प्रकरण ११ - अंत्यकर्म के श्राद्ध एवं स्पिंडीकरण
प्रकरण ११ - अंत्यकर्म के श्राद्ध एवं स्पिंडीकरण
अंत्यकर्म के श्राद्ध - कर्ता एक होनेपर एक ही परिवार में
एक ही दिन एक से अधिक मृत्यु होनेपर कर्म के विषय में « माता तथा पिताजी की एक ही दिन मृत्यु हुई हो तब? उनके १०वें का कर्म १०वें दिन को ही करना है, परंतु पिता का पहले और उसके पश्चात् उसी दिन माता का कर्म करना चाहिए। « एक ही दिन घर में 2-3 व्यक्तियों की मृत्यु हुई हो तब दसवा दिन किस प्रकार करना चाहिए? पिता और पुत्र / माँ और पुत्र / दो सगे भाई यदि एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त हुए हो तब १० वें दिन का कर्म ज्येष्ठ का पहले करें उसके पश्चात् उसी दिन कनिष्ठ का कर्म करना चाहिए। * एक ही दिन परिवार में 2-3 व्यक्ति मृत होनेपर ११वें दिन का श्राद्ध (एकोदिष्ट श्राद्ध) १२वां दिन (सपिंडीकरण) १३वें दिन का कर्म कैसे करना चाहिए? ग्यारहवां दिन (एकोदिष्ट श्राद्ध) एक ही दिन करना चाहिए, परंतु ज्येष्ठ का पहले व कनिष्ठ का बाद में करना चाहिए। बारहवां दिन (सपिंडीकरण) भी एक ही दिन करना चाहिए, परंतु वह भी ज्येक्ठ का पहले और कनिष्ठ का बाद में करना चाहिए। एकोदिष्ट श्राद्ध होने के बाद सपिंडीकरण ११वें दिन भी कर सकते है (थर्मसिंधु, तृतीय परिच्छेद, उत्तरार्थ, सपिंडीकरण विचार) १३वें दिन २-३ व्यक्तियों की निधनशांति एक ही कर सकते है, परंतु मासिक श्राद्ध एक ही दिन ज्येष्ठ का पहले तथा कनिष्ठ का बाद में करना चाहिए। मासिक श्राद्ध करते समय ३ पिंडों का पूजन करना चाहिए (संदर्भ - नारायण भट्टी) तथा ४५ पिंडों का पूजन करने की भी परंपरा है। एक ही परिवार में एक व्यक्ति के १० दिन पूरे होने से पहले अन्य व्यक्ति मृत होनेपर क्रियाकर्म किस तरह से करने चाहिए? * एक ही परिवार में एक व्यक्ति के १० दिन के अंदर अन्य व्यक्ति मृत होनेपर उन दोनों का दसवां दिन कब करें? 1. दसवां दिन - (१०वें दिन का कर्म १० दिन से पूर्व नहीं करना चाहिए।) - एक ही परिवार में एक व्यक्ति की मृत्यु होने के पश्चात् दस दिन के अंदर दूसरे व्यक्ति की मृत्यु होनेपर प्रत्येक का १०वें दिन का कर्म उसके १०वें दिन ही करना चाहिए (पहले व्यक्ति के १वें
दिन उस घर के सगों का तथा सर्पिडों का अशौच समाप्त होता है।) परंतु कर्ता को दूसरे व्यक्ति का कर्मांग अशौच रखना याहिए। उसे स्पर्शास्पर्श (छुआछुत) का दोष नहीं है लेकीन वह थार्मिक कृत्य नहीं कर सकता। 4 वें अथवा १० वें दिन उसी धर में रहनेवाले किसी व्यक्ती की मृत्यु होनेपर मृत व्यक्ती का दहनविथी प्रथम करें, तत्पश्चात् सनानकर पहले मृत हुए व्यक्ती का ९वें / १०वें दिन का कर्म करें।
