कुण्डली के निर्णायक 300 योग

 कुण्डली के निर्णायक 300 योग 


1)भास्कर योग

भास्कर योग सू्र्य के अनेक नामों में भास्कर भी एक है.यह योग कुण्डली तब बनता है जबकि बुध सूर्य से द्वतीय भाव में होता है एवं बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और इससे पंचम अथवा नवम में गुरू होता है.ग्रहों का यह योग अति दुर्लभ होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह महान योग बनता है वह व्यक्ति भी महान बन जाता है.इस योग के प्रभाव से धन वैभव से घर भरा होता है.भमि, भवन एवं वाहन का सुख प्राप्त होता है.इनमें कला के प्रति लगाव एवं अन्य लोगों के प्रति स्नेह होता है.

2)संतान प्रतिबंधक योग

संतान प्रतिबंधक योग 1- तृतीय भाव का अधिपति और चंद्रमा केंद्र या त्रिकोण भावों में स्थित हो तो जरक को संतान सुख में बाधा होती है ! 2- लग्न में मांगल, आठवें शनि और पंचम भाव में शनि हो तो भी जातक को संतान सुख में बाधा होती है ! 3- बुध और लग्न भाव का अधिपति ये दोनों लग्न के अलावा केंद्र स्थानों में हो तो भी संतान सुख में बाधा होती है ! 4- लग्न, अस्थम एवम बारहवें भाव में पापग्रह हो तो संतान सुख में बाधा उत्पन्न होती है ! 5- सप्तम भाव में शुक्र, दशवें भाव में चन्द्रमा, एवं सप्तम भाव में शनि या मंगल हो तो संतान सुख में बाधा होती है ! 6- तीसरे भाव का अधिपति 1/2/3/5 वें भाव में स्थित हो तथा शुभ से युत या द्रस्त हो तो ऐसे जातक को संतान सुख में बाधा होती है !

3)महाराज योग

महाराज योग लग्नेश पंचमेश में तथा पंचमेश लग्न में हो | लग्नेश शुभग्रहो से दृष्ट हो | लग्नेश तथा पंचमेश स्वराशिस्थ हो | इन योगो में जन्म लेनेवाला जातक उच्च शासनधिकारी बनता हे |

4)भाग्योदय योग

भाग्योदय योग सप्तमेश या शुक्र 3, 6, 10, 11वें स्थान पर हों, तो 22वें वर्ष में भाग्योदय होता हो | भाग्येश रवि हो, तो 24वें वर्ष में | चन्द्रमा भाग्येश हो, तो 25वें वर्ष में | भाग्येश भौम हो, तो 28वें वर्ष में | भाग्येश बुध हो, तो 32वें वर्ष में | भाग्येश गुरु हो, तो 16वें वर्ष में | शुक्र भाग्येश हो, तो 25वें वर्ष में | शनि भाग्येश हो, तो 36वें वर्ष में | राहु-केतु भाग्येश हो, तो 42वें वर्ष में | नवम भाव में गुरु या शुक्र हो | नवमस्थ गुरु शुभ राशि का व स्वराशिस्थ हो | नवम भाव में शुभग्रह हो और उस पर किसी पापग्रह की दृष्टी न हो |

5)स्त्री रोग योग

स्त्री रोग योग लग्न में शनि, मंगल या केतु हो | सप्तमेश 8, 12वें भाव में हो | सप्तमेश और दुतीयेश पापग्रहो से युक्त हो | नीच का चन्द्रमा सातवें भाव में हो | सातवें भाव में बुध पापग्रहो से दृष्टी हो |

6)रोग योग

रोग योग षष्ठेश सूर्य के साथ 1 या 8वें भाव में हो, तो मुखरोग | षष्ठेश चन्द्र के साथ 1 या 8वें भाव में हो, तो तालुरोग | 12वें भाव में गुरू और चन्द्र साथ हों | मंगल और शनि का योग 6 या 12वें भाव में हो | लग्नेश रवि का योग 6, 8 12वें स्थान में हो | मंगल और शनि लग्न स्थान या लग्नेश को देखते हों | सूर्य ,मंगल तथा शनि-तीनों जिस स्थान में हो, उस स्थान वाले अगं पर रोग होता है | पापी मंगल पापराशि में हो | शुक्र और मंगल में सूर्य का योग हो | अष्टमेश और लग्नेश साथ हो | छठे स्थान पर शनि की पुणॅ दृष्टी हो | चन्द्र और शनि एक साथ कर्क राशि में हो | छठे भाव में चन्द्र, शनि और बुध हों, तो जातक कोढ़ी होता है | अष्टमेश नीच ग्रहों के बीच में हो | सूर्य पापग्रह द्रारा दृष्ट हो |

7)बहुसन्तान योग

बहुसन्तान योग पंचमेश शनि शुक्र के साथ पाप स्थानगत हो | आठवें भाग में पंचमेश हो | पंचमेश तथा तृतीयेश साथ-साथ हो | पंचमेश के स्थान में तृतीयेश हो | सप्तमेश-तृतीयेश का अन्योंयास्रित योग हो |

8)गोद जाने का योग

गोद जाने का योग कर्क या सिंह राशि मे पापग्रह हो | ४ या १०वें स्थान पर पापग्रह हो | चन्द्रमा से चतुर्थ राशि मे पापग्रह हो | सूर्य से ९वें स्थान पर पापग्रह हो | चन्द्रमा या सूर्य शत्रुक्षेत्र मे हो |

9)जमींदारी योग

जमींदारी योग चौथे घर का मालिक दशम मे तथा दशमेश चतुर्थ मे हो | चतुर्थेश, २ या ११वें स्थान पर हो | चतुर्थेश, दशमेश और चन्द्रमा बलवान हों तथा परस्पर मित्र हों | पंचमेश लग्न मे हो | सप्तमेश, नवमेश तथा एकादशेश लग्न मे हों |

10)ससुराल से धन-प्राप्ति के योग

ससुराल से धन-प्राप्ति के योग सप्तमेश और द्वतीयेश एक साथ हों और उन पर शुक्र की दृष्टि हो | चौथे घर का स्वमी सातवें घर में हो, शुक्र चौथे स्थान पर हो, तो ससुराल से धन मिलता है | सप्तमेश नवमेश शुक्र द्वारा देखे जाते हों | बलवान धनेश सातवें स्थान पर बैठे शुक्र द्वारा देखा जाता हो |

11)धन-सुख योग

धन-सुख योग दिन मे जन्म लेने वाले जातक का चन्द्रमा अपने नवांश मे हो तथा उसे गुरु देखता हो, तो धन-सुख योग होता है | रात मे जन्म हो, चंद्रमा को शुक्र देखता हो, तो धन-प्राप्ति होती है | भाग्य के स्वामी का लाभ के स्वामी के साथ योग हो | चौथे घर का मालिक भाग्येश के साथ बैठा हो | भाग्येश और पंचमेश का योग हो | भाग्येश और द्वितीयेश का योग हो | दशमेश और लाभेश साथ हों | दशमेश और चतुर्थेश २, , , ९ घर मे साथ बैठे हो | धनेश और पंचमेश का योग हो | लग्न का स्वामी चौथे घर के साथ बैठे हो | लाभेश और चतुर्थेश का योग हो | लाभेश और धनेश का योग हो | लाभेश और लग्नेश का योग हो | लग्नेश और धनेश का योग हो | लग्न का स्वामी पांचवें स्थान के स्वामी के साथ हो |

12)महालक्ष्मी योग

महालक्ष्मी योग धन और एश्वर्य प्रदान करने वाला योग है। यह योग कुण्डली Kundli में तब बनता है जब धन भाव यानी द्वितीय स्थान का स्वामी बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर द्वितीय भाव पर दृष्टि डालता है। यह धनकारक योग (Dhan Yoga) माना जाता है। इसी प्रकार एक महान योग है

13)सरस्वती योग

सरस्वती योग यह तब बनता है जब शुक्र बृहस्पति और बुध ग्रह एक दूसरे के साथ हों अथवा केन्द्र में बैठकर एक दूसरे से सम्बन्ध बना रहे हों। युति अथवा दृष्टि किसी प्रकार से सम्बन्ध बनने पर यह योग बनता है। यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है उस पर विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा रहती है। सरस्वती योग वाले व्यक्ति कला, संगीत, लेखन, एवं विद्या से सम्बन्धित किसी भी क्षेत्र में काफी नाम और धन कमाते हैं।

14)छत्र योग

छत्र योग जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका Kundli में होता है वह व्यक्ति जीवन मे निरन्तर प्रगति करता हुए उच्च पद प्राप्त करता है। इस भगवान की छत्र छाया वाला योग कहा जा सकता है यह योग तब बनता है तब कि कुण्डली Kundli में चतुर्थ भाव से दशम भाव तक सभी ग्रह मौजूद हों या फिर दशम भाव से चतुर्थ भाव तक सभी ग्रह स्थित हों। तीन भावों में दो दो ग्रह हों तथा तीन भावों में एक एक ग्रह स्थित हों तब शुभ योग बनता है जो नन्दा योग (Nanda Yoga) के नाम से जाना जाता है। यह योग जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका में होता है वह स्वस्थ एवं दीर्घायु होता है। इस योग से प्रभावित व्यक्ति का जीवन सुखमय रहता है।

15)अष्टलक्ष्मी योग

अष्टलक्ष्मी योग वैदिक ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है.इस ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है अत: जिस राशि में होता है उस राशि के स्वामी अथवा भाव के अनुसार फल देता है.राहु जब छठे भाव में स्थित होता है और केन्द्र में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) नामक शुभ योग का निर्माण करता है. अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) में राहु अपना पाप पूर्ण स्वभाव त्यागकर गुरू के समान उत्तम फल देता है. अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति आस्थावान होता है.इनका व्यक्तित्व शांत होता है.इन्हें यश और मान सम्मान मिलता है.लक्ष्मी देवी की इनपर कृपा रहती है.

