मृगशीर्ष नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं स्थित ग्रहो का फलादेश
मृगशीर्ष नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं स्थित ग्रहो का फलादेश
राशि चक्र मे 53।20 से 66।40अंश तक विस्तार का क्षेत्र मृगशीर्ष नक्षत्र कहलाता है। अरब मंजिल मे इसे अल हक़ 'ह, ग्रीक मे ओरिओनिस, चिन मे त्से कहते है। मृगशीर्ष का तात्पर्य हिरण के सिर से भी है इसलिए इसे मृगशिर भी कहते है। यह नारियल की आँख के सामान भी दिखता है।
मृगशीर्ष के देवता चन्द्र, स्वामी मंगल, राशि वृषभ 23।20 से मिथुन 06।40, राशि स्वामी शुक्र और बुध है।
भारतीय खगोल मे यह 5 वा मृदु, मैत्र संज्ञक नक्षत्र है। इसके तीन तारे है। इसके तीन तारो से हिरण के सिर की आकृति बनती है इसलिए वेदो मे इसे मृगशीर्ष कहा है। मृगशीर्ष को मृगशिरा भी कहते है। इसका मृग चिन्ह है।
इसका वर्णन सूर्य सिद्धांत मे मिलता है।
संस्कृत शब्द मृग: + शिर: से मृगशीर्ष या मृगशिरा निष्पन्न हुआ है। मृग: का अर्थ वन, वाटिका, खोज, अविष्कार, वनपर्यटन, शिकारी, स्वयम कार्य कर दूसरो को बताना, प्रदर्शक, उपदेशक आदि है।
मृगशीर्ष शुभ, सात्विक, नपुसंक नक्षत्र है। इसकी जाति कृषक, योनि सर्प, योनि वैर नकुल, गण देव, नाड़ी आदि है। यह दक्षिण दिशा का स्वामी है। जातक को बाल्यकाल मे रोग अधिक होते है। स्त्रियो मे गर्भाशय के रोग, मासिक धर्म की अनियमितता, दमा आदि होते है।
मृगशिरा नक्षत्र-यह पांचवां नक्षत्र रोहिणी नक्षत्र से अगले 13-20’ में स्थित है। इस नक्षत्र के प्रारम्भिक 2 चरण वृषराशि क्षेत्र में व अन्तिम 2 चरण मिथुन राशि क्षेत्र में पड़ते हैं (यानी ये आधा वृष और आधा मिथुन राशि के क्षेत्र में स्थित है)। इस नक्षत्र के तारों की संख्या 3 है, जो मिलकर हिरण के समान आकृति बनाते हैं। अतः इसे मृगशिरा कहा है। इस नक्षत्र के देवता सोम हैं (यहां स्पष्ट कर दें कि देवता व स्वामी में अन्तर है। स्वामियों का वर्णन पहले नक्षत्र प्रकरण में हो चुका है। जैसे अश्विनी नक्षत्र के देवता अश्विनी कुमार हैं किन्तु स्वामी केतु हैं। इसी प्रकार भरणी, कृतिका व रोहिणी के स्वामी क्रमशः शुक्र, सूर्य व चन्द्र हैं। जबकि इनके देवता क्रमशरू यम, अग्नि एवं प्रजापति/ब्रह्मा हैं। इसी प्रकार मृगशिरा के देवता सोम हैं किन्तु स्वामी मंगल हैं)।
मृगशिरा नक्षत्र में उत्पन्न पुरुष जातक धनी, सुशील, साहसी, विद्वान, वीर, अहंकारी, स्वार्थी तथा प्रायः ईर्ष्यालु भी होता है। ऐसा ज्योतिषवेत्ताओं का मत है।
मृगशिरा नक्षत्र में उत्पन्न स्त्री जातक सुन्दर रूप वाली, प्रसन्न करने वाले वाक्य बोलने वाली, धन-वस्त्रों व पुत्र से युक्त, धार्मिक प्रवृत्ति की व शुद्ध शरीर वाली होती है।
पुरुष चंद्र
प्रतीकवाद - मृगशीर्ष के देवता पुरुष चन्द्र है। इसका विवाह मृगशिरा से हुआ था। संस्कृत शब्द मृग: यानि चन्द्रमा का लांछन जो हरिण के रूप मे लगा है। पौराणिकता अनुसार मृगशीर्ष या मृगशिरा ने शारीरिक उत्तेजना (इन्द्रिय प्रकोपन) के कारण अपने नजदीकी से मैथुन सम्बन्ध बना लिये थे। चन्द्रमा का लांछन इसी का प्रतीक है।
