प्रकरण ९ - अंत्येष्टि / अग्निसंस्कार

    प्रकरण ९ - अंत्येष्टि / अग्निसंस्कार

    हर प्राणीमात्र के जीवन की अंतिम घटना मृत्यु होती है। यह घटना अटल होती है, परंतु अनिश्चितभी होती है। किस व्यक्ति को कहा, कब, किस कारण मृत्यु प्राप्त होगी यह अनिश्चित है। मृत्यु केपश्चात् मृत शरीरपर संस्कार करना अथवा संस्कारपूर्वक दहनादि कर्म करना इसे ही अंत्यकर्मअथवा अंत्येष्टि कहते हैं। यह विधि मंत्रोच्चारण के साथ करनेपर उसे मंत्राग्नि विधि कहते हैं।बिना मंत्रों के संस्कार करनेपर उसे भड़ाग्नि कहते है। ऐसा भड़ाग्नि देने के पश्चात् अस्थिसंचयकरते समय एक-दो अस्थि रखकर उसपर मंत्राग्निविधि करना चाहिए। यहांपर (सामान्यतःकिये जानेवाले दाह संस्कार का विवरण दिया है। परंतु कुछ समाज में इस विधि में थोड़ाभेद हो सकता है, इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार विधि करना चाहिए।)

    दहन तथा खनन संस्कार - दहन करना अर्थात् अग्नि देना तथा खनन करना अर्थात्गाड़ देना। बच्चे के दांत निकलने के पूर्व मृत्यु होनेपर खनन करना चाहिए। छ: महीने से लेकर ३वर्ष की आयु तक दहन अथवा खनन कर सकते हैं। तीन वर्ष की आयु पूर्ण होनेपर अंत्यसंस्कारमंत्रसहित करना चाहिए।

    अंत्यकर्म (अग्निसंस्कार) के अधिकारीस्त्री की मृत्यु होनेपर अंत्यकर्म के अधिकारी-

    ज्येष्ठ पुत्र, ज्येष्ठ पुत्र यदि वहां उपस्थित न हो तो, दूसरा/तिसरा पुत्र, पति (पिता जीवितहो तब भी) अविवाहित अथवा विवाहित कन्या, जामात / जमाई / दामाद, (स्वयं के पिताजीजीवित हो तो अंगुठे तक अपसव्य करना चाहिए तथा यदि पिता जीवित न हो तो प्रचलित रीतिके अनुसार अपसव्य कर के कर्म करना चाहिए।) ज्येष्ठ क्रम के अनुसार सगोत्र तथा सपिंड कीकोई भी व्यक्ति अथवा मातुलगृह के सपिंडी में ज्येष्ठ क्रम से कोई भी रिश्तेदार अंतिम संस्कारसंपन्न करा सकता है। (इस प्रकार अधिकारी व्यक्तियों में से रिश्तेदारी, भावसंबंध तथा स्वयंइच्छा के अनुसार कोई भी व्यक्ति अंत्यकर्म कर सकता है)

    पुरुष की मृत्यु होनेपर अंत्यकर्म के अधिकारी -

    ज्येष्ठ पुत्र, ज्येष्ठ पुत्र यदि वहां अनुपस्थित हो तब दूसरा/तिसरा पुत्र, अविवाहित कन्या,विवाहित कन्या, जंवाई (यदि स्वयं के पिताजी जीवित हो तो अंगुठे तक अपसव्य कर, यदिजीवित न हो तो प्रचलित रिवाज के अनुसार अपसव्य कर के कर्म करना चाहिए) पत्नी, ज्येष्ठक्रम के अनुसार सगोत्र तथा सपिंड का कोई भी रिश्तेदार अंतिम संस्कार संपन्न करा सकताहै। (इस प्रकार अधिकारी व्यक्तियों में से रिश्तेदारी, भावसंबंध तथा स्वयं इच्छा के अनुसार कोईभी व्यक्ति अंत्यकर्म कर सकता है।)

    पुत्र तथा कन्या के अंत्यसंस्कार के अधिकारी

    सबसे पहले पिता, उसके बाद भाई, बहन तथा उसके पश्चात् सपिंड के ज्येष्ठ क्रम से कोई भीरिश्तेदार अथवा माता अधिकारी हैं।

    अंत्ययात्रा हेतु आवश्यक सामग्री - गंगाजल, तुलसीपत्र, बांस-२, कमटि-९, घास-पिंडी,

    चावल, छिंका, दो मटके, सफेद वस्त्र, घी, अग्नि, फूलमाला, सुतली, जलाने हेतु लकड़ियाँ,

    अश्मा (पत्थर)-२, तिल, दर्भ, माचीस आदि एवं क्षौरकर्म हेतु नाई।

    अंतिम क्रिया हेतु मिलनेवाली सामग्री शहरों में एक जगह मिल जाती है। परंतु जहांपर ऐसी

    सुविधा उपलब्ध नहीं होती वहांपर अलग-अलग दुकानों से यह सामान प्राप्त करना पड़ता है।

    जहांपर ऐसा सामान नहीं मिलता वहांपर छिंका तथा अरथी तैयार करनी पड़़ती है। छिंका तैयार

