अश्विनी नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन व्याख्या
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ज्योतिष शास्त्र की आत्मा का स्थान नक्षत्र विचार है। वाङमय मे इसके अनेक प्रमाण है कि प्राचीन काल मे ज्योतिष का व्यवहार नक्षत्र आधारित ही था। अतः नक्षत्र ज्योतिष शास्त्र की नीव है जिस पर ज्योतिष प्रवर्तको, ऋषियो, मनीषियो ने भारतीय ज्योतिष का सुरम्य प्रसाद खड़ा किया है।
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अश्विनी
राशि चक्र मे 00 अंश 13 अंश 20 कला के विस्तार वाला क्षेत्र अश्विनी नक्षत्र कहलाता है। अश्विनी नाम दो अश्विन से बना है। ग्रीक मे इसको कस्टर और पोलुक्स, अरब मंजिल मे अल शरतेैन, चीन के सियु मे ल्यु कहते है। " "चकलय" और खंडकातक के अनुसार अश्विनी समूह दो अश्वनियो का प्रतीक दो तारो का समूह है। कालब्रुक और बाद की धरणाओ के अनुसार अश्विनी नक्षत्र दो अश्व मुख के प्रतीक तीन तारो का समूह है।
देवता-अश्विनी कुमार स्वामी-केतु राशि-मेष 00 अंश से 13 अंश 20 कला
भारतीय खगोल मे अश्विनी प्रथम नक्षत्र है। इसके तीन तारे है। इसी से मेष राशि और वसंत विषुव का प्रारम्भ होता है। अश्विनी से लगभग 400 वर्ष पूर्व से गणना की जाने लगी है। मुहूर्त ज्योतिष मे इसे लघु क्षिप्र नक्षत्र कहते है। यह निश्चित, यथार्थ, कोमल, नाजुक कार्यो मे लाभ दायक है। यह शुभ, सात्विक पुरुष नक्षत्र है। इसकी जाति वैश्य, योनि अश्व, योनि वैर महिष गण देव, नाडी आदि है। यह दक्षिण दिशा का स्वामी है।
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| अश्विनीकुमार |
विशेषताऐ : यह जीवन के उत्तरार्ध मे लक्षण परिवर्तन का कारक है। जातक जीवन मे शीध्र उन्नति करता है। जातक सुंदर, उज्ज्वल, बुद्धिमान, होशियार होता है।
अश्विनी कुमार को चिकित्सा शिक्षा सूर्य से लेने मे इन्द्र ने अड़चन डाली लेकिन उन्होंने भक्ति और समर्पण से शिक्षा प्राप्त करली। इस कारण से जातक को चिकित्सा शिक्षा मे बाधा आती है, परन्तु जातक की लगन से पूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि अश्विनी जातक का ज्येष्ठा नक्षत्र (देवता-इन्द्र) के जातक से विरोध रहता है।
भारत रत्न रविन्द्रनाथ टैगोर का सायन चन्द्र अश्विनी के चतुर्थ चरण मे था ।
डा, मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिकन गाँधी) का निरयण लग्न अश्वनी चतुर्थ चरण मे था।
एडमंड हिलेरी (एवरेस्ट पर्वतारोही) का निरयण चंद्र अश्विनी द्वितीय चरण मे था।
अश्विनी फलादेश : अश्वनी नक्षत्र से लगभग 400 ई.पू. गणना की जाने लगी और यह पहला नक्षत्र माना गया। यह परिवहन का नक्षत्र भी है। जातक सुन्दर, भाग्यवान, कार्यकुशल, स्थूल देह, धनवान, लोकप्रिय होता है। चन्द्रमा के दिन उत्पन्न जातक सैनिक कमाण्डर, चिकित्सक, घोड़ो या पशुओ का स्वामी या व्यापारी होगा। अश्विनी स्वच्छ का प्रतीक है। अतएव स्फूर्ति, शुरुआत का का कारक है। इसकी शुरुआत भीन्न प्रकार की है। जातक चंचल, नायक, खर्चीला, हमेशा युवा दिखने वाला, भ्रष्ट, पथ प्रदर्शक, अदम्य साहसी होता है।
पुरुष जातक* सुन्दर मुखाकृति, आंखे बड़ी, चमकीली उन्नत ललाट लम्बी नाक होती है। जातक हठी, शांत, निश्चल, कार्य को अगोचर रूप से करनेवाला होता है। ये लक्षण 14 से 20 अप्रेल अश्विनी मे उच्च का सूर्य और 14 से 28 अक्टूम्बर स्वाति मे नीच का सूर्य मे विशेष परिलक्षित होते है। ये गुणधर्म अन्य माहो मे जन्मे जातक मे कम होते है। जातक विश्वनीय, सच्चामित्र, सलाह मानने वाला, निंदा से डरपोक, समय पर कार्य करनेवाला, अन्धविश्वास रहित, आधुनिक परम्परावादी होता है। 30 वर्ष की उम्र तक अड़चन संघर्ष, 30 से 55 के मध्य जीवन स्थिर होकर उन्नति होती है। सामान्यतया विवाह 26 से 30 वर्ष मे होता है।
