चैत्र-शु-9-रामनवमी व्रत एवं मातृकानवमी व्रत

 रामनवमी व्रत एवं मातृकानवमी व्रत 
 (विष्णुधर्मोत्तर)-


इस व्रत की चारों जयन्तियोंमेंगणना है। यह चैत्र शुक्ल नवमीको किया जाता है।
   रामनवमीनिर्णय

    चैत्रशुक्ल नवमी में रामनवमी होती है, पुनर्वसुनक्षत्रयुत्तचैत्रशुक्ल नवमी मध्याह्न कर्कलग्न और मेष के सूर्य में उच्च केपांच ग्रह के होने पर श्रीरामचन्द्र के जन्म का उल्लेख प्राप्त होताहै, अतः मध्याह्न में यदि नवमी हो तो उसी का ग्रहण करें। दोदिन में मध्याह्व्यापिनी नवमी हो अथवा दोनों दिन मध्याह् मेंनवमी न हो तो अष्टमी विद्धा के निषेध के कारण परा नवमीलेनी चाहिये। इसलिये पहले दिन सम्पूर्ण मध्याह्रव्यापिनी नवमीको छोड़कर मध्याह्न के एक देश में रहने वाली परा नवमी ग्राह्महै। अर्थात् अष्टमीविद्धा मध्याह्रव्यापिनी पुनर्वसु नक्षत्रयुक्ता को भी छोड़कर दूसरे दिन त्रिमूहूर्ता भी नवमी सब लोगों के उपवास योग्या है। यदि दशमी के क्षीण होने से पारणा के दिन स्मार्तो कीएकादशी पड़ती हो तो स्मा्तो को अष्टमीविद्धा नवमी में हीउपवास करना चाहिये। शुद्धा नवमी के न मिलने पर या तीनमुहुर्त से कम होने पर सबको अष्टमीविद्धा नवमी में ही उपवासकरना चाहिये, यह व्रत नित्य और काम्य ही होता है।

 इसमें मध्याहवव्यापिनीशुद्धा तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन मध्याह्रव्यापिनी हो या दोनोंदिनोंमें ही न हो तो पहला व्रत करना चाहिये । इसमें अष्टमीका वेध हो तो निषेध नहीं, दशमीका वेध वर्जित है।यह व्रत नित्य, नैमित्तिक औरकाम्य-तीन प्रकारका है। नित्य होनेसे इसे निष्काम भावना रखकरआजीवन किया जाय तो उसका अनन्त और अमिट फल होता है। औरकिसी निमित्त या कामनासे किया जाय तो उसका यथेच्छ फल मिलता है।भगवान् रामचन्द्रका जन्म हुआ, उस समय चैत्र शुद्ध नवमी, गुरुवार,     पुष्य (या दूसरे मतसे पुनर्वसु), मध्याह्न और कर्क लम्म था। उत्सवके दिनये सब तो सदैव आ नहीं सकते, परंतु जन्मर्क्ष कई बार आ जाता है; अतःवह. हो तो उसे अवश्य लेना चाहिये ।जो मनुष्य रामनवमीका भक्ति औरविश्वासके साथ व्रत करते हैं, उनको महान् फल मिलता है। व्रतीकोचाहिये कि व्रतके पहले दिन (चैत्र शुक्ष अष्टमीको) प्रातःस्रानादिसे निशचन्तहोकर भगवान् रामचन्द्रका स्मरण करे। दूसरे दिन (चैत्र शुद्ध नवमीको)नित्यकृत्यसे अति शीघ निवृत्त होकर ‘उपोष्य नवमी त्वद्य यामेप्वष्रसुराघव। तेन प्रीतो भव त्वं भो संसारात् त्राहि मां हरे ।' इस मन्तसेभगवान्के प्रति व्रत करनेकी भावना प्रकट करे। और 'ममभगवत्रीतिकामनया (वामुकफलप्राप्रिकामनया) रामजयन्तीव्रतमहंकरिष्ये' यह संकल्प करके काम-क्रोध-लोभ-मोहादिसे वर्जित होकर व्रतकरे। त्पश्चात् मन्दिर अथवा अपने मकानको ध्वजा-पताका, तोरणऔर बंदनवार आदिसे सुशोभित करके उसके उत्तर भागमें रंगीन कपड़ेकामण्डप बनाये और उसके अंदर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करके उसकेमध्यभागमें यथाविधि कलश-स्थापन करे। कलशके ऊपर रामपञ्ञायतन(जिसके मध्यमें राम-सीता, दोनों पारश्वोंमें भरत और रात्रुप्र, पृष्ठ-प्रदेशमेंलक्ष्मण और पादतलमें हनुमानजी) की सुवर्णनिर्मित मूर्ति स्थापन करकेउसका आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करे। व्रतराज, व्रतार्क,जयसिंहकल्पद्धुम और विष्णुपूजन आदिमें वैदिक और पौराणिक दोनोंप्रकारकी पूजनविधि है। उसके अनुसार पूजन करे। "उस दिन दिनभर भगवानका भजन-स्मरण, स्तोत्रपाठ, दान-पुण्य, हवन, पितृश्राद्ध औरउत्सव करे और रात्रिमें उत्तम प्रकारके गायन-वादन-नर्तन (रामलीला) औरचतित्र-श्रवणादिके द्वारा जागरण करे तथा दूसरे दिन (दशमीको) पारणकरके व्रतका विसर्जन करे । सामर्थ्य हो तो सुवर्णकी मूर्तिका दान औरब्राह्मण-भोजन कराये तथा इस प्रकार प्रतिवर्ष करता रहे।