    करने हेतु मकान के सामने खुली जगहपर तीन कमटों का त्रिकोण बनाकर उसे सुतली से बांधना

    चाहिए। लायी हुई मटकी उस में ठीक तरह से बैठ जाय उतना उस छिंके का आकार होना चाहिए।

    अंतिम यात्रा अत्यंत भावनिक घटना होती है। इस में समाज के अनेक घटकों से विविध

    प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है। कुछ अंधश्रद्धायुक्त व्यक्ति इसे अशुभ मानते है, अतः इस में

    शामील नहीं होते तथा कुछ लोग डर के मारे शामील नहीं होते। हम कभी न कभी मरने वालेहै तथा हमारे घर में कभी न कभी किसी व्यक्ति की मृत्यु होनेवाली है, यह सामान्य विचार भीउनके मन में नहीं आता है। समाज में कंधा देने के संबंध में अनेक गलत धारणाएँ होती है। कुछअंधश्रद्धाएं है तथा कुछ रुढ़ियोंपर आधारित है। जैसे, पिताजी जीवित हो तो वह व्यक्ति कंधानहीं दे सकता, यदि पत्नी गर्भवती हो तो पति कंधा नहीं दे सकता, यदि पत्नी रजस्वला हो तोपति कंधा नहीं दे सकता तथा जिसकी मंगनी निश्चित हो गई है वह भी कंधा नहीं दे सकता। ऐसीअनेक गलत धारणाएँ समाज में प्रचलित है, परंतु इन सब बातों के लिए कोई शास्त्रीय आधारनहीं है। अशौच हो तो भी अंत्ययात्रा में शामील हो सकते है। जिस व्यक्ति से अब हमें किसी भीप्रकार का लाभ प्राप्त होनेवाला नहीं है यह जानते हुए भी, ऐसे व्यक्ति को कंधा देना यह एकप्रकार का निष्काम कर्म योग ही है।

    अंत्ययात्रा की तैयारी - जब व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है तब वह मृतदेह घर में दरीअथवा चादर पर, खुली जगह में, दक्षिण की ओर सिर तथा उत्तर की ओर पैर करके रखनाचाहिए। कुछ प्रदेशों में सिर उत्तर की ओर रखने की प्रथा है। मृत व्यक्ति के मुख में गंगाजलतथा तुलसी पत्र रखना चाहिए। ईश्वर का नामस्मरण, गीतापठन करना चाहिए। मृत व्यक्ति कीपलथी लगवाकर लेटाना चाहिए। यदि उसकी पलथी लगाना संभव ना हो तब पांव के दोनोअंगुठे एक दूसरे से बांध कर रखने चाहिए। सिर की ओर अगरबत्ती जलानी चाहिए। नाक तथामुखपर कपास रखना चाहिए। यदि आँखे खुली रह गई हो तो उन्हें बंद करना चाहिए। उसके 
    पश्षात् अंत्ययात्रा का समय निश्चित करना चाहिए तथा अंतिम क्रिया हेतु लगनेवाली सामग्री भीलाकर रखनी चाहिए।

    क्षौरकर्म - क्षौर अर्थात् शिखा की जगह थोड़े बाल रखकर बाकी सिर को मुंडवाना चाहिए।मुंछे व दाढ़ी भी मुंडवाकर स्नान करना चाहिए। अंतिम क्रिया दिन में होनेवाली हो तब क्षौर कर्मकरना चाहिए। यदि मृत्यु रात को हुई हो और दहन भी रात्रि को होनेवाला हो तब रात को क्षौरकर्म न करते हुए तीसरे या ९वें दिन करना चाहिए। यदि दिन में मृत्यु हुई हो परंतु रात्रि में दहनहोनेवाला हो तब दिन में क्षौर कर्म करना चाहिए।

    जिस व्यक्ति को अंतिम क्रिया संपन्न करानी हो उसने अपसव्य कर दक्षिण दिशा में मुखकर, क्षौर(मुंडन) एवं स्नान करना चाहिए। सफेद वस्त्र परिधान करना चाहिए। एक से अधिक पुत्र हो तबसभी पुत्रों केक्षौर करने चाहिए। किसी कारणवश क्षौर (मुंडन) न करनेवाले हो तब उसने पहले दिनअथवा दस दिन तक किसी भी दिन आगे लिखे हुए अनुसार संकल्प करना चाहिए - "क्षौराभावेअंत्यकर्माणि अधिकार प्राप्त्यर्थ द्विगुणित गोप्रदानम् ततप्रत्याम्नाय तन्निष्क्रय व्यावहारिक द्रव्यदानेन सूतकान्ते प्रायश्चित्तमहमाचरिष्ये। " तथा १३ वें दिन द्विगुणित गोप्रदान करना चाहिए।पत्नी तथा कम उम्र के व्यक्ति (पुत्र अथवा छोटे भाई) की अंतिमक्रिया करनेवाले को क्षौर(मुंडन) नहीं करना चाहिए, यदि अंतिम क्रिया स्त्री करनेवाली हो तब उसको क्षौर (मुंडन) नहींकरना चाहिए।

