सिंह लग्न सम्पूर्ण विवेचन एवं विश्लेषण

 सिह लग्न सम्पूर्ण विवेचन एवं विश्लेषण स्वभाव और जीवानवृति :सिंह लग्न (लग्नेश सूर्य)


जन्मकुंडली के प्रथम भाव में सिंह राशि हो तो जातक सिंह लग्न का होता है। सिंह राशि का राशीश सूर्य है। अतः सिंह लग्न का लग्नेश भी सूर्य होता है। यदि कर्क को ’रानी लग्न’ माना गया है तो सिंह को ’राजा लग्न’ माना जाता है (केवल कर्क व सिंह लग्न/राशि ही ऐसे हैं जिनके स्वामी चन्द्र व सूर्य मात्र इन्हीं के एकछत्र स्वामी हैं। शेष सभी लग्न/राशियों के स्वामी दो-दो राशियों/लग्नों के स्वामी होते हैं। पाठकों को स्मरण दिला दें। अतः कर्क व सिंह महत्वपूर्ण लग्नों में सर्वप्रथम हैं)। सिंह लग्न के जातकों का विवेचन करने के लिए हमें इस राशि के प्रतीक ’सिंह’ (बब्बर शेर) तथा स्वामी सूर्य की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। इस आधार पर संक्षेप में सहज ही कहा जा सकता है कि सिंह लग्न के जातक जोशीले, असहनशील, क्रोधी, स्वतंत्रता प्रेमी, डोमिनेट करने वाले (नेतृत्व क्षमता से युक्त व आदेश देना या शासन करना, पसंद करने वालों या हावी हो जाने वाले), शरीरवादी, निडर, आत्मविश्वासी, अभिमानी किन्तु आलसी व निद्रालु होते हैं (मंगल-सूर्य की स्थिति खराब हो तो ऐसे जातक हिंसक, आक्रामक तथा क्रूर भी हो सकते हैं)।


जन्म कुंडली : सिंह लग्न में जन्म लेने वाले जातकों में शेर की तरह आदतें पाई जाती है. यह एक अग्नि तत्व प्रधान राशि है. सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली के पांचवें भाव की राशि है. पांचवां भाव संतान, जन्मजात ज्ञान और बुद्धि का होता है. जिन लोगों का जन्म सिंह लग्न में होता है वे साहसी  होने के साथ साथ गर्म स्वभाव वाले होते हैं. ऐसे लोग नेतृत्व करने वाले होते हैं.

 

आपका जन्म अगर सिंह लग्न में हुआ है तब आप साहस से भरपूर होगें. आप निर्भीक व पराक्रमी व्यक्ति होगें. प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आप आसानी से घबराने वाले व्यक्ति नहीं होते हैं. आप अपनी संस्था के कुशल संचालक हो सकते हैं अथवा आपको जो भी काम दिया जाएगा उसे आप बहुत ही खूबसूरती से संचालित करते हैं और कामयाब होते हैं.

 

सिंह राशि स्थिर स्वभाव की राशि है इसलिए आपके कार्यों में ठहराव रहेगा और आप बुद्धिमत्तापूर्ण रुप से निर्णय लेगें. आप जल्दबाजी में कोई काम करना पसंद नहीं करेगें. आप पहले उसके दूरगमी परिणाम देखेगे फिर आगे बढे़गें.

 

आपके अंदर नेतृत्व के सभी गुण मौजूद होगें और आप एक अच्छे लीडर बन सकते हैं. आप अपनी टीम को आगे बढ़ाने की सभी विशेषताएँ रखते हैं. आप हठीले किस्म के व्यक्ति हो सकते हैं. एक बार जो जिद ठान ली तो बस ठान ली, उसे फिर कोई नहीं बदल सकता है. आप अत्यधिक महत्वाकांक्षाएँ भी रखते हैं और उन्हें पूरा करने का हर भरसक प्रयास भी करते हैं. आपके अंदर आत्मविश्वास भरा होता है, इसी कारण आपको कोई आसानी से आपके इरादों से हिला नही सकता है.

 आप आनंद से जीवन ब्यतीत करने वाले रिपुओं (शत्रु ) और बिरोधियों पर विजय प्राप्त करने वाले होंगें | स्पष्टवादी होते हुए आप निष्कपट और मनसा वाचा से पवित्रता पालन करने वाले होंगें |

नीच कर्म से घृणा करने वाले धैर्यवान और उदार तथा आप जिस कार्य को करेंगे उसको  पूरी ईमानदारी तथा निपुणता से करेंगें | आप अपने गुणों तथा साहस से बिघ्न बाधाओं का शीघ्र निपटारा कर सकते हैं | नीच कर्म से लाभ की सम्भावना होने पर भी आप उससे घृणा करेंगें |

अपनी मर्यादा के पालन में सर्बदा तत्पर रहेंगें | आपके रहन सहन से बड़प्पन प्रतीत होगा मित्रता में अटल तथा विश्वास पात्र होंगें | आप केवल दयालु ही नहीं बल्कि सत्पात्र की रक्षा में भी तत्पर रहेंगें |

दुःख के समय में आप अपनी सूझ बूझ को काम में लाकर दुःख के निवारण में समर्थ होंगें |

आप शत्रुओं से झगड़ा नहीं करके धैर्य से काम लेने वाले शांति पूर्वक ब्यौहार करने वाले तथा आपकी रूचि आलसी मनुष्यों के प्रति तथा ऐसे लोग जो उद्यम द्वारा अपनी अवस्था की उन्नति नहीं करते, अच्छी नहीं होती |

आपको अपने उद्यम और  परिश्रम का फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होगा | लोगों पर आपके गुणों का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है |

आप अपनी आज्ञा तथा रूचि के अनुसार अन्य मनुष्यों को चलने में कुशल होंगें | आपका जीवन प्रायः सुखी और धन से परिपूर्ण रहेगा 

सिंह राशि की गिनती राजसी राशि में की जाती है और इसके स्वामी सूर्य को सभी नौ ग्रहों में राजा की उपाधि दी गई है, इसलिए आपके भीतर भी राजनीति में भाग लेने की इच्छा रहती है और मौका मिलते ही आप किसी ना किसी संस्था के सदस्य बनने के लिए चुनाव में भाग ले भी लेते हैं.

 सिंह राशि व लग्न सम्पूर्ण परिचय

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सिंह लग्ने समुत्पन्नो धनी भोगी शत्रुविमर्दक:।

स्वल्पोदरो अल्पपुत्रशच सोत्साहि रणविक्रमी मांस प्रियः।।


आकाश मंडल में सिंह राशि पंचम क्रम में है। इसका विस्तार १२० अंश से १५० अंश के अंदर होता है।

इस राशि के अंतर्गत मघा नक्षत्र के चारो चरण, पूर्वाफाल्गुनी के चारो चरण तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम चरण समाहित है।

मघा नक्षत्र का स्वामी केतु पूर्वाफाल्गुनी का शुक्र तथा उत्तरा फाल्गुनी का स्वामी सूर्य है।


आकाश मंडल में इस राशि का स्वरूप सिंह के समान है इसी कारण इस राशि का प्रतीक चिन्ह सिंह माना जाता है।इस राशि का स्वामी सूर्य एव इस राशि के अन्य पर्यायवाची नाम केशरी, मृगाशन, चित्रकाय, मृगारी, रविभ, पंचानन, पुण्डरीक, हरि इत्यादि है। अंग्रेजी में इसे lio कहते है। इस राशि का अधिकार कालपुरुष के हृदय एवं उदर पर है। यह अग्नि राशि शौर्य, पराक्रम, प्रचंडता, अधिकार एवं नेतृत्व की प्रतीक है। यह अग्नि तत्त्व, पुरुष राशि, दीर्घाकार, उष्ण व स्थिर स्वभाव, पित्त प्रकृति, शीर्षोदय, विषम राशि, क्षत्रिय जाती, क्रूर संज्ञक, रजोगुणी, रक्तवर्ण, रजस गुण प्रधान, दिन में बली, पूर्व दिशा की स्वामी है। इसकी प्रिय धातु सुवर्ण, तांबा प्रिय रत्न माणक (Ruby) है। जिस की जन्म समय मे निरयण चंद्र यदि सिंह राशि मे संचार कर रहा होता है तो उसकी जन्म राशि सिंह मानी जायेगी। गोचर में निरयण सूर्य प्रतिवर्ष इस राशि पर लगभग, १६ अगस्त से १५ सितंबर तक संचार करता है। 

सूर्य इस राशि के ० से २० अंश तक मूलत्रिकोणस्थ होता है। केतु की भी मूल त्रिकोण राशि सूर्य ही है।


मुख्य गुण विशेषताये👉 सिंह जातक साहसी, दिलेर, खुशमिजाज, प्रभावशाली व्यक्तित्त्व, गंभीर वाणी, अहम युक्त, स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी, उच्चाभिलाषी, खर्चीला स्वभाव, वैभवशाली रईसी रहन-सहन, आशावादी दृष्टिकोण के होते है।


सिंह लग्न जातको की प्रमुख विशेषताये

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शारीरिक संरचना👉 सिंह लग्न में सूर्य सुभस्थ हो तो जातक का सुगठित एवं पुष्ट शरीर, कुछ बड़े व चौड़े मुखमंडल वाला, बलिष्ठ भुजाएं, कुछ लालिमा युक्त बड़ी व सुंदर आंखे, चौड़ी भरी हुई छाती, सामान्यतः ऊंचा कद, चौड़ा मस्तक एवं मजबूत अस्थियां, बाल्यकाल में काले घने  व घुंघराले बाल, आकर्षक व प्रभावशाली व्यक्तित्त्व, एवं गंभीर वाणी का स्वामी होता है। जातक तेज गति से चलने वाला, पतली कमर, प्रारंभिक आयु में इकहरा बदन परंतु रौबीला चेहरा होगा।


चारित्रिक विशेषताये👉 सिंह जातक की कुंडली मे गुरु-मंगल भी सुभस्थ हों तो ऐसा जातक तीव्र बुद्धिमान, स्वाभिमानी, उच्च-अभिलाषी, उदार-हृदय, निडर व आत्मविश्वास से भरपूर, धैर्यवान, उद्यमी, पराक्रमी, गंभीर प्रक़ति, न्याय प्रिय, संवेदनशील, आशावादी दृष्टिकोण, नेतृत्व व संचालन करने की क्षमता, अधिकार पूर्ण वाणी का प्रयोग करने वाला, अपने परिवार की उन्नति के लिये विशेष संघर्ष करने वाला, परिश्रमी, परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढाल लेने की प्रकृति, स्पष्टवादी, स्वतंत्र व प्रगतिशील विचारों का अनुयायी, ये किसी प्रकार के बंधन या आधीनता में काम करना पसंद नही करते, भ्रमण प्रिय अर्थात सुदूर देश विदेश में यात्रा करने का शौक होगा। चंद्र शुक्र के प्रभाव से देश विदेश में भी यात्रा करने के अवसर मिलेंगे।


सिंह जातक की कुंडली मे मंगल शुक्र भी शुभस्थ हो तो जातक उच्चशिक्षति व इनकी मानसिक व आत्मिक शक्ति प्रबल होती है। बाधाओं व परेशानी के समय य विचिलत नही होते। उच्चस्तरीय व्यवसाय करनेमे प्रबल इच्छा रखेंगे। अपनी मान प्रतिष्ठा का भी विशेष ध्यान रखते है। उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ संपर्क होते हैं।

विदेश संबंधों से विशेष भाग्योन्नति के योग बनते है। शुक्र के कारण संगीत कला व साहित्य का भी शौक रहते है। मंगल यदि पंचम भाव मे हो तो जातक क्रोध आने पर भयंकर रूप धारण करने वाला परन्तु अपने बुद्धि चातुर्य से स्थिति को संभाल लेता है। इनकी उच्च स्तरीय रहीसी जीवन यापन करने की प्रबल आकांक्षा होती है। इस कारण ये कई बार अपनी सीमा से बढ़कर भी खर्च कर देते है। इससे कई बार कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। विभिन्न प्रकार के उत्तम वस्त्र, आवस, सौंदर्य-प्रसाधन, बढ़िया वाहन आदि बाहरी शानोशौकत व प्रदर्शन पर अनावश्यक रूप से अधिक व्यय होता है। सामाजिक क्षेत्र पर जातक मिलनसार, व्यवहार कुशल, भाग्यशाली किन्तु अपने ही पुरुषार्थ पर भरोसा करने वाला, धनवान एवं भूमि सवारी आदि सुखों से सम्पन्न होता है।


सावधानी👉 सामान्यतः सिंह जातक उदारता से व्यवहार करते है परन्तु कई बार आवेश व क्रोध में लाभ की जगह अपनी हानि कर लेते है। आत्म-प्रदर्शन व अत्यधिक हठ भी इनके लिये हानिकारक होती है।


सिंह लग्न जातको का स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय-आर्थिक स्थिति और प्रेम-वैवाहिक सुख

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स्वास्थ्य और रोग👉 सिंह लग्न के जातक का स्वास्थ्य प्रायः अच्छा ही होता है। सामान्य स्थिति में ये जातक यदि बीमार होभी जाए तो शीघ्र ठीक भी हो जाते है। सिंह लग्न की कुंडली मे यदि लग्नस्थ सूर्य अशुभस्थ हो तथा कुंडली शनि, राहु, केतु आदि अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो, तो जातक को तीव्र ज्वर, मस्तिष्क पीड़ा, नेत्र रोग, उदर विकार, पीठ में दर्द, लू लगना, स्नायु एवं त्वचा रोग, उच्च रक्तचाप, हृदय के रोग, मंदाग्नि, अपचन, आदि रोगों की संभावना अधिक होती है।

सिंह जातको को अत्यधिक तनाव, क्रोध, उत्तेजना, तम्बाकू एवं शराब, आदि नशीली वस्तु और तामसिक भोजन (मांस, मछली) आदि के सेवन से परहेज करना चाहिए तथा संतुलित व सात्विक भोजन करना चाहिए अन्यथा इन्हें पेट की बीमारी होने पर अन्य गंभीर रोग होने की संभावना बढ़ती है।


शिक्षा👉 सिंह लग्न की कुंडली मे यदि मंगल, गुरु व सूर्य ग्रह शुभस्थ हो तथा इनही ग्रहों में से किसी की दशा-अंतर्दशा चल रही हो, तो जातक उच्च व्यावसायिक शिक्षा में सफलता प्राप्त कर लेते है। विशेषकर उच्च प्रशाशनिक विद्या, कॉमर्स, चार्टर्ड अकाउंटेंट, मेडिकल, कम्प्यूटर शिक्षा, तकनीकी इंजीनियरिंग, अध्यापन, क्लेरिकल आदि क्षेत्रों में अच्छी सफलता प्राप्त कर सकते है।


व्यवसाय और आर्थिक स्थिति👉 सिंह जातक की कुंडली मे सूर्य-मंगल-गुरु, शुक्रादी ग्रह शुभस्थ हो एवं इन्ही ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा का प्रभाव चल रहा हो तो निम्न व्यवसायों में से किसी एक मे (अपनी योग्यता अनुसार) अच्छी सफलता पा सकता है।


