पुनर्वसु नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फलादेश
पुनर्वसु नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फलादेश
✶पुनर्वसु नक्षत्र
राशि चक्र मे 80।00 से 93।20 अंश विस्तार वाला क्षेत्र पुनर्वसु नक्षत्र कहलाता है। अरब मंजिल मे अल धीरा, ग्रीक मे जेमिनोरियम, चीन सियु मे त्सिंग कहते है। सूर्य सिद्धांत अनुसार पुनर का अर्थ दुबारा और वसु का अर्थ अच्छा या चकमदार है। वसु के अर्थ मे शंका है कि अच्छा या चमकदार। वसु का शाब्दिक अर्थ "बसना" है। कुछ विद्वान पुनर्वसु का अर्थ पुनरस्थिरीकरण मानते है।
इसके अतिरिक्त तारो की संख्या में भी मतभेद है। शाक्य और खंडकातक के अनुसार पुनर्वसु के दो तारे है। क्योकि जुड़वा के शीर्षो मे एक-एक जोड़ी तारो का होना वर्णित किया है। अतः चार तारे एक धनुषाकार मे होते है। यहाँ एक संयोजन (मिलन) तारे का भी उल्लेख है इसका वास्तविक अर्थ हुआ कि पांच तारो का समूह है। आम स्वीकृत सिद्धांत अनुसार पुनर्वसु समूह एक मकान के समान स्थित है। इससे इसके इस अर्थ को भी बल मिलता है कि वसु का तात्पर्य "बसना" है।
देवता देवी अदिति, स्वामी गुरु, राशि मिथुन 20।00 से कर्क 03।20 अंश । राशि स्वामी बुध व चन्द्र। भारतीय खगोल मे यह 7 वा चंद्र भवन चल संज्ञक है। इसके चार तारे है। इनसे गृह द्वार या तोरण की आकृति दृश्य होती है। पुनर्वसु को दक्षिण भारत में पुनर्पुसम कहते है। पुनर्वसु का अर्थ है। प्रकाश की वापसी अर्थात दिव्य क्षमता, अन्धेरे मे आध्यत्मिक प्रकाश लाने के लिए होता है पुनर्वसु। पुनर्वसु = पुनः + वासु अर्थात वापस लौटने के लिए, नवीनीकरण, पुनर्स्थापना। यह भय कारक, सात्विक, पुरुष नक्षत्र है। इसकी जाति वैश्य, योनि मार्जार योनि वैर मूषक, गण देव आदि नाड़ी है। यह उत्तर दिशा का स्वामी है
देवी अदिति
प्रतीकवाद - इसके देवता आकाशीय माता देवी अदिति है। ये सूर्य की माता, तथा भूत भविष्य, जीवन चक्र, मातृत्त्व, जीवन चेतना, ब्रम्हाण्ड के सातो आयाम की देवी है। कश्यप और अदिति से बारह आदित्य 1 इन्द्र, 2 विष्णु, 3 वागा, 4 त्वस्था, 5 वरुण, 6 अर्यमा, 7 पूषा, 8 मित्र, 9 अग्नि, 10 प्रज्यन्य, 11 विवस्वान, 12 दिनकर (सूर्य) हुए। सभी 12 आदित्यो मे अदिति के गुण जैसे सत्य, उदारता, महानता, पवित्रता, शिष्टता, सौन्दर्य, कीर्ति आदि है। देवी अदिति वामन अवतार मे भगवान विष्णु की माता व दक्ष की पुत्री थी।
चैत्र 9 अदिति के दिन, पुनर्वसु नक्षत्र, कर्क लग्न, लग्नस्थ गुरु, चन्द्र, पांच ग्रह सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि, उच्चस्थ भोर पश्चात इक्ष्वाकु वंश के वृद्धि दाता जगत पूज्य विष्णु के अवतार राम ने जन्म लिया था। यानि श्री राम का जन्म नक्षत्र पुनर्वसु था।
पुनर्वसु नक्षत्र-यह सातवां नक्षत्र भचक्र में आर्द्रा से आगे के 13-20’ पर होता है। यह नक्षत्र मिथुन राशि क्षेत्र में स्थित है, किन्तु इसका अन्तिम चरण कर्क राशि के क्षेत्र में पड़ता है। यह नक्षत्र चार (कुछ के मत में 5) तारों द्वारा मिलकर धनुष/घर के समान आकृति बनाता है। इस नक्षत्र के देवता अदिति (देवमाता) तथा स्वामी बृहस्पति हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र में उत्पन्न जातक (पुरुष) शांत चित्त का, सुशील, प्रियभाषी, उदार, धनी, मित्रों वाला एवं गूढ़ विषयों का ज्ञाता होता है, किन्तु भोगी तथा विलासी भी होता है। ऐसा जानकारों का मत है।