    अरथी/टिकठी तैयार करना -अंत्ययात्रा प्रारंभ करने के पूर्व मकान के सामने की खुलीजगह में दो बांस सीधि पंक्ति में रखें। (रेखाचित्र क्र.१) उसके उपर बांस के ६ टुकड़े तीन जगहजोड़ी से रखकर सुतली से बांध लेना चाहिए (रेखाचित्र क्र.२) उसके ऊपर सूखी घास डालकरउसे भी सुतली से बांध लेना चाहिए। उसपर सफेद वस्त्र बिछाना चाहिए। उसे बिछाते वक्त पांवकी तरफ का हिस्सा ज्यादा रखना चाहिए (रेखाचित्र क्र.३) उसके पश्चात् पैर की ओर अग्नि तैयारकर उसपर मटकी रखकर पानी गरम करें और छिंका तैयार करना चाहिए। (रेखाचित्र क्र. ४)
    उसके पश्चात् मृतदेह को बाहर लाकर अरथी के पैर की दिशा में जमीनपर उत्तर दिशा की ओरमुख करके बिठाना चाहिए। तत्पश्चात् कर्ता ने अपनी तर्जनी से (पहली उंगली से) शव के सिरपरपीछे की ओर घी लगाना चाहिए। मृतदेह को नहलाने के पूर्व जनेऊ तथा लाये हुए सामान में सेउत्तरीय वस्त्र से अपसव्य करना चाहिए। जनेउ न हो तो केवल उत्तरीय वस्त्र का अपसव्य करनाचाहिए, यदी उत्तरीय वस्त्र भी न हो तब सफेद कपड़े को फाड़कर उसका उत्तरीय वस्त्र बनानाचाहिए। तत्पश्चात् मटके के गरम पानी से शव को नहलाना चाहिए। नहलाने के हेतु सर्व प्रथमपैरोंपर तत्पश्चात् सिरपर थोड़ासा पानी डालना चाहिए। पश्चात् उस मटकी को एक तरफ जाकरफोड़ देना चाहिए। दूसरी मटकी में अग्नि अर्थात् अंगारे रखकर उसपर थोड़ीसी हवा लगे ऐसाढक्कन रखकर उस मटकी को छिंके में रखें। उसके बाद मृत व्यक्ति के ललाटपर गोपीचंदन काटीका लगाना चाहिए। फूलमाला डालकर साहित्य में दिया हुआ नवीन वस्त्र शवपर ओढ़ना चाहिए।मृत स्त्री सुहागन हो तो उसके ललाटपर हलदी-कुंकुम् लगाना चाहिए और उसकी गोदभराईकरें। सड़कपर हलदी-कुंकुम् का छिड़काव करना चाहिए। विवाहित पुरुष मृत हो तो उसकेपत्नी के मंगलसूत्र के दो मणी शव के मुख में रखने चाहिए। शव को जिस दिशा में ले जाना होउस दिशा की ओर पैर रखते हुए शव को अरथीपर रखें। तत्पश्चात् बचा हुआ वस्त्र शव के ऊपरओढ़ना चाहिए और सुतली से उसे चारों ओर से कसकर बांधना चाहिए। (रेखाचित्र ५ और ६)उसके बाद अंत्ययात्रा प्रारंभ करें।
    अंत्ययात्रा - अंतिम विधि संपन्न करनेवाले व्यक्ति को सफेद वस्त्र धारण करना चाहिए।दूसरा एक सफेद वस्त्र लेकर उसकी तिकोनी कर उसके अंतिम छोरों की गांठ मारकर वहअपसव्य कर गले में धारण करना चाहिए। जिस दिशा में शवयात्रा निकलनेवाली हो उस ओरकर्ता सबसे आगे खड़े होकर हाथ में छिंका लेकर प्रस्थान करें तथा पीछे मुड़कर नहीं देखनाचाहिए। अंत्ययात्रा में रामनाम का उच्चारण करते हुए चलना चाहिए। मटकी लेकर चलनेवालेतथा अरथी लेकर चलनेवालों के बीच में से कोई रास्ता न काटे। श्मशानघाट में प्रवेश करने केपूर्व जिस जगह विश्रांति लेना निश्चित होता है वहांपर छिंका एवं अरथी जमीनपर रखनी चाहिए।कर्ता को मृत व्यक्ति के नाम और गोत्र का उच्चारण कर मुख में तिलांजली देनी चाहिए। कंधादेनेवाले व्यक्ति जो आगे है उन्हे पीछे जाना चाहिए एवं पीछेवाले व्यक्तियों को आगे आना।चाहिए। पश्चात् अरथी को उठाकर श्मशानघाट में प्रवेश करना चाहिए।

    जहांपर दहन होना है उससे थोड़ी दूरीपर दक्षिण की ओर मस्तक रखकर शव को रखना चाहिए।
    अंतिम क्रिया संपन्न करनेवाले व्यक्तिने दो पत्थर लेकर उससे शव के छाती के ऊपर की डोरीतोड़नी चाहिए। उन पत्थरों में से दाहिने हाथ का पत्थर आगामी विधि हेतु सुरक्षित रखनाचाहिए, उसे अश्मा कहते है। इसके पश्चात् उपस्थित लोगों को मृत व्यक्ति के शरीरपर चढ़ायें हुएफूल एवं मालायें निकालकर अलग से रखनी चाहिए।पुत्तलविधि

