कृतिका नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं नक्षत्र स्थित ग्रह फल

 

कृतिका नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं नक्षत्र स्थित ग्रह फल



नक्षत्र के विचार से जातक का व्यक्तित्व प्रागट्य होता है। इससे मूलभूत बातो को जानने में मदद मिलती है।

आचर्यों का मत है कि :-

1- फल विचार से जन्म चन्द्र और जन्म लग्न के नक्षत्रो से विचार करना चाहिए।

2- लग्न और चन्द्र मे से जो बलवान हो उसका मुख्यतया फल मिलता है।

3- लेकिन प्रत्येक अवस्था मे जातक लग्न व चंद्र का मिश्रित फल ग्रहण करता है।

4- बलाबल से कम या ज्यादा अनुपात का ही ज्ञान होता है।

5- वैदिक परम्परा अनुसार जन्म चन्द्र को ही अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

कृतिका नक्षत्र

लगभग 400 ई.पू. वर्ष पूर्व सभी ज्योतिष गणना कृतिका से ही प्रारम्भ होती थी। यही प्रथम नक्षत्र माना जाता था। भारतीय खगोल मे यह तीसरा शुभ, कार्यकारी, तामसिक स्त्री नक्षत्र है। यह उत्तर दिशा का स्वामी है। देवता कार्तिकेय, अग्नि, स्वामी सूर्य, राशि मेष स्वामी मंगल, राशि वृषभ स्वामी शुक्र। राशि मेष 2640 से वृषभ 10 00 अंश। अरब मंजिल मे इसे "अल थूर्या", ग्रीक मे इसे "अलसियोन" चीन मे इसे "माओ" कहते है। इसकी जाति ब्राह्मण, योनि छाग, योनि वैर वानर, गण राक्षस, नाड़ी अन्त्य है।

फरसा

कृतिका नक्षत्र के 6 तारे मिलकर क्षुर, खुरपा या फरसा का आकार प्रकट करते है। वैदिक साहित्य तैत्तिरीय उपनिषद मे कृतिका नक्षत्र के यज्ञ मे सात आहुतिया देने का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है कि उस समय सात तारे मुख्य माने जाते थे जिनके नाम अम्बा, दुला, नित्त्नी, अभ्रयन्ति, मेघयन्ति, चपुनिका है। 6 तारो का उलेख भी अनेक स्थानो पर मिलता है।

कार्तिक नाम भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के नाम पर पड़ा है। कार्तिक शब्द का अर्थ ज्वाला, तीर की नोक अथवा छूरा है। चाकू के आकार का छह तारो का समूह कृतिका नक्षत्र का प्रतीक है। संस्कृत कृत्तिका का रूपान्तरण कृतिका है। कृतिका अर्थात काटने वाला है।

इस नक्षत्र के अधिष्ठाता देव अग्नि पंच महभूतो में से एक है। अग्नि विश्व की आठ दिशाओ मे से एक के पालक है। इन्हे ब्रम्हा का पुत्र भी माना जाता है। कार्तिकेय को अन्य मत से अग्नि सुत भी मानते है। इसके छह तारे युद्ध के देवता कार्तिकेय की छह परिचारिका अप्सरा है।

प्रतीकवाद : इसके देवता कार्तिकेय है मतान्तर से अग्नि है। कार्तिकेय भगवान शिव और पार्वती के दूसरे पुत्र है। इनके स्कंध, सुब्रमण्यम, षडानन, गुहा, सन्मुख नाम भी है, इन्हे छह चेहरे वाले अर्थ से भी जाना जाता है। इन्हे युद्ध का देवता भी माना जाता है जो भयंकर, अग्नि रूप है। दक्षिण भारत में इन्हे "मरुगन" भी कहते है।

अग्नि

कार्तिकेय

इस नक्षत्र के देवता अग्नि भी माने जाते है। इन्द्र के बाद द्वितीय देव अग्नि की उत्पत्ति से हुई। अग्नि शब्द संस्कृत भाषा का है, लेटिन मे यह इग्निस Ignis और अंग्रेजी मे इग़नाइट Ignite होता है। ये उपकार और विनाश के प्रतीक है। ये दक्षिण पूर्व आग्नेय कोण के स्वामी है। तीन मुखी रुद्राक्ष का स्वामी अग्नि है। यह माना जाता है कि जिस प्रकार आग मे समस्त अशुद्धता, गंदगी भस्म हो जाती है उसी प्रकार तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करने पर पापो का नाश, विचारो की शुद्धता और कर्मो की पवित्रता होती है।