16)परिभाषा योग

परिभाषा योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) का निर्माण करता है.वह व्यक्ति राहु के कोप से मुक्त रहता है.यह योग जन्मपत्री में तब निर्मित होता है जब राहु लग्न में स्थित हो अथवा तृतीय, छठे या एकादश भाव में उपस्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो.राहु का परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) व्यक्ति को आर्थिक लाभ देता है.स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति के कार्य आसानी से बन जाते हैं.

17)कपट योग

कपट योग दो पापी ग्रह राहु और शनि जब जन्मपत्री में क्रमश: एकादश और षष्टम में उपस्थित होते हैं तो कपट योग (Kapata Yoga) बनता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में कपट योग (Kapata Yoga) निर्मित होता है वह व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु किसी को भी धोखा देने वाला होता है .इनपर विश्वास करने वालों को पश्चाताप करना होता है.सामने भले ही लोग इनका सम्मान करते हों परंतु हुदय में इनके प्रति नीच भाव ही रहता है.

18)पिशाच योग

पिशाच योग पिशाच योग (Pishach Yoga) राहु द्वारा निर्मित योगों में यह नीच योग है.पिशाच योग (Pisach Yoga) जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में होता है वह प्रेत बाधा का शिकार आसानी से हो जाता है.इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है.इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है, ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं.इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है.कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं.

19)गौरी योग

गौरी योग गौरी योग उस समय बनता है, जब कुण्डली में चन्द्रमा गुरु से द्र्ष्ट हों. यह योग व्यक्ति को स्वस्थय शरीर देने के साथ साथ, व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को सुदृ्ढ करता है. इस योग वाला व्यक्ति सम्मानीय परिवार से संबन्ध रखने वाला होता है. उसके बच्चे अच्छे चरित्रवान होते है. व्यक्ति तथा संतान दोनों को सराहना प्राप्त होती है.

20)दुर योग

दुर योग वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में दसवें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दुर योग बन जाता है जो जातक के व्यवसाय पर बहुत अशुभ प्रभाव डाल सकता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दुर योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवन भर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को भारी शारीरिक परिश्रम वाले कार्य करके ही जीवन निर्वाह करना पड़ता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दुर योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अनैतिक तथा अवैध कार्यों के माध्यम से धन कमाते हैं जिसके कारण इन जातकों का समाज में कोई सम्मान नहीं होता तथा ऐसे जातक अपने लाभ के लिए दूसरों को चोट पहुंचाने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते। दुर योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह योग प्रत्येक चौथी कुंडली में बनता है क्योंकि कुंडली के दसवें घर के स्वामी ग्रह की किसी कुंडली के बारह में से किन्हीं तीन विशेष घरों में स्थित होने की संभावना प्रत्येक चौथी कुंडली में रहती है। इस प्रकार संसार के प्रत्येक चौथे व्यक्ति की कुंडली में दुर योग बनता है तथा संसार का हर चौथा व्यक्ति दुर योग के अशुभ प्रभाव के कारण अति निर्धन अथवा अपराधी होता है। यह तथ्य वास्तविकता से पर है तथा इसीलिए दुर योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग का निर्माण नहीं होना चाहिए। मैने अपने अनुभव में यह पाया है कि यदि किसी कुंडली में दसवें घर का स्वामी ग्रह अशुभ होकर कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में बैठ जाए तो ऐसी कुंडली में दुर योग का निर्माण हो सकता है तथा दसवें घर के स्वामी ग्रह के कुंडली में शुभ होकर 6, 8 अथवा 12वें घर में से किसी घर में बैठ जाने पर कुंडली में दुर योग का निर्माण नहीं होता बल्कि ऐसा शुभ ग्रह कुंडली के इन घरों में स्थित होकर कोई शुभ योग भी बना सकता है। कुंडली में दसवें घर के स्वामी ग्रह पर अन्य अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर कुंडली में बनने वाला दुर योग और भी अधिक अशुभ फलदायी हो जाता है। उदाहरण के लिए अशुभ मंगल यदि किसी कुंडली में दसवें घर के स्वामी होकर छ्ठे घर में स्थित हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में कुंडली में दुर योग का निर्माण हो सकता है तथा ऐसे मंगल के साथ अशुभ शनि अथवा राहु के भी स्थित हो जाने पर इस योग का फल और भी अधिक अशुभ हो जाता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भयंकर अपराधी बन सकते हैं। किन्तु उपरोक्त उदाहरण में कुंडली के इसी छठे घर में बैठा मंगल यदि शुभ हो तो कुंडली में दुर योग नहीं बनेगा तथा ऐसा जातक चिकित्सक, वकील, जज, ज्योतिषी, पुलिस अधिकारी, सेना अधिकारी आदि बन सकता है। इसी प्रकार शुभ मंगल के दसवें घर का स्वामी होकर कुंडली के बारहवें घर में स्थित हो जाने से भी कुंडली में दुर योग नहीं बनता तथा ऐसा जातक धन कमाने के लक्ष्य से विदेश में स्थापित हो सकता है तथा ऐसा जातक विदेश में बहुत धन कमा सकता है। इसलिए किसी कुंडली में दुर योग के बनने या न बनने का निर्णय लेने के लिए कुंडली में दसवें घर के स्वामी ग्रह का स्वभाव तथा कुंडली के अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जान लेना अति आवश्यक है।

21)शापित योग

शापित योग श्रापित योग इसे शापित दोष भी कहा जाता है. शानि एवं राहु की मौजूदगी एक राशि में होने पर श्रापित योग का निर्माण होता है. यह दोनों ही ग्रह अशुभ फल देने वाले होते हैं इसलिए इन दोनों ग्रहों के योग से बनने वाले योग को शापित या श्रापित कहा जाता है. शनि की दृष्टि राहु पर होने से भी इस योग का जन्म होता है. इस योग के विषय में मान्यता है कि यह जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है उनकी कुण्डली में मौजूद शुभ योगों का प्रभाव कम हो जाता है जिससे व्यक्ति को जीवन में कठिनाईयों एवं चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

22)विक्रम योग

विक्रम योग यदि दो तीन ग्रह उच्च राशि के हों चन्द्रमा स्वराशि में स्थित हो और लग्नेश पूर्ण बली हो तो विक्रम योग होता है । विक्रम योगधारी जातक पूर्ण धन-संपन्न तथा ऐश्वर्यशाली होता है साथ ही साथ वह अधिक बली तथा प्रबल साहसी होता है। कठिन परिस्थितियों में भी वह कभी विचलित नहीं होता है । ऐसा जातक राजा या राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है ।

23)दामिनी योग

दामिनी योग यदि किन्हीं छः स्थानों में सातों ग्रह विद्यमान हों तो दामिनी योग का निर्माण होता है । इस योग को दम योग के नाम से भी संबोधित किया जाता है । ऐसा जातक उच्च चरित्रवान, पशुपालक तथा दूसरों का सहायक होता है । तीक्ष्ण बुद्धि तथा सभाचतुर होता है । धर्मार्थ तथा परमार्थ होता है ।

24)बुद्धिचातुर्य योग

बुद्धिचातुर्य योग यदि पंचमाधिपति शुभ ग्रह होकर अन्य शुभ ग्रह से दृष्ट हो अथवा किसी शुभ राशि में स्थित हो तो यह बुद्धिचातुर्य योग बनता है । ऐसा जातक बुद्धिमान और चरित्रवान होता है ।

25)सुख योग

सुख योग यदि द्वितीयेश अथवा भाग्येश चन्द्रमा से केन्द्र में हो तो सुख योग होता है । ऐसा जातक चिन्ता से मुक्त तथा सुखी होता है । वह सत्कर्म करता है । सोलह वर्ष की अवस्था से ही इसका सुप्रभाव प्रारंभ हो जाता है ।

26)दीर्घायु योग

दीर्घायु योग यदि लग्नेश त्रिकोण के स्वामी से युक्त हो तो दीर्घायु योग होता है । केन्द्र-त्रिकोण का संबंध सुखकारी तथा दीर्घायु प्रदाता होता है । जिस जातक की कुण्डली में दीर्घायु योग होता है, वह पूर्ण जीवन भोगता है ।

27)भ्रातृ वृद्धि योग

भ्रातृ वृद्धि योग यदि तृतीयेश या मंगल या तृतीय भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट अथवा बली हो तो भ्रातृ वृद्धि योग बनता है । जातक अपने भाईयों के कारण सुखी होता है, जो अधिक संपन्न होते हैं । एक ही माता-पिता की अनेक संतान बालकपन में भाई बहन होते हैं और जब वे बड़े हो जाते हैं तो परस्पर शत्रु बन जाते हैं । छोटी-छोटी बातों के कारण प्रश्न उठते हैं । यदि अपवाद को छोड़ दें तो तो भाई-बहनों के मध्य घनिष्ट संबंद देखने को नहीं मिलता ।भाईयों और बहनों की उपलब्धता और उनके साथ, सुख-शांतिपूर्ण तथा प्रसन्नचित्त रहना वस्तुतः एक सौभाग्य की बात है । श्री भरतजी की कुण्डली में तीनों प्रकार से भ्रातृ वृद्धि योग बना हुआ है । प्रथमतः तृतीयेश शुक्र उच्च स्थिति में लग्न में विराजमान हैं और जिसे शुभ ग्रह बृहस्पति नवम पूर्ण दृष्टि से देख रहा है । द्वितीयतः मंगल उच्च स्थिति में लाभ भवन में विराज मान है और जिसे शुभ ग्रह बृहस्पति तथा चन्द्रमा सप्तम पूर्ण दृष्टि से देख रहे हैं और तृतीयतः तृतीय भाव में शुभ ग्रह बुध विराजमान हैं । फलतः आज भी श्री भरतजी का भ्रातृत्व प्रेम विश्व प्रसिद्ध है ।

