्यप्रदानं गृहम् । धी: प्रज्ञाधिककाव्यगोपुरसभासन्मो्दसिंहासन-
ब्रह्मस्थापन सार्वकालबलमासाः पात्रवैड्ू्यकौ। । अग्निष्टोममहाफर्ल
मधुरसः सत्त्व सुखासौख्यके। दीर्घः: सौम्यपरोडिगते च कनकालंकार-
तन्त्रादिकः । वातश्लेष्मसुपुष्पराग निगमाभासा मृद्प्रस्तरं शैवोपासनं- नैष्ठिक्त्वंचतुरतारण्यप्रयाणं गुरौ।। इस मत के अनुसार गुरु के अधिकार में निम्नलिखित विषय है -
ब्राह्मण, गुरु, अपना काम, रथ, गाय, पैदल सेना, निक्षेपक, मीमांसा, गड़ा हुआ धन, घोड़े, भैंस, बड़े अवयव, प्रताप, कीति, तर्कशास्त्र, ज्योतिष, पुत्रपौत्र, पेट के रोग, दोपाये प्राणी, वेदान्त, परदादा इत्यादि पुरखे, प्रासाद, गोमेधिक, बड़े भाई, दादा, शिशिर ऋतु, रत्न, व्यापारी, शरीर का आरोग्य, सन्दर घर, राजसन्मान।
तपश्चर्या, दान, धर्म, परोपकार, समदृष्टे, उत्तर दिशा, वर्लुलाकृति, पीला रंग, गांव के प्राणी, प्रिय मित्र, झुला, मेद, मध्य, वस्त्र, नय चर, बड़े बूढ़ों की सलाह, तीर्थ, सुख देनेवाला घर, बुद्धि, काब्य, गोपुर, सभा, सत्पुरुषोंका आनन्द, सिंहासन, ब्रह्यदेव की स्थापना
सभी काल, बल, महिने, वैडूर्य रत्न,अग्निष्टोम यज्ञ का फल, मीठी रुचि, सत्त्व, सुख-दुख, ऊंचाई, सोने के अलंकार, तन्त्र, वात, श्लेष्मरोग, पुष्पराग रत्न, असत्य शास्त्र, मृदु पत्थर, शिव की उपासना, नैष्ठिकता, चतुरता, प्रयाण।

विलिमय लिली - दीखने में यह ग्रह सब से बड़ा है। इस का रंग भी सबसे अधिक उजला है। यह प्रकाश कुछ पीला सा स्वच्छ होता है। इसकी गति शनि से अधिक है। राशिचक्र की परिक्रमा यह १४ वर्ष ३१४ दिन १२ घंटों में पूरी करता है। इसकी मध्यम गति ४ मिनिट ५२ सेकिंड है। इसका अधिकतम उत्तरी शर १ अंश ३८ मिनिट है और दक्षिणी शर १ अंश ४० मिनिट है। यह कोई १२० दिन वक्री रहता है।इस काल में पहले पांच दिन और अन्त में चार दिन इसकी गति स्तंभित होती है। यह पुरुष ग्रह है। स्वभाव से कुछ गरम, आर्द्र है। यह संयम,नम्रता, गंभीरता, न्याय और उत्तम भाग्य का कारक है।

उपर्युक्त मतों का विवेचन

नैसर्गिक कुंडली में गुरु नवम् और व्ययस्थान का स्वामी है। नवम स्थान से ज्ञान, बुद्धि का विकास, आध्यात्मिक गुरु, ज्ञानदान इनका विचार होता है। बारहवें स्थान मे मोक्ष, विश्वबन्धुता, परोपकार आदि का बोध होता है। गुरु शब्द का व्युत्पत्ति की दृष्टि से अर्थ होता है अज्ञान का नाशक (गु = अज्ञान, रु = नाशक)। हृदयस्थित अज्ञानरूप अन्धकार गुरु के उपदेश से प्राप्त ज्ञानरूप प्रकाश से विलीन हो जाता है। भारतीय परमार्थसाधना में अत्युच्च ज्ञान प्राप्त करने के लिए संसार और शरीर के प्रति आसक्ति छोडना पडता है। इसी के प्रतीक स्वरूप गुरु ग्रह के अधिकार के व्यक्ति ज्ञानी, विद्वान किन्तु सांसारिक सुख से दूर ही पाये जाते हैं। ज्ञान के स्वामित्व के कारण ही गुरु को देवों का मन्त्री कहा गया है।
वर्ण - इसका रंग कुछ पीला गोरा है, यह आंखों से ही स्पष्र
दिखाई देता है। धातु मेद पर इसका अधिकार माना है। इसका कारण शायद यह है कि इसका आकार सब ग्रहों से बड़ा है। कामला से पीडिन व्यक्ति जैसा इसका रंग भी मेद वृद्धि का सूचक है। किन्तु इस ग्रह के अधिकार में जो व्यक्ति होते हैं उन्हें उत्तर वय में मेदव्ृद्धि होती
है। पूर्ववय में नहीं । पराशर ने चर्म अर्थात त्वचा का स्वामी गुरु को माना है। किन्तु यह ठीक प्रतीत नहीं होता।
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कोश - खजाने का कारकत्व गुरु के अधिकार में कहना ठीकनहीं है। गुरू के अधिकार के व्यक्ति द्रव्यसंचय नहीं कर सकते, न उन्हें उसकी फिक्र ही होती है।
वस्त्र - मध्यम, न बहुत ऊचा, न बहुत हलका तथा पीतपोला यह वर्णन शायद इसके रंग के अनुसार है।
धातु - रौप्य अर्थात चांदी का अधिकार गौर वर्ण के कारण
इसे दिया है। किन्तु हमारे मत से कांसे का अधिकार गुरु को देना चाहिये।
ऋतु - हेमन्त अथवा शिशिर ऋत-इस वर्णन का कारण समझ में नहीं आाता। शायद इस ग्रह का शीत स्वरूप देखकर यह कल्पना की हो।
रूचि मधुर रुचि इन व्यक्तियों में तीखे चरपरे और मधुर ये दो रस प्रिय होते हैं। मूलत: यह रूक्ष, शीत और रुचिहिन है। ठंडी के कारण शायद इसे मधुर रुचि का स्वामी कहा है।
ऋग्वेद - इसके स्वामित्व का गुरु से सम्बन्ध स्पष्ट नहीं है।
बल सायंकाल में यह बलवान होता है ऐसा कहा गया है।किन्तु वाचन- लेखन के लिए सुबह और रात का ही समय उपयुवत होता है अत: यह वर्णन ठीक नहीं।
    लोक - विबुधलोक अर्थात स्वर्ग का यह अधिपति माना गया
है। ज्ञानी पुरुष मृत्यु के बाद स्वर्ग में ही जाते हैं


जीवस्तुभवतो वृजेत -ग्रहां के उदय की कल्पना रवि-विचारमें स्पष्ट की है।

    द्विपाद - ज्ञान की अधिकता मनुष्यादि दोपाये प्राणियों मेंपायी जाती है। अतः यह विषय गुरु के अधिकार में है।

    आयु- कुछ लोगों ने तीस वर्ष और कुछ लोगों ने बृद्ध अवस्थामानी है। हमारे अनुभव से ४२ वें वर्ष के बाद की आयु पर गुरु काअधिकार प्रतीत होता है।

    शाखाधिप - यह वैद्यनाथ का वर्णन है। इसके स्थान में कुछशास्त्रकार जीवाधिप शब्द का प्रयोग करते हैं। इस वर्णन का उद्देशस्पष्ट नहीं है। फिर भी दूसरा शब्द अधिक उपयुक्त है।

    देवता - इन्द्र स्वर्ग का अधिपति है। इसी का मन्त्री गुरु है।किन्तु उपासना में इन्द्र का उपयोग नहीं होता।

    पुष्पराग - रंग की समानता के कारण यह रत्न गुरु का कहाहै। इसका फल भी अनुभव में आता है। किन्तु वृषभ, कन्या, तुलाऔर मकर लग्न के व्यक्तियों ने इस रत्न का प्रयोग नहीं करनाचाहिये। क्योंकि इन्हें गुरु अनिष्ट होता है। दशमस्थान में हो तो भीइन्हें गुरु का फल अशुभ ही मिलता है। अन्य लग्नों में इस रत्न केउपयोग से लाभ होता है।

    दिशा - ईशान्य - यह देवों का निवासस्थान है। भारत केउत्तर में हिमालय के परिसर में देवता रहते हैं ऐसी धारणा पुरानेसमय प्रचलित थी। अतः यह दिशा गुरु के स्वामित्व मे कही गई।प्रदेश - गोदावरी से विन्ध्य तक का प्रदेश गुरु के अधिकार में है।
    वर्ण - ब्राह्मण-ज्ञानदान का कार्य ब्राह्मण करते हैं अतः यहगुरु का वर्ण कहा गया। किन्तु कुछ शास्त्रकारोंने वैश्य वर्ण कहा उसका भी अनुभव आता है।

    गुण - सत्त्वप्रधान-गुरु का शान्त और रुक्ष स्वरूप देखकर यहवर्णन किया गया है।

    आकार -पुरुषाकृति-इस ग्रह के स्वामित्व के व्यक्तियों केविचार पौरुषपूर्ण होते हैं।

    तत्त्व - आकाश-इस वर्णन का तात्पर्य स्पष्ट नहीं।काल - महीना-इस वर्णन का उपयोग प्रश्न कुण्डली केविवरण में ही हो सकता है।

    बल - इसे लग्न में बलवान माना है। किन्तु ऐसा हो तो पूर्वदिशा का स्वामित्व इसे क्यों नहीं दिया गया ?

    मृदु - देखने में गुरु का तेज उग्र नहीं-मृदु है। इसके अधिकारके व्यक्तियों का शरीर भी मृदु ही होता है।

    पराभव - बैद्यनाथने मंगल के द्वारा गुरु का पराजय कहा है।किन्तु हमारे अनुभव से यह कार्य चन्द्र का है।

    वृक्ष - फल देनेवाले वृक्षों पर गुरु का अधिकार है।दृष्टि - समदृष्टि-शिक्षक सभी शिष्यों को समान रूप सेपढ़ाता है अतः गुरु की दृष्टि सम कही गयी है।

    उदङमुख - उत्तर की ओर गुरु थोडा चपटा है अतः यह वर्णनकिया गया होगा। इस वर्णन में कुछ विषय बुध ग्रह के समान हैं, उनका विवेचनबुध-विचार में देखना चाहिये।

★★★वैदिक बृहस्पति ★★★
       पुराणों में बृहस्पति के पिता का नाम अंगिरा है पर वेद में अंगिरा कोई एक मानव नहीं है। शब्द बहुवचनान्त है। ऋग्वेद का कथन है कि अंगिरस आकाश के पुत्र हैं तथा उनमें इन्द्र और अग्नि श्रेष्ठ हैं। ऋग्वेद ४ । ५० के ११ मन्त्रों में बृहस्पति शब्द १० बार आया है। अन्य वेदों में भी अनेक बार आया है और वहाँ प्रायः उसका अर्थ परमात्मा है क्योंकि वह बृहतों का पति है किन्तु कई स्थानों में उसका बृहस्पति ग्रह के रूप में भी वर्णन है क्योंकि उसे आकाश को महान ज्योति और पुष्य नक्षत्र के पास स्थित कहा है। मन्त्र ये हैं- 

"त्वमग्ने प्रथमो अंगिरस्तमः।"( ऋ० १/३१/२)

"अंगिरस्तम इन्द्रः।"( ऋ० १/१३०/३)

" बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्।"( ऋ० ४/५०/४)

"बृहस्पतिः प्रथमं जायमानः तिष्यं नक्षत्रमभिसंबभूव।"( तै० प्रा० ३/१/१)

"बृहस्पतिर्नः परिपातु।"( २०।८६।११)

" बृहस्पतिः समजयत् ॥"(अथर्ववेद २०/ ९०/३)

        बृहस्पति और पुष्य नक्षत्र का योग मनोहर होता है। वेद में बृहस्पति पुष्य का स्वामी कहा गया है और आज का ज्योतिष भी गुरु-पुष्य को शुभ कहता है। चूँकि बृहस्पति का अर्थ परमात्मा या ब्रह्मा भी है इसलिये बृहस्पति पुष्य के योग को ब्रह्मा पुष्य का विवाह भी कहा जा सकता है क्योंकि वेद में चन्द्रमा से सूर्यकिरण के संयोग को सूर्याचन्द्र का विवाह कहा है। जो पुराण रोहिणीमृग के चित्र को सरस्वती ब्रह्मा का कामयुद्ध कहते हैं वे बृहस्पतिपुष्य के योग में भी अश्लीलता देख सकते हैं और ब्रह्मा द्वारा पुष्य को शाप दिला सकते हैं। वस्तुतः आज इसी कल्पना के आधार पर पुष्य नक्षत्र विवाहादि में निषिद्ध हो गया है। पुराणों में भाई उतथ्य की पत्नी ममता के साथ बृहस्पति के व्यभिचार का और दीर्घतमा (गौतम) के जन्म का जो अश्लील वर्णन है वह भी वेद में आकाश की ही कथा है। ऋग्वेद (१/१५८) में स्पष्ट लिखा है कि सूर्य प्रकाश रूपी नदी में दीर्घतम डूब रहा था। 

"न मा गरन्नद्यो मातृतमाः ५॥ दीर्घतमा मामतेयो... ६ ।।"

     चन्द्रमा, तारा और बृहस्पति सम्बन्धी कथा के विषय में ऋग्वेद का कथन है कि बृहस्पति ने अपनी पत्नी जुहू छोड़ी, सोम राजा ने उसे पुनः भेजा, मित्रावरुण ने समर्थन किया और अग्नि ने हाथ पकड़ कर स्वयं पहुँचाया। तब सोम द्वारा लायो जाया को बृहस्पति ने पुनः स्वीकार कर लिया। 

"सोमो राजा ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छद् अग्निर्हस्तगृह्या निनाय।"( ऋग्वेद१०/१०९/२)

" तेन जायामन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीताम्।"(ऋग्वेद १०/१०९/५)

     वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस कथा का अर्थ यह है कि सोमराजा का हर मास में पुष्य से संयोग होता है पर बृहस्पति उसे छोड़ने के १२ वर्ष बाद फिर वहाँ आते हैं तथा इस बीच में मित्र, वरुण और अग्नि देव उससे कई बार मिल लेते हैं। विद्वानों ने इसके आध्यात्मिक अर्थ भी लगाये हैं। वेदों ने ईश्वर (ब्रह्मा) को बृहस्पति और बुद्धिपति कहा है। ज्योतिष ने बृहस्पति ग्रह को परमात्मा का ज्ञान और सुख, शुक्र को कामदेव, चन्द्रमा को मन और बुध को वचन कहा है (बृहज्जातक)। बुद्धि पोषिका होने से पुष्य है और तारिका होने से। है। यही जुहू है। इसके पास बृहस्पति (ज्ञान सुख) कभी-कभी आते हैं पर काम आदि सर्वदा चक्कर काटते रहते हैं। यही है बृहस्पति और तारा की कथा का वैदिक तथ्य।

★★★वैज्ञानिक और पौराणिक बृहस्पति★★★

           इसको देवगुरु और आंगिरस आदि भी कहते हैं। तेजस्विता में इसका शुक्र के बाद दूसरा स्थान है। इसकी अमाप्रदक्षिणा ४०० दिवसों में होती है। ग्रहलाघव के अनुसार यह अस्त होने के एक मास बाद उदित होता है, उसके सवा चार (मास के बाद वक्री होता है, पुनः चार मास बाद मार्गी होता है और फिर उसके सवा चार मास बाद अस्त होता है। यह मध्यम मान है। इसका व्यास ८६००० मील है। घनफल पृथ्वी का १२४० गुना और द्रव्य ३०० गुना है। प्राचीन ऋषियों ने इसीलिये इसको गुरु (भारो) कहा है। यह एक सेकेण्ड में आठ मील चलता है। इसमें थोड़ा निजी प्रकाश और घोड़ो उष्णता भी है। 

   यह सूर्य की अपेक्षा हमसे दूर है और सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होता है फिर भी जन्मपत्री में सूर्य चन्द्र से अधिक महत्त्वपूर्ण है। सूर्य पाप ग्रह है और उसकी किरण से प्रकाशित होने वाले गुरू शुक्र शुभग्रह हैं सूर्य चन्द्र एक-एक राशि के स्वामी हैं पर गुरु शुक्र आदि दो-दो के इसका कारण यह है कि ग्रहों और तारों का भाग्य ज्योतिषियों को मुट्ठी में है।

    देव हमारे पूज्य हैं पर पुराणों के मत में देवों के पूज्य बृहस्पति अपनी गर्भवती भाभी से संभोग कर भरद्वाज को पैदा करते हैं, उनकी पत्नी तारा पुंश्चली है और पुत्र बुध दोगला है। ज्योतिषशास्त्र में बृहस्पति पुष्यनक्षत्र के स्वामी हैं पर उसमें विवाह होने से ब्रह्मा इतने कामी हो गये कि शिव के बाण से घायल होकर भी अभी मृग बन कर पुत्रो रोहिणी के पीछे दौड़ रहे हैं। ब्रह्मा ने पुष्य को इसी कारण शाप दे दिया है। आजकल उसमें विवाह नहीं होता।
    गुरु का स्वरूप

    आचार्य - बृहतनुः पिंगलमूर्धजेक्षणो बृहस्पतिः श्रेष्ठमतिःकफात्मकः। इसका शरीर बड़ा, केश व नेत्र लाल-पीले, बुद्ध श्रेष्ठएवं प्रकृति कफप्रधान होती है।

    कल्याणवर्मा - ईषत्पिंगललोचनः श्रुतिधरः सिंहाब्दनादः स्थिरः

    सत्त्वाढ्यः सुविशुद्धकांचनवपुः पीनोन्नतोरः स्थलः। व्हस्वो धर्मरतोविनीतनिपुणो बद्धोत्कटाक्ष: क्षमी स्यात्पीताम्बरधृककफात्मकतनुर्मेंद-प्रधानो गुरुः।।

    इसकी आँखे कुछ लाल पीले वर्ण की होती है, आवाज सिंहया मेघ जैसा गंभीर होता है, स्वभाव सात्विक और स्थिर होता है,वर्ण सोने जैसा गोरा और छाती पुष्ट होती है। कद छोटा होता है।यह धर्मनिष्ठ, विनयशील, समाधान, कफ प्रकृति का, पीलेवस्त्रपहननेवाला और मोटा होता है।

    गुणाकार - उत्कृष्टबुद्धिः कलधौतगौरः। प्राज्ञो गुरुः। इसकीबुद्धि उत्तम और वर्ण सोने जैसा गोरा होता है। यह ज्ञानी होता है।शेष वर्णन कल्याणवर्मा के समान है।

    पराशर - बृहद्गात्रविशारदः। अवयव बड़े होते हैं। यह सबशास्त्रोमें प्रवीण होता है।

    वैद्यनाथ - बृहत् उदरशरीरः सकलगुणसमेतः कपिलरुचिकचाक्षःअलघुनृपतिचिन्हः। इसका पेट और शरीर बड़ा होता है, केश और आँखेकाली होती हैं। यह सब गुणों से और कई राजचिन्हों से युक्त होता है।सर्वार्थचिन्तामणि - हास्यप्रियः पित्तकफानिलात्मा सद्य:

    प्रतापीननु पुश्चलश्च। बृहस्पतिस्तुदिलगात्रयष्टिः कफात्मकः श्रेष्ठमतिः    सुविद्वान्। यह हंसमुख होता है। पित, कफ और वायु का समानप्रमाण होता है। यह शीघ्र ही प्रतापी होता है। व्याभिचारी, मोटा,बुद्धिमान, विद्वान और कफप्रकृति का होता है।

    ढुंढिराज - न्हस्वाकारश्चारुचामीकरामः सम्यक्सारः सुस्वरोदार-बुद्धिः। दक्षः पिंगाक्षः कफी चातिमांसः प्राज्ञः सुज्ञः कीर्तितोजीवसंज्ञः।।इसका कद नाटा, वर्ण सोने के समान, आवाज मधुर, बुद्धि उदारतथा बल अच्छा होता है। आँखे लालपीली और प्रकृति कफप्रधानहोती है। यह दक्ष और ज्ञानी होता है।

    विलियम लिली - यह सीधे ऊंचे कद का, लाल-पीले वर्ण काऔर सुन्दर होता है। आँखे बड़ी, लंबी और कुछ गोल होती हैं।मस्तक ऊंचा, केश मृदु और लाल-पीले वर्ण के होते हैं। डाढी बढ़ीऔर पेट भी बड़ा होता है। इसके पुठ्ठे और पैर मजबूत औरप्रमाणबद्ध होते हैं। किंतु पैर के तलुवे बहुत बड़े दिखते हैं। इसकाबोलना गम्भीर और सूझबूझ का होता है। यह पूर्व की ओर हो तोत्वचा अधिक स्वच्छ होती है। वर्ण शहद के समान लाल-गोरा होताहै। आँखे बड़ी और शरीर मोटा होता है। प्रायः दाहिने पैर परजन्मजात चिन्ह होता है। यह पश्चिम की ओर हो तो आकृति सुन्दरऔर कद नाटा होता है। केश लाल-पीले, मृदु होते हैं। मस्तक केपास कुछ गंजापन होता है। मध्यम आयु के ये व्यक्ति निर्णय अच्छीतरह और गम्भीरतापूर्वक ले सकते हैं। यह कुण्डली में शुभ हो तोयह उदार, विश्वसनीय, लज्जाशील और अच्छी बातों में महत्त्वाकांक्षीहोता है। सभी कामों में यह,सच्चाई का व्यवहार चाहता है औरसभी को मदद करने के लिए सत्कृत्य करता है। यह आदरणीय औरधार्मिक प्रवृत्ति का होता है। यह मधुर और प्रिय बोलता है। स्त्रीपुत्रोंपर बहुत प्रेम करता है। वृद्ध पुरुषों का आदर करता है। गरीबों को     उदारतापूर्वक मदद करता है। कठोर कृत्यों का यह तिरस्कार करताहै। यह न्यायी, बुद्धिमान, होशियार, कृतज्ञ और सदगुणी होता है।कुण्डली में यह अशुभ हो तो-पैतृक सम्पत्ति का दुरुपयोग करता है,धार्मिक दृष्टि से दाम्भिक होता है; हठपूर्वक झूठे धार्मिक तत्त्वों काप्रतिपादन करता है। इसे आशंका होती है कि हर कोई इसे ठगानाचाहता है। अज्ञानी, बेपरवाह और मित्रता की कद्र न करनेवालाहोता है। क्रियाशक्ति थोडी और मन्द होती है। मित्रमंडली में अपनेव्यवहारसे नीचता प्रकट करता है।

    उपर्युक्त मतों का विवेचन - इस वर्णन में शारिरीक वर्णनऔर रूप-रंग का भाग गुरु के प्रत्यक्ष अवलोकन से बताया है। गुरुबड़ा है इसलिए शरीर मोटा होता है यह फल कहा गया है। गुरु पोलादिखता है इसलिए शरीर का रंग पीला-गोरा कहा गया। चेहरे परसात्त्विक तेज होता है। यह चेहरा मंगल जैसा तेजस्वी नही होता।कामला से पीड़ित व्यक्ति के समान पोलासा रंग होता है। सिंह केसमान गंभीर आवाज यह विशिष्ट फल मेष, सिंह या धनु राशि मेंगुरु हो तो अनुभव में आता है। अन्य गुणधर्म नैसर्गिक कुण्डली केनौवें और बारह वें स्थान के हैं। कुण्डली में गुरु बलवान हो तोविद्वान, बुद्धिमान, संशोधक, लेखक, व्यवहार से उदासीन, लोगों कीपरवाह न करनेवाला, ऐसा यह व्यक्ति होता है। खुद भूखा रह करभी यह दूसरों की भूख दूर करना चाहता है। लोगों की मुश्किलों कोहल करने की हमेशा कोशिश करता है। समय और परिस्थिती कोदेखकर वर्तन करता है। समाज में किसी नये तत्व के लिए बहुतप्रयत्न करता है और सुधारतावादी होता है। सामाजिक कार्यों मेंध्यान देता है। भाषाशास्त्र और कानून का जानकार होता है। लोगोंसे मिलजुल कर रहने की अपेक्षा किसी विशिष्ट ध्येय की प्राप्ति के     लिए हमेशा प्यत्नशील रहते हैं। पैसे, कपड़े और खानेपीने के बारेमें ये फिक्र नही करते और इन्हे इन चीजों की प्राप्ति में तकलीफ हीहोती है। किन्तु आयु के अन्तिम भाग में ये जरूर यशस्वी होते हैं।गुरु स्त्री राशि में हो तो पहले कुछ समय नौकरी कर बाद में स्वतंत्रव्यवसाय करते हैं। पुरुषराशि में गुरुू हो तो प्रारंभ से ही स्वतन्त्रव्यवसाय होता है। किन्तु दशम स्थान में गुरु हो तो आयुभर नौकरीकरनी पड़ती है। इन लोगों का शरीर भरापूरा, कद सुदृढ,वर्णपीला-गोरा, मासल आकृति होती हैं। पूर्ववय में साधारण और उत्तरबय में मोटा शरोर होता है। आँखे बड़ी और तेजस्वी होती है। भौहोंके बाल लंबे किन्तु सुन्दर और धनुष्याकृति होते हैं। केश महीन,नरम और चमकीले होते हैं। सामने के दांत अधिक बड़े दीखते हैं।ठोडी बड़ी और दो भागों में बंटी सी दीखती है। गाल मांसल होते हैं।पैरों पर केश अधिक होते हैं। भालप्रदेश चौड़ा होता है और उसपरपसीना बहुत आता हैं। ३६ वें वर्ष के बाद वात का प्रादुर्भाव होताहै और पसीना बढ़ता है-बार बार कपड़े बदलने पडते हैं। किसीबिल्डिंग में ऊपर चढना हो तो थक जाते हैं और श्वास लगता है। इनलोगों को सब्जी खाने का बहुत शौक होता है इससे शरीर में उष्णताबढ़ती है। इन्हें खानदान का बहुत अभिमान होता है और उसकीरक्षा के लिये हमेशा कोशिंश करते हैं। ये लोग स्कूल, कॉलेज,आश्रम आदि संस्थाए स्थापन करते हैं। नगरपालिकां, जिला बोर्ड,विधानसभा आदि में इनका चुनाव होता है।

    कुण्डली में गुरु दूषित हो तो - ये व्यक्ति फिजूल अभिमानकरते हैं। धंदे बहुत करते हैं किन्तु उनमें नुकसान ही अधिक होताहै। खुद की स्तुती करके ये दूसरों को तुच्छ समझते हैं। खुद कोसमझदार और दूसरों को मूर्ख मानते हैं। हमेशा लोगों की निंदा करते
    हैं। पत्नी के साथ ये पांच सिनिट स्थिरता से नहीं बोल पाते किन्तुअन्य स्त्रियों के साथ घुलमिल कर बातें करते हैं। व्यामिचारी, मुक्तमें प्रेम के इच्छुक होते हैं। इनकी पढ़ाई अधूरी होती है। किन्तुखुदको बहुत सुशिक्षित मानते हैं। लोगों पर रौब जमाने की कोशिशकरते हैं। सुस्थोपित संस्थाओं में गडबडी पैदा करते हैं।सामान्यतः - मेष, मिथुन, सिंह, धनु और मीन राशियों सेगुरु उत्तम फल देता है। तुला, वृश्चिक, मकर व कुम्भ में मध्यम फलमिलता है तथा वृषभ, कन्या और कर्क में अशुभ फल मिलता है।

   कारकत्वविचार

    कल्याणवर्मा - मांगल्यधर्मपौष्टिकमहत्वशिक्षानियोगपुरराष्ट्रम्।या नासनसुवर्णधान्य (वेश्म) पुत्रप्रभु्जीवः।। मंगल कार्य, धर्म, शरीरकी पुष्टता, बडप्पन, शिक्षा, नियोग, शहर, देश, वाहन, आसन,नींद, सोना, धान्य, (घर) और पुत्र इन विषयों पर गुरु का प्रभुत्वहै। इन में नियोग शब्द के कई अर्थ हैं- उपयोग, काम, आज्ञा,प्रतिदिन के लिए नियुक्त काम, प्रयत्न, निश्चय, आवश्यकता, पतिकी मृत्यु होने पर देवर के सम्बन्ध से पुत्रोत्पत्ति करना- इन मेंवैद्यनाथ - प्रज्ञावित्तशरीरपुष्टीतनयज्ञानानि वागीश्वरात्।।

    यथायोग्य अर्थ का उपयोग करना चाहिये।

    आचा्यदेवगुरुभुसुरशापदोषैः शोकं च गुल्मरुजमिंद्रगुः करोति।। बुद्धि,धन, शरीर की पुष्टता, पुत्र और ज्ञान का विचार गुरू से करनाचाहिये। आचार्य, देव, गुरु या ब्राह्मण के शाप से दुःख होना तथा गुल्मरोग यह भी गुरु का कारकत्व है।
    पराशर -स्वकर्मयजनदेवब्राह्मणधनगृहकांचनवस्त्रपत्रमित्रांदो-लनादिकारको गुरुः। अपना काम, यज्ञ करना, देव और ब्राह्मण, घर,कपडे, सोना, बर्तन, मित्र तथा पालकी में बैठनेका सम्मान ये विषयगुरु के अधिकार में हैं।

    चाहिये।गुणाकार - धिषणात् सुखंच। सुख का विचार गुरू से करना

    सर्वार्थचिन्तामणि - वाग्धोरणीमंत्राजतंत्रनैष्ठिकगजतुरगयाम-निगमभावबोधरकर्मपुत्रसंपज्जीवनोपायकर्मयोगसिंहासनकारको गुहः। वाणी,दूरदर्शिता, वेदमंत्र, राजनीति, नैष्ठिक कार्य, हाथीघोडे, शास्त्र, पदानेकाकाम, पुत्र, जीविका के साधन, कर्मयोग (फल की अपेक्षा छोड़कर कर्मकरना) तथा राजगद्दी ये विषय गुरु के अधिकार में हैं।

    जीवनाथ - वनचपटुत्वतुरंगमसौख्यम् तंत्रविचारनृपालविनोदम्।संततिसौख्यमलं निगमार्थज्ञानमुतांगबलं गुरुतश्च।। बोलने में कुशलता,घोडे का सुख, तंत्र का विचार, राजा की प्रसन्नता, पुत्रमुख, वेदों काज्ञान तथा शरीर का बल इन विषयों का विचार गुरु से करना चाहिये।मन्त्रेश्वर - ज्ञानं सदगुणमात्मजं च सचिवं स्वाचारमाचार्यकमह स्रसत स्वो्नत सदगतिम। देवव्राहणभक्तिध्वरतपः श्रद्धांच कोशस्थल वैदुष्यं विजितेंद्रिय धवसुखं सम्मानमीड्याम्।।गलमान्ज्वरशोकोहकफजान श्रतर्मोहायदवस ि-महीदेवेशशापोद्वम्। रोगंकिसर्यक्षदेवफणभृद विद्याधराधुद्भवं जीवः सूचपतिस्वयं बुधगुरुत्कृष्टापचारोदमवम्। ज्ञान, सद्गुण, पुत्र,मन्त्री, आचार-धर्म,गुरु, बडम्पन, वेदशास्त्रों का ज्ञान, सभी प्रकार की उन्नति, मरणोतर शुभगति, देवब्राह्मणों पर श्रद्धा, यज्ञ तथा तप पर श्रद्धा, खजाना, विद्धता,जितेन्द्रिता, पति का सुख, पूज्यों की कृपा, सम्मान ये विषय गुरु केअधिकार म हैं। गुरु के कारकत्व में निम्नलिखित रोगों का समावेश     होता है - गुल्म, अंतडियों के विकार, ज्वर, कफ, शोध, मर्छा, कामके रोग, देवस्थान के पैसे हडप करने से या ब्राह्मण के शाप से उत्पन्नरोग, यक्ष, किश्वर, नाग आदि देवों द्वारा, उत्पन्न किये हुये रोग।विद्यारण्य - गुरुणा देहपुष्टिश्च पुत्रार्थधनसम्पदः। शरीर कीपुष्टता, पुत्र तथा धन यह गुरु का कारकत्व है।
    पाशचात्य मत - सम्मान, भाग्य, कीर्ति, वृद्धि, यश, मैत्री कासंरक्षण, पालनपोषण, बहुत सन्तति होना, बहुफल मिलना, कानूनबनानेवाले लोग, न्यायदेवता, राजनीतिज्ञ, न्यायाधीश, धर्मगुरु, शकुनजाननेवाले, वकील, विद्यार्थी, डाक्टरेट उपाधि प्राप्त करनेवाले,विश्वविद्यालय, कुलगुरु, उपकुलगुरु, दीक्षान्त समारोह, ऊनी कपडे केकारखाने, जांधें, पैर, दाहिना कान शरीरांर्गत शोषण शक्ति इन विषयोंपर गुरु का अधिकार है। इसके कारकत्व में निम्नलिखित रोगों काअन्तर्भाव होता है-जलोदर, यकृत के रोग, फेकडे के रोग, मस्तिष्क कीरक्तवाहिनियों के रोग, आंतडियों की सूजन, हृदय को धक्का पहुंचना,पेट में शूल होना, पीठ की रीढ में दर्द होना, घटसर्प, पसलियों के तथारक्तवाहिनियों के रोग, खून दूषित होना और लम्बे ज्वर।
उपर्युक्त मतों का विवेचन

    कल्याणवर्मा - ने नियोग शब्द का उल्लेख किया है। देवर सेपुत्रोत्पत्ति कराना यह इस शब्द का अर्थ लिया जाय तो इस कारकत्वका वर्तमान समय में कोई उपयोग नहीं क्यों की नियोग की यहपद्धति प्राचीन समय में ही बन्द हो चुकी है। मन्त्ेश्वरने जितेन्द्रियत्वयह कारकत्व कहा यह अनुभव के और पौराणिक वर्णनों के अनुकूलही है। पुराणों में कहा है कि गुरु की पत्नी तारा ने चन्द्र से व्याभिचारकर बुध को जन्म दिया था। ऐसे प्रकारों से गुरु को वैराग्य उत्पन्नहोना स्वाभाविक है। अत्याधिक विद्वत्ता के परिणामस्वरूप स्त्री सुख     कम ही सिलता है। हमेशा अ्रत्यपठन या संशोधन में व्यस्त रहने सेस्वी की ओर ध्यान नही दे पाते। इस लेखक ने पतिसुख यह कारकत्वकैसे कहा यह स्पष्ट नही। बस्तुतः गुरु न तो स्त्रीकारक है, नपतिकारका इसी तरह शोक और मोह ये वर्णन भी गलत मालूम होतेहैं. क्योंकि शोक शतति का विषय है और मोह शुक्र का। कोशस्थल काकारकत्व भी शुक्र का है। गुरु से इसका सम्बन्ध प्रतीत नही होता। हरकिसी प्रकार का सुख, दीक्षागुरु, आध्यात्मिक गुरुू, राजा के समानअधिकार, लोकसंग्रह, ग्रहणशक्ति, तीव्र बुद्ध, ग्ंथलेखन, स्थिर वृत्ति,संकट काल में अतिधीरता, संकटग्रस्तों को मदद करने की इच्छा,कर्तृत्व का प्रभाव, सारासार विचार, विवेक, समयसूचकता, निःस्पृहता,निर्भयता, सादे रहनसहन की रुचि, रुचिकर खाने की इच्छा, धान्य येगुरु के अन्य कारकत्व हैं जिन पर विशेष विचार करने की जरुरत नही।मेरे विचार से - गुरु के कारकत्व में विशेषतः निम्नलिखित विषयों काअन्तर्भाव होता है - दूसरी भाषा (Second Language), बीजगणित,वैद्यक, आरोग्पशास्त्र, हिन्दू कानून, सिविल कानून, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र,विद्वता की उच्च उपाधियां-पी. एच. डी., डी. लिट् आदि, शिक्षाविभाग, कार्यकारी अधिकारी, फिल्म सेन्सार बोर्ड, सचिवालय, राज्यपालोंके सलाहगार, शाला, कॉलेज, शिक्षक, प्राध्यापक, बॅरिस्टर।

    कारकत्व का वर्गीकरण

    जन्म कुण्डली में उपयोगी कारकत्व - मांगल्य, धर्म, पौष्टिक,महत्त्व, शिक्षा, पान, सुवर्ण, घान्य, पुत्र, परज्ञा, ज्ञान, वित्त, शरीरपुष्टि,शाप, शोक, गुल्म, कामला, वातरोग, पाश्चात्य मत में उल्लिखितसभी रोग, स्वकर्म, यजन, गृह, वस्त्र, पात्र, मित्र, आन्दोलन, सुख,वाग्धोरणी, मन्त्र, राजतन्त्र, नैष्ठिक, गज, कारागृह, बोधकर्म,जीवनोपाय, कर्मयोग, सिंहासन, वचनपटुता, तन्त्रविचार, प्रवचनकार, व्याख्याता, लेखक, प्रकाशक, विडम्बन काव्य, राजकृषा, सचिव,आचार्य, शास्त्र, घी, स्मृति, मति, सर्वोञ्नति, भक्ति, अध्वरतपःश्रद्धा, वैदुष्य, धवसुख, सम्मान, दया, अन्त्रज्वर, मोह, कफज रोग,देवस्थाननिधि प्रपीडन से उत्पन्न रोग, भाग्य, किर्ति, यश, मैत्रीसंरक्षण, विधानसभासदस्य,धर्म गुरु, दीक्षागुरु, आध्यात्मिक गुरु, न्यायाधीश,वकील, विद्यार्थ, ऊनी तथा सूती कपडे के कारखानदार, व्यापारी,जांघे, पैर, दाहिना कान, किसी भी प्रकार का सुख, राजा जैसाअधिकार, लोकसंग्रह, ग्रहणशक्ति, तीव्रबुद्ध, ग्रन्थकर्तृत्व, स्थिसवृत्ति,संकट में धीरता, कर्तृत्व का प्रभाव, संकटग्रस्तों को मदद करने कीइच्छा, सारासार विचार, विवेक, समयसूचकता, निःस्पृहता, निर्भयता,सादा रहनसहन, रुचिकर अन्न।

    शिक्षा में उपयोगी कारकत्व - मेरे मत में कारकत्व का जोवर्णन किया है उन विषयों का अच्छा अध्ययन होने के लिए गुरु,लग्न, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम या एकादश स्थान में शुभ राशिमें होना चाहिये। ऐसे योग के डाक्टरों की प्रेक्टिस अच्छी चलती है।

    मेदिनीय ज्योतिष में उपयोगी कारकत्व - कोशस्थल, पुर,राष्ट्र, न्याय व राज्यव्यवस्था, विधानसभा सदस्य, मन्त्री, मन्त्रिमंडल,संसद, विद्यापीठ, कुलगुरु, उपकुलगुरु, रजिस्ट्रार, दीक्षान्त समारोह।

    निरुपयोगी कारकत्व - नियोग, आसन, शयन, देव, ब्राहमण,मन्त्र, निगम इन विषयों का फलनिर्देश में विशेष उपयोग नही होगा।व्यवसाय के विषय में गुरु के कारकत्व का वर्णन नही कियाक्यों कि सभी व्यवसायों में गुरु्प्रधान व्यक्ति यशस्वी होते हैं।व्यवसाय के विषय में गुरु से तभी विशेष विचार करना चाहिये जबवह लग्न, सप्तम या दशम स्थान में हो। अन्य स्थानों में इस दृष्टि सेविशेष विचार नही हो सकता।

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बूहस्पति यानी गुरु लम्बे शरीखाला, सोने के वर्णवाला,अधिक चर्वीवाला, सुन्दर वरणी बोलनेवाला, उदार, चतुर, पीलीआंखोंवाला, कफ प्रकृति, अधिक मांसवाला और विद्वान मानागया है।

    सौरमंडल में गुरु का विशिष्ट स्थान है। इसे देवों का गुरू होनेका गौखव प्राप्त है। यह स्थूल रूप से एक रशि में एक सालतक परिश्रमण करता है। यह पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त्होता है। यह नीति-धर्म का महान पण्डित है, फलतः ग्रह परिषदमें इसे मन्त्री का स्थान प्राप्त है। आंगिरस, वाकुपति, जीव,प्रशान्त, देवपूज्य, सुराधिप, बूहस्पति, चित्रशिखंडिज, वाचस्पति,सुराचार्य, इज्यद्युति आदि गुरु के पर्याय नाम है।

    गुरू का रंग-पीला, प्रकृति-कफ, वर्ण-बाह्मण, तत्त्व-आकाश,लिंग-पुरुष शुभ/क्रूर-शुभ, गुण-सत्व, दिशा-ईशान, ऋतु-हेमन्त,रस-मधुर, धातु-पीतल, भावकारक-पंचम, दशम, एकादश, राशिअवधि लगभग एक वर्ष, अधिष्ठाता-ज्ञान काो अपने स्थान सेपंचम, सप्तम और नवम स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है।धनु-मीन इसकी स्वराशियां हैं। कर्क राशि में यह उच्च तथा मकरराशि में नीच का होता है।

    मांगल्य कर्म, धर्म, शिक्षा, सोना, धान्य, पुत्र, प्रज्ञा-ज्ञान,शरीर-पुष्टि, शाप, शोक, यजन, गृह, वस्त्र, पत्र-मित्र,आन्दोलन, सुख, मन्त्र, राजतन्त्र, नैष्ठिक, गज-तुरंग, बोधकर्म,जीवन-साधन, कर्मयोग, सिंहासन, वचन पहुता, प्रवचनकार,व्याख्याता, लेखक, प्रकाशक, काव्य, राज्यकृपा, सचिव,आचार्य, शास्त्र, स्मूति, न्यायाथीश, वकील, विद्यार्थी, लोकसंग्रह,देवस्थान, सभी प्रकार कर सुख, शिवोपासना, अर्थशास्त्र,दर्शनशास्त्र आदि अनेक विषय-वस्तुओं का कारक गुरु है।

    पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभादपद्र इसके नक्षत्र है। जन्म समयमें चन्द्रमा जब इन नक्षत्रों में से किसी एक पर होतर है तो गुरुकी महादशा चलती है। जलोदर, यकृत के रोग, फेफड़ों के रोग,मस्तिष्क की रक्तवाहिनी के रोग, अन्तडियों में शोथ, उदर शूल,रीढ़ की हड्डी का दर्द, लम्बा मुखार गुरु की अशुभ स्थिति केकारण होता है।
=========================== गुरू के राशिगत व स्थानगत फल
राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक नीतिवान, विवेकी,क्षमाशील, दानवीर बहुसंतानवान, धार्मिक, दो व्यवसायों से जुड़ा हुआ, बुद्धिमानएवं सुखी होता है। वह अपनी योग्यता के आधार पर मित्रों के माध्यम से नामकमाता है। जातक के विवाह के समय कुछ मुश्किलें पैदा होने का भय रहता है।2. वृषभवृषभ राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक धनवान,कर्तव्यपरायण, दयालु, विद्वान एवं सुखी वैवाहिक जीवन से युक्त, विवाह केनिमित्त धन प्राप्त करनेवाला होता है। दान या वसीयतनामे से संपत्ति प्राप्त होतीहै। जातक को स्त्री जाति से लाभ होता है। उम्र के 20वें वर्ष के बाद उन्नतिहोती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक अनेक मित्र एवंपुत्रोंवाला, बड़े परिवार से युक्त, वक्ता, विद्वान, नीतिनिपुण, व्यवसाय पारंगत,धनवान एवं भावनाशील होता है। गुरु पापग्रह से दृष्ट होने पर जातक बेईमान,दुश्चरित्र एवं कपटी होता है।

    4. कर्क कर्क राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक सुंदर, ऐश्वर्यवान,चरित्रवान, महत्त्वाकांक्षी, दयालु, ललितकला प्रेमी, शास्त्रज्ञ, पंडित, गूढ़ विद्याका जानकार, प्रख्यात एवं अनायास धन प्राप्त करनेवाला होता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक उच्च पदस्थ,न्यायप्रिय, चतुर, उदार, परोपकारी व अनेक मित्रों से युक्त रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक विद्वान, सहनशील,एकाग्रचित्त, उद्यमी, अनंत अड़चनों से मुकाबला करनेवाला एवं यकृत पीड़ासे त्रस्त रहता है।
  7. तुला-तुला राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक सुंदर, प्रसन्नचित्त,व्यवहारकुशल, त्त्वज्ञानी, अध्यापक, वकील, साहित्य एवं कलाओं का प्रेमीहोता है। जातक सम्मान प्राप्त करता है, वैवाहिक जीवन सुख से परिपूर्ण रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक अभिमानी,कामातुर, स्त्री का गुलाम, उत्साही, झगड़ालू, कपटी, यकृत रोग एवं हृदयरोगसे पीड़ित रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक तत्त्वेत्ता, प्रभावीव्यक्तित्व का, भरोसेमंद, क्रीड़ाप्रेमी, कवि, दयालु, बिना प्रयास धन प्राप्तकरनेवाला, उच्च विचारोंवाला रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक मंदबुद्धि, अप्रसन्न,दुखी रहता है एवं उम्र के 44वें वर्ष में दुर्घटना या कोई बड़ी बीमारी उसे भोगनीपड़़ती है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक प्रगतिशील,विचारक, हितचिंतक, मित्र एवं दानपुण्य करनेवाला होता है।

    12. मीन-मीन राशि का गुरु कुंडली में हो तो जातक अधिकारी, साहित्यिक,दान-पुण्य करनेवाला, परोपकारी, व्यवहारकुशल, शांत स्वभावी एवं मिलनसारहोता है।
==========================द्वादश स्थानों में गुरू के राशिगत फल
  1) प्रथम भाव -  प्रथम स्थान (लग्न भाव)
    प्रथम स्थान में गुरु के फल

    आचार्य तथा गुणाकार - विद्वान, प्राज्ञः। यह विद्वान होता है।कल्याणवर्मा - होरासंस्थे जीवे सुशारीरः प्राणवान् सुदीर्थायुः।सुसमिक्षितकार्यकरः प्राशो धीरस्तथार्यश्च।। यह सुन्दर, बल्वान, दीर्षायु,विचारपूर्वक काम करनेवाला, बुद्धिमान, धर्यशाली तथा सदाचारी होता है।
वैद्यनाथ - जीवे लग्नगते चिरायुरमलज्ञानी धनी रूपवान्। यहदीर्घायु, निर्मल ज्ञान से युक्त, धनवान और रूपवान होता है।

पराशर - जीवो लग्ने यदि वा केन्द्रगः। तस्य पुत्रस्य दीर्धायुर्धनवान्राजवल्लभः।। यह धनवान, राजा को प्रिय होता है। इसके पुत्रदीर्घायु होते हैं।

    वसिष्ठ - सुखकान्तिदाः स्युः। भयम्। यहं सुखी और कान्तिमानहोता है किन्तु मन में हमेशा भय बना रहता है।

    गर्ग - कविः सुगीतः प्रियदर्शनः शुचि्दाताज्यभोक्ता नृपपूजितश्च।सुखी च देवार्चनतत्परश्च धनी भवेद्देगुरौ तनुस्थे।। यह कवि, गायक,देखने में प्रिय, पवित्र, उदार, उपभोगों का भोक्ता, राजाद्वारा सन्मानित,सुखी, देवपूजा में तत्पर और धनवान होता है। गुरुर्धनुषि मीने चतथा कर्कटकेपि च। लग्नत्रिकोणकेन्द्रे वा तदारिष्ट न जायते। गुरुलग्न में, त्रिकोण में या केन्द्र में धनु, मीन या कर्क राशि में हो तोआयुष्य में संकट नही आते।

    तनुस्थानगते जीवे गौरवर्णतनुरभवेत्। वातश्लेष्म शरीरे च बाल्येच सुखसंपदः।। इसका वर्ण गोरा होता है, शरीर में वात और श्लेष्मरोग होते हैं और बचपन में सुख मिलता है।
    मिथ्यापवादजा पीड़ा शत्रूणा विषयदायिका। राजतो मानमतुलंधनप्राप्तिरनेकधा।। झूठी अफवाहों से तकलीफ होती है, शत्रुओं के लिएविषवत् होता है, राजा द्वारा सन्मान और बहुत धन प्राप्त होता है।

    जातककलानिधि - क्रूरदृष्टिसमायोगे व्यया का चित् प्रजायते। योयो विष्नः समुत्पन्नः स सद्यश्च विनश्यति।। क्रूर ग्रह से या उसकी दृष्टिसे युक्त हो तो कुछ पीड़ा होती है अन्यथा इस गुरु से जो जो विष्न उत्पन्नहो उसका तत्काल नाश होता है। स्थिरप्रकृतिदः। शरीर दृढ होता है-(स्वभाव चंचल नही होता)। प्रकृत्या स भवेत् वृद्धो मान्यः सर्वजनेषु च।यह स्वभाव से प्रौढ और सभी लोगों में सन्माननीय होता है।

    बृहद्यवनजातक - विद्यासमेतोऽभितो हि राज्ञां प्राज्ञः कृतज्ञोनितरामुदारः। नरो भवेश्वुकलेवरश्च तनुस्थिते देवगुरौ बलाढ्यः।।विद्यावान, राजा को प्रिय, बुद्धिमान, कृतज्ञ, बहुत उदार, सुन्दरशरीर का और बलवान होता है। प्रजामष्टवत्सरे सुरगुरुः। आठवें वर्षसन्तति होती है। ढुंढिराज का मत इसी प्रकार है।

    नारायणभट्ट - गुरुत्वं गुणैर्लग्नगे देवपूज्ये सुवेशी सुखीदिव्य-देहोडल्पवीर्यः।। गतिर्भाविनी पारलोकी विचिन्त्या वसूनि व्ययं संबलेनब्रजन्ति॥ यह गुणणों से श्रेष्ठ होता है। लौकिक शिक्षा की दृष्टि सेशिक्षक अथवा आध्यात्मिक गुरु होता है। इसका पोशाक अच्छाहोता है। सुखी, भव्य शरीर का किन्तु अल्पवीर्यवाला होता है।परलोक की गति के बारे में चिन्ता करता है। उपभोग से धन काव्यय करता है। जीवनाथ का मत ऐसा ही है।

    काशीनाथ-लग्ने गुरौ सुशीलश्व प्रगल्भो रूपवानापि। नृपाभीष्टश्नीरोगी ज्ञानी सौम्यश्च जायते।। यह शीलवान, प्रौढ बुद्धि का, रूपवान,राजा को प्रिय, नीरोग, ज्ञानी और सौम्य स्वभाव का होता है।

    आर्यग्रन्थकार - विविधवस्त्रविपूर्णकलेवरः कनकरत्नधन:
प्रियदर्शनः। नृपतिवंशजनस्य च वल्लभः भवति देवगुरौ तनुगे नरः।।
    यह विविध कपडे पहनता है, सोने रत्न आदि धन से युक्त होता है,सुन्दर होता है तथा राजा को और कुल के लोगों को प्रिय होता है।

    जयदेव - विद्वान् नृपेज्यः सुतरामुदारो दारादिसीख्यस्तनुगोगुरुश्चेत। यह विद्वान, राजा द्वारा सन्मानित, बहुत उदार और स्त्रीआदि सुखों से सम्पन्न होता है।