2. ग्यारहयां दिन - पहले का ११वें दिन का कर्म - ग्यारहवें दिन को तथा दूसरे का श्श्वें दिन का कर्म उसके ११ वे दिन ही करना चाहिए।
3. सर्पिडीकरण - दूसरे के १२वें दिन ज्येक्त क्रमानुसार सर्पिडीकरण करना याहिए। सपिंडीकरण १५वें दिन भी कर सकते हैं। (धर्मसिंधु तृतीय परिच्छेद, उत्तरार्थ, सपिंडीकरण विचार) (अधिक जानकारी हेतु सर्पिंडीकरण का अध्याय देखें)
4. तेरहवां दिन (निधनशांति) - सपिंडीकरण के बाद १३वें दिन का कर्म (निधनशांति) ज्येष्ठ क्रमानुसार करना चाहिए। मासिक श्राद्ध करते समय ४५ पिंडों की अपेक्षा ३ पिंडों का पूजन करने की भी एक पद्धति है। वर्तमान समय में इसपर विचार कर सकते है।
(११श्वां, १रवां तथा १३वां दिन अलग-अलग से करना संभव ना हो तब अंत्यकर्म के ११श्वां, १२वें, १३वें दिन के सभी श्राद्ध एक ही दिन अर्थात् ११वें दिन कर सकते हैं परंतु ११वें तथा १२वें दिन का कर्म घर के बाहर करना चाहिए और १३वें दिन का कर्म स्नान इत्यादि से शुद्धिकर घर में करना चाहिए।)
० एक व्यक्ति के दस दिन के अंदर सपिंड की अन्य व्यक्ति मृत होनेपर अंत्यकर्म किस प्रकार से करें?
एक ही दिन अथवा दस दिन के अंदर सपिंड में यदि किसी की मृत्यु होती है तब क्रियाकर्म प्रत्येक के ३०वें से १३वें दिन तक क्रम से करना चाहिए।
० त्रिपाद / पंचक शांति के संदर्भ में
त्रिपाद / पंचक नक्षत्रपर यदि किसी की मृत्यु होती है, तब उसके रिश्तेदारों को घर तथा गांव को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। त्रिपाद / पंचक नक्षत्र की शांति करने से दोष की निवृत्ति हो जाती है। कहीं-कहीं घर / गांव छोड़ने की पद्धति है, परंतु यह गलत है। कभी-कभी कर्ता त्रिपाद / पंचक शांति नहीं करता है, ऐसे में सपिंड का कोई भी व्यक्ति अरिष्ट निवारण हेतु त्रिपाद | पंचक शांति कर सकता है। त्रिपाद / पंचक शांति घर में भी कर सकते है।
'त्रिपाद नक्षत्र - कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ा
पंचक नक्षत्र - धनिष्ठा का ३ और ४ चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा, रेवती
* देहदान किया है अथवा मृतदेह नहीं मिला ही तब अंत्यकर्म कैसे करें?
माता-पिताने देहदान किया हो अथवा किसी अन्य कारण से उन्होंने उनका अंन्यकर्म जा करने की इच्छा व्यक्त की हो तब भी माता-पिता का अंत्यकर्म करने का अधिकार तथा कर्म पुत्र का है। उनके इच्छा विरुद्ध भी कर्तव्य समझकर उसको अंत्यकर्म करना चाह़िए। ऐगा करना परिवार तथा आगामी पीढ़ियों के लिए श्रेयस्कर होता है। देहदान करनेपर भी रिश्वेदा> १०, ११, १२ व १३वें दिन का अंत्यकर्म कर सकते हैं। उस हेतु पर्णशरदाह विधि है। ऐसे समय आवश्यक हो तो पुत्तलविधिकर पर्णशरदाह विधि करना चाहिए।
« किसी कारणवश अंत्यकर्म न हुआ हो अथवा विधिवत् न हुआ हो तब क्या करें?