पुनर्वसु नक्षत्र में जन्मी स्त्री जातक पुण्यशीला, वेदमार्गी, धर्मपरायण, सद्स्वभाव वाली, पाखंड से दूर रहने वाली, मनोविद् तथा पति-पुत्र से युक्त होती है।
विशेषताएं
यह माना जाता है कि पुनर्वसु जातक के यहा केवल पुत्र संतति ही होती है।
पुनर्वसु प्रत्येक कार्य के शुभारम्भ के लिए श्रेष्ठ होता है।
चन्द्र इस नक्षत्र मे मित्रता, दयालुता, अभावो का नष्ट होना, दूरदर्शिता का कारक है।
एक बार टूट कर पुनः प्रारम्भ करने का, नवीन जीवन शुरू करने का, दूर देश से वापस आकर नये सिरे से शुरू करने का पुनर्वसु प्रतीक है।
युग पुरुष राम का यह जन्म नक्षत्र है।
पुनर्वसु विभूतिया
⃝ मर्यादा पुरषोत्तम रामचंद्र का जन्म नक्षत्र पुनर्वसु था।
⃝ महर्षि रमन अद्वैतवाद गुरु तमिलनाडु भारत का चन्द्र पुनर्वसु मे था।
⃝ नेल्सन राकफेलर उपराष्ट्रपति अमेरिका का सूर्य पुनर्वसु मे था।
⃝ बिल गेट्स चेयरमेन माइक्रोसॉफ्ट का लग्न पुनर्वसु है।
नक्षत्र फलादेश
पुनर्वसु वास्तु प्राण शक्ति से सम्बंधित है। इसमे उद्श्यो को पुनः प्राप्त करने की शक्ति है। जिस प्रकार विजय, नवीनीकरण, वापसी की पुनर्योजी क्षमता बारिश मे होती है, उसी प्रकार बारिश बाद पुनर्वसु मे पोषण से एक लय कर पृथ्वी को पुनः युवती बनाने की क्षमता है। इस कारण से पुनर्वसु जातक संतुष्ट, कठिन परिश्रम से ऋणात्मक ऊर्जा नष्ट करने वाला, आत्मविश्वास से बधाओ पर काबू करने वाला होता है।
जातक सुस्वभावी, मित्रवान, आध्यत्मिक, स्व अनुभवी होता है। यदि पुनर्वसु लग्न मे हो, तो सामान्य शारीरिक गठन वाला, शान्त, स्वच्छ, गंभीर परोपकारी होता है। यह दुर्घटना या रोग मे भी सुरक्षित, घर से बहार रहने पर खिन्न, चुनौती को स्वीकार कर सफल होने वाला, दुविधा युक्त, नफा-नुकसान प्राप्त कर्म वाला होता है।
जातक सुखी, भोगी, लोकप्रिय, पुत्र मित्र आदि से सुखी, मित्रो मे वैचारिक मतभेद उत्पन्न करने वाला, मेघावी, रत्न-सोना पसंद करने वाला, सुस्वादि भोजन प्रिय, धार्मिक, विष्णु भक्त होता है।
पुरुष जातक - जातक ईश्वरवादी, धर्म मे रुचिवान, प्रारम्भ मे अच्छे व्यवहार वाला किन्तु बाद मे परिस्थिति अनुसार व्यवहारी होता है। इसके अंतरंग के विचारो को जान पाना कठिन है। थोड़ा क्रोधी और विरोधी, प्राचीन परम्परा वादी पुराने ख्यालो वाला होता है यह गैर क़ानूनी काम करने वालो का विरोधी और गैर क़ानूनी काम करने वालो को निरुद्ध करने वाला, दूसरो को कष्ट नही देने वाला, विपत्ति मे सहयक, साफ-सुथरा जीवन जीने वाला होता है। सभी विषयो मे उन्नतिवान, अध्यापक या अभिनेता, चिकित्सक या लेखक के रूप मे नाम और प्रसिद्धि पाता है। 32 वर्ष तक बड़े व्यवसाय मे सफल नही हो पाता है।
इसका दाम्पत्य जीवन सुखी नही रहता है, या तो पहली पत्नी को तलाक देता है, या पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करता है। पानी खूब पिता है। जठराग्नि प्रबल होती है।
स्त्री जातक - स्त्री मे भी गुण-दोष पुरुष जैसे ही होते है, अंतर निम्न है :-