    जागेश्वर -यदा देवपूज्यो विलग्ने नराणां जनै पूज्यते भुज्यतेनो कदान्न। शरीर दृढं कोमलं कान्तियुक्तं मनश्चिन्तित नैव व्यक्तविधत्ते। लोगों द्वारा सन्मानित, कदान्न कभी न खानेवाला, कोमलकिन्तु दृढ और कान्तिमान शरीर का तथा मन के विचार स्पष्ट नकहनेवाला ऐसा यह व्यक्ति होता है। प्रधानो नराणाम्। यह मनुष्योंमें मुख्य होता है।

    पुंजराज - लग्नस्थे च द्वितीये वा जीवे स्यान्मधुरप्रियः। मधुरंवचनं वक्ति सत्यं सर्वहितावहं। यह सत्य, सब लोगों के लिएहितकर तथा मीठे वचन बोलता है। इसे मीठे पदार्थ प्रिय होते हैं।

    होता है।मन्त्रेश्वर - सुकृतिः सात्मजः। सदाचारी तथा पुत्रों से युक्त

    गोपाल रत्नाकर - यह गुरु यदि स्वक्षेत्र में हो तो छहों शास्त्रोंमें प्रवीण, स्नेहल, विद्वान, दीर्घायु, राजाद्वारा सन्मानित, युक्तिमानएवं विपुल सन्तति से युक्त होता है।

    घोलप - यह संसार-व्यवहार में चतुर, प्रख्यात, पूज्य, शत्रुओंका घात करनेवाला, धर्मशील, बुद्धिमान, शुद्धचि्त, पवित्र, मित्रों सेयुक्त, तेजस्वी, पुराणशास्त्र सुनने में रुचि रखनेवाला, सर्वमान्य औरधनवान होता है।

    हिल्लाजातक - प्रज्ञाकरोष्टमें वर्षे लग्नसंस्थो बृहस्पतिः। आठवेंवर्ष ज्ञान प्राप्त होता है।

    लखनक के नवाब - मुश्तरी यदि भवेद् यदिताले साहिबः

    खुशदिलो मनुजः स्यात्।। अमिलः पुरसखुन सरदारः फारसो हि कविरोमहबूबः।। यह तेजस्वी और अधिकारसम्पन्न, आनंदी, ईश्वरभक्त,बहुतों का स्वामी, सरदार, कवि होता हैं।

    पाश्चात्य मत - यह सुन्दर और निरोगी होता है। यह गुरुअग्निराशि में हो तो उदार, धैर्यशाली, स्नेहिल, विजयी, मित्रों सेयुक्त, अभिमानी होता है। यह पृथ्वीराशि में हो तो स्वार्थी, अभिमानी,विश्वासु, मदद करनेवाला होता है। यह जलराशि में हो तो ऐश-आरामी,खिलाडी, पैसे की फिक्र न करनेवाले, धन प्राप्त करनेवाले और उदारहोते है। यह वायुराशि में हो तो न्यायी, उदार, समतोल आचरण के,निःपक्षपाती, विश्वासु, हरेक को मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं।सामान्यतः लग्न में किसी भी राशि में गुरु हो तो वह व्यक्ति उदार,स्वतन्त्र, प्रामाणिक, सच बोलनेवाले, न्यायी, धार्मिक तथा कीर्ति प्राप्तकरनेवाले और शुभ कार्य करनेवाले होते है। इनका भाल बड़ा औरतेजस्वी दिखता है।

    नारायण भट्ट - मृगराशि परित्यज्य स्थिते लग्न बृहस्पतिः।करोति स महीपालं धनपो वा भवेनन्नरः। मकर से अन्य किसी राशिमें गुरु लग्न में हो तो वह राजा या बड़ा धनवान होता है।

    अज्ञात - सुखी। उच्च्चे पूर्णफलानि। षोडशवर्षें महाराजयोगः।अरिनीचपापक्षेत्रे पापयुते वा नीचकर्मवान् मनश्चंचलत्ववान्। मध्यायुः,पुत्रहीनः, स्वजनपरित्यागी, कृतच्नः, गर्विष्ठः, बहुजनद्वेषी, व्याभिचारवान्,संचाखवान् पापक्लेशभोगी।। यह सुखी होता है। यह गुरु उच्च्च में हो तोशुभ फल पूरे मिलते हैं। सोलहवें वर्ष म महाराजयोग (बड़े अधिकारपदकी प्राप्ति का योग) होता है। यह शत्रुग्रह की राशि में, नीच राशि में,पापग्रह की राशि में या पापग्रह के साथ हो तो वह नीच काम     करनेवाला और चंचल मन का व्यक्ति होता है। आयु मध्यम होती है।पुत्र नहीं होते। अपने लोगों को छोड़ देता है। कृतज्ञ, गर्विष्ठ, बहुतों सेवैर करनेवाला, व्याभिचारी, भटकनेवाला और दुःखी होता है।

    हरिवंश - लग्नस्थे सुरराजमन्त्रिणि नरो राजप्रतापी भवेत्विद्या-वाहनभोगभूषणधृतिप्ञ्ञप्रभावाधिकः ख्यातो वंशधरादिकोगुण-गणैः सन्त्यक्तवैरो बली गौरांगः सुभगः सुभामिनियुतो दोर्घायुरारोग्यवान् ।। यह राजा जैसा प्रतापी, विद्यावान, वाहनों मेंसम्पन्न, उपभोग प्राप्त करनेवाला, धैर्यशाली, बुद्धिमान, प्रभावी,प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न, गुणी, वैर न करनेवाला, बलवान, गोरा,सुन्दर, अच्छी पत्नी से युक्त, दीर्घायु तथा नीरोगी होता है।

    त्त्वप्रदीपजातक - लोके वेदे प्रसिद्धाः। सकलफलहरा नीचगाःपापखेटाः स्वोच्चा नैव प्रशस्ता विमलफलहरा रनधरिःफारियुक्ताः। जीवःस्थस्थानहन्ता वदति मुनिवरो दृष्टिरस्य प्रशस्ता सौरिः स्वस्थानपालःपरमभयकरी दृष्टिरस्य प्रणष्टा।। यह ग्रह नीच राशि में हो तो सभीफलों का हरण करते हैं और यदि षष्ठ, अष्टम या व्यय स्थान में यहउच्च राशि में हो तब भी सभी शुभ फलों का नाश करता हैं। गुरु जिसस्थान में हो उस स्थान के फल का नाश करता है किन्तु जिस पर गुरुकी दृष्टि हो उस स्थान के फल अच्छे मिलते हैं। इसके विपरीत शनिजिस स्थान में हो उसके फल अच्छे मिलते है किन्तु उसकी दृष्टि जिसस्थान पर हो उसके फलों का नाश होता है।

    गुरु-धार्मिक उत्साह, दार्शनिकता, प्रत्येक विज्ञान के प्रति रूचि,ज्ञानोत्सुक तथा प्रखर बुद्धि, देवोपदेशक, कोष का स्वामी, सम्पत्ति तथाप्रसिद्ध, पुत्रों-पौत्रों से युत, बुद्धिमत्ता, शिक्षा प्रदाता तथा चर्बी बनाना/बढ़नापाचन तन्त्र, गुर्दें और यकृत आदि के रोग दिखाता है।
    (i) लग्न में गुरु
    जातक धन संपत्तिशाली, आभूषण तथा रत्नों व अच्छे वस्त्रादि सेयुक्त, सुदर्शन व राज-परिवार का प्रिय होगा।
    -मानसागरी
    व्यक्ति सुदर्शन, आकर्षक, कामुक, चिरंजीवी और निर्भीक होगा। वहदेवताओं का कृपापात्र होने का सौभाग्य प्राप्त करे, सफल, भाग्यशालीतथा पुत्रवान् होगा।
    -फलदीपिका
    जातक का व्यक्तित्व आकर्षक, दीर्घायु, परिस्थिति के अनुरूप कामकरने वाला, विद्वान्, शक्तिशाली, साहसी तथा महान् होगा।
    -सारावली
    वह अच्छा वक्ता, शास्त्रज्ञ तथा तीन वेदों का मर्मज्ञ होगा। वह पर्याप्तसंतति वाला, चिरंजीवी, विद्वान् और प्रसन्न होगा। यदि गुरु बुरे स्थानों परस्थित है तो जातक पापकर्म में लिप्त, अस्थिर मस्तिष्क और मध्यायु वालाहोगा। वह निसंतान, कृतष्न तथा दूसरों से शत्रुता रखने वाला होगा।
    -भृगु
    वह चुम्बकीय व्यक्तित्व वाला, वैयाकरण, प्रभावशाली, उच्च शिक्षित,बहुत संतान वाला, विद्वान, कुशल, चिरंजीवी, शासकों द्वारा सम्मानित,शब्दशास्त्र का ज्ञाता, राजनीतिक रूप से सफल, कुशाग्र बुद्धिवाला,बलिष्ठ शरीर वाला, सक्षम, प्रभावशाली व नेता होगा।
    -डॉ रामन
    टिप्पणी
    लग्न में स्थित गुरु पंचम भाव (शिक्षा व संतान), सप्तम भाव(पति-पत्नी, सामने वालों पर छवि डालने वाला) तथा नवम भाव(भाग्य/पिता, प्रसिद्धि, भाग्योदय आदि) को देखता है। जातक सभीप्रतिकूलताओं तथा अनिष्टों से सुरक्षित रहता है। वह समृद्ध, पाप प्रभावोंसे मुक्त, बाह्मण स्त्रियों के प्रति श्रध्धावान, सदाचारी, पिता संतान ववैवाहिक जीवन से प्रसन्न होगा। गर्गाचार्य ने कर्क, धनु व मीन लग्न मेंगुरु की स्थिति की प्रशंसा की है। शत्रु राशियों या पापराशियों में गुरु केहोने से जातक निसंतान, मध्यायु, संबंधियों से विंलग, व्यसनी औरव्यर्थ-घूमने वाला होगा।

    मेरे विचार - उपुर्यक्त शास्त्रकारों ने शुभफल कहे हैं उनकाअनुभव मेष, सिंह, धनु, मिथुन तथा मीन राशियों में आता है। अन्यराशियों में अशुभ फल मिलते हैं। इसका वर्ण गोरा कहा गया है किन्तुकाला वर्ण भी पाया जाता है। वात और श्लेष्मा विकार होते हैं।वृषभ, कन्या, मकर, कुंभ या वृश्चिक में हो तो आयु के उत्तरार्ध में     वातरोग होते हैं। मिथुन, तुला इस राशियों में शरीर अच्छा और वर्णगोरा होता है। बृहद्यवनजातक में आठवें वर्ष सन्तति का फल कहाहै। यह शारिरीक दृष्टि से असम्भव है। अतः विवाह के बाद आठवेंवर्ष में सन्तति होगी ऐसा इसका अर्थ समझना चाहिए। इस प्रकारहिल्लाजातक में आठवें वर्ष ज्ञान प्राप्ति का योग कहा यह उन्हीविभूतियों के बारे में ठोक हो सकता है जो जन्मजात ज्ञानी हैं।हुबली के सिद्धारूढ स्वामी की कुण्डली में लग्न में गुरु-चन्द्र युति थी।महाराष्ट्र के एक और सन्त गोंदवलेकर महाराज के लग्न में धनु राशिमें गुरु था। श्रीमद् रामकृष्ण परमहंस के लग्न में मीन राशि में गुरुऔर शुक्र थे। अन्यत्र सामान्यतः १६ वें वर्ष तक खेल कुद की उम्रहोती है, अतः आठवें वर्ष ज्ञानप्राप्ति कठिन है। अज्ञात ने १६ वें वर्षमहाराजयोग कहा है। इस योग का अनुभव भी सामान्यतः सम्भवनहीं है। इस आयु में राजपद या तो किसी राजपुत्र को मिल सकताहै या किसी राजा के द्वारा गोद लेने से मिल सकता है। अन्यत्रउच्चवर्गीय बालक इस आयु में पढ़ते हैं और व्यापारियों के पुत्रव्यापार आरम्भ करते हैं अत: इन्हें राजयोग होना मुश्किल है। मकरको छोड़ अन्य राशियों में लग्नस्थ गुरु से राजपद मिलता है यह भीइसी तरह का अतिरंजित वर्णन है जो अनुभव में नही आता। उच्चगुरु के पूर्ण फल मिलते हैं ऐसा अज्ञात ने कहा है किन्तु मेरे विचारसे ये पूर्ण फल अशुभ ही होते हैं। नीच काम करना, व्यसनासक्तहोना, व्याभिचार करना, बुरा आचरण ये फल प्राप्त होते हैं यदिकर्क राशि के गुरु के साथ मंगल या शुक्र के अनिष्ट योग हों। गर्गके अनुसार कर्क, धनु, मीन लग्न में गुरु हो तो आयुभर संकट नहींआते। यह अनुभव धनु और मीन के बारे में तो ठीक है। किन्तु कर्कलग्न में गुरु हो तो बार बार संकट आते हैं।

    मेरे अनुभव - मेष, सिंह तथा धनु लग्न में गुरु के फल अच्छे मिलते हैं। इनका स्वभाव उदार, सरदारों जैसा होता है। लोगों का कल्याण करने के लिये यत्न करते हैं और लोगों पर हुकूमत भीचलाना चाहते हैं। गाँव के सभी लोगों को रिश्तेदार जैसे प्रिय होतेहैं। दीर्घायु, मिलनसार, लोकसंग्रही होते हैं। शिक्षा अधिक न होनेपर भी विद्वान प्रतीत होते हैं। वृत्ति गंभीर होती है। किसी भाषा केअध्यापक, वकील, बैरिस्टर, जज, उपन्यास, लेखक, नट, गायक,कवि इन रूपों में ये यशस्वी होते हैं। ये शान्तिप्रिय, इरपोक,अतिकामुक, नास्तिक और सुखासक्त होते है। मेष, मिथुन, कर्क,कन्या, मकर इनके सिवाय अन्य लग्नों में गुरु हो तो सिर गंजा होताहै, भाल भव्य होता है। डाढी के केश कम किन्तु मूंछों के अधिकहोते हैं। कभी कभी शरीर पर भी केश अधिक पाये जाते हैं।खिलाडी, नकल करने में कुशल, विनोदी, हावभाव के साथ बोलनेवालेहोते हैं। इन्हें आयु के पूर्वार्ध में कष्ट होते हैं और उत्तरार्ध सुख सेबोतता है। इन्हें मित्र प्रिय होते हैं। जीवन यशस्वी होता है। समयसूचकहोते हैं। इन्हें बड़ा अधिकारपद प्राप्त होकर धन भी मिलता है किन्तुसंग्रह की ओर प्रवृत्ति नहीं होती। ये धैर्यशील, विपत्ति में न डरनेवाले, संसार में व्यवस्थित रहनेवाले, घर में कठोरता से नियमों का पालनकरनेवाले होते हैं। कुल का अभिमान बहुत होता है। लेन देन मेंसाबधान और तत्पर होते हैं। किसी का आक्षेप सहन नही करते। मेषव सिंह लग्न में सन्तति मध्यम प्रमाण में होती है। धनु लग्न मेंसन्तति योग नही होता। वृषभ और कन्या लग्न में सांसरिक सुख कममिलता है। स्वार्थी, हठी, अपनाही कहना सच माननेवाले होते हैं।अडचनों में दूसरों की मदद करते है किन्तु उसमें अपना स्वार्थ भीदेखते हैं। सांपत्तिक स्थिति अच्छी नहीं होती। विपत्ति में घबरा जाते हैं। दूसरों पर जिन गलतियों के लिये दीका करते हैं उन गलतियों कीसे स्वये करते हैं। लोकमत अनुकूल नही होता। अपनी गलती ये कभीस्वीकार नही करते। उसका दोष दूसरों पर डालते हैं।

    इस गुरू के फलस्वरूप रसिकता बिलकुल नही होती। इन्हेकिसी भी प्रकार का शौक नही होता। पढने की भी इच्छा नही होतीफिर लेखन कैसे हो सकेगा ? ये हमेशा खानेपीने की फिक्र करते है।वृषभ, कर्क, कन्या, तथा वृश्चिक राशियों में यह गुरु हो तो वे लोगबहुत खाते है। मकर में हो तो साधारणतः गाना बजाना, नाटक,सिनेमा और पढ़ने की ओर रुचि होती है। मीन में हो तो काव्य और बाङङय के उपासक होते हैं। जातक चंद्रिका के अनुसार वृषभ, कन्या,तुला, मकर, कुम्भ इन लम्नों में गुरु अनिष्ट फल देता है। इसका अनुभव भी आता है। लग्न में अशुभ फल यही होता है कि स्वभावअच्छा नही होता। लोगों में अपवाद फैलते हैं। सन्मान कम मिलताहै। वृषभ, कल्या, तुला इन राशियों में यह गुरु हो तो धन कममिलता है। मकर तथा कुम्भ में हो तो झूठा अभिमान अधिक होताहै। इन्हें धन प्राप्त हो तो सन्तति नही होती और सन्तति हुई तो धननहीं मिलता। कर्क और वृश्चिक लग्न में यह गुरु हो तो स्वभावनिर्दय, ओछा, क्रोधी होता है किन्तु इनका क्रोध क्षणिक होता है।झूठ बोलते हैं, मीठी गप्पें लड़ाते हैं। बड़ेबड़े व्यवहारों में गप्पें बड़ीही हांकते है। अधम श्रेणी की मजाक करते हैं। गन्दी मनोवृत्ति होतीहै। दरिद्री, बातूनी, झूठ अभिमानवाले, गर्वीले, खुद को होशियारऔर दूसरों को मूर्ख माननेवाले, ताने देकर बोलनेवाले और निर्लज्जऐसे ये व्यक्ति होते हैं। ये बोलने में सावधान होते हैं। किसी कीबातों में नही आते। आश्चर्य तो यह है कि इन्हें कल क्या कहाइसका स्मरण बिलकुल नहीं रहता। लोगोपर प्रभाव डालने का बहुतयत्न करते हैं। खाने का सामान जुटाने में ही इनका समय बीतता है।
    लग्न में मिथुन राशि में गुरु हो तो पूर्व आयु में दुःख और उत्तर आयुमें सुख मिलता है। मिथुन, तुला, कुम्भ लम्न में गुरु हो तो उनव्यक्तियों को प्रपंच की चिन्ता नही होती और उसके लिए वे अधिकप्रयत्न नही करते। ये चैनी होते हैं किन्तु पैसों की कमी इन्हें कमीनही होती। स्त्री के साथ इनका व्यवहार बहुत. ही साधारण किसीहमसफर मुसाफिर जितने ही प्रेम के साथ होता है। वह दिनभर घरके काम कर इनकी सेवा करे इतनी ही पत्नी की योग्यता ये मानतेहैं। मीन लग्न में गुरु हो तो स्वभाव अच्छा होता है। ये विश्वव्यापीदृष्टि से विचार करते हैं। बड़ी बड़ी संस्थाएं स्थापन करते हैं। अपनेसुख की विशेष फिक्र नही होती किन्तु जगत की चिन्ता करते हैं।इन्हें व्यवहारज्ञान नही होता किन्तु भाग्य अच्छा होता है। ये या तोअविवाहित रहते हैं या एकसे अधिक विवाह करते है। वसिष्ठ के मतसे केन्द्र अथवा त्रिकोण में गुरु लक्षावधि दोष दूर करता है - दुनाविना केन्द्रगतोमरेज्यस्त्रिकोणगो वापि हि लक्ष निहंति दोषान्।। किन्तुअनुभव उलटा ही है। गुरु जिस स्थान में हो उसका फल नष्ट करताहै - स्थाननाशं करोति गुरुः। लग्नस्थ गुरु हर छठवें वर्ष या हरबारहवें वर्ष विपत्ति लाता है, शारीरिक, मानसिक या आर्थिक संकटउत्पन्न करता है और इन संकटों को दूर करने का सामर्थ्थ नही होता।गुरु धनदायक नही है इसलिए आर्थिक संकट दूर नही होते। यह ज्ञानऔर विद्या का कारक है। इन व्यक्तियों का आयुष्य सुखसमाधानपूर्णनही होता - दुःख और विपत्तियों से भरा होता है। सामान्यतः येलोग व्याभिचारी होते हैं। मेष, कर्क, तुला, मकर इन लग्नों में गुरुूहो तो अतिनीच वर्ग की स्त्रियों से सम्बन्ध होता है। वृषभ, सिंह,वृश्चिक तथा कुम्भ इन लग्नों में यह दोष नही होता। मिथुन, कल्या,धनु मीन लग्नों में कुल, मान और आयु से श्रेष्ठ स्त्रियों से सम्बन्धहोता है। इस गुरु के फलस्वरूप बचपन में माता या पिता की मृत्यु     होती है। इन्हें द्विभार्यायोग होता है। पहली पत्नी आयु के माध्यम सेही मृत होती है। यह विवाह न होने का भी योग हो सकता है।कर्क, वृश्चिक तथा मीन लग्नों में गुरु डाक्टरों के लिए अच्छा होताहै। इनका रोगों का निदान और औषधियोजना ठीक होती है।वकीलों के लिए भी अच्छा योग है। इन्हे अच्छी कीर्ति मिलती हैऔर न्यायाधीशों पर प्रभाव पडता है तथा यशस्वी होते हैं। इनकीबुद्धि तीव्र होती है और न्याय-अन्याय का निर्णय सूक्ष्मता से करसकते है। लग्न में गुरु हो तो पुलिस, सैनिक या अबकारी विभाग मेंबिलकुल नहीं जाना चाहिए। ये शिक्षा विभाग में सफल होते है। इन्हेऋण लेकर खर्च करने की बिलकुल इच्छा नही होती। प्रतिष्ठा कीरक्षा करते हैं। श्रीराम के वनवास का कारण लग्नस्थ गुरु माना है।इस फल का अनुभव मेष, कर्क, तुला तथा मकर इन लग्नों में आताहै। एक क्ष व्यक्ति के मेष लग्न में गुरु है। इनकी शिक्षा नही हुईकिन्तु ४० वें वर्ष तक व्यापार में यशुस्वी होकर ११ भाषाओं काअच्छा ज्ञान इन्हों ने प्राप्त किया। चाचाने इनकी इस्टेट का अपहरणकिया था। अतः ३२ वें वर्ष तक इन्हें वनवास जैसी दशा में समयबिताना पडा। दूसरे उदाहरण के व्यक्ति के वृश्चिक लग्न में गुरु है।यह फ्रेंच, जर्मनी, ग्रोक, लेटिन, हिब्रू तथा स्पेनिश ये भाषाएं अच्छीतरह बोल सकता है तथा लिखता है। लग्नस्थ गुरु कुम्भ में हो तोविज्ञान के तथा मीन, मकर और सिंह लग्न में हो तो भाषा औरसाहित्य के प्रोफेसर होने का योग होता है। शिक्षक, प्राध्यापक यही व्यवसाय लग्नस्थ गुरु के अनुकूल होता है।
लग्नस्त गुरु के फल साधारण तह अच्छे मिलने पर भी कष्ट सहन करना पड़ता है l
किन्तु आपत्ति का समय किसी तरह निभ जाता है स्वाभाव उच्च होता है प्रतिज्ञा में जीता है धार्मिक भावुक और रूढ़िवादी 
 किन्तु आपत्तिका समय भी किसी तरह निभ जाता है। स्वभाव उच्चहोता है। कृतज्ञ और विश्वासु मनोवृत्ति होती है। मिथुन,तुला और कुम्भ लग्न में गुरुहो तो वे वादविवाद में कुशलहोते है। समय पर अपना कहना झूठ है यह मालूम होनेपर उसे सच सिद्ध करते हैं। किन्तु वहसमय बीत जाने पर उनकी गलती उन्हें समझाई जा सकती है। अतः ऐसे व्यक्तियों से विवाद नहीं करना चाहिए। लग्न में गुरु हो तोआपसी झगड़े अदालत में ले जाने की वृत्ति नही होती। समझौते काप्रयास करते हैं। इन व्यक्तियों की पत्नी गम्भीर वृत्ति की औरविपत्तियों में धैर्य रखनेवाली होती है। इस विषय में ये लोगभाग्यशाली होते हैं। बहुत ऋण होने पर या बेइज्जती के मौके परये अज्ञात स्थान में चले जाते हैं। मेष, सिंह और धनु लम्न में गुरु होतो नींद सजग होती है। ये अपने काम व्यविस्थत रूप में औरसमयपर करते हैं। ये किसी के काम का उत्तरदायित्व अपने पर नहींलेते। किन्तु लेना पडा तो उसे बराबर पूरा करते हैं। ये अपना वचनअच्छी तरह निभाते हैं।

    लग्न में गुरु हो तो जातक दीर्घायु, निरोगी, विवेकी, धैर्यवान, विद्वान, सदाचारी,सुंदर, आर्थिक दृष्टि से संपन्न, समाज एवं शासन में प्रतिष्ठित, यशस्वी, गंभीर,ज्ञानी, आध्यात्मिक, एकाग्रचित्त, मिष्ठान्प्रेमी, मधुरभाषी होता है।

    संतान आज्ञाकारी होती है। कर्क, धनु या मीन राशि का गुरु लग्न में होतो वह सबसे अधिक लाभकारी रहता है। धन प्राप्ति के अनेक साधन उसेउपलब्ध रहते हैं तथा वह सुखी जीवन यापन करता है।

    जातक का शरीर स्थूल रहता है, शत्रु बहुत होते हैं, झूठे आरोप लगते हैं,सुख के सभी साधन मौजूद होते हुए भी निरंतर चिंता एवं निर्थक भय मनमें बना रहता है। गुरु पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो उसके हर कार्य में विष्नएवं दिक्कतें उपस्थित होती हैं किंतु उनका निवारण भी शीघ्र हो जाता है।लग्न में मकर राशि के गुरु के अच्छे फल प्राप्त नहीं होते। आठवें वर्ष मेंबुद्धि का विशेष विकास होता है। विवाह होने के आठ वर्ष के बाद आज्ञाकारीसंतान का जन्म होता है।

    पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार वायु राशि का गुरु लग्न में हो तो अनेकशुभ फल प्राप्त होते हैं। अग्नि या पृथ्वी राशि का गुरु लग्न में हो जातकस्वाभिमानी होता है। जन्मराशि का गुरु लग्न में हो तो विशेष फलदायक होताहै। ऐसा जातक तेजस्वी रहता है एवं उसका ललाट उन्नत रहता है।
    
    प्रथम भाव-प्रथम भाव या लग्न में गुरु हो तो जातक सर्वगुण सम्पन्न,सुन्दर, निरोग, दीर्घायु, कर्मठ, विद्वान, जनसेवक, वचनों को पूर्ण करने वाला,प्रतिष्ठित, स्पष्टवकता, अपने आत्मसम्मान के प्रति जागरूक, आकर्षक, सुखी, विनम्र,धनी, गुणी, धार्मिक, सरकार द्वारा सम्मानित तथा अधिक सन्तानवाला (यदि सिंहलग्न न हो तो) होता है। ऐसा जातक या तो बिल्कुल फकीरी/अलमस्त स्वभाव काहोता है या पूरी तरह नवाब। विशेषकर तब जब गुरु अशुभ प्रभाव में हो तो जातकनिर्धन होते हुए भी श्रेष्ठ फकीर होता है। यदि बुध भी सबल स्थिति में हो तो जातककई प्रकार की विद्याओं का जानकार होता है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसे जातक का भाग्य उसके अपने दिमाग तथासरकारी पदों पर बैठे व्यक्तियों की मित्रता से बढ़ता हैं। मकान, जायदाद तथासमर्थ दृष्टि का सुख उसको मिलता है। परन्तु यदि ऐसा जातक दूसरों सें मांगे याउनके आगे हाथ फैलाए तो उसके भाग्य की हानि होती है।
    गुरु यदि स्वराशि में लग्नस्थ हो तो जातक व्याकरण शास्त्र का ज्ञाता, बहुतसे पुत्रों वाला, सुखी, सौभाग्यशाली, ज्ञानी, दीर्घायु व समस्त सुविधाएं भोगने वालाहोता है। जलराशि का गुरु घुड़दौड़ का शौकीन तथा उदार बनाता है। ऐसा जातकधन को तुच्छ/तृणवत समझता है। उच्च का गुरु (कर्क राशि) लग्न में हो तो जातकको सर्व शुभफलों को भोगते हुए भी संकटों का सामना बार-बार करना पड़ता है,जिसके कारण उसके श्रेष्ठ भाग्य पर भी प्रश्नचिह्न लगता अनुभव होता है। (कुछविद्वनों के अनुसार उच्च का लग्नस्थ गुरु हर छठे तथा बारहवें वर्ष में विपतिदायकहोता है।) वैसे कर्क, वृश्चिक व मीन (जलराशि) का गुरु डॉक्टरों को बहुत शुभरहता है। मिथुन, तुला, वृश्चिक तथा कुम्भ राशियों में गुरु हो तो जातक निश्ंचित,व सबसे मित्रता रखने वाला होता है।
    शास्त्रकारों के अनुसार लग्नस्थ गुरु जातक को मरने के बाद उत्तम गति प्राप्तकरवाता है। जैसा कि कहा है-
    गुरुत्वं गुणैलग्नगे देवपूज्ये सुवेषी सुखी दिव्य देहाल्प वीर्यः ।गतिर्माविनी पारलौकी विचिन्त्य वसूनी व्ययं सबलेन व्रजन्ति॥
अर्थात् लग्नस्थ गुरु जातक को अच्छे वस्त्रों तथा शोभायुक्त, स्वच्छ शारीरिक
    कान्ति वाला, सुखी, अल्पबली, पण्डित, चतुर तथा समाज में प्रशंसा व मान पानेवाला बनाता है। ऐसा जातक शरीर त्यागकर अन्त में उत्तम गति प्रास्त करता है तथाधनादि सुखों का जीवन में भोग करता है।
  
    प्रथम भावः शास्त्रों में लग्नस्थ बृहस्पति के शुभ फलों का उल्लेख हैलेकिन अनुभव इसके विपरीत है। अशुभ फल अधिक और शुभ फल अल्पमात्रा में मिलते हैं। जैसे वृहद्यवन जातककार का मत है प्रजामष्टंवत्सरेबृहस्पतिः अर्थात आयु के आठवें वर्ष में संतान की प्राप्ति होती है। यह प्रायःअसम्भव ही है क्योंकि वयस्क हुए बिना संतानोत्पादक क्षमता कैसे आ सकतीहै? वृष का बृहस्पति लग्न में हो तो जातक चरित्रहीन होता है, स्त्री हो तोउसके अन्य पुरुषों से संबंध होते हैं। उच्च का अर्थात कर्क राशि का बृहस्पतिशुक्र व मंगल से युक्त हो तो भी जातक चरित्रहीन, नीच कर्मरत, व्यसनासक्तहोता है। धनु अथवा मीन का बृहस्पति शुभ फल देता है, संकट हों तो टलजाते हैं लेकिन उच्च का बृहस्पति जातक को बार-बार संकटग्रस्त करता है।मिथुन-तुला राशि का बृहस्पति गौरवर्णी बनाता है तो वृष, कन्या, कुम्भ-मकरऔर वृश्चिक में होने से वात-व्याधि से पीड़ित रखता है। विशेषत: आयु काउत्तर भाग अधिक कष्टकारी होता है। अग्नि राशि का बृहस्पति लग्नस्थ हो तोशुभ फल मिलते हैं। धनु में हो तो पुत्र संतति का अभाव हो सकता है। मकरऔर कुम्भ राशि का हो तो धन या संतान दोनों में से एक की प्राप्त होती है।

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक शास्त्रविद्या में पारंगत,कफरोगी, मधुरभाषी, विदेश निवासी, सरकारी नौकरी करनेवाला एवं मंदजठराग्नि से युक्त रहता है। उसके पैरों में कोई विकार रहता है, पत्नी सुख मेंन्यूनता रहती है। जातक में पुरुषत्व की कमी होना भी संभव रहता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक त्वचा रोग से पीड़ितरहता है। दूसरों का मजाक करने का विशेष गुण जातक में निहित होता है। महर्षिलोमश के अनुसार ऐसे जातक के दो पल्ियां होती हैं। महर्षि गर्ग के अनुसारऐसा जातक अल्पायु होता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक का बचपन कष्टोंमें गुजरता है। जातक विद्वान, वक्ता एवं कवि होता है। महर्षि गर्ग के अनुसारजातक पितृभक्त रहता है, परंतु मां के साथ मतभेद होते हैं। मां का चरित्रसंदेहास्पद होता है। महर्षि लोमश के अनुसार ऐसा जातक उतावले स्वभावका एवं परस्त्रीगामी रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक सुखी, संपन्न, शासनमें प्रतिष्ठित सरकारी कर्मचारी, आस्तिक होता है एवं राज्य कर्मचारी के रूपमें जीवनयापन करता है। जठराग्नि मंद रहती है। पारिवारिक एवं वैवाहिक सुखमें न्यूनता रहती है। पशु से सुख प्राप्त होता है। पशुपालन का व्यवसायफायदेमंद होता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक चर्मरोग से पीड़ित रहताहै। महर्षि लोमश के मतानुसार जातक नास्तिक होता है, दो पल्ियां रहती हैं।वह कंजूस, आडंबरी, बहुरूपी एवं चुगलखोर रहता है। अन्य आचा्यों के मतानुसारजातक आस्तिक, विद्वान, युक्तिबाज, मंत्रशास्त्रज्ञ, सुखी एवं संपन्न रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक शास्त्रों में पारंगत,विद्वान, स्वपरिश्रम से प्रगति करनेवाला परंतु बड़बोला, निरोगी, यशस्वी एवंसंपन्न होता है। इसका पिता प्रख्यात होता है। जातक के पिता के रिश्तेदारोंसे मतभेद रहते हैं। पिता की परंपरा से जातक भी विख्यात बनता है। माता-पिताका पर्याप्त सुख जातक को मिलता है किंतु पैतृक संपत्ति का सदुपयोग नहींहोता। महर्षि लोमश एवं यवनाचार्य के मतानुसार जातक कठोर, उतावला एवंपरस्त्रीगामी होता है।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक शत्रुहंता, धैर्यवान,निरोगी, प्रतिष्ठासंपन्न, पशु एवं वाहन सुख भोगनेवाला, भाइयों में फूटडालनेवाला, वाद-विवाद में कुशल, विद्वान, कामातुर एवं परस्त्रीगामी होता है।संतान सुख में कमी रहती है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक कंजूस, सत्करमी,सुखी, शासन में प्रतिष्ठित, यशस्वी, परिवार का पालनहार, परोपकारी, क्रोधीहोता है तथा व्यापार में धन कमाता है। यवनाचार्य के मतानुसार जातक विद्वान,संतान सुख भोगी, मंत्रवेत्ता, चालाक एवं अत्यंत चतुर होता है। उसकी पत्नीसुनयनी रहती है। महर्षि लोमश की राय में जातक कपटी एवं चुगलखोर रहता है।9. धनु-धनु राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक अनेक शास्त्रों काजानकार, निरोगी, संपन्न, यशस्वी, मातृ-पितृभक्त होता है। वह वाचाल नहींहोता, दीर्घायु एवं पुरुषार्थी रहता है। पिता विख्यात रहते हैं। चाचा आदि सेजातक के मतभेद रहते हैं। पैतृक संपत्ति का सुख कम प्राप्त होता है। महर्षिलोमश के मतानुसार जातक के एक से अधिक स्त्रियों से प्रत्यक्ष या परोक्षरूप में संबंध रहते हैं।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक सुखी, धैर्यवान,पुरुषार्थी, परोपकारी, विद्वान एवं शरीर से दुबला-पतला रहता है। सहोदरों सेमतभेद रहते हैं। वह बोलने में चतुर एवं वाद-विवाद में निपुण होता है।यवनाचार्य के मतानुसार ऐसा जातक नपुसक रहता है जबकि महर्षि लोमशके अनुसार पत्नी सुख में न्यूनता रहती है। अति स्त्रीकामी होने के कारण ऐसाहो सकता है। पैरों में विकार रहता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक संपन्न, स्तुतिप्रिय,अतिवाचाल, सुखी एवं सरकारी कर्मचारी होता है। परोपकारी, परिवार कापालनहार, कंजूस, क्रोधी होता है। पत्नी सुंदर मिलती है। व्यापार में धन कमाताहै। महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक अल्पायु होता है। प्यास से व्याकुल होकरमृत्यु को प्राप्त होता है।

    12. मीन-मीन राशि का गुरु लग्न में हो तो जातक को बचपन में काफीक्लेश रहते हैं। जातक मातृ-पितृभक्त, विद्वान, सुखी, संपन्न, दीर्घायु, अधिकारसंपन्न, जमीन-जायदाद का धनी एवं कवि होता है। महर्षि लोमश के मतानुसारजातक के एक से अधिक पलियां होती हैं। स्त्रियों से वैवाहिक या गुप्त संबंधहोते हैं। महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक की मां का चरित्र निष्कलंक नहीं होता।
1. गाय की सेवा करें। 
2. केसर का तिलक लगावे।
3. तिजोरी में चांदीके पुराने सिक्के रखें।
4. ब्रह्माजी की पूजा करें।
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2) द्वितीय भाव - द्वितीय स्थान (धन भाव)
द्वितिय स्थान में गुरु के फल

    आचार्य व गुणाकार - सुवाक्यः। वाणी अच्छी होती है।कल्याणवर्मा - धनवान् भोजनसारोवाग्मी सुवपुः सुवाक्सुवकाश्च। कल्याणवपुस्त्यागी सुमुखो जीवे भवेद् धनगे।। यह धनवान्अच्छा अन्न खानेवाला, वक्ता, सुंदर, मधुर बोलनेवाला, मोहकमुखवाला, सुदृढ, उदार स्वभाव का होता है।

    गर्ग - लक्ष्मीवान् नित्यमुत्साही धनस्थे देवतागुरौ। बुधट्ृष्टे चनिःस्वःस्यादिति सत्यं प्रभाषितम्। धनवान, सदा उत्साही होता है।किन्तु इस पर बुध की दृष्टि हो तो निर्धन होता है। भौमक्षेत्रे यदाजीवः षष्ठाष्टमद्वितीयकः। षष्ठे वर्षें भवेन्मृत्युर्जातकस्य न संशयः।।यदि मेष या वृश्चिक राशि में गुरु दूसरे, छठवें या आठवें स्थान मेंहो तो उस बालक की छठवें वर्ष में मृत्यु होती है।

    जातकरलनाकर - गुरौ धनेडथवा दृष्टे धनधान्यसुखं भवेत्।विद्याविनयसंपन्नो मान्यः सर्वस्य जायते।। गुरु धनस्थान में हो तो याइस स्थान पर गुरु की दृष्टि हो तो धनधान्य का सुख मिलता है तथा वह व्यक्ति विद्यावान और विनयी तथा सब लोगों द्वारा सन्माननीयहोता है। मन्त्रेश्वर ने भी इसी प्रकार वर्णन किया है।

    वसिष्ठ - नानाविधं धनचयं कुरुते धनस्थः। अनेक प्रकारों सेधन का संग्रह होता है।

    बृहद्यवनजातक - सद्रूपविध्यागुणकीर्तियुक्तः संत्यक्तवैरो नितरागरीयान्। त्यागी सुशीलो द्रविणेन पूर्णो गीर्वाणवंधे द्रविणोपयाते|रूपवान, विद्यावान, गुणी, कीर्तिमान, वैरहीन, गम्भीर स्वभाव का,उदार, सुशील तथा धनवान होता है। गुरुभद्धि भूपमानम्। यह २७वें वर्ष राजाद्वारा सन्मान प्राप्त करता है। जयदेव तथा ढुंढिराज केमत इसी प्रकार के है।

    वैद्यनाथ - वाग्मी भोजनसौख्यवित्तविपुलस्त्यागी धनस्थे गुरौ। बोलनेमें कुशल, धनवान, उदार तथा उत्तम भोजन प्राप्त करनेवाला होता है।

    काशीनाथ - धने जीवे धनी लोकः कृतघ्नो बन्धुसंयुतःगजाश्वमहिषीयुक्तः कान्तिमानपि जायते।। धनवान, कृतष्न, भाईबहिनोंसेयुक्त, हाथी, घोड़े, भैस आदि से संपन्न तथा कान्तिमान होता है।

    आर्यग्रन्थकार - सुरगुरौ धनमंदिरमाश्रिते प्रमुदितोरुचिरप्रमदापतिः। भवति मानधनो बहुमौक्तिकैर्गतवसुर्भविताप्रसवाहिन्के।। आनन्दी, सुन्दर स्त्री का पति, मानी और धनवानहोता है। जन्म के समय निर्धन होता है। धनस्थाने गुरु्यस्य अतिकष्टात्धनागमः। कवित्वे मतिः संजाता न धनं तिष्ठति गृहे। इसे धन कीप्राप्ति बहुत कष्ट से होती है, बुद्धि कविता करने की ओर प्रवृत्तिहोती है, घर में धन कायम नही रहता।

    नारायण भट्ट- कवित्वे मतिर्द्नेतृत्वशक्तर्मुख दोषधृकशीष्र-भोगार्तएव। कुटुबे गुरौ कष्टतो द्रव्यलब्धिः सदा नो धन विश्रमेद यत्लोडपि।।कविता की ओर प्रवृत्ति होती है, अधिकार धारण करने का सामर्थ्य     होता है, मुख में दोष होते हैं, जल्दी उपभोग समाप्त होने से दुखी होताहै, धन बडे कष्ट से मिलता है और मिलने पर स्थिर नही होता।जीवनाथ का मत भी इसी प्रकार का है।

    जागेश्वर - संजीवे धने काव्यकृच्चंचलो वै धन तस्य वर्गेविरोधस्तदानीं परं शञ्रुवः प्रौढतां संप्रपन्नाः सुरूपं तथा भामिनीरंजितोडयं। कवि, चंचल, धनवान, अपने लोगों से विरोध करनेवाला,सुन्दर तथा स्त्री से सन्तुष्ट होता है। इसके शत्रु बढ़ते हैं।

    हरिवंश - दानी दीनदयाकरो नरवरो ज्ञानी गुणज्ञो गुणी।निर्लोभी निरुपद्रवी च विनयी सत्संगमी साहसी।। विद्याभ्यासरतोविवेकसहितो युक्तो महिष्यादिभिर्नानावाहनवत्तसंचयपरो विते सुरेज्येभवेत्।। दानी, दीनों पर दया करनेवाला, ज्ञानी, गुणवान, गुणों कोसमझनेवाला, निर्लोभी, निरुपद्रवी, नम्र, सत्संगति में रहनेवाला,साहसी, पढ़ने में मग्न, विवेकयुक्त, भैसें आदि प्राणियों से संपन्न,विविध वाहनों से युक्त तथा धन का संग्रह करनेवाला होता है।

    कश्यप - धनस्थानगते जीवे धनी भवति बालकः। सर्वाधिराजःसुरराजमंत्री।। यह धनवान और अधिकारसंपन्न होता है।

    नारद - धनलाभं तथारोग्यं प्रमोदो बन्धुवर्गतः। प्रचडैः सद्टशं भोगोदेवेज्ये धनगे भवेत्। धन मिलता है, आरोग्य प्राप्त होता है, भाइयों औररिश्तेदारों से आनन्द होता है और उत्तम उपभोग प्राप्त होते हैं।

    पुंजराज - कोशस्थे चेद्देवपूज्ये वाम्मी स स्यात् पुरुषः सौम्यवकत्रः।बोलने में कुशल और प्रसन्न चेहरे का होता है। रामदयाल का यही मत है।

    घोलप - यह प्रसिद्ध, शत्रुओं का नाश करने में समर्थ,बलवान, बुद्धिमान, धनवान, पुण्यवान, उत्तम मित्रों से युक्त, सर्वत्रसुशोभित, भोगी, कलाओं का ज्ञाता, उत्तम कपडे पहननेवाला, स्त्रीसुख से युक्त और उदार होता है।
    गोपाल रत्लाकर - स्पष्ट बोलनेवाला, बडे परिवार सेयुक्त, मृदु बोलनेवाला, दानी, धन जमीन में रखनेवाला और परिवारका संचालक होता है।

    हिल्लाजातक - द्वितीयः सप्तर्विशे च जायालामकरो गुरुः। २७वें वर्ष पत्नी प्राप्त होती है।

    लखनऊ के नवाब - मुश्तरी यदि भवेज्जरखाने बुक्दमःपरमपुण्यमतिः स्यात्। कामिलः कनकसूनुयुतश्च खूबरो हि मनुजोजरदारः।। चतुर, पुण्यशील, यशस्वी, स्त्रीपुत्रों से युक्त, धनवान,मधुर बोलनेवाला और सफल होता है।

    पाश्चात्य मत - धन का संग्रह होता है। यह गुरु बलवान होतो श्रेष्ठ फल मिलता है। सरकारी नौकरी, कानूनी काम, बैंक,देवालय, धर्मदाय संस्था आदि में यश मिलता है। रसायनशास्त्र औरभाषाओं के ज्ञान में निपुणता प्राप्त होती है। परिवार के व्यक्तियों सेऔर पत्नी से अच्छा सुख मिलता है।

    अज्ञात - धनवान् बुद्धिमान उच्चभाषी। षोडशवर्षेधनधान्य-समृद्धिः। बहुप्राबल्यवान्। उच्चक्षेत्रे धनुषि द्रव्यवान्। पापयुतेविद्याविष्नः। चोरवचनवान् दुर्वचाः अनतप्रियः। नीचयुते पापकषे्रे द्यपायीअ्रष्टः कुलनाशः। कलत्रान्तरयुतः पुत्रहीनः।। यह धनवान, बुद्धिमानऔर अच्छा बोलनेवाला होता है। सोलहवें वर्ष धनधान्य मिलता है।बहुत प्रबल होता है। कर्क और धनु राशि में हो तो धनवान होताहै। पापग्रह से युक्त हो तो शिक्षा में रुकावट आती है। चोर, ठग,झूठ बोलनेवाला, अयोग्य बोलनेवाला होता है। नीच राशि में यापापग्रह की राशि में हो तो शराबी, भष्ट, कुल का नाश करनेवाला,दूसरी स्त्री से युक्त, पुत्रहीन होता है।

    हमारे विचार - प्रायः सभी शास्त्रकारोंने इस गुरु का फलधनप्राप्ति बतलाया है। गुरु धन देनेवाला शुभ ग्रह है यह उनकीधारणा है। किन्तु मेरे विचार से धनप्राप्ति से गुरु का सम्बन्ध नही है।
    (ii) द्वितीय भाव में गुरु
    जातक समृद्ध व अपनी धन, संपदा तथा प्रसिद्धी का घमंडी होगा।उसकी पत्नी सुदर और वह स्वयं धनी परिवार का तथा सदा ही प्रसन्नरहने वाला होगा।
    -मानसागरी
    द्वितीय भाव का बृहस्पति जातक को विद्वान्, संपन्न, सुदर्शन, प्रभावशालीवाणी वाला तथा अच्छे भोजन का शौकीन बनाता है।
    -फलदीपिका
    जातक खाने का शौकीन, वाक्यपटु, भाग्यशाली, धर्मार्थ कार्य करनेवाला, संपन्न और सुदर्शन चहरे-मोहरे और देह वाला होगा।
    -सारावली
    वह धनी और बुद्धिमान तथा सटीक भविष्यवाणी करने वाला होगा।13 वें वर्ष में उसे आर्थिक लाभ और कृषि-संबंधी सम्पन्नता मिले तथाशक्तिशाली हो। यदि बृहस्पति पापाक्रान्त है तो शिक्षा में बाधा तथाझूठ-कपट की आदत और व्यर्थ का वक्ता होगा।
    -भृगुवह धनी, बुद्धिमान, महान्, आकर्षक, प्रसन्न, धाराप्रवाह बोलनेवाला, कोमल, स्वादिष्ट वस्तुएँ खाने-पीने वाला, विजयी हावभाव वाला,भाग्यशाली, विनोदी, अच्छी पत्नी व परिवार वाला, वाक्यपटु तथा निपुणहोगा।-डॉ रामन
    टिप्पणी
    भाग्य, संपत्ति, संतान, शिक्षा, धर्म तथा न्याय का कारक बृहस्पतिद्वितीय भाव में जो कि धन, वाणी, परिवार, आय के स्रोत, खानपान कीआदतों आदि का भाव है, जातक को प्रतिष्ठित लेखक तथा कवि बनाताहै। वह मोतियों का कारोबार करने वाला, समृद्ध, शत्रुजित्, सुदर्शना पत्नीसे युक्त, न्यायकर्ता, नेता तथा राजकीय सम्मान पाने वाला होगा।
    यदि गुरु नीचस्थ, पापयुत है, तो जातक पियक्कड़, अनैतिक, परिवारको नष्ट करने वाला तथा परस्त्रीगामी होगा।
    नारायण भट्ट और जीवनाथ के अनुसार जातक धन कमाने में अनेककठिनाईयों का सामना करें। अन्य मतों के अनुसार द्वितीयस्थ गुरु जातकको धन संपत्तिशाली बनाता है।
    ‘स्थान हानि करो जीवाः स्थान वृद्धिकरो शनिः।' अर्थात गुरुजहाँ स्थित होता है, उस भाव का फल कम करता है। जबकि दृष्टि देनेवाले भावों के फलों में वृद्धि करता है। दूसरी ओर शनि स्थिति केअनुसार भाव में वृद्धि और दृष्टि-अनुसार फलों में हानि करता है।तत्व-प्रदीप-जातक के अनुसार
    टिप्पणी
    अतः द्वितीय भाव में बृहस्पति की स्थिति धन तथा इसी तरह पंचमभाव में संतान के लिए हानिकारक है। ‘कारको भाव् नाशाय'-केसिद्धान्त से बृहस्पति जो कि संपत्ति व द्वितीय भाव का कारक है आर्थिकरूप से अनिष्ट फलप्रद ही होगा।
    अनुभव से देखा गया कि धनु, मीन या उच्चस्थ गुरु संपत्ति के लिएअच्छा सिद्ध होता है। दूसरे भाव में किसी भी राशि का हो इसकी स्थितिजातक को आवश्यकता पड़ने पर धन उपलब्ध अवश्य कराती है। उसकेपास बहुत धन न हो परन्तु उसका धन संबंधी कार्य अवश्य हो जाएगा।