विशेषताएँ - यह मुहूर्त ज्योतिष मे मिश्र नक्षत्र है। साहस, विनाश और हड़पने का प्रतीक है। जातक के जीवन मे उतार-चढाव आते है और निर्थक यात्राये होती है।

कृतिका - जातक भोजन प्रेमी होता है, उसके भोजन की आदते स्वास्थ्य मे बाधा लाती है। जातक रोगो के प्रति सतर्क व चिंतित नही रहता है। अग्नि तत्व का यह नक्षत्र छेदक, भेदक, तेजक है। यह लड़ाई-विवाद, युद्ध का कारक नक्षत्र है। जातक किंकर्तव्यविमूढ़ या मुर्ख, व्यंगात्मक या तानेबाज, छिन्द्रान्वेषी या आलोचक होता है। इनका चयापचय और पाचन अच्छा होता है। यह अच्छा रसोइया Cook भी होता है। इनके जनून के कारण अवैध यौन सम्बन्ध होते है।

कृतिका दो भागो मे विभक्त है। एक भाग मेष मे स्वामी मंगल जो क्रूर, आक्रामक, प्रतापी, तेज, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन मे परिवर्तन का द्योतक है। दूसरा भाग वृषभ स्वामी शुक्र जो मुलायम, प्रेम, कल्पना, सौन्दर्य, अनुमान, ललित कला का द्योतक है। कृतिका नक्षत्र-कृतिका नक्षत्र तीसरा नक्षत्र है। यह भरणी नक्षत्र से अगले 13-20’ में स्थित होता है। अतः इसका प्रथम चरण मेष राशि के क्षेत्र के अंतर्गत आता है और शेष तीन चरण वृष राशि में चले जाते हैं (क्योंकि एक राशि 30 की होती है और एक नक्षत्र 1320’ का। अतरू एक राशि में सवा दो नक्षत्र आते हैं। यानी दो नक्षत्र पूरे और तीसरे नक्षत्र का पहला चरण। क्योंकि प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं - पाठक यह पहले नक्षत्र-राशि प्रकरण में पढ़ चुके हैं)। इस नक्षत्र की आकृति तारों के समूह से छुरी के समान बनती है। इस नक्षत्र के देवता अग्नि हैं। इस नक्षत्र के अंतर्गत आने वाले तारों की संख्या 6 है। (यही 6 तारे मिलकर छुरी की आकृति बनाते हैं)। पुराणों में वर्णित 6 कृतिकाएं जिन्होंने शिवपुत्र कार्तिकेय का पालन किया, जिनका दुग्धपान एकसाथ करने के लिए कार्तिकेय ‘षडानन’ (6 मुख वाले) बने। ये     कृतिकाएं कृतिका नक्षत्र के 6 तारे ही हैं। इन्हीं से पोषित होने से कुमार स्वामी को ’कार्तिकेय’ कहा गया।

            कृतिका नक्षत्र में उत्पन्न पुरुष जातक लोभी, पापी, कंजूस, जीवों को मारने वाला, न करने योग्य कार्यों को करने में अधिक सुख पाने वाला तथा बुरे कार्यों में संकोच न करने वाला होता है। ऐसे जातक को भूख अधिक लगती है। प्रायः ऐसा जातक कंगाल होता है।

            कृतिका नक्षत्र में उत्पन्न स्त्री जातक क्रोधी, कलहकारिणी, द्वेष रखने वाली, बंधुहीन, विरक्त, कफ प्रकृति की और प्रायः दुर्बल शरीर की होती है। इसको भी भूख अधिक लग सकती है।

पुरुष जातक -जातक सामान्य व्यक्तित्व वाला, मध्यम कद, शरीर गठीला, मोटी गर्दन लम्बी नाक वाला होता है। शनि के प्रभाववश लम्बा होता है। जातक कृपण, पापी, क्षुधा से पीडित, अकर्मण्य, अकर्तव्यी, दरिद्र, दु:खी किन्तु समझदार, ईमानदार, चतुर, स्थिर स्वतंत्र होता है।

आजीविका के लिए यात्रा, असफलता के कारण निराश व असंतुलित, अविचलित, शांति प्रिय होता है। जातक को 50 वर्ष की उम्र तक उतार-चढ़ाव सहन करना पड़ते है, 25 से 35 और 50 से 56 उम्र वर्ष शुभ होते है। यह माना जाता है कि पिता श्रद्धा की पवित्र आत्मा होता है। माता से स्नेह मिलता है।