स्त्री जातक मे गुणदोष पुरुष जातक के समान होते है अंतर इस प्रकार है। स्त्री जातक की आँखे मछली के समान चमकीली होती है। वक्तित्व मे आकर्षण होता है। पवित्र ह्रदय वाली, आधुनिक होते हुए भी परम्परानुसार वरिष्ठो का सम्मान करनेवाली होती है। यह यौन क्रियाओ मे अत्यधिक लिप्त रहती है। यदि नौकरी करती है तो प्रशानिक सेवाओ मे रहती है और 50 की उम्र मे सेवा निवृत्ति लेलेती है। विवाह 23 से 26 के मध्य होता है, यदि विवाह जल्दी हो जाता है, तो तलाक, दीर्घ अवधि का वियोग या वैधव्य होता है।
आचार्यो अनुसारअश्विनी फलादेश :
अश्विनी नक्षत्रोपन्न जातक सुरूप, सुन्दर, सुभग, सब कार्यो मे दक्ष, सुन-समझकर स्वमति से अमल करनेवाला, वस्त्राभूषण युक्त, स्त्रियो का आकर्षण केंद्र, सत्यवादी, तथ्यान्वेषक होता है। - ऋषि नारद
जातक राजकीय नौकरी मे हो, तो सरकार इससे विशेष खुश रहती है। रोजगार मे हो, तो उच्च लोगो से संपर्क बनाना इसका शौक होता है। यह नफासत पसंद, मान-सम्मान का विशेष ख्याल रखनेवाला, शूर, निडर, जड़ी-बूटी तथा पारम्परिक चिकित्सा मे रुचिवान होता है। -ऋषि पराशर
- चन्द्र - यदि चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक विनम्र, आभूषणो का शौकीन, संगीत-कला-परिवार प्रेमी, ईश्वर भक्त, लोकप्रिय, बुद्धिमान होता है।
- वराहमिहिर अनुसार अश्विनी मे चन्द्र प्रभाव सुखद आभाष, शिष्टाचार और ज्ञान, उत्कृष्टता का कारक है।
- सूर्य - यदि सूर्य अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक वैभव युक्त, धमंडी, आक्रामक, आतंकवादी, जिद्दी, व्यापारी, नेता, शक्ति और प्रसिद्धि का इच्छुक होता है।
- लग्न - यदि लग्न अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक साहसी, महान विचार वाला, यात्रा प्रेमी, चुंबकीय आकर्षण वाला शील युक्त, दक्ष, निडर होता है। यह अत्यधिक भोजन करने वाला, दवाओ का नशेड़ी होता है। (नोबल पुरष्कार विजेता मार्टिन लूथर किंग का जन्म लग्न (निरयण) अश्विनी नक्षत्र था।)
चरण फल : प्रत्येक नक्षत्र मे चार चरण होते है और एक चरण 3 अंश 20 कला का होता है। यह नवमांश जैसा ही है यानि इससे राशि के नौ वे भाग का फलित मिलता है। प्रत्येक चरण मे तीन ग्रह का प्रभाव होता है 1- राशि स्वामी, 2- नक्षत्र स्वामी, 3- चरण स्वामी।
प्रथम चरण : इसमे मंगल, केतु और मंगल ♂ ☋ ♂ का प्रभाव है। मेष 00 अंश से 03 अंश 20 कला। इसका स्वामी मंगल है। यह शारारिक क्रिया, साहस, प्रेरणा, प्रारम्भ का द्योतक है। जातक मध्यम कद, बकरे जैसा मुंह, छोटी नाक और भुजा, कर्कश आवाज, संकुचित नेत्र, कृश, धायल अथवा नष्ट अंग वाला होता है।
इसके गुणदोष - शारारिक सक्रियता, साहस, प्रोत्साहन, आवेगी बली. भावनावश परिणाम की बिना चिंता कार्य है। जातक नृप सामान, निर्भीक, साहसी, अफवाहो के प्रति आकर्षित, मितव्ययी, वासनायुक्त, भावुक होता है।
द्वितीय चरण : इसमे मंगल, केतु और शुक्र ♂ ☋ ♀ का प्रभाव है। मेष 03 अंश 20 कला से 06 अंश 40 कला। इसका स्वामी शुक्र है। यह अवबोध, अविष्कार, साकार कल्पना का द्योतक है। जातक श्याम वर्णी, चौड़े कन्धे, लम्बी नाक, लम्बी भुजा, छोटा ललाट, खिले नेत्र, मधुर वाणी, कमजोर जोड़ वाला होता है।
इसके गुणदोष - अवबोध, आविष्कारी, अश्विनीकुमार जैसी सदभावना, कल्पनाओ (भौतिक) को साकार करना है। जातक धार्मीक, हंसमुख, धनवान होता है।