    धनस्थान में गुरु अशुभ सम्बन्ध में या पापग्रह से युक्त न होने परभी बहुतांश व्यक्ति साधारण स्थिति के ही देखे गये हैं। बैरिस्टर याजज्ज लोगों का अपवाद छोड़ दिया जाय तो ये लोग प्रायः भिक्षुक,ब्राह्मण, शालाओं में शिक्षक, प्राध्यापक अथवा ज्योतिषी होते हैं.और इन वर्गों में धन कितना मिलता है यह स्पष्ट ही है। नारायणभट्टने शीघ्र उपभोग के कारण दुखी होना यह फल बतलाया है इसकाअनुभव नहीं आता किन्तु इन लोगों में नाजुक शरीर अवश्य पायाजाता है। मुख में दोष होना यह फल मंगल का अशुभ सम्बन्ध होनेपर मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में गुरु हो तो मिलता हैं। घर के बड़ेव्यक्तियो से विरोध होना इस फल का अनुभव मेष, सिंह, या धनुराशि में यह गुरु होने पर आता है। कुटुम्ब के निर्वाह के लिए धनकी कमी होती है, धन का संग्रह नहीं होता यह फल वृषम, कन्या,तुला, मकर या कुंभ लग्न हो तो मिलता है। अज्ञात ने दूषित गुरु केफलों में शराबी, चोर, ठग, झूठ बोलनेवाला, भ्रष्ट ऐसा वर्णनकिया। किन्तु इस वर्णन का विशेष अनुभव नहीं आता। दूसरीस्त्री सेसम्बन्ध और, पुत्र न होना ये भी फल कहे हैं। इनके बारे में अनुभवऐसा है कि पहली पत्नी की मृत्यु ४८ से ५२ वर्ष तक की आयु मेंहोती है। किन्तु दूसरा विवाह नही होता। पुत्र न होने के बारे में-मिथुन, तुला व कुंभ ये वन्ध्या लग्न हों तो यह फल मिलेगा। लग्नपुरुष राशि का और गुरु स्त्री राशि में हो तो सन्तति नही होगी।यवनजातक में २७ वें वर्ष राजमान्यता मिलने का योग कहा गया वहठीक्र है। हिल्लाजातक में २७ वें वर्ष पत्नी मिलने का योग कहागया। यह विलम्ब से विवाह होने का योग हुआ क्यों कि लेखक केसमय में बालविवाह का ही प्रचलन था। आजकल उच्च वर्गों में प्रौढ़अवस्था में विवाह होते हैं अतः यह आयु ३२ से ३६ वें वर्ष तकमानना चाहिये। नीचले वर्गों में इस फल का अनुभव प्रायः नहीमिलता। क्यों कि असाधारण कारण न हो तो अभी उनमें बालवय में     ही विवाह करते हैं। ऐसे असाधारण कारण का दोतक यह गुरु होसकता है। जन्मसमय में गुरु धनस्थान में हो तो २७ वें वर्ष में गोचरगुरु का भ्रमण पंचम स्थान से होता है। यही कारण है कि यह आयुविवाहयोग्य की कही हैं।

    हमारे अनुभव - गुरु द्वितीय स्थान में हो तो जन्म के समयपरिवार बड़ा होता है। परिवार बड़ा हो तो गरीबी होती है, छोटा होतो श्रीमान हो सकता है। ऐसा प्रकार रहता है। परिवार बड़ा होकरधनसमृद्धि हो तो कुटुम्ब के व्यक्तियों की मृत्यु हो कर संख्या कमहोती है। अथवा बँटवारा होता हैं। अथवा वैभव कम होने लगता है।रवि विचार में धनस्थान के रवि के जो फल मैने बतलाये गये है उनमेंनिम्नलिखित फलों का अनुभव गुरु के बारे में भी आता है। (१)पिता का सुख कम मिलता है। इसके धन का उपभोग पिता नहीं कर।सकता है। (२) पैंतृक सम्पत्ति नहीं मिलती। मिली तो नष्ट होती है।(३) दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया जाता हैं। (४) पैतृकसम्पत्ति अच्छी हो तो बेकार रहना पड़ता हैं। पिता पुत्र दोनों एकसाथ धनार्जन नहीं कर सकते। इस गुरु से शिक्षा पूर्ण नहीं होती।अपनी जाति के लोग मदद नही करते। जिन पर उपकार किया जायवे ही निन्दा करने लगते हैं। उपकार कर्ता को बिलकुल अयोग्यबतलाने की ये कोशिश करते हैं। यह गुरु मेष में हो तो वाणी बहुतकठोर होती है। वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ में हो तो पैसों केलिए सदा ही चिंतित रहना पड़ता है। धन मिले तो भी ये निश्चन्त नहीहो पाते। ये लोग यदि बहुत झूठ बोलें तो वाणी में दोष उत्पन्न होताहै। अतः इन्हें सच ही बोलना चाहिये। वाणी के शाप से इन्हें धन कीकमी बहुत होती है। यह गुरु धनु में हो तो दानधर्म के कारण धन कमहोता है। 

 द्वितीय स्थान यानी धन स्थान में गुरु हो तो जातक की वाणी प्रखर तथा     प्रभावशाली रहती है। जातक साहित्यकार होता है। चेहरा सुंदर एवं स्वभावदयालु रहता है। जातक समाज में प्रतिष्ठित, आर्थिक दृष्टि से संपन्न, वाचालएवं भोजनप्रिय होता है।

    जातक के शत्रु अधिक होते हैं, पत्नी अच्छी मिलती है, नजदीकी लोगोंसे एवं सहोदरों से अनबन रहती है। कुछ आचायों के मत इसके विपरीत हैं।सहोदरों का सुख अच्छा मिलता है एवं उनसे संबंध भी मधुर रहते हैं।गुरु पापग्रह से युक्त हो तो विद्याध्ययन में दिक्कतें आती हैं। चोरी, ठगी,जैसे दुर्गुण जातक में रहते हैं। नीच राशि यानी मकर राशि का गुरु लग्न मेंहो तो चारित्रिक दोष पैदा होता है।

    ऐसे जातक की आर्थिक स्थिति के बारे में विद्वानों में मतभिन्नता पाई जातीहै। कश्यप, वशिष्ठ, वैद्यनाथ आदि अधिकांश आचायों के मतानुसार द्वितीयस्थानस्थ गुरु जातक को संपन्न बनाता है। कुछ अन्य आचायों के अनुसार इसगुरु के फलस्वरूप धनलाभ मुश्किल से हो पाता है और जो धनलाभ होताहै, वह खर्च हो जाता है। कुछ आचायों के अनुसार धनु या कर्क राशि कागुरु धन स्थान में होने पर जातक संपन्न होता है, अन्यथा नहीं। महर्षि गर्गके मतानुसार धन स्थानस्थ गुरु पर बुध की दृष्टि हो तो जातक निर्धन होता है।

    सोलहवें वर्ष में धनलाभ एवं भाग्योदय होता है। द्वितीय स्थान में मेष यावृश्चिक राशि का गुरु हो तो छठे वर्ष में जातक को यातनाएं सहनी पड़ती हैं।धनस्थ गुरु सामाजिक नेतृत्व की क्षमता और अधिकार देता है। फलस्वरूपजातक नेता या कुशल प्रशासक बन सकता है।

    कुछ विद्वानों के अनुसार धनस्थ गुरु होने पर जातक लोगों के उपकार भूलजाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी इस विधान से सहमत हैं। आर्थिक दृष्टि सेऐसा जातक संपन्न होता है, ऐसा उनका मानना है।

    यवनाचार्य भी धनस्थ गुरु के जातक को धनवान बनाने की बात को मानतेहैं। उनकी राय में 27वें वर्ष में वैवाहिक जीवन सुखी बनता है।
द्वितीय भाव-गुरु यदि जन्मकुंडली के दूसरे भाव में हो तो जातक को सुन्दर देह, ऊंची किन्तु गम्भीर मधुर आवाज, संतान, लोकप्रियता, दीर्घायु तथासौभाग्य प्रदान करता है। ऐसा जातक शुभकर्मा, शत्रुजित तथा अचल सम्मत्ति सेविशेषरूप से सम्पन्न होता है।
    लाल किताल के अनुसार ऐसा जातक श्रेष्ठ विद्या का स्वामी, पूरी दुनिया का धर्मगुरु, धर्मोपदेशक, गृहस्थ होते हुए भी ज्ञानी व गुरु तथा पिता के धन की वृद्धि करनेवाला होता है। ऐसे जातक के पास खूब धन आता है और वह खूब धनलुटाता भी है। ऐसे जातक को मिट्टी, कृषि तथा स्त्रियों के प्रयोग में आने वाली वस्तुओं के.व्यापार में लाभ होता है। परन्तु सोने का व्यापार नुकसानदायक होता है।
    गुरु यदि शुभ प्रभाव में हो तो जातक बुद्धिमान, कुशलवक्ता होता है। राज्य सेवा तथा धार्मिक स्थानों से सम्बन्धित कार्यों में अधिक सफल होता है। जातक गुरु से प्रभावित हो तो यूं भी प्रायः शिक्षक, पुजारी, धर्मोपदेशक, प्रधानाध्यापक,मठाधीश या ज्योतिषी होता है। स्वराशिया उच्च का गुरु जातक को वकालत के पेशेमें विशेष धन प्राप्त कराता है।
    अग्नित्त्व राशियों में हो तो परिवार में बड़ों से बैर कराता है। मंगल के साथ अशुभ योग करता है तथा मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में हो तो मुख के रोग देता है।
    स्त्री राशियों में सन्तानाभाव देता है। (गुरु सिंह राशि का हो तो प्रायः सन्तान कष्टसे-मिलती है.।) गुरु अशुभ हो तो जातक को मानहानि, परेशानियां, धनहानि वसरकार से कष्ट होता है। पाप प्रभाव अधिक हो तो शिक्षा पूर्ण नहीं होती। जातकआचारहीन तथा पुत्रहीन होता है। वह परस्त्रीगामी तथा मदिरासेवी भी होता है।
    गुरु यदि शुक्र की राशियों (वृष, तुला) में हो तो प्रायः पुरुष जातकों कोपरस्त्रीगामी तथा स्त्री जातकों को परपुरुषगामी बनाता है (विशेषकर तब जबचन्द्रमा भी पाप प्रभाव में हो)।
द्वितीय भावः द्वितीय भाव में बृहस्पति हो तो धन का संग्रह होता है,राजकीय सेवा, देवालय, धर्म संस्था, कानूनी सलाह आदि से यश मिलता है।परिजनों और पत्नी से अच्छा सुख मिलता है। पिता का सुख अल्प मिलता है,पिता अपने ही पुत्र के धन का उपभोग नहीं कर पाता। जातक दत्तक पुत्र होसकता है, पैतृक संपत्ति होती है तो पिता-पुत्र में वैमनस्य बना रहता है तथाअंत में उस संपत्ति का नाश हो जाता है। धनस्थान का बृहस्पति शिक्षा प्राप्ति मेंहो तो धनाभाव बना रहता है। वृष, वृश्चिक, कुम्भ और सिंह में हो तब भीबाधक रहता है। परिजनों का विरोध सहन करना पड़ता है। उच्चस्थ बृहस्पति धन की तंगी रहती है। वायु राशि का बृहस्पति धन स्थानगत हो तो मुख रोग से
पीड़ा, बुजुगों से वैमनस्य का अनुभव अग्नि राशि में सम्भव है। मेष का बृहस्पति हो तो वाणी में कठोरता होती है। विवाह में देरी होती है।
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक संपन्न, विद्वान,सुशील, यशस्वी, स्वाभिमानी, दीर्घायु, आस्तिक एवं दुबला-पतला होता है।माता-पिता का सुख प्राप्त होता है। जातक कामातुर रहता है। उसके विवाह के पहले छोटे भाई या बहन का विवाह होता है।

2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक उद्यमी, पराक्रमी,विद्वान, जनप्रिय, तपस्वी, आस्तिक, भ्रमणशील, खर्चीला एवं कामातुर होताहै। यवनाचार्य के मतानुसार ऐसा जातक कंजूस रहता है।

    3. मिथुन मिथुन राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, संपन्न,सभी साधनों से परिपूर्ण, सुखी जीवन जीनेवाला, शान-शौकत से रहनेवालासंतोषी एवं खर्चीला रहता है। जातक में पैसा अधिक कमाने की या धनसंग्रहकी वृत्ति रहती है। किसी को दिया धन वापस मिलना मुशिकल रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक आलसी तथाकामातुर रहता है, पत्नी अच्छी नहीं मिलती, बांझ रहने की संभावना रहतीहै। जातक का वैवाहिक जीवन दुःखी रहता है। फलस्वरूप समागम एवंव्यभिचार वृत्ति रहती है। माता-पिता का, विशेष रूप से मां का सुख पर्याप्तरूप में मिलता है।

    5, सिंह-सिंह राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक जनप्रिय, पराक्रमी,संपन्न, तपस्वी, धैर्यवान, अपने कुल में प्रख्यात, जन्म स्थान से दूर रहनेवाला,अपनी प्रगति के लिए अथक प्रयास करनेवाला एवं कामातुर रहता है। स्वास्थ्यमध्यम रहता है। संतान धन का अपव्यय करनेवाली होती है। पशु या वाहनके कारण शारीरिक विकृति आती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक कवि या गायक,घूमने-फिरने का शौकीन एवं प्रख्यात होता है। आर्थिक स्थिति साधारण हीरहती है। कुछ आचायों के मतानुसार ऐसा जातक रिश्वत या अन्य गुप्त मार्गसे धन कमाता है। उसके मित्र बहुत रहते हैं, संतान आज्ञाकारी रहती है, पैतृकसंपत्ति काफी मिलती है, सहोदरों से मतभेद रहते हैं तथा स्वभाव गर्म रहताहै। ऐसा जातक अपना धन दूसरों को न दे क्योंकि वह लौटकर नहीं आता।
7. तुला--तुला राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक के पासजमीन-जायदाद बड़ी मात्रा में रहती है। वह धैर्यवान, भोगी, पितृभक्त, विद्वान,प्रख्यात एवं पारिवारिक सुखों से परिपूर्ण रहता है। उसकी पत्नी का मिजाजअच्छा नहीं रहता। फलस्वरूप वैवाहिक जीवन दुखी रहता है। जातक व्यभिचारकी ओर आकर्षित होता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक धैर्यवान,जन्म स्थान से दूर रहनेवाला, साधु स्वभावी, कर्तव्यनिष्ठ एवं कुलप्रसिद्ध होताहै। उसकी संतान संपत्ति का अपव्यय करती है। स्वास्थ्य साधारण रहता है, गुदारोग होते हैं। परस्त्री एवं संपत्ति के विषय में जातक के विचार अच्छे नहीं होते।

9. धनु-धनु राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी, संपन्न,आस्तिक, दान-पुण्यकर्त एवं कवि या गायक रहता है। मित्र काफी रहते हैं।महर्षि लोमश की राय में दो या तीन विवाह करने के बाद भी जातक कोपुत्र सुख से वंचित रहना पड़ता है।

10. मकर-मकर राशि का गुरु द्वितीय स्थान में हो तो जातक विद्वान, दीर्घायु,समाज में विख्यात, अधिकारसंपन्न, कामातुर एवं शरीर से स्थूल होता है।

    11. कुंभ कुंभ रश का गुरु धन स्थान में हो तो जातक अधिकारसंपन्न, लोभी, कामातुर एवं परस्त्री तथा परसंपत्ति में आसक्त तथा गुदा रोग से ग्रस्तरहता है।

    12. मीन-मीन राशि का गुरु धन स्थान में हो तो जातक अनेक सुखों से परिपूर्ण, संपन्न एवं सुखी रहता है। संतान आज्ञाकारी रहती है। महर्षि लोमश के मतानुसार दो विवाह होकर भी उसे पुत्र सुख से वंचित रहना पड़ता है।
1. सभी को बुरे शब्द न कहे। 
2. दान देवे।
 3. चने की पाल, केले व गुड़दान करे ।
4. सांप को दूध का भोग लगावे।
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3) तृतीय भाव - तृतीय स्थान (सहज भाव)
तृतीय स्थान में गुरु के फल

    होता है।आचार्य तथा गुणाकर - कृपणः, क्लेशः। कंजूस तथा दुखी

    कल्याणवर्मा-अतिपरिभूतः कृपणः, सदाजितो मानवो भवतिजीवे। मन्दाग्निः स्त्रीविजितो दुश्चिक्ये पापकर्मा च।। सदा पराभूतहोनेवाला, कंजूस, भूख कम लगनेवाला, स्त्रीद्वारा पराजित औरपापकर्म करनेवाला होता है।

    गर्ग - भ्रतृस्थाने गुरौ भातृभगिनीभ्यः सुखं बदेत्। भ्रातरः पंचचत्वारःक्रूरदृष्ट्या विपत्तयः।। क्ररैश्च शत्रुभिद्दृष्टे स्वल्पं भ्रातृसुखं भवेत्। इसे     भाईबहिनों का सुख अच्छा मिलता है। चार पांच भाई होते हैं। क्रूर औरशञ्रुग्रहों को दृष्टि हो तो भाईयों का सुख कम मिलता है। धनवान्निर्धनाकारः कृपणो भातृसंयुतः। कुटुम्बी नृपपूज्यश्च सहजे देवता गुरौ।।यह धनवान होकर भी निर्धन जैसा दिखता है। कंजूस, भाई और बड़परिवार से युक्त तथा राजा द्वारा सम्मानित होता है।

    गौरीजातक - लग्नात् तृतीयगे जीवे नराणां चैव वल्लभः।लोकप्रिय होता हैं।

    जातकमुक्तावली - स्वक्षे जीवे भ्रातृसौख्यं। यह धनु या मीनराशि में हो तो भाइयों का सुख मिलता है।

    यवनजातक - शताधिपो देवपुरोहितश्च। सैंकडों लोगों कास्वामी होता है।

    वैद्यनाथ - भ्रातृस्थानगते गुरौ गतधनः स्त्रीनिर्जितः- पापकृत्।निर्धन, स्त्रीद्वारा पराजित तथा पापकर्म करनेवाला होता है। जीवेनयुते कंठस्वर चारुतर समेति। आवाज बहुत मधुर होता है।

    द:कनर्जितश्चा नरोडम्निमंद्याबलतासमतेः पराक्रमे शक्र-पुरोहितेऽस्मिन्। सौजन्यन बतलानेवाला, कंजूस, कृतच्न, स्त्रीपुत्रों पर प्रेम न रखनेवाला तथाअग्निमान्ध और दुर्बलता से युक्त होता है।

    आर्यग्रन्थ - सहजमन्दिरगे च बृहस्पतौ भवति बन्धुगतार्थसमन्वितः। भाइयों से धन प्राप्त करता हैं।

    नारायणभट्ट- भवेद् यस्य दुश्चिक्यगो देवमन्त्री लघूना लघीयान्सुखं सोदराणाम्। कृतष्नो भवेन् मित्रसार्थे न मैत्री ललाटोदयेडप्पर्थलाभोन तद्त्।। यह हीन दर्जे का होता है। भाइयों का सुख मिलता है।कृतष्न, किसी से मित्रता न करनेवाला होता है। बहुत भाग्योदयहोने पर भी इसे यथेच्छ धन नहीं मिलता।
    जीवनाय - गुरी सहोतये यदि पंजपत्रः। पांच पुत्र होते हैं।अन्य फल नारायणभट्ट के समान हैं।

    काशीनाथ - जीवे तुतीये तेजस्वी कर्मदशो जितेन्द्रियःमित्रप्तमुखसम्पन्रस्तीर्थयात्राप्रियो भवेत्।। यह तेजस्वी, अपने काममें तत्पर, जितेन्द्रिय, मित्र और आप्तों के सुख से सम्पन्न, तीर्थयात्राए,करनेवाला होता है।

    जपदैव -असुजन: कृषणो विमनाः कृशा: कुधयुतौउलसभाकसहजे गुरी।। दुर्जन, कंजूस, विमनस्क, दुबलापतला, आलसी होताहै। इसे 'भूख बहुत लगती है।

    मन्त्रेश्वर - सावज्ञः कृपणः प्रतीतसहजः शीर्यडषकृद् दृष्टधीः।अपमानित, कंजूस, पाषी, दुष्ट बुद्धि का होता है। इसके भाई प्सिद्धहोते हैं।

    पुंजराज - सहोत्थितानां बहुल सुखं गुरुस्तृतीये सौख्यं त्रयाणांच सहोत्थितानां।। भाइ््यों को अच्छा सुख मिलता है। तीन भाई होतेहै। रामदयाल का मत इसी प्रकार का है।

    जागेश्वर - भवेल्लाधवं मानवाना विशेषात्। मीठी बातें करता है।बृह्धवनजातक - गुरुतोडभ्रनेत्रैमित्राप्तिः। बीसवें वर्ष मित्र

    प्राप्त होते हैं। इसका अन्य वर्णन ढुंढिराज के समान है।

    हिल्लाजातक - सुजसमागमो विंशे तृतीयः कुरुते गुरुः। बीसवेंवर्ष विद्वान व्यक्तियों का समागम होता है।

    पराशर - गुरः तृतीये तु शत्ुवृद्धिय धनक्षयम्। शत्रु बढते हैं,धन कम होता है।

    वसिष्ठ - सुधिषणां क्लेशम्। बुद्धि अच्छी होती है। किन्तुक्लेश होते हैं।

    हरिवंश - उन्माद्यांकृतहीनतां कृषणतां प्रीति कलने सुमां अप्रीतिःसुतमित्रतोपि जनने मानं नरेन्द्राश्रयात्। उन्माद के कारण अपमान
होता हैं। कंजूष होता है, स्त्री पर प्रीति करता है किन्तु पुत्र और
मित्रों से प्रेम नहीं होता। राजा द्वारा सन्मान होता है।
घोलप यह सामान्य हो तो भी दान अवस्था में नहीं होता।
राजा की कृपा प्राप्त कर सुख होता है। वस्तुओं का संग्रह करनेवाला,
धनवान, पूज्य, गौर वर्ण का तथा काव्यादि पठन कर श्रेष्ठता प्राप्त
करनेवाला होता है।
गोपालरत्नाकर - बहुत कंजूस, दाक्षिण्य से युक्त, भाइयों को
बढ़ानेवाला, संकल्पों को सफल बनानेवाला, अपने लोगों का पोषक,
खेती में रुचि रखनेवाला होता है।
लखनऊ के नवाब - गाफिलो बहपराक्रमयुकू स्यात् मानवः
परुषवाक च वखील:। पालको भरवति श्रेष्ठजनानां मुश्तरी यदि
बिरादरखाने।। बहत पराक्रमी होता हैं किन्तु गाफिल रहता है। कठोर
बोलनेवाला वकील होता है। श्रेष्ठ लोगों का पालन करता है।
पाश्चात्य मत - छोटे प्रवास होते हैं। लेखन से लाभ होता हैं।
यह गुरु धाम्मिक और आध्यात्मिक वृत्ति का पोषक हैं। यह विचारशील
और बुद्धिमान होता हैं किन्तु युक्तिवाद करता है और मत बदलता
है। आप्तो से इसे धनलाभ होता हैं। यह गुरु अ्नितत्व की राशियों
में हो तो संसार में विजय मिलती हैं। पृथ्वीतत्तव की राशियों में हो
की राशियों
तो व्यापार, सट्ट, साहस में विजय मिलती हैं। वायुत्व
में हो तो मानसिक और ज्ञानसम्बन्धी कार्यों में श्रेष्ठ होता हैं।
जलतत्त्व की राशियों में हो तो जलप्रवासद्वारा सुख मिल्ता है।
अज्ञात - अतिलुब्धः । भ्रातृवृद्धि। दाक्षिण्यवान् । आरातर सहजे।
हदबन्धुसमागमः अष्टात्रिंशदवर्ष यात्रासिद्धिः। भावाधिपे बलयुते
भता दीर्घायुः । भावाधिपे पापयुते बन्धुदोषकरः । भ्रात्नाशः । धैर्यहीन
जडबुद्धिः दारिद्रयुक्तः ॥। भाई बहुत
बहुत होते हैं। विजयी होता है। मित्रों तथा बन्धुओं का समागम होता हैं। ३८ वे वर्ष में तीर्थयात्रा होती थै,
तृतीयेश बलवान हो तो भाई दीर्घायु होते हैं। तृतीयेश पापग्रहों के
युक्त हो तो भाईयों का नाश होता है, उनसे सम्बन्ध दृषित होते हैं।
यह डरपोक, मन्दवुद्धि और दरिद्री होता हैं।
हमारे विचार - तृतीय स्थान शुभग्रहों को अच्छा नहीं माना
है। अतः इस स्थान में गुरु हो तो दारिद्र्घ प्राप्त होता है। दारिद
और कंजूस होना तथा कृतध्न होना यह फल सभी आचार्यों ने दिया
है। ये सब अशुभ फल कर्क, वृश्चिक, मीन तथा स्त्री राशियों के हैं।।
हिल्लाजातक, यवनजातक तथा अज्ञात ने विशिष्ट वर्षों के जो फल कहे हैं उनका अनुभव देखना चाहिये। हमें इन फलों की प्रतीति नहीं हुई। जीवनाथ ने ५ पुत्र होने का फल कहा उसका अनुभव नहीं आता। इस स्थान में गुरु पुरुष राशि में हो या स्त्री राशि में हो पुत्र  प्त्संख्या बहत कम होती हैं। गर्ग ने चार-पांच भाई होने का फल कहा। यह स्त्री राशियों के लिए ठीक है। पुंजराज ने तीन भाई होने का फल काहा। यह पुरुष राशियों में ठीक प्रतीत होता है। गोपाल रत्नाकर तथा घोलप का फलादेश स्त्री राशियों के लिए योग्य है। यवनमत के वर्णन का अनुभव पुरुष राशियों में अता है। कारशीनाथ का फलवर्णन मेष, सिंह, धन् तथा मिथुन, तुला, कुंभ इन  राशियों में उचित प्रतीत होता है। 

    (iii) तीसरे भाव में गुरु
    जातक धनी और धनहानि से ग्रस्त भी हो सकता है। उसकी संपत्तिको भाई हडप लें
    -मानसागरी
    जातक कंजूस, दुश्चरित्र, पापी परन्तु प्रसिद्ध तथा कभी-कभी मानहानिको भी प्राप्त होगा। उसके भाइयों में से कोई एक अत्यधिक प्रतिष्ठित पदपर आसीन होगा।
    -फलदीपिका
    जातक कंजूस, सदैव विजयी, विकारग्रस्त पाचन तन्त्र वाला, स्त्रियोंसे परजित, पापकर्मी अपमानित तथा घृणित होगा।
    -सारावली
    जातक कंजूस और बहुत से भाईयों वाला, चतुर, निश्चयी, संबंधो कोबनाए रखने वाला, 38 वें वर्ष की आयु में यात्रा करने वाला होगा। यदितृतीयेश बली हो तो भाई चिरंजीवी अन्यथा भातृ-हानि होगी। वह स्वयंमूर्ख तथा गरीब होगा।
    -भृगुजातक प्रसिद्ध, बहुत से भाईयों वाला, परिवार के प्रति समर्पित,कंजूस, परोपकारी, विनयी, अच्छा किसान, मितव्ययी, सफल, शक्तिशाली,बहादुर, कला व साहित्य के प्रति अभिरूचि रखने वाला तथा सभीसंबंधियों का प्रिय होगा।
    -डॉ रामन
    यद्यपि जातक राजसी प्रभावों वाला होगा परन्तु उसकी खुशी काआनन्द नहीं उठा पायेगा। वह कंजूस, पत्नी व संतान के प्रति सहानुभूति     नही, प्रसिद्ध भाईयों वाला, सैकडों लोगों पर शासन करने वाला तथाआर्थिक हानियों का सामना करने वाला होगा।
    -जीवनाथ
    जातक के पाँच सहोदर, पाँच बच्चे और ससुर के तीन पतलियाँ होंगी।उसके स्वयं दो पत्ियाँ और वह गंभीर चिंतक होगा।
    -जातकसागर के अनुसारजातक के चार या पाँच भाई होंगे। गुरु पर कोई भी पाप प्रभावसहोदरों के लिए खतरा दर्शाता है। वह धनी परन्तु गरीब होने का ढोंगरचेगा।-गर्गाचार्यटिप्पणीयश प्रतिष्ठा का ग्रह बृहस्पति तीसरे भाव में बैठकर सप्तम, नवम वएकादश भाव को देखता है। तीसरा भाव-भाई-बहन, श्वसुर ओर जातकके प्रयास को दर्शाता है, सप्तम भाव-पति-पत्नी, सार्वजनिक छवि,प्रसिद्धि, स्तर या रूतबा, साझेदारों से सहयोगादि, नवम भाव-भाग्य, पितातथा ग्यारहवाँ-प्रसिद्धि, दक्षता, लाभ प्राप्ति तथा भाई-बहनों को दर्शता है।यदि ये भाव गुरु से प्रभावित है तो जातक भी अन्ततः भाव के उपरोक्तसभी शुभ फलों को प्राप्त करता है।
    भाव विशेष में किसी ग्रह का विवेचन निम्न आधार पर किया जासकता है-
    (1) साधारण
    (क) ग्रह के गुणधर्म।
    (ख) कारक भाव-वह ग्रह किसका कारक है?
    (घ) उस भाव के कारक ग्रह के गुण धर्मं।
    (2) विशिष्ट
    (अ) ग्रहों की स्थिति के अनुसार तत्तत् भावेशों की विवेचना।
    (आ) ग्रह की स्थिति और भावेश कहाँ स्थित हैं वहाँ का विवेचन।
    (३)अन्य गरहों से स्थिति-दृष्टि-युत्यादि संबंध।
    (ई) उस भाव में पड़ने वाली राशि के गुणधर्म।
    (उ) उस भाव के स्वामी के गुणधर्म।
    (ऊ) त्व, सम-विषम, चर स्थिर, द्विस्वभाव आदि राशियों कीविशेषताएँ।
    गुरु की स्थिति के उपरोक्त प्रभाव, गुरु तथा तीसरे भाव के कारकत्वके स्वभावानुरूप ही हैं। गुरु-संतान, संपत्ति, स्वभाव पाचन अग्नि,धार्मिक तथा पुण्य प्रवृत्ति, प्रसिद्धि आदि व तीसरा भाव-सहोदर, प्रयत्नतथा मित्र में संबंध को एक साथ लिया जाए, तो वे पूर्व प्रतिपादित,भिन्न-भिन्न शास्त्रों में दिये गये फलों के जैसे ही परिणाम देगें।

हमारा अनुभव - इस स्थान में गुरु पुरुष राशि में हो तो शिक्षा कम होती है। वृषभ, कन्या तथा मकर में हो तो शिक्षा पूर्ण होतीं है। किन्तु इस योग में सुशिक्षित लोग कम ही मिलते हैं - ज्यादा तर अशिक्षित ही होते हैं। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में यह सुशिक्षित होते हैं - अशिक्षित कम मिलते हैं। गुरस्त्री राशि में हो गुरु हो तो तो वह व्यक्ति स्वतन्त्र व्यवसाय द्वारा उपजीविका करता है। पहले नौकरी हो तो वह छोड़कर स्वतंत्र व्यवसाय का आरम्भ करता है। इस योग में भाइयों से सम्बन्ध अच्छे नही रहते किन्तु कचहरी तक जाने का मौका नही आता। आपस में ही झगड़ते रहते हैं। घर का कारोबार तरुण वय में ही देखना पडता हैं। यह गुरु पुरुष राशि में हो तो नौकरी करना पडता है। इस योग में बड़े भाई होते हैं-बहने नहीं होती। स्त्रीराशि में यह गुरु हो तो छोटे भाई और बहने होती हैं। तृतीय के गुरु से भाइयों की प्रगति में विरोध आता हैं। सभी एक साथ प्रगति नही कर सकते। कोई एक निरुपयोगी हो जाता हैं। अतः ऐसे व्यक्तियों को परिवार से अलग हो कर ही रहना चाहिये। बहने अधिक होती हैं किन्तु उन्हें सुख नहीं मिलता। यह गुरु, मेष, सिंह, मिथुन, तुला या कुम्भ में हो तो शिक्षा विशेष न होने पर भी पठन बहुत होने से वे लोग विद्वान प्रतीत होते हैं और विद्वानों से मित्रता करते हैं। स्त्रीराशि में यह गुरु हो तो विद्वान होकर भी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं होती। सरकारी नौकरी हो तो असमय में ही पेन्शन लेना पडता है। जिस व्यवसाय में कीर्ति मिले उसमें धन नही मिलता, धन के लिए दूसरा धंधा करना पडता है। तृतीय के गुरु के लिए अच्छा व्यवसाय शिक्षक, प्राध्यापक या ऐसी ही कोई नौकरी करना ही ठिक हैं। इन की बुद्धि शान्त और गहरी होती है। लोगों से दूर रहना, दारिद्र्य की परवाह न करना, दूसरों को ज्ञान बतलाकर स्वयं विक्षिप्त वर्तन करना यह इनका स्वभाव होता हैं। इन्हें धनवान से एकदम गरीब अथवा अधिकार से एकदम सामान्य स्थिति में आना पडता है। पुराणों में बलि राजा को त्रिलोक का साम्राज्य छोड़कर पाताल में जाना पडा ऐसा कहा है। तृतीय में कर्क राशि के उसे यह फल प्राप्त हुआ।

 तृतीय स्थान में गुरु हो तो जातक धनवान होता है। साथ ही व्यवहारकुशलएवं कंजूस भी होता है। आवाज सुरीली रहती है। भाई-बहनों का उत्तम सुखप्राप्त होता है। भाई प्रख्यात होते हैं। प्रायः तीन से पांच सहोदर होते हैं। धनुया मीन राशि का गुरु हो तो सहोदरों का उत्तम सुख प्राप्त होता है। गुरु पापग्रहाँसे युक्त होने पर उनका सुख कम मिलता है। जातक की जठराग्न तथाकामवासना प्रबल रहती है। कामुकता के कारण वह स्त्री के वश में रहता है।विवेकहीन होने से आचरण भ्रष्ट होना संभव रहता है। उसे भले-बुरे का विचारनहीं रहता। अनेक आचायोँ ने ऐसे जातक को कृतष्न कहा है। वह स्वार्थीहोने के कारण भरोसेमंद नहीं होता। मैत्री अधिक समय तक नहीं टिक पाती,फिर भी मित्र एवं शत्रुओं की संख्या अधिक रहती है। प्रायः सभी आचायोंकी राय में ऐसा जातक अग्निमांधय की बीमारी से पीड़ित रहता है।

    जातक सरकारी कर्मचारी होता है। इसके अधीन कई लोग कार्य करते हैंlवह प्रसिद्धि पाता है। किंतु आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती फलस्वरूप मानसिक शांति में कमी रहती है। फिर भी संकट के समय वह डांवाडोल नहींहोता और न ही दीनता का भाव आता है। 38वें वर्ष में विदेश यात्रा होती है। प्रायः पांच पुत्र होते हैं। यवन ज्योतिषाचायों के अनुसार जातक का 20वां
 वर्ष महत्त्वपूर्ण रहता है।

  पाश्चात्य विद्वानों के मतानुसार ऐसा जातक प्रवासी,लेखक,साहित्यसेवी,विचारवान, धार्मिक एवं विद्वान होता है। उसमें विचारों की अस्थिरता रहतीहै और वह तर्क बहुत करता है। गुरु मेष, कन्या या धनु राशि का हो तो जातकसमाज में प्रभावी एवं विजयी होता है। वृषभ कन्या या मकर राशि का गुरुहो तो व्यापार में घन कमाता है। मिथुन, तुला या कुंभ राशि का गुरु हो तोआध्यात्मिक सफलता प्राप्त होती है। कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का गुरुहो तो विदेश प्रवास से फायदा होता है।
 
    तृतीय भाव-गुरु यदि लग्नकुंडली के तीसरे भाव में हो तो जातक विचारकर बोलने वाला, वाणी पर नियंत्रण व संयम रखने वाला, शास्त्रज्ञ, ज्ञानी, लेखक,
    ज्योतिषी अथवा योगी होता है। वह प्रसिद्ध, लोकप्रिय, सम्मानित एवं यात्राओं काविशेष शौकीन होता है। ऐसे जातक के भाई अधिक होते हैं अथवा केवल भाई हीहोते हैं। वह प्रबल कामुक तथा जन्मस्थान से दूर रहने वाला होता है। तीसरे मुरु
    का जातक मितव्ययी होता है। वह अपने सुख आराम पर धन व्यय नहीं करता 
    किन्तु परिवार/आश्रितों के लिए व्यय करता है। ऐसे जातक का जोड़ा गया धन बादमें उसके पत्नी या बच्चे भोगते हैं। वह स्वयं अपने जीवन में उसे नहीं भोगता। यदिबृहस्पति इस भाव में अशुभ हो तो जातक कायर, मनहूस या दुर्भाग्यशाली (मंदभागी)हो सकता है। ऐसा जातक बीच के सम्बन्ध नहीं रखता। या तो बहुत घनिष्ठ होताहै या एकदम विरुद्ध। यदि अशुभ गुरु अशुभ भाषों का स्वामी भी हो तो जातकदुष्ट, कंजूस, अहसानफरामोश तथा खूब मेहनत करने पर भी धन संग्रह न कर पानेवाला होता है। शुभ गुरु हो तो जातक ज्योतिषविद्, योगी, अध्यात्म विद्या काजानकार, अतिज्ञानवान, विद्वान, तीव्र बुद्धिवाला, सुयोग्य, धनवान एवं अच्छे स्वास्थ्यव समृद्धि वाला होता है। सरकार से लाभ/नौकरी उसे प्राप्त होती है तथा आदर वयश भी मिलता है।
    अग्निराशियों में भी गुरु लाभप्रद रहता है। खासकर मेष व सिंह राशि में तोजातक कम शिक्षित/अशिक्षित होते हुए भी समाज में पूर्ण शिक्षित समझा जाता है।जलराशियों में गुरु हो तो समुद्री यात्राओं से लाभ कराता है। वायुराशियों मेंमानसिक स्तर अच्छा तथा ज्ञानोपार्जन की लालसा देता है। पृथ्वीराशियों का गुरुजुआ, सट्टा, रेस या व्यापार से लाभ दिलाता है। स्त्री राशि में अशुभ फल प्रायः होतेहैं। नौकरी में अभ्युदय नहीं होता, स्वतंत्र व्यवसाय की इच्छा रहती है। ऐसा जातकशिक्षित होता है, पर गुमनाम रहता है। भाइयों से बंटवारे पर कलह होती है। पुरुषराशियों में बड़ी बहन नहीं होती (स्त्री राशियों में बड़ा भाई नहीं होता)।तीसरे घरका गुरु क्योंकि भाग्य स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है। अतः भाग्य में आकस्मिकपरिवर्तन करता है। (शुभ प्रभाव से एकाएक धनी तथा अशुभ प्रभाव से एकाएकनिर्धन बना सकता है तथा सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि रहने के कारण कैसी भी स्थितिहो, प्रायः पत्नी से जातक को अलग नहीं होने देता। ग्यारहवें भाव पर पूर्ण दृष्टि होनेसे लाभ व आय में वृद्धि कारक होता है।) यह लाल किताब का मत है।
तृतीय भावः तृतीय भाव में बृहस्पति हो तो जातक विचारशील और
    बुद्धिमान होता है लेकिन तर्कवादिता और मत बदलने की आदत होती है। पुरुष  राशि में बृहस्पति हो तो जातक की शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाती, पृथ्वी राशि का होतो शिक्षा पूर्ण हो जाती है। परंतु ऐसे जातकों का प्रतिशत अधिक नहीं होता,अशिक्षित अधिक होते हैं। जल राशि में बृहस्पति हो तो विपरीत फल मिलता है। स्त्री राशि का बृहस्पति जातक को स्वतंत्र व्यवसायी बनाता है, भाइयों सेसंबंध अच्छे नहीं रहते, प्रायः परस्पर झगड़ते रहने की प्रवृत्ति होती है। लेकिनफैसले के लिए कोर्ट-कचहरी का सहारा नहीं लेते। पुरुष राशि का बृहस्पतितीसरे स्थान में हो तो जातक नौकरी करता है। बड़ी बहिन का सुख नहीं रहता।सभी भाई एकसाथ कार्य करें तो असफल रहते हैं, उन्नति नहीं कर पाते।तृतीयस्थ बृहस्पति के कारण धन-कीर्ति दोनों साथ नहीं मिलते, धन मिलता हैतो यश नहीं, यश मिलता है तो धन नहीं। ऐसे जातक शिक्षक बनें तो उचित है।
    राशिगत फल

    1. मेष--मेष राशि का गुरु तृत्तीय स्थान में हो तो जातक नास्तिक, पराक्रमी,हर कार्य में होशियार रहता है, व्यापार में काफी धन कमाता है। कामातुर होनेसे वह परस्त्री से संबंध बना सकता है, विचार अस्थिर रहते हैं, झगड़ालू रहताहै। वह योग्य-अयोग्य, न्याय-अन्याय का विचार आर्थिक मामलों में नहींकरता। उसका उद्देश्य किसी भी तरह धन कमाने का रहता है। शूलरोग कीसंभावना होती है।

    2. वृषभवृषभ राशि का गुरु तृत्तीय स्थान में हो तो जातक विद्वान, संपन्न,पराक्रमी एवं सुखी होता है। माता एवं सगे-संबंधियों से मनमुटाव रहता है।दो पलियां हो सकती हैं।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक सुंदर, विद्वान,परिश्रमी, संपन्न एवं लोकप्रिय होता है। जीवन के कार्यों के कारण मरणोत्तरभी प्रसिद्धि पाता है। जातक कंजूस, स्वार्थी एवं अल्पायु होता है, सहोदरों सेविरोध रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक प्रवासी,आस्तिक, हर कार्य में दक्ष एवं संपन्न होता है। उसके भाई-बहन नहीं रहतेया उनसे मधुर संबंध नहीं रहते। जन्म से ही या दुर्घटना के कारण शरीर मेंविकृति रहती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक को संतान सुखमें न्यूनता रहती है यानी संतान अल्पायु होती है। विशेष प्रयास से ही पुत्रसुखसंभव होता है। पत्नी के अपने देवर के साथ एवं पति के अपनी साली के साथ अनुचित संबंध रह सकते हैं। बचपन में पालन-पोषण ननिहाल में होता है। मामा-मामी का अच्छा सहयोग रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक गर्ममिजाज,चुगलखोर, स्वाभिमानी, अस्थिर विचारों का, विद्वान, लोकप्रिय एवं खूबसूरतहोता है, आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। संगति अच्छी न होने से जातक पैतृकसंपत्ति का दुरुपयोग करता है। अपनी कर्तव्यपरायणता के कारण उसका
मरणोत्तर भी नाम रहता है। जातक अल्पायु होता है या बाल्यारिष्ट का भय रहता है। सहोदरों का उचित सहयोग प्राप्त नहीं होता।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक कंजूस, बहुरूपी,मधुरभाषी, चुगलखोर, सरकारी कर्मचारी, संपन्न एवं सुखी रहता है। संतानआज्ञाकारी होती है। भाई-बहन नहीं रहते या फिर उनसे मतभिन्नता रहती है।स्वास्थ्य साधारण रहता है। शरीर में कोई विकृति रहती है।

 8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमीएवं लोकप्रिय रहता है। पति-पत्नी का चरित्र अच्छा नहीं रहता। पति का अपनीसाली से एवं पत्नी का अपने देवर से अनुचित संबंध रहता है, संतान अल्पायुरहती है। विशेष परिश्रम से ही पुत्रसुख प्राप्त होता है, स्वास्थ्य मध्यम रहताहै। माता-पिता के साथ जातक की मतभिन्नता रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक नौकर-चाकरोंसे युक्त, संपन्न, सुखी, शासन में प्रतिष्ठित, क्रोधी, अभिमानी, समाज के लिएउपद्रवकारक रहता है। उसे सहोदरों से मध्यम सुख प्राप्त होता है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,मधुरभाषी, बहुरूपी, महाकंजूस, चुगलखोर किंतु समाज में प्रसिद्ध रहता है।संतान विशेषकर कन्याएं आज्ञाकारी होती हैं। परस्त्री या परपुरुष से अनुचितसंबंध रहते हैं।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक दयालु, गुणवान,पुरुषार्थी एवं संपन्न रहता है, समाज में मान रहता है। जातक केप्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दो पल्लियां होती हैं। रिश्तेदार एवं माता-पिता के साथ उसकेमधुर संबंध नहीं रहते।

    12. मीनमीन राशि का गुरु तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,नौकर-चाकरों से युक्त, सुखी, संपन्न एवं सरकारी कर्मचारी होता है किंतुस्वार्थी एवं कंजूस रहता है। पिता का सुख मध्यम प्राप्त होता है।

1. कन्याओं को गुरूवार को भोजन करावें। 
2. चंदन का टीका लगावे।
3. दुर्गा का पाठ करेंl
4. पीला वस्त्र पहने।
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4) चतुर्थ भाव -चतुर्थ स्थान (सुख भाव)
चतुर्थ स्थान में गुरु के फल

आचार्य तथा गुणाकर सुखी ।
कल्याणवर्मा - स्वजनपरिच्छदवाहनसुखमतिभोगार्थसुयंतो भवति। श्रेष्ठः शत्रुविषादी चतुर्थसंस्थो यदा जीवः।। आप्त, वाहन, सुख, बुद्धि और विविध उपभोग तथा धन प्राप्त होते हैं। यह श्रेष्ठ और शत्रुओं को ताप देनेवाला होता है।

वसिष्ठ - यह मुख्य होता है किन्तु धन नष्ट होता है।
गर्ग – भवन्ति बालमित्राणि यस्य मित्रगते गुरुः । दिव्यमालाम्बरक्रीडा नावाहनयोग्यता।। जीवंस्यात् पितुस्तस्य सुखं भवेत्।। जीवश्चाप्य- मृतोपमम्।। एकोऽपि जीवश्चतुर्थस्थाः पापाश्चान्यत्र संस्थिताः । तदा गृहे हि जातस्य पूर्वजं धनमुच्यतै ।। अनन्तसौख्यं सुरराजमन्त्री ।। इसे बालमित्र प्राप्त होते हैं। उत्तम वस्त्र, पुष्पहार प्राप्त होते हैं। खेल खेलता हैं। अनेक वाहन चला सकता है। पिता को सुख प्राप्त होता है। कुएँ में जल बहुत मीठा होता हैं। चतुर्थ में गुरु अकेला हो और पापग्रह अन्यत्र हो तो पूर्वजों का धन प्राप्त होता है। यह गुरु अपरिमित सुख देता है।

वैद्यनाथ – वाग्मी धनी सुखयशोबलरूपशाली जातः शठप्रकृति- रिन्द्रगुरौ सुखस्थे।। यह वक्ता, धनवान, सुखी, कीर्तिमान, बलवान, रूपवान, किन्तु कपटी होता है।

मन्त्रेश्वर–बन्धौ मातृसुहृत्परिच्छदसुतस्त्रीसौख्यंधान्यान्वितः । माता, मित्र, परिवार, पुत्र, स्त्री और अनाज का सुख अच्छा मिलता है।

बृहद्यवनजातक - सन्माननानाधनवाहनाद्यैः संजातहर्षः पुरुषः सदैव। नृपानुकम्पासमुपात्तसंपत् स्वर्गाधिपे मन्त्रिणि भूतलस्थे ।। सम्मान, धन और वाहनों से इसे सदा आनन्द मिलता हैं। राजा की कृपा से धन मिलता है। गुरुराकृतौ। आयु के २२ वें वर्ष धन मिलता हैं। आर्यग्रंथ, महेश तथा ढुंढिराज - इन्हों ने बृहद्यवनजातक के समान वर्णन किया हैं।
नारायणभट्ट -गृहद्वारत: भुयते वाजिदेहेषा द्विजोच्चारितो वेदघोषोऽपि तद्वत्। प्रतिस्पर्धिनः कुर्वत पारिचयं चतुर्थे गुरौ तप्तमन्तर्गतं च।। इसके घर में घोड़ों की हिनहिनाहट सुनी जाती हैं और ब्राह्मण वेदपठन करते हैं (यह धनवान और ब्राह्मणों का आश्रयदाता होता है।) शत्रु भी इसकी सेवा करते हैं। किंतु इस का अंतःकरण चिन्तायुक्त रहता हैं। जीवनाथ- ने नारायणभट्ट के समान ही वर्णन किया है।

काशीनाथ सुखे जीवे सुखी लोके सुभगो राजपूजितः । विजितारिः कुलाध्यक्षो गुरुभक्तश्च जायते।। यह सुखी, सुन्दर, राजाद्वारा सम्मानित, शत्रुओं को जीतनेवाला, कुल का प्रमुख और गुरु का भक्त होता है। जयदेव ने काशीनाथ के समान ही वर्णन किया है।

जागेश्वर - चतुर्थे गुरुर्मित्रसौख्यं नराणां सुविद्याविवादो भवेत् तस्य गेहे। गजाश्वादिलाभः परैः सेव्यतेऽसौधिया काव्यकर्ता सुकर्मा इति स्यात्।। मित्रों का सुख मिलता है। इसके घर विद्वत्तापूर्ण वाद होते हैं। हाथीघोड़े प्राप्त होते हैं। शत्रु भी सेवा करते हैं। बुद्धिमान, कवि और अच्छे कार्य करनेवाला होता है।

पुंजराज - जीवे च सर्वकल्याणं यदा स हिबुके वसेत्। मामा और मौसियों को सुख मिलता है।

पराशर - चतुर्थे च सैनापत्यं धनायतिः । जीवेन चिन्ता तु सुखस्य कार्या।। धन और सेनापतिपद प्राप्त होता है। सुख प्राप्ति का विचार इस गुरु से करना चाहिए।

घोलप - अपने प्रदेश मे पूज्य होता है। श्रेष्ठ कवि, कमल जैसे गोरे वर्ण का और शान्त स्वभाव का होता है। उत्तम पुरुष के आश्रय से उन्नति होती है। पिता और गुरु पर भक्ति होती हैं। सद्गुणी, श्रेष्ठ कीर्तिमान और उद्योगी होता हैं।

गोपाल रत्नाकर स्नेह के योग्य, बुद्धिमान, सुखी, आप्तों का पालन करनेवाला, वाहन और दुधारू पशुओं का स्वामी होता है।

हिल्लाजातक - द्वाविंशे बन्धुमित्रयोलभिदस्तुर्योगो गुरुः । २२ वें वर्ष में बन्धु और मित्रों से लाभ होता है।

लखनऊ के नबाब - अश्वजर्जरकशीरथ फीलैर्युग्जनः प्रियतमः खलु राज्ञः । मुश्तरी यदि चहारुमखाने भवति यः सकलसौख्ययुतः स्यात्।। हाथी, घोड़े, धन, परिवार से सम्पन्न, मधुर बोलनेवाला और बहुत सुखी होता है।

पाश्चात्यमत - आयु के अन्तिम भाग में विजय प्राप्त होता है। यह गुरु बलवान हो तो पिता की स्थिति बहुत अच्छी होती हैं। शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वारिस के नाते अच्छी सम्पत्ति मिलती हैं। मातापिता पर भक्ति होती है और उससे अच्छा लाभ होता है।