    व्यक्ति की मृत्यु के बाद पंचांग देखकर उस समय का नक्षत्र तथा दहन करते समय का नक्षत्रदेखना अनिवार्य हैं। मृत्यु के समय त्रिपाद अथवा पंचक नक्षत्र है क्या? यह देखना चाहिए।कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफालगुनी, विशाखा तथा उत्तराषाढ़ा इनमें से कोई एक नक्षत्र हो तो उसेत्रिपाद कहते है। धनिष्ठा नक्षत्र का तीसरा तथा चौथा चरण, शततारका (शतभिषा), पूर्वा भाद्रपदा,उत्तरा भाद्रपदा तथा रेवती में से कोई एक नक्षत्र हो तब उसे पंचक कहते हैं। अन्य किसी नक्षत्रपरमृत्यु हुई हो और त्रिपाद या पंचक नक्षत्रपर दहन होनेवाला हो तब केवल पुत्तलविधि करनाचाहिए। पंचक अथवा त्रिपाद नक्षत्रपर मृत्यु हुई हो तथा दहन अन्य नक्षत्रपर संपन्न होना हो तबकेवल शांति कर लेनी चाहिए। जैसे - रेवती नक्षत्रपर मृत्यु हुई हो तथा दहन अश्विनी नक्षत्रपरसंपन्न होनेवाला हो तब पंचक शांति करनी चाहिए, पुत्तलविधि न करें। इसी तरह त्रिपाद नक्षत्रहोनेपर करना चाहिए। निधनशांति के पहले नक्षत्रशांति (त्रिपाद/पंचक) विधि संपन्न करनाचाहिए। (अन्यथा परिवार में तीन अथवा पांच मृत्यु हो सकती है, ऐसी जनमानस में धारणा है।)मृतशरीरपर यदि पुत्तलविधि करना रह गया हो तब दशक्रिया के समय मंत्राग्नि देते वक्त यह विधिकर सकते हैं, वह प्रधान विधि नहीं है। पूर्वा भाद्रपदा यह नक्षत्रचरण भेद के अनुसार त्रिपाद नक्षत्रहोने के बावजूद उसके लिए पंचक शांति ही करनी चाहिए। यह त्रिपाद एवं पंचक शांति ग्यारहवेंदिन करनी चाहिए। ग्यारहवें दिन करना संभव न हो सके तब उसको शीघ्रातिशीघ्र करना चाहिए।यह शांति घर के बाहर की जाती है, परंतु वर्तमान में घरपर भी कर सकते है।

    श्मशान घाटपर प्रेतकर्म करते समय आचमन (घूंट) तथा संकल्प सव्य से करना चाहिए।अन्य कर्म अपसव्य से करने चाहिए। दहन के समय त्रिपाद अथवा पंचक हो तब शव के ऊपरपुत्तलविधि करना चाहिए। सत्तू या गेहूँ का आटा लेकर उस में थोड़े तिल और पानी मिलाकर उसेगुंद लेना चाहिए। पंचक हेतु पांच और त्रिपाद हेतु तीन पुतले अथवा गोले बनाने चाहिए। त्रिपादहो तब (१) ललाटपर (२) दो आँखों के बीच में (३) बायीं करवट की ओर रखने चाहिए। पंचकहो तब (१) ललाटपर (२) दो आँखों के बीच में (३) दायी करवटपर (४) नाभिपर (५) दो पांवोंके बीच में रखने चाहिए। मृतशरीर के ऊपर रखे हुए पुतलोंपर / गोलोंपर घी और तिल डालें।

    दहन प्रक्रिया

    जहांपर चिता रचानी हो वहां की जमीनपर तिलयुक्त पानी का तीन बार छिड़काव करना
चाहिए। तत्पश्चात् अन्य लोग आधी चिता रचने के बाद उसपर शव रखें। शव का सिर दक्षिण की     ओर होना चाहिए। शव के मुख को छोड़कर बाकी पूरे शरीरपर शेष चिता रचनी चाहिए। उसकेपश्चात् विधि संपन्न करानेवाला एवं अन्य पुत्रोंको तिलांजली देनी चाहिए। उसके पश्चात् धी कीदो बूंदे दोनों आँखो में, दोनों कानों में, दोनो नासापुरों में तथा मुख में डालें। शव का मुख लकड़ी/ कण्डे से ढक देना चाहिए। दहनक्रिया करनेवाले ने मृत व्यक्ति पुरुष हो तो शव के मस्तक कीओर तथा मृत व्यक्ति स्त्री हो तो शव के पैरों की ओर से मटके में लाई हुई अग्नि देनी चाहिएतत्पश्चात् चिता के अन्य स्थानोंपर अग्नि प्रज्वलित करना चाहिए। कर्ता ने अपने उपवस्त्र से उसअग्नि को हवा देनी चाहिए। उसके पश्चात् अन्य लोग अग्नि प्रज्वलित करें। कर्ता को मटकी मेंपानी भरकर लाना चाहिए।