इस नक्षत्र में चन्द्रमा के सभी गुणधर्म तथा प्रभाव पाए जाते है। इसे खोजी तारा कहते है। "Star of Searching" संसार की अनेक खोजे यानि अविष्कार इसमे हुई है। भारतीय "समुन्द्र मंथन" मृगशीर्ष नक्षत्र में ही हुआ था जिसमे 16 रत्न प्राप्त हुए थे।
मृगशीर्ष नक्षत्र का अधिष्ठाता देवता चन्द्र है। इसे पुराणो मे "सोम" कहा है। सोम ने धोखे से बृहस्पति की पत्नी तारा का शीलभंग कर दिया था जिससे बुध की उत्पत्ति हुई। प्रारम्भ मे बृहस्पति ने बुध को अपनाने से इन्कार कर दिया लेकिन बाद मे बुध के सुन्दर व्यक्तित्व और स्वभाव को देखकर बृहस्पति ने बुध को अपना पुत्र मान लिया। गुरु पत्नी से सम्भोग भी चन्द्र मे लांछन का कारण माना जाता है और इससे यह भी स्पस्ट है कि चन्द्रमा मे इतनी शक्ति है कि मानव मन मे अहंकार उत्पन्न कर दे।
विशेषताएं - इसका आधा भाग वृषभ और आधा भाग मिथुन राशि में है। यह खूबसूरत चहेरे खोजने के विचार, कन्या से मिलने या शादी का प्रस्ताव रखने का कारक है। इसमे जन्मा जातक सुदृढ़ शरीर वाला, मध्यम वर्णी, अन्वेषक, आत्म खोजी, वस्तुए क्रय करने का शौकीन, अनैतिक सम्बन्ध रखनेवाला, पर्यटक, सुन्दर स्वस्थ और संतान वाला होता है।
✸ मृगशीर्ष देवी पार्वती का जन्म नक्षत्र है।
✸ मृगशीर्ष के देवता चन्द्र तथा स्वामी शुक्र दोनो स्त्री गृह है, किन्तु दोनेा के प्रभाव अलग-अलग है।
चन्द्र : मातृत्व, मातृ प्रवृत्ति, सुंदरता, स्त्री गरिमा का प्रभु है।
शुक्र : स्त्री रूप की संरचना, शारीरिक उत्कृष्टता, स्त्री आकर्षण, सौन्दर्य का प्रभु है।
यह खोजी या अन्वेषक नक्षत्र है। इसका जातक हमेशा खोज करता या निहारता रहता है। ये निराश, यात्री और संग्रहक होते है। एक के बाद दूसरी वस्तु के संग्रह मे व्यस्त रहते है, इनकी खोज या खरीदी कभी समाप्त नही होती है। ये मृग के सामान शांत, भद्र, नाजुक कबूतर के सामान आँखे वाले होते है।
जातक चतुर, धैर्यवान, नकली व अपमिश्रित वस्तु निर्माता, स्वार्थी, अहंकारी, परद्वेषी, बुद्धिमान जैसा, भयातुर, शिल्पकला का ज्ञानी, माता का स्नेही, मृदुभाषी होता है। इनका वैवाहिक जीवन सुव्यवस्थित नही रहता है, फिर भी रमणियो को आकर्षित करने मे अड़चन नही आती है।
पुरुष जातक - जातक उत्कृष्ट ख्यात वक्तित्व वाला, प्राकृतिक आकर्षण, अच्छा डील-डोलवाला, अच्छी ऊंचाई, मध्यम रंग होता है। इनके पैर पतले और भुजाऐ लम्बी होती है, जो मृगशीर्ष व्यक्ति की पहचान है।
जातक का जीवन साधरण होता है। प्रत्येक कार्य दृढ़ निश्चय से करता है। जातक बुद्धिजीवी, उत्साही सजीव होता है। प्रारम्भ मे साहस दिखता है लेकिन अंत मे भीरु निकलता है। यह वित्त सलाहकार होता है किन्तु नुकसान और मुक्तहस्त से अर्थ छीजन के कारण आर्थिक विपन्न होता है। अधीर होने के कारण एक राह पर नही चलता, बाल्यावस्था मे रोगी रहता है।
जातक परिवार प्रेमी होता है किन्तु परिवार वालो से गलत फहमी के कारण प्यार स्नेह नही मिलता है, इस कारण परिवार मे परेशानी और कष्ट होते है। विडंबना यह है कि इसमे किसी की गलती नहीं रहती है।
जातक की दो पत्निया होती है। दाम्पत्य जीवन अड़चनों से भरा होता है। पत्नियो में गलत फहमी और विचारो मे अंतर होने से सामंजस्य नही रहता है। दोनो अपने-अपने विचारो पर दृढ़ रहती है।