स्त्री जातक - यह आकर्षक व्यक्तित्व, मध्यम कद, गठीला शरीर वाली, अतिसुन्दर होती है। 27 वर्ष की उम्र मे सुंदरता मे कमी और जीवन मे उतार-चढ़ाव के कारण तनावग्रस्त, अप्रसन्न, अशांत रहती है। यह प्रबल स्त्रीत्ववाली, आक्रामक, रूखी, निर्भीक होती है। पुरुषो से अपने को निम्नस्तरीय नहीं मानती है। विवाह और वैवाहिक जीवन मे बाधा रहती है। पति सुख नही रहता है, वियोग या तलाक होता है।

आचार्यो अनुसार नक्षत्र फलादेश

कृतिका प्रथम चरण यानि मेष राशि मे जन्म हो, तो जातक कम खाने वाला और द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ चरण यानि वृषभ राशि मे जन्म हो, तो अधिक खाने वाला होता है। ये लोग प्रायः तेजस्वी, सुन्दर, मतिमान, भीड़ मे अलग दिखने वाले, दानी, स्त्री प्रसंग के शौकीन, कार्य कुशल, स्वाभिमानी, तुनक मिजाजी, तीक्ष्ण स्वभाव वाले, लगनशील होते है। - नारद

ये लोग धार्मिक बुद्धि वाले, संस्कारयुक्त विचार वाले, प्रायः स्वाध्याय और चिंतन मे लगे रहने वाले, कुलीन, कुलानुसार रूप और चरित्र वाले, धनाढ्य होते है। - पराशर

यदि यह नक्षत्र पीड़ित हो, तो जातक कटुभाषी, पर स्त्री गामी, अधिक खाने वाला (भुक्कड़) झूठ बोलने वाला, वृथा घूमने वाला, निन्दित कार्य करने वाला होता है। ये लोग प्रायः पित्त प्रकृति के होते है अतः तला, गरिष्ठ, अधिक खट्टा खाने से पाचन विकारी होते है। - ढुंडीराज

चंद्र :

इस नक्षत्र मे चन्द्र हो, तो भुक्खड़, प्रौढ़, सुन्दर, प्रसिद्ध होता है। जातक मित्र वियोगी, परिवार वियोगी, पुत्र युक्त, सफल भाग्यशाली होता है। यह अभिप्राय विहीन यात्रा करने वाला, रुखा अनुचित कार्य करने वाला पर स्त्री रत होता है। यह सफ़ेद बाल वाला, वायु से डरने वाला शरीर पर तिल और मछली का चिन्ह होता है।

सूर्य :

इस नक्षत्र मे सूर्य हो, तो आध्यत्मिक योद्धा, अनुशासित, नेतृत्व करने वाला, संगीत प्रिय, नृत्य नाटक मे रुचिवान, क्रोधी, तनहा, एकांतप्रिय होता है।

लग्न :

लग्न इस नक्षत्र मे हो, तो अभिमानी, गर्वीला, माननीय, महत्वाकांक्षी, कुशल, अमीर, सच्चा, ईमानदार, मजबूत, अच्छी पाचन शक्ति वाला, ढुलमुल होता है।

चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे मंगल, सूर्य, गुरु, ♂ का प्रभाव है। राशि मेष 2640 से 3000 अंश। नवमांश धनु। यह परोपकार, निस्वार्थ, महानता, उदारता, इच्छाशक्ति, ताकत, सेना अनुशरण, शुभ लक्षणो का द्योतक है।

जातक लम्बा, क्रश, चौड़ा ललाट, लम्बे कान, अश्व मुखी, धूमने-फिरने वाला, ज्ञानी, निर्मम, बहुरुपिया होता है। जातक बुद्धिमान, अनुशासित, रोगी किन्तु दीर्घायु, अनेक प्रकार से संतोषी, अनेक उपाधिया प्राप्त होता है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि। इसमे शुक्र, सूर्य, शनि ♀ का प्रभाव है। राशि वृषभ 3000 से 3320 अंश। नवमांश मकर। यह सदाचार, नीति, भौतिकता, मातृपक्ष का द्योतक है।

जातक श्यामवर्णी, विषम नेत्र, क्रूरदृष्टि, नीच, प्रकृति विरुद्ध, वैर-विरोध करने वाला होता है। जातक की मृत्यु मघा के अंत मे या रेवती नक्षत्र मे होती है।

जातक आध्यत्मिक व्यक्ति से नफरत करने वाला, धार्मिक साहित्य का विरोधी, दूसरो को धार्मिक ग्रंथो का विरोध करने के लिए प्रेरित करने वाला, यदाकदा यशस्वी होता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे शुक्र, सूर्य, शनि ♀ का प्रभाव है। राशि वृषभ 3320 से 3640 अंश। नवमांश कुम्भ। यह मानवता, भविष्यवाद, प्राचीन सत्ता, कर्तव्य, ज्ञान का द्योतक है।