तृतीय चरण : इसमे मंगल, केतु और बुध ♂ ☋ ☿ का प्रभाव है। मेष 06|40 से 10|00 अंश। इसका स्वामी बुध है। यह विनोद, संचार, फुर्ती, व्यापकता का द्योतक है। जातक काले बिखरे बाल, सुन्दर नेत्र व नाक, गौर वर्ण, वाकपटु, पतले जांध व नितम्ब वाला होता है।
इसके गुणदोष - विनोद, आदान-प्रदान, विस्तीर्ण योग्यता, दिमागी फुर्ती है। जातक विद्वान, ज्ञानवान, भोजन प्रेमी, भौतिकवादी, अशांत, तर्क आधारी, साहसिक होता है।
चतुर्थ चरण : इसमे मंगल, केतु और चन्द्र ♂ ☋ ☾ का प्रभाव है। मेष 10|00 से 13|20 अंश , इसका स्वामी चन्द्र है। यह चेतना, भावुकता, सहानुभूति का द्योतक है। जातक व्याकुल नेत्र, साहसी, ठिगना, नट अथवा नृत्यक, भ्रमणशील; खुरदरे नख, विरल कड़े रोम, कृश, भाई हीन होता है।
इसके गुणदोष - सामूहिक चेतना, महत्व, जानकारी, भावुकता है। जातक ईश्वर से डरने वाला, धार्मिक, पौरुषयुक्त, स्त्री संग प्रेमी, चरित्रवान, गुरुभक्त होता है।
☀ मानसागराचार्य मतेन - अश्विनी के प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय मे धनवान, तृतीय मे विद्वान, चतुर्थ मे गुरुभक्त होता है।
भातीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि या पाद दृष्टि नही होती क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है।
❉ सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक क्रूर, रक्तिम नेत्रो वाला, क्रोधी होता है।
❉ सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक सह्रदय, राजकीय शक्तियो का उपयोगी होता है।
❉ सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन और कार्य मे उसका मन नही होता है।
अश्विनी सूर्य चरण फल
प्रथम चरण - जातक वाकपटु, आत्मविश्वासी, उत्साही, शासकीय संस्था मे उच्च पदासीन, समाज मे शक्तिशाली, प्रसिद्ध मंदिरो (विशेषकर पहाड़ स्थित) का तीर्थयात्री, स्पष्टवादी होता है। इसके पत्नी से मधुर सम्बन्ध होते है लेकिन अहंकारवश कुछ समस्याये होती है, पहले पुत्र के जीवन मे बाधाऐ होती है। जातक ह्रष्ट, पुष्ट और स्वस्थ रहता है।
द्वितीय चरण - जातक छोटी उम्र मे धनवान हो जाता है किन्तु क़ानूनी उलझन मे धन खोना पड़ता है। विदेश मे रहने पर निर्धन और अस्वस्थ, शासकीय सहायता प्राप्त होता है। परिवार मे विरोधाभास होता है। संधर्ष कर खोया धन प्राप्त करनेवाला, नैत्र रोगी होता है।
❉ मतान्तर - इस चरण मे सूर्य राशि चक्र की परिक्रमा पूर्ण कर विश्राम की अवस्था मे होने के कारण अशुभ परिणाम देता है। सूर्य की सुप्तावस्था मे दुष्ट शक्तिया प्रभावी होने के कारण जातक निर्धन या भिखारी हो जाता है।
❉ इस चरण मे सूर्य से चन्द्रमा युक्त हो, तो दुष्परिणाम गहन होते है। प्रायः 8 वर्ष से पहले बालारिष्ट हो सकता है तथा आयु की दीर्घता भी संदिग्ध होती है। इसके अपवाद के रूप मे यदि मंगल का प्रभाव या दृष्टि हो तो परिणाम अच्छे होते है।
तृतीय चरण - जातक धनवान किन्तु समाज मे प्रतिष्ठाहीन, कृषि से सम्पत्तिवान, सम्पदा-जमीन-जायदाद का दलाल, कर्मठ, स्व परिश्रम से व्यवसाय मे उन्नत, साधारण स्वस्थ होता है। इसका पिता क़ानूनी मामले मे धन खोने वाला होता है।
चतुर्थ चरण - जातक आध्यात्मिक और दैविक ज्ञानी, कृषि से सम्पत्तिवान, परिवार प्रिय, सेनाध्यक्ष या नेता अत्यधिक धनी नही पर समाज मे प्रतिष्ठित, यात्राप्रेमी, दानी, भूखो को निशुल्क आहार कराने वाला होता है। यदि सूर्य 8-10 अंश का हो, तो अधिक सुखद परिणाम होते है।
चन्द्र :
❉ यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक उन लोगो पर कृपालु होता है जो उससे सहायता की अपेक्षा रखते हो। लेकिन उसकी मानसिकता क्रूर होगी। वह सरकारी शक्तियो का उपयोग करेगा।