किसी व्यक्ति की इच्छानुसार उस व्यक्ति का अंत्यकर्म नहीं किया गया हो अथवा विधिवत् अंत्यकर्म नहीं हुआ हो तब कुछ कालावधि के पश्चात् परिवार के किसी व्यक्ति को अनाकलनीय पीड़ा होने लगती है। ऐसे में उसका संबंध माता / पिता का अंत्यकर्म विधिवत् न करने से जोड़ा जाता है। इस पीड़ा से छुटकारा कैसे मिले इसकी चिंता सताने लगती है। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति को मृत व्यक्ति का (त्रिपाद/पंचक न हो उस दिन) पर्णशरदाह विधिकर उसी दिन ९वें तथा १०वें दिन का अंत्यकर्म करना चाहिए। दूसरे दिन से ११, १२ तथा १३वें दिन का अंत्यश्राद्ध कर्म करना चाहिए और उस समय कर्ता को कर्मांग अशौच का पालन करना चाहिए। उस के बाद व्यतीपात योग, कृष्ण अष्टमी अथवा अमावस्या के दिन प्रथम वर्षश्राद्ध करना चाहिए। उस के पश्चात् प्रतिवर्ष मृत व्यक्ति के श्राद्ध तिथि को प्रतिसांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिए तथा पितृपक्ष में महालय श्राद्ध करना चाहिए। इस तरह करने से अंत्यकर्म न करने का दोष जाता है। प्रतिवर्ष श्राद्ध करना पूरे परिवार के लिए श्रेयस्कर होता है।
* घर छोड़कर गुम हुए व्यक्तिका अंत्यकर्म कैसे करें?
कभी-कभी व्यक्ति घर छोड़कर जाता है अथवा यात्रा के दौरान लापता हो जाता है। इस घटना को बहुत वर्ष होनेपर उस व्यक्ति की घर आने की संभावना नहीं रहती। ऐसे में धर्मशास्र के अनुसार कम से कम १२ वर्ष तक राह देखकर वह व्यक्ति मृत हो गया है ऐसा समझकर उसका अंत्यकर्म कर सकते है। ऐसे समय उसके परिवार के सदस्यों को त्रिपाद/पंचक नक्षत्र का दिन छोड़कर कोई एक दिन निश्चितकर उस दिन वह व्यक्ति मृत हो गया है, ऐसा समझकर उसी दिन उस व्यक्तिका पर्णशरदाह विधि करना चाहिए। कर्ता को एवं सभी सगे-संबंधीयों को १० दिन का सूतक रखना चाहिए। उसके पश्चात् ११, १२ तथा १३वें दिन का श्राद्धकर्म करें। निश्चित किए हुए दिन को उस व्यक्ति की मृत्युतिथि मानकर उस तिथि को प्रतिवर्ष श्राद्ध करें तथा महालय श्राद्ध भी करना चाहिए। '
वर्तमान समय मे घर से लापता हुए व्यक्ति की ७ वर्ष तक राह देखकर तथा कानून के नियमों की पूर्तिकर उसके मृत्यु का प्रमाणपत्र लिया जाता है। ऐसे प्रसंग में मृत्यु के प्रमाणपत्रपर जो तारीख लिखी हो वही उसका मृत्युदिन मानकर उसी दिन से उसके सगे-संबंधीयों को १० दिन का सूतक (अशौच) पालन करना चाहिए। पर्णशरदाह विधिकर १०, ११, १२ व १३वें दिन का अंत्यकर्म करना चाहिए। मृत्यु के प्रमाणपत्रपर लिखित तारीख के अनुसार जो तिथि हो उस विथि को प्रतिवर्ष श्राद्ध एवं महालय श्राद्ध करना चाहिए। मृत्यु प्रमाणपत्र जिन्होंने नहीं लिया हो उन्हें १२ वर्ष के पश्चात् उपरोक्त विवेचनानुसार अंत्यकर्म करना चाहिए।
* मृत व्यक्ति जीवित हो तथा घर वापस आनेपर क्या करना चाहिए?