जातक गंभीर नेत्र वाला, टेड़े सर व मुख वाला, आत्मा से द्रवित, अल्पबुद्धि, प्रतिकूल कर्मी, असत्य और अधिक बोलने वाला होता है। जातक वीर, अभिमानी, शीघ्र गर्म होने वाला, वेश्यागामी, तुच्छ जीवन वाला होता है।

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे शुक्र, सूर्य, गुरु, ♀ का प्रभाव है। राशि वृषभ 3640 से 4000 अंश। नवमांश मीन। यह शीलता, सूक्ष्म ग्राह्यता, परोपकारिता, रचना का द्योतक है।

जातक कोमल अंग, सुन्दर शरीर व नाक, बड़े नेत्र, यज्ञ व धर्म कार्यो में रुचिवान, स्थिर, शुभ लक्षण वाला, पालन-पौषण करने वाला, चोरी की आदत वाला, नम्र किन्तु घमंडी, चिंतित, व्याकुल, कष्टमय, रोगी, मानसिक मुसीबतो से त्रस्त रहता है।

आचार्यों ने चरण फल सूत्र रूप मे कहा है किन्तु फलादेश मे अंतर बहुत है।

यवनाचार्य : प्रथम चरण मे तेजश्वी, दूसरे मे शास्त्र विज्ञानी, तीसरे मे शूर, चौथे मे दीर्घायु व पुत्रवान होता है।

मानसागराचार्य : प्रथम पाद मे शुभ लक्षणो से युक्त, द्वितीय मे यशस्वी, तृतीय मे पुत्रवान, चतुर्थ मे वीर होता है।

नक्षत्र चरण में ग्रह फल

भारतीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की आपसी पूर्ण या पाद दृष्टि नही होती, क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है।

सूर्य :

चन्द्रमा से दृष्ट हो, तो जातक सुन्दर, सुखी, विद्यावान, शांत होता है।

मंगल से दृष्ट हो तो जातक स्पस्टवादी, प्रतिस्पर्धी स्वाभाव का होता है। यह समाज मे स्थान, सम्पत्ति, शोहरत देता है।

गुरु से दृष्ट हो, तो जातक कुल मे सर्वश्रेष्ठ, सम्पत्तिवान, सार्वजनिक या सांस्कृतिक मंत्री होता है

शनि से दृष्ट हो, तो ख़राब स्वास्थ्य और दयनीय आर्थिक स्थति तथा विसंगतियो के कारण पीड़ित, परिवार मे क्लेश होता है।

कृतिका सूर्य चरण फल

प्रथम चरण - जातक का जीवन अस्त-व्यस्त, अनेक सन्तान वाला, गरीब होता है। जातक मे ज्योतिष और उससे समन्धित विषयो की सीखने इच्छा रहती है, जबकि इन विधाओ का प्रारम्भिक ज्ञान लाभ दायक नही होता। जातक दृष्टिदोष से पीड़ित, भुक्खड़ और शरीर संक्रमित होता है। अग्नि दुर्घटना की सम्भावना होती है।

द्वितीय चरण - जातक दीर्घायु, संतति से सुखी, तेजबुद्धि, जीवन के उत्तरार्ध मे महाधनी, अनुशासित, संत, धार्मिक वक्तित्व वाला, संगीत और नाटक मे रुचिवान होता है। यदि जातक को उचित मार्गदर्शन मिलता है, तो वह चर्मरोग विशेषज्ञ या दवाई विक्रेता होता है।

तृतीय चरण - जातक अल्प शर्तो के तहत देशी जीवन जीता है और अप्राकृतिक रोगो से ग्रसित रहता है। बालारिष्ट (शैशव अवस्था मे मृत्यु) की सम्भावना रहती है। जातक नाई या अन्य व्यवसाय से जीविकापार्जन करता है। कुछ जातक भिखारी होकर दर-दर भटकते है। इस चरण मे सूर्य चन्द्र से दृष्ट हो, तो स्त्री जातक चरित्रहीन, अवैधानिक गतिविधियो मे सलग्न और संसर्ग जनित रोगो से पीड़ित होती है।

चतुर्थ चरण - जातक उत्पीड़ित अत्याचारित जीवन जीता है। सम्भवतया नौकर होता है। जातक निर्दयी, क्रूर, कदाचित हत्यारा और पारिवारिक बाधाए अनुभव करने वाला होता है। जातक अनुपयोगी गतिविधियो मे धन का अपव्यय करता है और जल जनित रोगो से ग्रस्त रहता है।

चन्द्र :

यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो समृद्धि प्रदान करता है, जातक कृषि या अचल संपत्ति के कारोबार में सफल होता है।