1 स्त्री जातक घुंगराले बाल वाली, मिष्टभाषी, लाल आँखे, उन्नत नाक होती है।
2 यह बहसबाज, उत्तेजना रहित, पड़ोसियो और घर वालो से मनमुटाव रखती है।
3 यह संगीत प्रेमी, नृत्य मे माहिर होती है। पति सुन्दर होता है। अस्वस्थ रहती है।
पुनर्वसु फलादेश आचार्यो अनुसार
पुनर्वसु नक्षत्र मे उत्पन्न जातक जितेन्द्रिय, व्रत-उपवास मे लीन, सुखी-सद्चरित्र, लाभ कमाने मे निपुण, व्यापार मे रेत से तेल निकलने वाला, सोना इकट्ठा करने की आदत वाला होता है।
इन्हे पुनः पुनः वसु अर्थात धन प्राप्त होता है। जिससे इनकी प्रभुता मे वृद्धि होती है। व्यापार-व्यवसाय या क्रय-विक्रय भी अपनी शर्तो अनुसार
करते है। - जातकाभरण
इन्हे अचल सम्पदा का सुख अच्छा मिलता है। यदि रोग ग्रस्त हो, तो विशेष कष्ट होता है। इन्हे पेय पदार्थ दूध, शरबत, फलो का रस, मट्ठा, इक्षु रस अादि का शौक होता है। - वराहमिहिर
ये संतान विहीन भी होते है। इनकी प्रतिष्ठा चन्द्रमा की तरह घटती बढ़ती रहती है।
कभी-कभी पुराण या शास्त्र पढ़ने का अवसर ये लोग निकाल लेते है। - पराशर
चन्द्र - इस नक्षत्र मे चंद्र हो, तो जातक मित्रवत, मिलनसार, खुश, आत्म संयमी, धर्म में रुचिवान, सरल जीवन, विवाह मे बाधा, चंचल, लेखक, अनिश्चयी, स्व प्रशंसक होता है।
जातक मजबूत आतंरिक संसाधन युक्त, समस्या से निकलने की क्षमता वाला, दार्शनिक, क्षमाशील, धार्मिक, आध्यात्मिक, दिलकश, आदर्शवादी, परिवार और घर के प्रति ईमानदार होता है।
⇴ चंद्र इस नक्षत्र मे संतोष, धीमी शिक्षा, विनम्रता का कारक है। - वरामिहिर
सूर्य - सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र मे हो, तो महान बौद्धिक कौशल वाला, संचार क्षेत्र मे उपहार प्राप्त करने वाला, भावनात्मक रूप से अभिभूत, अच्छी सामाजिक स्थिति वाला होता है।
लग्न - जातक धर्मार्थी, बुद्धिमान, विचारशील, काव्यशील, भावुक, लेखक, मजाकी, स्वतंत्रता प्रिय, अभिनय कुशल, मित्रवान, आध्यत्मिक, सफल व्यापारी होता है।
चरण फल
प्रथम चरण - इसके स्वामी मंगल है। इसमे बुध, गुरु, मंगल ☿ ♃
का प्रभाव है।
मिथुन 80।00 से 83।20 अंश । नवमांश मेष। यह गति, साहसिक / जोखिम
के काम, दर्शन, आध्यात्मिक मार्ग, मित्रता का द्योतक है।
जातक ताम्र वर्ण, अरुण और समुन्नत नेत्र, विशाल वक्ष, शिक्षा व कला मे निपुण, मज़ाकी स्वाभाव का होता है।
जातक कुशल, गुणी, सृजनात्मक होता है। कार्य प्रारम्भ मे जल्दबाज बाद मे सामान्य और सफल होता है। ये आसानी से मित्र और महिला मित्र बना लेते है। इनकी संतान समर्पित होती है। बिना ओरो को नुकसान पहुंचाये धन कमाने मे माहिर होते है।
द्वितीय चरण - इसके स्वामी शुक्र है। इसमे बुध, गुरु, शुक्र ☿ ♃
का प्रभाव है।
मिथुन 83।20 से 86।40 अंश। नवमांश वृषभ। यह स्थाईत्व, भौतिकता, यात्रा का द्योतक है।
जातक श्याम वर्णी, मोटा शरीर, लम्बे श्वेत नेत्र, मनस्वी (मनन, चिंतन, विचार) मधुर भाषी कलाविद होता है। जातक संपत्ति का संग्रहक, बिना मेहनत किये कमाने मे कलाविद, संचार कुशल, सफल व्यापारी होता है।
तृतीय चरण - इसके स्वामी बुध है। इसमे बुध, गुरु, बुध ☿ ♃ ☿ का प्रभाव है। मिथुन 86।40 से 90।00 अंश। नवमांश मिथुन। यह कल्पना, मानसिक केंद्र, विज्ञान का द्योतक है।