    (२४) मातृकाव्रत (विष्णुधर्म)-यह भी इसी दिन (चैत्र शुक्कनवमीको) होता है। इसमें नवदुर्गा दशविद्या अष्टभरव और चौंसठ योगिनियोंका सफेद रंगकेगन्ध-पुष्पादिसे पूजन किया जाता है।



आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।

वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।

बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।

पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, 

एतद्धि रामायणम्।।

    श्रीराम पूजन
        "ॐ  श्रीं रां रांमाय नमः"
   
 ध्यान-

    इन्दीवरनिभं शान्तं विशालाक्ष सुबवक्षसम्।उद्यद्दधितिमद्वास्वत्कुण्डलाभ्यां विराजितम्॥सुनासं सुकिरीट च सुकपोलं शुचिस्मितम्।विज्ञानमुद्रं द्विभुजं कम्बुग्रीवं सुकुन्तलम्॥नानारत्नमयैर्दिव्यहारै भूषितमव्ययम् ।विद्युत्पुञ्जप्रतीकाशं वस्त्रयुग्मधरं हरिम् ॥
वीरासनस्थं संतानतरुमूलनिवासिनम्।महासुगंधलिसाङ्ग बनमालाविराजितम्॥वामपार्श्वे स्थिता सीतां चामीकरसमप्रभाम्।लीलापद्मधरां देवीं चारुहासां शुभाननाम्॥पश्यन्तीं स्रगधया दृष्या दिव्यां कल्पविराजिताम्।छत्रचामरहस्तेन लक्ष्मणेन सुसेविताम्॥हनुमत्प्रमुखैर्नित्यं वानरै: परिवारितम् ।स्तूयमानमृषिगणै: सेवितं भरतादिभिः॥सनन्दनादिभिश्वान्यै्योगिवृन्दैः स्तुतं सदा।सर्वशास्त्रार्थकुशलं योगज्ञं योगसिद्धिदम्॥

    हिन्दी अर्थ- श्रीराम नीले कमल की आभा से युक्त एवं विशाल नेत्रों से सुशोभित हैं,शात हैं, सुवक्ष वाले हैं, सुन्दर किरणों की दीसि से प्रकाशित कुण्डलों से उनके कान अलंकृतहैं, उनकी नासिका सुन्दर है, कपोल मनोहर हैं, उनकी निर्मल अमृतमयी मुस्कान है, उन्होंनेसुन्दर मुकुट धारण किया है, विज्ञानमुद्रा धारण किये हैं, वे दो भुजा वाले हैं, शंख के समानउनकी ग्रीवा है, काले-काले सुन्दर केश हैं, अनेक रत्ों से गुंधे दिव्य हार उन्होंने धारण कियेहैं, वे अव्यय अविनाशी हैं, उन्होंने विद्युतप्रकाशपुंज की आभा वाले युगल पीत वस्त्र धारणकर रखे हैं, हरि-श्रीराम वीरासन से स्थित हैं, वे कल्पवृक्ष के नीचे विराजमान हैं, उनकेअंग में उत्तम सुगंधित चन्दन-अंगराग आदि का लेप है, वे वनमाला से विभूषित हैं, उनकेवाम भाग में स्वर्ण-आभामयी श्रीसीताजी विराजित हैं जिनके हाथ में लीलापद्म है, जिनकीमुस्कान मन को मोहित कर लेने वाली है तथा मुख बड़ा सुन्दर है, जो स्रिग्ध स्नेहमयी दृष्टिसे श्रीराम की ओर निरन्तर देख रही हैं, जो दिव्य हैं और दिव्य आभूषणों से अलंकृत हैं, वेश्रीलक्ष्मणजी के द्वारा सुसेवित हैं, जिनके हाथ में छत्र और चँवर हैं, श्रीलक्ष्मणजी हाथ मेंछत्र और चँवर लेकर उनकी सेवा कर रहे हैं। वे हनुमान आदि वानरों से नित्य घिरे हुयेपरिसेवित हैं। ऋषिगण उनका स्तवन कर रहे हैं, सनन्दन आदि योगी उनकी स्तुति में तलीनहैं, भरत आदि उनकी सेवा में रत हैं, उन्हें सारे शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान है, वे परम योगी हैं तथासमस्त योग-सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं।