सफल व्यापारी, प्रबंधात्मक क्षेत्र, प्राध्यापन, फोटोग्राफी, कलाकार, अभिनेता, राजनीति क्षेत्र, प्रशासन, न्यायाधीश, वकील, पुस्तक प्रकाशन, लेखक, चिकित्सक, केमिस्ट, सेना-पुलिस आदि रक्षात्मक कार्य, होटल, स्टेशनरी, ऊनी वस्त्र-उद्योग, सुवर्णकार, घरेलू सजावट, ठेकेदार, अम्बेसडर, मैनेजर, धर्म गुरु आदि क्षेत्रों में कामयाब हो सकते है। चंद्र यदि शुभस्थ हो तो विदेश में भाग्योन्नति होगी।


आर्थिक स्थिति👉 सिंह जातक की आर्थिक स्थिति कुंडली मे सूर्य, मंगल, बुध शुक्रादी ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति पर निर्भर करेगी। जन्म एवं चलित कुंडली मे यदि इन ग्रहों की स्थिति शुभ है तथा इन्ही ग्रहों में से किसी शुभ ग्रह की दशा चल रही हो तो जातक की पारिवारिक एवं आर्थिक स्थिति अच्छी होती है।

चंद्रमा यदि अशुभ हो तो जातक बाहरी आडंबर एवं प्रदर्शन पर अधिक खर्च करेगा। सिंह जातक को अपनी आय वृद्धि के साथ-साथ वृथा खर्च पर भी नियंत्रण रखना चाहिये।


प्रेम और वैवाहिक सुख👉 सिंह जातक प्रेम के संबंध में अधिक उदार व निष्ठावान होते है। विपरीत भोग के प्रति अत्यधिक आकर्षण होने के बाद भी स्वाभिमान के कारण शीघ्र अपनी भावनाओं को प्रकट नही करते, परन्तु एकबार प्रेम आकर्षण या संबंध हो जाये तो उस प्रेम को पूरी ईमानदारी व निष्ठा से निभाते है। कुंडली मे यदि शनि शुभस्थ हो तो जातक अपनी पत्नी एवं परिवार के प्रति पूर्णतया समर्पित रहते है। परन्तु शनि अशुभस्थ होने से दाम्पत्य जीवन मे वैमनस्य एवं असंतोष पैदा होने की संभावना रहती है। सिंह जातक को अच्छी प्रकार जन्म कुंडली मिलान करके ही विवाह करना चाहिये।


सिंह लग्न की जातिका

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सिंह लग्न (राशि) मे उत्पन्न कन्या सुन्दर, चौड़ी मुखाकृति वाली संतुलित शरीर रचना, सामान्यतः ऊंचा कद, पतली कमर, सुन्दर बड़ी-बड़ी आंखे, आकर्षक व प्रभावशाली व्यक्तित्त्व वाली होती है।


चारित्रिक विशेषताये👉 सिंह लग्न की कुंडली मे मंगल-गुरु व सूर्य शुभस्थ हो तो ऐसी जातिका बुद्धिमान, उदार-हृदय, स्पष्टवादी (बोल्ड), परोपकारी स्वभाव, आत्मविश्वास से युक्त, स्वाभिमानी, परीश्रमी, परोस्थितियो के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाली, निडर, मजबूत दिल, धैर्यवान, अधिकार पूर्ण वाणी का प्रयोग करने वाली, जातिका प्रगतिशील परंतु स्वतंत्र विचारों वाली, अपने अधिकारों के प्रति पूर्णतः सजग, हँसमुख व्यवहार कुशल, उद्यमी तथा अपने पुरुषार्थ पर भरोसा करने वाली होगी। यदि कुंडली मे शुक्र भी शुभस्थ हो तो वैभवशाली, अच्छा आवास, सुन्दर गाड़ी व उच्चस्तरीय जीवन यापन करने में प्रयास शील रहेगी।


मंगल-शुक्र👉 के कारण नाजुक मिजाज एवं संवेदनशील प्रकृति की होगी।खुशामद पसंद एवं अपनी प्रसंशा की चाह रखने वाली होगी। अपने विरुद्ध आलोचना बिल्कुल सहन नही करेगी। गायन, संगीत, कला एवं साहित्य की और विशेष झुकाव होगा। ऐसे जातिका भोग प्रिया अर्थात अच्छे कपड़े, खान-पान एवं सौंदर्य प्रसाधन की शौकीन तथा उनपर काफी खर्च करने वाली होगी।


चंद्र-शुक्र👉 के प्रभाव से भ्रमण प्रिया अर्थात देश-विदेश में भ्रमण करने की उत्कृष्ट इच्छा रखेगी। 


शुभ गुरु के प्रभाव से जातिका उच्च व्यावसायिक विद्या पाने में सफल होगी। गुरु के कारण अपनी प्रतिष्ठा का भी ध्यान रखेगी। अपने आदर्शों के विपरीत किसी भी प्रकार का सौदा नही करेगी। उच्च संस्कारो से युत गुणवान जातिका होगी। ऐसी जातिका अपनी मौलिक विशेषताओ व गुणों के आधार पर अपने परिवार व समाज मे विशेष प्रतिष्ठा पाने वाली होंगी।


स्वास्थ्य एवं रोग👉 सिंह लग्न की जातिका का स्वास्थ्य सामान्यतः बाहरी तौर पर अच्छा दिखाई देता है। लेकिन कुंडली मे यदि सूर्य, बुध, मंगलादि ग्रह अशुभ हो तो जातिका का स्वास्थ्य गलत एव अनियमित खान-पान के कारण बिगड़ जाता है। इन्हें अनिष्ट ग्रहों के प्रभावस्वरूप प्रायः निम्न रोगों की संभावना अधिक रहती है।

रक्त विकार, निम्न या उच्च रक्तचाप, स्नायु रोग, मस्तिष्क पीड़ा, मेरुदंड या पीठ में समस्या, मस्तिष्क पीड़ा, हृदय रोग, दबाव, तनाव आदि मानसिक विकृति, तीव्र ज्वार, मासिक धर्म मे गड़बड़ी, हिस्टीरिया, मंदाग्नि, अतिसार, शनि-मंगल-गुरु आदि अशुभ हों तो गर्भस्त्राव, दुर्घटना आदि में चोट ऑपरेशन की संभावना हो जाती है।

इन्हें तामसिक भोजन, गर्मी से तथा क्रोधावेश एवं उत्तेजना तथा तामसिक आहार एवं कुविचारों से बचना चाहिए।


उपयुक्त व्यवसाय👉 सिंह लग्न जातिकाओ को राज्य स्तरीय सेवा, शिक्षिका, प्राध्यापिका, लेखन, दूरदर्शन, ड्रेस-डिजाईनिंग, कम्पनी-आफिस में प्रबंधकीय कार्य, खेलकूद, चिकित्सा, पर्यटन, कानून, एक्टिंग एवं उच्च प्रशासकीय कार्य क्षेत्र, घरेलू साज-सज्जा, अभिनय आदि कार्य अनुकूल एवं लाभदायक होते है।


इसके अतिरिक्त फोटोग्राफी, कलाकार, राजनीति क्षेत्र, प्रशासन, न्यायाधीश, वकील, पुस्तक प्रकाशन, लेखक, चिकित्सक, केमिस्ट, सेना-पुलिस आदि रक्षात्मक कार्य, होटल, स्टेशनरी, ऊनी वस्त्र-उद्योग, सुवर्णकार, घरेलू सजावट, ठेकेदार, अम्बेसडर, मैनेजर आदि कार्य भी अनुकूल रहते है।


प्रेम और वैवाहिक सुख👉 सिंह जातिका वैवाहिक एवं प्रेम संबंधों में अत्यंत उत्साही, सक्रिय एवं कुशल भूमिका निभाती है। ये अपने पति, बच्चों व परिवार के प्रति पूर्ण निष्ठावान एवं समर्पित होती है। ये बाहरी हस्तक्षेप सहन नही करपाती। पति के साथ घरेलू तथा सामाजिक दायित्वों को पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश करती है। आर्थिक क्षेत्र में भी सहायके रहती है।

कुंडली मे गुरु व शनि शुभस्थ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है। भली भांति कुंडली मिलान करके किया गया विवाह शुभ व सफल होगा। नीचे दी गई राशियों में मध्य किया गया विवाह इनके लिए अनुकूल व लाभदायक होगा।


इन्हें मेष, मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुम्भ राशि के जातको के साथ मैत्री एवं विवाह संबंध शुभ व सुखदायक रहेगा।


सिंह लग्न में शुभ योगकारक ग्रह एवं भावानुसार ग्रहों का फल

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सिंह लग्न में शुभ ग्रह👉 इस लग्न में लग्नेश सूर्य व भाग्येश व सुखेश मंगल सर्वाधिक शुभ व योगकारक माने जाते है।


अशुभ ग्रह👉 बुध, शुक्र व शनि सिंह लग्न में अशुभ फलकारक होते है। जबकि गुरु व चंद्र कुंडली मे शुभाशुभ फल प्रदायक होते है।

ग्रहों की स्थिति के फल में उन पर अन्य ग्रहों की शुभाशुभ दृष्टि का भी विचार कर लेना चाहिए।


भावानुसार ग्रहों का फल

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सूर्य👉 सिंह लग्न में १,२,३,४,५,९,१० व ११ वें भाव मे सूर्य शुभ तथा शेष अन्य भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है।


चंद्रमा👉 २,३,७,९,१० एवं ११ वें भावो में शुभ तथा अन्य सभी भावो में मिश्रित एवं अशुभ फल देता है।


मंगल👉 १,२,३,४,५,९ व दशम भाव मे शुभ तथा अन्य स्थानों में अशुभ या मिश्रित फल देता है।


बुध 👉 १,२,३,५,७,९ एवं ११ वें भावो में शुभ शेष में अशुभ फलदायी रहता है।


गुरु 👉 १,३,५,९,१० व ११ वे भावो में शुभ शेष सभी स्थानों में अशुभ रहता है।


शुक्र👉 १,२,३,४,५,९,१० व ११ वें भाव मे शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित या अशुभ फल देता है।


शनि👉 ३,५,८,९ एवं ११ वे भाव मे शुभ तथा अन्य स्थान पर अशुभ या मिश्रित फल देता है।


राहु👉 ३,९,१० व ११वें भाव मे शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित फल प्रदान करेगा।


केतु👉 १,४,५,९ व १२ वे भावो में शुभ अन्य भावो में अशुभ फलकारक रहेगा।


सिंह लग्न में शुभाशुभ ग्रहों के योग एवं तीन ग्रहों के फल

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सूर्य-मंगल👉 लग्नेश व भाग्येश का यह योग राजयोग कारक बनता है। यह योग १,२,४,५,९ व ११ वें भावो में शुभ तथा शेष अन्य स्थानों में मध्यम होता है। इस योग के प्रभावस्वरूप जातक भाग्यशाली, उच्चपद प्रतिष्ठित एवं भूमि, जायदाद, सवारी आदि सुखों से सम्पन्न एवं जातक का विदेश या जन्म स्थान से दूर भाग्योदय होता है।


सूर्य-गुरु👉 केन्द्रेश व त्रिकोणेश का संबंध अत्यंत शुभ माना जाता है। लेकिन गुरु के यहां अष्टमेश भी होने से यह योग दोषयुक्त भी है। इस योग जेम्स जातक को बुद्धि, उच्चविद्या, प्रतिष्ठित पद, संतानादि सुखों की प्राप्ति होती है।


मंगल-गुरु👉 कुंडली मे चतुर्थेश एवं पंचमेश का योग शुभ माना गया है। इस योग के प्रभाव से जातक भाग्यशाली, उचव्यवसायिक विद्या (जैसे कम्प्यूटर, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी आदि) क्षेत्रों में सफलता मिलती है। यह योग भूमि, जायदाद, वाहनादि सुख संपन्नता देता है।


मंगल-शनि👉 यह दोनों क्रूर ग्रहों का योग है। इस योग के प्रभाव से जातक को संघर्ष के साथ ३६ वर्ष आयु के बाद तकनीक, मेडिकल क्षेत्र तथा भूमि, वाहन एवं भाग्योन्नति होती है।


सूर्य-शुक्र👉 यह योग भी अत्यंत कठिनाई व संघर्ष के बाद (३३ वर्ष के बाद) स्त्री के सहयोग से जन्म स्थान से दूर अथवा विदेश ने विशेष उन्नति कारक होता है।


चंद्र-मंगल👉 यह योग भाग्य एवं अन्य सांसारिक सुख साधनों में उन्नति कारक होता है। विशेषकर विदेश संबंधित कार्यो में लाभ दिलाता हैं।


सूर्य-बुध👉 यह योग जातक को उच्चशिक्षित, प्रतिष्ठित, धन-संपदा, वाहन आदि कार्यो के लिये लाभदायक रहता है। 


गुरु-चंद्र👉 इस योग से जातक बुद्धिमान, गुणी, परिश्रमी, एवं दूरंदेश होता है तथा पत्नी सुंदर-सुशील एवं कार्यक्षेत्र में हर तरह से सहायक होती है। द्वादश भाव मे यह योग बने तो जातक की जन्म स्थान से दूर अथवा विदेश में भाग्योन्नति होती है।


सिंह लग्न के जातको को👉 सूर्य-चंद्र, चंद्र-बुध, गुरु-शुक्र, शुक्र-मंगल, गुरु-शनि, बुध-शनि आदि योगों का फल सामान्यतः मिश्रित (शुभाशुभ) मिलता है।


गुरू-शुक्र👉 का योग जातक के कार्य क्षेत्र में संघर्ष व उतार-चढ़ाव के बाद सफलता प्रदान करता है। (मतांतर से यह योग निष्फली होता है)।


सिंह लग्न में तीन ग्रहों का फल

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सूर्य-मंगल-बुध👉 सिंह लग्न में सूर्य-मंगल व बुध एकसाथ बैठे हो तो जातक श्रेष्ठ, आत्मबली, सिद्ध, महान एवं धनी होता है। तीन ग्रहों के फल में प्रायः सर्वाधिक बलि की दशा अंतर्दशा में शुभाशुभ फल प्रकट होता है। 


सूर्य-चंद्र-गुरु👉 आदि कुंडली मे एकत्रित हों तो जातक धर्मनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, समाज मे प्रतिष्ठित, देश-विदेश, की यात्रा करने वाला, साधन-सम्पन्न होगा।


सूर्य-मंगल-गुरु👉 की युति होने पर जातक सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्त्व, उच्चशिक्षित, मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि में उत्तीर्ण होने वाला भूमि-जायदाद-वाहन आदि सुखों से सम्पन्न होगा। 


सूर्य-बुध-शुक्र👉 की युति होने से आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण एवं अत्यंत कठिनाइयों का सामना हो, विदेश में विशेष भाग्योन्नति के अवसर मिलते है।


चंद्र-मंगल, बुध-राहु के प्रभाव से जातक पराक्रमी, उच्चशिक्षित व धनाढ्य होता है।


उपरोक्त योगों का फल सम्बद्ध ग्रहों की दशा-अंतर्दशा एवं गोचर स्थिति अनुसार प्राप्त होता है।

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सिहं राशि को शिव परिवार का सदस्य माना गया है. क्यों सिंह देवी की सवारी भी है. सिंह को राजसी राशि कहा जाता है. ग्रहों के राजा सूर्य इस लग्न वालों के स्वामी होते हैं. यह क्रूर एवं अग्नि तत्व का लग्न है. यह राशि मघा, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रों के सभी चरणों व उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के प्रथम चरण से मिलकर बनती है. सिंह लग्न दिनबली है. सिंह लग्न वालों के लिए सूर्य, मंगल और गुरु नैसर्गिक मित्र होते हैं. बुध और चंद्रमा सम होते हैं. शनि, शुक्र  इन जातकों के शत्रु होते हैं. यह राशि पूर्व दिशा संचालित करती हैं.