जातक गोल श्वेत नेत्र, सुन्दर देह निपुण, मेघावी, रति क्रीड़ा दक्ष, कला साहित्य विज्ञान का ज्ञाता होता है। इस चरण मे धन अर्जित करने की ऊर्जा होती है। जातक उच्च शिक्षा प्राप्त, साहित्य प्रेमी, संधर्ष से धनी होता है।
चतुर्थ चरण - इसके स्वामी चन्द्र है। इसमे चन्द्र, गुरु,चंद्र ☾ ♃ ☽ का प्रभाव है। कर्क 90।00 से 93।00 अंश। नवमांश कर्क। यह माँ बनना, मातृत्व, फैलाव, पोषण का द्योतक है।
जातक स्वच्छ, सुन्दर गौर वर्ण, बड़ा पेट अथवा कमर. दिव्य आभा युक्त मुखड़ा, बड़े नेत्र, छोटी भुजा होती है। इस पाद में पुनर्वसु के सबसे घनात्मक प्रभाव होते है। जातक अत्यधिक देख-भाल करने वाला, दानी, आध्यत्मिक ज्ञान के लिए परिश्रमी, रचनात्मक लेखक, नाम और शोहरत वाला होता है।
आचर्यों ने चरण फल सूत्र रूप मे कहा है परन्तु अंतर बहुत है।
यवनाचार्य : पुनर्वसु के प्रथम चरण मे सुखी, द्वितीय मे विद्वान, तृतीय मे रोगी, चतुर्थ में मृदुभाषी होता है।
मानसागराचार्य : पुनर्वसु के पहले चरण मे चोर, दूसरे मे महात्मा, तीसरे मे देव-गुरु भक्त, चौथे मे धनी होता है।
नक्षत्र चरण मे ग्रह फल
भारतीय मतानुसार सूर्य, बुध, शुक्र की आपस मे पूर्ण या पाद दृष्टि नही होती है क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश, शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते।
सूर्य :
सूर्य चन्द्र से दृष्ट होने पर जातक परिजनो से परेशान, जन्म स्थान से दूर निवास करने वाला, सम्पत्ति अर्जित नही कर पाता है।
सूर्य मंगल से दृष्ट होने पर जातक शत्रुओ से पीड़ित और
आलसी होता है।
सूर्य गुरु से दृष्ट होने पर जातक गूढ़ विद्या
(मन्त्र-तन्त्र, ज्योतिष आदि) मे
निपुण होता है। पत्नी और सन्तान
से वैचारिक मतभेद रहते है।
सूर्य शनि से दृष्ट होने पर जातक मातहतो के प्रति
क्रूर, अशुद्ध कार्य
करने वाला लेकिन कार्य के प्रति हमेशा वफादार होता है।
पुनर्वसु सूर्य चरण फल
प्रथम चरण - जातक अच्छी बुद्धि वाला, अचल संपत्ति से लाभ प्राप्त करने वाला, रोग से पीड़ित होने पर कष्ट पाने वाला, स्वर्ण या भूगर्भ की वस्तुओ को इकठ्ठा करने वाला, धनवान होता है।
मतान्तर - जातक उच्च शिक्षित, धनवान, ज्योतिष पर लेखक, 38 वर्ष पश्चात भाग्यशाली, संत द्वारा ईश्वरीय शक्ति पाने वाला, सबका स्नेह भाजक होता है।
द्वितीय चरण - जातक बहुत तेज बुद्धिवाला, गणित व भाषा मे प्रवीण, इन्द्रियो को वश मे रखने वाला, कुशल प्रशासक, अन्तर्दर्शी, अनुमानो मे चतुर, प्राकृतिक सौन्दर्य प्रेमी, राजनीतिज्ञ होता है।
तृतीय चरण - जातक महान बौद्धिक, तेज बुद्धिवाला, धन कमाने मे कुशाग्र होता है। राजनीति मे उच्चस्थ या मंत्री, मित्रो से लाभन्वित होता है।
चतुर्थ चरण - जातक असाध्य रोग से पीड़ित, निर्धन, कर्जदार होता है। वह निम्न स्तर पर होगा या ऐसा व्यापार करेगा जिसमे लाभ कम होगा।
चंद्र :
पुनर्वसु मे चन्द्र सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक विद्वान, सम्मानीय लेकिन निर्धन होगा।
पुनर्वसु मे चन्द्र मंगल से दृष्ट हो, तो जातक विद्वान, दयावान, विज्ञान कार्य से धन कमायेगा।