    अग्नि का स्पर्श मृत व्यक्ति के शरीर को होनेपर कर्ता को पानी से भरी मटकी बायें कंधेपररखकर शव के पैरों की ओर खड़े होकर मुख पश्चिम दिशा में करना चाहिए। शव की डोरी तोड़ेहुए पत्थर (अश्मा) से मटकी के ऊपर की ओर एक छेद करना चाहिए। उसके पश्चात् पानी कोगिराते हुए उलटी परिक्रमा अर्थात् कर्ता के बायीं ओर से प्रारंभ करनी चाहिए। पहली परिक्रमा(प्रदक्षिणा) पूर्ण होने के बाद दूसरा छेद कर, दूसरी परिक्रमा करने के पश्चात् तीसरा छेद करतीसरी परिक्रमा पूरी करनी चाहिए। तीन परिक्रमा पूरी होने के पश्चात् मृत व्यक्ति के मस्तक केपास जाकर दक्षिण की ओर मुख कर मटकी को पीछे की ओर छोड़ देना चाहिए और तीन बारबोंब ठोकनी चाहिए। मृत व्यक्ति स्त्री हो तो पैरों के पास जाकर एवं उत्तर दिशा की ओर मुखकर मटकी को पीछे की ओर छोड़कर तीन बार बोंब ठोकनी चाहिए। तत्पश्चात् कर्ता ने अपनेउत्तरीय वस्त्र में उस पत्थर (अश्मा) को बांध लेना चाहिए। कर्ता को हाथ पाव धोने चाहिए।तत्पश्चात् कर्ता सहित सभी लोग घर जा सकते हैं।

    श्मशान घाट से घरपर लौटनेपर घर के किसी सदस्य को गेहूं अथवा जवार का आटा गुंदकर एक दीपक बनाना चाहिए। उस में बाती डालकर उसे प्रज्वलित करें एवं दक्षिण दिशा कीओर ज्योत करते हुए उसके ऊपर छलनी रखनी चाहिए। वह दीपक दस दिन तक अखंड रूपसे प्रज्वलित रखकर ग्यारहवें दिन उसका विसर्जन करना चाहिए। श्मशान से लाया हुआ अश्माएवं वस्त्र धोकर सुरक्षित जगहपर रखना चाहिए। श्मशान घाट से वापीस आनेपर मृत व्यक्ति केसगे रिश्तेदार तथा जिन्होंने कंधा दिया हो उन्होंने स्नान करना चाहिए। (अन्य व्यक्ति जो केवलअंत्ययात्रा में शामील हुए थे उन्होंने मृत व्यक्ति के घर जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने घरजाकर स्नान करने की परंपरा है तथा केवल हाथ-पैर धोकर तथा आँख और मस्तक को पानीलगाने से भी स्पर्शास्पर्श की शुद्धि होती है।)

    मृत व्यक्ति के वस्त्र एवं बिछाना (गद्दी/दरी) दान देना चाहिए। विशेषतः जिस बिछानेपर मृत्युहुई हो उसे घर में नहीं रखना चाहिए। अन्य वस्तुओं के संदर्भ में अपने विवेकानुसार निर्णय लेनाचाहिए। मृत व्यक्ति की जो वस्तुएँदीर्घकाल तक टिक सकती हो उसे स्मृति रूप रखने हेतु उसे साफ     कर रखना चाहिए, परंतु उसको उपयोग में नहीं लेना चाहिए। व्यक्तीगत उपयोग में लायी जानेवालीवस्तुएं जैसे चष्मा, पगड़ी, डेडा, जपमाला आदि वस्तुओं का विसर्जन करें अथवा दान देना चाहिए।हिम्पणी-विध्युतदाहिनी में दहन के संदर्भ में आगे विस्तृत जानकारी स्वतंत्र रूप से दी गई है।