अज्ञात सुखी क्षेत्रवान्, बुद्धिमान्, क्षीरसमृद्धः सन्मानसः मेधावी। पापयुते क्षेत्रवाहनहीनः परगृहवासः मातृनाशः बन्धुद्वेषी, बहुचिन्तावान, सुखी, अच्छे हृदयवाला, बुद्धिमान, खेती तथा दुधारू पशुओं से सम्पन्न होता हैं। इस गुरु के साथ पापग्रह हो तो खेती और वाहन नही होते, दूसरों के घर रहना पडता है, आप्तों से द्वेष होता बहुत चिन्ता होती हैं, माता की मृत्यु होती हैं।
    (vi) चतुर्थ भाव में गुरु
    चतुर्थ भाव में गुरु प्रसिद्धि, सम्मान, वाहन, संपत्ति व सदैव प्रसन्ताप्रदान करता है। जातक राजा से सम्मान व संपत्ति प्राप्त करता है।
    -मानसागरी
    जातक प्रसन्न तथा बहुत समय तक मातृ-सुख पाने वाला, मित्रों,पुत्रों तथा नौकर चाकरों से युक्त, समृद्ध अर्थात् धन-धान्य से परिपूर्णहोगा।
    -फलदीपिका
    जातक के संबंधियों के साथ स्वस्थ संबंध, वाहन सुख से युक्त,बुद्धिमान्, प्रसन्नचित, धनवान तथा समृद्ध, महान् व शत्रुओं के लिएपरेशानी पैदा करने वाला होगा।
    -सारावली
    जातक अच्छे अच्छे वाहनों का स्वामी, शिक्षित, प्रसन्न, बुद्धिमान्,समृद्ध, धर्मार्थ संस्थाओं का संस्थापक, आराम पसन्द, अच्छे वेश वाला,मातृ-सुख सम्पन्न, संतुष्ट जीवन वाला और पढ़ने का शौकीन होगा।
    -डॉ रामनचतुर्थस्थ गुरु यदि पापाक्रान्त है तो जातक को भवन व वाहन केस्वामित्व से वंचित करेगा और वह दूसरों के घरों में रहने वाला होगा।उसकी माता का निधन छोटी आयु अर्थात् जल्दी ही होगा तथा संबंधियोंशत्रुतापूर्ण संबंधो वाला होगा।
    -भृगुयदि गुरु की स्थिति अच्छी है तो जातक चतुर, प्रसन्न, सच्चरित्र तथामेधावी होगा। वह भू सम्पत्ति का स्वामी तथा अनेक दुधारू पशुओं कास्वामी होगा। यदि चतुर्थेश बली है या चन्द्रमा या शुक्र के साथ या शुभवगों में है तो जातक मनुष्य द्वारा खीचे जाने वाले वाहनों का स्वामी(आधुनिक समय में वाहन चालकों को कार्य-प्रदाता) होगा।
    उसके अधिकार में अनेक घर होंगे तथा उनमें विद्वान् ब्राह्मणों द्वारामांगलिक वेदपाठ का सदैव सौभाग्य प्राप्त होता रहेगा।
    -भट्ट तथा जीवनाथजातक माँ की देख भाल के प्रति हठी होगा। उसे संतति-हानि याअल्प संतति प्राप्त हो।
    -जातक सार
    टिप्पणी
    गुरु के बलवान् व पापाक्रान्त न होने पर स्थिति कुल मिलाकर अच्छीव शुभ कही गई है। चतुर्थ भाव पंचम से बारहवाँ है, इसमें गुरु कीस्थिति पंचम से संबद्ध शुभ फल देने में समर्थ नहीं हैं जिस प्रकारद्वितीयस्थ मंगल होने पर भाईयों के लिए, तृतीयस्थ चन्द्रमा माँ के लिए,अष्टमस्थ सूर्य पिता के लिए, षष्ठस्थ शुक्र विवाह के लिए शुभ नहीं।अन्यथा चतुर्थ भाव में गुरु की स्थिति लाभदायक है। अर्थात् भ-चक्र मेंकर्क में गुरु (नवमेश तथा द्वादशेश) की स्थिति उच्च की है, जो किशुभफलदायी है। इसी कारण चतुर्थ भाव में इसकी स्थिति को अच्छाकहा गया। धनु लग्न के लिए चतुर्थस्थ गुरु (अर्थात् मीन राशिगत)स्वगृही हुआ, मीन लग्न के लिए लग्नेश और दशमेश गुरु चतुर्थ भाव मेंहोता है। मेष लग्न के लिए नवमेश तथा द्वादशेश गुरु चतुर्थ भाव में यासिंह लग्न के लिए पंचमेश व अष्टमेश गुरु चतुर्थ में एक समानफलदायक नही हो सकता। पाठक ध्यान दें कि गुरु का राशीश से संबंधआदि का प्रभाव विद्वानोक्त फलों में परिवर्तन ला सकता है।

हमारे विचार - इस स्थान में सिर्फ वसिष्ठ और वैद्यनाथ ने गुरु के अशुभ फल बतलाये हैं। बाकी सभी ग्रन्थकारों ने शुभ फल बतलाये हैं। वैद्यनाथ, अज्ञात, पराशर, नारायणभट्ट, जीवनाथ इन लेखकों ने सुख की चिन्ता होना यह फल कहा। इस विषय में अनुभव ऐसा है कि सन्तति, सम्पत्ति और विद्या इन तीनों से सुखी विरले ही मिलते हैं। सम्पत्ति मिली तो सन्तति नहीं होती। सन्तति होने पर जीवित नही रहती अथवा बडी होने पर सम्पत्ति का रक्षण नही कर सकती। सन्तति अधिक होने पर सम्पत्ति की चिन्ता होती है। परिवार का पालन पोषण ठीक तरह नहीं होता। इन दोनों की चिन्ता न हो तो लोगों में मान सन्मान प्राप्त करना, चुनाव में जीतना इन बातों की फिक्र करते हैं। स्त्री, प्रेयसी, स्थावर इस्टेट, सुख इन में किसी एक की चिन्ता बनी रहती है। पुंजराज ने मामा और मौसियों के सुख का फल कहा। किन्तु इनका चतुर्थ स्थान से क्या सम्बन्ध है यह समझ में नहीं आता। अतः यह विचारणीय हैं। हिल्लाजातक और यवनजातक में २२ वे वर्ष लाभ का फल कहा है। यह हमें ठीक प्रतीत नहीं होता। शास्त्रकारों ने जो शुभ फल कहे वे पुरुष राशियों के हैं और अशुभ फल स्त्री राशियों के हैं।

हमारा अनुभव - इस स्थान में किसी भी राशि में गुरु हो तो वह पूर्वार्जित इस्टेट का नाश करता हैं। या तो ऐसी इस्टेट होती ही नहीं। अपने प्रयत्न से ही धन प्राप्त करना पडता हैं। ३६ वें वर्ष तक स्थिरता प्राप्त नहीं होती। पिता का सुख जल्दी ही नष्ट होता है। मां भी जब तक जीवित रहती है तब तक भाग्योदय नही होता। इसके कमाये धन का उपभोग माता पिता नहीं कर पाते। नौकरी में वर्षो तक एक ही जगह पडे रहते हैं। व्यापार में भी बहुत मन्द प्रगति होती हैं। इनके जीवन में बारह वर्ष अच्छे जाते हैं, फिर बारह वर्ष अशुभ जाते हैं, इस प्रकार अच्छे बुरे का चक्र चलता है। मेष, सिंह या धनु में यह गुरु हो तो क्षेत्रचिन्ता होती है - अर्थात अपना निजी घर या बंगला हो, खेतीबाडी हो, बाग बगीचे हों ऐसी इच्छा होती है। आयु के अन्त में घर मिलने की इच्छा पूरी होती है किन्तु अन्य इच्छाएं बनी रहती हैं। वृषभ, कन्या या मकर में हो तो द्रव्यचिन्ता या सन्तति चिन्ता होती हैं। दोनों में से कोई एक ही सुख प्राप्त होता है। मिथुन, तुला या कुम्भ में यह गुरु हो तो प्रपंच की चिन्ता होती है। आयुभर स्थिरता नही मिलती। अपनी इस्टेट कुछ नही होती। सन्तति बहुत होती है। कुछ व्यक्ति गोद लिये गये भी इस योग में देखे गये है। कर्क, वृश्चिक या मीन में यह गुरु हो तो गोद लिये जाने का योग विशेष रूप से होता हैं। ऐसा नहीं हो तो जनक माता पिता को कष्ट होते हैं। दुःख, दारिद्र्य, वनवास, कष्ट का अनुभव करना पडता बहुत हैं। इस गुरु का सर्व साधारण फल पूर्वार्जित सम्पत्ति न होना, अपनी मेहनत से धन प्राप्त करना यह है। उत्तर आयुष्य कुछ अच्छा जाता है। माता या पिता की अल्पवय में मृत्यु होती है। उनके बाद भाग्योदय होता है। आयु का पूर्वार्ध कष्टमय होता हैं। पूर्वार्जित सम्पत्ति अपने हाथों से नष्ट होती है या कोई ट्रस्टी हडप जाते हैं। 

    चतुर्थ स्थान में गुरु शुभ फलदायी होता है। जातक का जीवन सुखी रहताहै। पिता का सुख अच्छा प्राप्त होता है। गुरु के साथ अन्य कोई भी पापग्रहचतुर्थ में न हो तो पैतृक संपत्ति बड़े पैमाने पर प्राप्त होती है। गड़ा हुआ धनमिलता है। वाहनादि संपत्ति का भी सुख प्राप्त होता है।

    जातक निरोगी, भाग्यवान, धार्मिक, मधुरभाषी, शत्रुहंता, संपन्न, सरकारीकर्मचारी, एवं उत्कृष्ट वक्ता होता है। समाज में विख्यात होता है। उसके मित्रबहुत रहते हैं। महर्षि गर्ग के मतानुसार छोटे बच्चे बड़ी संख्या में जातक केमित्र रहते हैं। विरोधी भी प्रशंसक बनते हैं।

    कुछ आचारयों के मतानुसार चतुर्थ स्थान में गुरु होने पर संपूर्ण सुख-समृद्धिहोते हुए भी जातक को मानसिक शांति का अभाव महसूस होता है। हृदय मेंकपट भाव भी रहता है।

    पाप ग्रह से युक्त गुरु चतुर्थ स्थान में शुभ फल कम देता है। सांपत्तिकसुखों में कमी रहती है। निकटवर्ती लोगों से एवं सहोदरों से उसकी मतभिन्नतारहती है। मातृ सुख में भी न्यूनता रहती है।
    यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार 22वें वर्ष में भाग्योदय होता है। राजसम्मान एवं मित्रसुख प्राप्त होता है।
    पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार उपरोक्त फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथ ही जातक की पैतृक स्थिति भी अच्छी रहती है। पैतृक संपत्ति का सुख जातकको प्राप्त होता है। वह मातृ-पितृभक्त रहता है, जीवन के उत्तरार्थ में सुखीबनता है।
    
    चतुर्थ भाव-चौथे भाव में गुरु हो तो जातक शौकीनमिजाज, आरामतलब,सुन्दर शरीरवाला, उच्च शिक्षा पाने वाला, कम संतान वाला, सरकार से सम्मान प्राप्तकरने वाला, माता से विशेष प्यार करने वाला, व्यवहारकुशल, ज्योतिष में रुचि लेनेवाला तथा परिश्रमी होता है। ऐसा व्यक्ति शाही स्वभाव का व अपने इलाके मेंप्रसिद्ध होता है। लालच से दूर, चरिंत्र उत्तम तथा श्रेष्ठ पत्नी वाला होता है। यदि गुरुअशुभ हो तो जातक इश्कबाजी में पड़ जाता है। परन्तु इससे न सिर्फ जातक काबल्कि उसके परिवार का भी नुकसान होता है।
    लाल किताब के अनुसार चौथा गुरु जातक को बुद्धिमान, मेधावी तथा साफदिल बनाता है। यदि अग्निराशि में हो तो इच्छा होते हुए भी जातक स्थायी सम्पत्तिनहीं जुटा पाता। पृथ्वी राशि में गुरु संतान व स्थायी संपत्ति दोनों प्रदान करता है।वायु राशि में जातक प्रपंची, ढोंगी व कपटी हो जाता है। जलराशि में जातक केदत्तक पुत्र बन जाने की सम्भावना रहती है। ऐसा न हो तो स्थिति माता-पिता केलिए अप्रियकर होती है।
 चतुर्थ भावः अग्नि राशि का बृहस्पति चतुर्थस्थ हो तो व्यक्ति की इच्छास्थावर संपत्ति (कृषि भूमि, बाग-बगीचादि) एकत्रित करने की रहती है। यहअलग बात है कि उसकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो पाती। आयु का उत्तर खण्डआने तक रहने योग्य घर अवश्य बना लेता है। वायु राशि का बृहस्पति हो तोसंतान अधिक होती है, एक-दो पुत्र गोद चले जाएं, ऐसी सम्भावना रहती है।पृथ्वी राशि का बृहस्पति हो तो धन और संतान दोनों में से एक का सुखमिलता है। जल राशि में दत्तक पुत्र की संभावना अधिक होती है। पिता-पुत्रएकसाथ कार्य करें तो दोनों असफल रहते हैं, दुख-दरिद्रता का अनुभव होताहै। चौथे स्थान का बृहस्पति चाहे जिस राशि में हो पूर्वार्जित स्थावर संपत्ति कोनष्ट करा देता है। माता-पिता को पुत्र द्वारा कमाए धन का सुख नहीं मिलता।व्यवसाय करे तो जीवनभर उतार-चढ़ाव बने रहते हैं। नौकरी करता हो तोउन्नति बड़ी कठिनता से हो पाती है।
    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक स्वयं परोपकारीहोता है, उसे सुख कम मिलता है यानी पिता के सुख में न्यूनता और संतानसुख में बाधा रहती है। महर्षि लोमश के अनुसार पुत्र के कारण या पुत्र केहाथों उसकी मौत होती है।

    2. वृषभवृषभ राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,यशस्वी एवं पिता के कारण सुखी रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार जातकपरस्त्रीगामी एवं शूलरोगी होता है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक गुप्त विद्याएवं गूढ रहस्यों का जानकार, विद्वान, पराक्रमी, सदाँचारी, मातृ-पितृभक्त, सुंदर,शासन में प्रतिष्ठित, संपन्न, कामातुर, सहोदरों, अनेक स्त्रियों से युक्त एवं सुखीरहता है।

    4. कर्क कर्क राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक अधिकारसंपन्न,प्रतिष्ठित, धार्मिक, सहोदरों एवं पिता के लिए पोषक, बड़े मित्र परिवार से युक्त, धैर्यवान एवं संपन्न रहता है। पैतृक संपत्ति सुख में कमी और संतान सुख में बाधा रहती है। जातक के दो पलियां रहती हैं।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सर्वकार्य में दक्ष, भाग्यवान एवं दीर्घायु होता है। माता-पिता एवं सहोदरों के सुख में कमी रहती है। पैतृक संपत्ति का अपव्यय होता है। पिता-पुत्र में मतभेद रहते हैं। पिता केस्वास्थ्य के लिए यह गुरु अनिष्टकारक रहता है। जातक का स्वास्थ्य मध्यमरहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो पत्नी चरित्रवान रहतीहै। जातक स्वयं भी सच्चरित्र एवं आस्तिक रहता है। वह गुप्तविद्या एवं रहस्योंका जानकार, विद्वान, परिश्रमी एवं सरकारी कर्मचारी होता है। पिता से अलगावरहता है। वातरोग से पीड़ित रहता है।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक शासन मेंअधिकार प्राप्त अधिकारी, सुप्रतिष्ठित, धैर्यवान, उद्यमी, वाहन सुख भोगी, संपन्न, सुखी एवं कई मित्रों से घिरा हुआ रहता है। विचार अस्थिर, स्वभावगर्म एवं चुगलखोर भी होता है। भाइयों से मेल नहीं रहता। जातक के वर्णसंकरहोने की संभावना रहती है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक को इसगुरु के अधिक शुभ फल प्राप्त होते हैं। जातक प्रतिष्ठित, विद्वान, दानी-धर्मीएवं संपन्न रहता है। माता-पिता एवं सहोदरों के प्रेम में न्यूनता रहती है। जातकद्वारा पैतृक संपत्ति का अपव्यय होता है। पैतृक संपत्ति के विषय में समस्याएंखड़ी होती हैं। स्वास्थ्य मध्यम रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक स्वाभिमानी,ऐश्वर्यवान, कर्तव्यों के प्रति जागरूक, आर्थिक दृष्टि से संपन्न एवं सरकारीकर्मचारी रहता है। जातक का विवाह अच्छे कुल की चरित्रवाली संपन्न कन्यासे होता है। जातक स्वयं आस्तिक, चरित्रवान किंतु वातरोगी रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक को अधिकांशरूप से अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं। जातक गर्ममिजाज अस्थिर विचारों का,सहोदरों से उपेक्षित, पैतृक संपत्ति का दुरुपयोग करनेवाला, नजदीकी लोगों केलिए उपद्रवकारी, रोगी किंतु आर्थिक दृष्टि से संपन्न रहता है। उसकी पत्नीका स्वभाव भी तेज रहता है।

    11. कुंभ कुंभ राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो शुभ फलदायी होताहै। ऐसा जातक उद्यमी, विद्वान, धार्मिक, दीर्घायु, समाज एवं सत्ता में प्रतिष्ठितनेता, मातृ-पितृ भक्त, दानपुण्यकर्ता एवं कामातुर रहता है। परस्त्री से संबंधरहने का योग बनता है।

    12. मीन-मीन राशि का गुरु चतुर्थ स्थान में हो तो जातक नेता, चतुर,स्वाभिमानी, सुंदर, संपन्न, ऐश्वर्यवान, पिता एवं सहोदरों के सुख से युक्त,निरोगी, दीर्घायु एवं कामातुर होता है।

1. दुर्गा मां की पूजा नित्य करें। 
2. मांस व व्यसन न करे। 
3. बच्चीयोंको मीठा भोजन करावें। 
4. चिड़ियों को बाजरी चुगावें।
===========================5) पंचम् भाव - पंचम स्थान (सुत भाव)
पंचम् स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकर - धीमान् बुद्धिमान होता है। कल्याणवर्मा सुखसुतमित्रसमृद्धः प्राज्ञो धृतिमांस्तथा विभवसारः । पंचमभवने जीवे सर्वत्र सुखी भवति जातः ।। सुखी, पुत्र और मित्रों से संपन्न, बुद्धिमान, धैर्यशाली, धनवान् होता है।

वैद्यनाथ - मन्त्री गुणी विभवनसारसमन्वितः स्याद् अल्पात्मजः सुरगुरौ सुतराशियाते।। यह प्रधान, गुणवान, धनवान् और कम पुत्रों से युक्त होता है। मीनस्थोऽत्यल्पसन्तानः श्वापस्थः कृच्छसन्ततिः । असन्ततिः कुलीरस्थो जीवः कुम्भेन सन्ततिः ।। पुत्रस्थाने कुलीरे वा मीने कुम्भे शरासने। स्थितो यदि सुराचार्यस्तत्फलं कुरुते नृणाम्।। यह गुरु कुम्भ या कर्क राशि में हो तो सन्तति नहीं होती। मीन में हो तो थोडी सन्तति होती है। धनु में हो तो कष्ट से युक्त सन्तति होती है। यह पंचमस्थ गुरु विफल होता है - गुरुः सुते तु ।

गर्ग - समृद्धो बहुपुत्रश्च दाता भोक्ता गुणान्वितः। धनी मानी च सततं सुतस्थे देवतागुरौ । जीवे मकरे याते पंचमभे आत्मजमृतिं विद्यात्। मीनस्थितेपि चैवं नवमे शुभसंस्थितेल्पजीवौ च।। जीवे शुभामतिः ।। इन्दोर्वेश्मनि जीवे पुत्रस्थे दारिकाबहुलं स्यात्।। ताताम्बिकासोदरमातुलाच मातामहाः पितृ पिता च सूनुः । सूर्यदिखैटेः खलु पंचमस्थैर्नशन्ति नूनं मुनयो वदन्ति।। यह समृद्ध बहुत पुत्रों से युक्त, दानी, भोक्ता, गुणवान, धनवान और मानी होता है। यह गुरु मकर या मीन में हो तो पुत्रों की मृत्यु होती है। यही नवम में शुभग्रह हों तो पुत्र अल्पायु होते हैं। बुद्धि शुभ होती है। यह कर्क राशि में हो तो कन्याएं अधिक होती है। पंचम में रवि हो तो पिता, चन्द्र हो तो माता, मंगल हो तो भाई, बुध हो तो मामा, गुरु हो तो नाना, शुक्र हो तो दादा और शनि हो तो पुत्र को मारक होता हैं। सुतपंचकदो गुरुः। पंचम में गुरु अकेला हो तो पांच पुत्र होते हैं। 

वसिष्ठ - कुर्वन्ति पुत्रबहुलं सुखिनं सुरूपम्। बहुत पुत्र होते हैं। सुखी और सुन्दर होते हैं।

विलासे मतिर्बुद्धिगे देवपूज्ये भवेत् जल्पकः नारायणभट्ट कल्पको लेखको वा। निदाने सुते विद्यामनेऽपिभूतिः फलोपद्रवः पक्वकाले फलस्य।। विलासी वृत्ति होती है। वक्ता, कल्पक अथवा लेखक होता है। किसी भी कार्य का फल प्राप्त होने के समय विघ्न आते हैं।

बृहद्यवनजातक - सन्मिपुत्रोत्तममन्त्रशास्त्रसुखाति नानाधन- वाहनानि।। बृहस्पतिः क्रोमलवाग्विलांस नरं करोत्यात्मजभावसंस्थः।। उत्तम मित्र और पुत्र होते हैं। मन्त्रशास्त्र का अभ्यास करता है। विविध प्रकारो से धन और वाहन मिलते हैं। वाणी कोमल होती हैं। रिष्टमातुलगो मातुलार्तिम्। ७ वें वर्ष मामा को कष्ट होता हैं। महेश व ढुंढिराज - बृहद्यवनजातक के समान वर्णन हैं।

आर्यग्रन्थकार - सुहृदयता च सुहृज्जनवन्दितंः सुरगुरौ सुतगेहगते नरः विपुलशास्त्रमतिः सुखभाजनं भवति सर्वजनप्रियदर्शनः ।। मित्रों द्वारा सम्मान मिलता है। विविध शास्त्रों का अभ्यास करता हैं। सुखी और सब लोगों को प्रिय होता है।

काशीनाथ - सुखे जीवे सुतैर्युक्तो धार्मिकः पंडितः सुखी। धार्मिक, विद्वान, सुखी और पुत्रों से युक्त होता है।

जयदेव - सुमित्रपुत्रः, ससुखार्थमन्त्रः प्राज्ञः शुचिः श्रेष्ठतमः सुतस्थे ।। इसे पुत्र, मित्र, सुख और धन प्राप्त होता हैं। यह बुद्धिमान, पवित्र और श्रेष्ठ होता है।

मन्त्रेश्वर - पुत्रैः क्लेशयुतो महीशसचिवो धीमान् सुतस्थे गुरौ। पुत्रों से कष्ट होता है। यह राजा का मन्त्री और बुद्धिमान होता है।

 जागेश्वर - गुरौ पंचमे पंडितोयं प्रतापी सुतानां सुखं वार्धकेवै कदाचित्।। सदा प्राप्तिकाले नराणां विरोधः परं वर्गराजो नृपो वै धनेशः ।। पंडित और प्रतापी होता हैं। वृद्धावस्था में पुत्रों से कदाचित् ही सुख मिलता है। धनलाभ के समय विरोध उपस्थित होता है। अपने वर्ग का प्रमुख और धनवान होता है।

जीवनाथ - यदा प्रज्ञास्थाने जनुषि मनुजो भोगकुशलः सदार्थानां वक्ता सदासिच सतर्कः सुरगुरौ। सदर्थैः संपूर्णः प्रवरकृतिभिश्चापि महितः सदा योगाभ्यासी तनयतनयानन्दविमुखः।। उपभोग करने में कुशल, अच्छा वक्ता, सभाओं में तर्कयुक्त बोलनेवाला, धनवान, महान लोगों द्वारा सन्मानित, योगाभ्यास करनेवाला होता है। इसे सन्तति सुख नहीं मिलता।

घोलप - बन्धुओं को मान्य, उनके सम्बन्ध से सुशोभित, पुत्रों से युक्त, पण्डित, नीचों और शत्रुओं से दूर रहनेवाला, अच्छे लोगों का आश्रय लेनेवाला, अपने पराक्रम से सुशोभित, शूर, मित्रों का रक्षण करनेवाला, गुरु की कृपा से और पूर्वजों के गुण सुनकर तद्नुसार सदाचरण में तत्पर रहनेवाला होता हैं।

गोपाल रत्नाकर - सेनाधिकारी, बुद्धिमान, बडी आंखोंवाला, कम पुत्रों से युक्त, खरीदी बिक्री में कुशल, पिता से श्रेष्ठ पुत्रों के ऐश्वर्य से युक्त होता है।

लखनऊ के नवाब - पण्डितः

पण्डितः फुरुतराहुद आर्यः पुत्रपौत्रसंहितो महबूबः || मुश्तरी यदि भवेत् फरजदस्यालये न मनुजो जरदारः ।। पण्डित, चिन्तायुक्त, पुत्रपौत्रों से युक्त, तेजस्वी किन्तु निर्धन होता है।

हिल्लाजातक - पंचमे मातुलारिष्टं कुरुते पंचमे गुरुः । पांचवें वर्ष में मामा पर संकट आता हैं।

पाश्चात्य मत - इसके पुत्र आज्ञाधारक होते हैं। मनोरंजक खेल, सट्टा, जुआ, साहसी काम, रेस, प्रेम प्रकरणों आदि में यह विजयी होता है। वृत्ति न्यायशील होती हैं। इस गुरु के साथ रवि का या चन्द्र का अथवा दोनों का त्रिकोण योग हो तो सट्टा, लॉटरी अथवा अन्य आकस्मिक साधन द्वारा धन प्राप्त होकर इसका आयुष्यक्रम बदलता है।
अज्ञात

• सुभूषः। बुद्धिचातुर्यवान्, विशालकार्यकरः, सुज्ञः ।

वाग्मी, प्रतापी, अन्नदानप्रियः, कुलप्रियः, धनवान्, मंत्रविद्यावान्। अष्टादशवर्षे राजद्वारेण सैनापत्ययोगः । पुत्रसमृद्धिः । पापयुते बलहीनों विपुत्रः । पापक्षेत्रे अरिनीचगे पुत्रनाशः। एकपुत्रवान्। पापक्षेत्रे अरिनीचगे राजमूलेन धनव्ययः ।


हमारे विचार इस स्थान में आचार्य, गुणाकर, कल्याणवर्मा, वैद्यनाथ, गर्ग, वसिष्ठ, बृहद्यवनजातक, आर्यग्रन्थ, ढुंढिराज तथा जयदेव ने सब शुभफलों का वर्णन किया है। ये फल पुरुष राशियों में प्राप्त होते हैं । वैद्यनाथ ने कर्क, मीन, धनु तथा कुम्भ राशि में न होना अथवा थोडे और रोगी पुत्र होना यह फल कहा। यह अनुभव सिद्ध फल हैं। पंचमस्थ गुरु निष्फल होता है यह वर्णन वृषभ, कर्क, कन्या, मकर, मीन तथा धनु राशियों के लिए ठीक प्रतीत होता है। ऐसे व्यक्तियों को धन लाभ और पुत्रलाभ का फल कभी अनुभव में नहीं आता। किन्तु अन्य राशियों में गुरु के फलों का अनुभव अवश्य आता है। गर्ग, वसिष्ठ तथा वैद्यनाथ ने पंचम और दशम स्थान को मारक माना है और इन स्थानों में अलग अलग ग्रहों के होने से अलग अलग सम्बन्धियों के मृत्यु का फल कहा हैं। इसकी तालिका इस प्रकार हैं -
गर्ग.            वशिष्ठ.           B वैद्यनाथ       रवि-पिता     रवि-पिता       रवि-पिता
चंद्र-माता      राहु-माता       चंद्र- माता
मंगल-भाई.   मंगल-भाई.     मंगल-भाई.
बुद्ध- मामा
गुरु-नानी
शुक्र-दादा
शनि-पुत्र.     शनि-पुत्र.         शनि-पुत्र
राहु को दादा नानी       केतु नाना दादी

बैद्यनाथ ने पंचम भाव में ही पिता के सुख और आयु का विचार करना चाहिए ऐसा कहा है - पुत्रादेवमथापि पुत्रपितृधीपुण्यानि संचितयेत्। उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होगा कि गर्ग ने छोड़कर अन्य सभी ग्रहों को एक एक व्यक्ति के लिए मारक माना है। वसिष्ठ ने सिर्फ पापग्रहों को मारक माना हैं और वैद्यनाथ ने चन्द्र का उनमें समावेश किया है। तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि कोई ग्रह पंचम स्थान में हो तो वह जिस व्यक्ति का कारक ग्रह हो उस व्यक्ति के लिए मारक होता है। किन्तु इस पंचम स्थान जैसे शुभ स्थान में मृत्यु के फलों का वर्णन करना कुछ विलक्षण ही हैं। इस स्थान में गुरु के फलस्वरूप सन्तति नहीं होती ऐसा जीवनाथ का मत हैं। पुत्र कम होते हैं और कर्क, मीन, धनु तथा कुंभ में पुत्र नहीं होते ऐसा वैद्यनाथ ने कहा हैं। पुत्र होते हैं किन्तु उनसे सुख नहीं मिलता यह मंत्रेश्वर और जागेश्वर का वर्णन हैं। तात्पर्य यह कि पंचमस्थ गुरु सन्तति के बारे में अशुभ फल देता है। प्रयत्न का फल प्राप्त होते समय विघ्न आना यह फल नारायणभट्ट ने कहा सो ठीक ही हैं। ये व्यक्ति ज्ञानी, विद्वान किन्तु व्यवहार में उदासीन होते हैं अतः फल प्राप्ति में बाधा अवश्य आती हैं। अन्य अशुभ फल स्त्री राशियों के हैं। अज्ञात ने १८ वें वर्ष सेनापति होने का फल कहा है। इसके अनुभव आना मुश्किल ही हैं। गोपाल रत्नाकर ने आंखे बडी होना यह फल कहा किन्तु इस स्थान का आखों से कुछ संबंध प्रतीत नहीं होता। हिल्लाजातक में ५ वें वर्ष और यवनजातक में ७ वें वर्ष मामा को अनिष्ट योग कहा है इसका अनुभव देखना चाहिए।
    (v) पंचम भाव में गुरु
    जातक सुहृदयी या पवित्र हृदयवाला, मित्रों द्वारा सम्मानित, अनेकशास्त्रों में रूचि रखने वाला, प्रसन्न और लोकप्रिय होगा।
    -मानसागरी
    पंचमस्थ गुरु संतान के लिए अच्छा नहीं या पुत्र शोककारक होता है।जातक राजा का मंत्री और विद्वान् होगा।
    -फलदीपिका
    व्यक्ति के अनेक पुत्र व मित्र होंगे। अत्यधिक खुश, विद्वान्, साहसीधनी और सदा प्रसन्न रहने वाला होगा।
    -सारावली
    जातक अत्यन्त मेधावी, सुंदर नेत्रों वाला, वाक्पटु, यशस्वी, दूसरों कापोषण करने वाला, परिवार को प्यार करने वाला, 18 वर्ष की आयु मेंराजा के अनुग्रह से सेना का अधिकारी बने। संतान की दृष्टि से वह सुखीहोगा। गुरु के पापाक्रान्त होने पर विपरीत फल होंगे।
    -भृगुजातक बड़े, बड़े नेत्रों वाला, अच्छी दृष्टिवाला, उच्चपदस्थ, पवित्रहृदयी और आज्ञाकारी संतान वाला, सुदर्शन, राज-अधिकारी, बुद्धिमान,कुशल व्यापारी, नेता तथा सक्षम होगा।
    -डॉ रामन
    पंचमस्थ गुरू की स्थिति पर विचारः
    (क) संतान के लिए अशुभ फलदीपिका के अनुसार।
    (ख) कल्याण वर्मा, वशिष्ठ, भृगु काशीनाथ, ढुंढिराज तथा डॉरामन द्वारा अत्यधिक शुभ एवं अच्छी संतान दाता कहा गयाहै।
    ऐसी भी विचार है कि पंचम भाव में गुरु संतान शोक देता है।कारकों भाव नाशय के अनुसार-पुत्रकारक गुरु की संतानभाव में स्थितिअच्छी नहीं बताई गई है। इस कारण विलंब से पुत्र प्रप्त हो, पुत्र शोक,रोगी, अनाज्ञाकारी या मूर्ख संतान हो सकती है। विद्वान् ज्योतिर्विदों केअनुसार पंचमभाव का गुरु कर्क या कुंभ में कोई संतान नहीं देता, मीनमें अल्प संतति और धनु में कष्ट झेलकर संतान प्राप्ति होती है।
    संतान के सिवा, पंचमस्थ गुरु जातक को लेखक, अदभुत, कल्पनाशक्तिका धनी, अपार संपत्तिशाली और धार्मिक शास्त्रों का ज्ञाता बनाता है। फिरभी विभिन्न राशियों में गुरु की स्थिति तथा दृष्टि-युति संबंध को ध्यानमें रख कर फलित करना चाहिए।
द्वितीयस्थ गुरु के विषय में कथनों के संदर्भ पर भी विचार करें। उसस्थिति में भी विद्वानों के मत परस्पर भिन्न हैं। इस मामले में भी पंचमस्थगुरुू के संतान सुख के संबंध में मतैक्य नहीं है। अनुभव के अनुसार-पंचमभावमें गुरु अधिक पुत्री प्रदान करता है। केवल क्षीण, पापाक्रान्त या अस्त गुरुही अशुभ सिद्ध हो सकता है।
    देखें कुण्डली 37-जातक के एक पुत्र व एक पुत्री है। वह धनी वशिक्षित व्यक्ति है।

हमारा अनुभव - इस स्थान में गुरु, मेष, सिंह, मिथुन, तुला या कुंभ में हो तो शिक्षा पूरी होती है। धनु में शिक्षा अधूरी रहती है। भाषाविज्ञान, बीजगणित, अर्थशास्त्र, दर्शन पैलिओन्टालजी आदि विषयों का अच्छा अध्ययन होता है। पाठशालाओं में शिक्षक, प्राध्यापक, प्राचार्य आदि के रूप में ये यशस्वी होते हैं। वक्ता. लेखक, सम्पादक, शिक्षाविभाग के अधिकारी आदि के रूप में कार्य करते हैं। इन्हें पुत्र एक दो ही होते हैं। पुत्र स्वयं भाग्यवान होते हैं किन्तु उनसे पिता को कष्ट ही होता हैं। पिता जीवित हो तब तक उनका भाग्योदय नही होता। पिता का नाम कलंकित करनेवाले पुत्र होते हैं। पिता के बाद ही वह अच्छा पद प्राप्त कर सकते हैं। ये लोग कीर्तिमान और भाग्यवान होते हैं किन्तु धन कम मिलता हैं। प्रेम प्रकरणों में ये यशस्वी होते हैं। इनकी पत्नी भी प्रणयक्रीडा कुशल होती हैं। यह गुरु वृषभ, कन्या या मकर में हो तो शिक्षा अधूरी रहती हैं। व्यापार में भाग लेते हैं। बुद्धि मन्द होती हैं। सन्तति बहुत होती है। उसमें भी लड़कियां अधिक होती हैं। साधारणतः धनहीन होते हैं। स्वभाव से रूक्ष किन्तु व्यवहार में दक्ष होते हैं। प्रेम प्रकरणों में इनका विश्वासघात होता हैं। पंचमस्थ गुरु कुछ व्यभिचारी वृत्ति का निदर्शक है। कर्क, वृश्चिक या मीन में यह गुरु हो तो सन्तति नही होती। गुरु ग्रह अग्नितत्त्व का और उष्ण प्रकृति का है अतः जलतत्त्व की राशि में यह ग्रह हो तो निष्फल होता है। इसलिए स्त्री राशियों में गुरु सन्तति और धन के विषय में कुछ शुभ फल नही देता। ये लोग वकील, अॅडव्होकेट या बैरिस्टर हुए तो हिन्दू कानून, इक्विटी आदि में प्रवीण होते हैं। वैद्यक, दर्शन, भाषा आदि में भी निपुण हो सकते हैं। ये लोग बहुत विद्वान होते हैं। पत्नी के साथ इन का बरताव प्रेमपूर्ण नही होता। किसी मुसाफिर जैसा व्यवहार करते हैं। पुत्रों की बहुत चिन्ता करते हैं किन्तु पत्नी की बिलकुल फिक्र नहीं करते। पूर्व आयु में स्थिरता नहीं मिलती। २८ वें वर्ष के बाद ही भाग्योदय होता है। पुत्र सन्तति नहीं होती अथवा पुत्रों से कुछ लाभ नहीं होता। हीन वर्गो में पुत्र प्राप्ति के वर्ष १८-२४-३०-३६-४२ ये होते हैं। उच्च वर्गो में ३०- ३६-४२ ये वर्ष कहना चाहिये। पंचमस्थ गुरु होते हुए जो डॉक्टर होते हैं उन्हें अच्छा यश मिलता है। वकील भी इस योग में यशस्वी होते हैं। अन्य व्यवसायों में इस गुरु से लाभ नही होता। भिक्षुक, याज्ञिक, वैदिक ब्राह्मणों के लिए यह योग बहुत बार देखा है। 

प्रायः पंचमस्थ गुरु शुभ माना जाता है। ऐसा जातक ज्ञानी, बुद्धिमान,धनवान, विवेकी, धैर्यवान एवं सुखी होता है। संतान.    आज्ञाकारी रहती है। मित्रअधिक होते हैं। पंचम स्थान में कर्क या कुंभ राशि का गुरु होने पर संतानहोना मुश्किल रहता है। धनु या मीन राशि का गुरु पंचम स्थान में होने परअल्प संतान होती है। कुछ आचायों के मतानुसार धनु या मीन राशि का गुरुपंचम स्थान में होने पर संतान होने में दिक्कत रहती है। जन्मकुंडली में अन्यग्रहयोग देखकर इस विषय में निर्णय लेना श्रेयस्कर होगा। महर्षि गर्ग केअनुसार पंचम स्थान में मीन या मकर राशि का गुरु हो तो संतान अल्पायु

    रहती है। कर्क राशि का गुरु पंचमस्थ होकर संतान होने में बाधक नहीं बनताकिंतु कन्याएं अधिक होती हैं। पंचम स्थान में अकेला गुरु हो तो पांच पुत्रहोते हैं।

    पंचम स्थान में स्थित गुरु का सप्तम स्थान में स्थित पाप ग्रहों से संबंधहोने पर प्रेम विवाह होता है। आर्थिक दृष्टि से संपन्न न होते हुए भी समाजमें उसे अपने पिता से अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। खरीददारी में चतुर, दयालुएवं दानपुण्यकर्ता रहता है।

    महर्षि गर्ग के मतानुसार पंचमस्थ गुरु मां के पिता को यानी नाना कोअनिष्टकर होता है। 16वें वर्ष में शासन से लाभ या यश प्राप्त होता है।

    पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार भी पंचमस्थ गुरु के उपरोक्त फल प्राप्तहोते हैं। संतान आज्ञाकारी रहती है, जातक न्यायप्रिय होता है। गुरु का सूर्यया चंद्र से अच्छा दृष्टि संबंध होता हो तो जातक को अकस्मात धन लाभहोता है, परीक्षा में यश प्राप्त होता है।
पंचम भाव-पंचमस्थ गुरु यदि लग्नकुंडली में हो तो जातक लोकप्रिय,ज्योतिषी, अधिक संतान वाला, सद्मार्गी, शास्त्रज्ञ, कुटुम्ब/परिवार का मुखिया,सम्मानित, मानवता के गुणों से युक्त होता है। ऐसे जातक को सट्टे में लाभ होता है।गुरु अशुभ हो तो पूर्ण ज्ञानी होते हुए भी जातक महाक्रोधी होकर अपना नुकसानकरने वाला होता है। ऐसे जातक को धर्म के नाम पर कभी चंदा आदि न तो मांगनाचाहिए, न ही किसी से लेना चाहिए।
    लाल किताब के अनुसार पांचवां गुरु जातक को सर्वहितैषी, शास्त्रज्ञ, श्रेष्ठपुत्र व उत्तम मित्रों से युक्त, वेदों में रचि रखने वाला तथा पत्नी से प्रेम करने वालाबनाता है। ऐसे जातक की पत्नी रूपवती होती है। ऐसा जातक न तो स्वयं गलतकाम करता है, न किसी को करने देता है। उसको तंत्रमंत्र की सिद्धि सम्भावितहोती है। गुरु के साथ यदि चन्द्र व सूर्य का शुभ योग हो या दोनों गुरु से नौवें,पांचवें स्थान पर हों तो आकस्मिक धन लाभ/जुए, सट्टे, लॉटरी में लाभ का प्रबलयोग बन जाता है। पांचवें भाव का गुरु जातक को अपना कमिटमेंट पूरा करने वालातथा किसी को धोखे में न रखने वाला बनाता है।
    वायु राशि में गुरु हो तो पूर्ण शिक्षा प्रदान कर जातक को शिक्षक बनाता वशिक्षण में ख्याति दिलाता है, परन्तु सन्तान कम होती है। पृथ्वी राशि (तथा धनुराशि में भी) में प्राय: जातक की शिक्षा अधूरी रह जाती है। ऐसा जातक व्यापारकरता है, कन्याएं अधिक व पुत्र कम होते हैं। सिंह राशि में गुरु पंचमस्थ हो तोसंतान होती नहीं या अत्यंत कठिनाई से विलम्ब में होती है। जलराशि या स्त्रोराशिका गुरु धन व पुत्र दोनों के लिए शुभ नहीं होता, विशेषकर जलतत्त्व राशि में तोसंतान का अभाव ही रहता है। लेकिन यश प्रा्त हो जाता है।
पंचम भावः पंचमस्थ बृहस्पति के कारण शुभाशुभ दोनों प्रकार के फलमिलते हैं। बृहस्पति को वैसे तो शास्त्रकारों ने आकाश तत्वीय माना है लेकिनआधुनिक खोज के परिणामस्वरूप यह अग्नि त्वीय उष्ण ग्रह पाया गया है।फलत: जल राशि में रहने पर वह फल देने में प्ायः असमर्थ रहता है। धन औरसंतान दोनों के लिए जल राशि का बृहस्पति पंचमस्थ होकर शुभ फल नहींदेता। ऐसे लोग तार्किक होते हैं, फलतः वकील बनें तो यश-मान मिलता है।ऐसे जातक किसी से विशेष लगाव नहीं रखते, यहां तक कि अपनी पत्नी सेभी नहीं। बस, पुत्र संतान की चिंता करते रहते हैं। पृथ्वी राशि का बृहस्पतिपंचमस्थ हो तो व्यक्ति अर्धशिक्षित रहता है, स्वतंत्र व्यवसाय करता है, पुत्रकम, पुत्री अधिक होती हैं। मेष, सिंह, तुला, कुम्भ और मिधुन का बृहस्पतिजातक को पूर्ण शिक्षित करता है। धनु के बृहस्पति में शिक्षा में व्यवधान आतेहैं, फलत: शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाती। पुरुष राशि का बृहस्पति शिक्षक बनने परकीर्ति देता है। जातक दर्शन, साहित्य, अर्थशास्त्र में प्रवीण होता है। संतानअधिक नहीं होती, जो होती है वह भी नकारा सिद्ध होती है।
    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, सत्कर्मी,दयालु, स्वाभिमानी, अधिकारसंपन्न, लोकप्रिय, सरकारी कर्मचारी एवं आस्तिकरहता है। प्रायः पैतृक संपत्ति अच्छी रहती है। संतान सुख मध्यम रहता है।प्रथम संतान की हानि होती है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक परोपकारी,दयालु, दीर्घायु एवं स्वपरिश्रम से अपनी उन्नति करनेवाला होता है। पिता कीआर्थिक स्थिति साधारण रहती है। पत्नी गर्ममिजाज एवं निर्दयी रहती है। इसकारण वैवाहिक सुख में न्यूनता रहती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक के कामातुररहने से अन्य स्त्री-पुरुषों से संबंध रहते हैं। संतान सुख एवं आर्थिक स्थितिअच्छी रहती है।

    4. कर्ककर्क राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक गायन कला मेंप्रवीण, सरकारी कर्मचारी रहता है। संतान सुख अच्छा प्राप्त होता है। महर्षि लोमशके मतानुसार प्रथम संतान की हानि होती है। प्रायः गर्भपात होता है। जातकअधिकारसंपन्न, स्पष्ट वक्ता, दीर्घायु, समाज में विख्यात तथा प्रतिष्ठित रहता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान, दयालु,मधुरभाषी, प्रतिष्ठित एवं जनप्रिय होता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक अल्पायु, मंदजठराग्निवाला, अस्थिर बुद्धि का एवं धूर्त रहता है, उसे पैसा मिलता है परधन्न संग्रह नहीं हो पाता। संतान हानि होने पर भी संतान सुख प्राप्त होता है।
    7. तुला-तुला राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक पुत्रवान, प्रसन्न,सदाचारी, स्वाभिमानी, सरकारी कर्मचारी एवं संगीत-गायन में कुशल होताहै।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक अपनेकार्य में दक्ष एवं प्रख्यात रहता है। मित्र मौकापरस्त होते हैं। कफ विकार केकारण स्वास्थ्य मध्यम रहता है। जातक यशस्वी एवं प्रतिष्ठित रहता है। उसकेशत्रु बलवान होते हैं, संतान से मतभिन्नता रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक आस्तिक, विद्वान,यशस्वी, स्वाभिमानी, कटुभाषी, धूर्त एवं सुखी रहता है। लोगों को चुभनेवालीबात कहने की उसकी आदत रहती है। संतान सुख मध्यम रहता है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक जनप्रिय,आस्तिक, उद्यमी, पुरुषार्थी, स्वाभिमानी, दीर्घायु, संपन्न, सरकारी कर्मचारी,प्रसन्नचित्त एवं लेखक होता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान,परोपकारी, दयालु, सहोदरों के सुख से युक्त रहता है, मित्र स्वार्थी होते हैं, शत्रुअधिक होते हैं। जातक का स्वास्थ्य मध्यम रहता है, पत्नी गर्ममिजाज एवं कठोरस्वभाव की होती है। संतान सुख में बाधा आती है या संतान का नुकसान होता है।

    12. मीन मीन राशि का गुरु पंचम स्थान में हो तो जातक निष्टुर किंतुपरोपकारी, परिवार का पालनहार, विलासप्रिय, सुंदर आंखोंवाला, अस्थिरविचारों का, कटुभाषी, समाज में प्रतिष्ठित एवं बोलने में चतुर रहता है। महर्षिलोमश के अनुसार संतान सुख एवं संतानोत्पत्ति में बाधा रहती है।

1. कोई वस्तु मुफ्त में न लें उसका दाम देवे। 2. व्यसन का सेवन नकरें।
3. घर में केले का पेड़ लगावें।
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6) षष्टम् भाव -षष्ठ स्थान (रात्रु भाव)
षष्ठ स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकार अशत्रुः । इसे शत्रु नहीं होते।

कल्याणवर्मा - स्वल्पोदराग्निपुंस्त्वः परिभूतो दुर्बलोलसः षष्ठे। स्त्रीविजितो रिपुहन्ता जीवे पुरुषोऽतिविख्यातः ।। भूख और पौरुष कम होता है। पराभव होता है। दुबला और आलसी होता है। स्त्री के आधीन होता है। शत्रुओं का पराभव करता हैं। प्रसिद्ध होता हैं। 

वसिष्ठ
जीवः करोति विकलं शुचम्। रोगी और शोक
करनेवाला होता हैं।
वैद्यनाथ - कामी जितारिरबलोऽरिगतेऽमोज्ये। कामुक शत्रुओं को जीतनेवाला और दुर्बल होता है।

गर्म - स्वगेहे शुभगेहे वा षष्ठे गुरुरमित्रहा। शत्रुगेहेऽरिणां दृष्टे शत्रुपीडां ददाति सः। यह गुरु स्वगृह में अथवा शुभग्रह की राशि में हो तो शत्रुओं का नाश होता है। शत्रुग्रह की राशि में हो अथवा शत्रुग्रह की दृष्टि में हो तो शत्रुओं से कष्ट होता हैं। सबलौ शत्रुगौ स्यातां तदा स्याद् गोधनं बहु।। यह गुरु बलवान हो तो विपुल गोधन प्राप्त होता है। गुरुः रिपुगेहे यदा भवेत् तदा भ्रातृस्वसृणांच मातुलानां महासुखं। भाई बहिनों के लिए तथा मामा के लिए सुखदायक होता है। यस्य जीवो भवेत् षष्ठे भवने तेजसा युतः । शुभं तस्य प्रवक्तव्यं जातस्य पृच्छकस्य वा। जन्मकुंडली अथवा प्रश्नकुंडली में छठवें स्थान गुरु हो तो शुभ फल कहना चाहिए। सदैव दोषान् चन्द्रेण समः पतंगः । चंद्र के साथ हो तो यह दोष निर्माण करता है।
बृहद्यवनजातक

सद्गीतनृत्याहृतचित्तवृत्तिः कीर्तिप्रियोथो
निजशत्रुहन्ता। आरम्भकालोद्यमकृन्नरः स्यात् सुरेन्द्रमन्त्री यदि शत्रुसंस्थः।। गाना, बजाना, नाचना आदि प्रिय होता हैं। कीर्तिप्रिय, शत्रुओं का नाश करनेवाला कार्य के प्रारंभ में बहुत मेहनत करनेवाला होता हैं। षष्ठे भ्रातृनाशकरो गुरुः। यह गुरु भाइयों का नाश करता हैं। षष्ठे जीवे भवेच्चैव शत्रुमातुलनाशकृत्। शत्रुओं का और मामा का नाश होता हैं। सुरगुरुः खाब्धौ च शत्रोर्भयं । ४० वें वर्ष शत्रु से भय होता है।

नारायणभट्ट रुजार्तो जनन्या रुजः सम्भवेयूरिपौ वाक्पतौ शत्रुहन्तृत्वमेति। बलादुद्धतः को रणे तस्य जेजा महिष्यादिशर्मा न तन्मातुलानाम्।। इसे और इसकी माता को रोग होते हैं। शत्रुओं का नाश करता हैं। बहुत बलवान होने से युद्ध में इसे कोई जीत नहीं सकता। घर में भैंस आदि प्राणी रहते हैं। मामा को सुख नही मिलता।
जीवनाथ - जंभारेर्गुरुरमलकांताततिरतिः । सुन्दर स्त्रियों का उपभोग करनेवाला होता हैं। इसके अन्य फल नारायणभट्ट के समान हैं। काशीनाथ - षष्ठे गुरौ विघ्नयुक्तो बहुशत्रुनिष्ठुरः । उद्वेगी मतिहीनश्च कामुको जायते नाः ।। विघ्न आते हैं। शत्रु बहुत होते हैं। यह कठोर नही होता। उद्वेग करनेवाला बुद्धिहीन और कामुक होता है।

पराशर-षष्ठे पराजयं व्याधिं च कुरुतः। गुरुणां रोगाभावं तु नासिकायां। षड्वर्षद्वादशवर्षे ज्वररोगी भवेन्नरः । पराजय होता है। रोग नही होते किन्तु हुए तो नाक के रोग होते हैं। छठवे वर्ष और बारह में वर्ष ज्वर से पीडा होती हैं।

ढुंढिराज - प्रारब्धकार्यालयसकृन्नरः स्यात्। शुरू किये हुए कार्य में आलसी रहता हैं। अन्य वर्णन बृहद्यवनजातक के समान है आर्यग्रंथकर्ता – करिहयैश्च कृशांगतनुर्भवेत् जयति शत्रुकुलं रिपुगे गुरौ। रिपुगृहे यदि वक्रगते गुरौ रिपुकुलाद् भयमातनुते विभुः ।। शरीर कृश होता हैं। हाथीघोड़ों द्वारा शत्रु पर विजय प्राप्त करता हैं। यह गुरु यदि वक्री हो तो शत्रुओं से भय होता है।

जयदेव - हिंस्त्रोलसः कीर्तियुतोऽरिहन्ता विरागवान शत्रुगृहे गुरुश्चेत्। हिंसक, आलसी, विख्यात, शत्रुओं का नाश करनेवाला और विरक्त होता हैं।