❉ यदि मंगल से दृष्ट हो, तो कान व दांत की पीड़ा रहेगी तथा समाज के कुछ वर्गों पर निर्भर रहेगा।
❉ यदि बुध से दृष्ट हो, तो प्रसिद्धि प्राप्त करेगा और जीवन के सभी सुख भोगेगा।
❉ यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक बहुत ही विद्वान् और दुसरो को ज्ञान प्रदान करेगा।
❉ यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक स्त्रियो की संगत मे रहेगा और धनवान होगा।
❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो स्वास्थ्य खराब रहेगा, दूसरो के प्रति कठोर और अच्छी संतान के लिए तरसेगा।
अश्विनी चन्द्र चरण फल
प्रथम चरण - जातक पतला और छोटे कद वाला, सामान्य सुन्दर, मानसिक या रक्त विकार या कफ जन्य रोग से ग्रसित, दुर्बल, कामुक, असफल प्रेमी, कर्कश, अभागा, वस्त्राभूषण का शौकीन, राज्य से लाभी, सेना से सम्बंधित, भूमिलाभी, धनवान होता है। विद्वानो से विचार विमर्श करनेवाला होता है। यदि लग्न और गुरु इस चरण मे हो, तो दीर्धायु होता है।
द्वितीय चरण - जातक मोहक, रूपवान, मजबूत हड्डीवाला, मधुर वाणी वाला, धन-वैभव युक्त, संततिवान, ईश्वरभक्त, संगीत और कला प्रेमी, रूपाजीवी, डाक्टर या वैद्य, आथित्य प्रेमी, स्त्रियो का आकर्षण केंद्र होता है।
❉ मतान्तर - जातक लम्बे कद वाला, चतुर, मदिरा आदि का शौकीन, स्त्रियो से परेशान, महत्वाकांक्षी स्वार्थी होता है। चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक भाग्यशाली होगा और पुत्रो के साथ सुखी जीवन व्यतीत करेगा। शनि की दृष्टि होगी तो जातक ईर्ष्यालु, दयनीय, अप्रसन्न होता है और कुअवसरो का सामना करता है। स्त्री जातक मे चन्द्रमा की प्रतियुति मंगल व राहु से हो, तो 30 वर्ष की उम्र मे वैधव्य होगा।
तृतीय चरण - जातक गौरवर्णी, सुन्दर, सुदृढ़ अंग-प्रत्यंग, वार्ता कुशल, प्रभावी वक्ता, प्रसन्नचित्त, वणिक, धनवान, विद्वान्, बुद्धिमान, कार्य को कुशलता से निपटाने वाला सत्यवादी होता है। कोई-कोई जातक त्वचा रोगी या त्वचा रोग विशेषज्ञ होता है।
चतुर्थ चरण - इस चरण मे सूर्य चन्द्र की युति न हो, तो यह स्थिति बहुत अच्छी है। जातक शुष्क त्वचा, क्रश, सौम्य, विनम्र, स्त्रियो का प्रिय, यशश्वी, राज्य सम्मानी, कन्या संतति वाला, विश्व्वनीय होता है। यदि चन्द्र 12-13 अंश का हो, तो जातक प्रशासनिक सेवा मे अधिकारी या शासन मे उच्च पद पर या डाक्टर होता है।
✷ प्राचीन धरणाओ अनुसार अश्विनी नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अश्विन का प्रमुख कार्य चिकित्सा है। अतः इस चरण मे उत्पन्न डाक्टर चिकित्सा के क्षेत्र मे सफल होते है। यदि लग्न इस चरण मे हो और चन्द्रमा अन्यत्र हो, तो भी वही परिणाम होता है।
मंगल
❉ यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक श्रेष्ठ विद्वान तथा माता-पिता का आज्ञाकारी होता है।
❉ यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक दूसरो की स्त्रियो मे रूचि लेने वाला, क्रूर होता है।
❉ यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक वेश्यागामी और व्यर्थ की धूमधाम तथा दिखावा करने वाला होता है।
❉ यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक धन, शक्ति और अधिकार से पूर्ण, गृह स्वामी होता है।
❉ यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक को अच्छा भोजन नसीब नही होता है। वह दूसरो की स्त्रियो के पीछे भागेगा और मुसीबत मे पड़ेगा। फिर भी समाज के लिए अच्छे कार्य करेगा।
❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो जातक माता की देखभाल और प्यार से वंचित और धर से निष्काषित होता है।
अश्विनी मंगल चरण फल