 

सिंह लग्न के जातक होते हैं आकर्षक इस लग्न में जन्म लेने वाले जातकों का रंग साफ और लालिमा लिए हुए होता है.इस लग्न के लिए मंगल योगकारक ग्रह है. इस लग्न में कोई ग्रह उच्च या नीच का नहीं होता है. सिंह लग्न में जन्मे जातक देखने में आकर्षक होते हैं. उनके कंधे चौड़े, आंखे सुंदर व भाव प्रकट करनी वाली होती है. यह लोग अपनी बहुत अधिक बातें आंखो से ही प्रकट कर देते हैं. मुख पुष्ट व शरीर का ऊपरी हिस्सा पुष्ट व बली होता है. ऐसा जातक बहुत साहसी होता है. ऐसे जातक आंनदप्रिय होता है और सुखमय ही जीवन व्यतीत करना चाहता है. अगर कुंडली में सूर्य शुभ ग्रहों से दृष्ट और मजबूत हो तो सिंह लग्न वाले अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है, स्पष्टवादी होता है, नीच कामों से घृणा करता है.

 

जो ठान लेते हैं उसे पूरा करते हैं

 

सिंह लग्न का व्यक्ति सामने वाले से अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दिमाग का प्रयोग करते हुए भावनात्मक दबाव भी डालते हैं. धैर्यवान व उदार होता है. वह जिस कार्य को अपने हाथ में ले लेता है, उसे पूरे मन से निष्ठा के साथ पूरा करता है. ऐसा जातक एकाएक उत्तेजित नहीं होता बल्कि समझ से काम लेता है. कला, संगीत, नाटक व सिनेमा में गहरी रुचि होती है. ऐसे लोगों में मैनेजमेंट स्कील अच्छी होती है. वे अपना काम निकालना अच्छी तरह से जानते हैं.

 

चित्त शांत और संतोषी स्वभाव के होते हैं

 

सिंह लग्न के लोग हर परिस्थिति में खुश रहते हैं, इसमें दुख को भी सुख से गुजार देने की क्षमता होती है. ऐसे जातक सुख में भले ही न हंसे पर दुख में अपने को सुख दरसाने के लिए ज्यादा हंसते हैं. प्रेम के मामले में सिंह लग्न की जातिकाएं बहुत गंभीर और विश्वसनीय होती हैं. ऐसे लोग रुढ़िवादी और परंपराओं में विश्वास रखने वाले होते हैं. जीवन के उत्तरार्ध में प्राय: असफल रहते हैं क्योंकि उनकी अपेक्षाएं और आशाएं अत्यधिक होती हैं, जिन्हें पाने के लिए वे लगातार संघर्षशील रहते हैं पर उनकी इच्छांए अधूरी ही रह जाती हैं। उनमें क्षमा कर देने की आदत होती है.

 

शीर्ष पर बने रहने की होती है लालसा

 

सिंह लग्न के जातक किसी से भी प्रसन्न हो जाएं तो उसके लिए पूरे मन से समर्पित रहते हैं. सिंह लग्न के व्यक्ति अपने अधिकारियों तथा बड़ों के द्वारा आमतौर पर गलत समझे जाते हैं और अधिकारीगण उनके बारे में गलत धारणा बना लेते हैं. उनके रहन-सहन में बड़प्पन प्रतीत होता है. वे मित्रता में विश्वसनीय व अटल होते हैं. दुख व चिंता के समय में अपनी सूझबूझ, बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से काम लेते हैं. इन लोगों में ईष्र्या की भावना बहुत अधिक होती है. इसके अलावा लाभ के लिए गलत योजनाओं को बनाने में भी नहीं चुकते हैं. सिंह लग्न वालों का लोगों से अक्सर अहम टकराता रहता है. राज्य करने की प्रवृत्ति जन्मजात होती है. अधिकारी बनना या लोगों पर राज्य करना इस तरीके के भाव सदैव मन में रहते हैं.

 

मेधावी होते हैं

सिंह लग्न के जातकों की कुंडली में सूर्य यदि बलवान हो तो ऐसा जातक अतिभाग्यवान होता है. ऐसे व्यक्ति को राज्य में अच्छा पद भी प्राप्त हो सकता है. भाग्य भाव का स्वामी और लग्नेश सूर्य का परममित्र होने के कारण इस लग्न वालों को मंगल बहुत अच्छे परिणाम देता है.  सिंह लग्न वालों का स्वामी सूर्य इस लग्न के लिए शुभ फल देता है, इसलिए सूर्य ही लग्नेश होता है. सिंह जातकों को रोज सुबह सूर्य को जल देना चाहिए. इस लग्न के जातकों को माणिक्य धारण करना चाहिए. भाग्य के स्वामी मंगल के लिए मूंगा पहनना चाहिए.

    सिंह लग्न में जन्मे जातक अनुशासन प्रिय होते हैं तथा इनमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा होता है। ये न्याय प्रिय, शांति प्रिय, प्रसन्नचित एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं। ऐसे जातक मध्यस्थता का कार्य करने में निपुण, सत्य वचन कहने वाले, दार्शनिक सुधारवादी एवं तीक्ष्ण बुद्धि से युक्त, लोकप्रिय, स्त्री वर्ग एवं संगीत कला प्रेमी, बच्चों का विशेष स्नेही, प्रतिष्ठित एवं अच्छे से अच्छा कलाकार तक होता है। ऐसे जातक जीवन को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की क्षमता रखते हैं। अपने उच्चाधिकारियों के प्रति ये सदैव कृतज्ञ बने रहते हैं। इनमें शासन करने की अद्भुत क्षमता होती है, किन्तु सफल तथा संतुष्ट हो जाने पर ये प्रायः आलसी हो जाते हैं, पर किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति में आजीवन लगे रहते हैं। इनका भाग्योदय 24, 25, 32, 33 और 35 वें वर्ष में होता है।

 

सिंह राशि में जन्में जातकों की भौहें परस्पर मिलती हुई तथा जबड़ा भी कुछ कुछ वैसा ही होता है। इनका शारीरिक गठन मजबूत तथा शरीर लम्बा एवं छरहरा होता है।

 

प्रायः इन्हें गुस्सा कम ही आता है, किन्तु एक बार आक्रोश में भर जाएं तो शान्त भी कठिनाई से होते हैं और शत्रु का अंत तक कर डालते हैं। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कैसे रखा जाता है, कोई इनसे सीखे। ये सच्चे प्रेम में विश्वास करते हैं। धर्म के मामले में इनके विचार कट्टर होकर कुछ नरम होते हैं। यूं इनका स्वभाव गंभीर होता है, किन्तु व्यंग्यात्मक बातें करना इनकी आदत होती है। प्रेम व मित्रता इनकी मेष, मिथुन और कुम्भ राशि वाले से खूब जमती है।


ऐसे जातकों के यहां प्रायः एक ही पुत्र होता है। अपवाद रूप में या ग्रह स्थितिवश अधिक भी हो सकते हैं, यहां चूंकि हम राशि विशेष के फल की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। जो कि कुलदीपक होता है और पिता की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाता है।

 लग्न के जातकों को गुप्त रोग, गुर्दा रोग, मूत्राशय एवं कमर सम्बंधित रोगों व विकारों से ग्रस्त होने की सम्भावना बलवती रहती है। सिंह लग्न के जातकों के लिए शनि, बुध एवं शुक्र ग्रह शुभ फलदायक एवं मंगल व बृहस्पति अशुभ फलदायक ग्रह माने गए हैं।

सिंह लग्न के जातकों को क्रोध शीघ्र आता है। ये प्रायः ऊंची आवाज में या चिल्लाकर बोलने वाले होते हैं। इनको अपनी असफलता बर्दाश्त नहीं होती, वैसे ये सहिष्णु हो सकते हैं किन्तु एक हद तक ही। ये लोग भावुक व सिंसियर होते हैं किन्तु प्रायः प्राकृतिक नियमों को न मानने वाले होते हैं। इस कारण इन्हें बहुत बार कठिनाइयां भी झेलनी पड़ती हैं। ये शासित होना पसंद नहीं करते। हुक्म चलाने की इन्हें आदत होती है। ये लोग उत्साही, जोशीले तथा महत्त्वाकांक्षी होते हैं। कला, साहित्य व संगीत के प्रेमी भी होते हैं। इनका चेहरा अंडाकार तथा कद औसत होता है। परन्तु कंधे चौड़े व पुष्ट होते हैं। इनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक होती है। व्यक्तित्व आकर्षक होता है। प्रकृति प्रेमी तो होते हैं, किन्तु खुले स्थानों में रहना पसंद करते हैं। बन्धन इन्हें पसन्द नहीं होता। ये स्वतंत्रता प्रेमी तथा अभिमान की हद तक स्वाभिमान रखने वाले होते हैं। ईर्ष्यालु होते हैं। आलसी तथा निद्रालु होते हैं। बैठे-बैठे, टी.वी. देखते-देखते, पढ़ते-पढ़ते ये लोग सो जाते हैं और रात में भरपूर सोने के बाद भी दिन में सो सकते हैं। गृहस्थी में ये प्रायः असफल रहते हैं। अपने से बड़ों तथा अपने साथियों द्वारा ये जातक गलत समझे जाते हैं। इनको नाड़ी तन्त्र की परेशानी प्रायः सम्भावित होती है।

     सिंह लग्न वालों का शरीर सुगठित, हड्डियां, पुढे व कंधे मजबूत होते हैं। छाती चौड़ी होती है। इनमें जीवनी शक्ति भरपूर होती है। सिंह लग्न के जातक शानो-शौकत के प्रदर्शन में विश्वास रखते हैं। विद्या/अध्ययन में रुचि लेते हैं। यद्यपि भीतर से ये दयालु होते हैं किन्तु क्रोध आने पर बेकाबू हो जाते हैं। सिंह लग्न के जातक प्रायः विज्ञान, शिक्षा, मैनेजमेंट, प्रशासक, वकील या जंगल (वन विभाग) सम्बन्धी कार्यों में सफल रहते हैं। धनु, कुंभ तथा मेष लग्न के जातकों से मित्रता इन्हें शुभ रहती है। यदि लग्न पीड़ित या पापाक्रांत हो तो इनको शिरोरोग, ज्वर तथा सिरदर्द या दिमाग का कोई रोग सम्भव होता है। (माइग्रेन, आधासीसी, ब्रेन ट्यूमर आदि)। सिंह लग्न के जातक भौतिकवादी होते हैं।

     सिंह लग्न के जातक शाही मिजाज वाले होते हैं (यदि उनका सूर्य बहुत ही अशुभ न हो तो)। उनका माथा व गाल उभरे हुए तथा नाक तीखी व उन्नत होती है। छाती, कंधे व जांघे मांसल एवं पुष्ट होती हैं। उनकी चाल में एक अकड़ या विशेष प्रकार का आकर्षण हो सकता है। प्रायः ये जातक अपने वस्त्रों का भी विशेष ध्यान रखने वाले होते हैं। अक्सर ये लोग अपनी चोटों की परवाह नहीं करते तथा अपना दुखड़ा औरों के आगे नहीं रोते। यह एक प्रकार से दूसरों से दया या सहानुभूति की भीख मांगने जैसा होता है, जो इन्हें पसंद नहीं होता। ये अपना दुख स्वयं झेलते हैं। इसका कारण इनका स्वाभिमान अभिमान की हद तक पहुंचे होना है। ये अपनी आर्थिक समस्याएं भी दूसरों को नहीं बताते। ये जहां भी रहते हैं आकर्षण का केन्द्र बनकर रहना चाहते हैं और ऐसा होता भी है। भीड़ में खड़े सिंह लग्न के जातक को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते।

     सिंह दुर्गा/शक्ति का वाहन है, जो असुरमर्दिनी है। सिंह लग्न के जातक क्रोध आने पर क्या कर बैठें यह कहना कठिन होता है। प्रायः ये बाद में अपने क्रोध पर पछताते भी नहीं हैं। इसके विपरीत कर्क लग्न के जातक परिस्थितिवश क्रोध करें भी तो बाद में न्यायपूर्ण विश्लेषण कर अपनी गलती पर न केवल पछताते हैं बल्कि प्रायः स्वयं को दंडित भी करते हैं। सिंह लग्न के जातक सूक्ष्म बुद्धि वाले नहीं होते। अतरू अंतर्ज्ञान प्रेरणा इनमें कम ही मिलती है। इनकी सोच, जीवनशैली व मानसिकता शुद्ध भौतिकवादी होती है।

     मेरे अपने अनुभव में देखने में आया है कि सिंह लग्न के कुछ जातकों में सिंह के स्वभाव के विपरीत संचय का गुण भी विद्यमान रहता है। इसके बावजूद वे शाह खर्च होते हैं और इस बात की परवाह भी नहीं करते कि कब, कहां, कितना खर्च हो गया है। ये दूसरों के परामर्शों पर अधिक ध्यान नहीं देते और मनमर्जी करते हैं। यहां तक कि कोई नया काम आरम्भ करने से पूर्व उसके दोनों पक्षों पर विचार नहीं करते। अतः अपनी गलतियों से सीखने का माद्दा इनमें कम ही रहता है। इनकी योजनाएं व स्वप्न बहुत ऊंचे स्तर के होते हैं। क्योंकि ये प्रबल भौतिकवादी होते हैं। लेकिन दुनिया से अथवा दिखावे से ताल्लुक रखने वाले होते हैं। दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए ये कई बार ऐसे भी काम कर जाते हैं जो इनके लिए घातक होते हैं। लेकिन इनमें प्रशासनिक क्षमता बहुत अच्छी होती है। ये औरों से काम लेना जानते हैं। ये लोग किसी का अहसान लेना पसंद नहीं करते। दूसरों की धनादि से सहायता करके खुशी महसूस करते हैं। लेकिन इनकी सहायता अपनी सीमा के भीतर होती है। (जबकि कर्क लग्न का जातक सीमा से बढ़कर भी सहायता करता है) अतः इनकी सोच कर्क लग्न वालों की तुलना में अधिक प्रैक्टिकल व स्वार्थ प्रधान होती है। किन्तु आडम्बरी प्रवृत्ति के कारण व ऊंची आकांक्षाओं के कारण अनप्रैक्टिकल-सी मालूम होती है (सूर्य आत्मा का कारक होते हुए भी आध्यात्मिक ज्ञान की ओर सिंह लग्न वाले जातकों की रुचि नहीं होती)। उच्च स्वाभिमान के कारण ये अपना दुख-दर्द तक किसी को नहीं बताते जब तक सामने वाला अतिविश्वसनीय न हो और वह स्वयं ही न कुरेदे। शायद यही कारण है कि इनको प्रायः इनके निकटस्थों व बुजुर्गों द्वारा भी गलत समझ लिया जाता है। बहरहाल... ।