पुनर्वसु मे चन्द्र बुध से दृष्ट हो, तो जातक सरकार से सहायता प्राप्त करेगा।
पुनर्वसु मे चन्द्र गुरु से दृष्ट हो, तो उसके कार्य को सहारा जायगा, समाज मे सम्मान होगा।
पुनर्वसु मे चन्द्र शुक्र से दृष्ट हो, तो उसे जीवन के वांछित सुख मिलेगे।
पुनर्वसु मे चन्द्र शनि से दृष्ट हो, तो जातक धन, परिवार, पत्नी से वंचित होगा।
पुनर्वसु चन्द्र चरण फल
प्रथम चरण - जातक रोग से पीड़ित, एक अववय दोषित अथवा असाधारण, मिश्रित स्वभाव, दो माताएं, विद्वान होगा। गुरु की युति होने पर कन्या संतति अधिक होगी। यदि लग्न उत्तरा भाद्रपद मे हो, तो प्रतिष्ठा, अनार्जित धन, कई भाई वाला, शत्रुहंता, अनेक काम ठीक व सफाई से करने वाला होगा।
द्वितीय चरण - जातक स्त्री या यौनरोग विशेषज्ञ, कु आदत वाला, वैज्ञानिक या राजदूत या प्रतिनिधि होगा। एक से अधिक विवाह करने के बाद भी स्त्रियो में रत होगा। स्त्रिया उसकी भक्त होगी।
तृतीय चरण - जातक चतुर, स्त्रियो (कामसुख) और संगीत का शौकीन, जुआरी होगा। यदि बुध से युत हो, तो नम्र, व्याख्या करने मे निपुण, जनप्रिय, ख्याति प्राप्त होगा। शनि से युत हो, तो पिता के सुख से वंचित होगा।
चतुर्थ चरण - जातक यौन विज्ञान मे कुशल, रक्तिम नेत्रो वाला होगा। यदि गुरु से युत हो, तो परिवार या समुदाय का मुखिया, धनवान होगा। यदि मंगल से युत हो, तो पैसे के लिए पत्नी को बेचने मे भी नही हिचकेगा। यदि चंद्र द्वितीयेश या सप्तमेश हो, तो अल्पायु होगा।
मंगल :
पुनर्वसु मे मंगल सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक धनवान, अति बुद्धिमान, धैर्यवान, शक्तिवान होगा।
पुनर्वसु मे मंगल चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक सेना या आरक्षी मे होगा। अच्छी औरतो की संगति करेगा।
पुनर्वसु मे मंगल बुध से दृष्ट हो, तो जातक गणितज्ञ, कविता, संगीत* प्रेमी होगा। अवसर पड़ने पर सफ़ेद झूट बोलेगा। * यदि बुध तीसरे या ग्यारहवे भाव मे हो, तो ही संगीत प्रेमी होगा।
पुनर्वसु मे मंगल गुरु से दृष्ट हो, तो जातक प्रारम्भ मे परदेश मे कष्ट पायेगा, 40 वर्ष की उम्र बाद सुखी होगा।
पुनर्वसु मे मंगल शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक चरित्रहीन स्त्री मे अधिकतर समय व्यतीत करेगा
और अनैतिक तथा आपराधिक तरीको से धन अर्जित करेगा।
पुनर्वसु मे मंगल शनि से दृष्ट हो, तो धोखेबाज, आलसी होगा। और वनोपज या लकड़ी का व्यवसाय करेगा।
पुनर्वसु मंगल चरण फल
प्रथम चरण - जातक साहसी, अचल सम्पत्ति से सुखी, युद्ध प्रेमी या बार-बार लड़ाई-झगड़ा करने पर आमादा, उत्पीड़क होता है।
∎ अन्यत्र - जातक जड़ी-बूटी का व्यवसाय करेगा। स्त्री जातक धोखेबाज, चरित्रहीन, रोगग्रस्त, *दूसरो का धन हड़पने मे माहिर होती है। *उक्त फल पुरुष जातक मे भी मिलता है।
द्वितीय चरण - जातक रतिक्रीड़ा प्रवीण, भिन्न-भिन्न तरीको से रति करने मे माहिर, परिवार का स्नेह भाजन, मीठे वचनो से दूसरो को प्रसन्न करनेवाला, कर्मकांड मे रूचि रखनेवाला, धातु शोधक, कुशाग्र बुद्धि होता है।
∎ अन्यत्र - जातक युद्ध के मामले मे कुशल, दूसरो के मामले मे ईर्ष्यालु, वस्तु क्रय-विक्रय और संग्रह से धनी , अनेक रोगो से ग्रस्त होता है।