300 महत्वपूर्ण योग

पुत्र सुख योग

पुत्र सुख योग   जब पंचम भाव में बृहस्पति अथवा शुक्र स्थित हो या जब बुध पाँचवें भाव से युक्त हो अथवा जब पंचम भाव में शुभ राशि हो और वहाँ शुभ ग्रह स्थित हो तो पुत्र सुख योग बनता है । ऐसे जातक संतानों से सुख प्राप्त करते हैं ।

पुत्रतः धनाप्ति योग

पुत्रतः धनाप्ति योग   जब द्वितीय भाव का स्वामी पंचम भाव के स्वामी और पंचम भाव के कारक ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो अथवा धनेश बलवान हो तब पुत्रतः धनाप्ति योग बनता है । जिस कुण्डली में पुत्रतः धनाप्ति योग होता है उसे पुत्र से धन प्राप्ति होती है।

यश एवं पुरस्कार योग

यश एवं पुरस्कार योग   यदि पंचमेश दृष्ट अथवा युत हो तथा दशमेश से त्रिकोण स्थान में संबंध हो तो यश एवं पुरस्कार योग बनता है और जातक यश एवं पुरस्कार प्राप्त करता है । श्री भरतजी की लग्न कुण्डली में पंचमेश चन्द्र से नवमेश मंगल दृष्ट है तथा दशमेश बृहस्पति से त्रिकोण (पंचम) स्थान में संबंध बना हुआ है । इस प्रकार यहाँ यश एवं पुरस्कार योग बना हुआ है ।

निर्माण योग

निर्माण योग   यदि धनेश और नवमेश दोनों एक साथ हों और उन्हें शुभ ग्रह देखते हों तो निर्माण योग होता है । जिस जातक की कुण्डली में निर्माण योग होता है वह अपने जीवन अनेक भवनों का निर्माण कराता है । देवालय, चिकित्सालय, विश्रामालय आदि बनवाता है । ऐसा व्यक्ति धर्मात्मा होता है। चूँकि दूसरे भाव का संबंध धन तथा कुटुम्ब से है और नवम भाव का संबंध धर्म तथा निर्माण से है, इसलिए दोनों का संबंध जातक को विशेष धर्मात्मा बना देता है । श्री भरतजी की लग्न कुण्डली में धनेश, कुटुम्बेश और नवमेश धर्मेश दोनों एक ही ग्रह भूमि पुत्र मंगल है तथा वह अपनी उच्च स्थिति में लाभ भवन में स्थित है । इस प्रकार वह अकेला निर्माण योग का निर्माण कर रहा है ।

गजकेसरी योग

गजकेसरी योग   ज्योतिष शास्त्र में कई शुभ और अशुभ योगों का वर्णन किया गया है| शुभ योगों में गजकेशरी योग को अत्यंत शुभ फलदायी योग के रूप में जाना जाता है| गजकेशरी योग (Gajkesari Yoga) को असाधारण योग की श्रेणी में रखा गया है। यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में उपस्थित होता है उस व्यक्ति को जीवन में कभी भी अभाव नहीं खटकता है। इस योग के साथ जन्म लेने वाले व्यक्ति की ओर धन, यश, कीर्ति स्वत: खींची चली आती है। जब कुण्डली में गुरू और चन्द्र पूर्ण कारक प्रभाव के साथ होते हैं तब यह योग बनता है। लग्न स्थान में कर्क, धनु, मीन, मेष या वृश्चिक हो तब यह कारक प्रभाव के साथ माना जाता है। हलांकि अकारक होने पर भी फलदायी माना जाता परंतु यह मध्यम दर्जे का होता है। चन्द्रमा से केन्द्र स्थान में 1, 4, 7, 10 बृहस्पति होने से गजकेशरी योग बनता है। इसके अलावा अगर चन्द्रमा के साथ बृहस्पति हो तब भी यह योग बनता है। कभी-कभी इन ग्रहों कि क्षमता कम होने पर जैसे ग्रह के बाल्या, मृता अथवा वृद्धावस्था इत्यादि में होने पर इस योग के प्रभाव को बढ़ाने हेतु ज्योतिषीय उपाय करने से इस राजयोग में वृद्धि होती है एवं व्यक्ति और अधिक लाभ प्राप्त कर पाता है |

पर्वत योग

पर्वत योग   वैदिक ज्योतिष के अनुसार पर्वत योग को एक शुभ योग माना जाता है तथा ऐसा माना जाता है कि किसी कुंडली में इस योग के बनने से जातक को धन, संपत्ति, प्रतिषठा तथा सम्मान आदि की प्राप्ति होती है। पर्वत योग के किसी कुंडली में निर्माण संबंधी नियमों को लेकर एक से अधिक धारणाएं देखने को मिलतीं है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में केन्द्र के प्रत्येक घर में यदि कम से कम एक ग्रह स्थित हो तो कुंडली में पर्वत योग बनता है जो जातक को उपर बताए गए शुभ फल प्रदान कर सकता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि यदि किसी कुंडली में केन्द्र के प्रत्येक घर अर्थात 1, 4, 7 तथा 10वें घर में कम से कम एक ग्रह स्थित हो तथा कुंडली के 6 तथा 8वें घर में कोई भी ग्रह स्थित न हो तो कुंडली में पर्वत योग बनता है। ज्योतिषियों का यह वर्ग मानता है कि कुंडली के छठे अथवा आठवें घर में किसी ग्रह के स्थित हो जाने से कुंडली में बनने वाला पर्वत योग भंग हो जाता है। इसी वर्ग में से कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि यदि कुंडली के 6 तथा 8वें घर में स्थित होने वाला ग्रह अथवा स्थित होने वाले ग्रह शुभ हों तो कुंडली में बनने वाला पर्वत योग भंग नहीं होता तथा इसके शुभ फल जातक को प्राप्त होते हैं। ज्योतिषियों का एक वर्ग यह भी मानता है कि यदि किसी कुंडली में लग्न का स्वामी अर्थात लग्नेश केंद्र के घरों में से किसी घर में स्थित हो तथा साथ ही साथ कुंडली के 12वें घर का स्वामी भी केन्द्र के ही किसी घर में स्थित हो तो भी कुंडली में पर्वत योग का निर्माण होता है। इस प्रकार से बनने वाले पर्वत योग में कुंभ लग्न के स्वामी शनि की गणना नहीं की जाती क्योंकि कुंभ लग्न के स्वामी होकर शनि 12वें घर के स्वामी भी हो जाते हैं जिससे लग्नेश तथा 12वें घर का स्वामी एक ही हो जाता है। इस प्रकार पर्वत योग की बहुत सी परिभाषाएं उपलब्ध हैं किन्तु इनमें से पहली परिभाषा सबसे अधिक प्रचलित तथा मान्य है जिसके चलते अधिकतर ज्योतिषी कुंडली में केन्द्र के सभी घरों में किसी न किसी ग्रह के स्थित होने पर पर्वत योग का निर्माण निश्चित मानते हैं।

ग्रहण योग

ग्रहण योग   ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है खा जाना तथा इसी प्रकार यह माना जाता है कि राहु अथवा केतु में से किसी एक के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने से ये ग्रह सूर्य अथवा चन्द्रमा का कुंडली में फल खा जाते हैं जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस योग के बनने के पश्चात भी वास्तव में यह दोष कुंडली में या तो बनता ही नहीं है या फिर इसका बल बहुत कम होता है जिसके कारण यह योग जातक को कोई विशष अशुभ फल नहीं दे पाता। यहां पर इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ बनने वाले कुछ संयोग कुंडली में ग्रहण योग न बना कर कोई शुभ अथवा बहुत शुभ योग भी बना सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में शुभ केतु का शुभ सूर्य के साथ संबंध जातक को किसी सरकारी संस्था में लाभ, प्रतिष्ठा तथा प्रभुत्व वाला पद दिलवा सकता है तथा यह योग जातक को बहुत योग्य तथा सक्षम पुत्र भी प्रदान कर सकता है जो जातक के लिए बहुत भाग्यशाली तथा शुभ सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार किसी कुंडली में शुभ राहु के चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने पर शक्ति योग बन सकता है तथा इस प्रकार का शक्ति योग जातक को ऐश्वर्य, सुख सुविधा, किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था में लाभ तथा प्रभुत्व वाला कोई पद आदि भी प्रदान कर सकता है। इस प्रकार चन्द्र राहु से बनने वाले शक्ति योग के प्रभाव में आने वाले जातक ग्रहण योग के अशुभ फलों से बिल्कुल विपरीत शक्ति योग के शुभ फल प्राप्त करते हैं जिससे एक बार फिर यह सिद्ध हो जाता है कि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु का सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ संबंध कुंडली में केवल ग्रहण योग ही नहीं बनाता बल्कि यह संबंध कुंडली में किसी शुभ योग का निर्माण भी कर सकता है। इस लिए किसी कुंडली में केवल राहु अथवा केतु के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ संबंध के आधार पर ही कुंडली में ग्रहण योग के बनने का निर्णय नहीं लेना चाहिए तथा कुंडली में राहु, केतु, सूर्य और चन्द्रमा के बल, स्वभाव तथा स्थिति का भली भांति निरीक्षण करने के पश्चात ही यह निर्णय लेना चाहिए कि कुंडली में इन ग्रहों के संयोग से ग्रहण योग बन रहा है अथवा शक्ति योग जैसा कोई शुभ योग।