अनेक वर्ष लापता हुए व्यक्ति की सामान्यतः एक/दो तप राह देखकर उसका अंत्यकर्म किया जाता है। किसी व्यक्ति के निधन का गलत समाचार प्राप्त होने के कारण उसका अंत्यकर्म किया जाता है। क्वचित् प्रसंग में वह व्यक्ति जीवित घर लौटकर आता है, तब उस व्यक्ति को पहले दूध से बाद में पानी से स्नान करवाना चाहिए। तत्पश्चात् जातकर्म से लेकर जनेऊ तक के पूरे संस्कार तंत्रानुसार करने चाहिए। वह व्यक्ति विवाहित हो तथा उसका जोड़ीदार जीवित हो तब उन दोनों का पुनर्विवाहकर अपने परिवार में उसे सम्मिलीत कर लेना चाहिए। वह व्यक्ति जीवित है इस हेतु कानून की पूर्ति करनी चाहिए।
' सपिंडीकरण
वर्तमान समय में सपिंडीकरण ११वें अथवा १२वें दिन किया जाता है। परंतु वर्षाति सर्पिंडीकरण करने का भी एक पक्ष हैं।
" पुत्र तथा पिता / पुत्रवधु तथा सास का सपिंडीकरण
पुत्र की मृत्यु के बाद १० दिन के अंदर पिता मृत होनेपर पुत्र का ११वें दिन का कर्मकर रुक जाना चाहिए तथा पिता के १२वें दिन उनका सपिंडीकरणकर तत्पश्चात् उसी दिन पुत्र का
कि करना चाहिए। (पुत्रवधु एवं सास के संबंध में ऐसा प्रसंग होनेपर उपरोक्त क्रम से धि करें)
" माता-पिता की मृत्यु पश्चात् १० दिन के अंदर पुत्र मृत हुआ हो तथा सास की मृत्युपश्चात् पुत्रवधु मृत होनेपर संपिंडीकरण विषय में क्या करना चाहिए?
माता व पिता का सपिंडीकरण १२वें दिन होगा तथा पुत्र का सपिंडीकरण उसके १२वें होगा। उदाहरण - माता अथवा पिता 1 तारीख को मृत्यु को प्राप्त हुए हो तब उनका
सपिंडीकरण 11 अथवा 12 तारीख को होगा। उसी बीच पुत्र 5 तारीख को मृत हुआ हो तब उसका सपिंडीकरण 15 अथवा 16 तारीख को होगा। (इसी तरह सास और बहु का भी
होगा।) १३वां दिन (निधनशांति) अर्थात् मासिकश्राद्ध दूसरे के १३वें दिन ज्येष्ठ क्रमानुसार स्वतंत्ररूप से करना चाहिए। १४वें दिन उदकशांती एक साथ तथा एक ही कर सकते है।
*» पुरुष का सपपिडीकरण
पिताजी, दादाजी तथा पड़दादाजी इन तीनों के साथ करना चाहिए।
मृत व्यक्ति के पिताजी यदि जीवित हो तब उस व्यक्ति के दादा, पड़दादा तथा पड़ पड़दादा के साथ सपिंडी करनी चाहिए। यदि मृत व्यक्ति के पिता जीवित ना हो, परंतु दादाजी जीवित हो तब उस व्यक्ति की सपिंडी पिताजी, पड़दादाजी एवं पड़-पड़दादा के साथ करनी चाहिए। मृत व्यक्ति के पिताजी तथा दादाजी जीवित हो तब पड़दादा, पड़दादा के पिताजी तथा पड़दादा के दादाजी के साथ सपिंडी करनी चाहिए। (दादाजी तथा पड़दादाजी जीवित हो तब पिताजी का सर्पिंडीकरण किया होता है, परंतु दादाजी अथवा पड़दादाजी मृत होनेपर पिताजी का पुनः सपिंडीकरण करना चाहिए।)
० विवाहिता (स्त्री) का सर्पिंडीकरण
सास, पड़सास, पड़-पड़सास इन तीनों के साथ करना चाहिए। (अर्थात् पति की माँ, दादी तथा पड़दादी इन तीनों के साथ करना चाहिए।) मृत स्त्री की सास जीवित न हो किंतु दादीसास जीवित हो तब ऐसे समय में सपिंडी सास, पड़सास और उसके सास के साथ (पति की माँ, पड़ पड़दादी और उसकी सास के साथ) करनी चाहिए। मृत स्त्री की सास तथा दादीसास जीवित हो तब पड़सास, पड़-पड़सास एवं उसकी सास के साथ (पति की पड़दादी, पड़-पड़दादी तथा उनकी सास के साथ सपिंडी करनी चाहिए) दादी सास व पड़दादी सास जीवित हो तब सास का सपिंडीकरण किया होता है। परंतु दादी सास एवं पड़दादी सास मृत होनेपर सास का पुनः सर्पिडीकरण करना चाहिए।