तृतीय चरण - जातक विद्वानो का आदर करने वाला, तीव्रबुद्धि, सफल व्यापारी, लाभ कमाने मे बुद्धि का उपयोग करनेवाला, सौभाग्यशाली, राज्य से सहायता प्राप्त करने वाला होता है।
∎ अन्यत्र - जातक सम्पत्ति और प्रतिभूतियो मे व्यस्त तथा ज्यादा कमाने के लिए उत्सुक, कामुक, सुख चाहने वाला, प्रमुख लोगो की सेवा मे धन व्यय करेगा।
चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, बुद्धिमान, कला कुशल, शांत व संतोष प्रकृति का होता है, ये सम्मानित भी होते है लेकिन इनकी यश-प्रतिष्ठा चन्द्रमा की भांति घटती-बढ़ती रहती है। पुरुष जातक का जीवन सुखी, लेखन से सम्पत्ति, दुर्घटना की सम्भावना, तक यौन रोग (एड्स) होगे। स्त्री जातक मे गर्भपात, शरीरिक तकलीफ होगी।
बुध :
पुनर्वसु मे बुध चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक मधुर शैली मे वाचाल, परिवार मे एकता करने वाला, शासकीय सेवक होता है।
पुनर्वसु मे बुध मंगल से दृष्ट हो, तो जातक आकर्षक वस्त्र पहिनने वाला, नियोक्ता का स्वामी भक्त होगा।
पुनर्वसु मे बुध गुरु से दृष्ट हो, तो जातक उच्च श्रेणी के लोगो का प्रतिनिधि, असर और प्रभावकारी जन संपर्क अधिकारी, अनुबंध अनुसार मतभेद दूर करने वाला और शत्रुओ को
परास्त करने मे माहिर होता है।
पुनर्वसु मे बुध शनि से दृष्ट हो, तो जातक कार्य क्षेत्र मे तुरंत प्रसिद्धि पाने वाला, सबका सम्मान करने वाला, मध्यम धनी होता है।
पुनर्वसु बुध चरण फल
प्रथम चरण - जातक सरकारी सेवा मे शिखर तक पहुंचेगा। सम्पत्ति और प्रसिद्धि पायेगा। वह विज्ञान और कला के अनेक विषयो का ज्ञाता, शांतिपूर्ण जीवन मे विश्वास करने वाला, दूसरो का सम्मान करने वाला, दो स्त्रियो का स्वामी होता है।
द्वितीय चरण - जातक वाणी सम्राट, सफल ज्योतिषी, अनेक कार्यो से सम्पत्तिवान, वृद्धो और मुख्य लोगो द्वारा प्रशंसित, बिना भेद-भाव के कर्तव्यो का पालन करने वाला होगा। अपने स्तर पर कायम रहेगा। जनता उसे सुनेगी और सहमत होगी।
तृतीय चरण - जातक विज्ञान या गणित अथवा ज्योतिष या अर्थशास्त्र का ज्ञाता, साधरण जीवन व्यापन करने वाला, सामाजिक और धार्मिक कार्यो में रुचिवान, व्यापार मे अधिक धन लगाकर अल्प लाभ लेने वाला होगा।
चतुर्थ चरण - जातक स्वस्थ, सुंदर, पेय पदार्थो का शौकीन, शिक्षण संस्थान या संगठन का प्रमुख, शासन के निकट, धनवान, प्रसिद्ध होगा।
गुरु :
पुनर्वसु मे गुरु सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक की पत्नी सुशील व सुन्दर, सन्तान युक्त, परिवार मे आदरणीय होगा।
पुनर्वसु मे गुरु चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक अनेक गांव और शहरो की देख-भाल करने वाला
(जिलाधीश) संघर्ष के बाद प्रसिद्ध, पवित्र (सात्विक) आचरणी होगा।
पुनर्वसु मे गुरु मंगल से दृष्ट हो, तो जातक सेना मे होगा और अनेक असफलताओ के बाद सफल
होगा।
पुनर्वसु मे गुरु बुध से दृष्ट हो, तो जातक ज्योतिष शास्त्र का ज्ञाता, उम्दा पारवारिक जीवन, मृदुभाषी होगा।
⇴ विश्वविख्यात ज्योतिषी "नास्त्रेदम" का पुनर्वसु गुरु बुध से दृष्ट था।
पुनर्वसु मे गुरु शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक अल्प धनी, औरतो के कारण परेशान, वायदो को कभी पूरा नही करने वाला होता है।