दरिद्र योग

दरिद्र योग   वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग बन जाता है जो जातक के व्यवसाय तथा आर्थिक स्थिति पर बहुत अशुभ प्रभाव डाल सकता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवन भर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को अपने जीवन में अनेक बार आर्थिक संकट का सामाना करना पड़ता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अनैतिक तथा अवैध कार्यों के माध्यम से धन कमाते हैं जिसके कारण इन जातकों का समाज में कोई सम्मान नहीं होता तथा ऐसे जातक अपने लाभ के लिए दूसरों को चोट पहुंचाने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते। दरिद्र योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह योग प्रत्येक चौथी कुंडली में बनता है क्योंकि कुंडली के 11वें घर के स्वामी ग्रह की किसी कुंडली के बारह में से किन्हीं तीन विशेष घरों में स्थित होने की संभावना प्रत्येक चौथी कुंडली में रहती है। इस प्रकार संसार के प्रत्येक चौथे व्यक्ति की कुंडली में दरिद्र योग बनता है तथा संसार का हर चौथा व्यक्ति दरिद्र योग के अशुभ प्रभाव के कारण अति निर्धन अथवा अपराधी होता है। यह तथ्य वास्तविकता से पर है तथा इसीलिए दरिद्र योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग का निर्माण नहीं होना चाहिए। मैने अपने अनुभव में यह पाया है कि यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह अशुभ होकर कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में बैठ जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण हो सकता है तथा 11वें घर के स्वामी ग्रह के कुंडली में शुभ होकर 6, 8 अथवा 12वें घर में से किसी घर में बैठ जाने पर कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण नहीं होता बल्कि ऐसा शुभ ग्रह कुंडली के इन घरों में स्थित होकर कोई शुभ योग भी बना सकता है। कुंडली में 11वें घर के स्वामी ग्रह पर अन्य अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर कुंडली में बनने वाला दरिद्र योग और भी अधिक अशुभ फलदायी हो जाता है। उदाहरण के लिए अशुभ बृहस्पति यदि किसी कुंडली में 11वें घर के स्वामी होकर 8वें घर में स्थित हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण हो सकता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक निर्धन, अति निर्धन, चोर, ठग, जेबकतरे तथा धन कमाने के लिए किसी न किसी प्रकार का धोखा करने वाले हो सकते हैं। किन्तु उपरोक्त उदाहरण में कुंडली के इसी 8वें घर में बैठा बृहस्पति यदि शुभ हो तो कुंडली में दरिद्र योग नहीं बनेगा तथा ऐसा जातक ज्योतिषी, आध्यात्मिक गुरु, आध्यात्मिक प्रवक्ता, योगाचार्य, हस्त रेखा विशषज्ञ, जादूगर, बैंक अधिकारी अथवा वित्तिय सलाहकार आदि बन सकता है। कुंडली के आठवें घर में स्थित इस प्रकार का शुभ बृहस्पति जातक को लाटरी, उत्तराधिकार, वसीयत अथवा अन्य कई प्रकार के अचानक हो जाने वाले धन लाभ भी प्रदान कर सकता है। इसलिए किसी कुंडली में दरिद्र योग के बनने या न बनने का निर्णय लेने के लिए कुंडली के 11वें घर के स्वामी ग्रह का स्वभाव तथा कुंडली के अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जान लेना अति आवश्यक है।

महाभाग्य योग

महाभाग्य योग   वैदिक ज्योतिष में वर्णित अधिकतर योगों का निर्माण पुरुष तथा स्त्री जातकों की कुंडलियों में एक समान नियमों से ही होता है जबकि महाभाग्य योग के लिए ये नियम पुरुष तथा स्त्री जातकों के लिए विपरीत हैं। इसका कारण यह है कि सूर्य दिन में प्रबल रहने वाला पुरुष ग्रह है तथा चन्द्रमा रात्रि में प्रबल रहने वाला एक स्त्री ग्रह है और किसी पुरुष की कुंडली में दिन के समय का जन्म होने से, लग्न, सूर्य तथा चन्द्रमा सबके विषम राशियों में अर्थात पुरुष राशियों में स्थित हो जाने से कुंडली में पुरुषत्व की प्रधानता बहुत बढ़ जाती है तथा ऐसी कुंडली में सूर्य भी बहुत प्रबल हो जाते हैं जिसके कारण पुरुष जातक को लाभ मिलता है। वहीं पर किसी स्त्री जातक का जन्म रात में होने से, कुंडली में लग्न, सूर्य तथा चन्द्रमा तीनों के विषम राशियों अर्थात स्त्री राशियों में होने से कुंडली में चन्द्रमा तथा स्त्री तत्व का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है जिसके कारण ऐसे स्त्री जातकों को लाभ प्राप्त होता है। किन्तु महाभाग्य योग का फल केवल उपर दिये गए नियमों से ही निश्चित कर लेना उचित नहीं है तथा किसी कुंडली में इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण विषयों के बारे में विचार कर लेना भी अति आवश्यक है। किसी भी कुंडली में महाभाग्य योग बनाने के लिए कुंडली में सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों का शुभ होना अति आवश्यक है क्योंकि इन दोनों में से किसी एक ग्रह के अशुभ होने की स्थिति में महाभाग्य योग या तो कुंडली में बनेगा ही नहीं अन्यथा ऐसे महाभाग्य योग का बल बहुत क्षीण होगा जिससे जातक को अधिक लाभ प्राप्त नहीं हो पायेगा जबकि इन दोनों ही ग्रहों के किसी कुंडली में अशुभ होने की स्थिति में ऐसी कुंडली में महाभाग्य योग बिल्कुल भी नहीं बनेगा बल्कि ऐसी स्थिति में कुंडली में कोई अशुभ योग भी बन सकता है जिसके चलते जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि कई बार किसी कुंडली में ऐसे अशुभ सूर्य तथा चन्द्रमा का संयोग होने पर भी जातक बहुत धन कमा सकता है अथवा किसी सरकारी संस्था में कोई शक्तिशाली पद भी प्राप्त कर सकता है किन्तु ऐसा जातक सामान्यतया अवैध कार्यों के माध्यम से धन कमाता है तथा अपने पद और शक्ति का धन कमाने के लिए दुरुपयोग करता है जिसके कारण ऐसे जातक का पद तथा धन स्थायी नहीं रह पाता तथा उसे अपने पद तथा धन से हाथ धोना पड़ सकता है तथा अपयश अथवा बदनामी का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए कुंडली में महाभाग्य योग बनाने के लिए कुंडली में सूर्य तथा चन्द्रमा का शुभ होना अति आवश्यक है।

अमावस्या योग

अमावस्या योग   जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों कुण्डली के एक ही घर में विराजित हो जावे तब इस दोष का निर्माण होता है। जैसे की आप सब जानते है की अमावस्या को चन्द्रमा किसी को दिखाई नही देता उसका प्रभाव क्षीण हो जाता है। ठीक उसी प्रकार किसी जातक की कुंडली में यह दोष बन रहा हो तो उसका चन्द्रमा प्रभावशाली नही रहता। और चन्द्रमा को ज्योतिष में कुण्डली का प्राण माना जाता है और जब चन्द्रमा ही प्रभाव हीन हो जाए तो यह किसी भी जातक के लिए कष्टकारी हो जाता है क्योंकि यही हमारे मन और मस्तिक्ष का करक ग्रह है। इसलिए अमावस्या दोष को महर्षि पराशर जी ने बहुत बुरे योगो में से एक माना है, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपने ग्रन्थ बृहत पराशर होराशास्त्र में बड़े विस्तार से की है तथा उसके उपाय बताये है। जोकि में आगे अपने ब्लॉग पर कुछ समय बाद प्रकाशित करूँगा। ज्योतिष में ऐसा माना जाता है कि सूर्य और चन्द्र दो भिन्न तत्व के ग्रह है सूर्य अग्नि तत्व और चन्द्र जल तत्त्व, इस प्रकार जब दोनों मिल जाते है तो वाष्प बन जाती है कुछ भी शेष नही रह जाता।

भेरी योग

भेरी योग   धनदायक योगों में भेरी योग (Bheri Yoga) भी काफी प्रभावशाली और उत्तम होता है.जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका में भेरी योग (Bheri Yoga) होता है वह ज्ञानवान और उच्च विचारों वाले होते हैं.अपने उत्तम गुण और व्यवहार के कारण सम्मान व आदर प्राप्त करते हैं.अपने व्यक्तित्व के कारण दिनानुदिन प्रगति की राह पर आगे बढ़ते हैं और लक्ष्मी माता की कृपा प्राप्त करते हैं.इस योग से प्रभावित व्यक्ति निरोग और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होते है.