    अस्थिसंचयन - तीसरे अथवा अन्य किसी दिन स्नानकर श्मशान घाट में अस्थि संचयनहेत साथ में दूध, दही, धी एकत्रितकर ले जाना चाहिए। गोमूत्र, गोमय (गोबर), सफेद पुष्प,तलसीपत्र, तिल, पानी, अगरबत्ती, कपूर, माचीस, अस्थि रखने हेतु वस्त्र, बाल्टी, लोटा, बोरी,,छोटी थेली आदि वस्तुएँ साथ में ले जानी चाहिए। श्मशान घाटपर जाने के बाद बाल्टी में थोड़ासा पानी लेकर उसमें गोमूत्र, गोबर, (एकत्रित किया हुआ) दूध-दही-धी, पुष्प, तुलसीपत्र, तिलबाल्टी के पानी में एकत्रित करें। जिसने अंतिम संस्कार किया हो उसने चिता के स्थानपर उसकाछिड़काव करना चाहिए। कर्ता तथा साथ में आये हुए व्यक्तियों को अस्थियाँ एकत्रित कर,साथ में लाये हुए कपड़ेपर रखनी चाहिए। रक्षा (राख) बोरी में भर लेनी चाहिए तथा श्मशानघाटपर अथवा नियत जगहपर डाल देनी चाहिए। गोमूत्र, दूध, दही, घी का मिश्रण अस्थियोपरछिडकना चाहिए। अस्थिपर पुष्प एवं तुलसी चढ़ानी चाहिए। दहन करते समय मंत्राग्नि न हुआहो तो मंत्राग्नि हेतु एक-दो अस्थि अलग रखनी चाहिए तथा शेष अस्थियाँ विसर्जन करने हेतुअलग से थेली में रखनी चाहिए। उसके पश्चात् फिर एक बार चिता की जगह गोमूत्र, गोमय(गोबर), दही, दूध, घी के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। तुलसी, पुष्प व तिल अर्पण करें।उस जगह अगरबत्ती तथा कपूर जलाना चाहिए। शेष दूध, दही, घी का मिश्रण वहीं छोड़ देनाचाहिए। उसके पश्चात् अलग से रखी हुई एक-दो अस्थि छोटी थैली में डालकर घर ले जाएं।शेष अस्थियों की थैली कर्ता को अथवा उसके रिश्तेदारों को नदी, कुंड, तीर्थस्थान अथवानियतस्थानपर जाकर विसर्जित करनी चाहिए। घरपर लायी हुई अस्थि को घर के बाहर अथवाबाल्कनी में सुरक्षित जगह रखकर तत्पश्चात् स्नान करें।

    विद्युत दाहिनी में किया जानेवाला दहनकर्म(अंत्येष्टि प्रकरण में आरंभ में दिए गए अंत्ययात्रा हेतु आवश्यक सामग्री, अंत्ययात्रा कीतैयारी, क्षौरकर्म, अरथी/ टिकठी तैयार करना, अंत्ययात्रा, पुत्तलविधि यह सभी विषयविद्युत दाहिनी में दहन करते समय भी उसी क्रम से और उसी प्रकार से किए जाते है।)

    विद्युत दाहिनी में यदि दहनक्रिया करनी हो तब विद्युत दाहिनी के श्मशानघाटपर जाकरअरथी सहित शव को अंदर ले जाकर दक्षिण दिशा की ओर सिर रखना चाहिए। उसके पश्चात्विधि संपन्न करानेवाला एवं अन्य पुत्रों को तिलांजली देनी चाहिए। उसके पश्चात् घी की दो बूंदेदोनों आँखों मे, दोनों कानों में, दोनो नासापुरों में तथा मुख में डालें। दहनक्रिया करनेवाले कोमृत व्यक्ति पुरुष हो तो शव के मस्तक की ओर तथा मृत व्यक्ति स्त्री हो तो शव के पैरों की ओरमटके में लाई हुई अग्नि रखनी चाहिए। कर्ता को पानी से भरी मटकी बायें कंधेपर रख कर शव के पांव की ओर खड़े होकर मुख पश्चिम दिशा में करना चाहिए। शव की डोरी तोड़े हुए पत्थर (अश्मा) से मटकी के ऊपर की ओर एक छेद करना चाहिए। उसके पश्चात् पानी को गिराते हुए उलटी परिक्रमा अर्थात् कर्ता के बायीं ओर से प्रारंभ करनी चाहिए। पहली परिक्रमा (प्रदक्षिणा) पूर्ण होने के बाद दूसरा छेद कर दूसरी परिक्रमा करने के पश्चात् तीसरा छेद कर तीसरी परिक्रमा
पूरी करनी चाहिए। तीन परिक्रमा पूरी होने के पश्चात् मृत व्यक्ति के मस्तक पास जाकर
दक्षिण की ओर मुख कर मटकी को पीछे की ओर छोड़ देना चाहिए और तीन बार बोंब ठोकनी चाहिए। मृत व्यक्ति स्त्री हो तो पैरों के पास जाकर एवं उत्तर दिशा की ओर मुख कर मटकी को पीछे की ओर छोड़कर तीन बार बोंब ठोकनी चाहिए। इसके पश्चात् शव को अरथी सहित विद्युत दाहिनी के पास ले जाना चाहिए। विद्युत दाहिनी के कर्मचारी ने शव को दाहिनी के पट्टीपर रखने के बाद कर्ता ने शेष अग्नि को शव के ऊपर रखना चाहिए। शव विद्युत दाहिनी के अंदर जाने के
बाद कुछ समय पश्चात् कर्ता ने अपने उत्तरीय वस्त्र में उस पत्थर (अश्मा) को बांध लेना चाहिए। कर्ता को हाथ पाव धोने चाहिए और कर्ता सहित सभी लोग घर जा सकते है।