पुनर्वसु मे गुरु शनि से दृष्ट हो, तो जातक शासन मे उच्च पदासीन और लाभ प्राप्त करने
वाला, धनी, सबका सम्मान करने वाला होता है।
पुनर्वसु गुरु चरण फल
प्रथम चरण - जातक व्यसन प्रिय, पेय पदार्थो का शौकीन होने से शराब की लत वाला होता है। बार-बार अचल सम्पत्ति मिलने के कारण अहंकारी होता है। कोई-कोई जातक निसंतान भी होता है।
∎ अन्यत्र - जीवन के सभी प्रकार के सुख, सम्मान प्राप्त करेगा। मध्यमावस्था तक पारिवारिक जीवन दुःखद, जनसेवा और सामाजिक कार्य करने के कारण पत्नी से वैमनस्य होगा। कार्य से दूसरे शहर में रहेगा।
द्वितीय चरण - जातक धनवान, प्रसिद्ध, पुजारी या पंडित, दूसरो की सहायता करने वाला होगा। परिवार से दुःखी, पत्नी संकीर्ण विचार वाली होगी। संतान शिक्षित और गुणवान होगी जिससे मध्यमावस्था मे सुखी होगा।
तृतीय चरण - जातक राजकुमार, कुछ जिद्दी स्वभाव वाला, सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने वाला, मंत्री या अध्यापक, मंत्रीत्व से धनवान, युवावस्था से ही धनवान होता है।
चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर स्त्रियो का चहेता, स्त्रियो का अभीष्ट पूरा करने वाला, जीवन मे अत्यधिक प्रसिद्ध, ख़ुशी और धन की कमी महसूस करने वाला, परिवार और मित्रो से दुःखी किन्तु दूसरो द्वारा सम्मानित होगा। यदि बुध से दृष्ट हो, तो शाही वैभव प्राप्त करने वाला, अनेक भवनो का स्वामी, कई लोगो का भरण-पोषण करने वाला होगा। स्त्रिया उसकी कृपा दृष्टि की आकांक्षी होगी।
शुक्र :
पुनर्वसु मे शुक्र चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक गौरवर्ण, लम्बे बाल वाला, स्वादिष्ट भोजन और सुन्दर वस्त्र धारण करनवाला होगा।
पुनर्वसु मे शुक्र मंगल से दृष्ट हो, तो जातक भाग्यवान, जमीन व्यवसायी होगा।
पुनर्वसु मे शुक्र गुरु से दृष्ट हो, तो जातक लेखन विशेषज्ञ होगा। कई सेवक होगे लेकिन
पारिवारिक जीवन कष्टमय
होगा।
पुनर्वसु मे शुक्र शनि से दृष्ट हो, तो जातक छल, कपट, धोखे से पीड़ित, सताया हुआ, सदैव कष्ट पाता है।
पुनर्वसु शुक्र चरण फल
प्रथम चरण - जातक वस्त्राभूषण से संपन्न, फल-फूल व्यवसायी, जाति समाज का नेता, सम्मानीय होगा।
द्वितीय चरण - जातक दीर्घसूत्री, जाहिल, कार्यो में अरूचिवान परन्तु जिज्ञासु, अस्वीकारी मस्तिष्क के लिए संघर्षशील होगा।
तृतीय चरण - जातक विद्वान, धर्म के मर्म को समझने वाला, वस्त्राभूषण और सुंदरता की वस्तुओ को सम्भाल कर रखने वाला, शासकीय संस्था मे नियुक्त पर पदो मे बदलाव होता रहता है। वह शीर्ष अधिकारी, प्रशासक, शिक्षाशास्त्री होगा। इसकी पत्नी गुणी, संस्कारित और समान व्यवसाय / विभाग मे होगी।
चतुर्थ चरण - जातक धन सम्पदा वैभव युक्त, पत्नी सुन्दर मनोकुल सुशील होती है। सुसराल से धन प्राप्तक होता है। शनि की दृष्टि हो, तो दूसरो के लिए काम करने वाला होगा।
शनि :
पुनर्वसु मे शनि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक ख़ुशी रहित और निम्न स्तरीय लोगो के साथ
रहेगा।
पुनर्वसु मे शनि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक आकर्षक व्यक्तित्व, प्रसिद्ध, सरकार से लाभ प्राप्त करेगा।