     यदि सूर्य लग्न में ही बैठा हो (सिंह लग्न में) और बलवान स्थिति में हो तो जातक रजोगुणी, प्रतापी, वीर, पराक्रमी, शक्तिशाली तथा राजा का पद व अधिकार प्राप्त करने वाला होता है। यदि नवम भाव में सूर्य हो तो ये फल और बढ़ते हैं तथा जातक विदेश से भी यश, धन, मान प्राप्त करने वाला, प्रबल प्रतापी एवं विख्यात होता है। रोग ज्योतिष के अनुसार सिंह लग्न वाले जातकों को मस्तिष्क सम्बन्धी, हृदय सम्बन्धी रोगों की सम्भावना रहती है। यदि सिंह लग्न में तीसरे भाव में सूर्य हो तो कान के रोग देता है। सूर्य लग्न वालों को हड्डी सम्बन्धी रोग तीव्रता से सम्भव होते हैं। यदि सूर्य पर पाप प्रभाव हो या मंगल से अशुभ युति होती हो जल जाने या अग्निकांड की सम्भावनाएं भी बनती हैं। यदि सिंह लग्न में सूर्य आठवें भाव में हो तो प्यास तथा खुश्की का रोग होता है।

सिंह लग्न वाले जातक गतिशील और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक होते हैं। वे महत्वाकांक्षी, साहसी, मजबूत इच्छाशक्ति, सकारात्मक, स्वतंत्र और आत्म विश्वास से ओतप्रोत होते हैं। हलांकि वे कभी-कभी किसी बात पर दुखी होने पर आक्रामक हो जाते हैं। सिंह लग्न के लोग सहज, खुश रहने वाले बुद्धिमान और खुले विचार वाले होते हैं। वे धर्म में रूढ़िवादी सिद्धांतों का पालन करते है लेकिन दूसरे के उपदेशों के प्रति संवदेनशील भी होते हैं।

 

सिंह लग्न वाले जातक आनंद से जीवन ब्यतीत करने वाले रिपुओं और बिरोधियों पर विजय प्राप्त करने वाले होते हैं। स्पष्टवादी होते हुए आप निष्कपट और मनसा वाचा से पवित्रता पालन करने वाले होंगें। ऐसे लोग खरी-खरी बात करने वाले सरल व्यक्ति होते हैं, जिन्हें अच्छी तरह पता होता है कि उन्हें क्या चाहिए और वे उसे पाने के लिए रचनात्मक तरीके का प्रयोग करते हैं। नीच कर्म से घृणा करने वाले धैर्यवान और उदार तथा आप जिस कार्य को करेंगे उसको पूरी ईमानदारी तथा निपुणता से करेंगे।

 

आप अपनी मर्यादा के पालन में सर्बदा तत्पर रहेंगें। आपके रहन-सहन से बड़प्पन प्रतीत होगा मित्रता में अटल तथा विश्वास पात्र होंगें। आप केवल दयालु ही नहीं बल्कि सत्पात्र की रक्षा में भी तत्पर रहेंगे। दुःख के समय में आप अपनी सूझ-बूझ को काम में लाकर दुःख के निवारण में समर्थ होंगे। आपको अपने उद्यम और परिश्रम का फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होगा। लोगों पर आपके गुणों का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है। आप अपने गुणों तथा साहस से बिघ्न बाधाओं का शीघ्र निपटारा कर सकते हैं।

 लग्नेश होने के कारण सूर्य देवता इस लग्न कुंडली में सबसे योग करक ग्रह होते है। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम, एकादश भाव में सूर्य देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें है। तीसरे (नीच), छठें, आठवें और द्वादश भाव में सूर्य देवता अशुभ हो जातें है। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता को कम किया जाता है। शुभ भावों में सूर्य का रत्न माणिक पहन कर सूर्य देवता का बल बढ़ाया जाता है।

 

सिंह लग्न में बुध ग्रह का प्रभाव

बुध देवता इस लग्न कुंडली में दूसरे और एकादश भाव के मालिक हैं। लग्नेश सूर्य के अतिमित्र होने के कारण बुध देवता इस लग्न कुंडली में योग करक ग्रह माने जाते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में शुभ फल देतें है। तीसरे, छठें, आठवें और बारहवें भाव में बुध देवता अशुभ फल देते हैं। उनका दान-पाठ करके बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव को कम किया जाता है।

 

सिंह लग्न में शुक्र ग्रह का प्रभाव

इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता तीसरे और दसम भाव के मालिक हैं। सूर्य देवता के विरोधी दल के होने के कारण वह कुंडली के सम ग्रह माने जाते हैं। पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं। दूसरे (नीच), तीसरे, छठें, आठवें, व द्वादश भाव में शुक्र देवता अशुभ हो जाते हैं। दान व पाठ करके शुक्र देवता की अशुभता को कम किया जाता है।

 

सिंह लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव

मंगल देवता इस लग्न कुंडली में चौथे व नवमें, दो अच्छे भावों के स्वामी होते हैं। लग्नेश सूर्य के अति प्रिय मित्र होने के कारण मंगल ग्रह इस कुंडली के योगकारक ग्रह माने जाते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में मंगल देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं। तीसरे, छठें, आठवें और द्वादश भाव में पड़े मंगल अशुभ हो जाते हैं। उनकी अशुभता दान पाठ करके दूर की जाती है। अस्त अवस्था में किसी भाव में स्थित मंगल का रत्न मूंगा पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है।

 

सिंह लग्न में बृहस्पति ग्रह का प्रभाव

बृहस्पति देवता इस लग्न कुंडली में पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। सूर्य देवता के मित्र होने के कारण बृहस्पति योगकारक ग्रह माने जाते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं। तीसरे, छठे, आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देव मारक बन जातें है और अशुभ फल देते है। अस्त अवस्था में बृहस्पति का रत्न पुखराज पहनकर उन्हें मजबूत किया जाता है।

 

सिंह लग्न में शनि ग्रह का प्रभाव

शनि देव इस लग्न कुंडली में छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं। लग्नेश सूर्य के शत्रु होने के कारण शनि देव को कुंडली का अति मारक ग्रह माना जाता है। कुंडली के सभी भावों में शनि देव अशुभ फल देंगे इसलिए उनकी दशा-अंतर्दशा में उनका पाठ और दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है। छठे, आठवें, और बारहवें भाव में शनि देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि होना अति अनिवार्य है। शनि देव का रत्न इस लग्न कुंडली में नहीं पहना जाता है क्योंक वह रोगेष एवं मारकेश है।

 

सिंह लग्न में चन्द्र ग्रह का प्रभाव

चंद्र देव इस लग्न कुंडली में द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए इस कुंडली में चंद्र देवता अतिमारक ग्रह माने जाते हैं। कुंडली के किसी भाव में चंद्र देव अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं। छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े चंद्र देवता विपरीत राज़योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि व शुभ होना अनिवार्य है। इस लग्न कुंडली में मोती चन्द्रमा का रत्न कभी भी नहीं पहना जाता है। चन्द्रमा के दान और पाठ करके उनका अशुभ प्रभाव को कम किया जाता है।

 

सिंह लग्न में राहु ग्रह का प्रभाव

राहु द्वितीय भाव का अधिपति होकर जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

 

सिंह लग्न में केतु ग्रह का प्रभाव

केतु अष्टम भाव का अधिपति होकर जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

 

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सिंह लग्न में ग्रहों की स्तिथि

सिंह लग्न में योग कारक ग्रह (शुभ-मित्र ग्रह)

सूर्य 1 भाव का स्वामी

मंगल देव 4, 9, भाव का स्वामी

बृहस्पति  5, भाव, 8, भाव का स्वामी

बुध देव 2, भाव 11, भाव का स्वामी

सिंह लग्न में मारक ग्रह (शत्रु ग्रह)

शनि देव 6, भाव 7, भाव का स्वामी

चन्द्र देव 12 भाव का स्वामी

सिंह लग्न में सम ग्रह

शुक्र देव 3, 10, भाव का स्वामी

सिंह लग्न में ग्रहों का फल

सिंह लग्न में सूर्य ग्रह का फल

लग्नेश होने के कारण सूर्य देवता इस लग्न कुंडली में सबसे योग करक ग्रह माने जातें है।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम, एकादश भाव में सूर्य देवता अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें है।

तीसरे (नीच ), छठें, आठवें और द्वादश भाव में सूर्य देवता अशुभ हो जातें है। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता को कम किया जाता है।

शुभ भावों में सूर्य का रत्न माणिक पहन कर सूर्य देवता का बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में बुध ग्रह का फल

बुध देवता इस लग्न कुंडली में दूसरे और एकादश भाव के मालिक हैं। लग्नेश सूर्य के अति मित्र होने के कारण बुध देवता इस लग्न कुंडली में योग करक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा -अन्तरा में शुभ फल देतें है।

तीसरे, छठें, आठवें और 12वें भाव में बुध देवता मारक ग्रह माने जाते हैं। उनका दान-पाठ करके बुध ग्रह के मारकेत्व को कम किया जाता है।

कुंडली के किसी भी भाव में बुध देव, सूर्य देव के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न पन्ना पहन कर बुध देवता का बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में शुक्र ग्रह का फल

इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता तीसरे और दसम भाव के मालिक हैं। सूर्य देवता के विरोधी दल के होने के कारण वह कुंडली के सम ग्रह बन जाते हैं।

पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा -अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं।

दूसरे (नीच ), तीसरे, छठें, आठवें, व द्वादश भाव में शुक्र देवता अशुभ हो जाते हैं। दान व पाठ करके शुक्र देवता की अशुभता को दूर की जाती है।

शुक्र देवता इस लग्न कुंडली में किसी भी भाव में अगर अस्त अवस्था में है तो उनकी दशा-अन्तरा में कामकाज की वृद्धि के लिए उनका रत्न हीरा, ओपल पहनकर शुक्र देवता का बल बढ़ाया जाता है

सिंह लग्न में मंगल ग्रह का फल

मंगल देवता इस लग्न कुंडली में चौथे और नवम दो अच्छे भावों के स्वामी हैं। लग्नेश सूर्य के अति प्रिय मित्र होने के कारण मंगल ग्रह इस कुंडली के योग कारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में मंगल देवता अपनी दशा -अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं।

तीसरे, छठें, आठवें और द्वादश भाव में पड़े मंगल अशुभ हो जाते हैं। उनकी अशुभता दान पाठ करके दूर की जाती है।

अस्त अवस्था में किसी भाव में स्थित मंगल का रत्न मूंगा पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है।

सिंह लग्न में बृहस्पति ग्रह का फल

बृहस्पति देवता इस लग्न कुंडली में पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं। बृहस्पति देवता की मूल त्रिकोण राशि (धनु) कुंडली के मूल त्रिकोण भाव में आती है। सूर्य देवता के मित्र होने के कारण वह अति योग कारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा -अंतर्दशा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं।

तीसरे, छठे, आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देव मारक बन जातें है और अशुभ फल देतें है परन्तु आठवां और 12वें भाव में विपरीत राज़ योग की स्थिति में आकर शुभ फल देते हैं अगर लग्नेश बलि और शुभ हो जाएँ तो।

छठे भाव में बृहस्पति नीच राशि में आ जाते है इसलिए वह विपरीत राज़ योग का शुभ –लाभ नहीं देते हैं।

अस्त अवस्था में बृहस्पति का रत्न पुखराज किसी भी भाव में पहना जाता है।

अशुभ बृहस्पति का दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

सिंह लग्न में शनि ग्रह का फल

शनि देव इस लग्न कुंडली में छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं। लग्नेश सूर्य के शत्रु होने के कारण शनि देव को कुंडली का अति मारक ग्रह माना जाता है।

कुंडली के सभी भावों में शनि देव अशुभ फल देंगे इसलिए उनकी दशा-अन्तरा में उनका पाठ और दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

छठे, आठवें, और 12वें भाव में शनि देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि होना अति अनिवार्य है।

शनि देव का रत्न इस लग्न कुंडली में नहीं पहना जाता है क्योंक वह रोगेष है।

सिंह लग्न में चन्द्रमा ग्रह का फल

चंद्र देव इस लग्न कुंडली में द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए इस कुंडली में चंद्र देवता अति मारक ग्रह माने जाते हैं।

कुंडली के किसी भाव में चंद्र देव अपनी दशा-अन्तरा में अशुभ फल देतें है। अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं।

छठे, आठवें और 12वें भाव में पड़े चंद्र देवता विपरीत राज़ योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि व शुभ होना अनिवार्य है।

इस लग्न कुंडली में मोती चन्द्रमा का रत्न कभी भी नहीं पहना जाता है।

दशा-अंतर्दशा में चन्द्रमा के दान और पाठ करके उनका मारकेत्व को कम किया जाता है।

सिंह लग्न में राहु ग्रह का फल

राहु देव की अपनी कोई राशि नहीं होती। वह अपनी मित्र राशि और शुभ भावों में बैठकर ही शुभ फल देते हैं।

दूसरे, सातवें, दशम व एकादश भाव में अपनी दशा अन्तरा में राहु देव शुभ फल देते हैं।

पहले, तीसरे, चौथे (नीच), पांचवें (नीच), छठें, आठवें, नवम और द्वादस भाव में राहु देव मारक ग्रह बनकर अशुभ फल देंगे। राहु का रत्न गोमेद कभी भी नहीं पहना जाता बल्कि इसका दान–पाठ करके इसकी अशुभता दूर की जाती है।

सिंह लग्न में केतु ग्रह का फल

केतु देवता की अपनी कोई राशि नहीं होती। केतु देवता अपने मित्र राशि और शुभ भाव में बैठकर ही शुभ फल देते हैं।

दूसरे, चौथे (उच्च राशि), सातवें भाव में केतु देवता अपनी दशा-अन्तरा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें है।

पहले, तीसरे, छठे, आठवें, नवम और एकादश (नीच) और द्वादश भाव में केतु देवता मारक ग्रह बन जातें है व अशुभ फल देतें हैं।

केतु का रत्न लहसुनिया कभी भी नहीं पहना जाता बल्कि केतु का पाठ व दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