    इसके पश्चात् कौस्तुभमणि तथा चिन्तामणि से विभूषित श्रीराम का हृदय में पूजनकरके उनका आह्वान करना चाहिये-

    आह्वान :

    आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभ विभुम्।कौसल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृते: परम्॥अर्थात् मैं प्रकृति से परे दिव्य विष्णुस्वरूप कौसल्यानंदन जानकीवलभ, जगदीश्वर,    4सर्वव्यापक-विभु भगवान श्रीराम का आह्ान करता हैं।आसन :

    राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते।रत्रसिंहासने तुर्थ्य दास्यामि स्वीकुछ प्रभी॥श्रीरामागच्छ भगवन् रघुव्रीर रयूत्तम।जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरी भव सर्वदा॥रामचन्द्र महेष्वास रावणान्तक राषव।यावत्पूर्जा समाप्येउह तावर्व संनिधी भव॥रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलीचन।रघुवंशज में देव श्रीरामाभिमुखी भव्र॥प्रसीद जानकीनाथ सुप्रसिद्ध सुरैश्वर।प्रसन्नो भव मे राजन् सर्वेश पधुसूदन॥शरणं में जगन्नाथ शर्ण भक्तवत्सल।वरदो भव में राजन् शरण में रघूत्तप॥हे राजाधिराज राजेन्द्र पृथ्वीनाथ श्रीरामचन्द्र! मैं आपको रतसिंहासन प्रदान करता हैँ,उसे आप स्वीकार कीजिये। हे राजेन्द्र! हे रघुवीर, रघुश्रेष्ठ भगवान राम! जानकी के साथपधारकर आप इस आसन पर सदा विराजमान रहें। हे महाधनुष धारण करने वाले श्रीरामचन्द्र!रावण का अन्त करने वाले राघव! जब तक मैं पूजा समास नहीं कर लेता, तब तक आप मेंरेपास ही निवास कीजिये। हे रघुनन्दन! राजर्षे, कमलनयन राम, रघु के वंश में जन्म लेने वालेदेव! आप मेरे सम्मुख होने की कृपा कीजिये। जानकीनाथ, परम प्रसिद्ध देवेश्वर! हे सर्वेश्र,मधुसूदन, राजन! आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइये, प्रसत्न हो जाइये। हे जगत्राथ, भककवत्सल,रघुश्रेष्ठ राजन! आप मेरे रक्षक हैं, आप मझे वरदान दीजिये, मेरी रक्षा कीजिये।पाद्य

    त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक।पाद्यं गृहाण राजषे नमो राजीवलोचन॥हे अनन्त, तीनों लोकों को पवित्र करने वाले रघुनायक, राज्षे, कमलनयन! मैंआपको नमस्कार करता हूँ। आप इस पाध्य-पादप्रक्षालन हेतु जल को स्वीकार कीजिये।

    उपरोक्त मंत्र पढ़कर श्रीराम के चरणकमल को शुद्ध जल से धोकर उस जल को
    अपने मस्तक पर धारण करने की भावना करनी चाहिये।अर्ध्य :

    परिपूर्णपरानन्द नमो रामाय वेधसे।
    गृहाणाध्य मया दत्तं कृष्ण विष्णोजनार्दन॥
अष्ट-नमस्कार पुष्पाञ्जलि :

    ॐ नमो भगवते श्रीरामाय परमात्मने।सर्वभूतान्तरस्थाय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमो भगवते श्रीरामचन्द्राय वेधसे।सर्ववेदान्तवेद्याय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमां भगवते श्रीविष्णवे परमात्मने।परात्पराय रामाय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमो भगवते श्रीरघुनाथाय शार्ङ्गिणे।चिन्मयानन्दरूपाय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमो भगवते श्रीरामकृष्णाय चक्रिणे।विशुद्धज्ञानदेहाय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमो भगवते श्रीवासुदेवाय विष्णवे।पूर्णानन्दैकरूपाय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमो भगवते श्रीरामभद्राय वेधसे।सर्वलोकशरण्याय ससीताय नमो नमः॥ॐ नमो भगवते श्रीरामायामिततेजसे।ब्रह्मानन्दैकरूपाय ससतीताय नमो नमः॥