पुंजराज - सुरेज्यो वीर्यान्वितोऽरिस्थितस्तद्रेगृह बहु गोधनेन सहितं वा सौरमेयैर्धनेः । वीर्याढ्येज्ये सुप्रजाः सौख्यगुक्तः पुत्रापत्यभ्रातृसौख्यान्वितः स्यात्।। यह गुरु बलवान हो तो उसके घर में गोधन और कुत्ते बहुत होते हैं। पुत्र और भाइयों का सुख मिलता है। मामा सुखी होता हैं।

मन्त्रेश्वर - षष्ठे स्यादलसोऽरिहा परिभवी मन्त्राभिचारो पटुः। आलसी, शत्रुओं का नाश करनेवाला, अपमानित, जारणामारणादि मन्त्रों में कुशल होता हैं।
घोलप - धन थोडा होता है, शरीर जड होता है, मंगल काम नहीं होते, व्रणों से पीडा होती हैं, सुखी होता है, बहुत प्रवास करता हैं, पौरुष कम होता हैं।

गोपाल रत्नाकर - ज्ञाति की वृद्धि करता है, पोते का मुख देख सकता है, विनोद प्रिय होता है, भूख कम होती हैं। हिल्लाजातक - चतुर्विशन्मिते वर्षे शत्रुगो भयदो भवेत्। २४ वें वर्ष भय होता हैं।

लखनऊ के नबाब – काहिलश्च बहुरोगयुतश्च मानवो बदसखुन् बदशक्लः । मुश्तरी यदि भवेद् रिपुखाने मातुलादिभवसौख्यविहीनः ।। आलसी; बहुत रोगों से पीडित, कठोर बोलनेवाला, कुरूप होता हैं। मामा इत्यादि से सुख प्राप्त नहीं होता।

पाश्चात्य मत - यह गुरु बलवान हो तो शरीर प्रकृति अच्छी होती है। नौकर अच्छे मिलते हैं। वैद्य, डाक्टरों के लिए यह गुरु अच्छा होता है। स्वास्थ्य विभाग की नौकरी में ये यशस्वी होते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य विषय में ये प्रवीण होते हैं। स्वतंत्र व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी के लिए यह गुरु अनुकूल होता है। यह गुरु यदि अशुभ योग में हो तो यकृत के विकार, मेदवृद्धि तथा खानेपीने की अनियमितता से अन्य रोग होते हैं।

अज्ञात इसका फलादेश अब तक के वर्णन में आ गया हैं।
    
    (vi) छठे भाव में गुरु
    जातक हाथी घोड़़ों का स्वामी, कमजोर शरीखवाला और शत्ुजित्होगा। यदि गुरु शत्रुक्षेत्री या वक्री है तो जातक साहसी होते हुए भीशत्रुओं से भयभीत होगा।
    -मानसागरी
    जातक आलसी (धीरे-धीरे काम करने वाला) परन्तु शत्रुजित होगा।वह विनम्र, चतुर, मंत्रोच्चारण तथा उनके प्रयोग का जानकार होगा।
    -फलदीपिका
    षष्ठस्थ गुरु पाचनतन्त्र में गड़बड़ी, पौरूष प्रजनन शक्ति पर कुप्रभाव,विनम्र और गर्वहन्ता होता है। जातक कमजोर, स्त्रियों के कारण लोकप्रिय,शत्रुहन्ता होगा।
    -सारावली
    वह शत्रुहन्ता होगा, उसके परिवार में वृद्धि होगी, प्रपौत्र होंगे, शरीरपर घाव के निशान होगें। यदि गुरु शुभयुत है तो वह निरोगी और यदिपापयुत है तो वह उसे गठिया तथा ठण्ड के रोग होगें। यदि राहु और केतुका भी प्रभाव हो तो रोग भंयकर होगा।
    -भृगु
    जातक दुर्भाग्यशाली, परेशान, अस्पष्ट मानसिकता वाला, बहुत-सेचचचेरे-ममेरे भाई-बहनों और पौत्र-पौत्रियों वाला, पेट संबंधी रोगों सेपीड़ित, रसिक, असफल, बुद्धिमान्, विनोदी व शत्रुरहित होगा।
    -डॉ रामन
    टिप्पणी
    सभी विद्वानों ने सप्तम भाव में गुरु की स्थिति को शुभ फलप्रद कहाहै। धर्म, प्रसिद्धि, संतान, संपत्ति, बुद्धिमत्ता, शास्त्र तथा वरिष्ठजनों काकारक गुरु यदि सप्तम भाव में अच्छी स्थिति में हो, तो जातक जीवन मेंउच्च पद प्राप्त करता है। वह धनी, पत्नी के माध्यम से आय के स्नोतोंवाला या पत्नी भाग्यशालिनी व उत्तम होगी।
    कुछ विद्वानों के अनुसार कर्क लग्न होने पर जातक को पत्नी-शोकहोगा। यदि गुरु, राहु, केतु, शनि या मंगल से युत हो तो वह परस्त्रीगामीहो सकता है।

हमारे विचार - इस स्थान में शास्त्रकारों ने अशुभ फलों का वर्णन किया उसका अनुभव पुरुष राशियों में आता है और शुभ फलों का अनुभव स्त्री राशियों में आता हैं। यवनजातक में ४० वें वर्ष शत्रु भय कहा गया उसका अनुभव नहीं आता। हिल्लाजातक में २४ वे वर्ष शरीर भय कहा गया यह अनुभव सिद्ध हैं।

हमारा अनुभव - यह गुरु किसी भी राशि में हो तो मामा और मौसियों का सुख नहीं मिलता। वैद्य, डाक्टरों के लिए यह अशुभ
होता हैं। अयशस्वी होते हैं। वकील भी इस योग पर यशस्वी नहीं हो पाते। इस गुरु का सामान्य फल यह है कि अच्छा बर्ताव करने पर भी लोगों में इस व्यक्ति के बारे में गलतफहमी होती है। इसे कठोर और व्यवहारी माना जाता है। पुरुष राशियों में यह गुरु हो तो जुआ, शराब या वेश्यागमन का व्यसन होता हैं। मधुमेह, बहुमूत्र, हर्निया, किडनी, मेदवृद्धि ये रोग होते हैं। यह गुरु यदि धनेश हो तो पैतृक सम्पत्ति नहीं मिलती। पिता का किया कर्ज चुकाना पडता है। मेष, कन्या या कर्क लग्न के लिए यह गुरु भाग्योदय में विरोधक होता है। मिथुन, तुला या मकर में हो तो नित्य कर्ज बना रहता है। एक कर्ज चुकाने के पहले ही दूसरा लेना पडता है। बेइज्जत होने का यह योग हैं। पुराणों में द्रौपदी के वस्त्रहरण का कारण उसके षष्ठ में कर्क स्थित गुरु बतलाया है। द्रौपदी को जिस प्रकार श्रीकृष्ण की सहायता मिली उस प्रकार दैवी सहायता से ही आपत्तियों से छुटकारा मिलता है। षष्ठ में मीन राशि में गुरु होने से ललित कलादर्श नाटक मंडली के मालिक श्री. पेंढारकर अन्तिम समय तक कर्ज के बोझ में ही रहे।

    षष्ठ स्थान में गुरु हो तो जातक के कई शत्रु होते हैं, किंतु वे पराजितहो जाते हैं। जातक समाज में प्रतिष्ठित एवं विख्यात रहता है, सुख-शांति कमरहती है। वह कामातुर होता है, सहोदर एवं मामा के लिए शुभ फलदायी होताहै। महर्षि लोमश के मतानुसार षष्ठ स्थान में स्थित गुरु चंद्र से युक्त हो तोशुभ फल कम एवं अशुभ फल अधिक प्राप्त होते हैं। युद्ध विषयक कार्य एवंवाक्युद्ध दोनों में ही जातक पारंगत रहता है। जीवन अनेक समस्याओं से घिराएवं संघर्षमय रहता है। कुछ आचायों के अनुसार ऐसे जातक की जठराग्तिमंद होती है एवं पुरुपत्व की कमी रहती है। जन्मलगन 10 या 20 अंशों केमध्यम हो तो जातक बचपन में रोगी रहता है। जातक को जन्म से छठा एवंआठवां वर्ष कष्टकारक रहता है।

    कुछ आचायों के मतानुसार षष्ठ स्थान में गुरु हो तो शत्रु परास्त होते हैं।     किंतु यह गुरु यदि वक्री हो तो शत्रु बलवान होते हैं। धनु राशि का गुरु षष्ठ स्थान में शुभ फलदायी होता है ऐसा भी एक निष्कर्ष है।पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार अशुभ गुरु षष्ठ स्थान में हो तो आंतों  संबंधी रोग एवं पेट तथा पाचनेन्द्रियों से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं, मधुमेह भी रहता है। बलवान एवं उच्च का गुरु षष्ठस्थ में होने पर जातक यशस्वीचिकित्सक, डॉक्टर-वैध होता है। स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। शासन में भी
जातक को यश प्राप्त होता है।

    यवन ज्योतिषाविदों के अनुसार षष्ठ स्थान में गुरु शुभ फलदायी नहीं होता।उनके मतानुसार ऐसा जातक बदसूरत, रोगी, आलसी एवं कटुभाषी होता है। मामाएवं सहोदरों के विषय में अशुभ फल प्राप्त होते हैं। जातक कीर्ति प्रिय, संगीतप्रेमी एवं शत्रुहंता होता है। 24 एवं 25वें वर्ष में रोगभय एवं शत्रुभय होता है।

    हमारी राय एवं अनुभव से षष्ठ स्थान में स्थित गुरु मधुमेह एवं हृदय रोगका प्रादुर्भाव करता है।
    
    
    षष्ठ भाव-छठे भाव का गुरु जातक को मधुरभाषी, प्रसिद्ध, विद्वान,अल्पसंतति वाला तथा अल्प शत्रुवाला बनाता है। ऐसा जातक प्रायः दुर्बल, क्षमाशीलहोता है। यदि बीमार पड़े तो जल्दी ठीक हो जाता है। स्वभाव का अच्छा होता है।गुरु इस भाव में शुभ हो तो जातक को बिना मांगे सब-कुछ मिलता है। अशुभ होतो धन दौलत की कमी रहती है तथा जातक मुफ्त का माल लेने की नियत वालाहो जांता है। ऐसे जातक को बुजुगों के नाम पर दान करना शुभदायक होता है।लाल किताब के अनुसार गुरु-यहां अशुभ प्रभावं में मंदबुद्धि, यकृत रोगी,(मधुमेह का रोग भी सम्भव) मीठे का शौकीन तथा प्रायः ऋणी बनाता है। अक्सरमरते समय तक वह ऋणी बना रहता है। मामा पक्ष के लिए भी प्रभाव अशुभ रहताहै। मेष या कर्क राशि में हो तो पैतृक सम्पत्ति जातक को नहीं मिलती। कन्या राशिमें हो तो उन्नति में बाधाएं आती हैं। पुरुष राशि में हो तो सदाचार हीनता उत्पन्नहोती है। जुए, सट्टे, वैश्यागमन में धन का अपव्यय होता है तथा दाम्पत्य जीवननरक तुल्य हो जाता है। छठा गुरु प्रायः मुकदमेबाजी की नौबत नहीं आने देता।मुकदमा चले भी तो जातक समझौते की ओर प्रवृत्त होता है।
षष्ठ भावः षष्ठस्थ बृहस्पति स्त्री राशि में हो तो शुभ फलों का अनुभवहोता है, अशुभ फलों का अनुभव पुरुष राशि में होता है। मित्रग्रही शुभ दृष्टबृहस्पति षष्ठस्थ हो तो शत्रु का नाश होता है, दुधारू पशुओं की अभिवृद्धिहोती है तथा उनसे लाभ मिलता है। भाई-बहिनों के लिए शुभ फल प्रदानकरता है। जातक निरोगी होता है, जाति की अभिवृद्धि, पौत्रों का सुख आदिफल मिलते हैं। अशुभ योग में हो तो यकृत विकार, मेदवृद्धि तथा अनियमितखान-पान से उदर रोग होते हैं। मकर-कुम्भ राशि का बृहस्पति राहु से युक्तहो तो दीर्घकालीन रोगों से पीड़ा मिलती है। पुरुष राशि का बृहस्पति षष्ठस्थहो तो व्यक्ति सदाचार का पालन नहीं करता। जुआ, मदिरापान और वेश्यागमनजैसे व्यसन उसे घेरे रहते हैं। फलतः बहुमूत्र, मधुमेह, हर्निया जैसे रोगों को स्वकृत्यों से पाल लेता है। मिथुन, तुला, मकर, कुम्भ का बृहस्पति ऋणी बनाए रखता है। कन्या, कुम्भ का बृहस्पति भाग्योदय में अवरोध उत्पन्न करता है।सप्तम भावः सप्तमस्थ बृहस्पति पुरुष राशि का हो तो शुभ फल तथाकिसी भी राशि का बृहस्पति षष्ठस्थ हो तो मामा आदि के लिए अशुभ होता है। ऐसे व्यक्ति की सहायता दैवी कृपा से ही सम्भव है। 

राशिगत फल

 1. मेष-मेष राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक धनसंचय करनेमें चतुर होता है तथा जमीन-जायदाद का सुख भोगता है। वाद-विवाद एवं मुकदमेबाजी में पैसा खर्च होता है। गुदा रोग उत्पन्न होते हैं। संतान के साथ मतभिन्नता रहती है।

2. वृषभवृषभ राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक निरोगी, सरकारी कर्मचारी, स्वाभिमानी एवं गर्ममिजाज होता है। उसके अनेक शत्रु रहते हैं किंतु अंत में पराजित होते हैं। जातक का चरित्र दोषपूर्ण रहता है।

3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक गर्ममिजाज,कामातुर, संतान से अलगाव रखनेवाला, मामा के लिए अनिष्टकारी, सहोदरों से शत्रुवत व्यवहार करनेवाला रहता है। महर्षि लोमंश के मतानुसार जातकके अपनी मामी से अनुचित संबंध रहते हैं।

4. कर्क-कर्क राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक परोपकारी, गुदारोग एवं आंतवृद्धि रोग से ग्रस्त, विदेश निवासी होता है। जमीन-जायदाद अच्छी रहती है। विदेश में या राह में मृत्यु होती है। कोई भी रोग जल्द ठीक नहीं होता।

5. सिंह-सिंह राशि का गुरु प्रष्ठ स्थान में हो तो जातक चतुर होता है।शत्रु प्रबल होते हैं, जीवन संघर्षमय रहता है। शासन में कमजोर रहता है, दो विवाहों की संभावना होती है। जातक मधुमेह एवं हृदय रोग की बीमारी से ग्रस्त रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु षष्द स्थान में हो तो जातक मामा एवं     सहोदरों के सुख की हानि करता है। स्वयं के भाग्योदय में कई दिक्कतें एवं बाधाएं, आती हैं, दांत विकृत होते हैं, कामातुर रहता है। वह अनुचित प्रेम-संबंधों  के कारण बदनाम होता है। मा एवं संतान के सुख में न्यूनता रहती है।

    7. तुला-तुला रशि का गुरु पष्ठ स्थान में हो तो जातक परोपकारी,प्रतिष्ठित एवं परदेश निवासी रहता है। बाल्यावस्था में सर्प, पानी एवं विष भयरहता है और संसर्गजन्य रोग होते हैं। विदेश में चोर-डाकुओं के हाथों मृत्युहोती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक सुंदरकिंतु अल्पायु रहता है। पत्नी गर्ममिजाज एवं रोगी रहती है या जातक स्वयंबीमार रहता है। सांसर्गिक रोग होने का भय रहता है। सत्ता में या अन्य क्षेत्रोंमें शत्रुओं से परेशानी रहती है। शत्रुओं के कारण जीवन में संकट आता है।

9. धनु-धनु राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक के भाग्योदय मेंकदम-कदम पर रोड़े उपस्थित होते हैं। मामा या सहोदरों के सुख में न्यूनतारहती है। प्रेम-संबंध के कारण बदनामी का डर रहता है। परायों से दोस्ती एवंपरिवार के लोगों से मतभिन्नता रहती है। धन-संपत्ति काफी रहती है। जन्मस्थान में ही प्रगति होती है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक को संतानसुख प्राप्त नहीं होता, स्वास्थ्य मध्यम रहता है। जातक को बचपन में सर्प,पानी, विषभय एवं कुष्ठ रोग होता है।

    11. कुभ-कुंभ रशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो जातक की पत्नी कास्व्भाव गर्म रहता है। संसर्गजन्य एवं तपेदिक जैसी बीमारी होती है। पारिवारिकजीवन दुखी रहता है। माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। जातक के सौतेली मां होने की संभावना रहती है।

    12. मीनमीन राशि का गुरु षष्ठ स्थान में हो तो आर्थिक स्थिति अच्छीरहती है, स्वास्थ्य मध्यम होता है। स्वजातीय या पारिवारिक लोगों की अपेक्षाबाहरी लोगों का जातक को अच्छा सहयोग प्राप्त होता है। जमीन-जायदादकाफी रहती है। जन्म स्थान में ही भाग्योदय होता है। मामी के साथ अनुचितसंबंध हो सकते हैं।

1. कन्याओं के चरण धोकर भोजन करावें। 
2. लहसुनिया पहने। 
3.चिरमियां बांधकर पेटी में रखें। 
4. भोजन करते समय पहले कुत्ते कीरोटी निकाल कर पेड़़ को सींचे।
===========================7) सप्तम् भाव - सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)सप्तम स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकर - पितृतोऽधिकश्च। पिता से श्रेष्ठ होता हैं। कल्याण वर्मा - सुभगः सुरुचिरुदारः पितुरधिकः सप्तमे भवति जातः । वक्ता कविः प्रधानः प्राज्ञो जीवे सुविख्यातः ।। यह भाग्यवान, अच्छी रुचिवाला, उदार, पिता से श्रेष्ठ वक्ता, कवि, बुद्धिमान, प्रसिद्ध पुरुष होता हैं।

वैद्यनाथ - धीरश्चारुकलत्रवान् पितृगुरुद्वेषी मदस्थे गुरौ। वागीशे गुणयुक्ता सुपुत्रिणी। नीचे गुरौ मदनगे सति नष्टदारः । विप्रवनितां जीवे। धैर्यवान, सुन्दर स्त्री का पति, पिता और गुरु का द्वेष करनेवाला होता हैं। पत्नी गुणी और पुत्रवती होती है। यह गुरु नीच हो तो पत्नी की मृत्य होती है। ब्राम्हण स्त्री का उपभोग करता हैं।
जातकालंकार - मदनगते वाक्पतौ पुत्र चिन्ता । सप्तमस्थ गुरु से पुत्रों की चिन्ता होती हैं।

वसिष्ठ - मानं बहुपुत्रयुक्तताम्। मान मिलता है, बहुत पुत्र
होते है।

गर्ग युवतिमंदिरगे सुरयाजके नयति भूपतितुल्यसुखं जनः । अमृताशिसमानवचाः सुधीर्भवति चारुवपुः प्रियदर्शनः।। राजा जैसा सुख मिलता है। अमृत के समान मधुर बोलता है। बुद्धिमान और सुन्दर होता है। पूज्ये रम्या सुतसूः । सुन्दर और पुत्रवती पत्नी प्राप्त होती हैं। सप्तमें गुरुसौम्यौ चेत तदैका वनिता भवेत्। सप्तम में गुरु या बुध हो तो एक ही स्त्री होती हैं। 

आर्यग्रंथकार - का मत भी इसी प्रकार है।

बृहद्यवनजातक -  शास्त्राभ्यासेत्यन्तसक्तो विनीतः कान्ता- पित्रात्यन्तसंजातसौख्यः । मन्त्री मर्त्यः कार्यकर्ता प्रसूतौ जायाभावे देवपूज्यो यदि स्यात्।। अध्ययन में बहुत रुचि होती है। नम्र होता है। मन्त्री तथा कार्यकर्ता होता हैं। पत्नी और पिता से सुख मिलता है। गुरुर्यमयमैः। २२ वें वर्ष स्त्री प्राप्त होती है। ढुंढिराज - बृहद्यवनजातक के समान वर्णन है।

जयदेव - सुमित्र:- मित्र अच्छे मिलते हैं। अन्य फलादेश अब तक के वर्णन में आ ही गया हैं।

पुंजराज - जीवे गौरवर्णा नारी। पत्नी गौर वर्ण की होती हैं। मन्त्रेश्वर - इसका फलादेश अब तक के वर्णन में आ गया हैं।

जागेश्वर - गुरुर्गौरगरिष्ठां। स्त्री गौर वर्ण की होती हैं। भवेद् बुद्धिमान् सौख्ययुक्तो नरः स्यात् सुनेत्रीसुखं शत्रुजेता भवेद् वा। विभूत्या धिया को भवेत् तेन तुल्यो यदा प्राणनामालयेऽथो गुरुः स्यात्।। बुद्धिमान, सुखी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेवाला और ऐश्वर्यवान होता है। स्त्री सुख प्राप्त होता हैं।
पराशर- सप्तमे सैन्यापत्यं धनायतिः। सेनापतिपद और प्राप्त होता हैं।

घोलप - चोरी से अथवा चोरों और दुष्टों से धन प्राप्त करता है। कवि, गुणवान, प्रवास करनेवाला, सौम्य, वीर्यवान, कामुक, अपनी जाती की प्रगती करनेवाला होता है। शरीर सुख प्राप्त होता है।

गोपाल रत्नाकर - विद्वान, अभिमानी, गुणवान होता है। स्त्री पतिव्रता होती हैं। शरीर सम्बन्ध किसी उच्च घराने से होता हैं। व्यापार बढ़ता हैं।

नारायणभट्ट – मतिस्तस्य बह् वी विभूतिश्च बह् वी रतिर्वैभवे भामिनीनाम बह् वी। गुरुर्गर्वकृद् यस्य जामित्रभावे सपिंडाधिकोऽखंडकंदर्प एव।। बुद्धिमान, धनवान, गर्वयुक्त, भाईबहिनों में श्रेष्ठ और सुन्दर होता हैं। स्त्री पर विशेष आसक्ति नहीं होती।

काशीनाथ सप्तमस्थे सुराचार्ये कामचित्तो महाबलः। धनी दाता प्रगल्भश्च चित्रकर्मश्च जायते।। कामुक, बलवान, धनवान, उदार, प्रगल्भ बुद्धि से युक्त और विचित्र कार्य करनेवाला होता है। हिल्लाजातक - द्वादशे वत्सरे स्त्रियः स्त्रीलाभं च बृहस्पतिः । १२ वें वर्ष स्त्री प्राप्त होती है।

लखनऊ के नबाब - फाजिलः सुखयुतः सुविनीतो हम्जवाक् च रमणीसुखयुक्तः फारसश्च चतुरः किल ना स्यात् मुश्तरी यदि भवेज्जनखाने।। विद्वान, सुखी, नम्र, न्यायी चतुर होता हैं।

पाश्चात्य मत - इसे विवाह के कारण सुख, धन और विजय मिलता है। न्याय के कार्य में यश मिलता है यह गुरु मकर में हो तो संसार सुख ठीक तरह नहीं मिलता। पति या पत्नी उदार, न्यायी, सुस्वभावी, प्रामाणिक और स्नेहिल मिलती हैं। पत्नी या पति उच्च

कुल का, धनवान और सुखी होता हैं। शत्रुता दूर होती है। मित्र मिलते -हैं। साझीदार अच्छे होने से साझे के व्यवहार में और कचहरी के मामलों में यश मिलता हैं। वकीलों के लिए सप्तम में गुरु बलवान हो तो अच्छा योग होता हैं। क्योंकि ये समझौता करने में कुशल होते हैं। किन्तु यही गुरु अशुभ योग में या कन्या राशि में हो तो विशेष लाभ नहीं होता। अज्ञात विद्याधनेशः बहुलाभप्रदः चिन्ताधिकः विद्यावान, पातिव्रत्यभक्तियुक्तकलत्रः, सुनाभिकटिसंयुक्तः, शुभोदरः, सुखी। चतुस्त्रिंशद्वर्षे प्रतिष्ठासिद्धिः।। यह गुरु धनेश या पंचमेश हो तो बहुत लाभ होता है। चिन्ता अधिक होती है। विद्वान होता है। स्त्री प्रतिव्रता होती है। इसकी नाभि, कमर और पेट सुन्दर होते हैं। ३४ वे वर्ष प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
   

हमारे विचार - इस स्थान में प्रायः सभी शास्त्रकारों ने गुरु के फल शुभ कहे हैं। ये पुरुष राशियों में प्राप्त होते हैं। सिर्फ वैद्यनाथ ने पितृगुरुद्वेषी और जातकालंकारकर्ता ने पुत्र चिन्ता ये अशुभ फल कहे हैं। इन का अनुभव स्त्री राशियों में आता है। हिल्लाजातक में १२ वें वर्ष और यवनजातक में २२ वें वर्ष स्त्री प्राप्ति का योग कहा है। उस समय बालविवाह प्रचलित थे अतः यह योग देरी से विवाह होने का समझना चाहिए।

हमारा अनुभव - इस स्थान का गुरु मेष, सिंह, मिथुन या धनु में हो तो शिक्षा पूरी होती है। वह व्यक्ति विद्वान, बुद्धिमान शिक्षक, प्राध्यापक, वकील या बैरिस्टर और एकाध बार न्यायाधीश भी होता है। शिक्षा विभाग में नौकरी का यह योग है। पत्नी इच्छा के अनुकूल होती है और संसार सुख प्राप्त होता है। मिथुन, सिंह तथा कुम्भ यह गुरु हो तो पुत्र सन्तति की चिन्ता होती है। सन्तति नही होती या होकर जीवित नही रहती। पति पर पत्नी का बहुत प्रभाव होता है और दोनों प्रेम से रहते हैं। वृषभ, कन्या, मकर, कर्क, वृश्चिक, मीन इन राशियों में संसार सुख नही मिलता। पत्नी से झगड़ा होता है या वह भाग जाती है या तलाक देना पडता है। विवाह के विरूद्ध प्रवृत्ति होती है। अविवाहित रह सकते हैं। पति पत्नी विभक्त हो कर रहते हैं। कर्क, वृश्चिक व मीन में ये अशुभ फल विशेष रीति से देखे गये हैं। तुला या मकर में यह गुरु हो तो दो विवाह होते हैं। विवाह के बाद भाग्योदय और स्थिरता प्राप्त होती है। इस स्त्री राशि के से व्यापार की ओर प्रवृत्ति होती है। पुरुष राशि में गुरु हो तो पत्नी पर प्रेम कम होता है। स्वभाव दुष्ट होता है। स्त्री को पशु से अधिक योग्य नही समझते। किन्तु बाहर दिखावे से लोगों को उदार धर्मात्मा और दयालु प्रतीत होते हैं। स्त्री को अन्नवस्त्र ठीक मिले इसकी भी फिक्र नहीं रखते। इसी लग्न में स्त्री राशि में गुरु हो तो स्त्री पुत्रों पर प्रेम होता है। उनकी फिक्र करते हैं। बाहर विशेष अच्छा बरताव नही होता। दूसरों से मदद की अपेक्षा करते हैं किन्तु स्वयं किसी को मदद नही करते। इसके विपरीत सप्तमस्थान में गुरु पुरुष राशि में हो तो स्त्री पर प्रेम होता है और स्त्री राशि में हो तो स्त्री को तुच्छ समझते हैं। इस स्थान के गुरु से पुत्र चिन्ता होती है। पत्नी, गम्भीर, विचारी, प्रत्येक कार्य में सलाह देनेवाली, पती और वृद्धों की सेवा करनेवाली, स्नेहिल, व्यवहार में दक्ष, प्रपंच कुशल होती है। कार्येषुमन्त्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, शयनेशु रम्भा इस प्रकार वह सभी कार्यों में कुशल होती है। कर्क राशि में यह गुरु हो तो ऐसी स्त्री प्राप्त होती है किन्तु आयु के मध्यम भाग्य में ही उसकी अचानक मृत्यु होती है। कालिदास के रघुवंश काव्य में अज राजा की इन्दुमती नामक रानी की मृत्यु का वर्णन इसी प्रकार किया गया है। एक दिन प्रासाद के छत पर वार्तालाप करते हुए ये दम्पति बैठे थे। उसी समय आकाश मार्ग से जा रहे नारद मुनि की पुष्पमाला नीचे गिरी और उस का स्पर्श होते ही के घबराहट के कारण इन्दुमती की मृत्यु हो गई।

    ज्योतिषशास्त्र में सप्तम स्थान के गुरु को शुभ माना गया है। ऐसा जातकभाग्यवान, दयालु, दानशील, विद्वान, प्रतिष्ठित एवं उत्तम वक्ता होता है।साहित्य में रुचि होने से जातक लेखक अथवा कवि बनता है, गोरी और सुंदरपत्नी प्राप्त होती है।

    अनेक आचायोँ के मतानुसार सभी विषयों में जातक अपने पिता से श्रेष्ठरहता है। महर्षि पाराशर की राय में जातक सेनाधिकारी या दंडाधिकारी रहताहै। 34वें वर्ष में भाग्योदय होता है।गुरू के फलित में मतभिन्नता

    1. कुछ आचायों के अनुसार जातक कामातुर रहता है तो कुछ आचायोँ केअनुसार ऐसे जातक में स्त्री के प्रति आसक्ति कम रहती है।

    2. जातक पारिजात के अनुसार जातक पितृ एवं गुरुद्वेषी रहता है। पिता कापर्याप्त सुख प्राप्त होता है। अन्य आचायों का मत इस विषय में भिन्न है।

3. पत्नी प्रायः सुंदर गोरी, सौम्यस्वभावी, अच्छे घराने की होती है। सभीआचार्य इस विषय में एकमत हैं किंतु वैद्यनाथ की राय अलग है। वेकहते हैंमकर राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक की पत्नीका देहांत जातक के देहांत से पूर्व होता है। वैवाहिक जीवन पूर्ण रूपसे सुखी नहीं रहता।

    4. जातकालंकार के अनुसार जातक संतानविषयक चिंता से ग्रस्त रहता है,अन्य आचार्यों के मतानुसार उत्तम संतान सुख प्राप्त होता है।

    5. पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार भी सप्तम स्थान के गुरु के फल शुभही प्राप्त होते हैं। उनके मतानुसार न्याय संबंधी कार्य, साझेदारी केव्यवसाय, वकील, न्यायाधीश के रूप में जातक को अच्छा लाभ प्राप्तहोता है। पत्नी अच्छी मिलती है। वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। कुछपाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार मकर राशि का गुरु सप्तम स्थानमें शुभ फलदायी नहीं होता।

    6. यवन ज्योतिषविदों के अनुसार जातक का 12वें या 22वें वर्ष में विवाहहोता है। श्वसुर से विशेष स्नेह संबंध रहते हैं एवं उससे भाग्योदय मेंसहयोग प्राप्त होता है।

सप्तम भाव-गुरु ससमस्थ हो तो जातक भाग्यवान, सुखी, विवाहित जीवनवाला, विनम्र, वक्ता, विद्वान, किन्तु सन्तोषी होता है। ऐसा जातक अल्प कामशक्ति वाला होता है। (लाल किताब ऐसे जातक को 'पूर्व जन्म का साधु' मानतीहै।) वह कई प्रकार के कार्यों का जानकार तथा ज्योतिष विद्या में रुचि रखने वालाहोता है, लेकिन अपने पुत्र से प्रायः दुखी रहता है। यदि ऐसे जातक का सूर्य लग्नमें हो तो जातक में धार्मिक वृत्ति बढ़ जाती है और वह SEX में अधिक रुचि नहींलेता। ऐसे जातक को घर में मंदिर, मूर्तियां, घंटे/घड़ियाल आदि नहीं रखने चाहिए।ऐसा लाल किताब का मत है।
    अग्न राशियों या मिथुन राशि का गुरु ससमस्थ हो तो शिक्षा के लिए शुभहोता है। जातक उच्च शिक्षा प्रास करता है। प्रायः न्यायाधीश, वकील या शिक्षाविभाग में अच्छे पद पर होता है। जलराशियों व कन्या राशि में सांसारिक सुखों मेंन्यूनता देता है। पति-पत्नी के सम्बन्ध मधुर नहीं रहते। गुरु अशुभ हो तो तलाककी नौबत आ सकती है या पत्नी किसी अन्य के साथ भाग जाती है। शनि सेप्रभावित गुरु जातक में विवाहेच्छा उत्पन्न ही नहीं होने देता पर राहू साथ हो तो यह‘विवाह प्रतिबन्धक योग' समास हो जाता है। ऐसे में विवाह तो होता है, तलाक भीनहीं होता परन्तु पति-पत्नी शीघ्र ही अलग-अलग (एक ही छत के नौचे भीसम्भव है) रहने लगते हैं। सातवें भाव में गुरु हो तो जातक अप्रने कमिटमेंट कोपूरा करने वाला तथा पत्नी आदि को धोखे में न रखने वाला होता है।
    लाल किताब के अनुसार गुरु यदि तुला राशि में हो या नीच का (मकर राशिमें) हो तो‘द्विभार्या योग' बनाता है। पुरुष राशि में गुरु ससमस्थ हो तो जातक पत्नीको मात्र भोग की वस्तु मानता है। स्त्री राशि में व्यापार के प्रति झुकाव रहता है।बीवी-बच्चों से प्रेम रहता है। बीवी भी पतिपरायणा, सेवा करने वाली तथा मंत्रीकी भांति परामर्श देने वाली होती है। किन्तु जातक मध्यायु में ही प्रायः विधुर होजाता है अथवा विधुर का जीवन जीने को विवश हो जाता है।
सप्तम भाव :  सप्तमस्त बृहस्पति पुरुष राशि का हो तो शुभ फल तथा स्त्री राशि में हो तो अशुभ फल प्रदान करता है। सिंह, धनु और कुम्भ लग्न वालों के सप्तमस्थ बृहस्पति हो तो पुत्र संतान की चिंता जातक को बनी रहतीहै। इसमें संतानोत्पत्ति न होना, होकर कालकवलित हो जाना आदि हेतु होते हैं। वृश्चिक, मकर, मीन, वृष और कन्या लग्न वाले जातकों को दाम्पत्य सुखप्राप्ति में बाधा रहती है, विवाह की इच्छा ही न होना, विवाह होकर संबंधविच्छेद हो जाना अथवा परस्पर झगड़ते रहना आदि कारण हो सकते हैं। मेषऔर कर्क लग्न वाले जातकों के दो विवाह सम्भव हैं। स्त्री राशि में बृहस्पतिहो तो जातक की दृष्टि में पत्नी मात्र भोग्या होती है। वह उसे आदर-मान नहीं
देता। पुरुष राशि में जातक पत्नी और पुत्र दोनों से प्रेम करने वाला होता है। तुला, कुम्भ, धनु तथा मिथुन लग्न वालों के लिए सप्तम स्थान का बृहस्पति शिक्षा के लिए शुभ रहता है। ऐसे जातक प्राध्यापक, वकील और न्यायाधीश बनते हैं। शिक्षा विभाग में कार्यरत जातकों के लिए विशेष शुभ है।
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्नएवं कामातुर रहता है और उसे राजभय रहता है। कामुकता एवं चोरी जैसेदुर्गुणों के कारण जातक को सजा हो सकती है। जातक सेना में हो तो नौकरीमें मृत्यु होती है, पत्नी बांझ होती है। इसी कारण या अन्य किसी कारण सेसंतान सुख में बाधा रहती है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक धनवान,धार्मिक एवं यशस्वी रहता है। जातक का कद ऊंचा रहता है, पत्नी सुंदर,मधुरभाषिणी सदाचारिणी एवं मध्यम शारीरिक बनावट की होती है। जातकवैद्यक शास्त्र में निपुण रहता है।

    महर्षि लोमश के मतानुसार जातक, उसकी मां एवं पत्नी तीनों व्यभिचारीहोते हैं। मंत्रेश्वर की राय में संतान सुख में बाधा रहती है। पति-पत्नी दोनों अल्पायु रहते हैं। यवनाचार्य के मतानुसार गुरु पापग्रह से युक्त हो तो संतान सुखमें बाधा रहती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक विद्वान,बहुश्रुत, स्वपरिश्रम से प्रगति करनेवाला, सुंदर, संपन्न, कामातुर एवं ससुरालपक्ष के कारण सुखी बनता है। महर्षि लोमश के अनुसार पति-पत्नी दोनोंअल्पायु रहते हैं। वैवाहिक जीवन का पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता। ऐसा जातकबैरागी भी बन सकता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्यबचपन में ठीक नहीं रहता, आगे चलकर वह निरोगी बनता है। व्यभिचार, चोरीजैसे व्यसनों में फंसने के कारण सजा का भय रहता है या जातक की मृत्युसेना में हो सकती है। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक एक पल्लीवाला किंतुवेश्यागामी रहता है तथा स्त्रियों के लिए धन का अपव्यय करता है।

5. सिंह-सिंह राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक भरपूर संपत्तिसे युक्त, सुखी जीवन जीता है। वह दिखने में क्रोधी किंतु दयालु एवं सौम्यस्वभाव का, दीर्घायु रहता है एवं सामाजिक कार्यों में यश कमाता है। पत्नीअतिसुंदर होती है। महर्षि गर्ग के अनुसार एक ही पत्नी रहती है एवं जातकसदाचारी होता है। परंतु महर्षि लोमश के मतानुसार जातक की मां, पत्नी एवंस्वयं जातक तीनों ही व्यभिचारी रहते हैं। ऐसा जातक चिकित्सा क्षेत्र में सफलरहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक या तो राजसीजीवन जीता है अन्यथा विरक्त हो जाता है। पत्नी सुंदर, सौम्य, कलादक्ष, सासकी सेवा करनेवाली एवं आज्ञाकारिणी मिलती है पर उसका दीर्घकालीन सुखजातक को नहीं मिलता।

    . 7. तुला-तुला राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक निशानेबाज,स्वास्थ्य का मध्यम, कफज विकारों से ग्रस्त तथा स्वभाव राजसी होता है।कुसंगति के कारण वह वेश्यागामी बनकर शारीरिक एवं आर्थिक नुकसानउठाता है। पत्नी सुंदर, चतुर, आज्ञाकारी एवं अच्छे स्वभाव की मिलती है।

    कुल मिलाकर जीवन सुखी एवं संपन्न रहता है।सुंदर, शासन में प्रतिष्ठित, दीर्घायु, दिखने में क्रूर किंतु स्वभाव से दयालु रहताहै। फोड़े-फुन्सियां, कैन्सर, मूत्र, फोड़ा, गुदारोग, बवासीर आदि रोगों से पीड़ित

 8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न,सूंदर, साशन में प्रतितष्ठा, दीर्घायु, दिखने में क्रूर किन्तु स्वाभाव से दयालु रहता है l फोड़े फुंसियां, कैंसर, मूत्र, फोड़ा, गुदारोग, बवासीर आदि रोगो से पीड़ित  एवं सदाचारी होता है। किंतु महर्षि लोमश के मतानुसार जातक के दो विवाह होते हैं।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,अधिकारसंपन्न, प्रतिष्ठित, निरोगी, दीर्घायु, यशस्वी, मधुरभाषी, संतान सुख सेयुक्त परंतु कामातुर होता है। पत्नी सुंदर एवं. आज्ञाकारिणी मिलती है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातकधन-संपत्तिवान एवं सुखी रहता है। संतान सुख में बाधा रहती है यानी संतानहोती ही नहीं या पत्नी संतानोत्पादन के अयोग्य होती है। उत्साही एवं धैर्यवानहोते हुए भी जातक का प्रत्येक कार्य विलंब से होता है। पत्नी सुंदर, कुलीन,सुशील, चतुर, संपन्न एवं आज्ञाकारिणी रहती है।

    11. कुंभकुंभ राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक ऊंचे कद कालेकिन पत्नी छोटे कद की, सदाचारिणी, सुशील, सुन्दर, प्रियभाषिणी एवंआज्ञाकारिणी होती है। जातक बवासीर, गुप्तरोग या कैन्सर से पीड़ित रहता है।

12. मीन--मीन राशि का गुरु सप्तम स्थान में हो तो जातक के विचारअस्थिर रहते हैं। वह कामातुर, परस्त्री-परपुरुष से संबंध रखनेवाला, दीर्घायु,निरोगी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता एवं स्वपरिश्रम से एवं स्वप्रभुत्व से प्रगतिकरनेवाला, सुखी एवं संपन्न रहता है।

1. पैतृक सोना व मकान न बेचे। 
2. हर साल चाँदी खरीदे। 
3. साधु कीसेवा में रहे।
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 8) अष्टम् भाव - अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
अष्टम स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकर - दुष्कर्म - सुरे काम करता है। कल्याण वर्मा - परिभूतो दीर्घायुतको दासोऽथवा निधनसंस्थे। स्वजनप्रेष्यों दीनो मलिनस्त्रीभोगवा जीवे।। पराभव पानेवाला, दीर्घायु, दीन, नौकर अथवा गुलाम, स्वजनों में नौकरी करनेवाला और मलिन स्त्री का उपभोग करनेवाला होता है।

वैद्यनाथ - मेघावी नीचकर्मा यदि दिविजगुरौ रन्ध्रयाते चिरायुः। बुद्धिमान, नीच काम करनेवाला और दीर्घायु होता है।

वसिष्ठ - इस स्थान के गुरु के रोग विषयक फलों का वर्णन मंगल विचार में किया है।

पराशर - अष्टम में बन्धन तथा कारावास भोगना पडता है।

गर्ग - जीवे मृत्युगते ज्ञानात् सुतीर्थे मरण भवेत्। शुभर्क्षे स्वगृहे चेत् स्यादन्यत्र मरणं श्रमात् ।। यह गुरु शुभ राशि में या स्वगृह में हो तो ज्ञानपूर्वक किसी तीर्थ स्थान में मृत्यु होती है। अन्यथा कष्टपूर्वक मृत्यु होता है।

काश्यप- नानारोगैः १ शूलरौगः २ कर्णरोगात् ३ तथैवच। स्वजनात ४ विषुचिकातः ५ अतीसारात् ६ निजमृत्युतः ७ रक्तकोपात् ८ तुरगतो ९ निजेशात् १० राजकोपतः ११ बहुभक्षणात् १२ भवेत् मृत्युर्जीवे सयात्मृत्युभावगे ।। यह गुरु मेष राशि में हो तो विविध रोगों से, वृषभ में हो तो शूलरोग से, मिथुन मे हो तो कर्ण रोग से, कर्क में हो तो अपने ही लोगों से, सिंह में हो तो विषूचिका (कॉलरास) से, कन्या में हो तो अतिसार से, तुला में हो तो अपने नौकरों द्वारा, वृश्चिक में हो तो रक्तदोष से, धनु में हो तो घोडे पर से गिरने से, मकर में हो तो राजा द्वारा, कुंभ में हो तो राजकोप से और मीन में हो बहुत खाने से मृत्यु होता है।
नारायणभट्ट चिरनो वसेत् पैतृके चैव गेहै चिरस्थायिनो तद्गृहं तस्य देहः । चिरं नो भवेत्तसयनीरोगमंगं गुरुर्मृत्युगो यस्य वैकुण्ठगन्ता।। यह पिता के घर में बहुतकाल नही रहता। घर और शरीर चिरकाल नही टिकता। शरीर में हमेशा रोग बने रहते है। मृत्यु के बाद अच्छी गति मिलती हैं।

बृहद्यवनजातक - प्रेष्यो मनुष्यो मलिनोऽतिदीनो विवेकहीनो विनयोज्झितश्च । नित्यालसः क्षीणकलेवरश्चेद् आयुर्निशेषे वचसामधीशः।। यह नौकर, मलिन, बहुत दीन, अविवेकी, अतिउद्धत्त, आलसी, दुबला होता है। गुरुरिन्दुरामै रोगम्। ३१ वें वर्ष रोग होते हैं। ढुण्डिराज - का भी मत यवनजातक के समान वर्णन है।

काशीनाथ - जीवेऽष्टमे सदा रोगी कृपणः शोकसंयुतः । बहुवैरी कुकर्मा च कुरूपश्च भवेन्नरः ।। यह हमेशा रोगी, कंजूस शोक से युक्त बुरे काम करनेवाला और कुरुप होता है। इसे बहुत शत्रु होते है। जयदेव- काशीनाथ के समान ही वर्णन है।

आर्यग्रन्थकार - विमलतीर्थकरश्च बृहस्पतौ निधनता नमनः स्थिरता यदा । धनकलत्रविहीनकृशः सदा भवति योगपथे निरतः परम्।। तीर्थयात्रा करनेवाला, चंचल, धनहीन, स्त्रीहीनः दुबला, सदा योगाभ्यास करनेवाला होता है।

जागेश्वर - परं पैतृकं नैव धान्यं सुखं वा गृहे नैव ऋद्धि, स रोगी नरःस्यात्। कुतस्तस्य भाग्यं धनं क्षीयते वै यदा जीवनामा विनाशं गतः स्यात्।। इसे पैतृक धनधान्य प्राप्त नही होता। सुख, धन, भाग्य, वैभव यह कुछ प्राप्त नही होता। हमेशा रोगी रहता है। 

मन्त्रेश्वर - नारायणभट्ट के समान वर्णन है।

जीवनाथ - बुद्धि स्थिर होती है, शरीर सुन्दर होता है। अन्य वर्णन नारायणभट्ट के समान है

घोलप - इसका फलादेश अब तक के वर्णनों मे आ गया है।

गोपाल रत्नाकर - नीच काम करनेवाला, पतित, विधवा से व्यभिचार करनेवाला, शूलरोगी, दीर्घायु होता है। फीस लेकर पढ़ाने का काम करता है।

लखनऊ के नवाब - बेदिलश्च परदेशरतश्च जाहिल: खलु नरः सगदश्च मुश्तरी यदि हि हस्तमखाने गुस्वर: स किलभवेज्जन-मस्तः ।। निर्दय, मूर्ख, रोगी, लोगों की परवाह न करनेवाला और विदेशों में रहनेवाला होता है।

पाश्चात्य मत यह गुरु बलवान हो तो विवाह से आर्थिक लाभ होता है और प्रगति होने लगती है। किसी के वसीयत द्वारा अथवा मृत्यु के कारण धन मिलता है। यह बलवान गुरु शनि के साथ शुभ योग करता हो तो वसीयत द्वारा स्थावरजंगम सम्पत्ति अवश्य प्राप्त होती है। किन्तु यही गुरु पीडित हो तो इन्हीं मार्गों से असफलता द्वारा हानि होती है। इस गुरु से दीर्घायु प्राप्त होती है। मृत्यु शान्त अवस्था में होता है। अपने जन्म का साध्य पुरा हुआ यह जानकर ही मानों ये लोग मृत्यु का स्वागत करते है।

अज्ञात - अल्पायुः नीचकृत्यकारी, पतितः। बलवान्, अरोगी, पुण्यकर्ता, पौरुषपूर्णः, विद्वान् वेदशास्त्रविचक्षणः ।। यह अल्पायु, नीच काम करनेवाला और पतित होता है। यह गुरु बलवान हो तो नीरोगी, पुण्यकार्य करनेवाला, बलवान, विद्वान और वेदशास्त्रों का ज्ञाता होता है।
 (vii) अष्टम भाव में गुरु
    जातक तीर्थ यात्रा का शौकीन, निष्कपट, चंचलचित्त वाला, निर्धन,शारीरिक रूप से कमजोर, पत्नी-विहीन और सदैव योग में रूचि रखनेवाला होगा।
    -मानसागरी
    जातक निर्धन, असहाय, नीच कमों में प्रवृत्त, नौकरों या ओछेमाध्यमों से धनार्जन करने वाला तथा चिरंजीवी होगा।
    -फलदीपिका
    अष्टमस्थ गुरु दुख, अपमान और गंदी औरतों का संग प्रदान करताहै। जातक अपमानित, दास, अपने ही लोगों की सेवा करने वाला,चिरंजीवी तथा दयनीय होगा।
    -सारावली
    व्यक्ति अप्रसन्न, अशोभनीय कृत्यों से आजीविका अर्जन करने वाला,चिरंजीवी, नीच, पदावनत, विधवा से संबंध रखने वाला, उदर शूल सेत्रस्त, संशयी, धमार्थ होने का इच्छुक और कुत्सित आदतों वाला होगा।-डॉ रामन
    टिप्पणी
    गुरु के स्वक्षेत्री या उच्चस्थ होने पर जातक चिरंजीवी, निरोगी, संतस्वभाव वाला, विद्वान् और शास्त्रज्ञ होगा। पापयुत होने पर वह अल्पायु,अवाछित गतिविधियों में लिप्त और पापकर्मी आदि बताया गया है। यदिअष्टमेश का शुभ ग्रहों से स्थिति-दृष्टि तथा युति संबंध और अष्टम में     स्थिति है तो वह चिरंजीवी होगा। यदि अष्टमेश निर्बल है तो आयु भीकम होगी। यदि अष्टमेश पापक्रान्त है तो 17 वें वर्ष की आयु के बादजातक के विधवाओं से अवैध संबंध होंगे।
    गुरु नैतिक मूल्यों, वरिष्ठजनों, बुद्धिमत्ता, मेधा, सम्मान, धनादि काप्रतिनिधित्व है। अष्टम में गुरु की स्थिति शुभ नहीं है। जातक कुकृत्योंमें संलगन, रोगी, निर्धन, पिता से पृथक् रहने वाला, बुद्धिहीन, नम्रता, तर्कऔर सोन्दर्य रहित तथा दयनीय होगा। अष्टम भाव हानियों, बाधाओं आदिका भाव है। इसे गुप्त भाव भी कहते है। अष्टमस्थ गुरु के कारण गुरुके सभी कारकत्वों जैसे-नैतिक मूल्य, सम्मान, धन, स्वास्थ्य आदि, मेंकमी होगी।
    दीर्घायु के संबंध में, अष्टमस्थ गुरु दीर्घायु देता हैं। यह कल्याणवर्मा, जीवनाथ, मंत्रेश्वर, वैद्यनाथ आदि का मत है। भृगु के अनुसार-जातकअन्य शुभ ग्रहों के अष्टम भाव से संबद्ध न होने तक अल्पायु होगा।
    गुरु की स्थिति का अवलोकन करने पर ही निष्कर्ष तक पहुँचा जासकता है। गुरु शीघ्रहन्ता और असामयिक मृत्यु दायक भी हो सकता हैजबकि कुछ मामलों में वह लंबी आयु का कारण भी होता है।
    महिलाओं की जन्म-कुण्डली में गुरु की अष्टमस्थ स्थिति अत्यन्तअशुभ है। ऐसी जातिका पति द्वारा परित्यक्ता, तनावग्रस्त, रोगी, गुणहीनपरन्तु सुदृढ हाथों पैरों वाली होगी।