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सिंह लग्न में धन योग

सिंह लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए धनप्रदाता ग्रह बुध होता है। धनेश बुध की शुभाशुभ स्थिति से, धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रहों की स्थिति से, एवं धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों की दृष्टि संबंध से जातक की आर्थिक स्थिति, आय के स्रोत तथा चल-अचल संपत्ति का पता चलता है। इसके अलावा लग्नेश सूर्य, पंचमेश गुरु एवं भाग्येश मंगल की अनुकूल स्थितियां भी सिंह लग्न वालों को धन व ऐश्वर्य प्राप्त करने में पूर्ण सहयोग करती हैं। वैसे सिंह लग्न के लिए शनि एवं बुध परमपापी है। सूर्य शुभ फलदायक है, सुखेश व नवमेश मंगल अतिशुभकारी है।

 

शुभ युति : गुरु + मंगल

 

अशुभ युति : शुक्र + मंगल

 

राजयोग कारक : गुरु व मंगल

 

सिंह लग्न में बुध मिथुन या कन्या राशि में हो तो जातक धनाधिपति होता है। लक्ष्मीजी जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ती।

सिंह लग्न में बुध शुक्र के घर में तथा शुक्र बुध के घर में परस्पर राशि परिवर्तन करके बैठे हो, तो ऐसा जातक बहुत भाग्यशाली होता है तथा खूब धनवान बनता है।

सिंह लग्न में मंगल मेष या वृश्चिक राशि का हो तो जातक अल्प प्रयत्न से ही बहुत धन कमाता है। ऐसा व्यक्ति धन के मामले में भाग्यशाली कहलाता है।

सिंह लग्न में बुध मंगल के घर में मंगल बुध के घर में राशि परिवर्तन करके बैठे हो तो जातक महाभाग्यशाली होता है।

सिंह लग्न में शुक्र यदि केंद्र-त्रिकोण में हो तथा बुध स्वगृही हो तो जातक कीचड़ में कमल की तरह खिलता है अर्थात सामान्य परिवार में जन्म लेकर भी करोड़पति बनता है।

सिंह लग्न में सूर्य लग्नस्त हो तथा गुरु व मंगल से दृष्ट हो तो जातक महा धनी होता है।

सिंह लग्न में पंचमस्थ स्वगृही बृहस्पति हो तथा लाभ स्थान में चंद्रमा, मंगल हो तो जातक महालक्ष्मीवान होता है।

सिंह लग्न में पंचम बृहस्पति तथा लाभ स्थान में बुध स्वगृही हो तो महालक्ष्मी योग बनता है। ऐसा जातक बहुत धनवान होते हुए धनशाली व्यक्तियों में अग्रगण्य होता है।

सिंह लग्न में सूर्य मिथुन राशि में हो तथा बुध लग्न में सिंह राशि में हो तो जातक शत्रुओं का नाश करते हुए स्वअर्जित धन लक्ष्मी को भोगता है।

सिंह लग्न में लग्नेश सूर्य, धनेश बुध व भाग्येश मंगल अपनी-अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित हो तो जातक करोड़पति होता है।

सिंह लग्न में द्वितीय स्थान में राहु, शुक्र, मंगल और शनि की युति हो तो जातक अरबपति होता है।

सिंह लग्न में धनेश बुध यदि आठवें हो तथा सूर्य लग्न में हो तो जातक को भूमि में गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है अथवा लाटरी से रुपया मिल सकता है।

सिंह लग्न में सूर्य शुक्र के नवांश में हो तो जातक व्यापार से धन कमाता है।

सिंह लग्न में मंगल उच्च का हो तथा सूर्य, चंद्र, गुरु उसे देखते हो तो जातक धन सुख एवं वाहन से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

सिंह लग्न में लग्नेश लग्न में हो तथा दशमेश चतुर्थ में एवं चतुर्थ भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक उच्च प्राप्त करता है एवं आर्थिक दृष्टि से बहुत संपन्न बनता है।

सिंह लग्न में सूर्य, मंगल, बुध यदि लाभ भवन में मिथुन राशि में स्थित हो तो जातक बहुत धनाढ्य होता है।

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सिंह लग्न में रत्न


     विशेष (रोग)-सिंह लग्न में सूर्य सप्तमस्थ हो तो जातक को नेत्र रोग होता है तथा उसकी पत्नी को भी गर्भाशय या योनि के रोग सम्भव होते हैं। पुत्र उत्पन्न नहीं होते या मर जाते हैं।

    यदि सिंह लग्न में शनि लग्नस्थ हो तथा सूर्य निर्बल हो, चन्द्र भी पाप प्रभाव में हो तथा दूसरे व बारहवें भाव पर भी पाप प्रभाव हो तो जातक जन्म से ही अंधा होता है।

    सिंह लग्न में आठवें भाव में निर्बल चन्द्र यदि शनि के साथ हो तो प्रेतबाधा या शत्रुकृत अभिचार से जातक की अकाल मृत्यु सम्भावित होती है।

    सिंह लग्न हो, लग्न में सूर्य दो पापग्रहों के मध्य हो, दूसरे तथा बारहवें भाव में पापग्रह हों तो जातक 47वें वर्ष में अस्त्र-शस्त्र या विस्फोटक सामग्री का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।

    सिंह लग्न में चन्द्रमा पापग्रह के साथ, सातवें भाव में शनि हो तो जातक देवशाप/शत्रुकृत अभिचार से पीड़ित होता है। आठवां भाव भी प्छटव्स्टम् हो तो मृत्यु भी सम्भावित हो जाती है।

    सिंह लग्न में शनि लग्नस्थ हो और सूर्य मकर राशि में हो (म्ग्ब्भ्।छळम्) तथा सूर्य पर शुभ दृष्टि न हो तो जातक की बारहवें वर्ष में मृत्यु हो जाती है।

    सिंह लग्न, सूर्य-दोनों पापग्रहों के बीच हो, चन्द्र निर्बल व शनि सप्तमस्थ हो तो जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या कर लेता है।

    सिंह लग्न हो, कन्या का राहू, सूर्य व शुक्र शुभ दृष्टि से हीन हों तो जातक बड़ा होकर पिता की हत्या करके स्वयं भी मर जाता है (दसवें व नौवें भाव की स्थिति भी विचारनी चाहिए)।

    सिंह लग्न हो, सूर्य लग्न में शनि, मंगल, राहू व गुरु के साथ हो तो जातक अपनी माता की हत्या कर देता है (चौथे भाव तथा चन्द्रमा की स्थिति भी विचारनी चाहिए)।

    सिंह लग्न में मंगल द्वादशस्थ हो तथा राहू/केतु से युति करता हो तो भी जातक मातृघातक होता है।

    सूर्य पर मंगल/शनि की दृष्टि हो अथवा शनि सिंह लग्न से लग्नस्थ हो तो जातक क्रमशः नेत्रहीन व भेंगा होता है। अथवा सूर्य चौथे में तथा मंगल दसवें भाव में हो तो जातक काना व अधर्मी होता है। सिंह लग्न में पापग्रह हो तथा सूर्य निर्बल हो तो जातक रोगी होता है।

    सिंह लग्न, मेष का गुरु, मीन का मंगल (म्ग्ब्भ्।छळम्) हो तो जातक की 12वें वर्ष में मृत्यु होती है। अथवा दूसरे व बारहवें भाव में पापग्रह हो, सूर्य निर्बल हो तथा.लग्न, द्वितीय व द्वादश भाव पर शुभदृष्टि न हो तो जातक 32वें वर्ष में मर जाता है।

    सिंह लग्न में सूर्य सातवें, मंगल दसवें हो तथा बारहवां भाव निकम्मा हो तो जातक के पुत्रों की एक-एक करके मृत्यु हो जाती है (अकेला सूर्य सातवें भाव में हो और सिंह लग्न हो तो भी जातक की नर-संतान समाप्त हो जाती है, यह पहले बता ही आए हैं)।

    सिंह लग्न, चौथे पापग्रह, चतुर्थेश व चंद्र पापग्रहों के मध्य हो एवं सूर्य निर्बल हो तो जातक को हृदय रोग होता है। अथवा मंगल, गुरु/अष्टमेश के साथ आठवें भाव में हो तो भी हृदय रोग से भारी कष्ट हो।

    चतुर्थेश/मंगल नीच का हो या आठवें भाव में हो, या अस्त हो तो भी सिंह लग्न के जातक को हृदय रोग होता है अथवा वृश्चिक के शनि के साथ सिंह लग्न में सूर्य सातवें भाव में होता है तो भी जातक हृदय रोगी होता है।

     अतिविशेष-सिंह लग्न की कन्याएं विवाह के लिए आदर्श नहीं मानी जा सकती क्योंकि क्रोध, क्लेश, झगड़ा करने वाली तथा ऊंचा बोलने वाली होती हैं।

v सिंह लग्न : इसका स्वामी सूर्य है। इस राशि मे कोई भी ग्रह उच्च अथवा नीच का नही होता है। जातक पराक्रमी लम्बे हाथ-पैर वाला, चौड़े वक्ष वाला, पतली कमर वाला, ताम्र वर्णी, तेज स्वाभाव वाला, क्रोधी, वेदांत का ज्ञाता, घुड़सवारी प्रेमी, अस्त्र-शस्त्र चलने में निपुण, उदार वृत्ति, साधु सेवा मे रत, प्रथम और अंतिम अवस्था मे सुखी मध्यावस्था मे दुखी होता है।

v सिहं राशि को शिव परिवार का सदस्य माना गया है. क्यों सिंह देवी की सवारी भी है. सिंह को राजसी राशि कहा जाता है. ग्रहों के राजा सूर्य इस लग्न वालों के स्वामी होते हैं. यह क्रूर एवं अग्नि तत्व का लग्न है. यह राशि मघा, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रों के सभी चरणों व उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के प्रथम चरण से मिलकर बनती है. सिंह लग्न दिनबली है. सिंह लग्न वालों के लिए सूर्य, मंगल और गुरु नैसर्गिक मित्र होते हैं. बुध और चंद्रमा सम होते हैं. शनि, शुक्र इन जातकों के शत्रु होते हैं. यह राशि पूर्व दिशा संचालित करती हैं।

v सिंह लग्न में जन्म लेने वाले जातकों में शेर की तरह आदतें पाई जाती है. यह एक अग्नि तत्व प्रधान राशि है. सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली के पांचवें भाव की राशि है. पांचवां भाव संतान, जन्मजात ज्ञान और बुद्धि का होता है. जिन लोगों का जन्म सिंह लग्न में होता है वे साहसी होने के साथ साथ गर्म स्वभाव वाले होते हैं. ऐसे लोग नेतृत्व करने वाले होते हैं.

v सिंह राशि के लोग करिश्माई व्यक्तित्व के मालिक होते हैं और इनके व्यक्तित्व से लोग काफी आकर्षित होते हैं। व्यक्तित्व के मुकाबले शारीरिक बनावट के मामले में वे उतने भाग्यशाली नहीं होते, वे औसत ऊचाई वाले और शरीर का उपरी हिस्सा बेहतर बनावट वाला होता है। इस राशि के लोगों की आँखे हल्की पीली और चेहरा अंडाकार होता हैं। इस राशि के पुरूष या महिला भले ही नियंत्रित दिखे लेकिन आसानी से उन्हें मनाया जा सकता है। जोश और जूनुन इनमें आम होती है।

v सिंह लग्न का व्यक्ति सामने वाले से अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दिमाग का प्रयोग करते हुए भावनात्मक दबाव भी डालते हैं. धैर्यवान व उदार होता है. वह जिस कार्य को अपने हाथ में ले लेता है, उसे पूरे मन से निष्ठा के साथ पूरा करता है. ऐसा जातक एकाएक उत्तेजित नहीं होता बल्कि समझ से काम लेता है. कला, संगीत, नाटक व सिनेमा में गहरी रुचि होती है. ऐसे लोगों में मैनेजमेंट स्कील अच्छी होती है. वे अपना काम निकालना अच्छी तरह से जानते हैं.

v इस राशि के लोग गतिशील और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं वे महत्वाकांक्षी, साहसी, मजबूत इच्छाशक्ति, सकारात्मक, स्वतंत्र और आत्म विश्वास से ओतप्रोत होते हैं। वे खरी खरी बात करने वाले सरल व्यक्ति होते हैं जिन्हें अच्छी तरह पता होता है कि उन्हें क्या चाहिए और वे उसे पाने के लिए पूरे मन और रचनात्मक तरीके से उसे पूरा करते हैं। हलांकि वे गुस्सैल और कभी कभी किसी बात पर दुखी होने पर आक्रामक हो जाते हैं। वे निजी आक्षेप के प्रति काफी संवेदनशील होते है और जब उनके आदर्श की आलोचना होती है तो वो काफी गुस्से में आ जाते हैं। वे जिद्दी होते है और इस बात में यकीन करते हैं कि उसके द्वारा उठाया गया कदम सही है और वे सही या गलत समय में उसपर अड़े रहते हैं। वे मानवीय गुणों से संपन्न होते हैं। सिंह राशि के लोग सहज, खुश रहने वाले बुद्धिमान और खुले विचार वाले होते हैं। वे धर्म में रूढ़िवादी सिद्धांतों का पालन करते है लेकिन दूसरे के उपदेशों के प्रति संवदेनशील भी होते हैं।

v सिंह लग्नोत्पन्न जातक भोगी, शत्रु को जीतने वाला, पतली कमर, पुष्ट व मांसल देह, उत्साही, रण मे पराक्रमी, वन-पर्वत घूमने वाला, भूख सहने वाला, कुटुम्ब का कार्य करने वाला, भाई, मित्रो मे चित्त रखने वाला होता है।

v सिंह लग्न का स्वामी सूर्य है. सूर्य अभी ग्रहों का राजा होने के साथ साथ एक तेजस्वी , ओजयुक्त पौरुष का प्रतिनिधित्व करता है.

v सिंह लग्न में जन्मे जातक निर्भीक, उदार व अभिमानी होते हैं. स्वभाव से दृढ़, साहसी एवं धैर्यशील होते हैं. सूर्य आत्म्कारक ग्रह है अतः सूर्य को आत्मशक्ति एवं आत्म विशवास का कारक माना गया है इसीलिए सिंह लग्न के जातकों में आत्मविश्वास की कभी कमी नहीं होती है.

v जीवन की कठिन से कठिन परिस्तिथियों में भी आप नहीं घबराते अपितु बिना हिम्मत हारे अपना रास्ता बनाते हुए आगे निकल जाते है.

