प्रकरण १२ - श्राद्ध

प्रकरण १२ - श्राद्ध 

* श्राद्ध कर्म के अधिकारी 

1. माता का श्राद्ध संयुक्त परिवार में ज्येष्ठ पुत्र, दूसरा/तिसरा पुत्र, विभक्त परिवार में प्रत्येक पुत्र को करना चाहिए। (निवास, रसोई आदि अलग हो तब उसे विभक्त परिवार समझना चाहिए।) पुत्र न हो तब पति श्राद्ध कर सकता है, पति भी न हो तब कन्या या सं्पिडी में से कोई भी श्राद्ध कर सकता है। 

2. पिता का श्राद्ध संयुक्त परिवार में ज्येष्ठ पुत्र, दूसरा/तिसरा पुत्र तथा विभक्त परिवार में प्रत्येक पुत्र को करना चाहिए। (निवास, रसोई आदि अलग हो तब उसे विभक्त परिवार समझना चाहिए।) यदि पुत्र न हो तब विवाहित अथवा अविवाहित कन्या भी श्राद्ध संपन्‍न करा सकती है। पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है तथा सप्िडी में से कोई भी श्राद्ध कर सकता है। 

* श्राद्ध के प्रकार - 

ब्राह्मण भोजनसह श्राद्ध करना हो तब घर में रसोई बननी चाहिए। यह संभव न हो तब 

आमानन्‍न (भोजन सामग्री) देकर श्राद्ध कर सकते है। इसके उत्तरोत्तर निम्नलिखित पर्याय हैं। 

१) सपिंडक ब्राह्मण भोजन के साथ २) सपिंडक आमान्न (भोजन सामग्री देकर) 

३) सपिंडक चट श्राद्ध ४) ब्रह्मार्पण ब्राह्मण भोजन के साथ ५) ब्रह्मार्पण आमान्न. (भोजन सामग्री देकर) ६) हिरण्यश्राद्ध ७) मानसिक संकल्पकर ब्राह्मण को भोजन पर्याप्त दक्षिणा देकर नमस्कार करना चाहिए। 

० प्रथम सांवत्सरिक श्राद्ध 

1. प्रथम सांवत्सरिक श्राद्ध १२ महीने पूर्ण होने के बाद श्राद्ध तिथि के दिन करना चाहिए। (ग्यारह अथवा साड़ेग्यारह महीने होने के बाद नहीं करना चाहिए।) 

2. एक ही दिन मृत हुए व्यक्तियों का श्राद्ध ज्येष्ठ क्रम से एक ही दिन करना चाहिए, परंतु मृत्यु के समयानुसार तिथिभेद होनेपर श्राद्ध तिथि के दिन ही श्राद्ध करना चाहिए। कर्ता एक ही हो तो तीन श्राद्ध एक ही दिन नहीं करने चाहिए, ऐसे प्रसंग में दो श्राद्ध एक दिन कर, दूसरे दिन तीसरा श्राद्ध करना चाहिए। 

* अशौय तथा श्राद्ध 

सूतक के दिनों में यदि श्राद्ध तिथि आती है तब सूतक (अशौच) समाप्ति के बाद ४/५ दिन में तुरंत श्राद्ध करलेना चाहिए, यदि यह भी असंभव हो तब अष्टमी, अमावस्या अथवा व्यतीपात॑ योग के दिन श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध का लोप न करें। 
" श्राद्ध दिवस ज्ञात न होनेपर। 

तिथि ज्ञात हो लेकिन महीना ज्ञात न हो तब आषाढ़, भाद्रपद, मार्गशीर्ष अथवा माच माह के उस तिथिपर श्राद्ध करना चाहिए। महीना ज्ञात हो लेकिन तिथि ज्ञात न हो तब उस महीने के एकादशी (ग्यारस) अथवा अमावस्या को श्राद्ध करना चाहिए। महीना और तिथि दोनों ही ज्ञात नहीं हो तब मार्गशीर्ष अथवा माघ मास की अमावस्या को श्राद्ध करना चाहिए। 

* एक ही दिन / एक ही तिथि को माता-पिता का श्राद्ध करना हो तब 

पिता का श्राद्ध प्रथमकर पश्चात्‌ माता का श्राद्ध करना चाहिए। ऐसे प्रसंग में अलग-अलग भोजन बनवाना असंभव हो तब चावल एवं खीर अलग से बनवानी चाहिए। पकार्ये हुए अन्य भोजन पदार्थों के दो हिस्सेकर श्राद्ध के समय उन दोनों हिस्सोंपर अलग से प्रोक्षण करना चाहिए। दर्शश्राद्ध तथा श्राद्ध एक ही दिन हो तब श्राद्ध प्रथम करें, पश्चात्‌ दर्शश्राद्ध करें। 