जातक 32 वर्ष तक अस्थिर, अशांत, परेशान रहता है। 33 वे वर्ष से कष्ट समाप्त होते है। 33 से 50 तक महत्वपूर्ण उन्नति होती है लेकिन विषमता यह होती है कि जातक अपनी मुर्खताओ और गलतियो से सारा धन खो देता है।
स्त्री जातक - इस नक्षत्रोपन्न स्त्री जातक मे वही गुण-दोष होते है जो पुरुष जातक मे होते है। अंतर इस प्रकार है। स्त्री जातक लम्बी, दुबली-पतली, मोहक, होशियार, फुर्तीली, स्वार्थी, अत्यंत कटुभाषी, गुस्से मे शाप देने के कारण अहितकारी, झगड़ालू, शिक्षित, ललित कला प्रेमी, संपत्ति की लालची, सुस्वादु भोजन करने वाली, पतिभक्त, वस्त्राभूषण के लिये भाग्यशाली होती है।
इसे मशीनो का ज्ञान अच्छा होता है। यह आश्चर्यजनक होता है जब यह पुरुषो के कार्य करती है। विवाह पश्चात् भी अन्य गतिविधियो मे व्यस्त रहती है। पति को वश मे रखती है। इसके एक या दो प्रेम प्रसंग होते है जिनसे इसका विवाह नही होता है, विवाह पश्चात यह पति के इतनी नजदीक होती है जैसे पहले कुछ हुआ ही न हो।
फलादेश आचर्यों के मतानुसार
मृगशीर्ष मे उत्पन्न जातक आक्रामक, असहनशील, प्रहार करने मे निपुण, डरपोक, चंचल व शरारती, खेल-कूद और संघर्ष पूर्ण कार्यो मे तल्लीन होता है। सैनिक हो, तो युद्ध कुशल, खिलाडी हो, तो आक्रामक होता है। ये लोग धन कमाने मे सफल, धन सम्पत्ति का उपभोगी, शांतिप्रिय, सिर पर आने पर पीछे नही हटते है। - वराहमिहिर
ये लोग उत्साही, चपल, भीरु, धनी होते है। शास्त्र, नीति, कानून, गणित के अच्छे ज्ञाता होते है। इसी बल पर ये प्रभुता पालते है और विद्वान् कहलाते है। - नारद
उपरोक्त गुणो के आलावा युद्ध विद्या या मल्ल युद्ध या मार्शल आर्ट या जूडो कराटे में इनकी रूचि होती है। दूसरो के गुणो से प्रभावित होने का स्वभाव होता है. राजा आदि श्रेष्टि लोगो के करीब होते है। वृष राशि मे होने पर युद्ध आकर्षण, युद्ध सम्बन्धी बाते, मिथुन मे होने पर सौम्यत्व, वेदांगत्व, शान्तिप्रियता अधिक होती है। - पाराशर
चन्द्र : इस नक्षत्र में चन्द्र हो, तो जातक मेघावी, लेखन निपुण, धनाढ्य, राजनीतिज्ञ, कामुक, डरपोक होता है। व्यावसायिक साझेदारी में अड़चन आती है।
मृगशीर्ष मे चंद्र अशन्ति और निराशा, अन्वेषन, निहारने का द्योतक है। ये नाजुक, नम्र, कामुक, प्रणयप्रेमी, कल्पनाशील, मातृ प्रवृत्ति के होते है। जातक यात्री, शोधक, अन्वेषक, जिज्ञासु, संग्रहक, संचारवाहक होता है।
⇴ चन्द्र प्रभाव से मृगशीर्ष जातक चंचल, चतुर, बुद्धिमान, हर्षित, सम्पन्न होता है। - वराहमिहिर
सूर्य : इस नक्षत्र में सूर्य हो, तो जातक साहसी, योद्धा, कवि, शिल्पकार, प्रतिपक्ष नेता, अधिकारी, रचनात्मक लेखक, सभी व्यवसायो का ज्ञाता, सृजनात्मक, आलसी होता है।
लग्न : लग्न इस नक्षत्र मे हो, तो जातक आकर्षक, कुमार्गी, प्रलोभनकारी, सत्य जानने का इच्छुक, रहष्यकारी, हिरन जैसी मुख आकृति वाला, उत्साही, वाचाल, निर्भीक, डगमगाते दिमाग वाला होता है।
चरण फल
प्रथम चरण - इसका स्वामी सूर्य है। इसमे शुक्र, मंगल, सूर्य ![]()
☉ का प्रभाव है। राशि वृषभ 53।20 से 56।40 अंश। नवमांश सिंह। यह स्थायीकरण, स्वयोजना, रचना का द्योतक है।
जातक व्याघ्र के सामान नेत्र, सुन्दर दांत, चौड़ी नाक, भूरे बाल, कड़े नख, अहंकारी, अल्पकर्मी बातूनी होता है।
जातक शिक्षित, मेघावी, होशियार, भावुक, अन्वेषक, आवेगी, सृजनात्मक होता है। पुरुष संतति की दुविधा होती है, कन्या संतति होती है। दाम्पत्य जीवन साधारण होता है।