हमारे विचार - इस स्थान में प्रायः सभी शास्त्रकारों ने अशुभ फल बतलाए हैं। इसका अनुभव स्त्री राशियों में आता है। पराशर ने बन्धन योग कहा है। यह बन्धन कर्ज अधिक होने से कारावास रूप में होता है। फौजदारी मामलों में नही होता। गोपाल रत्नाकर फीस लेकर पढ़ाने का फल कहा। यह वास्तव में नवम या सप्तम स्थान का है। अन्य शुभफलों का अनुभव पुरुष राशियों में आता है
हमारा अनुभव - इस स्थान में मेष, सिंह, धनु, मिथुन या तुला में गुरु हो तो किसी के वसीयत द्वारा अथवा वारिस के रुप में सम्पत्ति प्राप्त होती है। धनु या मिथुन राशि में विधवा स्त्रियों द्वारा रखी गई अनामत रकम प्राप्त होती है क्यों कि मृत्यु आदि द्वारा उन स्त्रियों का नाश होता है। वृश्चिक या कुम्भ में यह गुरु हो तो विवाह से भाग्योदय कम होता है। व्यवहार में बाधा आती है, उद्योग ढीले पडते हैं। पैतृक इस्टेट नष्ट होती है। ससुर गरीब होता है या विवाह के बाद वह धनहीन होता है। यह गुरु कर्क में हो तो हमेशा कर्ज होता है। धन नष्ट होकर गरीबी बढती हैं। व्यवहार किसी तरह निभाना पडता है। पैतृक सम्पत्ति धीरे धीरे नष्ट होती जाती है। इस गुरु से दारिद्र्य या वंशक्षय का फल प्राप्त होता है।
जीवित रहा। इस गुरु का एक शुभ फल अवश्य मिलता है। इस व्यक्ति की पत्नी शान्त, धैर्यवती, आनन्दी, संकटों में स्थिर रहनेवाली और घर की बातें बाहर न बतलानेवाली होती है। इस गुरु से दीर्घायु प्राप्त होती है। यह स्त्रीराशि में हो तो आयु के ३, ६, ९, १२, १५, १८, २१, २४, २७, ३०, ३३ इन वर्षों में आपत्तियाँ आती हैं। पुरुष
राशि में हो तो ७, १४, २१, २८, ३५ और ९, १८, २७, ३६ इन वर्षों में आपत्तियां आती हैं। भाग्याधिपे विनाशस्थे नीचशत्रुखगेक्षिते। कुरांशे नीचराश्यादौ भाग्यहीनो भवेन्नरः ।। अष्टम में भाग्येश नीच राशि में या क्रूर या नीच अथवा शत्रुग्रह द्वारा दृष्ट हो तो वह व्यक्ति भाग्यहीन होता है। हमारे अनुभव से यह भाग्य हानि विवाह के बाद होती है। यह गुरु पुरुष राशि में हो तो घर की बातें घर में ही रहती हैं। पत्नी और नौकर विश्वासु होते हैं। स्त्री राशि के गुरु से घर के गुह्य सबको मालूम होते हैं। नौकर अच्छे नही मिलते। इस स्थान में गुरु किसी भी राशि या योग में हो - मृत्यु शारीरिक दृष्टि से बुरी हालत में ही होती है। पुराणों में रावण की मृत्यु का कारण अष्टम में कर्क का गुरु बताया है।

    ज्योतिषाचारयों ने अष्टम स्थानस्थ गुरु को अशुभ माना है। अनेक आचायोंके अनुसार अष्टमस्थ गुरु जातक को रोगी एवं अल्पायु बनाता है। सारावलीकारआचार्य कल्याण वर्मा एवं जातक पारिजातकार वैद्यनाथ के मतानुसार जातकदीर्घायु रहता है। महर्षि पाराशर के अनुसार अष्टमस्थ गुरु के कारण जातकको कारावास भोगना पड़ता है, बंधेन योग होता है। जातक दीर्घायु है या अल्पायु,यह देखने के लिए जन्मकुंडली में स्थित अन्य ग्रह योगों का अवलोकन अनिवार्यहै किंतु ऐसे जातक का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, यह अनुभूत है। मूत्रविकार,मधुमेह, आंतों एवं पाचनक्रिया संबंधी रोगों से जातक पीड़ित रहता है। महर्षिगर्ग के अनुसार अष्टम स्थानस्थ गुरु बलवाम होने पर जातक की मृत्यु तीर्थस्थानमें होती है। अधिकांश आचार्यों के मतानुसार अष्टमस्थ गुरु के कारण जातकआचारहीन, निकृष्ट कार्य करनेवाला, आलसी, दरिद्री, विवेकशून्य, दुर्बल देहधारी,कंजूस, दुखी अनेक शत्रुओं के जाल में फंसा हुआ, आर्थिक तंगी सहनेवालाएवं कुरूप होता है। ये फल हमारे अनुभव से कम प्राप्त होते हैं। जातक उदार,परोपकारी एवं सांसारिक विषयों में निर्मोही एवं आध्यात्मिक विचारों में प्रगतिकरता है। वास्तव में अष्टमस्थ गुरु नीच राशि एवं शत्रु राशि में हो, तो.विपरीतफल देगा अन्यथा शुभ फल ही प्राप्त होंगे।

 महर्षि कश्यप ने केवल अष्टमस्थ गुरु के आधार पर मृत्यु के कई कारणबताए हैं, जो इस प्रकार हैं :

    1. मेष राशि का गुरु हो तो अनेक रोगों के कारण मृत्यु होती है।

    2. वृषभ राशि का गुरु हो तो सिरदर्द के कारण मृत्यु होती है।

    3. मिथुन राशि का गुरु हो तो कर्णरोग से मृत्यु होती है।

    4. कर्क राशि का गुरु हो तो रिश्तेदारों के हाथो मृत्यु होती है।

    5. सिंह राशि का गुरु हो तो विष दिए जाने से मौत आती है।

    6. कन्या राशि का गुरु हो तो अतिसार के कारण मृत्यु होती है।

    7. तुला राशि का गुरु हो तो नौकर-चाकरों के हाथो मृत्यु होती है।

    8. वृश्चिक राशि का गुरु हो तो रक्तदोष के कारण मृत्यु होती है।

    9. धनु राशि का गुरु हो तो घोड़़े पर से गिरने से या अन्य वाहनों के कारणमृत्यु होती है।
    10. मकर राशि का गुरु हो तो सजा के कारण मृत्यु होती है।

    11. कुंभ राशि का गुरु हो तो राजकोप के कारण मृत्यु होती है।

    12. मीन राशि का गुरु हो तो अतिसार के कारण मृत्यु होती है।

    यवन ज्योतिषविदों ने भी इसी तरह के अनिष्ट फल बताए हैं। उनके अनुसारजातक परदेश प्रवास करता है, किसी की परवाह नहीं करता, उसके लिएउन्नीसवां वर्ष अनिष्टकारक होता है।

    अष्टम स्थान ‘पति सौभाग्य' का होता है। इसी तरह पुरुषों की दृष्टि सेआठवां स्थान पत्नी भाग्य का रहता है। इसी आधार पर पाश्चात्य ज्योतिषाविदोंके अनुसार अष्टमस्थ गुरु बलवान हो तो विवाह के बाद भाग्योदय होता है।वसीयतनामे के अनुसार जातक को धन प्राप्त होता है। गुरु के साथ शनि होतो निश्चित रूप से वसीयत में संपत्ति प्राप्त होती है एवं जातक दीर्घायु होताहै। गुरु निर्बल होने पर वर्णित फल प्राप्त नहीं होंगे।
अष्टम भाव-आठवें भाव में गुरु हो तो जातक को दीर्घायु, मधुरभाषी,लेखक, किन्तु गुसांग रोगी बनाता है। जातक का धन नाश होता है अथवा अल्पधनही रहता है। प्रायः ससुराल पक्ष से अच्छे सम्बन्ध रहते हैं। यदि गुरु अशुभ प्रभावमें हो तो आय ठीक होते हुए भी जातक कर्ज में डूबा रहता है। उसकी स्थिति लाल किताब के शब्दों में ‘श्मशान के साधु' जैसी हो जाती है (विशेषकर तब जबकुंडली में मंगल भी अशुभ हो)। किन्तु शुभ प्रभाव हो तो जातक का भाग्य देव कीशक्ति तथा स्वयं की आत्मिक शक्ति से बढ़ता है। धनवान न भी हो तो उसे दुनियाके सब सुख-साधन भोगने को मिलते हैं। ऐसे जातक को ईश्वरीय सहायता प्राप्त
    होती रहती है। ऐसा जातक शरीर पर सोना धारण करे तो शुभता बढ़ती है।
    लाल किताब के अनुसार गुरु अष्टमस्थ हो तो पिता-पुत्र साथ नहीं रह पाते।गुरु बलवान हो तो विवाह से लाभ तथा विवाहोपरांत भाग्योदय होता है। यदि गुरुअष्टमेश भी हो या शनि से शुभयोग बनाता हो तो जातक को अचल सम्पंतिवसीयत में मिलती है। दीर्षायु प्रास होती है। ऐसा जातकं शांत अवस्था में मृत्युपाता है (बेहोशी/कॉमा/नींद में) मिथुन राशि में गुरु हो तो जातक को विभिन्न रोग(कर्णरोग विशेष) देता है। ऐसे जातक की मृत्यु वाहन से गिरकर सम्भावित होतीहै, परन्तु किसी विधवा के मरने पर उसकी सम्पत्ति जातक को मिलती है। वृश्चिकया कुम्भ राशि का गुरु ससुराल से लाभ नहीं होने देता। ऐसे जातक की स्थितिविवाह के बाद और भी बिगड़ती है। पैतृक सम्पत्ति प्रायः नहीं मिलती। यदिमिलती है तो शीघ्र नष्ट हो जाती है।
    आठवां गुरु यदि पाप प्रभाव में हो तो जातक एकदम दरिद्रि जीवन जीता है।
    सम्भव है क्रिजातक का वंशक्षय (कोई नाम लेवा न बचना) भी हो जाए।
अष्टम स्थानः स्त्री राशि का बृहस्पति अष्टम स्थान में हो तो पत्नी के
कारण घर की गुप्त बातें बाहर वाले जान लेते हैं। पुरुष राशि में उलटे फल मिलते हैं। पत्नी ही नहीं नौकर भी घर के लिए वफादारी निभाते हैं। अग्नि राशि का बृहस्पति अष्टमस्थ हो तो वसीयत से संपत्ति की प्राप्ति होती है, उत्तराधिकारमें तो संपत्ति मिलती ही है। मिथुन-तुला राशि का बृहस्पति होने पर भी वसीयत से संपत्ति के उदाहरण मिलते हैं। वृश्चिक और वृष लग्न वालों को विधवा की संपत्ति उसके मरणोपरान्त मिलती है। मेष और कर्क लग्न वालों को विवाह से
भी विशेष लाभ नहीं होता। कार्य-व्यवसाय में हानि की सम्भावना रहती है, पैतृक संपत्ति नष्ट होती है। व्यक्ति शनैः शनैः दरिद्र बन जाता है तथा वंशनाश तक की नौबत आती है। भिन्न-भिन्न राशियों में उनके अनुरूप रोग कारकबनता है। जैसे मेष में अनेक रोग, वृष में शूल रोग, मिथुन में कर्ण रोग, सिंह मेंविषूचिका (उल्टी-दस्त), कन्या में अतिसार, वृश्चिक में रक्तदोष तथा मीनमें बहुभक्षण से उत्पन्न रोग। किसी भी राशि का बृहस्पति हो मृत्यु कष्टमय होती है।
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक के पारिवारिकसुख में न्यूनता और माता-पिता के सुख में कमी रहती है। जातक केअविवाहित रहने की संभावना रहती है। कलह या पत्नी वियोग होता है। ऐसीहालत में परस्त्रीगमन या वेश्यागमन की संभावना रहती है। जातक को वाहनादिसे नुकसान पहुंचता है। स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता किंतु उम्र अधिक रहती है।

2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो बचपन में जातकको कष्ट सहने पड़ते हैं, स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, विशिष्ट परिस्थिति मेंकुसंगति में फंसने से चोरी, दुराचार आदि करणों से राज्यदंड भुगतना पड़ सकता     है। जातक की हिंसक प्रवृत्ति रहती है, शत्रु बहुत होते हैं, विषभय रहता है।एवं आंखों के विकार रहते हैं।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो बड़े भाई एवं पत्नीसे मधुर संबंध नहीं रहते। जातक अपने कार्य से ही अपना नुकसान कर लेताहै, मित्र काफी रहते हैं। वह धूर्त एवं विकारयुक्त रहता है। संतान विकृत एवंअल्पायु रहती है। आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। कहीं से गुप्त धन प्राप्त होता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक शिल्पकलामें प्रवीण रहता है, उसका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता एवं माता-पिता के सुखसे वंचित रहता है। जीवन लंबा रहता है, वाहनों के कारण हानि पहुंचती हैऔर जायदाद के सुख में न्यूनता रहती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक विवेकशून्य रहताहै, किसी भी मार्ग से धनसंग्रह करने की वृत्ति रहती है। कामातुर होने से स्त्रीकामीजातक को सजा हो सकती है तथा मृत्यु का आलिंगन करना पड़ता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक तेजस्वी, धनी,चरित्रवान एवं यशस्वी रहता है। पत्नी सुंदर मिलती है, किंतु वैवाहिक जीवनका सुख लंबे असें तक भोगा नहीं जा सकता। बड़े भ्राता के सुख में न्यूनतारहती है। आकस्मिक धन लाभ प्राप्त होता है।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु अष्टम स्थान में होने पर जातक शिल्पकलामें प्रवीण रहता है, आर्थिक स्थिति मध्यम रहती है, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।जातक हमेशा चिंताग्रस्त रहता है, कुसंगति के फलस्वरूप चोरी, जुआ, दुराचारकी ओर प्रवृत्त होता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक स्वतंत्रविचारों का, रूढ़िवाद का विरोधी एवं समाज सुधारक होता है। जीवन मेंअसफलता हाथ लगती है। कार्य बड़ी मुश्किल से संपन्न हो पाते हैं। भले-बुरेका विचार न करते हुए वह धनसंग्रह करता है। बीमारी के कारण पुरुषत्व मेंकमी आती है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक को सुंदर पत्नीप्राप्त होती है। शत्रु एवं रोग का कष्ट सहन करना पड़ता है। जातक व्यापारमें धन कमाता है तथा अविश्वास के कारण पति या पत्नी का चरित्र भ्रष्टहोने की संभावना रहती है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक दुख देनेवाला,कपटी, अल्पायु एवं रोगी रहता है। वह भरोसेमंद नहीं रहता। पत्नी वियोग यापत्नी के साथ मतभिन्नता रहने से जातक व्यभिचारी बनता है।

    11. कुंभ-कुभ राशि का गुरु, अष्टम स्थान में हो तो जातक नास्तिक एवंरूढ़िवाद का विरोधी रहता है। उसके प्रत्येक कार्य में दिक्कतें आती हैं। जातकक्रूर, हिंसक, धूर्त, नपुंसक, चरित्र भ्रष्ट होता है, शत्रु काफी रहते हैं। उसेसंग्रहणी एवं नेत्ररोग की पीड़ा रहती है। विषभय भी रहता है।

    12. मीन-मीन राशि का गुरु अष्टम स्थान में हो तो जातक रोगी, कपटी,दुर्व्यवहारी, धूर्त, चोर, जुआरी रहता है। फिर भी समाज एवं खानदान मेंविख्यात रहता है। पत्नी का आचरण भ्रष्ट रहता है। आर्थिक स्थिति अच्छीरहती है। मित्र काफी रहते हैं। जातक के संतान एवं सहोदर अल्पायु रहते हैं।वह उदर रोग से पीड़ित रहता है। स्त्रियों की जन्मकुंडली में अष्टम स्थान मेंमीन का गुरु हो तो संतान होकर मर जाती है या मृत अवस्था में जन्म लेतीहै। प्रसवकाल में पत्नी को मृत्युभय रहता है।

1. घर पर मांगने वाले को कुछ न कुछ देकर भेजे। 
2. शव यात्रा मेंशामिल नहीं होना। 
3. सोने की अंगुठी पहने।
4. गुलाब मंदिर में चढ़ावें।
===========================9) नवम् भाव -नवम स्थान (भाग्य भाव)
नवम् स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकर - तपस्वी। यह तपश्चर्या करता है।

कल्याण वर्मा - दैवतपितृकार्यरतो विद्वानः सुभगो भवेत् तथा नवमे । नृपमन्त्री नेता व जीवे जातः प्रधानश्च।। देव तथा पितरों के कार्य में तत्पर होता है। विद्वान, भाग्यवान, राजा का मन्त्री, नेता अथवा प्रधान पुरुष होता है।

पराशर - सर्वसंपत्समृद्धि च नवमे राजसंपदम्। सभी प्रकार की सम्पत्ति बढ़ती है। राजा जैसा ऐश्वर्य मिलता है।
वैद्यनाथ

ज्ञानी धर्मपरो नृपालसचिवो जीवे तपस्थानगे। ज्ञानी, धार्मिक और राजा का मन्त्री होता है।

नारायणभट्ट - एकोऽपि यदि केन्द्रस्थो भार्गवो वा गिरापतिः । नवमे वा सुतस्थाने दारिद्र्यं च न जायते। गुरु या शुक्र अकेला ही केन्द्र में अथवा पंचम या नवम स्थान में हो तो दारिद्र्य प्राप्त नही होता। लग्नधर्मसुत आयबंधुषु देवपूज्यनृपसोमसम्भवाः। लक्षदोषमुपयाति विनाशं अन्धकारमिव भास्करोदये। लग्न, नवम, पंचम, एकादश या तृतीयस्थान में मंगल, गुरु, शुक्र अथवा बुध हो तो अन्य ग्रहों के लाखों दोष भी दूर होते हैं।

जातकालंकार - नवमंसुते पुत्रजा वासवेज्ये। गुरु नवम या पंचम स्थान में हो तो पुत्र चिन्ता होती है।

वसिष्ठ - सुखं सुरराजमन्त्री धर्मक्रियासु निरंत कुरुते मनुष्यम् ।। सुखी और निरन्तर धार्मिक कार्यों में तत्पर रहता है।

गर्ग - विविधतीर्थकरः सुकलेश्वरः सुरगुरौ नवमे सुखवान् गुणी । त्रियदशयज्ञकरः परमार्थवित् प्रचुरकीर्तिकरः कुलवर्धनः ।। तीर्थयात्राएं करनेवाला, सुन्दर, सुखी, गुणवान देवताओं के लिये यज्ञ करनेवाला, परमार्थ को जाननेवाला, बहुत कीर्ति प्राप्त करनेवाला और कुल को बढ़ानेवाला होता है। आयुःपर्यन्तं सुखयोगः । गुरुर्भाग्ये भवेन्मंत्री महाभाग्योऽखिलेश्वरः । जीवन भर सुख मिलता है। बहुत भाग्यवान, बहुत लोगों का स्वामी और राजा का मन्त्री होता है।

बृहद्यवनजातक - नरपतेः सचिवः सुकृती पुमान् सकलशास्त्र- कलाकलनादरः। व्रतकरो हि नरो द्विजतत्परः सुरपुरोधसि वै नवमे स्थिते।। यह कर्तृत्ववान, राजा का मन्त्री, सभी शास्त्रों और कलाओं के अभ्यास में आस्था रखनेवाला, व्रत धारण करनेवाला और ब्राम्हणों की सेवा में तत्पर होता है। जीवस्तिथ्यद्वके पितृमृतिंच । १५ वें वर्ष पिता की मृत्यु होती है। जीवे षोडशः । १६वें वर्ष लाभ होता है।

आर्थग्रन्थकार - सुरगुरौनवमे मनुजोत्तमो भवति भूपतितुल्यधनी शुचिः। कृपणबुद्धिरतः सुखी बहुधनः प्रमदाजनवल्लभः ।। यह श्रेष्ठ पुरुष राजा के समान धनवान, पवित्र, कंजूस, सुखी और स्त्रियों को प्रिय होता है।

मन्त्रेश्वर - शुभेऽर्थसुतवान्। धन और पुत्र प्राप्त होते हैं।

जयदेव - सुविद्यः । उत्तम विद्या प्राप्त होती है। अन्य वर्णन पहले आ गया है।

काशीनाथ - धर्मे जीवे धर्मकर्ता साधुसंगी च शास्त्रवित्। विनयी तीर्थसेवी च ब्रम्हज्ञश्च स जायते।। धर्मकार्य करता है, साधुओं की संगति में रहता है। शास्त्रो को जानता है, तीर्थयात्रा करता है। विनयी और ब्रम्हज्ञानी होता है।

नारायणभट्ट - चतुर्भूमिकं तद्गृहं तस्य भूमिपतेर्वल्लभो वल्लभा भूमिदेवाः । गुरोर्धर्मगे बान्धवाः स्यर्विनीताः सदालस्यतो धर्मवैगुण्यकारी।। चार मंजिलो का घर होता है। यह राजा के प्रिय और ब्राम्हणों पर भक्ति रखनेवाला होता है। इसके रिश्तेदार सद्भावना से रहते हैं। आलस के कारण धर्मकार्य में न्यूनता होती है। जीवनाथ - नारायणभट्ट के समान ही मत है।

जागेश्वर - भवेद् भाग्ययुक्तो नरः श्रेष्ठशक्तिस्तथा तीर्थपुण्या- दिवार्तासु सक्तः। भवेद् बान्धवैः सेवकैः संप्रयुक्तो यदा देवपूज्यो ध्रुव पुण्ययातः।। यह भाग्यवान, शक्तिमान, तीर्थयात्रा तथा अन्य पुण्यकार्यो में रुचि रखनेवाला, रिश्तेदार और नौकरो से युक्त होता है।

घोलप यह सूर्य के समान तेजस्वी, पराक्रमी, गृहकृत्यों में निपुण, शत्रुओं का धन हरण करनेवाला, सुन्दर और सब लोगों के चित्त को प्रसन्न करनेवाला होता है।

गोपाल रत्नाकर-धार्मिक, तपस्वी, सदाचारी, दानशील होता है। इसका पिता दीर्घायु होता है। इसे कई पुत्र होते हैं।

हिल्लाजातक 
यवनजातक के समान वर्णन है।

लखनऊ के नबाब
-हजरते च खुश परिजनवांश्च खूबरो बहुसुखी च मुशीरः। आमिलश्च यदि यख्तमखाने मुश्तरी प्रविभवेत् खलु यस्य।। यह भाग्यशाली, सुन्दर, बडे परिवारवाला, अति सुखी, कीर्तिमान अधिकारी होता है।

पाश्चात्यमत - धार्मिक, सच बोलनेवाला, नीतिमान, विचारी और माननीय होता है। इसे कानून के काम, क्लर्क का काम, धार्मिक विषय, वेदान्त, दर के प्रवास, इन में लाभ होता है। विवाह सम्बध से जो नये रिश्तेदार होते हैं उनसे अच्छा सुख प्राप्त होता है। यह योग अध्यात्मक ज्ञान और योगाभ्यास का द्योतक है। अन्तर्ज्ञान या भविष्य का ज्ञान प्राप्त होता है। न्यायकार्य, लेखन आदि के लिए यह गुरु शुभ है। यह गुरु यदि पीडित हो तो ऊपरी दिखावा, वृथा अभिमान बहुत होता है। वाह्यात बरताव से इसकी बेइज्जत होती है।

अज्ञात -  जीवो नवमे बलिष्ठः । पंचत्रिंशवर्षे यज्ञकर्ता। अनेक प्रतिष्ठावान्। बहुजनपालकः ।। गुरु नवमस्थान मे बलवान होता है। यह व्यक्ति ३५ वें वर्ष यज्ञ करता है। बहुत सन्मान प्राप्त होता है। बहुत लोगों का पालन करता है।

हमारे विचार - प्रायः सभी शास्त्रकारों ने इस स्थान में बहुत शुभ फलों का वर्णन किया है। इन फलों का अनुभव मेष, सिंह, धनु और मीन राशियों में आता है। जो थोडे अशुभ फल कहे हैं वे अन्य राशियों के हैं। नवमस्थान पिता का स्थान हैं। अतः हिल्लाजातक और यवनजातक में १५ वें वर्ष पिता की मृत्यु का फल कहा गया है। इसका अनुभव देखना चाहिये। अज्ञात ने ३५ वें वर्ष यज्ञ कराने का जो फल कहा उसका अनुभव मिलना सम्भव नहीं है।
    (xi) नवम भाव में गुरु
    जातक लोगों में मुखिया, राजा या राजा के जैसा धनी, पवित्र कर्मकरने वाला, प्रसन्न जीवन जीने वाला, स्त्रियों में लोकप्रिय तथा कंजूस भीहोगा।
    -मानसागरी
    जातक राजा का मंत्री, प्रशंसायोग्य और धार्मिक कायें को करने वालाहोगा। वह पुत्रवान् और धनी होगा।
    -फलदीपिका
    जातक राजा का मंत्री या नेता या मुखिया होगा और दिव्य तथा पैतृककृत्य करने वाला, माता पिता के प्रति कर्तव्यपरायण, भाग्यशाली, विद्वानहोगा।
    -सारावली
    जातक दान व धार्मिक कर्म करने वाला, ध्यान-पूजा में रूचि रखनेवाला, विनम्र और धनी होगा। वह 35 वें वर्ष की आयु में धार्मिकअनुष्ठान करने वाला, उसके पिता दीर्घायु, वह अनेक प्रकार से सम्मानितऔर प्रतिष्ठित तथा बहुत से लोगों को आश्रय देने वाला एवं न्यायप्रियहोगा।
    -भूगु
    व्यक्ति दानी, बहुत संतान वाला, नित्योत्सव की इच्छा रखने वालातथा दीर्घायु पिता का पुत्र होगा। वह प्रभु के प्रति समर्पित, धार्मिक,दयावान्, शुद्ध, सिद्धान्तवादी, संकोची, उदार, ईश्वर से डरने वाला,संस्कारी, परोपकारी, सभ्य, प्रसिद्ध, मानवीय सिद्धान्तों का पक्षधर होगा।
    -डॉ रामन
    टिप्पणी
    नवम भाव में गुरु की स्थिति अच्छीं कही जाती है। जातक को सभीप्रकार के सुख, रहने के लिए बड़ा घर, महान् व्यक्ति का उत्तराधिकारीऔर भाईयों व संबंधियों द्वारा सम्मानित होगा। त्याग की भावना वाला औरविनम्र होगा। वह संतान और स्वास्थ्य की दृष्टि से भाग्यशाली होगा।

हमारा अनुभव नवमस्थान में गुरु हो तो उस व्यक्ति का स्वभाव शान्त और सदाचारी होता है। विचार उच्च होते हैं। मेष, सिंह, धनु या मीन में हो तो आर्टस् विषयों में शिक्षा पूरी होकर एम्.ए., एल्.एल्.बी., पीएच.डी., डी.लिट्. आदि उपाधियाँ प्राप्त करते हैं। प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी के अधिकारी, उपकुलगुरु आदि पद प्राप्त करते है। यह गुरु, वृषभ, कन्या, मकर में हो तो विज्ञान विषयों में एम्.एस्.सी. आदि पदवियां प्राप्त कर शिक्षक के रूप में प्रगति करते हैं। कभी व्यापारी भी होते हैं। इनके विचार संकुचित अपने फायदे की बात सोचनेवाले होते हैं। इनकी बहुत प्रगति नही होती है। मिथुन, तुला या कुम्भ में यह गुरु हो तो प्रकाशक, वृत्तपत्रों में सम्पादक, मुद्रक आदि होते हैं। कर्क में यह गुरु हो तो शिक्षा पूरी होती है। बाद में सन्तति नही होती। वृश्चिक या मीन में हो तो शिक्षा पूरी होती है। वकील, बॅरिस्टर, कानून के प्रोफेसर, संशोधक, न्यायाधीश, बड़े अधिकारी होते हैं। यह पुरुष राशि में हो तो भाई बहिनें कम होती हैं। उनके साथ प्रेम पूर्ण बरताव होता हैं। स्त्री राशि में हो तो भाई बहिनें अधिक होती हैं किन्तु प्रेम नहीं रहता। झगड़े होकर बंटवारा होता है। नवम में गुरु हो तो भाइयों ने एकत्र कुटुम्ब में नही रहना चाहिए। इस योग में एक साथ दोनों भाई प्रगति नहीं कर पाते। पुरुष राशि में सन्तति कम होती है। एक या दो पुत्र होते हैं। स्त्री राशियों में वृश्चिक में सन्तति अधिक होती है। कर्क और मीन में सन्तति नही होती। विवाह में ही अडचने आती हैं। वृषभ, कन्या, मकर में सन्तति होती है किन्तु जीवित नहीं रहती। साधारणतः इस स्थान के गुरु से पुत्र चिन्ता बनी रहती है। पुत्र न होकर लडकी होती हैं। पुत्र होकर मृत होता है। जीवित रहा तो इच्छा के विरुद्ध आचरण करता है। सुशिक्षित होकर भी ठीक बरताव नही करता। इन्हें २६ वें वर्ष से भाग्योदय का आरम्भ होकर ३२ वें वर्ष अच्छा सन्मान मिलता है। जीवन सुखपूर्वक और सरल रीति से व्यतीत होता
है। इसकी माता, पिता, भाई, बहिन आदि के मृत्यु तीन के गुणक वर्षों मे (३, ६, ९, १२ आदि) होते हैं। सम्मान, राजकृपा आदि शुभयोग चार के गुणक वर्षों में (४, ८, १२, १६) होते हैं। नवमस्थान पितृस्थान हैं किन्तु माता की मृत्यु होना यह यवनजातक का फल भी अनुभव के अनुकूल ही है। कभी दोनों फलों का अनुभव भी आता है। इस स्थान के गुरु से कुछ व्यभिचारी प्रवृत्ति होती है। यह योग स्त्री राशियों में विशेषतः होता है। आयु अथवा सम्मान से ज्येष्ठ स्त्री-चाची, मामी, मौसी, सौतेली मां, गुरु अथवा किसी बड़े अधिकारी की पत्नी आदि से यह सम्बन्ध होता है। (इसका वर्णन करते समय अन्य ग्रहों का सम्बन्ध भी देखना चाहिए) 

    नवम स्थान में गुरु शुभ फलदायी होता है। ऐसा जातक परिश्रमी, परंपराओंका पालन करनेवाला, आस्तिक, विद्वान, भाग्यवान, शासन में प्रतिष्ठित एवंज्ञानी होता है। आर्थिक दृष्टि से जीवन सुखी रहता है। राजसी वैभव एवं प्रतिष्ठाप्राप्त होती है। जीवनभर के कार्यों के फलस्वरूप मृत्यु के बाद भी नाम रहताहै। जातक कंजूस एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति का रहता है। गुरु बलवान हो तोअध्यात्म में प्रगति होकर उसमें सफलता प्राप्त होती है। जातक को जनाधारप्राप्त रहता है। 35वां वर्ष महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों का होता है। लाभ एवं प्रतिष्ठाप्राप्त होती है।

    जातकालंकार के मतानुसार जातक को संतान की चिंता रहती है। अन्यआचार्यों के मतानुसार उत्तम संतान का सुख प्राप्त होता है।
     यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार नवमस्थ गुरु के शुभ फल तो प्राप्त होते हैं।किंतु 15वां वर्ष पिता को कष्टकारक एवं 16वां वर्ष भाग्योदयकारक सिद्ध होता है।पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार ऐसा जातक लेखन कार्य, अध्यात्म, न्यायसंबंधी कार्य, वकालत, धार्मिक कार्य आदि के कारण लाभ प्राप्त करता है।दर्शन, योगशास्त्र, दिव्यज्ञान विषयक विद्या, ज्योतिष आदि में प्रगति होती है।परदेश यात्रा से लाभ होता है। विवाह के बाद ही जातक का भाग्योदय होताहै। गुरु दुर्बल हो तो वह मिथ्याभिमानी एवं आडंबरयुक्त रहता है अन्यथासच्चरित्र, नीतिवान एवं दयालु होता है।
नवम भाव-नौवें भाव में गुरु हो तो जातक प्रसिद्ध, योगी, संन्यास कीओर जाने वाला, वेदान्ती, धर्मभीरू, शास्त्रज्ञ, प्रतिभावान, विद्वान, ज्ञानी, अध्यात्मआदि गुत्त विद्याओं में रुचि रखने वाला, कुशाग्र बुद्धि, प्रखर मेधा, भाग्यवान तथाप्रायः अधिक सन्तान वाला होता है। ऐसा जातक सरकार से सम्मानित होता है तथाअपने कमिटमेंट को पूरा करने वाला एवं न्यायप्रिय होता है। वह पत्नी व अन्यजनों को धोखे में नहीं रखता, प्रबल सिद्धांतवादी, कुलीन होता है। ऐसे जातक कीजैसे-जैसे आयु बढ़ती है, वैसे-बैसे उसका ज्ञान भी बढ़ता है। फिर भी ज्ञान प्राप्तके लिए वह सतत् प्रयासरत रहता है। धन-दौलत, आय तथा माता-पिता का सुखपूर्ण होता है (यदि कोई अन्य अशुभ योग न बनता हो तो)। किन्तु गुरु इस भाव मेंअशुभ स्थिति में हो तो जातक निर्धन, मंदभागी तथा नास्तिक/कर्मकांड विरोधी होसकता है। किन्तु शुभ स्थिति में नवम भाव का गुरु सर्वश्रेष्ठ होता है।
    लाल किताब में नौवें गुरु को विशेष शुभ माना है। स्वराशि या उच्च राशि कागुरु राज्य की ओर से विशेष लाभ दिलाता है। ऐसा जातक राज्याधिकारी यो सत्तासम्पन्न मंत्रिपद प्राप्त करता है। ऐसा गुरु प्रकार से ‘राजयोग' बनाता है। ऐसाजातक धर्मात्मा, शांत, विनम्र, सदाचारी, उच्च विचार वाला होता है तथा प्रभु कीकृपा उस पर सदा बनी रहती है। वह तंत्रमंत्र आदि विद्याओं में सिद्धि प्रा्त कर
सकता है। यदि अग्नितत्त्व राशि में गुरु हो जातक को उच्च शिक्षा तथा शिक्षाविभाग में उच्च पद प्रास्त होता है। पृथ्वी तत्त्व राशि में विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्तहोती है पर जातक स्वार्थी हो जाता है। वायु तत्त्व राशि में गुरु हो तो लेखन, मुद्रण,प्रकाशन से लाभ तथा जलतत्त्व में हो तो कानूनविद्, न्यायाधीश, वकील आदिबनना सम्भव होता है। क्योंकि तब जातक अत्यधिक न्यायप्रिय एवं प्रबल तर्कक्षमतावाला हो जाता है। छोटे भाई-बहनों के लिए नौवां गुरु अशुभ होता है। वे या तोहोते नहीं या उनसे मनोमालिन्य रहता है, साथ रहने पर प्रगति नहीं होती। सन्तान
    की ओर से भी चिन्ता रहती है।
नवम भावः बृहस्पति नवम भावस्थ हो तो व्यक्ति शांत स्वभावी औरसदाचरण का पालन करने वाला और उच्च विचारवान होता है। अग्नि राशिका बृहस्पति उच्च शिक्षित बनाता है तथा व्यक्ति गुरु की उपाधि प्राप्त करलेता है। पृथ्वी राशि का बृहस्पति हो तो व्यक्ति विज्ञान में उच्च शिक्षित होताहै परन्तु स्वभाव से स्वार्थी एवं संकुचित विचारों का भी होता है। जल राशि मेंहो तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर व्यक्ति न्यायाधीश, वकील आदि बन जाता है।वायु राशि में बृहस्पति हो तो व्यक्ति लेखन, प्रकाशन, सम्पादन या मुद्रण आदिकायों से जीविका चलाता है। पुरुष राशि का बृहस्पति हो तो भाई-बहिनों केलिए नेष्ट फल देता है, भाई-बहिन कम होते हैं। स्त्री राशि का हो तोभाई-बहिन अधिक होते हैं लेकिन परस्पर प्रेम से नहीं रहते, उनके बीचवैमनस्य बना रहता है। पृथ्वी राशि में संतान उत्पन्न होकर मर जाती है, जलराशि में वृश्चिक को छोड़ संतानाभाव रहता है। नवम भाव का बृहस्पति पुत्रसंतान की चिंता बनाए रखता है। इसमें पुत्र का न होना, होकर मर जानाअथवा जीवित रहे तो स्वभाव से नीच होना आदि कारण होते हैं।

    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक तर्कशास्त्र का ज्ञाता,नाटक-अभिनय आदि कलाओं का शौकीन, परिवार में प्रख्यात, विद्वान एवं     संपन्न होता है। किंतु जातक के विचार अच्छे नहीं रहते, दयाभाव कम रहताहै, न्याय-अन्याय का विचार न करते हुए वह धन कमाता है। चेहरे पर विकृतिरहती है। बांझ पत्नी मिलने की संभावना रहती है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थी,स्वपराक्रम से प्रगति करनेवाला, असंख्य मित्रों से घिरा हुआ, पितृभक्त,धार्मिक, विद्वान एवं परदेश प्रवास करनेवाला होता है। आंखें सुंदर रहती हैं।महर्षि लोमश के अनुसार ऐसा जातक स्त्रीलोलुप रहता है।

    3. भिथुन-मिथुन राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक आर्थिक दृष्टिसे अस्थिर रहता है। व्यापार में हानि-लाभ होता रहता है। लकड़ी, फर्श, सीमेंटआदि भवन निर्माण संबंधी व्यापार में जातक को काफी हद तक सफलता प्राप्तहोती है। जातक के कई शत्रु होते हैं, वाद-विवाद होते ही रहते हैं। सहोदरोंका अच्छा सहयोग प्राप्त होता है। पत्नी एवं संतान का सुख मध्यम रहता है।विवाह के बाद जातक का भाग्योदय होता है। स्त्रियों के माध्यम से अधिकलाभ होता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक को अंतरराष्ट्रीयख्याति प्राप्त होती है। जातक लेखक, सुधारक, नेता, सर्वज्ञानी, प्रसिद्ध, संपन्नएवं विद्वान होता है। बचपन क्लेशकारक एवं बाद का जीवन सुखमय व्यतीतहोता है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थी,लोकप्रिय, यशस्वी, धार्मिक, विदेशप्रवासी, विद्वान, पितृभक्त एवं संपन्न रहताहै। आंखें सुंदर होती हैं।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक स्वार्थी रहताहै। वह आर्थिक दृष्टि से उदार, परोपकारी एवं दानपुण्य में काफी खर्चकरनेवाला होता है। सहोदरों के विषय में सभी दायत्वों को निभाता है। स्त्रियोंके माध्यम से हमेशा लाभान्वित होता है।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक चतुर, आस्तिक,संपन्न, यशस्वी, दानपुण्य करनेवाला, शासन, समाज में प्रतिष्ठित, ज्ञानी,स्पष्टवक्ता एवं चरित्रवान रहता है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान,व्यवहारकुशल, वक्ता, परदेश प्रवासी, सरकारी कर्मचारी, पारिवारिक दृष्टि से सुखी होता है। जातक की मां चरित्रशील एवं सुशील रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, पारिवारिकसुख से युक्त, तार्किक, दानपुण्यकर्ता, सत्कायों में खर्च करनेवाला एवं निरर्थकवाद-विवाद करनेवाला होता है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक विद्वान, संपन्न,बुरी नीयत का, अधिक शत्रु एवं कम मित्रोवाला होता है।

    11. कुभ-कुभ राश का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,आस्तिक होता है। वैवाहिक जीवन दुखी रहता है। जातक में कामवासना एवंस्त्री लोलुपता अधिक रहती है। मां सुशील एवं सच्चरित्र रहती है।

    12. मीन-मीन राशि का गुरु नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,सहोदरों के सुख से युक्त, वादविवाद पटु, अधिक शत्रुओं से घिरा हुआ रहताहै। भवन निर्माण से संबंधित वस्तुओं के व्यापार में लाभ कमाता है।

1. धर्म में आस्था रखें। 
2. मांस का व दारू को सेवन न करें। 
3. गंगास्नान करें। घर में नित्य हवन करें।
===========================10) दशम् भाव - दशाम स्थान (कर्म भाव)
दशम स्थान में गुरु के फल

आचार्य तथा गुणाकर - सधनः वित्तैर्युक्तः । धनवान होता है। कल्याण वर्मा - सिद्धारम्भो मान्यः सर्वोपायकुशलः समृद्धश्च । दशमस्थे त्रिदशगुरौ सुखधनजनवाहनयशोभाक् ।। जिस कार्य का आरम्भ करता है वह पूरा होता है। सन्माननीय, सभी उपायों में कुशल, समृद्ध, सुखी, धनवान, कीर्तिमान और लोगों तथा वाहनों से सम्पन्न होता है। पंचदशषट् समेतश्चत्वारिंशत् तथैकविंशश्च। त्रिंशत् चतुस्त्रिंशत् पंचाशदेव यथोक्तहोरायुः।। प्रोक्ता सहजे तुर्ये पंचम के सप्तमे च नवमे च। दशमे चैकादशके गृहेषु जीवस्थितौ वर्षाः।। गुरु तृतीय मे हो तो १५, चतुर्थ में हो तो ६, पंचम में हो तो ४०, सप्तम में हो तो २१, नवम में हो तो ३०, दशम में हो तो ३४ और एकादश में हो तो ५० वें वर्ष मृत्युयोग होता है।

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वैद्यनाथ - सिद्धारम्भः साधुवृत्तः स्वधर्मी विद्वानाढ्यो मानगे चामरेज्ये। कार्य को पूरा करनेवाला, सदाचारी कर्तव्य पालन करनेवाला, विद्वान और धनवान होता है। अर्थाप्तिः पितृजननीसपत्नमित्र- भ्रातृस्त्री-भृतःकजनात् दिवाकराद्यैः ।। दशम में रवि हो तो पिता से, चन्द्र हो तो माता से, मंगल हो तो शत्रु से, बुध हो तो मित्र से, गुरु हो तो भाई से, शुक्र हो तो स्त्री से और शनि हो तो नौकरों से धन प्राप्ति होती है। मीनालिचापकटके निजवर्गवारे मध्यन्दिनोदगयने यदि । राशिमध्ये। कुंभे च नीचभवनेऽपि बली सुरेज्योः लग्ने सुखे चे दशमे बहुवित्तदः स्यात्।। मीन, वृश्चिक, धनु और कर्क राशि में वर्गकुंडली में स्वगृह में, मध्यान्ह में विषुव के उत्तर में राशि के मध्य भाग में कुंभ में तथा मकर में गुरु बलवान होता है। लग्न में, चतुर्थ में दशम में गुरु हो तो बहुत धन प्राप्त होता है।

तथा

वसिष्ठ - दैन्यं गुरुः शुभकर्मभाजम्। दीनता प्राप्त होती है। अच्छे काम करता है।

गर्ग - यशोवाहनसौख्यार्थगुणसत्यसमन्वितः । सिद्धारम्भोऽप्रति- चतुरो भव्यकर्मीस्थते गुरौ। कीर्तिमान, सुखी, धनवान, गुणवान, चतुर, वाहनों से सम्पन्न, सच बोलनेवाला तथा कार्य पूरा करनेवाला होता है।

नारायणभट्ट - ध्वजामण्डपे मंदिरे चित्रशाला पितुः पूर्वजेभ्योऽपि तेजोऽधिकत्वम्। न तुष्टो भवेच्छर्मणा पुत्रकाणां पचेत् प्रत्यहं प्रस्थसामुद्रमन्नम्।। मन्दिर में मण्डप और चित्रशाला बनवाता है तथा ध्वज लगाता है। पिता और पूर्वजों से अधिक तेजस्वी होता है। पुत्रों के भाग्योदय से सन्तुष्ट नही होता। इसके घर में इतना अन्न पकाया जाता है जिसमें ४० तोले नमक लगे - अर्थात बहुत लोगों का आश्रयदाता होता है।

जीवनाथ - द्विजगणाः समन्ताद् गुंजन्ते मधुरमनिशं कीर्तिरतुला । ब्राम्हण सर्वत्र इस की कीर्ति का गान करते है। अन्य वर्णन नारायणभट्ट के समान है।

बृहद्यवनजातक - सद्राजचिहनोत्तमवाहनानि मित्रात्मजश्रीर- मणीसुखानि । यशोविवृद्धिधा जगत्यां राज्ये सुरेज्ये विजयं नराणाम्।। राजा के चिन्ह, उत्तम वाहन, मित्र, पुत्र, धन, स्त्री, कीर्ति तथा विजय की प्राप्ति होती है। जीवोऽर्कके धनमथो। १२ वें वर्ष धन प्राप्ति होती है। यही वर्णन ढुंढिराज ने किया है।

आर्यग्रन्थकार - दशममन्दिरगे च बृहस्पतौ तुरगरत्नविभूषित- मन्दिरः । भवति नीतिर्गुणैर्बुधसंयुतः परवरांगणवर्जितधार्मिकः ।। इसका घर घोडे और रत्नों से शोभित होता है। यह नीतिमान, गुणी, विद्वानों से युक्त, परस्त्री से दूर रहनेवाला और धार्मिक होता है।

काशीनाथ - कर्मभावगते जीवे पुण्यकीर्तिसुखान्वितः। राजतुल्यः सुरूपश्च दयालुर्जायते नरः। यह पुण्यवान, कीर्तिमान, सुखी, राजा जैसा वैभवशाली, सुन्दर और दयालु होता है।

मन्त्रेश्वर, जागेश्वर तथा जयदेव - इन्होंने अन्य शास्त्रकारों जैसे शुभ फलों का ही वर्णन किया है।

पुंजराज - कर्मसंस्थो गुरुश्वेत् नानवित्ताभ्यागमं सः करोति । पुंसां नूनं गौरवं भूमिपालात् सत्त्वाधिक्यं जीवनं चित्तवृत्या ।। विविध प्रकारों से धन मिलता है। राजा से सन्मान मिलता है। सात्विक और बुद्धिजीवी होता है।

घोलप - अच्छे पुत्रों से युक्त, शूर, शत्रु का नाश करनेवाला आनन्दी, इष्ट हेतू सिद्ध करनेवाला, सम्पन्न, घोड़े आदि वैभव से युक्त तथा स्त्री सुख प्राप्त करनेवाला होता है।

हिल्लाजातक - दशमे दशमश्चैव लाभदः सर्वदा गुरुः। दसवें वर्ष लाभ होता है।

लखनऊ के नबाब - पालकीजजवाहिरफीलैः संयुतो विविधवस्त्र विशालैः । मुश्तरी भवति शाहमखाने साहिबः खलु नरो नसरः स्यात्।। पालकी, जवाहरात, हाथी, विविध वस्त्र प्राप्त होते हैं। यह वैभवसम्पन्न और भाग्यवान होता है।

पाश्चात्य मत - यह गुरु सन्मान, कीर्ति, भाग्य, यश आदि के लिए शुभ है। गुरु दशम में या धनस्थान में शुभ सम्बन्ध में बलवान हो तो बहुत भाग्य वृद्धि करता है। बड़ा अधिकार पद प्राप्त होता है। उन्नति जल्दी होती है। आचरण शुद्ध होता है। यह गुरु, कर्क, मकर, मीन और धनु में अच्छा होता है। मेष, सिंह, वृषभ, तुला, कुम्भ और वृश्चिक में कुछ अच्छा होता है।
दशम भाव में गुरु रा जातक घोड़ो, बहुमूल्य रत्नों और सुसज्जित घर का स्वामी, राजनीति क्‍ में दक्ष, व्यवहारिक , धार्मिक तथा परस्त्री में रूचि रखने वाला नहीं होगा। 
-मानसागरी 
दशमस्थ गुरु जातक को धनी और राजा का कृपा पात्र बनाता है। वह
उच्च प्रतिष्ठित और गुणी होगा।
'यदि
-फलदीपिका
गुरु दशमस्थ है तो जातक अपने कार्यों में आरंभ में ही सफलता
पाने वाला, सम्मानित, बिना प्रयास के सफल, प्रचुर धन से सम्पन्न तथा
प्रसन्न, संबंधियों, वाहनों व प्रसिद्धि से होगा।
युक्त
-सारावली
व्यक्ति धार्मिक मानसिकता वाला, न्यायिक कर्म करने वाला, धर्म-ग्रंथों
का अध्येता, विस्तीर्ण प्रतिष्ठा वाला, जनसमूह के आदर का पात्र, होगा।
यदि गुरु पापाक्रान्त है तो उसके व्यावसायिक क्षेत्र में बाधाएँ आएँगी। वह
कुकृत्यों में लिप्त और आर्थिक कठिनाईयों का सामना करेगा।
भृगु
जातक गुणी, विद्वान, धनार्जन में चतुर, वाहनों से युक्त, उच्चादशों
वाला तथा संस्थाओं का संस्थापक होगा। वह अच्छा कृषक, अहिंसक,
महत्वाकांक्षी, सचेत और दृढ़निश्चयी होगा।
टिप्पणी
-डॉ रामन
दशम भाव प्रबलतम केन्द्र स्थान है। गुरु की कर्मस्थान में स्थिति एक अच्छी स्थिति है। यदि यह शुभयुत हो तो जातक को प्रत्येक काम व ध्येयपूर्ति में सफलता की सहज प्राप्ति को स्वर्णिम आयाम प्रदान करती
है। जातक खाने का शौकीन, सीमित यौन सुख प्राप्तकर्त्ता, धार्मिक कृत्य वाला या चिरस्थायी-प्रकृति के धार्मिक कार्यों में योगदान देने वाला, प्रसिद्ध व्यक्ति के आश्रय में रहने वाला और अत्यन्त समृद्ध होगा। उसे
धर्म ग्रंथों और शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान होगा।
• जातक संतान की दृष्टि से अत्यन्त पीड़ित होगा। दशम भाव पंचम भाव से षष्ठ तथा पंचम भाव दशम से आठवाँ जिससे षडाष्टक संबंध स्थापित होता है। जो अभीष्ट नहीं होता। पंचम भाव का कारक अष्टम से अनिष्ट स्थिति में होता है शायद इसी कारण ऋषियों ने दशमस्थ गुरु को संतान के लिए अनिष्ट कारक कहा है।
भट्ट तथा जीवनाथ के अनुसार जातक संतान को लेकर बुरी तरह कष्ट भोगेगा। शायद इसलिए कि दशम पंचम से षष्ठ तथा पंचम दशम से अष्टम भाव है, इस 6/8 स्थिति के लिए यह मत रहा होगा। दशमस्थ गुरु की दृष्टि दूसरे भाव, (जो कि संपदा, वाणी, खानपान की आदतें, अध्ययन आदि का भाव है) चतुर्थभाव, जो कि पारिवारिक
जीवन, घर और माता आदि का भाव है, छठा भाव (जो कि रोग, शत्रु, प्रतियोगिता का भाव है) पर दृष्टि है। गुरु की स्थिति इन चारों भावों से संबद्ध सभी शुभ फलप्रद है। दशम, द्वितीय से नवम, चतुर्थ से सप्तम
तथा छठे से पंचम भाव है। अर्थात् पुनः शुभफलों की अपेक्षा की जा
सकती है।
सभी
दशम भाव में गुरु अधिक उन्नति और विशेष प्रसन्नता प्रदान करता
है और जातक गुणी होगा। जातक शुरु किए गए कामों में सफल,
सुविधाओं की प्राप्ति, जीवन में प्रगति, प्रसन्नता, संपत्ति, वाहन आदि प्राप्त
करता है। वह कर्तव्यनिष्ठ और विद्वान् होगा।
केन्द्रगत गुरु स्वक्षेत्री, मूलत्रिकोण या उच्च राशि में 'हंस योग'
बनाता है। वह सम्मानित और जनता द्वारा आदर प्राप्त करेगा।
जातक शास्त्रों का ज्ञाता, मंत्री, न्यायाधीश, वकील, पुजारी, प्राध्यापक,
कपड़े का कारोबार करने वाला, परचून की दुकान करने वाला होगा। वह
आस्तिक, धर्म व्याख्याता, वेद-पुराण-शास्त्र मार्ग का अनुकरण कर्ता
होगा।
'फलित ज्योतिष' पुस्तक में डॉ बी. वी. रमन तथा श्री के. एन. राव
की कुण्डलियाँ भी देखें।
यदि मीन लग्न है तो दशम भाव में धनुराशि में गुरु लग्नेश व दशमेश होकर बैठता है। मिथुन लग्न के लिए मीन राशि में दशमस्थ गुरु
सप्तमेश और दशमेश के रूप में होगा। जबकि कन्या लग्न के लिए
मिथुन राशि में बृहस्पति सप्तमेश और चतुर्थेश के रूप में दशमस्थ होता 
है। धनु लग्न में कन्या राशि में लग्नेश और चतुर्थेश होकर गुरु दशमस्थ
होता है। ये सभी स्थितियाँ प्रबल धनयोग बनाती है। गुरु के केन्द्राधिपति
होने के कारण यह केन्द्राधिपत्य दोष से युक्त हो जाता है। इसी कारण
अशुभ कहलाता है। सिद्धान्त के अनुसार शुभ ग्रह केन्द्राधिपति होने पर
इस दोष से दूषित होगा। सामान्यतया विद्वानों ने दशमस्थ गुरू की प्रशंसा
की है। पाठक परिणामों को जाँचें और निर्णय करें। यह एक विवादास्पद
विषय है। इस दोष का प्रभाव क्या होगा?