* श्राद्ध कहीं भी कर सकते है। 

जिस गांव या घर में मृत्यु हुई हो, उसी गांव या घर में अंत्यकर्म या श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। अंत्यकर्म, वर्षश्राद्ध, श्राद्ध, महालयश्राद्ध किसी भी गांव/शहर अथवा विदेश में भी कर सकते है। 

* पिताजी श्राद्ध करने की स्थिति में न हो तब। 

पिताजी वृद्धावस्था के कारण अथवा दुर्धर अवस्था के कारण श्राद्ध करने में असमर्थ हो तब उनकी अनुमती से संकल्प में परिवर्तनकर पुत्र श्राद्ध कर सकता है (पूर्ण अपसव्य ना करें)। यदि पुत्र न हो तब पत्नी, कन्या अथवा आचार्य भी श्राद्ध करवा सकते है। परंतु पिताजी श्राद्ध के समय बीमार हो तथा कुछ ही काल के लिए बीमार रहनेवाले हो तब श्राद्ध तिथि छोड़कर स्वास्थ्य प्राप्ति के बाद पिताजी अंतरित श्राद्ध कर सकते है। ऐसे समय पुत्र से श्राद्ध नहीं करवाना चाहिए। * 

* श्राद्ध काल ( 

श्राद्धकर्म के लिए श्राद्ध की तिथि अपराह्नकाल में अर्थात्‌ सामान्यतः दोपहर डेढ़ बजे से चार बजे तक जिस दिन हो, उस दिन सुबह से लेकर दोपहर २३ बजे तक किसी भी समय श्राद्धकर्म कर सकते है। 

* श्राद्ध के दिन उपवास अथवा व्रत होनेंपर 

त्यौहार अथवा उपवास-द्रत के दिन भी श्राद्ध कर सकते हैं। उपवास का दिन होनेपर श्राद्ध के रसोई में उपवास योग्य १-२ पदार्थ बनवाकर उसे प्रसादरूप फरिहाली खाते वक्त खाना चाहिए। सेंभव हो तब ब्राह्मण भोजन करवाना चाहिए अथवा चटश्राद्ध करना चाहिए। त्यौहार के दिन भरद्ध आनेपर प्रात:काल में भगवान की पूजाकर नैवेद्य अर्पण करें, पश्चात्‌ अल्प मात्रा में श्राद्ध 
रसोई बनाए। श्राद्धकर्म संपन्न होने के बाद उस में से एकाथ व्यंजन प्रसादरूप से भोजन समय ग्रहण करना चाहिए। 