० पुनर्विवाहिता (स्त्री) का सर्पिंडीकरण
1. घटस्फोटित पुनर्विवाहित स्त्री अथवा पुनर्विवाहित विधवा स्त्री का सपिंडीकरण दूसरे परिवार के त्रयी के साथ करना चाहिए। अर्थात् दूसरे पति की माँ, दादी माँ तथा पड़दादी माँ के साथ करना चाहिए।
2. प्रथम पति का पुत्र हो तब उससे सपिंडी करते समय अपने जनक पिता के मातृत्रयी कें साथ सपिंडीकरण करना चाहिए।
3. प्रथम पति का पुत्र एवं द्वितीय पति का पुत्र इन दोनों को अपने-अपने जनक पिता के मातृत्रयी के साथ स्वतंत्र रुप से सरपिंडीकरण करना थाहिए।
० अवियाहितल पुत्र / कन्या के संदर्भ में
1. उपनीत परंतु अविवाहित पुत्र का अंत्येष्टीकर्म विथियत् कर १० से १३वें दिन का कर्म सपिंडीकरण के साथ करना चाहिए।
2. अनुपनीत, अविवाहित पुत्र का -
(अ) ३ वर्ष से अधिक और 21 वर्ष की आयु तक का अविवाहित पुत्र मृत होनेपर उसके १०वें तथा ११वें दिन का कर्म कर प्रेतत्व निवृत्ति हेतु नारायणयली, वृषोत्सर्ग तथा उदकशांति करनी चाहिए। उसका सपिंडीकरण नहीं किया जाता है।
(ब) आवश्यक शिक्षण तथा समावर्तन पूर्ण होने की आयु साथारण रूप से 21 वर्ष होने के
कारण 21 वर्ष से अधिक आयु का अनुपनीत / अविवाहित पुत्र मृत होनेपर अर्क विवाह कर सर्पिडीकरण सहित दहनादि सर्व अंत्यसंस्कार करें।
3. अवियवाहित कन्या का - ३ वर्ष से अधिक आयु की अविवाहित कन्या मृत होनेपर
१०वें, ११वें दिन का कर्मकर प्रेतत्व निवृत्ति हेतु केवल नारायणबली, वृषोत्सर्ग तथा उदकशांति करनी चाहिए। उसका सर्पिडीकरण नहीं किया जाता।
अंत्यकर्म करने के अधिकारी
० स्त्री की मृत्यु होनेपर अंत्यकर्म के अधिकारी -
ज्येष्ठ पुत्र, ज्येष्ठ पुत्र यदि वहां उपस्थित न हो तो, दूसरा/तिसरा पुत्र, पति (पिता जीवित हो तब भी) अविवाहित अथवा विवाहित कन्या, जामात / जमाई / दामाद, (स्वयं के पिताजी जीवित हो तो अंगुठे तक अपसबव्य करना चाहिए तथा यदि पिता जीवित न हो तो प्रचलित रीति के अनुसार अपसव्य कर के कर्म करना चाहिए।) ज्येष्ठ क्रम के अनुसार सगोत्र तथा सपिंड की कोई भी व्यक्ति अथवा मातुलगृह के सप्पिडी में ज्येष्ठ क्रम से कोई भी रिश्तेदार अंतिम संस्कार संपन्न करा सकता है। (इस प्रकार अधिकारी व्यक्तियों में से रिश्तेदारी, भावसंबंध तथा स्वयं रैच्छा के अनुसार कोई भी व्यक्ति अंत्यकर्म कर सकता है)
" पुरुष की मृत्यु होनेपर अंत्यकर्म के अधिकारी - ज्येष्ठ पुत्र, ज्येष्ठ पुत्र यदि वहां अनुपस्थित हो तब दूसरा/तिसरा पुत्र, अविवाहलित कन्या, विवाहित कन्या, जमाई / दामाद (यदि स्वयं के पिताजी जीवित हो तो अंगुठे तक अपसब्य
कर, यदि जीवित न हो तो प्रचलित रिवाज के अनुसार अपसव्य कर के कर्म करना चाहिए)” पत्नी, ज्येष्ठ क्रम के अनुसार सगोत्र तथा सर्पिड का कोई भी रिश्तेदार अंतिम संस्कार संपन्न करा सकता है। (इस प्रकार अधिकारी व्यक्तियों में से रिश्तेदारी, भावसंबंध तथा स्वयं इच्छा के अनुसार कोई भी व्यक्ति अंत्यकर्म कर सकता है।)
० पुत्र तथा कन्या के अंत्यकर्म के अधिकारी सबसे पहले पिता, उसके बाद भाई, बहन तथा उसके पश्चात् सर्पिड के ज्येष्ठ क्रम से कोई भी रिश्तेदार अथवा माता अधिकारी हैं।