श्मशान घाट से घरपर लौटनेपर घर के किसी सदस्य को गेहूं अथवा जवार का आटा गुंद कर एक दीपक बनाना चाहिए। उस में बाती डालकर उसे प्रज्वलित करें एवं दक्षिण दिशा की ओर ज्योत करते हुए उसके ऊपर छलनी रखनी चाहिए। वह दीपक दस दिन तक अखंड रूप से प्रज्वलित रखकर ग्यारहवें दिन उसका विसर्जन करना चाहिए। श्मशान से लाया हुआ अश्मा एवं वस्त्र धोकर सुरक्षित जगहपर रखना चाहिए। श्मशान घाट से वापीस आने पर मृत व्यक्ति के सगे रिश्तेदार तथा जिन्होंने कंधा दिया हो उन्हें स्नान करना चाहिए। (अन्य व्यक्ति जो केवल
अंत्ययात्रा में शामील हुए थे उन्हें मृत व्यक्ति के घर जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने घर जाकर स्नान करने की परंपरा है तथा केवल हाथ-पैर धोकर तथा आँख और मस्तक को पानी लगाने से भी स्पर्शास्पर्श की शुद्धि होती है।) 

मृत व्यक्ति के वस्त्र एवं बिछाना (गद्दी/दरी) दान देना चाहिए। विशेषतः जिस बिछानेपर मृत्यु हुई हो उसे घर में नहीं रखना चाहिए। अन्य वस्तुओं के संदर्भ में अपने विवेकानुसार निर्णय लेना
चाहिए। मृत व्यक्ति की जो वस्तुएँ दीर्घकाल तक टिक सकती हो उसे स्मृति रूप रखने हेतु उसे साफ कर रखना चाहिए, परंतु उसको उपयोग में नहीं लेना चाहिए। व्यक्तीगत उपयोग में लायी जानेवाली वस्तुएं जैसे चष्मा, पगड़ी, डंड़ा, जपमाला आदि वस्तुओं का विसर्जन करें अथवा
दान देना चाहिए।

अस्थिसंचयन- दूसरे अथवा तीसरें दिन स्नानकर श्मशान घाट में अस्थि संचयन हेतु जाना चाहिए, साथ में दूध, दही, घी एकत्रित कर ले जाना चाहिए। गोमूत्र, गोमय, तिल, सफेद पुष्प एवं तुलसीपत्र ले जाना चाहिए। श्मशान घाटपर जाने के बाद गोमूत्र, गोमय और दूध, दही, घी के मिश्रण का छिड़काव अस्थियोंपर करना चाहिए। अस्थिपर पुष्प एवं तुलसी चढ़ानी चाहिए।

दहन करते समय मंत्राग्निविधि न हुआ हो तो मंत्राग्नि हेतु एक-दो अस्थि अलग रखनी चाहिए तथा शेष अस्थियाँ विसर्जन करने हेतु अलग से थैली में रखनी चाहिए। उसपर तुलसी, पुष्प व तिल चढ़ाने चाहिए। उसके पश्चात् अलग से रखी हुई एक-दो अस्थि छोटी थैली में डालकर घर ले जाएं। शेष अस्थियों की थैली कर्ता को अथवा उसके रिश्तेदारों को नदी, कुंड, तीर्थस्थान अथवा
नियत स्थानपर जाकर विसर्जित करनी चाहिए। घरपर लाई हुई अस्थि को घर के बाहर अथवा बाल्कनी में सुरक्षित जगह रखनी चाहिए। तत्पश्चात् स्नान करना चाहिए।

देहदान करनेपर अंत्यकर्म कर सकते है।

वर्तमान समय में बहुत से व्यक्ति मरणोपरांत देहदान करते हैं। धर्मशास्त्र के किसी भी ग्रंथ में देहदान के उपरांत कोई धार्मिक विधि करना चाहिए इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। परंतु आजकल वैद्यकीय महाविद्यालयों में मृतदेह की अभ्यास हेतु आवश्यकता होने से कुछ लोग
मरणोपरांत देहदान करते है। अर्थात् ऐसे समय में कानूनी कागजात की प्रक्रिया पूरी कर प्रतिज्ञा पत्र भी देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त घर के सदस्यों की अनुमति एवं सहायता की भी
आवश्यकता रहती है। मरणोपरांत नेत्रदान करने के कारण अनेक दृष्टिहीनों को पुनः दृष्टी मिल जाती है, यह सब को विदित है। नेत्रदान करने के पश्चात् अंत्येष्टि करने में कोई कठिनाई नहीं आती है। देहदान करने के पश्चात् पहले दिन से लेकर दसवें दिन तक किसी भी दिन पर्णशरदाह विधि करना चाहिए और दस दिन पश्चात् ग्यारहवें से तेरहवें तक के सभी कर्म करने चाहिए।
(इसकी विस्तृत जानकारी अंत्यकर्म के श्राद्ध इस अध्याय में देखें।)

उत्तरक्रिया का संक्षेप में विवरण

व्यक्ति की मृत्यु होने के पश्चात् अग्निसंस्कार के बाद अनेक धार्मिककार्य संपन्न किये जाते
हैं। मुख्यतः किये जानेवाले प्रमुख विधि "प्रेतस्य प्रेतत्व निवृत्तया उत्तमलोक प्राप्त्यर्थं ..." इस संकल्प से किये जाते हैं। प्रथमतः मृत्यु के पश्चात् पहले दिन से नौ दिनों तक प्रतिदिन प्रेतक्रिया के हेतु (विषमदिन सहित) ९ अवयव श्राद्ध करते हैं। इस में प्रतिदिन स्नान, आचमन, उत्तरीय
धारण, देशकालोच्चारसहित संकल्प, मृत्तिकास्नान, तिलतोयांजली, पिंडदान, विष्णुस्मरण आदि विषय रहते हैं, परंतु यह विधि घर में नहीं करनी चाहिए।