द्वितीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे शुक्र, मंगल, बुध ![]()
☿ का प्रभाव है। राशि वृषभ 56।40 से 60।00 अंश। नवमांश कन्या। यह परिकलन, गणना, भेदभाव, फर्क, व्यंग का द्योतक है।
जातक सम्मानीय, अल्प साहसी, डरपोक, दुबला-पतला, जुआरी, कुंठाग्रस्त, धन संचयी दुःख से प्रलाप करने वाला होता है।
इस चरणोत्पन्न जातक प्रायोगिक, सामाजिक, गणितज्ञ, मनोरंजक, गायन और संगीत में रुचिवान अच्छा सैनिक होता है। यदि यह चरण पाप प्रभाव मे हो, तो जातक अपमिश्रण करने वाला होता है। परिवार मे छोटे-मोटे विरोधाभास होते रहते है। इसके साथ धोखा हो सकता है।
तृतीय चरण- इसका स्वामी शुक्र है। इसमे बुध, मंगल, शुक्र ☿ ![]()
का प्रभाव है। राशि मिथुन 60।00 से 63।20 अंश। नवमांश तुला। यह दिमागी दौड़, सामाजिकता का द्योतक है।
जातक लम्बे धने रोम, बड़े ऊँचे कंधे व भुजा, ऊँची नाक, मयूर समान नेत्र, दूर्वा (घास) के सामान अस्तिया, श्याम वर्ण, पतले हस्त वाला होता है। टांगे लम्बी और पतली होती है।
जातक ज्यादा सोच-विचार करने वाला, सामाजिक रोमांटिक (प्रणय प्रेमी, कल्पना जीवी) उच्च जन संपर्क अधिकारी होता है। इनके एक से अधिक स्त्रियो से प्रेम प्रसंग होते है।
चतुर्थ चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे बुध, मंगल, मंगल ☿ ![]()
का प्रभाव है। राशि मिथुन 63।20 से 66।40 अंश। नवमांश वृश्चिक। यह विद्ववता पूर्ण बहस, शक या अविश्वास, आध्यात्मिक उन्नति का द्योतक है।
जातक घट के सामान सिर वाला, नासिका के मध्य मे चोट लगना, धार्मिक, वाचाल, क्रियाशील, हिंसक, सेनापति होता है।
जातक अच्छा अन्वेषक, अत्यधिक सन्देह करने वाला, आवेगी होता है। इन्हे अच्छे परामर्शदाता की महत्वपूर्ण निर्णय लेने मे आवश्यकता होती है। यदि ये अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करे तो ज्योतिषी, निवेशक, रचनात्मक लेखक, पादरी या पुरोहित हो सकते है।
आचर्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है लेकिन उसमे अन्तर बहुत है।
यवनाचार्य : मृगशीर्ष प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय मे तस्कर, तृतीय मे भोगी, चतुर्थ मे धन-धान्य युक्त होता है।
मानसागराचार्य : पहले मे धनधान्यापार्जक, दूसरे मे पर स्त्री गामी, तीसरे मे भाग्यवान, चौथे मे निर्धन होता है।
⃝ इसके प्रथम और द्वितीय चरण वृषभ मे आते है अतएव जातक की संतान सुन्दर, मेघावी, सृजनात्मक, प्रचुर भौतिकता लाने वाली होती है।
⃝ इसके तृतीय और चतुर्थ चरण मिथुन मे आते है अतएव लेखन, जनवक्ता, प्रभावपूर्ण भाषण, जिज्ञासावृत्ति, अक्ल खोज प्रकट करते है।
⃝ स्त्री जातक गलत विचारो को व्यक्त करने में भी नही हिचकिचाति है इस कारण मित्र भी शत्रु बन जाते है।
नक्षत्र चरण मे ग्रह फल
भारतीय ज्योतिष मे सूर्य, बुध, शुक्र की आपस मे पूर्ण या पा दृष्टि नही होती क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है।
सूर्य :
➽ यदि सूर्य पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक के आश्रित कई औरते होगी, वह जलीय उद्यगो का व्यवसाय करेगा।