" व्यक्ति की मृत्यु होनेपर एक वर्ष के अंदर कौनसे कर्म करने चाहिए?
घर में किसी की मृत्यु हुई हो तब एक वर्ष के अंदर वर्ष प्रतिपदा, गौरी तथा गर्णेश पूजन, नवरात्री, दीपावली का लक्ष्मीपूजन, बहीपूजन, कुलधर्म-कुलाचार, तीज-त्यौहार, श्राद्ध तथा महालय कर सकते हैं, परंतु तीज-त्यौहार आड़ंबर रहित करें। माता-पिता के मृत्यु के पश्चात् एक वर्ष तक घर में विवाहादि कोई भी मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए। एक वर्ष के बाद तीन वर्ष तक कोई भी मांगलिक कार्य नहीं करने संबंध में कोई भी शास्त्रीय आधार नहीं है। परंतु योगायोग से विवाह निश्चित होनेपर मासिक श्राद्ध कर, एक वर्ष के अंदर विवाह संपन्न करा सकते हैं। अन्य कार्य मात्र नहीं करने चाहिए।
पुरोहित / पंडितों को अंत्यकर्म भी करने चाहिए!
अंत्येष्टी कर्म करनेवाले पुरोहित उपनयन, विवाह, वास्तुशांति तथा विविध प्रकार की पूजा, शांति आदि कार्य नहीं कर सकते, ऐसी गलत धारणा पुरोहित-वर्ग.में तथा अन्य लोगों में व्याप्त
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हमारे शास्त्र में जन्म के पूर्व से मृत्यु तक १६ संस्कार बताए गये हैं। वर्तमान समय में उसमें से केवल ३/४ संस्कार किये जाते हैं। उनमें भी विवाह तथा अंत्येष्टी यह दो कर्म प्रमुखता से किये जाते हैं।
वेदपाठशाला में पौरोहित्य सिखाते समय अन्य कर्मों के साथ अंत्यकर्म भी सिखाना आवश्यक है। कुछ पाठशालाओं में सिखाया भी जाता है, परंतु वे शिक्षित पुरोहित अंत्यकर्म श्राद्धविधि नहीं करते। वर्तमान समय में वेदपाठशाला में अंत्यकर्म की शिक्षा लिए बगैर पुस्तक | पोथी से अंत्यकर्म करनेवाले कुछ पुरोहित है। वेदपाठशाला में शिक्षा न लेने के कारण, ऐसे अंत्यकर्म करनेवाले पुरोहितों को अन्य मांगलिक कार्य एवं धार्मिक विधियों का शास्त्रोक्त ज्ञान
न होने के कारण अन्य पुरोहित उन्हें विविध प्रकार के धार्मिक कार्य में निमंत्रित नहीं करते, यह भी एक कारण है। कुल मिलाकर ऐसा दृष्टिगोचर होता है कि, धार्मिकविधि करनेवाले पुरोहित अंत्यकर्म नहीं करते तथा अंत्यकर्म करनेवाले पुरोहित थार्मिककार्य नहीं करते। इस कारण भविष्य में अंत्यकर्म विधि के लिए समाज को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। शहरों में बड़ी संख्या में धार्मिककार्य संपन्न करानेवाला पुरोहित वर्ग उपलब्ध है, परंतु अंत्यकर्म करनेवाले पुरोहित अत्यल्प है। अंत्यकर्म करनेवाले इन पुरोहितों के पश्चात् भविष्य में मृतव्यक्ति का अंत्यकर्म कौन करेगा? इसका विचार करते हुए धार्मिकविधि करनेवाले पुरोहितों को भी अंत्यकर्म की विधि करानी चाहिए, यदि ऐसा नहीं हुआ तो आत्मा को गति कैसे मिलेगी? इन सबका गंभीरता से विचार करते हुए तथा समय की मांग को जानकर धार्मिककार्य करनेवाले पुरोहितों को अपने यजमान के परिवार संबंधी अंत्यकर्म भी संपन्न करवाने चाहिए। समाज को भी अंत्यकर्म करनेवाले पुरोहित की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए एवं उनके द्वारा अन्य धार्मिकविधि भी संपन्न करवानी चाहिए, तभी यह भेदभाव नष्ट हो सकेगा।