प्रथम चरण - जातक हृष्ट-पुष्ट, कर्मठ, साहसी, निडर, उत्पीड़क, शस्त्र संचालन मे निपुण, उद्विग्न, व्याकुल, युद्धप्रेमी, दुराचारी, साधु का वैरी, सेना या रक्षा अधिकारी, शल्य चिकित्सक होता है। यदि मंगल पाप दृष्ट हो, तो हिंसक, तानाशाह होता है। यदि शासकीय नौकरी मे हो, तो सरकार विशेष प्रसन्न रहती है।
द्वितीय चरण - जातक सुदृढ़, सुन्दर, परिवार व गुरुओ का स्नेह भाजन, रतिःक्रीडाप्रेमी, मधुर भाषी, नौकरो से युक्त, धार्मिक, मैत्री पूर्ण व्यवहारी, धनवान होता है। यदि मंगल शुक्र की युति हो, तो लैंगिक सुख या स्त्री प्रसंग मे बाधा या योगाभ्यासी होता है।
❉ मतान्तर प्रायः निर्धन, निसंतान, प्रतिशोधी होगा। आग, दुर्धटना व रोग का भय होगा। किसी-किसी मामले मे कन्या संतति होगी।
तृतीय चरण - जातक गोरा, वार्ताकुशल, विद्वानो का आदर सत्कारी, साधु स्वभाव वाला, धैर्यवान, प्रापर्टीब्रोकर, घोड़े आदि पशुओ का व्यवसायी या चिकित्सक या वैद्य, शिल्पज्ञ या शास्त्रज्ञ होता है।
❉ सूर्य की दृष्टि स्वास्थ्य, धन, व सुखी जीवन दायक है। (अनिष्टकारी मंगल पर अनिष्टकारी सूर्य की दृष्टि हो, तो मंगल ज्यादा शक्तिवान हो जाता है। जिस प्रकार उष्ण ही उष्ण को नष्ट करता है) यदि सूर्य या गुरु की दृष्टि नही हो, तो माता का बाल्यकाल मे निधन होता है। वह अति यौन सुख भोगेगा।
चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, शांत, सुखी, सम्मानित, स्वाभिमानी, मित्रवत, संतोषी, धन संग्रह, कार्यकुशल, शूरवीर, संतानयुक्त, पालन-पोषण करने वाला होता है। यदि सूर्य, चन्द्र, मंगल की युति हो, तो सुशासक होता है।गुरु की दृष्टि हो, तो विपुल पैतृक सम्पत्ति मिलेगी। अश्विनी के 12-13 अंश के मध्य जन्मा हो, तो निपुण इन्जीनियर होता है।
बुध
❉ यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक संगीत, कला प्रेमी तथा इन्ही से आजीविका करने वाला होता है। वाहन, भवन, स्त्री आदि का सुख भोगेगा।
❉ यदि मंगल से दृष्ट हो, तो जातक शासक वर्ग की निकटता से विभिन्न सुविधा प्राप्त करेगा।
❉ यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक सुपरिवार, संतान, धन से सम्पन्न होगा।
❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो जातक सामाजिक सुकार्यकर्ता, मजबूत कद-काठी का होगा परन्तु परिजनो से उसका निर्वाह नही होगा।
अश्विनी बुध चरण फल
प्रथम चरण - जातक दुबला-पतला, व्यर्थ बकभक करने वाला, ईर्ष्यालू, कुटिल, मित्रो का अहित करने वाला, विद्वेषी, दण्डित, त्वचा रोगी या रक्तविकारी, अधीनस्थ, चतुर, स्वविचार से तथ्यान्वेषक, स्वादिष्ट भोजन प्रिय, मदिरा और स्त्रियो का शौकीन होता है।
द्वितीय चरण - जातक सुन्दर, सौभग्यशाली, वैभवयुक्त, उदार, मित्रो और गुरुओ का सम्मान करने वाला, निष्ठावान, प्रेमाशक्त, रतिप्रिय, साहित्यिक कार्य से लाभ प्राप्त करने वाला, मुंशी, पारम्परिक चिकित्सा प्रेमी होता है। 30 वर्ष की उम्र पश्चात सन्यासी हो सकता है।
तृतीय चरण - जातक सौम्य, सुभग, चमकीली त्वचा, राजकुमार, ऐश्वर्यशाली, सभी का हितेषी, सफल चिकित्सक, जड़ी-बूटी का ज्ञाता, चिकित्सा क्षेत्र मे अविष्कारक, दयालु, सुखी होता है। यदि बुध नीच या उग्र ग्रहो से युत हो, तो ऐश्वर्यहीन, तामसी, बकवादी, रोगी होता है।
चतुर्थ चरण - जातक निर्धन, दुश्चरित्र, व्यापार मे असफल, प्रेम प्रसंग में बाधा या अवैध संतानी, पापी, धूर्त, कठोर, दुष्ट स्वभावी होता है। यदि बुध शुभ धृष्ट हो, तो विवाह, धारा सभासद, लेखाकार होता है।
गुरु
❉ गुरु पर सूर्य की दृष्टि हो, तो धार्मिक, अनैतिक कार्यो से परे, जनता की भलाई करने वाला होता है।