अरिष्ट भंग योग

अरिष्ट भंग योग   वर्षलग्नेश पंचवर्गी में सबसे अधिक बलवान होकर एक, चार, पांच, सात, नौवें या दसवें भाव में हों, तो अरिष्टनाशक योग होता है | ब्रहस्पति केंद्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में शुभग्रहों से द्रष्ट हो व उस पर पापग्रहों की दृष्टि न हो, तो अरिष्टनिवारक योग होता है | चतुर्थ भाव अपने स्वामी के साथ या शुभग्रह के साथ अथवा उससे दृष्ट हो, तो भी अनिष्टनाशक योग होकर धन, दुःख और सम्मान कि वृद्धि करता है | सप्तमेश लग्न में ब्रहस्पति के साथ हो और क्रूरग्रह उसे न देखते हों, तो ऐसा योग अरिष्टनिवारक योग कहलाता है | नवम घर का स्वामी तथा दुसरे घर का स्वामी बलवान होकर लग्न में हों तथा उन पर पापग्रहों की दृष्टि न हो, तो जातक राज्य में सम्मान प्राप्त करता है | तीसरे, छठें, तथा ग्यारहवें स्थानों में पापग्रह एवं केन्द्र तथा त्रिकोण में शुभग्रह होते हैं, तो अरिष्टनिवारक योग बनता है | लग्नेश पूर्णबली होकर केन्द्र, त्रिकोण या ११, १२वें स्थान में हो, तो जातक की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं | उच्च राशि का स्वामी बलवान होकर वर्षेश हो तथा वह तीसरे व ग्यारहवें भाग में स्थित हो, तो अरिष्टनिवारक योग होता है | सूर्य, ब्रहस्पति, तथा शुक्र परस्पर इत्थशाल योग करते हों, तो उस वर्ष जातक को नौकरी में प्रमोशन मिलता है | शुक्र, बुध और चन्द्रमा अपनी मुधा में हों, तो जातक व्यापर से लाभ उठता है | मंगल वर्षेश होकर मित्र की र्शी में हो और घर में पड़े ग्रह से मुत्थशिल योग करता है, तो उस वर्ष जातक को उच्च वाहन मिलता है |

इत्थशाल योग

इत्थशाल योग   इत्थशाल योग का उपयोग ताजिक शास्त्र में देखा जा सकता है. ताजिक ज्योतिष वर्ष फल बताने की एक पद्धति है. इत्थशाला योग का ताजिक ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान है. इत्थशाला शब्द का अर्थ है अवश्य संभावी अर्थात निश्चित सीमा तक जल्द मिलने वाला शुभ फल. ग्रहों के जिस तेजोमय के द्वारा शुभाशुभ फलों की प्राप्ति होती है उसी का नाम इत्थशाल है. इत्थशाल केवल सात ग्रहों में ही होता है इसमें राहु-केतु को स्थान प्राप्त नहीं है.इस योग को समझने के लिए ग्रहों की ताजिक दृष्टियों व सूर्यादि ग्रहों के दीप्तांशों की जानकारी होना जरूरी है. प्रश्न कुण्डली में ताजिक योगों तथा ताजिक दृष्टियों का बहुत महत्व है. इनके बिना प्रश्न कुण्डली का आधार नहीं है. राहु-केतु के अतिरिक्त सात ग्रहों में से चन्द्रमा की गति सबसे अधिक है और शनि की गति सबसे कम है. चन्द्रमा शीघ्रगामी तो शनि मंदगामी ग्रह है. इत्थशाल योग का पहला नियम यही है कि जब कोई दो ग्रह आपस में इत्थशाल करते हैं तो शीघ्रगामी ग्रह के अंश मंदगामी ग्रह के अंशों से कम होने चाहिए. इत्थशाल नियम शीघ्रगामी ग्रह, मंदगामी ग्रह से पीछे होना चाहिए. साथ ही यह दीप्ताँशों के भीतर होने चाहिए तभी इत्थशाल योग होता है. इत्थशाल योग में शामिल ग्रहों की आपस में दृष्टि होनी चाहिए. ग्रहों के दीप्ताँश निम्नलिखित हैं :- सूर्य - 15 अंश, चन्द्रमा - 12 अंश, मंगल - 8 अंश, बुध - 7 अंश, गुरु - 9 अंश, शुक्र - 7 अंश, शनि - 9 अंश. होता है और ग्रहों के चलने का क्रम चंद्र, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, गुरू एवं शनि रुप में होता है. यदि मंदगामी ग्रह के अंश, शीघ्रगामी ग्रह के अंशों से अधिक हैं. दोनों ही ग्रहों की आपस में दृष्टि है और यदि दोनों ग्रहों के भोगांश का अंतर, दोनों ग्रहों के दीप्तांश के योग के आधे से कम है होना चाहिए. यदि यह नियम पूर्ण हैं तब ग्रह इत्थशाल योग में शामिल है. बुध, गुरू, शुक्र एवं चंद्रमा का आपस में इत्थशाल निर्मित हो तो अच्छे फल प्राप्त हो सकते हैं. इसके साथ ही साथ लग्नेश जिस ग्रह के साथ इत्थशाल करता है, उस ग्रह के प्रभाव जातक को मिलते रहते हैं. शीघ्रगामी ग्रह अपना प्रभाव आगे वाले मंदगति ग्रह को देता है इस कारण दोनों ग्रहों से कार्य सिद्धि हो सकता है. इत्थशाल भाव ताजिक के अनुसार जो ग्रह कुंडली के जिस भाव में स्थित होते हैं वहां से चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव को शत्रु दृष्टि से और तीसरे, नौंवें और एकादश भाव को मित्र दृष्टि से देखते हैं. इसलिए कुंडली का ताजिक दृष्टि से विचार कते समय यह याद रखें कि ताजिक में ग्रहों का कोई निश्चित मित्र-शत्रु नहीं है. जो ग्रह आपस में दृष्टि रखते हों या एक ही राशि में हों अथवा अगली-पिछली राशियों में स्थित हों तो उन्हें शीघ्रगति व मंदगति ग्रह के क्रम से देखें. चंद्र सबसे तेज और शनि सबसे धीमी गति से चलने वाले ग्रह होते हैं. इत्थशाल से राज योग यदि कुण्डली के वृष लग्न में शुक्र 15 अंशों पर हो और शनि नवम भाव में 21 अंशों पर स्थित है तो दोनों ग्रहों में मित्र दृष्टि होने से शुभ प्रभाव प्राप्त हो सकते हैं और यह एक उच्च स्तर का इत्थशाल योग माना जाएगा. यह यह एक प्रकार से राजयोग का भी निर्माण करेगा और जातक को सम्मान एवं धन संपत्ति प्रदान करने वाला होगा. कुंडली के छठे, आठवें और बारहवें भावों के स्वामियों को छोड़कर अन्य भावों के स्वामी ग्रहों से यदि लग्नेश चंद्रमा या सूर्य मित्र दृष्टि का इत्थशाल करें तो शुभता की प्राप्ति होती है. व्यक्ति को कार्यों में सफलता प्राप्त होती है. परंतु इसके विपरित यदि शत्रु दृष्टि का इत्थशाल निर्मित हो रहा हो तो कार्यों में सफलता पाने के लिए अत्यधिक प्रयत्न एवं बार बार प्रयास करना पड़ सकता है.

सिंहासन योग

सिंहासन योग   दशमेश के केन्द्र, त्रिकोण, अथवा धन भाव में स्थित होने से निर्मित होता है सिंहासन योग. जन्म कुण्डली में दशम भावाधीश केन्द्र, त्रिकोण अथवा द्वितीय इनमें से किसी एक स्थान पर भी स्थित हो तो ऎसा जातक उच्च स्थान पाता है. वह राज सिंहासन पर सुशोभित होने वाला राजा समान होता है, उसकी कीर्ति सभी ओर फैलती है तथा उसकी सेना हाथी इत्यादि सदैव परिपूर्ण रहती है. दशमभवननाथे केन्द्रकोणे धनस्थे । वनिपतिबलयाने शस्तसिंहासनेषु ।। स भवति नरनाथो विश्वविख्यात कीर्ति। मर्दगलितकपोलै: सद् गजै: सेव्यमान: दशमेश यदि केन्द्र, त्रिकोण या धन भाव में से किसी में भी स्थित होने पर जातक समृद्धशाली, यशस्वी और कीर्तिवान बन सकता है. व्यक्ति को जीवन में उच्च पद की प्राप्ति होती है तथा सौभाग्य में वृद्धि पाता है. दशमेश की शुभ स्थिति होने पर कर्म स्थान बल पाता है. द्वितीय प्रकार का सिंहासन योग सातों ग्रहों के द्वितीय भाव तथा त्रिक भावों में स्थित होने से यह बनता है. द्वितीय, अष्टम, षष्ठ और व्यय में सब ग्रह हों तो व्यक्ति की कुण्डली में सिंहासन योग का निर्माण होता है. आकाशवासै: सकलैर्निधाननिमीलनाराह्यवसानयातै:। वदन्ति सिंहासन नामयोगं सिंहासनं तत्र विशेन्नृपस्य।। ज्योतिष में सिंहासन योग का निर्माण हो तो शुभ प्रभाव जातक को अच्छी क्षमता, वाक कुशलता, संचार कुशलता, नेतृत्व करने की क्षमता, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा देने वाला होता है. अधिकतर जातक इस योग से मिलने वाले शुभ फलों को प्राप्त करते हैं यह जातक के जीवन को प्रभावशाली स्वरुप प्रदान करने में सहायक है. इस योग के द्वारा प्रदान होने वाली विशेषताएं कुछ विशेष जातकों में ही देखने को मिलती हैं. कुंडली में इस योग का निर्माण निश्चित करने के लिए कुछ अन्य तथ्यों के विषय में विचार कर लेना भी आवश्यक है. किसी कुंडली में किसी भी शुभ योग के बनने के लिए यह आवश्यक है कि उस योग का निर्माण करने वाले सभी ग्रह कुंडली में शुभ रूप से काम कर रहे हों क्योंकि अशुभ ग्रह शुभ योगों का निर्माण नहीं करते अपितु अशुभ योगों अथवा दोषों का निर्माण करते हैं.