हमारे विचार - इस स्थान में प्रायः सभी शास्त्रकारों ने फलों का वर्णन किया है। सिर्फ नारायणभट्ट ने पुत्र सुख न मिलना यह और वसिष्ठ ने दीनता यह अशुभ फल कहा। इन अशुभ अनुभव मिथुन, कर्क, तुला तथा कुम्भ में आता है। अन्य राशियों में शुभ फल मिलते हैं। जातकमार्गोपदेशिका (श्री. प्रधान) में दशमस्थ गुरु के जो फल बतलाए उनका अनुभव नवम स्थान में आता है। इस स्थान में धनलाभ के जो वर्ष यवनजातक और हिल्लाजातक में बतलाए हैं उनका अनुभव नही आता। वैद्यनाथ ने दशम में मकर में गुरु हो तो उत्तम धनलाभ का फल कहा। प्रचलित ज्योतिष में मकरस्थ गुरु निष्फल मानते हैं किन्तु यह योग्य नहीं। वैद्यनाथ का मत अनुभव सिद्ध प्रतीत होता है। कल्याण वर्मा ने मारक वर्षों का वर्णन किया है उसका अनुभव देखना चाहिए।

हमारा अनुभव - इस स्थान में गुरु के फलस्वरूप १६ या २४ वें वर्ष के पहले पिता की मृत्यु होती है अथवा उससे झगड़ा होता है। दोनों का भाग्योदय एक साथ नही हो सकता। कर्ज बढ़ता है। कारावास का प्रसंग आता है। रोज के खर्च के लिए भी कमाई पूरी नही पड़ती। लोगों से याचना करनी पडती है। पिता को अपनी कमाई का उपयोग नही होता। बड़े होने पर भी अपनी कमाई न होने का दुख रहता है। सदा अपयश मिलता है। इन फलों का अनुभव वृषभ, कन्या, तुला, मकर या कुम्भ लग्न हो तो विशेषतः आता है। कुछ उदाहरणों में दशम में वृषभ और कर्क में गुरु होते हुए जीवित रहते ही मृत्यु हुआ। कुछ उदाहरणों में पिता के एक ही वर्ष बाद मृत्यु हुआ। भाग्योदय न होकर अन्नान्न दशा में मृत्यु हुई। कुछ ने आत्महत्या और कुछ ने गृह त्याग किया। पुराणों में दुर्योधन के अधःपात का कारण दशमस्थ गुरु बतलाया है। पिता की मृत्यु बचपन में ही हुआ तो प्रपंच ठीक चलता है। कार्य यशस्वी होते हैं। अन्य राशियों में साधारण अच्छा फल मिलता है। दशमस्थान में गुरु पुरुष राशि में हो तो सन्तति कम होती है। स्त्री राशि में हो तो सन्तति बहुत होती है। इस स्थान में व्यवसाय का फल बतलाना कठिन है। भिक्षुक, ठेलेवाले व्यापारी, जज्ज, आयात निर्यात व्यापारी आदि सभी प्रकार के लोग देखे जाते हैं।

  दशम स्थान में गुरु शुभ फलदायी होता है। ऐसा जातक चरित्रवान,कार्यकुशल, यशस्वी, सुखी, कर्तव्यशील एवं विद्वान होता है। उसकीकार्यनिष्ठा गजब की होती है, हाथ में लिया काम वह तन्मयता के साथ पूर्णकरता है। कार्यसिद्ध होने तक निरंतर प्रत्यनशील रहता है। सहोदरों का पर्याप्तसुख, शासन में मान-सम्मान प्राप्त होता है। जातक अधिकारसंपन्न, अपने पिताकी अपेक्षा अधिक विद्वान, यशस्वी एवं संपन्न रहता है। किंतु संतानकर्तव्यशील नहीं रहती। जातक अल्पायु, लोगों का आश्रयदाता एवं सहायकरहता है। 34वें वर्ष में उसे कुछ यातनाएं भोगनी पड़ती हैं।

    यवन ज्योतिषविदों ने भी दशमस्थ गुरु के अच्छे एवं शुभ फल बताए हैं।वृहत यवन जातककार की राय में ऐसे जातक को 22वें वर्ष में धनलाभ होताहै। पाश्चात्य विद्वानों के मत भारतीय आचायों से मिलते-जुलते हैं।
दशम भाव-दसवें भाव्र का गुरु जातक को शुभ कर्म करने वाला तथाधर्मात्मा बनाता है। जातक प्रसिद्ध व सम्मानित होता है। धनाद्य, सत्यवादी तथान्यायप्रिय भी होता है। ऐसा जातक सफल ज्योतिषी हो सकता है या अति उच्च पदपर आसीन होता है (सर्वोच्च न्यायाधीश/मंत्री/प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति आदि) । ऐसेजातक को प्रायः अपने पिता का सहयोग नहीं मिलता, यद्यपि यह भी एक प्रकारका 'राजयोग' होता है। बृहस्पति यहां अशुभ स्थिति में हो तो जातक को चालाकीभरे कार्य करने से लाभ होता है। धर्म-कर्म में विश्वास या नेकी के काम करने सेलाल किताब के अनुसार दसवां गुरु जातक को धर्मात्मा, शुभकर्मा, पूजनीय
    वह दरिद्र व दुखी बनता है-ऐसा लाल किताब का मत है। परन्तु शुभ हो या
    अशुभ (अशुभ में धनाभाव होता है)-जातक बुद्धिमान अवश्य होता है।
    व अति सम्मानित बनाता है। शुभ प्रभाव का बली गुरु इस भाव में हो तो जातक के
    भाग्य की काफी वृद्धि होती है। बड़ा अधिकार व बड़ा पद प्राप्त होता है, तीर्थ यात्रा
    के अवसर बार-बार मिलते हैं। जातक माता-पिता (माता का विशेष)का भक्त
    होता है। किन्तु पुत्रों से सुख प्राप्त नहीं होता। यदि दशमस्थ गुरु पंचमेश होकर बैठा
    हो तब पुत्र वृद्धि, दीर्घायु पुत्र तथा जातक को स्वयं भी दीर्घायु प्राप्त होती है और
    जातक की शिक्षा उसके कार्य क्षेत्र में परम सहयोगिनी सिद्ध होती है। पुरुष राशि
    का गुरु अल्प संतति देता हैं। स्त्री राशि का गुरु संतानाधिक्य देता है।
    यदि दशमस्थ ‘गुरु' केन्द्राधिपति दोष से ग्रस्त हो (उसकी दोनों राशियां
    केन्द्र में ही पड़ती हों। यानी वह दोनों केन्द्रों का अधिपति हो ऐसा केवल मिथुन या
    कन्या लग्न होने पर ही होता है) तो गुरु की दशा/अन्तर्दशा में जातक को लम्बे
    चलने वाले रोग होते हैं। गुरु यदि नीच राशि में हो तो भी धन का लाभ तो कराता
    ही है। किन्तु शुक्र (वृष व तुला) या शनि (मकर व कुम्भ) का लग्न हो तो दसवां
    गुरु उत्तम फल नहीं दे पाता।
दशम भावः दशमस्थ बृहस्पति जातक के लिए शुभ फलदाता होता है,ऐसा मत एक-दो आचायों को छोड़कर सभी का है। पुरुष राशियों में से किसीभी राशि में बृहस्पति दशम स्थान में हो तो संतान अल्प संख्या में होती है, स्त्रीराशि का हो तो अधिक संतान उत्पन्न होती है। मिथुन, कर्क, तुला, वृश्चिकऔर कुम्भ राशि का बृहस्पति हो तो युवाकाल में ही पिता का साया सिर से उठजाता है, जीवित रहे तो झगड़े होते हैं। पुत्र-पिता एकसाथ कार्य करें तो प्रगतिनहीं कर पाते, कारावास तक की सम्भावना रहती है, अपयश मिलता है।दशमस्थ बृहस्पति के जातक किस विशेष व्यवसाय से लाभ उठा सकते हैं यहभलीभांति निर्णय करना कठिन है। सभी तरह से जीविका चलाने वाले देखेजाते हैं। ऐसे जातक व्यवसायी भी हैं तो शिक्षक, न्यायाधीश, लिपिक, वकीलया विदेश से आयात-निर्यात का व्यवसाय करने वाले भी। कर्क, धनु, मीनऔर मकर राशि को छोड़ अन्य राशियों का बृहस्पति दशमस्थ हो तो अशुभफल ही मिलते हैं।

    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक धैर्यशील एवं अपनेपरिवार में सबका प्रिय रहता है। जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है। जातकसंपन्न एवं सुखी रहता है। माता-पिता के साथ मतभिन्नता रहने से उनका सुखउसे प्राप्त नहीं होता।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,आलसी, चुगलखोर होता है। माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। महर्षिगर्ग के अनुसार संतान एवं बंधुसुख में कमी रहती है। वीर्यदोष के कारणसंतानोत्पत्ति की क्षमता कम रहती है। उसके संतान नहीं होती। परोक्ष रूप सेपर-पुरुष से उसकी पत्नी संतान को जन्म देती है। संतान कर्तव्यपरायण होती है।

3. मिथुन मिथुन राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो वह शुभ फलदायीहोता है। ऐसा जातक संपन्न, सुखी, चरित्रवान एवं सरकारी कर्मचारी रहता है।

    जातक की आंखें आकर्षक रहती हैं, पत्नी अच्छी मिलती है। जातक स्वयंमातृ-पितृभक्त होता है। माता-पिता का अच्छा सुख उसे प्राप्त होता है। जातकशासन का आलोचक या टीकाकार रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु उच्च होकर भी दशम स्थान में अच्छाफलदायी नहीं होता। फिर भी ऐसा जातक संपन्न, सुखी, सरकारी कर्मचारी,यशस्वी, पुरुषार्थी एवं सुखी रहता है। उसके शत्रु अधिक होते हैं, भाग्य प्रबलरहता है एवं पत्नी गर्ममिजाज रहती है। पुरुषत्व की कमी या वीर्यदोष होनेसे संतान सुख में बाधा आती है। जातक को दत्तक संतान लेनी पड़ती है।

5. सिंह-सिंह राशि का गुरु दशम स्थान में उत्तम फलदायी होता है। ऐसाजातक सुधारक, तर्कशास्त्री, न्यायशास्त्री, लेखक, नाटककार, संगीतकार,अनेक विषयों का ज्ञाता, यशस्वी, सरकारी कर्मचारी, मातृ-पितृभक्त एवं सुखीहोता है। पत्नी विदुषी मिलती है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक चरित्रवान,सरकारी कर्मचारी, सेवाभावी, मातृसुखभोगी एवं सुखी रहता है। उसे पत्नी सुख अच्छा प्राप्त होता है। स्वास्थ्य अच्छा एवं आंखें सुंदर होती हैं।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक परोपकारी, सुखी,संपन्न, सरकारी कर्मचारी रहता है। मां एवं पत्नी दोनों गर्ममिजाज होती हैं।महर्षि लोमश की राय में संतान सुख में बाधा रहती है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक विद्वान,कर्तव्यनिष्ठ, सरकारी कर्मचारी, संपन्न, दीर्घायु, मातृसेवक एवं चरित्रवान रहताहै। पत्नी विदुषी एवं आज्ञाकारिणी रहती है। यवनाचार्य के मतानुसार जातककी पिता से अनबन रहती है। महर्षि लोमश के मतानुसार संतान सुख में बाधारहती है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक विद्वान,कर्तव्यनिष्ठ, उद्यमी, चरित्रवान, सरकारी कर्मचारी, चतुर, कवि, मात-पितृभक्त,संपन्न एवं सुखी होता है। माता-पिता, दादा से लाभ एवं सुख प्राप्त होता है।10. मकर-मकर राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,यशस्वी, सत्कर्मी, परोपकारी, उद्यमी, पराक्रमी, मातृसेवक एवं चरित्रवान रहताहै। मां का स्वभाव गर्म रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार संतान सुख मेंव्यवधान रहता है।

    11. कुभ-कुंभ राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सरकारीकर्मचारी, चतुर, कर्तव्यनिष्ठ उद्यमी, यशस्वी एवं दीर्घायु रहता है। माता-पिताके सुख में न्यूनता रहती है, उनसे मतभिन्नता रहती है। पत्नी का चरित्र अच्छानहीं रहता। जातक वर्णसंकर संतान का पिता होता है।

12. मीन-मीन राशि का गुरु दशम स्थान में हो तो जातक को श्रेष्ठफलदायी होता है। ऐसा जातक विद्वान, आस्तिक, चरित्रवान, पराक्रमी, उद्यमी,निरोगी, सरकारी कर्मचारी एवं मातृभक्त रहता है। ननिहाल से सुख मिलताहै। पत्नी आज्ञाकारिणी रहती है। स्वयं को वातविकार रहता है।

1. बिल्ली को दूध पिलावें। 
2. ग्रहण में दान करें। 
3. कौऐं को घर पर नबैठने देवें। 
4. फलदार वृक्ष न लगावें।
===========================11) एकादश भाव- एकादरा स्थान (लाभ भाव)ग्याहरवें स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकर - लाभवान्। इसे बहुत लाभ होते हैं। कल्याण वर्मा - अपरिमितायद्वारो बहुवाहनभृत्यसंयुतः साधु एकादशगे जीवे न चातिविद्यो न चातिसुतः ।। इसके धन प्राप्ति मार्ग असंख्य होते हैं। बहुत वाहन और नौकर होते हैं। सज्जन होत है। शिक्षा बहुत नही मिलती। पुत्र बहुत नही होते ।

वसिष्ठ - धनायुषीज्यः लाभं । धन, दीर्घायु तथा लाभ प्राप् होते हैं।

वैद्यनाथ - आस्थेऽमरमन्त्रिणि प्रबलधीर्विख्यातनामा धनी। इसकी बुद्धि प्रबल होती है। यह धनवान और प्रसिद्ध होता है, जीव यच्छति वेदशास्त्रयजनाचारदिपुत्रैर्धनम्। वेदशास्त्रों का अभ्यास, यज्ञ कराना आदि से तथा पुत्रों से धन प्राप्त करता है।

गर्ग - नीरोगो दृढवीर्यश्च मन्त्रवित् परशास्त्रवित् । नातिविद्योल्प- तनयः साधुरेकादशे गुरौ।। यह नीरोग, बलवान, मन्त्र जाननेवाला, दूसरों के शांस्त्र जाननेवाला होता है। शिक्षा बहुत नही मिलती। पुत्र कम होते हैं। यह सज्जन होता है।

बृहद्यवनजातक – सामर्थ्यमर्थागमनं च नूनं सद्रत्नवस्त्रोत्तम- वाहनानि । भूपप्रसादं कुरुते नराणां गीर्वाणवन्द्यो यदि लाभसंस्थ: ।। यह बलवान और धनवान होता है। उत्तम रत्न, वस्त्र और वाहन प्राप्त होते हैं। राजा की कृपा होती है। ईज्य इनाब्दलक्ष्मीम. । १२ वें वर्ष धन प्राप्त होता है।

नारायणभट्ट - अकुप्यं च लाभे गुरौ किं न लभ्यं वदन्त्यष्टधी- मन्तमन्ये मुनीन्द्राः ।। पितुर्भारभृत् स्वांगजास्तस्य पंच परार्थस्तदर्थो न चैट्टै वैभवाय।। सभी प्रकार का धन प्राप्त होता है। यह अष्टावधानी होता है। एक ही समय आठ चीजों की ओर ध्यान दे सकता है। पिता के परिवार का भार इसे ही वहन करना पडता है। पांच पुत्र होते हैं। इसके धन का उपयोग दूसरों के लिए ही अधिक होता है।

काशीनाथ लाभे गुरौ विवेकी स्याद्धस्त्यश्वादिधनैर्युतः । अलोलुपः सुरूपश्च गुणवानपि जायते। विवेकी, निर्लोभ, सुन्दर, गुणवान तथा हाथी घोडे आदि सम्पत्ति से युक्त होता है।

आर्यग्रन्थकार व्रजति भूमिपतेः समतां धनैः निजकुलस्य विकासकरः सदा। सकलधर्मरतोऽर्थ समन्वितो भवति चायगते सुरनायके।। यह राजा के समान धनवान, अपने कुल का विकास करनेवाला, धार्मिक तथा धनवान होता है।

मन्त्रेश्वर - आयस्थे धनिकोऽभयोल्पतनयो जैवातृको योनगः । यह धनवान, निर्भय, विजयी तथा वाहनों से युक्त होता है। इसे पुत्र कम होते है।

जयदेव - सविक्रमायाम्बरमानवित्तः सुकीर्तिसामर्थ्ययुतो भवस्थे। यह पराक्रमी, धनवान, मानी, विविध वस्त्रों से युक्त, कीर्तिमान तथा धनवान होता है। जीवनाथ का मत भी यही है।

जागेश्वर - गुरौ विद्यया पुत्रसौख्यान्वितः स्याद् भवेद् धार्मिकैः साधुलोकैः प्रसंगः। सुवर्णादिधातुर्भवेत् तस्य गेहे नृपाणां सुमान्यः सुधानं प्रभूतं ।। यदा देवपूजस्य लाभे स्थितिः स्यात्।। यह विद्यावान, सुखी, पुत्रों से युक्त, धार्मिक, सज्जनों के साथ रहनेवाला होता है। सोना चांदी आदि धातु प्राप्त होते हैं। राजा को मान्य होता है। धान्य बहुत होता है।

पुंजराज - कान्तासुखम्। स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। घोलप

यह मित्रता के लिये उत्सुक होता है। मित्र बहुत होते हैं और उनके फायदे के लिए यह प्रयत्न करता है। सज्जनों का आश्रय लेनेवाला किन्तु कपटी और हीन होता है। राजा की कृपा प्राप्त कर के बलिष्ठ शत्रुओं का नाश करता है। यह वाहनों से युक्त, कलाओं का ज्ञाता और पुज्य होता है।

गोपाल रत्नाकर

यह गीतापठन करता है। बडे भाई का पोषण करता है। धन जमीन में गाड़कर रखता है। हिल्लाजातक - लाभगो लाभदश्चैव चतुर्विंशे च वत्सरे। २४ वे वर्ष लाभ होता है।

लखनऊ के नबाब - साविरः शुभतनुर्जरदारः फारसो बहुपराक्रमयुक् स्यात्। काविलश्च यदि याफ्तिमकाने मुश्तरी प्रविभवेत् खुशरः स्यात्।। यह धनवान, पराक्रमी, सुन्दर, विद्वान् और बलवान होता है।

पाश्चात्य मत यह प्रामाणिक, सच बोलनेवाला, भाग्यवान, उदार और अच्छे मित्रों से युक्त होता है। यह गुरु स्थिर राशि में हो तो गर्विष्ठ और अभिमानी होता है। चर राशि में हो तो साहसी, कार्यकुशल होता है। द्विस्वभाव राशि में हो तो धार्मिक और संसारदक्ष होता है। इसे
राजा द्वारा सन्मान और लाभ के विलक्षण योग प्राप्त होते है। इस स्थान में गुरु बलवान होना बड़े भाग्य का लक्षण है। श्रीमान और खानदानी लोगों से मित्रता होती है। मित्रों की मदद से आशाएं और महत्वाकांक्षाएं

होती है। उनकी सलाह उत्तम और फायदेमन्द होती है। अपने कामो से समाज में नाम होता है और श्रेष्ठता प्राप्त होती है। धन प्राप्ति अच्छी होती है। संतति सुख अच्छा मिलता है। पुत्र के जन्म से भाग्योदय शुरू होता है। इस स्थान में गुरु के साथ चन्द्र, रवि, हर्षल, नेपच्यून अथवा शनि की युति शुभ युति होती है। मंगल, शनि और हर्षल से अशुभ सम्बन्ध नही होना चाहिए।

अज्ञात

नरेशयज्ञगजभूज्ञानक्रियाभिः ।। आयुरारोग्यमैश्चर्य जायापत्यसुहृत्सुखम्। नृणां चतुष्पदप्राप्तिः देवेज्यो लाभगो यदि ।। विद्वान, धनवान, द्वात्रिंशद्वर्षे बहुलाभः । अनेकप्रतिष्ठासिद्धिः । शुभपापयुते गजलाभः। भाग्यवृद्धिः । चन्द्रयुते निक्षेपलाभः ।। इसे राजा, यज्ञ, हाथी, जमीन और ज्ञान की क्रिया से लाभ होता है। यह दीर्घायु, नीरोग, धनवान होता है। स्त्री, पुत्र और मित्रों का सुख प्राप्त होता है। चौपाये पशु मिलते हैं। यह विद्वान होता हैं। ३२ वें वर्ष लाभ होता है। अनेक प्रकार की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अन्य ग्रहों से सम्बन्ध हो तो हाथी प्राप्त होता है। भाग्य बढता है। चन्द्र की युति हो तो निक्षेप (धरोहर रखा हुआ धन प्राप्त होता है।

एकादश भाव में गुरु 

जातक राजा के समान संपत्तिशाली होगा। वह सदेव अपने परिवाएजनों के प्रति विरूद्ध विचारों बाला परन्तु धार्मिक और धर्मार्थ कारों में सलन होगा। 

-मानसागरी 

वह समृद्ध, दीर्घायु, निर्भीक, अल्प संतति बाला, वाहन सुख से युक्त होगा। 

-फलदीपिका 

जातक के अनेक नौकर चाकर तथा वाहन होगें। वह गुणी अल्प 

संतति तथा कम शिक्षित होगा। उसे अनेक प्रकार के आर्थिक लाभ मिलेंगे। 

-सारवली जातक विद्वान्‌, समृद्ध, पर्याप्त आर्थिक लाभों का प्राप्तकर्त्ता, 32 वें वर्ष की आयु में घुड्सवारी तथा कीर्ति का विस्तार करे। यदि गुरु शुभवृतत 

है तो जातक वाहनों का स्वामी और भाग्यशाली होगा। यदि गुरु चन्द्रमा से युत है तो वह बिना प्रयास के अर्थलाभ प्राप्त करेगा। 
"भृगु"

जातक संगीत प्रेमी, अत्यधिक समृद्ध, राज्याधिकारी की क्षमताओं से युक्त, पुण्य कर्म कर्त्ता, धन को एकत्रित करने वाला, ईश्वर से डरने वाला, दानी, कभी-कभी परावलंबी, प्रभावशाली, बहुत से मित्रों वाला या लोक हितेषी होगा। 

-डॉ रामन॑ 

भट्ट के अनुसार-जातक के 5 पुत्र होगें। 

गर्गाचार्य के अनुसार-जातक बहुत शिक्षित नहीं होगा और न ही उसके बहुत पुत्र होंगे परन्तु वह गुणवान्‌ होगा। 

टिप्पणी 
सामान्य दृष्टिकोण से एकादश भाव में गुरु की स्थिति शुभफलदायी होगी। यह भी देखा गया है कि गुरु की एकादश भाव में स्थिति बड़े भाई बहनों के लिए अच्छी नहीं है। 

हमारे विचार - पुराने ग्रन्थकारों की एक सामान्य कल्पना है कि लाभ स्थान में सभी ग्रहों का फल शुभ मिलता है - लाभस्थाने ग्रहाः सर्वे बहुलाभप्रदाः । इसी के अनुसार इस स्थान में सभी ग्रन्थकारों ने प्रायः शुभ बतलाए है। सिर्फ कल्याणवर्मा और गर्ग ने शिक्षा न होना और पुत्र कम होना यह फल कहा है। इस स्थान गुरु के शुभ फलों का अनुभव कर्क, कन्या और मीन को छोड़कर अन्य रशियों में आता है।
हमारा अनुभव - इस स्थान में गुरु का सामान्य फल यह है कि सन्तति, सम्पत्ति या विद्या इन में कोई एक लाभ अच्छा होता है। सन्तति अधिक हो तो सम्पत्ति और विद्या कम होती है। सम्पत्ति अधिक हो तो सन्तति और विद्या कम होती है। विद्या अधिक हो तो सन्तति और सम्पत्ति कम होती है। पूर्वार्जित इस्टेट प्राप्त होती है मगर रिश्तेदार हडप करते हैं अथवा अपने ही हाथों उस इस्टेट का नाश होता है। बडे भाई का प्रपंच ठीक नही चलता। उसका पोषण भी इसे करना पडता है। इस स्थान में गुरु होने से पुत्र बहुत दुराचारी होते हैं। मां-बाप से झगडा कर मारपीट तक नौबत लाते हैं। कुल का नाम गंवाते हैं। अपने परिश्रम से उदरनिर्वाह नही कर सकते। ये व्यक्ति पुत्रों का हित नही कर सकते। पिता और पुत्र दोनों की एक साथ उन्नति नही होती। पिता के पश्चात् भाग्योदय होता है। यह गुरु कर्क, कन्या, धनु या मीन में हो तो सन्तति नही होती अथवा होकर मृत होती है। यह खुद अथवा इसकी स्त्री पुत्रोत्पत्ति में असमर्थ होते हैं। प्रपंच में विपत्तियां बहुत आती हैं। खुद बीमार होना, पत्नी बीमार होना, पत्नी से झगड़ा होना, द्विभार्यायोग, सन्तति में सिर्फ कन्याएं होना, बड़े भाई को मारक अथवा दारिद्र्ययोग होना, कर्ज अधिक होने से कारावास होना, व्यवसाय में नुकसान और बेइज्जत होने से गांव छोड़ना आदि अशुभ फल मिलते हैं।

    एकादश स्थान में गुरु शुभ फलदायी होता है। आर्थिक दृष्टि से यह गुरुबहुत महत्त्व रखता है। ग्यारहवां गुरु क्या नहीं देता? ऐसा जातक संपत्ति सेभरपूर रहता है। शिक्षा भी अच्छी होती है। उच्च शिक्षा प्राप्त न हो तो भीबुद्धि प्रखर होने से उच्च शिक्षा का अभाव नहीं खटकता। जातक समाज मेंयशस्वी एवं ख्याति प्राप्त रहता है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है, दीर्घायु रहती है।सत्ता या शासन में अच्छा सम्मान प्राप्त होता है। धनी होते हुए भी वह अपनीशान-शौकत के लिए धन व्यय न करके परहित के लिए खर्च करता है।वैवाहिक जीवन सुख से पूर्ण रहता है। पत्नी अच्छी मिलती है। एकादश स्थानमें गुरु के साथ दो या तीन ग्रह और हों तो वाहन सुख अच्छा प्राप्त होताहै। एकादश स्थान में गुरु चंद्र योग (गुरुचान्द्री योग) हो तो वसीयत के रूपमें आकस्मिक रूप से धन प्राप्त होता है। 32वां वर्ष लाभदायक एवं महत्त्वपूर्णउपलब्धियों का रहता है। जातक विदेशी भाषा का जानकार होता है एवं उसेविदेश में मान्यता प्राप्त होती है।

    यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार उपरोक्त फल एकादशस्थ गुरु के प्राप्त तो होते ही हैं, साथ ही 12वां एवं 24वां वर्ष जातक की आर्थिक प्रगति के लिए अंच्छा रहता है।

    पाश्चात्य ज्योतिषविदों के अनुसार उन फलों के अतिरिक्त मेष, कर्क, तुलाएवं मकर राशियों में से किसी एक राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तोजातक कार्यदक्ष एवं पराक्रमी बनता है। वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ में से किसीएक राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो शुभ फलदायी होता है एवं पुत्रजन्म के बाद जातक का भाग्योदय होता है।
एकादश भाव-यदि लग्न कुंडली में गुरु ग्यारहवें भाव में हो तो जातक
    सुन्दर, स्वस्थ, धनी, सन्तुष्ट, सफल व्यापारी, विद्वान, दानी व सम्मानित होता है।
किन्तु उसके सन्तान कम होती हैं। यदि गुरु इस भाव में सिंह राशि में हो तो पुत्रसुख जातक को नहीं मिलता। या तो पुत्र होता नहीं, होता है तो जीवित नहीं रहता(तुला लग्न हो तो गुरु वैसे ही पापी व अकारक हो जाता है) । जातक को संतान,शिक्षा व सम्पत्ति तीनों एक साथ नहीं मिलते, कोई एक प्रासत होता है तो दूसरे काअभाव हो जाता है।
    विशेष-वैसे ग्यारहवां घर क्योंकि लाभ का होता है, अतः इस भाव मेंसमस्त ग्रह लाभकारी ही माने जाते हैं। यह एक सामान्य नियम है।
    लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक स्वयं को अकेला भी महसूस करता है।
    यदि संयुक्त परिवार में प्रेमपूर्वक रहा जाए तो गुरु का प्रभाव शुभ रहता है अन्यथा
    अशुभ हो जाता है। इस भाव का गुरु अशुभ हो तो जातक की बहन, बुआ या बेटी
    दुःखी ही रहती है (यह अशुभ गुरु का प्रधान लक्षण लाल किताब ने माना है)।
    उसे कफन भी नसीब नहीं होता। यदि गुरु इस भाव में अत्यधिक अशुभ हो तब। 
एकादश भावः पूर्व मनीषियों के मतानुसार लाभ भावस्थ सभी ग्रह शुभफल प्रदान करते हैं लेकिन अनुभव इसके बिल्कुल विपरीत है। जैसे सिंह राशिका बृहस्पति आय स्थान में हो तो पुत्र संतान का अभाव रहता है। धनु, मीन,कर्क एवं कन्या के बृहस्पति के भी प्राय: अशुभ फल ही अनुभव में आते हैं।संतान और धन-संपत्ति दोनों में से किसी एक का सुख मिलता है। पूर्वजों कीसंपत्ति या तो मिलती नहीं अथवा मिलकर नष्ट हो जाती है। एक के बाद एक  नई विपत्ति आती है। स्वयं रोगी, पत्नी रोगी, दोनों में परस्पर वैमनस्य, पत्नी कीमृत्यु के पश्चात पुनर्विवाह, धन की कमी, ऋण का बढ़ना, चुकता न करने परदण्डित होना, मान-प्रतिष्ठा की हानि जैसे दुष्फल मिलते हैं। विद्या, संतान औरसंपत्ति में से एक का लाभ ही आय भावस्थ बृहस्पति देता है। द्विस्वभावीराशियों (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) में से किसी एक में बृहस्पति हो तो जातककी वृत्ति धार्मिक होती है तथा समाज में मान मिलता है। चर राशि (मेष, कर्क,तुला, मकर) में हो तो साहसी और कार्य कुशल, स्थिर राशि (वृष, सिंह,वृश्चिक, कुम्भ) में हो तो अभिमानी होता है।
    राशिगत फल

    1. मेषमेष राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक प्रसन्नचित्त,चरित्रवान, अनेक नौकर-चाकरों से युक्त, सत्यवादी एवं सुखी रहता है। पत्नीसुंदर, विदुषी, आज्ञाकारिणी और संतान अल्पायु होती है। प्रायः मृत संतान जन्मलेती है। प्रसवकाल में मृत्यु का भय रहता है। ऐसा जातक वकील, न्यायाधीशकी हैसियत से जीवन में यश कमाता है।

    2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु एकादश स्थान में हो जातक दीर्घायु, समाज     का अगुआ, धैर्यवान, दानपुण्य करनेवाला, सरकारी कर्मचारी एवं संपन्न होता है।

    3. मिथुनमिथुन राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक चतुर,विद्वान, संपन्न, लेखक, सुधारक, अधिकारसंपन्न, संगीतप्रवीण, होता है। विचारएवं संपत्ति अस्थिर रहती है। बचपन में उसे दुख उठाने पड़ते हैं। तदोपरांतजीवन सुखी रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु एवंस्वपरिश्रम, पुरुषार्थ से प्रगति करता है। स्वास्थ्य मध्यम रहता है, मातृ-पितृभक्त होता है एवं विदेश यात्रा होती है। पत्नी सुंदर, सच्चरित्र एवं आज्ञाकारिणीरहती है।

    5. सिंह-सिंह राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक धैर्यवान,परोपकारी, स्वाभिमानी, स्वपुरुषार्थ से आगे बढ़नेवाला, सरकारी कर्मचारी,संपन्न एवं सुखी होता है। संतान सुख निर्विध्न रूप से प्राप्त नहीं होता।

6. कन्या-कन्या राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,व्यवहकुशल, लोकप्रिय, संगीत-कलाप्रवीण, सरकारी कर्मचारी एवं यशस्वीहोता है। किसी शोध या संशोधन या लेखन के कारण प्रसिद्धि मिलती है।व्यापार में कुशल होता है। बचपन में स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता किंतु बढ़तीआयु के साथ स्वास्थ्य भी सुधरता है।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,चरित्रवान, आर्थिक दृष्टि से संपन्न, दीर्घायु, यशस्वी एवं विचारवान होता है।

    8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातकसत्यवक्ता, सुखी, संपन्न, सदाचारी, उदार एवं मधुरभाषी होता है। वहस्वपुरुषार्थ से प्रगति करता है, स्वाभिमानी भी होता है। महर्षि लोमश केमतानुसार पुत्रसुख में न्यूनता रहती है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान, धनवान,लेखक, कवि, निरोगी, दीर्घायु एवं सुंदर होता है। उसे कई पुत्र-प्रपौत्रों का सुखप्राप्त होता है और व्यापार में कुशल, उदार एवं परोपकारी होता है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,यशस्वी एवं सरकारी कर्मचारी रहता है। ऐसा जातक वकील या न्यायाधीशकी हैसियत से धन एवं नाम कमाता है।

    11. कुंभ-कुंभ राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जाતक धार्मिक,उदार, समाज में विख्यात, अग्रणी, दीर्घायु, जनकल्याण एवं परोपकार के कामोंके लिए पैसा खर्च करनेवाला होता है। संतान सुख में बाधा रहती है।

    12. मीनमीन राशि का गुरु एकादश स्थान में हो तो जातक के पास काफीधन रहता है, जीवन सुखी रहता है। बुद्धि शंकालु एवं अस्थिर रहती है। बोलने एवं लेखन में चतुर होने से कवि या लेखक के रूप में प्रसिद्ध होता है, स्वास्थ्यअच्छा रहता है।

    1. पीपल का पूजन करें। 2. पक्षियों को दाना चुगावें। 3. शव पर कफनजरूर दान करें।
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12) बारहवां भाव - द्वादशा स्थान (व्यय भाव)बारहवें स्थान में गुरु के फल

आचार्य व गुणाकर
खल: दुर्जनः। यह दुष्ट होता है।

कल्याण वर्मा - अलसो लोकद्वेष्यो ह्यपगतवाग्दै दैवपक्षभग्नो वा। परितः सेवानिरतो द्वादशसंस्थे गुरौ भवति।। यह आलसी, लोगों द्वारा द्वेष किया जानेवाला, बोलने में अकुशल, सेवक और दुर्भागी होता है।
पराशर - रि.फे. चोरहृतस्वं तु नेत्ररोगं पराजयम्। इस का धन चोरों द्वारा हरण होता है। आंख के रोग होते हैं। पराजय होता है। वसिष्ठ - धिषणः कृशांग पीडां च। दुबला और पीडायुक्त होता है।

वैद्यनाथ - चार्वाकी चपलोटन: खलमति: जीवो यदान्त्ये गतः । चार्वाक मत का अर्थात् मनः पूतं समाचरेत् इस विचार का होता है। चंचल, प्रवासी, दुष्ट होता है। वागीशेन्दुसिता यदि व्ययगता वित्स्य संरक्षकः । गुरु, शुक्र या चन्द्र व्ययस्थान में हो तो धन का रक्षण करते हैं।

जातकालंकार - रिः फस्थानस्थितश्चेत् गुरुर्गुप्तरोगी नितान्तं । वागीशे यानभूषावससनहयभवा चामरच्छत्रं चिन्ता । गुप्त रोग होते हैं। वाहन, भूषण, वस्त्र, घोडे, छत्र, चामर आदि की चिन्ता होती है।

गर्ग- उच्छितव्ययकारी च रिः फगे देवतागुरौ, सेवाविज्ञो महाक्रोधी सालसो लोकविग्रही ।। व्ययेन्नदाता धिषणः । गुरुर्व्यये यदापटगोधनहेम- सम्पदः ।। बड़े बड़े खर्च करता हैं। सेवा में कुशल, क्रोधी, आलसी, लोगों से झगड़नेवाला होता है। अन्न की कमी नही होती, वस्त्र, गायें, सोना आदि धन प्राप्त होता है।

बृहद्यवनजातक - नानाचित्तोद्वेगसंजातकोपं पापत्मानं सालसं त्यक्तलज्जं । बुद्ध्या हीनं मानवं वागीशोयं द्वादशस्थः करोति।। पंचविंशे धनव्ययं गुरुः । चित्त उद्विग्न होने से क्रोध बहुत आता है। यह पापी, आलसी, निर्लज्ज, बुद्धिहीन और अपमानित होता है। २५ वें वर्ष बहुत खर्च होता है। इसी प्रकार वर्णन जयदेव और ढूंढिराज ने भी किया है। नारायणभट्ट - यशः कीदृशं सद्व्ये साभिमाने मतिः कीदृशी वंचना चेत् परेषाम्।। विधिः कीदृशोऽर्थस्य नाशो हि येन त्रयस्ते भवेयुर्व्यये यस्य जीवः ।। अभिमान के कारण इसे दान करने पर भी कीर्ति नहीं मिलती। बुद्धि होती है किन्तु उसका उपयोग दुसरों को धोखा देने के लिए करता है। धन का नाश होता है।

जीवनाथ - गुरुणां बन्धूनामुपकृतिविधाने शिथिलता। माता पिता तथा भाइयों पर उपकार करने में आलसी होता है।

काशीनाथ - व्यये बृहस्पतौ रोगी व्यसनी परधर्मकृत् बन्धुवैरी नीचसेवी गुरुद्वेषी च जायते।। यह रोगी, व्यसनी, धर्मभ्रष्ट भाइयों का वैरी, नीचों का नौकर तथा गुरुजनों का द्वेष करनेवाला होता है।

आर्यग्रन्थकार - शिशुदशाभवने हृदय रोगवान् उचितदान पराङमुख एव च। कुलधनेन सदा बहुदाम्भिको भवति पापगृहे च बृहस्पतौ ।। हृदय रोग होता है। योग्य दान नहीं करता। कुल के धन से मदान्ध होता है।

जागेश्वर - ईज्य: व्यये संस्थितः संचयं वै धनानाम् लालसः । भवेत् कोपयुक्तस्तथा चिन्तयासौ ध्रुवं लालसो मानहीनः कुबुद्धिः । स्वयं पापरूपः खलानां च रूपो व्यये देवपूज्ये न दृष्टश्च पापैः।। धन का संचय करनेवाला तथा लोभी होता हैं। क्रोधी, चिन्तित, मानहीन, दुर्बुद्धि, दुष्ट तथा दुष्टों को सहाय्यता करनेवाला होता है।

पुंजराज- जीवो व्ययभावसंस्थः पितुः सहोत्थाः सुखिनस्तदा स्युः । पिता के भाइयों को सुख मिलता है।

मन्त्रेश्वर - द्वेष्यो धिक्कृतवाग् व्यये वितनयः साधोऽलसः सेवकः । द्वेषयोग्यः, धिक्कार होनेवाला, पुत्रहीन, पापी, आलसी तथा नोकर होता है। हिल्लाजातक - बृहद्यवनजातक के समान वर्णन है।


लखनऊ के नबाब मुफलिस: कमफहम् गतलज्जो बदस- खुश्चरयभूतलचिन्तः । काहिलश्च यदि खर्चमकाने मुश्तरी भवति ना बदफेलः।। बेकार, कम बोलनेवाला, निर्लज्ज, निष्ठुर बोलनेवाला झगड़ालू, चिन्तायुक्त, आलसी तथा बुरे कार्यो से धन खर्च करनेवाला होता है।
गोपाल रत्नाकर

पतित, दरिद्री, विरक्त होता है। पुत्र कम होते हैं। वेश्यासंग करता है। विचित्र शय्या मिलती हैं।

घोलप - शरीर में सन्धियों तथा पांव में पीड़ा होती है। बोलना अच्छा नहीं होता। अधिकारहीन, स्त्रीसुखहीन, धनहीन, दुष्टों द्वारा पीडित, राजा द्वारा पीडित, आलसी, मातृहीन, निर्लज उद्विग्न, क्रोधी होता है। इसे अधिकार पद मिले भी तो राजा के कोप से भ्रष्ट होना पडता है।

पाश्चात्य मत यह गुरु विजय प्राप्त कराता है किन्तु शत्रु बहुत होते हैं। अध्यात्मविद्या तथा गूढ शास्त्रों में रुचि होती है। शत्रु द्वारा लाभ होता है। आयु का मध्य तथा उत्तरार्ध अच्छा जाता है। वैद्य, धर्मगुरु, वेदज्ञानी, लोकसेवक आदि के लिए यह गुरु शुभ हैं। पुरानी रीतियों के बारे में आदर होता है। लोगों को अकल्पनीय ऐसे चमत्कारिक प्रकारों से लाभ होता है। यह गुरु पीड़ित या अशुभ सम्बन्ध में हो तो विवाह में कुछ गडबड होती है। शुभ सम्बन्ध में हो तो ३० वें वर्ष के बाद मित्रों से गुप्त साहाय्यता मिलकर अच्छा उत्कर्ष होता है। यह गुरु बलवान हो तो दानाध्यक्ष पद, दान संस्थाओंसे संबंध, सार्वजनिक संस्थाओं में कार्यकर्ता, अस्पताल, धार्मिक संस्थाएं आदि के व्यवस्थापक के रूप में लाभ होता है। इस गुरु में एकांतवास में होनेवाले कार्यों में यश, लाभ और कीर्ति प्राप्त होती हैं। देशत्याग, अज्ञातवास तथा दूर प्रदेशों में प्रवास से कीर्ति तथा लाभ प्राप्त होते है। द्वादश स्थान का सम्बन्ध परोपकार तथा विश्व प्रेम से हैं अतः ये फल कहे गये हैं। बड़े बड़े दान देने की प्रवृत्ति भी होती है। यही गुरु पीडित हो तो आलसी, विवेकहीन तथा किसी सार्वजनिक संस्था के आश्रय से जीवन बितानेवाला होता हैं। कन्या, मकर तथा वृश्चिक में यह गुरु बहुत अशुभ होता है

    व्यय स्थान में शुक्र को छोड़कर बाकी सभी प्रह अशुभ फलदायी होते हैं। गुरु भी बारहवें स्थान में अशुभ फलदायी होता है। ऐसे जातक का शरीर रोगग्रस्त एवं कृशकाय रहता है। जातक को नेत्रविकार,तपेदिक एवं गुप्तरोग उत्पन्न होते हैं। हृदयरोग भी हो सकता है।
अज्ञात

महेन्द्रेज्ये प्रयच्छति व्ययस्थे विपुलं धनम्।
स्वजनविग्रहं दुःखं क्षयोत्पत्तिर्धनव्ययः । प्रवासी नृपतेर्भीतिर्देवेज्ये व्ययंसंस्थिते।। निर्धनः, पठितः, अल्पपुत्रः, गणितशास्त्रज्ञः, ग्रंथिव्रणी, अयोग्यः ब्राह्मणस्त्रीभोगी, गर्भिणीसंगमी, धर्ममूलेन धनव्ययः । उच्चे स्वक्षेत्रे जनहितकारी, राष्ट्रसेवकः । स्वर्गलोकप्राप्तिः । पापयुते पापलोकः।। इस गुरु से विपुल धन प्राप्त होता है। अपने लोगों से झगड़े होते है। दुःख होता है। क्षयरोग होता है। धनहानि होती है। प्रवास बहुत होता है। राजा का क्रोध सहना पडता हैं। धनहीन, पढ़ालिखा, गणित का ज्ञाता होता है। पुत्र कम होते है। गंथिव्रण होता है। अयोग्य होता है। ब्राह्मणी और गर्भिणी स्त्री से संगम करता है। धर्म कार्य में धन खर्च होता है। यह गुरु उच्च अथवा स्वगृह में हो तो लोकहित करनेवाला, देशसेवक होता है। मृत्यु के बाद स्वर्ग में पहुंचता है। पापग्रह से युक्त हो तो पापगति में जाता है।
द्वादश भाव में गुरु 

जातक वक्ष रोगों से पीड़ित, पुरानी या पैतृक संपत्तिशाली और दानविरोधी स्वाभाव वाला होगा। यदि गुरु पापाक्रान्त या अशुभ राशिगत है वो जातक अपने परिवार में छली और धूर्त होगा। 

-मानसागरी जातक दूसरों की घृणा का पात्र, अभद्रभाषी, निसंतान, आलसी तथा दूससें की सेवा करने वाला होगा। 

-फलदीपिका जातक दोषपूर्ण वाणी वाला, गूंगा और भाग्यहीन, संभवतया पराधीन 

या पर सेवा में संलग्न, आलसी व द्वोषी होगा। -सारावली जातक अध्ययन में रूचि रखने वाला, अल्पसंतति वाला, गणित में 

दक्ष लेकिन दुश्चरित्रवान्‌ होगा। यदि गुरु शुभयुत या स्वक्षेत्री या उच्चस्थ हो तो जातक स्वर्गगामी अन्यथा मृत्यु के बाद नर्कंगामी होगा। 

-भगु 
भूगु तथा गर्ग महाऋषि के अनुसार जातक बहुत सारा धन एकत्रित करेगा। 

टिप्पणी 

द्वादश भाव में स्थिति गुरु के सभी कारकत्वों के लिए अरिष्ट कारक होती है। जैसे-धन, संपत्ति, धर्म, सामाजिक कृत्य आदि। जातक बदनामी की हद तक गिरने वाला, बुरे कामों में धन खर्च करने याला (गुरु धन संपत्ति का कारक व्ययभाव तथा भोग भाव में स्थित होकर) होगा। जातक आर्थिक हानियों का सामना करने वाला, अहंकारी व दूसरों की संपत्ति हडपने की नीयत वाला होगा। वह अपने संबंधियों से शज्रुतापूर्ण संबंधो वाला, बेशर्म और यौन रोग ग्रस्त होगा। जातक चोरी के कारण अर्थ की हानियों का सामना करने बाला परन्तु शांतिपूर्वक मरने वाला होगा। द्वादश में गुरु मोक्ष का इच्छुक बनाती है। 

फलदीपिका में यह कहा है कि जो ग्रह ट्वादश भाव में बैठा है वह जिस भाव का कारक है उस भाव के फल में वृद्धि करता है। इसके अनुसार जातक धनवान, विज्ञावानर, सतानवान व धार्मिक होगा। 


हमारे विचार - इस स्थान के गुरु के अशुभ फल ही हमने देखे है। किसी भी शुभ फल का अनुभव नहीं मिला। पाठकों ने अनुभव देखना चाहिए।

हमारा अनुभव

इस स्थान में गुरु के विशेष उदाहरण हमने नहीं देखे हैं। जो देखे उनमें प्रायः अशुभ फल ही मिले। कंजुस तथा स्वार्थी स्वभाव के ये लोग होते हैं किंतु लोगों से मिलजुल कर रहते हैं। ग्रंथिव्रण जांघ में चमत्कारिक फोड़ा हो जो बहुत चिकित्सा करने पर भी ठिक नहीं हो। इससे स्त्रीसुख भी बिलकुल नही मिलेl

    आर्थिक दृष्टि से भी व्ययस्थ गुरु के अशुभ फल ही प्राप्त होते हैं। अनेकज्योतिषाचायों के मतानुसार ऐसा जातक अपना जीवन सुख में बिताता है।अत्यधिक कंजूसी बरतने पर भी धनसंग्रह नहीं कर पाता। स्वभाव दयालु एवंखर्चीला रहता है। परोपकारी एवं उदार होने पर भी इसका श्रेय जातक कोनहीं मिलता। सजा या चोरी के कारण भी धनव्यय होता है। व्ययस्थ गुरु जातकको दार्शनिक बनाता है। लौकिक कर्मकांडों पर उसका विश्वास नहीं रहता।मानसिक एवं वैचारिक बुद्धि को वह अधिक महत्त्व देता है। फलस्वरूपअंधविश्वासी समाज में उसे स्थान नहीं मिलता।

    व्यय स्थान में स्थित गुरु उच्च, मित्रक्षेत्री, बलवान, स्वक्षेत्री हो तो जातकको अपने चाचा से लाभ प्राप्त होता है। जातक विद्वान, गणितज्ञ, सत्कारयों मेंखर्च करनेवाला, भाग्यवान एवं परोपकारी होता है। इसके विपरीत गुरु पापग्रहसे युक्त, पापक्षेत्र में नीच का हो तो आत्मीयजनों से मतभेद रहते हैं। राजभयरहता है एवं जातक दूर तक की यात्रा करनेवाला, निष्टुर, निर्लज्ज, स्वार्थी,आलसी, असफल, बुरे कामों में धन का अपव्यय करनेवाला, गर्मदिमाग का,धूर्त एवं कामातुर रहता है।

    यवनाचायों ने भी व्ययस्थ गुरु के प्रतिकूल फल ही बताए हैं। अधिक बुराफल उन्होंने यह बताया है कि 25वें वर्ष में विशेष आर्थिक नुकसान होता है।

 पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार भारतीय ज्योतिषविदों के मत सही हैं;

    और कुछ फल उन्होंने बताए हैं, वे इस प्रकार हैं:

1. द्वादश गुरु हो तो शत्रु बहुत होते हैं किंतु जातक इन सबको मात देताहै। शत्रुओं से लाभ होता है।

 2. व्यय स्थान का गुरु नीच का, पापग्रहों से युक्त, दुर्बल या पापक्षेत्र मेंहो तो विवाह में विच्न आते हैं।