v सिंह लग्न में जन्मे जातक अनुशासन प्रिय होते हैं तथा इनमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा होता है v जो काम नहीं भी आता है उसमे भी हाथ डालना और उसमे expert comment करना इनकी आदत होती है, इनको अपना क्षेत्र बनाने मे बोहोत आनंद होता है। ये न्याय प्रिय, शांति प्रिय, प्रसन्नचित एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं।

v इनको अपना क्षेत्र बनाने मे बोहोत आनंद होता है, जहा रहते है वह अपनी शाख या रिश्ते बनाते है। नाम की बोहोत भूख भी होती है। सभी बाटो में स्वयं का नाम होना इनको अच्छा लगता है। किसिस व्रतांत मे ये अपने बारे मे विशेष टिप्पणी की चाहत रखते है।

v भीड़ से अलग दिखने की आदत और गुण दोनों होता है अलग होंगे भी क्यूकी सूरी इंका स्वामी है। इस देवीय गुण के कारण इनको राजा लग्नी भी कहते है। सिंह और कर्क को ही ईश्वर तक लेजाने वाला द्वार माना गया है हमारे शारी के नासिका को भी सूरी चन्द्र से निर्धारित किया है, इन दोनों लगनों को प्रकृति कीविशेष देवीय ऊर्जा और शक्ति प्राप्त होती है।

v ऐसे जातक मध्यस्थता का कार्य करने में निपुण, सत्य वचन कहने वाले, दार्शनिक सुधारवादी एवं तीक्ष्ण बुद्धि से युक्त, लोकप्रिय, स्त्री वर्ग एवं संगीत कला प्रेमी, बच्चों का विशेष स्नेही, प्रतिष्ठित एवं अच्छे से अच्छा कलाकार तक होता है।

v दाम्पत्य जीवन कुछ खास नहीं रेहता किन्तु अगर शनि का स्थान शुभ हो तो जातक प्रेम विवाह करे और अक्सर सुंदर पत्नी वाला डॉक्टर होता है, और पत्नी की प्राप्ति के बाद उन्नति करता है। मकर लग्न मे सूर्य अगर 7वे भाव के कुम्भ राशि का हो तो बाभ्रावी यानि भूरे बालोवाली, भूरे रंग वाली, नेत्रो से पीड़ित या ठिंगनी किन्तु कर्कश, झूठ बोलने या बात घुमानेवाली कामुक, कर्मठ नौकरिशुदा, और स्पस्ट वादी पुरुषीय स्वभाव की स्त्री प्राप्त होती है। किन्तु यदि शनि चंद्रमा का विश योग होता है तो द्विभार्य योग होगा जातक को विवाह विलंब से होगा या दोब्याह की ओर लेजाए या उसका दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं रेहता उसकी पत्नी को मनोरोग होत है और जातक की माता को भी पेट का कोई बड़ा रोग होता है। जिसमे जातक के धन का नाश होता है और जीवन हमेशा संघर्ष माय और माता एवं पत्नी सेवा और इलाज मे गुज़रता है।

v सिंह लग्न के लोग हर परिस्थिति में खुश रहते हैं, ऐसे जातक जीवन को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की क्षमता रखते हैं। इसमें दुख को भी सुख से गुजार देने की क्षमता होती है. ऐसे जातक सुख में भले ही न हंसे पर दुख में अपने को सुख दरसाने के लिए ज्यादा हंसते हैं.

v प्रेम के मामले में सिंह लग्न की जातिकाएं बहुत गंभीर और विश्वसनीय होती हैं. ऐसे लोग रुढ़िवादी और परंपराओं में विश्वास रखने वाले होते हैं.

v जीवन के उत्तरार्ध में प्राय: असफल रहते हैं क्योंकि उनकी अपेक्षाएं और आशाएं अत्यधिक होती हैं, जिन्हें पाने के लिए वे लगातार संघर्षशील रहते हैं पर उनकी इच्छांए अधूरी ही रह जाती हैं। उनमें क्षमा कर देने की आदत होती है.

v अपने उच्चाधिकारियों के प्रति ये सदैव कृतज्ञ बने रहते हैं। इनमें शासन करने की अद्भुत क्षमता होती है, किन्तु सफल तथा संतुष्ट हो जाने पर ये प्रायः आलसी हो जाते हैं, पर किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति में आजीवन लगे रहते हैं

v जातक आकर्षक, सिंह के सामान मुख वाला, नृपतुल्य, धैर्यवान, गम्भीर, साहसी, विलास प्रिय, अल्प भाषी, भाई-बंधु के प्रति दयालु, दुःख सहने मे अत्यंत क्रोधी, अभिमानी, आडम्बरी, खर्चीला, वायु रोग से पीड़ित, धर्म से विमुख, मांसाहारी, शिकार शौकीन होता है।

v सिंह राशि में जन्में जातकों की भौहें परस्पर मिलती हुई तथा जबड़ा भी कुछ कुछ वैसा ही होता है। इनका शारीरिक गठन मजबूत तथा शरीर लम्बा एवं छरहरा होता है। छती चौड़ी मजबूत कंधे और बड़ा चेहरा होता है। पुष्ट जंघा और छोटे पांव होते है।

v प्रायः इन्हें गुस्सा कम ही आता है, किन्तु एक बार आक्रोश में भर जाएं तो शान्त भी कठिनाई से होते हैं और शत्रु का अंत तक कर डालते हैं। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कैसे रखा जाता है, कोई इनसे सीखे। ये सच्चे प्रेम में विश्वास करते हैं। धर्म के मामले में इनके विचार कट्टर होकर कुछ नरम होते हैं। यूं इनका स्वभाव गंभीर होता है, किन्तु व्यंग्यात्मक बातें करना इनकी आदत होती है। प्रेम व मित्रता इनकी मेष, मिथुन और कुम्भ राशि वाले से खूब जमती है।

v ऐसे जातकों के यहां प्रायः एक ही पुत्र होता है। जो कि कुलदीपक होता है और राम कृष्ण आदि ई भाति अपनी आभा और किर्ति से पूरे विश्व पर छाप छोड़ता है। और पिता की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाता है।

v सिंह लग्न के जातकों को गुप्त रोग, गुर्दा रोग, मूत्राशय एवं कमर सम्बंधित रोगों व विकारों से ग्रस्त होने की सम्भावना बलवती रहती है। सिंह लग्न के जातकों के लिए शनि, बुध एवं शुक्र ग्रह शुभ फलदायक एवं मंगल व बृहस्पति अशुभ फलदायक ग्रह माने गए हैं।

v सिंह लग्न के जातक किसी से भी प्रसन्न हो जाएं तो उसके लिए पूरे मन से समर्पित रहते हैं. सिंह लग्न के व्यक्ति अपने अधिकारियों तथा बड़ों के द्वारा आमतौर पर गलत समझे जाते हैं और अधिकारीगण उनके बारे में गलत धारणा बना लेते हैं.

v उनके रहन-सहन में बड़प्पन प्रतीत होता है. वे मित्रता में विश्वसनीय व अटल होते हैं. दुख व चिंता के समय में अपनी सूझबूझ, बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से काम लेते हैं. इन लोगों में ईष्र्या की भावना बहुत अधिक होती है. इसके अलावा लाभ के लिए गलत योजनाओं को बनाने में भी नहीं चुकते हैं.

v सिंह लग्न वालों का लोगों से अक्सर अहम टकराता रहता है. राजसी अहंकार इनके शरीर मे होता है। स्वयं को श्रेष्ठ और अपनी शेख़ी बघारने मे सबसे आगे हो जाते है।

v अपने कृत्यो का महिमा मंडन और डिनडोरा पीटकर व्यक्त करने की जताने की आदत होती है इस प्रक्रिया मे ये अगले की बात कभी नहीं सुनेंगे और अपनी कहकर रवाना होजाएंगे

v अपनी भुजाओ के बल का यू कहे की स्वार्जित धन से मदद करेंगे, मदद भी बिना किसी के कहे स्वयं पंच बनकर अपनी सोच से बिना किसी से सलाह लिए, किन्तु ऊपर उपकार जताकर या उसे गिनाकर व्यंग के बान बोल कर या उसकी शेख़ी बघार कर समाज या अपने समूह मे स्वयं को सिद्ध करने की प्रवृति रखेंगे ये अपनी प्रभुता थौपेंगे।

v प्रतिस्पर्धात्मक ईर्ष्या और व्यंगात्मक वाणी के साथ शक्ति, धन और ऐश्वर्य को प्राप्त करने की होड जीवन भर रहेगी।

v चिकित्सा, लेखाशाखा, व्याख्याता, या तकनीकी, कानूनी क्षेत्र के गणमान्य पदो पर या फिर अभिनय और राजनीति के क्षेत्र मे अधिक देखने को मिलते है।

v ये अक्सर बड़ी संतान या ज्येष्ठ या पहली संतान होते है किन्तु अगर ये मँझले या सबसे छोटे होंगे तो स्वयं को बड़ा मान कर वो सब काम करेंगे जो एक ज्येष्ठ को करने चाहिए इस कारण परिवार का ध्रुवीकरण करने मे ये अपना योग दान देंगे। या इनको दायित्व बड़े का या पंच का मिलेगा,

v कही भी निर्णय लेने मे ये अपनी ही बात मनवाने की आदत रखते है। और दूरसों की कम से सुनते है। किसी भी जगह इनको मुखिया का पद मिलता है नहीं तो ये हथिया लेते है।

v राजकीय सेवा मिलने के प्रबल दावेदार होते है मृतक आश्रित या कोई भी तरह से इनको राजकीय सेवा या गोवेरमेंट जॉब मिलजाती है जिनसे इंका जीवन आर्थिक सुरकशा के साथ वृद्धि की ओर अग्रसर होता है इस देवीय कृपा को ये कुछ दिन बाद अपनी शक्ति अहंकार और अपने रिश्तेदारों या अपने बराबर वालों से स्वयं को बेहतर और उचा मानते है।

v राज्य करने की प्रवृत्ति जन्मजात होती है. अधिकारी बनना या लोगों पर राज्य करना इस तरीके के भाव सदैव मन में रहते हैं. इसकारण कार्य क्षेत्र मे और घर मे लोग इनकी राजा प्रवृति को कुछ हद तक स्वीकार करते है प्फ़िर शत्रु या इनसे मुह फेर लेते है तानाशाही घमंडी और अहंकारी स्वभाव मे ये अपने ही काम को सर्वोपरि मानते है और मतलबी सा व्यवहार करते है।

v व्यवसाय - कार्यक्षेत्र मे उन्नति से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है। स्वर्णाभूषण, कलाकृति, संगमरमर, प्रबंध व्यवस्था, सरकार, सेना, राजनीति, उद्योग, होटल, पशु प्रजनन, कृषि, वन उत्पाद से जीविका होती है। भूविज्ञान या तकनीक, अनुसन्धान, खेलकूद, अभिनय आदि से मान-सम्मान, धन-यश प्राप्त होता है।

v 21 या 28 वर्ष की अवस्था मे भाग्योदय होता है। वर्ष 20, 21, 22, 28, 34, 36, 42, 51 वे शुभ और 5, 13 26, 36, 38 वे वर्ष मे कष्ट, रोग, व्याधि आदि होते है।

v सिंह लग्न विभूतिया : सम्राट सिकंदर, बादशाह अकबर, छत्रपति शिवाजी, माधवराव पेशवा, गुरु नानक, सरोजिनी नायडू (नाइटेंगल आफ इंडिया) डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी, भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र, एंड्रू जॉन्सन (17 वे अमेरिकन राष्ट्रपति) राजीव गाँधी (पूर्व प्रधान मंत्री) सनत जयसूर्या (क्रिकेटियर) विनोद खन्ना (अभिनेता)

v सिंहलग्न का स्वामी सूर्य है सूर्य ग्रहराज होने के साथ-साथ एक तेजस्वी ओजयुक्त पौरुष का प्रतिनिधित्व करता है, इस लग्न वाले व्यक्ति निर्भीक, उदार व अभिमानी होते हैं। इनके चित्त में दृढ़ता, साहस और धैर्य विशेष मात्रा में पाये जाते हैं। सूर्य आत्मकारक ग्रह है। यह आत्मशक्ति व आत्म विश्वास का कारण ग्रह माना जाता है। अत: सिंहलग्न वाले पुरुषों में आत्मशक्ति गजब की होती है।

v ये कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी नहीं घबराते, हिम्मत हारना तो इन्होंने सीखा ही नहीं। आपके जन्म समय में सिंहलग्न उदित हो रहा था, जिसका स्वामी सूर्य है।

v जल्दबाजी में काम करने वाला, मोटी हनु (हिचकी) वाला, बड़े मुंह वाला, पिंगल अर्थात् काले व पीले मिश्रित नेत्रों वाला, कम पुत्रों वाला, स्त्रियों से द्वेष करने वाला, मांस-मदिरा के प्रति आकर्षण रखने वाला, वन व पर्वत प्रदेशों से विशेष स्नेह रखने वाला, बिना प्रसंग के निरर्थक क्रोध करने वाला, भूख प्यास अधिक अनुभव करने वाला, पेट, दांत, मन के विकास का अनुभव करने वाला, त्यागी, पराक्रमी, स्थिर बुद्धि, घमंडी तथा माता के वश में रहने वाला होता है।

v सिंहलग्न में मनुष्य का जन्म हो तो जातक शत्रुओं का नाश करने वाला कर फल में कमी वाला, धन से रहित, अधिक खाने वाला,सदेव लज्जा से रहित व्यहा करने वाला अर्थात् संकोचहीन होकर व्यवहार करने वाला होता है। सज्जनों का निन्दित, नीच कार्यों में रत व कृतघ्न होता है

v थोड़े पुत्र, चित्त में संतोष अधिक हो, हिंसक, शूरवीर, राजा को वश में करने वाला (अर्थात् राजा का प्रिय) शत्रुओं पर विजयी, कामी, विदेश जन्म भूमि से अन्यत्र स्थान में रहे।

v यदि जन्म लग्न में सिंह राशि व सिंह राशि का पहला द्रेष्काण हो तो जातक दानी, भर्ता अर्थात् भरण (पालन) करने वाला, शत्रु को जीतने वाला, अधिक बलवान, अधिक स्त्री वाला, सुन्दर मित्रों से युक्त, अधिक राजाओं का सेवक और बलवान होता है।

v सिंहलग्न वाला जीव संसार भोगी, शत्रु नाशक, अल्पाहारी, परिवार नियोजक, पराक्रमशील, कर्मवादी साथ ही विशेष स्वाभिमानी रहे

v पराक्रम सामान्यतया सिंहलग्न में उत्पन्न जातक तेजस्वी सहासी एवं पराक्रमी होते हैं। उनके अंदर आत्मविश्वास का भावपूर्ण रूप से विद्यमान रहता है तथा अपनी बुद्धि एवं के बल पर वे जीवन में उन्नति प्राप्त करने में समर्थ रहते हैं।

v धनैश्वर्य वैभव एवं भौतिक सुख संसाधनों से ये प्रायः युक्त रहते हैं तथा जीवन में सुखपूर्वक इनका उपयोग करते हैं। ये जातक सिद्धान्तवादी होते हैं तथा अपने सिद्धांतों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

v इनकी प्रवृत्ति धार्मिक भी होती है तथा स्वभाव से परोपकार का भाव भी रहता है फलतः ये पूर्ण विकास के योग्य होते हैं।

v इसके अतिरिक्त सरकारी या गैर सरकारी क्षेत्रों में किसी उच्च पद को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। जिससे सामाजिक मान प्रतिष्ठा या यश समाज में विद्यमान रहता है। साथ ही नेतृत्व की क्षमता भी इनमें विद्यमान रहती है। इसके प्रभाव से आपका व्यक्तित्व आकर्षक रहेगा जिससे अन्य लोग आपसे प्रभावित रहेंगे।