पुनर्वसु मे शनि मंगल से दृष्ट हो, तो जातक प्राचीन ज्ञान, विज्ञान, प्रथाओ का ज्ञाता होगा।
पुनर्वसु मे शनि बुध से दृष्ट हो, तो जातक व्यापार मे कुशल, धैर्यवान, धनवान, व्यवहार कुशल होगा।
पुनर्वसु मे शनि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक खूबियो वाला, सरकार या प्रतिष्ठान की सेवा मे होगा।
पुनर्वसु मे शनि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक सोने काशे का व्यवसायी, स्त्रियो से लाभी, पत्नी से व्यथित होगा।
पुनर्वसु शनि चरण फल
प्रथम चरण - जातक इन्द्रियो के वशीभूत, आचरण भ्रष्ट, जुआरी, नास्तिक, अवैधानिक कार्यो से ऋणी और सहानुभूति का पात्र, कपटी, मेकेनिक के रूप मे नौकर, विकलांग होता है।
द्वितीय चरण - जातक छोटे-मोटे व्यापार से जीवन व्यापन करने वाला, शेयर या सट्टा बाजार या साहूकारी से लाभ प्राप्त करने वाला, भवन निर्माता, गाली-गलोच करने वाला होता है।
तृतीय चरण - जातक अपने व्यापार से संतुष्ट, रसायन और रसविद्या व्यापार मे परिश्रमी होगा। अधीनस्थ कर्मचारी उच्च पद पर होगे।
चतुर्थ चरण - जातक ठिगना या मध्यम कद वाला परन्तु आकर्षक होगा। बाल्यावस्था मे रोगी होगा। माता-पिता के प्यार से वंचित होगा। दूसरो का मददगार लेकिन तनाव ग्रस्त और खिंचा हुआ रहेगा।
पुनर्वसु राहु चरण फल
प्रथम चरण - जातक अनुमान करने मे चतुर, अपने कार्यो का विशेषज्ञ, लेखन, व्यापार और शिक्षा से जुड़ा हुआ होगा। हाथ-पैर व कानो मे सूजन, वातविकारी होगा।
द्वितीय चरण - जातक दयालु, बढ़िया महंगे वस्त्र पहिनने वाला, विज्ञान और शोध में सफल तथा इनसे आजीविका करने वाला, सोना-वस्त्र तथा कांसे का व्यापार व्यवसाय करने वाला होगा।
तृतीय चरण - जातक तीव्र बुद्धि, परिवार से अलग मान्यता और विचार धारा रखने वाला, योजना आयोग या वित्त मे लिप्त, शासकीय कार्यालय में पंजीयक होगा।
चतुर्थ चरण - जातक कथा लेखक, प्रतिष्ठित गणितज्ञ, सद्चरित्र वालो के संपर्क मे रहेगा। राहु यदि बुध या गुरु से दृष्ट या युत हो, तो उत्कृष्ट ज्योतिषी और गणितज्ञ होगा।
➤ विख्यात ज्योतिर्विद व्ही, व्ही, रमन, के कृष्णमूर्ति, के, एन. राव, कीरो सभी का राहु द्वितीय भाव मे गुरु के प्रभाव मे था।
➤ प्रसिद्ध अंक ज्योतिर्विद मेरिनो यारा और ब्राजीलियन का राहु द्वितीय भाव मे बुध से दृष्ट था।
पुनर्वसु केतु चरण फल
पहला पाद - जातक धनवान, दीर्घायु, संतान युक्त, भाई-बहन के लिए हानिकारक, सद्व्यवहारी होता है।
दूसरा पाद - जातक रोगी, कमजोर हृदय, धनाढ्य परिवार मे जन्मा लेकिन कंगाल जैसा होता है। यदि केतु पाप प्रभाव मे हो, तो जातक यतीम या पिता द्वारा अनाथालय भेजा जायगा।
तीसरा पाद - जातक दो विवाह करेगा और दोनो पत्नियो को दुश्मन समझेगा। संतान बहुल होगा। हृदय रोग से मृत्यु या आत्मघाती होगा।
चौथा पाद - जातक परिश्रमी किन्तु अल्प आमदनी, परिश्रम से जीने वाला, बुद्धिमान संतान से खुशिया प्राप्त करने वाला होता है। यदि केतु पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक गोद नसीन होता है।
जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।
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