हल योग

हल योग   हल योग अपने नाम के अनुसार ही दिखाई भी देता है. हल जो भूमि को खोदकर उसमें से जीवन का रस प्रदान करता है और उसी को पाकर ही जीव अपने जीवन को बनाए रखने में सफल होता है यही हल योग जब कुण्डली में निर्मित होता है तो उसी प्रकार जातक के जीवन के शुभ रुपों को बाहर निकाल कर उसे नई शक्ति प्रदान करता. ज्योतिष अनुसार यह योग जब त्रिकोण की आकृति में स्थित हो, अर्थात लग्न से 2, 6, 10 भाव अथवा 3, 7, 11 अथवा 4, 8, 12 भावों में हो, तो इस शुभ हल योग की रचना होती है. इस योग से युक्त व्यक्ति भूमि और भूमि से जुडे क्षेत्रों से आय प्राप्त करने में सफल रहता है. यह हल योग जातक को कृषि क्षेत्र से लाभ प्राप्त कराने में सहायक होता है. इस योग वाले व्यक्ति को भूमि खनन के कार्यो से आजीविका की प्राप्ति हो सकती है. वह शारीरिक परिश्रम के कार्य करने में कुशल होता है. इस योग वाला व्यक्ति भूमि से जुडे कार्यो को कुशलता से कर सकता है. इसलिए ऎसे व्यक्तियों को भूमि के क्रय-विक्रय से संबन्धित कार्य करना लाभकारी रहता है. हल योग का निर्माण ज्योतिष शास्त्रियों और विद्वानों के अनुसार कुंडली में हल योग तीन प्रकार से बनता है. जातक परिजात और वृहदपराशरहोराशास्त्र में इस योग के इन मुख्य संदर्भों पर प्रकाश डाला गया है जिसके अनुसार जन्म कुंडली में सभी ग्रह दूसरे, छठे और दसवें भाव में स्थित हैं तब हल योग निर्मित होता है. एक अन्य तथ्य के अनुसार कुंडली में जब सभी ग्रह तीसरे, सातवें और एकादश भाव में स्थित हैं तब भी हल योग का निर्माण होता है. तथा तीसरा तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि यदि कुंडली में सभी ग्रह चतुर्थ, अष्टम और बारहवें भाव में स्थित है तब भी इस हल योग का निर्माण संभव होता है. हल योग का जीवन पर प्रभाव जन्म कुंडली में हल योग किसी भी प्रकार से निर्मित होता हो परंतु यह अपना प्रभाव अवश्य दिखाता है. यह योग जातक की कुण्डली में दूसरे, छठे और दसवें भाव में स्थित होने पर उसको अधिक संघर्ष की स्थिति तो देता है लेकिन साथ ही साथ उसके प्रयासों में तेजी लता है. जातक अपनी कठिनाईयों से लड़ने के लिए पूर्ण रुप से तैयार रहता है. कुंडली में यदि सभी ग्रह तीसरे, सातवें और एकादश भाव में स्थित होने पर इस स्थिति में उसके लाभ में बहुत सा अच्छा संकेत देखने को मिलता है. संबंधों में नई चुनौतियां तो आती ही हैं परंतु साथ ही साथ एक सकारात्मक रवैया भी प्राप्त होता है. कुंडली में सभी ग्रह चतुर्थ, अष्टम और बारहवें भाव में स्थित होने पर स्थिति कुछ अलग होती है जीवन संघर्षपूर्ण व्यतीत होता है जातक को कृषि कर्म में अधिक सफलता प्राप्त होती है. कृषि कर्म के ज़रिए ही व्यक्ति आय प्राप्त करता हैं. व्यक्ति की कुंडली में हल योग बनने पर उसका जीवन संघर्षपूर्ण परिस्थितियां लाता है लेकिन उनसे लड़ने की क्षमता भी प्राप्त होती है. यह योग अच्छे तथा बुरे दोनों ही प्रकार के होते हैं. यह किस तरह से बनते हैं और आपके जीवन पर इन योगों का क्या प्रभाव पड़ता है.इस बत को जानना अत्यंत अवश्यक है

वाला वज्रमुष्टि योग

वाला वज्रमुष्टि योग   वज्रमुष्टि योग के विषय में कई ज्योतिषी ग्रंथों में लिखा गया है, इस योग के बारे में कई प्रकार के फलों को भी बताया गया है जिसमें से प्रमुख तो यह है कि स्वास्थ्य में कमी का सामना करना पड़ता है और जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है. इस योग को वृश्चिक लग्न और कर्क लग्न में अधिक प्रभावी माना गया है. चक्रस्य पूर्वभागे पापा: सौम्यास्तथेतरे चैव । वृश्चिकलग्ने जाता गतायुषो वज्रमुष्टियोगेस्मिन।। इस तथ्य के अनुरूप जन्म कुण्डली में पूर्वार्ध के भावों अर्थात 1, 2, 3, 4, 10, 11, 12 भावों में सभी पाप ग्रह स्थित हों और शेष बचे हुए भावों में समस्त शुभ ग्रह स्थित हों तो वृश्चिक लग्न में जन्म होने पर यह वज्रमुष्टि नामक योग बनता है. यह योग जातक के स्वास्थ्य के लिए बहुत खराब माना जाता है. इसी संदर्भ में बादरायण ने भी कहा है जिसमें उन्होंने कर्क लग्न को प्रमुख मानते हुए यह योग के प्रभावों को परिलक्षित किया है. वहीं एक अन्य ज्योतिषाचार्य के अनुसार लग्न में कमजोर चंद्रमा स्थित हो और पाप ग्रह केन्द्र स्थानों व अष्टम भाव में बैठे हों तो जीवन के प्रति संशय बना रहता है. पाप ग्रह राशि के अन्तिम नवांश में हों तथा संध्या समय का जन्म हो, चंद्रमा की होरा में जन्म हुआ हो और चंद्रमा व पाप ग्रह चारों केन्द्रों में हों तो मृत्यु तुल्य कष्ट का भय बना रहता है. योग का प्रभाव ग्रहण का दिन चंद्रमा पाप युक्त होकर लग्न में स्थित हो और मंगल आठवें में हो तो सेहत में कमी बनी रहती है माता को भी कष्ट होता है ओर संतान को भी कष्ट झेलना पड़ता है . इन सभी के प्रभाव से एक बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि यह स्थिति किसी भी तरह से जातक के लिए अनुकूल नहीं मानी जा सकती कुछ न कुछ परेशानियां तो उत्पन्न होती ही रहती हैं और कष्ट से पिडा़ अधिक बढ़ जाती है. मृत्यु तुल्य कष्ट से बचाव नहीं हो पाता है और यदि दशा और गोचर का साथ मिल जाए तो यह स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है और किसी न किसी दुर्घटना का अंदेशा बना ही रहता है. जातक की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और हल्की से बिमारी भी खतरनाक रूप धारण कर सकती हैं.

मकान बनाने के योग

मकान बनाने के योग   एक अच्छा घर बनाने की इच्छा हर व्यक्ति के जीवन की चाह होती है. व्यक्ति किसी ना किसी तरह से जोड़-तोड़ कर के घर बनाने के लिए प्रयास करता ही है. कुछ ऎसे व्यक्ति भी होते हैं जो जीवन भर प्रयास करते हैं लेकिन किन्हीं कारणो से अपना घर फिर भी नहीं बना पाते हैं. कुछ ऎसे भी होते हैं जिन्हें संपत्ति विरासत में मिलती है और वह स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं. बहुत से अपनी मेहनत से एक से अधिक संपत्ति बनाने में कामयाब हो जाते हैं. जन्म कुंडली के ऎसे कौन से योग हैं जो मकान अथवा भूमि अर्जित करने में सहायक होते हैं, उनके बारे में आज इस लेख के माध्यम से जानने का प्रयास करेगें. स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है, तभी व्यक्ति घर बना पाता है. मंगल को भूमि का और चतुर्थ भाव का कारक माना जाता है, इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए. मंगल का संबंध जब जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी खुद की प्रॉपर्टी अवश्य बनाता है. मंगल यदि अकेला चतुर्थ भाव में स्थित हो तब अपनी प्रॉपर्टी होते हुए भी व्यक्ति को उससे कलह ही प्राप्त होते हैं अथवा प्रॉपर्टी को लेकर कोई ना कोई विवाद बना रहता है. मंगल को भूमि तो शनि को निर्माण माना गया है. इसलिए जब भी दशा/अन्तर्दशा में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ/चतुर्थेश से बनता है और कुंडली में मकान बनने के योग मौजूद होते हैं तब व्यक्ति अपना घर बनाता है. चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव घर का सुख देता है. चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर पाप व अशुभ ग्रहो का प्रभाव घर के सुख में कमी देता है और व्यक्ति अपना घर नही बना पाता है. चतुर्थ भाव का संबंध एकादश से बनने पर व्यक्ति के एक से अधिक मकान हो सकते हैं. एकादशेश यदि चतुर्थ में स्थित हो तो इस भाव की वृद्धि करता है और एक से अधिक मकान होते हैं. यदि चतुर्थेश, एकादश भाव में स्थित हो तब व्यक्ति की आजीविका का संबंध भूमि से बनता है. कुंडली में यदि चतुर्थ का संबंध अष्टम से बन रहा हो तब संपत्ति मिलने में अड़चने हो सकती हैं. जन्म कुंडली में यदि बृहस्पति का संबंध अष्टम भाव से बन रहा हो तब पैतृक संपत्ति मिलने के योग बनते हैं. चतुर्थ, अष्टम व एकादश का संबंध बनने पर व्यक्ति जीवन में अपनी संपत्ति अवश्य बनाता है और हो सकता है कि वह अपने मित्रों के सहयोग से मकान बनाएं. चतुर्थ का संबंध बारहवें से बन रहा हो तब व्यक्ति घर से दूर जाकर अपना मकान बना सकता है या विदेश में अपना घर बना सकता है. जो योग जन्म कुंडली में दिखते हैं वही योग बली अवस्था में नवांश में भी मौजूद होने चाहिए. भूमि से संबंधित सभी योग चतुर्थांश कुंडली में भी मिलने आवश्यक हैं. चतुर्थांश कुंडली का लग्न/लग्नेश, चतुर्थ भाव/चतुर्थेश व मंगल की स्थिति का आंकलन करना चाहिए. यदि यह सब बली हैं तब व्यक्ति मकान बनाने में सफल रहता है. मकान अथवा भूमि से संबंधित सभी योगो का आंकलन जन्म कुंडली, नवांश कुंडली व चतुर्थांश कुंडली में भी देखा जाता है. यदि तीनों में ही बली योग हैं तब बिना किसी के रुकावटों के घर बन जाता है. जितने बली योग होगें उतना अच्छा घर और योग जितने कमजोर होते जाएंगे, घर बनाने में उतनी ही अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ भाव पर अशुभ शनि का प्रभाव आ रहा हो तब व्यक्ति घर के सुख से वंचित रह सकता है. उसका अपना घर होते भी उसमें नही रह पाएगा अथवा जीवन में एक स्थान पर टिक कर नही रह पाएगा. बहुत ज्यादा घर बदल सकता है. चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को जमीन से संबंधित कोर्ट-केस आदि का सामना भी करना पड़ सकता है. वर्तमान समय में चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बनने पर व्यक्ति बैंक से लोन लेकर या किसी अन्य स्थान से लोन लेकर घर बनाता है. चतुर्थ भाव का संबंध यदि दूसरे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपनी माता की ओर से भूमि लाभ होता है. चतुर्थ का संबंध नवम से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपने पिता से भूमि लाभ हो सकता है.