❉ गुरु पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक धन, यश प्राप्त करने वाला होता है।
❉ गुरु पर मंगल की दृष्टि हो, तो क्रूर, दूसरो का गर्व चकनाचूर करने वाला, शासक वर्ग से लाभ प्राप्त करने वाला होता है।
❉ गुरु पर बुध की दृष्टि हो, तो दुर्व्यवहारी, अनावश्यक विवाद पैदा करने वाला होता है।
❉ गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो सौन्दर्य प्रसाधन व्यवसायी, स्र्त्री संग रसिक होता है।
❉ गुरु पर शनि की दृष्टि हो, तो परिवार का सुख-चेन लूटने वाला, क्रूर पृवत्ति वाला होता है।
अश्विनी गुरु चरण फल
प्रथम चरण - जातक मुख रोगी, पापी, व्यसनप्रिय, अज्ञात भय से पीड़ित, धन-धान्य से युक्त, देश मे मान्य, शासन मे अधिकार वाला, विद्वान होता है। इन्हे मान- सम्मान का विशेष ख्याल रहता है।
❉ मतान्तर जातक धर्म-आध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र मे विद्वान, मधुर वाणी से मन जीतने वाला, 36 वर्ष की आयु मे प्रसिद्ध होगा। मित्रो व अन्य की सहायता से उन्नति करेगा।
द्वितीय चरण - जातक सुगठित शरीर वाला, मनोहर, तेजस्वी, प्रतिष्ठित, पुण्यात्मा, धार्मिक आस्था युक्त, गुणी, सुखी परिवार वाला, कृषि से धनलाभी, राजमित्र, विलासी, संततिवान, सुनना और सुनकर समझना तथा उसपर अमल करने वाला होता है। कोई-कोई जातक पर स्त्री रत, वेश्यागामी, कर्जदार होता है।
तृतीय चरण - जातक सुन्दर, नाजुक, सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने वाला, शास्त्रार्थ मे निपुण, वृद्धजनो का आदर-सत्कार करने वाला, नफासत पसंद, विशेष चाल वाला होता है। यदि शनि, मंगल से युत या दृष्ट हो, तो क्लेश, रोग, शोक, त्रिदोष, हानि होती है।
❉ इस चरण मे कुछ आधारो पर जीवन काल केवल 16 वर्ष होने से "राजाधिराज" योग असम्भव प्रतीत होता है।
चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, आथित्यप्रेमी, प्रसन्नचित्त, स्त्रियो का अभीष्ट करने वाला, सौभाग्यशाली, अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाला, शासन से सम्मानी, संतान कर्तव्यपरायण व सट्टे से मुनाफा होता है।
शुक्र
❉ शुक्र पर चंद्र की दृष्टि हो, तो उच्च स्थान प्राप्त करने वाला, स्त्रियो के कारण बदनाम होता है।
❉ शुक्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो निर्धन, पारिवारिक सहायता से वंचित, वैवाहिक जीवन क्लेशमय होता है।
❉ शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो ऐश्वर्यवान, अच्छा परिवार, संतान व धन संपन्न होता है।
❉ शुक्र पर शनि की दृष्टि हो, तो धन को छुपाकर रखने वाला, तस्करी और अनैतिक रूप से धन कमाकर दान करने वाला होता है।
अश्विनी शुक्र चरण फल
प्रथम चरण - जातक मुस्कराता चेहरा, स्थूल शरीर, ईर्ष्या-द्वेष की प्रवृत्ति वाला, भोग-विलाषी, धातु संशोधक या विमान चालक या नाविकीय इंजिनियर, पर स्त्री रत या वैश्यागामी होता है। उसे राजा या डाकुओ (सरकार और असामाजिक तत्व) से कष्ट होता है।
द्वितीय चरण - जातक सुन्दर, मनमोहक, युद्ध मे विजयी, सफल डाक्टर या वैद्य, परम्परागत चिकिसा मे पारंगत, आध्यात्मिक, पवित्र, विनम्र, व्रतादि करने वाला, अकस्मात धन प्राप्तक होता है। इसकी सौन्दर्य प्रसाधन से आजीविका होती है।
तृतीय चरण - जातक निरोगी, विद्या द्वारा प्रसिद्ध, उत्कृष्ट विद्वान, तीर्थाटन प्रेमी, धार्मिक आस्थावान, धर्म स्थानाश्रयी, निपुण डॉक्टर या शिखर राजनीतिज्ञ, कमीशन एजेंट, जेवरात या फैशन की वस्तुओ का विक्रेता, विलासी होता है। यदि शुक्र कुप्रभाव मे हो, तो अंग भंग या लंगड़ा-लूला होने का खतरा होता है।