➽ यदि सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक वीर होगा और वीरता (सेना या पुलिस) से संपत्ति अर्जित करेगा।
➽ यदि सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक शासन से जुड़कर शासित दल से गठबंधन करेगा और उससे बहुत संपत्ति अर्जित करेगा।
➽ यदि सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक नीच प्रवृत्ति का होगा और अपने से बड़ी उम्र की औरत से विवाह करेगा। परन्तु शनि वक्री हो, तो कम उम्र की कन्या से विवाह करेगा।
मृगशीर्ष सूर्य चरण फल
प्रथम चरण - जातक को सुगन्धित पुष्पो का शौक होगा। वह बुद्धिमान, आकर्षक, भाग्यवान होगा। उसकी कुछ संतान होगी जिन्हे गले, आँख, चेहरे के रोग हो सकते है।
द्वितीय चरण - जातक सुख-सुविधा युक्त, अच्छे पहनावे और संगीत का शौकीन, रचनात्मक लेखक, पानी से डरने वाला होता है। विवाह 25-27 वर्ष की उम्र मे होगा।
तृतीय चरण - जातक मुखिया, विवेकशील, वित्तीय सलाहकार, जनसम्पर्क कार्यो मे निपुण, ललित कला प्रेमी, एक पुत्र विज्ञान के शोध से यशस्वी होता है। किसी-किसी मे रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होती है। नाक के रोग हो सकते है।
चतुर्थ चरण - जातक जन लाभ के कार्य करेगा। यदि बुध चंद्र की युति इस चरण मे हो, तो जातक बुद्धिमान, अच्छा बयानबाज, ज्योतिष का विशेषज्ञ होता है।
चन्द्र :
➽ यदि चन्द्र पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक ग्रामवासी, धनाढ्य और साहूकार होगा।
➽ यदि चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक अन्य स्त्री के कारण पहली पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद करेगा और माता से क्रूर व्यवहार करेगा।
➽ यदि चन्द्र पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक रिश्तेदारी मे विवाह करेगा, संतान के कारण सर्वप्रिय, धनी होगा।
➽ यदि चन्द्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक जीवन के सभी सुख (संतान, पत्नी, सम्पत्ति) भोगेगा, प्रसिद्ध होगा। ➽ यदि चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक को मातृपक्ष से सम्पत्ति मिलेगा। सुखी होगा।
➽ यदि चन्द्र पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन और माता के लिये धातक होगा।
मार्गशीर्ष चंद्र चरण फल
प्रथम चरण - जातक प्रसिद्ध, विद्वान, पुत्रियो वाला होगा। पत्नी सुन्दर प्रतिव्रता होगी जो राजनीति व सामाजिक कार्यो में व्यस्त रहेगी और आर्थिक मदद करेगी। जातक सन्धिवात रोग से पीड़ित होता है।
द्वितीय चरण - जातक मेघावी, लेखन निपुण, धनाढ्य, संचार वाहक, संग्रहक, गरिमा युक्त होता है। यदि लग्न भी इस चरण मे हो, तो धनाढ्य और विशिष्ट परिवार मे जन्म होता है।
तृतीय चरण - व्यक्ति नामी और प्रसिद्ध होता है। बचपन में अनेक समस्याग्रस्त ऐसा जातक माता के प्यार और स्नेह से वंचित होता है। आमदानी साधारण होती है। तम्बाखू सेवन से मुँह, गला या फेफड़े का कैंसर होता है।
चतुर्थ चरण - व्यक्ति मजबूत शरीर, काम वासना से औत-प्रोत, दवा या रसायन या सौन्दर्य प्रसाधन का व्यवसायी, रोगी होता है।
मंगल :
➽ यदि मंगल पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक वनवासी, उपद्रवी, स्त्री जाति से घृणा करने वाला होगा।