यदि मंगल से दृष्ट हो, तो जातक प्रतिजाति की तरफ चुम्बक की तरह खींचा रहेगा, यौन क्रियाओ में लिप्त रहेगा जिससे वह अनेक समस्याओ से घिरा रहेगा लेकिन परिवार द्वारा पसंद किया जायगा।

यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक बुद्धिमान, दयालु होगा और जरुरतमंदो की सहायता करेगा।

यदि गुरु से दृष्ट हो तथा गुरु पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक की माता रोगी और अल्पायु होती है। यदि गुरु पर शनि की दृष्टि नहीं हो और शनि की दृष्टि चन्द्रमा पर हो तो सब प्रकार की खुशिया प्राप्त होती है तथा प्रसंशनीय सम्पदा होती है।

यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक को अच्छा मकान, साजो सामान, वस्त्राभूषण, अनेक नौकर प्राप्त होते है लेकिन माँ का सुख नहीं मिलता है, जैसे बचपन मे ही माँ से अलग हो जाना।

कृतिका चन्द्र चरण फल

प्रथम चरण - जातक काला जादू (मन्त्र-तंत्र, वशीकरण) मे ख्यात होता है। विपरीत लिंग के कारण विपत्ति का सामना करना पड़ता है।

द्वितीय चरण - जातक शक्ति का उपयोग करेगा। वह आकर्षक वक्तित्व वाला विद्वानो से सलग्न रहता है। यह पित्त विकारी, अनेक दुःखो से पीड़ित, रसायन व भूगोल शास्त्र में रुचिवान होता है। यदि चन्द्रमा शनि से दृष्ट हो, तो पैतृक ख़ुशी से वंचित होता है।

तृतीय चरण - जातक चुस्त लेकिन निर्धन, लम्बे कद का होगा। यदि स्त्री जातक की कुंडली मे राहु या मंगल की दृष्टि हो, तो 36 वे वर्ष मे पति की मृत्यु होती है।

चतुर्थ चरण - जातक का शारीरिक गठन मध्यम और नेत्र विकार होता है। यह ज्ञानी, सांसारिक, धनाढ्य व्यापारी, अनेक मामलो मे भाग्यशाली होता है लेकिन जीवन अनेक दुःखो से भरा होता है और सुसर या पिता से अनबन रहती है। यह दूसरो से सम्मान पाने के लिये कठोर परिश्रमी, तथा स्त्री और पुरुष दोनों का प्रतिद्वंदता रहित मित्र होता है।

मंगल :

यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक की पत्नी लालची होगी तथा वह उसकी इच्छाओ की पूर्ति नहीं कर सकेगा। वह वानप्रस्थी होने मे रूचि रखेगा व उसके दुश्मन कम होगे।

यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक माता का विरोधी होगा, उसकी अनेक पत्निया होगी।

यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक एकान्त प्रिय, अल्प शत्रु वाला, संयमी, कलाप्रेमी, मिष्टभाषी, शिक्षित होता है।

यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक संगीत व कला मे निपुण, परिवार पालक, 30 वर्ष की उम्र पश्चात् धनी होता है। यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो सेना अध्यक्ष, आरक्षी अधीक्षक या आर्डिनेंस फैक्ट्री मे प्रबंधक होता है।

यदि शनि से दृष्ट हो, तो घनवान, स्वस्थ, नौकरो से सेवित, समाज मे आदरणीय होता है।

कृतिका मंगल चरण फल

पहला पाद - जातक जुर्माना लगाने वाला, कमाण्ड करने वाला, मजबूत प्रतिस्पर्धी, सशस्त्र सेना का कमाण्डर या कानून लागू करने वाला होता है। यदि मंगल 28 से 30 अंश के बीच हो, तो जातक उपरोक्त पदो के सर्वोच्च स्तर पर होता है।

मतान्तर - यदि मंगल या सूर्य वृषभ मे गोचर मे हो अथवा दशा, अन्तर्दशा हो, तो जातक प्रसद्धि पायेगा। वह दुसरो की पत्नियो से अवैध सम्बन्ध बनाएगा। यह भी देखा गया है कि वह अनजाने में विष खा जायगा जिससे मृत्यु या लकवा होगा। यदि शनि से दृष्ट हो, तो पति या पत्नी चरित्र हीन और दुश्चरित्र होगे।

मतान्तर - जातक शराब और दवाओ के नशे से पीड़ित और अस्वस्थ रहता है, निषिद्ध दवाओ के विक्रय से धन कमाता है। जातक को बचपन मे मेनिन्जाइटिस, उच्च ताप, सिर मे चोट आदि हो सकते है।