चतुर्थ चरण - जातक सौन्दर्यवान, धन-वैभव युक्त, निपुण कलाकार, संगीतकार या वाद्यवादक, पत्नी सुन्दर सुशील, मनोकुल होती है। जातक शत्रुहन्ता, मित्रो से सुखी होता है। स्त्री जातक पति का निर्वाह करने वाली और चाहने वाली होती है।
शनि
❉ शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक पशु पालक, दुग्ध पदार्थो का विक्रेता होता है।
❉ शनि पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक कुआचरणी, निर्धन क्रूर होता है।
❉ शनि पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक बड़बोला, दूसरो की सहायता नही करने वाला होता है।
❉ शनि पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक अनैतिक कार्यो से धन उपार्जित करने वाला, सुखी वैवाहिक जीवन के लिए तरसने वाला होता है।
❉ शनि पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक उच्च पदवान, धनवान, पत्नी व संतान से सुखी होता है।
❉ शनि पर शुक्र की दृष्टि हो, तोजातक प्रवाशी, अप्रभावि, रतिक्रिया मे रूचिवान होता है।
अश्विनी शनि चरण फल
प्रथम चरण - जातक क्रश, कठोर, निर्ल्लज, आचरण भ्रष्ट, मंदबुद्धि, अश्लील भाषी, भेद बताने वाला, मर्म स्थान मे रोग, त्वचा रोगी, आत्म बल हीन, बाल्यावस्था मे दुःखी बाद मे सुखी, ऐतिहासिक विषय मे रुचिवान होता है।
द्वितीय चरण - जातक श्याम वर्णी, दुर्बल, संयमी, कृतज्ञ, विवेकी किन्तु बदमिजाज, मध्यमावस्था तक असामाजिक कार्यो मे सलग्न, वन पदार्थ या खनिज व्यवसायी, कार्य कुशल लेकिन समस्याओ से धिरा हुआ, वीर्य विकारी होता है।
तृतीय चरण - जातक जीवन मे उन्नति करने वाला, सुख वैभव से तृप्त, सौभाग्यशाली, अनुष्ठान मे निष्ठावान, महत्वाकांक्षी मगर बदमिजाज, व्याख्याता, मातहतो से सौहार्द पूर्ण होता है।
चतुर्थ चरण - जातक नेत्रो मे आकर्षण वाला, सुखी, अनुसंधानक, धार्मिक मगर जुआरी होता है। जातक का जन्म रात्रि का हो, तो बलिष्ठ होता है। इस चरण मे सूर्य की दृष्टि होने पर पुरुष जातक जमींदार या कृषक होता है। स्त्री जातक अविवाहित रहती है, और विवाह हो भी जाय तो दुर्भाग्य अथवा विपत्ति होती है। चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक बदसूरत और दुश्चरित्र होता है।
राहु
प्रथम चरण - जातक मजबूत देह वाला, बुद्धिमान, पिता का भक्त होता है। राहु आक्रान्त हो, तो दुर्घटनाए होती है।
द्वितीय चरण - नाना प्रकार के कष्ट, मानसिक रुग्णता, विदेश यात्रा योग, योजनाओ मे फेरबदल होता है।
तृतीय चरण - जातक दीन-हीन, कार्य मे अरूचिवाला, सनकी, दार्शनिक, दाम्पत्य साथी से दुःखी होता है।
चतुर्थ चरण - जातक निडर, साहसी, कर्मठ, पेट के रोगो से ग्रस्त होता है। यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो उत्तरदायित्व निभाने योग्य होता है। विपत्ति मे कोई-कोई सहायता करता है।
केतु
प्रथम चरण - जातक अच्छी शिक्षा, उन्नति के लिए उद्यमशील, लोकप्रिय इंजीनियर (मेकेनिकल) होता है।
द्वितीय चरण - निम्न जीवन स्तर, स्त्रियो से लगाव, अच्छे जन सम्पर्क वाला होता है।
तृतीय चरण - जातक निम्न प्रवत्तियो के लोगो से मेलजोल रखेगा, विपत्ति मे सहयतादारो का प्रतिदानी होगा।
चतुर्थ चरण - जातक* जन्म स्थान से दूर, अल्प पारिवारिक सुख वाला, दूसरो पर निर्भर होता है। कुछ की आयु केवल तीस वर्ष होती है।
अश्वनी नक्षत्र में जन्मे जातक अक्सर सेक्स के मामलों में उतावले होते हैं. किसी भी स्त्री से मिलने के बाद आप उसके प्रति विशेष रुझान एवं लगाव महसूस करते हैं यही आपकी सबसे बड़ी कमजोरी है. आप अपने कार्य सज्जनता की उपेक्षा लड़ाई झगड़े से करवाने में सदा सक्षम रहते हैं.