➽ यदि मंगल पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक माता का मान करने वाला, वेश्यागामी, जीवन मे अनेक परेशानी और अड़चनो का सामना करने वाला होगा।
➽ यदि मंगल पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक नृत्य-नाट्य और संगीत प्रेमी, मित्रो से स्नेह करेगा।
➽ यदि मंगल पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक पुत्रवान, सम्पत्तिवान होगा।
➽ यदि मंगल पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक विशिष्ट राजनैतिक दर्जा प्राप्त करेगा या सुरक्षा अथवा पुलिस मे ऊंचे पद पर होगा।
➽ यदि मंगल पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक बदमाश या खलनायक होगा।
मृगशीर्ष मंगल चरण फल
प्रथम चरण - जातक लालची, ललनाओ का संग पाने का इच्छुक, कुसंगति में रहने के कारण मुसीबत मे पड़ने वाला होता है। ये लोग दीन, हीन (विद्या, बुद्धि, संतान) अधिक खाने वाले भुक्कड़ होते है। ये प्रायः युध्य विद्या, या मार्शल आर्ट में रुचिवान होते है।
➤ मतान्तर - जातक बयानबाज, कटुभाषी, धनाभाव से पीड़ित, परिवार मे पालन का उत्तरदायित्व वहन कर्ता होगा। पत्नी व स्वयम की अल्पायु होगी। यदि विशखा नक्षत्र मे लग्न हो, तो निसंतान होगा।
द्वितीय चरण - जातक अल्प धीरज रखने वाला, लड़ाकू, चंचल, परिवार विरोधी, परिवार की बदनामी का कारण होता है। यदि शनि की युति हो तो कारावास होता है।
तृतीय चरण - जातक रतिक्रीड़ा मे प्रवीण, दुःखी, निर्धन किन्तु अच्छी आय अर्जित करने वाला होता है। यदि लग्न भी इस चरण मे हो तो चेचक रोग हो सकता है।
चतुर्थ चरण - जातक के उच्च वर्ग और अधिकारियो से स्नेह भाव और आत्मीयता रहेगी। पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट, वैवाहिक जीवन दुखमय और पत्नी बीमार रहेगी। यदि मंगल पापयुक्त या पापधृष्ट हो, तो हिंसक होता है।
बुध :
➽ यदि बुध पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक अच्छे स्वास्थ्य वाला, दानी, परिवार पालक, प्रतिष्ठित होता है।
➽ यदि बुध पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक क्रोधी, चीजो को नष्ट करने मे आनंदित होता है।
➽ यदि बुध पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक वायदे का पक्का, समर्पित, विश्वनीय, विद्वानो का मुखिया होता है।
➽ यदि बुध पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक दरिद्र, मित्रो द्वारा अवरोध व कष्टो से त्रस्त, अड़चनो से पीड़ित होगा।
मृगशीर्ष बुध चरण फल
प्रथम चरण - पवित्र चरित्र, विद्वान् और धनी, वृद्धावस्था मे मानसिक अस्थिरता के कारण भुलक्क़ड होता है।
द्वितीय चरण - जातक तुच्छ तरीको से कमाने वाला, दूसरो की शान-शौकत, सम्पदा पर जलने वाला होता है।
तृतीय चरण - जातक सौभाग्यशाली, धन-वैभव युक्त, मूल रूप से शान्तिप्रिय, अनेक स्रियो से काम सम्बन्ध लेकिन एक ही विवाह और पत्नी से प्रगाढ़ प्रेम करने वाला, उत्तरदायित्व निर्वाहक होता है।
चतुर्थ चरण - जातक धैर्यवान, विद्वान्, आशावादी, औरतो का प्रेमी, एक से अधिक विवाह करनेवाला होता है। हकलाहट और टी बी का रोग हो सकता है।
➤ मतान्तर - भगवन भक्त, माध्यमिक शिक्षा लेकिन ईमान और मेहनत से उन्नति के शिखर पर, लेखा या वित्तीय विभाग अध्यक्ष होगा।
गुरु :