यूप योग

यूप योग   ज्योतिष में हजारों योगों के विषय में उल्लेख प्राप्त होता है. कुण्डली में बनने वाले अनेक योग किसी न किसी प्रकार से जीवन को अवश्य प्रभावित करते हैं. यूप योग लग्न से चतुर्थ भाव अर्थात कुण्डली के पहले चार भावों में सभी ग्रह होने पर बनता है. यह योग शुभ योगों की श्रेणी में आता है. यह योग क्योकि लग्न, भाव, धन भाव, तृ्तीय भाव अर्थात यात्रा भाव व चतुर्थ भाव अर्थात सुख भाव के संयोग से बनता है. इसलिए इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति को इन्हीं चारों भावों से मिलने वाले फल प्राप्त होते है. जब दो या दो से अधिक ग्रह एक साथ एक ही राशि में बैठते हैं तो योग या कहें युति का निर्माण होता है. ग्रहों का एक साथ दृष्टि संबंध बनाना या साथ में स्थित होना किसी न किसी प्रकार के योग होने के अर्थ को सपष्ट होता है. इन नौ ग्रहों के योग किसी न किसी प्रकार के योग का कथन सार्थक करते हैं. ज्योतिषीय योग, कुछ अच्छे व कुछ बुरे सभी प्रकार के हो सकते हैं अच्छे योग शुभ फल देने वाले एवं बुरे योग जीवन में कठिनाईयां उत्पन्न करने वाले होते हैं. ग्रह अलग-अलग भावों में शृंखलाबध्द होकर एक विशेष क्रम में उपस्थित होते हैं तब भी अनेक योगों का निर्माण होता है इसमें से एक योग यूप योग है जिसका निर्माण इसी आधार पर देखने को मिलता है. कुछ ग्रह आपस में दृष्टि संबंध बनाते हैं तब भी विशेष योग बनते हैं. योग के निर्मित होने पर ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार, जिस भाव में बैठे हैं उससे संबंधित एवं जिस राशि में हैं उससे अपने संबंधों के आधार पर अपना प्रभाव दिखाते हैं. इसी प्रकार योग विशेष अवस्था में भंग भी हो जाते हैं जिसके फलस्वरुप यह अपना प्रभाव देने में अस्मर्थ हो जाते हैं. यही बात यूप योग पर भी लागू होती है यदि यह योग शुभ स्वरुप में निर्मित हुआ हो तो शुभ फलों को देने में सफल होता है अन्यथा नहीं. ज्योतिष में योगों का महत्व किसी अभिन्न अंग की भांति ही होता है. कुण्डली के भविष्य-कथन में ज्योतिषीय योगों का बहुत महत्व रहता है. यूप योग का निर्माण “एकद्वित्रिचतुर्थस्थै: सर्वखेटैस्तु यूपकम्।” कुंडली में प्रथम भाव से चतुर्थ भाव तक सभी ग्रह स्थित होने पर यूप योग बनता है. कुंडली में यह योग बनने पर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी बन जाती है. इस योग के कारण व्यक्ति धर्म- कर्म में विश्वास रखने वाला होता है. यूप योग का जीवन पर प्रभाव कुंडली में यह योग बनने पर आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी बन जाती है. जातक का जन्म यदि कितने भी गरीब परिवार में क्यूँ ना हुआ है वह एक दिन अवश्य ही बहुत अच्छी स्थिति बनाने में सफल हो सकता है. यदि इस योग में जन्म हुआ हो तो व्यक्ति धर्म- कर्म में विश्वास रखने वाला होता है. यूप योग के प्रभाव से व्यक्ति यज्ञ करने वाले हो सकते हैं तथा अपनी स्थिति नीचे से ऊपर उठने वाली बना सकते हैं. व्यक्ति जीवन के अंत तक बहुत अच्छा पद प्राप्त करने में कामयाब हो सकते हैं

दुःख योग

दुःख योग   चौथे स्थान का स्वामी पापग्रह से युक्त हो | चौथे घर मे नीच का सूर्य व मंगल हो | आठवें घर का स्वामी ११वें भाव मे हो | लग्न मे पापग्रह के बीच मे हो | लग्न मे शनि, आठवें स्थान पर राहु तथा छठे स्थान पर मंगल हो | चन्द्रमा पापग्रहों के बीच मे हो | लग्न का स्वामी १२वें स्थान पर, दसवे स्थान पर पापग्रह और किसी भी घर मे चन्द्रमा तथा सूर्य साथ मे बैठे हो|

दिवालिया योग

दिवालिया योग   लग्नेश निर्बल हो तथा अष्टमेश ४, ५, या ९वें स्थान पर हो | लाभेश व्यय भाव में हो | भाग्येश और दशमेश व्यय स्थान पर हों | पंचम स्थान मे शनि तुला राशि का हो | द्सरे घर का मालिक ९, १०, या ११वें स्थान पर हो |

कूर्म योग

कूर्म योग   कूर्म योग अपने नाम की सार्थकता को इस प्रकार व्यक्त करता है कि कुण्डली में बनने वाला यह योग कूर्म के समान दिखाई देता है. जिस प्रकार कूर्म के पैर अनेक दिशाओं में फैले हुए से रहते हें उसी प्रकार इस योग में ग्रह 1,3,5,6,7,और 11 भावों में फैले हुए होते हैं. कूर्म योग में शुभ ग्रहों के उच्च राशि, स्वराशि, मित्र राशि या नवांश में स्थित होकर पंचम, षष्ठ एवं सप्तम भाव में स्थित होने से इस योग को देखा जा सकता है. शुभ ग्रहों के उच्च राशि, स्वराशि, मित्र राशि या नवांश में स्थित होकर लग्न, तृतीय अथवा एकादश भाव में स्थित होने से यह योग शुभ फल देने वाला बनता है. जातक परिजात के अनुसार कलत्र पुत्रारिगृहेषु सौम्या: स्वतुग मित्रांशकराशियाता:। तृतीय लाभो दयगास्त्व सौम्या मित्रोच्चसंस्था यदि कूर्म रोग:।। विख्यात कीर्तिर्भुवि राजभोगी धर्माधिक: सत्त्व गुण प्रधान:। धीर: सुखी वागुपकारकर्ता कूर्मोद्भवो मानव नायको वा।। कूर्म योग का निर्माण कूर्म योग ज्योतिष की योग श्रृखला में अपने महत्व को प्रदर्शित करने में सार्थकता पाता है. इस योग के निर्मित होने में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार किया जाता है. यहां पर हम इसके निर्माण रुप को इस प्रकार समझ सकते हैं कि यदि जन्म कुण्डली में पांचवें, छठे तथा सातवें भाव में शुभ ग्रह दीप्त, स्वस्थ या मुदित अवस्था में स्थित हों तो इस योग को बनने में सहायता प्राप्त होती है. एक अन्य विचार के अनुसार यदि जन्म कुण्डली में तीसरे, एकादश तथा लग्न भाव में अशुभ ग्रह दीप्त या स्वस्थ अवस्था में हों तो इस योग को देखा जा सकता है. किंतु इस बात पर भी ध्यान देने की बात है कि यदि उपरोक्त दोनों शर्ते पूरी हो रहीं हैं तो जातक की कुण्डली में कूर्म योग अच्छा एवं दृढ़ रूप में बनेगा अन्यथा इसके बनने में कमी रह जाएगी. कूर्म योग का प्रभाव कूर्म योग बनने के लिए जन्म कुंडली में पांचवें, छठे तथा सातवें भाव में शुभ ग्रह दीप्त, स्वस्थ या मुदित अवस्था तथा तीसरे, एकादश तथा लग्न भाव में अशुभ ग्रह दीप्त या स्वस्थ अवस्था में होने हि चाहिए. इस प्रकार से बना यह योग जातको अच्छे फल प्रदान करने में सहायक होता है. यदि आपकी जन्म कुंडली में उपरोक्त दोनों शर्ते पूरी हो रही हैं तभी कूर्म योग का निर्माण होगा क्योंकि इस योग में मौजूद ग्रहों की स्थिति कूर्म की आकृति जैसी होनी चाहिए. कूर्म योग के प्रभाव के विषय में ज्योतिष शास्त्रों में कई प्राकार की टिप्पणीयां कि गई हैं जिसके अनुसार:- पुत्रा रिमदने सौम्या: स्वोच्चक्षिशादिगो: खला:। त्रिलाभोदयगा: स्वाच्चभांशगा: कच्छपो मत:।। कूर्म योग के प्रभाव से व्यक्ति राजा के समान होता है, गुणवान होता है, धार्मिक होता है. यदि कुंडली में कूर्म योग बन रहा है तब जातक सुख तथा वैभव से भरपूर हो सकते हैं. इस योग के प्रभाव से व्यक्ति उपकारी होता है, धीर- वीर गंभीर होता है तथा घर की ओर से भी सुखी रह सकता है. इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक किर्तिवान, विख्यात होता है उसके परोपकार को दुनिया देखती है उसके मान सम्मान में इजाफा होता है. जातक दूसरों के लिए दानी और उपकारी व्यक्ति बनता है. जातक के भीतर धार्मात्मा जैसे सत्व गुणों का वास देखा जा सकता है. वह धार्मिक कार्यों को रूचि से करने वाला यज्ञादि कार्यों अपना सहयोग देने वाला बनता है