v आप निर्भय पुरुष होंगे तथा अपने समस्त शुभ एवं महत्वपूर्ण सांसारिक कार्यकलापों को निर्भयता से सम्पन्न करके उनमें वांछित सफलता प्राप्त करेंगे जिससे जातक को भौतिक सुख संसाधनों तथा अन्य ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी तथा उसकी उन्नति के मार्ग भी प्रशस्त रहेंगे फलतः आपका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होगा।

v जातक हृदय में उदारता का भाव भी विद्यमान रहेगा तथा वह अन्य जनों के प्रति स्नेह के भाव का प्रदर्शन करेंगे। आपको स्वपुरुषार्थ से जीवन में सफलता प्राप्त होगी तथा प्रतियोगिता के क्षेत्र में आप सफल होंगे तथा आपके शत्रु या प्रतिद्वन्द्वी आपसे भयभीत होंगे परन्तु यदि आप अन्य जनों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार करें तो आप समाज में लोकप्रियता तथा अतिरिक्त प्रतिष्ठा भी अर्जित करने में समर्थ हो सकते हैं।

v आपमें शारीरिक बल की प्रधानता रहेगी तथा परिश्रम एवं पराक्रम से अपने सांसारिक महत्त्व के कार्यों को सम्पन्न करेंगे तथा इनमें इच्छित सफलता प्राप्त करके जीवन में उन्नति के मार्ग प्रशस्त करेंगे।

v राजनीति या व्यापार आदि में आप उन्नतिशील रहेंगे तथ इन क्षेत्रों में आपकी श्रेष्ठता बनी रहेगी। आपके स्वभाव में तेजस्विता का भाव भी विद्यमान रहेगा। अतः यदा-कदा आप अनावश्यक क्रोध या उग्रता के भाव का भी प्रदर्शन करेंगे।

v योग आदि के प्रति भी आपकी इच्छा विद्यमान तथा समय-समय पर योगाभ्यास करेंगे। आपमें गम्भीरता का भाव विद्यमान होगा। फलतः आपके कार्य धैर्य एवं गंभीरतापूर्वक सम्पन्न होंग जिससे आपको सफलता प्राप्त होगी। धर्म के प्रति आपके मन में श्रद्धा रहेगी तथा आप श्रद्धापूर्वक धार्मिक कार्यकलापों तथा अनुष्ठानों को सम्पन्न करेंगे। इसी परिपेक्ष्य में सत्संग आदि में भी अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं। आपको भ्रमण या पर्वतीय क्षेत्रों में घूमना रुचिकर लगेगा। अत: आप समय समय पर ऐसे स्थानों की सैर करते रहेंगे। इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक समस्त सुखों का उपभोग करते हुए आप अपना समय व्यतीत करते है। ये अछे पाक शास्त्री होते है और खाना बनाना अचा जानते है किन्तु बारीकी का काम इनसे कम होता है

ये फल सिर्फ लग्न का है इसमे अलग अलग गृह और स्थितिया और ड्रिसती इत्यादि अवयव काम करते है इसलिए ये 100% फल नहीं हो सकता है इसके लिए

सिंह लग्न कुण्डली में सूर्य देवता के फल:

 

लग्नेश होने के कारण सूर्य देवता इस लग्न कुण्डली में सबसे योग करक ग्रह माने जातें है l

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम, एकादश भाव में सूर्य देवता अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें है l

तीसरे (नीच ), छठें, आठवें और द्वादश भाव में सूर्य देवता अशुभ हो जातें है l उनका दान और पाठ  करके उनकी अशुभता को कम किया जाता है l

शुभ भावों में सूर्य का रत्न माणिक पहन कर सूर्य देवता का बल बढ़ाया जाता है l

सिंह लग्न कुण्डली में बुध देवता के फल:

 

बुध देवता इस लग्न कुण्डली में दूसरे और एकादश भाव के मालिक हैं l लग्नेश सूर्य के अति मित्र होने के कारण बुध देवता इस लग्न कुण्डली में योग करक ग्रह माने जाते हैं l

पहले , दूसरे , चौथे , पांचवें , सातवें , नवम , दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा -अन्तरा में शुभ फल देतें है l

तीसरे , छठें , आठवें और 12वें भाव में बुध देवता मारक ग्रह माने जाते हैं l उनका दान-पाठ  करके बुध ग्रह के मारकेत्व को कम किया जाता है l

कुण्डली के किसी भी भाव में बुध देव, सूर्य देव के साथ बैठकर अस्त अवस्था में आ जाते हैं तो उनका रत्न पन्ना पहन कर बुध देवता का बल बढ़ाया जाता है l

सिंह लग्न कुण्डली में शुक्र देवता के फल:

 

इस लग्न कुण्डली में शुक्र देवता तीसरे और दसम भाव के मालिक हैं l सूर्य देवता के विरोधी दल के होने के कारण वह कुण्डली के सम ग्रह बन जाते हैं l

पहले, चौथे , पांचवें , सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा -अन्तरा में  अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं l

दूसरे (नीच ), तीसरे , छठें , आठवें, व द्वादश भाव में शुक्र देवता अशुभ हो जाते हैं l दान व पाठ करके शुक्र देवता की अशुभता को दूर की जाती है l

शुक्र देवता इस लग्न कुण्डली में किसी भी भाव में अगर अस्त अवस्था में है तो उनकी दशा-अन्तरा में कामकाज की वृद्धि के लिए उनका रत्न हीरा, ओपल पहनकर शुक्र देवता का बल बढ़ाया जाता है

सिंह लग्न कुण्डली में मंगल देवता के फल:

 

मंगल देवता इस लग्न कुण्डली में चौथे और नवम दो अच्छे भावों के स्वामी हैं l लग्नेश सूर्य के अति प्रिय मित्र होने के कारण मंगल ग्रह इस कुण्डली के योग कारक ग्रह माने जाते हैं l

पहले, दूसरे , चौथे , पांचवें , सातवें , नवम, दशम और एकादश भाव में मंगल देवता अपनी दशा -अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं l

तीसरे, छठें, आठवें और द्वादश भाव में पड़े मंगल अशुभ हो जाते हैं l उनकी अशुभता दान पाठ  करके दूर की जाती है l

अस्त अवस्था में किसी भाव में स्थित मंगल का रत्न मूंगा पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है l

सिंह लग्न में बृहस्पति देवता के फल:

 

बृहस्पति देवता इस लग्न कुण्डली में पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं l बृहस्पति देवता की मूल त्रिकोण राशि (धनु) कुण्डली के मूल त्रिकोण भाव में आती है l सूर्य देवता के मित्र होने के कारण वह अति योग कारक ग्रह माने जाते हैं l

पहले, दूसरे , चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा -अन्तर्दशा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं l

तीसरे, छठे, आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देव मारक बन जातें है और  अशुभ फल देतें है परन्तु आठवां और 12वें भाव में विपरीत राज़ योग की स्थिति में आकर शुभ फल देते हैं अगर लग्नेश बलि और शुभ हो जाएँ तो l

छठे भाव में बृहस्पति नीच राशि में आ जाते है इसलिए वह विपरीत राज़ योग का शुभ -लाभ नहीं  देते हैं l

अस्त अवस्था में बृहस्पति का रत्न  पुखराज किसी भी भाव में पहना जाता है l

अशुभ बृहस्पति का दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है l

सिंह लग्न में शनि देवता के फल:

 

शनि देव इस लग्न कुण्डली में छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं l लग्नेश सूर्य के शत्रु होने के कारण  शनि देव को कुण्डली का अति मारक ग्रह माना जाता है l

कुण्डली के सभी भावों में शनि देव अशुभ फल देंगे इसलिए उनकी दशा-अन्तरा में उनका पाठ और दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है l

छठे, आठवें, और 12वें भाव में शनि देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि होना अति अनिवार्य है l

शनि देव का रत्न इस लग्न कुण्डली में नहीं पहना जाता है क्योंक वह रोगेष है l

 सिंह लग्न में चन्द्रमा देवता के फल:

 

चंद्र देव इस लग्न कुण्डली में द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए इस कुण्डली में चंद्र देवता अति मारक  ग्रह माने जाते हैं l

कुण्डली के किसी भाव में चंद्र देव अपनी दशा-अन्तरा में अशुभ फल देतें है l अपनी क्षमतानुसार  अशुभ फल देते हैं l

छठे, आठवें और 12वें भाव में पड़े चंद्र देवता विपरीत राज़ योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता  रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि व शुभ होना अनिवार्य है l

इस लग्न कुण्डली में मोती चन्द्रमा का रत्न कभी भी नहीं पहना जाता है l

दशा -अन्तरा में चन्द्रमा के दान और पाठ करके उनका मारकेत्व को कम किया जाता है l

सिंह लग्न कुण्डली में राहु देवता के फल:

 

राहु देव की अपनी कोई राशि नहीं होती l वह अपनी मित्र राशि और शुभ भावों में बैठकर ही शुभ  फल देते हैं l

दूसरे, सातवें, दशम व एकादश भाव में अपनी दशा अन्तरा में राहु देव शुभ फल देते हैं l

पहले, तीसरे, चौथे (नीच), पांचवें (नीच ), छठें, आठवें , नवम और द्वादस भाव में राहु देव मारक  ग्रह बनकर अशुभ फल देंगे l राहु का रत्न गोमेद कभी भी नहीं पहना जाता बल्कि इसका दान-पाठ करके इसकी अशुभता दूर की जाती है l

सिंह लग्न कुण्डली में केतु देवता के फल:

 

केतु देवता की अपनी कोई राशि नहीं होती l केतु देवता अपने मित्र राशि और शुभ भाव में बैठकर  ही शुभ फल देते हैं l

दूसरे, चौथे (उच्च राशि), सातवें भाव में केतु देवता अपनी दशा-अन्तरा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें है l

पहले, तीसरे, छठे, आठवें, नवम और एकादश (नीच) और द्वादश भाव में केतु देवता मारक ग्रह  बन जातें है व अशुभ फल देतें हैं l

केतु का रत्न लहसुनिया कभी भी नहीं पहना जाता बल्कि केतु का पाठ व दान करके उनकी  अशुभता दूर की जाती है l

सिंह लग्न में ग्रहों के प्रभाव :-

1.सूर्य :- लग्नेश होने के कारण सूर्य देवता इस लग्न कुण्डली में सबसे योग करक ग्रह होते है | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम, एकादश भाव में सूर्य देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें है | तीसरे (नीच), छठें, आठवें और द्वादश भाव में सूर्य देवता अशुभ हो जातें है | उनका दान और पाठ  करके उनकी अशुभता को कम किया जाता है | शुभ भावों में सूर्य का रत्न माणिक पहन कर सूर्य देवता का बल बढ़ाया जाता है |

 

2.बुध :- बुध देवता इस लग्न कुण्डली में दूसरे और एकादश भाव के मालिक हैं | लग्नेश सूर्य के अतिमित्र होने के कारण बुध देवता इस लग्न कुण्डली में योग करक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में शुभ फल देतें है | तीसरे, छठें, आठवें और बारहवें भाव में बुध देवता अशुभ फल देते हैं | उनका दान-पाठ  करके बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव को कम किया जाता है |

 

 

3.शुक्र :- इस लग्न कुण्डली में शुक्र देवता तीसरे और दसम भाव के मालिक हैं | सूर्य देवता के विरोधी दल के होने के कारण वह कुण्डली के सम ग्रह माने जाते हैं l पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में  अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं | दूसरे (नीच), तीसरे, छठें, आठवें, व द्वादश भाव में शुक्र देवता अशुभ हो जाते हैं | दान व पाठ करके शुक्र देवता की अशुभता को कम किया जाता है |

 

4.मंगल :-  मंगल देवता इस लग्न कुण्डली में चौथे व नवमें, दो अच्छे भावों के स्वामी होते हैं | लग्नेश सूर्य के अति प्रिय मित्र होने के कारण मंगल ग्रह इस कुण्डली के योगकारक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में मंगल देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | तीसरे, छठें, आठवें और द्वादश भाव में पड़े मंगल अशुभ हो जाते हैं | उनकी अशुभता दान पाठ  करके दूर की जाती है l अस्त अवस्था में किसी भाव में स्थित मंगल का रत्न मूंगा पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है |

 

 

5.बृहस्पति :- बृहस्पति देवता इस लग्न कुण्डली में पांचवें और आठवें भाव के स्वामी हैं | सूर्य देवता के मित्र होने के कारण बृहस्पति योगकारक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में क्षमता अनुसार शुभ फल देतें हैं | तीसरे, छठे, आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देव मारक बन जातें है और  अशुभ फल देते है | अस्त अवस्था में बृहस्पति का रत्न पुखराज पहनकर उन्हें मजबूत किया जाता है |

 

6.शनि :- शनि देव इस लग्न कुण्डली में छठे और सातवें भाव के स्वामी हैं | लग्नेश सूर्य के शत्रु होने के कारण  शनि देव को कुण्डली का अति मारक ग्रह माना जाता है | कुण्डली के सभी भावों में शनि देव अशुभ फल देंगे इसलिए उनकी दशा-अन्तर्दशा में उनका पाठ और दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है | छठे, आठवें, और बारहवें भाव में शनि देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि होना अति अनिवार्य है | शनि देव का रत्न इस लग्न कुण्डली में नहीं पहना जाता है क्योंक वह रोगेष एवं मारकेश है |

 

 चन्द्रमा :- चंद्र देव इस लग्न कुण्डली में द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए इस कुण्डली में चंद्र देवता अतिमारक ग्रह माने जाते हैं | कुण्डली के किसी भाव में चंद्र देव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं | छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े चंद्र देवता विपरीत राज़योग में आकर शुभ फल देने की क्षमता रखते हैं परन्तु सूर्य देव के बलि व शुभ होना अनिवार्य है | इस लग्न कुण्डली में मोती चन्द्रमा का रत्न कभी भी नहीं पहना जाता है | चन्द्रमा के दान और पाठ करके उनका अशुभ प्रभाव को कम किया जाता है |

सिंह लग्न


सूर्य : लग्नेश के प्रतिरूप में सूर्य सर्वदा शुभ कारक और शुभ ग्रह है। यह जितना बलीहोगा, उसी अनुपात में फल देगा। भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है।सूर्य भगवान् को अर्ग देवे, माणक 1 मुखी रुद्राक्ष, सांड को आटा खिलाये या खिलावेमंदिर में चाँदी का नंदी भेट करे l बेल की जड़ी पहने आदित्य ऋदय स्तोत्र, सूर्य कवच का पाठ करे सप्तमी, रविवार का व्रत रखे  ॐ घृणिः सूर्याय नमः बेल का वृक्ष लगावे बेल का फल शिव पर चढ़ावे l



चंद्रमा : द्वादशेश चंद्रमा अपकारक है। अशुभ अशुभ रहेगा तो दान करे, मोती न पहने चावल,सफ़ेदवस्त्र, दान करे शिवलिंग पर दूध का अभिषेक कर कुत्तो को पिलावे, प्याउ लगावे पानी पिलावे, 