➽ यदि गुरु पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक शासक वर्ग के निकट, धन-दौलत युक्त, प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध होता है।
➽ यदि गुरु पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक करोड़ पति लेकिन अवैध यौन सम्बन्धो के कारण लोक निन्दित और अपयश के संकट मे होता है।
➽ यदि गुरु पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक भाग्यशाली, धैर्यवान, विद्वान, वैवाहिक जीवन दुःखद होता है।
➽ यदि गुरु पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त, धन-वैभव युक्त, धार्मिक होता है।
➽ यदि गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो गौरवपूर्ण भव्य व्यक्तित्व, सुन्दर स्त्रियो का सानिध्य, महिलाओ के उपयोगी वस्तुओ का व्यवसायी होगा।
➽ यदि गुरु पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक विभिन्न भाषाओ का ज्ञाता, स्व परिश्रम से प्रशंसित लेकिन पत्नी का व्यवहार कटु होता है।
मृगशीर्ष गुरु चरण फल
प्रथम चरण - जातक मांसल देह, डांवाडोल मन स्थति वाला, पढ़ने-लिखने का शौकीन, धन-दौलत युक्त फिर भी असंतुष्ट रहता है। यदि गुरु लग्न मे हो, और लग्न मृगशीर्ष प्रथम या द्वितीय चरण मे हो, तो विश्व विख्यात पार्श्व गायक / गायिका होता है।
द्वितीय चरण - जातक सुन्दर, सुंदर वस्त्र धारण करने वाला, शासको और राजनीतिज्ञो तक पहुंच वाला, शास्त्रार्थ करने मे प्रवीण होता है।
तृतीय चरण - जातक कंजूस, कृतध्न, पत्नी व संतान सुख से वंचित, मतलबी होता है। अपने पास से किसी को भी यहा तक पत्नी और संतान को भी फूटी कोड़ी नही देता है। रक्त विकार या ह्रदय रोग से पीड़ित होता है।
चतुर्थ चरण - जातक धनी, भूमि कार्यो से धन प्राप्त करने वाला, सरकार से मान्य व पदक प्राप्त करने वाला, दूसरो के विचार पढ़ने मे माहिर होता है।
शुक्र :
➽ यदि शुक्र पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो माता की समाज मे उच्चतम स्थिति होने के कारण जातक जनजीवन मे प्रसिध्द होता है।
➽ यदि शुक्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो स्त्रियो के कारण संपत्ति तहस-नहस होगी, वैवाहिक जीवन नष्ट होगा ।
➽ यदि शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो अच्छी पत्नी, संतान, धन-दौलत होगी।
➽ यदि शुक्र पर शनि की दृष्टि हो, तो धन का अभाव, पत्नी से पीड़ित, सुसराल वालो की धमकिया सहन करेगा।
मृगशीर्ष शुक्र चरण फल
प्रथम चरण - जातक संगीत, नृत्य-नाट्य, ललित कला मे पारंगत और इनमे विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित, अभिनेता के रूप मे विशाल धन अर्जित करने वाला, कामक्रीड़ा मे लिप्त, अभिनय या कला के लिए पुरष्कृत होगा।
द्वितीय चरण - जातक राजकुमार के सामान, विविध विषयो का ज्ञाता, स्त्रियो से संपर्कशील, जरुरतमन्दो का सहायक होगा। गुर्दे या मूत्राशय के रोग से पीड़ित होता है।
तृतीय चरण - जातक स्वधर्म का अनुयायी, शास्त्रो और अनेक विज्ञान का ज्ञाता होने से प्रसिद्ध, शत्रु भय से मुक्त, संगीत और नृत्यादि से धन अर्जित कर धनी होता है। यदि शुक्र अशुभ ग्रह से पीड़ित हो, तो दूसरा विवाह होगा। यदि शुक्र की महादशा हो, तो 13 वर्ष तक लाभदायक परिणाम, बाद मे मिलाजुला परिणाम होगा।