ग्रामीण क्षेत्र में धार्मिककार्य करनेवाले पुरोहितों की संख्या अत्यल्प है। ऐसे गांवो में पुरोहितों ने आपस में भेदभाव नहीं किया तो भी समाज के लोग ऐसा भेदभाव करते है। वस्तुतः पौरोहित्य कर्म में शुभकर्म व अशुभकर्म ऐसा भेद करना ही गलत है, परंतु पुरोहित वर्ग ने ही ऐसा भेदभाव करने के कारण समाज में भी यह विचार व्याप्त है। विद्वान ब्राह्मण को श्राद्ध भोजन देना चाहिए ऐसा शास्त्रों में लिखा है, परंतु व्यवहार में श्राद्ध भोजन करनेवाले ब्राह्मण अलग ही होते है।
आजकल कुछ संस्था / मठ के द्वारा श्राद्धकर्म, अंत्यकर्म करवाये जाते हैं। यह विधि संस्था द्वारा महिलाएँ भी करती हैं। संस्था के माध्यम से ऐसी विधि करनेवाले समाज में उपेक्षित नहीं है क्योंकि, वे संस्था द्वारा उपनयन, विवाह आदि थधार्मिककार्य भी संपन्न कराते हैं।
प्राचीन समय में कुलोपाध्याय यजमान के सभी कार्य (अंत्यकर्म भी) संपन्न करवाते थे, परंतु वर्तमान में इसमें परिवर्तन हुआ है।
अत: किसी भी कर्म को शुभ अथवा अशुभ नहीं मानना चाहिए। पुरोहितों को भी आपस में उच्च-नीच भाव नहीं रखना चाहिए, इसी में पुरोहित तथा समाज का हित है।
मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में
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मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है,जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक लेजाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं।
मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं।
- मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं। वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है। नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है।
- यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराजके दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं।
- इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है। वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठताहै। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकारमय मार्ग से यमलोक ले जाते हैं।
- गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है, चार कोस यानी 13-16 कि.मी) दूर है। वहां पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसे भयानक यातना देते हैं। यह याताना भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।
- घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पातीऔर भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समयमें दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।
- जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिनपिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।
- गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है। यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।
- यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है। मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है।
- इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण,शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है।
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