अश्वनी नक्षत्र के जातक साज सज्जा में अधिक विश्वास रखते हैं इसलिए सदा ही आकर्षक , महंगी और आरामदायक वस्तुओं में रूचि रखते है. अपने जीवन के 30 वर्ष तक आप कई प्रकार के उतार चढ़ाव झेलते हैं. उसके उपरान्त ही आपका आगे बढ़ने का रास्ता साफ़ और सुगम होता है.
आप अपने परिवार से बहुत जुड़े हुए रहते हैं परन्तु कुछ परिजन आपके जिद्दीपन के कारण आपको पसंद नहीं करते . पिता की उपेक्षा आपको माता से अधिक सहयोग और प्रेम प्राप्त होता है . 26 से 30 वर्ष की आयु में विवाह संभव है. संतान में पुत्र संतति की संभावना अधिक होगी.
इस नक्षत्र में जन्मी स्त्रियाँ सुन्दर, धन-धान्य युक्ता, श्रृंगार में रूचि रखने वाली होती हैं. अश्वनी नक्षत्र में जन्मी महिलाएं मीठा बोलती हैं और बहुत अधिक सहनशील भी होती है. माता पिता की लाडली एवं आज्ञाकारी पुत्री होने के साथ-साथ ईश्वर में भी पूरी आस्था रखती हैं. सदा बड़ों का आदर एवं गुरु का सम्मान करने वाली अश्वनी नक्षत्र में जन्मी स्त्रियाँ मनोहर छवि एवं बुद्धिशाली होती है.
स्वभाव संकेत : समाज और मित्रों में लोकप्रिय
संभावित रोग: दिमाग से सम्बंधित रोग, मलेरिया एवं चेचक
विशेषताएं
प्रथम चरण : इस चरण का स्वामी मंगल हैं. इस चरण में जन्मे जातकों को दूसरों की वस्तुएं उठाने की आदत होती है. जन्म नक्षत्र स्वामी केतु लग्नेश मंगल का मित्र होने के कारण जातक की मंगल एवं केतु की दशा शुभ फल देंगी.मंगल गृह भी शुभ फल देगा.
द्वितीय चरण : इस चरण का स्वामी शुक्र हैं. अश्वनी के द्वितीय चरण में जन्म होने के कारण जातक कड़ी मेहनत से कतरायेगा और छोटे छोटे अल्प अवधी वाले कार्य करने में रूचि रखेगा. जन्म नक्षत्र स्वामी केतु लग्नेश मंगल का मित्र है और नक्षत्र चरण स्वामी शुक्र भी केतु से मित्रतापूर्वक व्यवहार रखता है इसलिए जातक की मंगल, शुक्र एवं केतु की दशा शुभ फल देंगी.
तृतीय चरण : इस चरण का स्वामी बुध हैं. शास्त्रों के अनुसार अश्वनी नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्मा जातक सुन्दर , धनी एवं ऐश्वर्यशाली होते हैं. मंगल और केतु की दशा अति उत्तम फल देगी परन्तु नक्षत्र चरण स्वामी बुध केतु से शत्रु भाव रखता है इस कारण बुध की दशा में जातक अशांत एवं विचलित रहेगा.
चतुर्थ चरण : इस चरण का स्वामी चन्द्रमा हैं. शास्त्रों के अनुसार अश्वनी नक्षत्र के चौथे चरण में जन्मे जातक भोगी एवं दीर्घायु होते है. नक्षत्र स्वामी केतु, लग्नेश मंगल का मित्र है. नक्षत्र चरण स्वामी चन्द्रमा , केतु से शत्रु भाव रखता है अतः जातक को मंगल एवं केतु की दशा उत्तम फल देंगी परन्तु चन्द्रमा की दशा में जातक अशांत एवं उद्विग्न रहेगा
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