नवमदिन - आजकल बहुत बार ऐसा होता है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसी दिन दाह संस्कार न होनेपर कुछ दिन बाद भी होता है, परंतु सूतक मृत्यु के उपरांत ही प्रारंभ होता है। दहनविधि के पश्चात् ही अन्यविधि (प्रेतविधि) करनी होती है, इस कारण सामान्यतः ९ वें दिन ही पहले दिन से ९ वें दिन तक के श्राद्ध संपन्न किये जाते हैं। शहरों में तो बहुत बार अंत्येष्टि संपन्न होते ही
अस्थि संचयन किया जाता है। इस हेतु सिर्फ गोमूत्र का छिड़काव किया जाता है। पाथेयश्राद्ध, 

अस्थिसंचयन श्राद्ध एवं नवमश्राद्ध ९ वें या १० वें दिन किये जाते है। मृत व्यक्ति के अवयव (लिंग देहात्मक) उत्पन्न हो इस हेतु यह श्राद्ध होते है, इसलिए नवमश्राद्ध को अवयवश्राद्ध भी कहते है। यह अवयवश्राद्ध मंत्राग्नि से अंत्येष्टि हुई हो तो उत्कर्ष से करते है।

व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही सूतक (अशौच) प्रारंभ होता है, परंतु बहुत बार ऐसा होता है की मृत व्यक्ति का देह यदि वह विदेश में है या अन्य किसी कारण से सूतक समाप्ति के बाद ही मिलता है तभी दहनक्रिया संपन्न होती है। ऐसी स्थिति में कर्ता दहनविधि कर उस दिन का सूतक रखकर तुरंत दूसरे दिन से नौ दिन के आगेवाले कर्म क्रमशः करने चाहिए। दूर जगह यदि अंत्येष्टि संपन्न
हुई हो तब केवल अश्मा लाकर ऊपर वर्णित नवमदिन के आगे के कर्म संपन्न करने चाहिए।

दसवां दिन - दसवें दिन को दशपिंड भी कहते है। इस दिन दक्षिणाभिमुख वेदीपर अश्मा, उदककुंभ, पिंड रखकर क्रियाकर्म करते है। पिंड को काकस्पर्श होना भी इसी दिन होता है। काकबली हेतु रखे गये पिंड को वायस पिंड कहते है। काकस्पर्श के बाद अश्मा पूजन होता है। अश्मा के ऊपर रिश्तेदार, सगे-संबंधी और स्नेहिजन तिलांजली देते है। तत्पश्चात् पिंड के साथ
अश्मा का विसर्जन होता है। सूतक समाप्ति ग्यारहवें दिन अर्थात् दस रात्रि बीतने के बाद होती है। ९ वें अथवा १० वें दिन उसी घर में रहनेवाले किसी व्यक्ती की मृत्यु होनेपर मृत व्यक्ती का दहनविधी प्रथम करें, तत्पश्चात् स्नानकर पहले मृत हुए व्यक्ती का ९वें / १०वें दिन का कर्म करें।

ग्यारहवां दिन - त्रिपाद या पंचक नक्षत्र की शांति सूतक समाप्ति के बाद ग्यारहवें दिन अथवा सपिंडी के बाद करनी चाहिए। एक को अर्थात् मृतक को उद्देशकर एक पिंड से जो श्राद्ध संपन्न किया जाता है उसे एकोद्दिष्ट अथवा महैकोद्दिष्ट श्राद्ध कहते हैं। (जिस व्यक्ति की सपिंडी नहीं कर सकते जैसे अविवाहित बेटा / बेटी, इस संबंध में अधिक जानकारी सपिंडीकरण के अध्यायमें देखें।) एकोद्दिष्ट के पश्चात् बारहवें दिन सपिंडीकरण करते हैं, यह सपिंडीकरण ग्यारहवें दिन भी कर सकते हैं। इसके पश्चात् तेरहवीं करने की परंपरा हैं। सपिंडी-पिंड संयोजन करने के बाद शांतोदक विधि करते हैं। मृत्यु यह घटना अशुभ मानी जाती है, अतः उसके परिहारार्थ निधनशांति करना उचित है। उसी दिन कर्ता के साथ सभी परिवारजनों को मंदिर में जाकर
देवदर्शन करना चाहिए।

(ग्यारहवीं, बारहवीं तथा तेरहवीं अलग-अलग करना संभव न हो तब तीनों दिन का श्राद्ध ग्यारहवें दिन कर सकते है, परंतु ग्यारहवीं तथा बारहवीं घर के बाहर करें पश्चात् स्नान आदि शुद्धि कर घर में तेरहवीं कर सकते है।)

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