दूसरा पाद - जातक मिलनसार, प्रतिशोध लेने वाला, मेहमानबाज होता है। जातक का बचपन मे मानसिक स्वास्थ बूरी तरह प्रभावित होता है और वह चरित्र हीन भी होता है। येन-केन प्रकारेण वह सरकारी पक्ष दी हो सकता है। जातक इंजीनियरिंग या शस्त्र निर्माण से अच्छी आय प्राप्त करता है। यदि मंगल अन्य ग्रहो से युत हो, तो स्त्री जातक को गर्भवती होने मे अवरोध होते है।

तीसरा पाद - जातक को शासकीय लाभ प्राप्त होता है, उसके पास आभूषण रत्नादि होगे। व्यापारिक मामलो मे नियंत्रण और सफलता प्राप्त करेगा। यह ज्ञानी, सब धर्मो का आदर करने वाला, बचपन से ही निश्चयी, हठी, प्रतिस्पर्धी, वाद-विवाद मे निपुण, धर्म ग्रंथो का विद्वान होता है।

चौथा पाद - जातक थुल-थुल शरीर वाला चेचक या चेचक सामान संक्रामक रोगो से पीड़ित होता है। यह जीवन का आनन्द लेता है और अच्छा मित्र होता है। यदि मंगल चन्द्रमा से युत हो, तो रसायन या औषधि निर्माण से आजीविका होती है। पिता की मृत्यु के बाद व्यापार मे उन्नति होने लगती है।

बुध :

यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक धनाढ्य होने के लिए कठोर परिश्रम करेगा और यशस्वी होगा।

यदि मंगल से दृष्ट हो, तो नाजुक स्वास्थ्य या अस्वस्थ, नियोक्ता या सरकार से सजा याफ़्ता, परिजनों से दूर होता है।

यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक नगर पालिका अध्यक्ष या मेयर या मंत्री, अपनी विद्वता से उच्च सम्मान प्राप्त करता है।

यदि शनि से दृष्ट हो, तो गरीब, पत्नी और संतान से परित्यक्त या दुःखी होता है।

कृतिका बुध चरण फल

प्रथम चरण - शासकीय कर्मचारी या व्यापार-व्यवसायी, स्त्री और शराब का शौकीन होता है, मध्य अवस्था तक जीवित रहता है, दूसरे इसका आदर और गुणगान करते है। यह अभिनय, संगीत, लेखन, व्यापार से आमदानी पाता है। यदि मंगल या शनि से दृष्ट हो, तो जातक दुबला, सम्भोग का आनंद लेने वाला, बचत का सदुपयोगी होता है। यदि सूर्य बुध युति हो, तो उत्कृष्ट डॉक्टर या सर्जन होता है।

द्वितीय चरण - जातक एक से अधिक विवाह करता है। इसका शरीरिक गठन पूर्ण विकसित, दीर्घायु तथा प्रसन्नचित और प्रफुल्ल होता है। यह सफल व्यापारी, सनातन से आनन्दित, 40 वर्ष पश्चात् प्रसिद्ध होता है। यदि बुध गुरु की युति हो, तो ज्योतिष मे विभूति या तंत्र का महा पण्डित होता है।

तृतीय चरण - जातक अपने प्रस्ताव पर व्यवहारिक और दृढ़, आनन्द दायक, मोहित करने वाला, प्रभावशाली, हाकिम होता है। यदि शनि बुध की युति हो, तो जातक वैज्ञानिक या बुद्धि जीवी होता है।

चतुर्थ चरण - जातक व्यापार मे उत्कृष्ट होता है। वह सत्यवादी, कर्तव्यनिष्ट, दूसरो के द्वारा सम्म्मानित होता है। इसे कन्या की अपेक्षा पुत्र अधिक होते है और 60 -62 वर्ष जीता है। जीवन के उत्तरार्ध मे स्वास्थ्य पर भारी धन व्यय करता है। यदि बुध गुरु की युति हो, तो जातक समुदाय का नेता या वित्तीय परामर्शदाता होता है।

गुरु :

यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक युद्ध कार्यो मे पारंगत होता है, युद्ध मे चोट लगने की सम्भावना रहती है। वह धनाढ्य, नौकर, वाहन युक्त होता है।

यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक सत्यवादी, सीधा-सच्चा, दयालु होता है। माता-पिता से प्रेम पूर्ण लाभ दायक सम्बन्ध होते है।

यदि मंगल से दृष्ट हो, तो जातक की संतति विलक्षण होगी। वह सम्मानी, भाग्यशाली, अफसरो के नजदीक होगा।

यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक प्रभावी, शासक वर्ग मे आदरणीय होता है। जातक मन्त्र-तन्त्र सिद्ध, अनेक क्षेत्रो मे प्रवीण होता है।

यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक धन-धान्य से भरपूर, सुखी, प्रसिद्धि का आनंद लेगा।

यदि शनि से दृष्ट हो, तो जातक पत्नी और संतान से सुखी, समुदाय का नेता, गांव या नगर प्रमुख होता है।

कृतिका गुरु चरण फल

प्रथम चरण - जातक सीखने के लिए भावुक होता है, इस कारण बुद्धिमान, रहस्यमय, भविष्यदर्शी, आध्यत्मिक हो जाता है। यह संतान और पैतृक धन पाने वाला, विलासी, शराबी, स्त्रियो को भोगने वाला होता है। " Eat, Drink be Marry "

द्वितीय चरण - जातक लम्बा कद वाला, माता से अधिक स्नेह, धार्मिक सम्बन्ध अथवा धार्मिक संस्थाओ के कारण प्रसिद्ध होता है। उसकी कमजोरिया स्त्रियो मे निहित होती है।

तृतीय चरण - जातक उच्च प्रशासन या प्रबंध में कार्यरत होता है, ऐसा जातक अद्भुत व्यक्तित्व वाला, सबके द्वारा पसंद किया जाने वाला लेकिन गरीबी मे जन्मा होता है। वह समाज के नियमो के मुताबिक या स्वयं के मापदंडो के मुताबिक जीने वाला किन्तु दूसरो के सामने नियमो के उल्लधन की परवाह नही करता है।

चतुर्थ चरण - जातक महान, सत्यवादी, माता से धन पाने वाला, व्यवहार मे सच्चा, उच्च शिक्षित, 27 वे वर्ष मे विवाह होता है। पति अथवा पत्नी के द्वारा आमदनी होती है।

शुक्र :

यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक अति निर्मल मन वाला, यौन क्रियाओ मे अत्यधिक लिप्त, व्यापार मे हानि उठाने वाला, बेमिलनसार परिवार का प्रिय होता है।

यदि मंगल से दृष्ट हो, तो अशान्त, सुख हीन, दुर्भाग्यशाली, अनैतिक तरीको से आजीविका करता है।

यदि गुरु से दृष्ट हो, तो प्रचुर संपत्ति, पत्नी और संतान संचित संपत्ति होते है।

यदि शनि से दृष्ट हो, तो लम्बा-पतला, तार की तरह मजबूत शरीर वाला, परिवार के सम्मान को नष्ट करने वाला, परिवार का प्रिय होता है।

कृतिका शुक्र चरण फल

प्रथम चरण - पुरुष जातक स्त्रियोचित और स्त्री जातक पुरुषोचित होती है। जातक रतोंदी रोगी होता है। नेवी मे उच्च पद पर हो सकता है। वैवाहिक जीवन मुसीबतो भरा होता है।

इस चरण मे शुक्र, सूर्य से युत हो तो तरुण अवस्था (13 से 18 वर्ष) मे विवाह, वसीयत से धन प्राप्त होता है।

यदि स्त्री जातक मे शुक्र, चन्द्रमा से दृष्ट हो, तो अनेक बार गर्भपात होते है, कोई-कोई गर्भ ही सफल होता है।

यदि शुक्र, बुध से युत हो, तो एक रिश्तेदार से अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध होते है। भाई-बहन मे मनमुटाव रहता है।

द्वितीय चरण - जातक जल संसाधनो से धन कमाता है। चन्द्रमा से युति हो, तो पत्नी अस्वस्थ रहती है तथा संतान के साथ दुर्भाग्यशाली परस्थितिया होती है।

तृतीय चरण - जातक सदहृदयी, एक से अधिक पत्नी वाला, विद्वान, पूर्ण शिक्षित, अध्यापक होता है। कम शिक्षित व्यक्ति फैशन या सौन्दर्य या पोशाक उद्योग मे कार्य करता है।

चतुर्थ चरण - जातक अभिनेता या अभिनेत्री या संगीतकार होता है और इनसे विपुल संपत्ति अर्जित करता है। इसे वसीयत या अन्य तरीको से धन मिलता है। चरित्र संदिग्ध होता है।

शनि :

यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक युक्तियुक्त वक्ता, शांतचित्त, भोजन के लिए दूसरो पर निर्भर रहेगा।

यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक को उच्च समुदाय या शासक वर्ग से सहयोग मिलेगा, सम्मानीय महिलाओ के सानिध्य मे रहेगा, संपत्ति अर्जित करेगा।