चतुर्थ चरण - जातक मध्यम से ठिगना कद वाला, मांसल देह, आदर्श चरित्रवान, लेखक या कवि होगा। यदि लग्न पुष्य नक्षत्र मे हो, तो दो विवाह होगे या पत्नी के जीवित रहते अन्य स्त्रियो से अवैध सम्बन्ध होगे।
शनि :
➽ यदि शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक वेदो और अन्य शास्त्रो का विद्वान् लेकिन जीवन पर्यन्त दैनिक आवश्यकताओ की पूर्ति हेतु दूसरो पर निर्भर होगा।
➽ यदि शनि पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो राजनीति मे उच्च पद पर या विभाग अथवा संस्था का अध्यक्ष होगा।
➽ यदि शनि पर मंगल की दृष्टि हो, तो सुरक्षा अथवा आरक्षी विभाग मे कार्यरत, पारिवारिक जीवन सुखी होगा।
➽ यदि शनि पर बुध की दृष्टि हो, तो स्त्री के अधीनस्थ कार्य करेगा और उसके चरित्र की आलोचना होगी।
➽ यदि शनि पर गुरु की दृष्टि हो, तो दूसरो के सुख-दुःख मे भागीदार, जरुरतमंदो का सहायक होगा।
➽ यदि शनि पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जमीन्दार या शासकीय अधिकारी, सूरा-सुन्दरी मे मशगूल होगा। कोई-कोई जातक ज्योतिर्विद होगा।
मृगशीर्ष शनि पाद फल
पहला पाद - जातक लम्बा कद, संकीर्ण छाती, घुंघराले बाल, काला रंग वाला होता है। आर्थिक रूप से कमजोर होगा। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो, तो पत्नी या प्रेयशी अपवित्र होती है।
दूसरा पाद - जातक अधिक खर्चीला, दुश्चरित्र मित्र वाला, व्यापर मे व्यस्त लेकिन लाभ से वंचित होता है। जीवन मे शीघ्र उन्नति तथा उतनी शीघ्रता से पतन होगा। वह स्त्रियो के आनंद और अन्य प्रकार के आनन्दो मे धन खर्च कर दिवालिया होगा।
तीसरा पाद - यदि लग्न उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र मे हो, तो स्त्री जातक विवाह के पूर्व गर्भ धारण करेगी। जातक जेलर, या आरक्षी विभाग मे कार्यरत होगा।
चौथा चरण - जातक बचपन में पैर से विकृत और बाद मे लंगड़ा होगा। जन्म स्थान से दूर पवित्र स्थान पर पापकर्म करेगा। अस्थमा या फेफड़ो के रोग से ग्रसित रहेगा।
मार्गशीर्ष राहु चरण फल
प्रथम चरण - जातक अर्थ से सम्पन्न, अच्छे कार्यो से प्रतिष्ठित, श्वेत कुष्ठ, मिर्गी, आंत के रोग होते है।
द्वितीय चरण - जातक मुर्ख, संयमहीन, अचानक धनवान होगा।
तृतीय चरण - जातक लालची, हीन कार्यो मे रत और हीन कार्यो से दूसरो को कष्ट देनेवाला, अपने कर्मो से कष्ट पानेवाला, ईर्ष्यालु, शत्रुओ से त्रस्त होता है।
चतुर्थ चरण - जातक शोध कार्यो मे रत, आज्ञाकारी संतान, चरित्र से संदिग्ध किन्तु पत्नी को प्यार और आदर करनेवाला होता है।
मार्गशीर्ष केतु चरण फल
प्रथम चरण - जिन्दगी मे अनेक उतार-चढ़ाव, कठिन परिश्रम के बाद स्वल्प कमाई, अनेक संतान होने से वृद्धावस्था मे सुखी होता है।
द्वितीय चरण - जातक पैर से विकृत लेकिन विद्वान, विकलांगो का मददगार होता है।
तृतीय चरण - जातक दूसरो की बुराइयो मे रत, ईर्ष्यालु होता है।
चतुर्थ चरण - आपराधिक कार्यो मे रत, चरित्रहीन, अनेक रोगो से ग्रस्त, स्वकार्यो से दिवालिया होता है। छदाम भी पास मे नहीं होती है।
जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।
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