 3.गुरु बलवान एवं शुभ हो तो जीवन आनंदमय एवं सुखी रहता है।

4. कन्या, मकर या वृश्चिक का गुरु व्यय स्थान में होने पर वह शुभफलदायक नहीं होता।

द्वादश भाव-गुरु यदि बारहवें भाव में हो तो जातक उदार व दूसरों कीसहायता करने वाला होते हुए भी लालची नहीं होता। वह सुखी किन्तु आलसीहोता है। प्रायः वह अपना बुरा करने वाले का भी भला सोचता है। क्षमा द्वाराशत्रुओं को जीतता है। यदि बृहस्पति शुभ हो तो जातक धन को तिनके की तरहंसमझने वाला, श्रेष्ठ ज्ञानी, संसार से वैराग्य रखने वाला या योगी होता है। साधुओंकी सेवा करने वाला होता है। गुरु पीड़ित या अशुभ हो तो जातक विवेकशून्य,आलसी, परजीवी तथा लालची होता है। विशेषकर तब जब गुरु नीच का हो,युतिदोष में हो तो जातक को पीड़ा देता है।
    वृश्चिक या कन्या राशि का हो तो अशुभ फल बढ़ जाते हैं। केन्द्राधिपति दोष या
    लाल किताब के अनुसार बारहवें गुरु वाला जातक शत्रुओं से घिरा रहकर भी
    अपराजित रहता है। जातक की अध्यात्म विद्या में विशेष रुचि होती है। बुद्धि, बल,
    चतुराई तथा विनम्रता के बल पर शत्रु से भी लाभ प्रास् करता है। धर्म गुरुओं,
    वेदपाठियों तथा लोकोपकारों के लिए बारहवां गुरु शुभ रहता है।
    शास्त्रकारों ने बारहवें गुरु को अच्छा नहीं माना है। उनके अनुसार ऐसे
    जातक को अपयश तथा धन हानि होती है। प्रायः वह ठग बुद्धिवाला होता है औरभाग्य उसका साथ नहीं देता। जैसा कि कहा है-
    यशः कीदूशं सद्धयय साभिमाने मतिः कीदृशी वर्चं नायेत्परेषाम्।
    विधिः कीदृशोर्यस्यत्राशो हियेन त्रयस्तेनवे पुर्ण्यजेयस्य जीवः॥
    अर्थात् गुरु बारहवें भाव में हो तो धनादि अच्छी प्रकार व्यय करने पर यश
    कैसे हो? (अर्थात् अपयश प्राप्त होता है भली प्रकार धन व्यंय करने पर भी)।
    उसकी बुद्धि औरों को ठगने वाली तथा ऐसा काम करने वाली हो जिससे व्यर्थधन
    की हानि हो जाए। इस लोक व परलोक में कहीं काम न आए। यश; मति औरविधि तीनों ही उसके विरुद्ध रहते हैं।
    विशेष-गुरु क्योंकि बुद्धि व ज्ञान के साथ भाग्य व धर्म का भी कारक है।जबकि बारहवां भाव व्यय/हानि का घर है। अतः गुरु का बारहवें घर में होनाउपयुक्त मामलों में कमी दर्शाता है। किन्तु कालपुरुष के हिसाब से बारहवें घर मेंमीन राशि पड़ती है। मीन राशि का स्वामी गुरु होता है। स्वामी अपने भाव में हो तोभाव का बल बढ़ाता है। दूसरे गुरु जहां बैठता है, वहां के प्रभाव को कम करता है।जहां देखता है, वहां के प्रभाव बढ़ाता है। बारहवां गुरु 4, 6, 8 भावों को पूर्ण दृष्टिसे देखता है। अतः सुख, शत्रु एवं आयु/गुत्त रहस्यों के सम्बन्ध में जातक कोलाभान्वित कराता है। इस विवेचन के आधार पर तथा विद्वानों के प्रैक्टिकलअनुभव के आधार पर शास्त्रकार का उपरोक्त मत सत्य तो सिद्ध होता है। परन्तु गुरुके अशुभ, दूषित या पाप प्रभाव में होने पर ही। अन्यथा फलों में विपरीतता आतीहै। गुरु शुभ स्थिति में हो तो ऊपर कहे प्रभाव जातक में देखने में नहीं आते।इसलिए पाठक शास्त्र के मत को पढ़कर भ्रमित न हों।
    अतिविशेष-बारहवें भाव में गुरु हो तो जातक कामशीतल या SEX मेंकम रुचि लेने वाला हो सकता है। अन्यथा कम से कम उसके शयन कक्ष मेंदेवालय अवश्य रहता है या शयनकक्ष में भगवान के चित्रादि अवश्य टंगे रहते हैं,क्योंकि गुरु महात्मा है। शुक्र विरोधी है (शुक्र काम/SEX का कारक है) तथाबारहवां घर शयन सुख/प्राण सम्बन्धों का भी कारक है। ऐसा भी प्रायः प्रैक्टिकलअनुभव में आया है।
द्वादश भावः प्रायः सभी दैवज्ञ व पूर्वाचार्य बृहस्पति के शुभ फल बतातेहैं, भले ही किसी भी भाव में हो। लेकिन देखने में आया है कि द्वादश भाव काबृहस्पति अशुभ फल ही देता है। जैसे श्री रामचंद्र के लग्न में बृहस्पति था।उन्हें वनवास और पत्नी वियोग सहन करना पड़ा। राजा बलि के तीसरे, राजाहरिश्चंद्र के चौथे, महारानी द्रौपदी के छठे, रावण के आठवें, कुरुराज दुर्योधनके दसवें, राजा पाण्डु के बारहवें, भीष्म पितामह के दूसरे, महाराजा दशरथ केपांचवें भाव में बृहस्पति था, राजा अज के सातवें तथा महर्षि विश्वामित्र केनवम तथा राजा नल के लाभ भाव में बृहस्पति था। उन सबके परिणाम भीसभी जानते हैं। व्यय भावस्थ बृहस्पति विजय प्रदाता है तो शत्रु की अभिवृद्धिकरने वाला भी है। आयु का मध्य और उत्तरार्ध भाग सुखमय व्यतीत होता है।वैद्य, धर्मगुरु, प्रवचनकर्ता, गूढ़शास्त्रों के जानकार, लोक सेवक आदि के लिएव्यय स्थानगत बृहस्पति शुभ फल देता है। अशुभ संबंध में आया बृहस्पतिव्यक्ति को निर्लज्ज और चरित्रहीन बनाता है, ग्रंथि व्रण से भी पीड़ित करताहै।
    राशिगत फल

    1. मेष-मेष राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक कुसंगति, अल्पायु,अभिमानी, अविवेकी एवं चंचल रहता है, स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। बचपनमें उसे सर्प तथा विषभय रहता है। आत्मघात करने की प्रवृत्ति रहती है। शरीरमें कोई-न-कोई विकार रहता है। विष या अभक्ष्य भक्षण करने से उसकी मृत्युहोती है। मृत्यु के बाद दुर्गति होती है। जातक स्वार्जित धन से जीवन चलाता है।

2. वृषभ-वृषभ राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक के शत्रु बहुतरहते हैं, बुद्धि षड्यंत्री होती है, जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है, मां का सुखकम प्राप्त होता है। वह शासकीय सेवा में नौकरी या स्वतंत्र व्यवसाय करकेजीवनयापन करता है। मां के सुख में न्यूनता रहती है, पत्नी असभ्य, लोभी, चंचल,खर्चीली एवं कलंकित चरित्र की मिलती है।

    3. मिथुन-मिथुन राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक दिखने मेंअच्छा लेकिन रोगी रहता है, शत्रु अधिक रहते हैं। मामा एवं ज्येष्ठ भ्राता केसुख में न्यूनता रहती है। जातक कामातुर, परस्त्रीगामी, धैर्यवान, पराक्रमी एवंसुखी रहता है।

    4. कर्क-कर्क राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक देश-विदेश मेंभटकनेवाला, नशीली वस्तुओं का सेवन करनेवाला, स्वास्थ्य मध्यम, बपचनमें विष, सर्प एवं पानी का भय रहता है। जातक प्रायः संतानहीन रहता है,यदि संतान हो भी तो वह आज्ञाकारी नहीं होती। मृत्यु के बाद शरीर की दुर्गतिहोती है।

    5. सिंहसिंह राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक को पिता केसुख एवं पैतृक संपत्ति के उपभोग से वंचित रहना पड़ता है। जातक दीर्घायुरहता है। उसकी पत्नी, भ्रष्ट बुद्धि की, झगड़ालू, आज्ञा में न रहनेवाली एवंदुश्चरित्रा रहती है। जातक का श्वसुर संभवतः चोर रहता है।

    6. कन्या-कन्या राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक भ्रमणप्रिय एवंउद्यमी रहता है, स्वास्थ्य मध्यम एवं बचपन में रोगग्रस्त होता है। जातक केशत्रु बहुत होते हैं। अत्यंत कामातुर होने की वजह से वह परस्त्रीगामी रहताहै। सहोदरों से मतभिन्नता रहती है। सेवाकाल में मृत्यु होती है।

    7. तुला-तुला राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक उद्यमी, स्वाभिमानी,आडंबरप्रिय, तांत्रिक, पाखंडी, शासन से प्रतिष्ठित, युद्धकुशल होता है। संतानसुख में बाधा रहती है। ज्येष्ठ पुत्र के सुख में न्यूनता रहती है।

    8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातकमधुरभाषी, वाक्चतुर, आर्थिक दृष्टि से सुखी, गर्ममिजाज एवं परस्त्रीगामी होता     है एवं शिल्पकला का ज्ञाता रहता है। वैसे पैतृक संपत्ति का पूर्ण सुख उसेनहीं मिलता किंतु वसीयत से दूसरों की संपत्ति मिलना संभव रहता है।

    9. धनु-धनु राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक उद्यमी, पराक्रमी,भ्रमणशील रहता है। बचपन में कष्ट सहने पड़ते हैं। चोरी, दुराचार जैसे अवगुणजातक में निहित रहते हैं। रिश्तेदारों एवं मां से मतभिन्नता रहती है। संतान सुखमें बाधा रहती है। वह आर्थिक दृष्टि से संपन्न एवं समाज में गौरव प्राप्त करताहै। नौकरी में मृत्यु होती है।

    10. मकर-मकर राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक उद्यमी, पुरुषार्थी,कामातुर, परस्त्रीगामी, अनेक स्त्रियों के संपर्क में रहनेवाला होता है। उसकीआर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती एवं पुत्र सुख में कमी रहती है।

    11. कुंभ कुंभ राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तो जातक शिल्पकला मेंनिपुण होता है। जुआ, चोरी, दुराचार की ओर उसकी प्रवृत्ति रहती है। उसेवसीयत में जायदाद मिलती है, जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है।

    12. मीन मीन राशि का गुरु व्यय स्थान में हो तोजातक गांव में हनेवाला,माता एवं संतान सुख से वंचित, कलंकित चरित्र का होता है। मां एवं बड़ेभ्राता से उसकी बनती नहीं।

 1. चंदन या केसर का टीका लगावें।
 2. बेसन की मिठाई पर ढक्कर ढककर दान करें।
जन्पराशि में: जन्मराशि से बृहस्पति का गोचर भ्रमण जब होता है तबआय कम और व्यय अधिक होता है। वादविवाद, पदावनति, स्थान परिवर्तन,आय के साधनों में न्यूनता आना, बुद्धि-विवेक का काम न आना जैसे फलजातक को प्राप्त होते हैं।
    जन्मराशि से दूसराः दूसरे स्थान में जब बृहस्पति का गोचर भ्रमण होताहै तब लाभ होता है। आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। आमोद-प्रमोद,भोग-विलास, पारिवारिक सुख-शांति प्राप्त होने के साथ ही सभी प्रकार केशुभ फल मिलते हैं।
    जन्मराशि से तीसराः जब बृहस्पति तीसरी राशि में आता है तब स्थानकार्यनाश, स्थानान्तरण, पदावनति, नौकरी से अलग होना या आय का कोईसाधन हाथ से निकल जाना, व्यय में वृद्धि, शारीरिक अस्वस्थता, विष्न-बाधाएंउपस्थित होना जैसे अशुभ फल भोगने पड़ते हैं।
    जन्मराशि से चौथाः जब बृहस्पति चौथी राशि में आता है तब धन व्यय, हानि,मित्र एवं परिवार के सदस्यों के कारण अशांति का अनुभव होता है।
    जन्मराशि से पांचवां: जब बृहस्पति पांचवीं राशि में आता है तब सुख-शाति,पारिवारिक सुख, आनंद विलास प्राप्त होता है। व्यापार में प्रगति, आर्थिकस्थिति में सुधार, मित्रों का सुख, दान-धर्म का काम होता है तथा संतति सेसहयोग, मित्रों का सुख प्राप्त होता है।
    जन्मराशि से छठाः जब बृहस्पति छठी राशि में आता है तब शारीरिकअस्वस्थता, शत्रुवृद्धि एवं अशांति प्राप्त होती है।
    जन्मराशि से सातवां: जब बृहस्पति सातवीं राशि में आता है तब व्यापारमें उन्नति, आर्थिक स्थिति में सुधार, शत्रु वर्ग से सहयोग, वैवाहिक जीवन मेंसुख, पारिवारिक सुख प्राप्त होता है।
    जन्मराशि से आठवां: जब बृहस्पति आठवीं राशि में आता है तब जातकपरिस्थिति के बंधनों में जकड़ा जाता है। रोगों का प्रादुर्भाव, यात्रा में कष्ट,शारीरिक अस्वस्थता, एकाध बुरी घटना के कारण संताप, आकस्मिक खर्च,व्यापार उद्योग में घाटा जैसी घटनाएं घटती हैं।
    जन्मराशि से नौवां: जब बृहस्पति नौवीं राशि में आता है, तब रुके कामबनते हैं। सामाजिक कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। प्रतिष्ठा वृद्धि, संतति सेआनंद एवं सुख, आर्थिक स्थिति में सुधार, आध्यात्मिक प्रगति, बुद्धि-विवेकका सदुपयोग होता है।
    जन्मराशि से दसवा: जब बृहस्पति दसवीं राशि में आता है तब मित्रों सेअलगाव, बिना कारण मतभेद, खर्च में बढ़ोत्तरी, कार्य में असफलता, नौकरीमें व्यवधान, आय के साधनों में न्यूनता आती है।
    जन्मराशि से ग्यारहवां: बृहस्पति जब ग्यारहवीं राशि में हो तो नवीन कार्यतथा स्थान की प्राप्ति, आर्थिक स्थिति में सुधार, यश-मान में वृद्धि तथाव्यवसाय में प्रगति होती है।
    जन्मराशि से बारहवां: जब बृहस्पति बारहवीं राशि में आता है तब खर्चमें बढ़ोत्तरी, अपयश, घाटा, शारोरिक अस्वस्थता, किसी अशुभ घटना केकारण मन:स्ताप होता है।

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•••बृहस्पति ग्रह••••

√•ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को देवताओं का पुरोहित कहा गया है ...

"बृहस्पतिर्वै देवानां पुरोहितः।"
   ( ऐतरेय ब्राहाण ८ /२२)

 दिव्य सम्पत्तियों का स्वामी देवता होता है। देवी सम्पदा वाले पुरुष का वर्णन वेदव्यास ने गीता में इस प्रकार किया है...

"अभयं सत्व संशुद्धि:, ज्ञान योगव्यवस्थितिः। 
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ 
अहिंसा सत्यमक्रोधः त्यागः शांतिरपैशुनम् । 
दया भूतेष्वलोलुपत्वं, मार्दवं हीरचापलम् ॥
 तेजः क्षमा धृतिः शौचं अद्रोहोनातिमानिता। 
भवंति सम्पदं दैवी, अभिजातस्य भारत ॥"
     ( गीता १६ । १,२,३)

√•ऊपर के श्लोकों में बताये गये २७ गुणों का कारक बृहस्पति है। ये गुण दैवी सम्पत्ति के द्योतक है, बृहस्पति देव पुरोहित है। इस लिये ये गुण बृहस्पति में है। अभयता, सात्विकता, अन्तः करण की शुद्धता, ज्ञानयोग में सुदृढस्थिति, दानशीलता, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, चित्त की सरलता, अहिंसा, सत्यता, अक्रोध, त्याग, शांतिमयता, अपिशुनता, दयालुता, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, बुद्धिकी स्थिरता, तेजस्विता, क्षमाशीलता, धैर्य, पवित्रता, अद्रोह, अनभिमानता-ये २७ गुण बड़प्पन देने वाले हैं, गौरव देने वाले हैं। इन गुणों का स्वामी बड़प्पन युक्त (बृहस्पति) होता है, गौरव युक्त (गुरु) होता है। कुण्डली में गुरुप्रह की स्थितिवश इन गुणों के न्यूनाधिक्य की कहा की जाती है।

 √•बृहस्पतिः = बृहतः पतिः षष्ठी तत्पुरुष इसका अर्थ हुआ-बड़ों का स्वामी/ पति वा बड़ा से भी बड़ा अर्थात् सबसे बड़ा । इसका सामान्य अर्थ हुआ- परमेश्वर ।

 √•बृहत् = बृह + अति विस्तृत,। विशाल, बड़ा, स्थूल, प्रशस्त, पूर्ण, प्रचुर यथेष्ठ, वेद, ब्रह्म, ब्राह्मण ब्रह्मण्य । बृहतः वाचः पतिः/ बृहती वाक् तस्याः पतिः बृहस्पतिः ।

√•बृहस्पति का मोटा मोटा अर्थ है- मात्रा में सबसे अधिक, भार में सबसे भारी, आकार में सबसे बड़ा, गुणों में सबसे श्रेष्ठ, शक्ति में सबसे ज्यादा। सौरमण्डल के ग्रहो में सबसे भारी होने से इसे गुरु कहते हैं। सबसे बड़ा आकार होने से बृहस्पति करते हैं।

√•बृहस्पति के पर्यायवाची जीव, गुरु, गिरस, देवगुरु, प्रशांत, ईज्या, विदिवेश, वैद्य मंत्री, वाचस्पति, ब्राह्मणस्पति सुराचार्य, देवेन्य, सुरगुरु, पुरोहित धियस्पति । 

वेद में बृहस्पति से संबंधित अनेक ऋचाएँ है।...

 "भसदासीदादिल्याना श्रोणी आस्ता बृहस्पतेः।"
      (अर्थव ९।४।१३)

 [ बृहस्पति आणि प्रदेश का कारक है।]

"तस्यौदनस्य बृहस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम्।"
      (अथर्व ११।३।१)

 (बृहस्पति शिर (मस्तिष्क) का कारक है।] है।

 "बृहस्पतिः ककुद् बृहती कीकसाः।"
        (अथर्व ९।७।५ )

√•अथर्व वेद के काण्ड ९ सूक्त ७ मंत्र ५ में बृहस्पति को गाय का ककुद (डिल) कहा गया है। वस्तुतः ककुद कहते हैं, तालु को। तालु का अर्थ है- वाणी का उत्स वा काण्ठ/ उच्चारण प्रदेश । निरुक्त में कहा गया है-

 "काकुदं तात्वित्याचक्षते जिह्वा कोकुवा सास्मिन् धीयते । "
    (५। ४। २७ पद सं. ७६)। 

√•इससे सिद्ध होता है, बृहस्पति उच्चारण अवयवों का कारक है। कुण्डली में बृहस्पति की स्थिति से उच्चारणसंस्थान के शुभाशुभ की ऊहा की जाती है। उच्चारण से संबंधित एक मंत्र है...

 "सुदेवो असि वरुन यस्य ते सप्तसिन्धवः।
 अनु क्षरन्ति काकुदं सूयं सुषिरामिव ॥"
      (ऋग्वेद ८ । ६९ । १२)

√•स्वादेन्द्रिय जिला के मूल में मुख विवर के भीतर कण्ठ देशस्य लटकती हुई एक लघुजिह्वा (अंग विशेष) होती है। इसे काकुद कहते हैं। इसी से सप्तवर्गीय व्यञ्जन क्षरित होते हैं। कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग-ये सप्तवर्गीय व्यंजन हैं। मूलस्वर 'अ' इनमें अनुस्यूत है। स्यन्दनशील होने से ये सिन्धु (स्यन्द् भ्वा आ. स्यन्दते + उद् सम्प्रसारणं दस्य धः) हैं। इनकी संख्या सात है। अतः सप्तसिन्धवः हैं। सबके द्वारा वर्य होने से बृहस्पति ही वरुण है। वर्ण प्रवाह सुतरंगित होने से सूर्म्य हैं। इनका अधिष्ठाता वरुण (बृहस्पति) है। इसे ही वाचस्पति कहते हैं।

 √•ककुस्थ वंश में जन्म लेने से राम को काकुस्थ कहा गया है। एक पौराणिक कथा है-इन्द्र बैल बने । इस बैल के ककुद पर राजा पुरञ्जय बैठ कर राक्षसों को पराजित कर इन्द्रादि देवताओं की सहायता किये । इन्द्र के पुरोहित हैं बृहस्पति। इस प्रकार इन्द्र = ककुद् । बृहस्पति= काकुद ।सूर्यवंशी पुरञ्जय= ककुस्थ ।भगवान् राम = काकुस्थ। यह सौर व्याकरण का विषय है। कलयुग में यह लुप्तप्राय है। बृहस्पति इस व्याकरण का कारक है। इसलिये वह वाचस्पति है। बृहस्पति इन्द्र का पुरोहित है। पौरोहित्यकर्म ब्राह्मण का है। इसलिये बृहस्पति को ब्राह्मणस्पति समझा जाय। पुराणों में बृहस्पति को अंगिरा अषि का पुत्र बताया गया है। इसलियेये आगङ्गिरस कहे जाते हैं। इस संबंध में एक उपनिषद् वाक्य इस प्रकार है...

 "सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा  
अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसः

तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति
 तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा अद्गानां रसः।।" 
  (बृहदारण्यक उपनिषद् १।३।१९)

√•【वह प्राण अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि वह अंगों का रस (सार) है। प्राण ही अंगों का रस है, निश्चय प्राण ही अंगों का रस है, क्योंकि जिस किसी अंग से प्राण उत्क्रमण कर जाता है, वह उसी जगह सूख जाता है अतः यही अंगों का रस है ।】

 √•इस श्रुतिवचन से निष्कर्ष यह निकला कि बृहस्पति ही प्राण है। अंगों में लकवा मार जाना बृहस्पति के दोष से होता है। अंगों का पुष्ट एवं क्रियाशील रहना बृहस्पति की अदोषता का फल है।

 √•इस प्रकार बृहस्पति = प्राण प्राण सब का पालन पोषण करता है; अतएव बृहस्पति पालक पोषक हुआ। शास्त्र प्रमाण इस प्रकार है ...

"बृहस्पतिः बृहतः पाता वा पालयिता वा ।"
       (निरुक्त १०।१।१२)

 √•पालयिता/ पाता, पिता होता है। अतः बृहस्पति = पिता। पिता ही पुत्र रूप में पत्नी के गर्भ से जन्म लेता है। अतएव, बृहस्पति =पुत्र । 

 √•आगे के मन्त्र में बृहस्पति का अर्थ दर्शाया गया है...

 “एष एव उ बृहस्पतिः ।
 वाग्वै बृहती तस्या एष पतिः ।
 तस्माद् उ बृहस्पतिः । ” 
  (बृहदारण्यक १।३।२०)

√•यह (प्राण) ही बृहस्पति है। वाक् हो बृहती है। उस (वाक्) का (यह = प्राण) पति है। इस लिये यह बृहस्पति है। 

√•इस मंत्र से स्पष्ट है, वाक् का पति प्राण है। इस लिये प्राण बृहस्पति/ वाचस्पति है। प्राण ब्रह्म है। इसलिये वह ब्रह्मणस्पति है। 

√•उपनिषद् का यह वाक्य बृहस्पति की गुरुता, ब्रह्मण्यता का उद्बोधन करता है तथा उसके कारकत्व की ओर संकेत भी करता है। 

√•अङ्ग भ्वादि. परस्मै. गमनार्थक गत्यर्थक है।
 अङ्गति । अङ्ग + अच् अंग अंग + इरट् = अंगिरः। 

√•जो गति युक्त है, वह अंग है। गमनशीलता जिसका स्वभाव है, वह अंगिरः है। प्राण में स्वभावतः गति होती है। इसलिये प्राणः =अंगिरः।

 √•किन्तु प्राण एक नहीं पाँच वा दश हैं। इसलिये प्राणः = अंगिराः । इस प्रकार अंगिरा बहुवचन हुआ। बहुवचन हो कर भी यह एक वचन है। जैसे विश्वेदेवा (सभी देवताओं का एकीकृत समूह)। अतः, अंगिरा = पञ्च प्राणों का एकीकृत समुच्चयन। प्राण से प्राण ही पैदा होता है। अंगिरा का अपत्य आंगिरस भी प्राण का अर्थ वहन करता है।

 √•अंगिरा के पौत्र तथा बृहस्पति के पुत्र का नाम कच है ...

"ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं, साक्षाद् बृहस्पतेः पुत्रम्।
 नाम्ना कचमिति ख्यातं शिष्यं गृहणातु मां भवान् ॥"
(महाभरत, आदि पर्वणि सम्भवपर्व, अध्याय ७६ श्लोक १९ । )

√•कच कहते हैं, केश (सिर के बाल) को। कच, बृहस्पति से जन्मा है। कच (केश) सिर से निकलता । अतः बृहस्पति ही सिर (मूर्धा) है। कच = मूर्धज ।बृहस्पति = मूर्धा। मूर्धा=लग्न भाव। इस से निष्कर्ष निकला बृहस्पति लग्न का कारक है। इस प्रकार बृहस्पति त्रिकोण (१, ५, ९) तथा द्वितीय (वाक्, विद्या, धन) का कारक हुआ। 
लग्न =सिर, चिन्तुन, विचार। पंचम प्रज्ञा, पुत्र, बुद्धि । नवम = धर्म, पिता, = ज्ञान।

 √•बृहस्पति, मन्त्रणा देने वाला, परामर्शदाता, हितकारक मार्ग पर ले जाने वाला उपदेशक मंत्री पुरोहित है। जो बृहस्पति का आदर सम्मान नहीं करता, बृहस्पति उसको त्याग देता है। फलतः उसका पराभव होता है। बृहस्पति है विवेकयुक्त बुद्धि, हितकारी वाक्य, सात्विक ज्ञान, निर्मलमति, निस्वार्थमन्त्रणा, शुभोपदेशन, दिव्य वैभव । बृहस्पति का अपमान इन सब का अभाव है। श्रीमद भागवत में एक कथा है-देवराज इन्द्र अपनी पत्नी शची के साथ देवसभा में बैठे थे। देवगुरु बृहस्पति के आगमन पर वे मद वश अपने आसन सेहिले डुले तक नहीं, न खड़े हुए, न अभिवादन ही किये। त्रिकालदर्शी बृहस्पति ने देखा कि यह ऐश्वर्यमद का दोष है। वे वहाँ से निकल का तुरन्त अपने घर चले गये । 

"ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरसः प्रभुः । आययौ स्वगृहं तूष्णी विद्वान् श्रीमदविक्रियाम्॥"
       ( भागवत ६ । ७ । ९)

√•बृहस्पति ने अपने को योगबल से अदृश्यकर लिया 

"बृहस्पतिर्गतोऽदृष्टां गतिमध्यात्ममायया।"
      (भागवत ६।७।१६ )

√•अनन्तर इन्द्र सत्ताच्युत हुए। गुरु के अपमान से सत्परापर्श नहीं मिलता। इसके अभाव में पतन निश्चित है। यही इस कथा का सार है। 

√•सद्विचार, सद्वचन, सयंत्रणा, सद्धर्म का कारक गुरु निर्बल होने पर जातक को इनसे क्षीण कर देता है। बृहस्पति की आकाश स्थिति के विषय में व्यास जी कहते हैं ...

"तत उपरिष्टाद् द्विलक्षयोजनान्तर गतो भगवान् 
बृहस्पतिरेकैकस्मिन् राशौ परिवत्सरं परिवत्सरं
 चरति यदि न वक्रः स्यात् प्रायेणानकूलो ब्राह्मण कुलस्य । " 
   (श्रीमद् भागवत ५।२३।१४)

√• [इस (भौम) के ऊपर दो लाख योजन की दूरी पर भगवान् बृहस्पति जी है। ये यदि वक्र गति से न चलें तो एक-एक राशि को एक-एक वर्ष मे भोगते हैं। ये प्रायः ब्राह्मण कुल के लिये अनुकूल (शुभ) रहते हैं।]

 √•आज बृहस्पति के गुण-धर्मों के निरूपण में मैं अपनी बुद्धि लगा रहा हूँ।

√•गुरु के गुण धर्म...

शुभ। ज्ञानसुख । पुरुष । ब्राह्मणवर्ण। वृत्ताकार मृदु स्वभाव। विद्वद्समाज । मासावधि मंत्री पुरोहित। युवा ३० वर्ष पीतगौर वर्ण दीर्घ स्थूल व्याकरण शास्त्र आकाश तत्व । सत्वगुण । जीवकारक। मधुर रस मोटा वस्त्र। प्रातः काल बली द्विपद, सुवर्ण ईशान दिशा। ब्रह्मा देवता । मेद कारक । कोषागार । हेमन्त अतु। सत। सम दृष्टि । कफ प्रकृति । पुष्ट स्थविर पीत केश नेत्र वृद्धावस्था । विवेकयुक्त बुद्धि । प्रज्ञावान्। ग्राम चर। पाण्डित्य स्थिर स्वभाव। फलदार वृक्ष कमर से जाँघ तक प्रभावकारी। श्रवणेन्द्रिय। उदररोग सर्वदोष हारक। शुभ कर्मक। चन्द्र का बल बढ़ाता है। राशि के मध्य में फलीभूत। दूसरी राशि में जाने से २ मास पूर्व प्रभावकारी दशाफल मध्य में। भाग्योदय वर्ष १६ । दक्षिणांग शुभकर्मज चिह्न।

√•एक पाद दष्टि-३, १० । 

√•द्विपाद दृष्टि -० ।

√•त्रिपद दृष्टि- ४,८।
 
√•सम्पूर्ण दृष्टि - ५, ७, ९ ।

√•हर्ष स्थान- ११ ।

√•कारक भाव- २, ५, ९, १०, ११ ।

√•बलवत्तम भाव- प्रथम । 

√•मित्र ग्रह -सूर्य, चन्द्रमा, मंगल ।

√•सम ग्रह-शनि राहु । 

√•शत्रु ग्रह-बुध शुक्र । 

√•उच्च राशि एवं परमोच्चांश -कर्क ५° ।

√•नीच राशि एवं परम नीचांश- मकर ५°।

 √•मूल त्रिकोण राशि एवं अंश -धनु १३°।

√•स्वगृह राशि -धनु, मीन। 

√•अस्त राशि -कन्या, मिथुन ।

√•राशि चक्र परिभ्रमण वर्ष ११.९ । 

√•मध्यम राशि भ्रमण काल १३ मास ।

√•नक्षत्र चार दिन- १७३ । 

√•नक्षत्र पाद चार दिन- ४३ । 

√•मध्य दैनिक गति-४'५९"।

√•शीघ्र गति- १२' २२" । 

√•परम शीघ्र गति - १४'४ "। 

√•दीप्तांश-९। 

√•कालांश- ११ ।

√•गोचर से निन्द्य- ४, ८, १२ । 

√•गोचर से पूज्य- १, ३, ६, १० ॥

√•गोचर से शुद्ध २, ५, ७, ९, ११ ।

√•बुद्धि का कारक बुध है, गुरु भी है किन्तु दोनों के कारकत्व में विशिष्टता है। बुध की बुद्धि में विस्तार है, गहराई नहीं है। गुरु की बुद्धि में विस्तार के साथ गहराई भी है। बुध में विवेक नहीं, गुरु में विवेक है। बुध की बुद्धि लौकिक है, गुरु की अलौकिक बुध की बुद्धि में चाञ्चल्य है, गुरु में गाम्भीर्य ।

 √•गुरु, ज्येष्ठ भ्राता, पुत्र एवं पति की प्राप्ति कराता है- बृहस्पति। श्रेष्ठ वाहन वस्त्र एवं कोष की प्राप्ति भी इसी मह से होती है। पितामह और पौत्र का विचार भी इसी से होता है। देह की मांसलता, पुष्टता एवं स्थूलता का यह मापक है सत्यनिष्ठ दानशीलता, आचार्यत्व, अध्यापकत्व, साधुसंग, सुख संपत्ति वैभव संतति, गुरुता (सयानापन), यज्ञमार्ग का यह कारक है।

 √•बृहस्पति सुखपूर्वक मृत्यु देता है। गुल्म (आंत्ररोग) आंत्रज्वर, आंत्रस्खलन, कर्णरोग, कफाधिक्य, श्रम, संज्ञाशून्यता एवं गुरुजनों के प्रति किये अपराध के कारण पीडा भी इसी ग्रह से होती है।

  ••••राश्यनुसार गुरु का फल •••

√•१. मेष में-अति उदार, उत्तम बुद्धि, तेजस्वी प्रख्यात सैनिक।

 √•२. वृष में- धनी, वाहनयुक्त, विद्वान्, सुमुखी, श्रेष्ठ। 

√•३. मिथुन में शास्त्रज्ञ, गणितज्ञ, वक्ता, लेखक । 

√•४. कर्क में ऐश्वर्यवान्, कलावन्त, कामान्वित । 

√•५. सिंह में प्रभुता सम्पन्न सेनानी स्वाभिमानी एकान्तप्रियः । 

√•६. कन्या में सांसारिक बुद्धि, व्यवहार कुशल, सौम्य ।

√• ७. तुला में सगुणों का पुतला, प्रचुर स्त्रीसुख । 

√•८. वृश्चिक में शत्रुनाशक, परिश्रमी, आयुष्मान् ।

 √•९. धनु में बलवान् धर्मात्मा श्रेष्ठ विचार मुखी।

 √•१०. मकर में भ्रष्ट बुद्धि, निम्न संग, कठोर, दुःखी, अल्पधनी ।

√•११. कुम्भ में- उदर पीड़ा, प्रखर बुद्धि, रुक्ष स्वभाव । 

√•१२. मीन में सत्संगी धनी विद्यायुक्त, परोपकारी। 

√••आगे, कश्यप अषि के मत से भावगत गुरु के फल का कथन करता हूँ...

  •••कश्यपोक्त भावस्थ गुरु फलम्•••

 √••१. लग्नस्थ बृहस्पति...
•१. उच्च राशि में, सुन्दर ।
•२. उच्च नवांश में, सुन्दरकर। 
•३. शुभ वर्ग में, सुकूर्च (भृकुटि)। 
•४. नीच राशि में, रोगरहित । 
•५. नीच नवांश में, सुज्ञ । 
•६. पाप वर्ग में, सुन्दर वेशी [ पाखण्डी]।
•७. मित्र राशि में, अच्छा वस्त्रधारी । 
•८. मित्र नवांश में, सुनाभिकटि युक्त । 
•९. वर्गोत्तम में, सुन्दरविस्तृत वक्षस्थल । 
•१०. शत्रु राशि में, उदररोगी। 
•११. शत्रु नवांश में, पाण्डुरोगी। 
•१२. स्व राशि में, सुलिंगी एवं भाग्यवान् । 

√••२. धनस्थ बृहस्पति ...

•१. उच्च राशि में, न्याय से धनार्जन करने वाला। 
•२. उच्च नवांश में, ब्राह्मण व साधु से धन प्राप्त करने वाला ।
•३. शुभ वर्ग में, राजा से धन । 
•४. नीच राशि में, दूसरे की स्त्री से धन । 
•५. नीच नवांश में, अन्त्यज से धन । 
•६. पाप वर्ग में, काष्ठज धन। 
•७. मित्र राशि में वस्त्र वाहनादि से धन । 
•८. मित्र नवांश में, कृषि से धन । 
•९. वर्गोत्तम में, स्वजनों से धन । 
•१०. शत्रु राशि में, शत्रु की सेवा से धन । 
•११. शत्रु नवांश में, दरिद्रता से धन ।
•१२. स्व राशि में कोष से धन प्राप्ति । 

√••३. भ्रातृस्थ बृहस्पति...

•१. उच्च राशि में, अविनम्र । 
•२. उच्च नवांश में, दूषित चित्त ।
•३. शुभ वर्ग में, नृशंस एवं अल्प संतान वाला।
•४. नीच राशि में, दरिद्री । 
•५. नीच नवांश में, द्यूतानुरक्त । 
•६. पाप वर्ग में, बन्धुरहित एवं कृशकाय । 
•७. मित्र राशि में, कंजूस लोभी ।
•८. मित्र नवांश में, द्यूतकार । 
•९. वर्गोत्तम में, नपुंसक । 
•१०. शत्रु राशि में, शिल्पज्ञ । 
•११. शत्रु नवांश में, निकृष्ट । 
•१२. स्व राशि में, पतित । 

√••४. मातृस्थ बृहस्पति ...

•१. उच्च राशि में, नित्य पूर्ण सुखी ।
•२. उच्च नवांश में, आधा सुखी । 
•३. शुभ वर्ग में, धर्म से सुखी । 
•४. नीच राशि में, नीच संगति से सुखी । 
•५. नीच नवांश में, मिश्रभाव से सुखी। 
•६. पाप वर्ग में, चौर वृत्ति से सुखी ।
 •७. मित्र राशि में, अंगज (पुत्र, प्रेम, काम, सौन्दर्य) से सुखी ।
 •८. मित्र नवांश में, भूत्यज सुख । 
•९. वर्गोत्तम में, भगिनीजात सुख ।
•१०. शत्रु राशि में, नीच सेवा से सुख । 
•११. शत्रु नवांश में, दुष्टों की सेवा से सुख। 
•१२. स्व राशि में, भूपसंगज सुख । 

√••५. पुत्रस्थ वृहस्पति...

•१. उच्च राशि में, बहुवीर्यवान् पुत्र । 
•२. उच्च नवांश अतिभाग्यवान् पुत्र । 
•३. शुभ वर्ग में, ज्ञानी पुत्र । 
•४. नीच राशि में, दुःखी पुत्र । 
•५. नीच नवांश में, पापी पुत्र । 
•६. पाप वर्ग में, सौहार्दगत पुत्र ।
•७. मित्र राशि में, नानाविधधनान्वित पुत्र।
•८. मित्र नवांश में, सुशीलवान् पुत्र ।
•९. वर्गोत्तम में, तेजस्वी पुत्र । 
•१०. शत्रु राशि में, विरागभ्रष्ट पुत्र । 
•११. शत्रु नवांश में, द्यूतप्रेमी पुत्र । 
•१२. स्व राशि में, प्रथमाद्भुत पुत्र । 

√••६. शत्रुस्थ बृहस्पति...
•१. उच्च राशि में, अधिक शत्रुओं वाला ।
•२. उच्च नवांश में, सचिव हीन ।
•३. शुभ वर्ग में, स्त्री के अनुकूल । 
•४. नीच राशि में, अन्य का सैनिक। 
•५. नीच नवांश में, पाननिष्ठ (मद्यप) । 
•६. पाप वर्ग में, गुणहीन ।
•७. मित्र राशि में, प्रसिद्ध । 
•८. मित्र नवांश में, विख्यात । 
•९. वर्गोत्तम में, स्वराढ्य (वाचस्पति)। 
•१०. शत्रु राशि में, मंगलहीन (अशुभ)।
•११. शत्रु नवांश में, अविनीत बन्धुओं वाला। 
•१२. स्व राशि में, बहुपुत्रवान् ।

√••७.कलत्रस्थ बृहस्पति- 

•१. उच्च राशि में, आलोक प्रिय स्त्री ।  
•२. उच्च नवांश में, सौख्ययुत् स्त्री । 
•३. शुभ वर्ग में, सुकुलोत्था स्त्री ।
•४. नीच राशि में, कुवंशजा स्त्री । 
•५. नीच नवांश में, मानिनी स्त्री । 
•६. पाप वर्ग में, पिशुना क्रूरा स्त्री । 
•७. मित्र राशि में, बहुसखीयुक्ता स्त्री । 
•८. मित्र नवांश में, मणिमुक्तायुक्त स्त्री । 
•९. वर्गोत्तम में, शुचिस्वरूपा स्त्री । 
•१०. शत्रु राशि में, चञ्चला स्त्री । 
•११. शत्रु नवांश में, कठोर वाक्या स्त्री । 
•१२. स्व राशि में, अतिगुणा स्त्री ।

√••८. मृत्युस्थ बृहस्पति ...

•१. उच्च राशि में, नाना रोगों से मृत्यु ।
•२. उच्च नवांश में, स्थूल रोगों से मृत्यु । 
•३. शुभ वर्ग में, कर्णरोग से मृत्यु । 
•४. नीच राशि में, स्वजनों से मृत्यु । 
•५. नीच नवांश में, विषूचिका से मृत्यु । 
•६. पाप वर्ग में, अतिसार रोग से मृत्यु । 
•७. मित्र राशि में, अपने सेवक द्वारा मृत्यु।
•८. मित्र नवांश में, रक्तकोप से मृत्यु । 
•९. वर्गोत्तम में, करभ (थप्पड़) से मृत्यु । 
•१०. शत्रु राशि में, केश (सींग) से मृत्यु ।
•११. शत्रु नवांश में, ऊर्ध्वकोप से मृत्यु । 
•१२. स्व राशि में बहुभक्षण से मृत्यु। 

√••९. भाग्यस्थ बृहस्पति...
•१. उच्च राशि में, प्रचरण से भाग्योदय ।
•२. उच्च नवांश में, गुरु सेवा से भाग्यालु। 
•३. शुभ वर्ग में, अद्भुतता से भाग्यवान् । 
•४. नीच राशि में कृतकता (दक्षता) से भाग्य। 
•५. नीच नवांश में, गुरु विरोध से भाग्य।
•६. पाप वर्ग में, तीर्थज (घाट शुल्क) से भाग्य। 
•७. मित्र राशि में, धर्मकृत्यों से भाग्य। 
•८. मित्र नवांश में स्वीमति से भाग्य। 
•९. वर्गोत्तम में, पुत्र के सहयोग से भाग्य।। •१०. शत्रु राशि में, अन्याय से भाग्यलाभ । 
•११. शत्रु नवांश में, गुरुमेषण से भाग्य। 
•१२. स्व राशि में, घृण (प्रकाश, ज्ञान) से भाग्य।

√•• १०. कर्मस्थ बृहस्पति ...

•१. उच्च राशि में, बहुदान कर्मा । 
•२. उच्च नवांश में द्विजाच करने वाला। 
•३. शुभ वर्ग में, द्विजदेवार्चन कर्मा ।
•४. नीच राशि में, होन सेवात्मक काम करने वाला। 
•५. नीच नवांश में, चौर्य कर्मा ।
•६. पाप वर्ग में, धन हीन । 
•७. मित्र राशि में, शुभ कार्य करने वाला। 
•८. मित्र नवांश में, भूपज कर्मा ।
•९. वर्गोत्तम में, गाय भैंस के दूध का काम करने वाला । 
•१०. शत्रु राशि में, कृतघ्न । 
•११. शत्रु नवांश में, परवञ्चक । 
•१२. स्व राशि में, राजप्रिय (राज्याधिकारी)। 

√••११. लाभस्थ बृहस्पति...
•१. उच्च राशि में, राजा से लाभ । 
•२. उच्च नवांश में, राजभृत्य से लाभ। 
•३. शुभ वर्ग में, राज्यशक्ति से लाभ । 
•४. नीच राशि में नीच जनों से लाभ।
•५. नीच नवांश में, मिथ्याचार से लाभ । 
•६. पाप वर्ग में, कष्ट से लाभ ।
•७. मित्र राशि में, दूत कार्य से लाभ ।
•८. मित्र नवांश में, धातुओं से लाभ ।
•९. वर्गोत्तम में, सज्जनों से लाभ।
•१०. शत्रु राशि में, घोर अधर्म से लाभ। 
•११. शत्रु नवांश में, अगुण (व्यर्थता) से लाभ। 
•१२. स्व राशि में, स्वराशि में, शास्त्रों से लाभ। 

√••१२. व्यवस्थ बृहस्पति...
•१. उच्च राशि में, गुरु जनों के लिये व्यय। 
•२. उच्च नवांश में, गुरु भृत्यों के लिये व्यय । 
•३. शुभ वर्ग में, बन्धुओं हेतु व्यय। 
•४. नीच राशि में, व्यसनों द्वारा व्यय ।
•५. नीच नवांश में, दूषित बुद्धि से व्यय । 
•६. पाप वर्ग में, अविचार से व्यय।
•७. मित्र राशि में, मित्रों पर व्यय ।
•८. मित्र नवांश में, स्वजनों पर व्यय । 
•९. वर्गोत्तम में, सत्कार्यों पर व्यय । 
•१०. शत्रु राशि में क्रूर कार्यों में व्यय । 
•११. शत्रु नवांश में, सारहीन कामों में व्यय। 
•१२. स्व राशि में, पुत्रादिकों पर व्यय ।

√•पुष्य नक्षत्र में गुरु के होने से 'गुरु पुष्य' योग होता है। इसका विशेष महत्व है। कर्क राशि के पाँचवें अंश में गुरु उच्चतम (परमोच्च) होता है। यह भाग पुष्य नक्षत्र के प्रथम चरणान्तर्गत पड़ता है। परमोच्चांश पुष्य नक्षत्र में पड़ने से इस नक्षत्र को योग कारक माना गया है।

 √•परमोच्च का गुरु = परम श्रेष्ठ बुद्धि।

 √•परम श्रेष्ठ बुद्धि का अर्थ है- विवेकशीलता विवेक होने पर अशुभ कार्य नहीं होते। इसीलिये पुष्य का गुरु पुष्यकारक है। इसी से पुष्यामृत योग बनता है। पुष्य नक्षत्र का स्वामी शनि है। किन्तु यह कर्क राशि के अन्तर्गत आता है। कर्क, चन्द्रमा की राशि है। चन्द्रमा, मन है। पुष्य में बृहस्पति का होना, मन में बुद्धि का प्रवेश है। इससे मन अमल हो जाता है। श्रेष्ठ बुद्धि वा विवेक के योग से मन भी श्रेष्ठ वा शुद्ध हो जाता है। मन का शुद्ध होना, आनन्द वा मोक्ष है। 

"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।"
   ( मैत्रायणी आरण्यक ६।३४।११)

 √•[ पुष्य नक्षत्र प्रथम चरण ३-६°-४०' तक, 'द्वितीय चरण ३-१०°-०' तक, तृतीय चरण ३-१३°-२०' तक, चतुर्थ चरण ३-१६°-४०']

√• प्रत्येक चरण का मान = ३° २०'।

√•सम्पूर्ण पुष्य नक्षत्र कर्कराशि में आता है। अतः पुष्य ही पूर्ण मन है। 

√•पूर्ण मन + निश्रेयस बुद्धि =आनन्द ।

 √•जिसमें विवेक है, उसमें मार्गदर्शन को क्षमता है। इसलिये वह गुरु है। गुरु की बड़ी महिमा है। राम चरित मानस के प्रारंभ में श्री तुलसी दास जी कहते हैं...

"श्रीगुरुपद नख मणिगण जोती । 
 सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती ॥
 गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। 
 नयन अमिय दूगदोष विभंजन ॥ 
 बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि।
 महामोह तमपुंज, जासु वचन रवि कर निकर ।।" 
          ( बालकाण्ड)

 "बिनु गुरु होइ कि ज्ञान ?
  ज्ञान कि होइ विराग विनु ? 
  गावहि वेद पुरान,
 सुख कि लहिय हरि भगति बिनु ?"

√•गुरु को गोविन्द से बढ़कर कहा गया है। संतवचन है...

"गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागी पाँय ?
 बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय।"

√•गरीमा में गुरुत्व होता है। वह अपनी ओर खींचता। इसलिये वह कृष्ण है। कृष्ण कथित वाक्य सब को अपनी ओर खींचते हैं। अतः गीता गुरु है। वेद का एक एक मंत्र गुरु है। उपनिषद् का एक-एक वाक्य गुरु है। पुराण का एक-एक श्लोक गुरु है। वैयासिक्य संहिता गुरु है। परमात्मा का एक-एक नाम गुरु है। नाम से बढ़ कर तो कुछ है ही नहीं। 

√•गुरु भारी है। उसका भार वहन करने की क्षमता सब में नहीं है। इसीलिये उसका वाहन हाथों है। जब इन्द्र का वाहन हाथी ऐरावत है तो इन्द्र के पुरोहित बृहस्पति का वाहन भला हाथी क्यों न हो ? इसका दीर्घ चतुरस्र मण्डल है। यह ६ अंगुल है। गोत्र अगिरा है। समिधा- पीपल है। दानद्रव्य-पुखराज, सोना, कांसा, चने की दाल, खाँड, पी, पीला वस्त्र, पीला फूल, हल्दी, पुस्तक, अश्व, पीलाफल है। गुरु के अनिष्ट प्रभाव के निवारणार्थ इन द्रव्यों का दान करना चाहिये।

√•धारणीय रत्न- पुष्पराज । गुरु पुष्य योग में धारण करना चाहिये, गुरुवार को ।

 √•जड़ी- केले का मूल, हल्दी / हरिद्रामूल। इसे पहनना वा इसे जल में डाल कर उस जल से स्नान करना चाहिये । 

√•गुरु मारकेश होने पर अपनी दशान्तर्दशा में बहुत कष्ट देता है। मिथुन, कन्या, वृश्चिक, कुम्भ लग्नों मारकेश (द्वितीयेश वा सप्तमेश) होता है। इस अवस्था में यथा समय गुरु शान्त्यर्थ जप यज्ञ हवन में गुरु दान स्नान का विधान है।

√•विंशोंत्तरी मान से गुरु की महादशा १६ वर्ष की होती है।

 √•बलवान् गुरु अपनी दशा में देता है, स्त्री को पति की प्राप्ति कराता है। कुटुंब में धन की वृद्धि होती है। इसके विपरीत, निर्बल गुरु, पुत्र कष्ट देता है, पति सुख से वञ्चित करता है, धन का अभाव लाता है। हरिवंश पुराण सुनने से पुत्र की लब्धि पुत्र संतति होती है। विष्णु की आराधना से पति सुख प्राप्त होता है। शिवार्चन से धनधान्य का विस्तार होता है।

 √•संसार में जितने चराचर जीव हैं, सब के गुरु एक मात्र प्रभु नारायण हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण में गजेन्द्रमोक्ष प्रकरण के अन्तर्गत् व्यास जी कहते हैं..

 "नारायणाखिल गुरो भगवन्नमस्ते ।"
      ( भागवत ८।४।३२ )

√•व्यापकता के सूत्र की दीक्षा देने वाले गुरुता सम्पन्न श्री पंडित जी के चरणों में मैं पुनः  प्रणाम करता हूँ ।
गुरु के दान की सामग्री  अंक 3 

3gm सोने की गिन्नी, पित्तल के 11 बर्तन 3अलग ,8अलग धार्मिक, पुखराज, पुस्तकें, केसर, हल्दी, पीताम्बर, चने की दाल, पीले मूंग, पीले पुष्प, पीला वस्त्र, शक्कर, घोड़ा (लकड़ी या खिलौना घोड़ा), चने की दाल, हल्दी, ताजे फल, पके केले  नमक, स्वर्णपत्र, कांस्य, पीतल, कपास, पीला गुड़, पीली गेंद, बेसन की सेवे, बेसन के नमकीन, बेसन के बने व्यंजन, मक्की, अध्यन सामग्री, अध्यन के लिए स्टेशनरी का सामान, किताब, कॉपी कलम, कागज़, ग्रन्थ, भगवा वस्त्र

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