यदि मंगल से दृष्ट हो, तो जातक आकर्षक और वाचाल होगा।

यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक औरतो का साथ ज्यादा पसन्द करेगा, व्यापार मे हलके तबके के लोगो का साथ रहेगा, गलत लोगो की संगति करेगा। गरीबी और कंगाली का जीवन जियेगा।

यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक दूसरो का सहायक, सहायता मे अधिक समय गुज़ारने वाला, जनता की नजरो मे आदरणीय होता है।

यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक अहंकारी, आत्मकेंद्रित होगा। जीवन की आवश्यकताए सहजता से पूर्ण होगी। इसका सरकारी अफसरो से निकटता का गठबंधन होता है।

कृतिका शनि चरण फल

प्रथम चरण - जातक कार्य करने मे काम उत्साही होता है। पिता से विरोध होता है। बचपन मे संधर्ष करना पड़ता है किन्तु बाद में सुधर जाता है। यह कृष्णवर्णी, दुबला, जुझारू, महत्वपूर्ण कार्य करने योग्य होता है।

द्वितीय चरण - एक से अधिक प्रेम प्रसंग होते हुए भी जातक अपनी उम्र से अधिक उम्र वाली औरत से विवाह करता है, इस कारण इसका वैवाहिक जीवन नरक बन जाता है।

तृतीय चरण - जातक कृषि व्यवसाय मे काम करता है। इस चरण मे शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो स्त्री अथवा पुरुष के विवाह में कठनाई आती है, या विवाह नही होता और होता है भी तो विनाशकारी होता है। यदि बुध की दृष्टि हो, तो पुरुष जातक नपुसंक या स्त्री जातक बाँझ होती है।

चतुर्थ चरण - वैवाहिक जीवन के आलावा अनेक प्रेम प्रसंग होते है। इस चरण मे शनि पर चन्द्रमा की दृष्टि हो, तो जातक की पत्नी आकर्षण विहीन, दुश्चरित्रा होती है। अस्वास्थ्यकर और हानिकारक आदतो के कारण स्वास्थ्य को क्षति पहुँचती है। यदि पुरुष जातक की कुंडली मे शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो अप्रसन्न, अप्रिय स्वाभाव देता है। चन्द्रमा की दृष्टि हो, तो स्त्रियो के पोषाक का व्यवसाय करता है।

राहु :

प्रथम चरण - चेहरे पर काला मस्सा, अति कामुक, विवाहेतर अवैध सम्बन्ध होते है। जातक सम्पत्तिवान, पिता को समर्पित, विद्वान्, स्वस्थ, नियोक्ता का आशीर्वाद प्राप्तक होता है।

द्वितीय चरण - जातक आध्यात्मिक लेकिन संतान व संपत्ति विहीन, एक से अधिक महिलाओ से संबन्ध, विदेश मे रोजगार करेगा।

तृतीय चरण - जातक की वाणी मे रूकावट (हकलाना या गूंगापन) ख़ारिज किया हुआ क्योकि हर काम से दूर रहता है। इसे वित्तीय कठिनाइया और घोर गरीबी का सामना करना पड़ता है।

चतुर्थ चरण - वह पारवारिक जीवन और विवाह पश्च्चात भी अपनी जबाबदारियो और कर्तव्यो से विमुख होता है। वह जीवन की अाधात्यमिक यात्रा के लिए धन और घर को छोड़ देता है। छोटी उम्र मे कमाए विशाल धन को भगवान् के नाम पर लुटा देता है।

केतु :

प्रथम चरण - जातक को व्यावसायिक कठिनाइया, पाचन सस्थान और यौन रोग होते है। वह मौसम विभाग या धातु शोधन या रसायन या इन जैसे तकनिकी व्यवसाय मे काम करता है और 50-55 साल जीवित रहता है।

द्वितीय चरण - जातक परिजनो से अलग रहता है। गरीब होते हुए भी मदिरा और स्त्रियो का शौकीन होता है। वह दूसरो द्वारा दुर्पयोग से पीड़ित होता है।

तृतीय चरण - जातक को अटकलबाजियो से घाटा और शासकीय प्रतिबन्धो का सामना करना पड़ता है। इसकी पत्नी अवैध बच्चे की माँ होती है। इसे परिवार की नफरत किन्तु यदा-कदा सहयोग भी मिलता है।

चतुर्थ चरण - जातक को हमेशा व्यापर मे व्यपारियो से बाधा व विरोधाभास, वैवाहिक जीवन मे बाधा और कष्ट होते है। यदि विवाह कड़ी उम्र में होता है, तो वैवाहिक जीवन आरामदायक खुशियो भरा होता है।

जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।

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