शनि और मंगल का योग

शनि और मंगल का योग   सभी ग्रह समय - समय पर अपनी राशि परिवर्तित करते रहते हैं. सभी ग्रहों का एक राशि में भ्रमण का समय अलग ही होता है. कोई शीघ्र राशि बदलता है तो कई ग्रह लम्बी अवधि तक एक ही राशि में रहते हैं. सभी नौ ग्रहों में एक शनि ऎसा ग्रह है जो सबसे अधिक समय तक एक राशि में रहता है. इसी तरह गोचर में कभी न कभी ग्रहों का संबंध एक साथ बनता है,जैसे अभी मंगल और शनि का युति संबंध बन रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि और मंगल दोनों ही क्रूर एवं पाप ग्रह माने जाते हैं.जहां एक और मंगल बहुत उग्र, क्रोधी हैं और इनकी प्रकृति तमस गुणों वाली मानी गई है. इसी प्रकार अपनी धीमि गति से चलते हुए शनिदेव अपना असरदार प्रभाव देते हैं, अपने अद्वितीय तेज से दोनों ही ग्रह सभी को प्रभावित करते से दिखाई देते हैं. यह सभी पर ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास तथा अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं. शनि और मंगल आपस में एक-दूसरे के शत्रु हैं. मृत्यु के कारक शनि और रक्त के कारक ग्रह मंगल एक दूसरे का के साथ युति में होना बहुत सी परेशानियों का कारण बन सकता है. शनि-मंगल योग का प्रभाव कुंडली में शनि और मंगल की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है. जन्म कुंडली में इन दोनों ग्रहों की युति यानी एक ही भाव में साथ होना अच्छा संकेत नही माना जाता है .गोचर में भी शनि और मंगल की अशुभ युतियां देखी जा सकती हैं जिनका असर कुछ खास अच्छा नहीं होता है. इन ग्रहों का शत्रु के साथ होना अच्छा नहीं माना जाता है. यह दुघर्टना और संकट का सूचक बनते हैं. शनि मंगल का दृष्टि संबंध बनना और षडाष्टक योग बनाना आपदाओं का कारण हो सकता है. हाल फिलहाल बनने वाला मंगल का शनि के साथ कन्या राशि में यह योग इस समय अनेक परेशानियों, दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है. प्राकृतिक आपदाएं और राष्ट्रों का आपसी मतभेद बढ़ सकता है. आतंकी घटनाओं में तेजी की संभावना देखी जा सकती है. मंगल का राशि परिवर्तन का असर सभी पर दिखाई दे सकता है. मंगल राशि परिवर्तन और शनि के साथ युति से अचानक सफलता और वाणी एवं चतुराई में तेजी देखी जा सकती है. अनावश्यक गुस्सा और मानसिक तनाव बढ़ सकता है. नए उत्तरदायित्व मिल सकते हैं और व्यवसायियों को धन लाभ होने के योग बनते हैं. रूके हुए कार्य मेहनत से करने पर ही पूरे होंगे. वाहन, मशिनरी के क्रय- विक्रय से लाभ हो सकता है इस समय में दुर्घटना और धन हानि के योग भी बन सकते हैं. भूमि प्रॉपर्टी से संबंधित लोगों के लिए ये समय अच्छा रह सकता है. व्यर्थ के विवाद का सामना भी करना पड़ सकता है. वर्तमान में ग्रहों की स्थिति पर नजर डाले तो इस आधार पर मंगल का शनि से योग बना रहा है. ग्रहों की यह स्थिति राष्ट्र के मौजूदा घटना क्रम व वर्तमान उथल-पुथल का कारण बन सकती हैं. सांसारिक जीवन में आजीविका, नौकरी, कारोबार, सेहत या संबंधों के लिए मिले जुले परिणाम देने वाला हो सकता है.

चामर योग

चामर योग   जातक परिजात के अनुसार “लग्नेश केन्द्रगते स्वतुग्डें जीवेक्षिते चामरनाम योग:” अर्थात कुण्डली में यदि लग्नेश उच्च राशि में स्थित होकर केन्द्र में हो और यह योग केवल मेष, मिथुन कन्या, मकर लग्न में उपन्न जातकों के जन्मांग में विद्यमान होना संभव है. अन्य लग्न होने पर अगर लग्नेश उच्चराशि में होगा, तो केन्द्र में नहीं हो पाएगा. जातक परिजात में इसके फल का विचार करते हुए कहा गया है कि - योगे जातश्चामरे राजपूज्यो विद्वान् वाग्मी पण्डितो वा महीप: । सर्वज्ञ: स्याद्वेदशास्त्राधिकारी जीवेल्लोके सप्ततिर्वत्सराणाम्।। “सौम्यद्वये लग्नगृहे कलत्रे नवास्पद वा यदि चामरः स्यात् ।।” ज्योतिषतत्वम के अनुसार लेखाच्र्येन विलोकिते हरिहपे केन्द्रस्थिते तुग्ड़भे कि पौरे पथिभेSथ वा पथि पदे चरुद्वये चामर: । सर्वज्ञ: श्रुतिशास्त्र विन्मनुभवेद् पूज्यो बुधोSत्राद्भव आयुर्वर्षमुपैति खाश्वतुलितं वाग्ग्मी च विद्वान्नृप: ।। इस प्रकार के कई और तथ्यों के आधार पर ही चामर योग को राजयोग की संज्ञा दी गई है. इस योग में जातक राजा के समान होता है, विशेषज्ञ होता है शस्त्रों को जानने में रुचि रखने वाला होता है. चामर योग निर्माण किसी भी व्यक्ति की कुंडली में चामर योग चार प्रकार से बनता है, अर्थात चामर योग बनने की चार प्रकार की शर्ते होती हैं. इन चारों में से किसी एक शर्त के पूरा होने पर चामर योग बनता है. कुण्डली में लग्नेश यदि अपनी उच्च राशि में स्थित हो तथा उसे गुरू देख रहा हो तब चामर योग बनता है. दूसरी अवस्था में यदि आपकी जन्म कुंडली में दो शुभ ग्रह लग्न या नवम भाव में स्थित हैं तब भी चामर योग का निर्माण होता है. तीसरी अवस्था में यदि कुंडली में दो शुभ ग्रह सप्तम और दशम भाव में स्थित हैं तब इस योग से भी चामर योग बनता है और अंत में यदि जन्म कुंडली में शुभ ग्रह लग्न में स्थित हों, शुभ ग्रह का भावेश या लग्नेश शुभ भावों में बैठा हो तब भी चामर योग का निर्माण होता है. इस शर्त में ग्रह अपनी स्व राशि या उच्च राशि में अर्थात दीप्त या मुदित अवस्था में होना चाहिए. चामर योग प्रभाव जिन लोगों कि कुण्डली में चामर योग का निर्माण होता है वह प्रतिष्ठित, विद्वान और यश-प्रतिष्ठा पाने में सफल होते हैं. यह योग व्यक्ति को परिश्रमी और सफल बनाता है. जातक वह दीर्घायु प्राप्त करता है. चामर योग के प्रभाव से आप नेता या नेता के समान पद पाने की संभावना रखते हैं. इस योग के प्रभाव से सरकार द्वारा सम्मान प्राप्त व्यक्ति हो सकते हैं. इसके द्वारा जातक दीर्घायु तथा विद्वान भी होता है. चामर योग में जन्म लेने पर आप अच्छे वक्ता तथा विभिन्न कलाओं में निपुण व्यक्ति हो सकते हैं. चामर योग में उत्पन्न जातक राजा के समान समान पाने वाला, सर्वज्ञ, वेदों को समझने वाला अच्छा वक्ता होता है. व्यक्ति इस योग में वृद्धि को प्राप्त करने में सहायक होता है. वह भाँति सुन्दर और सुशील तथा लक्ष्मीवान, कीर्तिवान होता है. कई व्यक्तियों में योग योग उन्हें सफलता के उच्च शिखर प्रदान करने वाला होता है. भगवान श्री राम जी की कुण्डली में भी यही योग निर्मित होने की बात कही गई है.


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