*» तीज-त्यौहार होनेपर श्राद्ध बाद में भी कर सकते है। 

व्यक्ति के मृत्यु के समय जो तिथि होती है, वह तिथि उस व्यक्ति की श्राद्धतिथि मानी जाती है। उदाहरण - किसी दिन दोपहर ४ बजे तक पंचमी हो तथा व्यक्ति का निथन सायंकाल ६ बजे होनेपर उस व्यक्ति की श्राद्ध तिथि षष्ठी होगी। श्राद्ध की तिथि अपराह्न में सामान्यतः दोपहर डेढ से चार इस समयावधी में जिस दिन अधिक होती है, उस दिन श्राद्ध करना चाहिए। ऐसे समय श्राद्ध के दिन अपराह्न समय में श्राद्ध तिथि होती है, इसलिए सूर्योदय से लेकर दोपहर १२ बजे तक श्राद्ध तिथि न होनेपर भी सुबह से दोपहर दो बजे तक किसी भी समय श्राद्धकर्म कर सकते है। श्राद्ध तिथि का लोप अथवा उल्लंघन नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्रकथन है। परंतु श्राद्ध के दिन वृद्धि / सूतक हो तब ऐसे समय श्राद्ध तिथि का उल्लंघनकर वृद्धि / सूतक समाप्त होने के पश्चात्‌ तुरंत श्राद्ध करना चाहिए। किसी कारणवश अथवा बिमारी के कारण श्राद्ध तिथि के दिन श्राद्ध करना संभव न हो तब अष्टमी, व्यतीपात योग अथवा दर्श अमावस्या के दिन श्राद्ध कर सकते हैं। ऐसे प्रसंग में ““अंतरित श्राद्ध*' ऐसा उच्चारणकर श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्धतिथि के २-३ दिन पहले या पश्चात्‌ घर में अनायास कोई मांगलिक कार्य निश्चित हुआ हो तब मंगलकार्य को महत्त्व देकर श्राद्धतिथि का उल्लंघन करते हुए मंगलकार्य के पश्चात्‌ श्राद्ध कर सकते है। 'पित्रो: क्षयाहादिश्राद्धदिनंयदि ज्ञानादज्ञानाद्वापतति तदा त्रिपुरुषसपिंडैविंवाहादि मंगल समाप्त्युत्तरं श्राद्धंकार्य” (धर्मसिंधु तृतीय परिच्छेद पूर्वार्ध) इसका तात्पर्य यह है कि, श्राद्धदिन जाने-अनजाने में मांगलिककार्य के मध्य में आता हो तब तीन पुरुषों तक सपिंड विवाहादिक मंगलकार्य समाप्त होने के बाद श्राद्ध कर सकते हैं, ऐसा धर्मसिंधु में लिखा है। वर्तमान समय में विभक्त कुटुंब पद्धति के कारण प्रत्येक के घर तीज-त्यौहार अलग-अलग मनाये जाते हैं। अतः हर भाई को श्राद्धकर्म भी स्वतंत्र करना चाहिए। श्राद्धकर्म करनेवाले पंडितों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है तथा उपलब्ध पंडित भी तीज-त्यौहारों में व्यस्त रहते हैं। त्यौहार के दिन पूजा, रसोई, श्राद्धविधि और श्राद्ध की रसोई बनाना इन सब में ही यजमान तथा पंडितों को भी बड़ी अड़चन होती है। ऐसे समय में धर्मसिंधु में दिए गए मांगलिककार्य संबंधी निर्णय का आधार लेकर तीज-त्यौहार के पश्चात्‌ श्राद्ध संपन्न कर सकते है। जिससे श्राद्धकर्म विधिवत्‌ पूर्ण होकर कर्ता एवं कुटुंब को समाधान प्राप्त होता है। परंतु श्राद्ध तिथि के दिन ही श्राद्ध करना महत्त्वपूर्ण है, अत: जिन्हें तीज-त्यौहार के दिन ही श्राद्ध करना हो उन्हे सपिंडक या हिरण्यश्राद्ध संपन्‍न करना चाहिए। जिन्हें तीज-त्यौहार के दिन श्राद्ध आनेपर वह करना संभव न हो तब वे कालांतर में अंतरित श्राद्ध करने का पर्याय ले सकते है। श्राद्ध सपिंडक ही करना चाहिए किंतु वर्तमान में जिन्हें सपिंडक श्राद्ध करना संभव नहीं हो पाता वे श्राद्धसंकल्प और तर्पणकर पंडित को आमान्नसह दक्षिणा अथवा भोजन पर्याप्त दक्षिणा दे सकते है, श्राद्ध के लिए ऐसा विकल्प भी शास्त्र को मान्य है। श्राद्ध अपने घर में ही करना चाहिए ऐसा नहीं है, दूसरी जगह भी कर सकते हैं। अतः अपने दिवंगत माता-पिता का स्मरणकर श्राद्ध तिथिपर श्राद्ध करना अथवा पश्चात्‌ सपिंडक तथा अन्य प्रकार से भी श्राद्ध होना चाहिए यह विचार महत्त्वपूर्ण है। 

(मलमास में श्राद्ध विचार मलमास के अध्याय में देखें) (पितृपक्ष (महालय श्राद्ध) जानकारी भाद्रपद मास में देखें) 

उपसंहार 

प्राचीन समय में सभी धार्मिक ग्रंथ संस्कृत भाषा में उपलब्ध थे। कालांतर में सामान्य जनता को समझ में आए इसलिए संस्कृत विश्लेषण के पश्चात्‌ उसके नीचे हिंदी तथा अन्य भाषाओं में उसका अनुवाद दिया है। परंतु वर्तमान समय को ध्यान में रखते हुए इस ग्रंथ में धर्मांचरण संबंधी पूर्ण जानकारी केवल हिंदी में दी गई है। इस जानकारी का उपयोग कर लोगों को धर्माचरण करना सहज हो, यहीं इस ग्रंथ का उद्देश्य है। 

अतः ”यदू रोचते तद ग्राद्माम' यह सविनय प्रार्थना। “| शुभ भवतु।। 

- संदर्भ ग्रंथ - 
७ धर्मसिंधु ७ निर्णयसिंधु ७ पुरुषार्थ चिंतामणि ७ मनुस्मृति ७ पाराशर स्मृति 
6 याज्ञवल्क्य स्मृति ७ ऋग्वेदीय ब्रह्मकर्म ७ पारसकर गृह्मसूत्र ७ कर्मकांड प्रदीप ७ मुहूर्त चिंतामणि ७ मुहूर्त मार्तण्ड ७ मुहूर्तसिंधु ७ व्रतराज ७ बृहत्‌ पंचांग फलादः 
७ उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह ७ धर्मशास्त्रीय निर्णय (भाग १ एवं २) ७ व्रतपर्व विवेक 
७ व्रतशिरोमणि ७ थर्मशास्त्राचा इतिहास (मराठी) ७ भारतीय संस्कृति कोश ,७ नवा हिंदुर्धम ७ सुलभ ज्योतिषशास्त्र ७ कालगणना # भारतीय ज्योतिषशास्त्राचा इतिहास (मराठी) 



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