मंगल : सूर्य के बाद मंगल सर्वाधिक कारक ग्रह है। इसकी दशा में सम्मान औरअचल संपत्तियों की उपलब्धि होती है। अत्यधिक शुभ लाल मूंगा धारण करे, अनंत मूल की जड़ी, 3 मुखी रुद्राक्ष पहने, ताम्बे का कड़ा ताम्बे में जल पिए, हनुमानजी को पूजे, हनुमानजी, नरसिंह जी, रक्तांग भैरवजी पूजे, नीम का पेड़ लगावे, ताम्बे में मंगल यन्त्र धारण करे



बृहस्पति : अष्टमेश होकर बृहस्पति जहां शारीरिक कष्टप्रद सिद्ध होता है, वहीं पंचमेश होने से नए कार्यों का आरंभ भी करवाता है।शुभ अमृत कारक आयुष्य के लिए सर्वश्रेस्ठ बृहस्पति लग्नेश होने से सबसे श्रेष्ठ, पुखराज , सुनहला, सिट्रीन रत्न धारण करे 5 मुखी रुद्राक्ष और भारंगी की जड़ी पहने, पीतल में खाना खावे, पीपल का पेड़ लगाए सीचे और शनिवार को  के तेल का दिया करे, बृहस्पति यंत्र इंडेक्स फिंगर में सोने में पहने, पुष्करतीर्थ में स्नान और पूजन करावे, दक्षिणमुखीशिव, दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे उनको गुरु  बनावे


शनि : अशुभ षष्ठेश होने से शनि रोग और ऋण का कर्ता है, साथ ही सप्तमेश होकर मारकेश भी बन जाता है। शनि की महादशा प्रतिकूल ही रहेगी।भैरव जी की उपासना संडे को  फ़िरोज़ा पेहेन कर शनि के दोषो से मुक्त रहेंगे शनि की महादशा में लोहे का दान देना शुभ होता है। 7 मुखी रुद्राक्ष, बिच्छू की जड़ धारण करे, लाजवर्त,  फ़िरोज़ा धारण करे, लोहे का छल्ला दाए हाथ की मधयमा अंगुली में में पहने, नाव की कील को पास रखे, तेल उड़द दान करे l इडली डोसा 8 इमरती गरीबो में बांटे


बुध : धन कारक शुभकारक वाणी के लिए शुभ द्वितीयेश होकर बुध मारकेश बन जाता है। बुध की दशा  और किन्तु धन कुटुंब लाभ और इच्छाओ की पूर्ति का भी स्रोत होता है पन्ना पहने सर्वदा शुभ धन सिद्धि कारी पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने किन्नरों की सेवा करे साडी और हरे मुंग की दाल खावे फिटकरी से नहाये दुर्गा उपासना करे गणेश और देवी दुर्गा की उपासना करे 


शुक्र : केंद्र के स्वामी जब शुभ ग्रह हों, तो वे अशुभ फलकरते हैं। शुक्र दशम और तृतीय का स्वामी होकर अपकारक बन जाता है। शुक्र के दान करे  दुर्गा उपासना करे कोई रत्न जड़ी रुद्राक्ष न पहने 


राहु विनाशकारी राहु के  दान करे 

केतु अशुभ करि किन्तु अग्नि राशि में शुब्कारक है तो टाइगर पेहेन सकते है किन्तु साथ में केतु का दान करे 


राहु-केतु सर्वदा अशुभ इनके दान करे जूता छाता चप्पल कम्बल मोज़े टोपी, 8स्टील और 8लोहे के बर्तन, जौ बाजरी प्याज लहसुन सफ़ेद काले तिल, कोयला सिगड़ी, मोप्पर, वाइपर, पोछा, साबुन लिक्विड वाशिंग  पाउडर केमिकल, मेडिसिन  या इंडक्शन 

शनि :  काली उडद

शुक्र :  ज्वार

चंद्र: चावल

केतु :  बाजरा/चवला

राहू: जौ/मोठ

मिक्सचर donate करे गौशाला में 

@  9,18,27,54,81,108,kg

गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को करें

OR

50gm डिब्बी में रात को सिरहाने रखकर या सुबह 27 बार एंटीक्लॉक वाइज उवार कर पक्षियों में डाले


चंद्र के दान :  

सफ़ेद रंग की वस्तुवे, सफ़ेद फूल, कैल्शियम, नदी स्नान, केवड़ा  सफ़ेदवस्त्र,दूध,पानी मोती, मूंस्टोंन, चाँदी के आइटम , चाँदी का सिक्का,चाँदीपायल ,  चाँदीकमरबंध,चाँदीबिछिया,चाँदी पेन,चाँदी गायी, चावल, लौकी जल पेठा, खीर, मावा, खील, बताशे,खरबूजा,ककड़ी, अनानास, रसीलेफल, अंगूर, भांग, शलजम, सिंघाड़े, खस, केवड़ा, ठंडाई, बर्फ,गोला, सीताफल,  नारियलपानी,पोदीना, शरबत, ओला,शकरगोला, मिश्री, मक्खन, 

मैदा, छाछ, नारियल तेल 


शुक्र ग्रह के दान 

अंक 6, 6 मुखी रुद्राक्ष, सरपौंखा की जड़, हीरा प्लैटिनम चांदी  स्टील वाइट metal,का 6ग्राम सिक्का, श्रीयंत्र, छोला,सफ़ेद काबुली चने, मैदा,  कमलगट्टा , सफ़ेदक्रीम, पनीर , मक्खन, दही,  चावल, ज्वार, सफ़ेद उड़द दाल, मिश्री, दूध, दही लस्सी, श्रीखंड, इत्र, सफेद चंदन, चांदी, प्लैटिनम, हीरा, अमेरिकन डायमंड, सफ़ेद पुखराज, ओपल, मोज़ोनैट, बंगाली छैने की सफ़ेद मिठाई, मलाई, कपूर, इत्र, कमल ककड़ी, धूपबत्ती, खुशबु की वस्तुवे,टेलकम पाउडर, श्रृंगार सामग्री, मोगरा चमेली सफ़ेद खुशबूदार पुष्प, इत्र परफ्यूम डीओ, फ्रग्रेंस, कद्दू,आलू,शक्करकंद, आगरे का पेठा, मखाने, सफ़ेद क्रिस्टल, led लाइट, गन्ना, सफ़ेद मावा मिश्री, काजू कतली, दूधबर्फी, बताशा, आभूषण, सिल्क रेशम, मखमल, सफ़ेद मूंगा, sunscreen लोशन, क्रीम, टूथपेस्ट, स्त्री सौंदर्य सामग्री, सैनेटरीपेड, स्त्री प्रसाधन, ब्रा-पेंटी,   मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, आराम की सामग्री, मनोरंजन सामग्री, सिंघाड़ा, साबूदाना , आलू के बने व्यंजन, निरोध, वियाग्रा, 


शनि के दान अंक 8

अंक 8, लोहा, 8 लोहे के बर्तन, 8 के काले नीले वस्त्र  अंक में काजल, सुरमा, कालीउड़द, लोहे के औज़ार, हथियार गाडी, धातु से बने पात्र, अस्त्र शास्त्र, मशीन, 7 धान, जूते, काले फल, काले अंगूर, काले नीले फूल, कला दन्त मंजन, काला नमक, राई,  काले मोज़े, काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, अलसी, तेल, काला पुष्प, कस्तूरी, काले तिल, चमड़ा, काले कंबल का दान किया जाता है, नील, चारकोलसोप, आवला, पीपल, कला कुत्ता, उड़द से बने इमरती, डोसा, इडली, सांभर वादा, काली दाल, चाय की पत्ती, काली पैंट, कला रुमाल, गोल बगीचे के आठ चक्कर, टायर, पायल, धातु, बांसुरी, लौंग, काली हल्दी, 


राहु-केतु के दान अंक 4-7


नीलेफूल, मैग्गी, चौमीन, सोया सॉस ,फ़ास्ट फ़ूड, अंडा नॉनवेज, चाय, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, ईरफ़ोन, mic, स्पीकर, मुखौटा,  नशे, डबल रोटी ब्रेड, बासी भोजन, स्टील, अस्ट धातु या पांच धातु या मिश्रण धातु के आइटम, लेड शीशा, पीतल, कांसा, स्टील के बर्तन  जौ-बाजरा,प्याज-लहसुन,काले-सफ़ेद तिल, मशरूम, ऊनि- टोपी, जूता, छाता, चप्पल कम्बल, एलोपैथिक होम्योपैथिक दवाइयाँ, चाकू छुरी, तलवार कटार, ढाल, कपडे, शराब, मादक पदार्थ, खट्टे आइटम, डेटोल, स्पिरिट, पोछा, वाशिंग मशीन, साबुन डिटर्जेंट, केमिकल, तेज़ाब, एसिड, पोइसन, केमिकल स्प्रे, radio, मोबाइल, ट्रांजिस्टर, इंडक्शन चूल्हा, शमशान की लकड़ी, पलंग, पूरानी लकड़ी के आइटम हेंडीक्राफ्ट   काले-दुरंगे कुत्ते, राहु के लिए काला-नीला कपड़ा, कंबल, सरसों का दाना, राई, ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का ‍दान किया जाता है।

केतु के लिए सात अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान किया जाता है।


5. सिंह लग्न के ईष्ट - मंत्र- 


सिंह राशि : इन्हें हरिद्रा गणेश सूर्य, नरसिंघ, दुर्गा नारायण विष्णु हनुमान, शरभ आकाश भैरव  जी माता पीताम्बरा या माता कालरात्रि की उपासना करनी चाहिए।

ॐ लं लम्बोदराय नमः 

ॐघृणि सूर्य आदित्य श्रीं

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

ॐऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै

ॐ हौं जूं सः  

सिंह राशि लग्न  के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।

ॐ ग्लौंरंक्ष्रौंदंह्लींखंभ्रंहंफ़्रॉंह्रींश्रींक्लींसौः 

ॐक्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:


इसके साथ नीचे दिए गृह अनुकूल और लाभ कारी है इनके दान न करे केवल  मन्त्र जप लाभकारी श्रेष्ठ रहेगा 

सूर्य तांत्रिक मंत्र- ॐ ह्रां ह्रीं हौं स: सूर्याय नम:।

एकाक्षरी बीज मंत्र- ॐ घृणि: सूर्याय नम:

गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'। 

गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।

भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।

भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।

बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।

बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'।

प्रजापति

शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'। 

शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:' 

सिंह लग्न के लिए सूर्य,मंगल, गुरु, बुध, अरुण, योग कारक हैं। अतः इनके लिए माणिक्य, मूंगा, पुखराज, सुनहला,पन्ना, फ़िरोज़ा,  धारण करें। 1,3,4,5,6,7 मुखी रुद्राक्ष धारण करना शुभ रहेगा। 

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गणेश मंदिर :  बुद्धवार, लाल या हरे पत्थर के गणेश जी की मूर्ति 

लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की दोनों  चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE

में लगावे 

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विष्णु लक्ष्मी मंदिर:  मंदिर में जावे बेसन चक्की और दूध की बर्फी केले भोग नैवेद्य ॐ श्रीं दं नमः पूर्णिमा, एकादशी, द्वादशी का व्रत रखे सूर्य यन्त्र विष्णु यन्त्र बुद्ध यन्त्र उत्तर में 

ग्रह            अवतार 

सुर्य           राम अवतार

चंद्रमा        कृष्ण अवतार 

मंगल         नरसिंह अवतार 

बुध           बुद्ध अवतार 

बृहस्पति    वामन अवतार 

शुक्र          परशुराम अवतार 

शनि ग्रह     कूर्म. (कछुआ) अवतार       राहु     वराह  (सुअर/सूअर) अवतार 

केतु          मत्स्य अवतार 


राम:  अयोध्या राम दरबार जावे  रामायण का पाठ करे राम दरबार का पूजन करे रामचरित मानस का पाठ करे ॐ रां रामाय नमः 

नवमी का व्रत रखे राम मंदिर जावे राम नाम का जप करे 


कृष्ण:  मासिक जन्मास्टमी का व्रत रखे, काले रंग की कृष्ण मूर्ति श्रीनाथ जी, वृन्दावन मथुरा गिरिराज जी द्वारिका, नाथद्वारा में दुग्धाभिषेक करावे ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का जाप करे, माखन मिश्री

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देवी दुर्गा मंदिर 

/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच 

सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री  यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे   


सूर्य मंदिर : रविवार, सप्तमी का व्रत 

रोली चावल जल से नित्य अर्घ दे 

आस्तोत्र, अष्टक, कवच का पाठ सूर्य यन्त्र स्थापित करे पूर्व दिशा में  

गायत्रीमन्त्र स्तोत्र कवच का पाठ

राम उपासना रामायण का पाठ 


काली मंदिर : शनिवार  चढ़ावे : माँ काली को प्रथम भेट में पांव की पायल भेट करे और सरसो के तेल का दिया मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे  108 बार मंत्र बोले ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए   


भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ  इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड,  उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः, भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे 


हनुमान मंदिर : मंगल शनि 

गदा की भेट, चमेली आवला का दिया 5 इमरती 5 गुलाब पुष्प,सिन्दूर चमेली तेल गुड़ चना पान चढ़ावे 

llॐ हं फ़्रौं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट ll दक्षिण में मंगल यन्त्र पांच मुखी हनुमान यन्त्र स्थापित करे 

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शिव मंदिर : कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे 

सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र,  व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार),  पान, गन्ने का रास दीप, पान 

मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च 

ह्रौं नमः शिवाय  

पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में 

बारह ज्योतिर्लिंग और उनका राशियों से संबंध

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कमला लक्ष्मी मंदिर 

मिश्री दही दूध बताशा गन्ना श्रीफल केला पान सुपारी मखाना साबूदाना चावल की खीर मोगरे का इत्र माला धुप ,मिश्री मावा अनार सेब 

श्रीयंत्र स्थापित करे कनकधारायंत्र कुबेर यंत्र स्थापित करे श्रीसूक्त, कनकधारा, लक्ष्मीसूक्त, पद्मावती, श्रीविद्या,लक्ष्मीअष्टक,त्रयोदशी,  अमावस्या पूर्णिमा, अष्टमी तृतीया त्रयोदशी लक्ष्मी कमला त्रिपुर सुंदरी कवच मन्त्र पत्नी से करावे 

षोडशी श्री विद्या मंत्र 

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'

या

ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

ॐ ह्रींश्रींक्लीं महालक्ष्म्यै नमः 

ॐश्रीं श्रियै नमः 

ॐकमलवासिन्यै स्वाहा

ॐ कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं महालक्ष्म्यै नमः 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगतप्रसूत्यै नमः 


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 पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे 

अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे 

रामायण, भागवत का पाठ करावे 

गौशाला ब्राह्मण को दान करे 

पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे  में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00  से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके  हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे  

llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3

    2. त्रिपिंडी 

    3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच 

ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः

पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे 

प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे 

दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे


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