श्रीरामचन्द्र कृपालु भजुमन हरणभवभयदारुणंनवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनीलनीरदसुन्दरंपटपीतमानहु तडित रूचिशुचि नौमिजनकसुतावरं
भजुदीनबन्धु दिनेश दानवदैत्यवंशनिकन्दनंरघुनन्द आनन्दकन्द कोशलचन्द्र दशरथनन्दनं
सिरमुकुटकुण्डल तिलकचारू उदारुअंगविभूषणंआजानुभुज शरचापधर संग्रामजितखरदूषणं
इति वदति तुलसीदास शङकरशेषमुनिमनरंजनंममहृदयकंजनिवासकुरु कामादिखलदलगञजनं
मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर सावरोकरुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो
एही भाँति गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषींअलीतुलसी भवानी पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चलीमुदित मन मंदिर चली (मुदित मन मंदिर चली)
जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहिमंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे
    भगवान श्रीराम दीनों के नाथ हैं, इसलिये वे दीनानाथ हैं। अगर आप दीनबनकर प्रभु श्रीराम से कुछ मांगते हैं तो वे आपकी मांग एवं कामना कोेअवश्य पूरा करते हैं। इस अध्याय को पढ़़ने वाले सभी पाठक एक बारप्रभु श्रीराम से दीनता के वशीभूत होकर जो कुछ मांगेंगे, श्रीराम उस्सेअवश्य पूरा करेंगे। प्रभु श्रीराम राम की जय हो.....

    श्रीरामजी का ध्यान

    ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुरषं बद्धपद्मासनस्थंपीत वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्नं प्रसन्नम्।वामांकारूढसीतामुखकमलमिललोचनं नीरदारभनानालंकारदीसं दधतमुरूजटामण्डले रामचन्द्रम् ॥

    श्री रामजी को प्रणामआपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥

 
    किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिये प्रभु श्रीराम के बारे में कुछ भी कहना अत्यन्तकठिन कार्य है। अवतारी देव होने के उपरांत भी पुरुष रूप में उन्होंने अपने जीवन में ग्यादाके जिस उच्च शिखर का स्पर्श किया, उसने उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बना दिया।अगर हम कुछ गहराई से देखें तो चाहे परिवार हो, समाज हो अथवा देश हो, मर्यादाहीनहोने की स्थिति में तीव्रता के साथ विनाश की ओर अग्रसर हो जाता है। अगर हमारीपारिवारिक व्यवस्था का आधार सुदृढ़ है, सामाजिक स्तर पर उत्तम प्रेमभाव है और हमारादेश सर्वशक्तिशाली है तो उसका कारण है कि हम सभी उन मर्यादाओं से बंधे हुये हैं।जिसका प्रतिपादन भगवान श्रीराम ने किया था। अपनी मर्यादाओं के कारण ही वे हम सभीके आदर्श बन गये हैं और हमें गर्व है कि ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम हमारेआराध्य देव हैं। भगवान श्रीराम को समग्रूप से जान लेना अत्यन्त कठिन है किन्तु उनकेएक-एक पक्ष को जान लेना भी किसी पूजा एवं साधना से कम नहीं होगा।

    भगवान श्रीराम सृष्टिपालक श्रीहरि विष्णुजी के अवतार हैं। भगवान श्रीहरि विष्णु कासम्पूर्ण प्राकट्य चार रूपों में माना गया है- श्रीहरि स्वयं, शेषनाग, शंख एवं चक्र। श्रीराम केरूप में उनका यह पहला अवतार है जिसमें उसके यह चारों स्वरूप एक साथ और एक हीसमय में प्रकट हुये। ये हैं श्रीराम के रूप में स्वयं श्रीहरि, लक्ष्मणजी के रूप में शेषनाग,भरत के रूप में शंख तथा शत्रुष्न के रूप में चक्र। इसे अगर दो भागों में विभक्त करें तो आधेभाग में स्वयं श्रीहरि श्रीराम के रूप में और आधे भाग में लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुष्न आदि।इसलिये श्रीराम की प्रबलता का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है और यही सर्वाधिकअनुकरणीय भी है।
    

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